राजपथ - जनपथ
मोदी-शाह का हाल
नवा रायपुर स्थित आईआईएम संस्थान में डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस चल रही है। कॉन्फ्रेंस में पीएम नरेंद्र मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ एनएसए अजीत डोभाल, और केन्द्रीय एजेंसियों के शीर्ष अफसर हैं। मोदी, और शाह यहां हैं, तो स्वाभाविक है कि सरकार-पार्टी के सारे नेता राजधानी में ही डटे हैं। शाह से तो पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं ने आगमन के दौरान मुलाकात कर ली थी, लेकिन मोदी से सीएम को छोड़ किसी भी नेता की मुलाकात नहीं हो पाई।
शाह ने कॉन्फ्रेंस में जाने से पहले 28 तारीख को सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा के साथ बैठक की थी। इसमें नक्सल समर्पण-पुनर्वास पर चर्चा हुई थी। मोदी 28 तारीख की रात रायपुर पहुंचे थे, और सीधे नवा रायपुर के लिए रवाना हो गए। वो नवा रायपुर के स्पीकर हाऊस में ठहरे हुए हैं। कॉन्फ्रेंस सुबह 9 बजे शुरू हो जाती है। केंद्रीय गृहमंत्री शाह पौने 9 बजे कॉन्फ्रेंस स्थल में चेयर संभालते, और इसके बाद ठीक 9 बजे पीएम भी। पीएम ने दोनों ही दिन पूरे समय कॉन्फ्रेंस में रहकर गृहमंत्री के साथ प्रेजेंटेशन देखे।
खास बात ये है कि नक्सलवाद पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अफसरों ने प्रेजेंटेशन दिया है। इस दौरान छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, और आंध्र के डीजीपी अपने राज्य की जानकारी बीच-बीच में देते रहे। इस दौरान छत्तीसगढ़ के एसीएस(गृह) मनोज पिंगुआ को भी आमंत्रित किया गया था। बताते हैं कि कॉन्फ्रेंस के एक दिन पहले आईटीबीपी के डीजी प्रवीण कुमार मानपुर-मोहला जिले के मदनवाड़ा में थे, और उन्होंने वहां मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में नक्सल अभियान की समीक्षा की थी।
कॉन्फ्रेंस के चलते नक्सलियों पर काफी दबाव बना है। पिछले दो दिनों में बस्तर से लेकर महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश के 50 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। यह सिलसिला जारी है। नक्सलियों के महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्पेशल जोनल कमेटी ने संघर्ष विराम का ऐलान करते हुए एक जनवरी को पूरी तरह हथियार डालने का वादा भी किया है। कुल मिलाकर कॉन्फ्रेंस के बाद बस्तर में पूरी तरह शांति की उम्मीद जताई जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
हाजिरी पंच करते ही चाय पीने?
अब सरकारी दफ्तरों में लेटलतीफी पुरानी बात होने जा रही है। कारण सरकारी मुलाजिमों का ठीक 10 बजे ऑनलाइन बायोमेट्रिक अटेंडेंस की अनिवार्यता। राज्य मंत्रालय में यह जनवरी से ही लागू हो चुका है और कल से इसमें और एक्यूरेसी आने वाली है। जब 65 स्टाफ बसें 9.50 तक महानदी भवन के गेट में खड़ी होंगी। अगले दस मिनट में भवन के पांच गेट में लगी दर्जनों मशीनों में स्टाफ अटेंडेंस पंच करेगा। यह आधार कार्ड आधारित होगा। अगले दस मिनट में पता चल जाएगा कि कितने अफसर कर्मचारी ऑन ड्यूटी हैं। इसके बाद 1 जनवरी से यही व्यवस्था संचालनालय इंद्रावती भवन में भी लागू कर दी जाएगी।
राज्य के दोनों प्रशासनिक मुख्यालय इन टाइम काम करेंगे तो निचले क्रम के दफ्तरों से सरकारी कामकाज गांव तक पहुंचेगा। राजधानी समेत कुछ जिलों में भी 10 बजे अटेंडेंस की व्यवस्था लागू है। अब यह अलग बात है कि अटेंडेंस की पंचिंग के बाद घंटे आधे घंटे के लिए चाय पान ठेले में चले जाते हैं। अब यह भी नहीं चलेगा क्योंकि जितनी बार बाहर निकलेंगे इन आउट की पंचिंग करनी होगी।
दरअसल केंद्र सरकार की आन टाइम गवर्नेंस की योजना के तहत यह कदम उठाए जा रहे हैं। कम से कम भाजपा शासित प्रदेशों के लिए तो इसी लक्ष्य के साथ काम किया जा रहा है। दिल्ली के साउथ और नॉर्थ ब्लॉक के दफ्तरों में दस बजते ही ई ऑफिस सॉफ्टवेयर में फाइल मूवमेंट शुरू हो जाता है।
विपक्ष को अधिकार परिवारवाद कहने का

इसे परिवारवाद नहीं पिता के पदचिन्हों पर चलना कहेंगे। टिकिट मिलने पर केवल विपक्ष को अधिकार होगा कि परिवारवाद कहे। खबर यह है कि असम से पूर्व सांसद और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका की पुत्री आयुष्मिता डेका ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। अमेरिका में उच्च शिक्षा के बाद कुछ समय तक नौकरी करने के बाद वह असम लौट आईं। यह संयोग रहा कि कुछ माह पहले रमेन डेका भी अमेरिका गए थे। इस दौरे का बेटी के फैसले से कोई संबंध नहीं है। आयुष्मिता ने प्रदेश अध्यक्ष के हाथों सदस्यता पत्र लेने के बाद कहा कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से लौटीं हूं देश सेवा के लिए। इसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री ने ही हाल की एक मुलाकात में कहा था।
आयुष्मिता का यह भी कहना था कि उनका परिवार लंबे समय से संघ और विचारधारा से जुड़ा है। उनके बचपन से ही प्रमोद महाजन, राजनाथ सिंह वरिष्ठ नेताओं का घर पर आना जाना था। जिसने उन्हें राजनीतिक और सामाजिक जीवन के संस्कार दिए। वैसे बता दें कि राजधानी में एक और पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल भी हैं रमेश बैस। तन मन धन से उनका पूरा परिवार संघ भाजपा समर्थित है लेकिन बेटे की सदस्यता कभी सार्वजनिक नहीं हुई वे रीयल एस्टेट कारोबारी के रूप में जाने जाने जाते हैं।
आंदोलन के अति उत्साह में
किसी भी विपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह जनता से जुड़े मुद्दों पर सडक़ पर उतरे। कांग्रेस भी चुनाव हारने के बाद अब फिर उसी भूमिका में दिखाई दे रही है। बिलासपुर जिला मुख्यालय में जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई। यह प्रेस वार्ता उसी स्थान पर रखी गई, जहां सरकारी धन की बर्बादी का आरोप लगाया गया था।
यह वह सडक़ है जो कुछ दूर जाकर खाली जमीन पर समाप्त हो जाती है। दावा किया गया कि इस सडक़ पर 50 से 60 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, जबकि आगे न कोई बस्ती है, न मोहल्ला, न गांव। इशारा यह किया गया कि संभवत: आगे किसी बिल्डर का प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जिसके लिए स्मार्ट सिटी या पीडब्ल्यूडी के फंड का लाभ पहुंचाया जा रहा है।
प्रेस वार्ता के अगले दिन कांग्रेस ने शहर की उन सडक़ों पर प्रदर्शन किया, जिनकी हालत बेहद खराब है और जहां मरम्मत की सख्त जरूरत है। आरोप लगाया गया कि एक तरफ करोड़ों रुपये ऐसी सडक़ पर उड़ाए जा रहे हैं जिसकी जरूरत ही नहीं, जबकि दूसरी तरफ आवश्यक मरम्मत कार्यों के लिए कोई फंड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा।
प्रेस वार्ता और प्रदर्शन के बाद भाजपा नेताओं ने उस कथित वीरान सडक़ के बारे में जानकारी इक_ा करना शुरू किया। जब तथ्य सामने आए, तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई।
दरअसल, कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अरपा नदी के सामने पौधारोपण अभियान चलाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इसका उद्घाटन भी किया था। संदेश दिया गया था कि किसान धान की खेती पर निर्भर रहने के बजाय उद्यानिकी की ओर बढ़ें, जहां कम लागत में अधिक लाभ संभव है।
मगर यह योजना अन्य कई योजनाओं की तरह असफल हो गई। उद्यान अब अस्तित्व में नहीं है, पौधे सूख चुके हैं। लेकिन सडक़ अब भी बनी हुई है। और वही सडक़ कांग्रेस द्वारा अनावश्यक खर्च के रूप में बताई जा रही थी। यह सडक़ कांग्रेस सरकार के समय ही मंजूर की गई थी, हालांकि अब काम रोक दिया गया है।
डगमगाते सवार...

बिलासपुर के लालखदान ओवरब्रिज का यह दृश्य है। अपने राज्य की हकीकत का एक आइना। एक युवक नशे में धुत है, इतना कि वह खुद को संभाल नहीं पा रहा है। उसका साथी उसे गमछे से मोटरसाइकिल से बांधकर ले जा रहा है।
अफसरों की ट्रेनिंग
दो आईपीएस त्रिलोक बंसल और विवेक शुक्ला माहभर की ट्रेनिंग पर जाएंगे। सोमवार को दोनों को हैदराबाद स्थित नेशनल पुलिस एकेडमी में रिपोर्ट करना है। दोनों फेस-3 की ट्रेनिंग में शामिल होंगे। बंसल वर्तमान में एसटीएफ के एसपी हैं।
इससे परे आईपीएस चिराग जैन और संदीप पटेल वर्तमान में हैदराबाद एकेडमी में फाउंडेशन कोर्स कर रहे हैं। उधर बलरामपुर एसपी वैभव बैंकर भी महीनेभर के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं। उनकी जगह आईपीएस मनोज खिलाड़ी को बलरामपुर का प्रभार सौंपा गया है।
आईपीएस अवार्ड होने के बाद यह पहला मौका है, जब खिलाड़ी को किसी जिले का प्रभार सौंपा गया है। अगले महीने एक-दो और अफसर ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद जाएंगे।
दो नाराज एक साथ!
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल शुक्रवार को कोरबा में थे, और वो कई कार्यक्रमों में शरीक हुए। इन सबके बीच वो नाराज चल रहे पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर से भी मिलने गए। दोनों के बीच करीब आधे घंटे चर्चा हुई।
कंवर ने कोरबा कलेक्टर को हटाने की मुहिम छेड़ रखी है। उन्होंने अपनी ही सरकार को कटघरे पर खड़ा कर दिया था। पूर्व मंत्री के तेवर देखकर सरकार को कोरबा कलेक्टर के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए समिति बनानी भी पड़ी। चर्चा है कि पार्टी संगठन के प्रमुख नेता, कंवर के तेवर से नाखुश चल रहे हैं। सीएम और दोनों डिप्टी सीएम, कोरबा आते-जाते रहे हैं, लेकिन उनकी कंवर से मुलाकात नहीं हुई। इन सबके बीच सांसद बृजमोहन अग्रवाल कंवर के घर गए, तो इसकी पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है।
मंत्रियों के सहायकों की बारी
सरकार के मंत्री स्थापना के अफसर-कर्मियों को बदलने का सिलसिला जारी है। ताजा घटनाक्रम में राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के विशेष सहायक दुर्गेश वर्मा को भारमुक्त कर दिया गया है। वो राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर हैं, और उनकी सेवाएं सामान्य प्रशासन विभाग को लौटा दी गई है। ये सब यूं ही नहीं हो रहा है। मंत्रियों के निजी स्थापना के अफसर-कर्मियों के खिलाफ शिकायतें आती रही हैं, और कुछ जगह शिकायत पुष्ट पाए जाने पर अफसर-कर्मियों को हटाया गया है।
साय सरकार दो साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही है। मंत्रियों के शपथ लेने के बाद निजी स्थापना में जगह पाने के लिए अफसर-कर्मियों में होड़ मची रही। संघ परिवार से भी सिफारिशें आई थीं। हाल यह है कि डिप्टी सीएम विजय शर्मा, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी को छोड़ दें, तो बाकी सारे मंत्रियों की निजी स्थापना के अफसर-कर्मियों को बदला जा चुका है। कुछ मंत्रियों को तो अपनी स्थापना के अफसर-कर्मियों का काम पसंद नहीं आया। कुछ अफसर-कर्मी जरूरत से ज्यादा तेज निकले। इन सभी को एक-एक कर हटाया गया।
और तो और तीन माह पहले शपथ लेने वाले तीनों मंत्रियों की निजी स्थापना के अफसर-कर्मी भी बदले जा चुके हैं। दरअसल, मंत्री स्थापना पर संगठन, और सरकार की पैनी नजर है। गंभीर शिकायत मिलने पर तुरंत मंत्री जी को इत्तला कर दी जा रही है। कुछ ऐसे भी हैं जिनके खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं, लेकिन मंत्री जी के पसंदीदा होने की वजह से उन्हें बदला नहीं जा रहा है। लेकिन दो साल में ही जिस तरह मंत्री स्थापना के अफसर-कर्मी बदले गए हैं, वैसी नौबत पहले कभी नहीं आई।
आईआरएस अफसर और छत्तीसगढ़ की सेवा
कुछ दिनों पहले हमने इसी कालम में बताया था कि 2014-24 तक 853 आईआरएस अफसरों ने वीआरएस लेकर नौकरी छोड़ी है या कोई और सर्विस ज्वाइन किया है। इसके पीछे मुख्य कारण इस नौकरी का पहले की तरह अब हाईप्रोफाइल न रह जाना, और उच्च स्तरीय दबाव। छत्तीसगढ़ में दो अफसरों ने वीआरएस तो नहीं लिया लेकिन यह राष्ट्रीय महकमा छोड़ राज्य सेवा को ज्वाइन किया है। दोनों ही महिला अफसर हैं। एक ने पांच वर्ष पहले आयकर से डेपुटेशन लेकर छत्तीसगढ़ वित्त विभाग ज्वाइन किया था और अब वह राज्य कैडर में ही समायोजन (एब्जार्ब) के करीब हैं। संयुक्त कमिश्नर स्तर की दूसरी अफसर ने इसी सप्ताह ज्वाइनिंग दी है। उनको अभी विभागीय नियुक्ति नहीं दी गई है। चूंकि वह भी रेवेन्यू सर्विस की हैं इसलिए समझा जा रहा है कि उन्हें वित्त विभाग में ही संचालक स्तर का पद दिया जा सकता है। 05 बैच की अफसर भी यदि 5 वर्ष पूरा कर लेती हैं तो वह भी समायोजन के दायरे में आ जाएंगी। इनके पति यहां आईएएस और संचालक स्तर के अफसर हैं। वैसे इनसे पहले दो और आईआरएस अफसर अमन सिंह, अजय पांडेय छत्तीसगढ़ शासन में काम कर चुके हैं। इनमें से एक ने डेपुटेशन के बाद नौकरी से इस्तीफा दिया था और अभी एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हैं। दूसरे ने आयकर छोड़ सेंट्रल जीएसटी की ओर रुख कर लिया।
विकास के लडख़ड़ा जाने की रिपोर्ट
भारत के महालेखाकार की एक रिपोर्ट जारी हुई है। इसके अनुसार जो राज्य बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ा रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ कतार में बहुत पीछे दिख रहा है। अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच पूंजीगत व्यय पर पूरे देश के 19 राज्यों का औसत खर्च 33.5 प्रतिशत था, जबकि छत्तीसगढ़ सिर्फ 13.5 प्रतिशत पर सिमट गया। यानी राज्य में सडक़, पुल, स्कूल, अस्पताल और उद्योग जैसे विकास कार्यों पर बहुत कम खर्च किया जा रहा है। सौ रुपये में सिर्फ साढ़े तेरह रुपये।
पूंजीगत व्यय किसी राज्य की अर्थव्यवस्था की असली रफ्तार मानी जाती है। हरियाणा जैसे राज्य बजट का 85 प्रतिशत तक खर्च कर रहे हैं। तेलंगाना 80 प्रतिशत खर्च के साथ निवेश आकर्षित कर रहा है। केरल और मध्य प्रदेश भी 70 प्रतिशत से ऊपर चल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अधिक खर्च करने वाले राज्य स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में भी सुधार कर रहे हैं। जहां दूसरे राज्य गति पकड़ रहे हैं, वहीं कैग की रिपोर्ट बता रही है कि हमारा राज्य पिछड़ता जा रहा है।
अर्थशास्त्री बेहतर तरीके से बता सकते हैं कि छत्तीसगढ़ पूंजीगत खर्च करने में इतना पीछे क्यों है, पर आम तौर पर फाइलें महीनों तक दफ्तरों में घूमती रहती हैं। बिलासपुर में सेंट्रल जेल के निर्माण का टेंडर 9वीं बार जारी किया जा चुका है। सालों से अटका है और ऐसे मामले पूरे प्रदेश में अनेक मिल जाएंगे। हाईकोर्ट को हाल ही में सडक़ों की हालत पर सुनवाई के दौरान जब बताया गया कि एनआईटी में प्रोजेक्ट का परीक्षण हो रहा है, तो कोर्ट ने कहा- एक दो साल में तो ही जाएगा न! यही हाल नक्सल प्रभावित इलाकों में टेंडर प्रक्रिया और पूर्णता का है। इधर वेतन, पेंशन और सब्सिडी में ही राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा, करीब 78 प्रतिशत जा रहा है। केंद्र की सभी योजनाओं, चाहे सतत शिक्षा अभियान हो, पीएम सूर्य घर हो, जल जीवन मिशन हो या आवास योजना- राज्य को अपना हिस्सा देना पड़ता है। पिछली सरकार ने पीएम आवास योजना से हाथ ही खींच लिया था। कई ऐसी योजनाओं में राज्य, केंद्र के अनुकूल हिस्सेदारी नहीं दे पाता तो उसे लक्ष्य भी हासिल नहीं होता।
इसलिये छत्तीसगढ़ जैसे खनिज, जल, वन संसाधन-संपन्न राज्य यदि ग्रामीण सडक़ें जर्जर पड़ी हैं, स्कूल में अतिरिक्त कमरे नहीं बन रहे हैं, स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतें अधूरी हैं, स्टाफ की कमी है, उद्योगों के लिए ढांचा मजबूत नहीं हो रहा है तो इसका कारण समझने के लिए कैग की तरह रिपोर्ट को समय-समय पर पढ़ते रहना चाहिए।
तकनीक से ज्यादा जरूरी समझदारी
यूपी के हरदोई में गूगल मैप की गलती से तंग गलियों में एक कारण बार-बार रिवर्स करने, टर्न लेने के कारण फंस गई। इंजन गर्म हुआ और कार धू-धू कर जल जल उठी। सवार लोग बाल-बाल बचे। हम आजकल गूगल मैप पर ज्यादा ही भरोसा करने लगे हैं। आसपास की दुनिया, स्थानीय अनुभव और अपनी समझ को जैसे भूल जाते हैं।
यह भी भूल जाते हैं कि तकनीक मदद के लिए है, आप पर नियंत्रण करने के लिए नहीं। रास्ते के मामले में तो कई बार ऐसा धोखा पहले भी हुआ है। यूपी में ही गूगल मैप ने एक कार को अधूरे नए पुल पर चढ़ा दिया और अंधेरे में सब के सब कार सहित नीचे गिर गए। किसी की जान नहीं बच पाई थी। सडक़ पर खड़े किसी राहगीर से जानकारी ले लेना, किसी चाय दुकान पर पांच मिनट रुककर दो मीठी बात कर पता पूछ लेना अब भी कारगर है।
तनातनी घर के भीतर हावी
चर्चा है कि रायपुर शहर जिला भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जिलाध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर, और मेयर मीनल चौबे के बीच मतभेद दिख रहे हैं। हाल यह है कि संगठन के लोग मेयर के, और पार्षदगण संगठन के कार्यक्रमों से दूरी बना रहे हैं।
मेयर और जिलाध्यक्ष के बीच मतभेद का अंदाजा उस वक्त लगा जब पिछले दिनों प्रदेश भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल ने एसआईआर के मसले पर जिले के नेताओं की बैठक ली। इस बैठक में शहर जिला भाजपा के तमाम पदाधिकारी मौजूद थे, लेकिन रायपुर नगर निगम के 27 पार्षद गैरहाजिर रहे।
जम्वाल ने पार्षदों की गैरमौजूदगी को गंभीरता से लिया। इस पर मेयर को सफाई देनी पड़ी कि पार्षद क्यों नहीं आए, इसका पता लगाएंगी। बात खत्म हो गई। इसके बाद 26 नवंबर को संविधान दिवस जोर-शोर से मनाया गया। अंबेडकर चौक पर कार्यक्रम हुआ, इसमें मेयर और तमाम पार्षद मौजूद थे। लेकिन शहर जिला भाजपा के पदाधिकारी गैरहाजिर रहे। कहा जा रहा है कि नगर निगम के इस कार्यक्रम की सूचना जिले के पदाधिकारियों तक नहीं पहुंची। इस वजह से वो नहीं गए।
पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि शहर जिला भाजपा और मेयर के बीच समन्वय नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति बन रही है। कुछ लोग पार्टी के गुटीय राजनीति से जोडक़र देख रहे हैं। मेयर मीनल चौबे को पूर्व मंत्री राजेश मूणत की करीबी मानी जाती हैं, तो शहर जिला भाजपा अध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के कट्टर समर्थकों में गिने जाते हैं।
दोनों ही रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव में टिकट के दावेदार थे। ये अलग बात है कि दोनों की दावेदारी को नजरअंदाज कर सुनील सोनी को टिकट दे दी गई। सुनील सोनी, भारी वोटों से चुनाव जीत गए। मगर चुनाव के वक्त टिकट को लेकर खींचतान चल रही थी, वो अब भी जारी है। कुछ इसी तरह की तनातनी पिछले 5 बरस में कांग्रेस शासनकाल में भी देखने को मिली। तब मेयर एजाज ढेबर, और रायपुर पश्चिम विधायक विकास उपाध्याय के बीच बोलचाल तक बंद थी। कांग्रेस संगठन और मेयर-पदाधिकारियों के बीच दूरियां रही। इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा चुनाव में न सिर्फ खुद विकास उपाध्याय हारे, बल्कि चारों सीट पर करारी हार का सामना करना पड़ा। निकाय चुनाव में कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। मेयर एजाज ढेबर वार्ड का चुनाव नहीं जीत पाए।
कहावत का फोटोशूट
सरकार ने दो सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ कर दिया है लेकिन इसको बढ़ाकर चार सौ यूनिट तक करने की मांग हो रही है। भूपेश सरकार में चार सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ था। बाद में साय सरकार ने घटाकर सौ यूनिट कर दिया, और अब इसको बढ़ाकर दो सौ यूनिट कर दिया गया है। बावजूद इसके सरकार के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। मगर दुर्ग में कांग्रेस ने जिस अनोखे अंदाज में प्रदर्शन किया, उसकी गूंज प्रदेश भर में हो रही है।
दुर्ग ग्रामीण जिला कांग्रेस के अध्यक्ष राकेश सिंह ठाकुर ने दो सौ यूनिट तक बिजली बिल हाफ को ऊंट के मुंह में जीरा करार दिया, और विरोध दिखाने के लिए ऊंट ले आए। दरअसल, ठंड में राजस्थान से छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में बंजारा यहां आते हैं, और वो अपने साथ ऊंट लेकर आते हैं। जिलाध्यक्ष ने एक ऊंट मालिक को तैयार कर शहर के बीचोंबीच प्रदर्शन स्थल पर ऊंट को एक किलो जीरा खिलाया, इस दौरान ऊंट के साथ फोटो खिंचाने होड़ मच गई। एक किलो जीरा खिलाने में सात सौ रूपए खर्च हुए, और ऊंट मालिक को एक हजार रूपए दिए गए। मगर जिस तरह इस प्रदर्शन न सुर्खियां बटोरी है, इस पर प्रदेश भर में चर्चा हो रही है।
कांग्रेस के बड़े नेता इस जिला स्तर के प्रदर्शन में मौजूद तो नहीं थे, लेकिन फोन कर जिलाध्यक्ष की खूब तारीफ कर रहे हैं। यह अनोखा प्रदर्शन था जिसने सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है। मीडियाकर्मी प्रदर्शनकारी ऊंट के साथ फोटो खिंचाने के लिए जद्दोजहद करते देखे गए।
शिक्षक के चेहरे वाले शैतान
पता है, हाल ही में ये दो घटनाएं क्या हो गईं? किसी के सीने में सुई चुभी, धडक़नों का तारतम्य बिगड़ा? किसी मंत्री-विधायक ने स्कूलों में बच्चियों की दशा पर चिंता जताई? उनके राज्य में ऐसा हो रहा है तो आंखें नम नहीं, लाल होनी चाहिए। रतनपुर, नेवसा के सीता देवी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 9वीं कक्षा की छात्रा थी पूनम। यह एक प्राइवेट स्कूल है, जिसे एक सरकारी स्कूल का टीचर रमेश साहू चला रहा था, अपनी पत्नी अंजना के नाम पर। पूनम से एक छात्र छेड़छाड़ करता था, बहुत परेशान थी।
रमेश साहू से उसने शिकायत की। प्राइवेट स्कूल संचालक इस सरकारी शिक्षक ने हालात से टूट चुकी छात्रा को भरे स्कूल में बच्चों के मजमे में पहले डांटा फिर थप्पड़ मार दिया। थप्पड़ की जोर चाहे जितनी भी रही हो, पर पूनम की आंखों के सामने अंधेरा छा गया, आसमान काला नजर आने लगा। इसलिये कि गुरुतुल्य शिक्षक ने उसे हिम्मत देने, ढांढस बंधाने की जगह कुसूरवार मान लिया। अपमान का बोझ सह नहीं पाई। ग्लानि से भर गई होगी, कलेजा मुंह को आ गया होगा। पूनम रजक ने 23 सितंबर उसी थप्पड़ वाली घटना के दिन, घर पहुंचकर फांसी के फंदे पर झूल गई।
इधर, जशपुर के बगीचा थाना क्षेत्र के सरस्वती हायर सेकेंडरी स्कूल का मामला है। 23 नवंबर को 9वीं कक्षा की 15 साल की छात्रा हॉस्टल के स्टडी रूम में साड़ी को फंदा बना लिया और अपनी जान ले ली। सुसाइड नोट में उसने क्या लिखा है- एक-एक शब्द पढिय़े- प्रिंसिपल सर मुझे बैड टच करते थे, प्राइवेट पार्ट छूते थे। वे स्कूल की दूसरी बच्चियों को भी परेशान कर रहे हैं। उसने लिखा कि जिस दुनिया में लड़कियों की कोई इज्जत नहीं है, उस दुनिया में जी कर मैं क्या करूंगी?
इसी जशपुर में इसी महीने, नवंबर 2025 में एक चौकीदार को छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें करने की वजह से गिरफ्तार किया गया। रतनपुर, नेवसा के शिक्षक को अभी दो तीन पहले शिक्षा विभाग ने केवल निलंबित किया गया है। उसके खिलाफ खुदकुशी के लिए उकसाने का कोई अपराध दर्ज नहीं कराया गया है। सरकारी शिक्षक है, विभाग के अफसरों की कुछ सहानुभूति होगी, लेन-देन चलता होगा। इस वजह से क्योंकि सरकारी शिक्षक उनकी नाक के नीचे प्राइवेट स्कूल भी चला रहा है। जशपुर के मामले में प्राचार्य को अरेस्ट कर लिया गया है। उसकी कोई पहुंच नहीं रही होगी।
नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो- एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि बुलिंग और शिक्षकों के बुरे बर्ताव के कारण के कारण छात्र आत्महत्याओं की दर कोविड के बाद 20 प्रतिशत बढ़ी है। हालांकि इस रिपोर्ट में गर्ल्स और ब्वायज़ की अलग-अलग सारणी नहीं है। क्रूरता जेंडर नहीं देखती। महामारी बनने से पहले ऐसी घटनाओं को कैसे रोकें? आप भी सोचें।
सेवा विस्तार के आसार

छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा 30 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें एक साल का सेवा विस्तार मिलने की अटकलें लगाई जा रही है। स्पीकर डॉ. रमन सिंह प्रदेश से बाहर हैं, और उनके आज-कल में रायपुर वापसी के बाद दिनेश शर्मा के सेवा विस्तार पर फैसला होने की संभावना है।
राज्य बनने के बाद कुछ समय के लिए विधि सचिव टीपी शर्मा, जस्टिस मिन्हाजुद्दीन विधानसभा सचिव रहे। इसके बाद भगवान देव इसरानी विधानसभा के सचिव नियुक्त हुए। बाद में इसरानी मध्यप्रदेश के विधानसभा सचिव हो गए। यहां उनकी जगह रिक्त पद पर देवेन्द्र वर्मा की पोस्टिंग हुई। देवेन्द्र वर्मा को रिटायरमेंट के बाद दो बार एक-एक साल का सेवा विस्तार मिला। इसके बाद उनकी जगह चंद्रशेखर गंगराडे विधानसभा के प्रमुख सचिव हुए। गंगराडे को भी एक बार सेवा विस्तार मिला।
हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन का उद्घाटन हुआ है। शिफ्टिंग की प्रक्रिया चल रही है। विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 से 17 दिसंबर तक चलेगा। वैसे भी विधानसभा में सीनियर अफसरों की कमी है। दिनेश शर्मा के ठीक नीचे अतिरिक्त सचिव आरके अग्रवाल रिटायर हो चुके हैं। उन्हें छह माह का सेवा विस्तार मिला हुआ है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए दिनेश शर्मा को भी पूर्ववर्तियों की तरह एक साल का सेवा विस्तार मिल सकता है।
संजू, तुमको बहुत-बहुत बधाई...

ढाका में हुए महिला कबड्डी वल्र्डकप के रोमांचक फाइनल में कोरबा की संजू देवी ने जिस जोश, हिम्मत और बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया, वह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व की बात है। सिर्फ 13 रेड में 16 महत्वपूर्ण अंक जुटाकर टीम को शानदार जीत दिलाना संजू की मेहनत, अनुशासन और उनकी खास प्रतिभा है।
मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर का खिताब जीतकर संजू ने न सिर्फ देश का, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का सिर ऊंचा कर दिया। उन्होंने अपने मजबूत हौसले और खेल के प्रति समर्पण बताता है कि छत्तीसगढ़ की बेटियां हर मुश्किल का सामना कर सकती हैं और अपनी वेश्विक पहचान बना सकती हैं।
तारीख पे तारीखछत्तीसगढ़ लोक आयोग में अलग- अलग विभागों के भ्रष्टाचार प्रकरणों की जांच चल रही है। कई प्रकरणों सुनवाई इसलिए टल रही है कि संबंधित विभाग के अफसरों को नोटिस तामील होने के बाद भी आयोग के समक्ष हाजिर नहीं हो पा रहे हैं।
सबसे ज्यादा शिकायत स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग के अफसरों की है। स्कूलों की मान्यता से जुड़े प्रकरणों की शिकायतों पर आयोग ने स्कूल शिक्षा सचिव और अन्य अफसरों को नोटिस जारी किया गया था। आयोग ने स्कूल शिक्षा सचिव को उपस्थित होकर शिकायतों पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने कहा था। विभाग से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है। इसके बाद फिर स्मरण पत्र भेजकर 22 दिसंबर को उपस्थित होने के आदेश दिए हैं। यही हाल, बाकी विभागों का भी है। इसका प्रतिफल यह है कि सुनवाई की तारीख पे तारीख मिलती जा रही है।
छत्तीसगढ़ देख चुके, अब कर्नाटक देखिए..
मानो वही फिल्म फिर से लगी हो, बस किरदार बदल गए हों। पांच-छह साल पहले छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ था, आज कर्नाटक में ठीक वही चल रहा है। यहां मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला बना था। सिंहदेव का यह दावा था, बघेल ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। सिंहदेव ने मीडिया में खूब बयान दिए। तूल पकड़ा तो बघेल एक दिन अचानक 50-55 विधायकों को दिल्ली लेकर पहुंच गए, हाईकमान के सामने परेड करा दी और कुर्सी पक्की कर ली। सिंहदेव के पास या तो विधायक नहीं थे, या फिर उन्होंने परेड कराने में रुचि नहीं ली। मगर, सिंहदेव नाराज चल रहे थे तो आखिरी छह महीने में उप-मुख्यमंत्री बना दिया, संतुष्ट हो गए।
मगर, कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के दावेदार डीके शिवकुमार पहले से ही उप-मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री पद से नीचे की कोई जगह नहीं बनती। चुनाव जीतने के बाद डीके रेस में तो थे पर सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना गया तो उस वक्त चुपचाप हाईकमान का फैसला मान लिया। छत्तीसगढ़ में ही मचे घमासान को देखकर शायद शुरू से ही उप-मुख्यमंत्री पद दे दिया गया, मगर अब उनके खेमे के विधायक दिल्ली पहुंच गए हैं और खुलेआम कह रहे हैं, नेतृत्व बदला जाए। अब शिवकुमार खेमा वैसा ही दबाव हाईकमान पर डाल रहा है जैसा बघेल ने किया था। इधर सिद्धारमैया बेंगलूरु में अपने समर्थक विधायकों के साथ बैठकें कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के लोग तो जानते ही हैं कि ऐसे आपसी झगड़े का अंत क्या होता है। कांग्रेस हाईकमान को भी पता है। 2018-23 में ढाई-ढाई साल का विवाद चला, गुटबाजी के चलते जीत की संभावना वाले टिकट कटे, जिनके नहीं कटे उन्हें खुद कांग्रेसियों ने हरवा दिया। भाजपा का माहौल बहुत जबरदस्त भी नहीं था, फिर भी कांग्रेस 15 सीटों पर सिमट गई। उसकी ऐतिहासिक हार हुई और भाजपा को अब तक की सर्वाधिक सीटें।
कर्नाटक में भी आज वही माहौल बन रहा है। विधायक दिल्ली में डेरा डाले हैं, सोशल मीडिया पर खुली बगावत है, हाईकमान असमंजस में है। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से मीडिया ने जब बेंगलूरु में इस मसले पर सवाल किया तो उन्होंने कहा- हाईकमान तय करेगा। शायद, कांग्रेस में हाईकमान कोई सर्वशक्तिमान अदृश्य शक्ति होती है, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से ऊपर।
2028 के पहले कांग्रेस कर्नाटक में भी वही गलती दोहराएगी, कुर्सी की लड़ाई को वास्तविक रूप से नहीं रोक पाएगी तो नुकसान तय है। समर्पित कार्यकर्ता चाहें जितनी मेहनत कर लें। छत्तीसगढ़ ही नहीं, मध्यप्रदेश (कमलनाथ-सिंधिया) और राजस्थान (गहलोत-पायलट) में भी उसकी सत्ता ऐसे ही कारणों से हाथ आने के बाद फिसली थी। कांग्रेस की यह समस्या स्थायी मान ली जाएगी कि जहां-जहां सत्ता में आई, वहां आपसी कलह ने उसे पीछे धकेल दिया।
सरकारी क्वार्टर पर तनातनी
सरकारी क्वार्टर को लेकर मंत्रालय और पुलिस महकमे में नया विवाद शुरू हो गया है। शिकायत मिली है कि गृह विभाग को संपदा संचालनालय,नवा रायपुर स्थित सामान्य प्रशासन विभाग के क्वार्टर को अनाधिकृत रूप से पुलिसकर्मियों को आबंटित कर रहा है। यह शिकायत और आपत्ति और किसी ने नहीं मंत्रालय कर्मचारी संघ ने ही की है। एसीएस गृह मनोज पिंगुआ को चार बिंदुओं का दो पेज का लंबा चौड़ा पत्र सौंपकर इसे अनाधिकृत कहा है। इसमें सबसे उल्लेखनीय बात यह कही गई है कि पुलिस हाउसिंग बोर्ड द्वारा भी सभी कैटेगरी के आवास बनाए गए हैं उसके बाद भी संपदा संचालनालय जीएडी के क्वार्टर पर अपना अधिकार जता रहा है वह भी केवल नाम संपदा संचालनालय होने से। मानो यह संचालनालय सभी सरकारी आवासों का अकेला मालिक हो।
कुर्सी कुनबे में ही रहेगी?
प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल के उत्तराधिकारी की खोज चल रही है। रामगोपाल कोल-कस्टम मिलिंग स्कैम में फंसे हैं, और पिछले तीन साल से फरार चल रहे हैं। इन सबके बीच पार्टी के कई नेता रामगोपाल की जगह लेने के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। पार्टी के कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि पार्टी का अगला कोषाध्यक्ष दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा के परिवार से हो सकता है।
प्रदेश कांग्रेस बिना कोषाध्यक्ष के चल रहा है। वर्तमान में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति हो रही है, तो प्रदेश कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की भी चर्चा है। हालांकि पार्टी के प्रमुख नेताओं का मानना है कि प्रदेश संगठन में बदलाव के साथ ही कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। बताते हैं कि विधानसभा चुनाव के समय ही रामगोपाल अग्रवाल की जगह नई नियुक्ति पर मंथन हुआ था। एक बिल्डर के नाम पर सहमति भी बन गई थी। मगर बिल्डर उस समय गंभीर रूप से बीमार हो गए, उनसे जुड़े कुछ विवाद पार्टी को बताए गए, और फिर नियुक्ति अटक गई।
कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ कारोबारी नेताओं ने कोषाध्यक्ष पद के लिए भागदौड़ करना भी शुरू कर दिया है। पार्टी के एक खेमे के लोगों के बीच दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा के परिवार के सदस्यों में से एक नाम की चर्चा भी हो रही है। दिवंगत पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा करीब 2 दशक तक राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे हैं। वो गांधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते थे। वोरा के पुत्र अरुण वोरा दुर्ग से तीन बार विधायक रहे हैं, और चुनाव हारने के बाद दुर्ग शहर जिलाध्यक्ष बनने की होड़ में हैं। अरुण वोरा अपने पिता की तरह सीधे सरल माने जाते हैं। मगर कोषाध्यक्ष के लिए अरुण नहीं, बल्कि उनके चचेरे भाई राजीव वोरा के नाम का हल्ला है।
चर्चा है कि राजीव वोरा के लिए पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव सहमत हो सकते हैं। मगर पूर्व सीएम भूपेश बघेल, राजीव वोरा के नाम पर सहमत होंगे, इस पर संशय है। इन सबके बीच पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष पारस चोपड़ा सहित कई और कारोबारी नेताओं के नाम उछल रहे हैं। देखना है पार्टी क्या कुछ करती है।
आखिर कमरा एलॉट हो गया...

कुछ दिन पहले सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव ने पर्यटन, संस्कृति व धर्मस्व विभाग के मंत्री राजेश अग्रवाल के पीए को ससम्मान एक पत्र लिखा था जिसमें बताया गया था कि मंत्री जी के आदेश पर अमल नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति को अपना निजी सहायक नियुक्त करने का आदेश जारी करने कहा गया है वे केवल आठवीं पास हैं। जबकि छत्तीसगढ़ सचिवालय सेवा भर्ती नियम 2012 के तहत उन्हें कम से कम 12वीं पास होना चाहिए।
इस जवाब के बाद ऐसा लग रहा था कि नियुक्ति की जिद छोड़ दी गई होगी। मगर सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी से प्रत्याशी रहे डॉ. सुनील किरण ने एक तस्वीर पोस्ट की है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के किसी दूसरे हैंडल की पोस्ट भी शेयर की है। इसमें यह दिखाया गया है कि जिस तरबेज आलम को नियुक्ति करने से मना किया गया है, उनको मंत्री के बंगले में एक कमरा मिल गया है और निज सहायक का ओहदा भी दे दिया गया है। इसमें यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि जीएडी ने इस नियुक्ति के लिए सहमति दे दी है या फिर अपने स्तर पर ही मंत्री या अफसरों ने फैसला ले लिया है। लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया भी इस पोस्ट पर दे रहे हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि अपने से ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों को शायद मंत्री जी अपना सहायक नहीं बनाना चाहते होंगे। मंत्री जी हायर सेकेंडरी स्कूल तक पढ़े हुए हैं। यह शिक्षा कम नहीं है- कई विधायक और मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता इससे भी कम है और रही है।
अब गवाह मुद्दई बना
कल ईओडब्ल्यू ने कांग्रेस शासन काल में हुए दो घोटालों को लेकर चल रही अपनी जांच के सिलसिले में 19 ठिकानों पर सर्च किया। इनमें भ्रष्टाचार की कमाई से क्या मिला, कितना मिला इसे लेकर ब्यूरो ने कोई जानकारी नहीं दी। उसके संक्षिप्त से दो पैराग्राफ के प्रेस नोट में केवल छापे मारे गए, यही सूचना थी। बहरहाल इस कार्रवाई में एक नई जानकारी सामने आई। वह यह कि एक ऐसे अधिकारी भी लपेटे में आए जो अब तक एसीबी ईओडब्ल्यू की पंचनामा कार्रवाई में बतौर गवाह पैनलिस्ट हुआ करते थे। इन्हें विभाग ने ही मनोनीत कर रखा था। यानी सरगुजा संभाग में जहां भी ब्यूरो रेड करता या रेड हैंडेड पकड़ता ये साहब गवाह के रूप में सील साइन करते। शायद यही वजह रही कि उन्हें अब तक एसीबी से बचने के तौर तरीके समझ में आ गए थे। लेकिन कहा गया है न कि पुलिस की दोस्ती और दुश्मनी दोनों अच्छी नहीं। आखिरकार डॉक्टर साहब फंस ही गए।
डॉ. साहब वर्तमान में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में उप संचालक के पद पर हैं। इससे पहले वे वर्षों तक अंबिकापुर में पशु चिकित्सक के रूप में पदस्थ रहे हैं। बाद में वे सरगुजा जिला पंचायत में सहायक परियोजना अधिकारी रहे और पुन: मूल विभाग में लौटने के बाद कांग्रेस शासनकाल में बलरामपुर जिले में उपसंचालक पशुपालन भी रहे। डीएमएफ घोटाले के दौरान पशुपालन विभाग के कई कार्यों में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं, जिसकी आंच उन पर पड़ गई है।
ऐसे में यहां भी लाखों नाम कटेंगे!
आजकल हर घर में एक चर्चा चल रही है - मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर। 4 नवंबर से शुरू यह प्रक्रिया 4 दिसंबर तक चलेगी, लेकिन लाखों मतदाताओं को इसमें भारी परेशानी हो रही है। जशपुर से लेकर बस्तर तक की खबरें बताती हैं कि फॉर्म भरना हो या 2003 की पुरानी लिस्ट में नाम ढूंढना, सब कुछ जटिल लग रहा है। बिहार के फॉर्म से भी कठिन ये प्रपत्र, नाम न मिलना, ब्लैक एंड व्हाइट फोटो का भ्रम ये सब मिलकर लोगों को तनाव दे रहे हैं।
भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर को मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाने के लिए शुरू किया है। छत्तीसगढ़ में 2.12 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं, और 99 फीसदी तक फॉर्म घर-घर पहुंच चुके हैं। जांजगीर का ही उदाहरण लें, यहां 7 लाख से ज्यादा फॉर्म बांटे गए, लेकिन सिर्फ 31 फीसदी ही डिजिटलाइज हो पाए हैं। ऑनलाइन आवेदन तो महज 1000 के आसपास ही हैं। बूथ लेवल अधिकारी फॉर्म तो दे जाते हैं, लेकिन नाम कैसे ढूंढें, फॉर्म कैसे भरें, उनको ये सिखाने का समय ही नहीं। वे खुद पूरी तरह नहीं सीखे हुए हैं। पोर्टल पर 2003 की लिस्ट डाउनलोड करने का लिंक है लेकिन नाम में जरा सा बदलाव जैसे विवाह के बाद कुमारी से श्रीमती हो गया हो तो नाम गायब! कुछ दिलचस्प मामले हैं- एक महिला ने बताया, उनकी मां का वोटर आईडी गांव का है, 20 साल से शहर में हैं, लेकिन पुराना रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहा। कोरबा के स्लम इलाकों से खबर है कि बीएलओ से लोग उल्टे सवाल पूछते हैं, महिला बीएलओ को अकेले जाना डरावना लगता है। शिविर लग रहे हैं, मितानिन और पार्षद मदद कर रहे, लेकिन समय कम है।
कहा गया है कि 1987 से पहले जन्मे लोगों के लिए कोई सरकारी आईडी चलेगी, लेकिन 1987-2004 वाले को जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल सर्टिफिकेट देना होगा, उसके बाद वालों को सिर्फ जन्म प्रमाणपत्र। पहचान के लिए आधार, पैन, पासपोर्ट ठीक है लेकिन फोटो ब्लैक एंड व्हाइट ही हो या कोई भी चलेगा इस पर भी भ्रम फैला है। आयोग ने कहा है कि पहले वाली फोटो धुंधली है तो ही नई लगेगी, वरना पुरानी ही चलेगी। गलत जानकारी पर जेल और जुर्माने का डर भी लोगों को रोक रहा। टोल-फ्री नंबर 1950 पर मदद मिल सकती है, मगर रोजमर्रा के कामकाज में उलझे लोग इसे मुसीबत समझ रहे हैं।
आधार न होने से आदिवासी समुदाय के लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। प्रवासी मजदूर छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में हैं- बिहार की तरह। छत्तीसगढ़ में भी यही आशंका है। अगर फॉर्म न भरा या नाम न मिला, तो वैध मतदाताओं के नाम कट सकते हैं। आयोग कहता है, कोई छूटेगा नहीं, लेकिन दिक्कतें साफ दिख रही हैं।
माथुर से मिलने का मौका

सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर के परिवार में राजस्थान के पाली में शनिवार को विवाह समारोह में सीएम विष्णुदेव साय, और सरकार के मंत्रियों ने शिरकत की। माथुर छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। वो यहां के छोटे-बड़े नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर मिलते-जुलते रहे हैं। माथुर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद संगठन के प्रभार से मुक्त हुए, तब भी पार्टी के नेता उनके संपर्क में रहे हैं।
और जब माथुर के भाई की बेटी की शादी हुई, तो छत्तीसगढ़ के भाजपा के नेता चार्टर्ड प्लेन से वहां पहुंचे थे। इनमें सरकार के मंत्री ओपी चौधरी, रामविचार नेताम, दयालदास बघेल, गजेन्द्र यादव, टंकराम वर्मा, गुरू खुशवंत साहेब के साथ ही सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी थे। धमतरी मेयर रामू रोहरा, और कारोबारी पप्पू भाटिया सहित कई उद्योगपतियों ने भी विवाह समारोह में शिरकत की। माथुर भले ही सक्रिय राजनीति से अलग हैं, और संवैधानिक पद पर हैं। लेकिन उनकी सिफारिशों को पार्टी तवज्जो देती है। इसकी झलक उनके यहां विवाह समारोह में भी नजर आई।
खुद के बनाए नियम बह गए..
सोशल मीडिया पर राजधानी रायपुर के एक समाज विशेष के मुखिया के यहां ‘कॉकटेल’ पार्टी का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें रशियन सुंदरियां मेहमानों को शराब परोसते दिखाई दे रही है। यह पार्टी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी वजह यह है कि समाज के मुखिया ने बकायदा एक बैठक कर कुछ महीने पहले विवाह व अन्य कार्यक्रमों में शराब आदि के प्रचलन को रोकने के लिए 8 बिंदुओं पर फरमान जारी किया था। इसमें पूल पार्टी पर प्रतिबंध लगाने के अलावा सगाई, और संगीत समारोह में शराब व हुक्का पिलाने पर पूरी तरह से रोक भी शामिल था। अब मुखियाजी ने खुद के यहां कॉकटेल पार्टी रखी, तो हडक़ंप मच गया। मुखियाजी के विरोधियों ने ‘पार्टी’ का वीडियो वायरल कर दिया। अब उन्होंने खुद के बनाए नियमों का उल्लंघन किया है, तो जवाब देना मुश्किल हो रहा है। मुखियाजी की कॉकटेल पार्टी का वीडियो कारोबारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
जंगल में पैदल चलतीं सरस्वती बेटियां

सरकार की सरस्वती साइकिल योजना का फायदा इन बच्चियों तक नहीं पहुंचा। बिलासपुर एटीआर के छपरवा गांव से आगे अमरकण्टक मार्ग पर केंवची के पास स्कूली बालिकाएं पैदल स्कूल जाती दिखीं। यहां करीब 100 से अधिक छात्राओं के पास एक भी साइकिल नहीं थी।
छात्राओं ने बताया कि योजना के तहत उन्हें साइकिलें जरूर मिली थीं, लेकिन उनकी गुणवत्ता बेहद खराब थी। साइकिलें दो-तीन महीने में ही टूट-फूट गईं, कई की चेन, ब्रेक और पैडल कुछ ही दिनों में जवाब दे गए। मरम्मत पर पैसा खर्च करना पड़ा, लेकिन फायदा नहीं हुआ। अब इन लड़कियों को रोजाना कई किलोमीटर पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि सरस्वती साइकिल योजना का हाल ‘बंदरबांट’ है। योजना का मकसद छात्राओं को शिक्षा से जोडऩा और दूरी की परेशानी कम करना था, पर साइकिलों की निम्न गुणवत्ता ने उद्देश्य को बेअसर कर दिया। यदि इस योजना की निष्पक्ष जांच हो, तो छत्तीसगढ़ में एक बड़ा स्कैंडल सामने आ सकता है।
ननकीराम की निशानेबाजी
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर की शिकायतों की अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। कंवर ने कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत के खिलाफ 14 बिन्दुओं पर शिकायत की थी। उन्होंने कोरबा कलेक्टर की हटाने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन भी किया था। सीएम विष्णुदेव साय की दखल के बाद कंवर की शिकायतों की जांच का जिम्मा बिलासपुर कमिश्नर सुनील जैन को दिया गया है। वैसे तो हफ्ते भर के भीतर जांच प्रतिवेदन देना था, लेकिन जांच अब तक जारी है।
बताते हैं कि बिलासपुर कमिश्नर बिंदुवार जांच कर रिपोर्ट देने वाले थे। उन्होंने कुछ शिकायतों की पड़ताल के लिए अलग से टीम भी गठित की। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर से भी आरोपों से जुड़े दस्तावेज मांगे थे। चर्चा है कि कंवर ने कुछ दस्तावेजी सुबूत भी दिए हैं। बिलासपुर कमिश्नर अगले दो-तीन दिनों में जांच प्रतिवेदन सरकार को सौंप देंगे। फिर भी जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद भी सरकार, कोरबा कलेक्टर को हटाने कंवर की जिद पूरी कर पाएगी, इसको लेकर संशय है। यदि शिकायत जांच में गलत पाए जाते हैं, तो हटाने का सवाल पैदा नहीं होता। मगर सही पाए जाने पर भी हटाना आसान नहीं है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि प्रदेश में एसआईआर का काम तेजी से चल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में कलेक्टर सीधे जुड़े हुए हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया से जुड़े अफसरों के तबादले पर रोक लगा रखी है। तबादले के लिए आयोग की अनुमति जरूरी है। इन सबको देखते हुए कोरबा कलेक्टर को राहत मिलती दिख रही है। फिर भी जांच प्रतिवेदन का इंतजार हो रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
वफ़ादारी अभी जि़ंदा है...
इस बार जशपुर और छत्तीसगढ़ के टमाटर वाले किसानों के चेहरे पर सच्ची मुस्कान है। पिछले कई सालों से नवंबर-दिसंबर में टमाटर का दाम चारों खाने चित्त होता था। एक रुपया, दो रुपया, पांच रुपया। कई बार तो खेत में ही सड़ाने या फेंकने की नौबत आ जाती थी। पिछले साल दुर्ग में जब टमाटर एक रुपये किलो पहुंच गया तो किसानों ने इसे सडक़ों पर लाकर फेंक दिया था। लुड़ेग में ही टमाटर के खेत को ट्रैक्टर से रौंदा जा चुका है। लेकिन इस नवंबर में लुड़ेग, पत्थलगांव जैसे इलाकों में टमाटर थोक में ही 50-60 रुपए किलो तक बिक रहा है। सुबह दस बजते-बजते मंडी खाली, दोपहर में सन्नाटा। बाहर के व्यापारी रात में ही गाडिय़ां लगाकर खड़े हो रहे हैं। माल हाथों-हाथ उठ रहा है।
जशपुरिहा टमाटर अपने नाम से पूरे उत्तर भारत में मशहूर है। ओडिशा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल – इन राज्यों की मंडियों में लोग खास तौर पर जशपुर का लाल रसीला टमाटर मांगते हैं। यहां की मिट्टी, मौसम और किसानों की मेहनत की वजह से इस साल लुड़ेग क्षेत्र में ही 15 हजार टन से ज्यादा उत्पादन हुआ है। पूरे जशपुर जिले में करीब 10 हजार हेक्टेयर में टमाटर की खेती होती है और एक सीजन में एक लाख 90 हजार मीट्रिक टन तक पैदावार होती है। दुलदुला, मनोरा, सन्ना जैसे नए इलाकों में भी कृषि विभाग की मदद से टमाटर की खेती तेजी से फैल रही है।
पहले नवंबर-दिसंबर में खरीफ का टमाटर एक साथ इतना आता था कि दाम धड़ाम से गिर जाते थे। लेकिन इस सीजन में मौसम की कुछ अनुकूलता और किसानों ने थोड़ी सावधानी बरती। फसल का पीक एक साथ नहीं आया। नतीजा, इस बार सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा है। झारखंड, बंगाल, बिहार में वहां के स्थानीय टमाटर की फसल या तो देर से आई या कमजोर हुई, इसलिए सारी नजरें जशपुर पर टिक गईं।
स्थानीय बाजारों में जो टमाटर दिख रहा है, वो छोटी बाडिय़ों का है। मगर, वह भी 50-60 रुपए किलो आसानी से बिक रहा है। छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग के आसपास के किसान भी इसी मौके का फायदा उठा रहे हैं।
ज़मीन कारोबारी सदमे में
सरकार ने सात साल बाद संपत्ति की गाइड लाईन दरों में भारी वृद्धि की है। शहरों में तो 40 फीसदी तक और ग्रामीण इलाकों में तीन सौ फीसदी तक की वृद्धि की गई है। इससे रियल एस्टेट कारोबारियों में हडक़म्प मचा हुआ है। कारोबारी रियल एस्टेट कारोबार ठप्प पडऩे की आशंका जता रहे हैं। फिलहाल तो रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े लोगों ने रजिस्ट्री नहीं कराने का फैसला लिया है।
रियल एस्टेट के कारोबारियों की एक बैठक हो चुकी है। चैम्बर ऑफ कॉमर्स से भी समर्थन मांगा गया है। कारोबारियों को सबसे ज्यादा परेशानी रायपुर शहर की सीमा से सटे ग्रामीण इलाकों की गाइड लाईन दरों में बढ़ोत्तरी से हो रही है। रायपुर और आसपास के इलाकों में सैकड़ों करोड़ का निवेश हो चुका है। ऐसे में आवासीय परियोजना की लागत बढऩे से कारोबार पर असर पडऩे की संभावना जताई जा रही है।
बताते हैं कि कुछ प्रमुख बिल्डर्स ने तीन माह पहले आवास पर्यावरण मंत्री ओ.पी.चौधरी से मुलाकात की थी। चौधरी ने उन्हें साफ तौर पर संकेत दे दिए थे कि गाइड लाईन की दरों में बड़ी वृद्धि की जाएगी। सरकार की तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि किसानों को गाइड लाईन दर बढऩे पर मुआवजा ज्यादा मिलेगा। मगर जमीन अधिग्रहण शहर के आसपास नहीं के बराबर है। क्योंकि कोई बड़ा सरकारी प्रोजेक्ट फिलहाल नहीं चल रहा है।
कारोबारी इस मसले पर सरकार से लड़ाई लडऩे की योजना बना रहे हैं। कानूनी विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। ऐसे में सरकार के फैसले का क्या असर होता है, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।
कुत्ता पकड़वाएंगे प्रिंसिपल साहब....!
देशभर में आवारा कुत्तों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है। सडक़ पर आवारा कुत्तों के प्रति कुत्ताप्रेमियों की हमदर्दी एकतरफ और आवारा कुत्तों के जुल्म के सताए बच्चे-नौजवान दूसरी तरफ। इस बहस से परे सरकारों के सामने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करवाने की जिम्मेदारी तो है ही। बता दें कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक जगहों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया है।
हमने राजपथ में कुछ दिन पहले आपको छत्तीसगढ़ की बैकुण्ठपुर नगर पालिका के एक आदेश के बारे में बताया था, जिसके मुताबिक सडक़ पर आवारा कुत्तों को कुछ भी खिलाने पर जुर्माने का प्रावधान रखा गया। इसके पीछे मकसद ये कि कम से कम खाने के लालच में तो सडक़ों पर कुत्तों का जमावड़ा नहीं लगेगा।
अब एक और नया आदेश आया है, जो पूरे प्रदेश के लिए है। लोक शिक्षक संचालनालय ने स्कूल के आसपास आवारा कुत्तों को हटाने के लिए सभी स्कूल प्रिंसिपलों को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। इनकी जिम्मेदारी तय की गई है कि ये अपने स्कूल के पास जहां भी कुत्ते देखेंगे तुरंत संबंधित नगर निगम, पालिका, जनपद, या पंचायत के डॉग कैचर को सूचना देंगे। हालांकि शालेय शिक्षक संघ ने इस फैसले को अव्यवहारिक और अनुचित बताया है, उनका कहना है कि ये काम स्थानीय प्रशासन को करना चाहिए, शिक्षकों पर पहले ही काम का इतना बोझ है, स्ढ्ढक्र का काम भी सर पर है और अब कुत्तों की निगरानी का काम ज्यादती न हो जाए...!
एक दिन का सत्र, कई तरह की चर्चा
विधानसभा के रजत जयंती पर एक दिन का विशेष सत्र हुआ। पुराने भवन में यह आखिरी सत्र था। शीतकालीन सत्र अब विधानसभा के नए भवन में होगा। सत्र के दौरान कई सीनियर सदस्य अध्यक्षीय दीर्घा में मौजूद थे। खुद स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने उन्हें आमंत्रित किया था। इनमें सांसद बृजमोहन अग्रवाल, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री रविन्द्र चौबे, और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल थे।
सदन में पक्ष-विपक्ष के सदस्यों ने अपनी पुरानी यादें साझा की। हल्ला है कि एक पूर्व विधानसभा सदस्य, जो कि लंबे समय तक सदन की सदस्य रहे हैं, वो सदन को संबोधित करना चाह रहे थे। स्पीकर तक उन्होंने अपनी बात पहुंचाई भी। मगर पूर्व में कभी इस तरह की अनुमति नहीं दी गई थी, लिहाजा, उन्हें मना कर दिया गया। इससे परे पूर्व मंत्री कवासी लखमा की गैरमौजूदगी विशेषकर विपक्षी सदस्यों को खल गई।
लखमा, आबकारी घोटाला केस में जेल में हैं। कांग्रेस विधायक दल के सचेतक लखेश्वर बघेल ने कहा कि लखमा राज्य बनने के पहले से लगातार विधानसभा के सदस्य हैं। इसलिए उन्हें सदन की कार्रवाई मेें हिस्सा लेने की अनुमति दी जानी चाहिए थी। लोकसभा और राज्यसभा में भी जेल में बंद सदस्यों को सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाती है। चर्चा है कि खुद कवासी सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने के बजाए आंखों के इलाज के लिए अंबेडकर अस्पताल में भर्ती होना चाह रहे थे जो कि उन्हें मिल गई थी। और इलाज कराकर वापस जेल चले गए। कुल मिलाकर एक दिन यह सत्र कई मामलों में चर्चा का विषय रहा है।
बिहार से लौटा लश्कर, बंगाल कूच
बिहार के बाद भाजपा पश्चिम बंगाल चुनाव तैयारियों में जुट गई है। छत्तीसगढ़ भाजपा के महामंत्री (संगठन) पवन साय को बंगाल की 45 विधानसभा सीटों का प्रभारी बनाया गया है। साय पिछले दिनों कोलकाता में जाकर स्थानीय प्रमुख नेताओं के साथ बैठक कर चुके हैं।
बताते हैं कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पदाधिकारियों की ड्यूटी लगाई जा रही है। सौ से अधिक नेताओं को प्रचार के लिए वहां भेजा जा सकता है। भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल बंगाल में पहले भी काम कर चुके हैं। लिहाजा, वो यहां प्रदेश के नेताओं को टिप्स भी दे रहे हैं। सरकार के एक मंत्री भी पिछले दिनों बंगाल का दौरा कर आ चुके हैं। इन सबको देखते हुए प्रदेश कार्यकारिणी, और निगम मंडलों में नियुक्तियां जल्द होने के संकेत हैं। देखना है आगे क्या होता है।
यूनेस्को सूची के लिए सिरपुर में नई कोशिशें

हजारों साल पुराने पुरातात्विक अवशेष, अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व होने के बावजूद राज्य का एक भी स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है। विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के लिए किसी भी स्थल को पहले अस्थायी सूची में आना जरूरी है। कांगेर घाटी ने इस पहली बाधा को पार कर लिया है, लेकिन बीते कई वर्षों से चल रही कोशिशों के बाद भी सिरपुर अस्थायी तौर पर भी सूची में शामिल नहीं हो सका है।
महासमुंद जिले में महानदी के किनारे स्थित सिरपुर 6वीं से 8वीं शताब्दी में एक बड़ा बौद्ध-हिंदू केंद्र था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने सिरपुर को 100 विहार और 150 मंदिरों वाले समृद्ध स्थल के रूप में दर्ज किया था। यहां का भ्रमण करने पर इनमें से कुछ का ही दर्शन किया जा सकता है। जाहिर है कि इसकी मिट्टी के नीचे अनगिनत कहानियां छिपी हो सकती हैं।
इसे विश्व धरोहर में नामांकित करने की कोशिश इसी महीने फिर शुरू हुई। एएसआई और साडा की टीम ने यहां का निरीक्षण कर 34 खास जगहों का चिन्हांकित किया और उन्हें 4 कलस्टरों में बांटने की योजना बनाई है। यूनेस्को के मानक में फिट बैठ सके, इसके लिए कुछ आधुनिक सुविधाएं पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराने की योजना है। जैसे अधिक सुगम पैदल मार्ग, बैटरी गाडिय़ां, ब्रेल साइनेट और नए गाइड सेंटर।
यूनेस्को में नामांकन केंद्र सरकार की ओर से ही जाता है। केंद्र हर वर्ष केवल 2-3 नामांकन ही भेजता है, जिनमें अन्य राज्यों के आवेदन भी शामिल होते हैं। प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय स्तर पर होनी है। देश की ओर से प्रस्ताव जाएगा, तब यूनेस्को में विचार होगा। वैसे कांगेर घाटी को अस्थायी सूची में शामिल हो जाने से यह तो समझा जा सकता है कि वैश्विक स्तर के दस्तावेज कैसे तैयार करे और कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाए- इसकी मोटी जानकारी अपने राज्य के अफसरों को है। मगर, अभी तक सिरपुर का वैज्ञानिक दस्तावेज, तुलनात्मक अध्ययन और संरक्षण की योजना पूरी तरह तैयार नहीं है। इसे राज्य सरकार को एएसआई की मदद से तैयार करना है। कई हिस्सों में यहां खनन अधूरा पड़ा है, जिसे आगे बढ़ाने के लिए शायद फंड नहीं मिल रहा है। अगर सिरपुर का डोजियर अगले एक-दो साल में तैयार हो गया, तो 3–5 साल में इसे अस्थायी सूची में जगह मिल सकती है। सिरपुर में विश्व धरोहर बनने की क्षमता तो है, मगर- वर्षों से प्रयास के बावजूद अब तक सफलता नहीं मिली है।
हे राम...!

छत्तीसगढ़ में लंबे वक्त तक संस्कृति और धर्मस्व मंत्री रहे, बीजेपी के सीनियर मोस्ट नेता बृजमोहन अग्रवाल ने राज्य सरकार को चि_ी लिखकर बताया है कि इस वक्त एक बात को लेकर सनातनियों में असंतोष और निराशा व्यापत है। बात प्रभु राम की मूर्ति से जुड़ी है। भूपेश सरकार में पूरे प्रदेश में अलग-अलग जगहों श्रीराम की आदमकद प्रतिमा लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहली प्रतिमा चंदखुरी में लगी। उस प्रतिमा के रंग-ढंग पर आम जनता समेत उस वक्त विपक्ष में बैठी बीजेपी ने खूब टिप्पणी की, और कहा कि कांग्रेस सरकार ने प्रभु राम का अपमान किया। राज्य में हाल की बीजेपी सरकार बनने के पहले तक समय-समय पर मांग होती रही कि रामजी की इस प्रतिमा को बदलकर नई मूर्ति लगाई जाए।
2023 में बीजेपी सरकार बनी, और मूर्ति बनने का ऑर्डर हो गया। मध्यप्रदेश के एक मूर्तिकार ने बड़ी मेहनत से रामजी की बड़ी सुंदर प्रतिमा तैयार की। प्रतिमा का निर्माण ग्वालियर सेंड स्टोन आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में किया गया, पांच महीने पहले प्रतिमा पूरी तरह तैयार हो चुकी थी, और चंद्रखुरी में स्थापना का इंतजार था। कई अखबारों और मीडिया में मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा का ये बयान है कि छत्तीसगढ़ के ठेकेदार ने केवल 10 लाख रुपए का अग्रिम भुगतान दिया था, जबकि करीब 70 लाख रुपए का बकाया अब तक नहीं मिला है। लगातार बढ़ते दबाव और भुगतान न मिलने के कारण प्रतिमा को बेचने व दूसरी जगह स्थापित करने का निर्णय लेना पड़ा। भगवान श्रीराम के वनवासी स्वरूप की 51 फीट ऊंची प्रतिमा अब मुरैना जिले के एंती पर्वत स्थित शनिधाम में स्थापित की जाएगी।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को चि_ी लिखकर ये याद दिलाया है कि दो साल बीतने के बाद भी भगवान राम की नई मूर्ति के स्थापना की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। उन्होंने लिखा है कि विभागीय उदासीनता के चलते नवनिर्मित मूर्ति को दूसरे राज्य में स्थापित करने की स्थिति बन गई है, जिससे सनातन धर्मावलंबियों और प्रदेशवासियों में असंतोष और निराशा व्याप्त है। उन्होंने 3 महीने में मूर्ति स्थापित करने की मांग की है।
पगड़ी उतारी और छूटा शेखावत...
सोशल मीडिया पर रायपुर के मौदहापारा थाने के भीतर का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें करणी सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राज शेखावत पल भर के लिए पुलिस के सामने अपनी पगड़ी उतार रहा है। पगड़ी उतारते हुए उसके वकील उसे हाथ से इशारा कर मानो मना कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सूदखोर वीरेंद्र तोमर की गिरफ्तारी के बाद जुलूस निकालने को राजपूत समाज की साख के खिलाफ बताते हुए बीते कुछ दिनों से शेखावत लगातार अपने सोशल मीडिया पर वीडियो बना रहा है। उसने रायपुर पुलिस को घर में घुसकर मारने की धमकी तक दी, इतना ही नहीं जब डिप्टी सीएम और सूबे के गृहमंत्री विजय शर्मा ने ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई की बात कही तो राजपूत ने उनका फोन नंबर सोशल मीडिया पर साझा कर अनर्गल बातें कहीं।
वीरेंद्र तोमर केस रफा-दफा करने के बदले छत्तीसगढ़ के एक सांसद पर पैसे लेने के बाद काम नहीं करने का आरोप भी लगाया। अब बुधवार को मानो किसी तय करार के मुताबिक जब वो खुद गिरफ्तारी देने रायपुर पहुंचा तब थाने में कुछ ही घंटों में उसे मुचलके पर छोड़ दिया गया। अब शेखावत, रायपुर में 7 दिसंबर को क्षत्रिय समाज की महापंचायत की तैयारी में लग गया है।
इस पूरे वाकये पर सोशल मीडिया पर एक समय छत्तीसगढ़ के एक चर्चित नेता से जुड़े रहे, और लगातार आलोचनात्मक टिप्पणियां करने वाले एक चर्चित व्यक्ति ने खुद को क्षत्रिय बताते हुए शेखावत को आड़े हाथों लिया है। उनकी सोशल मीडिया पोस्ट, सांसद से डील वाले आरोप पर एक तरह से पलटवार भी है।
पहले राष्ट्रपति की घोषणाएं अधूरी

1952 में इन्हीं दिनों, 22 नवंबर को जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरगुजा दौरे पर आए थे तो वे पंडो जनजाति से मिले। तब यह आदिवासी समाज जंगल में रहता था। छोटे कपड़ों से शरीर को ढंके हुए रहते थे। आज डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निर्देश पर बसाई गई 13 कॉलोनियों में रहने वाले लोग सलीके से कपड़े ही नहीं पहनते, लोगों के पास मोबाइल फोन, गाडिय़ां, घरों में बिजली के आधुनिक उपकरण हैं। कई लोग सरकारी नौकरी में पहुंच चुके हैं। कुछ साल बाद पंडो समाज से एक डॉक्टर भी निकलेगा। एक युवा छात्र मेकहारा (रायपुर) में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। कुछ बच्चे पीएससी की तैयारी कर रहे हैं।सरगुजा जिला मुख्यालय अंबिकापुर से सिर्फ 12 किलोमीटर दूर पंडोनगर तक पहुंचने के लिए पक्की सडक़ भी बन चुकी है। सैलानियों के लिए यहां का राष्ट्रपति भवन कौतूहल बना हुआ है।
पंडो जनजाति के साथ-साथ विशेष संरक्षित अति पिछड़ी जनजातियों को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था।
मगर, कुछ तथ्य आपको हैरान कर सकते हैं। जैसे- केंद्र की पीवीटीजी सूची में विशेष संरक्षित पंडो जनजाति को शामिल नहीं किया जा सका है। इसके पीछे अफसरों की उदासीनता बताई जाती है, वे दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए। हालांकि राज्य सरकार ने अपनी पीवीटीजी सूची में शामिल कर लिया है और उन्हें योजनाओं का लाभ दे रही है।
यह बात भी गौर करने की है कि प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई एक बड़ी घोषणा पर अब तक अमल नहीं हुआ। इस घोषणा के मुताबिक प्रत्येक परिवार को 10-10 एकड़ जमीन दिया जाना था। यहां के निवासी बताते हैं कि कुछ लोगों को 4-5 एकड़ जमीन तो मिली, कई लोगों को नहीं मिली। 10 एकड़ जमीन तो किसी को मिली ही नहीं। वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद उन्हें विधिवत पट्टा दिया गया। इसके पहले उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं था कि जमीन उनकी है। जब भी दत्तक पुत्रों की बात होती है, ध्यान सरगुजा की ओर ही जाता है, मगर ये जनजाति बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया, एमसीबी, कोरबा, रायगढ़ और जीपीएम जिलों में भी मौजूद है। पंडो के साथ-साथ पहाड़ी कोरवा, बिरहोर और कामर जातियों को भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दत्तक पुत्र माना था। इन समुदायों को लुप्त होने से बचाने के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने, कुपोषण दूर करने के कई काम हुए हैं- मगर प्रशासन तक पहुंच अब भी आसान नहीं है। पिछली सरकार के दौरान बलरामपुर जिले की घटना सामने आई थी जहां करीब 15 लोगों की कुपोषण, रक्ताल्पता के कारण मौत हो गई थी। पंडो जनजाति पिछली जनगणना में 31 हजार 800 के करीब थी। 2011 के बाद से जनगणना हुई नहीं है। समाज के लोगों का कहना है कि हम दत्तक पुत्रों की आबादी छत्तीसगढ़ में अब 70 हजार के आसपास है। पंडो समाज के प्रमुखों से बात करने से यह भी पता चलता है कि पढ़ाई का अवसर मिला तो बहुत से युवा पढ़ लिख लिए लेकिन वे बेरोजगार हैं। बहरहाल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सरगुजा प्रवास से उन्हें बेहद खुशी है। इसे वे 73 साल पहले जैसा ही ऐतिहासिक मौका मानते हैं और बड़ी घोषणाओं की उम्मीद भी कर रहे हैं।
अभिमन्यु का शोक या जयद्रथ वध
छत्तीसगढ़ विधानसभा की 25 वर्षों की यात्रा पर आहूत विशेष सत्र में मंगलवार को सदन में पहली विधानसभा से लेकर अब तक के पक्ष विपक्ष की राजनीति के उतार चढ़ाव पर चर्चा हुई। वक्ताओं हूं कहा गया था कि कोई राजनीतिक बातें नहीं होंगी। केवल सदन की अच्छाई और कार्यवाही संचालन में लागू और अपनाए गए नवाचारों पर बात होगी। भला दलीय नेता भाषण दें और राजनीति की बातें न हो असंभव। कई दिग्गज नेताओं ने संसदीय हदों को समझते हुए हल्के फुल्के अंदाज में ही सही आरोपात्मक बातें रखते रहे।
शुरुआत में भाजपा के वरिष्ठ विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने और विपक्ष की ओर से पूर्व सीएम कांग्रेस भूपेश बघेल ने जवाब दिया। चंद्राकर ने अपनी बातें 45 मिनट में रखी तो बघेल ने 25 मिनट में। दर्शनशास्त्र में उपाधिधारी चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ शब्द से इसके इतिहास से शुरू कर गठन काल और 25 वर्षों की बात रखी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के उस बयान को उद्धृत किया जिसमें देश में छोटे राज्यों को गैर जरूरी कहा था । इस पर चुप्पी साधने वाले स्व. चंदूलाल चंद्राकर,वीसी शुक्ल, अजीत जोगी का नाम लिया। फिर राज्य गठन के बाद इन पर नाखून कटाकर शहीद बनने की कोशिश करने जैसे आरोप लगाया।
कांग्रेस की पहली सरकार और (अजीत जोगी का नाम नहीं लिया) मुख्यमंत्री मंत्रियों पर भी हमले किए। लंबे चौड़े संबोधन का समापन चंद्राकर ने यह कहकर किया कि अभिमन्यु के वध का शोक मनाते या जयद्रथ वध की तैयारी करें। उसके बाद से अध्यक्षीय दीर्घा में आए रविन्द्र चौबे, बृजमोहन अग्रवाल समेत अन्य नेता कांग्रेस के अभिमन्यु और जयद्रथ को तलाशते रहे हैं।
दरअसल, अभिमन्यु महाभारत के एक प्रमुख योद्धा थे।जो अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। बहुत वीर और पराक्रमी थे, और कम उम्र में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करके कौरवों से अकेले लड़ गए थे। दुर्भाग्यवश, चक्रव्यूह से बाहर निकलने की विधि न जानने के कारण उनका वध हो गया था। जब अर्जुन को यह बात पता चली कि कौरवों के एक मात्र दामाद जयद्रथ ने चक्रव्यूह रचा था तो अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने की प्रतिज्ञा ली। आज कर्ण और अर्जुन से भी पहले शूरवीर अभिमन्यु का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
महाभारत कथा से खत्म हुए वार पर बघेल भला कैसे चुप रहते उन्होंने ने भी चुटकी ली। बघेल ने कहा पहली विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष चुनाव में भाजपा के भीतर मची हलचल पर चुटकी ली। उन्होंने पर्यवेक्षक के रूप में आए नेता का नाम न लेकर कहा कि वो आज देश के शीर्ष पद पर हैं।
सरकारी खर्च पर बनाओ, लीज पर दो
सरकार ने शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम को पांच वर्ष के लिए छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन को लीज पर दे दिया है। मंगलवार को खेल विभाग, और छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन के बीच औपचारिक रूप से एमओयू भी हो गया। क्रिकेट स्टेडियम तो छत्तीसगढ़ सरकार के लिए एक तरह से सफेद हाथी साबित हो रहा था। रखरखाव पर करीब तीन करोड़ रुपए सालाना खर्च हो रहा था। अब क्रिकेट संघ सरकार को डेढ़ करोड़ रुपए सालाना देगा। साथ ही आईपीएल, और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच होने पर 20 से 30 लाख रुपए सरकार को मिलेंगे।
बताते हैं कि छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य, और बीसीसीआई के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने स्टेडियम को क्रिकेट एसोसिएशन को देने के लिए सरकार को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। शुक्ला की दो माह पहले सीएम विष्णुदेव साय से चर्चा हुई थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम को एसोसिएशन को लीज पर देने के फायदे गिनाए। एसोसिएशन के पास स्टेडियम आने से रखरखाव भी बेहतर ढंग से होगा, और यहां अंतरराष्ट्रीय मैच भी ज्यादा संख्या में हो पाएंगे। सीएम को शुक्ला की बातें जंच गई। इसके बाद विभागीय स्तर पर चर्चा हुई, और फिर स्टेडियम को एसोसिएशन के हवाले कर दिया गया।
क्रिकेट स्टेडियम के अलावा यहां साइंस कॉलेज में सरदार पटेल अंतरराष्ट्रीय स्तर हॉकी स्टेडियम है, अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैच काफी समय से नहीं हुए हैं। इसका रखरखाव बेहतर ढंग से नहीं हो पा रहा है। ऐसे में क्रिकेट स्टेडियम को एसोसिएशन के हवाले करने का फैसला उचित प्रतीत हो रहा है।
केरल चुनाव पर छत्तीसगढ़ की छाया

पिछले दिनों केरल के ईसाई समुदायों के सबसे प्रमुख बिशपों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला। मुलाकात कराई वहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने। दिलचस्प यह है कि इस मुलाकात के एक दिन पहले ही इन बिशपों की एक संयुक्त समिति ने छत्तीसगढ़ के कई गांवों में ईसाई धर्म प्रचारकों को प्रवेश करने से रोके जाने पर चर्चा की और प्रस्ताव पारित किया था। उन्होंने इस बैठक में यह भी कहा कि धार्मिक भेदभाव का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं दिखता जहां अल्पसंख्यकों को अपने धर्म का प्रचार करने पर सार्वजनिक घोषणा कर रोक लगा दी जाए। मालूम हो कि प्राय: ये गांव आदिवासी बहुल है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में यह मामला आया था। हाईकोर्ट ने पेसा कानून का हवाला देते हुए, ग्राम सभाओं के पक्ष में फैसला दिया है और चेतावनी बोर्ड को सही बताया है। बिशपों ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात भी कही। यह सब तब हुआ जब बिशपों की मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी से अगले दिन होने वाली थी। मुलाकात होने के बाद राजीव चंद्रशेखर ने पूछे जाने पर मीडिया से कहा कि छत्तीसगढ़ के मामले में विशेष तौर पर कोई बात नहीं हुई, लेकिन अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा का मुद्दा जरूर मोदी के सामने बिशपों ने रखा और उन्होंने आश्वस्त भी किया। मोदी ने बिशपों से कहा कि मैं सदैव आपकी सेवाओं में उपस्थित रहूंगा।
छत्तीसगढ़ में इस समय प्रार्थना सभाओं के दौरान हिंदुत्ववादी संगठन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आए दिन विवाद हो रहा है। पुलिस उन लोगों को हिरासत में भी ले रही है, जो सभाएं आयोजित कर रहे हैं। गृह विभाग ने भी ऐसी सभाओं को बिना अनुमति आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा रखा है। दुर्ग में दुर्व्यवहार का शिकार हुई ननों को जमानत तो मिल गई है, मगर उनके खिलाफ केस अभी भी चल रहे हैं। बिशप यह मुकदमा वापस लेने की मांग कर रहे हैं। राजीव चंद्रशेखर ने कई चर्चों में जाकर इस घटना पर माफी मांगी और यह आश्वस्त करने की कोशिश की मामला पूरी तरह सुलझा लिया जाएगा। मोदी ने भी एक्स पर लिखा- अद्भुत रही मुलाकात।
केरल में ईसाई समुदाय एक बड़ा वोट बैंक है। अगले साल वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा इनके बीच लगातार इसका समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। कुछ चर्चों का समर्थन मिल भी चुका है। मगर, छत्तीसगढ़ के घटनाक्रमों पर बिशपों की प्रतिक्रिया उसके लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
सांसद खेल में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़

छत्तीसगढ़ में मालवाहक वाहनों में सवारियों को ढोने पर प्रतिबंध केवल कागजों में रह गया है। हर बार हादसे के बाद अभियान चलाया जाता है, कुछ दिन कार्रवाई होती है, और फिर सब कुछ सामान्य। अब तो यही तस्वीर सरकारी आयोजनों में भी दिखाई दे रही है।
मंगलवार को बलौदाबाजार में आयोजित सांसद खेल महोत्सव के समापन कार्यक्रम में बच्चों को ले जाने और वापस लाने के लिए खुली मालवाहक पिकअप गाडिय़ों को लगा दिया गया। एक-एक गाड़ी में 30 से ज्यादा बच्चे सामान की तरह ठूंस-ठूंसकर भरे गए। कार्यक्रम समाप्त होने तक अंधेरा गहरा गया। बच्चों को उसी खुली पिकअप में ठिठुरते हुए घर भेज दिया गया। कई बच्चे ठंड से कांपते दिखाई दे रहे हैं। सरकारी और निजी स्कूलों पर ऐसे आयोजनों की भीड़ बढ़ाने का दबाव रहता है। व्यवस्था की जिम्मेदारी टीचर्स पर सौंप दी जाती है। उनकी स्थिति लाचारी ऐसी तस्वीरों से देखी जा सकती है। ऐसे आयोजनों की भव्यता दिखाने के लिए लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा के लिए हिस्सा इसमें से नहीं निकाला जाता।
किस दबाव में थे महाधिवक्ता?
महाधिवक्ता के पद से सीनियर एडवोकेट प्रफुल्ल एन. भारत के अचानक इस्तीफे ने कई लोगों को चौंकाया जरूर होगा, लेकिन हाईकोर्ट परिसर में इस बात की चर्चा बीते कई दिनों से हो रही थी सरकार के कुछ प्रभावशाली आईएएस अफसरों के साथ उनका टकराव चल रहा है। सोमवार को दिनभर उन्होंने दफ्तर में काम किया और कई मामलों में सरकार की तरफ से पैरवी भी की। रात करीब 8 बजे अचानक इस्तीफा सामने आ गया। मीडिया ने जब उनसे इस्तीफे का कारण पूछा तो उन्होंने यही कहा कि मैंने अपने इस्तीफे में कारण को नहीं दर्शाया है। यानि उन्होंने दूसरी व्यस्तताओं के कारण पद छोड़ा, स्वास्थ्य के कारण छोड़ा, निजी कारणों से छोड़ दिया- इस तरह के बहाने न बनाकर- वजह को छिपा दिया, जिससे कारणों पर अटकलें और तेज हो गईं। चर्चा तो यह भी है कि इस्तीफे का प्रारूप तैयार कर उनके सामने रखा गया, जिस पर उन्हें केवल हस्ताक्षर ही करना था। आज हाईकोर्ट परिसर में उनका इस्तीफा ही चर्चा का विषय रहा। वे हाईकोर्ट पहुंचे तो साथी अधिवक्ताओं ने उन्हें घेरा और कारण पूछा। उन्होंने एक ही बात कही- जमा नहीं। किससे नेताओं से या अफसरों से इस पर खामोश रहे।
चर्चा यह भी रही कि सरकार के कुछ अफसर मनमाना जवाब दाखिल करना चाहते थे जो वास्तव में कानूनसम्मत नहीं होते थे। कई मामलों का जवाब दाखिल करने में अनावश्यक देरी होती थी, जिसे लेकर बेंच की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही थी। कई मुद्दों पर सरकार का बचाव करने के लिए अचानक नियम बदल दिया जाता था और सुनवाई की तारीख के ठीक पहले महाधिवक्ता कार्यालय की जानकारी में लाया जाता था।
भ्रष्टाचार के जिन चर्चित मामलों में एजेंसियों का पक्ष रखा जा रहा है, उनमें महाधिवक्ता कार्यालय की सलाह के बगैर ही पैरवी की जा रही है। इनमें से कुछ को अनाप-शनाप फीस भी दी जा रही है- खासकर, जिन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस होनी है। महाधिवक्ता कार्यालय में कुछ अन्य पोस्ट होल्डर्स की ताकत एजी से कहीं अधिक हो गई है। कुछ विवाद बड़े औद्योगिक-कार्पोरेट घरानों के मुकदमों से भी जुड़े हैं, जिन पर भी मंत्रालय के ताकतवर अफसरों के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था। कुल मिलाकर- हाईकोर्ट परिसर में जितने समूहों में आप खड़े हो जाएं- एक नई अटकल- एक नया दावा सामने आ रहा है। यह सब इसलिये हो रहा है कि इस्तीफे में कोई कारण नहीं दर्शाया गया। निजी कारणों से- जैसी कुछ प्रचलित पंक्ति लिख दी गई होती तो शायद गुबार कम उठता।
फ्यूज बल्ब और इतिहास
बिहार चुनाव के नतीजे क्या आए, छत्तीसगढ़ में अरसे बाद फ्यूज बल्ब की याद ताजा हो गई। फ्यूज बल्ब शब्द का उपयोग पहली बार तत्कालीन सांसद रमेश बैस ने 2014 के संसदीय चुनाव में किया था। बैस ने यह शब्द, कांग्रेस की ओर से घोषित अपनी प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी छाया वर्मा के लिए कहा था। इसका इतना असर हुआ कि कांग्रेस ने अगले दो तीन दिन में प्रत्याशी बदलकर सत्यनारायण शर्मा को बी फार्म दिया। फिर भी कांग्रेस हार टाल नहीं पाई, और बैस ने सत्यनारायण शर्मा को करीब पौने 2 लाख वोटों के अंतर से हराया था। बहरहाल राजनीतिक बयानों में अब फिर फ्यूज बल्ब सुना गया।
इस बार सीएम विष्णु देव साय ने तीन दिन पहले ही केवल एक प्रत्याशी के लिए नहीं पूरी कांग्रेस के लिए इस्तेमाल किया है। बिहार में करारी हार का सामना करने के लिए कांग्रेस और समूचे विपक्ष की तुलना फ्यूज बल्ब से की है। दरअसल, सीएम ने विपक्ष द्वारा हार के लिए एफआईआर, केंचुआ और ईवीएम पर विपक्षी लांछन पर पलटवार किया था। फिर क्या था भाजपा के साथ कांग्रेस में भी नेता-कार्यकर्ता फ्यूज बल्ब का इतिहास याद करने लगे।
ये शिक्षक बनेंगे, बच्चों के आंख, कान, नाक?
बलरामपुर जिले के मचांदांड कोगवार प्राथमिक स्कूल में सहायक शिक्षक प्रवीण टोप्पो बच्चों को गलत अंग्रेजी स्पेलिंग पढ़ाते हुए पकड़े गए। वीडियो में उन्हें नाक के लिए एनओजीई, कान के लिए ईएआरई और आंख के लिए आईईवाई लिखते और पढ़ाते हुए देखा गया। इतना ही नहीं, वह सप्ताह के दिनों और परिवार से जुड़े साधारण शब्दों की सही वर्तनी भी नहीं बता सका।
वीडियो वायरल होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने शिक्षक को निलंबित कर दिया है। स्कूल में कुल 42 बच्चे पढ़ते हैं और दो शिक्षक हैं। अब एक के निलंबन के बाद बच्चों की पढ़ाई और भी प्रभावित होने की आशंका है। छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के कई हिस्सों में ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं। शिक्षक या तो गलत पढ़ा रहे थे या उन्हें खुद मूलभूत भाषा ज्ञान की कमी थी। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में भी इसी तरह की गलतियों के लिए शिक्षकों पर कार्रवाई हुई है। यह घटनाएं बताती हैं कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और निगरानी की कमी का है।
छत्तीसगढ़ में शराब पीकर स्कूल पहुंचने वाले शिक्षकों पर भी कार्रवाई होती है और गलत पढ़ाने वाले पर भी, क्योंकि दोनों ही बच्चों के भविष्य के लिए समान रूप से खतरा हैं। दोनों ही तरह के शिक्षक बच्चों को ही नहीं समाज को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। मगर, निलंबन एक ऐसा इलाज है जो मर्ज तो खत्म नहीं करता- लोगों का गुस्सा तात्कालिक रूप से कम कर देता है। कठोर कार्रवाई, सख्त मॉनिटरिंग, नियमित मूल्यांकन और प्रशिक्षण की जिम्मेदारी तो व्यवस्था के कंधे पर है।
प्रवचन की मेहरबानी

राजधानी रायपुर के सबसे पुराने गुढिय़ारी बाजार इलाके के रहवासी, और कारोबारी परेशान हैं। दरअसल, पीडब्ल्यूडी ने गुढिय़ारी पहाड़ी चौक से रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म सात तक सडक़ 70 फीट चौड़ी करने की योजना बनाई है। ताकि इस भीड़ भाड वाले इलाके में रोजमर्रा की ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात मिल सके। परेशानी चौड़ीकरण से नहीं बल्कि जिस तरीके से नगर निगम ने नोटिस थमाई है, उससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है।
नगर निगम ने करीब एक किमी सडक़ चौड़ीकरण के लिए 27 मकान-दुकानों को हटाने के लिए नोटिस जारी किया है। चौड़ीकरण के लिए स्थानीय लोग तैयार भी हैं, और अपना हिस्सा देने के लिए तैयार थे। मगर पीडब्ल्यूडी ने चौड़ीकरण के लिए सिर्फ एक ही हिस्से को चिन्हित किया है। नियमत: चौड़ीकरण दोनों तरफ होता है। दूसरे हिस्से को छोडऩे के पीछे वजह यह बताई जा रही है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के मकान-दुकान दायरे में आ रहे थे। इनमें से एक जमीन कारोबारी का भी मकान है, जो कि अपने धार्मिक आयोजनों के लिए काफी चर्चा में रहा है।
नोटिस मिलने के बाद प्रभावितों ने निगम अफसरों से पूछताछ की, तो उन्हें बता दिया गया कि प्रस्ताव पीडब्ल्यूडी का है, और जिन मकानों को हटाने का प्रस्ताव है उसकी सूची भी पीडब्ल्यूडी ने भेजी है। चौड़ीकरण प्रस्ताव से प्रभावित लोगों ने बकायदा एक मोर्चा बना दिया है, और नगर निगम के साथ-साथ पीडब्ल्यूडी अफसरों पर कानूनी कार्रवाई के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं। बहरहाल, आने वाले दिनों में मामला राजनीतिक रंग भी ले सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
सरगुजा की रेललाइनें
चर्चा है कि सरगुजा की दो रेल परियोजना पर जनप्रतिनिधि बंट गए हैं। अंबिकापुर से रेणुकूट (उत्तर प्रदेश), और अंबिकापुर से बरवाडीह (झारखंड)रेल परियोजना दशकों से अटकी पड़ी है। कई बार सर्वे हो चुका है। उक्त रेल परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सडक़ से लेकर संसद तक आवाज उठ चुकी है। मगर दोनों ही परियोजना कागजों पर ही है। इन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि एकमत नहीं हैं।
अंबिकापुर-रेणुकूट रेल लाइन बिछाने के लिए आंदोलन हुआ था। इस परियोजना के पूरा होने से अंबिकापुर से बनारस, और दिल्ली तक का सफर आसान हो जाएगा। गैरआदिवासी जनप्रतिनिधि रेणुकूट रेल परियोजना के लिए दबाव बनाए हुए हैं, तो आदिवासी जनप्रतिनिधि अंबिकापुर को बरवाडीह से जोडऩे के पक्षधर हैं। सीएम विष्णुदेव साय ने आदिवासी जनप्रतिनिधियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर रेलवे मंत्रालय को चि_ी भी लिखी थी, और केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से चर्चा भी कर चुके हैं, लेकिन यह परियोजना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। इस वजह से रेलवे बोर्ड उक्त परियोजना को लेकर अनिच्छुक है।
बताते हैं कि आदिवासी जनप्रतिनिधियों का सोचना है कि रेणुकूट रेल लाइन से उत्तर प्रदेश से गैर आदिवासी लोगों की आवाजाही बढ़ेगी। जबकि यहां के आदिवासियों की रिश्तेदारी झारखंड में ज्यादा है। ऐसे में अब परियोजना को व्यवहारिक बनाने के लिए बलरामपुर-रामानुजगंज को जोड़ते हुए अंबिकापुर-गढ़वा रोड (झारखंड) का प्रस्ताव दिया गया है। इस परियोजना से कोयले का परिवहन बिहार तक आसानी से हो सकेगा। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज इस परियोजना पर विशेष रुचि दिखा रहे हैं। सबकुछ ठीक रहा, तो सरगुजा के आदिवासी जनप्रतिनिधियों की मांग पूरी हो सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
संजय नाम में गड़बड़ी
संजय (संस्कृत में इसका अर्थ है ‘जीत’) या संजय गावलगण प्राचीन भारतीय हिंदू युद्ध महाकाव्य महाभारत के सलाहकार थे। महाभारत में - पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध की एक प्राचीन कहानी - नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र कौरव पक्ष के प्रमुखों के पिता थे। सारथी गावलगण के पुत्र संजय, धृतराष्ट्र के सलाहकार और उनके सारथी भी थे। संजय ऋ षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के शिष्य थे और अपने गुरु राजा धृतराष्ट्र के प्रति अत्यधिक समर्पित थे। संजय - जिसके पास घटनाओं को दूर या दिव्य दृष्टि से देखने का उपहार था, धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के चरम युद्ध में कार्रवाई बताता रहा। ये तो हुई महाभारत की बात।
अब आधुनिक राजनीति में भी संजयों ने महाभारत मचा रखा है। सबसे पहले संजय गांधी ने कांग्रेस और गांधी परिवार में। फिर आप पार्टी के संजय सिंह ने और अब आरजेडी के संजय यादव ने। दिल्ली में आप पार्टी की सरकार में हुआ शराब घोटाला संजय सिंह के इर्द-गिर्द घूमती है। जो दो बार की सरकार के पतन का कारण बना। और बिहार के संजय यादव ने तो लालू यादव परिवार में ही खलबली मचा दी है। यहां भी एक ‘संजय’ ने दिल्ली तक हलचल मचा दी है। यहां के ‘संजय’ का नाम निजी मेडिकल कॉलेज की मान्यता घोटाले में प्रमुखता से उछला है। मामले की सीबीआई जांच चल रही है। ये अलग बात है कि इस ‘संजय’ का अभी तक बाल बांका तक नहीं हुआ। इस क्रोनोलाजी को देख कर यही कहा जा सकता है कि ‘संजय’ टारगेटेड काम ही करते हैं।
गृह मंत्री को खुली चुनौती का मतलब?

छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के अध्यक्ष अमित बघेल के बाद अब करणी सेना चर्चा में आ गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व बीएसएफ जवान डॉ. राज शेखावत ने विवादों से घिरे एक मामले को उठाया है, जो इस चर्चा की वजह है। अनेक संगीन मामलों में रायपुर पुलिस ने जिस वीरेंद्र सिंह तोमर को गिरफ्तार किया, उसे इस संगठन का उपाध्यक्ष बताया जाता है। शेखावत ने फेसबुक लाइव के जरिये इस गिरफ्तारी को लेकर तूफान खड़ा कर दिया। इसे उन्होंने राजपूत सम्मान के साथ जोड़ दिया है। आरोप लगाया कि तोमर के साथ आतंकवादी जैसा बर्ताव किया गया। एसएसपी और टीआई के घर में घुसकर प्रदर्शन करने की बात कही। पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने, धमकी देने, अश्लील शब्दों का इस्तेमाल करने जैसी धाराओं में शेखावत के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया। मगर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। शेखावत ने एक्स पर गृह मंत्री का मोबाइल नंबर जारी कर दिया है। ‘करणी सैनिकों’ को आदेश दिया है कि वे फोन लगाकर मंत्री से पूछें कि मां करणी के सपूतों को गिरोह कैसे कह दिया? कुछ आपत्तिजनक शब्दों का फिर इस्तेमाल करते हुए कहा है कि वोट के जरिये करारा जवाब दिया जाएगा।
करणी सेना का गठन 19 साल पहले राजस्थान के जयपुर में हुआ था। संगठन मुख्य रूप से राजपूत युवाओं का है, जो समुदाय के सम्मान, इतिहास और अधिकारों की रक्षा का दावा करता है। पहली बार यह चर्चा में तब आया था जब संगठन ने ठीक लोकसभा चुनावों के पहले पद्मावत फिल्म के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन किया था। आरोप लगाया गया था कि राजपूतों की छवि को इस फिल्म में विकृत कर दिया गया है। फिल्म लोकसभा चुनाव निपटने के बाद ही रिलीज हो पाई। ऐसे ही राजपूत सम्मान से जुड़े कई मामलों पर राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश में यह संगठन आंदोलन कर चुका है। छत्तीसगढ़ में राजपूतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, पर अपना वोट बैंक तो उनका है ही। तोमर, जिस पर दर्जनों अपराध दर्ज हैं, उसे समुदाय का योद्धा बताकर पुलिस के लिए चुनौती खड़ी करने का मतलब यह है कि छत्तीसगढ़ में संगठन के विस्तार की रणनीति पर काम हो रहा है। भले ही यहां सरकार भाजपा की क्यों न हो। करणी सेना संगठन दावा करता है कि उसका किसी राजनीतिक दल से कोई नाता नहीं, पर कांग्रेस ने कई बार आरोप लगाया है कि इस संगठन के माध्यम से भाजपा अपने राजनीतिक एजेंडे को साधती रही है। पुलिस अफसरों के बाद सीधे गृह मंत्री को चुनौती देने वाले इस संगठन के मुखिया पर फिलहाल तो एफआईआर ही दर्ज हुई है। सरकार इस नए तनाव से किस तरह निपटेगी- यह देखना होगा।
सहकारी बैंक कर्मी सुप्रीम कोर्ट तक!
प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अधिकारी-कर्मचारी, और सरकार वेतन वृद्धि के मामले आमने-सामने आ गए हैं। कर्मचारी यूनियन वेतन वृद्धि के लिए आंदोलन भी किया था।इस मसले पर हाईकोर्ट का फैसला भी कर्मचारियों के पक्ष में आया है। मगर सरकार ने सालाना वेतन वृद्धि को गैरवाजिब मानते हुए हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका स्वीकृत भी हो गई है। इस पर जल्द सुनवाई होने की उम्मीद है। पहले बैंक कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का आदेश का पालन नहीं होने पर आंदोलन का रुख अख्तियार किया था। एक दिन सारे बंद भी रहे। अगले चरण में धान खरीदी काम ठप करने की रणनीति बनाई थी। धान खरीदी की सारी व्यवस्था जिला सहकारी बैंकों के माध्यम से संचालित होती है। मगर सरकार ने धान खरीदी कार्य को अत्यावश्यक सेवा घोषित कर दिया है। इसके चलते यूनियन ने एक कदम पीछे हटते ही सुप्रीम कोर्ट में ही अपना पक्ष रखने की फैसला किया है। खास बात ये है कि ऐसा पहली बार हुआ है जब राज्य सरकार और कर्मचारी यूनियन के बीच का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। देखना है आगे क्या होता है।
देवेंद्र यादव निशाने पर
बिहार चुनाव नतीजे आने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा में जश्न का माहौल है, तो कांग्रेस में मायूसी है। बिहार में भिलाई के विधायक देवेंद्र यादव को अहम जिम्मेदारी संभाल रहे थे, और नतीजे उलट आए, तो बिहार कांग्रेस के नेताओं का गुस्सा देवेन्द्र यादव पर फट पड़ा है।
बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता आदित्य पासवान पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावारू, और प्रभारी सचिव देवेंद्र यादव को सीधे-सीधे निशाने पर लिया है। उन्होंने कह दिया कि पार्टी की टिकट बेच दी गई थी। पासवान ने देवेन्द्र यादव को फ्राड तक करार दिया है। पार्टी के प्रवक्ता के आरोपों से हलचल मची है। देवेन्द्र यादव तो नतीजे आने से एक दिन पहले तक महागठबंधन की सरकार बनने का दावा कर रहे थे, और अब उन्हें बिहार के नेता कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
बिहार में में कांग्रेस मात्र 6 सीट जीत पाई है। जबकि इससे पहले के चुनाव में 19 विधायक चुनकर आए थे। जहां तक देवेन्द्र यादव का सवाल है, तो उन्हें छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा रही है, लेकिन बिहार में पार्टी के प्रदर्शन से उनकी उम्मीदों को झटका लग सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
मंत्री को पसंद का निज सहायक नहीं मिला
मंत्रियों के आसपास रहने वालों और उनके परिवारों को कई तरह से लाभ पहुंचाया जा सकता है। स्वेच्छानुदान की राशि वास्तव में जरूरतमंदों को मिलनी चाहिए, लेकिन कई मंत्री–विधायक इस सुविधा का उपयोग अपने नजदीकी लोगों के लिए करते आए हैं। यह तो अस्थायी व्यवस्था होती है, लेकिन कई बार स्थायी रूप से उपकृत करने के प्रयास भी सामने आ जाते हैं। इसी दौरान कभी–कभी मंत्री के दफ्तर से ऐसे फरमान भी जारी हो जाते हैं, जो नियमों के दायरे में नहीं आते और अफसरों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है।
हाल ही में ऐसा ही मामला मंत्री राजेश अग्रवाल की एक सिफारिश को लेकर सामने आया। मंत्री ने अपने निजी सहायक के रूप में तबरेज आलम की संविदा नियुक्ति के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र भेजा। लगभग 15 दिन की समीक्षा के बाद विभाग ने पाया कि यह नियुक्ति नियमों के अनुसार संभव नहीं है। विभाग ने मंत्री के विशेष सहायक को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि इस पद पर कम से कम 12वीं पास व्यक्ति ही रखा जा सकता है, जबकि आलम केवल आठवीं पास हैं। अवर सचिव की ओर से बता दिया गया कि यह नियुक्ति नहीं हो सकती, कृपया मंत्री को अवगत कराएं।
प्रदेश में बेरोजगारी की हालत यह है कि ड्राइवर और भृत्य जैसे पदों के लिए भी उच्च शिक्षित युवा कतार में खड़े हैं। इसके बावजूद मंत्री ने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता न रखने वाले युवक को निजी सहायक बनाने की अनुशंसा कर दी। बताया जा रहा है कि वह युवक मंत्री का ड्राइवर है।
ऐसा मामला पहले भी सामने आ चुका है। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान, फरवरी 2019 में, मंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद डॉ. प्रेमसाय टेकाम ने अपनी पत्नी डॉ. रमा सिंह को विशेष सहायक नियुक्त करने का आदेश जारी करा दिया था। जब आलोचना बढ़ी तो वह नियुक्ति रद्द कर दी गई और उन्हें मूल विभाग वापस भेज दिया गया। लेकिन इस बार मामला अलग इसलिए है क्योंकि अफसरों ने पहले ही मंत्री की मांग मानने से मना कर दिया।
हजार रुपये में एक लीटर दूध !
छत्तीसगढ़ के जशपुर में इन दिनों एक अनोखी बछिया चर्चा का केंद्र बनी हुई है। कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रिया से पैदा हुई पुंगनूर नस्ल की इस बछिया को देखने लोग लगातार पहुंच रहे हैं। पुंगनूर दुनिया की सबसे छोटी गाय मानी जाती है। इसी नस्ल की गाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास भी है।
जशपुर जिले के गोढ़ीकला और करमीटिकरा–करूमहुआ गांव में यह बछिया एक नवंबर को जन्मी। पशुपालक खगेश्वर यादव बताते हैं कि उन्होंने पीएम मोदी के पास यह नस्ल देखकर प्रेरित होकर अपनी देशी गाय में ब्रीडिंग कराई थी।
पुंगनूर नस्ल आंध्रप्रदेश के चित्तूर क्षेत्र की है और कभी खत्म होने के कगार पर थी। 1997 में सिर्फ 21 गायें बची पाई थीं। अब सरकारी प्रयासों के बाद इनकी संख्या बढक़र 13,000 से ज्यादा हो चुकी है। यह नस्ल जितनी दुर्लभ है, उतनी ही लोकप्रिय और महंगी भी। इसकी ऊंचाई केवल 3 फीट के आसपास होती है और वजन 115-200 किलो तक। सींग छोटे, कान पीछे की ओर झुके हुए और पूंछ जमीन तक। यही इसकी खूबसूरती मानी जाती है। इन गायों की कीमत 2 से 10 लाख रुपये के बीच होती है। कारण भी खास है। इनका दूध ए-2 कैटेगरी का होता है, जिसमें वसा लगभग 8 प्रतिशत पाया जाता है। यही वजह है कि इसका दूध 1000 रुपये लीटर में और घी 50,000 रुपये किलो तक बिकता है। दूध कम मिलता है, लेकिन पोषण और औषधीय गुण बेहद अधिक। इस नस्ल के गोमूत्र में भी एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जिसे किसान फसल पर छिडक़ते हैं। गोबर भी अच्छी कीमत में बिक जाता है। यानी यह गाय दिखने में भले छोटी हो, लेकिन कमाई के मामले में पूरी पावरहाउस है। जशपुर में पैदा हुई यह बछिया ने छत्तीसगढ़ के पशुपालकों के लिए नई संभावना का रास्ता खोला है।
जोगी नितीश के साथ चाय पर
अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री थे। जब भी मंच पर कोई उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री कहता, तो वे तत्काल टोका करते थे, मुझे प्रथम मुख्यमंत्री कहिए। भूपेश बघेल जब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के उद्घाटन के लिए गए थे, तब भी यही वाकया दोहराया गया था।
भले ही उनकी प्रतिमा प्रदेश में कहीं स्थापित नहीं हो पाई। यहां तक कि उनके अपने गांव-घर में भी नहीं। लेकिन छत्तीसगढ़ को जानने समझने वालों के बीच जोगी हर समय मौजूद हैं- कटु आलोचक और प्रशंसक- सब तरह के लोग हैं। उनके बेटे, पूर्व विधायक अमित जोगी ने बिहार में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाले मुख्यमंत्री नितीश कुमार के साथ स्व. अजीत जोगी की एक तस्वीर आज सोशल मीडिया पर साझा की है।
भूपेश राहुल की गजब जोड़ी

बिहार विधानसभा चुनाव, और राज्यों के उपचुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल बिहार में पार्टी के पर्यवेक्षक थे। उनके पास पंजाब का प्रभार भी है। पंजाब में तरनतारन विधानसभा सीट पर उपचुनाव भी हुए, जिसमें कांग्रेस चौथे नंबर पर चली गई। जिस समय चुनाव नतीजे घोषित हो रहे थे, उस वक्त पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह उर्फ राजा बरार रायपुर में थे।
राजा बरार, पूर्व सीएम भूपेश बघेल से उनके निवास पर मिले। दोनों के बीच काफी देर चर्चा हुई। इसके बाद राजा बरार सेंट्रल जेल गए, और वहां पूर्व सीएम के बेटे चैतन्य बघेल से मुलाकात की। उनकी पूर्व मंत्री कवासी लखमा से भी मुलाकात हुई। पूर्व मंत्री लखमा पिछले 10 महीने से जेल में हैं। मुलाकात के बाद राजा बरार मीडिया से बचते रहे, और बात किए बिना निकल गए।
चुनाव में बुरी हार हुई, तो विरोधियों को भूपेश पर हमला बोलने का मौका भी मिल गया। स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने भूपेश पर तीखा हमला बोला, और कहा कि भूपेश बघेल व राहुल गांधी की जोड़ी अद्भुत है। ये जहां भी जाते हैं, वहां बचा खुचा भी साफ कर देते हैं। इन बयानों से परे पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष की पूर्व सीएम भूपेश बघेल से मीटिंग की पार्टी हलकों में काफी चर्चा हो रही है।
इंदिरा का शुरू किया विभाग मर्ज
प्रदेश में कांग्रेस की पिछली सरकारों की योजनाएं, हितग्राही कार्यक्रम और विभागों को बंद करने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। इस बार राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के दो माह पहले लिए गए निर्णय अनुसार बीस सूत्रीय कार्यक्रम को पृथक रूप से बंद कर उसे आर्थिक योजना सांख्यिकी विभाग में मर्ज कर दिया है। यानी अब 20 सूत्रीय कार्यक्रम अलग से संचालित नहीं होंगे। दरअसल ये 20 सूत्रीय कार्यक्रम 1974-1978 के दौरान तत्कालीन इंदिरा गांधी (भारत) सरकार ने पांचवीं पंचवर्षीय योजना में बीस सूत्री कार्यक्रम शुरू किया था। और इस कार्यक्रम में पहली बार 1982 और फिर 1986 में संशोधन किया गया।
बीस सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन विभाग नहीं, बल्कि यह एक कार्यक्रम है जिसकी निगरानी के लिए भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा समितियों और विभागों का गठन किया जाता है। इसका उद्देश्य गरीबी उन्मूलन और आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार करना है। भारत सरकार में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय केंद्रीय स्तर पर इसकी निगरानी करता है।
राज्यों में, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली बीस सूत्रीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समितियां होती हैं, और संबंधित विभागों जैसे कि आर्थिक एवं सांख्यिकी संचालनालय इसके क्रियान्वयन की समीक्षा करते हैं। इसके लिए पृथक से मंत्री (श्याम बिहारी जायसवाल) भी बनाए जाते रहे। अब यह वित्त मंत्री के अधीन होगा। राज्य सरकार ने केंद्र के फैसले का अनुमोदन किया है।इसी तरह से सार्वजनिक उपक्रम विभाग को भी उद्योग विभाग में मर्ज कर दिया गया है। निकट भविष्य में युवक कार्यक्रम और खेल विभाग भी केवल खेल विभाग कहलाएगा। यह निर्णय लेकर केंद्र ने सभी राज्यों को अनुमोदन के लिए भेजा है।
छत्तीसगढ़ में बिहार की ख़ुशी बिखरी
बिहार में जीत से भाजपा में जश्न का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय से लेकर पार्टी के कई प्रमुख नेता बिहार में चुनाव प्रचार के लिए गए थे। नतीजे अच्छे आए हैं, तो पार्टी नेताओं का खुश होना स्वाभाविक है। प्रदेश भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल तीन महीने बिहार में कैंप किया। वो संगठन का काम देख रहे थे। उन्हें एनडीए के 50 सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसमें से 25 सीटें भाजपा की थी।
जिन 50 सीटों पर जम्वाल को जिम्मेदारी मिली थी। उनमें से 45 सीट एनडीए जीतने में कामयाब रही। भाजपा तो सभी 25 सीटें जीत गई। इसी तरह रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल को दो विधानसभा हाजीपुर, और लालगंज सीट की जिम्मेदारी दी गई थी। दोनों ही सीट कठिन मानी जा रही थी। बृजमोहन करीब 18 दिन दोनों जगहों में बूथ प्रबंधन का काम संभाला, और प्रचार खत्म होने तक डटे रहे। लालगंज में तो भाजपा प्रत्याशी संजय कुमार सिंह के मुकाबले बाहुबली पूर्व सांसद मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला चुनाव मैदान में थी। मगर दोनों ही सीट पर भाजपा को बड़ी जीत हासिल हुई।
छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन 52 हजार से अधिक वोटों से जीत हासिल की। यह उनकी अब तक की सबसे बड़ी जीत है। जीत के बाद नबीन और बिहार के अन्य नेताओं ने यहां प्रदेश के नेताओं से चर्चा कर उनकी भूमिका की सराहना की है।
बिहार का नतीजा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए आईना

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर विपक्षी महागठबंधन को करारी शिकस्त दी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो यह हार सिर्फ बिहार की नहीं, बल्कि 2023 में यहां कांग्रेस की करारी पराजय का भी सटीक आईना है। तब वोट चोरी कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, मगर कुछ ठोस और ज्वलंत कारण थे, जिन्होंने मतदाताओं को कांग्रेस से दूर और भाजपा के पक्ष में मजबूती से खड़ा किया, जैसे हर महिला को एक हजार रुपये प्रतिमाह का वादा, जिसने सीधे दिल और जेब दोनों पर असर डाला। और, कांग्रेस अपनी सरकार होते हुए भी यह समझाने में विफल रही कि बेमेतरा की घटना सांप्रदायिक नहीं थी। यह तथ्य तो भाजपा की सरकार आने के लगभग डेढ़ साल बाद अब जाकर सीबीआई ने बताया। मगर, तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था। राहुल गांधी की एच-फाइल्स, वोटर अधिकार यात्रा और महादेवपुरा में कथित वोट चोरी के मुद्दों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ा दिया कि वह मतदाता सूची की अनियमितताओं को उजागर करें। पर कांग्रेसियों से पूछना चाहिए कि उनके कितने बूथ-लेवल एजेंट अब तक फर्जी वोटरों की सूची तैयार कर पाए हैं? टीएस सिंहदेव बेहद मामूली अंतर से हारे। उन्होंने करीब 200 फर्जी वोटरों का दावा किया, मगर अभी तक न चुनाव आयोग में और न अदालत में इसे चुनौती दी। अगर मुद्दा इतना गंभीर था, तो वे खामोश क्यों बैठ गए?
राज्य गठन के बाद से देखें तो 2023 के चुनाव में कांग्रेस को अब तक की सबसे कम सिर्फ 35 सीटें मिलीं। दूसरी ओर भाजपा 54 सीटों पर पहुंच गई। वोट शेयर में दोनों दलों के बीच 10 प्रतिशत से ज्यादा का अंतर दर्ज हुआ। भाजपा का 41 प्रतिशत के मुकाबले कांग्रेस मात्र 29 प्रतिशत पर सिमट गई। क्या इतना बड़ा फर्क सिर्फ वोट चोरी से संभव है? इधर, जमीन पर शून्य, मीडिया में उपस्थित- कांग्रेस नेता बयानबाजी कर रहे हैं कि वोट चोरी से भाजपा ने छत्तीसगढ़ में सरकार बनाई।
हाल का ही मामला देख लें। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए कांग्रेस ने बड़े धूमधाम से साक्षात्कार की कवायद की थी, लेकिन जल्द ही वह रस्सी ढीली पड़ गई। नाम उजागर ही नहीं हो रहे हैं। बृहस्पत सिंह के आरोपों को अलग रख दें कि प्रभारी लोग, नियुक्तियों के नाम पर उगाही कर रहे हैं, तब भी आम कार्यकर्ताओं के मन में सवाल बचा रहता है कि सूची लटकाने में क्या कोई घोटाला हो रहा है ?
कांग्रेस का बड़ा नुकसान यही है कि उसके अधिकतर कार्यकर्ता और नेता अपनी मेहनत पर नहीं, बल्कि विरोधियों की गलतियों पर निर्भर रहते हैं। राजनीति में यह रणनीति ज्यादा देर तक नहीं चलती। मोदी की कितनी ही गारंटियां पूरी नहीं हो पाई हैं, पर कांग्रेस मजबूर कर पा रही है क्या सरकार को कि वह वादा निभाए। बिहार का ताजा नतीजा बता रहा है कि कांग्रेस फिलहाल सालों तक एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में रहने के लिए ही तैयार है।
15 नवंबर: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे को आज ही के दिन दी गई थी फांसी
नयी दिल्ली, 15 नवंबर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को विश्व इतिहास के महानतम नेताओं में शुमार किया जाता है। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए महात्मा गांधी ने जीवनभर अहिंसा और सत्याग्रह का संकल्प निभाया, लेकिन उन्हें आजादी की हवा में सांस लेना ज्यादा दिन नसीब नहीं हुआ।
भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ और 30 जनवरी 1948 की शाम नाथूराम गोडसे ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियां उतार दीं। इस अपराध पर गोडसे को फांसी की सजा सुनाई गई और वह 15 नवंबर 1949 का दिन था, जब उसे फांसी दी गई। यह तथ्य अपने आप में दिलचस्प है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गोडसे महात्मा गांधी के आदर्शों का मुरीद था, लेकिन एक समय ऐसा आया कि वह उनका विरोधी बन बैठा और उन्हें देश के बंटवारे का दोषी मानने लगा।
देश-दुनिया के इतिहास में 15 नवंबर की तारीख में दर्ज अन्य प्रमुख घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है :-
- 1949 : महात्मा गांधी की जान लेने वाले नाथूराम गोडसे और इस अपराध की साजिश में उसका साथ देने वाले नारायण दत्तात्रेय आप्टे को फांसी दी गई।
- 1961 : संयुक्त राष्ट्र ने परमाणु हथियारों पर रोक लगाने का ऐलान किया।
- 1982 : भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनायक नरहरि भावे उर्फ विनोबा भावे का निधन।
- 1988 : अल्जीयर्स में बैठक के दौरान फलस्तीन नेशनल कौंसिल ने पीएलओ के अध्यक्ष यासिर अराफात के निर्देश पर फलस्तीन की आजादी का ऐलान किया।
- 1989 : पाकिस्तान के कराची में वकार यूनुस और सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया।
- 1998 : इराक ने ऐन मौके पर संयुक्त राष्ट्र के हथियार निरीक्षकों को अपने यहां आने की अनुमति दे दी, जिससे वह ब्रिटेन और अमेरिका के हवाई हमले की मार से बच गया।
- 2000 : झारखंड भारत का 28वां राज्य बना।
- 2012 : शी चिनफिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने।
- 2022 : संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की आबादी आठ अरब होने की घोषणा की।
- 2023 : भारत में जम्मू-कश्मीर के डोडा में बस के खाई में गिरने से 37 लोगों की मौत, 19 घायल।
- 2023 : विराट कोहली मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में न्यूजीलैंड के खिलाफ विश्व कप सेमीफाइनल के दौरान अपने आदर्श सचिन तेंदुलकर को पीछे छोड़ते हुए क्रिकेट के इतिहास में 50 एकदिवसीय शतक बनाने वाले पहले बल्लेबाज बन गए।
- 2024: श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की पार्टी ‘नेशनल पीपुल्स पावर’ (एनपीपी) ने संसदीय चुनाव में दो तिहाई बहुमत हासिल किया। (भाषा)
कुत्ता प्रेमियों को चोट !
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुंठपुर में नगर पालिका के एक सरकारी बैनर ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। नगरपालिका सीएमओ के आदेश पर लगाए गए इस बोर्ड में साफ लिखा है- क्षेत्र में खुले में कुत्तों को भोजन कराना मना है। हालांकि, आदेश में उल्लंघन करने पर किसी जुर्माने या कार्रवाई का कोई उल्लेख नहीं है। बैनर सामने आते ही शहर दो हिस्सों में बंट गया है। कुत्ता प्रेमी नागरिकों का कहना है कि यह फरमान अमानवीय है और इससे स्ट्रीट डॉग्स का व्यवहार और ज्यादा आक्रामक हो सकता है। वही दूसरी ओर, कुत्तों के काटने के लगातार बढ़ते मामलों से परेशान लोग इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। इस बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्देश और अहम हो जाता है। कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से कहा है कि स्कूल-कॉलेज, अस्पताल और रेलवे स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। नगर पालिका के इस आदेश के पालन से बैकुंठपुर के कुछ इलाकों में कुत्तों का जमावड़ा कम होने लगा है, लेकिन विरोध की आवाजें भी तेज हो गई हैं। अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इस विवाद को कैसे संभालता है।
गड़े धन की तलाश में डकैती
कोरबा जिले के छोटे से गांव तराईडांड़ में एक किराना दुकानदार के घर पर डेढ़ दर्जन हथियारबंद डकैतों ने आखिर क्यों धावा बोला होगा? इनको कट्टा, चाकू, सब्बल, लाठी और वाहन जुटाने के साथ-साथ पूरी साजिश रचने में भी कम खर्च नहीं आया होगा। आखिरकार, उन्हें घर में मौजूद 11 लोगों को बंधक बनाना था। डकैतों ने ऐसी बेरहमी दिखाई कि महिलाओं और बच्चों तक को नहीं छोड़ा और उनके साथ भी मारपीट की।
पुलिस ने जब मौके का निरीक्षण किया तो पता चला कि पीडि़त परिवार को बंधक बनाने के बाद डकैतों ने घर के अलग-अलग हिस्सों में फर्श खोद डाला। दरअसल, वे गड़ा हुआ धन और आभूषण तलाश रहे थे। कहानी यह सामने आई है कि जिस किसान शत्रुघ्न महंत के यहां डकैती हुई, उनकी बेटी बबीता बचपन से पूर्व मुख्यमंत्री की उप सचिव रही सौम्या चौरसिया के घर पली-बढ़ी है। कोरबा में चौरसिया परिवार ने उसकी पढ़ाई-लिखाई और यहां तक कि विवाह की जिम्मेदारी उठाई।
कोयला लेवी घोटाले और आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच एजेंसियों और अदालतों का सामना कर रहीं सौम्या चौरसिया की करीब 50 करोड़ रुपये की संपत्ति पिछले महीने ही ईओडब्ल्यू ने अटैच की थी। जब्त संपत्ति में कोरबा जिले के सतरेंगा और अजगरबहार की जमीन भी शामिल है।
डकैतों को शायद उन्हें लगा होगा कि अवैध कमाई यहां भी छिपाई गई है। जांच एजेंसी का ध्यान इस छोटे से गांव की तरफ नहीं गया होगा। हालांकि खुदाई से कुछ नहीं मिला, लेकिन घर से करीब 10 लाख के जेवर और डेढ़ लाख रुपये नकद लूटे जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। यह साफ नहीं है कि यह रकम और आभूषण महंत परिवार के ही थे या किसी अन्य की अमानत।
वैसे, इतनी बड़ी संख्या में डकैतों का एक साथ किसी घर में घुसकर दो घंटे तक वारदात अंजाम देना और घटना के तीन दिन बाद भी पुलिस का किसी ठोस सुराग तक नहीं पहुंच पाना, उसकी मुस्तैदी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
ये सडक़ें कब सुधरेंगीं?

कबीरधाम बाईपास का भी देख लिया, सरगुजा का रिंगरोड भी देख लिया। अब इसे देखिये यह है राजधानी रायपुर से बस्तर जाने वाली सडक़ का हाल। केसकाल घाटी की यह सडक़ महीनों से इसी हालत में है। गिट्टी बिछकर पड़ी है, डामर चढऩे के इंतजार में। मरम्मत हो रही है तो कब पूरी होगी, पता नहीं। बजट की कमी से सडक़ अधूरी है या ठेकेदार और अफसरों के बीच ट्यूनिंग नहीं बैठने के कारण। वैसे कल ही पीडब्ल्यूडी के सचिव ने विभागीय अफसरों की बैठक लेकर एक बार फिर दिसंबर तक जर्जर सडक़ों का ‘हर हाल में’ निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया है। देरी करने पर ठेकेदारों पर पेनल्टी लगाने की भी चेतावनी दी है। दो महीने और इंतजार कर लीजिए।
नितिन नबीन का डंका
छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन ने अच्छी खासी मार्जिन से जीत हासिल कर पांचवीं बार विधायक बने हैं। सीएम विष्णुदेव साय और दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव व विजय शर्मा, भी नबीन के प्रचार के लिए बिहार गए थे। छत्तीसगढ़ के दो दर्जन से अधिक नेता, नबीन के विधानसभा क्षेत्र बाकीपुर में प्रचार खत्म होने तक डटे रहे, और अब बिहार में एनडीए को भारी बहुमत मिलने पर यहां खुशियां मनाई जा रही है।
वेतन आयोग पर भ्रम और फैक्ट चैक
8वें केंद्रीय वेतन (रंजना देसाई आयोग) आयोग के गठन के बाद से दिल्ली से अपलोड एक मैसेज रायपुर तक केंद्रीय कर्मियों, पेंशनरों के वॉट्सऐप समेत सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस मैसेज में लिखा है, फाइनेंस एक्ट 2025 के नए नियमों के अनुसार पेंशनर्स अब महंगाई भत्ता (डीए) वृद्धि या भविष्य के पे कमीशन के फायदों के लिए पात्र नहीं होंगे, जिसमें आने वाला 8वां वेतन आयोग भी शामिल है।
इसके बाद यह मतलब प्रचारित हो रहा हैं कि जो लोग पहले ही रिटायर हो चुके हैं, या जनवरी 26 तक रिटायर होंगे उन पर 8 वें वेतन आयोग के फायदे और डीए में बढ़ोतरी लागू नहीं होगी। यह मैसेज सेवारत कर्मचारियों और 67 लाख पेंशनर्स के बीच चिंता बढ़ा दी है। डीओपीटी,और सरकार भी सकते में हैं।
केंद्र सरकार के आधिकारिक फैक्ट चेकर (पीआईबी फैक्ट चेक) ने अपने एक्स अकाउंट पर गुरुवार को एक पोस्ट किया है। इस पोस्ट में स्पष्ट किया है कि यह खबर झूठी है। पीआईबी फैक्ट चेक ने कहा, क्या रिटायर सरकारी कर्मचारी फाइनेंस एक्ट 2025 के तहत डीए वृद्धि और पे कमीशन के फायदे मिलना बंद कर देंगे? वॉट्सऐप पर यह एक मैसेज वायरल हो रहा है जिसमें दावा किया गया है कि केंद्र सरकार ने फाइनेंस एक्ट 2025 के तहत रिटायर कर्मचारियों के लिए डीए बढ़ोतरी और पे कमीशन रिवीजन जैसे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों को बंद कर दिया है। यह दावा फेक है!
दो और आईपीएस केन्द्र में जाएंगे
भारतीय पुलिस सेवा के दो और अफसर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। वो अपने संपर्कों के माध्यम से केंद्र में बेहतर पोस्टिंग की संभावना तलाश रहे हैं। खास बात ये है कि दोनों आईपीएस अफसर, दुर्ग-नांदगांव समेत तीन जिलों में एसपी रह चुके हैं। मगर कुछ समय पहले दोनों को अलग-अलग वजहों से हटा दिया गया था, इसके बाद से वो दोनों नाखुश चल रहे हैं।
एक अफसर की तो केन्द्र सरकार की एजेंसी में पोस्टिंग हो गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उन्हें यहां एसपी बना दिया गया था। हालांकि उनकी पोस्टिंग चुनाव आयोग की अनुशंसा पर हुई थी। सरकार बदलने के बाद भी उनकी हैसियत में कमी नहीं आई। मगर जिले में एक विवाद उन्हें हटा दिया गया। इसके बाद से वो बटालियन में पोस्टेड हैं। सबकुछ ठीक रहा, तो एक महीने के भीतर दोनों केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। इधर, महासमुंद एसपी आशुतोष सिंह की भी सीबीआई में पोस्टिंग हो गई है। राज्य सरकार उन्हें जल्द रिलीव कर सकती है।
दो साल बाद मिनिमम स्पीड 100 !

पिछले सप्ताह हुई लाल खदान रेल दुर्घटना 76 किमी की स्पीड पर हुई थी। उसके बाद यह चर्चा चल पड़ी है कि हमारी ट्रेनों को दुर्घटनाओं से बचाने कम स्पीड पर ही चलाया जाएगा। पर नहीं, रायपुर मंडल के रेल ड्राइवरों ने इसे खारिज करते हैं। उन्होंने रेलवे बोर्ड की पूरी योजना ही बता दी। उनका कहना है कि अभी भारतीय रेलवे की औसत गति 70-90 किमी प्रति घंटा है। और 2027 तक 50 प्रतिशत रेल नेटवर्क पर 100 किमी प्रति घंटा तक बढ़ जाएगी। इसके पीछे मुख्य वजह देश के 50 प्रतिशत रेल लाइनों पर वक्र संशोधन यानी मोड़ (टर्निंग लाइन) को अधिकतम 1.3 डिग्री कम करने के साथ ही रेल लाइनों के दोनों ओर बाड़ लगाए जा चुके हैं।
इतना ही नहीं, ओवर हैड विद्युत लाइनों का 2&25 केवीए तक उन्नयन, रेलवे समतल रोड क्रॉसिंग भी समाप्त किए गए हैं। ऐसे उपाय अभी जारी हैं और इनके पूरा होने पर 2050 तक 15,000 किमी रेल लाइन को हाई स्पीड लाइन में बदला जाएगा। 25-30 इको-क्लस्टरों में ट्रेनों की 160-180 किमी प्रति घंटा करते हुए सभी इंजनों को कवच-संरक्षित किया जाएगा। ये सभी रेल मार्ग देश के सभी बंदरगाहों के लिए माल ढुलाई गलियारे बनाते हैं। यह सभी कार्य युद्धस्तर पर जारी है। यह सारे कार्य अगले 60 प्रतिशत तेल उपकर से किए जा रहे हैं।
बिहार के बाद बंगाल
बिहार चुनाव निपटने के बाद प्रदेश भाजपा के कुछ प्रमुख नेताओं को पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार की कमान सौंपी जा सकती है। बंगाल में अगले मार्च-अप्रैल में विधानसभा के चुनाव हैं। प्रदेश भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल करीब तीन महीने बिहार में रहकर चुनाव प्रबंधन को मजबूत करने के काम में लगे थे। जामवाल के साथ-साथ दो दर्जन से अधिक नेता महीने भर से अधिक समय बिहार में डटे रहे।
प्रदेश भाजपा के नेता बिहार से लौट आए हैं। चर्चा है कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय बंगाल में पार्टी संगठन का काम देखने जा सकते हैं। साय के अलावा सरकार के दो-तीन मंत्री भी प्रचार के लिए वहां जा सकते हैं। इसकी सूची बनाई जा रही है। ये सभी नेता अगले चार-पांच महीने बंगाल में रहकर पार्टी प्रत्याशियों के प्रचार में अपनी भूमिका निभाएंगे। वैसे भी छत्तीसगढ़ में हाल फिलहाल में कोई चुनाव नहीं है।
तीन साल बाद वर्ष-2028 में विधानसभा के चुनाव हैं। संगठन में प्रदेश पदाधिकारियों की नियुक्ति हो चुकी है। प्रदेश कार्यकारिणी की सूची जारी होना बाकी है, वो भी पखवाड़े भर के भीतर जारी हो सकती है। ऐसे में यहां के पदाधिकारियों, और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को बंगाल भेजने पर सहमति बनी है। चर्चा है कि प्रदेश के नेता दिसंबर के पहले पखवाड़े में बंगाल कूच कर सकते हैं।
जंगल के जमींदार

प्रदेश के रिटायर्ड आईएफएस अफसर सुनील मिश्रा की नियुक्ति आदेश की प्रशासनिक हलकों में काफी चर्चा हो रही है। पीसीसीएफ स्तर के 94 बैच के अफसर मिश्रा 31 अक्टूबर को रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद उन्हें वन मुख्यालय में ओएसडी के पद पर संविदा नियुक्ति दी गई है। मिश्रा को लैंड मैनेजमेंट का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
सुनील मिश्रा पिछले छह साल से लैंड मैनेजमेंट का प्रभार संभाल रहे हैं। रिटायरमेंट के पहले उन्हें पीसीसीएफ का स्केल मिला था। दिलचस्प बात यह है कि वन मुख्यालय में पहली बार पीसीसीएफ स्तर के अफसर को संविदा पर ओएसडी नियुक्त किया गया है। हालांकि भूपेश सरकार में पीसीसीएफ स्तर के अफसर जेईसी राव को रिटायरमेंट के बाद संविदा पर वन औषधि बोर्ड में सीईओ बनाया गया। उन्हें तीन साल के लिए सीईओ नियुक्त किया गया। मगर सुनील मिश्रा के आदेश में संविदा अवधि की कोई सीमा नहीं है। उन्हें आगामी आदेश तक नियुक्त किया गया है। कुल मिलाकर इस नियुक्ति आदेश पर वन मुख्यालय में कानाफूसी हो रही है।
दीपावली पर एडवांस देने वाले अब ढूंढ रहे
दीपावली बीत गई। अक्टूबर के पहले सप्ताह मिले गिफ्ट, सप्रेम भेंट, सौजन्य भेंट सब खप गए। अब बवाल का इंतजार हो रहा है। यह सब ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए जो लिए गए थे। खबर है कि एक कद्दावर मंत्री के इंजीनियर सहयोगी ने भेंट के नाम पर एडवांस ले लिया। यह तब लिया गया जब उसकी बंगले में पोस्टिंग थी। बाद में उसे हटा दिया गया। और मूल पंचायत विभाग अंबिकापुर लौटा दिया गया। लेकिन वह फिर सक्रिय हो गया है। इसके लिए उसकी विभागीय आला अफसर के साथ द्विपक्षीय बैठक की थी। और फिर विभागीय कामकाज में बराबर दखल बना ली है। इस सहयोगी से दूर रहने वालों ने पड़ताल की तो पता चला ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष पिता के इस इंजीनियर बेटे को मंत्री ने उसे अधिकृत ही नहीं किया था। फिर क्या अब सोने चांदी के सिक्के के रूप में एडवांस देने वाले बंगले में उसे ढूंढ रहे हैं। अब बात धीरे-धीरे फैल रही है। देर सबेर इसको लेकर बवाल होने की आशंका जताई जा रही है। देखना है आगे क्या
होता है।
अपने ही शिक्षक को संभालते मजबूर बच्चे

अनुसूचित जाति बहुत, दिव्यांगों की सर्वाधिक संख्या वाले और आर्थिक रूप से पिछड़े बिलासपुर जिले के मस्तूरी इलाके का उज्ज्वल पक्ष यह है कि यहां का मल्हार गांव पुरातात्विक दृष्टि से देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यहां मां डिडनेश्वरी की 13वीं शताब्दी की प्रतिमा है। पुरातत्व विभाग की खुदाई में बौद्ध, जैन और हिंदू संस्कृति के अनेक अवशेष बिखरे हुए हैं, पर्यटन और शोध का केंद्र है। यहां शिवनाथ, महानदी और खूंटाघाट से सिंचाई की सुविधा मिलती है और बहुफसली खेती की जाती है।
मगर, इस तहसील में शिक्षा और कानून व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हुई है। इस साल जनवरी से लेकर अब तक 9 शिक्षक शराब पीकर स्कूल आने के कारण सस्पेंड कर दिए गए हैं। दो-तीन पहले ही एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें बाइक से गिरे, नशे में धुत शिक्षक हितेंद्र तिवारी को स्कूल परिसर में बच्चे खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। फरवरी 2024 में एक शिक्षक संतोष कुमार केवट शराब के नशे में तो पहुंचा ही, स्टाफ रूम में महिला शिक्षकों के सामने बोतल खोलकर बैठ गया। उसे बर्खास्त कर दिया गया है। ये ऐसी रिपोर्ट्स हैं जो सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने की वजह से सामने आ गई और न्यूज़ पोर्टल में चलने की वजह से शिक्षा विभाग को कार्रवाई करनी पड़ी। मगर, शायद यह वास्तविक संख्या का थोड़ा सा प्रतिशत होगा।
स्कूलों का माहौल ऐसा हो तो असर क्या होता है? प्राथमिक स्तर पर बच्चे गणित और विज्ञान से अधिक नैतिक मूल्यों को सीखते हैं। बच्चे शिक्षकों को आदर्श मानते है। उन्हें लडख़ड़ाते और असहाय देखने से उनके मन में असुरक्षा, भय और अविश्वास की भावना पैदा होती है। आत्मविश्वास गर्त में चला जाता है और अनुशासन के लिए तो जगह ही नहीं बचती। कोमल मस्तिष्क यह भी समझ सकता है कि शिक्षक का शराबी होना एक सामान्य सी बात है। उन्हें नशा आकर्षक लग सकता है। लड़कियों को स्कूल भेजने से अभिभावक डरने लगते हैं। ऐसे में बच्चे क्या सेकेंडरी स्कूल और कॉलेज के लिए तैयार हो पाएंगे? मस्तूरी जैसे अनुसूचित जाति बहुत गरीब इलाके में ड्रॉप आउट की संख्या बढ़ सकती है। मुफ्त शिक्षा के बावजूद वे स्कूल छोडक़र कम उम्र में मेहनत-मजदूरी करने लगेंगे। प्रवासी मजदूरों की सबसे ज्यादा तादाद इसी और इससे लगे जांजगीर-चांपा इलाके में है। शराबी शिक्षक बच्चों और उनके परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्तर ऊंचा उठाने की संभावनाओं को ही खत्म कर रहे हैं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बच्चों और युवाओं को नहीं शिक्षकों की ही काउंसलिंग कराने की जरूरत आ पड़ी है। मस्तूरी ही नहीं, प्रदेश के दूसरे स्थानों पर जहां भी ऐसी शिकायतें आ रही है, सरकार नरमी बरत रही है। इन शिक्षकों सस्पेंड होने की अधिक चिंता नहीं होती। कुछ महीने के बाद दोबारा उसी स्कूल में पढ़ाने के लिए भेज दिए जाते हैं। नए स्कूल शिक्षा मंत्री ने शराबी शिक्षकों को नौकरी से बर्खास्त करने की घोषणा की थी, उस पर अब तक अमल नहीं हुआ है।
किसान की जिद ने हिला दिया प्रशासन को
गरियाबंद जिले के खरीपथरा गांव के किसान मुरहा नागेश ने अपनी पुश्तैनी जमीन के हक के लिए जिस तरह शांतिपूर्ण संघर्ष का रास्ता चुना, उसने आखिरकार प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर दिया। कडक़ती ठंड में परिवार सहित गांधी मैदान में बैठा यह किसान अपनी जमीन वापस पाने के लिए कई दिनों से भूख हड़ताल पर है। नतीजा यह हुआ कि अब प्रशासन को गांव की पूरी जमीन की नाप-जोख शुरू करनी पड़ी है।
दरअसल, 1954 से लेकर 1986 तक के सभी राजस्व रिकॉर्ड में उसकी जमीन 2.680 हेक्टेयर के रूप में दर्ज रही, लेकिन 1990 में बंदोबस्त सुधार के दौरान खसरा क्रमांक बदलने से रिकॉर्ड गड़बड़ा गया।
अब उसी एक खसरे की जगह दो नए क्रमांक (778 और 682) बना दिए गए, और उनमें चार अन्य लोगों के नाम दर्ज हो गए। नतीजा यह हुआ कि मुरहा की पुश्तैनी जमीन पर कब्जा विवाद में आ गया।
पहले उसने इसी तरह धरना दिया बीते तो प्रशासन ने उसे जमीन वापस दिलाई, तो दूसरे पक्ष ने ऊपरी कोर्ट से आदेश पाकर फिर कब्जा कर लिया। अब जब उसने फिर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, तो प्रशासन को मानना पड़ा कि दरअसल, सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में ही गड़बड़ी है।
अब कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने एसडीएम, तहसीलदार, भू-अभिलेख शाखा के अफसरों, आरआई और पटवारियों की 10 लोगों की टीम गठित कर दी है, जो गांव के सभी किसानों की, जिनकी संख्या 350 से अधिक है, के बंटवारे और कब्जे की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करेगी, और उसके बाद मुरहा नागेश को उसके जमीन का हक दिलाया जाएगा।
बीज बोने वाले कुलपति
कल राज्य सरकार द्वारा अंबिकापुर विश्वविद्यालय में नए कुलपति प्रो राजेन्द्र लखपाले की नियुक्ति से चर्चाओं की हलचल बढ़ गई है। सरगुजा विश्वविद्यालय आर्ट्स, कॉमर्स, साइंस संकाय वाला सामान्य विश्वविद्यालय है जहां आम तौर पर अब तक इन्हीं विषयों के शिक्षाविदों की नियुक्ति की जाती रही है। यह नियुक्ति इस परंपरा से हटकर की गई है। वैसे कुलपति के लिए विषय का कोई बंधन नहीं होता।
प्रोफेसर राजेंद्र कृषि और बीज विज्ञानी हैं। उनकी नियुक्ति से एक बात और उल्लेखनीय है कि वे इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के ऐसे तीसरे कृषि विज्ञानी प्राध्यापक हैं जो प्रदेश के ही विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए हैं। इनसे पहले महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, पाटन-दुर्ग के कुलपति प्रोफेसर रवि रत्न सक्सेना हैं। वे विश्वविद्यालय से एक प्रोफेसर और एसोसिएट निदेशक (अनुसंधान) रहे हैं। वैसे उनकी नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर है। और फिर डॉ. गिरीश चंदेल भी हैं। यहां बता दें कि कुलाधिपति व राज्यपाल रमेन डेका उच्च शिक्षा विभाग, और कुलपतियों की बैठकों में कहते रहे हैं कि प्राध्यापकों की पदोन्नतियां न रोकी जाए। ताकि स्थानीय शिक्षाविदों को कुलपति बनने का अवसर मिले। शायद वे यह अपनी समझ या फीड बैक के आधार पर कहते रहे हैं क्योंकि पूर्ववर्ती सरकारों में बाहरी शिक्षाविदों के कुलपति बनकर आने की बहुतायत रही है।
बर्खास्तगी खत्म होने के आसार नहीं
प्रदेश में एनएचएम कर्मियों की हड़ताल महीने भर चली, और सीएम विष्णुदेव साय की दखल के बाद सितंबर के आखिरी में हड़ताल खत्म भी हो गई। इसी बीच हड़ताली 25 अफसर-कर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था। हड़ताल खत्म हुए महीने भर से अधिक हो गए हैं, लेकिन बर्खास्त कर्मियों की वापसी नहीं हो पाई है। चर्चा है कि स्वास्थ्य मंत्री, बर्खास्त कर्मियों की वापसी के पक्षधर हैं, लेकिन विभागीय अफसर तैयार नहीं हैं।
बताते हैं कि एनएचएम नेताओं को बर्खास्त कर्मियों की बहाली का आश्वासन दिया गया था। पहले दिवाली, और फिर राज्योत्सव तक रुकने के लिए कहा गया। अब सब कुछ निपट गया है। कर्मचारी नेता अपने साथियों की बहाली के लिए दबाव बनाए हुए हैं। बर्खास्त अधिकारी-कर्मचारी अलग-अलग जिलों के हैं।
विभागीय अफसरों का कहना है कि ये सभी अपने-अपने जिलों में हड़ताल की अगुवाई कर रहे थे। उनकी वजह से ही हड़ताल महीनेभर खिंच गई। कर्मचारी नेता, अपने साथियों की बहाली के लिए अड़े हुए हैं। संकेत है कि अगले कुछ दिनों में बहाली नहीं होती है, तो एक फिर 16 हजार एनएचएम कर्मचारी हड़ताल पर जाने की रणनीति बना सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
ठिकाना बनाएगा या यह बाघ भी भटकेगा?
1976 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत स्थापित छत्तीसगढ़ का बार नवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। बलौदाबाजार जिले में फैला यह 245 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र मैदानी और पहाड़ी इलाकों का संगम है। यहां साल, सागौन और बांस के घने जंगल हैं, जो महानदी की सहायक नदियों जोंक और बालमदेही से सींचे जाते हैं। अभ्यारण्य में गौर, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, चीतल, सांभर, जंगली सुअर और 150 से अधिक पक्षी प्रजातियां जैसे मोर, बुलबुल, बगुले हैं। पर्यटक इन दिनों इस सुहावने मौसम में जंगल सफारी का आनंद ले रहे हैं।
8 नवंबर 2025 को बलौदा बाजार के बार नवापारा क्षेत्र में एक बाघ फिर से दिखा। एडिशनल पीसीसीएफ मथेश्वरन के अनुसार, यह बाघ गरियाबंद जिले के सीता नदी उदंती टाइगर रिजर्व से पहुंचा है। सीसीटीवी फुटेज में कैद यह नया मेहमान अभ्यारण्य के जंगलों में इत्मीनना से विचरण करता दिख रहा है।
बाघों की मौजूदगी जैव विविधता को मजबूत करती है। दो वर्ष पहले 2023 में भी एक युवा बाघ उड़ीसा (ओडिशा) से बार नवापारा पहुंचा था। वह बिना किसी साथी मादा के भटकता रहा। वन विभाग ने उसके लिए मादा बाघ लाने का प्रयास नहीं किया, जिससे वह आगे बढ़ गया। बाद में अचानकमार टाइगर रिजर्व, अमरकंटक और शहडोल जैसे क्षेत्रों में घूमता नजर आया। बाघ अनुकूल आवास की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर तय करने के अभ्यस्त होते हैं। मार्च 2024 में एक अन्य नर बाघ महासमुंद रूट से आया और आठ महीने तक यहां रहा, अपना इलाका बना लिया। अब यह नया बाघ अभ्यारण्य को टाइगर हॉटस्पॉट बना रहा है। मगर, बाघों का बढ़ता प्रवास जलवायु परिवर्तन, शिकार और उनके पारंपरिक ठिकाने के ह्रास का संकेत भी है। बार नवापारा यदि बाघों को सुरक्षित आश्रय लग रहा है तो क्या उन ठिकानों में उनके लिए आहार और विचरण की पर्याप्त जगह नहीं है, जहां से वे भटक रहे हैं। कहीं इस बाघ को भी सैकड़ों किलोमीटर भटकना न पड़े, जैसा पहले के बाघ ने किया। फिलहाल तो प्रकृति प्रेमियों के लिए बार नवापारा का आकर्षण बढ़ गया है, वहीं वन अफसरों और मैदानी अमले की जिम्मेदारी भी।
पुराने साथियों से परिचय

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा रायपुर आए, तो सांसद बृजमोहन अग्रवाल के घर भी गए। बृजमोहन का सिन्हा से काफी पुराना परिचय है। दोनों युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में साथ काम कर चुके हैं। सिन्हा का बृजमोहन अग्रवाल के परिवार के सदस्यों ने स्वागत किया। इस मौके पर पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, और रायपुर शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर भी थे। बृजमोहन ने अपने स्टाफ के सदस्यों से भी उपराज्यपाल सिन्हा का परिचय कराया। अपने निज सचिव मनोज शुक्ला का परिचय देते हुए बृजमोहन ने सिन्हा को बताया कि मनोज 35-40 साल से उनके साथ हैं। इसके बाद उन्होंने अपने ड्राइवर अर्जुन का भी परिचय कराया, और कहा कि अर्जुन भी उनके साथ 45 साल से जुड़े हैं। उपराज्यपाल ने इस पर खुशी जताई, और कहा कि उनके स्टाफ के लोग भी 40-45 साल से जुड़े हैं। एक बार साथ आए, तो फिर छोडक़र नहीं गए। सिन्हा ने पारिवारिक माहौल में सबका हालचाल लिया, और फिर अजय चंद्राकर व रमेश ठाकुर की जम्मू कश्मीर के हालात को लेकर जानकारी दी। उन्हें कहा कि कश्मीर एकदम शांत है, और आप लोग निश्चिंत होकर घूमने आ सकते हैं।
हवाई मुसाफिरों को न्यू ईयर गिफ्ट

न्यू ईयर या न्यू फाइनेंशियल ईयर से अब एयर ट्रेवल्स भी ट्रेनों की तरह टिकट कैंसिल कर सकेंगे। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने इस पर एक प्रस्ताव का प्रारूप अपने वेबसाइट पर जारी किया है। इस पर 30 नवंबर तक सुझाव मांगे हैं, उसके बाद अंतिम नीति जारी की जाएगी। इसे लेकर देश के प्रमुख हवाई सेक्टर छत्तीसगढ़ में भी हलचल बढ़ गई है। ट्रैवल एजेंट और यात्रियों ने अपने सुझाव, अपलोड करने लगे हैं। महानिदेशालय ने अपने ड्राफ्ट में सबसे अहम प्रस्ताव में कहा है कि अगर कोई यात्री टिकट बुक करने के बाद 48 घंटे के अंदर उसे रद्द या संशोधित करना चाहता है, तो एयरलाइन उससे कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूल सकेगी। हालांकि, अगर यात्री अपनी फ्लाइट की तारीख या समय बदलता है, तो उसे नई फ्लाइट का प्रचलित किराया देना होगा। यह सुविधा केवल उन्हीं टिकटों पर लागू होगी जो घरेलू उड़ानों के लिए बुकिंग के पांच दिन बाद या अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए बुकिंग के 15 दिन बाद निर्धारित हैं। यानी इस अवधि के भीतर है, तो यात्री इस सुविधा का लाभ नहीं ले पाएगा। अगर किसी यात्री के नाम की स्पेलिंग बुकिंग के दौरान गलत हो जाती है और वह इसे 24 घंटे के भीतर सुधारना चाहता है, तो एयरलाइन कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लेना चाहिए। यह भी प्रस्ताव है कि क्रेडिट कार्ड से टिकट खरीदने वाले यात्रियों को टिकट रद्द होने के सात दिन के भीतर रिफंड , कैश पेमेंट पर रिफंड तुरंत, एजेंट से खरीदी टिकट का रिफंड की सारी प्रक्रिया और पेमेंट 21 कार्य दिवसों के भीतर पूरी हो जाए। यह भी प्रस्ताव है कि एयरलाइन को बुकिंग के समय कैंसिलेशन चार्जेज को स्पष्ट रूप से दिखाना चाहिए, ताकि यात्रियों को पता रहे कि कितना शुल्क कटेगा।
कैंसिलेशन चार्ज बेसिक किराए और फ्यूल सरचार्ज से अधिक नहीं वसूल सकते। एयरलाइंस रिफंड प्रोसेसिंग फीस के नाम पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूलें। विदेशी एयरलाइंस भी अपने देश के नियमों के साथ-साथ भारत के सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट के तहत रिफंड मानदंडों का पालन करना होगा। यह कदम भारत में एविएशन सेक्टर में उपभोक्ता अधिकारों की दिशा में एक बड़ा सुधार साबित हो सकता है।
घर लौटे, मगर बेघर ही रह गए
करीब दो दशक पहले बस्तर के बीजापुर जिले से शुरू हुआ सलवा जुडूम आंदोलन अपने साथ ऐसी हिंसा लाया, जिसने सैकड़ों गांवों को उजाड़ दिया। लगभग 600 गांवों के करीब एक लाख से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो गए और पड़ोसी राज्यों में शरण लेने को मजबूर हुए।
अब वर्षों बाद, इनमें से कई लोग अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। उन्हें लगता है कि सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और नक्सली धड़ों के आत्मसमर्पण से माओवादी हिंसा का दौर अब खत्म होने की कगार पर है। मगर, घर लौटने वालों को यह उम्मीद जब हकीकत से टकरा रही है, तो पता चल रहा है कि उनके अपने घर, खेत और बाड़ी अब उनके नहीं रहे।
पड़ोसी राज्यों से लौटे भैरमगढ़ ब्लॉक के कई ग्रामीणों को यहां आने पर पता चला कि उनकी जमीनें बेच दी गई हैं। ये जमीनें रायपुर के कुछ उद्योगपतियों के नाम दर्ज हो चुकी हैं। पता चला है कि रायपुर की तीन कंपनियां, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और इस्पात कारोबार से जुड़ी हैं-के डायरेक्टर्स के नाम पर करीब 120 एकड़ जमीन का नामांतरण कर दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने न कोई सौदा किया, न कोई रजिस्ट्री कराई। इनमें से ज्यादातर भूमि तो आदिवासी लैंड है, जिसे कानूनन गैर-आदिवासियों को बेचा ही नहीं जा सकता। अब ये ग्रामीण तहसीलदार और एसडीएम के दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। यह जानने के लिए कि उनकी जमीन कब और कैसे बिक गई?
अधिकारियों का भी कहना है कि कुछ न कुछ गड़बड़ी जरूर हुई है, क्योंकि जब मालिक स्वयं मौजूद नहीं थे, तो भूमि नामांतरण संभव ही नहीं होना चाहिए था। जांच के आदेश दिए गए हैं, लेकिन फिलहाल इन लोगों के लिए हकीकत यही है कि वे घर लौटे जरूर, पर अब भी बेघर हैं।
यह मामला एक बड़ा संकेत है कि बस्तर में नक्सल हिंसा समाप्त होने का अर्थ हर किसी के लिए अलग है। जहां स्थानीय समुदाय शांति, शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़ और पुल जैसी मूलभूत सुविधाओं की उम्मीद कर रहा है, वहीं बाहरी निवेशक यहां की कीमती जमीन, जंगल और खनिज संसाधनों के दोहन का अवसर देख रहा है।
बृहस्पति के हमले के आगे-पीछे

कांग्रेस के पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह ने जिलाध्यक्ष बनाने के लिए प्रभारी सचिव जरिता लैटफलांग पर पैसे मांगने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है। इससे कांग्रेस में नाराजगी देखी गई है। अंबिकापुर में तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बृहस्पति सिंह के खिलाफ थाने में शिकायत भी दर्ज कराई है। जहां तक बृहस्पति सिंह का सवाल है, तो वो फिलहाल कांग्रेस से निष्कासित हैं, और माफीनामा देने के बाद भी उनकी पार्टी में वापसी नहीं हो पाई है। और अब उनके ताजा आरोप के बाद पार्टी में वापसी की संभावना फिलहाल खत्म होते दिख रही है।
इससे परे बृहस्पति सिंह के आरोपों को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है। जरिता लैटफलांग, जिलाध्यक्षों के चयन में सीधा कोई रोल नहीं है। बावजूद इसके उन पर आरोप लगाए जाने पर कई तरह की चर्चा चल रही है। दरअसल, पार्टी ने तीनों प्रभारी सचिव जरिता लैटफलांग, सुरेश कुमार, और विजय जांगिड़ को अलग-अलग संभागों का प्रभारी बनाया है। जरिता सरगुजा संभाग में पार्टी संगठन का काम देख रही हैं। वो काफी मेहनत भी कर रही हैं।
पिछले महीने पार्टी ने सरगुजा के अलग-अलग जिलाध्यक्षों के चयन के लिए झारखंड के पूर्व पीसीसी अध्यक्ष राजेश ठाकुर, और विकास ठाकरे को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। जरिता, पूरे समय पर्यवेक्षक के साथ रहीं। पर्यवेक्षक ने अंबिकापुर, सूरजपुर, और बलरामपुर जिलाध्यक्षों के लिए पैनल हाईकमान को भेज दिया है। चर्चा है कि पार्टी पर्यवेक्षक की राय पर पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की पसंद को तवज्जो दे सकती है। यानी अंबिकापुर से बालकृष्ण पाठक, और बलरामपुर जिले से के पी सिंहदेव का नाम फाइनल कर सकती है। ये सभी बृहस्पति सिंह के विरोधी माने जाते हैं।
जग्गी हत्याकांड का भूत फिर जोगी पर
बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित को बरी करने के खिलाफ सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली है, और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जाने की अनुमति दे दी है। हाईकोर्ट इस पर सुनवाई करेगा, और इसमें अमित जोगी को पक्ष रखने का भी मौका होगा।
एनसीपी के तत्कालीन कोषाध्यक्ष रामअवतार जग्गी की वर्ष-2003 में हत्या हुई थी। पुलिस ने पहले प्रकरण दर्ज किया, और फिर सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई ने प्रकरण की जांच की। इस प्रकरण पर अमित जोगी व अन्य 28 लोगों को आरोपी बनाया गया। उनके खिलाफ हत्या, और साजिश रचने का आरोप लगा।
सीबीआई की टीम जम्मू-कश्मीर कैडर के आईपीएस अफसर जावेद गिलानी की अगुवाई में यहां डटी रही। उनके साथ सीबीआई के एडिशनल एसपी ए.पी.कौल ने भी भूमिका निभाई, और अमित जोगी व अन्य 28 लोगों को आरोपी बनाया। हालांकि सेशन कोर्ट ने अमित जोगी के खिलाफ सुबूतों की कमी मानते हुए बरी कर दिया, मगर बाकियों को सजा हुई। ये अलग बात है सीबीआई ने उस समय भी मीडिया से चर्चा मेें अमित जोगी को बरी करने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने की बात कही थी, लेकिन इसके लिए अनुमति मिलने में देरी होती गई। इधर, अमित जोगी को बरी करने के खिलाफ रामअवतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी लगातार कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहे। अब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो उन्हें हाईकोर्ट में जाने की अनुमति मिल गई। खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की 1373 दिन की देरी को माफ कर दिया। अब 22 साल पुराने रामअवतार जग्गी हत्याकांड की हाईकोर्ट में सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। जग्गी परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद है। वो अमित को मुख्य साजिशकर्ता मानते रहे हैं। ऐसे में यह प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया।
रेलवे का मुआवजा इतना कम क्यों लग रहा है?
बिलासपुर में हुई रेल दुर्घटना में मृतकों के परिजनों के लिए रेलवे ने 10 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की, तो कांग्रेस नेताओं और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुआवजा बढ़ाने की मांग उठाई। किसी ने एक करोड़ रुपये, तो किसी ने 50 लाख रुपये तक देने की मांग की। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने आरोप लगाया कि मुआवजा राशि न देनी पड़े, इसलिए रेलवे ने मृतकों की वास्तविक संख्या छिपाई है।
इस दुर्घटना में कई परिवारों ने अपने कमाने-खाने वाले सदस्यों को खो दिया। कुछ युवा थे, जिनसे परिवार को आने वाले वर्षों में सहारे की उम्मीद थी। कुछ गृहिणियां और बच्चे भी मारे गए। बावजूद इसके, सभी मृतकों के लिए समान 10 लाख रुपये का मुआवजा घोषित किया गया। गंभीर रूप से घायलों के लिए 5 लाख और सामान्य घायलों के लिए 1 लाख रुपये की सहायता राशि तय की गई है। यह राशि आज के दौर में बेहद कम मानी जा रही है, विशेषकर उन परिवारों के लिए जो इस हादसे के बाद पूरी तरह बेसहारा हो गए।
यह मुआवजा राशि रेलवे अधिनियम 1989 की धारा 124 के तहत दी जाती है। साल 1990 में मृत्यु के मामलों के लिए 4 लाख रुपये का प्रावधान किया गया था, और यह राशि लगभग 19 वर्षों तक वही रही। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर मुआवजा बढ़ाने की मांग की गई। उस समय एक एयरक्रैश हुआ था, जिसमें मृतकों के परिवारों को 75-75 लाख रुपये का मुआवजा मिला था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सरकार को रेलवे का मुआवजा बढ़ाने का निर्देश दिया। वर्ष 2016 में, जब सुषमा स्वराज रेल मंत्री थीं, तब मुआवजा बढ़ाकर 8 लाख रुपये किया गया। यही दर आज भी लागू है, हालांकि रेलवे अपनी ओर से कुछ एक्स-ग्रेशिया जोडक़र प्राय: कुल 10 लाख रुपये देती है।
स्थायी विकलांगता के मामलों में भी मृतकों के बराबर मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन बिलासपुर हादसे में ऐसा कोई मामला रेलवे को नहीं मिला। गंभीर घायलों को 5 लाख रुपये और मामूली घायलों को 64 हजार रुपये निर्धारित हैं, जिन्हें इस मामले में एक लाख रुपये दिए गए। चार नवंबर को ट्रेन पर सवार कई यात्रियों को चोटें आईं, लेकिन घबराहट और बदहवाली के कारण वे अस्पताल में भर्ती न होकर घर की ओर निकल गए। रेल प्रशासन के लिए यह भी एक प्रकार की सुविधा साबित हुई, क्योंकि इससे मुआवजे के दावे घट गए। रेलवे नियमों के अनुसार, अगर दुर्घटना पटरियों को पार करने, अनमैन फाटक पार करने या नियम उल्लंघन के कारण होती है, तो रेलवे की कोई जवाबदेही नहीं होती। इसी तरह, अगर कोई यात्री ट्रेन से चढ़ते या उतरते समय घायल होता है, तो मुआवजा पाने में उसे लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कई मामलों में यह मुकदमे अदालतों में 3-4 साल तक चलते हैं।
आरक्षित टिकट से यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए टिकट के साथ वैकल्पिक बीमा सुविधा उपलब्ध होती है। लेकिन बिलासपुर की इस पैसेंजर ट्रेन में लगभग सभी यात्री जनरल टिकट से सफर कर रहे थे, जिनके लिए कोई बीमा प्रावधान नहीं होता है। रेलवे ने अपने कर्मचारियों के लिए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के साथ अलग से एमओयू किया है, जिसके तहत मृत्यु या स्थायी विकलांगता पर एक करोड़ रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है।
रेलवे ने मुआवजा दरें तब बढ़ाईं जब दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया। हवाई दुर्घटनाओं के मामलों में मुआवजा मॉन्ट्रियल कन्वेंशन 1999 के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार तय किया जाता है। इसीलिए हाल में हुए एयर इंडिया विमान हादसे में प्रत्येक मृतक के परिवार को लगभग 1.25 करोड़ रुपये मुआवजा मिला।
रेलवे से मुआवजा बढ़ाने की मांग भले राजनीतिक दिखाई दे, पर यह न्यायसंगत तो है। रेलवे की वर्तमान प्रणाली में आय, उम्र, पारिवारिक जिम्मेदारी और वास्तविक नुकसान की परवाह किए बिना सभी को एक समान मुआवजा दिया जा रहा है। शायद छत्तीसगढ़ के सांसद इस रेल दुर्घटना के बहाने दिल्ली में इस मुद्दे को उठाएं।
पिछड़े वर्ग पर नजरें
भाजपा के रणनीतिकारों की नजर पिछड़ा वर्ग के वोटरों पर है। भूपेश सरकार ने पिछड़ा वर्ग कल्याण के लिए अलग विभाग बनाया था, लेकिन साय सरकार ने एक कदम आगे जाकर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया है। जायसवाल खुद पिछड़ा वर्ग की कलार बिरादरी से आते हैं। उन्होंने समीक्षा बैठक कर पिछड़ा वर्ग संचालनालय अलग कर संचालक नियुक्त करने की अनुशंसा की है।
प्रदेश में आधे से ज्यादा आबादी पिछड़ा वर्ग की है। पार्टी के रणनीतिकार पिछड़ा वर्ग के अलग-अलग समाजों के नेताओं को प्रमोट भी कर रही है। सरकारी स्तर पर पिछड़ा वोटरों पर पकड़ बनाने के लिए लंबित समस्याओं को पूरा करने की दिशा में कदम भी उठा रही है। जायसवाल ने पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को मिलने वाले छात्रवृत्ति को बढ़ाने की भी कोशिश में जुटे हैं। यही नहीं, पिछड़ा वर्ग का बड़ा सम्मेलन बुलाने की योजना पर भी काम चल रहा है। इसमें कई घोषणाएं हो सकती हैं। देखना है कि पार्टी और सरकार के प्रयासों का कितना फायदा मिलता है।
देखना है आगे क्या होता है
प्रदेश के जिला सहकारी बैंकों के अफसरों-कर्मियों की वार्षिक वेतन वृद्धि पिछले चार साल से रूकी है। इसको लेकर कर्मचारी आंदोलित है, और गुरुवार को सामूहिक अवकाश पर चले गए। हाईकोर्ट ने भी कर्मचारी संगठन के हक में फैसला दिया है। बावजूद इसके उन्हें वेतन वृद्धि नहीं मिल पा रही है। कुछ कर्मी वेतन वृद्धि के अड़ंगे के पीछे नौकरशाहों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
बताते हैं कि पिछली सरकार में विशेष सचिव स्तर के एक अफसर बैंक के प्राधिकृत अफसर के अतिरिक्त प्रभार पर थे। एक बैठक में उन्होंने बैंक के ओएसडी से उनके वेतन को लेकर सामान्य पूछताछ की। वो ये जानकर हैरान रह गए,कि बैंक के ओएसडी का वेतन उनके वेतन के बराबर है। फिर क्या था विशेष सचिव ने बैंक कर्मियों के वेतन भत्ते की समीक्षा करनी शुरू कर दी।
विशेष सचिव तो कुछ समय बाद हट गए, लेकिन उनकी जगह आए आईएएस ने भी अपने पूर्ववर्ती द्वारा की गई समीक्षा को आगे बढ़ाया, और एक आदेश जारी किया कि स्थापना व्यय का डेढ़ फीसदी से कम प्रबंधकीय व्यय होने पर ही वेतन वृद्धि दी जा सकती है। कुछ और भी शर्तें लगाई। इस वजह से बैंक कर्मियों को वेतन वृद्धि का फायदा नहीं मिल पा रहा है।
कुछ ऐसा ही वाक्या ऊर्जा विभाग में हुआ था। कुछ साल पहले विभाग के नए सचिव ने अपने कॉलेज के दिनों के सहपाठी, जो कि ईई के पद पर थे, उन्हें विभागीय गतिविधियों को समझने के लिए बुलाया। सहपाठी से उनके वेतन को लेकर पूछताछ की, तो पता चला कि सहपाठी का वेतन मुख्य सचिव के वेतन के बराबर है। सचिव को थोड़ा बुरा तो लगा कि उनके मातहत अधिकारियों का वेतन अधिक है, लेकिन काम की प्रकृति को समझा, और अफसर-कर्मचारी विरोधी कोई फैसले नहीं लिए।
कोरोना काल में जब राष्ट्रीयकृत बैंकों में कामकाज ठप था, तब जिला सहकारी बैंकों में पूरी रफ्तार से काम चला, और धान खरीदी व्यवस्था में किसी तरह की रुकावट नहीं आने दिया। अब जब वेतन वृद्धि रोकी गई है, तो कर्मचारी संगठन आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। देखना है आगे क्या होता है।
डेपुटेशन से बेरूखी, और कारण...

चाहे केंद्रीय विभाग हो या राज्य, डेपुटेशन पर जाने को लेकर ऐसी बेरुखी पूर्व में कभी भी देखने को नहीं मिली। हो सकता है कि अफसरों को पता नहीं चला हो। यह भी सही है कि इस पद के लिए जो अधिसूचना जारी हुई है वह केवल डीओपीटी के ही वेबसाइट में कर दी गई। लेकिन इसकी सूचना राज्यों को भी भेजी जाती है। उसके बाद भी बीते छमाह में एक भी अफसर ने आवेदन नहीं दिया। केंद्र ने ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (ट्राईफेड) के दिल्ली- एनसीआर, अहमदाबाद, रांची, कोलकाता, भुवनेश्वर और रायपुर में सीनियर मैनेजर के पदों के लिए पे मैट्रिक्स लेवल 12 यानी डिप्टी कलेक्टर रैंक के अफसरों से आवेदन आमंत्रित किए हैं। पहली बार ये अधिसूचना 12 जून को जारी की गई थी। उसके बाद से अब तक छह माह से लगातार डेट-पर-डेट बढ़ाई जा रही लेकिन किसी ने भी आवेदन नहीं दिया।
अब एक बार और डेट 3 दिसंबर तक बढ़ा दी गई है। ऐसा नहीं है कि केवल सहकारिता या आदिम जाति कल्याण विभाग के ही अफसर हो।कोई भी अफसर आवेदन कर सकता है। सहकारिता वह भी केन्द्रीय सहकारिता विभाग का उपक्रम है- ट्राईफेड । यहां कुछ कर लो दिल्ली दूर है पता नहीं चलेगा। इसी ध्येय से पूर्व में कई अफसरों ने अपने वाले न्यारे किए हैं।
इस बार एक बात है इस विभाग के केंद्रीय मंत्री अमित शाह हैं। शायद इसी घबराहट में अहमदाबाद समेत सभी किसी भी राज्य के लिए आवेदन न किए जा रहे हों। यही हाल रहा तो दिसंबर के बाद विभाग विज्ञापन ही वापस ले ले।
क्या मानसिक फिटनेस की अनदेखी हुई?

भारतीय रेलवे को दुनिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क माना जाता है। इस समय यह लोको पायलटों की भारी कमी से जूझ रहा है। रेल यूनियनों की मार्च 2024 की स्थिति में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि रेलवे में 1 लाख 24 हजार लोको पायलटों के पद स्वीकृत हैं, मगर इनमें से 33 हजार 174 पद खाली पड़े हैं। यह कभी वैसे तो 23 प्रतिशत है, पर कुछ जोन में 40 से 45 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। एसईसीआर, बिलासपुर में 25 प्रतिशत पद खाली हैं। यह स्थिति न केवल संचालन को प्रभावित कर रही है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा को भी खतरे में डाल रही है। गतौरा और बिलासपुर के बीच मालगाड़ी से एक मेमू पैसेंजर ट्रेन की टक्कर में 11 यात्रियों की जान चली गई, 20 से अधिक लोग घायल हो गए। इस दुर्घटना का संबंध कहीं इन रिक्तियों से नहीं है?
रेलवे अधिकारिक रूप से यह बताने को तैयार नहीं है कि मेमू के चालक विद्यासागर से मानसिक फिटनेस की परीक्षा पास की थी या नहीं। मगर, रेलवे में यह चर्चा है कि जून 2025 में विद्यासागर साइकोलॉजिकल टेस्ट पास नहीं कर पाए थे। उनकी परीक्षा फिर ली जानी थी। विद्यासागर मालगाड़ी के चालक थे और एक माह पहले ही पदोन्नत कर यात्री ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। मगर, यह साइको टेस्ट पास किए बिना ही दे दी गई। रेलवे के अफसरों का अनऑफिशियली यह कहना है कि विद्यासागर के साथ एक सहायक लोको पायलट को इसीलिए रखा गया था।
दुर्घटना नियंत्रण के लिए 1962 में बनी एक कमेटी की सिफारिश पर साइकोलॉजिकल परीक्षा रेलवे में सन् 1964 से अनिवार्य है। पायलट का एक गलत निर्णय सैकड़ों जिंदगियों को संकट में डाल सकता है। इसलिए चालक को यात्री ट्रेन देने से पहले देखा जाता है कि वह फिट व सतर्क है या नहीं, आपात स्थिति में निर्णायक क्षमता कैसी है? चालक की एकाग्रता, निर्णय-क्षमता, स्मृति, तनाव सहने की शक्ति, दृश्य-श्रव्य प्रतिक्रिया कैसी है? पर एक तो गुड्स परिवहन का टारगेट पूरा करने का दबाव है, दूसरा यात्री सेवाओं में कमी होने पर लोगों को रोष से बचना है। ऐसी स्थिति में जब लोको पायलट की संख्या, जो बिलासपुर जोन में 25 प्रतिशत तक कम हैं- उन चालकों को भी यात्री ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी दी जा रही है, जिन्होंने साइको फिटनेस का टेस्ट पास नहीं किया। रेलवे की ओर से प्रारंभिक जांच में यह कहा गया है कि घुमावदार ट्रैक पर सही सिग्नल को पायलट नहीं समझ नहीं पाया। उसने दूसरे ट्रैक के ग्रीन सिग्नल को अपने ट्रैक का सिग्नल समझ लिया होगा। रेलवे का यही अनुमान इशारा करता है कि साइको फिटनेस टेस्ट कितना जरूरी होता है। दुर्घटना की उच्चस्तरीय जांच हो रही है, पर शायद ही उन अफसरों पर कार्रवाई होगी, जिन्होंने विद्यासागर यात्री ट्रेन की टेस्ट ड्राइव में झोंक दिया। फिलहाल तो विद्यासागर को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जो अपनी सफाई देने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। खुद उनकी तीन बेटियों के सिर से पिता का साया उठ चुका है।


