राजपथ - जनपथ
समर्पण की जीवंत तस्वीर
छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ प्रेस-फोटोग्राफर गोकुल सोनी फेसबुक पर अपना देखा सच खूबसूरती से बताते हैं। अभी उन्होंने लिखा है- क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में इतनी सजी-संवरी हरियाली देखी है?
यह तस्वीर रायपुर के के.के. रोड, जयस्तंभ चौक के आगे स्थित क्चस्हृरु दफ्तर की है। हैरानी की बात यह है कि यहाँ फैली हरियाली सरकार के एक भी पैसे से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के समर्पण, प्रेम और जिम्मेदारी से सींची गई है।
इस ऑफिस में अब्दुल खलील केयरटेकर हैं, लेकिन सिर्फ केयरटेकर कहना उनके समर्पण के साथ अन्याय होगा। खलील साहब ने तीन सौ से ज़्यादा गमले, विभिन्न पौधे, मिट्टी, खाद—सब कुछ अपनी जेब से खरीदकर लगाया है। पानी देना, देखभाल करना, सफाई करना—यह सब वे रोज़ खुद करते हैं। विभाग की ओर से उन्हें इस काम के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता। वे यह सब सिर्फ पर्यावरण प्रेम और अपनी खुशी के लिए करते हैं।
खलील साहब का इस जगह से रिश्ता भी पुराना और गहरा है। जब यह ज़मीन बिल्कुल खाली पड़ी थी, उसी दौर से वे यहाँ जुड़े हुए हैं। 4 फरवरी 1994 को जब तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने तारघर भवन का भूमि पूजन किया था, तभी से अब्दुल खलील यहाँ सेवा दे रहे हैं। 10 अक्टूबर 1996 को भवन बनकर तैयार हुआ और तारघर स्थापित हुआ—तब से वे केयरटेकर और जनरेटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। तीन दशक बाद भी उनका यह सफर बिना रुके जारी है।
आज भी सुबह-सुबह आप उन्हें पौधों में खाद-पानी देते, सूखे पत्ते हटाते, नई कलियों को सहेजते देख सकते हैं। उन्होंने इस सरकारी दफ्तर को सिर्फ कार्यस्थल नहीं, एक जीवंत बगीचा बना दिया है—जहाँ हर पौधा उनके श्रम और संवेदनशीलता की खामोश कहानी सुनाता है।
बृजमोहन के अलावा देवजी भी
प्रदेश में जमीन की गाइडलाइन दरों की वृद्धि से जुड़ा विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस सिलसिले में सरकार ने गाइडलाइन दरों का पुनरीक्षण प्रस्ताव मांग कर कुछ हद तक मामले को ठंडा करने की कोशिश भी की है। बावजूद इसके भाजपा के भीतर ही गाइडलाइन दरों में वृद्धि को वापस लेने की मांग जोर पकड़ रही है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो खुले तौर पर गाइडलाइन दरों में वृद्धि पर असहमति जताई है, और अब पूर्व विधायक देवजी पटेल भी गाइडलाइन दरों में वृद्धि के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। देवजी पटेल ने सीएम विष्णुदेव साय को चि_ी लिखी है। पत्र में उन्होंने कहा कि गाइडलाइन की दरों में पुनरीक्षण हर साल होना चाहिए, मगर सरकार के सिपहसलारों के चलते नियंत्रित रूप से पुनरीक्षण नहीं किया गया, और वर्तमान सरकार के समय से ही एकमुश्त 8-9 वर्षों के पुनरीक्षण का नतीजा एक साथ 50 से 500 फीसदी तक वृद्धि स्पष्ट रूप से दृष्टिगत हो रहा है।
देवजी ने कहा कि सरकार के उच्चाधिकारियों द्वारा बिना सोचे समझे एकमुश्त वृद्धि जनता के लिए नासूर बन गया है। इसका नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में सरकार के खिलाफ माहौल बन गया है। उन्होंने कहा कि गाइडलाइन दरों में इतनी वृद्धि संभवत: पहली बार हुई है। अविभाजित राज्य के समय भी इस प्रकार की घटना नहीं हुई। परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ प्रदेश की आम जनता चाहे वह किसान हो, या बिल्डर हो, या आमजन सभी लिए शहरी-ग्रामीण क्षेत्र के जमीन संबंधी लेनदेन में इसका असर दिख रहा है।
प्रदेश के रजिस्ट्री कार्यालयों में वीरानी छाई हुई है। देवजी ने कहा कि प्रदेश की जनता के हित में जमीन की गाइडलाइन की दरों में वृद्धि के आदेश को निरस्त किया जाना चाहिए। देव जी के पत्र पर तो सरकार का रुख सामने नहीं आ पाया है। मगर इसे नजर अंदाज कर पाना मुश्किल होगा।
कब तक चलेगा जननी सुरक्षा नाटक?
आदिवासी बाहुल्य सरगुजा के लोगों को दो बार गर्व करने का मौका मिला। एक बार 2013 में कांग्रेस की सरकार बनी तो टी.एस. सिंहदेव प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने उसके बाद दूसरी बार श्याम बिहारी जायसवाल। यहां लोगों को लगा था कि अब तो अपने इलाके का स्वास्थ्य ढांचा चमक जाएगा, मां-बच्चों की जान नहीं जाएगी। लेकिन कुछ भी नहीं बदला, बल्कि और बदतर हो गया। सरगुजा की गर्भवती माताएं और उनके नवजात आज भी एंबुलेंस के इंतजार में, अस्पताल के बंद ताले के सामने या रास्ते में दम तोड़ रहे हैं। व्यवस्था की नाकामी क्रूर विडंबना ही बनी रह गई है।
सूरजपुर की कविता सिंह सोमवार-मंगलवार की रात प्रसव पीड़ा लेकर जिला अस्पताल पहुंचीं। उनका बीपी 180 पहुंच गया था। यह हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का साफ-साफ संकेत था। प्रोटोकॉल कहता है कि ऐसे में पहले बीपी कंट्रोल किया जाए, फिर रेफर करें। लेकिन यहां से तुरंत रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस में ही प्रसव हुआ और अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज पहुंचते-पहुंचते कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई। सिविल सर्जन डॉ. अजय मरकाम का जवाब देते हैं- हमारे यहाँ स्त्री रोग विशेषज्ञ ही नहीं हैं। यही सच है, वाहवाही के लिए सूरजपुर को जिला तो बना दिया, पर महिलाओं के लिए डॉक्टर ही नहीं। पिछले छह महीने में सूरजपुर में यह तीसरी घटना है। 8 अगस्त को भटगांव सीएचसी में महिला जमीन पर तड़पती रही, प्रसव हो गया। 24 सितंबर को जिला अस्पताल में इलाज नहीं मिला, रेफर किया, मौत हो गई। और अब कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई।
सप्ताह भर पहले लांजीत गांव के पीएचसी पर ताला लगा था। गर्भवती बाहर तड़पती रही, फिर किराए की कार में रास्ते में प्रसव कराना पड़ा। सिंहदेव के स्वास्थ्य मंत्री रहते (2013-18) भी बलरामपुर-वाड्रफनगर में आदिवासी खून की कमी से मर गए थे। वहां महीनों तक कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता झांकने नहीं गया था। सरगुजा से रोज खबरें मिलेंगी रेफर, एंबुलेंस उपलब्ध नहीं- मरीज पैदल या बाइक में ढोते हुए- रास्ते में मौत। और उसके बाद जांच कमेटी, निलंबन का नाटक और फिर बहाली, सब पहले जैसा।
अचरज की बात नहीं है कि इन सबके चलते ही नवजात मृत्यु दर में सरगुजा सबसे आगे है। पिछले छह महीनों में पूरे छत्तीसगढ़ में 3,184 नवजात और 221 माताएं मर चुकी हैं। कौन जिम्मेदार है? 2024-25 में स्वास्थ्य का बजट सिर्फ 4.8 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6 प्रतिशत से ऊपर है। मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर जैसे राज्य स्वास्थ्य पर 10 प्रतिशत के आसपास खर्च करते हैं। छत्तीसगढ़ में तो डॉक्टरों के 9,000 से ज्यादा पद खाली हैं। इनमें स्पेशलिस्ट के 70-80 प्रतिशत पद रिक्त हैं। तकनीशियन, नर्स और एनेस्थेटिस्ट की भी भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 40 फीसदी से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या तो बिना डॉक्टर के हैं या बिना बिजली-दवा के।
सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, योजनाएं बदलती हैं। जननी सुरक्षा योजना का नाम बहुत है, लेकिन जमीन पर क्या है? नशे में ड्यूटी करते डॉक्टर मिलते हैं, सर्जरी की कैंची भी थाम लेते हैं। क्या यह मान लिया जाए कि सत्ता और कुर्सी किसी की भी हो, आदिवासी जीवन की कीमत उनके लिए आज भी सस्ती है।
महासमुंद की सशक्त महिलाएं

दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल में हाल ही में महासमुंद जिले के बुंदेली गांव की एक रिपोर्ट ‘एक गांव’ के एपिसोड में प्रसारित की गई। बुंदेली गांव में महिलाओं ने अवैध शराब और नशे के खिलाफ एक प्रभावी आंदोलन चलाया है, जिसने गांव की सामाजिक स्थिति को बदला है और उन्हें आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाया है। महिलाओं ने एकजुट होकर गांव में अवैध शराब की बिक्री और सेवन के खिलाफ मोर्चा खोला। पहले यह गांव पूरी तरह से शराब की चपेट में था और घरेलू स्थिति काफी खराब थी। स्थानीय पुलिस के मार्गदर्शन में महिलाओं ने एक समूह का गठन किया। इस पहल के बाद गांव में मद्य निषेध पूरी तरह लागू है।
भाजपा की नई टीम
तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश भाजपा की नई टीम तैयार हो गई है। पार्टी ने आरंग के पूर्व विधायक नवीन मारकंडेय को प्रभारी महामंत्री का दायित्व सौंपा है। यही नहीं, अंबिकापुर के नेता और प्रदेश महामंत्री अखिलेश सोनी को रायपुर संभाग का प्रभारी बनाया गया है।
सोनी से पहले भूपेन्द्र सवन्नी रायपुर संभाग के प्रभारी थे। सवन्नी की पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर से अनबन रही है। इसके चलते कई बार वाद विवाद हो चुका है। नए प्रभारी अखिलेश सोनी के सांसद बृजमोहन अग्रवाल, और अजय चंद्राकर सहित अन्य नेताओं से मधुर संबंध हैं। कुल मिलाकर अखिलेश के प्रभारी बनने से गुटबाजी पर लगाम लगने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरी तरफ, जगदीश रामू रोहरा को बिलासपुर संभाग का प्रभारी नियुक्त किया गया है। रामू रोहरा चूंकि धमतरी के मेयर भी हैं। इसलिए उनके साथ अभिषेक शुक्ला को सहप्रभारी नियुक्त किया गया है।
बेमेतरा के पूर्व विधायक अवधेश चंदेल को सरगुजा, और जगन्नाथ पाणिग्रही को दुर्ग संभाग का प्रभारी नियुक्त किया गया है। बस्तर संभाग की जिम्मेदारी यशवंत जैन को दी गई है। यशवंत के साथ हरपाल सिंह भामरा को सहप्रभारी नियुक्त किया गया है। कुल मिलाकर नई टीम विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम करने की उम्मीद जताई जा रही है।
लंबे इंतजार का फल

ये तस्वीर सत्रह साल पुरानी है। उस कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन थीं। सोनिया के बगल की कुर्सी पर बिलासपुर के महेंद्र गंगोत्री, और उनके ठीक पीछे राजेन्द्र पप्पू बंजारे बैठे हैं। सोनिया गांधी ने एआईसीसी दफ्तर में अलग-अलग राज्यों से प्रशिक्षण के लिए आए प्रतिनिधियों को संबोधित भी किया था। महेन्द्र, और पप्पू बंजारे संगठन में पद के लिए प्रयासरत थे। अब जाकर दोनों ही अपने-अपने जिलों में अध्यक्ष बन पाए हैं।
महेन्द्र गंगोत्री को पार्टी ने बिलासपुर जिला कांग्रेस ग्रामीण अध्यक्ष की कमान सौंपी है। गंगोत्री, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के समर्थकों में गिने जाते हैं। उन्हें अध्यक्ष बनवाने में भिलाई विधायक देवेंद्र यादव ने भी भूमिका निभाई थी। इससे परे राजेन्द्र पप्पू बंजारे, धरसीवां जिला जनपद के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें भूपेश सरकार ने आरडीए संचालक मंडल का सदस्य बनाया था। अब उन्हें ग्रामीण जिला कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी मिली है। उन्हें ग्रामीण अध्यक्ष बनवाने में स्थानीय नेताओं की भूमिका रही है। दोनों को लंबे इंतजार का फल मिला है।
थानेदार को कलेक्टर का सैल्यूट

सरगुजा में अमेरा स्थित कोल ब्लॉक के आवंटन के खिलाफ ग्रामीणों के रोष ने हिंसक रूप ले लिया था। भीड़ का जैसा आचरण होता है- उन्होंने पुलिस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इनके बीच डीएसपी, महिला थाना प्रभारी- सुनीता भारद्वाज फंस गईं। उनकी जान खतरे में थी, फिर भी डटी रहीं। चोटें आईं, मगर ड्यूटी निभा रही थीं। सरगुजा कलेक्टर विलास राव भोस्कर ने प्रशासनिक अधिकारियों की एक बैठक में उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। इतना ही नहीं, भरी सभा में उन्हें सैल्यूट कर सम्मानित किया। बेशक, अमेरा के ग्रामीणों की कोयला खदान का विरोध करना जायज हो, लेकिन जब स्थिति उपद्रव की हो जाए- तो उसे नियंत्रित करना पुलिस का काम है और जो ऐसा करता है उसकी तारीफ भी होनी चाहिए। मगर, यह भी देखा गया है कि ग्रामीणों का गुस्सा फूटता कब है? प्राय: प्रशासन ग्रामीणों की जायज मांगों को भी नहीं सुनती। हाल ही में कवर्धा (कबीरधाम) और रायगढ़ जिले में नए संयंत्रों और खदानों के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहे हैं। हसदेव अरण्य को नष्ट होते देख वहां के आदिवासियों ने मीलों पैदल यात्रा की, सैकड़ों दिनों से शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं। प्रशासन सुन ले तो पुलिस को सामने करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सोशल मीडिया पर छाई सेल्यूट वाली इस तस्वीर पर कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया भी दी है। उनका कहना है कि पुलिस की लाठियों से ग्रामीण भी घायल हुए हैं, क्या कलेक्टर ने उनका हाल-चाल जाना। जल-जंगल और जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनों के साथ प्रशासन कभी सहानुभूति क्यों नहीं दिखाता?
विमान कंपनियों पर गुस्सा जारी
विमान सेवा अब तक सामान्य नहीं हुई है। लोग विमानन कंपनियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के विशेष सचिव रहे सीनियर आईआरएस अफसर अजय पाण्डेय ने फेसबुक पर लिखा कि एयर फेयर की लूट है, लूट सके तो लूट। वो दिन जल्दी आएगा सब मारेंगे बूट।
पाण्डेय ने लिखा कि ऐसे नाजुक मौके पर जब लाखों लोग एयरपोर्ट पर लाचार पड़े हैं, बच्चों के एग्जाम छूट रहे हैं। कोई किसी की शव यात्रा में नहीं जा पा रहा है। ऐसी लूट एयर इंडिया, और टाटा समूह के नाम पर कलंक है। इंडिगो तो सदा से बेशर्म थी, है और रहेगी। पाण्डेय ने रायपुर से मुंबई किराया साझा किया, जो कि 72722 रुपए पहुंच गया।
उन्होंने लिखा कि एयर फेयर में कैपिंग बेहद जरूरी हो चुका है। सरकार को हर एयर डिस्टेंस का अधिकतम किराया तुरंत निर्धारित कर देना चाहिए, और इंडिगो को सजा देनी चाहिए कई सौ करोड़ की पेनाल्टी लगाकर। आईआरएस अफसर के पोस्ट पर लोग काफी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं। एक ने लिखा-आपदा में अवसर।
गलती आई-गई हो गई
कई बार बड़े नेता वस्तुस्थिति की जानकारी के बिना ऐसी तथ्यात्मक गलती कर बैठते हैं, जिस पर सफाई देना भी कई बार मुश्किल हो जाता है। बात पिछले दिनों अंबिकापुर जिले के अमेरा कोयला खदान में लाठीचार्ज मामले की है।
घटना में डेढ़ सौ ग्रामीणों के साथ ही करीब तीन दर्जन पुलिसकर्मी जख्मी हुए। ग्रामीण कोयला खदान विस्तार का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस की प्रतिक्रिया तुरंत आ गई। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने कहा कि सरगुजा की घटना बेहद दर्दनाक है। सरकार अरबपतियों की गुलाम बनकर काम कर रही है। जंगल काटे जा रहे हैं। भूरिया ने कहा किसी भी कीमत पर अडानी मॉडल को सफल नहीं होने दिया जाएगा। हम है, तो जंगल हैं और जंगल है तो हम है।
विक्रांत ने जिस खदान को लेकर आंदोलन छेडऩे की बात कही है, वो अडानी नहीं, एसईसीएल की खदान है। यह जंगल नहीं बल्कि पठारी इलाका है। यहां पेड़ कटाई का कोई मसला नहीं है। जहां तक अमेरा खदान इलाके में अशांति का फैलने का सवाल है। इस पूरे मामले पर एसईसीएल ने कहा कि कोयला चोरों की वजह से घटना घटी है। ये बात अलग है कि सरगुजा के दूसरे इलाके में अडानी समूह खनन में लगी है, और वहां इसका विरोध भी हो रहा है। चूंकि कांग्रेस अडानी समूह को निशाने पर लेती रही है। इसलिए इस तथ्यात्मक गलती को अनदेखा कर दिया गया।
आदिवासी नेता की मौत पर घिरा जेल विभाग
पुलिस और जेलों में हिरासत के दौरान होने वाली मौतों को लेकर एक ही तरह की कहानी अफसरों के पास होती है। कांकेर के आदिवासी नेता जीवन ठाकुर की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके खिलाफ वन अधिकार का नकली प्रमाण पत्र बनवाकर जमीन पर कब्जा करने का आरोप था। पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बाद उनको 12 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया था। तब से वह जेल में थे। जमानत की अर्जी खारिज हो गई थी। नकली पट्टा बनवाना एक फर्जीवाड़ा तो है लेकिन ऐसे मामलों में प्राय: पट्टा निरस्त कर दिया जाता है। बड़े पैमाने पर ऐसी गड़बडिय़ां करने पर एफआईआर और गिरफ्तारी की कार्रवाई भी होती है- पर जमानत भी मंजूर कर ली जाती है। बहरहाल, कांकेर जेल से जीवन ठाकुर को 2 दिसंबर को रायपुर के रायपुर के सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया। परिजन बताते हैं कि उन्हें उनकी जानकारी के बिना ही शिफ्ट कर दिया गया। सेंट्रल जेल रायपुर के सुपरिंटेंडेंट का का कहना है कि बीमार होने के कारण उनको रायपुर लाया गया और यहां से मेकहारा में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 4 दिसंबर को मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि मौत सुबह हो गई थी लेकिन उन्हें इसकी जानकारी शाम को दी गई। मजिस्ट्रेट को मामला ज्यादा संगीन लगा होगा, इसलिए जमानत नहीं मिल पाई, और वे दो माह से जेल की सजा काट रहे थे। जेल प्रशासन पर परिजनों ने जो आरोप लगाए हैं उनका समाधान जरूरी है, जैसे जब बीमार थे- तो कांकेर के किसी अस्पताल में भर्ती किए बिना सीधे रायपुर क्यों लाया गया। रायपुर लाने और यहां पर मौत हो जाने के बाद परिवार को समय पर सूचित क्यों नहीं किया गया? सबसे बड़ी बात यदि जेल विभाग को लगता है कि मौत स्वाभाविक है, अफसरों ने कोई गलती नहीं की तो फिर कांकेर की जेलर को हटा क्यों दिया गया? मामला संवेदनशील हो चुका है क्योंकि आदिवासी समाज ने मोर्चा खोल दिया है। कांकेर ही नहीं- बस्तर संभाग में बंद का आह्वान आज किया गया है। देखना होगा कि क्या जीवन ठाकुर के परिजन और सर्व आदिवासी समाज को न्याय मिलेगा?
गूमा के रस का रहस्य
यह गूमा का फूल है और टेढ़ी चोंच वाली सन बर्ड। जैसे कुदरत ने दोनों एक दूसरे के लिए ही विकसित किया हो। फूल का रस भीतर छिपा होता है,सन बर्ड की लंबी नुकीली चोंच उस तक पहुंच जाती है। हर साल ठंड के दिनों में ये फूल खिलते हैं और रसपान के लिए सन बर्ड इसके पौधों के पास मंडराती रहती हैं। तस्वीर प्राण चड्ढा ने खींची है।
जिसका डर था वही हुआ
जिसे लेकर हर विद्युत कर्मचारी डर रहे थे वही हुआ। विद्युत कंपनी ने अपने 18 हजार कर्मचारियों के लिए पीएम सूर्य घर सोलर प्लांट लगाना अनिवार्य कर दिया है। श्रमिक अधिनियम के तहत उन्हें अविभाजित मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बिजली बिल में आधी छूट मिलती थी। पीएम सूर्य घर नहीं लगाने पर अब उन्हें मिलने वाली यह छूट बंद कर दी गई है। बेचारे बिजलीकर्मी अब घर के न रहे और न घाट के, क्योंकि विभाग से छूट तो बंद कर दी गई है, सरकार से 200 यूनिट की जो छूट सब उपभोक्ताओं को मिल रही है वह भी नसीब नहीं हो रही है। वे फरियाद भी नहीं लगा पा रहे हैं। अब कर्मचारी अधिकारी अपने-अपने संघों के बैनर तले इस पर प्रदर्शन धरने आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं।
हमने पिछले ही दिनों बताया था कि कंपनी के सलाहकारों की यह सलाह, गले की हड्डी की तरह फंस गई है। विद्युत मंडल के अधिकारी कर्मचारी चाहते हैं कि रेलवे की तरह वे भी हाईरिस्क सर्विस वाले होते हैं इसलिए उन्हें ,रेल कर्मचारियों के मुफ्त यात्रा पास की तरह बिजली मिलनी चाहिए। वे रेल कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम होते हैं। इसलिए यह मंडल के बजट को भी प्रभावित नहीं करेगा।
दुनिया की गर्माहट भी महसूस कर लें

छत्तीसगढ़ में सर्दी ने पूरे तेवर के साथ दस्तक दे दी है। जशपुर, मैनपाट, कोरिया और सरगुजा के ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान लगातार पांच से सात डिग्री सेल्सियस तक लुढक़ गया है। सुबह का कोहरा इतना घना है कि सूरज देर तक दिखाई ही नहीं दे रहा। खेत-खलिहान ओस की चमक से ठिठुरे हुए। अमरकंटक में पारा तीन से चार डिग्री पर स्थिर। जाड़े के चलते पूरा अमरकंटक नैचुरल फ्रीजर बन गया है। कमोबेश मैनपाट का भी यही हाल। दिन सिकुड़ गए। सुबह देर से खिल रही और शाम जल्दी ढल रही। सिहरन के मौके पर कंबल की गरमाहट और चाय की भाप में ही सुख मिल रहा है।
मगर, चलिये अवगत हो जाएं, इसी से जुड़े कुछ और भी दिलचस्प तथ्यों से। दक्षिण भारत में तस्वीर उलट है। छत्तीसगढ़ के और उत्तर और मध्य भारत के लोग ठिठुरन में लिपटे हैं, वहीं मुंबई में तापमान 32 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ा हुआ है। गोवा के समुद्र तटों पर दिन में 31 से 33 डिग्री की चमकती धूप है, जो लोगों को गर्मी का एहसास दिला रही है। केरल के कोच्चि में उमस की चुभन ने दिसंबर को हमारे यहां का मार्च बना दिया है। कर्नाटक के करवार में 35.8 डिग्री का रिकॉर्ड टूट गया है। विचित्र है मौसम। एक ही देश में सर्दी और गर्मी की तीखी विभाजन रेखा।
वैश्विक तस्वीर और भी चकित कर सकती है। पृथ्वी के कई हिस्सों में इस महीने ने इतिहास के सबसे गर्म दिनों के रिकॉर्ड दर्ज किए। कैरिबियन के डोमिनिका में तापमान 34 डिग्री से ऊपर चला गया, वहां दिसंबर का यह सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया। ताइवान में तापमान 33.5 डिग्री तक पहुंच गया है। यहां सामान्य तौर पर इस मौसम में हल्की ठंड रहती है, पर इस वर्ष कई शहरों में पारा लगातार 32 डिग्री से ऊपर है। अफ्रीकी देश तंजानिया में हीट वेव और सूखे ने मिलकर लोगों के लिए इसी दिसंबर ने जीवन कठिन कर दिया है। यूरोप भी नवंबर के बाद से अभूतपूर्व गर्मी का सामना कर रहा है। स्पेन में तो और बुरा हाल है। दिसंबर के शुरुआती दिनों में पारा 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो न केवल देश के बल्कि यूरोप के भी अब तक के सबसे चरम है। ओशिनिया से लेकर एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक 100 से अधिक देशों में दिसंबर के पहले ही सप्ताह में गर्मी के रिकॉर्ड टूट चुके हैं।
कमाल की यह धरती। कहीं गर्मी, कहीं सर्दी, कहीं वर्षा और कहीं पर सूखा। इधर, हम सर्द हवाओं से जूझ रहे हैं। अलाव और सिगड़ी जला रहे हैं, तो दूसरी तरफ दूर दुनिया तपन से हांफ रही है। मौसम की यह सनक ग्लोबल वार्मिंग के मसले से भी जुड़ी है, पर उस पर बात लंबी हो जाएगी। बस, हमें जलवायु को लेकर सतर्क और जिम्मेदार होना चाहिए।
बीस साल तक अंधेरे कमरे में
जगदलपुर में बीस साल तक एक लडक़ी को उसके ही रिश्तेदारों ने एक अंधेरे कमरे में बंद रखा। वजह यह बताई गई कि कोई छेड़छाड़ करने वाला व्यक्ति था, जिससे उसे बचाना जरूरी समझा गया। लंबे वक्त तक अंधेरी कोठरी में कैद रहने के कारण उसकी आंखों की रोशनी शायद कभी वापस न आए। मानसिक रूप से वह पूरी तरह टूट चुकी है। अपना नाम भी उसे याद करके बताना पड़ा।
भारत के दूसरे इलाकों की तरह छत्तीसगढ़ में भी लड़कियों की इज्जत और सुरक्षा को लेकर जुनून इतना गहरा है कि कई बार वह बड़ा खतरा बन जाता है। इस मामले में बाहर छेड़छाड़ करने वाला कोई एक आदमी था, लेकिन घर वालों ने उसे पूरी दुनिया से ही काट दिया, पूरे बीस साल के लिए। उस उम्र में जब कोई लडक़ी स्कूल जाती है, दोस्त बनाती है, सपने देखती है, प्यार करती है, वह दिन-रात अंधेरे में सांस लेती रही। वहां न धूप थी, न हवा, न किसी अपने का चेहरा, न किसी से कोई संवाद।
हैरानी की बात है कि ऐसा करने वाले उसके अपने रिश्तेदार थे। वे शायद भूल गए कि लक्ष्मण रेखा जैसी कोई लकीर खींचते-खींचते उन्होंने इस युवती से इंसान बने रहने तक का हक छीन लिया। बाहर के खतरे से बचाने के चक्कर में घर को ही जेल बना दिया।
समाज कल्याण विभाग के अफसर अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि यह अवैध कैद और मानवाधिकार उल्लंघन का मामला है या नहीं। लेकिन कानून के बाद भी सवाल बाकी रह जाता है कि क्या सामाजिक सोच भी इसके लिए दोषी नहीं है?
पुतिन के सम्मान में...

एक सदाबहार फिल्मी गीत है, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी। मगर, जूते भी रूसी नामों से भारत में बिकते हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लामिदिर पुतिन भारत आए तो सोशल मीडिया में यह बिलासपुर शहर के एक दुकान की यह तस्वीर डाल दी और कहा कि हमारे यहां तो बरसों से मॉस्को (रूस की राजधानी) को पसंद किया जाता है। इस नाम से यहां एक बहुत पुरानी दुकान है।
देवांगन की पिटीशन
राज्य खनिज निगम के पूर्व अध्यक्ष, और कांग्रेस नेता गिरीश देवांगन की उस याचिका पर सीजेएम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जिसमें उन्होंने ईओडब्ल्यू-एसीबी के अफसरों पर कोयला घोटाला केस में कथित तौर पर फर्जी बयान तैयार कर हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आरोप लगाया है।
देवांगन ने इससे जुड़े कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं। उन्होंने अपनी याचिका में फर्जी दस्तावेजी करण, न्यायालय में धोखाधड़ी, और कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का आरोप लगाया है। सीजेएम कोर्ट ने याचिका पर ईओडब्ल्यू-एसीबी चीफ अमरेश मिश्रा, और दो अन्य अफसर चंद्रेश ठाकुर, और राहुल शर्मा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था।
तीनों अफसरों की तरफ से पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के वकील रवि शर्मा ने जवाब दाखिल किए हैं। इसमें याचिकाकर्ता की शिकायतों का कड़ा प्रतिवाद किया गया, और याचिका के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए हैं। दोनों पक्षों से अपने-अपने समर्थन में दलील दी जा चुकी है, और 8 तारीख को प्रकरण पर अंतिम सुनवाई होगी। इस हाईप्रोफाइल मामले पर निगाहें कोर्ट पर टिकी हैं। देखना है आगे क्या होता है।
उड़ानों में एकाधिकार का नतीजा?

देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के कारण लाखों यात्री हवाईअड्डों पर फंसे हुए हैं। दिसंबर 2025 के पहले सप्ताह में इंडिगो ने एक हजार से अधिक उड़ानें रद्द कीं। दिल्ली से सभी घरेलू उड़ानें 5 दिसंबर को पूरी तरह बंद कर दी गईं। बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद जैसे प्रमुख हवाईअड्डों पर 100-100 से अधिक उड़ानें। रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट का भी यही हाल है। यात्री घंटों इंतजार करते रहे- बिना भोजन, पानी या स्पष्ट जानकारी के। सैकड़ों यात्री फंस गए हैं। शादी ब्याह का मौसम चल रहा है। कुछ लोगों को अपने बीमार परिजन को देखने के लिए जाना था, कुछ को अंतिम संस्कार में शामिल होना था। टिकट रद्द कर पैसे लौटाए तो जा रहे हैं लेकिन वैकल्पिक उड़ानों का किराया 4-5 गुना महंगा कर दिया गया है। एयरलाइंस कंपनियां जैसे ही भीड़ बढ़ती है, किराये में मनमाना वृद्धि कर देती हैं। इसी इंडिगो ने कुंभ मेले के समय 7-8 हजार की टिकट को 30 से 40 हजार रुपये में बेचा था। दिल्ली रायपुर के बीच टिकट सामान्य से पांच गुना महंगी हो गई है।
यह संकट नई ड्यूटी टाइम लिमिटेशन लागू करने की वजह से बताया जा रहा है। पायलटों के आराम के घंटे तय किए गए। संकट देखते हुए सरकार ने अब इसमें रियायत भी दे दी है, फिर भी उड़ानें नियमित नहीं हो पाई हैं।
मगर समस्या विकराल इसलिये दिखाई दे रही है क्योंकि यात्री के पास विकल्प नहीं है। इंडिगो के पास घरेलू बाजार का 65 फीसदी शेयर है। इंडिगो व एयर इंडिया मिलाकर 90 प्रतिशत उड़ानें संचालित करते हैं। किंगफिशर और जेट एयरवेज जैसी कंपनियां दिवालिया हो चुकीं, लेकिन इंडिगो को कोई बाधा नहीं आई। अमेरिका या यूरोपमें ऐसा एकाधिकार नहीं है। वहां एंटी-ट्रस्ट कानून सख्त है, जो बाजार 40 प्रतिशत से अधिक शेयर पर नियंत्रण लगाते हैं। भारत में इस एकाधिकार ने यात्रियों को बंधक दिया है।
लगे हाथ उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) योजना की भी अपने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में चर्चा कर लें। बिलासपुर, जगदलपुर और अंबिकापुर आदि शहरों से नियमित उड़ानों की योजना बनाई गई थी। मगर, कुछ उड़ानों के बाद अंबिकापुर हवाई अड्डा पूरी तरह बंद पड़ा है। बिलासपुर में भी फ्लाइट और फेरों की संख्या घटा दी गई है। हवाई सेवा विस्तार के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों की मांग है कि खुली निविदा से कंपनियों को उड़ानें शुरू करने के लिए बुलाया जाए, लेकिन सरकार अपनी मोनोपॉली तोडऩे के लिए तैयार नहीं है। छोटे शहरों के हवाई अड्डे इस जिद के चलते वीरान होते जा रहे हैं।
बदहाल अंबिकापुर
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कुछ महीने पहले कांग्रेस के एक कार्यक्रम में माना था कि अंबिकापुर नगर निगम को विकास कार्यों के मद में पर्याप्त राशि नहीं मिली, और इसका विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा।
प्रदेश की एकमात्र आदिवासी आरक्षित अंबिकापुर नगर निगम अब कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है। दस साल बाद यहां भाजपा काबिज हो गई। ऐसे में यहां सरकार से विकास कार्यों के मद में मदद की उम्मीद थी। सडक़ों की दुर्दशा है। यहां के स्थानीय नेता यहां की मूलभूत समस्याओं के निराकरण के लिए पार्टी संगठन तक गुहार लगा चुके हैं। मगर स्थिति में परिवर्तन नहीं आया है। सरकार ने नगरोत्थान योजना के मद में निगमों को विकास कार्यों के मद में राशि जारी की है, इसमें अंबिकापुर को 13 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। जबकि अंबिकापुर से ज्यादा चिरमिरी, भिलाई-चरौदा, और बीरगांव जैसे निगमों को मिला है।
बाकी निगमों के पास विकास के लिए डीएमएफ, और कई अन्य फंड भी हैं। इस मामले में अंबिकापुर काफी पीछे है। हाल यह है कि पिछले नगर निगम के पार्षदों को दो साल का मानदेय नहीं मिला है। ये सभी पार्षद अब पूर्व हो चुके हैं, और वो अपना बकाया मानदेय के लिए स्थानीय विधायक, और सरकार के मंत्री राजेश अग्रवाल से मुलाकात भी की थी। मगर उन्हें अब तक बकाया मानदेय नहीं मिला है। खास बात यह है कि प्रदेश के बाकी निकायों में ऐसी नौबत नहीं आई। अब कांग्रेस यहां जल्द ही आंदोलन छेडऩे की तैयारी कर रही है।
पीएम अवार्ड और छत्तीसगढ़
पांच माह बाद आगामी 21 अप्रैल, 2026 को सिविल सर्विसेज डे के मौके पर प्राइम मिनिस्टर अवार्ड दिए जाएंगे। ये सालाना दिए जाते हैं। ये अवॉर्ड देश भर के सिविल सेवक द्वारा प्रदेश या जिले में किए गए बेहतरीन काम को पुरस्कृत करने के लिए बनाए गए हैं। रजिस्ट्रेशन और नॉमिनेशन जमा करने एक पोर्टल इस साल 1 अक्टूबर को लॉन्च किया गया था, और एंट्रियां 30 नवंबर तक ली गई। इनमें छत्तीसगढ़ से भी आठ अफसरों ने भी अपनी कामयाबी को जमा किया है। इनमें जिला कलेक्टरों के अलावा दो सचिव स्तर के अफसरों ने भी जमा किया है। अब इनमें से कौन पीएम अवार्ड पाता है यह तो उसी दिन पता चलेगा। पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ के दो आईएएस अफसरों को यह अवार्ड मिल चुका है। इनमें से एक केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर है।
पर्सनल मिनिस्ट्री की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एक्सीलेंस के लिए प्राइम मिनिस्टर अवार्ड्स के लिए 2035 नॉमिनेशन मिले हैं। अवार्ड्स में एक ट्रॉफी, एक स्क्रॉल और 20 लाख रुपये का इंसेंटिव होगा, जिसे उस डिस्ट्रिक्ट या ऑर्गनाइजेशन को दिया जाएगा जिसका इस्तेमाल किसी प्रोजेक्ट या प्रोग्राम को लागू करने या पब्लिक वेलफेयर के किसी भी एरिया में रिसोर्स की कमी को पूरा करने के लिए किया जाएगा।
महाराष्ट्र डीजीपी का छत्तीसगढ़ से रिश्ता

एनआईए के डीजी सदानंद दाते को महाराष्ट्र का डीजीपी नियुक्त किया गया है। आईपीएस के 91 बैच के अफसर सदानंद दाते का छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। दाते बस्तर में सीआरपीएफ के आईजी रह चुके हैं, और उन्होंने नक्सल फ्रंट पर काफी बेहतर काम किया। वो मुंबई में 26/11 हमले के दौरान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
दाते की यहां पोस्टिंग से पहले छत्तीसगढ़ पुलिस, और सुरक्षाबलों के बीच तालमेल अच्छा नहीं रहा। यह भी शिकायतें रही कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान में सीआरपीएफ से अपेक्षित मदद नहीं मिल पाती है। मगर सदानंद दाते के यहां आने के बाद राज्य पुलिस के साथ मिलकर काम किया, और नक्सल फ्रंट पर उनके काम की काफी सराहना भी हुई। अब जब महाराष्ट्र के डीजीपी बने हैं, तो यहां उनके बेहतर कामों को याद किया जा रहा है।
मंत्रियों के बंगले बने रजवाड़े

छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष में राजनीतिक गलियारों में बैठो तो एक न एक पुराने किस्से नेता सुना ही देते हैं। एक कांग्रेस नेता ने एक ऐसा ही वाकया बताया- जब राज्य बना और महेंद्र कर्मा मंत्री बने तब वे वित्त मंत्री सिंहदेव के पास पहुंचे और दो चीजें मांगी पहला गाड़ी और दूसरा प्यून। अजीत जोगी ने पहले ही ऐलान कर रखा था कि स्थापना व्यय 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने दिया जाएगा।
सिंहदेव ने महेंद्र कर्मा की बातें सुनी और उठकर खड़े हुए और पीछे टेबल पर रखी फाइल उठाकर लाने लगे और कहा कि प्यून इतना ही काम करेगा। फाइल टेबल तक लाएगा, ये काम मैं खुद कर लेता हूं। हां गाड़ी की व्यवस्था धीरे धीरे कर लेंगे। अब जब राज्य के 25 साल पूरे हो गए हैं तक मंत्रियों के बंगलों को देखकर लगता है कि वे किसी राजा रजवाड़े ये कम नहीं हैं।
बताते हैं कि एक से पांच एकड़ में बने मंत्रियों के बंगलों में केवल गार्डन को मेन्टेन करने दस से पंद्रह लोग लगते हैं। सरकार में तेरह मंत्री हैं सो उनके विभाग के अधिकारी इतने कर्मचारी लगाने के लिए परेशान हैं। आउटसोर्सिंग से इनकी कमी पूरी की जा रही है फिर भी मंत्रियों को गार्डन की रौनक में कमी दिख रही है।
समस्या उन अधिकारियों की गलियों में नहीं है...
छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक न्यूज-फोटोग्राफर रहे हुए गोकुल सोनी सामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते हैं, और छत्तीसगढ़ का समकालीन इतिहास भी। आज उन्होंने फेसबुक पर लिखा है-रायपुर शहर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है।
हर गुजरते दिन के साथ इनकी तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है कि आम नागरिक खासकर बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। शहर के कई वार्डों से कुत्तों के झुंड के हमलों, रात के समय सडक़ों पर पैदा होने वाले डर के माहौल और आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। यह तस्वीर बाबूलाल टाकीज (अब शॉपिंग कॉम्प्लेक्स) के सामने गणेशराम नगर की है, पर समस्या सिर्फ एक मोहल्ले की नहीं, पूरे रायपुर की है। मच्छर उन्मूलन हो या कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण, नगर निगम की गंभीरता केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है। कुत्तों को पकडऩे वाली गाड़ी आती जरूर है, लेकिन कुत्ते तो दूर से ही देखकर ऐसे गायब हो जाते हैं मानो यह सब उनके लिए रोज़मर्रा का खेल बन गया हो। सच्चाई यह है कि यह समस्या उन अधिकारियों की गलियों में नहीं है, जहां वे रहते हैं। वहां तो परिंदा भी पर नहीं मार सकता फिर कुत्तों का झुण्ड कैसे पहुँच जाए। यही कारण है कि न प्रशासन सक्रिय है और न ही जनप्रतिनिधियों को इससे कोई खास सरोकार। नतीजा यह कि समस्या धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज़ी से विकराल रूप लेती जा रही है।
शहर को सुरक्षित बनाने के लिए अब केवल शिकायतें काफी नहीं। ठोस और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है, क्योंकि आज यह समस्या किसी और के मोहल्ले की है, कल आपके दरवाजे पर भी खड़ी हो सकती है।
फोकट वाला पनौती कौन?

नवा रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह क्रिकेट स्टेडियम में बुधवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका के मैच को लेकर रोमांच चरम पर रहा। करीब 60 हजार दर्शक मुकाबला देखने स्टेडियम पहुंचे थे। भारत की हार पर स्वाभाविक रूप से लोग मायूस हैं, और सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। मगर ज्यादा गुस्सा वो लोग उतार रहे हैं, जो कि टिकट के लिए प्रयासरत थे, और उन्हें टिकट नहीं मिल पाई। इनमें कई बड़े भाजपा नेता भी शामिल हैं।
राज्य श्रम कल्याण मंडल के पूर्व उपाध्यक्ष, और सीनियर भाजपा नेता सुभाष तिवारी ने फेसबुक पर अपने पोस्ट में लिखा कि कल भारत-दक्षिण अफ्रीका का वनडे क्रिकेट मैच था। मैं घर में टेलीविजन पर मैच देख रहा था। तभी दर्शक दीर्घा में एक पनौती बैठा हुआ दिखाई दिया, जो फोकट की टिकट में गया था। तभी मुझे शंका हो गई थी कि भारत यह मैच हार जाएगा। तिवारी का इशारा किसकी तरफ था, यह तो स्पष्ट नहीं है। मगर मैच देखने सरकार के मंत्री ओपी चौधरी, वन मंत्री केदार कश्यप, श्याम बिहारी जायसवाल, और कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त सौरभ सिंह, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह सहित पार्टी के कई कद्दावर नेता पहुंचे थे।
रायपुर नगर निगम के पूर्व पार्षद प्रमोद साहू ने एक अखबार में छपी उस खबर को फेसबुक पर साझा किया गया जिसमें प्रभावशाली अफसरों को 20-20 टिकट मिलने की बात कही गई है। साहू ने लिखा अफसरशाही हावी है। मैच देखने से वंचित हुए, तो नाराज भाजपा के नेताओं का गुबार निकाल रहे हैं। कुछ आईएएस अफसर किस्मत के इतने धनी थे कि उनके गार्ड, अर्दली, ड्राइवर सभी स्टेडियम में थे।
एमओयू के बाद पहला क्रिकेट..

शहीद वीर नारायण अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में कल हुए भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए मैच में गायकवाड़ और कोहली के शतक के बावजूद भारत को हार का सामना करना पड़ा। उनके प्रशंसक निराश हुए पर क्रिकेटप्रेमियों ने मैच का खूब आनंद लिया। छत्तीसगढ़ स्टेट क्रिकेट संघ और राज्य सरकार के बीच हुए अनुबंध के बाद यह पहला बड़ा आयोजन था। तब ध्यान जाता है कि क्या भविष्य में छत्तीसगढ़ के क्रिकेट खिलाडिय़ों को अधिक अवसर मिलने की संभावना बनती है? सरकार और राज्य के क्रिकेट संघ के बीच हुए एमओयू से कुछ बातें साफ होती हैं, कुछ नहीं।
सेंध झील के पास 50 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैले 65 हजार दर्शकों की क्षमता के साथ यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा स्टेडियम है। राज्य सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये सालाना की लीज पर सीएससीएस को सौंप दिया है। हर तीन साल में लीज की राशि बढ़ेगी। इसके अलावा कुछ मामूली रकम भी अलग-अलग मौकों पर सरकार को मिलेगी- जैसे हर अंतर्राष्ट्रीय मैच पर 20 लाख, आईपीएल पर 30 लाख रुपये। इस हिसाब से देखा जाए तो हजारों करोड़ की कीमत वाली जमीन तो दूर लागत के 145 करोड़ रुपये भी इन 30 सालों में नहीं मिलने वाले। मगर, सरकार का वह खर्च बच जाएगा, जो सालाना 3 से 4 करोड़ रुपये रखरखाव पर होते हैं। आने वाले वर्षों में यह खर्च और बढ़ता जाता। आम तौर पर भवनों, उद्यानों के रखरखाव के के लिए मंजूर सरकारी विभागों के बजट तो खत्म हो जाते हैं, पर जमीन पर वह खर्च दिखता नहीं। यहां, इसकी जिम्मेदारी सीएससीएस को उठाना है। सीएससीएस को बीसीसीआई में अपनी मान्यता बनाए रखने और स्टेडियम की लीज की राशि चुकाने के लिए जरूरी होगा कि वह रायपुर कलेक्टर की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी की निगरानी के ही स्टेडियम को अच्छी हालत में रखे और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपग्रेड करता रहे।
मगर, अनुबंध की दूसरी बातें भी महत्वपूर्ण हैं, जिनमें राज्य के उभरते क्रिकेटरों की ट्रेनिंग और सुविधाएं प्रदान करना, ताकि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत प्रदर्शन कर सकें। देखना यह होगा कि राज्य में क्रिकेट की गतिविधियों और खेल पर्यटन को इस अनुबंध से कितना प्रोत्साहन मिल पायेगा। क्या भविष्य में नया रायपुर क्रिकेट हब बन पाएगा?
संचार साथी की पहुंच कितनी ?

विपक्ष, डिजिटल राइट्स ग्रुप, टेलीकॉम कंपनियों और डिवाइस निर्माताओं के विरोध के बाद संचार साथी ऐप को अनिवार्य करने से केंद्र सरकार पीछे हट गई है। पर यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि वह क्या-क्या जानकारी हासिल करने की अनुमति मांगता है। एक एंड्राइड फोन से यह विवरण लिया गया है। ऐप सभी कॉल इतिहास को पढ़ सकता है। उपयोगकर्ता के संपर्कों, कॉल की अवधि, और पैटर्न का विश्लेषण संभव है। फोन नंबर, डिवाइस आईडी (आईएमईआई), और वर्तमान स्टेटस (जैसे कॉल पर होना) तक पहुंच, उपयोगकर्ता की वास्तविक समय की लोकेशन और गतिविधियों को ट्रैक करना। फोन के इस्तेमाल नहीं करने पर भी ऐप बैकग्राउंड में चलता रहेगा। एसएमएस और एमएमएस पढऩे, भेजने की जानकारी लेने की क्षमता से निजी चैट तक पहुंच। यानि कोई ओटीपी या संवेदनशील जानकारी-जैसे बैंकिंग कोड भी। इसीलिए इसकी तुलना संसद में पेगासस जैसे स्पाईवेयर से की। प्री इंस्टाल संचार साथी मीडिया और स्टोरेज में संचार साथी घुसपैठ कर सकता है। यहां तक कि बिना सूचना के फोटो-वीडियो कैप्चर कर लेगा। स्टोरेज में फाइलों को पढऩा, संशोधित करना या हटाना भी संभव है। डिवाइस पर नियंत्रण का मामला ऐसा है कि ऐप बैकग्राउंड में लगातार चलता रहेगा और आपके ही फोन की बैटरी, इंटरनेट और वाई-फाई का इस्तेमाल करते हुए। फिलहाल सरकार ने अनिवार्य प्रि इंस्टाल का आदेश वापस ले लिया है और यह भी कहा है कि जिन्हें इसका इस्तेमाल नहीं करना है वे संचार साथी में लॉग इन नहीं करें और चाहें तो अपने फोन से हटा लें।
क्रिकेट की नेतागिरी या धोखागिरी?
नवा रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में बुधवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच की टिकट को लेकर काफी मारामारी रही। ऐसे में क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों के रवैये से विशेषकर रायपुर जिले के भाजपा विधायक काफी नाराज हैं, और इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिला। रायपुर के भाजपा विधायकों को उम्मीद थी कि उन्हें सौ-सौ टिकट मिल जाएंगे, इससे वो अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर सकेंगे। मगर मंगलवार की रात एसोसिएशन की तरफ से मंत्री-विधायकों को फ्री टिकट उपलब्ध कराया गया। मंत्रियों को 20, और विधायकों को 5 टिकट दिए गए। टिकट के लिए मंत्री-विधायकों के बंगले में कार्यकर्ताओं-समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा था। इतनी कम संख्या में टिकट आई, तो मंत्री-विधायकों में नाराजगी देखी गई।
बताते हैं कि रायपुर के एक विधायक को इस स्थिति का पहले से ही अंदाजा हो गया था, उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के लिए पहले ही टिकट खरीदकर बंटवा दिए। चूंकि एसआईआर अभियान में भाजपा कार्यकर्ता काफी मेहनत कर रहे हैं। ऐसे में क्रिकेट मैच की टिकट देकर उन्हें संतुष्ट करने का मौका भी था। और पर्याप्त टिकट नहीं मिली, तो विधायकों में गुस्सा स्वाभाविक था। रायपुर के भाजपा नेता को एसोसिएशन ने पांच सौ टिकट तो उपलब्ध करा दिए लेकिन इसके एवज में उन्हें चार लाख रुपए भुगतान करने पड़े।
क्रिकेट संघ के एक पदाधिकारी कारोबारी के खिलाफ फेसबुक पर काफी कुछ लिखा जा रहा है। टिकट ब्लैक करने के आरोप भी लग रहे हैं। कारोबारी अपने अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। चर्चा है कि वो पिछले चार दिनों से विधायकों तक का फोन नहीं उठा रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि बीसीसीआई के सबसे पावरफुल पदाधिकारियों में से एक राजीव शुक्ला, छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के सदस्य हैं, उनसे भी कई लोगों ने उम्मीदें लगा रखी थी। वो रायपुर में ही हैं, लेकिन सबको निराशा हाथ लगी।
हल्ला तो यह भी है कि सरकार के एक मंत्री ने तो क्रिकेट एसोसिएशन के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए टिकट वापस कर दिए। दरअसल, बीसीसीआई की पहल पर सरकार ने स्टेडियम पांच साल की लीज पर क्रिकेट संघ को दे रखा है। बावजूद इसके एसोसिएशन का रवैया निराशाजनक नजर देखने को मिला है। कुल मिलाकर मैच के बाद भी टिकट को लेकर किचकिच जारी रह सकती है।
ऑनलाइन चाकू बिक्री-चूहे बिल्ली का खेल
रायपुर उरला में एक फैक्ट्री कर्मी की हत्या ऐसे चाकू से कर दी गई, जिसे ऑनलाइन मंगाया गया था। पुलिस का दावा है कि साल भर में उसने 800 से अधिक ऑनलाइन मंगाए गए चाकू जब्त किए, मगर इस वारदात से मालूम होता है कि डिलीवरी रुकी नहीं है। हाईकोर्ट भी इस मुद्दे पर संज्ञान ले चुका है। सवाल है कि जब पुलिस दिन-रात कार्रवाई कर रही है, तब भी ई-कॉमर्स कंपनियाँ चाकू की बिक्री कैसे कर रही हैं?
अधिकतर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म चाकू को किचन टूल, क्राफ्ट कटर या आउटडोर नाइफ जैसे नामों से बेचते हैं। चूंकि 6 इंच से छोटे फोल्डिंग चाकू केंद्र के आर्म्स एक्ट में प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं आते, प्लेटफॉर्म उसी खामी का फायदा उठाते हैं। ई कॉमर्स कंपनियों को आईटी एक्ट की धारा 79 उन्हें मध्यस्थ का दर्जा देकर सुरक्षा भी देती है। यानी गलत बिक्री की जिम्मेदारी बेचने वाले की होती है। पुलिस ई-कामर्स कंपनियों को नोटिस देती है, कंपनियां पुलिस के बताए गए लिंक को हटा देती है, लेकिन अगले ही दिन नया विक्रेता वही प्रोडक्ट दोबारा अपलोड कर देता है।
10 लाख पर तलवार
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का काम चल रहा है। प्रदेशभर में बीएलओ घर-घर जाकर पंजीकृत मतदाताओं के गणना पपत्रों का संग्रहण, और डिजिटलाइजेशन का काम कर रहे हैं। वर्ष-2003, और वर्ष-2023 की मतदाता सूची का मिलान भी हो रहा है। कुल मिलाकर एसआईआर को लेकर गली-मोहल्लों में बहस चल रही है। एक अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रदेश के करीब 10 लाख तक मतदाताओं के नाम कट सकते हैं।
पहले भी मतदाता सूची में नाम जुड़ते रहे हैं। मगर मृत लोगों के नाम अब भी मतदाता सूची में है। यही नहीं, रायपुर शहर में किरायेदार एक से दूसरी जगह शिफ्ट होते रहे, लेकिन मतदाता सूची में पहले से दर्ज नामों को हटाया नहीं गया। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल मानते हैं कि शहर में एसआईआर के बाद एक लाख मतदाता कम हो सकते हैं। हजारों मतदाता ऐसे हैं जो मूलत: गांव से ताल्लुक रखते हैं, और शहर में रहते हैं। ऐसे लोगों का दो जगह मतदाता सूची में नाम दर्ज है। इनमें से किसी एक जगह से उन्हें अपना नाम हटवाना होगा। इन सबको देखते हुए कुल मतदाताओं की संख्या में कमी आ सकती है, और प्रदेशभर से 10 लाख तक मतदाता कम होने का अंदाजा लगाया जा रहा है। इन सबके बीच गृहमंत्री विजय शर्मा के उस बयान पर हलचल मची हुई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि एसआईआर में संदिग्ध नामों पर सख्त कार्रवाई होगी।
उन्होंने कहा था कि 2003 के मूल रिकॉर्ड में जिन व्यक्तियों का कोई पारिवारिक सदस्य, ब्लड रिलेशन या पारिवारिक उपस्थिति दर्ज ही नहीं थी ऐसे नाम अब अचानक कैसे आ गए, इसकी पूरी गहराई से जांच कराई जाएगी। मूल निवास के संबंध में जांच के साथ ऐसे लोगों के खिलाफ विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि गृहमंत्री के बयान पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 2003 के बाद राज्य में औद्योगीकरण, और नौकरी, व्यवसाय आदि के चलते दूसरे प्रदेशों से लोग यहां आए। बाद में स्थाई रूप से रहने लग गए, और स्वाभाविक रूप से मतदाता सूची में नाम दर्ज हुआ। वो चुनावों में वोट डालने लगे। ऐसी स्थिति में उन्हें कैसे गलत ठहराया जा सकता है। बहरहाल, एसआईआर का काम पूरा होने के बाद असली, और फर्जी को लेकर चल रहे विवाद का पटाक्षेप हो सकता है।
बिजली बिल हाफ, सरकारी छूट तो मिलेगी
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सरकार के सलाहकार ऐसी सलाह दे रहे हैं जो गले की हड्डी बन रहा है। पीएम सूर्य घर योजना लागू करने में बिजली विभाग को एड़ी चोटी लगानी पड़ रही है। बिजली विभाग के अधिकारियों ने सोलर पैनल नहीं लगवाने के पीछे तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ में हाफ बिजली बिल योजना के कारण लोग पीएम सूर्य घर योजना का लाभ नहीं लेना चाह रहे हैं। सरकार ने सलाह मानकर हाफ बिजली बिल योजना में कटौती कर दी। नतीजा यह हुआ कि सरकार को उल्टे पांव आदेश वापस लेना पड़ा। और 1 दिसंबर से पुन: लागू करना पड़ा वह भी यूनिट बढ़ाकर।
ऐसी ही एक और सलाह सरकार के पास गई कि खुद बिजली विभाग के सेवारत, और सेवानिवृत्त कर्मचारी पीएम सूर्य घर नहीं लगवा रहे हैं। आदेश जारी कर दिया गया कि पहले बिजली कर्मचारी सोलर पैनल लगवायें। अब कर्मचारी संकट में पड़ गये हैं। कुछ किराये पर रहते हैं। कुछ सरकारी आवास में रहते हैं। अब किराएदार कैसे लगवाएंगे। मालिक 200 यूनिट हाफ से संतुष्ट हो गया है और वह लगवाने की अनुमति नहीं देगा।
सरकारी क्वार्टर निवासी किसी का घर नहीं बना है। ऐसे में बिजली कर्मचारी सौर पैनल नहीं लगवा रहे हैं। अब पता चला है कि जो सोलर पैनल नहीं लगवा रहे, उन कर्मचारियों को बिजली बिल में छूट नहीं मिलेगी। पर कर्मचारी आश्वस्त है कि उन्हें सीएसईबी से मिलने वाली छूट बंद हो जाएगी तो क्या हुआ। अब सरकार ने 200 यूनिट बिजली फ्री कर दी है, उस योजना में तो आम उपभोक्ता की तरह लाभ तो मिल ही जाएगी।
कांग्रेस जिलाध्यक्षों का राज
कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए संगठन सृजन कार्यक्रम चलाया था, और दावा किया था कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से रायशुमारी से ही जिलाध्यक्षों की नियुक्ति होगी। जिलाध्यक्षों की सूची तो जारी हो गई, लेकिन संगठन सृजन की जो मूल भावना थी, वो नियुक्ति में दिखाई नहीं दी। ज्यादातर अध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता पूर्व सीएम भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की पसंद पर ही तय किए गए। इससे कई जगहों पर नाराजगी देखने को मिल रही है।
महासमुंद जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद पर विधायक द्वारिकाधीश यादव की नियुक्ति के विरोध में जिले के ही एक मोर्चा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष जफर उल्ला खान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भेजे अपने इस्तीफे में लिखा कि जिलेभर के कार्यकर्ताओं से रायशुमारी की गई थी। इससे कार्यकर्ताओं में जोश था। मगर नतीजे कार्यकर्ताओं के अनुरूप नहीं आ सके, यह कार्यकर्ताओं की भावनाओं के साथ धोखा हुआ है।
बताते हैं कि द्वारिकाधीश जिला अध्यक्ष की दौड़ में नहीं थे, लेकिन पूर्व सीएम भूपेश बघेल की सलाह पर उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से दिवंगत वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा, और श्यामाचरण शुक्ल व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के समर्थक खासे नाराज बताए जाते हैं।
दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा दुर्ग शहर, अमितेश शुक्ल गरियाबंद, और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू के पुत्र प्रवीण साहू रायपुर ग्रामीण जिलाध्यक्ष की दौड़ में थे। बड़ी संख्या में स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं ने उनके पक्ष में राय भी दी थी, लेकिन तीनों को नजरअंदाज कर दिया गया।
दशकों बाद ऐसा हुआ है जब वोरा परिवार की पसंद को नजरअंदाज कर दुर्ग शहर में अध्यक्ष नियुक्ति हुई है। वैसे तो दुर्ग शहर अध्यक्ष पूर्व मेयर धीरज बाकलीवाल को मेयर बनवाने में अरुण वोरा का हाथ था, लेकिन उन्हें जिलाध्यक्ष पूर्व सीएम भूपेश बघेल की अनुशंसा पर बनाया गया।
दूसरी तरफ, पूर्व मंत्री कवासी लखमा के पुत्र हरीश लखमा सुकमा, और दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री शशि सिंह को सूरजपुर जिले की कमान सौंपी गई है। दोनों ही नेताओं के पक्ष में स्थानीय कार्यकर्ताओं ने राय दी थी। कुल मिलाकर असंतुष्ट नेता संगठन सृजन कार्यक्रम को प्रतीकात्मक बता रहे हैं। अब नवनियुक्त अध्यक्ष असंतुष्टों को साधने में कामयाब हो पाते है या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
अफसरों की मनमानी और परेशानी
साइंस कॉलेज के पीछे वाली रोड में दो दिन पहले एक बड़ा सा गेट लगा दिया गया है। इसे कभी भी बंद कर दिया जाता है। सुबह-सुबह केंद्रीय विद्यालय से लेकर कई स्कूलों के बच्चे इस रोड से आना जाना करते हैं, लेकिन सुबह यह गेट बंद होने से उन्हें जीई रोड से घूम कर जाना पड़ रहा है। साइंस कॉलेज के पीछे की यह सडक़ डीडी नगर से पं. रविशंकर विश्वविद्यालय को भी जोड़ती है, जहां रोजाना सुबह हजारों लोग मॉर्निंग वाक करते हैं। अब उन्हें जीई रोड का सहारा लेना पड़ रहा है।
साइंस कॉलेज खेल मैदान में भी सैकड़ों लोग खेलने जाते हैं। सुबह ही सैकड़ों युवा सेना भर्ती की ट्रेनिंग, रनिंग के अभ्यास करने वाले भी इस मार्ग का उपयोग करते थे, लेकिन अफसरों ने जनता की परेशानी को नहीं देखा और मनमानी करते हुए लोहे की गेट लगा दी है। बताया जाता है कि पिछले दिनों साइंस कॉलेज के हास्टल में मारपीट के कारण यह गेट लगाया गया है, परन्तु हजारों बच्चों, युवा और बुजुर्गों की सहूलियत नहीं देखी जा रही है, जिन्हें सुबह जल्द जाना होता है। इसके बजाय हास्टल गेट में ही गेट लगाना पर्याप्त था। एक सार्वजनिक आवागमन की सडक़ के लिए ऐसा मनमाना फैसले से जनता परेशान है।
स्वागत और शिकवे
भाजपा में बड़े नेताओं का लगातार प्रवास हो रहा है। पीएम, और केन्द्रीय मंत्रियों के स्वागत के लिए पार्टी के अंदरखाने में रोज किचकिच हो रही है। पीएम, केन्द्रीय गृह मंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित अन्य नेताओं के एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए चुनिंदा नेताओं को ही मौका मिलता है। इसके लिए नाम प्रदेश कार्यालय मंत्री संगठन के प्रमुख नेताओं से चर्चा कर तय करते हैं। उन्हीं नेताओं को एयरपोर्ट पर स्वागत का मौका मिल पाता है। बड़े नेताओं के साथ फोटो खिंचवाने का क्रेज हर राजनीतिक दल में है। सोशल मीडिया के दौर में बड़े नेताओं का स्वागत करते फोटो वायरल करने की होड़ मची हुई है। इसके चलते भाजपा में काफी विवाद सुनने को मिल रहा है।
कई प्रमुख नेताओं की शिकायत है कि सूची तैयार करने में पक्षपात होता है। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के करीब दो दशक तक कार्यालय मंत्री रहे सुभाष राव जब तक पद पर रहे, इस तरह की शिकायतें नहीं आई। वो खुद कभी स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं गए। मगर उनके हटने के बाद से शिकवा-शिकायतों का क्रम जारी है। नरेश चंद गुप्ता प्रदेश कार्यालय मंत्री थे तब रोज उनके खिलाफ शिकायतें होती थी। पार्टी के नेता सवाल उठाते थे कि सूची तैयार करने वाले कार्यालय मंत्री खुद ही स्वागत के लिए चले जाते हैं, जो कि सही नहीं है। गुप्ता के हटने के बाद भी शिकवा-शिकायतें दूर नहीं हुई है। एक-दो नेताओं ने तो महामंत्री(संगठन) पवन साय तक अपनी बात पहुंचाई है।
नन्हें कीट प्रेमी की बड़ी सोच
प्रवासी भारतीय परिवार का बालक, नींव (उम्र 8 वर्ष) अमेरिका में जन्मा और वहीं का नागरिक है। नींव की रुचि प्रकृति के जीवों से प्रेम और जिज्ञासा का अनोखा उदाहरण है।
आज जब अधिकांश बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही मोबाइल, टैब और वीडियो गेम की आभासी दुनिया में उलझ जाते हैं, नींव ने बिल्कुल अलग राह चुनी है। उसे कीड़े-मकौड़ों और छोटे जीवों से गहरा लगाव है। बिच्छू, मकड़ी, छिपकली और विभिन्न प्रजातियों के कीड़े, जिनसे बच्चे ही नहीं बड़े भी आमतौर पर डरते हैं, नींव न केवल उनके प्रति आकर्षित है बल्कि उन्हें पहचानता, समझता है। कई कीटों को तो उसने अपने घर में पाल-पोसकर रखा है। नींव को कीटों और समुद्री जीवों का अपनी उम्र के हिसाब से काफी ज्ञान है। वह उनकी जीवनशैली, वातावरण और प्रकृति में उनकी भूमिका के बारे में अध्ययन करता रहता है। वह बड़ा होकर एंटोमोलॉजिस्ट (कीट विशेषज्ञ) बनना चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि ये कीट और जीव-जन्तु प्रकृति के संतुलन और जीवन चक्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। नींव की रुचि, दिलचस्पी जगाता तो है, पर उससे भी खास बात यह है कि उनके अभिभावक उसके जुनून को प्रोत्साहित करते हैं। आम तौर पर माता-पिता इस तरह के किसी प्रयोग करने की मंजूरी आसानी से देने वाले नहीं होते। नींव, बिलासपुर के राजकुमार अग्रवाल के नाती हैं।
एड्स में छत्तीसगढ़ में हाई-प्रिवलेंस राज्य क्यों?
छत्तीसगढ़ में एचआईवी-एड्स पर जारी रिपोर्ट चिंता बढ़ा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर जहां संक्रमण और मृत्यु दर में बड़ी गिरावट आई है, वहीं हमारा राज्य अब भी उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां एचआईवी का प्रसार सामान्य से काफी ज्यादा है। देश का औसत 0.22 प्रतिशत है, लेकिन छत्तीसगढ़ में वयस्क आबादी में यह दर 0.41 प्रतिशत है। राज्य में हर साल 4 से 5 हजार नए मामले सामने आ रहे हैं। खासकर रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, कोरबा और सरगुजा जैसे जिलों में हालात ज्यादा गंभीर हैं। जाहिर तौर पर, बाहर काम करने जाने वाले मजदूरों में असुरक्षित यौन संबंध, गांवों और आदिवासी इलाकों में जागरूकता की कमी, कंडोम का कम उपयोग, नशे के दौरान सुई साझा करना और गर्भवती महिलाओं का समय पर जांच न करवाना, ये सभी कारण बीमारी को फैलाते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 23 एआरटी सेंटर और 50 से अधिक लिंक एआरटी सेंटर हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर शहरों तक सीमित हैं। दूरस्थ गांवों के मरीजों को दवा लेने के लिए कई-कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। पहले एड्स नियंत्रण के लिए इतना फंड आता था कि जागरूकता के नाम पर बड़े-बड़े सिलेब्रिटी पहुंचते थे। अब लगता है कि इलाज और दवाओं के नए सेंटर्स खोलने के लिए भी फंड की कमी है।
मोदी-शाह का हाल
नवा रायपुर स्थित आईआईएम संस्थान में डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस चल रही है। कॉन्फ्रेंस में पीएम नरेंद्र मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ एनएसए अजीत डोभाल, और केन्द्रीय एजेंसियों के शीर्ष अफसर हैं। मोदी, और शाह यहां हैं, तो स्वाभाविक है कि सरकार-पार्टी के सारे नेता राजधानी में ही डटे हैं। शाह से तो पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं ने आगमन के दौरान मुलाकात कर ली थी, लेकिन मोदी से सीएम को छोड़ किसी भी नेता की मुलाकात नहीं हो पाई।
शाह ने कॉन्फ्रेंस में जाने से पहले 28 तारीख को सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा के साथ बैठक की थी। इसमें नक्सल समर्पण-पुनर्वास पर चर्चा हुई थी। मोदी 28 तारीख की रात रायपुर पहुंचे थे, और सीधे नवा रायपुर के लिए रवाना हो गए। वो नवा रायपुर के स्पीकर हाऊस में ठहरे हुए हैं। कॉन्फ्रेंस सुबह 9 बजे शुरू हो जाती है। केंद्रीय गृहमंत्री शाह पौने 9 बजे कॉन्फ्रेंस स्थल में चेयर संभालते, और इसके बाद ठीक 9 बजे पीएम भी। पीएम ने दोनों ही दिन पूरे समय कॉन्फ्रेंस में रहकर गृहमंत्री के साथ प्रेजेंटेशन देखे।
खास बात ये है कि नक्सलवाद पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अफसरों ने प्रेजेंटेशन दिया है। इस दौरान छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, और आंध्र के डीजीपी अपने राज्य की जानकारी बीच-बीच में देते रहे। इस दौरान छत्तीसगढ़ के एसीएस(गृह) मनोज पिंगुआ को भी आमंत्रित किया गया था। बताते हैं कि कॉन्फ्रेंस के एक दिन पहले आईटीबीपी के डीजी प्रवीण कुमार मानपुर-मोहला जिले के मदनवाड़ा में थे, और उन्होंने वहां मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में नक्सल अभियान की समीक्षा की थी।
कॉन्फ्रेंस के चलते नक्सलियों पर काफी दबाव बना है। पिछले दो दिनों में बस्तर से लेकर महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश के 50 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। यह सिलसिला जारी है। नक्सलियों के महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्पेशल जोनल कमेटी ने संघर्ष विराम का ऐलान करते हुए एक जनवरी को पूरी तरह हथियार डालने का वादा भी किया है। कुल मिलाकर कॉन्फ्रेंस के बाद बस्तर में पूरी तरह शांति की उम्मीद जताई जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
हाजिरी पंच करते ही चाय पीने?
अब सरकारी दफ्तरों में लेटलतीफी पुरानी बात होने जा रही है। कारण सरकारी मुलाजिमों का ठीक 10 बजे ऑनलाइन बायोमेट्रिक अटेंडेंस की अनिवार्यता। राज्य मंत्रालय में यह जनवरी से ही लागू हो चुका है और कल से इसमें और एक्यूरेसी आने वाली है। जब 65 स्टाफ बसें 9.50 तक महानदी भवन के गेट में खड़ी होंगी। अगले दस मिनट में भवन के पांच गेट में लगी दर्जनों मशीनों में स्टाफ अटेंडेंस पंच करेगा। यह आधार कार्ड आधारित होगा। अगले दस मिनट में पता चल जाएगा कि कितने अफसर कर्मचारी ऑन ड्यूटी हैं। इसके बाद 1 जनवरी से यही व्यवस्था संचालनालय इंद्रावती भवन में भी लागू कर दी जाएगी।
राज्य के दोनों प्रशासनिक मुख्यालय इन टाइम काम करेंगे तो निचले क्रम के दफ्तरों से सरकारी कामकाज गांव तक पहुंचेगा। राजधानी समेत कुछ जिलों में भी 10 बजे अटेंडेंस की व्यवस्था लागू है। अब यह अलग बात है कि अटेंडेंस की पंचिंग के बाद घंटे आधे घंटे के लिए चाय पान ठेले में चले जाते हैं। अब यह भी नहीं चलेगा क्योंकि जितनी बार बाहर निकलेंगे इन आउट की पंचिंग करनी होगी।
दरअसल केंद्र सरकार की आन टाइम गवर्नेंस की योजना के तहत यह कदम उठाए जा रहे हैं। कम से कम भाजपा शासित प्रदेशों के लिए तो इसी लक्ष्य के साथ काम किया जा रहा है। दिल्ली के साउथ और नॉर्थ ब्लॉक के दफ्तरों में दस बजते ही ई ऑफिस सॉफ्टवेयर में फाइल मूवमेंट शुरू हो जाता है।
विपक्ष को अधिकार परिवारवाद कहने का

इसे परिवारवाद नहीं पिता के पदचिन्हों पर चलना कहेंगे। टिकिट मिलने पर केवल विपक्ष को अधिकार होगा कि परिवारवाद कहे। खबर यह है कि असम से पूर्व सांसद और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका की पुत्री आयुष्मिता डेका ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। अमेरिका में उच्च शिक्षा के बाद कुछ समय तक नौकरी करने के बाद वह असम लौट आईं। यह संयोग रहा कि कुछ माह पहले रमेन डेका भी अमेरिका गए थे। इस दौरे का बेटी के फैसले से कोई संबंध नहीं है। आयुष्मिता ने प्रदेश अध्यक्ष के हाथों सदस्यता पत्र लेने के बाद कहा कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से लौटीं हूं देश सेवा के लिए। इसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री ने ही हाल की एक मुलाकात में कहा था।
आयुष्मिता का यह भी कहना था कि उनका परिवार लंबे समय से संघ और विचारधारा से जुड़ा है। उनके बचपन से ही प्रमोद महाजन, राजनाथ सिंह वरिष्ठ नेताओं का घर पर आना जाना था। जिसने उन्हें राजनीतिक और सामाजिक जीवन के संस्कार दिए। वैसे बता दें कि राजधानी में एक और पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल भी हैं रमेश बैस। तन मन धन से उनका पूरा परिवार संघ भाजपा समर्थित है लेकिन बेटे की सदस्यता कभी सार्वजनिक नहीं हुई वे रीयल एस्टेट कारोबारी के रूप में जाने जाने जाते हैं।
आंदोलन के अति उत्साह में
किसी भी विपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह जनता से जुड़े मुद्दों पर सडक़ पर उतरे। कांग्रेस भी चुनाव हारने के बाद अब फिर उसी भूमिका में दिखाई दे रही है। बिलासपुर जिला मुख्यालय में जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई। यह प्रेस वार्ता उसी स्थान पर रखी गई, जहां सरकारी धन की बर्बादी का आरोप लगाया गया था।
यह वह सडक़ है जो कुछ दूर जाकर खाली जमीन पर समाप्त हो जाती है। दावा किया गया कि इस सडक़ पर 50 से 60 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, जबकि आगे न कोई बस्ती है, न मोहल्ला, न गांव। इशारा यह किया गया कि संभवत: आगे किसी बिल्डर का प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जिसके लिए स्मार्ट सिटी या पीडब्ल्यूडी के फंड का लाभ पहुंचाया जा रहा है।
प्रेस वार्ता के अगले दिन कांग्रेस ने शहर की उन सडक़ों पर प्रदर्शन किया, जिनकी हालत बेहद खराब है और जहां मरम्मत की सख्त जरूरत है। आरोप लगाया गया कि एक तरफ करोड़ों रुपये ऐसी सडक़ पर उड़ाए जा रहे हैं जिसकी जरूरत ही नहीं, जबकि दूसरी तरफ आवश्यक मरम्मत कार्यों के लिए कोई फंड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा।
प्रेस वार्ता और प्रदर्शन के बाद भाजपा नेताओं ने उस कथित वीरान सडक़ के बारे में जानकारी इक_ा करना शुरू किया। जब तथ्य सामने आए, तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई।
दरअसल, कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अरपा नदी के सामने पौधारोपण अभियान चलाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इसका उद्घाटन भी किया था। संदेश दिया गया था कि किसान धान की खेती पर निर्भर रहने के बजाय उद्यानिकी की ओर बढ़ें, जहां कम लागत में अधिक लाभ संभव है।
मगर यह योजना अन्य कई योजनाओं की तरह असफल हो गई। उद्यान अब अस्तित्व में नहीं है, पौधे सूख चुके हैं। लेकिन सडक़ अब भी बनी हुई है। और वही सडक़ कांग्रेस द्वारा अनावश्यक खर्च के रूप में बताई जा रही थी। यह सडक़ कांग्रेस सरकार के समय ही मंजूर की गई थी, हालांकि अब काम रोक दिया गया है।
डगमगाते सवार...

बिलासपुर के लालखदान ओवरब्रिज का यह दृश्य है। अपने राज्य की हकीकत का एक आइना। एक युवक नशे में धुत है, इतना कि वह खुद को संभाल नहीं पा रहा है। उसका साथी उसे गमछे से मोटरसाइकिल से बांधकर ले जा रहा है।
अफसरों की ट्रेनिंग
दो आईपीएस त्रिलोक बंसल और विवेक शुक्ला माहभर की ट्रेनिंग पर जाएंगे। सोमवार को दोनों को हैदराबाद स्थित नेशनल पुलिस एकेडमी में रिपोर्ट करना है। दोनों फेस-3 की ट्रेनिंग में शामिल होंगे। बंसल वर्तमान में एसटीएफ के एसपी हैं।
इससे परे आईपीएस चिराग जैन और संदीप पटेल वर्तमान में हैदराबाद एकेडमी में फाउंडेशन कोर्स कर रहे हैं। उधर बलरामपुर एसपी वैभव बैंकर भी महीनेभर के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं। उनकी जगह आईपीएस मनोज खिलाड़ी को बलरामपुर का प्रभार सौंपा गया है।
आईपीएस अवार्ड होने के बाद यह पहला मौका है, जब खिलाड़ी को किसी जिले का प्रभार सौंपा गया है। अगले महीने एक-दो और अफसर ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद जाएंगे।
दो नाराज एक साथ!
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल शुक्रवार को कोरबा में थे, और वो कई कार्यक्रमों में शरीक हुए। इन सबके बीच वो नाराज चल रहे पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर से भी मिलने गए। दोनों के बीच करीब आधे घंटे चर्चा हुई।
कंवर ने कोरबा कलेक्टर को हटाने की मुहिम छेड़ रखी है। उन्होंने अपनी ही सरकार को कटघरे पर खड़ा कर दिया था। पूर्व मंत्री के तेवर देखकर सरकार को कोरबा कलेक्टर के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए समिति बनानी भी पड़ी। चर्चा है कि पार्टी संगठन के प्रमुख नेता, कंवर के तेवर से नाखुश चल रहे हैं। सीएम और दोनों डिप्टी सीएम, कोरबा आते-जाते रहे हैं, लेकिन उनकी कंवर से मुलाकात नहीं हुई। इन सबके बीच सांसद बृजमोहन अग्रवाल कंवर के घर गए, तो इसकी पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है।
मंत्रियों के सहायकों की बारी
सरकार के मंत्री स्थापना के अफसर-कर्मियों को बदलने का सिलसिला जारी है। ताजा घटनाक्रम में राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के विशेष सहायक दुर्गेश वर्मा को भारमुक्त कर दिया गया है। वो राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर हैं, और उनकी सेवाएं सामान्य प्रशासन विभाग को लौटा दी गई है। ये सब यूं ही नहीं हो रहा है। मंत्रियों के निजी स्थापना के अफसर-कर्मियों के खिलाफ शिकायतें आती रही हैं, और कुछ जगह शिकायत पुष्ट पाए जाने पर अफसर-कर्मियों को हटाया गया है।
साय सरकार दो साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही है। मंत्रियों के शपथ लेने के बाद निजी स्थापना में जगह पाने के लिए अफसर-कर्मियों में होड़ मची रही। संघ परिवार से भी सिफारिशें आई थीं। हाल यह है कि डिप्टी सीएम विजय शर्मा, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी को छोड़ दें, तो बाकी सारे मंत्रियों की निजी स्थापना के अफसर-कर्मियों को बदला जा चुका है। कुछ मंत्रियों को तो अपनी स्थापना के अफसर-कर्मियों का काम पसंद नहीं आया। कुछ अफसर-कर्मी जरूरत से ज्यादा तेज निकले। इन सभी को एक-एक कर हटाया गया।
और तो और तीन माह पहले शपथ लेने वाले तीनों मंत्रियों की निजी स्थापना के अफसर-कर्मी भी बदले जा चुके हैं। दरअसल, मंत्री स्थापना पर संगठन, और सरकार की पैनी नजर है। गंभीर शिकायत मिलने पर तुरंत मंत्री जी को इत्तला कर दी जा रही है। कुछ ऐसे भी हैं जिनके खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं, लेकिन मंत्री जी के पसंदीदा होने की वजह से उन्हें बदला नहीं जा रहा है। लेकिन दो साल में ही जिस तरह मंत्री स्थापना के अफसर-कर्मी बदले गए हैं, वैसी नौबत पहले कभी नहीं आई।
आईआरएस अफसर और छत्तीसगढ़ की सेवा
कुछ दिनों पहले हमने इसी कालम में बताया था कि 2014-24 तक 853 आईआरएस अफसरों ने वीआरएस लेकर नौकरी छोड़ी है या कोई और सर्विस ज्वाइन किया है। इसके पीछे मुख्य कारण इस नौकरी का पहले की तरह अब हाईप्रोफाइल न रह जाना, और उच्च स्तरीय दबाव। छत्तीसगढ़ में दो अफसरों ने वीआरएस तो नहीं लिया लेकिन यह राष्ट्रीय महकमा छोड़ राज्य सेवा को ज्वाइन किया है। दोनों ही महिला अफसर हैं। एक ने पांच वर्ष पहले आयकर से डेपुटेशन लेकर छत्तीसगढ़ वित्त विभाग ज्वाइन किया था और अब वह राज्य कैडर में ही समायोजन (एब्जार्ब) के करीब हैं। संयुक्त कमिश्नर स्तर की दूसरी अफसर ने इसी सप्ताह ज्वाइनिंग दी है। उनको अभी विभागीय नियुक्ति नहीं दी गई है। चूंकि वह भी रेवेन्यू सर्विस की हैं इसलिए समझा जा रहा है कि उन्हें वित्त विभाग में ही संचालक स्तर का पद दिया जा सकता है। 05 बैच की अफसर भी यदि 5 वर्ष पूरा कर लेती हैं तो वह भी समायोजन के दायरे में आ जाएंगी। इनके पति यहां आईएएस और संचालक स्तर के अफसर हैं। वैसे इनसे पहले दो और आईआरएस अफसर अमन सिंह, अजय पांडेय छत्तीसगढ़ शासन में काम कर चुके हैं। इनमें से एक ने डेपुटेशन के बाद नौकरी से इस्तीफा दिया था और अभी एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हैं। दूसरे ने आयकर छोड़ सेंट्रल जीएसटी की ओर रुख कर लिया।
विकास के लडख़ड़ा जाने की रिपोर्ट
भारत के महालेखाकार की एक रिपोर्ट जारी हुई है। इसके अनुसार जो राज्य बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ा रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ कतार में बहुत पीछे दिख रहा है। अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच पूंजीगत व्यय पर पूरे देश के 19 राज्यों का औसत खर्च 33.5 प्रतिशत था, जबकि छत्तीसगढ़ सिर्फ 13.5 प्रतिशत पर सिमट गया। यानी राज्य में सडक़, पुल, स्कूल, अस्पताल और उद्योग जैसे विकास कार्यों पर बहुत कम खर्च किया जा रहा है। सौ रुपये में सिर्फ साढ़े तेरह रुपये।
पूंजीगत व्यय किसी राज्य की अर्थव्यवस्था की असली रफ्तार मानी जाती है। हरियाणा जैसे राज्य बजट का 85 प्रतिशत तक खर्च कर रहे हैं। तेलंगाना 80 प्रतिशत खर्च के साथ निवेश आकर्षित कर रहा है। केरल और मध्य प्रदेश भी 70 प्रतिशत से ऊपर चल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अधिक खर्च करने वाले राज्य स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में भी सुधार कर रहे हैं। जहां दूसरे राज्य गति पकड़ रहे हैं, वहीं कैग की रिपोर्ट बता रही है कि हमारा राज्य पिछड़ता जा रहा है।
अर्थशास्त्री बेहतर तरीके से बता सकते हैं कि छत्तीसगढ़ पूंजीगत खर्च करने में इतना पीछे क्यों है, पर आम तौर पर फाइलें महीनों तक दफ्तरों में घूमती रहती हैं। बिलासपुर में सेंट्रल जेल के निर्माण का टेंडर 9वीं बार जारी किया जा चुका है। सालों से अटका है और ऐसे मामले पूरे प्रदेश में अनेक मिल जाएंगे। हाईकोर्ट को हाल ही में सडक़ों की हालत पर सुनवाई के दौरान जब बताया गया कि एनआईटी में प्रोजेक्ट का परीक्षण हो रहा है, तो कोर्ट ने कहा- एक दो साल में तो ही जाएगा न! यही हाल नक्सल प्रभावित इलाकों में टेंडर प्रक्रिया और पूर्णता का है। इधर वेतन, पेंशन और सब्सिडी में ही राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा, करीब 78 प्रतिशत जा रहा है। केंद्र की सभी योजनाओं, चाहे सतत शिक्षा अभियान हो, पीएम सूर्य घर हो, जल जीवन मिशन हो या आवास योजना- राज्य को अपना हिस्सा देना पड़ता है। पिछली सरकार ने पीएम आवास योजना से हाथ ही खींच लिया था। कई ऐसी योजनाओं में राज्य, केंद्र के अनुकूल हिस्सेदारी नहीं दे पाता तो उसे लक्ष्य भी हासिल नहीं होता।
इसलिये छत्तीसगढ़ जैसे खनिज, जल, वन संसाधन-संपन्न राज्य यदि ग्रामीण सडक़ें जर्जर पड़ी हैं, स्कूल में अतिरिक्त कमरे नहीं बन रहे हैं, स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतें अधूरी हैं, स्टाफ की कमी है, उद्योगों के लिए ढांचा मजबूत नहीं हो रहा है तो इसका कारण समझने के लिए कैग की तरह रिपोर्ट को समय-समय पर पढ़ते रहना चाहिए।
तकनीक से ज्यादा जरूरी समझदारी
यूपी के हरदोई में गूगल मैप की गलती से तंग गलियों में एक कारण बार-बार रिवर्स करने, टर्न लेने के कारण फंस गई। इंजन गर्म हुआ और कार धू-धू कर जल जल उठी। सवार लोग बाल-बाल बचे। हम आजकल गूगल मैप पर ज्यादा ही भरोसा करने लगे हैं। आसपास की दुनिया, स्थानीय अनुभव और अपनी समझ को जैसे भूल जाते हैं।
यह भी भूल जाते हैं कि तकनीक मदद के लिए है, आप पर नियंत्रण करने के लिए नहीं। रास्ते के मामले में तो कई बार ऐसा धोखा पहले भी हुआ है। यूपी में ही गूगल मैप ने एक कार को अधूरे नए पुल पर चढ़ा दिया और अंधेरे में सब के सब कार सहित नीचे गिर गए। किसी की जान नहीं बच पाई थी। सडक़ पर खड़े किसी राहगीर से जानकारी ले लेना, किसी चाय दुकान पर पांच मिनट रुककर दो मीठी बात कर पता पूछ लेना अब भी कारगर है।
तनातनी घर के भीतर हावी
चर्चा है कि रायपुर शहर जिला भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जिलाध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर, और मेयर मीनल चौबे के बीच मतभेद दिख रहे हैं। हाल यह है कि संगठन के लोग मेयर के, और पार्षदगण संगठन के कार्यक्रमों से दूरी बना रहे हैं।
मेयर और जिलाध्यक्ष के बीच मतभेद का अंदाजा उस वक्त लगा जब पिछले दिनों प्रदेश भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल ने एसआईआर के मसले पर जिले के नेताओं की बैठक ली। इस बैठक में शहर जिला भाजपा के तमाम पदाधिकारी मौजूद थे, लेकिन रायपुर नगर निगम के 27 पार्षद गैरहाजिर रहे।
जम्वाल ने पार्षदों की गैरमौजूदगी को गंभीरता से लिया। इस पर मेयर को सफाई देनी पड़ी कि पार्षद क्यों नहीं आए, इसका पता लगाएंगी। बात खत्म हो गई। इसके बाद 26 नवंबर को संविधान दिवस जोर-शोर से मनाया गया। अंबेडकर चौक पर कार्यक्रम हुआ, इसमें मेयर और तमाम पार्षद मौजूद थे। लेकिन शहर जिला भाजपा के पदाधिकारी गैरहाजिर रहे। कहा जा रहा है कि नगर निगम के इस कार्यक्रम की सूचना जिले के पदाधिकारियों तक नहीं पहुंची। इस वजह से वो नहीं गए।
पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि शहर जिला भाजपा और मेयर के बीच समन्वय नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति बन रही है। कुछ लोग पार्टी के गुटीय राजनीति से जोडक़र देख रहे हैं। मेयर मीनल चौबे को पूर्व मंत्री राजेश मूणत की करीबी मानी जाती हैं, तो शहर जिला भाजपा अध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के कट्टर समर्थकों में गिने जाते हैं।
दोनों ही रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव में टिकट के दावेदार थे। ये अलग बात है कि दोनों की दावेदारी को नजरअंदाज कर सुनील सोनी को टिकट दे दी गई। सुनील सोनी, भारी वोटों से चुनाव जीत गए। मगर चुनाव के वक्त टिकट को लेकर खींचतान चल रही थी, वो अब भी जारी है। कुछ इसी तरह की तनातनी पिछले 5 बरस में कांग्रेस शासनकाल में भी देखने को मिली। तब मेयर एजाज ढेबर, और रायपुर पश्चिम विधायक विकास उपाध्याय के बीच बोलचाल तक बंद थी। कांग्रेस संगठन और मेयर-पदाधिकारियों के बीच दूरियां रही। इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा चुनाव में न सिर्फ खुद विकास उपाध्याय हारे, बल्कि चारों सीट पर करारी हार का सामना करना पड़ा। निकाय चुनाव में कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। मेयर एजाज ढेबर वार्ड का चुनाव नहीं जीत पाए।
कहावत का फोटोशूट
सरकार ने दो सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ कर दिया है लेकिन इसको बढ़ाकर चार सौ यूनिट तक करने की मांग हो रही है। भूपेश सरकार में चार सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ था। बाद में साय सरकार ने घटाकर सौ यूनिट कर दिया, और अब इसको बढ़ाकर दो सौ यूनिट कर दिया गया है। बावजूद इसके सरकार के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। मगर दुर्ग में कांग्रेस ने जिस अनोखे अंदाज में प्रदर्शन किया, उसकी गूंज प्रदेश भर में हो रही है।
दुर्ग ग्रामीण जिला कांग्रेस के अध्यक्ष राकेश सिंह ठाकुर ने दो सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ को ऊंट के मुंह में जीरा करार दिया, और विरोध दिखाने के लिए ऊंट ले आए। दरअसल, ठंड में राजस्थान से छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में बंजारा यहां आते हैं, और वो अपने साथ ऊंट लेकर आते हैं। जिलाध्यक्ष ने एक ऊंट मालिक को तैयार कर शहर के बीचोंबीच प्रदर्शन स्थल पर ऊंट को एक किलो जीरा खिलाया, इस दौरान ऊंट के साथ फोटो खिंचाने होड़ मच गई। एक किलो जीरा खिलाने में सात सौ रूपए खर्च हुए, और ऊंट मालिक को एक हजार रूपए दिए गए। मगर जिस तरह इस प्रदर्शन न सुर्खियां बटोरी है, इस पर प्रदेश भर में चर्चा हो रही है।
कांग्रेस के बड़े नेता इस जिला स्तर के प्रदर्शन में मौजूद तो नहीं थे, लेकिन फोन कर जिलाध्यक्ष की खूब तारीफ कर रहे हैं। यह अनोखा प्रदर्शन था जिसने सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है। मीडियाकर्मी प्रदर्शनकारी ऊंट के साथ फोटो खिंचाने के लिए जद्दोजहद करते देखे गए।
शिक्षक के चेहरे वाले शैतान
पता है, हाल ही में ये दो घटनाएं क्या हो गईं? किसी के सीने में सुई चुभी, धडक़नों का तारतम्य बिगड़ा? किसी मंत्री-विधायक ने स्कूलों में बच्चियों की दशा पर चिंता जताई? उनके राज्य में ऐसा हो रहा है तो आंखें नम नहीं, लाल होनी चाहिए। रतनपुर, नेवसा के सीता देवी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 9वीं कक्षा की छात्रा थी पूनम। यह एक प्राइवेट स्कूल है, जिसे एक सरकारी स्कूल का टीचर रमेश साहू चला रहा था, अपनी पत्नी अंजना के नाम पर। पूनम से एक छात्र छेड़छाड़ करता था, बहुत परेशान थी।
रमेश साहू से उसने शिकायत की। प्राइवेट स्कूल संचालक इस सरकारी शिक्षक ने हालात से टूट चुकी छात्रा को भरे स्कूल में बच्चों के मजमे में पहले डांटा फिर थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ की जोर चाहे जितनी भी रही हो, पर पूनम की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, आसमान काला नजर आने लगा। इसलिये कि गुरुतुल्य शिक्षक ने उसे हिम्मत देने, ढांढस बंधाने की जगह कुसूरवार मान लिया। अपमान का बोझ सह नहीं पाई। ग्लानि से भर गई होगी, कलेजा मुंह को आ गया होगा। पूनम रजक ने 23 सितंबर उसी थप्पड़ वाली घटना के दिन, घर पहुंचकर फांसी के फंदे पर झूल गई।
इधर, जशपुर के बगीचा थाना क्षेत्र के सरस्वती हायर सेकेंडरी स्कूल का मामला है। 23 नवंबर को 9वीं कक्षा की 15 साल की छात्रा हॉस्टल के स्टडी रूम में साड़ी को फंदा बना लिया और अपनी जान ले ली। सुसाइड नोट में उसने क्या लिखा है- एक-एक शब्द पढिय़े- प्रिंसिपल सर मुझे बैड टच करते थे, प्राइवेट पार्ट छूते थे। वे स्कूल की दूसरी बच्चियों को भी परेशान कर रहे हैं। उसने लिखा कि जिस दुनिया में लड़कियों की कोई इज्जत नहीं है, उस दुनिया में जी कर मैं क्या करूंगी?
इसी जशपुर में इसी महीने, नवंबर 2025 में एक चौकीदार को छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें करने की वजह से गिरफ्तार किया गया। रतनपुर, नेवसा के शिक्षक को अभी दो तीन पहले शिक्षा विभाग ने केवल निलंबित किया गया है। उसके खिलाफ खुदकुशी के लिए उकसाने का कोई अपराध दर्ज नहीं कराया गया है। सरकारी शिक्षक है, विभाग के अफसरों की कुछ सहानुभूति होगी, लेन-देन चलता होगा। इस वजह से क्योंकि सरकारी शिक्षक उनकी नाक के नीचे प्राइवेट स्कूल भी चला रहा है। जशपुर के मामले में प्राचार्य को अरेस्ट कर लिया गया है। उसकी कोई पहुंच नहीं रही होगी।
नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो- एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि बुलिंग और शिक्षकों के बुरे बर्ताव के कारण के कारण छात्र आत्महत्याओं की दर कोविड के बाद 20 प्रतिशत बढ़ी है। हालांकि इस रिपोर्ट में गर्ल्स और ब्वायज़ की अलग-अलग सारणी नहीं है। क्रूरता जेंडर नहीं देखती। महामारी बनने से पहले ऐसी घटनाओं को कैसे रोकें? आप भी सोचें।
सेवा विस्तार के आसार

छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा 30 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें एक साल का सेवा विस्तार मिलने की अटकलें लगाई जा रही है। स्पीकर डॉ. रमन सिंह प्रदेश से बाहर हैं, और उनके आज-कल में रायपुर वापसी के बाद दिनेश शर्मा के सेवा विस्तार पर फैसला होने की संभावना है।
राज्य बनने के बाद कुछ समय के लिए विधि सचिव टीपी शर्मा, जस्टिस मिन्हाजुद्दीन विधानसभा सचिव रहे। इसके बाद भगवान देव इसरानी विधानसभा के सचिव नियुक्त हुए। बाद में इसरानी मध्यप्रदेश के विधानसभा सचिव हो गए। यहां उनकी जगह रिक्त पद पर देवेन्द्र वर्मा की पोस्टिंग हुई। देवेन्द्र वर्मा को रिटायरमेंट के बाद दो बार एक-एक साल का सेवा विस्तार मिला। इसके बाद उनकी जगह चंद्रशेखर गंगराडे विधानसभा के प्रमुख सचिव हुए। गंगराडे को भी एक बार सेवा विस्तार मिला।
हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन का उद्घाटन हुआ है। शिफ्टिंग की प्रक्रिया चल रही है। विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 से 17 दिसंबर तक चलेगा। वैसे भी विधानसभा में सीनियर अफसरों की कमी है। दिनेश शर्मा के ठीक नीचे अतिरिक्त सचिव आरके अग्रवाल रिटायर हो चुके हैं। उन्हें छह माह का सेवा विस्तार मिला हुआ है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए दिनेश शर्मा को भी पूर्ववर्तियों की तरह एक साल का सेवा विस्तार मिल सकता है।
संजू, तुमको बहुत-बहुत बधाई...

ढाका में हुए महिला कबड्डी वल्र्डकप के रोमांचक फाइनल में कोरबा की संजू देवी ने जिस जोश, हिम्मत और बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया, वह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व की बात है। सिर्फ 13 रेड में 16 महत्वपूर्ण अंक जुटाकर टीम को शानदार जीत दिलाना संजू की मेहनत, अनुशासन और उनकी खास प्रतिभा है।
मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर का खिताब जीतकर संजू ने न सिर्फ देश का, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का सिर ऊंचा कर दिया। उन्होंने अपने मजबूत हौसले और खेल के प्रति समर्पण बताता है कि छत्तीसगढ़ की बेटियां हर मुश्किल का सामना कर सकती हैं और अपनी वेश्विक पहचान बना सकती हैं।
तारीख पे तारीखछत्तीसगढ़ लोक आयोग में अलग- अलग विभागों के भ्रष्टाचार प्रकरणों की जांच चल रही है। कई प्रकरणों सुनवाई इसलिए टल रही है कि संबंधित विभाग के अफसरों को नोटिस तामील होने के बाद भी आयोग के समक्ष हाजिर नहीं हो पा रहे हैं।
सबसे ज्यादा शिकायत स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग के अफसरों की है। स्कूलों की मान्यता से जुड़े प्रकरणों की शिकायतों पर आयोग ने स्कूल शिक्षा सचिव और अन्य अफसरों को नोटिस जारी किया गया था। आयोग ने स्कूल शिक्षा सचिव को उपस्थित होकर शिकायतों पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने कहा था। विभाग से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है। इसके बाद फिर स्मरण पत्र भेजकर 22 दिसंबर को उपस्थित होने के आदेश दिए हैं। यही हाल, बाकी विभागों का भी है। इसका प्रतिफल यह है कि सुनवाई की तारीख पे तारीख मिलती जा रही है।
छत्तीसगढ़ देख चुके, अब कर्नाटक देखिए..
मानो वही फिल्म फिर से लगी हो, बस किरदार बदल गए हों। पांच-छह साल पहले छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ था, आज कर्नाटक में ठीक वही चल रहा है। यहां मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला बना था। सिंहदेव का यह दावा था, बघेल ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। सिंहदेव ने मीडिया में खूब बयान दिए। तूल पकड़ा तो बघेल एक दिन अचानक 50-55 विधायकों को दिल्ली लेकर पहुंच गए, हाईकमान के सामने परेड करा दी और कुर्सी पक्की कर ली। सिंहदेव के पास या तो विधायक नहीं थे, या फिर उन्होंने परेड कराने में रुचि नहीं ली। मगर, सिंहदेव नाराज चल रहे थे तो आखिरी छह महीने में उप-मुख्यमंत्री बना दिया, संतुष्ट हो गए।
मगर, कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के दावेदार डीके शिवकुमार पहले से ही उप-मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री पद से नीचे की कोई जगह नहीं बनती। चुनाव जीतने के बाद डीके रेस में तो थे पर सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना गया तो उस वक्त चुपचाप हाईकमान का फैसला मान लिया। छत्तीसगढ़ में ही मचे घमासान को देखकर शायद शुरू से ही उप-मुख्यमंत्री पद दे दिया गया, मगर अब उनके खेमे के विधायक दिल्ली पहुंच गए हैं और खुलेआम कह रहे हैं, नेतृत्व बदला जाए। अब शिवकुमार खेमा वैसा ही दबाव हाईकमान पर डाल रहा है जैसा बघेल ने किया था। इधर सिद्धारमैया बेंगलूरु में अपने समर्थक विधायकों के साथ बैठकें कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के लोग तो जानते ही हैं कि ऐसे आपसी झगड़े का अंत क्या होता है। कांग्रेस हाईकमान को भी पता है। 2018-23 में ढाई-ढाई साल का विवाद चला, गुटबाजी के चलते जीत की संभावना वाले टिकट कटे, जिनके नहीं कटे उन्हें खुद कांग्रेसियों ने हरवा दिया। भाजपा का माहौल बहुत जबरदस्त भी नहीं था, फिर भी कांग्रेस 15 सीटों पर सिमट गई। उसकी ऐतिहासिक हार हुई और भाजपा को अब तक की सर्वाधिक सीटें।
कर्नाटक में भी आज वही माहौल बन रहा है। विधायक दिल्ली में डेरा डाले हैं, सोशल मीडिया पर खुली बगावत है, हाईकमान असमंजस में है। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से मीडिया ने जब बेंगलूरु में इस मसले पर सवाल किया तो उन्होंने कहा- हाईकमान तय करेगा। शायद, कांग्रेस में हाईकमान कोई सर्वशक्तिमान अदृश्य शक्ति होती है, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से ऊपर।
2028 के पहले कांग्रेस कर्नाटक में भी वही गलती दोहराएगी, कुर्सी की लड़ाई को वास्तविक रूप से नहीं रोक पाएगी तो नुकसान तय है। समर्पित कार्यकर्ता चाहें जितनी मेहनत कर लें। छत्तीसगढ़ ही नहीं, मध्यप्रदेश (कमलनाथ-सिंधिया) और राजस्थान (गहलोत-पायलट) में भी उसकी सत्ता ऐसे ही कारणों से हाथ आने के बाद फिसली थी। कांग्रेस की यह समस्या स्थायी मान ली जाएगी कि जहां-जहां सत्ता में आई, वहां आपसी कलह ने उसे पीछे धकेल दिया।
सरकारी क्वार्टर पर तनातनी
सरकारी क्वार्टर को लेकर मंत्रालय और पुलिस महकमे में नया विवाद शुरू हो गया है। शिकायत मिली है कि गृह विभाग को संपदा संचालनालय,नवा रायपुर स्थित सामान्य प्रशासन विभाग के क्वार्टर को अनाधिकृत रूप से पुलिसकर्मियों को आबंटित कर रहा है। यह शिकायत और आपत्ति और किसी ने नहीं मंत्रालय कर्मचारी संघ ने ही की है। एसीएस गृह मनोज पिंगुआ को चार बिंदुओं का दो पेज का लंबा चौड़ा पत्र सौंपकर इसे अनाधिकृत कहा है। इसमें सबसे उल्लेखनीय बात यह कही गई है कि पुलिस हाउसिंग बोर्ड द्वारा भी सभी कैटेगरी के आवास बनाए गए हैं उसके बाद भी संपदा संचालनालय जीएडी के क्वार्टर पर अपना अधिकार जता रहा है वह भी केवल नाम संपदा संचालनालय होने से। मानो यह संचालनालय सभी सरकारी आवासों का अकेला मालिक हो।
कुर्सी कुनबे में ही रहेगी?
प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल के उत्तराधिकारी की खोज चल रही है। रामगोपाल कोल-कस्टम मिलिंग स्कैम में फंसे हैं, और पिछले तीन साल से फरार चल रहे हैं। इन सबके बीच पार्टी के कई नेता रामगोपाल की जगह लेने के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। पार्टी के कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि पार्टी का अगला कोषाध्यक्ष दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा के परिवार से हो सकता है।
प्रदेश कांग्रेस बिना कोषाध्यक्ष के चल रहा है। वर्तमान में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हो रही है, तो प्रदेश कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की भी चर्चा है। हालांकि पार्टी के प्रमुख नेताओं का मानना है कि प्रदेश संगठन में बदलाव के साथ ही कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के समय ही रामगोपाल अग्रवाल की जगह नई नियुक्ति पर मंथन हुआ था। एक बिल्डर के नाम पर सहमति भी बन गई थी। मगर बिल्डर उस समय गंभीर रूप से बीमार हो गए, उनसे जुड़े कुछ विवाद पार्टी को बताए गए, और फिर नियुक्ति अटक गई।
कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ कारोबारी नेताओं ने कोषाध्यक्ष पद के लिए भागदौड़ करना भी शुरू कर दिया है। पार्टी के एक खेमे के लोगों के बीच दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा के परिवार के सदस्यों में से एक नाम की चर्चा भी हो रही है। दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा करीब 2 दशक तक राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे हैं। वो गांधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते थे। वोरा के पुत्र अरुण वोरा दुर्ग से तीन बार विधायक रहे हैं, और चुनाव हारने के बाद दुर्ग शहर जिलाध्यक्ष बनने की होड़ में हैं। अरुण वोरा अपने पिता की तरह सीधे सरल माने जाते हैं। मगर कोषाध्यक्ष के लिए अरुण नहीं, बल्कि उनके चचेरे भाई राजीव वोरा के नाम का हल्ला है।
चर्चा है कि राजीव वोरा के लिए पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव सहमत हो सकते हैं। मगर पूर्व सीएम भूपेश बघेल, राजीव वोरा के नाम पर सहमत होंगे, इस पर संशय है। इन सबके बीच पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष पारस चोपड़ा सहित कई और कारोबारी नेताओं के नाम उछल रहे हैं। देखना है पार्टी क्या कुछ करती है।
आखिर कमरा एलॉट हो गया...

कुछ दिन पहले सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव ने पर्यटन, संस्कृति व धर्मस्व विभाग के मंत्री राजेश अग्रवाल के पीए को ससम्मान एक पत्र लिखा था जिसमें बताया गया था कि मंत्री जी के आदेश पर अमल नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति को अपना निजी सहायक नियुक्त करने का आदेश जारी करने कहा गया है वे केवल आठवीं पास हैं। जबकि छत्तीसगढ़ सचिवालय सेवा भर्ती नियम 2012 के तहत उन्हें कम से कम 12वीं पास होना चाहिए।
इस जवाब के बाद ऐसा लग रहा था कि नियुक्ति की जिद छोड़ दी गई होगी। मगर सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी से प्रत्याशी रहे डॉ. सुनील किरण ने एक तस्वीर पोस्ट की है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे हैंडल की पोस्ट भी शेयर की है। इसमें यह दिखाया गया है कि जिस तरबेज आलम को नियुक्ति करने से मना किया गया है, उनको मंत्री के बंगले में एक कमरा मिल गया है और निज सहायक का ओहदा भी दे दिया गया है। इसमें यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि जीएडी ने इस नियुक्ति के लिए सहमति दे दी है या फिर अपने स्तर पर ही मंत्री या अफसरों ने फैसला ले लिया है। लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया भी इस पोस्ट पर दे रहे हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि अपने से ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों को शायद मंत्री जी अपना सहायक नहीं बनाना चाहते होंगे। मंत्री जी हायर सेकेंडरी स्कूल तक पढ़े हुए हैं। यह शिक्षा कम नहीं है- कई विधायक और मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता इससे भी कम है और रही है।
अब गवाह मुद्दई बना
कल ईओडब्ल्यू ने कांग्रेस शासन काल में हुए दो घोटालों को लेकर चल रही अपनी जांच के सिलसिले में 19 ठिकानों पर सर्च किया। इनमें भ्रष्टाचार की कमाई से क्या मिला, कितना मिला इसे लेकर ब्यूरो ने कोई जानकारी नहीं दी। उसके संक्षिप्त से दो पैराग्राफ के प्रेस नोट में केवल छापे मारे गए, यही सूचना थी। बहरहाल इस कार्रवाई में एक नई जानकारी सामने आई। वह यह कि एक ऐसे अधिकारी भी लपेटे में आए जो अब तक एसीबी ईओडब्ल्यू की पंचनामा कार्रवाई में बतौर गवाह पैनलिस्ट हुआ करते थे। इन्हें विभाग ने ही मनोनीत कर रखा था। यानी सरगुजा संभाग में जहां भी ब्यूरो रेड करता या रेड हैंडेड पकड़ता ये साहब गवाह के रूप में सील साइन करते। शायद यही वजह रही कि उन्हें अब तक एसीबी से बचने के तौर तरीके समझ में आ गए थे। लेकिन कहा गया है न कि पुलिस की दोस्ती और दुश्मनी दोनों अच्छी नहीं। आखिरकार डॉक्टर साहब फंस ही गए।
डॉ. साहब वर्तमान में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में उप संचालक के पद पर हैं। इससे पहले वे वर्षों तक अंबिकापुर में पशु चिकित्सक के रूप में पदस्थ रहे हैं। बाद में वे सरगुजा जिला पंचायत में सहायक परियोजना अधिकारी रहे और पुन: मूल विभाग में लौटने के बाद कांग्रेस शासनकाल में बलरामपुर जिले में उपसंचालक पशुपालन भी रहे। डीएमएफ घोटाले के दौरान पशुपालन विभाग के कई कार्यों में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं, जिसकी आंच उन पर पड़ गई है।
ऐसे में यहां भी लाखों नाम कटेंगे!
आजकल हर घर में एक चर्चा चल रही है - मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर। 4 नवंबर से शुरू यह प्रक्रिया 4 दिसंबर तक चलेगी, लेकिन लाखों मतदाताओं को इसमें भारी परेशानी हो रही है। जशपुर से लेकर बस्तर तक की खबरें बताती हैं कि फॉर्म भरना हो या 2003 की पुरानी लिस्ट में नाम ढूंढना, सब कुछ जटिल लग रहा है। बिहार के फॉर्म से भी कठिन ये प्रपत्र, नाम न मिलना, ब्लैक एंड व्हाइट फोटो का भ्रम ये सब मिलकर लोगों को तनाव दे रहे हैं।
भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर को मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाने के लिए शुरू किया है। छत्तीसगढ़ में 2.12 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं, और 99 फीसदी तक फॉर्म घर-घर पहुंच चुके हैं। जांजगीर का ही उदाहरण लें, यहां 7 लाख से ज्यादा फॉर्म बांटे गए, लेकिन सिर्फ 31 फीसदी ही डिजिटलाइज हो पाए हैं। ऑनलाइन आवेदन तो महज 1000 के आसपास ही हैं। बूथ लेवल अधिकारी फॉर्म तो दे जाते हैं, लेकिन नाम कैसे ढूंढें, फॉर्म कैसे भरें, उनको ये सिखाने का समय ही नहीं। वे खुद पूरी तरह नहीं सीखे हुए हैं। पोर्टल पर 2003 की लिस्ट डाउनलोड करने का लिंक है लेकिन नाम में जरा सा बदलाव जैसे विवाह के बाद कुमारी से श्रीमती हो गया हो तो नाम गायब! कुछ दिलचस्प मामले हैं- एक महिला ने बताया, उनकी मां का वोटर आईडी गांव का है, 20 साल से शहर में हैं, लेकिन पुराना रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहा। कोरबा के स्लम इलाकों से खबर है कि बीएलओ से लोग उल्टे सवाल पूछते हैं, महिला बीएलओ को अकेले जाना डरावना लगता है। शिविर लग रहे हैं, मितानिन और पार्षद मदद कर रहे, लेकिन समय कम है।
कहा गया है कि 1987 से पहले जन्मे लोगों के लिए कोई सरकारी आईडी चलेगी, लेकिन 1987-2004 वाले को जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल सर्टिफिकेट देना होगा, उसके बाद वालों को सिर्फ जन्म प्रमाणपत्र। पहचान के लिए आधार, पैन, पासपोर्ट ठीक है लेकिन फोटो ब्लैक एंड व्हाइट ही हो या कोई भी चलेगा इस पर भी भ्रम फैला है। आयोग ने कहा है कि पहले वाली फोटो धुंधली है तो ही नई लगेगी, वरना पुरानी ही चलेगी। गलत जानकारी पर जेल और जुर्माने का डर भी लोगों को रोक रहा। टोल-फ्री नंबर 1950 पर मदद मिल सकती है, मगर रोजमर्रा के कामकाज में उलझे लोग इसे मुसीबत समझ रहे हैं।
आधार न होने से आदिवासी समुदाय के लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। प्रवासी मजदूर छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में हैं- बिहार की तरह। छत्तीसगढ़ में भी यही आशंका है। अगर फॉर्म न भरा या नाम न मिला, तो वैध मतदाताओं के नाम कट सकते हैं। आयोग कहता है, कोई छूटेगा नहीं, लेकिन दिक्कतें साफ दिख रही हैं।
माथुर से मिलने का मौका

सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर के परिवार में राजस्थान के पाली में शनिवार को विवाह समारोह में सीएम विष्णुदेव साय, और सरकार के मंत्रियों ने शिरकत की। माथुर छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। वो यहां के छोटे-बड़े नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर मिलते-जुलते रहे हैं। माथुर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद संगठन के प्रभार से मुक्त हुए, तब भी पार्टी के नेता उनके संपर्क में रहे हैं।
और जब माथुर के भाई की बेटी की शादी हुई, तो छत्तीसगढ़ के भाजपा के नेता चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुंचे थे। इनमें सरकार के मंत्री ओपी चौधरी, रामविचार नेताम, दयालदास बघेल, गजेन्द्र यादव, टंकराम वर्मा, गुरू खुशवंत साहेब के साथ ही सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी थे। धमतरी मेयर रामू रोहरा, और कारोबारी पप्पू भाटिया सहित कई उद्योगपतियों ने भी विवाह समारोह में शिरकत की। माथुर भले ही सक्रिय राजनीति से अलग हैं, और संवैधानिक पद पर हैं। लेकिन उनकी सिफारिशों को पार्टी तवज्जो देती है। इसकी झलक उनके यहां विवाह समारोह में भी नजर आई।
खुद के बनाए नियम बह गए..
सोशल मीडिया पर राजधानी रायपुर के एक समाज विशेष के मुखिया के यहां ‘कॉकटेल’ पार्टी का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें रशियन सुंदरियां मेहमानों को शराब परोसते दिखाई दे रही है। यह पार्टी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी वजह यह है कि समाज के मुखिया ने बकायदा एक बैठक कर कुछ महीने पहले विवाह व अन्य कार्यक्रमों में शराब आदि के प्रचलन को रोकने के लिए 8 बिंदुओं पर फरमान जारी किया था। इसमें पूल पार्टी पर प्रतिबंध लगाने के अलावा सगाई, और संगीत समारोह में शराब व हुक्का पिलाने पर पूरी तरह से रोक भी शामिल था। अब मुखियाजी ने खुद के यहां कॉकटेल पार्टी रखी, तो हडक़ंप मच गया। मुखियाजी के विरोधियों ने ‘पार्टी’ का वीडियो वायरल कर दिया। अब उन्होंने खुद के बनाए नियमों का उल्लंघन किया है, तो जवाब देना मुश्किल हो रहा है। मुखियाजी की कॉकटेल पार्टी का वीडियो कारोबारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
जंगल में पैदल चलतीं सरस्वती बेटियां

सरकार की सरस्वती साइकिल योजना का फायदा इन बच्चियों तक नहीं पहुंचा। बिलासपुर एटीआर के छपरवा गांव से आगे अमरकण्टक मार्ग पर केंवची के पास स्कूली बालिकाएं पैदल स्कूल जाती दिखीं। यहां करीब 100 से अधिक छात्राओं के पास एक भी साइकिल नहीं थी।
छात्राओं ने बताया कि योजना के तहत उन्हें साइकिलें जरूर मिली थीं, लेकिन उनकी गुणवत्ता बेहद खराब थी। साइकिलें दो-तीन महीने में ही टूट-फूट गईं, कई की चेन, ब्रेक और पैडल कुछ ही दिनों में जवाब दे गए। मरम्मत पर पैसा खर्च करना पड़ा, लेकिन फायदा नहीं हुआ। अब इन लड़कियों को रोजाना कई किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि सरस्वती साइकिल योजना का हाल ‘बंदरबांट’ है। योजना का मकसद छात्राओं को शिक्षा से जोडऩा और दूरी की परेशानी कम करना था, पर साइकिलों की निम्न गुणवत्ता ने उद्देश्य को बेअसर कर दिया। यदि इस योजना की निष्पक्ष जांच हो, तो छत्तीसगढ़ में एक बड़ा स्कैंडल सामने आ सकता है।
ननकीराम की निशानेबाजी
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर की शिकायतों की अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। कंवर ने कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत के खिलाफ 14 बिन्दुओं पर शिकायत की थी। उन्होंने कोरबा कलेक्टर की हटाने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन भी किया था। सीएम विष्णुदेव साय की दखल के बाद कंवर की शिकायतों की जांच का जिम्मा बिलासपुर कमिश्नर सुनील जैन को दिया गया है। वैसे तो हफ्ते भर के भीतर जांच प्रतिवेदन देना था, लेकिन जांच अब तक जारी है।
बताते हैं कि बिलासपुर कमिश्नर बिंदुवार जांच कर रिपोर्ट देने वाले थे। उन्होंने कुछ शिकायतों की पड़ताल के लिए अलग से टीम भी गठित की। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर से भी आरोपों से जुड़े दस्तावेज मांगे थे। चर्चा है कि कंवर ने कुछ दस्तावेजी सुबूत भी दिए हैं। बिलासपुर कमिश्नर अगले दो-तीन दिनों में जांच प्रतिवेदन सरकार को सौंप देंगे। फिर भी जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद भी सरकार, कोरबा कलेक्टर को हटाने कंवर की जिद पूरी कर पाएगी, इसको लेकर संशय है। यदि शिकायत जांच में गलत पाए जाते हैं, तो हटाने का सवाल पैदा नहीं होता। मगर सही पाए जाने पर भी हटाना आसान नहीं है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि प्रदेश में एसआईआर का काम तेजी से चल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में कलेक्टर सीधे जुड़े हुए हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया से जुड़े अफसरों के तबादले पर रोक लगा रखी है। तबादले के लिए आयोग की अनुमति जरूरी है। इन सबको देखते हुए कोरबा कलेक्टर को राहत मिलती दिख रही है। फिर भी जांच प्रतिवेदन का इंतजार हो रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
वफ़ादारी अभी जि़ंदा है...
इस बार जशपुर और छत्तीसगढ़ के टमाटर वाले किसानों के चेहरे पर सच्ची मुस्कान है। पिछले कई सालों से नवंबर-दिसंबर में टमाटर का दाम चारों खाने चित्त होता था। एक रुपया, दो रुपया, पांच रुपया। कई बार तो खेत में ही सड़ाने या फेंकने की नौबत आ जाती थी। पिछले साल दुर्ग में जब टमाटर एक रुपये किलो पहुंच गया तो किसानों ने इसे सडक़ों पर लाकर फेंक दिया था। लुड़ेग में ही टमाटर के खेत को ट्रैक्टर से रौंदा जा चुका है। लेकिन इस नवंबर में लुड़ेग, पत्थलगांव जैसे इलाकों में टमाटर थोक में ही 50-60 रुपए किलो तक बिक रहा है। सुबह दस बजते-बजते मंडी खाली, दोपहर में सन्नाटा। बाहर के व्यापारी रात में ही गाडिय़ां लगाकर खड़े हो रहे हैं। माल हाथों-हाथ उठ रहा है।
जशपुरिहा टमाटर अपने नाम से पूरे उत्तर भारत में मशहूर है। ओडिशा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल – इन राज्यों की मंडियों में लोग खास तौर पर जशपुर का लाल रसीला टमाटर मांगते हैं। यहां की मिट्टी, मौसम और किसानों की मेहनत की वजह से इस साल लुड़ेग क्षेत्र में ही 15 हजार टन से ज्यादा उत्पादन हुआ है। पूरे जशपुर जिले में करीब 10 हजार हेक्टेयर में टमाटर की खेती होती है और एक सीजन में एक लाख 90 हजार मीट्रिक टन तक पैदावार होती है। दुलदुला, मनोरा, सन्ना जैसे नए इलाकों में भी कृषि विभाग की मदद से टमाटर की खेती तेजी से फैल रही है।
पहले नवंबर-दिसंबर में खरीफ का टमाटर एक साथ इतना आता था कि दाम धड़ाम से गिर जाते थे। लेकिन इस सीजन में मौसम की कुछ अनुकूलता और किसानों ने थोड़ी सावधानी बरती। फसल का पीक एक साथ नहीं आया। नतीजा, इस बार सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा है। झारखंड, बंगाल, बिहार में वहां के स्थानीय टमाटर की फसल या तो देर से आई या कमजोर हुई, इसलिए सारी नजरें जशपुर पर टिक गईं।
स्थानीय बाजारों में जो टमाटर दिख रहा है, वो छोटी बाडिय़ों का है। मगर, वह भी 50-60 रुपए किलो आसानी से बिक रहा है। छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग के आसपास के किसान भी इसी मौके का फायदा उठा रहे हैं।
ज़मीन कारोबारी सदमे में
सरकार ने सात साल बाद संपत्ति की गाइड लाईन दरों में भारी वृद्धि की है। शहरों में तो 40 फीसदी तक और ग्रामीण इलाकों में तीन सौ फीसदी तक की वृद्धि की गई है। इससे रियल एस्टेट कारोबारियों में हडक़म्प मचा हुआ है। कारोबारी रियल एस्टेट कारोबार ठप्प पडऩे की आशंका जता रहे हैं। फिलहाल तो रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े लोगों ने रजिस्ट्री नहीं कराने का फैसला लिया है।
रियल एस्टेट के कारोबारियों की एक बैठक हो चुकी है। चैम्बर ऑफ कॉमर्स से भी समर्थन मांगा गया है। कारोबारियों को सबसे ज्यादा परेशानी रायपुर शहर की सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों की गाइड लाईन दरों में बढ़ोत्तरी से हो रही है। रायपुर और आसपास के इलाकों में सैकड़ों करोड़ का निवेश हो चुका है। ऐसे में आवासीय परियोजना की लागत बढऩे से कारोबार पर असर पडऩे की संभावना जताई जा रही है।
बताते हैं कि कुछ प्रमुख बिल्डर्स ने तीन माह पहले आवास पर्यावरण मंत्री ओ.पी.चौधरी से मुलाकात की थी। चौधरी ने उन्हें साफ तौर पर संकेत दे दिए थे कि गाइड लाईन की दरों में बड़ी वृद्धि की जाएगी। सरकार की तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि किसानों को गाइड लाईन दर बढऩे पर मुआवजा ज्यादा मिलेगा। मगर जमीन अधिग्रहण शहर के आसपास नहीं के बराबर है। क्योंकि कोई बड़ा सरकारी प्रोजेक्ट फिलहाल नहीं चल रहा है।
कारोबारी इस मसले पर सरकार से लड़ाई लडऩे की योजना बना रहे हैं। कानूनी विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। ऐसे में सरकार के फैसले का क्या असर होता है, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।
कुत्ता पकड़वाएंगे प्रिंसिपल साहब....!
देशभर में आवारा कुत्तों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है। सडक़ पर आवारा कुत्तों के प्रति कुत्ताप्रेमियों की हमदर्दी एकतरफ और आवारा कुत्तों के जुल्म के सताए बच्चे-नौजवान दूसरी तरफ। इस बहस से परे सरकारों के सामने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करवाने की जिम्मेदारी तो है ही। बता दें कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक जगहों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया है।
हमने राजपथ में कुछ दिन पहले आपको छत्तीसगढ़ की बैकुण्ठपुर नगर पालिका के एक आदेश के बारे में बताया था, जिसके मुताबिक सडक़ पर आवारा कुत्तों को कुछ भी खिलाने पर जुर्माने का प्रावधान रखा गया। इसके पीछे मकसद ये कि कम से कम खाने के लालच में तो सडक़ों पर कुत्तों का जमावड़ा नहीं लगेगा।
अब एक और नया आदेश आया है, जो पूरे प्रदेश के लिए है। लोक शिक्षक संचालनालय ने स्कूल के आसपास आवारा कुत्तों को हटाने के लिए सभी स्कूल प्रिंसिपलों को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। इनकी जिम्मेदारी तय की गई है कि ये अपने स्कूल के पास जहां भी कुत्ते देखेंगे तुरंत संबंधित नगर निगम, पालिका, जनपद, या पंचायत के डॉग कैचर को सूचना देंगे। हालांकि शालेय शिक्षक संघ ने इस फैसले को अव्यवहारिक और अनुचित बताया है, उनका कहना है कि ये काम स्थानीय प्रशासन को करना चाहिए, शिक्षकों पर पहले ही काम का इतना बोझ है, स्ढ्ढक्र का काम भी सर पर है और अब कुत्तों की निगरानी का काम ज्यादती न हो जाए...!
एक दिन का सत्र, कई तरह की चर्चा
विधानसभा के रजत जयंती पर एक दिन का विशेष सत्र हुआ। पुराने भवन में यह आखिरी सत्र था। शीतकालीन सत्र अब विधानसभा के नए भवन में होगा। सत्र के दौरान कई सीनियर सदस्य अध्यक्षीय दीर्घा में मौजूद थे। खुद स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने उन्हें आमंत्रित किया था। इनमें सांसद बृजमोहन अग्रवाल, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री रविन्द्र चौबे, और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल थे।
सदन में पक्ष-विपक्ष के सदस्यों ने अपनी पुरानी यादें साझा की। हल्ला है कि एक पूर्व विधानसभा सदस्य, जो कि लंबे समय तक सदन की सदस्य रहे हैं, वो सदन को संबोधित करना चाह रहे थे। स्पीकर तक उन्होंने अपनी बात पहुंचाई भी। मगर पूर्व में कभी इस तरह की अनुमति नहीं दी गई थी, लिहाजा, उन्हें मना कर दिया गया। इससे परे पूर्व मंत्री कवासी लखमा की गैरमौजूदगी विशेषकर विपक्षी सदस्यों को खल गई।
लखमा, आबकारी घोटाला केस में जेल में हैं। कांग्रेस विधायक दल के सचेतक लखेश्वर बघेल ने कहा कि लखमा राज्य बनने के पहले से लगातार विधानसभा के सदस्य हैं। इसलिए उन्हें सदन की कार्रवाई मेें हिस्सा लेने की अनुमति दी जानी चाहिए थी। लोकसभा और राज्यसभा में भी जेल में बंद सदस्यों को सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाती है। चर्चा है कि खुद कवासी सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने के बजाए आंखों के इलाज के लिए अंबेडकर अस्पताल में भर्ती होना चाह रहे थे जो कि उन्हें मिल गई थी। और इलाज कराकर वापस जेल चले गए। कुल मिलाकर एक दिन यह सत्र कई मामलों में चर्चा का विषय रहा है।
बिहार से लौटा लश्कर, बंगाल कूच
बिहार के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल चुनाव तैयारियों में जुट गई है। छत्तीसगढ़ भाजपा के महामंत्री (संगठन) पवन साय को बंगाल की 45 विधानसभा सीटों का प्रभारी बनाया गया है। साय पिछले दिनों कोलकाता में जाकर स्थानीय प्रमुख नेताओं के साथ बैठक कर चुके हैं।
बताते हैं कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पदाधिकारियों की ड्यूटी लगाई जा रही है। सौ से अधिक नेताओं को प्रचार के लिए वहां भेजा जा सकता है। भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल बंगाल में पहले भी काम कर चुके हैं। लिहाजा, वो यहां प्रदेश के नेताओं को टिप्स भी दे रहे हैं। सरकार के एक मंत्री भी पिछले दिनों बंगाल का दौरा कर आ चुके हैं। इन सबको देखते हुए प्रदेश कार्यकारिणी, और निगम मंडलों में नियुक्तियां जल्द होने के संकेत हैं। देखना है आगे क्या होता है।
यूनेस्को सूची के लिए सिरपुर में नई कोशिशें

हजारों साल पुराने पुरातात्विक अवशेष, अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व होने के बावजूद राज्य का एक भी स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है। विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के लिए किसी भी स्थल को पहले अस्थायी सूची में आना जरूरी है। कांगेर घाटी ने इस पहली बाधा को पार कर लिया है, लेकिन बीते कई वर्षों से चल रही कोशिशों के बाद भी सिरपुर अस्थायी तौर पर भी सूची में शामिल नहीं हो सका है।
महासमुंद जिले में महानदी के किनारे स्थित सिरपुर 6वीं से 8वीं शताब्दी में एक बड़ा बौद्ध-हिंदू केंद्र था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने सिरपुर को 100 विहार और 150 मंदिरों वाले समृद्ध स्थल के रूप में दर्ज किया था। यहां का भ्रमण करने पर इनमें से कुछ का ही दर्शन किया जा सकता है। जाहिर है कि इसकी मिट्टी के नीचे अनगिनत कहानियां छिपी हो सकती हैं।
इसे विश्व धरोहर में नामांकित करने की कोशिश इसी महीने फिर शुरू हुई। एएसआई और साडा की टीम ने यहां का निरीक्षण कर 34 खास जगहों का चिन्हांकित किया और उन्हें 4 कलस्टरों में बांटने की योजना बनाई है। यूनेस्को के मानक में फिट बैठ सके, इसके लिए कुछ आधुनिक सुविधाएं पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराने की योजना है। जैसे अधिक सुगम पैदल मार्ग, बैटरी गाडिय़ां, ब्रेल साइनेट और नए गाइड सेंटर।
यूनेस्को में नामांकन केंद्र सरकार की ओर से ही जाता है। केंद्र हर वर्ष केवल 2-3 नामांकन ही भेजता है, जिनमें अन्य राज्यों के आवेदन भी शामिल होते हैं। प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय स्तर पर होनी है। देश की ओर से प्रस्ताव जाएगा, तब यूनेस्को में विचार होगा। वैसे कांगेर घाटी को अस्थायी सूची में शामिल हो जाने से यह तो समझा जा सकता है कि वैश्विक स्तर के दस्तावेज कैसे तैयार करे और कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाए- इसकी मोटी जानकारी अपने राज्य के अफसरों को है। मगर, अभी तक सिरपुर का वैज्ञानिक दस्तावेज, तुलनात्मक अध्ययन और संरक्षण की योजना पूरी तरह तैयार नहीं है। इसे राज्य सरकार को एएसआई की मदद से तैयार करना है। कई हिस्सों में यहां खनन अधूरा पड़ा है, जिसे आगे बढ़ाने के लिए शायद फंड नहीं मिल रहा है। अगर सिरपुर का डोजियर अगले एक-दो साल में तैयार हो गया, तो 3–5 साल में इसे अस्थायी सूची में जगह मिल सकती है। सिरपुर में विश्व धरोहर बनने की क्षमता तो है, मगर- वर्षों से प्रयास के बावजूद अब तक सफलता नहीं मिली है।
हे राम...!

छत्तीसगढ़ में लंबे वक्त तक संस्कृति और धर्मस्व मंत्री रहे, बीजेपी के सीनियर मोस्ट नेता बृजमोहन अग्रवाल ने राज्य सरकार को चि_ी लिखकर बताया है कि इस वक्त एक बात को लेकर सनातनियों में असंतोष और निराशा व्यापत है। बात प्रभु राम की मूर्ति से जुड़ी है। भूपेश सरकार में पूरे प्रदेश में अलग-अलग जगहों श्रीराम की आदमकद प्रतिमा लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहली प्रतिमा चंदखुरी में लगी। उस प्रतिमा के रंग-ढंग पर आम जनता समेत उस वक्त विपक्ष में बैठी बीजेपी ने खूब टिप्पणी की, और कहा कि कांग्रेस सरकार ने प्रभु राम का अपमान किया। राज्य में हाल की बीजेपी सरकार बनने के पहले तक समय-समय पर मांग होती रही कि रामजी की इस प्रतिमा को बदलकर नई मूर्ति लगाई जाए।
2023 में बीजेपी सरकार बनी, और मूर्ति बनने का ऑर्डर हो गया। मध्यप्रदेश के एक मूर्तिकार ने बड़ी मेहनत से रामजी की बड़ी सुंदर प्रतिमा तैयार की। प्रतिमा का निर्माण ग्वालियर सेंड स्टोन आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में किया गया, पांच महीने पहले प्रतिमा पूरी तरह तैयार हो चुकी थी, और चंद्रखुरी में स्थापना का इंतजार था। कई अखबारों और मीडिया में मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा का ये बयान है कि छत्तीसगढ़ के ठेकेदार ने केवल 10 लाख रुपए का अग्रिम भुगतान दिया था, जबकि करीब 70 लाख रुपए का बकाया अब तक नहीं मिला है। लगातार बढ़ते दबाव और भुगतान न मिलने के कारण प्रतिमा को बेचने व दूसरी जगह स्थापित करने का निर्णय लेना पड़ा। भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप की 51 फीट ऊंची प्रतिमा अब मुरैना जिले के एंती पर्वत स्थित शनिधाम में स्थापित की जाएगी।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को चि_ी लिखकर ये याद दिलाया है कि दो साल बीतने के बाद भी भगवान राम की नई मूर्ति के स्थापना की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। उन्होंने लिखा है कि विभागीय उदासीनता के चलते नवनिर्मित मूर्ति को दूसरे राज्य में स्थापित करने की स्थिति बन गई है, जिससे सनातन धर्मावलंबियों और प्रदेशवासियों में असंतोष और निराशा व्याप्त है। उन्होंने 3 महीने में मूर्ति स्थापित करने की मांग की है।
पगड़ी उतारी और छूटा शेखावत...
सोशल मीडिया पर रायपुर के मौदहापारा थाने के भीतर का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें करणी सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राज शेखावत पल भर के लिए पुलिस के सामने अपनी पगड़ी उतार रहा है। पगड़ी उतारते हुए उसके वकील उसे हाथ से इशारा कर मानो मना कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सूदखोर वीरेंद्र तोमर की गिरफ्तारी के बाद जुलूस निकालने को राजपूत समाज की साख के खिलाफ बताते हुए बीते कुछ दिनों से शेखावत लगातार अपने सोशल मीडिया पर वीडियो बना रहा है। उसने रायपुर पुलिस को घर में घुसकर मारने की धमकी तक दी, इतना ही नहीं जब डिप्टी सीएम और सूबे के गृहमंत्री विजय शर्मा ने ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई की बात कही तो राजपूत ने उनका फोन नंबर सोशल मीडिया पर साझा कर अनर्गल बातें कहीं।
वीरेंद्र तोमर केस रफा-दफा करने के बदले छत्तीसगढ़ के एक सांसद पर पैसे लेने के बाद काम नहीं करने का आरोप भी लगाया। अब बुधवार को मानो किसी तय करार के मुताबिक जब वो खुद गिरफ्तारी देने रायपुर पहुंचा तब थाने में कुछ ही घंटों में उसे मुचलके पर छोड़ दिया गया। अब शेखावत, रायपुर में 7 दिसंबर को क्षत्रिय समाज की महापंचायत की तैयारी में लग गया है।
इस पूरे वाकये पर सोशल मीडिया पर एक समय छत्तीसगढ़ के एक चर्चित नेता से जुड़े रहे, और लगातार आलोचनात्मक टिप्पणियां करने वाले एक चर्चित व्यक्ति ने खुद को क्षत्रिय बताते हुए शेखावत को आड़े हाथों लिया है। उनकी सोशल मीडिया पोस्ट, सांसद से डील वाले आरोप पर एक तरह से पलटवार भी है।
पहले राष्ट्रपति की घोषणाएं अधूरी

1952 में इन्हीं दिनों, 22 नवंबर को जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरगुजा दौरे पर आए थे तो वे पंडो जनजाति से मिले। तब यह आदिवासी समाज जंगल में रहता था। छोटे कपड़ों से शरीर को ढंके हुए रहते थे। आज डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निर्देश पर बसाई गई 13 कॉलोनियों में रहने वाले लोग सलीके से कपड़े ही नहीं पहनते, लोगों के पास मोबाइल फोन, गाडिय़ां, घरों में बिजली के आधुनिक उपकरण हैं। कई लोग सरकारी नौकरी में पहुंच चुके हैं। कुछ साल बाद पंडो समाज से एक डॉक्टर भी निकलेगा। एक युवा छात्र मेकहारा (रायपुर) में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। कुछ बच्चे पीएससी की तैयारी कर रहे हैं।सरगुजा जिला मुख्यालय अंबिकापुर से सिर्फ 12 किलोमीटर दूर पंडोनगर तक पहुंचने के लिए पक्की सडक़ भी बन चुकी है। सैलानियों के लिए यहां का राष्ट्रपति भवन कौतूहल बना हुआ है।
पंडो जनजाति के साथ-साथ विशेष संरक्षित अति पिछड़ी जनजातियों को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था।
मगर, कुछ तथ्य आपको हैरान कर सकते हैं। जैसे- केंद्र की पीवीटीजी सूची में विशेष संरक्षित पंडो जनजाति को शामिल नहीं किया जा सका है। इसके पीछे अफसरों की उदासीनता बताई जाती है, वे दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए। हालांकि राज्य सरकार ने अपनी पीवीटीजी सूची में शामिल कर लिया है और उन्हें योजनाओं का लाभ दे रही है।
यह बात भी गौर करने की है कि प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई एक बड़ी घोषणा पर अब तक अमल नहीं हुआ। इस घोषणा के मुताबिक प्रत्येक परिवार को 10-10 एकड़ जमीन दिया जाना था। यहां के निवासी बताते हैं कि कुछ लोगों को 4-5 एकड़ जमीन तो मिली, कई लोगों को नहीं मिली। 10 एकड़ जमीन तो किसी को मिली ही नहीं। वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद उन्हें विधिवत पट्टा दिया गया। इसके पहले उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं था कि जमीन उनकी है। जब भी दत्तक पुत्रों की बात होती है, ध्यान सरगुजा की ओर ही जाता है, मगर ये जनजाति बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया, एमसीबी, कोरबा, रायगढ़ और जीपीएम जिलों में भी मौजूद है। पंडो के साथ-साथ पहाड़ी कोरवा, बिरहोर और कामर जातियों को भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दत्तक पुत्र माना था। इन समुदायों को लुप्त होने से बचाने के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने, कुपोषण दूर करने के कई काम हुए हैं- मगर प्रशासन तक पहुंच अब भी आसान नहीं है। पिछली सरकार के दौरान बलरामपुर जिले की घटना सामने आई थी जहां करीब 15 लोगों की कुपोषण, रक्ताल्पता के कारण मौत हो गई थी। पंडो जनजाति पिछली जनगणना में 31 हजार 800 के करीब थी। 2011 के बाद से जनगणना हुई नहीं है। समाज के लोगों का कहना है कि हम दत्तक पुत्रों की आबादी छत्तीसगढ़ में अब 70 हजार के आसपास है। पंडो समाज के प्रमुखों से बात करने से यह भी पता चलता है कि पढ़ाई का अवसर मिला तो बहुत से युवा पढ़ लिख लिए लेकिन वे बेरोजगार हैं। बहरहाल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सरगुजा प्रवास से उन्हें बेहद खुशी है। इसे वे 73 साल पहले जैसा ही ऐतिहासिक मौका मानते हैं और बड़ी घोषणाओं की उम्मीद भी कर रहे हैं।
अभिमन्यु का शोक या जयद्रथ वध
छत्तीसगढ़ विधानसभा की 25 वर्षों की यात्रा पर आहूत विशेष सत्र में मंगलवार को सदन में पहली विधानसभा से लेकर अब तक के पक्ष विपक्ष की राजनीति के उतार चढ़ाव पर चर्चा हुई। वक्ताओं हूं कहा गया था कि कोई राजनीतिक बातें नहीं होंगी। केवल सदन की अच्छाई और कार्यवाही संचालन में लागू और अपनाए गए नवाचारों पर बात होगी। भला दलीय नेता भाषण दें और राजनीति की बातें न हो असंभव। कई दिग्गज नेताओं ने संसदीय हदों को समझते हुए हल्के फुल्के अंदाज में ही सही आरोपात्मक बातें रखते रहे।
शुरुआत में भाजपा के वरिष्ठ विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने और विपक्ष की ओर से पूर्व सीएम कांग्रेस भूपेश बघेल ने जवाब दिया। चंद्राकर ने अपनी बातें 45 मिनट में रखी तो बघेल ने 25 मिनट में। दर्शनशास्त्र में उपाधिधारी चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ शब्द से इसके इतिहास से शुरू कर गठन काल और 25 वर्षों की बात रखी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के उस बयान को उद्धृत किया जिसमें देश में छोटे राज्यों को गैर जरूरी कहा था । इस पर चुप्पी साधने वाले स्व. चंदूलाल चंद्राकर,वीसी शुक्ल, अजीत जोगी का नाम लिया। फिर राज्य गठन के बाद इन पर नाखून कटाकर शहीद बनने की कोशिश करने जैसे आरोप लगाया।
कांग्रेस की पहली सरकार और (अजीत जोगी का नाम नहीं लिया) मुख्यमंत्री मंत्रियों पर भी हमले किए। लंबे चौड़े संबोधन का समापन चंद्राकर ने यह कहकर किया कि अभिमन्यु के वध का शोक मनाते या जयद्रथ वध की तैयारी करें। उसके बाद से अध्यक्षीय दीर्घा में आए रविन्द्र चौबे, बृजमोहन अग्रवाल समेत अन्य नेता कांग्रेस के अभिमन्यु और जयद्रथ को तलाशते रहे हैं।
दरअसल, अभिमन्यु महाभारत के एक प्रमुख योद्धा थे।जो अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। बहुत वीर और पराक्रमी थे, और कम उम्र में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करके कौरवों से अकेले लड़ गए थे। दुर्भाग्यवश, चक्रव्यूह से बाहर निकलने की विधि न जानने के कारण उनका वध हो गया था। जब अर्जुन को यह बात पता चली कि कौरवों के एक मात्र दामाद जयद्रथ ने चक्रव्यूह रचा था तो अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने की प्रतिज्ञा ली। आज कर्ण और अर्जुन से भी पहले शूरवीर अभिमन्यु का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
महाभारत कथा से खत्म हुए वार पर बघेल भला कैसे चुप रहते उन्होंने ने भी चुटकी ली। बघेल ने कहा पहली विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष चुनाव में भाजपा के भीतर मची हलचल पर चुटकी ली। उन्होंने पर्यवेक्षक के रूप में आए नेता का नाम न लेकर कहा कि वो आज देश के शीर्ष पद पर हैं।
सरकारी खर्च पर बनाओ, लीज पर दो
सरकार ने शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम को पांच वर्ष के लिए छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन को लीज पर दे दिया है। मंगलवार को खेल विभाग, और छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन के बीच औपचारिक रूप से एमओयू भी हो गया। क्रिकेट स्टेडियम तो छत्तीसगढ़ सरकार के लिए एक तरह से सफेद हाथी साबित हो रहा था। रखरखाव पर करीब तीन करोड़ रुपए सालाना खर्च हो रहा था। अब क्रिकेट संघ सरकार को डेढ़ करोड़ रुपए सालाना देगा। साथ ही आईपीएल, और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच होने पर 20 से 30 लाख रुपए सरकार को मिलेंगे।
बताते हैं कि छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य, और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने स्टेडियम को क्रिकेट एसोसिएशन को देने के लिए सरकार को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। शुक्ला की दो माह पहले सीएम विष्णुदेव साय से चर्चा हुई थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम को एसोसिएशन को लीज पर देने के फायदे गिनाए। एसोसिएशन के पास स्टेडियम आने से रखरखाव भी बेहतर ढंग से होगा, और यहां अंतरराष्ट्रीय मैच भी ज्यादा संख्या में हो पाएंगे। सीएम को शुक्ला की बातें जंच गई। इसके बाद विभागीय स्तर पर चर्चा हुई, और फिर स्टेडियम को एसोसिएशन के हवाले कर दिया गया।
क्रिकेट स्टेडियम के अलावा यहां साइंस कॉलेज में सरदार पटेल अंतरराष्ट्रीय स्तर हॉकी स्टेडियम है, अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैच काफी समय से नहीं हुए हैं। इसका रखरखाव बेहतर ढंग से नहीं हो पा रहा है। ऐसे में क्रिकेट स्टेडियम को एसोसिएशन के हवाले करने का फैसला उचित प्रतीत हो रहा है।
केरल चुनाव पर छत्तीसगढ़ की छाया

पिछले दिनों केरल के ईसाई समुदायों के सबसे प्रमुख बिशपों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला। मुलाकात कराई वहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने। दिलचस्प यह है कि इस मुलाकात के एक दिन पहले ही इन बिशपों की एक संयुक्त समिति ने छत्तीसगढ़ के कई गांवों में ईसाई धर्म प्रचारकों को प्रवेश करने से रोके जाने पर चर्चा की और प्रस्ताव पारित किया था। उन्होंने इस बैठक में यह भी कहा कि धार्मिक भेदभाव का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं दिखता जहां अल्पसंख्यकों को अपने धर्म का प्रचार करने पर सार्वजनिक घोषणा कर रोक लगा दी जाए। मालूम हो कि प्राय: ये गांव आदिवासी बहुल है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में यह मामला आया था। हाईकोर्ट ने पेसा कानून का हवाला देते हुए, ग्राम सभाओं के पक्ष में फैसला दिया है और चेतावनी बोर्ड को सही बताया है। बिशपों ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात भी कही। यह सब तब हुआ जब बिशपों की मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी से अगले दिन होने वाली थी। मुलाकात होने के बाद राजीव चंद्रशेखर ने पूछे जाने पर मीडिया से कहा कि छत्तीसगढ़ के मामले में विशेष तौर पर कोई बात नहीं हुई, लेकिन अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा का मुद्दा जरूर मोदी के सामने बिशपों ने रखा और उन्होंने आश्वस्त भी किया। मोदी ने बिशपों से कहा कि मैं सदैव आपकी सेवाओं में उपस्थित रहूंगा।
छत्तीसगढ़ में इस समय प्रार्थना सभाओं के दौरान हिंदुत्ववादी संगठन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आए दिन विवाद हो रहा है। पुलिस उन लोगों को हिरासत में भी ले रही है, जो सभाएं आयोजित कर रहे हैं। गृह विभाग ने भी ऐसी सभाओं को बिना अनुमति आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा रखा है। दुर्ग में दुर्व्यवहार का शिकार हुई ननों को जमानत तो मिल गई है, मगर उनके खिलाफ केस अभी भी चल रहे हैं। बिशप यह मुकदमा वापस लेने की मांग कर रहे हैं। राजीव चंद्रशेखर ने कई चर्चों में जाकर इस घटना पर माफी मांगी और यह आश्वस्त करने की कोशिश की मामला पूरी तरह सुलझा लिया जाएगा। मोदी ने भी एक्स पर लिखा- अद्भुत रही मुलाकात।
केरल में ईसाई समुदाय एक बड़ा वोट बैंक है। अगले साल वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा इनके बीच लगातार इसका समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। कुछ चर्चों का समर्थन मिल भी चुका है। मगर, छत्तीसगढ़ के घटनाक्रमों पर बिशपों की प्रतिक्रिया उसके लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
सांसद खेल में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़

छत्तीसगढ़ में मालवाहक वाहनों में सवारियों को ढोने पर प्रतिबंध केवल कागजों में रह गया है। हर बार हादसे के बाद अभियान चलाया जाता है, कुछ दिन कार्रवाई होती है, और फिर सब कुछ सामान्य। अब तो यही तस्वीर सरकारी आयोजनों में भी दिखाई दे रही है।
मंगलवार को बलौदाबाजार में आयोजित सांसद खेल महोत्सव के समापन कार्यक्रम में बच्चों को ले जाने और वापस लाने के लिए खुली मालवाहक पिकअप गाडिय़ों को लगा दिया गया। एक-एक गाड़ी में 30 से ज्यादा बच्चे सामान की तरह ठूंस-ठूंसकर भरे गए। कार्यक्रम समाप्त होने तक अंधेरा गहरा गया। बच्चों को उसी खुली पिकअप में ठिठुरते हुए घर भेज दिया गया। कई बच्चे ठंड से कांपते दिखाई दे रहे हैं। सरकारी और निजी स्कूलों पर ऐसे आयोजनों की भीड़ बढ़ाने का दबाव रहता है। व्यवस्था की जिम्मेदारी टीचर्स पर सौंप दी जाती है। उनकी स्थिति लाचारी ऐसी तस्वीरों से देखी जा सकती है। ऐसे आयोजनों की भव्यता दिखाने के लिए लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा के लिए हिस्सा इसमें से नहीं निकाला जाता।
किस दबाव में थे महाधिवक्ता?
महाधिवक्ता के पद से सीनियर एडवोकेट प्रफुल्ल एन. भारत के अचानक इस्तीफे ने कई लोगों को चौंकाया जरूर होगा, लेकिन हाईकोर्ट परिसर में इस बात की चर्चा बीते कई दिनों से हो रही थी सरकार के कुछ प्रभावशाली आईएएस अफसरों के साथ उनका टकराव चल रहा है। सोमवार को दिनभर उन्होंने दफ्तर में काम किया और कई मामलों में सरकार की तरफ से पैरवी भी की। रात करीब 8 बजे अचानक इस्तीफा सामने आ गया। मीडिया ने जब उनसे इस्तीफे का कारण पूछा तो उन्होंने यही कहा कि मैंने अपने इस्तीफे में कारण को नहीं दर्शाया है। यानि उन्होंने दूसरी व्यस्तताओं के कारण पद छोड़ा, स्वास्थ्य के कारण छोड़ा, निजी कारणों से छोड़ दिया- इस तरह के बहाने न बनाकर- वजह को छिपा दिया, जिससे कारणों पर अटकलें और तेज हो गईं। चर्चा तो यह भी है कि इस्तीफे का प्रारूप तैयार कर उनके सामने रखा गया, जिस पर उन्हें केवल हस्ताक्षर ही करना था। आज हाईकोर्ट परिसर में उनका इस्तीफा ही चर्चा का विषय रहा। वे हाईकोर्ट पहुंचे तो साथी अधिवक्ताओं ने उन्हें घेरा और कारण पूछा। उन्होंने एक ही बात कही- जमा नहीं। किससे नेताओं से या अफसरों से इस पर खामोश रहे।
चर्चा यह भी रही कि सरकार के कुछ अफसर मनमाना जवाब दाखिल करना चाहते थे जो वास्तव में कानूनसम्मत नहीं होते थे। कई मामलों का जवाब दाखिल करने में अनावश्यक देरी होती थी, जिसे लेकर बेंच की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही थी। कई मुद्दों पर सरकार का बचाव करने के लिए अचानक नियम बदल दिया जाता था और सुनवाई की तारीख के ठीक पहले महाधिवक्ता कार्यालय की जानकारी में लाया जाता था।
भ्रष्टाचार के जिन चर्चित मामलों में एजेंसियों का पक्ष रखा जा रहा है, उनमें महाधिवक्ता कार्यालय की सलाह के बगैर ही पैरवी की जा रही है। इनमें से कुछ को अनाप-शनाप फीस भी दी जा रही है- खासकर, जिन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस होनी है। महाधिवक्ता कार्यालय में कुछ अन्य पोस्ट होल्डर्स की ताकत एजी से कहीं अधिक हो गई है। कुछ विवाद बड़े औद्योगिक-कार्पोरेट घरानों के मुकदमों से भी जुड़े हैं, जिन पर भी मंत्रालय के ताकतवर अफसरों के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था। कुल मिलाकर- हाईकोर्ट परिसर में जितने समूहों में आप खड़े हो जाएं- एक नई अटकल- एक नया दावा सामने आ रहा है। यह सब इसलिये हो रहा है कि इस्तीफे में कोई कारण नहीं दर्शाया गया। निजी कारणों से- जैसी कुछ प्रचलित पंक्ति लिख दी गई होती तो शायद गुबार कम उठता।
फ्यूज बल्ब और इतिहास
बिहार चुनाव के नतीजे क्या आए, छत्तीसगढ़ में अरसे बाद फ्यूज बल्ब की याद ताजा हो गई। फ्यूज बल्ब शब्द का उपयोग पहली बार तत्कालीन सांसद रमेश बैस ने 2014 के संसदीय चुनाव में किया था। बैस ने यह शब्द, कांग्रेस की ओर से घोषित अपनी प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी छाया वर्मा के लिए कहा था। इसका इतना असर हुआ कि कांग्रेस ने अगले दो तीन दिन में प्रत्याशी बदलकर सत्यनारायण शर्मा को बी फार्म दिया। फिर भी कांग्रेस हार टाल नहीं पाई, और बैस ने सत्यनारायण शर्मा को करीब पौने 2 लाख वोटों के अंतर से हराया था। बहरहाल राजनीतिक बयानों में अब फिर फ्यूज बल्ब सुना गया।
इस बार सीएम विष्णु देव साय ने तीन दिन पहले ही केवल एक प्रत्याशी के लिए नहीं पूरी कांग्रेस के लिए इस्तेमाल किया है। बिहार में करारी हार का सामना करने के लिए कांग्रेस और समूचे विपक्ष की तुलना फ्यूज बल्ब से की है। दरअसल, सीएम ने विपक्ष द्वारा हार के लिए एफआईआर, केंचुआ और ईवीएम पर विपक्षी लांछन पर पलटवार किया था। फिर क्या था भाजपा के साथ कांग्रेस में भी नेता-कार्यकर्ता फ्यूज बल्ब का इतिहास याद करने लगे।
ये शिक्षक बनेंगे, बच्चों के आंख, कान, नाक?
बलरामपुर जिले के मचांदांड कोगवार प्राथमिक स्कूल में सहायक शिक्षक प्रवीण टोप्पो बच्चों को गलत अंग्रेजी स्पेलिंग पढ़ाते हुए पकड़े गए। वीडियो में उन्हें नाक के लिए एनओजीई, कान के लिए ईएआरई और आंख के लिए आईईवाई लिखते और पढ़ाते हुए देखा गया। इतना ही नहीं, वह सप्ताह के दिनों और परिवार से जुड़े साधारण शब्दों की सही वर्तनी भी नहीं बता सका।
वीडियो वायरल होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने शिक्षक को निलंबित कर दिया है। स्कूल में कुल 42 बच्चे पढ़ते हैं और दो शिक्षक हैं। अब एक के निलंबन के बाद बच्चों की पढ़ाई और भी प्रभावित होने की आशंका है। छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के कई हिस्सों में ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं। शिक्षक या तो गलत पढ़ा रहे थे या उन्हें खुद मूलभूत भाषा ज्ञान की कमी थी। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में भी इसी तरह की गलतियों के लिए शिक्षकों पर कार्रवाई हुई है। यह घटनाएं बताती हैं कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और निगरानी की कमी का है।
छत्तीसगढ़ में शराब पीकर स्कूल पहुंचने वाले शिक्षकों पर भी कार्रवाई होती है और गलत पढ़ाने वाले पर भी, क्योंकि दोनों ही बच्चों के भविष्य के लिए समान रूप से खतरा हैं। दोनों ही तरह के शिक्षक बच्चों को ही नहीं समाज को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। मगर, निलंबन एक ऐसा इलाज है जो मर्ज तो खत्म नहीं करता- लोगों का गुस्सा तात्कालिक रूप से कम कर देता है। कठोर कार्रवाई, सख्त मॉनिटरिंग, नियमित मूल्यांकन और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी तो व्यवस्था के कंधे पर है।
प्रवचन की मेहरबानी

राजधानी रायपुर के सबसे पुराने गुढिय़ारी बाजार इलाके के रहवासी, और कारोबारी परेशान हैं। दरअसल, पीडब्ल्यूडी ने गुढिय़ारी पहाड़ी चौक से रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म सात तक सडक़ 70 फीट चौड़ी करने की योजना बनाई है। ताकि इस भीड़ भाड वाले इलाके में रोजमर्रा की ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात मिल सके। परेशानी चौड़ीकरण से नहीं बल्कि जिस तरीके से नगर निगम ने नोटिस थमाई है, उससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है।
नगर निगम ने करीब एक किमी सडक़ चौड़ीकरण के लिए 27 मकान-दुकानों को हटाने के लिए नोटिस जारी किया है। चौड़ीकरण के लिए स्थानीय लोग तैयार भी हैं, और अपना हिस्सा देने के लिए तैयार थे। मगर पीडब्ल्यूडी ने चौड़ीकरण के लिए सिर्फ एक ही हिस्से को चिन्हित किया है। नियमत: चौड़ीकरण दोनों तरफ होता है। दूसरे हिस्से को छोडऩे के पीछे वजह यह बताई जा रही है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के मकान-दुकान दायरे में आ रहे थे। इनमें से एक जमीन कारोबारी का भी मकान है, जो कि अपने धार्मिक आयोजनों के लिए काफी चर्चा में रहा है।
नोटिस मिलने के बाद प्रभावितों ने निगम अफसरों से पूछताछ की, तो उन्हें बता दिया गया कि प्रस्ताव पीडब्ल्यूडी का है, और जिन मकानों को हटाने का प्रस्ताव है उसकी सूची भी पीडब्ल्यूडी ने भेजी है। चौड़ीकरण प्रस्ताव से प्रभावित लोगों ने बकायदा एक मोर्चा बना दिया है, और नगर निगम के साथ-साथ पीडब्ल्यूडी अफसरों पर कानूनी कार्रवाई के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं। बहरहाल, आने वाले दिनों में मामला राजनीतिक रंग भी ले सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
सरगुजा की रेललाइनें
चर्चा है कि सरगुजा की दो रेल परियोजना पर जनप्रतिनिधि बंट गए हैं। अंबिकापुर से रेणुकूट (उत्तर प्रदेश), और अंबिकापुर से बरवाडीह (झारखंड)रेल परियोजना दशकों से अटकी पड़ी है। कई बार सर्वे हो चुका है। उक्त रेल परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सडक़ से लेकर संसद तक आवाज उठ चुकी है। मगर दोनों ही परियोजना कागजों पर ही है। इन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि एकमत नहीं हैं।
अंबिकापुर-रेणुकूट रेल लाइन बिछाने के लिए आंदोलन हुआ था। इस परियोजना के पूरा होने से अंबिकापुर से बनारस, और दिल्ली तक का सफर आसान हो जाएगा। गैरआदिवासी जनप्रतिनिधि रेणुकूट रेल परियोजना के लिए दबाव बनाए हुए हैं, तो आदिवासी जनप्रतिनिधि अंबिकापुर को बरवाडीह से जोडऩे के पक्षधर हैं। सीएम विष्णुदेव साय ने आदिवासी जनप्रतिनिधियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर रेलवे मंत्रालय को चि_ी भी लिखी थी, और केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से चर्चा भी कर चुके हैं, लेकिन यह परियोजना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। इस वजह से रेलवे बोर्ड उक्त परियोजना को लेकर अनिच्छुक है।
बताते हैं कि आदिवासी जनप्रतिनिधियों का सोचना है कि रेणुकूट रेल लाइन से उत्तर प्रदेश से गैर आदिवासी लोगों की आवाजाही बढ़ेगी। जबकि यहां के आदिवासियों की रिश्तेदारी झारखंड में ज्यादा है। ऐसे में अब परियोजना को व्यवहारिक बनाने के लिए बलरामपुर-रामानुजगंज को जोड़ते हुए अंबिकापुर-गढ़वा रोड (झारखंड) का प्रस्ताव दिया गया है। इस परियोजना से कोयले का परिवहन बिहार तक आसानी से हो सकेगा। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज इस परियोजना पर विशेष रुचि दिखा रहे हैं। सबकुछ ठीक रहा, तो सरगुजा के आदिवासी जनप्रतिनिधियों की मांग पूरी हो सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
संजय नाम में गड़बड़ी
संजय (संस्कृत में इसका अर्थ है ‘जीत’) या संजय गावलगण प्राचीन भारतीय हिंदू युद्ध महाकाव्य महाभारत के सलाहकार थे। महाभारत में - पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध की एक प्राचीन कहानी - नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र कौरव पक्ष के प्रमुखों के पिता थे। सारथी गावलगण के पुत्र संजय, धृतराष्ट्र के सलाहकार और उनके सारथी भी थे। संजय ऋ षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के शिष्य थे और अपने गुरु राजा धृतराष्ट्र के प्रति अत्यधिक समर्पित थे। संजय - जिसके पास घटनाओं को दूर या दिव्य दृष्टि से देखने का उपहार था, धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के चरम युद्ध में कार्रवाई बताता रहा। ये तो हुई महाभारत की बात।
अब आधुनिक राजनीति में भी संजयों ने महाभारत मचा रखा है। सबसे पहले संजय गांधी ने कांग्रेस और गांधी परिवार में। फिर आप पार्टी के संजय सिंह ने और अब आरजेडी के संजय यादव ने। दिल्ली में आप पार्टी की सरकार में हुआ शराब घोटाला संजय सिंह के इर्द-गिर्द घूमती है। जो दो बार की सरकार के पतन का कारण बना। और बिहार के संजय यादव ने तो लालू यादव परिवार में ही खलबली मचा दी है। यहां भी एक ‘संजय’ ने दिल्ली तक हलचल मचा दी है। यहां के ‘संजय’ का नाम निजी मेडिकल कॉलेज की मान्यता घोटाले में प्रमुखता से उछला है। मामले की सीबीआई जांच चल रही है। ये अलग बात है कि इस ‘संजय’ का अभी तक बाल बांका तक नहीं हुआ। इस क्रोनोलाजी को देख कर यही कहा जा सकता है कि ‘संजय’ टारगेटेड काम ही करते हैं।
गृह मंत्री को खुली चुनौती का मतलब?

छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के अध्यक्ष अमित बघेल के बाद अब करणी सेना चर्चा में आ गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व बीएसएफ जवान डॉ. राज शेखावत ने विवादों से घिरे एक मामले को उठाया है, जो इस चर्चा की वजह है। अनेक संगीन मामलों में रायपुर पुलिस ने जिस वीरेंद्र सिंह तोमर को गिरफ्तार किया, उसे इस संगठन का उपाध्यक्ष बताया जाता है। शेखावत ने फेसबुक लाइव के जरिये इस गिरफ्तारी को लेकर तूफान खड़ा कर दिया। इसे उन्होंने राजपूत सम्मान के साथ जोड़ दिया है। आरोप लगाया कि तोमर के साथ आतंकवादी जैसा बर्ताव किया गया। एसएसपी और टीआई के घर में घुसकर प्रदर्शन करने की बात कही। पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने, धमकी देने, अश्लील शब्दों का इस्तेमाल करने जैसी धाराओं में शेखावत के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया। मगर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। शेखावत ने एक्स पर गृह मंत्री का मोबाइल नंबर जारी कर दिया है। ‘करणी सैनिकों’ को आदेश दिया है कि वे फोन लगाकर मंत्री से पूछें कि मां करणी के सपूतों को गिरोह कैसे कह दिया? कुछ आपत्तिजनक शब्दों का फिर इस्तेमाल करते हुए कहा है कि वोट के जरिये करारा जवाब दिया जाएगा।
करणी सेना का गठन 19 साल पहले राजस्थान के जयपुर में हुआ था। संगठन मुख्य रूप से राजपूत युवाओं का है, जो समुदाय के सम्मान, इतिहास और अधिकारों की रक्षा का दावा करता है। पहली बार यह चर्चा में तब आया था जब संगठन ने ठीक लोकसभा चुनावों के पहले पद्मावत फिल्म के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन किया था। आरोप लगाया गया था कि राजपूतों की छवि को इस फिल्म में विकृत कर दिया गया है। फिल्म लोकसभा चुनाव निपटने के बाद ही रिलीज हो पाई। ऐसे ही राजपूत सम्मान से जुड़े कई मामलों पर राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश में यह संगठन आंदोलन कर चुका है। छत्तीसगढ़ में राजपूतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, पर अपना वोट बैंक तो उनका है ही। तोमर, जिस पर दर्जनों अपराध दर्ज हैं, उसे समुदाय का योद्धा बताकर पुलिस के लिए चुनौती खड़ी करने का मतलब यह है कि छत्तीसगढ़ में संगठन के विस्तार की रणनीति पर काम हो रहा है। भले ही यहां सरकार भाजपा की क्यों न हो। करणी सेना संगठन दावा करता है कि उसका किसी राजनीतिक दल से कोई नाता नहीं, पर कांग्रेस ने कई बार आरोप लगाया है कि इस संगठन के माध्यम से भाजपा अपने राजनीतिक एजेंडे को साधती रही है। पुलिस अफसरों के बाद सीधे गृह मंत्री को चुनौती देने वाले इस संगठन के मुखिया पर फिलहाल तो एफआईआर ही दर्ज हुई है। सरकार इस नए तनाव से किस तरह निपटेगी- यह देखना होगा।


