विचार/लेख
-शारदा उगरा
आज जब सचिन तेंदुलकर के जन्मदिन पर सोशल मीडिया जश्न में डूबा हुआ है, तो मुझे सचिन से जुड़ा एक दशक से भी ज़्यादा पुराना कि़स्सा याद आ रहा है।
ये बात, उस वक्त की है, जब भारत ने 2011 का वनडे वर्ल्ड कप जीत लिया था। उस वक्त तेंदुलकर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक पूरा करने की कोशिश कर रहे थे।
एक दिन मेरे दोस्त के सात साल के बेटे ने पूछा कि, ‘सचिन ने आईपीएल में कितने शतक लगाए हैं?’
ये बड़ा मासूम सा सवाल था, जिस पर न इतिहास का साया था, न विरासत का बोझ। मैंने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।।। ‘हम्म...एक’। बच्चे ने हैरानी से कहा, ‘सिर्फ एक।’
मैं उसके मासूम सवाल पर चौंक ज़रूर गई थी, मगर मुझे ख़ुशी भी हुई थी।
उस स्कूली बच्चे ने 2011 के विश्व कप में सचिन की धुआंधार पारियों को देखा था। फिर भी उसकी नजर में सचिन तेंदुलकर की यही छवि थी जबकि उस वक्त सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट के इतिहास में भारत के सबसे बड़े स्टार थे।
क्रिकेट के ‘भगवान’
वो सोशल मीडिया और ख़ुद के प्रचार से पहले का दौर था। आज जब सचिन तेंदुलकर, मुंबई इंडियंस की टीम के डग आउट में पहुंचते हैं, या फिर विज्ञापनों में और इंस्टाग्राम पर दिखते हैं, तो मेरे ज़हन में सवाल उठता है कि अब सात साल के बच्चे सचिन तेंदुलकर को किस नजर देखते होंगे?
इस साल नवंबर में सचिन तेंदुलकर को सक्रिय क्रिकेट से संन्यास लिए हुए 13 साल पूरे हो जाएंगे।
टीनएजर्स के लिए वो महज़ एक ऐसे पूर्व खिलाड़ी हैं, जिनके बारे में सयाने लोग कहते हैं कि वो बहुत शानदार खिलाड़ी थे।
उनके लिए सचिन तेंदुलकर, 1989 से 2013 के दौर वाले क्रिकेट के भगवान नहीं, जैसा उन्हें करोड़ों क्रिकेट फ़ैन याद करते हैं। आज के नौजवानों के लिए वो 2023 वाले पूर्व क्रिकेटर हैं।
आज के युवा धोनी, कोहली और रोहित शर्मा के दौर में बड़े हुए हैं, जो मैदान के चारों और शॉट लगाने वाली बैटिंग करते हैं।
टी-20 के दौर में इन नौजवानों ने इन खिलाडिय़ों को हर गेंद पर ज़बर्दस्त शॉट लगाते देखा है, जो कई बार मैदान के उन कोनों तक पहुंच जाती है, जिसके बारे में उन्हें मालूम है कि तेंदुलकर ऐसा शॉट नहीं खेलते थे।
जादुई आंकड़े
ऐसा नहीं है कि सचिन तेंदुलकर ने टी-20 मैच नहीं खेले। वो छह सीजऩ तक मुंबई इंडियंस के लिए खेले थे।
78 मैचों में सचिन ने 2334 रन बनाए थे। इनमें 13 अर्धशतक और एक सेंचुरी थी। ढ्ढक्करु के इन 78 मैचों में सचिन तेंदुलकर का स्ट्राइक रेट 119।31 और औसत 34.83 रनों का था। जब आईपीएल शुरू हुआ था, तो सचिन तेंदुलकर अपने इंटरनेशनल करियर के 19वें बरस में थे।
आईपीएल के पहले सीजऩ के दौरान वो 35 साल के हुए थे। आईपीएल में सचिन तेंदुलकर का सबसे बढिय़ा सीजऩ 2010 का रहा था।
तब मुंबई इंडियंस की टीम पहली बार फ़ाइनल में पहुंची थी। हालांकि, वो फ़ाइनल में चेन्नई सुपर किंग्स से हार गई थी।
उस वक्त 37 साल के तेंदुलकर ने टी20 मैचों में 180 के जादुई आंकड़े को पार कर लिया था।
ये टी-20 में किसी बल्लेबाज़ के औसत और उसके स्ट्राइक रेट का जोड़ होता है, जिसे टी20 मैचों में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
2010 में सचिन तेंदुलकर आईपीएल के प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट बने थे। उन्होंने उस सीजऩ में 47।53 के औसत और 132।61 के स्ट्राइक रेट से 618 रन स्कोर किए थे। ये आईपीएल में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था।
आज कैसे बल्लेबाज होते?
उन्होंने कहा कि गेंद को बार-बार बाउंड्री लाइन के बाहर भेजने का आत्मविश्वास हासिल करने के लिए, ‘आपको पिच के मिज़ाज के मुताबिक़ लगातार कोशिश करते रहना होगा। हर पिच अलग तरह की होती है। आपको ख़ुद को पिच के हिसाब से खेलने के लिए ढालना पड़ता है। मैं अपने ज़हन और खेल को पिच का मिज़ाज भांपकर बदल लेता।’
मैंने सचिन तेंदुलकर के जितने भी इंटरव्यू लिए, हर बार यही अहसास हुआ कि आप ऐसे शख़्स से बात कर रहे हैं, जिसकी नस-नस में क्रिकेट समाया हुआ है।
वैसे तो अंग्रेज़ी के हृद्गह्म्स्र शब्द का हिंदी में मतलब 'पढ़ाकू' होता है। मगर, सचिन तेंदुलकर के मामले में आपको याद रखना होगा कि उनकी सारी पढ़ाई क्रिकेट के खेल और क्रिकेट के मैदान को लेकर थी।
यही वजह है कि वो कहते हैं कि वो आज के दौर की ज़रूरत के मुताबिक़, हर गेंद पर रन बनाने का कोई न कोई तरीक़ा तलाश ही लेते।
जब सचिन को वनडे मैचों में पारी की शुरुआत करने को कहा गया था, तो उन्होंने यही तो किया था।
अभिषेक शर्मा ने ब्रॉडकास्टर से की ये गुज़ारिश, ‘अगली बार से मैं चाहता हूँ।’
अपने वनडे मैचों के करियर के पहले दस वर्षों में सचिन तेंदुलकर, अपने दौर के ज़्यादातर खिलाडिय़ों से कहीं ज़्यादा स्ट्राइक रेट (86।78) से रन बना रहे थे। इस दौरान उन्होंने 24 शतक और 44 अर्थशतक लगाए थे।
एक दिन मुंबई के पूर्व ओपनर ज़ुबिन भरूचा और अब राजस्थान रॉयल्स टीम के हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर से किसी और मसले पर बात हो रही थी।
जब सचिन तेंदुलकर के एक नौजवान खिलाड़ी के तौर पर आईपीएल के फॉर्मैट में ढल जाने का सवाल उठा, तो ज़ुबिन ने ठहाका लगाया। उन्होंने कहा कि ‘ये तो सवाल ही बेमानी है।’
भरूचा ने घंटों आईपीएल मैचों में ‘बल्ले की चोट से गेंदों को उड़ते’ देखा है।
वो कहते हैं कि ‘हां, गेंद को कोई भी मार सकता है। एबी डिविलियर्स, केविन पोलार्ड या कोई और। ये सब बहुत बढिय़ा खिलाड़ी हैं। लेकिन, सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाज़ी की ख़ास बात यही है कि वो किसी भी दौर में होते, कामयाब बल्लेबाज़ ही होते। फिर चाहे वो अपने दौर के पहले होते, या उसके बाद।’
-सनियारा खान
डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाला एक फ्रांसीसी व्यक्ति, अपनी आंखों में हमारे देश के लिए ढेरों सपने संजोकर यहां आया था। वे फिल्मकार होने के साथ ही एक लेखक भी था। उनका नाम है वैलेंटीन हेनाल्ट। वे सन् 2023 में हिंदुस्तान आए थे। हमारे देश में जाति धर्म से कुछ लोग, ख़ास करके दलित महिलाएं किस तरह प्रभावित होती हैं, इसी पर उनको एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनानी थी। लेकिन बहुत जल्द ही उनको गोरखपुर पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल में बंद कर दिया। क्योंकि वे दलित महिलाओं के पक्ष में अंबेडकर जन मोर्चा द्वारा किए गए एक विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए थे। यह जानने के लिए कि वे लोग किस बात को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। पर यह सवाल उनको परेशान कर रहा था कि उनको किस जुर्म में जेल में बंद किया गया है? लेकिन किसी से भी उनको सही जवाब नहीं मिल रहा था।
बगैर किसी कारण उनको पुलिसवाले आतंकवादी, शहरी नक्सल और विदेशी दुश्मन के रूप में साबित करने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि उनको उनकी होटल से वीजा नियम उल्लंघन करने का अपराध बताकर गिरफ्तार करके लाया गया है। इसके बाद गोरखपुर जेल के अंदर रहते हुए, हिंदुस्तानी जेलों के अंदर क्या-क्या होता है और किस तरह का कानून चलता है, इन बातों को वे धीरे-धीरे समझने की कोशिश कर रहे थे। जितनी बातें वे समझ पा रहे थे, उतना ही वे हैरान होते जा रहे थे। जेल के अंदर की दुनिया एक अलग ही दुनिया थी। बाहर की दुनिया के समानांतर, लेकिन पूरी तरह अलग रंग लिए हुए। जेल के अंदर हो रही हिंसा और संगठित अपराधों को करीब से देखने के बाद उनकी आंखों से बहुत सारी बातों को लेकर पर्दा हट गया था ।
वे अक्सर छुप-छुपकर जेल के अंदर अलग-अलग लोगों से बातें करते थे और काफी सवाल भी पूछते रहते थे। यहां-वहां से छोटे-छोटे कागज उठाकर अपने पास रखते थे। किसी से कलम लेकर सवाल-जवाब लिखकर अपने पास रख लिया करते थे।
उनका मुकदमा खत्म होने पर वे सन् 2024 में फ्रांस लौट गए। उसके बाद उन्होंने जेल के अंदर जो कुछ भी होते हुए देखा था, उन्हीं अनुभवों को लेकर फ्रेंच भाषा में एक संस्मरण लिखने लगे। उस संस्मरण का नाम था-‘I had an Indian Dream : In the Hell of Gorakhpur Prison’. सच में, वे इस देश के बारे में जिन सपनों को अपने सीने में संजोकर आए थे, वो सभी सपने गोरखपुर जेल के अंदर दम तोडऩे लगे थे। इस संस्मरण में कुल सोलह अध्याय हैं। कैसे उनको गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिया गया था और जेल के अंदर आम कैदियों को कई बार किस तरह नौकरों की तरह रहना पड़ता था... इन्हीं सारी बातों को इस संस्मरण में खुलकर बताया गया है।
जब वे इस देश में आए थे तब वे अपने सपनों का हिंदुस्तान को ही देखने आए थे। तब तक ये देश उनकी नजर में आध्यात्मिक देश था। वे संन्यासियों के बीच रहकर उनसे आध्यात्मिकता के बारे में जानना चाहते थे। वाराणसी और हिमालय को सामने खड़े होकर देखना और महसूस करना चाहते थे। शायद बहुत सारे पर्यटकों को यही सब बातें आकृष्ट करती हैं। लेकिन यहां कदम रखने के बाद उन्होंने असल हिंदुस्तान को जाना और उसे समझने की कोशिश करने लगे। हिंदुस्तानी समाज के दोहरे रूप देखकर वे हैरान हो जाते थे। यहां आने के बाद वैलेंटीन हेनाल्ट ने देखा कि कई अंग्रेजी बोलने वाले और हाई प्रोफाइल लोग नीची कहीं जाने वाली जाति के लोगों से दूर रहना पसंद करते हैं। बहुत से ब्राह्मण उनसे कहते थे कि अब तो दलित लोगों को बहुत ज्यादा सुविधा मिलने लगी हैं। उन लोगों के अधिकार क्षेत्र भी पहले से बढ़ गए हैं। लेकिन उन्हीं के घरों में कई दलित नौकर होते थे। उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दलित महिलाओं के साथ होने वाले निर्मम अत्याचारों के बारे में जानकर वे इसलिए भी और दुखी थे कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार के बड़े-बड़े संगठनों में भी इन बातों को लेकर गहरी चुप्पी है।
अपने संस्मरण में उन्होंने उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जेल के अंदर के भयावह क्रूरता के साथ-साथ जाति और धर्म के हिसाब से चल रहे अलग-अलग सिस्टम....सभी कुछ खुलकर बताया है। यही नहीं, अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों के लोग सत्ता और धन के सहारे जेल में अपनी मर्जी की जिंदगी गुजारते हैं। बाकी सभी लोग उनसे डरते हैं। कई बार पुलिस वाले दबी जबान से उनको समझाते थे कि यहां की समस्याओं को लेकर फिल्म बनाने की जगह उनको अपने देश की समस्याओं को लेकर सोचना चाहिए। एक बार एक पुलिस कमिश्नर ने उनको कहा कि यहां के दलितों को लेकर उनको चिंता नहीं करना चाहिए। हैरानी की बात ये है कि वह कमिश्नर फ्रांस जाकर उसी शिक्षानुष्ठान से पढक़र आया था, जहां से वैलेंटीन हेनाल्ट ने भी पढ़ाई की है।
लोकसभा में पिछले दिनों परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर्याप्त संख्या बल के अभाव में गिर गया। सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगा रही है लेकिन विपक्ष इसे सरकार के षड्यंत्र के तौर पर पेश कर रहा है।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र का लिखा-
पिछले हफ्ते तीन दिन के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें 131वें संविधान विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पारित कराने की कोशिश थी। हालांकि यह विशेष सत्र नहीं बल्कि बजट सत्र का ही विस्तारित हिस्सा था। लेकिन इस सत्र की टाइमिंग और उसमें लाए जाने वाले विधेयक को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही और आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका जताई जा रही थी।
करीब तीन साल पहले पारित महिला आरक्षण कानून में संशोधन के लिए लाए जाने वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक का मुख्य मकसद परिसीमन करना था जिसके लिए विपक्ष तैयार नहीं था। विधेयक पारित नहीं हो सका और अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कांग्रेस पार्टी समेत समूचे विपक्ष पर आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने महिलाओं का अपमान किया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के अपमान का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि विधेयक में महिला आरक्षण से संबंधित कोई बात ही नहीं है।
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने विधेयक का बचाव करते हुए मीडिया से बातचीत में कहा कि डीलिमिटेशन के बिना आरक्षण को लागू करना संभव ही नहीं है। उनका कहना था, ‘संवैधानिक मर्यादाओं को समझे बिना ऐसी बातें करना आसान है। बिना डीलिमिटेशन किए और कांस्टीट्यूएंसी बढ़ाए, आरक्षण लागू करना संभव ही नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो पुरुषों के अधिकार का सवाल उठेगा। इसलिए सरकार का प्रस्ताव संविधान के दायरे में है।’ ऐसे में अभी भी कई लोगों में ये दुविधा है कि आखिर माजरा क्या है? सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप क्यों लगा रही है और विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल क्यों उठा रहा है?
नया विधेयक बनाम पुराना विधेयक
दरअसल, महिला आरक्षण विधेयक जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कहा गया है, उसे 2023 में ही संसद के दोनों सदनों में पारित किया जा चुका है और वो कानून भी बन चुका है। 106वें संविधान संशोधन के रूप में उस विधेयक को पारित कराने के लिए भी तत्कालीन सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था लेकिन विपक्ष के समर्थन से उस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया गया था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल राज्यसभा सदस्य हैं और सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, विधेयक पास कराने की सरकार की मंशा ही नहीं थी। वो तो यही चाहते थे कि कैसे इसके बहाने चुनाव के दौरान भाषण देने का मौका मिले। महिला आरक्षण विधेयक तो 2023 में ही पास हो चुका है, और सर्वसम्मति से पास हो चुका है। हम सबने उसे मिलकर पास कराया है। उस विधेयक में आपने देश से वादा किया था कि 2026 के बाद जनगणना होगी, उसके बाद परिसीमन होगा और फिर महिला आरक्षण की व्यवस्था तय की जाएगा। ये उनका संवैधानिक कर्तव्य था लेकिन सरकार उससे पीछे हट गई।’
दरअसल, 2023 में पारित संविधान संशोधन विधेयक में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया गया है लेकिन उस वक्त सरकार का कहना था कि इसकी व्यवस्था जनगणना और परिसीमन के बाद तय की जाएगी।
सरकार की मंशा पर सवाल
लेकिन जब अचानक सरकार 131वां संशोधन विधेयक 2026 लेकर आई तो विपक्ष सरकार की मंशा पर सवाल उठाने लगा। उसका कारण यह था कि सरकार अपने ही वादे से मुकर रही थी। यानी 2026 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बजाय, सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कर रही थी। हालांकि विपक्ष को सबसे ज्यादा आपत्ति विधेयक के दूसरे हिस्से पर थी जिसके तहत लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था।
लोकसभा सदस्य और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी का साफतौर पर कहना था कि महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण अभी देना है तो 543 सीटों पर ही सरकार क्यों नहीं दे रही है।
इस दौरान एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ जिसमें सरकार उलझ गई। दरअसल, 2023 का विधेयक संसद में पारित भी हो गया था और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वो कानून भी बन गया था लेकिन कानून नोटिफाई नहीं हुआ था और बिना नोटिफाई हुए वह व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं था। कानूनी जानकारों के मुताबिक, बिना अमल में आए किसी कानून में संशोधन नहीं हो सकता। इसलिए सरकार ने जिस दिन नया संविधान संशोधन विधेयक पेश किया उसी रात अचानक पुराने कानून का नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया।
सरकार की इस हड़बड़ी और अचानक नए विधेयक लाने को लेकर इन्हीं वजहों से सवाल उठ रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका वृंदा गोपीनाथ कहती हैं कि वास्तव में यह महिला आरक्षण विधेयक था ही नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए आरक्षण लागू करने की कोशिश थी जिसमें सरकार नाकाम रही।
उनके मुताबिक, "सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना जरूरी है कि संसद में जिस विधेयक को खारिज किया गया, वह महिला आरक्षण विधेयक 2026 नहीं था, बल्कि 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 था जिसका मकसद परिसीमन के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण लागू करना था। लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने से दक्षिणी और पूर्वी राज्यों के हित प्रभावित होते। सरकार को भी यह मालूम था।’
महिला आरक्षण के बीच कैसे आया परिसीमन?
दरअसल, विपक्षी दलों का विरोध इस बात को लेकर था कि सरकार ने महिला आरक्षण को चुपचाप परिसीमन से जोड़ दिया, जबकि सरकार को मालूम था कि परिसीमन के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाए जाने का दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं। यही नहीं, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ाने को लेकर और भी कई व्यवस्थागत सवाल उठाए जा रहे हैं।
राज्यसभा सांसद पी विल्सन तो एक प्राइवेट मेंबर बिल के लिए भी राज्यसभा में नोटिस दिया ताकि लोकसभा की मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण सुनिश्चित किया जाए लेकिन उनके नोटिस को खारिज कर दिया गया। उन्होंने राज्यसभा में नियम 267 के तहत यह नोटिस दिया था।
उधर, विधेयक के लोकसभा से खारिज हो जाने के बाद सत्तापक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि इसके जरिए महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही थी जिसे विपक्ष ने नाकाम कर दिया। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश की आम महिलाएं इस कानून को कैसे देख रही हैं। ज्यादातर महिलाओं का ये मानना है कि राजनीति में आने की इच्छुक महिलाओं के लिए तो ये एक अवसर की तरह जरूर है लेकिन आम महिलाओं के भीतर इसे लेकर कोई बहुत उत्साह नहीं है।
भगीरथ की मोक्षदायिनी गंगा की मूल धारा आदि गंगा आज औपनिवेशिक इंजीनियरिंग, बेतरतीव शहरी फैलाव, सांस्कृतिक विस्मृति और मेट्रो के खम्भों के बीच उलझ कर रह गई है
पिछले जनवरी में कोलकाता प्रवास के दौरान बाँसद्रोणी जाने के क्रम में मेरा सामना एक ऐसी कड़वी हकीकत से हुआ जो आधुनिक भारत के शहरी 'विकास' के पीछे छिपे विनाश की गवाही दे रही थी। जहाँ एक तरफ अत्याधुनिक मेट्रो ट्रेन कंक्रीट के खंभों पर सरपट दौड़ रही थी, और ठीक उसके नीचे काले, गाढ़े और बदबूदार पानी का एक संकरा प्रवाह था. स्थानीय लोगो से पता चला कि जिसे मैं एक 'गंदा नाला' समझ रहा हूँ, उसका नाम 'आदिगंगा' है, मोक्षदायणी गंगा की प्राचीन (आदि) मुख्य धारा! वही नदी जो हजारो सालो से आस्था का केंद्र रही और जिसके किनारे कभी इस शहर की नींव रखी गयी थी, आज एक बजबजाते नाले में बदल चुकी है, जिसको स्थानीय लोग टॉली नाला कहते हैं।
हालांकि, नाला शब्द का मूल अर्थ गंदगी से नहीं जुड़ा है। एक प्राकृतिक ढांचा जो बरसात के पानी की निकासी के लिए उपयोग में आता है। लेकिन हमारे विकास के नाम पर की गई लापरवाहियों और जल संसाधनों के दुरुपयोग ने इस शब्द के अर्थ को बदलकर गंदगी और सड़ांध का पर्याय बना दिया है। यहाँ केवल भाषा नहीं बदली, बल्कि नदी-पानी के साथ हमारी अंतर्संबंध भी बदल चुकी है। यह केवल एक नदी के लुप्त होने की ही कहानी नहीं है, बल्कि यह एक इतिहासिक दास्तवेज है जहाँ प्रकृति के बदलावों और इंसान की ‘शहरी’ और 'इंजीनियरिंग' की भूख ने मिलकर एक जीवित सभ्यता के वाहक को सीवेज लाइन में तब्दील कर दिया। यह कहानी केवल कोलकाता के आदि गंगा की ही नहीं बल्कि दिल्ली के यमुना की, वडोदरा के विश्वामित्री की, चेन्नई के अडियार की, पुणे के मुला-मुठा की, भारत के अधिकांश शहरो की आधार रही उन तमाम नदियों की कहानी है जो अब उन्ही शहरो की बलि चढ़ रही है।
आदिगंगा का पौराणिक और सांस्कृतिक वैभव
आदि गंगा महज पानी की एक धारा नहीं, बल्कि बंगाल की 'पवित्र भूगोल' का केंद्र रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर उतारा, तो कपिल मुनि के आश्रम की ओर बढ़ते हुए गंगा कई धाराओं में बंट गई। आदिगंगा को ही वह 'असली' धारा के रूप में मानी जाती है, जिसने भगीरथ के पूर्वजों की राख को छूकर उन्हें मोक्ष दिया।
यही कारण है कि बंगाल के मध्यकालीन साहित्य, जैसे बिप्रदास पिपलई की 'मनसामंगल', मुकुंदराम चक्रवर्ती की 'चंडीमंगल', कृष्णराम दास की ‘रायमंगल’, अयोध्या राम की ‘सत्यनारायण कथा’, हरिदेब की सीतामंगल आदि रचनाओं में आदि गंगा जो गंगा की मुख्य धारा है, के भूगोल के साथ साथ गौरवशाली धार्मिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ मिलता है।
वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु की यात्राओं में भी इसी धारा से गुजरने का वर्णन आता है; आज भी उनकी स्मृति में जिस स्थान को वैष्णवघाटा कहा जाता है, वह आदिगंगा के तट से ही जुड़ा हुआ है। मृतप्राय हो चुके नदी के किनारे एक शक्तिपीठ के रूप में कालीघाट मंदिर आज भी एक प्रमुख तीर्थ है। श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों का श्राद्ध और दाह संस्कार करते हैं और आस्था की डुबकी लगाते हैं, क्योंकि भले ही गंगा की मुख्य धारा आज हुगली के रूप में बह रही हो, पर लोकमान्यता में आदिगंगा को ही मूल धारा माना जाता है।
टेकटोनिक शिफ्ट: आदि गंगा के पतन की शुरुआत
गंगा की मुख्य धारा के मृतप्राय हो जाने के पीछे बेतरतीब शहरीकरण के साथ साथ लगभग पिछले पांच सौ सालो का क्षेत्रीय और व्यापक स्तर के भूगर्भीय बदलाव भी शामिल रहे है। जिसकी कहानी कोलकाता से तीन सौ किलोमीटर उत्तर ‘गिरिया’ से शुरू होती हैं, जहां से 16वीं शताब्दी के उतरार्ध तक गंगा की मुख्य धारा भागीरथी के रूप में दक्षिण में प्रयाण करती थी, और एक छोटी धारा पद्मा के रूप पूरब की ओर (जो अब बांग्लादेश है) बह निकलती थी।
भागीरथी नदी दक्षिण में जलंगी नदी से मिलने के बाद तीन अलग-अलग धाराओं सरस्वती (पश्चिम), हूगली (मध्य), जमुना-बिद्याधरी (पूरब) के रूप में बह निकलती है, जिसे बंगाल की त्रिबेणी कहा जाता है। प्रयागराज के त्रिवेणी के उलट जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है, जिसे 'युक्त वेणी' कहा जाता है, बंगाल के इस त्रिबेणी को 'मुक्त वेणी' कहा जाता है, क्योंकि यहां से तीन धाराएं अलग अलग मुक्त होती हैं।
सोलहवीं शताब्दी के आखिरी में बंगाल बेसिन में एक बड़ा टेक्टोनिक शिफ्ट हुआ, जिसके कारण डेल्टा का पश्चिमी हिस्सा (जहाँ कोलकाता स्थित है) थोड़ा ऊपर उठ गया और पूर्वी हिस्सा (वर्तमान बांग्लादेश) धंस गया। इस 'ईस्टवर्ड शिफ्ट' के कारण गंगा भागीरथी, हुगली-आदिगंगा और अन्य पश्चिमी धाराओं को आंशिक रूप में छोड़कर पूर्व की ओर मुख्य रूप से 'पद्मा' नदी से होकर बहने लगी।
इससे बंगाल का पश्चिमी हिस्सा जो उस समय तक सरस्वती पर स्थित नदी बन्दरगाहो के कारण समुद्री व्यापार का केंद्र था, पानी में बहाव के कमी और नदी में गाद जमा हो जाने के कारण बड़े स्तर पर प्रभावित हुआ।
ऐतिहासिक रूप से, हुगली-आदि गंगा ना हो के सरस्वती नदी ही बंगाल की मुख्य व्यापारिक धमनी थी, जिस पर 'सप्तग्राम' जैसा समृद्ध पत्तन फला-फूला।आदिगंगा, जो कभी लहरें मारती नदी थी, अब केवल मानसून के पानी पर निर्भर रहने वाली एक 'स्पिल चैनल' बनकर रह गई।
औपनिवेशिक दबाव और 'काटा गंगा'
धीरे धीरे घट रहे पानी का प्रभाव भागीरथी और सरस्वती नदी से होके आदि गंगा पर पड़ने वाला था, जिसमें केवल प्रकृति ही नहीं,नहीं, इंसानी हस्तक्षेप का भी बड़ा हाथ रहा। टेक्टोनिक शिफ्ट के पहले तक सरस्वती नदी का जलमार्ग गहरा होने के कारण ताम्रलिप्ति के जगह सप्तग्राम बहुत व्यस्त और समृद्ध पोर्ट के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था जिसे पुर्तगालीयो ने 'पोर्तो पेकेनो' (छोटा बंदरगाह) का नाम दिया था।
लेकिन टेक्टोनिक शिफ्ट के बाद पानी के बहाव में कमी के कारण सरस्वती नदी धीरे-धीरे गाद से भरने लगी. बड़े जहाज अब सप्तग्राम तक नहीं जा पा रहे थे, इसलिए पुर्तगाली व्यापारियों ने सरस्वती नदी में ही काफी नीचे 'बेतड़' पत्तन का उपयोग शुरू किया, जहाँ से माल छोटी नावों के जरिए सप्तग्राम भेजा जाता था।
सरस्वती नदी के व्यापारिक मार्ग को गाद से बचा कर सुचारू रखने के लिए अठारहवीं शताब्दी के मध्य (1739 और 1756 के बीच कभी) नवाब अलीवर्दी खान के शासनकाल में डच इंजीनियरों की सहायता से हावड़ा के संकरैल के पास हुगली जो उस समय आदि गंगा के रास्ते बहती थी, को सरस्वती के निचले और गहरे हिस्से से जोड़ने के लिए इस धारा को काटा गया। इस मानव-निर्मित नहर को 'काटा गंगा' कहा गया।
इस हस्तक्षेप के कारण धीरे धीरे सरस्वती नदी से होते हुए यही धारा हुगली की मुख्य धारा बन गई और पहले से ही पानी की कमी झेल रही गंगा की मुख्य धारा आदिगंगा को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया। इस प्रकार औपनिवेशिक ताकतों के प्रभाव में और समुद्री व्यापर को सुनिश्चित करने के दबाब में आदि गंगा सूखती और सिकुड़ती चली गयी।
औपनिवेशिक इंजीनियरिंग: टॉली नाला
'काटा गंगा' प्रकरण के कुछ सालो बाद ही बाद हुगली का सारा पानी अब सीधे सरस्वती की निचली धारा के रास्ते समुद्र में मिलने लगी और आदि गंगा पानी कमी के कारण तेजी से सिकुड़ने लगती है जिसका जिक्र भारत के पहले सर्वेयर जनरल जेम्स रेंनेल अपने सर्वे में इसे बस एक फेंटलाइन के रूप में दर्शाते है।
1775-1777 के बीच, ईस्ट इंडिया कंपनी के मेजर विलियम टॉली ने व्यापारिक लाभ के लिए आदिगंगा की पुरानी धारा के कुछ भाग (हेस्टिंग्स से गरिया तक) और वहा से सामुकपोता तक नहर खुदवाई ताकि इसका उपयोग सुंदरबन तक के लिए एक व्यापारिक मार्ग के रूप में हो सके, जिसे 'टॉली नाला' का नाम दिया गया।
इस प्रकार 15 किलोमीटर लम्बी नहर के सहारे आदि गंगा जो गरिया से दक्षिण की तरफ मुड के बरुइपुर, सुर्यापुर, मागरा से होकर पानी के विस्तृत विन्यास के हिस्सेके रूप में सागर द्वीप के पास समुद्र में मिल जाती थी, अब उसके एक हिस्से का प्रवाह सुन्दरवन की ओर प्रवाहित होने वाली विद्याधरी नदी तक हो गया।
अगले कुछ दशकों के लिए आदि गंगा के दिन बहुरते है और यह जल परिवहन खास कर छोटे नाव के माध्यम से स्थानीय व्यापर का केंद्र बन जाती है। इस प्रकार जल परिवहन को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए आदिगंगा के रख रखाव पर सरकारी कृपा बनी रही।
यह अंग्रेजी हुकूमत के शुरुवाती दौर की बात थी जब कोलकाता और आसपास के व्यापक रूप से फैले क्रीक, नदी नालों को जल परिवहन के लिए विकसित किया गया, पर कुछ दशकों में ही अंग्रेजों ने जलमार्गों के बजाय पहले सड़क और उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में रेलवे को प्राथमिकता देनी शुरू की।
नतीजतन आदिगंगा के रास्ते व्यापार कम हुआ और अंततः नदी के रखरखाव में निवेश पूरी तरह बंद हो गया. धीरे-धीरे, ज्वार के साथ आने वाली गाद ने इसे और भी उथला बना दिया। इस प्रकार आदिगंगा एक बार फिर नेपथ्य में चली गयी।
आदि गंगा की सांस्कृतिक स्मृति
उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में मृतप्राय आदि गंगा को स्थिति को ब्रिटिश अधिकारी विलियम विलसन हंटर 'ए स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ बंगाल' (1875) में दर्ज करते है। तब तक प्रवाह विहीन नदी सूख कर केवल छोटे पोखरों या 'डोबा' की एक श्रृंखला भर रह गई थी।
हालांकि नदी में कोई बहाव नहीं थी फिर भी स्थानीय लोगो के बीच गंगा की मुख्य धारा के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आई थी और अपने मृतकों को नदी की सूखी पेटी में ही अंतिम संस्कार की परम्परा बनी रही, क्योंकि उनकी मान्यता में यही 'मूल' गंगा थी, जिसके किनारे जलाए जाने से मोक्ष मिलता है।
हंटर से लगभग सौ साल पहले भी एक स्थानीय पुजारी के हवाले सूख रही आदि गंगा को ही गंगा की मुख्य धारा मानने की मान्यता का जिक्र तब के अंग्रेजी सरकार के नुमाइंदे जॉन जे होलवेल भी करते है।
बाद में नदी की पेटी में स्थानीय जमींदार परिवार धार्मिक आस्था के अनुरूप अपने अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए डोबा आरक्षित करने लगे, जिसमे कुछ् का अस्तित्व नदी के बरुइपुर, सुर्यापुर वाले रास्ते में डोबा की एक विस्तृत श्रृंखला के रूप में आज भी बचा हुआ है, जैसे करेर गंगा, धोषेर गंगा, मित्रो गंगा, यहाँ तक इन तालाबो के नाम के साथ गंगा नाम आज भी चलन में है, जो गंगा की मुख्य धारा के साथ सांस्कृतिक स्मृति का भान कराती है।
आधुनिक भारत: कंक्रीट के खंभों उलझी नदी
आजादी के बाद मुख्यतः अनियोजित शहरीकरण, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक-पर्यावरणीय असंतुलन के कारण आदिगंगा की स्थिति बिगडती चली गई। कोलकाता शहर के फैलाव और नदी तटों पर अवैध कब्जे, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार ने गंगा की इस पवित्र धारा को 'वेस्ट डंपिंग ग्राउंड' में बदल दिया।
तकनीकी व्यवस्थाओं की कमी, जैसे उचित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का अभाव और पुरानी जल-निकासी प्रणाली का रखरखाव न होना और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों ने स्थिति को और गंभीर बनाता गया।
हालाकि बीच-बीच में नदी के बचाव के लिए भी प्रयास होते रहे, पर विभिन्न सरकारी योजनाएँ, सीवेज ट्रीटमेंट परियोजनाएं और सफाई अभियान अक्सर तकनीकी समाधान तक सीमित रहे, जिनमें नदी को एक जीवंत सामाजिक-पर्यावरणीय तंत्र के रूप में समझने के बजाय मात्र एक “ड्रेनेज चैनल” मान लिया गया।
कई बार पुनरुद्धार के नाम पर बुनियादी ढाँचा निर्माण, अतिक्रमण हटाने या “सौंदर्यीकरण” पर जोर दिया गया, जो वास्तव में नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करने के बजाय शहरी विकास के हितों को साधने का माध्यम बन गया। नदी के साथ की स्थानीय समझ और सांस्कृतिक संबंधों की उपेक्षा ने आदि गंगा के पुनर्जीवन के प्रयासों को कमजोर किया।
नब्बे के दशक में बड़े स्तर पर नदी से गाद हटाने के बाद नदी में थोड़ा बहुत बहाव वापस आया पर नयी सदी के शुरुवात तक नदी मेट्रो के कुचक्र में फंस गयी। साल 2001 में, जब टॉलीगंज से गरिया के बीच मेट्रो रेलवे के विस्तार की योजना बनी, तो पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बावजूद, नदी के सीने पर मेट्रो के 300 कंक्रीट के खंभे गाड़ दिए गए।
इन खंभों ने कभी 75 किलोमीटर लंबी रही नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया और आदि गंगा कोलकाता में अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव से दूर, एक अवरुद्ध और प्रदूषित प्रवाह के रूप में सीमित रह गई है।
क्या आदि गंगा की मुक्ति संभव है?
आज आदिगंगा सूख रही, इसमें से जीवन के निशान धीरे धीरे खत्म हो रहे है, इसके पुनर्जीवन के नाम पर हजारों करोड़ खर्च कर हम तथाकथित आधुनिक शहर के लिए जरुरी हित साध रहे है। एक बार फिर नेशनल क्लीन गंगा मिशन नदी को पुनर्जीवन के 650 करोड़ की राशि के प्लान के साथ हाज़िर है।
एक बार फिर बंगाल के चुनाव में सभी पार्टियों के आदि गंगा के कायाकल्प के वादे गूंज रहे है। पर हम नदी को एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र मान कर और उसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक और जलसमाज वाले पहलू को देखे बिना बस शहरी अपशिष्ट वहन करने वाली धारा के सौदर्यीकरण से आगे अब भी सोच नहीं पा रहे है।
आदिगंगा की यह व्यथा केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभूतपूर्ण क्षरण है। जिन नदी ने सदियों तक हमें व्यापारिक संपन्नता और आध्यात्मिक शांति दी, उसे हमने अपने 'विकास' की वेदी पर चढ़ा दिया। रेंनेल और हंटर के नक्शों में और मनसामंगल, चंडीमंगल और श्चैतन्य महाप्रभु की यात्रा वाली नदी कभी 'पवित्र धारा' थी, आज वह हमारे शहरी लालच के स्मारक के रूप बच गयी है। हम देख ही नहीं पा रहे है कि कैसे फैलते शहर अपनी ही नदियों को निगल रही हैं! क्या हम अपनी अगली पीढ़ियों को यह बताने की हिम्मत जुटा पाएंगे कि जिसे वे 'नाला' कह रहे हैं, वह कभी 'आदिगंगा' थी?
(hindi.downtoearth)
जर्मन शहर बॉन में एक नई प्रदर्शनी लगाई गई है, जो सेक्स वर्क के इतिहास और उससे जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है. यह दिखाती है कि इस काम के लिए जो शब्द इस्तेमाल हुए, उसने समाज में इसके प्रति किस तरह से नफरत या भेदभाव पैदा की.
डॉयचे वैले पर ब्रेंडा हास का लिखा-
"लालुन दुनिया के सबसे पुराने पेशे की सदस्य हैं.”
अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी 1888 की कहानी ‘ऑन द सिटी वॉल' में यह ऐसी लाइन लिखी, जिसने सेक्स वर्क के लिए दुनिया का सबसे मशहूर छद्म नाम तैयार कर दिया. तब से यह मुहावरा बार-बार दोहराया जाता रहा है. सीधे तौर पर काम का नाम लेने के बजाय, इस तरह की घुमावदार भाषा उस समय के समाज की नैतिकता को दिखाती थी. तब लोग ऐसे शब्दों का इस्तेमाल इसलिए करते थे, ताकि इस विषय पर बात भी हो जाए और उन्हें शर्मिंदगी का सामना भी न करना पड़े.
बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले (फेडरल आर्ट गैलरी) में एक नई प्रदर्शनी शुरू हुई है, जिसका नाम है ‘सेक्स वर्क: ए कल्चरल हिस्ट्री'. यह प्रदर्शनी दिखाती है कि अलग-अलग समाजों और बदलत समय के साथ सेक्स वर्क को कैसे पेश किया गया, इसके लिए क्या नियम बनाए गए और इस काम से जुड़े लोगों के अनुभव कैसे रहे. यह इतिहास के माध्यम से समाज की बदलती सोच को समझने की एक कोशिश है.
प्रदर्शनी लगाने वाले इस विषय को ‘एक ऐसा क्षेत्र बताते हैं जो नैतिकतावादी और अत्यधिक राजनीतिक चर्चाओं से भरा हुआ है.' यहां ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरानी कलाकृतियों, कानूनी कागजातों, और आज के दौर के लोगों की बातों के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई है कि समाज में सेक्स वर्क को किस तरह एक खास सांचे में ढाला गया. प्रदर्शनी यह भी उजागर करती है कि कैसे आम बहसों में इसकी हकीकत को अक्सर तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है.
यह प्रदर्शनी आपको यह नहीं बताती कि क्या सही है और क्या गलत है. इसके बजाय, यह आपको खुद से यह पूछने के लिए तैयार करती है कि आपकी अपनी सोच कैसे बनी. क्या यह मीडिया की खबरों का असर है, समाज की उम्मीदें हैं, या फिर वे शब्द हैं जो आपने बचपन से सुने हैं? यह आपकी अपनी धारणाओं को टटोलने का निमंत्रण है.
परजीवी से लेकर सेक्स वर्कर तक
प्रदर्शनी का एक हिस्सा भाषा की पड़ताल करता है. यहां एक शब्द-कोश दिया गया है जो यह दिखाता है कि इतिहास में सेक्स वर्कर्स के लिए किन-किन शब्दों का इस्तेमाल हुआ. यह इस बात की भी पड़ताल करता है कि इन शब्दों ने किन सच्चाइयों को दुनिया के सामने रखा और किन्हें हमेशा के लिए छुपा दिया. साथ ही, यह भी दिखाया गया है कि इन शब्दों ने लिंग, नैतिकता और श्रम को लेकर हमारी सोच को कैसे गढ़ा.
अर्नेस्टीन पास्टोरेलो, इस प्रदर्शनी के आयोजनकर्ताओं में से एक हैं और वह सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट भी हैं. वह कहती हैं, "सेक्स वर्क के इतिहास पर शोध करना मुश्किल है, क्योंकि हर दौर में हमें अलग-अलग नामों से पुकारा गया. ऐतिहासिक दस्तावेजों में अक्सर अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.”
वह आगे कहती हैं, "ऐतिहासिक शब्दावली अक्सर सटीक नहीं होती. 19वीं सदी में, ‘वेश्या' शब्द का इस्तेमाल किसी भी ऐसी महिला के लिए किया जा सकता था जो सार्वजनिक जगहों पर ‘बहुत ज्यादा दिखाई देती' थी, चाहे वह असल में यौन सेवाएं देती थी या नहीं.” वे समझाती हैं कि उस समय यह ‘ठप्पा' बहुत ही लापरवाही से किसी पर भी लगा दिया जाता था, चाहे वे महिलाएं गरीबी में जी रही हों, नशे की समस्या से जूझ रही हों या जिन्हें समाज ‘बिगड़ा हुआ' मानता था. इस वजह से, ऐतिहासिक शोध के लिए इन शब्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इन शब्दों के साथ इतनी बुराई और नफरत जुड़ी हुई है कि आज भी जब हम सेक्स वर्क पर बात करते हैं, तो वही पुरानी सोच हमारे आड़े आती है.
इसी तरह की गलतफहमियां दूसरे ऐतिहासिक मामलों में भी दिखती हैं. पुराने सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों में सेक्स वर्कर्स पर ‘सामाजिक परजीवी' होने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जाता था. यह शब्द शारीरिक रुप से सक्षम उन वयस्कों के लिए इस्तेमाल होता था जो ‘सामाजिक तौर पर उपयोगी कोई काम' नहीं कर रहे थे और आधिकारिक श्रम प्रणाली यानी सरकारी सिस्टम से बाहर रहकर पैसा कमा रहे थे. सेक्स वर्क को भी इसी श्रेणी में रखा गया था, क्योंकि इसे समाज के लिए उपयोगी काम नहीं माना जाता था.
इस भाषा से यह साफ पता चलता है कि अधिकारियों ने शब्दों का इस्तेमाल लोगों के व्यवहार पर लगाम लगाने के लिए किया. इन शब्दों के जरिए ही यह तय किया जाता था कि किसे एक ‘असली श्रमिक' माना जाए और किसे नहीं.
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जब हम इन सभी शब्दों को एक साथ देखते हैं, तो समझ आता है कि किसी को कोई ‘नाम' देना केवल पुकारना नहीं है, बल्कि उसके पीछे लिंग, वर्ग और समाज में उसकी हैसियत को लेकर कई धारणाएं छिपी होती हैं. कुछ नाम तो सीधे तौर पर अपमान करने के लिए बने हैं. जैसे, जर्मन भाषा का शब्द ‘स्ट्रिशर', जो मुख्य रूप से उन पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है जो सेक्स वर्क करते हैं. यह शब्द एक मुहावरे से निकला है जिसका मतलब होता है ‘सड़क पर ग्राहकों की तलाश में घूमना.'
1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में, इस शब्द का इस्तेमाल खासकर बर्लिन के बानहोफ जू स्टेशन के पास काम करने वाले पुरुष सेक्स वर्कर्स के लिए होने लगा. यह जगह उस समय काफी बदनाम थी. इस वजह से, ‘स्ट्रिशर' शब्द का मतलब केवल काम से नहीं रहा, बल्कि यह गरीब, बेघर, और समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों के लिए दुखद पहचान बन गया. इसने उस दौर के शहरी जीवन के एक अंधेरे पक्ष को लोगों के सामने रखा.
क्या सोचती हैं कैजुअल सेक्स से ऊब चुकी महिलाएं
आज के डिजिटल दौर में ‘पॉर्न परफॉर्मर' जैसे शब्द यह दिखाते हैं कि यह काम अब कितना बदल चुका है. सब्सक्रिप्शन वाली शुरुआती वेबसाइटों से लेकर आज के ‘ओनली-फैन्स' जैसे प्लैटफॉर्म तक, अब परफॉर्मर खुद अपना कंटेंट बनाते हैं और उसे सीधे लोगों तक पहुंचाते हैं. आज के समय में कुछ लोग खुद को 'सेक्स वर्कर' कहना पसंद करते हैं, तो कुछ इस पहचान से खुद को दूर रखते हैं.
नाम को फिर से अपनाना और उस पर बहस करना
यह प्रदर्शनी यह भी दिखाती है कि सेक्स वर्करों ने अपने बारे में इस्तेमाल होने वाली भाषा को कैसे आकार दिया है. ‘सेक्स वर्क' शब्द 1970 के दशक के आखिर में अमेरिकी एक्टिविस्ट कैरोल लीघ ने गढ़ा था. वह एक ऐसा शब्द चाहती थीं जो किसी काम को बताए, न कि कोई नैतिक ठप्पा लगाए. इस बदलाव से एकजुट होने, पहचान बनाने और अपनी बात रखने के लिए जगह बनी.
सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट अर्नेस्टीन पास्टोरेलो कहती हैं कि ‘सेक्स वर्क' शब्द को इसलिए ज्यादा पसंद किया जाता है, क्योंकि इसका मतलब ‘ठीक वही है जिसकी असल में बात हो रही है, न उससे ज्यादा और न उससे कम.' यानी, पैसे या दूसरी चीजों के बदले यौन सेवाएं देना, ताकि गुजारा चल सके. उनकी नजर में, यह शब्द चर्चा के लिए स्पष्ट आधार देता है, बजाय उन शब्दों के जो पुरानी नैतिक सोच पर आधारित हैं.
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नजरिए में आया यह बदलाव असल में भी देखने को मिल रहा है. अलग-अलग देशों में सेक्स वर्कर के आंदोलनों ने अपने लिए इस्तेमाल होने वाले अपमानजनक शब्दों को अपनाकर उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया है. उन्होंने ‘एस्कॉर्ट' या ‘स्ट्रिपर' जैसे शब्दों को अपनी मर्जी से चुना है और बाहर से थोपे गए नामों को चुनौती दी है. ये चुनाव इस बात का सबूत हैं कि वे अब अपनी जिंदगी और अपने काम को अपनी शर्तों पर बयां करना चाहते हैं.
इसके साथ ही, कुछ लोग ‘सेक्स वर्क' शब्द के इस्तेमाल पर सवाल भी उठाते हैं.' ‘ग्लोबल अलायंस अगेंस्ट ट्रैफिकिंग इन वीमेन' जैसी संस्थाओं और स्वीडन की नीति विशेषज्ञ गुनीला एकबर्ग जैसी विशेषज्ञों का कहना है कि यह शब्द गंभीर समस्याओं के बीच के अंतर को धुंधला कर देता है. उनका मानना है कि जब हम सबको एक ही नाम (सेक्स वर्क) दे देते हैं, तो उन लोगों को पहचानना मुश्किल हो जाता है जिन्हें गरीबी, दबाव या किसी मजबूरी की वजह से इस काम में धकेला गया है. उनके लिए यह ‘मर्जी का पेशा' नहीं, बल्कि ‘शोषण' का मामला है.
यह असहमति दिखाती है कि भाषा किस तरह से कुछ बातों को तो साफ तौर पर सामने लाती है, लेकिन दूसरों की मजबूरियों को समझना मुश्किल बना देती है.
भाषा और श्रम अधिकार
बतौर पास्टोरेलो, अगर हम अधिकारों की बात करना चाहते हैं, तो सेक्स वर्क को एक ‘काम' की तरह देखना बहुत जरूरी है. वे मानती हैं कि कई लोग मजबूरी में यहां आते हैं, लेकिन उनका मानना है कि जब हम इसे ‘श्रम' कहेंगे, तभी हम इस बारे में बात कर पाएंगे कि इन लोगों को सुरक्षा कैसे मिले, इनके अधिकार क्या हों और ये कैसे एक साथ मिलकर अपनी आवाज उठा सकें.
वह बताती हैं, "इसे काम की तरह देखने से, हमें इस पर ट्रेड यूनियन के नजरिए से बात करने का मौका मिलता है. यह एक बुनियादी सम्मान की बात है कि हमें भी मजदूर माना जाए. इसलिए, हम भी उन्हीं सुरक्षा नियमों और अधिकारों के हकदार हैं जो बाकी कामगारों को मिलते हैं.” उनका मानना है कि पहचान मिलने के लिए ‘सशक्तिकरण' की शर्त नहीं होनी चाहिए. "सेक्स वर्क करने का हमारा अधिकार हमारे श्रम अधिकारों पर निर्भर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि यह हमें सशक्त बनाने वाला है या नहीं.”
कुल मिलाकर, यह प्रदर्शनी संस्कृति, भाषा और असल जिंदगी के अनुभवों के जरिए हमें यह बताती है कि सेक्स वर्क को समझने के लिए सबसे पहले यह मानना जरूरी है कि यह एक उलझा हुआ विषय है. हमें उन शब्दों पर गौर करना होगा जो समाज ने अब तक इस्तेमाल किए हैं. साथ ही, उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जिन्हें इन शब्दों ने कभी अपनी चर्चा का हिस्सा ही नहीं बनाया और नजरअंदाज कर दिया.
यह प्रदर्शनी ‘सेक्स वर्क- ए कल्चरल हिस्ट्री' बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले में 25 अक्टूबर, 2026 तक चलेगी.
-सुनीता नारायण
कुछ तस्वीरें जीवन भर आपके साथ रहती हैं। ऐसी ही मेरी एक याद कई दशक पुरानी है, जो राजस्थान के एक गांव से जुड़ी है। मुझे याद है, मैं उस दिन बहुत तडक़े उठ गई थी, उस समय बस्ती पर अब भी धुंध छाई हुई थी। मैं पास की एक डेयरी तक पैदल गई, जिसे मैं पश्चिमी फिल्मों जैसी जगह समझ रही थी, जहां गायों और भैंसों की कतारें हों और उनका हाथ से दूध निकाला जा रहा हो (यह ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीनों से पहले का समय था)।
लेकिन वहां पहुंचकर एक बिल्कुल साधारण-सी इमारत मिली। अंदर पारंपरिक शॉल में लिपटी महिलाएं कतार में खड़ी थीं। वे बारी-बारी से अपने बर्तन एक छोटे तराजू पर रखतीं, एक छपी हुई पर्ची लेतीं और फिर दूध को एक बड़े कंटेनर में उंडेल देतीं।
उनमें से कोई भी पढऩा-लिखना नहीं जानती थीं। फिर भी उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बताया कि उस पर्ची में न केवल दिए गए दूध की मात्रा दर्ज होती है, बल्कि उसकी वसा (फैट) की मात्रा भी लिखी होती है, जिसके आधार पर उन्हें भुगतान मिलता है।
दूध से भरे बर्तनों को तेजी से छोटे वाहनों में लाद दिया जाता, जो गांव-गांव घूमकर दूध इक_ा करते और फिर उसे जिला या राज्य स्तर की डेयरियों तक पहुंचाते। यही था मशहूर अमूल मॉडल, जिसे अब पूरे भारत में अपनाया जा चुका है।
चाहे किसी डेयरी के पास कई गायें हों या किसी घर में एक-दो पशु ही क्यों न हों, सभी इस सहकारी व्यवस्था का हिस्सा बन सकते थे।
आज वह दृश्य और भी प्रासंगिक लगता है, जब दुनिया प्रतिद्वंद्विता से आकार लेती एक नई आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जो वैश्वीकरण की कब्रों पर खड़ी होती दिखाई देती है। जैसा कि मैंने अपने पिछले कॉलम में लिखा था, इस उभरते दौर में हर देश को अपने घरेलू संसाधनों और आर्थिक ताकत के आधार पर अपना भविष्य सुरक्षित करना होगा।
इसलिए अब समय है कि हम भी गंभीरता से विचार करें कि हमारे विकास का सबसे उपयुक्त रास्ता क्या हो सकता है और क्यों वह पुराने समृद्ध देशों के रास्ते से अलग होना चाहिए, जो आज अपनी आर्थिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं।
आइए, डेयरी क्षेत्र की ही बात करते हैं। इस क्षेत्र में पश्चिमी मॉडल भी बाकी अर्थव्यवस्था की तरह ही है। यह बड़े पैमाने पर उत्पादन, औद्योगिक ढांचे, भारी मशीनीकरण और बाहरी संसाधनों के व्यापक उपयोग पर आधारित है। इसकी तर्कशक्ति सीधी और आकर्षक है: जितना बड़ा उत्पादन, उतनी अधिक बिक्री और उतना ही ज्यादा मुनाफा।
लेकिन ये फायदे एक कीमत के साथ आए। कीटनाशकों और एंटीबायोटिक जैसे बाहरी संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता ने पर्यावरण प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं पैदा कीं। इसके बाद नियम-कानून कड़े किए गए, जिससे लागत और बढ़ गई।
दूध को सस्ता बनाए रखने के लिए सरकारों को सब्सिडी देनी पड़ी। लेकिन समस्या और गहरी हो गई, क्योंकि अब दूध की आपूर्ति मांग से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में उत्पादकों को नए बाजार तलाशने पड़ रहे हैं।
नतीजा यह है कि आज विवाद इस बात पर है कि कौन-सा देश इस कृत्रिम रूप से सस्ते किए गए उत्पाद के लिए अपना बाजार खोलेगा और ऐसे आयात का घरेलू उत्पादन व किसानों पर क्या असर पड़ेगा।
यूरोपीय किसान कहते हैं कि यूरोपीय संघ व मर्कोसुर के बीच हुआ व्यापार समझौता उन्हें कारोबार से बाहर कर देगा, क्योंकि लैटिन अमेरिकी किसानों ने गहन औद्योगिक खेती में महारत हासिल कर ली है।
भारत में भी यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हालिया व्यापार समझौतों में कृषि और डेयरी सबसे विवादास्पद मुद्दे रहे हैं और यह चिंता वाजिब है। इसीलिए यह समझना जरूरी है कि भारत का डेयरी मॉडल किस तरह अलग है, क्यों यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए अहम है और कैसे यह हमारे अलग तरीके से गढ़े जाने वाले भविष्य का हिस्सा बन सकता है।
-अशोक पाांडे
हमारे समय की जीनियस लेखिका हेलेन ड्यूइट ने तीन दिन पहले करीब पौने दो करोड़ रुपए का प्रतिष्ठित इनाम विंडहैम-कैम्पबेल प्राइज़ महज़ इसलिए ठुकरा दिया कि उसके एवज में उन्हें कुछ लिट्-फेस्ट्स में हिस्सा लेना था, कुछ इंटरव्यू देने थे और कुछ वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालने थे।
लेखक को इन्फ़्लूएन्सर में तब्दील कर बेचने की जुगत में लगे रहने वाले इनाम-सम्मान के इस बाजारी मकडज़ाल से हेलेन का सामना पहले भी हो चुका था। साल 2000 में छपे उनके बेहतरीन उपन्यास की एक लाख से ऊपर प्रतियाँ बिकीं लेकिन उसके बाद सोलह बरसों तक किताब आउट ऑफ़ प्रिंट रही। इसका परोक्ष कारण उनका प्रकाशक था जिसने किताब छापने में लापरवाही दिखाई थी और टाइपिंग की बहुत सारी गलतियाँ की थीं। पैसे के लेनदेन को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था – जब हेलेन को यकीन था कि प्रकाशक ने उन्हें 75,000 डॉलर देने हैं, प्रकाशक ने उलटे उन पर 80,000 डॉलर की देनदारी निकाल दी।
बहरहाल उपन्यास 2016 में दोबारा छपा और उसे हाथों हाथ लिया गया। मशहूर आलोचक क्रिस्चियन लोरेन्ज़ेन ने अपने एक लेख में इसे शताब्दी का महानतम उपन्यास बताया। हेलेन के कुल चार उपन्यास छपे हैं और वे भीड़भाड़ से दूर रहना पसंद करती हैं।
इनाम ठुकराने के बाद उन्होंने मीडिया को बताया, ‘मेरी एक दोस्त ने मुझसे कहा की अगर तुम किसी तरह पांच मिनट के लिए एक टीवी चैनल के मॉर्निंग शो में मौक़ा हासिल कर पाओ तो हर कोई तुम्हारी किताब खरीद लेगा। तब मैंने अपनी कल्पना में खुद को देखा कि मैं, जिसे कैमरे से इस कदर झेंप लगती है, स्टूडियो में तेज रोशनी के सामने गाढ़ा मेकप पोते, सोफे पर बैठी हुई किसी अपढ़ एंकर को यह बताने की कोशिश कर रही हूँ कि किस तरह मैंने एक महान फ्रांसीसी आलोचक की प्रेरणा से अपना पहला उपन्यास लिखा था। मुझे यह बहुत हास्यास्पद और भोंडा लगा।’
-मोहम्मद हनीफ
बाबू और ब्यूरोक्रेट्स, चाहे वे कहीं से भी हों, काफ़ी पढ़े-लिखे होते हैं और थोड़े चालाक भी होते हैं। क़ानून की किताब से कोई बारीक सी बात निकालकर उसके पीछे पड़ जाते हैं।
उन्हें अपनी गलियों और मोहल्लों में हंसती-खेलती और कभी-कभी रोती जि़ंदगी नजऱ ही नहीं आती है।
वे अपने हाथ से लिखे कानून को भगवान का आदेश मानने लगते हैं।
भारत में आशा भोसले गुजऱ गई हैं। 92 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ है। वह अपनी जि़ंदगी का पूरा आनंद लेकर गई हैं और कोई चार पीढिय़ों के लोग उनके गाए हुए गाने सुनते रहे हैं।
इधर पाकिस्तान में ख़बरें चलीं कि पेमरा (पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी) के बाबुओं ने नोटिस भेजे हैं कि आशा जी के जाने की ख़बर के साथ-साथ उनके गाने क्यों चलाए गए हैं।
अब पाकिस्तानी संस्थाओं की हरकतें देखकर गुस्सा नहीं आता लेकिन यह सुनकर सच में अंदर से निकला है, ‘ओए पेमरा वालों तुम कौन लोग हो?’
पाकिस्तान में बॉलीवुड का जुनून
इंडिया-पाकिस्तान में एक-दूसरे की फि़ल्मों और गानों पर बैन है।
वैसे तो बैन किताबों पर भी है, लेकिन ज़ाहिर है लोग किताबें कम पढ़ते हैं।
लेकिन गानों और फि़ल्मों को न कोई जंग रोक पाई है और न ही कोई बॉर्डर।
हमारे बुजुर्ग छतों पर चढक़र, दूरदर्शन का सिग्नल पकडक़र ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म देखने के लिए एंटेना घुमाते थे।
उसके बाद वीसीआर किराए पर लेकर ‘उमराव जान अदा’ देखते रहे हैं।
हमने वो जमाना भी देखा है, जब वहां मुंबई में कोई फिल्म रिलीज होती, चार घंटे बाद उसका कैमरा प्रिंट डीवीडी में कराची में मिल जाता था।
अगर किसी को मास्टर प्रिंट चाहिए होता था तो उसे कहा जाता कि तुम दो दिन इंतजार कर लो।
अब डिजिटल ज़माना है। किसी दुकान पर, किसी बाजार जाने की या किसी स्मगलिंग में जाने की ज़रूरत नहीं है।
अपने फोन पर, कंप्यूटर पर पाकिस्तान में बैठे लोग ‘धुरंधर’ देख भी रहे हैं और साथ ही उसमें गलतियां निकाल रहे हैं।
यह पेमरा के बाबू पता नहीं किस पाकिस्तान में पले-बढ़े हैं, वे तो आशा भोसले के गानों के लिए क़ानून की किताब खोलकर बैठ गए हैं।
- प्रवीण झा
गांधी ने भले ही वकालत की पढ़ाई की, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता में अधिक समय बिताया। उन्होंने अखबारों की शुरुआत की, और उसका लंबे समय तक संपादन करते रहे।
गांधी के इक्कीस अलग-अलग आयामों पर ये लेख मूलत: अंग्रेज़ी में प्रवीण कुमार झा द्वारा लिखे गए थे। पढ़ें एक लेख का चैटजीपीटी द्वारा हिंदी अनुवाद
4 जून 1903 को अफ्रीका में एक सामान्य गर्मी का दिन था। भारत से आया 34 वर्षीय एक वकील डरबन में अपने कार्यालय में रात 3 बजे तक कड़ी मेहनत करता है और घर लौटने वाली अपनी ट्राम छूट जाती है। वह पैदल घर जाता है और अगले दिन फिर रात 11 बजे तक काम करता है; और अंतत: उसकी आँखें खुशी से चमक उठती हैं जब वह दक्षिण अफ्रीका में पहले भारतीय अख़बार की खुशबू महसूस करता है। वह इसका नाम रखता है, 'द इंडियन ओपिनियन'।
वह थोड़ा रुकता है, आराम करता है और अपनी डायरी में लिखता है, ‘अब मुझे दूसरे अंक की चिंता हो रही है। कम स्टाफ, सामग्री, टाइप आदि, और सुविधाओं की कमी के साथ, हमें अख़बार को स्तर पर बनाए रखना है।’
उन दिनों प्रिंटिंग प्रेस पूरी तरह से मशीनीकृत नहीं था। जब इंजन खराब हो जाता, तो गांधी खुद पहियों को हाथ से चलाते, अख़बार छापते, उसे मोड़ते, पते लिखते और रेलवे स्टेशन तक भेजते। प्रकाशन कार्य में वह लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर थे।
गांधी ने बाद में लिखा, ‘जब तक 'इंडियन ओपिनियन' मेरे नियंत्रण में था, पत्रिका में होने वाले परिवर्तन मेरे जीवन में होने वाले परिवर्तनों के संकेत थे।’
लेकिन उनकी पत्रकारिता की जड़ें 'इंडियन ओपिनियन' से बहुत पहले की थीं।
उन्होंने लंदन (1888-1891) के अपने छात्र जीवन के बारे में लिखा, ‘भारत में मैंने कभी अख़बार नहीं पढ़ा था। लेकिन यहाँ नियमित पढऩे से मुझे उनमें रुचि हो गई। मैं हमेशा ‘द डेली न्यूज़’, ‘द डेली टेलीग्राफ’ और ‘द पॉल मॉल गजट’ देखता था।’
दादा भाई नौरोजी ने 1890 में ‘इंडिया’ नामक अख़बार शुरू किया था, और गांधी बाद में उसके लिए दक्षिण अफ्रीका से संवाददाता बने। उन्होंने लंदन की वेजिटेरियन सोसाइटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘वेजिटेरियन’ में भारतीय भोजन, रीति-रिवाजों और त्योहारों पर लेख भी लिखे।
1893 में जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की अदालत में अपनी पगड़ी उतारने से इनकार किया, तो स्थानीय अख़बार ‘नटाल एडवर्टाइजऱ’ ने उनके बारे में ‘द अनवेलकम विजि़टर’ शीर्षक से लेख प्रकाशित किया। गांधी ने संपादक को एक लंबा शिकायत पत्र लिखा, जो प्रकाशित हुआ। इसी से उनकी ‘नटाल मर्करी’ और ‘नटाल एडवरटाइजर’ के साथ पत्राचार की शुरुआत हुई। गांधी न तो वेतनभोगी पत्रकार थे और न ही फील्ड संवाददाता, लेकिन उनके ‘लेटर टू एडिटर’ प्रकाशित होते थे और नटाल के लोग उन्हें रुचि से पढ़ते थे।
1896 में जब गांधी अपने परिवार को लेने भारत लौटे, तो उन्होंने हरे कवर में एक लंबा पत्र छापा, ‘द ग्रीन पैम्फलेट’। यह दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की पीड़ा की पहली मार्मिक कहानी थी। भारत में उनके पास कोई सचिव नहीं था, इसलिए उन्होंने पड़ोस के स्कूल के बच्चों को संगठित किया। उन्होंने उनसे लिफाफे बनाने और पते लिखने में मदद ली और बदले में उन्हें कुछ उपहार दिए। यह बच्चों की टोली भारत में उनकी पहली प्रकाशन टीम थी! उन्होंने देशभर में घूम-घूमकर सभी दस हज़ार प्रतियाँ बेच दीं और उत्साह में दस हज़ार और छपवाए।
1899 में बोअर युद्ध आया, जहाँ गांधी भारतीय एम्बुलेंस कोर का नेतृत्व कर रहे थे। वह ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के लिए युद्ध संवाददाता बने। उनके साथ एक और संवाददाता था, जो आगे चलकर उनका बड़ा विरोधी बना, विंस्टन चर्चिल! जहाँ चर्चिल हथियारों और हमलों के बारे में लिखते थे, वहीं गांधी मानवीय पीड़ा और घावों के बारे में लिखते थे।
उन्होंने ‘पायनियर’, ‘द हिंदू’, ‘मद्रास स्टैंडर्ड’, ‘द स्टेट्समैन’ के लिए भी लिखा। उन्होंने इसे दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के मुद्दों को प्रचारित करने का माध्यम बनाया। उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में लिखा, ‘प्रचार हमारा सबसे अच्छा और एकमात्र रक्षा का हथियार है।’
पर्याप्त प्रसिद्धि मिलने के बाद उन्होंने अपना अख़बार ‘इंडियन ओपिनियन’ शुरू किया। यह नटाल के 50,000 भारतीयों के लिए एक सामुदायिक अखबार था। गांधी ने इसे बहुभाषी बनाया ताकि अधिकतम लोगों तक पहुँचा जा सके। यह गुजराती और अंग्रेज़ी में प्रकाशित होता था, और कुछ संस्करण तमिल और हिंदी में भी थे। अपने बेटे मणिलाल को जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्होंने लिखा, ‘संपादक को धैर्यवान होना चाहिए और केवल सत्य की खोज करनी चाहिए। ‘इंडियन ओपिनियन’ में सत्य लिखो; लेकिन असभ्य मत बनो और क्रोध में मत बहो! अपनी भाषा में संयम रखो।’
भारत लौटने के बाद, उन्होंने चंपारण (1917) में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान लेख लिखे। दक्षिण अफ्रीका से उन्हें प्रचार की शक्ति का ज्ञान था, और यह भारत में भी काम आया। वह पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए, जबकि वे हिमालय की तलहटी के एक दूरस्थ जिले में काम कर रहे थे।
1919 के रॉलेट एक्ट विरोध के दौरान, उन्होंने एक गुप्त अख़बार ‘सत्याग्रह’ (पहले ‘सत्याग्रही’) भी निकाला।
जल्द ही वह ‘यंग इंडिया’ नामक प्रतिष्ठित ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ पत्रिका के संपादक बने।
साथ ही उन्होंने गुजराती पत्रिका ‘नवजीवन’ का संपादन भी शुरू किया। ये पत्रिकाएँ 1932 तक चलती रहीं और विभिन्न भाषाओं में गांधी की आवाज़ पूरे भारत तक पहुँचाती रहीं। उन्होंने पाठकों से व्यक्तिगत रूप से जुडऩे की कोशिश की और संपादक को भेजे गए हर महत्वपूर्ण पत्र का उत्तर देने में काफी समय लगाया।
1933 में गांधी ने ग्रामीण पत्रकारिता पर ध्यान केंद्रित किया, क्योंकि उन्हें पता था कि भारत की 90 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। उन्होंने अंग्रेजी और उर्दू में ‘हरिजन’, हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ और गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ शुरू किए। जहाँ ‘यंग इंडिया’ शहरी और शिक्षित वर्ग को आकर्षित करता था, वहीं ये पत्र गाँवों और वंचित वर्गों के लिए थे। कई वर्षों तक ‘हरिजन’ में राजनीतिक आंदोलनों पर लेख नहीं छपे; यह अस्पृश्यता और ग्रामोद्योग जैसे सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित था।
गांधी अपने अख़बारों का खर्च कैसे चलाते थे? क्या विज्ञापनों से?
शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने विज्ञापन लिए, लेकिन जल्द ही उन्हें इसमें नैतिक समस्या दिखी। उन्होंने वार्षिक सदस्यता और अग्रिम भुगतान का रास्ता चुना। जैसे-जैसे प्रसार बढ़ा, अख़बार का आकार और पृष्ठ संख्या भी बढ़ी।
‘हरिजन’ के पहले अंक में स्पष्ट लिखा था, ‘आप देखेंगे कि इस पत्र के संचालन के लिए कोई विज्ञापन नहीं लिया जा रहा है। यह पूरी तरह सदस्यताओं पर निर्भर है। सदस्यता शुल्क अग्रिम में देना अनिवार्य है।’
उन्होंने 1925 में ‘द हिंदू’ में लिखा, ‘पत्रकारिता को कभी भी स्वार्थ या केवल जीविका कमाने, या उससे भी बुरा, धन इक_ा करने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पत्रकारिता तभी उपयोगी और देश के लिए सेवा योग्य होगी, जब वह निस्वार्थ हो और देश की सेवा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दे।’
-डॉ.परिवेश मिश्रा
साढ़े चार हजार की आबादी वाला लेन्ध्रा सारंगढ़ जिले में एक अपेक्षाकृत बड़ा गांव है। किसान-ठेकेदारों के माध्यम से पुरानी पारम्परिक बसाहट को जब कृषि प्रधान गांव के रूप में पुनर्स्थापित किया गया तो शुरुआती परिवार रिकॉर्ड का हिस्सा बन गये।
1707 मे जब तक औरंगजेब की मृत्यु नहीं हुई, भारत के इस हिस्से के मूल निवासी वन-आश्रित अपनी जीवन शैली में थोड़ी सी खेती के साथ मस्त और संतुष्ट थे। पहले मराठों और फिर अंग्रेजों के आने के साथ साथ राजाओं से राजस्व-कर वसूली में अनाप-शनाप बढ़ोतरी हुई और राजाओं के सामने नये खेत तैयार कर उपज बढ़ाने की आवश्यकता मजबूरी बन गयी। अच्छी किसानी मे उस्ताद माने जाने वाली कृषि-आधारित जातियों की पूछ-परख बढ़ी। ऐसी अनेक जाति समूहों का सारंगढ़ में भी आगमन हुआ। अधरिया उनमे से एक थे।
छोटी, बिखरी और अक्सर में अक्सर अस्थाई बसाहटों को गांव का रूप दे कर कृषि-आधारित जीवन शैली विकसित होना शुरू हुई। गांव को ठेके पर दिया जाने लगा। ठेकेदार किसान ‘गौंटिया’ कहलाये। ठेका केवल गौंटिया के वंशजों में हस्तांतरणीय होता था। यदि पुत्र नहीं हुआ तो गौंटिया की मृत्यु पर ठेका उसकी पत्नी और यहां तक कि अविवाहित बेटी को भी हस्तांतरित होता था। उसका जि़म्मा था गांव बसाना, नये खेत तैयार करना और करवाना। इसके लिये सिंचाई के साधन उपलब्ध कराना। तालाब खोदे गये, जहां ज़रूरी और संभव हुआ बहते पानी को रोका गया। ठेका दिये जाने के समय पर तमाम शर्तें जो राज्य के वाजिब-उल-अजऱ् में दर्ज थीं, समझा दी जाती थीं। वाजिब-उल-अजऱ् गांव के प्रशासन का एक तरह का संविधान था। कुछ शर्तें ऐसी थीं जिनके उल्लंघन पर ठेका निरस्त किये जाने का प्रावधान था। ऐसी एक शर्त थी कि गांव में भूख से किसी की मृत्यु नहीं होना चाहिये। ठेकेदार के बाकायदा हस्ताक्षर लिये जाते थे। जिसे हम साक्षरता समझते हैं वह नहीं थी तो क्या – कोई तीर का चिन्ह बनाकर हस्ताक्षर करता तो कोई सीढ़ी का। सीढ़ी में तीन पायदान बनाकर उस हस्ताक्षर पर कोई पहले कब्जा कर चुका है तो बाद में आने वालों के सामने दो या चार या पांच पायदान बनाकर अपना विशिष्ट हस्ताक्षर इज़ाद करने का विकल्प मौजूद रहता। आज होती तो यह व्यवस्था अंग्रेज़ी में ‘बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मॉडल’ या ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप’-मॉडल के नामों से जानी जाती।
लेन्ध्रा के पहले गौंटिया अघरिया थे। शुरुआत करने के लिये चार अन्य गांवों से अपनी जाति के चार परिवारों को बुला कर बसाया। कुछ और परिवार भी आ कर बसे। इनमे माली थे। तेली, कलार, और हलवाई थे। ये रैयत कहलाये। गांव के चौकीदार का पद गांड़ा और झांखर या बैगा के लिये आरक्षित था। वे नियुक्त हुए। स्थानीय बोली मे जोर से आवाज देने या चिल्लाने के लिये नरियाना शब्द प्रयुक्त होता है। हर साल ‘पुस-पुन्नी’ के दिन ‘नरिहा’ की नियुक्ति होती थी (या कहें नियुक्ति का नवीनीकरण होता था)। इस तरह एक राउत (यदुवंशी) का परिवार भी बसा। यह व्यक्ति रोज सुबह घरों की दहलीज पर पहुंच कर नरियाता और घर का मालिक मवेशियों को इसके हवाले कर देता। शाम को इस का दोहराव होता जब नरिहा मवेशियों को वापस सौंपने पहुंचता। दिन भर मवेशी गांव से बाहर जिस जमीन पर चरते वह राजा की थी सो नरिहा साल मे एक बार एक सेर घी गौंटिया के माध्यम से राजा तक पहुंचाता। बढ़ई, लोहार, नाई, धोबी, सब बसे। उनकी सेवाओं के बदले र राज्य की ओर से सबको टैक्स-फ्ऱी जमीन दी गयीं।
रैयत को खेत तैयार कर फसल लेने के लिये टैक्स के साथ वाली जमीनें दी गईं। टैक्स इक_ा करने की जिम्मेदारी गौंटिया की थी। गौंटिया के पास जो जमीन थी वह ‘भोगरा’ जमीन कहलाती थी और टैक्स-फ्ऱी थी। उसके पास गांव की सरहद के भीतर रैयती भूमि का कुछ हिस्सा रख कर और टैक्स अदा कर खेती करने का विकल्प मौजूद था।
रैयतों मे एक थे बुद्धूराम। उस काल मे सरनेम जैसे शब्दों की जगह जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल होता था सो वे बुद्धूराम कलार के रूप मे जाने गये। बाद की पीढिय़ों ने सरनेम के रूप मे ‘डनसेना’ शब्द का उपयोग किया जो आज भी लेन्ध्रा मे बुद्धूराम के वंशजों की पहचान है।
प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय था जब इस ‘सरनेम’ का अस्तित्व नहीं था। उस काल मे वर्तमान दुर्ग जि़ले के बालोद नामक स्थान पर एक राजपूत राजा का राज्य था। एक कलार लडक़ा भी था जिसकी मित्रता राजा के बेटे से थी। दोनो ‘महाप्रसाद’ थे-रिश्ते मे दोस्त से भी बढ़ कर। एक दिन कलार लडक़े ने महसूस किया कि उसका महाप्रसाद कलार लडक़े की बहन पर बुरी नजऱ और नीयत रखता है। विचलित कलार लडक़ा राजा के पास पहुंचा। महाप्रसाद वाले रिश्ते के विस्तारित रूप मे राजा उसका ‘फूल बाप’ था। लडक़े ने फूल बाप से सवाल पूछा – अगर आपके घर मे बाहरी कुत्ता आ कर गंदगी करे तो आप क्या करेंगे? राजा ने कहा – मार दूंगा।
-गोकुल सोनी
आज जब लोग किसी के अतीत को लेकर तरह-तरह की कहानियां गढ़ लेते हैं, तो मुझे अपने जीवन का एक सच्चा और दिलचस्प प्रसंग याद आ जाता है। यह सुनकर शायद आपको थोड़ा आश्चर्य हो, लेकिन सच यही है, मैं भी कभी चाय बेचता था। यह कोई रूपक या राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि मेरे जीवन का बिल्कुल सच्चा अनुभव है। यह कहानी है वर्ष 1977 की, जब जीवन मुझे छोटे-छोटे कामों के जरिए बड़े सबक सिखा रहा था।
उस समय रायपुर के गांधी मैदान के पास स्थित बंदोबस्त कार्यालय को पहले चकबंदी ऑफिस कहा जाता था। बाद में जब यहां लैंड रिकॉर्ड का काम शुरू हुआ तो इसे बंदोबस्त कार्यालय के रूप में जाना जाने लगा। इसी कार्यालय परिसर में मेरे एक बेहद करीबी पारिवारिक सदस्य चपरासी के पद पर कार्यरत थे। उन्हें वहीं रहने के लिए एक सरकारी मकान मिला हुआ था और पूरा परिवार उसी परिसर में रहता था।
उस कार्यालय में बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी काम करते थे। इसके अलावा वहां पटवारी प्रशिक्षण भी चलता था, जिसमें रोज लगभग 60-70 प्रशिक्षु आते थे।
लेकिन आसपास चाय की कोई दुकान नहीं थी। चाय पीने के लिए लोगों को कोतवाली चौक या कालीबाड़ी चौक तक जाना पड़ता था। तब मेरे उस पारिवारिक सदस्य के मन में एक विचार आया, क्यों न यहीं चाय बनाकर लोगों को पिलाई जाए ?
बस फिर क्या था, सरकारी क्वार्टर में ही चाय बननी शुरू हो गई और धीरे-धीरे कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी वहीं आकर चाय पीने लगे। देखते ही देखते यह छोटी-सी व्यवस्था एक चलती-फिरती दुकान बन गई।
दुकान अच्छी चलने लगी तो लोगों की टेबल तक चाय पहुंचाने के लिए एक लडक़ा रखा गया। उसका नाम था मेघनाथ, जो उत्कल (ओडिशा) का रहने वाला था। जब कभी मेघनाथ छुट्टी पर चला जाता, तब चाय पहुंचाने की समस्या खड़ी हो जाती। ऐसे ही एक दिन मेरे रिश्तेदार ने मुझसे कहा, गोकुल, जरा अमुक साहब के पास चाय छोड़ आओ। बस यहीं से मेरी भी इस ‘चाय सेवा’ में एंट्री हो गई।
धीरे-धीरे दफ्तर के कई अधिकारी-कर्मचारी मुझसे ही चाय मंगाने लगे। मेघनाथ मौजूद रहता तब भी लोग कहते, गोकुल को भेज दो, वही चाय लेकर आए। इसकी एक छोटी-सी वजह थी। मैं चाय का गिलास थोड़ा ज्यादा भरकर दे देता था। उस समय मुझे न घाटे की चिंता थी, न मुनाफे की, बस लोगों को भरपूर चाय मिलनी चाहिए, यही सोचकर गिलास थोड़ा उदारता से भर देता था।
उन दिनों वहां के आयुक्त ए.के. वाजपेयी (ढ्ढ्रस्) और उपायुक्त श्रीवास्तवजी सहित कई अधिकारियों तक भी मैं चाय पहुंचाया करता था। करीब दो-चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। उस समय वहां काम करने वाली सुवार्ता जॉन मैडम मुझे छोटे भाई की तरह स्नेह देती थीं। वे अक्सर समझाती थीं, तू ये चाय-वाय छोड़ और पढ़ाई पर ध्यान दे।
इसी बीच मेरे बड़े भैया की भी उसी कार्यालय में सरकारी नौकरी लग गई। धीरे-धीरे मैंने चाय पहुंचाने का काम छोड़ दिया और पढ़ाई की ओर ध्यान देने लगा। वैसे भी चाय की दुकान चलाने वाले मेरे अपने पारिवारिक सदस्य ही थे, इसलिए मैं वहां पूरी तरह मुफ्त सेवा देता था। कभी किसी प्रकार का पारिश्रमिक नहीं लिया।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया। कई वर्ष बाद जब मैं नवभारत अखबार में पत्रकार बन गया, तो एक दिन किसी कवरेज के सिलसिले में उसी बंदोबस्त कार्यालय जाना हुआ। वहीं अचानक जॉन मैडम मिल गईं। जब उन्होंने मुझे एक बड़े अखबार के पत्रकार के रूप में देखा, तो वे बेहद खुश हुईं। मुझे आज भी याद है, उनकी आंखें खुशी से भर आई थीं। शायद उन्हें उस समय का वह चाय पहुंचाने वाला लडक़ा याद आ गया था।
यह है मेरे जीवन का वह छोटा-सा अध्याय जब मैं चाय पहुंचाया करता था। कुछ लोगों को यह कहानी शायद अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह मेरे जीवन की एक सच्ची घटना है। उस दौर के कई अधिकारी-कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जॉन मैडम भी अब रिटायर होकर संभवत: बैरन बाजार क्षेत्र में रहती हैं। मेघनाथ अब अपनी खुद की बढ़ईपारा में चाय दुकान संचालित करता है।
जीवन की यही खूबसूरती है कभी हम छोटे-छोटे काम करते हुए बड़े सपने देखते हैं, और वही अनुभव आगे चलकर हमारी पहचान बन जाते हैं।
आपको मेरे जीवन की यह सच्ची घटना कैसी लगी, जरूर बताइयेगा। आपके विचार और प्रतिक्रियाएँ हमेशा मुझे प्रेरणा देती हैं।
(इस तस्वीर को मेरे निवेदन पर ्रढ्ढ ने बनाकर दिया है। उसका आभार)
(लेखक छत्तीसगढ़ के सबसे वरिष्ठ सक्रिय न्यूज-फोटोग्राफर हैं। वे फेसबुक पर दिलचस्प संस्मरण लिखते ही रहते हैं।)
-सईदुज्जमां
गोल्ड यानी सोना काफी लंबे वक़्त से ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम का हिस्सा रहा है। इसे अनिश्चितता से बचाव और संपत्ति को अलग-अलग रूप में रखने का तरीका माना जाता है।
भारत में सोना घरेलू बचत और खर्च का अहम हिस्सा है, इसलिए यह दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है।
हाल के हफ्तों में सोने की कीमतों में गिरावट आई है। रॉयटर्स के मुताबिक, 28 फरवरी से अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद सोना 10 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है।
पिछले हफ्ते, एक लेख में शशि थरूर ने कहा कि, ‘भारत में गोल्ड यानी सोने की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन उत्पादन अभी भी बहुत कम है।’
भारत में गोल्ड की स्थिति
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के पास असल में कितना सोना है?
हमने यह सवाल इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर की प्रमुख प्रोफेसर सुंदरावल्ली नारायणस्वामी से पूछा।
उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘कई तरह के आंकड़े हैं, कुछ सही हैं और बाकी अनुमान हैं। आरबीआई के पास करीब 800-820 टन सोना है। आर्थिक रूप से निकाला जा सकने वाला सोना करीब 70-80 टन है।’
आर्थिक रूप से निकाला जा सकने वाला सोना वह होता है जिसे मौजूदा तकनीक से फायदे के साथ माइन किया जा सके, यानी निकाला जा सके।
प्रोफेसर सुंदरावल्ली कहती हैं, ‘भारत में अच्छी गुणवत्ता वाला सोना कम है, इसलिए यहां खनन प्रतिस्पर्धी नहीं है।’
उन्होंने कहा कि, ‘भारतीय घरों में बहुत सारा सोना है। घरों में मौजूद सोने को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन आमतौर पर इसे 25 हज़ार से 27 हज़ार टन माना जाता है।’ जब उनसे इस आंकड़े का आधार पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यह एक सामान्य अनुमान है, जिसे ज्य़ादातर लोग मानते हैं।
उन्होंने कहा कि, ‘हर साल 600 से 700 टन सोना आयात होता है और निर्यात बहुत कम है, इसलिए यह सोना घरों में जमा हो गया है।’
भारत से आगे कितने देश?
वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, फरवरी 2026 तक भारत के पास करीब 880 टन आधिकारिक सोना था।
इस मामले में भारत दुनिया में नौवें स्थान पर है। अमेरिका, जर्मनी, आईएमएफ, इटली, फ्रांस, रूस, चीन और स्विट्जऱलैंड भारत से आगे हैं।
हालांकि, आधिकारिक भंडार भारत की सोने की कहानी का केवल एक हिस्सा हैं।
थरूर ने अपने लेख में कहा कि, ‘हमारे पास करीब 500 मिलियन टन गोल्ड ओर यानी सोने का अयस्क(यानी वह पत्थर/मिट्टी जिसमें सोना होता है) है, लेकिन उत्पादन बहुत कम है।’
नेशनल मिनरल इन्वेंटरी के मुताबिक देश में कुल 518।23 मिलियन टन सोने का अयस्क है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारा सोना आसानी से निकाला जा सकता है। इसमें से 494।50 मिलियन टन निकालना मुश्किल है, जबकि 23।72 मिलियन टन को रिज़र्व माना जाता है।
बचा हुआ संसाधन उसे कहा जाता है, जहां सोना हो सकता है, लेकिन उसे निकालना महंगा और मुश्किल है। वहीं रिजर्व उसे कहा जाता है, जहां से सोना निकालना किफायती और फायदे का सौदा है।
प्राइवेट कंपनियां निवेश क्यों नहीं करना चाहती
प्रोफ़ेसर सुंदरावल्ली नारायणस्वामी के मुताबिक, ‘यह 500 मिलियन टन सोने का अयस्क है, असली सोना नहीं है। औसतन 1-3 ग्राम प्रति टन के हिसाब से इसमें सिर्फ 500-600 टन सोना होगा।’
इंडियन मिनरल्स ईयरबुक 2024 के मुताबिक, 2023-24 में भारत ने सिर्फ 1.6 टन सोने का उत्पादन किया। जबकि दुनिया में साल 2023 में करीब 3,300 टन सोना निकला, जिसमें चीन ने अकेले 375 टन उत्पादन किया।
भारत की क्षमता और उत्पादन के बीच अंतर कई वजहों से है। सोने की खदानों की खोज करना महंगा और जोख़िम भरा है। सरकार के पास सीमित संसाधन और तकनीक है, और निजी कंपनियां भी बिना पक्के सबूत के निवेश नहीं करना चाहतीं।
संतोष मल्होत्रा यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट में विजिटिंग प्रोफेसर हैं, वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। प्रोफेसर संतोष ने बीबीसी से कहा, ‘माइनिंग यानी खनन एक महंगा काम है। इसमें लोगों और तकनीक पर बड़ा निवेश चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है। निजी कंपनियां भी तभी आती हैं जब उन्हें भरोसा होता है।’
दुनिया की राजनीति में कुछ शब्द बार-बार लौटते हैं, ‘सुरक्षा’, ‘राष्ट्रहित’, ‘लोकतंत्र’, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक और शब्द चुपचाप केंद्र में आ गया है: ‘ईश्वर’। जब बड़े नेता युद्ध, सैन्य कार्रवाई या भू-राजनीतिक टकराव को ‘ईश्वर की इच्छा’ या ‘नैतिक कर्तव्य’ की भाषा में पेश करने लगते हैं, तब सवाल केवल नीतियों का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी सभ्यता की दिशा का हो जाता है। डॉनल्ड ट्रम्प के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट होकर सामने आई, जहाँ धार्मिक समूहों, खासतौर पर अमेरिकी इवैंजेलिकल ईसाइयों, का समर्थन केवल राजनीतिक गठजोड़ नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक समीकरण का हिस्सा था। इस समीकरण में इजऱाइल का समर्थन, ईरान का विरोध, और ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कहानी एक साथ गुँथ जाती है। यही वह जगह है जहाँ राजनीति और धर्म की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।
ट्रंप ने कई मौकों पर अपने समर्थकों से यह कहा कि अमेरिका ‘ईश्वर की कृपा से महान है’ और यह कि देश का मिशन केवल आर्थिक या सैन्य नहीं, बल्कि नैतिक भी है। उनके करीबी कुछ नेताओं और सलाहकारों ने इससे भी आगे जाकर यह संकेत दिया कि अमेरिका की विदेश नीति ‘दिव्य योजना’ का हिस्सा हो सकती है। उदाहरण के लिए, कुछ धार्मिक-राजनीतिक मंचों पर यह विचार खुलकर सामने आया कि इजऱाइल की सुरक्षा केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि बाइबिल की भविष्यवाणियों से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में ईरान को अक्सर ‘दुष्ट सत्ता’ यानी बुराई के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। यह भाषा सामान्य कूटनीति की नहीं होती; यह उस मानसिकता की भाषा है जहाँ संघर्ष को नैतिक युद्ध के रूप में देखा जाता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी, क्या ये नेता सच में धर्म के नाम पर युद्ध को जायज़ मानते हैं, या यह केवल राजनीतिक रणनीति है? जवाब सीधा नहीं है। एक स्तर पर यह साफ़ है कि धार्मिक भाषा लोगों को जोड़ती है। जब कोई नेता ‘ईश्वर’, ‘दैवीय जि़म्मेदारी’, ‘दुष्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह सीधे भावनाओं को छूता है। इससे समर्थकों में एक तरह की नैतिक ऊर्जा पैदा होती है, जो सामान्य राजनीतिक तर्कों से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि अमेरिकी इवैंजेलिकल समुदाय के कुछ हिस्सों में वास्तव में यह विश्वास मौजूद है कि मध्य पूर्व में होने वाली घटनाएँ ‘अंत-काल’, अंत समय, की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इस सोच में इजऱाइल का अस्तित्व और उसकी रक्षा एक धार्मिक जिम्मेदारी बन जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ता है, तो वह केवल भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं रह जाता। उसे एक ऐसी कथा में बदल दिया जाता है जिसमें अमेरिका ‘अच्छाई’ का प्रतिनिधि है और उसका विरोध करने वाले ‘बुराई’ के। यह व्याख्या खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह जटिल वास्तविकताओं को सरल नैतिक फ्रेम में बदल देता है। जब कोई संघर्ष ‘भले बनाम बुरे ’ का संघर्ष बन जाता है, तो संवाद, समझौता और कूटनीति के लिए जगह बहुत कम बचती है। यही कारण है कि कई बार ऐसे नेताओं के बयान बेहद आक्रामक और युद्धोन्मुखी लगते हैं, क्योंकि वे केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक युद्ध की भाषा में बात कर रहे होते हैं।
-कपिल सिब्बल
मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है। कहने को तो इसका मकसद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) में बदलाव करना है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो सके। लेकिन इस पूरी कवायद की टाइमिंग और कानूनी बारीकियों को देखें, तो यह महिला आरक्षण से जुड़ा कम और अगले, 2029 के, लोकसभा चुनावों से जुड़ा ज्यादा नजऱ आता है।
पहला सवाल इस विशेष सत्र के समय पर ही उठता है। यह तब हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। वहां 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में सत्र बुलाकर सरकार विपक्षी सांसदों, खासकर टीएमसी को, इस मुश्किल में डाल रही है कि वे अपनी जनता के बीच चुनाव प्रचार करें या दिल्ली आकर संसद में वोट दें?
यह कोई अनजाने में की गई चूक नहीं, बल्कि विपक्ष को परेशान करने की सोची-समझी कोशिश है। अगर सरकार की नीयत में खोट नहीं होता, तो क्या यह काम 29 अप्रैल के बाद नहीं किया जा सकता था? जाहिर है, इसका मकसद मतदाताओं के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाना और विपक्ष के चुनाव प्रचार में खलल डालना है।
2023 में जब 106वां संविधान संशोधन हुआ था, तो अनुच्छेद 334 ए में यह साफ लिखा गया था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। अब सरकार अचानक अपने ही बनाए कानून से पीछे हट रही है। वह नई जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के पुराने आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है।
ऐसा क्यों किया जा रहा है? जब देश के रजिस्ट्रार जनरल खुद कह चुके हैं कि नई जनगणना दिसंबर 2027 तक पूरी हो जाएगी, तो फिर 15 साल पुराने डेटा के आधार पर देश का राजनीतिक नक्शा क्यों बदला जा रहा है? जवाब साफ है, अपनी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाओं को बदलना।
कानूनी तौर पर अनुच्छेद 334 ए कहता है कि परिसीमन केवल महिला आरक्षण लागू करने के उद्देश्य के लिए ही होगा, यानी केवल यह तय करने के लिए कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसे ‘जनरल डिलिमिटेशन’ का जरिया बनाकर पूरी संसद की संरचना बदलना असंवैधानिक है।
सरकार यहां महिला सशक्तिकरण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है। जम्मू-कश्मीर और असम में हमने देख लिया है कि कैसे परिसीमन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया। मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हमला संविधान के ‘मूल ढांचे’ पर है, जिसे कोई भी विपक्ष स्वीकार नहीं कर सकता।
इस योजना का सबसे खतरनाक पहलू भारत के संघीय ढांचे को तबाह करना है। केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा।
गणित सीधा है: आज उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39। अगर सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो यूपी की सीटें बढक़र 120 हो जाएंगी और तमिलनाडु केवल 59 पर सिमट जाएगा। यानी दोनों राज्यों के बीच जो अंतर पहले 41 सीटों का था, वह बढक़र 61 हो जाएगा।
नीयत साफ हो, तो कभी भी लागू किया जा सकता है...
-कपिल सिब्बल
मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है. कहने को तो इसका मकसद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) में बदलाव करना है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो सके. लेकिन इस पूरी कवायद की टाइमिंग और कानूनी बारीकियों को देखें, तो यह महिला आरक्षण से जुड़ा कम और अगले, 2029 के, लोकसभा चुनावों से जुड़ा ज्यादा नज़र आता है.
पहला सवाल इस विशेष सत्र के समय पर ही उठता है. यह तब हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं. वहां 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है. ऐसे में सत्र बुलाकर सरकार विपक्षी सांसदों, खासकर टीएमसी को, इस मुश्किल में डाल रही है कि वे अपनी जनता के बीच चुनाव प्रचार करें या दिल्ली आकर संसद में वोट दें?
यह कोई अनजाने में की गई चूक नहीं, बल्कि विपक्ष को परेशान करने की सोची-समझी कोशिश है. अगर सरकार की नीयत में खोट नहीं होता, तो क्या यह काम 29 अप्रैल के बाद नहीं किया जा सकता था? जाहिर है, इसका मकसद मतदाताओं के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाना और विपक्ष के चुनाव प्रचार में खलल डालना है.
2023 में जब 106वां संविधान संशोधन हुआ था, तो अनुच्छेद 334 ए में यह साफ लिखा गया था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा. अब सरकार अचानक अपने ही बनाए कानून से पीछे हट रही है. वह नई जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के पुराने आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है.
ऐसा क्यों किया जा रहा है? जब देश के रजिस्ट्रार जनरल खुद कह चुके हैं कि नई जनगणना दिसंबर 2027 तक पूरी हो जाएगी, तो फिर 15 साल पुराने डेटा के आधार पर देश का राजनीतिक नक्शा क्यों बदला जा रहा है? जवाब साफ है, अपनी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाओं को बदलना.
कानूनी तौर पर अनुच्छेद 334 ए कहता है कि परिसीमन केवल महिला आरक्षण लागू करने के उद्देश्य के लिए ही होगा, यानी केवल यह तय करने के लिए कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इसे ‘जनरल डिलिमिटेशन’ का जरिया बनाकर पूरी संसद की संरचना बदलना असंवैधानिक है.
सरकार यहां महिला सशक्तिकरण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है. जम्मू-कश्मीर और असम में हमने देख लिया है कि कैसे परिसीमन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया. मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हमला संविधान के ‘मूल ढांचे’ पर है, जिसे कोई भी विपक्ष स्वीकार नहीं कर सकता.
इस योजना का सबसे खतरनाक पहलू भारत के संघीय ढांचे को तबाह करना है. केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा.
गणित सीधा है: आज उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39. अगर सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो यूपी की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी और तमिलनाडु केवल 59 पर सिमट जाएगा. यानी दोनों राज्यों के बीच जो अंतर पहले 41 सीटों का था, वह बढ़कर 61 हो जाएगा.
यह उन दक्षिण भारतीय राज्यों को सीधे तौर पर ‘सजा’ देना है, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है. अमेरिका की सीनेट में हर राज्य के दो ही प्रतिनिधि होते हैं, ताकि संतुलन बना रहे. लेकिन भारत में जनसंख्या के नाम पर उत्तर भारत को फायदा पहुंचाकर दक्षिण की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है. यह देश की एकता के लिए घातक है.
अगर प्रधानमंत्री वास्तव में महिला आरक्षण को तुरंत लागू करना चाहते हैं, तो उन्हें किसी विशेष सत्र या पुराने डेटा वाले परिसीमन का प्रपंच रचने की जरूरत नहीं है. इसका समाधान बहुत आसान है: लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में से ही तुरंत 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीजिए. सारा विपक्ष इस पर आपके साथ खड़ा होगा.
लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि ‘नारी शक्ति’ तो केवल एक बहाना है, असली मकसद ‘राजनीतिक शक्ति’ पर कब्जा करना है. विपक्ष को एकजुट होकर संघीय ढांचे पर इस हमले का विरोध करना चाहिए. हमें आरक्षण चाहिए, लेकिन परिसीमन की साजिशों वाली शर्तों के साथ नहीं.
-चित्रगुप्त
भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या, प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे के बीच का संतुलन नई कसौटी पर परखा जाने वाला है। 2011 की जनगणना के आधार पर तय लोकसभा सीटों का वितरण अब उस सामाजिक-जनसांख्यिकीय वास्तविकता से मेल नहीं खाता जो 2026 तक आकार ले चुकी है। उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश, में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र-तेलंगाना, ने अपेक्षाकृत स्थिर या धीमी वृद्धि दर्ज की है। इसके बावजूद संसद की संरचना अपरिवर्तित है, जिससे प्रतिनिधित्व का अनुपात असमान होता जा रहा है। यह असमानता केवल संख्यात्मक नहीं है; यह लोकतांत्रिक वैधता और राजनीतिक संतुलन दोनों को प्रभावित करती है। यदि एक सांसद उत्तर भारत में कहीं अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है और दक्षिण में अपेक्षाकृत कम, तो “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत व्यवहार में कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
लोकतंत्र का मूल विचार यह है कि हर नागरिक की राजनीतिक आवाज़ समान महत्व रखे, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह समानता धीरे-धीरे धुंधली हो रही है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में एक सांसद 30 लाख से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि दक्षिण भारत में यह संख्या लगभग 18–20 लाख के आसपास है। यह अंतर केवल सांख्यिकीय असमानता नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव के वितरण में भी असंतुलन पैदा करता है। यदि इसे समय रहते संबोधित नहीं किया गया, तो यह असंतोष का कारण बन सकता है, खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहाँ लोग पहले से ही खुद को कम प्रतिनिधित्व वाला महसूस कर सकते हैं। इसलिए जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास लोकतांत्रिक दृष्टि से आवश्यक प्रतीत होता है, लेकिन यहीं से एक और जटिल प्रश्न सामने आता है, क्या केवल जनसंख्या ही प्रतिनिधित्व का एकमात्र आधार होना चाहिए?
यहीं पर नीति प्रोत्साहन की बहस सामने आती है, जो इस मुद्दे को और संवेदनशील बना देती है। दक्षिण भारत के राज्यों ने दशकों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में निवेश कर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया। यह राष्ट्रीय नीति का ही हिस्सा था, जिसे प्रोत्साहित किया गया और जिसके कारण 1976 में लोकसभा सीटों को “फ्रीज़” कर दिया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो। अब यदि नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास होता है और दक्षिण भारत की सीटें घटती हैं, तो यह उनके लिए एक तरह से “नीति की सजा” जैसा महसूस हो सकता है। दूसरी ओर, उत्तर भारत के राज्य यह तर्क देते हैं कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुसार होना चाहिए, न कि पिछली नीतिगत सफलताओं या असफलताओं के आधार पर। यही वह नैतिक और राजनीतिक द्वंद्व है, जहाँ कोई भी समाधान पूरी तरह निष्पक्ष नहीं दिखाई देता।
इस बहस का तीसरा और शायद सबसे जटिल आयाम है, संघीय संतुलन। भारत केवल एक लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक संघीय गणराज्य है, जहाँ राज्यों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक पहचान है। यदि लोकसभा में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ती हैं, तो उत्तर भारत का राजनीतिक प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिण भारत का हिस्सा घट सकता है। इससे नीति-निर्माण की दिशा भी प्रभावित हो सकती है, क्योंकि संसद में बहुमत ही राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तय करता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह चिंता पहले से मौजूद है कि वे कर संग्रह में अधिक योगदान देते हैं, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति धीरे-धीरे उत्तर की ओर खिसक सकती है। यह स्थिति केवल राजनीतिक असंतुलन ही नहीं, बल्कि संघीय ढांचे में अविश्वास को भी जन्म दे सकती है, जो लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकता है।
दुनिया के अन्य लोकतंत्रों ने भी ऐसे ही संकटों का सामना किया है, और उनके अनुभव भारत के लिए उपयोगी संकेत देते हैं। अमेरिका ने दो सदनों की व्यवस्था के माध्यम से इस संतुलन को साधा, जहाँ एक सदन पूरी तरह जनसंख्या आधारित है, वहीं दूसरा राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देता है। कनाडा ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रांत की सीटें कम न हों, भले ही उसकी जनसंख्या वृद्धि धीमी हो। जर्मनी ने संसद की सीटों को लचीला रखा और असंतुलन होने पर सीटें बढ़ाने का रास्ता अपनाया। ऑस्ट्रेलिया ने छोटे राज्यों के लिए न्यूनतम प्रतिनिधित्व की गारंटी दी। इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी देश इस समस्या का “एकमात्र सही समाधान” नहीं ढूँढ पाया; सभी ने परिस्थितियों के अनुसार संतुलन बनाने की कोशिश की है।
भारत के लिए भी समाधान एकल नहीं, बल्कि बहु-स्तरीय होना चाहिए। लोकसभा की सीटों को बढ़ाना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है, जिससे उत्तर भारत को अधिक प्रतिनिधित्व मिले और दक्षिण भारत की मौजूदा सीटें बरकरार रहें। इसके साथ ही राज्यों के लिए न्यूनतम सीटों की गारंटी दी जा सकती है, ताकि नीति प्रोत्साहन का सिद्धांत कमजोर न पड़े। राज्यसभा की भूमिका को मजबूत करना भी एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, क्योंकि यह संघीय संतुलन का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अतिरिक्त, वित्त आयोग और अन्य संस्थागत तंत्रों के माध्यम से उन राज्यों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। इस तरह एक ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकता है जिसमें लोकतंत्र, नीति और संघीय संतुलन, तीनों को एक साथ जगह मिल सके।
अंततः यह प्रश्न केवल संविधान या गणित का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि का है। भारत को यह तय करना होगा कि वह अपने लोकतंत्र को केवल संख्याओं के आधार पर चलाना चाहता है, या वह एक ऐसा संतुलित मॉडल विकसित करना चाहता है जिसमें विविधता, न्याय और स्थिरता, तीनों का सम्मान हो। आने वाले वर्षों में यह बहस और तेज़ होगी, और उसका समाधान भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की सबसे बड़ी परीक्षा होगा। क्योंकि अंततः संसद की ताकत उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसकी न्यायपूर्ण संरचना में निहित होती है। (chatgpt की मदद से तैयार)
-जसिंता केरकेट्टा
हर समाज के भीतर स्त्रियां दरअसल दलित हैं। दलित मतलब दमित, शोषित, दोयम दजऱ्ा। सवर्ण समाज के भीतर भी बहुत सी स्त्रियां दमित और शोषित हैं। व्यवस्था की नींव में चुन दी गईं। इसलिए जब वे पूरे आक्रोश के साथ कविता में प्रतिरोध करती हैं, तब दलित और आदिवासी स्त्रियों को उनकी पीड़ा समझ में आती है। बहुत से पुरुषों को भी, जो इंसान के रूप में स्त्री-पुरुष से परे अपने भीतर वही संघर्ष कर रहे हैं। अपने भीतर और बाहर उस पीड़ा को दलित समाज, आदिवासी समुदाय और इंसान होने की जद्दोजहद में दूसरी जाति के कुछ लोगों ने भी अपने भीतर महसूस किया है। ऐसे में प्रतिरोध की हर पंक्ति के साथ उनका खड़ा होना स्वाभाविक ही है। तब भी हमेशा आत्ममंथन की ज़रूरत बनी रहती है। सामूहिक रूप से भी और अकेले भी।
सवर्ण समाज के भीतर स्त्रियां इंसान के रूप में न स्वीकारे जाते हुए दूसरे तरह से दमित हैं। इसे सह जाने के एवज में मुआवजे के रूप में ज़रूर उन्हें प्रिविलेज भी मिलता है। इन सब संघर्ष के अलग-अलग रूप हैं, तब भी दलितों की पीड़ा की तरह वह एहसास, अनुभव उन्हें कभी नहीं हो सकेगा। उस आक्रोश के भीतर भी स्त्री या पुरुष के रूप में सवर्ण होने का भाव कहीं गहरे बना ही रहेगा। और वह अनायास ही भाषा, व्यवहार में चला आएगा। कई बार बहुत सतर्कता के बाद भी, थोड़ी सी नींद और बेखय़ाली के बीच ही। दरअसल समाज व्यक्ति के भीतर निश्चित रूप से रहता है और अपनी भाषा भी बोलता रहता है, चाहे वह एक स्त्री हो या पुरुष। इसलिए साधारण बोलचाल में, प्रकट रूप में, छिपे हुए रूप में, हंसी में और कभी-कभी व्यंग्य में भी अक्सर यह सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई पडऩे लगता है। और वह दृश्य-अदृश्य रूप से शोषित समाज को बार-बार अपमानित महसूस भी कराता है। जो भाषा सवर्ण समाज और पुरुष दोहराते हैं, उसे सवर्ण स्त्री के लिए भी उसी तरह दोहरा देने में कोई हिचक नहीं होती। यह स्वत: ही होता है। आवेग में, प्रतिरोध में, व्यापक भलाई की चाहत में या कभी-कभी बेहोश प्रेम में भी। पर जीवन भर, पीढ़ी दर पीढ़ी अपमान भरे शब्द सुनने वाले कोई दलित समाज या आदिवासी समुदाय की कोई स्त्री या पुरुष भी उस वाक्य को क्या उसी तरह दोहरा सकता है? बहुत रातों तक यह सोचने पर लगा, यह कोई नहीं कर सकता।
यह भी ध्यान देने की बात है कि हर बात में जो कानून की बात करते हैं, वह जानते ही हैं कि देश में 1989 में अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट ने जातिसूचक संबोधन और अपमान दोनों पर पाबंदी लगाई है। इसे दंडनीय भी माना है। इन सबको ध्यान रखने की जिम्मेदारी लेखक, कवि के ऊपर भी है। और उस समाज के ऊपर भी जिससे कोई लेखक, कवि बोलते, देखते, सुनते हुए उसे आत्मसात भी करता है। और उन लोगों को भी यह ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो समूह की शक्ति का उपयोग कर किसी व्यक्ति की आलोचना करने, सुधार की गुंजाइश रखने के बदले दंड देने, भय को बनाए रखने के वर्चस्ववादी ढांचे की तरफ जाने को ही आसान रास्ता समझते हैं। बदलाव का यही एकमात्र ढांचा देख पाते हैं।
याद आता है। कुछ साल पहले एक आदिवासी लेखक ने आदिवासी स्त्रियों के प्रति जब दूसरी जाति के पुरुष द्वारा उपयोग की गई भाषा को हूबहू वैसे ही रख देने की कोशिश की थी, तब पूरा आदिवासी समाज सन्न रह गया था। इतना आहत हुआ कि उन्होंने उनकी किताब जला दी, उनके किताब पर बैन लगाने की मांग की। और इससे उनकी नौकरी भी प्रभावित हुई। निश्चित रूप से आदिवासी समाज के भीतर भी अलग तरह से स्त्रियों पर नियंत्रण और शोषण मौजूद है, पर भाषा की दृष्टि से ऐसी भाषा का उपयोग जैसा लेखक के हिंदी अनुवाद में था, सबको हिला देने वाली भाषा थी, जिसका आदिवासी समाज अभ्यस्त नहीं रहा है।
-ओशो
कन्फ्यूशियस ने एक बार चेतावनी दी थी कि बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहना, हैरानी की बात है कि उन्हें आपसे दूर कर सकता है।
यह कहानी ढाई हजार साल पुरानी है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यह आज के दौर के लिए ही लिखी गई हो।
ली वेई नाम का एक बूढ़ा आदमी महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के पास एक सवाल लेकर गया, जो आज भी बहुत से बुज़ुर्गों को परेशान करता है, अपनी पूरी जि़ंदगी औलाद के लिए लगा देने के बाद भी, हम बुढ़ापे में खुद को अकेला क्यों महसूस करते हैं?
ली वेई ने अपनी औलाद के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। उसने बहुत मेहनत की ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी न हो।
जब बच्चे बड़े हो गए और अपनी जि़ंदगी जीने लगे, तो ली वेई ने अपना घर बेच दिया और बेटे के पास रहने चला गया, यह सोचकर कि अब वह प्यार और अपनापन पाएगा।
लेकिन उसे वह खुशी नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी। घर भरा हुआ था, लेकिन उसका दिल खाली था।
सब लोग दिन भर व्यस्त रहते, शाम को थक कर आते और सुकून चाहते। वे उसकी बातें आधे मन से सुनते, उसके सुझावों से चिढ़ जाते और उसकी मौजूदगी को बोझ समझने लगे।
वह जितना करीब आने की कोशिश करता, वे उतना ही दूर होते गए।
ली वेई ने कन्फ्यूशियस से अपना दुख कह सुनाया, गुरुजी! मैंने अपनी जि़ंदगी बच्चों के लिए दे दी। सोचा था उनके साथ रहकर सुकून मिलेगा, लेकिन मैं खुद को उनके बीच नापसंद महसूस करता हूँ। ऐसा क्यों?’
कन्फ्यूशियस ने उसे तीन आसान सबक़ सिखाए।
पहला सबक- पानी का बर्तन
उन्होंने एक बर्तन को पानी से भर दिया और पूछा कि अगर इसमें और पानी डालूँ तो क्या होगा?’
ली वेई ने कहा-यह छलक जाएगा।
कन्फ्यूशियस बोले-
बिल्कुल, रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। जब हम खुद को ज़बरदस्ती किसी ऐसी जगह डालते हैं जो पहले से भरी हो, तो संतुलन बिगड़ जाता है।
तुम अपने बच्चों के घर में फिर से केंद्र बनना चाहते हो, लेकिन अब उनकी जिंदगी और उनके बच्चे ही उनका केंद्र हैं।
दूसरा सबक- दो पेड़
उन्होंने पास के दो पेड़ों की ओर इशारा किया।
जब पेड़ बहुत पास-पास होते हैं तो क्या होता है?
ली वेई ने कहा- वे एक-दूसरे को रोकते हैं और कमजोर हो जाते हैं।
कन्फ्यूशियस ने कहा-
जि़ंदगी में भी यही होता है। ज़्यादा नजदीकी भी समस्या बन जाती है। बढऩे के लिए जगह जरूरी है।
तीसरा सबक-मु_ी भर रेत
कन्फ्यूशियस ने रेत को कसकर मु_ी में पकड़ा।
- शुभांगी मिश्रा
केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों को जो तीन ड्राफ़्ट बिल (मसौदा विधेयक) भेजे हैं उनमें दो बड़े ऐतिहासिक बदलाव प्रस्तावित हैं- पहला, लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और दूसरा, संसद के निचले सदन यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना।
इन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल को बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।
ये तीन विधेयक हैं-
केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026)
ये 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था। इसी वजह से, 2023 का ये क़ानून संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित होने के बावजूद कई लोगों ने चिंता जताई थी कि इस आरक्षण को लागू होने में एक दशक से भी अधिक समय लग सकता है।
अगर ये तीनों विधेयक पारित हो जाते हैं, तो 2029 के अगले आम चुनाव में इस आरक्षण का रास्ता साफ हो सकता है।
हालांकि, मंगलवार को विपक्षी नेताओं ने इन तीनों विधेयकों की आलोचना की है।
विपक्षी दलों ने इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया और इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया।
सबसे तीखी आलोचना लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव को लेकर हो रही है। कई विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई कि सीटों के पुनर्निर्धारण का जो आधार है वो दक्षिणी राज्यों के लोकसभा में प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है।
आइए इन तीनों विधेयकों के प्रस्तावों और उनसे जुड़े विवादों को समझते हैं।
1. लोकसभा सीटों की संख्या 850
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी- 815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से। फि़लहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है।
विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके।
अनुच्छेद 81 के इन्हीं प्रावधानों की वजह से 1976 से ही लोकसभा की सीटों की संख्या में इज़ाफ़ा नहीं हुआ है।
तो अगर मौजूदा लोकसभा का आधार 1971 की जनगणना थी, तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किस आधार पर दिया जा रहा है?
इस सवाल का जवाब डीलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक 2026) में है, जिसे भी विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।
इस विधेयक के उद्देश्यों के बारे में कहा गया है परिसीमन (डीलिमिटेशन) की प्रक्रिया ‘ताजा प्रकाशित जनगणना’ के आधार पर होगी। आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी। यानी इस विधेयक का आधार होगी 2011 में हुई जनगणना। और यही वह बिंदु है जिस पर दक्षिणी राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी होने की चिंता है।
अब तक हर राज्य को मिलने वाली संसदीय सीटों की संख्या इस आधार पर तय होती रही है कि किसी राज्य की आबादी और उसकी निर्वाचन सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग बराबर रहे। यानी पूरे भारत में हर एक सीट लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी।
2. दक्षिण भारतीय राज्यों की आपत्ति
दशकों तक भारत में जनसंख्या वृद्धि असमान रही है, जिसमें दक्षिणी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। अध्ययनों से पता चलता है कि अगर मौजूदा परिस्थितियों में आबादी के अनुपात में सीटें तय करने का यही मानदंड लागू किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर हो जाएगा।
राजनीतिक टिप्पणीकार अदिति फडणिस ने बीबीसी से कहा, ‘दक्षिणी राज्यों ने, जिन्हें आम तौर पर प्रगतिशील माना जाता है, परिवार नियोजन की नीति को बेहतर रूप से अपनाया है और छोटे परिवारों को बढ़ावा देने की कोशिश की है। दक्षिणी राज्यों को लग रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण की उनकी यह कोशिश उन्हें नुकसान की स्थिति में डाल देगी।’
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि परिवार नियोजन पर बेहतर काम करने का उन्हें इनाम मिलने के बजाय नुकसान झेलना पड़ेगा और सीटों को तय करने का आधार जनसंख्या ही होगा तो ज़्यादा जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में सीटें दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़ जाएंगी और संसद में इन राज्यों से जुड़े मुद्दों को वरीयता दी जाने लगेगी।
सरकार बार-बार यह आश्वासन देती रही है कि संसद की मौजूदा संरचना में राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, लेकिन चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने मंगलवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा कि इसे सुनिश्चित करने के लिए इन तीनों विधेयकों में कुछ भी नहीं है।
मंगलवार को दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने भी अपनी चिंता जताई।
एक वीडियो संदेश में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश ‘लोकतंत्र पर हमला’ है।
उन्होंने कहा, ‘जब केंद्र सरकार ने हमसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, छोटे परिवार रखने और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को कहा, तो हमने (तमिलनाडु ने) उसका पालन किया। क्या अब अनुशासित तरीके से काम करने की यही सज़ा है?’
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष और बीजेपी के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि वो दक्षिणी राज्यों के साथ मिलकर सीटें बढ़ाने के ‘प्रो-राटा मॉडल’ का विरोध करें।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच प्रस्तावित 850 सीटों के पुनर्गठन का सटीक ढांचा अभी साफ़ नहीं है।
विधेयक में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला परिसीमन आयोग अंतिम रूप देगा, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे।
गौरतलब है कि विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि भविष्य में किस जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया जाएगा, यह संसद साधारण बहुमत से तय कर सकेगी। फिलहाल इसके लिए संविधान संशोधन की ज़रूरत होती है- यानी संसद में दो-तिहाई बहुमत।
-गीता पांडे
हाल में आई एक वेब सिरीज ने भारत में मैरिटल रेप (पत्नी का बलात्कार) जैसे गंभीर मुद्दे की ओर एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा है।
यह ऐसा मुद्दा है जिसे भारत अब तक अपराध घोषित करने से हिचकता रहा है।
‘चिरैया’, नाम की ये सिरीज हाल ही में जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई है और इसे अब तक लाखों लोग देख चुके हैं। ये हाल के महीनों में इस प्लेटफ़ॉर्म की सबसे लोकप्रिय हिंदी सिरीज़ में शामिल हो गई है।
मीडिया आलोचकों ने इस सिरीज की तारीफ की है क्योंकि यह एक ऐसे विषय को सामने लाती है जिसे आमतौर पर समाज में छिपाकर रखा जाता है। इसने सोशल मीडिया पर सहमति और महिला विरोधी सोच पर बहस छेड़ दी है। हालांकि कुछ लोगों ने इसे ‘पुरुष विरोधी’ और ‘शादी की पवित्रता’ को कमजोर करने की ‘कोशिश’ भी बताया है।
सिरीज़ की स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा बताती हैं कि कहानी दो महिलाओं-कमलेश और पूजा के इर्द-गिर्द घूमती है।
कमलेश का किरदार दिव्या दत्ता ने निभाया है।
कमलेश एक मिडिल क्लास हाउसवाइफ हैं, जो मानती हैं कि महिलाओं को घर और रसोई तक ही सीमित रहना चाहिए।
वहीं पूजा (ये किरदार प्रसन्ना बिष्ट ने निभाया है) पढ़ी-लिखी, जागरूक और बराबरी में विश्वास रखने वाली महिला है।
दोनों की दुनिया तब टकराती है जब पूजा की शादी कमलेश के देवर अरुण से होती है।अरुण को कमलेश ने बेटे की तरह पाला है।
अरुण एक आदर्श पति लगता है, लेकिन शादी की पहली रात ही वह पूजा के साथ बलात्कार करता है, जिससे उसके सपने टूट जाते हैं।
जब पूजा इसका विरोध करती है, तो अरुण कहता है, ‘मैंने वही लिया जो मेरा हक़ है।’
वह यह भी कहता है कि भारत में मैरिटल रेप अपराध नहीं है, इसलिए इसके खिलाफ कोई कानून नहीं है।
सहमति की अहमियत दिखाती है सिरीज
दिव्या दत्ता कहती हैं कि यह सिरीज़ सहमति की अहमियत दिखाती है। खासकर शादी जैसे रिश्ते में, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है।
वह कहती हैं, ‘मैरिटल रेप पर बात करना बहुत मुश्किल है। हर महिला जिसे यह झेलना पड़ता है, सोचती है कि यह सिफऱ् उसकी अपनी कहानी है। उसे डर रहता है कि अगर वह बोलेगी तो बदनामी होगी और घर टूट जाएगा।’
सिरीज़ में जब जख़्मी और परेशान पूजा अपने साथ हो रहे व्यवहार के बारे में बोलती है तो उसे अपने ही परिवार से ‘समझौता करने’ की सलाह मिलती है। उसे कहा जाता है कि सच बोलने से केवल बदनामी होगी।
कमलेश शुरुआत में मानती है कि शादी में सेक्स के लिए सहमति अपने आप मिल जाती है।
लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका नजरिया बदलता है और वह सच का साथ देने का फैसला करती है, भले ही उसे अपने ‘कम्फर्ट जोन’ से बाहर आना पड़े। अंत में वह पूजा का साथ देती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में शादीशुदा महिलाओं में से लगभग 6.1 फीसदी को कभी-ना-कभी यौन हिंसा झेलनी पड़ी है।
लेकिन वर्षों से चल रहे आंदोलनों के बावजूद भारत उन तीन दर्जन देशों में शामिल है, जहां मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता।
पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में भी ये अपराध नहीं माना जाता।
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। लेकिन सरकार, धार्मिक संगठनों और पुरुष अधिकार संगठनों ने कानून में बदलाव का विरोध किया है।
इस मामले में मौजूदा कानून औपनिवेशिक दौर का है। अगर पत्नी नाबालिग नहीं है तो ये पति को पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाने को अपराध नहीं मानता।
पिछले साल एक मामले को लेकर काफ़ी आक्रोश दिखा था। उस मामले में पत्नी के साथ ‘बलात्कार के दोषी’ शख़्स को अदालत ने इस आधार पर बरी कर दिया कि भारत में मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता।
स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा कहती हैं, ‘यह अन्याय हमारे घरों और आसपास ही हो रहा है। सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इसके खिलाफ कोई कानूनी या सामाजिक सहारा नहीं है। इसलिए एक लेखक के रूप में मैंने इस पर काम करना जरूरी समझा
- किरण पांडे
सीएसई का विश्लेषण बताता है कि 2026 में 1 मार्च से 7 अप्रैल तक 38 दिनों में 24 राज्यों में 29 दिन बेमौसमी घटनाएं हुईं और 13 राज्यों की 6,27,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसलें प्रभावित हुई
भारतीय खेती-बाड़ी के लिए मॉनसून को लंबे समय से सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला मौसम माना जाता रहा है। जून से सितंबर के बीच होने वाली भारी बारिश और बाढ़ की वजह से देश के बड़े इलाकों में फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लेकिन सीएसई द्वारा 2022 से लेकर अप्रैल 2026 की शुरुआत तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
इस विश्लेषण के अनुसार खेती से जुड़े जोखिमों के समय और उनके पैमाने दोनों में ही अब बदलाव देखा गया है। “भारत के मौसम आपदाओं पर आधारित इंटरैक्टिव एटलस” के अनुसार अब मॉनसून के साथ-साथ मॉनसून से पहले का मौसम भी फसलों के लिए एक नया और अधिक जोखिम वाला समय बनता जा रहा है।
मॉनसून से पहले फसलों को होने वाला नुकसान और बढ़ रहा है। मॉनसून से पहले के समय में होने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि अब फसलों को पहले से कहीं अधिक नुकसान पहुंचा रही है। जबकि एक समय ऐसा भी था जब खेती-बाड़ी के लिहाज से इस समय को काफी सुरक्षित माना जाता था।
पिछले चार सालों में से तीन साल (2022, 2024 और 2025) ऐसे रहे हैं जब मॉनसून से पहले के मौसम में खराब मौसम की घटनाओं, विशेषकर ओलावृष्टि की वजह से देश के एक बड़े इलाकों में फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई थीं।
विश्लेषण कहता है कि 2026 में भी यह सिलसिला जारी है। इस साल मॉनसून से पहले के मौसम के शुरुआती 38 दिनों (1 मार्च से 7 अप्रैल तक) में ही कम से कम 24 राज्यों में 29 दिन हुआ है। कम से कम 13 राज्यों की 6,27,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसलें प्रभावित हुई हैं। इनमें उत्तर प्रदेश (3,47,366.43 हेक्टेयर), महाराष्ट्र (2,04,704 हेक्टेयर) और बिहार (45,000 हेक्टेयर) जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं।
ये आंकड़े वास्तविक नुकसान से कम भी हो सकते हैं क्योंकि 11 अन्य प्रभावित राज्यों (जिनमें पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्य भी शामिल हैं) के आंकड़े अभी इसमें शामिल नहीं किए गए हैं। कुल मिलाकर केवल एक महीने से कुछ अधिक समय में ही 6,20,000 हेक्टेयर से अधिक का इलाका प्रभावित हुआ है। इस हिसाब से 2023 के बाद से मॉनसून से पहले के मौसम में फसलों को होने वाला यह दूसरा सबसे बड़ा नुकसान है।
2023 में पूरे मौसम के दौरान लगभग 6,36,000 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुईं थी। केवल मार्च 2026 में ही कम से कम 1,95,000 हेक्टेयर फसल को नुकसान पहुंचा। यह आंकड़ा पिछले पांच सालों में सबसे अधिक नुकसान को दिखाता है। इसकी तुलना में मार्च 2023 में लगभग 1,20,000 हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ था।
इसी तरह अप्रैल के केवल पहले सप्ताह में ही 7 अप्रैल 2026 तक उपलब्ध अनुमानों के अनुसार 4,26,000 हेक्टेयर से अधिक फसलें प्रभावित हुई हैं। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में अकेले इस नुकसान का 80 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा प्रभावित हुआ है।
कृषि विभाग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार गत 5 अप्रैल को लगभग 30 मिलीमीटर बारिश और ओलावृष्टि से जिले में लगभग 3,43,069 हेक्टेयर में खड़ी गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है। इन घटनाओं का समय बहुत अहम है। मार्च और अप्रैल का महीना गेहूं, सरसों और दालों जैसी रबी की फसलों की कटाई का समय होता है।
अब विश्लेषण में देखा गया है कि मौसम की मार कम समय में ही बार-बार पड़ रही है और विशेषकर ठीक कटाई से पहले आ रही है, जिससे किसानों को नुकसान की भरपाई का बहुत कम मौका मिल पाता है। सीजन की शुरुआत के उलट, इस चरण में खराब हुई फसलों को दोबारा नहीं बोया जा सकता, जिससे किसानों की पूरी आमदनी खत्म हो जाती है।
- तारन प्रकाश सिन्हा
बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा, संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा की नजर से। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि बस्तर का दूसरा चेहरा, जो कहीं अधिक गहरा, पुराना और जीवंत है, लगभग ओझल हो गया। जबकि सच यह है कि बस्तर केवल संघर्ष का भूगोल नहीं है; वह सभ्यता, स्मृति, श्रम, जंगल, जल, कला और समुदाय का प्रदेश है। अब जब हालात पूरी तरह बदल गए है जब भय और असुरक्षा की रात व्यतीत हो गई , नया सबेरा आ गया तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है, अब आगे क्या? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, अब बस्तर का रास्ता कैसा हो?
मेरे विचार से इसका उत्तर सीधा है, बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोकविश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।
उदाहरण के लिए बड़ेडोंगर को देखिए। वहां जब राजा नहीं रहा, तो लोगों ने नींबू को ही “लिमऊ राजा” का प्रतीक मान लिया। एक चट्टान पर बैठकर, धूप-दीप के साथ, लोग सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है। यह कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक बुद्धि का प्रमाण है। यह बताती है कि यहां निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते, बल्कि साथ बैठकर बनाए जाते हैं। यही वह बुनियादी बात है जिसे हमें बस्तर के विकास में भी समझना होगा।
दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हुए हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा है, तो यह केवल भाषिक संयोग नहीं, बल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है। आज जब दुनिया प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और टिकाऊ वस्त्रों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा भर नहीं रह जाता; वह रोजगार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर बन सकता है। यदि इसे सही डिज़ाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए, तो कोसा बस्तर की अर्थव्यवस्था का बड़ा स्तंभ बन सकता है।
बस्तर शब्द की एक और लोक-व्याख्या “बांस तरी” से भी जुड़ती है, अर्थात बाँसों के नीचे या बाँसों के बीच बसा भूभाग। यह व्याख्या भी केवल भाषा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि बस्तर की भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई की ओर संकेत करती है। बस्तर में बाँस हर जगह है, लेकिन बाँस आधारित उद्योग अभी भी अपनी पूरी संभावना तक नहीं पहुंचा। जबकि आज बाँस केवल टोकरी या परंपरागत उपयोग की चीज नहीं रह गया है। उससे फर्नीचर, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी उत्पाद, अगरबत्ती स्टिक, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और कई प्रकार के सूक्ष्म उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। बस्तर में बाँस केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि एक बड़ी हरित अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन सकता है।
दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में पूरी तरह से डिजिटल जनगणना शुरू हो गई है। लाखों कर्मचारी घर-घर जाकर डेटा जुटा रहे हैं। यह पहली बार है जब लोगों को खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने की सुविधा भी दी गई है।
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन का लिखा –
भारत में 1 अप्रैल से पूरी तरह से डिजिटल जनगणना का काम शुरू हो गया है। इसके लिए, 30 लाख से भी ज्यादा कर्मचारियों को काम पर लगाया गया है। साथ ही, सरकार ने लोगों को यह सुविधा भी दी है कि वे खुद एक ऑनलाइन पोर्टल (सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल) पर जाकर अपनी जानकारी भर सकें।
पहले चरण में, अधिकारी घरों की सूची बनाने और घरों की स्थिति पर ध्यान देंगे। इस दौरान 33 पैमानों पर डेटा इक_ा किया जाएगा। इसमें घर बनाने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री, बिजली और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच, और स्मार्टफोन और गाडिय़ों जैसी चीजों का मालिकाना हक शामिल है।
इस बार जनगणना में हर इमारत की जियो-टैगिंग भी की जाएगी। इसका मतलब है कि हर घर और बिल्डिंग की सही भौगोलिक स्थिति रिकॉर्ड की जाएगी। इससे यह पक्का हो सकेगा कि देश का कोई भी इलाका या मकान गिनती से छूट न जाए और हमें देश के बुनियादी ढांचे की एकदम सही जानकारी मिल सके।
अगले साल की शुरुआत में होने वाला दूसरा चरण पूरी तरह से आबादी पर केंद्रित होगा। इसमें विस्तृत जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक डेटा इक_ा किया जाएगा। जैसे, हर व्यक्ति की उम्र, पढ़ाई और वह क्या काम करता है, इसकी पूरी जानकारी ली जाएगी। डिजिटल तकनीक की मदद से सरकार यह समझने की कोशिश करेगी कि लोग एक शहर से दूसरे शहर क्यों जा रहे हैं और बच्चों के जन्म की दर क्या है। अधिकारियों का मानना है कि इस डेटा से भारत की बदलती आबादी की विस्तृत प्रोफाइल तैयार करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, सबसे खास बात यह है कि इस जनगणना में सभी समुदायों की जातियों की विस्तृत गिनती भी शामिल होगी। 1931 के बाद पहली बार ऐसा किया जा रहा है।
भारत की जनगणना के पीछे छिपे एजेंडों का डर
1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच, भारतीय नागरिकों के पास अपना सारा जरूरी डेटा खुद बताने का विकल्प है। सरकार की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, ‘खुद जानकारी देने की यह प्रक्रिया सुरक्षित और वेब-आधारित सुविधा है, जो 16 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। पहली बार, लोग जनगणना कर्मचारियों के आने से पहले, अपनी सुविधा के अनुसार अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं।’
इसमें आगे कहा गया है, ‘जनगणना शासन चलाने का एक बहुत जरूरी जरिया है। इसी आधार पर अगले दस सालों के लिए भारत के विकास की योजनाएं तैयार की जाएंगी।’
हालांकि, जिन लोगों को तकनीक से जुड़ी ज्यादा जानकारी नहीं है, उनके लिए ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल करना मुश्किल होगा। खासकर ऐसे लोग जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। ऐसे में उनका डेटा इक_ा करने के लिए जनगणना कर्मचारियों को ही उनके घर जाना होगा। लेकिन इस पुराने तरीके की भी अपनी अलग चुनौतियां हैं, जैसे डेटा दर्ज करने में होने वाली देरी या गलतियां।
जनगणना शुरू होने से पहले ही आलोचकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या लाखों कर्मचारियों को इतने कम समय में इतनी बड़ी आबादी का डेटा संभालने की सही ट्रेनिंग मिल पाएगी? क्या वे इतनी बड़ी संख्या में मौजूद घरों की सही से गिनती कर पाएंगे? कुछ लोगों को यह भी डर है कि घर के मालिकों को बिना किसी उचित मदद के खुद ही अपनी गिनती करने के लिए या फिर किसी अनौपचारिक बिचौलिए के जरिए अपना डेटा भेजने के लिए बढ़ावा दिया जा सकता है।
सबसे अहम बात यह है कि आलोचकों को इस बात की चिंता है कि राजनीतिक फायदे के लिए डेटा में हेर-फेर किया जा सकता है। इस जनगणना का डेटा 2027 में जारी होने की संभावना है। यह डेटा, भारत के सामने आने वाले राजनीतिक रूप से कुछ सबसे ज्यादा संवेदनशील फैसलों में अहम भूमिका निभाएगा। जैसे, जाति जनगणना से लेकर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करने तक।
भरोसे का सवाल
पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। पुराने तरीके से डेटा इक_ा करने का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि उस वक्त भी फर्जी कर्मचारियों या स्थानीय स्तर पर आंकड़ों में हेराफेरी का डर रहता था, लेकिन तब कम नुकसान की आशंका होती थी। इसकी वजह यह थी कि सारा डेटा कागजों पर दर्ज किया जाता था और उसे प्रोसेस करने में काफी समय लगता था।
आज जब भारत कागज से डिजिटल की ओर बढ़ रहा है, तो सारा डेटा लगभग तुरंत ही सेंट्रल सिस्टम में पहुंच जाएगा। इस बार की जनगणना में जाति, धर्म, कमाई और पलायन जैसी बहुत ही निजी और संवेदनशील जानकारी भी ली जा रही है। इससे जोखिम और बढ़ जाता है। खासकर तब, जब इस डेटा को दूसरे सरकारी डेटाबेस (जैसे आधार या वोटर आईडी) के साथ जोडक़र देखा जाए।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस। वाई। कुरैशी ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘ये नए जोखिम नहीं हैं, लेकिन डिजिटलीकरण से इनका दायरा बढ़ जाता है। जो चीज पहले स्थानीय और सीमित स्तर पर थी, वह अब पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर सुरक्षा के उपाय नाकाम हो जाएं।’
कुरैशी ने आगे कहा, ‘डिजिटल की ओर यह बदलाव मायने रखता है, लेकिन असली मुद्दा भरोसे का है, न कि तकनीक का।’ उन्होंने ‘उच्च राजनीतिक दांव' की ओर इशारा किया, जैसे परिसीमन— यानी किसी राज्य या निर्वाचन क्षेत्र के लिए प्रतिनिधियों की संख्या तय करने की प्रक्रिया और लैंगिक कोटा।
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि जनगणना की सफलता ‘ऐप्लिकेशन पर कम, बल्कि पारदर्शिता, ऑडिट और इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि इसे कितना निष्पक्ष और समावेशी माना जाता है।’
कुरैशी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जाति-आधारित जनगणना से आरक्षण के कोटे का स्वरूप बदल सकता है और तनाव पैदा हो सकता है। वहीं, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई ज्यादा बढऩे का खतरा है।
वह बताते हैं, ‘इसमें निजता से जुड़ी चिंताओं और डेटा के दुरुपयोग के डर को भी जोड़ दें, तो असली चुनौती केवल जनगणना को पूरा करना नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा, संघीय संतुलन और राजनीतिक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना है।’
वे छोड़ गए थे दर्द..
वे छोड़ गए थे अनाथ बच्चे..
और सिसकती हुईं विधवाएं!
उन्हीं में दो महिलाएं थीं,अत्तर कौर और रत्तन देवी, जिनकी हिम्मत इतिहास में दर्ज है ।
अत्तर कौर उस वक्त गर्भवती थीं, जब उनके पति भगमल भाटिया को गोली मार दी गई। उस रात, खून और मौत के बीच, वो अपने पति की लाश के पास बैठी रहीं।
मरते हुए अजनबियों को पानी पिलाया, उनके दर्द में साथ बैठीं, जबकि उनका खुद का दिल टूट चुका था।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹50,000 लेकर आए, उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम। उन्हें लगा, शायद इससे अत्तर कौर 'आगे बढ़ पाएंगी'। लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। दो बार!
मना इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी, वो अकेली थीं, अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।
बल्कि इसलिए किया क्योंकि उनके शब्दों में, "इस पैसे को लेने का मतलब, मेरे पति की शहादत को बेच देना होगा।"
रत्तन देवी को जब गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, तो वो भागकर बाग़ पहुंचीं, और वहां अपने पति की लाश देखी।
कर्फ्यू था, कोई मदद नहीं कर सकता था।
.तो वो पूरी रात वहीं रुकीं, अपने पति की लाश की अकेले रखवाली की।
अगली सुबह, उसे चारपाई पर उठाकर घर ले आईं।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹25,000 लेकर आए।
रत्तन देवी का जवाब था, "मैं अपने पति के हत्यारों से पैसे नहीं लूंगी।"
इन दो महिलाओं ने न हथियार उठाए, न नारे लगाए।
लेकिन अपने दर्द, अपने इनकार और अपनी ख़ामोशी से, उन्होंने विरोध किया।
और ये विरोध, हमेशा याद रखा जाना चाहिए!
(द बेटर इंडिया)
"यह हमारा अंतिम और बेस्ट ऑफ़र है, अब देखना यह है कि क्या ईरानी इसे क़बूल करते हैं. शुक्रिया." इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने सामने रखी मेज़ को दो बार थपथपाया और प्रेस कॉन्फ़्रेस ख़त्म कर दी.
पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई.
इस बात की जानकारी अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने दी, जो बातचीत के लिए पाकिस्तान आए थे. रविवार सुबह 6 बजे के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में जेडी वेंस ने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच फ़ासला कम करने और समझौता कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन "बुरी ख़बर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच सके."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह ख़बर अमेरिका के लिए उतनी बुरी नहीं है जितनी ईरान के लिए है, "कोई समझौता नहीं हुआ है और हम अमेरिका वापस लौट रहे हैं."
पाकिस्तान के कहने पर अमेरिका और ईरान दो हफ़्ते के संघर्ष विराम पर राज़ी हुए थे और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए इस्लामाबाद आए थे. दोनों पक्षों के बीच बातचीत इस्लामाबाद के सेरेना होटल में हुई.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि बातचीत बेनतीजा रही, लेकिन उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि समझौता न होने का दो हफ़्ते के अस्थायी संघर्ष विराम पर क्या असर पड़ेगा.
प्रेस कॉन्फ़्रेस के क़रीब दो घंटे बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेस की और कहा कि पाकिस्तान अमेरिका-ईरान बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहेगा, "यह ज़रूरी है कि दोनों पक्ष संघर्ष विराम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखें."
बातचीत क्यों टूटी?
अमेरिका और ईरान शांति वार्ता की नाकामी के लिए अलग-अलग वजहें बता रहे हैं.
बातचीत के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हमने बहुत साफ़ कर दिया था कि हमारी 'रेड लाइन्स' क्या हैं, हम किन बातों पर समझौता कर सकते हैं और किन पर नहीं."
जेडी वेंस के मुताबिक़, "और उन्होंने (ईरान) तय किया है कि वे हमारी शर्तें क़बूल नहीं करेंगे."
इस मौके पर पत्रकारों ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति से पूछा, "कृपया साफ़-साफ़ बताइए कि किन शर्तों को ख़ारिज किया गया?"
जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि वह बंद कमरे में 21 घंटे चली बातचीत की पूरी जानकारी नहीं देंगे, लेकिन "सीधी बात यह है कि हम उनसे (ईरान से) यह भरोसा चाहते हैं कि वे परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे और ऐसी क्षमता हासिल करने के लिए ज़रूरी उपकरण भी नहीं जुटाएंगे."
"यह अमेरिकी राष्ट्रपति का मुख्य लक्ष्य है और हमने बातचीत के ज़रिए इसे हासिल करने की कोशिश की."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि ईरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता पहले ही नष्ट की जा चुकी है, "लेकिन क्या हमें ईरान में यह इच्छा दिख रही है कि वे कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे? अभी तक हमें ऐसी इच्छा नहीं दिखी है."
एक सवाल के जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत के दौरान ईरान की फ़्रीज़ संपत्तियों पर भी चर्चा हुई, लेकिन हम उस मुकाम तक नहीं पहुंच सके जहां ईरान हमारी शर्तें मान लेता.
"मुझे लगता है कि हमने काफ़ी लचीलापन दिखाया. राष्ट्रपति ने हमें कहा था कि आपको अच्छी नीयत से बातचीत में जाना है और समझौते तक पहुंचने की पूरी कोशिश करनी है. हमने वही किया, लेकिन अफ़सोस कि कोई प्रगति नहीं हुई."
जेडी वेंस से पूछा गया कि बातचीत के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से कितनी बार संपर्क किया और उन्होंने क्या कहा.
इस पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने जवाब दिया, "हम राष्ट्रपति के साथ लगातार संपर्क में थे, पिछले 21 घंटों में हमने कितनी बार बात की, मुझे नहीं पता... शायद दर्जन भर बार."
"हम एडमिरल कूपर (सेंटकॉम कमांडर), मार्को रुबियो (विदेश मंत्री), पीट हेगसेथ (रक्षा मंत्री) और पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के संपर्क में थे. हम लगातार संपर्क में थे क्योंकि हम अच्छी नीयत से बातचीत कर रहे थे."
प्रेस कॉन्फ़्रेंस को ख़त्म करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हम समझ बनाने के एक आसान सा प्रस्ताव दिया है. यह हमारी अंतिम और सबसे बेहतर पेशकश है, अब देखना यह है कि ईरानी इसे क़बूल करते हैं या नहीं."
इस संक्षिप्त प्रेस कॉन्फ़्रेस के बाद जेडी वेंस रावलपिंडी के नूर ख़ान एयर बेस गए और वहां से अमेरिका के लिए रवाना हो गए. उन्हें पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इसहाक़ डार और गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने विदा किया.
ईरानी मीडिया- अमेरिका ने लचीलापन नहीं दिखाया
ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक़, अमेरिका की "ग़ैर-वाजिब मांगों" ने युद्ध ख़त्म करने की बातचीत को बाधित किया.
ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने टेलीग्राम पर पोस्ट में कहा, "ईरानी प्रतिनिधिमंडल की तरफ़ से कई कोशिशों के बावजूद, अमेरिकी पक्ष की ग़ैर-वाजिब मांगों ने बातचीत की प्रगति को रोक दिया. इस तरह बातचीत ख़त्म हो गई."
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात इस्लामाबाद पहुंचा, जबकि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ़, जेरेड कुशनर और अन्य अमेरिकी अधिकारी शनिवार सुबह पाकिस्तानी राजधानी पहुंचे.
दोनों प्रतिनिधिमंडलों ने अलग-अलग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, विदेश मंत्री इशाक़ डार और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत अन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की.
इन बैठकों के बाद पाकिस्तानी सरकार के बयानों में कहा गया कि पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका जारी रखेगा और उम्मीद जताई गई कि शनिवार को होने वाली बातचीत विवाद के हल की दिशा में एक क़दम होगी.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने बीबीसी उर्दू को बताया कि पहले ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच पाकिस्तान के ज़रिए संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, जिसके बाद दोनों पक्षों ने पाकिस्तानी अधिकारियों की मौजूदगी में ढाई घंटे तक बातचीत की.
इसके बाद एक घंटे का विराम लिया गया और पेश की गई मांगों के तकनीकी पहलुओं पर ईरानी और अमेरिकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा हुई.
पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़, तकनीकी मुद्दों पर संदेशों का आदान-प्रदान देर रात तक जारी रहा.
ईरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने दावा किया है कि बातचीत बेनतीजा रहने की वजह अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होना था.
तस्नीम के मुताबिक़, ईरानी संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में आए प्रतिनिधिमंडल ने सेना प्रमुख से कम से कम दो बार और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से एक बार मुलाक़ात की, "ताकि ज़रूरी इंतज़ाम किए जा सकें और बातचीत की शुरुआत में ही अमेरिका के वादाख़िलाफ़ी के ख़िलाफ़ औपचारिक विरोध दर्ज कराया जा सके."
ईरानी न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत 21 घंटे से ज़्यादा चली. इस दौरान ईरान ने बार-बार अपने प्रस्ताव पेश किए और "अमेरिकी पक्ष को हक़ीक़त की तरफ़ लाने की कोशिश की."
तस्नीम न्यूज़ एजेंसी का दावा है कि "हर चरण पर अमेरिका की ज़्यादा मांगों ने साझा ढांचा बनने में रुकावट डाली. अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होने की वजह से बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई."
ख़बर में आगे कहा गया कि अगली बातचीत के दौर के समय, जगह और प्रक्रिया को लेकर अभी तक कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है.
सेरेना होटल से एक किलोमीटर दूर शनिवार को माहौल?
बिरयानी, फ़्राइड राइस, चिकन, कबाब और मिठाइयां भी... ये मेन्यू इस्लामाबाद के सेरेना होटल का नहीं था, जहां शनिवार को ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच सीधी बातचीत हुई.
बल्कि यह नज़ारा एक किलोमीटर दूर जिन्ना कन्वेंशन सेंटर का था, जहां दुनिया भर से आए पत्रकारों के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे.
अगर कोई और मौक़ा होता तो पाकिस्तानी सरकार की इन तैयारियों की तारीफ़ होती, लेकिन वहां असल में देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे, जो 'एक्सक्लूसिव' ख़बर की तलाश में आए थे और पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही अमेरिका-ईरान बातचीत को कवर कर रहे थे.
होटल के बाहर सड़क पर बसें खड़ी थीं, जो पत्रकारों को जिन्ना कन्वेंशन सेंटर ले जा रही थीं, जहां सुरक्षा कारणों से गाड़ियों और ग़ैर-अधिकृत लोगों के आने पर रोक थी.
बस में विदेशी पत्रकारों का उत्साह साफ़ दिख रहा था.
मैंने एक विदेशी मीडिया संस्थान से जुड़ी महिला पत्रकार को फ़ोन पर यह कहते हुए भी सुना कि "सारी निगाहें पाकिस्तान पर हैं."
जानकारी की कमी लेकिन खाने की भरपूर व्यवस्था
कुछ देर बाद हम जिन्ना कन्वेंशन सेंटर पहुंचे, जहां दर्जनों देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे. यह एक मेला था जहां हर तरह की भाषाएं सुनाई दे रही थीं. कोई अंग्रेज़ी में, कोई उर्दू में, कोई पश्तो में और कोई दूसरी यूरोपीय भाषाओं में कैमरे और फ़ोन पर रिपोर्टिंग कर रहा था.
मैं सोच रहा था कि यहां काम कैसे चलेगा. मैंने एक विदेशी महिला पत्रकार से पूछा, "क्या आपको पता है कि यहां से एक किलोमीटर दूर सेरेना होटल में ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच बैठकों में क्या हो रहा है?" उसने जवाब दिया, "शायद कन्वेंशन सेंटर के बाहर कुछ पत्रकारों को जानकारी हो, लेकिन यहां किसी को कुछ नहीं पता."
मैंने यही बात अलग-अलग शब्दों में दूसरे पत्रकारों से भी सुनी. पूरा दिन यहां बिताने के बावजूद मैंने कोई ऐसा सरकारी अधिकारी नहीं देखा जो पत्रकारों को बता सके कि अंदर क्या चल रहा है.
स्थानीय और विदेशी पत्रकार एक-दूसरे से बार-बार यही सवाल पूछते रहे कि क्या किसी को बातचीत के बारे में कुछ पता है? जानकारी की कमी और धीमे इंटरनेट ने पूरे दिन पत्रकारों को परेशान किया.
इस बीच सेरेना होटल में पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत जारी थी. उनसे जुड़ी ख़बरें लेते समय मेरा संपर्क भी धीमे इंटरनेट की वजह से कई बार टूट गया.
दुनिया भर से इस्लामाबाद आए पत्रकार यह दुआ करते दिखे कि उन्हें खाली हाथ वापस न लौटना पड़े. यह एक बड़ी ख़बर थी और संघर्ष का ख़त्म होना, इससे बड़ी ख़बर नहीं हो सकती.
इसके लिए कन्वेंशन सेंटर में बैठे पत्रकार बातचीत के स्थल सेरेना होटल पर नज़र बनाए हुए थे.
जिस ख़बर का पत्रकार इंतज़ार कर रहे थे, वह रविवार सुबह 6 बजे के बाद आई, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एलान किया कि बातचीत बेनतीजा रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


