राजपथ - जनपथ
आखिर प्रतिमा ने सूरज देखा
राजधानी रायपुर के फुंडहर चौक पर सीएम विष्णुदेव साय ने दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर गुरुवार को प्रतिमा का अनावरण किया। छत्तीसगढ़ निर्माता अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा पिछले तीन माह से लगकर तैयार थी। मगर अलग-अलग कारणों से टलती रही।
भाजपा संगठन के नेताओं ने पीएम नरेंद्र मोदी से अटल जी की प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम तैयार किया था। पहले राज्योत्सव के मौके पर पीएम के हाथों अनावरण होना था, लेकिन उसी दौरान पीएम का विधानसभा परिसर में अटल जी की प्रतिमा का अनावरण कार्यक्रम था। इसलिए फुंडहर चौक की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम को आगे बढ़ा दिया गया। इसके बाद पीएम 28 से 30 नवंबर तक डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस के सिलसिले में रायपुर में थे। पार्टी संगठन ने प्रतिमा अनावरण के लिए पीएमओ को प्रस्ताव भेजा था। मगर पीएमओ से यह संदेश दिया गया कि पीएम, डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस को छोड़ किसी और कार्यक्रम में नहीं शामिल होंगे। अंतत: प्रतिमा अनावरण के साथ रोड-शो का कार्यक्रम टल गया। आज अटल जी का 101वां जन्मदिवस है। पार्टी की पहल पर सीएम ने पीएम की प्रतिमा का अनावरण किया। इस मौके पर डिप्टी सीएम अरुण साव, और पार्टी के सभी प्रमुख पदाधिकारी मौजूद थे।
सलामी गारद का विसर्जन
छत्तीसगढ़ सरकार ने बुधवार को एक आदेश जारी कर मंत्रियों, नेताओं, और सीनियर अफसरों को दिए जाने वाले गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा को समाप्त कर दिया है। ब्रिटिश शासन के समय से चली आ रही परंपरा को खत्म करने की पहल खुद डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने की। वो खुद भी इसके दायरे में आएंगे।
राज्य के भीतर मंत्रियों के सामान्य दौरों, आगमन-प्रस्थान, और निरीक्षण के दौरान गृह मंत्री व अन्य मंत्रियों, डीजीपी के अलावा अन्य सीनियर अफसरों को जिले के दौरे, भ्रमण या निरीक्षण के समय गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता रहा है। इस प्रचलित व्यवस्था में संशोधन किया गया है। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में गार्ड ऑफ ऑनर से जुड़े हाल ही में एक विवाद को ध्यान में रखकर फैसला लिया गया है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में पिछले दिनों प्रख्यात कथावाचक पुंडरीक महाराज को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस पर काफी विवाद हुआ, और इस मामले में एसपी को जवाब-तलब किया गया। बताते हैं कि बहराइच एसपी रामनयन सिंह खुद परेड के आगे चल रहे थे। इस पर राजनीतिक दलों ने एसपी की काफी आलोचना की है। प्रोटोकॉल के मुताबिक संवैधानिक पदों पर आसीन अतिविशिष्ट व्यक्तियों, और मंत्रियों को ही गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा रही है। मगर एसपी ने इसका ध्यान नहीं रखा। कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने इस तरह के विवादों से बचने के लिए पहले ही नियमों में संशोधन कर दिया है।
हालांकि सरकार की तरफ से यह कहा गया कि पुलिसबल की कार्यक्षमता बढ़ाने, और औपनिवेशिक परंपराओं को समाप्त करने के उद्देश्य से गार्ड ऑफ ऑनर से जुड़े नियमों में संशोधन किया गया। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, शहीद पुलिस स्मृति दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस, राजकीय समारोह, पुलिस दीक्षांत समारोहों और वीवीआईपी के लिए गार्ड ऑफ ऑनर की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी।
निगम-मंडल की अगली लिस्ट?
चर्चा है कि सरकार के निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की एक और लिस्ट विधानसभा के बजट सत्र के बाद जारी हो सकती है। पार्टी ने निगम-मंडलों के उपाध्यक्ष, और संचालकों की सूची तैयार रखी है। ये सूची जारी होने वाली थी, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों ने थोड़ा और रुक कर जारी करने का फैसला लिया है।
बताते हैं कि निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की सुविधाओं को लेकर पहले से ही किचकिच चल रही है। जरूरी नियुक्तियां हो चुकी है। ऐसे में बजट सत्र के बाद 50 से अधिक नेताओं को निगम-मंडलों में पद दिए जाएंगे। इससे पहले पार्टी प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देने में लगी है। प्रदेश कार्यकारिणी की सूची अगले दो-तीन दिनों में जारी हो सकती है।
हेल्थ कैंपों की भीड़, कमजोरी का भी आईना
सरगुजा से बस्तर तक, रायपुर से गौरेला-पेंड्रा-मरवाही तक, छत्तीसगढ़ के किसी भी कोने में जब मेगा हेल्थ कैंप लगते हैं, तो मरीजों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। हाल ही में रायपुर के मेगा हेल्थ कैंप-2025 में हजारों मरीज पहुंचे, जहां उन्हें मुफ्त जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध मिली। ऐसे शिविरों का आयोजन करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के प्रयास कई जिंदगियां बचाते हैं। मगर, सवाल यह है कि इन कैंपों में इतनी भीड़ क्यों लगती है?
जवाब ढूंढना आसान है। राजधानी रायपुर का मेकाहारा राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां लगभग 1340 बेड हैं। यहां भी आठ विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। रोजाना सैकड़ों मरीज ओपीडी में आते हैं, फिर भी विशेषज्ञ सेवाओं की कमी से कई को रेफर करना पड़ता है। 960 बिस्तरों वाले एम्स में बढ़ती मरीजों की संख्या के चलते वेटिंग चलती रहती है, सिफारिशें लगानी पड़ती हैं। डीकेएस में भी विशेषज्ञों की भारी कमी है।
बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है। रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स- ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में हैं, लगभग 71 प्रतिशत पद खाली। आदिवासी इलाकों में पहुंच कठिन है, सडक़ें नहीं हैं। पिछले दिनों बालोद जिले की तस्वीर आई थी कि किसी तरह 10 किलोमीटर पहाड़ी में चलकर खाट पर मरीज को सडक़ तक लाया गया तब एंबुलेंस मिली। खाट और कंधे पर मरीजों और शवों को ढोने की तस्वीरें आती ही रहती हैं। कई जगहों पर विशेषज्ञ डॉक्टर सालों से नहीं आए। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जैसे नए जिलों में तो और बुरा हाल है। यहां के एक स्वास्थ्य केंद्र का प्रभार तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को सौंपना पड़ा था। बलरामपुर-रामानुजगंज से लेकर जीपीएम तक आदिवासी जिलों में मलेरिया, कुपोषण और अन्य संक्रामक रोग आम हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने से मौतें होती हैं।
बिल्डिंग तो बन जाती हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं शुरू होतीं। बिलासपुर के कोनी में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल का उद्घाटन दो साल पहले हो चुका है, लेकिन अभी तक केवल ओपीडी स्तर की सेवाएं ही चल रही हैं। राज्य में कई जिला अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा नहीं है। सीटी स्कैन, एमआरआई और डायलिसिस जैसी आवश्यक मशीनें भी नहीं हैं। नए जिलों में इसका अभाव ज्यादा दिखा है।
2024-25 में नए मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के लिए 1390 करोड़ से अधिक की मंजूरी बजट में मिली, लेकिन समस्या भर्तियों की है। राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ में डॉक्टर-मरीज अनुपात का फासला बड़ा है। मजबूरन, आम लोग महंगे निजी अस्पतालों का सहारा लेने को मजबूर होते हैं या फिर ऐसे ही मेगा कैंपों की राह देखते हैं।
4 वर्ष बाद नए सीएस को मौका
करीब 4 वर्ष बाद किसी नए मुख्य सचिव (विकास शील) को देश भर के मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय कॉफ्रेंस में शामिल होने का अवसर मिलेगा। ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि बीते 4 सम्मेलनों में छत्तीसगढ़ से अमिताभ जैन ही शामिल होते रहे हैं। इसे लेकर पौने पांच वर्ष मुख्य सचिव रहे जैन ने अपने आप में एक रिकॉर्ड बनाया। उन्हें छ माह का सेवा विस्तार भी दिया गया था। वैसे केंद्र सरकार ने इन सम्मेलनों की शुरुआत ही पांच वर्ष पहले की थी। वहीं पुलिस के डीजीपी की कांफ्रेंस तो 64 हो चुके थे लेकिन मुख्य सचिवों की कॉफ्रेंस की शुरुआत मोदी 2.0 के अंतिम वर्षों में की गई। इस बार का यह सम्मेलन दिल्ली में आईसीएआर में 26-27 में आयोजित होना है। इसमें विकासशील के साथ सचिव जीएडी, कृषि, पंचायत ग्रामीण विकास जैसे बड़े फील्ड डिपार्टमेंट के सचिव भी बुलाए जाते हैं। नवंबर में मुख्य सचिव की जिम्मेदारी सम्हालने वाले विकासशील को भी अगले तीन साल शामिल होने का अवसर मिलेगा। छत्तीसगढ़ में अब तक 13 मुख्य सचिव हुए हैं। इनमें अधिकांश एक दो वर्ष का कार्यकाल कर चुके हैं। जैन से पहले विवेक ढांड को ही 4 वर्ष का कार्यकाल मिला था।
जब नई सडक़ का मटेरियल कचरा बन जाए
अंबिकापुर के सदर रोड की यह तस्वीर सिस्टम का एक आईना है। रातोंरात नई सडक़ बनी थी और सुबह होते-होते उसी सडक़ को सफाई कर्मचारियों ने बेलचों से उखाड़ दिया। उन्हें क्या पता कि परत इतनी पतली और मटेरियल इतना घटिया है कि उसके बेलचे से उखड़ जाएगी। छत्तीसगढ़ युवक कांग्रेस के महामंत्री विष्णु देव सिंह ने अपने फेस बुक पोस्ट पर इसका एक वीडियो साझा किया है। यह दावा भी उन्हीं का है कि रात में सडक़ बनी थी। मटेरियल इतना खराब था कि उसने मोहल्ले में कचरा साफ करने वाले कर्मचारी ने उखाडक़र ट्रैक्टर पर लाद दिया। युवक कांग्रेस नेता ने लिखा है कि लोगों के यहां सडक़ पर चोरी हो जाती होगी लेकिन अपने यहां सडक़ ही चुरा ली जाती है।
जनता की रेल-अमीरों की रेल
भारतीय रेलवे ने एक बार फिर यात्री किराए में वृद्धि की है,जो दो दिन बाद लागू हो जाएगी। इसी साल जुलाई में भी किराया बढ़ाया गया था। इस बार साधारण श्रेणी में 215 किलोमीटर से अधिक दूरी पर एक पैसा प्रति किलोमीटर, जबकि मेल एक्सप्रेस की नॉन-एसी (जनरल और स्लीपर सहित) तथा सभी एसी श्रेणियों में 2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी हो जाएगी। रेलवे का दावा है कि इससे चालू वित्त वर्ष में करीब 600 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी, जबकि जुलाई की वृद्धि से अब तक 700 करोड़ रुपये मिल चुके हैं।लेकिन क्या यह वास्तव में मामूली है?नहीं। मजदूर, छात्र, छोटे व्यापारी हजारों किलोमीटर का सफर करते हैं और महीने में एक से अधिक बार, कुछ व्यापारी तो लगातार यात्रा पर रहते हैं। रेलवे खुद कह रहा है कि इससे 600 करोड़ की कमाई होगी। यह राशि हमारी आपकी जेब से ही निकल रही है।रेलवे का फोकस वंदे भारत, तेजस जैसी प्रीमियम ट्रेनों और अमृत भारत स्टेशनों पर है, जिनका किराया कितना ऊंचा है कि आम यात्री इन्हें वहन नहीं कर सकता। ये सुविधाएं अमीर वर्ग के लिए हैं, लेकिन किराया बढ़ोतरी का बोझ गरीब पर। जनरल कोच में भीड़, गंदगी, सुरक्षा की कमी बरकरारहै। छत्तीसगढ़ से चलने और गुजरने वाली ट्रेनों के स्लीपर और जनरल डिब्बों का हाल देखा जा सकता है। कई बार थर्ड एसी में भी गंदगी और भीड़ मिलती है। सुविधाओं को लेकर तेजस, वंदेभारत, राजधानी, दुरंतो आदि ट्रेनों पर ध्यान अधिक है। पर जब किराये में वृद्धि की बात आती है तो सभी श्रेणी के यात्रियों से एक जैसा बर्ताव होता है। इस बार भी यही हुआ है।
सुलगते जिले से तबादला
आईपीएस अफसरों की एक छोटी तबादला सूची सोमवार की रात जारी की गई। इसमें कांकेर एसपी इंदिरा कल्याण एलेसेला का तबादला सरगुजा रेंज डीआईजी के पद पर किया गया। एलेसेला की जगह गरियाबंद एसपी निखिल रखेचा को कांकेर एसपी बनाया गया है।
कांकेर पिछले कुछ दिनों से अशांत रहा है। यहां चर्च जलाने की घटना हुई, और दो समुदायों के बीच मारपीट हुई। इसके चलते कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए थे, और समुदाय विशेष की तरफ से एसपी को हटाने की मांग भी हो रही थी। कांकेर एसपी के तबादले की बड़ी वजह यही रही है। कांकेर के नए एसपी निखिल रखेचा ने गरियाबंद में काफी बेहतर काम किया है।
रखेचा की आईएएस पत्नी नम्रता जैन को दो दिन पहले ही पड़ोस के जिले नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया है। नम्रता जैन मूलत: दंतेवाड़ा जिले की रहवासी हैं, और वो बस्तर की आदिवासी संस्कृति से परिचित हैं। इसके अलावा आईपीएस अफसर वेदव्रत सिरमौर को गरियाबंद एसपी बनाया गया है। सिरमौर पर्यटन बोर्ड में जीएम के पद पर थे। सिरमौर से पर्यटन विभाग में प्रतिनियुक्ति से सेवाएं वापस ली गई। पर्यटन मंडल में पुलिस अफसर की नियुक्ति भी पहली बार की गई थी। इन सबके बावजूद पुलिस में कुछ और फेरबदल की संभावना बनी हुई है।
अनुसूचित जाति इलाकों में...
भाजपा अनुसूचित जाति इलाकों में पैठ जमाने की भरपूर कोशिश कर रही है। इस कड़ी में सोमवार को अनुसूचित जाति बाहुल्य जांजगीर-चाम्पा जिले के खोखराभाठा में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की सभा भी हुई। भीड़ के मामले में सभा काफी सफल रही। नड्डा ने सीएम और प्रदेश अध्यक्ष किरण देव की पीठ भी थपथपाई।
भाजपा को विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली थी, मगर जांजगीर-चांपा लोकसभा की सभी विधानसभा सीटें हार गई। बाद में नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में फिर भाजपा का परचम लहराया है। अब तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के रणनीतिकार अनुसूचित जाति बाहुल्य इलाकों में अभी से ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि इलाके में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति कमजोर हुई है। इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला है। अब अनुसूचित जाति मतदाताओं के बीच पैठ बनाने के लिए काम चल रहा है। नड्डा की सभा भी इसी रणनीति का हिस्सा था। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि महतारी वंदन योजना के चलते अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत हुई है। इन सबको देखते हुए सीएम विष्णुदेव साय ने रायपुर लौटने के बाद प्रदेश सरकार के तीसरे साल को महतारी गौरव वर्ष घोषित किया। यानी अगला पूरा साल महतारी गौरव वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। भाजपा अनुसूचित जाति महिला मोर्चा के बैनर तले कई कार्यक्रम करने की योजना है। इसमें सीएम विशेष रूप से मौजूद रहेंगे। आरएसएस के पदाधिकारी भी इलाके में सक्रिय हो गए हैं। ऐसे में भाजपा यहां मजबूत स्थिति में आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
नई नियुक्तियों ने पुराने जख्म कुरेद डाले
राज्य सरकार ने हाल ही में पांच जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों में नियुक्तियां की है। इस सूची को देखकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का पुराना जख्म फिर ताजा हो गया है। लंबे समय से सहकारिता क्षेत्र से जुड़े बिलासपुर के तरु तिवारी उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं में शामिल हैं, जिन्हें कांग्रेस भवन में लाठी चार्ज के दौरान चोट पहुंची। आंदोलनों में कई बार गिरफ्तारियां दी। जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद तत्कालीन भूपेश सरकार ने नियुक्तियां कीं, मगर वर्तमान भाजपा सरकार ने न केवल अध्यक्ष बल्कि उपाध्यक्षों का मनोनयन भी किया गया है। तिवारी ने सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर किया है। उनका कहना है कि इस आदेश को देखकर स्पष्ट समझ आता है कि कांग्रेस के शासन काल में जानबूझकर निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई । जब भाजपा सरकार में सहकारी बैंकों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बन सकते हैं तो , कांग्रेस के शासन काल में उपाध्यक्ष क्यों नहीं बनाए गए? राज्य में 6 जिला सहकारी बैंक है। उपाध्यक्ष बनाने से 6 और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को सम्मान मिल सकता था, पर ऐसा नहीं किया गया। जानबूझ कर ऐसा किया गया । बस ऐसे ही कारण हैं कि दूसरी बार कांग्रेस की सरकार नहीं बनी, जबकि उपाध्यक्ष के साथ हर बैंक में तीन संचालक भी बनाए जा सकते थे। इससे 18 कार्यकर्ता और सम्मान पाते। तिवारी याद दिलाते हैं कि 2010 में भाजपा सरकार के दौरान उन्होंने संचालक का चुनाव लड़ा था। बराबरी का वोट मिलने के बावजूद टॉस की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, वरना भाजपा शासनकाल में वे एकमात्र निर्वाचित संचालक होते। कांग्रेस सरकार में मेरिट के आधार पर उनका हक था। कितनी बार तब सीएम से मिला, उपाध्यक्ष नहीं- संचालक ही बना दें लेकिन समय निकला, सरकार चली गई। यही कारण है कि आज कांग्रेस सत्ता से बाहर है। 2023 में चुनाव की तैयारियों के दौरान महासचिव पुनिया ने कहा था, सरकार तो बनाओ, हमारे पास दो से ढाई हजार पद हैं। जो लोग लाठी चलती देख कांग्रेस भवन से भाग गए, उनको सरकार बनने पर पद दिया गया।
जोड़ी फिर साथ-साथ
रिटायरमेंट के बाद कई प्रशासनिक अफसर सरकारी सुख-सुविधाओं का मोह नहीं छोड़ पाते हैं, और ऐन-केन प्रकारेण पद के लिए कोशिश भी करते हैं। इनमें बहुत सारे अफसरों को सफलता भी मिल जाती है। कुछ अफसरों की उपयोगिता सरकार समझती है, और उनके अनुभवों का लाभ लेने के लिए अलग-अलग पदों पर नियुक्ति भी देती है। मगर प्रदेश में रिटायर्ड अफसर की नियुक्ति का एक ऐसा उदाहरण सामने आया है जो पहले कभी देखने-सुनने में नहीं आया है।
बात सचिव स्तर के आईएएस अफसर अशोक अग्रवाल की है। अशोक कई जिलों के कलेक्टर रहे हैं। वो रायपुर के कमिश्नर भी रह चुके हैं। उनका पूरा प्रशासनिक करियर तकरीबन छत्तीसगढ़ में गुजरा। वो कांग्रेस, और भाजपा में अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। रिटायर होते ही उन्हें सूचना आयुक्त का पद मिल गया। सूचना आयुक्त का कार्यकाल खत्म हुआ, तो वो रेडक्रॉस सोसायटी के सचिव बन गए।
रेडक्रॉस सोसायटी में पूरे पांच साल गुजारने के बाद दो दिन पहले उन्हें राज्य निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के सचिव पद पर संविदा नियुक्ति दे दी गई। दिलचस्प बात ये है कि आयोग के अध्यक्ष डॉ.वी.के.गोयल, कभी अशोक अग्रवाल के मातहत काम कर चुके हैं। अशोक अग्रवाल माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव थे तब डॉ.गोयल मंडल में उपसचिव के पद पर थे। बताते हैं कि मंडल के सचिव बनने के बाद अशोक अग्रवाल ही डॉ.वी.के. गोयल को मंडल में लेकर आए थे।
तब डॉ.गोयल सहायक प्राध्यापक के पद थे। दोनों के बीच घनिष्ठता किसी से छिपी नहीं है। और अब जब अशोक अग्रवाल पूरी तरह खाली हो गए, तो डॉ. गोयल के प्रयासों से उन्हें सचिव की जिम्मेदारी मिल गई। मजे की बात ये है कि सचिव का पद पर सहायक प्राध्यापक या फिर डिप्टी कलेक्टर स्तर के अफसर ही रहते आए हैं। मगर अशोक अग्रवाल ने कई पायदान नीचे के पद पर काम करने से परहेज नहीं किया। अब जहां तक निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग की कार्यप्रणाली का सवाल है तो इस पर विधानसभा के शीतकालीन सत्र में काफी बातें हुई हैं।
पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने एक विधेयक की चर्चा के दौरान निजी विवि नियामक आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाई है। राज्यपाल रामेन डेका तो खुलकर आयोग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में गोयल-अग्रवाल की जोड़ी आगे क्या कुछ करती है, यह देखना है।
आरोपों में दम नहीं
सरकार ने पिछले दिनों आधा दर्जन कलेक्टर बदल दिए। इनमें कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत भी थे, जिन्हें कोरबा से सरगुजा भेजा गया है। खास बात ये है कि पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने अजीत बसंत के खिलाफ 14 बिंदुओं पर शिकायत की थी, और सरकार ने बिलासपुर कमिश्नर से जांच प्रतिवेदन मांगा था। जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद सरकार ने अजीत बसंत को कोरबा से हटाकर सरगुजा कलेक्टर बना दिया है।
सरगुजा पुराना जिला है, और कोरबा के मुकाबले बेहतर पोस्टिंग मानी जा रही है। बिलासपुर कमिश्नर के जांच प्रतिवेदन में क्या था, यह तो सार्वजनिक नहीं हुआ है। मगर अजीत बसंत की सरगुजा पोस्टिंग से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उनके खिलाफ आरोपों में दम नहीं है। कंवर भी सिर्फ इतना चाहते थे कि अजीत बसंत को हटा दिया जाए। सरकार ने उनकी इच्छा पूरी कर दी, और अजीत बसंत को बेहतर पोस्टिंग देकर उनका मान रख लिया है।
रेडियो के जुनून ने मशहूर कर दिया
रेडियो केवल गीत सुनने का माध्यम नहीं रहा है। यह मनोरंजन, जानकारी और श्रोताओं की भागीदारी का एक सशक्त मंच भी बन चुका है। कभी रेडियो श्रोता अपने पसंदीदा गीतों की फरमाइश चि_ियों के जरिए भेजा करते थे। कई श्रोता तो अपने नाम, पते, गीतकार और संगीतकार तक की अलग-अलग सील बनवाकर रखते थे, ताकि खाली जगह भरकर एक साथ कई रेडियो केंद्रों में पत्र भेज सकें। उस दौर में रेडियो एकतरफा माध्यम था, जहां सिर्फ उद्घोषक की आवाज सुनाई देती थी।
समय के साथ रेडियो में फोन-इन कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। इससे श्रोता की आवाज भी सीधे प्रसारण का हिस्सा बनने लगी। इस बदलाव ने रेडियो को जीवंत और संवादात्मक बना दिया है। साथ ही इंटरनेट की सुविधा मिलने के बाद देश-विदेश के किसी भी रेडियो स्टेशन के कार्यक्रम सुने जा सकते हैं।
फोन-इन कार्यक्रमों के कुछ श्रोता ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए यह केवल शौक नहीं, बल्कि जुनून बन जाता है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के ग्राम सिरखाबांधा निवासी योगेश जांगड़े ऐसे ही जुनूनी रेडियो श्रोता हैं। उन्हें फोन-इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का विशेष शौक है। देशभर के सैकड़ों रेडियो केंद्रों में वे लगातार कॉल करते रहे हैं।
योगेश के पास यह पूरी जानकारी होती है कि किस रेडियो स्टेशन पर किस दिन फोन-इन कार्यक्रम प्रसारित होता है। वे अब तक एक ही दिन में 32 अलग-अलग रेडियो केंद्रों पर फोन कर चुके हैं। इनमें जयपुर, गंगापुर, ईटानगर, मथुरा, भोपाल, गोरखपुर, गोपालगंज, शिलांग, परभणी, सतारा, कोटा, रामपुर जैसे देश के कई प्रमुख रेडियो स्टेशन शामिल हैं।
खास बात यह है कि योगेश के पास यह भी पूरा रिकॉर्ड मौजूद है कि किस स्टेशन पर, किस तारीख को उनकी बातचीत प्रसारित हुई और उस कार्यक्रम में कौन-सा पसंदीदा गीत सुनाया गया। योगेश जांगड़े के इसी जुनून ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला दी है। गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड ने उन्हें
रेडियो फोन-इन कार्यक्रमों में सबसे अधिक कॉल करने के लिए Certificate of E&cellence सर्टिफिकेट ऑफ एक्सीलेंस प्रदान किया है।
रिकॉर्ड के अनुसार, 15 दिसंबर 2025 तक योगेश जांगड़े देश के विभिन्न ऑल इंडिया रेडियो केंद्रों पर 12,870 से अधिक फोन कॉल कर चुके थे, ताकि वे अपनी पसंद के गीत सुन सकें।
अरपा रेडियो बिलासुप की संचालिका संज्ञा टंडन ने एक फेसबुक पोस्ट में यह जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि योगेश अरपा रेडियो के भी नियमित श्रोता हैं। ‘हेलो अरपा रेडियो’ कार्यक्रम में उनकी दसवीं बार कॉल लगने के दौरान यह जानकारी सामने आई कि देशभर में उनकी कुल बातचीत की संख्या अब 13,000 के करीब पहुंच चुकी है।
योगेश जांगड़े की लगन ने उसके नाम पर एक खास तरह अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि जोड़ दी है।
कांग्रेस की लिस्ट कब?

कांग्रेस के सभी 41 संगठन जिलों में अध्यक्षों की नियुक्ति तो हो गई है। ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति बाकी है। चर्चा है कि प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने प्रदेश कांग्रेस की सूची पर मुहर लगवा दी है। इस मामले में उन्होंने चुनिंदा कुछ प्रमुख नेताओं से चर्चा की है। ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जल्द जारी हो सकती है।
हालांकि इसको लेकर पार्टी में विवाद भी है। नवनियुक्त जिलाध्यक्ष चाहते हैं कि ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति में उनकी राय को महत्व दिया गया। नवनियुक्त जिलाध्यक्षों का मानना है कि विरोधी नेता, ब्लॉक के पदाधिकारी बन जाते हैं तो इसका असर पार्टी कार्यक्रमों पर पड़ सकता है। चर्चा है कि ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जारी होने के बाद पार्टी के भीतर खींचतान शुरू हो सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
21 दिसंबर : रसायन शास्त्री पियरे और मैरी क्यूरी ने रेडियम की खोज की
नयी दिल्ली, 21 दिसंबर। इतिहास में 21 दिसंबर की बात करें तो यह दिन विज्ञान जगत के लिए बेहद अहम है। वर्ष 1898 में इसी दिन मैरी क्यूरी और उनके पति पियरे ने रेडियम की खोज की। खनिज का अध्ययन करते हुए जब उन्होंने उससे यूरेनियम अलग कर दिया, तो पाया कि बाकी बचे हिस्से में अब भी कोई रेडियोधर्मी तत्त्व बाकी था। उन्होंने इस तत्व को रेडियम नाम दिया।
देश-दुनिया के इतिहास में 21 दिसंबर की तारीख में दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है:-
- 1898 : रसायन शास्त्री पियरे और मैरी क्यूरी ने रेडियम की खोज की।
- 1910 : इंग्लैंड के हुलटन में कोयला खदान में हुए विस्फोट में 344 श्रमिकों की मौत।
- 1914 : अमेरिका में पहली मूक हास्य फीचर फिल्म “तिल्लीस पंचर्ड रोमांस” रिलीज हुई।
- 1931 : आर्थर वेन का बनाया दुनिया का पहला क्रॉसवर्ड ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ अखबार में प्रकाशित हुआ।
- 1949 : पुर्तग़ाली शासकों ने इंडोनेशिया को संप्रभु राष्ट्र घोषित किया।
- 1952 : सैफुद्दीन किचलू तत्कालीन सोवियत संघ का लेनिन शांति पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने।
- 1963 : अभिनेता गोविंदा का जन्म।
- 1968 : फ्लोरिडा के केप केनेडी स्पेस सेंटर से ‘अपोलो-8’ को प्रक्षेपित किया गया।
- 1975 : मेडागास्कर में संविधान लागू।
- 1988 : स्कॉटलैंड की सीमा के नजदीक लॉकरबी शहर में पैन एम का एक जंबो जेट विमान 258 यात्रियों के साथ दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
- 1998 : नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने इस्तीफा दिया।
- 2008 : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान को अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूज वीक’ ने दुनिया के 50 शक्तिशाली लोगों की सूची में शामिल किया।
- 2011 : देश के जाने-माने परमाणु वैज्ञानिक पी के आयंगर का निधन।
- 2012 : दक्षिण कोरिया के एक गायक का ‘गंगनम स्टाइल’ यूट्यूब पर एक अरब बार देखा जाने वाला पहला वीडियो बना।
- 2020: कोरोना वायरस के नए प्रकार के सामने आने पर भारत, फ्रांस समेत कई देशों ने ब्रिटेन से संपर्क तोड़ा।
- 2021: पाकिस्तान ने बाबर क्रूज मिसाइल की और अधिक दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
- 2022: नेपाल की शीर्ष अदालत ने ‘सीरियल किलर’ चार्ल्स शोभराज को रिहा करने का आदेश दिया।
- 2023: जम्मू-कश्मीर में सेना के दो वाहनों पर घात लगाकर किए गए हमले में तीन सैनिक शहीद।
- 2024: यूक्रेन के कई ड्रोन ने रूस में तातारस्तान क्षेत्र के कजान शहर में आवासीय इमारतों को निशाना बनाया। (भाषा)
चंद्राकर मैन ऑफ़ द सीरीज
विधानसभा के इस बार का शीतकालीन सत्र पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के नाम रहा। सत्र शुरू होने के दो दिन पहले संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप ने पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को छत्तीसगढ़ अंजोर विजन डॉक्यूमेंट-2047 पर सत्ता पक्ष की तरफ से चर्चा की शुरूआत करने की जिम्मेदारी दी थी तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि अजय सदन में विपक्ष की कमी महसूस नहीं होने देंगे। विपक्ष ने तो चर्चा का बहिष्कार कर दिया था।
विजन डॉक्यूमेंट-2047 पर चर्चा की शुरूआत में पूर्व मंत्री चंद्राकर ने वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी से ही पूछ लिया कि ओपन माइंड से बात रखनी है या सिर्फ पीठ थपथपाना है। इससे हड़बड़ाए वित्तमंत्री ने ओपन माइंड से अपनी बात रखने के लिए कह दिए। इसके बाद चंद्राकर आसंदी की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, और कहा कि यह पहले स्पष्ट हो जाना चाहिए था कि किस नियम से चर्चा कराई जा रही है। शासकीय-अशासकीय संकल्प की तरह चर्चा होगी, और फिर मंत्रीजी का जवाब देंगे। उन्होंने यह भी कह दिया कि नई परंपरा की शुरूआत हो रही है। बाद में विजन डॉक्यूमेंट की सिंचाई से लेकर रोजगार और उद्योग पर खामियों को गिनाया। और यह कह गए कि इसमें मेक इन छत्तीसगढ़ की सोच को नजरअंदाज किया गया है।
कुल मिलाकर अजय चंद्राकर के उठाए सवालों से सत्ता पक्ष परेशान दिखा। अगले दिन विपक्षी कांग्रेस सदस्य सदन की कार्रवाई में हिस्सा लिया तो उन्होंने चंद्राकर की पीठ थपथपाई। नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत ने तो उन्हें धन्यवाद दिया। और जब एक सवाल के जवाब में चंद्राकर, कृषि मंत्री रामविचार नेताम से एक सवाल का जवाब चाह रहे थे, तो नेताम ने चंद्राकर से कहा कि आप पहले काफी कुछ बोल चुके हैं। हास-परिहास के बीच में कांग्रेस सदस्य श्रीमती संगीता सिन्हा ने तो चंद्राकर से कह दिया कि आप 15 विधायक तोडक़र लाईए, हम आपको सीएम बना देंगे। कुल मिलाकर अजय चंद्राकर ने सुर्खियां बटोरी है। ये अलग बात है कि पार्टी उनसे असहज नजर आई है। अब इसका क्या प्रभाव पड़ता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
अदाणी को किसी भी जगह छूना मना है?
देश के विभिन्न हिस्सों में अदाणी समूह के प्लांट्स में मजदूरों का असंतोष है। झारखंड का गोड्डा हो, जहां अप्रैल 2025 में भूमि अधिग्रहण के बदले नौकरी के वादे पर मजदूरों ने भूख हड़ताल की, या छत्तीसगढ़ का रायखेड़ा पावर प्लांट, जहां दिसंबर 2025 से मजदूर हड़ताल पर हैं। हसदेव से लेकर रामगढ़ तक जंगल की कटाई पर उठाई जा रही आवाज को तो अनसुना किया जा रहा है, मगर ऐसा लगता है कि जहां भी अडाणी का नाम आए मंत्री और अफसर आंख मूंद लेते हैं।
रायखेड़ा (तिल्दा) में स्थित अदाणी पावर प्लांट में करीब 1600 मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों की शिकायत है कि पिछले 10 वर्षों से उनकी मजदूरी दर नहीं बढ़ी, जो श्रम कानूनों का उल्लंघन है। 10 महीने पहले हड़ताल के दौरान प्रबंधन ने वादा किया था कि मांगों पर विचार किया जाएगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। श्रमायुक्त के पास आवेदन और कई बैठकें भी बेनतीजा रहीं। मजबूरन, 8 दिसंबर 2025 से मजदूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की, जो आज 13वें दिन में प्रवेश कर चुकी है। इस हड़ताल से बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ, और रायपुर लेबर कोर्ट ने आंदोलन को 6 महीने के लिए स्थगित करने का आदेश दिया, लेकिन मूल समस्या बनी हुई है।
दिलचस्प यह है कि इस हड़ताल से धरसीवां के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल भी विचलित हैं। उन्होंने वाणिज्य, उद्योग एवं श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन को पत्र लिखकर मजदूरों की मांगों पर तत्काल कार्रवाई की गुहार लगाई है। पत्र लिखकर कहा है कि ये छत्तीसगढ़ के गरीब मजदूर हैं, जो भूखे मरने की कगार पर हैं, और शासन-प्रशासन की चुप्पी से क्षेत्र में रोष फैल रहा है। पूर्व विधायक ने मंत्री से आग्रह किया कि विभागीय अधिकारियों को निर्देश देकर मजदूरों की उचित मांगें पूरी की जाएं। देखें, इस कड़ी ठंड में बर्फ पिघलती है या नहीं।
पुलिस हमारा बाप है....

एक वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है, जिसमें मुंगेली की पुलिस छेड़छाड़ के आरोपियों का सडक़ पर जुलूस निकाल रही है। पुलिस के कहने पर आरोपी नारा लगा रहे हैं कि छेडख़ानी पाप है, पुलिस हमारा बाप है। ऐसे वीडियो अक्सर दिखाई पड़ते हैं। पहले सिर्फ तस्वीरें आती थीं, मगर, जब से मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्ड करना आसान हुआ है, वीडियो क्लिप भी पुलिस शूट करती है और उसे खुद ही अधिकारिक तौर पर जारी करती है। पोस्ट करने वाले का कहना है कि पुलिस का यह कृत्य निंदनीय है। अभी वह सिर्फ आरोपी है। सजा देना अदालत का काम है। कल को यदि अदालत में ये लोग निर्दोष साबित हो गए तो? इसके अलावा पुलिस क्यों चाहती है कि उसे कोई आरोपी अपना बाप माने। बाप तो वही होता है, जिसने उसे पैदा किया। क्या बाप के नक्शे-कदम पर बेटा चल पड़ा है? प्रतिक्रिया में बहुत से लोगों ने पुलिस के कदम को सही माना है। ऐसे ही जुलूस निकालने से अपराधियों में भय पैदा होगा। कुछ लोगों ने रायपुर के तोमर के जुलूस का भी जिक्र किया है और याद दिलाया है कि इससे लोगों का डर भागा। दोनों तरफ की बातें कुछ-कुछ सही और थोड़ी गलत हो सकती है। बस, पाठकों के विचार के लिए यह मुद्दा सामने रख दिया गया है।
टाइगर इज बैक
प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष पद पर नियुक्तियां हो गई है। सहकारिता मंत्री केदार कश्यप, विभागीय अधिकारियों को नवनियुक्त पदाधिकारियों से संपर्क कर पदभार ग्रहण कार्यक्रम तय करने के लिए कहा, तो पता चला कि ज्यादातर बैंक अध्यक्षों ने आदेश निकलते ही पदभार ग्रहण कर लिया है। बाकी निगम मंडल के पदाधिकारियों की तरह पदभार ग्रहण की औपचारिकता नहीं निभाई।
नवनियुक्त पदाधिकारियों के पदभार ग्रहण की हड़बड़ी को लेकर कई बातें हो रही है। यह कहा जा रहा है कि प्रदेश में धान खरीदी तेजी से चल रही है। इसमें बैंकों की भूमिका अहम होती है। रोजाना सैकड़ों करोड़ का भुगतान हो रहा है। चर्चा है कि नवनियुक्त पदाधिकारी पूरी व्यवस्था के भागीदार बनना चाह रहे थे, इसलिए उन्होंने आनन-फानन में पदभार ग्रहण कर लिया।
दूसरी तरफ, रायपुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के नवनियुक्त उपाध्यक्ष अनिमेष कश्यप (बॉबी) गुरूवार को जिला ग्रामीण भाजपा पदाधिकारी की बैठक में पहुंचे तो उनका पदाधिकारियों ने जोरदार स्वागत किया। कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने 'टाइगर इज बैक’ के नारे लगाए। दरअसल, अनिमेष कश्यप को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया गया था। इससे पदाधिकारियों का एक खेमा नाखुश रहा, और जब उन्हें नई जिम्मेदारी मिली तो स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
बैंकों में मनोनयन के राज
सरकार ने सहकारिता चुनाव की अटकलों पर फिलहाल विराम लगा दिया है, और जिला सहकारी बैंकों में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि राज्य बनने के बाद अब तक सिर्फ दो बार ही सहकारी संस्थाओं के चुनाव हुए हैं। अब तक सहकारी संस्थाओं में मनोनयन ही होता आया है। जबकि सरकार ने सहकारी संस्थाओं के चुनाव के लिए आयोग बनाया है।
सरकार ने जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों के अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष की सूची जारी की है। पार्टी ने स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर नियुक्तियां की है। ये अलग बात है कि रायपुर और बिलासपुर को छोडक़र बाकी बैंक घाटे में चल रहे हैं। रायपुर में धमतरी जिले के सीनियर भाजपा नेता निरंजन सिन्हा को अध्यक्ष बनाया गया है। जबकि उपाध्यक्ष अनिमेष कश्यप (बॉबी) की नियुक्ति की गई है। अनिमेष रायपुर जिला ग्रामीण अध्यक्ष रह चुके हैं।
दुर्ग जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष पद पर प्रीतपाल बेलचंदन की नियुक्ति की गई है। प्रीतपाल पहले भी जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें अध्यक्ष बनाने के लिए सांसद विजय बघेल ने जोर लगाया था। इससे परे बेलतरा के पूर्व विधायक रजनीश सिंह को बिलासपुर ग्रामीण जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया।
रजनीश, उन 15 विधायकों में से थे जो 2018 में कांग्रेस की लहर में जीतकर आए थे। इनमें से दो विधायक रजनीश सिंह, और डमरूधर पुजारी को टिकट नहीं दी गई थी। बावजूद इसके रजनीश सिंह पार्टी संगठन का काम करते रहे। उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी मिलने की चर्चा थी। आखिरकार जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया।
राजनांदगांव से सचिन सिंह बघेल पहले भी अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके नाम की स्पीकर डॉ.रमन सिंह ने सिफारिश की थी, जबकि उपाध्यक्ष पद पर भरत वर्मा की नियुक्ति की गई, जो कि डोंगरगांव सीट से विधानसभा का चुनाव मामूली वोट हार गए थे। भरत वर्मा प्रदेश भाजपा के महामंत्री रहे हैं। इससे परे रामकिशुन सिंह को सरगुजा जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया है। रामकिशुन सिंह बलरामपुर-रामानुजगंज जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। इससे परे जगदलपुर जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष पद पर दिनेश कश्यप की नियुक्ति की गई है।
दिनेश, संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप के बड़े भाई हैं। दिनेश बस्तर से सांसद रह चुके हैं। उपाध्यक्ष पद पर श्रीनिवास मिश्रा की नियुक्ति की गई है। उनके लिए प्रदेशाध्यक्ष किरणदेव ने सिफारिश की थी। संकेत है कि कुछ और सहकारी संस्थाओं में नियुक्तियां हो सकती है।
विनोद शुक्ल की सेहत पर चिंता
हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता 88 वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल इस समय स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या के चलते रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती हैं। दिसंबर 2025 की शुरुआत में उनकी तबीयत बिगडऩे के बाद उन्हें आईसीयू में रखा गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है।
छत्तीसगढ़ के पूर्व महाधिवक्ता और साहित्यकार कनक तिवारी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में शुक्ल की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि बेहतर उपचार के लिए उन्हें मुंबई या किसी अन्य उन्नत केंद्र में भेजा जाए। तिवारी ने दिल्ली की ठंड और प्रदूषण को असुविधाजनक बताते हुए मुंबई को बेहतर विकल्प माना है। उन्होंने कई साल पहले पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा अपनी बीमारी में दी गई असाधारण मदद का उदाहरण देते हुए सरकार से उसी तरह की सक्रियता की उम्मीद की है। तिवारी ने अपनी पोस्ट में एम्स रायपुर की सुविधाओं पर सवाल उठाया है। परिवार के सदस्यों को जमीन पर सोने जैसी शिकायतों का भी उल्लेख है, इसे उन्होंने एम्स प्रशासन के लिए शर्मनाक बताया है। वैकल्पिक रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बुलाने का सुझाव भी उन्होंने दिया है।
मालूम हो कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 9 दिसंबर को एम्स रायपुर पहुंचकर शुक्ल से मुलाकात की, उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। उन्होंने चिकित्सकों को बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी 17 दिसंबर को अस्पताल पहुंचकर उनका कुशलक्षेम जाना और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की थी।
आज की पीढ़ी को बता दें कि विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढिय़ा मूल के हिंदी के पहले ज्ञानपीठ विजेता हैं। उनकी रचनाएं -नौकर की कमीज और दीवार में एक खिडक़ी रहती थी सरल भाषा में गहन संवेदना के लिए दुनिया भर में विख्यात हैं। साहित्य जगत में उनके स्वास्थ्य को लेकर बड़ी चिंता है, और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जा रही है।
निर्गुण भक्ति के सच्चे पुजारी
बाबा गुरु घासीदास सत्य की खोज में थे। एक बार वे अपने भाई के साथ ओडिशा के जगन्नाथ पुरी, तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में सारंगढ़ के घने जंगलों में उन्हें कुछ अलग ही अनुभव हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि सच्चा ईश्वर मंदिरों या तीर्थों में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में बसता है। वे यात्रा छोडक़र वापस लौट आए और जंगलों में कठोर तपस्या शुरू कर दी। इसी तप से उन्हें सतनाम का बोध हुआ। बाबा ने सिद्धांत अपनाया मूर्ति या मंदिर नहीं, सिर्फ सत्य का नाम ही उनका देवता है।
गिरौदपुरी धाम से लेकर, आज छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में संत शिरोमणि कहे जाने वाले गुरु घासीदास की 269वीं जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। मनखे-मनखे एक समान का नारा उनका ही दिया हुआ है। हर राजनीतिक दल इसे अपनाने की बात करता है, पर जमीन पर गुरु घासीदास के सिद्धांतों को अपनाते हुए कोई नहीं दिखता। बाबा जातिवाद, मूर्तिपूजा और कुरीतियों के सख्त खिलाफ थे। मगर आज राजनीतिक विकृति के तौर पर यह मौजूद है।
बाबा की कई कहानियां हैं ,जो चलन में कैसे आई- कह नहीं सकते। इनकी सच्चाई को भी आज नहीं परखा जा सकता। जैसे, एक प्रसिद्ध कहानी है कि बाबा बिना किसी सहारे के हवा में ही गीले कपड़े सुखा देते थे। लोग हैरान होकर देखते कि कपड़े हवा में तने रहते और सूख जाते। कई कथाएं किताबों में हैं कि उन्होंने मृतकों को जीवित किया। अपनी पत्नी सफुरा माता और पुत्र को भी पुनर्जन्म दिया।
ये कहानियां लोक मान्यताओं से अधिक नहीं हो सकती लेकिन उनके सात सिद्धांत आज के वक्त में अधिक प्रासंगिक हैं। उनका कहना था कि निर्गुण ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। ईश्वर निराकार है, मूर्तियों या प्रतिमाओं की पूजा न करें। सभी मनुष्य जन्म से समान हैं। मनखे-मनखे एक समान का सिद्धांत अपनाओ, जातिवाद और छुआछूत का त्याग करो। मांसाहार और किसी भी जीव की हत्या से दूर रहो। पशुओं पर दया करो। गुरु घासीदास पशुओं की पीड़ा को बहुत गहराई से समझते थे। वे कहते थे कि दोपहर में खेत की जुताई मत करो, वरना बैलों को बहुत तकलीफ होगी। उन्होंने कहा कि शराब, तंबाकू या किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहो। व्यभिचार या परस्त्रीगमन से दूर रहो। महिलाओं का सम्मान करो और नैतिकता बनाए रखो। ईमानदारी से जीवन यापन करो। चोरी, जुआ या किसी भी अनैतिक कार्य से बचो।
छत्तीसगढ़ में सतनाम अनुयायियों की संख्या 14 प्रतिशत से अधिक है। राजनीतिक रूप से यह बेहद प्रभावशाली है। जो सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नहीं हैं, वहां भी प्रभाव है। कैबिनेट में गुरु घासीदास की पीढ़ी के एक सदस्य धर्मगुरु बाल दास के बेटे गुरु खुशवंत सिंह को भी लिया गया है। मगर आप कभी नहीं पाएंगे कि गुरु घासीदास के सिद्धांतों को अपनाने के लिए वे प्रदेश में कोई आंदोलन चला रहे हों। छत्तीसगढ़ में एक आंदोलन लखन पाटले चला रहे हैं जो कहते हैं कि केवल वंशज होने के कारण किसी को धर्मगुरु का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उसे मिले जो जीव हत्या और नशा न करे, मांसाहार त्यागे और इसी तरह के गुरु घासीदास के बाकी सिद्धांतों का पालन करे।
दोनों में आएँगे नए प्रभारी?
नए साल में भाजपा और कांग्रेस, दोनों में ही नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है। प्रदेश भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन, पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बन गए हैं। स्वाभाविक है कि उन्हें प्रदेश भाजपा का प्रभार छोडऩा पड़ेगा।
अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस महीने के आखिरी अथवा जनवरी के पहले पखवाड़े में नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है। कुछ ऐसा ही कांग्रेस में भी है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने प्रभारी के दायित्व से मुक्त होने की मंशा जता दी है।
चर्चा है कि पायलट ने कुछ दिन पहले दोबारा हाईकमान को अपनी भावनाओं से अवगत कराया है। वो पूरा समय राजस्थान में देना चाहते हैं। पायलट पहले भी छत्तीसगढ़ में काम करने के अनिच्छुक रहे हैं। चर्चा है कि पायलट की जगह जल्द ही नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है।
इनको बनाया किसने था?

राजनीतिक दलों में कई नियुक्तियां ऐसी हो जाती है जिससे पार्टी संगठन पशोपेश में पड़ जाता है, और सफाई देते नहीं बनता है। कुछ ऐसी ही नियुक्ति भाजपा में हो गई। भाजपा पदाधिकारियों की सूची जारी हुई, तो रायपुर एससी महिला मोर्चा की अध्यक्ष पद पर सावित्री जगत की नियुक्ति कर दी गई। थोड़ी देर बाद पार्टी ने प्रेसनोट जारी किया, और स्पष्ट किया कि सावित्री जगत की नियुक्ति आदेश त्रुटिपूर्ण है। नई नियुक्ति जल्द की जाएगी।
दरअसल, सावित्री की नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद से पार्टी के अंदरखाने में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। सावित्री पार्टी से बगावत कर विधानसभा चुनाव में रायपुर उत्तर सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गई थी। वो बमुश्किल डेढ़ हजार वोट ही हासिल कर पाई। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। मगर नगरीय निकाय चुनाव के ठीक पहले पार्टी में वापिसी हो गई। पार्षद टिकट नहीं मिली तो वो फिर बगावत कर निर्दलीय खड़ी हो गई। सावित्री को बुरी हार का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके कुछ समय बाद उन्हें फिर पार्टी में ले लिया गया। और जब जिलाध्यक्ष बनाया गया, तो पार्टी के अंदरखाने में काफी बवाल मचा। आनन-फानन में नियुक्ति त्रुटिपूर्ण बताकर निरस्त किया गया।
अब पार्टी के भीतर इस बात की जांच हो रही है कि सावित्री जगत को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश किसने की थी।
कुछ ऐसा ही वाक्या कांग्रेस में भी हुआ। ड्रग्स-पिस्तौल के साथ पकड़ाए युवक कांग्रेस के प्रदेश सचिव राहुल ठाकुर को लेकर पार्टी ने सफाई दी कि उनका कांग्रेस से कोई नाता नहीं है। उन्हें 12 अक्टूबर को ही पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। बैक डेट से जारी निष्कासन लेटर में यह बताया गया कि निष्क्रियता की वजह से राहुल ठाकुर को निष्कासित किया गया है।
हड़बड़ी में जारी निष्कासन लेटर पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि युवक कांग्रेस के इतिहास का ये पहला उदाहरण है, जब निष्क्रियता के आधार पर किसी का निष्कासन किया गया है। न सिर्फ युवक कांग्रेस बल्कि अन्य संगठन में निष्कासन सिर्फ इसलिए नहीं होता कि वो पार्टी में ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। दरअसल, पार्टी ने बदनामी से बचने के लिए राहुल ठाकुर को निष्कासित किया है। ये अलग बात है कि निष्कासन के कारण किसी के गले नहीं उतर रही है।
जरूरत से ज़्यादा सहूलियत

नवा रायपुर के नए विधानसभा भवन में तीन दिन का शीतकालीन सत्र बुधवार को निपट गया। नए विधानसभा भवन में पहला सत्र था। करीब 51 एकड़ में फैले भव्य विधानसभा भवन को लेकर विधायकों, और आम लोगों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली। चर्चा है कि अधिकतर विधायक भी नए भवन से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि विधानसभा भवन में सुविधाओं की कोई कमी है, बल्कि यह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है।
विधायकों का तर्क था कि यह इतना बड़ा है कि एक जगह से दूसरे जगह जाना काफी थकाऊ है। सदन को दो सौ सदस्यों के लायक तैयार किया गया है, मगर वर्तमान में 90 सदस्य हैं। कुल मिलाकर आपस में चर्चा के दौरान सत्ता और विपक्ष के कई विधायक यह कहते सुने गए कि पुराना विधानसभा बेहतर था।
विधानसभा सचिवालय के अफसर-कर्मियों के लिए भव्य कमरा है। विधानसभा के जनसंपर्क अधिकारी का कक्ष, चीफ सेक्रेटरी के कक्ष से बड़ा है। एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में जाने में काफी मुश्किल होती है। यहां रखरखाव के लिए भी पुराने विधानसभा के मुकाबले दोगुने से अधिक खर्च होने का अनुमान है। हालांकि यह सौ साल की आगामी जरूरतों को देखकर बनाया गया है, लेकिन फिर भी पुराने विधानसभा का मोह नहीं छूट पा रहा है।
दूबर बर दू असाढ़ - जी राम जी
मनरेगा में केंद्र सरकार अकुशल मजदूरी का सौ प्रतिशत और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत वहन करती थी। व्यवहार में केंद्र और राज्य का अनुपात लगभग 90:10 रहता था। यानी छत्तीसगढ़ जैसे सामान्य राज्य को कुल खर्च का करीब 10 प्रतिशत ही देना पड़ता था।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत छत्तीसगढ़ को केंद्र से 2295.02 करोड़ रुपये मिले हैं। पुराने पैटर्न के हिसाब से राज्य का हिस्सा करीब 255 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। विकसित भारत- जी राम जी बिल 2025 में केंद्र-राज्य हिस्सेदारी को बदलकर 60:40 करने का प्रस्ताव है। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को छोडक़र छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों पर यह नियम लागू होगा। यानी अब राज्य सरकार को कुल खर्च का 40 प्रतिशत देना होगा।
कुल व्यय को कुछ कम कर देते हैं, क्योंकि 100 फीसदी राशि तो इस योजना की आज तक खर्च नहीं हुई। मान लें कि छत्तीसगढ़ ने चालू आवंटन के अनुसार करीब 2550 करोड़ रुपये केंद्र से हासिल किया। तो पुराने पैटर्न में राज्य का हिस्सा 255 करोड़ रुपये का होगा। लेकिन अब नए पैटर्न में राज्य का हिस्सा 1020 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस हिसाब से छत्तीसगढ़ पर करीब 765 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।
इधर, छत्तीसगढ़ सरकार इस समय जबरदस्त वित्तीय दबाव में है। राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए एक के बाद एक ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है। बिजली दरों में 10 से 20 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी की गई और रियायत सीमित की गई। इसी तरह जमीन रजिस्ट्री के लिए कलेक्टर गाइडलाइन रेट्स में कई जगहों पर 100 से 900 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी गई। विरोध के चलते बिजली रियायत में संशोधन करना पड़ा, जमीन रजिस्ट्री की नई गाइडलाइन को वापस लेना पड़ा। इसके चलते राजस्व बढ़ाने के ये दोनों उपाय काम नहीं आए।
वैसे महतारी वंदन योजना में खर्च कुछ कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। लाभार्थी के लिए ई केवाई सी सत्यापन अनिवार्य किया गया है। लोकसभा चुनाव के पहले इस पर कोई बात थी, जिसने आवेदन किया- सबको मिला। इधर, धान खरीदी में टोकन का भारी टोटा है। मामला किसान के जहर पीने तक चला गया है। खरीदी की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले कम है। सरकार कम धान खरीदना चाहती है ताकि भुगतान कम करना पड़े। यह विपक्ष का सदन में लगाया गया आरोप है ।
युवाओं की नाराजगी थामने की कोशिश करते हुए भी सरकार दिखती है। बीते दिनों दो साल की उपलब्धियों को गिनाते हुए वही वायदा दोहराया गया है जो 2023 के विधानसभा चुनाव में किया गया था। तब हजारों सरकारी खाली पदों पर भर्ती की गारंटी थी। हर साल करीब एक लाख लोगों के लिए। मगर, आज 16 लाख से अधिक बेरोजगार केवल रोजगार कार्यालय की फाइलों में दर्ज हैं। जिन्होंने पंजीयन नहीं कराया, उनकी संख्या अलग जोड़ लें।
भीड़ कैसे जाएगी उस दूसरी दुनिया

विधानसभा के नए भवन में शीतकालीन सत्र आज खत्म हो जाएगा। 4 दिन का यह सत्र, पंडरी से लेकर जीरो प्वाइंट तक के तीन लाख लोगों के लिए मानो-अच्छा सत्र हुआ था क्या? जैसी स्थिति में निपट गया। वर्ना 9-10 किमी का यह पूरा इलाका 25 नहीं तो 20 वर्ष से हर सत्र में विधानसभा घेराव के राजनीति प्रदर्शनों से हलाकान रहता था। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, छुट्टी देनी पड़ती थी। मोवा के मेडिकल हब में मरीज, परिजन अस्पताल नहीं पहुंच पाते। फ्लाइट, बस-ट्रेन पकडऩे वालों को घंटों पहले घर छोडऩा पड़ता रहा। रोजी मजदूर, ठेला कारोबारियों को एक दिन के लिए धंधा बंद करना पड़ता। इन सबसे अलग पुलिस प्रशासन की अपनी अलग परेशानी रहती थी। अब इन सबसे मुक्ति ही मिल गई शहर के इस हिस्से को। अब यह सब कुछ 30 किमी दूर नवा रायपुर में होगा। वहां ऐसे प्रदर्शन के लिए दलों की एक नई समस्या होगी। वह है-भीड़ जुटाने की। यहां पंडरी मंडी गेट के पास तो भीड़ पहुंच जाती रही लेकिन वहां के लिए भीड़ जुटाने के साथ लाने ले जाने का भी इंतजाम करना होगा जो महंगा पड़ेगा। क्योंकि भीड़ एक हाथ ले दूजे से ले वाली हो गई है। ऐसे ही हर सत्र में विधानसभा घेराव अब संभव नहीं। साल में एक प्रदर्शन हो जाए तो बहुत है। संभव हो नए शहर को मुक्ति मिले।
जल्द होगी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति?
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से रिक्त पड़े मुख्य सूचना आयुक्त और आठ सूचना आयुक्तों के पदों पर आखिरकार नियुक्तियां हो गईं। पूर्व आईएएस अधिकारी राज कुमार गोयल ने 15 दिसंबर को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ ली, जबकि आठ नए सूचना आयुक्तों ने कल पदभार संभाला। इधर छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग में 2022 से मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त है। दो सूचना आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ का जिक्र किया था, जहां आयोग केवल एक आयुक्त के भरोसे चल रहा था और 35 हजार से ज्यादा अपीलें या शिकायतें लंबित थीं। मार्च 2025 में दो पदों के लिए आवेदन मंगाए गए थे, अप्रैल तक 72 उम्मीदवारों ने दावेदारी की थी और इंटरव्यू की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है। हाईकोर्ट में प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराते हुए याचिका दायर की गई थी, जिसमें भी शासन के पक्ष में फैसला आ चुका है।
केंद्रीय स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के दबाव के चलते ही सही, रिक्तियां भर दी गईं, पर छत्तीसगढ़ में इतनी देरी हो रही है। ऐसा लगता है कि राज्य सरकार को केंद्र के इशारे की जरूरत थी। अब जल्द से जल्द मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हो सकती है।
कब बबा मरही, कब बरा खाबो
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है। एक गरीब व्यक्ति भीख मांग-मांग कर थोड़ा-थोड़ा सत्तू इक_ा करता है। वह सत्तू एक घड़े में भरकर टांट से लटका देता है, नीचे खटिया डालता है और सपनों की दुनिया में खो जाता है। वह सोचता है, अकाल पड़ेगा तो सत्तू 100 रुपये में बिकेगा। उससे बकरियां लूंगा, फिर मेमने होंगे, फिर गाय आएगी, दूध बिकेगा, खूब पैसा होगा, शादी होगीज्। और, जब पत्नी मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं उसे लात मार दूंगा। सपने में मारी गई वही लात असल में घड़े पर पड़ती है। घड़ा टूटता है, सारा सत्तू जमीन पर बिखर जाता है। विधानसभा में वित्त मंत्री का बयान सुनकर यही कहानी याद आ गई। फर्क बस इतना है कि यहां सत्तू नहीं, बल्कि जनता के सपने टांट पर लटकाए जा रहे हैं। टूटने की बस देर है। केंद्र की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कभी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना दिखाया था। अब छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओपी चौधरी सीधे 26 ट्रिलियन की गणित समझा रहे हैं। हकीकत यह है कि आज भी छत्तीसगढ़ की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं और 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। विधायक देवेंद्र यादव की, विजन 2047 पर यह प्रतिक्रिया है। छत्तीसगढ़ में इसके लिए आसान सी कहावत है- कब बूढ़े दादा की मौत होगी तो कब पोते को स्वादिष्ट बड़ा खाने का मौका मिलेगा।
खेलों के लिए बड़े सपने
सरकार के विजन डॉक्यूमेंट-2047 में ग्रोथ हब की परिकल्पना की गई है। खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम चल रहा है। बीसीसीआई क्रिकेट अकादमी की स्थापना कर रही है। इसके लिए नवा रायपुर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के समीप जमीन भी आबंटित की जा चुकी है। इन सबके बीच सरकार कई और खेल अकादमी की स्थापना की कोशिश कर रही है।
पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री से भी यहां एक और क्रिकेट अकादमी की स्थापना के लिए चर्चा चल रही है। इसके अलावा पूर्व अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी और कोच पी गोपीचंद को यहां अपना बैडमिंटन अकादमी स्थापित करने के लिए भी तैयार किया जा रहा है। गोपीचंद की हैदराबाद बैडमिंटन अकादमी से पीवी सिंधु सहित कई नामी खिलाड़ी निकले हैं, जो वर्तमान में देश का नाम रौशन कर रहे हैं।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी की कोशिश है कि प्रदेश में माइकल फेल्प्स की स्विमिंग अकादमी की स्थापना की जाए। इसके लिए वो अकादमी से जुड़े लोगों से चर्चा कर रहे हैं। विख्यात तैराक माइकल फेल्प्स के नाम से मुंबई, दिल्ली, पुणे सहित कई शहरों में अकादमी है। इन सबके बीच दिल्ली से स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अफसरों की एक टीम बस्तर आने वाली है। ये टीम बस्तर में तीरंदाजी, और अन्य अकादमी की स्थापना की संभावना तलाश करेगी, और वहां के खेल प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देने की योजना है, ताकि भविष्य में बस्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलकर सामने आए। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
तो पिछला हिसाब पूछ लेते

बताइए इन बेजुबान जानवरों से निपटने में भी नगर निगम-सरकार फेल हो रही हैं। इस पर सवाल उठाते हमारे एक पाठक ने अपना यह पोस्ट हमसे साझा किया है। उनका कहना है निगम करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी आवारा कुत्तों की समस्या का निराकरण नहीं कर पाया। अब सरकार इन्हें निजी एजेंसियों को सौंपने जा रही है। इस पर फिर वही सवाल सामने आता है कि जिस काम को सरकारी एजेंसियां पूरा नहीं कर पाती उन्हीं कामों को फिर निजी एजेंसियां कैसे पूरा कर लेती हैं? क्या निजी एजेंसियों में देश से बाहर के लोग काम करते हैं? उनके पास ऐसी कौन सी अतिरिक्त योग्यता होती है जो सरकारी एजेंसियां के पास नहीं होती?
आखिर क्यों फेल हो जाती है सरकारी एजेंसियां और क्यों पास हो जाती है निजी एजेंसियां? चाहे सरकारी अस्पताल हो,स्कूल हो या फिर बस सेवा या टेलीकॉम सेक्टर हर क्षेत्र में निजी एजेंसी/कंपनियों का ही क्यों बोलबाला है? क्यों सरकारी संस्थाएं इसमें फेल होती नजर आती है?
फिर अगर आवारा कुत्तों को भी नहीं संभाल पर रहे है तो फिर वो करते क्या हैं? अब निजी एजेंसियों को फिर होगा करोड़ों का भुगतान,यानी किसी न किसी का सर कढ़ाई में होगा ही। तो क्या इतने वर्षों से कुत्तों की नसबंदी के नाम पर खेल ही हो रहा था। अब उन्हें पकडऩे में आपके हमारे टैक्स के पैसे का खेल होने जा रहा है। इनकी जुबान होती तो पूछ बैठते पिछले धरपकड़ और नसबंदी अभियान में कितना खर्च हुआ और हमारी संख्या बढ़ी या घटी।
सरकारी दफ्तर बिजली बचाएंगे ?
केंद्र सरकार की रिवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम -आरडीएसएस के तहत देशभर में स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। उद्देश्य यह बताया गया है कि बिजली वितरण कंपनियों- डिस्कॉम की तकनीकी और एटीएंडसी लॉस को 12 से 15 फीसदी तक कम किया जाए, बिलिंग अधिक दक्षता के साथ हो और बिजली कंपनियों को घाटे से बाहर लाया जाए। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के पिछले माह के अपडेट्स से पता चलता है कि देशभर में 24 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य दिसंबर माह के अंत तक रखा गया था लेकिन सिर्फ 4 करोड़ 76 लाख लग पाए हैं। छत्तीसगढ़ में करीब 59-60 लाख उपभोक्ता हैं। सिंचाई के लिए बिजली लेने वाले किसानों को छोडक़र सभी घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक और सरकारी संस्थाओं में स्मार्ट मीटर लगाया जाना है। मामला सरकार के राजस्व में वृद्धि से जुड़ा है, इसलिये देर-सबेर लक्ष्य तो पूरा कर ही लिया जाएगा। यहां 47 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया जा चुका है।
स्मार्ट मीटर प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह से काम करेंगे। ये मीटर रियल-टाइम में खपत रिकॉर्ड करते हैं और डेटा सीधे डिस्कॉम को भेजते हैं। मैनुअल रीडिंग की जरूरत नहीं पड़ती। दावा है कि इससे गलत बिलिंग और चोरी कम हो जाएगी। प्रीपेड मोड में रिचार्ज खत्म होने पर बिजली अपने आप कट जाएगी।
अब छत्तीसगढ़ सरकार ने तय किया है कि सरकारी विभागों में प्री-पेड आधार पर बिजली सप्लाई की जाएगी। इस समय सरकारी विभागों का बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पर करीब 3000 करोड़ का बकाया है। इनमें से दो तिहाई- करीब 2000 करोड़ नगरीय निकायों का ही है, जिनकी वित्तीय स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। प्री-पेड लागू होने के बाद विभागों को न केवल पिछला बकाया जमा करना होगा, बल्कि बिजली कटने से पहले रिचार्ज भी कराना होगा। तीन हजार करोड़ इतनी भारी भरकम राशि है कि इसके लिए संभवत: बजट में अलग से प्रावधान करना पड़े। ये बकाया दो चार महीनों का नहीं- सालों का हो सकता है। हर माह बिजली की बिलिंग होती है। तय समय पर राशि जमा नहीं करने पर सरचार्ज बढ़ाया जाता है। खपत की गई यूनिट का स्लैब भी महंगे दर में चला जाता है। पर, विभागों के प्रमुखों को इसकी परवाह नहीं होती- क्योंकि उन्हें रकम जेब से नहीं भरनी होती। यदि वास्तव में यह व्यवस्था लागू हो गई तो जिस तरह वेतन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किया जाना होता है- स्मार्ट मीटर को रिचार्ज करने के लिए भी करना होगा। शायद बिजली की खपत में कुछ अनुशासन दिखे और साहबों के खाली चेंबर के एसी चालू न मिलें।
बच्चों का स्टार्ट-अप बिजनेस

कोरबा जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सतरेंगा की ओर जाते रास्ते में रविवार को सडक़ किनारे एक छोटी-सी दुकान ने पर्यटकों का ध्यान खींच लिया। चार नन्हे बच्चे जमीन पर बोरी बिछाकर मौसंबी बेचते दिखे। मुस्कान, आत्मविश्वास और मेहनत के जज्बे के साथ।
खेल-कूद की उम्र में ये बच्चे बाजार, लागत, मुनाफा और साझेदारी को व्यवहार में उतार रहे हैं। बच्चों ने बताया कि छुट्टी का दिन है। चारों ने अपनी-अपनी जेब से थोड़े-थोड़े पैसे मिलाए- कुछ किलो मौसंबी खरीदी। अब वही फल 10-20 रुपये की चिल्हर में राहगीर, पर्यटकों को बेच रहे हैं। जो भी कमाई होगी, उसे आपस में बराबर बांट लेंगे। जब ‘स्टार्ट-अप’ शब्द बड़े शहरों और कॉर्पोरेट से जुड़ा लगे, तब ये ग्रामीण बच्चे बिना ऐप-इंटरनेट के अपने दम पर अपनी क्षमता प्रदर्शित रहे हैं।
फेसबुक ने मजबूरी में बनाए औजार

फेसबुक पर लोग अपने को नापसंद पोस्ट को सामने से हटा सकते हैं, ताकि वह दुबारा न दिखे। इससे भी अधिक जो नापसंद हो, उसे पोस्ट करने वाले व्यक्ति की किसी भी पोस्ट को 30 दिन के लिए सामने आने से रोका जा सकता है। इसके बाद भी जो लोग न सुधरें, उन्हें अनफॉलो किया जा सकता है, ताकि उनकी कोई भी पोस्ट न दिखे। और अगर इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक पोस्ट है, तो उस पोस्ट की शिकायत फेसबुक से की जा सकती है। लेकिन अगर इसके बाद भी बात न बने, तो ऐसे किसी व्यक्ति या पेज को पूरी तरह से ब्लॉक किया जा सकता है।
फेसबुक से यह पूछा गया कि इतने तरह के नकारात्मक विकल्प उसने क्यों बनाए हैं, तो उसने कहा कि हिन्दी के लेखकों की किताब जब आती हैं, तब वे जिस अंदाज में उसके बारे में पोस्ट करते हैं, उससे बचने के लिए लोगों की मांग पर फेसबुक को ये औजार बनाने पड़े।
नई विधानसभा में सबसे पहले
1 नवंबर को उद्घाटित छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन में पहले शीतकालीन सत्र का आज विधिवत पहला दिन था। इस मेडन (पहले)अवसर पर पहली-पहली कार्यवाही को लेकर विधायक, स्पीकर ने अपने अपने तरीके से उद्धृत किया। जैसे पहला प्रश्न काल, उसमें पहला प्रश्न, उत्तर देने वाले पहले मंत्री आदि आदि। क्योंकि यह सारे तथ्य नए भवन में नया इतिहास में दर्ज होने हैं। आज का पहला प्रश्न भाजपा के वरिष्ठ विधायक धरमलाल कौशिक ने महिलाओं की शुचिता पर सेनेटरी नैपकिन से जुड़ा प्रश्न पूछा। पहला जवाब महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने दिया। यह उल्लेख स्वयं कौशिक ने किया। इस पर स्पीकर रमन सिंह ने कहा पहला दिन पहला प्रश्न एक तरफ धर्म, दूसरी तरफ लक्ष्मी। कुछ ऐसा ही संयोग रोजगार कौशल विकास मंत्री गुरू खुशवंत के साथ भी जुड़ा। तीन माह पहले मंत्री बने खुशवंत का आज पहला प्रश्नकाल वह भी नए भवन में। स्पीकर ने कहा -गुरू खुशवंत मंत्री बनने के बाद पहली बार उत्तर देने जा रहे हैं। प्रश्न कर्ता सदस्य लखेश्वर बघेल वरिष्ठ विधायक हैं। बघेल जी अच्छा प्रश्न करिए, और अच्छे से जवाब लीजिए। इस पर भाजपा के अजय चंद्राकर ने कहा कि लखेश्वर जैसे ही प्रश्न का मैं 5 साल तक उमेश पटेल (पूर्व मंत्री) से जवाब नहीं ले पाया। उमेश जी ने बेरोजगारों को ठगा था।
जल है तो कल है...
धर्म की कुछ बातें भी पर्यावरण की भी हो सकती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ में दिखी इस गाड़ी के पीछे लिखा है, सारी समस्या का हल, एक लोटा जल।
अब यह जल सूरज को चढ़ाने की बात हो रही है, या एक लोटा जल बचाने की बात हो रही है, या किसी प्यासे को पिलाने की बात हो रही है, यह तो नहीं पता, लेकिन यह तो तय है कि पर्यावरण के हिसाब से आने वाले दशकों में जल सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है, देशों के बीच जंग भी पानी को लेकर होगी, ऐसा भी कई लोगों का अंदाज है।
शाह का मिशन बस्तर
नक्सलियों के खिलाफ अभियान चल रहा है। इन सबके बीच केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार बस्तर दौरा कर रहे हैं। जब भी उन्हें बस्तर में किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया जाता है, तो वो हामी भर देते हैं। शाह पिछले दिनों डीजीपी-एसपी कॉन्फ्रेंस में शिरकत करने रायपुर आए थे, तो उस वक्त डिप्टी सीएम अरुण साव ने बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह में शामिल होने का आमंत्रण दिया था। शाह ने तुरंत सहमति दे दी, और वो शनिवार को बस्तर ओलंपिक के समापन कार्यक्रम में उपस्थित हुए।
शाह का बस्तर दौरा हो रहा है, तो कांग्रेस के नेता सवाल भी उठा रहे हैं। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने पूछ लिया, कि शाह बार-बार बस्तर क्यों आ रहे हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि वो (शाह) मणिपुर क्यों नहीं जाते हैं? पूर्व सीएम ने आरोप लगाया कि बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के साथ ही अडानी की एंट्री हो जाएगी। पूर्व सीएम के बयान पर भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन अमित शाह ने बस्तर ओलंपिक के समापन मौके पर अपने इरादे साफ किए।
उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में बस्तर के सात जिले प्रदेश के सबसे विकसित आदिवासी जिले बनेंगे। शाह ने अपने उद्बोधन में बस्तर प्लान से भी अवगत कराया, और बताया कि किस तरह सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने वनोपज आधारित उद्योग लगाने, पर्यटन को बढ़ावा देकर बस्तर को विकसित करने के लक्ष्य की जानकारी दी। शाह ने साफ तौर पर संकेत दिए कि वो बस्तर की विकास योजनाओं की सीधी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। सहकारिता विभाग, अमित शाह के पास है। ऐसे बस्तर के विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका अहम होगी। देखना है कि आगे क्या होता है।
घरवालों का इंतजाम

एक आदमी अपने घर में लोगों को लगातार यह बोल-बोलकर निराश करते रहता था कि उसकी जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है। जब कोई दिन में चार बार ऐसी बात करे, तो उसका असर तो खत्म होना ही था। एक दिन रात को खाने के साथ टेबिल पर उसे एक छोटा सा सीलबंद प्याला भी मिला जिस पर लेबल लगा था- गंगाजल।
उसने हैरान होकर पूछा कि यह क्या है?
परिवार ने कहा कि आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है, आप ही सारे वक्त ऐसा बोलते हैं, इसलिए थोड़ी सी तैयारी कर रखी है।
लिवर को यकृत कहना कैसा लगेगा?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उठाए गए कई कदमों से एक यह है कि हिंदी के गौरव को बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए ज्यादा से ज्यादा पाठ्यक्रम हिंदी में हों। कई हिंदी भाषा-भाषी राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाते हुए मेडिकल जैसी कठिन पढ़ाई को भी हिंदी में शुरू करने का फैसला किया। इनमें मध्य प्रदेश सबसे पहला राज्य था- जहां मेडिकल की किताबें हिंदी में आ गई और पढ़ाई शुरू हो गईं। इसके बाद राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकारों ने भी घोषणा की। छत्तीसगढ़ में भी हिंदी में पढ़ाई का पूरा इंतजाम कर लिया गया। भावनात्मक तौर पर यह एक अच्छा फैसला था क्योंकि इन राज्यों के अधिकांश युवा हिंदी से ही हायर सेकेंडरी परीक्षा पास किए हुए होते हैं। अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़े हों तब भी हिंदी से उनका गहरा संपर्क होता है, मातृभाषा है। मगर, हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई छात्र करना नहीं चाहते। छत्तीसगढ़ में बीते सत्र में पूरे प्रदेश के केवल 2 छात्रों ने हिंदी में परीक्षा देने का विकल्प चुना था, जबकि अभी जो सत्र चालू हुआ है- उसमें एक भी छात्र नहीं है। डीएमई ने खुद यह बात मीडिया से कही है। यह जानकारी भी दी है कि हिंदी पढ़ाई के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा तैयार किया गया है। मध्यप्रदेश सहित दूसरे राज्यों का भी यही हाल है- जहां हिंदी में पढ़ाई और परीक्षा नगण्य है। किताबें लाइब्रेरियों में रखी गईं, यहां तक कि परीक्षा शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन भी दिए गए, फिर भी छात्र दूर भाग रहे हैं।
मेडिकल टर्मिनोलॉजी दरअसल अंग्रेजी पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल, रिसर्च पेपर, दवाइयां, उपकरण और ग्लोबल स्टैंडर्ड सब अंग्रेजी में हैं। हिंदी अनुवाद बोलें तो हिंदी नहीं हिंग्लिश है जैसे लिवर को लिवर ही लिखना पड़ रहा है। इसे यदि यकृत लिखकर पढ़ाया जाए तो छात्र और शिक्षक दोनों सिर पकड़ लेंगे। इधर, नीट-पीजी की प्रवेश परीक्षाएं तो हिंदी में शुरू हुई नहीं हैं। इंटरनेशनल रिसर्च पेपर, नई किताबें सबसे पहले अंग्रेजी में छपकर आती हैं। हिंदी में तो सिर्फ पाठ्यक्रम की किताबें मिल रही हैं, यदि प्रैक्टिस, रिसर्च और करियर का दायरा बढ़ाने की जरूरत हुई तो अंग्रेजी की ओर देखना पड़ेगा। यही वजह है कि हिंदी पृष्ठभूमि वाले छात्र भी अंग्रेजी चुन रहे हैं।
10 करोड़ दिलों तक पहुंची लावण्या

पिछड़े वर्ग से आने वाली जगदलपुर के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक की बेटी रील क्रिएटर लावण्या दास मानिकपुरी इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त हलचल मचा रही हैं। अपने घर के छोटे से कमरे में, सीमित संसाधनों के बीच बनाई गई उनकी इंस्टाग्राम रील जिसमें वह अफगान जलेबी गाने पर कमर पर तलवार संतुलित करते हुए नृत्य करती दिख रही हैं। 3 दिसंबर को रिलीज इस रील ने आज करीब 10 दिनों में 10 करोड़ से ज्यादा व्यूज़ बटोर लिए हैं। इस एक मिनट की रील पर 60 लाख से अधिक लाइक्स भी आ चुके हैं और उनके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढक़र 15 लाख से ज्यादा हो गई है। कुछ दिन पहले तक जिनका नाम सीमित दायरे में था, आज वही लावण्या देश-विदेश में देखी और सराही जा रही हैं।
लावण्या के पास न बड़ा स्टूडियो है, न भारी संसाधन। बस मेहनत और अभ्यास ने उसे मशहूर कर दिया। उसके और भी कई रील्स हैं, जो करोड़ों में देखे जा चुके हैं। सोशल मीडिया नायाब चीज है। यहां प्रतिभा की तरफ लोगों का ध्यान गया तो रातों-रात मशहूर हुआ जा सकता है।
केन्द्रीय सूचना आयोग में छत्तीसगढ़
केन्द्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), और आठ सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि आयोग के गठन के बाद पहली बार सारे पदों पर नियुक्ति हुई है। पद पाने वालों में छत्तीसगढ़ कैडर के रिटायर आईपीएस अफसर स्वागत दास भी हैं, जिन्हें सूचना आयुक्त बनाया गया है।
आईपीएस के 87 बैच के अफसर स्वागत दास लंबे समय तक आईबी में रहे। वो स्पेशल डायरेक्टर थे, और फिर केन्द्र सरकार में आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव के पद से रिटायर हुए। यद्यपि उनका नाम यहां डीजीपी पद के लिए भी चर्चा में रहा। मगर अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें केन्द्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया है।
केन्द्रीय मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर राजकुमार मीणा की नियुक्ति की गई है, जो कि 90 बैच के आईपीएस अफसर हैं। अन्य सूचना आयुक्तों में सुरेन्द्र सिंह मीणा, आशुतोष चतुर्वेदी, सुधा रानी रेलंगी, पीआर रमेश, खुशवंत सिंह सेठी, जया वर्मा सिन्हा, संजीव कुमार जिंदल हैं। ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञ माने जाते हैं।
विधानसभा की प्रतिमाएं और संयोग

कल से नई नवेली विधानसभा में कामकाज शुरू होने जा रहा है। 51-52 एकड़ के परिसर में दरो-दीवार सब कुछ नया-नया सा होगा। खर्च भी भारी भरकम हुआ है। पुराने भवन की कोई भी कामकाजी वस्तु नए भवन में रियूज़ नहीं की जा रही है। हालांकि 25 वर्ष के इतिहास को सहेज कर सम्मान का संकल्प दोहराया जा रहा है। यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, युवा शक्ति के प्रतीक स्वामी विवेकानंद और संविधान के प्रतीक अशोक स्तंभ की प्रतिमाएं शिफ्ट होंगी ।
इनमें से ध्यान मग्न महात्मा गांधी, और अशोक स्तंभ पहली विधानसभा के समय स्थापित किए गए थे। और स्वामी विवेकानंद चौथी विधानसभा के समय। इन प्रतिमाओं के साथ एक और संयोग जुड़ा है। वह यह कि तीनों प्रतिमाएं हमारे छत्तीसगढ़ भिलाई के शिल्पकार पद्म श्री जेएम. नेल्सन ने बनाए हैं। यही एक अहम वजह भी है कि नई विधानसभा में नई प्रतिमाएं बनवाने के बजाय इन्हें ही स्थापित करने का निर्णय लिया गया। यह भी बता दें कि नए भवन परिसर में स्थापित छत्तीसगढ़ निर्माता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की प्रतिमा को भी नेल्सन ने ही आदमकद आकार दिया है। अब तीनों प्रतिमाएं अटलजी के पास ही स्थापित की जाएंगी। यह कार्य शीत सत्र पूरा होने के बाद होगा।
नौकर-चाकर भी करोड़पति

पिछले दिनों आयकर की टीम ने रायपुर के एक स्टील कारोबारी के यहां छापेमारी की। कारोबारी का परिवार मूलत: हरियाणा का है, और कुछ साल पहले यहां आकर कारोबार शुरू किया था। उन्होंने रायपुर में तीन स्पंज आयरन प्लांट खड़ा किया, और जमीनों में काफी कुछ निवेश किए। और आयकर की टीम जांच में जुटी, तो कई बेनामी निवेश के खुलासे होने लगे।
आयकर की टीम ने 42 ठिकानों पर छापे डाले हैं। आमतौर पर जांच दो-तीन दिनों में ही पूरी हो जाती है लेकिन यह छापा लंबा चला और आयकर की टीम हफ्ते भर तक जांच करती रही। कारोबारी अग्रवाल परिवार के सीए के यहां भी आयकर टीम ने दबिश दी। यह बात छनकर सामने आई है कि स्टील कारोबारी ने अपने ड्राइवर, नौकर-चाकरों के नाम से करोड़ों रुपए निवेश किए हैं। उनके नाम पर करीब 20 से अधिक बैंक खातों का पता चला है। यानी नौकर-चाकर भी कागजों में करोड़पति बन गए हैं।
आयकर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में बेनामी निवेश का अब तक का सबसे बड़ा मामला है। कारोबारी परिवार राजधानी रायपुर के एक धार्मिक ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं। जिसकी सत्ता की गलियारों में अच्छी-खासी दखल है। फिलहाल तो जांच-पड़ताल जारी है। कारोबारी कितना सरेंडर करते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
कोपरा को मिली राष्ट्रीय पहचान

कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की रामसर सूची में शामिल कर लिया गया है। छत्तीसगढ़ के लिए यह उपलब्धि ऐतिहासिक है। बिलासपुर शहर से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित कोपरा जलाशय पक्षियों, जलीय जीवों और वनस्पतियों का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। यहां प्रवासी पक्षियों की आवाजाही इस आर्द्रभूमि की समृद्धि को दर्शाती हैं, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल गई है। पर्यावरण व पक्षी प्रेमी इसकी लंबे समय से मांग कर रहे थे। इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की संख्या बढक़र 96 हो गई है। मगर, रामसर दर्जा मिलने के बाद लोगों को आदत डालनी होगी कि जलाशय की सुरक्षा की जाए। वन विभाग ने एक बोर्ड लगाकर चेतावनी दे दी है, जिसमें बताया गया है कि अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार और प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ जैसी गतिविधियों पर जेल भी हो सकती है। कोपरा जलाशय से कुछ दूर से ही नेशनल हाईवे निकली है। हालांकि शिकारियों को रोकने के लिए ग्रामीण पहले से ही सतर्क हैं, पर गाडिय़ों के धुएं और शोर की समस्या अब भी बनी हुई है।
केन्द्रीय सूचना आयोग में स्वागत दास
केन्द्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), और आठ सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि आयोग के गठन के बाद पहली बार सारे पदों पर नियुक्ति हुई है। पद पाने वालों में छत्तीसगढ़ कैडर के रिटायर आईपीएस अफसर स्वागत दास भी हैं, जिन्हें सूचना आयुक्त बनाया गया है।
आईपीएस के 87 बैच के अफसर स्वागत दास लंबे समय तक आईबी में रहे। वो स्पेशल डायरेक्टर थे, और फिर केन्द्र सरकार में आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव के पद से रिटायर हुए। यद्यपि उनका नाम यहां डीजीपी पद के लिए भी चर्चा में रहा। मगर अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें केन्द्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया है।
केन्द्रीय मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर राजकुमार मीणा की नियुक्ति की गई है, जो कि 90 बैच के आईपीएस अफसर हैं। अन्य सूचना आयुक्तों में सुरेन्द्र सिंह मीणा, आशुतोष चतुर्वेदी, सुधा रानी रेलंगी, पीआर रमेश, खुशवंत सिंह सेठी, जया वर्मा सिन्हा, संजीव कुमार जिंदल हैं। ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञ माने जाते हैं।

विधानसभा की प्रतिमाएं और संयोग
कल से नई नवेली विधानसभा में कामकाज शुरू होने जा रहा है। 51-52 एकड़ के परिसर में दरो-दीवार सब कुछ नया-नया सा होगा। खर्च भी भारी भरकम हुआ है। पुराने भवन की कोई भी कामकाजी वस्तु नए भवन में रियूज़ नहीं की जा रही है। हालांकि 25 वर्ष के इतिहास को सहेज कर सम्मान का संकल्प दोहराया जा रहा है। यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, युवा शक्ति के प्रतीक स्वामी विवेकानंद और संविधान के प्रतीक अशोक स्तंभ की प्रतिमाएं शिफ्ट होंगी ।
इनमें से ध्यान मग्न महात्मा गांधी, और अशोक स्तंभ पहली विधानसभा के समय स्थापित किए गए थे। और स्वामी विवेकानंद चौथी विधानसभा के समय। इन प्रतिमाओं के साथ एक और संयोग जुड़ा है। वह यह कि तीनों प्रतिमाएं हमारे छत्तीसगढ़ भिलाई के शिल्पकार पद्म श्री जेएम. नेल्सन ने बनाए हैं। यही एक अहम वजह भी है कि नई विधानसभा में नई प्रतिमाएं बनवाने के बजाय इन्हें ही स्थापित करने का निर्णय लिया गया। यह भी बता दें कि नए भवन परिसर में स्थापित छत्तीसगढ़ निर्माता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की प्रतिमा को भी नेल्सन ने ही आदमकद आकार दिया है। अब तीनों प्रतिमाएं अटलजी के पास ही स्थापित की जाएंगी। यह कार्य शीत सत्र पूरा होने के बाद होगा।

नौकर-चाकर भी करोड़पति
पिछले दिनों आयकर की टीम ने रायपुर के एक स्टील कारोबारी के यहां छापेमारी की। कारोबारी का परिवार मूलत: हरियाणा का है, और कुछ साल पहले यहां आकर कारोबार शुरू किया था। उन्होंने रायपुर में तीन स्पंज आयरन प्लांट खड़ा किया, और जमीनों में काफी कुछ निवेश किए। और आयकर की टीम जांच में जुटी, तो कई बेनामी निवेश के खुलासे होने लगे।
आयकर की टीम ने 42 ठिकानों पर छापे डाले हैं। आमतौर पर जांच दो-तीन दिनों में ही पूरी हो जाती है लेकिन यह छापा लंबा चला और आयकर की टीम हफ्ते भर तक जांच करती रही। कारोबारी अग्रवाल परिवार के सीए के यहां भी आयकर टीम ने दबिश दी। यह बात छनकर सामने आई है कि स्टील कारोबारी ने अपने ड्राइवर, नौकर-चाकरों के नाम से करोड़ों रुपए निवेश किए हैं। उनके नाम पर करीब 20 से अधिक बैंक खातों का पता चला है। यानी नौकर-चाकर भी कागजों में करोड़पति बन गए हैं।
आयकर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में बेनामी निवेश का अब तक का सबसे बड़ा मामला है। कारोबारी परिवार राजधानी रायपुर के एक धार्मिक ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं। जिसकी सत्ता की गलियारों में अच्छी-खासी दखल है। फिलहाल तो जांच-पड़ताल जारी है। कारोबारी कितना सरेंडर करते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
रविवार से सत्र की शुरूआत इसलिए...
विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 दिसंबर यानी रविवार से शुरू हो रहा है। यह सातवां सत्र है। आम तौर पर शनिवार, और रविवार को विधानसभा का अवकाश रहता है, लेकिन इस बार छुट्टी के दिन रविवार से ही सत्र की शुरुआत हो रही है।
राज्य बनने के बाद पहला विधानसभा का सत्र राजकुमार कॉलेज के जशपुर हॉल में 14 दिसंबर 2000 को हुआ था। हालांकि सदन की कार्रवाई के पहले दिन कुछ विपक्षी कांग्रेस सदस्य गैरहाजिर रह सकते हैं। इसकी वजह है कि 14 तारीख को ही दिल्ली में कांग्रेस की बड़ी रैली-सभा होने जा रही है।
सभा में देशभर के कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री उमेश पटेल के साथ ही कई विधायक सभा में शिरकत करने दिल्ली जा रहे हैं।
हालांकि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत को भी दिल्ली जाना था, लेकिन चूंकि वो विधायक दल के मुखिया हैं, इसलिए वो यहां रहकर सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेंगे। पहले दिन प्रश्नकाल-ध्यानाकर्षण नहीं होगा। सरकार की तरफ से विजन-2047 को लेकर प्रेजेंटेशन दिया जाएगा। ऐसे में सदन की कार्रवाई जल्द निपटने के आसार हैं
शादी बहरीन- बिलासपुर की और गूगल
इस वर्ष के शादियों के मुहूर्त खत्म हो रहे हैं। इस दौरान इनमें शामिल बराती-घराती आमंत्रित मेहमानों के बीच एक चर्चा रही अन्न की बर्बादी कैसे रूके। जरूरत के मुताबिक खाद्यान्न लेने के बजाय प्लेट भर लेकर छोडऩे की आदत कैसे छूटे। वैसे शुगर बीपी, अपच जैसे समस्या से, प्लेट के भराव में कमी आई है। हम यह इसलिए कह, बता रहे कि हाल में बिलासपुर में एक शादी हुई। बिलासपुर मूल के देवांगन परिवार ने बहरीन से आकर अपने बेटे का विवाह किया। बहु बिलासपुर की है जो अब पति के साथ यूरोप में रहेगी। यह परिवार शादी में यहां के खान-पान पर दांतों तले उंगली दबाते रहा। मेहमानों के हाथ में भरे भरे प्लेट देख कहते रहे कितना खाते हैं और कितना बर्बाद कर रहे। और एक शादी में कितनी बार खाते हैं।
एक परिजन से रहा नहीं गया तो पूछ बैठा। जवाब मिला बहरीन में शादी एक ही बार लंच या डिनर बस..चाहे घराती हो बराती या आमंत्रित। और प्लेट में कुछ ग्राम बिरयानी, कुछ खजूर और हलवा बस। सवाल करने वाले से रहा नहीं गया। उसने गूगल पर सच्चाई क्लिक किया तो यह जवाब मिला-बहरीन में शादी का खाना पारंपरिक और स्वादिष्ट होता है, जिसमें मचबूस (मसालेदार चावल और मांस/मछली), कूजी (चावल के साथ भरवां मेमना), और सलूना (सब्जिय़ों का स्टू) जैसे मुख्य व्यंजन होते हैं, जिन्हें खुब्ज (रोटी) के साथ खाया जाता है। मीठे में मुहम्मर (खजूर और गुलाब जल), रहश, और खानफरुश (पेस्ट्री) जैसे पकवान होते हैं, और गहवा (कॉफी) गर्मजोशी से परोसी जाती है, जो बहरीनी शादियों में मेहमानों को भरपूर और यादगार भोजन का अनुभव कराता है।
सूचना आयोगों में नियुक्ति अगले सप्ताह?
संसद का सत्र चल रहा है। इस दौरान केन्द्रीय सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए भी दिल्ली में बैठक होने वाली है। इससे परे छत्तीसगढ़ में भी मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर हलचल है।
छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस वजह से यहां नियुक्ति की प्रक्रिया रूक गई। हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले ही नियुक्ति से जुड़ी याचिकाओं को निराकृत कर दिया है। इसके बाद मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। प्रदेश में मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा सूचना आयुक्त के दो पद खाली हैं। इसके लिए आवेदन बुलाए गए थे। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू हो चुका है। विधानसभा का सत्र 14 तारीख से शुरू हो रहा है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सत्र की अवधि में सीएम बैठक कर नियुक्ति कर सकते हैं। मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए पूर्व सीएस अमिताभ जैन, पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा सहित दर्जनभर से अधिक रिटायर्ड अफसरों, और अन्य अभ्यर्थियों ने इंटरव्यू दिए थे। अमिताभ जैन रिटायरमेंट के बाद अभी उन्हें कोई और दायित्व नहीं दिया गया है। ऐसे में उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
समर्पण की जीवंत तस्वीर
छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ प्रेस-फोटोग्राफर गोकुल सोनी फेसबुक पर अपना देखा सच खूबसूरती से बताते हैं। अभी उन्होंने लिखा है- क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में इतनी सजी-संवरी हरियाली देखी है?
यह तस्वीर रायपुर के के.के. रोड, जयस्तंभ चौक के आगे स्थित क्चस्हृरु दफ्तर की है। हैरानी की बात यह है कि यहाँ फैली हरियाली सरकार के एक भी पैसे से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के समर्पण, प्रेम और जिम्मेदारी से सींची गई है।
इस ऑफिस में अब्दुल खलील केयरटेकर हैं, लेकिन सिर्फ केयरटेकर कहना उनके समर्पण के साथ अन्याय होगा। खलील साहब ने तीन सौ से ज़्यादा गमले, विभिन्न पौधे, मिट्टी, खाद—सब कुछ अपनी जेब से खरीदकर लगाया है। पानी देना, देखभाल करना, सफाई करना—यह सब वे रोज़ खुद करते हैं। विभाग की ओर से उन्हें इस काम के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता। वे यह सब सिर्फ पर्यावरण प्रेम और अपनी खुशी के लिए करते हैं।
खलील साहब का इस जगह से रिश्ता भी पुराना और गहरा है। जब यह ज़मीन बिल्कुल खाली पड़ी थी, उसी दौर से वे यहाँ जुड़े हुए हैं। 4 फरवरी 1994 को जब तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने तारघर भवन का भूमि पूजन किया था, तभी से अब्दुल खलील यहाँ सेवा दे रहे हैं। 10 अक्टूबर 1996 को भवन बनकर तैयार हुआ और तारघर स्थापित हुआ—तब से वे केयरटेकर और जनरेटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। तीन दशक बाद भी उनका यह सफर बिना रुके जारी है।
आज भी सुबह-सुबह आप उन्हें पौधों में खाद-पानी देते, सूखे पत्ते हटाते, नई कलियों को सहेजते देख सकते हैं। उन्होंने इस सरकारी दफ्तर को सिर्फ कार्यस्थल नहीं, एक जीवंत बगीचा बना दिया है—जहाँ हर पौधा उनके श्रम और संवेदनशीलता की खामोश कहानी सुनाता है।
बृजमोहन के अलावा देवजी भी
प्रदेश में जमीन की गाइडलाइन दरों की वृद्धि से जुड़ा विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस सिलसिले में सरकार ने गाइडलाइन दरों का पुनरीक्षण प्रस्ताव मांग कर कुछ हद तक मामले को ठंडा करने की कोशिश भी की है। बावजूद इसके भाजपा के भीतर ही गाइडलाइन दरों में वृद्धि को वापस लेने की मांग जोर पकड़ रही है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो खुले तौर पर गाइडलाइन दरों में वृद्धि पर असहमति जताई है, और अब पूर्व विधायक देवजी पटेल भी गाइडलाइन दरों में वृद्धि के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। देवजी पटेल ने सीएम विष्णुदेव साय को चि_ी लिखी है। पत्र में उन्होंने कहा कि गाइडलाइन की दरों में पुनरीक्षण हर साल होना चाहिए, मगर सरकार के सिपहसलारों के चलते नियंत्रित रूप से पुनरीक्षण नहीं किया गया, और वर्तमान सरकार के समय से ही एकमुश्त 8-9 वर्षों के पुनरीक्षण का नतीजा एक साथ 50 से 500 फीसदी तक वृद्धि स्पष्ट रूप से दृष्टिगत हो रहा है।
देवजी ने कहा कि सरकार के उच्चाधिकारियों द्वारा बिना सोचे समझे एकमुश्त वृद्धि जनता के लिए नासूर बन गया है। इसका नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में सरकार के खिलाफ माहौल बन गया है। उन्होंने कहा कि गाइडलाइन दरों में इतनी वृद्धि संभवत: पहली बार हुई है। अविभाजित राज्य के समय भी इस प्रकार की घटना नहीं हुई। परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ प्रदेश की आम जनता चाहे वह किसान हो, या बिल्डर हो, या आमजन सभी लिए शहरी-ग्रामीण क्षेत्र के जमीन संबंधी लेनदेन में इसका असर दिख रहा है।
प्रदेश के रजिस्ट्री कार्यालयों में वीरानी छाई हुई है। देवजी ने कहा कि प्रदेश की जनता के हित में जमीन की गाइडलाइन की दरों में वृद्धि के आदेश को निरस्त किया जाना चाहिए। देव जी के पत्र पर तो सरकार का रुख सामने नहीं आ पाया है। मगर इसे नजर अंदाज कर पाना मुश्किल होगा।
कब तक चलेगा जननी सुरक्षा नाटक?
आदिवासी बाहुल्य सरगुजा के लोगों को दो बार गर्व करने का मौका मिला। एक बार 2013 में कांग्रेस की सरकार बनी तो टी.एस. सिंहदेव प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने उसके बाद दूसरी बार श्याम बिहारी जायसवाल। यहां लोगों को लगा था कि अब तो अपने इलाके का स्वास्थ्य ढांचा चमक जाएगा, मां-बच्चों की जान नहीं जाएगी। लेकिन कुछ भी नहीं बदला, बल्कि और बदतर हो गया। सरगुजा की गर्भवती माताएं और उनके नवजात आज भी एंबुलेंस के इंतजार में, अस्पताल के बंद ताले के सामने या रास्ते में दम तोड़ रहे हैं। व्यवस्था की नाकामी क्रूर विडंबना ही बनी रह गई है।
सूरजपुर की कविता सिंह सोमवार-मंगलवार की रात प्रसव पीड़ा लेकर जिला अस्पताल पहुंचीं। उनका बीपी 180 पहुंच गया था। यह हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का साफ-साफ संकेत था। प्रोटोकॉल कहता है कि ऐसे में पहले बीपी कंट्रोल किया जाए, फिर रेफर करें। लेकिन यहां से तुरंत रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस में ही प्रसव हुआ और अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज पहुंचते-पहुंचते कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई। सिविल सर्जन डॉ. अजय मरकाम का जवाब देते हैं- हमारे यहाँ स्त्री रोग विशेषज्ञ ही नहीं हैं। यही सच है, वाहवाही के लिए सूरजपुर को जिला तो बना दिया, पर महिलाओं के लिए डॉक्टर ही नहीं। पिछले छह महीने में सूरजपुर में यह तीसरी घटना है। 8 अगस्त को भटगांव सीएचसी में महिला जमीन पर तड़पती रही, प्रसव हो गया। 24 सितंबर को जिला अस्पताल में इलाज नहीं मिला, रेफर किया, मौत हो गई। और अब कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई।
सप्ताह भर पहले लांजीत गांव के पीएचसी पर ताला लगा था। गर्भवती बाहर तड़पती रही, फिर किराए की कार में रास्ते में प्रसव कराना पड़ा। सिंहदेव के स्वास्थ्य मंत्री रहते (2013-18) भी बलरामपुर-वाड्रफनगर में आदिवासी खून की कमी से मर गए थे। वहां महीनों तक कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता झांकने नहीं गया था। सरगुजा से रोज खबरें मिलेंगी रेफर, एंबुलेंस उपलब्ध नहीं- मरीज पैदल या बाइक में ढोते हुए- रास्ते में मौत। और उसके बाद जांच कमेटी, निलंबन का नाटक और फिर बहाली, सब पहले जैसा।
अचरज की बात नहीं है कि इन सबके चलते ही नवजात मृत्यु दर में सरगुजा सबसे आगे है। पिछले छह महीनों में पूरे छत्तीसगढ़ में 3,184 नवजात और 221 माताएं मर चुकी हैं। कौन जिम्मेदार है? 2024-25 में स्वास्थ्य का बजट सिर्फ 4.8 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6 प्रतिशत से ऊपर है। मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर जैसे राज्य स्वास्थ्य पर 10 प्रतिशत के आसपास खर्च करते हैं। छत्तीसगढ़ में तो डॉक्टरों के 9,000 से ज्यादा पद खाली हैं। इनमें स्पेशलिस्ट के 70-80 प्रतिशत पद रिक्त हैं। तकनीशियन, नर्स और एनेस्थेटिस्ट की भी भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 40 फीसदी से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या तो बिना डॉक्टर के हैं या बिना बिजली-दवा के।
सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, योजनाएं बदलती हैं। जननी सुरक्षा योजना का नाम बहुत है, लेकिन जमीन पर क्या है? नशे में ड्यूटी करते डॉक्टर मिलते हैं, सर्जरी की कैंची भी थाम लेते हैं। क्या यह मान लिया जाए कि सत्ता और कुर्सी किसी की भी हो, आदिवासी जीवन की कीमत उनके लिए आज भी सस्ती है।
महासमुंद की सशक्त महिलाएं

दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल में हाल ही में महासमुंद जिले के बुंदेली गांव की एक रिपोर्ट ‘एक गांव’ के एपिसोड में प्रसारित की गई। बुंदेली गांव में महिलाओं ने अवैध शराब और नशे के खिलाफ एक प्रभावी आंदोलन चलाया है, जिसने गांव की सामाजिक स्थिति को बदला है और उन्हें आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाया है। महिलाओं ने एकजुट होकर गांव में अवैध शराब की बिक्री और सेवन के खिलाफ मोर्चा खोला। पहले यह गांव पूरी तरह से शराब की चपेट में था और घरेलू स्थिति काफी खराब थी। स्थानीय पुलिस के मार्गदर्शन में महिलाओं ने एक समूह का गठन किया। इस पहल के बाद गांव में मद्य निषेध पूरी तरह लागू है।
भाजपा की नई टीम
तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश भाजपा की नई टीम तैयार हो गई है। पार्टी ने आरंग के पूर्व विधायक नवीन मारकंडेय को प्रभारी महामंत्री का दायित्व सौंपा है। यही नहीं, अंबिकापुर के नेता और प्रदेश महामंत्री अखिलेश सोनी को रायपुर संभाग का प्रभारी बनाया गया है।
सोनी से पहले भूपेन्द्र सवन्नी रायपुर संभाग के प्रभारी थे। सवन्नी की पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर से अनबन रही है। इसके चलते कई बार वाद विवाद हो चुका है। नए प्रभारी अखिलेश सोनी के सांसद बृजमोहन अग्रवाल, और अजय चंद्राकर सहित अन्य नेताओं से मधुर संबंध हैं। कुल मिलाकर अखिलेश के प्रभारी बनने से गुटबाजी पर लगाम लगने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरी तरफ, जगदीश रामू रोहरा को बिलासपुर संभाग का प्रभारी नियुक्त किया गया है। रामू रोहरा चूंकि धमतरी के मेयर भी हैं। इसलिए उनके साथ अभिषेक शुक्ला को सहप्रभारी नियुक्त किया गया है।
बेमेतरा के पूर्व विधायक अवधेश चंदेल को सरगुजा, और जगन्नाथ पाणिग्रही को दुर्ग संभाग का प्रभारी नियुक्त किया गया है। बस्तर संभाग की जिम्मेदारी यशवंत जैन को दी गई है। यशवंत के साथ हरपाल सिंह भामरा को सहप्रभारी नियुक्त किया गया है। कुल मिलाकर नई टीम विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम करने की उम्मीद जताई जा रही है।
लंबे इंतजार का फल

ये तस्वीर सत्रह साल पुरानी है। उस कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन थीं। सोनिया के बगल की कुर्सी पर बिलासपुर के महेंद्र गंगोत्री, और उनके ठीक पीछे राजेन्द्र पप्पू बंजारे बैठे हैं। सोनिया गांधी ने एआईसीसी दफ्तर में अलग-अलग राज्यों से प्रशिक्षण के लिए आए प्रतिनिधियों को संबोधित भी किया था। महेन्द्र, और पप्पू बंजारे संगठन में पद के लिए प्रयासरत थे। अब जाकर दोनों ही अपने-अपने जिलों में अध्यक्ष बन पाए हैं।
महेन्द्र गंगोत्री को पार्टी ने बिलासपुर जिला कांग्रेस ग्रामीण अध्यक्ष की कमान सौंपी है। गंगोत्री, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के समर्थकों में गिने जाते हैं। उन्हें अध्यक्ष बनवाने में भिलाई विधायक देवेंद्र यादव ने भी भूमिका निभाई थी। इससे परे राजेन्द्र पप्पू बंजारे, धरसीवां जिला जनपद के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें भूपेश सरकार ने आरडीए संचालक मंडल का सदस्य बनाया था। अब उन्हें ग्रामीण जिला कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी मिली है। उन्हें ग्रामीण अध्यक्ष बनवाने में स्थानीय नेताओं की भूमिका रही है। दोनों को लंबे इंतजार का फल मिला है।
थानेदार को कलेक्टर का सैल्यूट

सरगुजा में अमेरा स्थित कोल ब्लॉक के आवंटन के खिलाफ ग्रामीणों के रोष ने हिंसक रूप ले लिया था। भीड़ का जैसा आचरण होता है- उन्होंने पुलिस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इनके बीच डीएसपी, महिला थाना प्रभारी- सुनीता भारद्वाज फंस गईं। उनकी जान खतरे में थी, फिर भी डटी रहीं। चोटें आईं, मगर ड्यूटी निभा रही थीं। सरगुजा कलेक्टर विलास राव भोस्कर ने प्रशासनिक अधिकारियों की एक बैठक में उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। इतना ही नहीं, भरी सभा में उन्हें सैल्यूट कर सम्मानित किया। बेशक, अमेरा के ग्रामीणों की कोयला खदान का विरोध करना जायज हो, लेकिन जब स्थिति उपद्रव की हो जाए- तो उसे नियंत्रित करना पुलिस का काम है और जो ऐसा करता है उसकी तारीफ भी होनी चाहिए। मगर, यह भी देखा गया है कि ग्रामीणों का गुस्सा फूटता कब है? प्राय: प्रशासन ग्रामीणों की जायज मांगों को भी नहीं सुनती। हाल ही में कवर्धा (कबीरधाम) और रायगढ़ जिले में नए संयंत्रों और खदानों के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहे हैं। हसदेव अरण्य को नष्ट होते देख वहां के आदिवासियों ने मीलों पैदल यात्रा की, सैकड़ों दिनों से शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं। प्रशासन सुन ले तो पुलिस को सामने करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सोशल मीडिया पर छाई सेल्यूट वाली इस तस्वीर पर कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया भी दी है। उनका कहना है कि पुलिस की लाठियों से ग्रामीण भी घायल हुए हैं, क्या कलेक्टर ने उनका हाल-चाल जाना। जल-जंगल और जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनों के साथ प्रशासन कभी सहानुभूति क्यों नहीं दिखाता?
विमान कंपनियों पर गुस्सा जारी
विमान सेवा अब तक सामान्य नहीं हुई है। लोग विमानन कंपनियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के विशेष सचिव रहे सीनियर आईआरएस अफसर अजय पाण्डेय ने फेसबुक पर लिखा कि एयर फेयर की लूट है, लूट सके तो लूट। वो दिन जल्दी आएगा सब मारेंगे बूट।
पाण्डेय ने लिखा कि ऐसे नाजुक मौके पर जब लाखों लोग एयरपोर्ट पर लाचार पड़े हैं, बच्चों के एग्जाम छूट रहे हैं। कोई किसी की शव यात्रा में नहीं जा पा रहा है। ऐसी लूट एयर इंडिया, और टाटा समूह के नाम पर कलंक है। इंडिगो तो सदा से बेशर्म थी, है और रहेगी। पाण्डेय ने रायपुर से मुंबई किराया साझा किया, जो कि 72722 रुपए पहुंच गया।
उन्होंने लिखा कि एयर फेयर में कैपिंग बेहद जरूरी हो चुका है। सरकार को हर एयर डिस्टेंस का अधिकतम किराया तुरंत निर्धारित कर देना चाहिए, और इंडिगो को सजा देनी चाहिए कई सौ करोड़ की पेनाल्टी लगाकर। आईआरएस अफसर के पोस्ट पर लोग काफी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं। एक ने लिखा-आपदा में अवसर।
गलती आई-गई हो गई
कई बार बड़े नेता वस्तुस्थिति की जानकारी के बिना ऐसी तथ्यात्मक गलती कर बैठते हैं, जिस पर सफाई देना भी कई बार मुश्किल हो जाता है। बात पिछले दिनों अंबिकापुर जिले के अमेरा कोयला खदान में लाठीचार्ज मामले की है।
घटना में डेढ़ सौ ग्रामीणों के साथ ही करीब तीन दर्जन पुलिसकर्मी जख्मी हुए। ग्रामीण कोयला खदान विस्तार का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस की प्रतिक्रिया तुरंत आ गई। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने कहा कि सरगुजा की घटना बेहद दर्दनाक है। सरकार अरबपतियों की गुलाम बनकर काम कर रही है। जंगल काटे जा रहे हैं। भूरिया ने कहा किसी भी कीमत पर अडानी मॉडल को सफल नहीं होने दिया जाएगा। हम है, तो जंगल हैं और जंगल है तो हम है।
विक्रांत ने जिस खदान को लेकर आंदोलन छेडऩे की बात कही है, वो अडानी नहीं, एसईसीएल की खदान है। यह जंगल नहीं बल्कि पठारी इलाका है। यहां पेड़ कटाई का कोई मसला नहीं है। जहां तक अमेरा खदान इलाके में अशांति का फैलने का सवाल है। इस पूरे मामले पर एसईसीएल ने कहा कि कोयला चोरों की वजह से घटना घटी है। ये बात अलग है कि सरगुजा के दूसरे इलाके में अडानी समूह खनन में लगी है, और वहां इसका विरोध भी हो रहा है। चूंकि कांग्रेस अडानी समूह को निशाने पर लेती रही है। इसलिए इस तथ्यात्मक गलती को अनदेखा कर दिया गया।
आदिवासी नेता की मौत पर घिरा जेल विभाग
पुलिस और जेलों में हिरासत के दौरान होने वाली मौतों को लेकर एक ही तरह की कहानी अफसरों के पास होती है। कांकेर के आदिवासी नेता जीवन ठाकुर की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके खिलाफ वन अधिकार का नकली प्रमाण पत्र बनवाकर जमीन पर कब्जा करने का आरोप था। पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बाद उनको 12 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया था। तब से वह जेल में थे। जमानत की अर्जी खारिज हो गई थी। नकली पट्टा बनवाना एक फर्जीवाड़ा तो है लेकिन ऐसे मामलों में प्राय: पट्टा निरस्त कर दिया जाता है। बड़े पैमाने पर ऐसी गड़बडिय़ां करने पर एफआईआर और गिरफ्तारी की कार्रवाई भी होती है- पर जमानत भी मंजूर कर ली जाती है। बहरहाल, कांकेर जेल से जीवन ठाकुर को 2 दिसंबर को रायपुर के रायपुर के सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया। परिजन बताते हैं कि उन्हें उनकी जानकारी के बिना ही शिफ्ट कर दिया गया। सेंट्रल जेल रायपुर के सुपरिंटेंडेंट का का कहना है कि बीमार होने के कारण उनको रायपुर लाया गया और यहां से मेकहारा में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 4 दिसंबर को मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि मौत सुबह हो गई थी लेकिन उन्हें इसकी जानकारी शाम को दी गई। मजिस्ट्रेट को मामला ज्यादा संगीन लगा होगा, इसलिए जमानत नहीं मिल पाई, और वे दो माह से जेल की सजा काट रहे थे। जेल प्रशासन पर परिजनों ने जो आरोप लगाए हैं उनका समाधान जरूरी है, जैसे जब बीमार थे- तो कांकेर के किसी अस्पताल में भर्ती किए बिना सीधे रायपुर क्यों लाया गया। रायपुर लाने और यहां पर मौत हो जाने के बाद परिवार को समय पर सूचित क्यों नहीं किया गया? सबसे बड़ी बात यदि जेल विभाग को लगता है कि मौत स्वाभाविक है, अफसरों ने कोई गलती नहीं की तो फिर कांकेर की जेलर को हटा क्यों दिया गया? मामला संवेदनशील हो चुका है क्योंकि आदिवासी समाज ने मोर्चा खोल दिया है। कांकेर ही नहीं- बस्तर संभाग में बंद का आह्वान आज किया गया है। देखना होगा कि क्या जीवन ठाकुर के परिजन और सर्व आदिवासी समाज को न्याय मिलेगा?
गूमा के रस का रहस्य
यह गूमा का फूल है और टेढ़ी चोंच वाली सन बर्ड। जैसे कुदरत ने दोनों एक दूसरे के लिए ही विकसित किया हो। फूल का रस भीतर छिपा होता है,सन बर्ड की लंबी नुकीली चोंच उस तक पहुंच जाती है। हर साल ठंड के दिनों में ये फूल खिलते हैं और रसपान के लिए सन बर्ड इसके पौधों के पास मंडराती रहती हैं। तस्वीर प्राण चड्ढा ने खींची है।
जिसका डर था वही हुआ
जिसे लेकर हर विद्युत कर्मचारी डर रहे थे वही हुआ। विद्युत कंपनी ने अपने 18 हजार कर्मचारियों के लिए पीएम सूर्य घर सोलर प्लांट लगाना अनिवार्य कर दिया है। श्रमिक अधिनियम के तहत उन्हें अविभाजित मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बिजली बिल में आधी छूट मिलती थी। पीएम सूर्य घर नहीं लगाने पर अब उन्हें मिलने वाली यह छूट बंद कर दी गई है। बेचारे बिजलीकर्मी अब घर के न रहे और न घाट के, क्योंकि विभाग से छूट तो बंद कर दी गई है, सरकार से 200 यूनिट की जो छूट सब उपभोक्ताओं को मिल रही है वह भी नसीब नहीं हो रही है। वे फरियाद भी नहीं लगा पा रहे हैं। अब कर्मचारी अधिकारी अपने-अपने संघों के बैनर तले इस पर प्रदर्शन धरने आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं।
हमने पिछले ही दिनों बताया था कि कंपनी के सलाहकारों की यह सलाह, गले की हड्डी की तरह फंस गई है। विद्युत मंडल के अधिकारी कर्मचारी चाहते हैं कि रेलवे की तरह वे भी हाईरिस्क सर्विस वाले होते हैं इसलिए उन्हें ,रेल कर्मचारियों के मुफ्त यात्रा पास की तरह बिजली मिलनी चाहिए। वे रेल कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम होते हैं। इसलिए यह मंडल के बजट को भी प्रभावित नहीं करेगा।
दुनिया की गर्माहट भी महसूस कर लें

छत्तीसगढ़ में सर्दी ने पूरे तेवर के साथ दस्तक दे दी है। जशपुर, मैनपाट, कोरिया और सरगुजा के ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान लगातार पांच से सात डिग्री सेल्सियस तक लुढक़ गया है। सुबह का कोहरा इतना घना है कि सूरज देर तक दिखाई ही नहीं दे रहा। खेत-खलिहान ओस की चमक से ठिठुरे हुए। अमरकंटक में पारा तीन से चार डिग्री पर स्थिर। जाड़े के चलते पूरा अमरकंटक नैचुरल फ्रीजर बन गया है। कमोबेश मैनपाट का भी यही हाल। दिन सिकुड़ गए। सुबह देर से खिल रही और शाम जल्दी ढल रही। सिहरन के मौके पर कंबल की गरमाहट और चाय की भाप में ही सुख मिल रहा है।
मगर, चलिये अवगत हो जाएं, इसी से जुड़े कुछ और भी दिलचस्प तथ्यों से। दक्षिण भारत में तस्वीर उलट है। छत्तीसगढ़ के और उत्तर और मध्य भारत के लोग ठिठुरन में लिपटे हैं, वहीं मुंबई में तापमान 32 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ा हुआ है। गोवा के समुद्र तटों पर दिन में 31 से 33 डिग्री की चमकती धूप है, जो लोगों को गर्मी का एहसास दिला रही है। केरल के कोच्चि में उमस की चुभन ने दिसंबर को हमारे यहां का मार्च बना दिया है। कर्नाटक के करवार में 35.8 डिग्री का रिकॉर्ड टूट गया है। विचित्र है मौसम। एक ही देश में सर्दी और गर्मी की तीखी विभाजन रेखा।
वैश्विक तस्वीर और भी चकित कर सकती है। पृथ्वी के कई हिस्सों में इस महीने ने इतिहास के सबसे गर्म दिनों के रिकॉर्ड दर्ज किए। कैरिबियन के डोमिनिका में तापमान 34 डिग्री से ऊपर चला गया, वहां दिसंबर का यह सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया। ताइवान में तापमान 33.5 डिग्री तक पहुंच गया है। यहां सामान्य तौर पर इस मौसम में हल्की ठंड रहती है, पर इस वर्ष कई शहरों में पारा लगातार 32 डिग्री से ऊपर है। अफ्रीकी देश तंजानिया में हीट वेव और सूखे ने मिलकर लोगों के लिए इसी दिसंबर ने जीवन कठिन कर दिया है। यूरोप भी नवंबर के बाद से अभूतपूर्व गर्मी का सामना कर रहा है। स्पेन में तो और बुरा हाल है। दिसंबर के शुरुआती दिनों में पारा 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो न केवल देश के बल्कि यूरोप के भी अब तक के सबसे चरम है। ओशिनिया से लेकर एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक 100 से अधिक देशों में दिसंबर के पहले ही सप्ताह में गर्मी के रिकॉर्ड टूट चुके हैं।
कमाल की यह धरती। कहीं गर्मी, कहीं सर्दी, कहीं वर्षा और कहीं पर सूखा। इधर, हम सर्द हवाओं से जूझ रहे हैं। अलाव और सिगड़ी जला रहे हैं, तो दूसरी तरफ दूर दुनिया तपन से हांफ रही है। मौसम की यह सनक ग्लोबल वार्मिंग के मसले से भी जुड़ी है, पर उस पर बात लंबी हो जाएगी। बस, हमें जलवायु को लेकर सतर्क और जिम्मेदार होना चाहिए।
बीस साल तक अंधेरे कमरे में
जगदलपुर में बीस साल तक एक लडक़ी को उसके ही रिश्तेदारों ने एक अंधेरे कमरे में बंद रखा। वजह यह बताई गई कि कोई छेड़छाड़ करने वाला व्यक्ति था, जिससे उसे बचाना जरूरी समझा गया। लंबे वक्त तक अंधेरी कोठरी में कैद रहने के कारण उसकी आंखों की रोशनी शायद कभी वापस न आए। मानसिक रूप से वह पूरी तरह टूट चुकी है। अपना नाम भी उसे याद करके बताना पड़ा।
भारत के दूसरे इलाकों की तरह छत्तीसगढ़ में भी लड़कियों की इज्जत और सुरक्षा को लेकर जुनून इतना गहरा है कि कई बार वह बड़ा खतरा बन जाता है। इस मामले में बाहर छेड़छाड़ करने वाला कोई एक आदमी था, लेकिन घर वालों ने उसे पूरी दुनिया से ही काट दिया, पूरे बीस साल के लिए। उस उम्र में जब कोई लडक़ी स्कूल जाती है, दोस्त बनाती है, सपने देखती है, प्यार करती है, वह दिन-रात अंधेरे में सांस लेती रही। वहां न धूप थी, न हवा, न किसी अपने का चेहरा, न किसी से कोई संवाद।
हैरानी की बात है कि ऐसा करने वाले उसके अपने रिश्तेदार थे। वे शायद भूल गए कि लक्ष्मण रेखा जैसी कोई लकीर खींचते-खींचते उन्होंने इस युवती से इंसान बने रहने तक का हक छीन लिया। बाहर के खतरे से बचाने के चक्कर में घर को ही जेल बना दिया।
समाज कल्याण विभाग के अफसर अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि यह अवैध कैद और मानवाधिकार उल्लंघन का मामला है या नहीं। लेकिन कानून के बाद भी सवाल बाकी रह जाता है कि क्या सामाजिक सोच भी इसके लिए दोषी नहीं है?
पुतिन के सम्मान में...

एक सदाबहार फिल्मी गीत है, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी। मगर, जूते भी रूसी नामों से भारत में बिकते हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लामिदिर पुतिन भारत आए तो सोशल मीडिया में यह बिलासपुर शहर के एक दुकान की यह तस्वीर डाल दी और कहा कि हमारे यहां तो बरसों से मॉस्को (रूस की राजधानी) को पसंद किया जाता है। इस नाम से यहां एक बहुत पुरानी दुकान है।
देवांगन की पिटीशन
राज्य खनिज निगम के पूर्व अध्यक्ष, और कांग्रेस नेता गिरीश देवांगन की उस याचिका पर सीजेएम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जिसमें उन्होंने ईओडब्ल्यू-एसीबी के अफसरों पर कोयला घोटाला केस में कथित तौर पर फर्जी बयान तैयार कर हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आरोप लगाया है।
देवांगन ने इससे जुड़े कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं। उन्होंने अपनी याचिका में फर्जी दस्तावेजी करण, न्यायालय में धोखाधड़ी, और कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का आरोप लगाया है। सीजेएम कोर्ट ने याचिका पर ईओडब्ल्यू-एसीबी चीफ अमरेश मिश्रा, और दो अन्य अफसर चंद्रेश ठाकुर, और राहुल शर्मा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था।
तीनों अफसरों की तरफ से पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के वकील रवि शर्मा ने जवाब दाखिल किए हैं। इसमें याचिकाकर्ता की शिकायतों का कड़ा प्रतिवाद किया गया, और याचिका के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए हैं। दोनों पक्षों से अपने-अपने समर्थन में दलील दी जा चुकी है, और 8 तारीख को प्रकरण पर अंतिम सुनवाई होगी। इस हाईप्रोफाइल मामले पर निगाहें कोर्ट पर टिकी हैं। देखना है आगे क्या होता है।
उड़ानों में एकाधिकार का नतीजा?

देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के कारण लाखों यात्री हवाईअड्डों पर फंसे हुए हैं। दिसंबर 2025 के पहले सप्ताह में इंडिगो ने एक हजार से अधिक उड़ानें रद्द कीं। दिल्ली से सभी घरेलू उड़ानें 5 दिसंबर को पूरी तरह बंद कर दी गईं। बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद जैसे प्रमुख हवाईअड्डों पर 100-100 से अधिक उड़ानें। रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट का भी यही हाल है। यात्री घंटों इंतजार करते रहे- बिना भोजन, पानी या स्पष्ट जानकारी के। सैकड़ों यात्री फंस गए हैं। शादी ब्याह का मौसम चल रहा है। कुछ लोगों को अपने बीमार परिजन को देखने के लिए जाना था, कुछ को अंतिम संस्कार में शामिल होना था। टिकट रद्द कर पैसे लौटाए तो जा रहे हैं लेकिन वैकल्पिक उड़ानों का किराया 4-5 गुना महंगा कर दिया गया है। एयरलाइंस कंपनियां जैसे ही भीड़ बढ़ती है, किराये में मनमाना वृद्धि कर देती हैं। इसी इंडिगो ने कुंभ मेले के समय 7-8 हजार की टिकट को 30 से 40 हजार रुपये में बेचा था। दिल्ली रायपुर के बीच टिकट सामान्य से पांच गुना महंगी हो गई है।
यह संकट नई ड्यूटी टाइम लिमिटेशन लागू करने की वजह से बताया जा रहा है। पायलटों के आराम के घंटे तय किए गए। संकट देखते हुए सरकार ने अब इसमें रियायत भी दे दी है, फिर भी उड़ानें नियमित नहीं हो पाई हैं।
मगर समस्या विकराल इसलिये दिखाई दे रही है क्योंकि यात्री के पास विकल्प नहीं है। इंडिगो के पास घरेलू बाजार का 65 फीसदी शेयर है। इंडिगो व एयर इंडिया मिलाकर 90 प्रतिशत उड़ानें संचालित करते हैं। किंगफिशर और जेट एयरवेज जैसी कंपनियां दिवालिया हो चुकीं, लेकिन इंडिगो को कोई बाधा नहीं आई। अमेरिका या यूरोपमें ऐसा एकाधिकार नहीं है। वहां एंटी-ट्रस्ट कानून सख्त है, जो बाजार 40 प्रतिशत से अधिक शेयर पर नियंत्रण लगाते हैं। भारत में इस एकाधिकार ने यात्रियों को बंधक दिया है।
लगे हाथ उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) योजना की भी अपने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में चर्चा कर लें। बिलासपुर, जगदलपुर और अंबिकापुर आदि शहरों से नियमित उड़ानों की योजना बनाई गई थी। मगर, कुछ उड़ानों के बाद अंबिकापुर हवाई अड्डा पूरी तरह बंद पड़ा है। बिलासपुर में भी फ्लाइट और फेरों की संख्या घटा दी गई है। हवाई सेवा विस्तार के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों की मांग है कि खुली निविदा से कंपनियों को उड़ानें शुरू करने के लिए बुलाया जाए, लेकिन सरकार अपनी मोनोपॉली तोडऩे के लिए तैयार नहीं है। छोटे शहरों के हवाई अड्डे इस जिद के चलते वीरान होते जा रहे हैं।
बदहाल अंबिकापुर
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कुछ महीने पहले कांग्रेस के एक कार्यक्रम में माना था कि अंबिकापुर नगर निगम को विकास कार्यों के मद में पर्याप्त राशि नहीं मिली, और इसका विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा।
प्रदेश की एकमात्र आदिवासी आरक्षित अंबिकापुर नगर निगम अब कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है। दस साल बाद यहां भाजपा काबिज हो गई। ऐसे में यहां सरकार से विकास कार्यों के मद में मदद की उम्मीद थी। सडक़ों की दुर्दशा है। यहां के स्थानीय नेता यहां की मूलभूत समस्याओं के निराकरण के लिए पार्टी संगठन तक गुहार लगा चुके हैं। मगर स्थिति में परिवर्तन नहीं आया है। सरकार ने नगरोत्थान योजना के मद में निगमों को विकास कार्यों के मद में राशि जारी की है, इसमें अंबिकापुर को 13 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। जबकि अंबिकापुर से ज्यादा चिरमिरी, भिलाई-चरौदा, और बीरगांव जैसे निगमों को मिला है।
बाकी निगमों के पास विकास के लिए डीएमएफ, और कई अन्य फंड भी हैं। इस मामले में अंबिकापुर काफी पीछे है। हाल यह है कि पिछले नगर निगम के पार्षदों को दो साल का मानदेय नहीं मिला है। ये सभी पार्षद अब पूर्व हो चुके हैं, और वो अपना बकाया मानदेय के लिए स्थानीय विधायक, और सरकार के मंत्री राजेश अग्रवाल से मुलाकात भी की थी। मगर उन्हें अब तक बकाया मानदेय नहीं मिला है। खास बात यह है कि प्रदेश के बाकी निकायों में ऐसी नौबत नहीं आई। अब कांग्रेस यहां जल्द ही आंदोलन छेडऩे की तैयारी कर रही है।
पीएम अवार्ड और छत्तीसगढ़
पांच माह बाद आगामी 21 अप्रैल, 2026 को सिविल सर्विसेज डे के मौके पर प्राइम मिनिस्टर अवार्ड दिए जाएंगे। ये सालाना दिए जाते हैं। ये अवॉर्ड देश भर के सिविल सेवक द्वारा प्रदेश या जिले में किए गए बेहतरीन काम को पुरस्कृत करने के लिए बनाए गए हैं। रजिस्ट्रेशन और नॉमिनेशन जमा करने एक पोर्टल इस साल 1 अक्टूबर को लॉन्च किया गया था, और एंट्रियां 30 नवंबर तक ली गई। इनमें छत्तीसगढ़ से भी आठ अफसरों ने भी अपनी कामयाबी को जमा किया है। इनमें जिला कलेक्टरों के अलावा दो सचिव स्तर के अफसरों ने भी जमा किया है। अब इनमें से कौन पीएम अवार्ड पाता है यह तो उसी दिन पता चलेगा। पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ के दो आईएएस अफसरों को यह अवार्ड मिल चुका है। इनमें से एक केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर है।
पर्सनल मिनिस्ट्री की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एक्सीलेंस के लिए प्राइम मिनिस्टर अवार्ड्स के लिए 2035 नॉमिनेशन मिले हैं। अवार्ड्स में एक ट्रॉफी, एक स्क्रॉल और 20 लाख रुपये का इंसेंटिव होगा, जिसे उस डिस्ट्रिक्ट या ऑर्गनाइजेशन को दिया जाएगा जिसका इस्तेमाल किसी प्रोजेक्ट या प्रोग्राम को लागू करने या पब्लिक वेलफेयर के किसी भी एरिया में रिसोर्स की कमी को पूरा करने के लिए किया जाएगा।
महाराष्ट्र डीजीपी का छत्तीसगढ़ से रिश्ता

एनआईए के डीजी सदानंद दाते को महाराष्ट्र का डीजीपी नियुक्त किया गया है। आईपीएस के 91 बैच के अफसर सदानंद दाते का छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। दाते बस्तर में सीआरपीएफ के आईजी रह चुके हैं, और उन्होंने नक्सल फ्रंट पर काफी बेहतर काम किया। वो मुंबई में 26/11 हमले के दौरान आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
दाते की यहां पोस्टिंग से पहले छत्तीसगढ़ पुलिस, और सुरक्षाबलों के बीच तालमेल अच्छा नहीं रहा। यह भी शिकायतें रही कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान में सीआरपीएफ से अपेक्षित मदद नहीं मिल पाती है। मगर सदानंद दाते के यहां आने के बाद राज्य पुलिस के साथ मिलकर काम किया, और नक्सल फ्रंट पर उनके काम की काफी सराहना भी हुई। अब जब महाराष्ट्र के डीजीपी बने हैं, तो यहां उनके बेहतर कामों को याद किया जा रहा है।
मंत्रियों के बंगले बने रजवाड़े

छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष में राजनीतिक गलियारों में बैठो तो एक न एक पुराने किस्से नेता सुना ही देते हैं। एक कांग्रेस नेता ने एक ऐसा ही वाकया बताया- जब राज्य बना और महेंद्र कर्मा मंत्री बने तब वे वित्त मंत्री सिंहदेव के पास पहुंचे और दो चीजें मांगी पहला गाड़ी और दूसरा प्यून। अजीत जोगी ने पहले ही ऐलान कर रखा था कि स्थापना व्यय 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने दिया जाएगा।
सिंहदेव ने महेंद्र कर्मा की बातें सुनी और उठकर खड़े हुए और पीछे टेबल पर रखी फाइल उठाकर लाने लगे और कहा कि प्यून इतना ही काम करेगा। फाइल टेबल तक लाएगा, ये काम मैं खुद कर लेता हूं। हां गाड़ी की व्यवस्था धीरे धीरे कर लेंगे। अब जब राज्य के 25 साल पूरे हो गए हैं तक मंत्रियों के बंगलों को देखकर लगता है कि वे किसी राजा रजवाड़े ये कम नहीं हैं।
बताते हैं कि एक से पांच एकड़ में बने मंत्रियों के बंगलों में केवल गार्डन को मेन्टेन करने दस से पंद्रह लोग लगते हैं। सरकार में तेरह मंत्री हैं सो उनके विभाग के अधिकारी इतने कर्मचारी लगाने के लिए परेशान हैं। आउटसोर्सिंग से इनकी कमी पूरी की जा रही है फिर भी मंत्रियों को गार्डन की रौनक में कमी दिख रही है।
समस्या उन अधिकारियों की गलियों में नहीं है...
छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक न्यूज-फोटोग्राफर रहे हुए गोकुल सोनी सामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते हैं, और छत्तीसगढ़ का समकालीन इतिहास भी। आज उन्होंने फेसबुक पर लिखा है-रायपुर शहर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है।
हर गुजरते दिन के साथ इनकी तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है कि आम नागरिक खासकर बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। शहर के कई वार्डों से कुत्तों के झुंड के हमलों, रात के समय सडक़ों पर पैदा होने वाले डर के माहौल और आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। यह तस्वीर बाबूलाल टाकीज (अब शॉपिंग कॉम्प्लेक्स) के सामने गणेशराम नगर की है, पर समस्या सिर्फ एक मोहल्ले की नहीं, पूरे रायपुर की है। मच्छर उन्मूलन हो या कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण, नगर निगम की गंभीरता केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है। कुत्तों को पकडऩे वाली गाड़ी आती जरूर है, लेकिन कुत्ते तो दूर से ही देखकर ऐसे गायब हो जाते हैं मानो यह सब उनके लिए रोज़मर्रा का खेल बन गया हो। सच्चाई यह है कि यह समस्या उन अधिकारियों की गलियों में नहीं है, जहां वे रहते हैं। वहां तो परिंदा भी पर नहीं मार सकता फिर कुत्तों का झुण्ड कैसे पहुँच जाए। यही कारण है कि न प्रशासन सक्रिय है और न ही जनप्रतिनिधियों को इससे कोई खास सरोकार। नतीजा यह कि समस्या धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज़ी से विकराल रूप लेती जा रही है।
शहर को सुरक्षित बनाने के लिए अब केवल शिकायतें काफी नहीं। ठोस और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है, क्योंकि आज यह समस्या किसी और के मोहल्ले की है, कल आपके दरवाजे पर भी खड़ी हो सकती है।
फोकट वाला पनौती कौन?

नवा रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह क्रिकेट स्टेडियम में बुधवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका के मैच को लेकर रोमांच चरम पर रहा। करीब 60 हजार दर्शक मुकाबला देखने स्टेडियम पहुंचे थे। भारत की हार पर स्वाभाविक रूप से लोग मायूस हैं, और सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। मगर ज्यादा गुस्सा वो लोग उतार रहे हैं, जो कि टिकट के लिए प्रयासरत थे, और उन्हें टिकट नहीं मिल पाई। इनमें कई बड़े भाजपा नेता भी शामिल हैं।
राज्य श्रम कल्याण मंडल के पूर्व उपाध्यक्ष, और सीनियर भाजपा नेता सुभाष तिवारी ने फेसबुक पर अपने पोस्ट में लिखा कि कल भारत-दक्षिण अफ्रीका का वनडे क्रिकेट मैच था। मैं घर में टेलीविजन पर मैच देख रहा था। तभी दर्शक दीर्घा में एक पनौती बैठा हुआ दिखाई दिया, जो फोकट की टिकट में गया था। तभी मुझे शंका हो गई थी कि भारत यह मैच हार जाएगा। तिवारी का इशारा किसकी तरफ था, यह तो स्पष्ट नहीं है। मगर मैच देखने सरकार के मंत्री ओपी चौधरी, वन मंत्री केदार कश्यप, श्याम बिहारी जायसवाल, और कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त सौरभ सिंह, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह सहित पार्टी के कई कद्दावर नेता पहुंचे थे।
रायपुर नगर निगम के पूर्व पार्षद प्रमोद साहू ने एक अखबार में छपी उस खबर को फेसबुक पर साझा किया गया जिसमें प्रभावशाली अफसरों को 20-20 टिकट मिलने की बात कही गई है। साहू ने लिखा अफसरशाही हावी है। मैच देखने से वंचित हुए, तो नाराज भाजपा के नेताओं का गुबार निकाल रहे हैं। कुछ आईएएस अफसर किस्मत के इतने धनी थे कि उनके गार्ड, अर्दली, ड्राइवर सभी स्टेडियम में थे।
एमओयू के बाद पहला क्रिकेट..

शहीद वीर नारायण अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में कल हुए भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए मैच में गायकवाड़ और कोहली के शतक के बावजूद भारत को हार का सामना करना पड़ा। उनके प्रशंसक निराश हुए पर क्रिकेटप्रेमियों ने मैच का खूब आनंद लिया। छत्तीसगढ़ स्टेट क्रिकेट संघ और राज्य सरकार के बीच हुए अनुबंध के बाद यह पहला बड़ा आयोजन था। तब ध्यान जाता है कि क्या भविष्य में छत्तीसगढ़ के क्रिकेट खिलाडिय़ों को अधिक अवसर मिलने की संभावना बनती है? सरकार और राज्य के क्रिकेट संघ के बीच हुए एमओयू से कुछ बातें साफ होती हैं, कुछ नहीं।
सेंध झील के पास 50 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैले 65 हजार दर्शकों की क्षमता के साथ यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा स्टेडियम है। राज्य सरकार ने 1.5 करोड़ रुपये सालाना की लीज पर सीएससीएस को सौंप दिया है। हर तीन साल में लीज की राशि बढ़ेगी। इसके अलावा कुछ मामूली रकम भी अलग-अलग मौकों पर सरकार को मिलेगी- जैसे हर अंतर्राष्ट्रीय मैच पर 20 लाख, आईपीएल पर 30 लाख रुपये। इस हिसाब से देखा जाए तो हजारों करोड़ की कीमत वाली जमीन तो दूर लागत के 145 करोड़ रुपये भी इन 30 सालों में नहीं मिलने वाले। मगर, सरकार का वह खर्च बच जाएगा, जो सालाना 3 से 4 करोड़ रुपये रखरखाव पर होते हैं। आने वाले वर्षों में यह खर्च और बढ़ता जाता। आम तौर पर भवनों, उद्यानों के रखरखाव के के लिए मंजूर सरकारी विभागों के बजट तो खत्म हो जाते हैं, पर जमीन पर वह खर्च दिखता नहीं। यहां, इसकी जिम्मेदारी सीएससीएस को उठाना है। सीएससीएस को बीसीसीआई में अपनी मान्यता बनाए रखने और स्टेडियम की लीज की राशि चुकाने के लिए जरूरी होगा कि वह रायपुर कलेक्टर की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी की निगरानी के ही स्टेडियम को अच्छी हालत में रखे और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपग्रेड करता रहे।
मगर, अनुबंध की दूसरी बातें भी महत्वपूर्ण हैं, जिनमें राज्य के उभरते क्रिकेटरों की ट्रेनिंग और सुविधाएं प्रदान करना, ताकि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत प्रदर्शन कर सकें। देखना यह होगा कि राज्य में क्रिकेट की गतिविधियों और खेल पर्यटन को इस अनुबंध से कितना प्रोत्साहन मिल पायेगा। क्या भविष्य में नया रायपुर क्रिकेट हब बन पाएगा?
संचार साथी की पहुंच कितनी ?

विपक्ष, डिजिटल राइट्स ग्रुप, टेलीकॉम कंपनियों और डिवाइस निर्माताओं के विरोध के बाद संचार साथी ऐप को अनिवार्य करने से केंद्र सरकार पीछे हट गई है। पर यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि वह क्या-क्या जानकारी हासिल करने की अनुमति मांगता है। एक एंड्राइड फोन से यह विवरण लिया गया है। ऐप सभी कॉल इतिहास को पढ़ सकता है। उपयोगकर्ता के संपर्कों, कॉल की अवधि, और पैटर्न का विश्लेषण संभव है। फोन नंबर, डिवाइस आईडी (आईएमईआई), और वर्तमान स्टेटस (जैसे कॉल पर होना) तक पहुंच, उपयोगकर्ता की वास्तविक समय की लोकेशन और गतिविधियों को ट्रैक करना। फोन के इस्तेमाल नहीं करने पर भी ऐप बैकग्राउंड में चलता रहेगा। एसएमएस और एमएमएस पढऩे, भेजने की जानकारी लेने की क्षमता से निजी चैट तक पहुंच। यानि कोई ओटीपी या संवेदनशील जानकारी-जैसे बैंकिंग कोड भी। इसीलिए इसकी तुलना संसद में पेगासस जैसे स्पाईवेयर से की। प्री इंस्टाल संचार साथी मीडिया और स्टोरेज में संचार साथी घुसपैठ कर सकता है। यहां तक कि बिना सूचना के फोटो-वीडियो कैप्चर कर लेगा। स्टोरेज में फाइलों को पढऩा, संशोधित करना या हटाना भी संभव है। डिवाइस पर नियंत्रण का मामला ऐसा है कि ऐप बैकग्राउंड में लगातार चलता रहेगा और आपके ही फोन की बैटरी, इंटरनेट और वाई-फाई का इस्तेमाल करते हुए। फिलहाल सरकार ने अनिवार्य प्रि इंस्टाल का आदेश वापस ले लिया है और यह भी कहा है कि जिन्हें इसका इस्तेमाल नहीं करना है वे संचार साथी में लॉग इन नहीं करें और चाहें तो अपने फोन से हटा लें।
क्रिकेट की नेतागिरी या धोखागिरी?
नवा रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में बुधवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच की टिकट को लेकर काफी मारामारी रही। ऐसे में क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों के रवैये से विशेषकर रायपुर जिले के भाजपा विधायक काफी नाराज हैं, और इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखने को मिला। रायपुर के भाजपा विधायकों को उम्मीद थी कि उन्हें सौ-सौ टिकट मिल जाएंगे, इससे वो अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर सकेंगे। मगर मंगलवार की रात एसोसिएशन की तरफ से मंत्री-विधायकों को फ्री टिकट उपलब्ध कराया गया। मंत्रियों को 20, और विधायकों को 5 टिकट दिए गए। टिकट के लिए मंत्री-विधायकों के बंगले में कार्यकर्ताओं-समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा था। इतनी कम संख्या में टिकट आई, तो मंत्री-विधायकों में नाराजगी देखी गई।
बताते हैं कि रायपुर के एक विधायक को इस स्थिति का पहले से ही अंदाजा हो गया था, उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के लिए पहले ही टिकट खरीदकर बंटवा दिए। चूंकि एसआईआर अभियान में भाजपा कार्यकर्ता काफी मेहनत कर रहे हैं। ऐसे में क्रिकेट मैच की टिकट देकर उन्हें संतुष्ट करने का मौका भी था। और पर्याप्त टिकट नहीं मिली, तो विधायकों में गुस्सा स्वाभाविक था। रायपुर के भाजपा नेता को एसोसिएशन ने पांच सौ टिकट तो उपलब्ध करा दिए लेकिन इसके एवज में उन्हें चार लाख रुपए भुगतान करने पड़े।
क्रिकेट संघ के एक पदाधिकारी कारोबारी के खिलाफ फेसबुक पर काफी कुछ लिखा जा रहा है। टिकट ब्लैक करने के आरोप भी लग रहे हैं। कारोबारी अपने अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। चर्चा है कि वो पिछले चार दिनों से विधायकों तक का फोन नहीं उठा रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि बीसीसीआई के सबसे पावरफुल पदाधिकारियों में से एक राजीव शुक्ला, छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के सदस्य हैं, उनसे भी कई लोगों ने उम्मीदें लगा रखी थी। वो रायपुर में ही हैं, लेकिन सबको निराशा हाथ लगी।
हल्ला तो यह भी है कि सरकार के एक मंत्री ने तो क्रिकेट एसोसिएशन के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए टिकट वापस कर दिए। दरअसल, बीसीसीआई की पहल पर सरकार ने स्टेडियम पांच साल की लीज पर क्रिकेट संघ को दे रखा है। बावजूद इसके एसोसिएशन का रवैया निराशाजनक नजर देखने को मिला है। कुल मिलाकर मैच के बाद भी टिकट को लेकर किचकिच जारी रह सकती है।
ऑनलाइन चाकू बिक्री-चूहे बिल्ली का खेल
रायपुर उरला में एक फैक्ट्री कर्मी की हत्या ऐसे चाकू से कर दी गई, जिसे ऑनलाइन मंगाया गया था। पुलिस का दावा है कि साल भर में उसने 800 से अधिक ऑनलाइन मंगाए गए चाकू जब्त किए, मगर इस वारदात से मालूम होता है कि डिलीवरी रुकी नहीं है। हाईकोर्ट भी इस मुद्दे पर संज्ञान ले चुका है। सवाल है कि जब पुलिस दिन-रात कार्रवाई कर रही है, तब भी ई-कॉमर्स कंपनियाँ चाकू की बिक्री कैसे कर रही हैं?
अधिकतर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म चाकू को किचन टूल, क्राफ्ट कटर या आउटडोर नाइफ जैसे नामों से बेचते हैं। चूंकि 6 इंच से छोटे फोल्डिंग चाकू केंद्र के आर्म्स एक्ट में प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं आते, प्लेटफॉर्म उसी खामी का फायदा उठाते हैं। ई कॉमर्स कंपनियों को आईटी एक्ट की धारा 79 उन्हें मध्यस्थ का दर्जा देकर सुरक्षा भी देती है। यानी गलत बिक्री की जिम्मेदारी बेचने वाले की होती है। पुलिस ई-कामर्स कंपनियों को नोटिस देती है, कंपनियां पुलिस के बताए गए लिंक को हटा देती है, लेकिन अगले ही दिन नया विक्रेता वही प्रोडक्ट दोबारा अपलोड कर देता है।


