राजपथ - जनपथ
नारी शक्ति का अपमान बन गई साडिय़ां
छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े पहली बार विधायक बनीं और तुरंत मंत्री बन गईं, अपने विभाग में लगातार विवादों में घिरी रहती हैं। लगता है कि उनका भोलापन अब आधिकारिक नीति का हिस्सा बन चुका है।
पहले आंगनबाड़ी केंद्रों में घटिया उपकरण और खेल सामग्री की सप्लाई का मामला आया। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नारी शक्ति के लिए बड़े-बड़े फैसले ले रहे हैं। इधर आंगनबाड़ी की नारियों, कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए करीब 10 करोड़ रुपये खर्च कर खरीदी गई साडिय़ां विवादों में है। बाजार में जो साड़ी 200 रुपये में मिल सकती है उसे 500 रुपये में खरीदी गईं। लंबाई साढ़े 5 मीटर होनी चाहिए पर छोटी निकली। इतना पतला कि पहनते ही फट जाने का डर, और धोने से रंग उड़ जाने का। महिलाएं पहनने से इनकार कर रही हैं। इसके खिलाफ आंदोलन कर रही महिलाओं का कहना है कि ये तो पोंछा लगाने के लायक भी नहीं है।
मंत्री जी का बचाव देखकर तो तालियां बजानी चाहिए। उन्होंने खुद साड़ी धोई, सुखाई और घोषणा की है, सब ठीक है, बस कुछ मामलों में खामी है। फिर जांच समिति बना दी गई। ठीक वैसे ही जैसे पिछले उपकरण घोटाले में बनाई गई थी। खराब सामान बदल दिया जाएगा, बस।
खुद धोया वाला वैज्ञानिक तरीका याद दिलाता है महाराष्ट्र के पुराने आंगनबाड़ी घोटाले की, वहां आम आदमी पार्टी ने पंकजा मुंडे के खिलाफ 54 सौ करोड़ के टेंडर में फर्जी महिला मंडलों के जरिए कमीशनखोरी का आरोप लगाया था। नक्सल प्रभावित बीजापुर इलाके में आंगनबाड़ी भवनों की मरम्मत के नाम पर पंचायत सचिवों ने एक ही फर्म के साथ सांठगांठ कर वित्त आयोग की राशि लूट ली। भवन हैं ही नहीं, फोटो फर्जी, बिल फर्जी। घटिया माल आ जाता है, तो या तो अधिकारी सो रहे हैं या उनकी सांठगांठ होती है। पता नहीं मंत्री की सहमति सप्लाई के बाद मिलती है, या उसके पहले ही।
ये सडक़ कहां तक जाएगी?
पड़ोसी जिले में खराब सडक़ों को लेकर कांग्रेस का धरना-प्रदर्शन इन दिनों चर्चा में है। ऊपर से मामला सडक़ निर्माण में गड़बड़ी का दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने कहानी कुछ और ही इशारा कर रही है।
दरअसल, कुछ समय पहले कांग्रेस के एक राष्ट्रीय नेता का जिले में कार्यक्रम हुआ था। जिला संगठन ने स्वागत-सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। सर्किट हाउस में ठहरने की व्यवस्था की गई और भोजन के लिए पीडब्ल्यूडी के ईई से सहयोग मांगा गया। लेकिन ईई ने साफ मना कर दिया।
इसके बाद जिला पदाधिकारियों ने आपस में चंदा कर नेताजी के खानपान का इंतजाम किया। कार्यक्रम तो बढिय़ा निपट गया, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
ईई के इलाके में सडक़ निर्माण में गड़बड़ी सामने आई, तो कांग्रेसजन सक्रिय हो गए। करीब साढ़े 6 करोड़ की लागत से बनी सडक़ में गुणवत्ता पर सवाल उठे, और जहां पुलिया का निर्माण होना था, वहां कोई निर्माण नहीं हुआ ।
धरना-प्रदर्शन के दबाव में ईई को लिखित में सडक़ सुधार और पुलिया निर्माण का आश्वासन देना पड़ा। इतना ही नहीं, वे कांग्रेस नेताओं से पुरानी नाराजगी के लिए हाथ जोडक़र माफी मांगते भी नजर आए।
हालांकि कांग्रेसजन अभी नरम पडऩे के मूड में नहीं दिख रहे हैं। अब देखना है कि मामला सिर्फ सडक़ तक सीमित रहता है या आगे और परतें खुलती हैं।
सादगी की सक्रियता भारी पड़ी
भाजपा के दो नेता ऐसे हैं, जिनकी सोशल मीडिया सक्रियता कई बार उलटी पड़ जाती है। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज इसका ताजा उदाहरण हैं।
हाल ही में उन्होंने दिल्ली स्थित एक रेस्टोरेंट में भोजन करते हुए अपनी तस्वीर फेसबुक पर साझा की। पोस्ट में उन्होंने लिखा 'सादगी ही असली पहचान है'। साथ ही यह भी कहा कि उन्होंने आम नागरिकों के बीच बैठकर, बिना किसी दिखावे के भोजन किया और जनप्रतिनिधि का दायित्व जनता के बीच रहकर उनके जीवन को समझना है।
लेकिन यह पोस्ट लोगों को रास नहीं आई। कई यूजर्स ने उन्हें सीधे-सीधे घेर लिया। एक यूजर ने लिखा कि वो दिल्ली है महाराज, वहां आपके जैसे सैकड़ों घूमते हैं, कोई पहचानता नहीं। दूसरे ने तंज कसते हुए कहा कि अंबिकापुर से बलरामपुर के रोड में बाइक से जाओ और रास्ते के किसी घर में खाना खाओ, तब जनता से जुड़ाव होगा।
एक अन्य टिप्पणी में कहा गया कि कमाल है, सादगीपूर्वक किए कार्य को भी फोटो खींचकर बताना पड़ रहा है।
कुछ इसी तरह की स्थिति रायपुर जिले के एक भाजपा विधायक की भी बताई जा रही है, जिनके पोस्ट पर भी यूजर्स अक्सर आक्रामक प्रतिक्रिया देते हैं।
पेट्रोल पंप का धंधा
पश्चिम एशिया संकट की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत की स्थिति बनती जा रही है। यदि यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और गैस का संकट और गहरा सकता है। इस कमी का असर सिर्फ आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि राजनेताओं पर भी देखने को मिल रहा है। दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों के कई छोटे-बड़े नेता पेट्रोल-डीजल और गैस एजेंसी के कारोबार से जुड़े हुए हैं।
पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी को हमेशा से स्थिर आमदनी का जरिया माना जाता है। यही कारण है कि विशेष रूप से राजनेता इस क्षेत्र में निवेश के लिए उत्सुक रहते हैं।
चर्चा है कि दुर्ग जिले के एक प्रभावशाली कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री के पास पांच पेट्रोल पंप हैं, जो परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर संचालित हो रहे हैं। इस बात का खुलासा किसी विपक्षी ने नहीं, बल्कि पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से किया।
दरअसल, एक निजी कार्यक्रम में खाड़ी क्षेत्र में जारी संकट के चलते पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कमी पर चर्चा हो रही थी। मंच से संबोधित करते हुए एक नेता ने कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के पास दो-तीन पेट्रोल पंप हैं, वे भी अब एक-एक पंप बंद करने की स्थिति में आ रहे हैं।
इसी कड़ी में उन्होंने पास बैठे पूर्व मंत्री की ओर इशारा करते हुए कहा, कि भइया के पास तो पांच-छह पेट्रोल पंप हैं, आपने भी दो-तीन बंद कर दिए होंगे? इस पर पूर्व मंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन यह टिप्पणी कांग्रेस के भीतर चर्चा का विषय बन गई है।
गौर करने लायक बात ये है कि पूर्व मंत्री के पास पिछली सरकार में एक महत्वपूर्ण विभाग था, लेकिन वे अक्सर यह शिकायत करते रहे कि उन्हें ट्रांसफर तक का अधिकार नहीं दिया गया। चुनाव हारने के बावजूद अभी भी पार्टी में उनका प्रभाव बरकरार है।
यूसीसी पर जवाब से ज्यादा सवाल
यदि सब कुछ समयबद्ध तरीके से चलता रहा तो गुजरात, उत्तराखंड और गोवा के बाद छत्तीसगढ़ चौथा राज्य होगा, जहां समान नागरिक संहिता यानि यूसीसी लागू हो जाएगा। छत्तीसगढ़ में इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक रिटायर्ड न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में समिति बना दी गई है। जहां भी यूसीसी पर जोर दिया जा रहा है, वहां पर सरकारों का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करें। कानून अलग-अलग होने की वजह से न्याय की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। यूसीसी रहेगा तो कानून सरल, एक जैसा और पारदर्शी रहेगा। न्याय व्यवस्था ज्यादा सुलभ होगी और कुशल भी। उम्मीद यह भी की गई है कि खासकर महिलाओं के अधिकारों में यूसीसी लागू होने से समानता आएगी। जैसे, संपत्ति के अधिकार, तलाक और बहुविवाह के मामलों में उन्हें मौजूदा कानूनों से ज्यादा मदद नहीं मिल पाती। सरकार का यह भी मानना है कि इससे सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा।
ये सभी आदर्श परिस्थितियां हैं, पर छत्तीसगढ़ के संदर्भ में कुछ चर्चा कर लें। यह साफ है और जानना जरूरी कि संविधान की जिस धारा 44 की बात कही जा रही है, वह एक नीति निर्देशक प्रावधान है। यानि सुझाव है, अनिवार्यता नहीं। मगर, इसकी अवहेलना भी तो नहीं करनी है। जब संविधान बनने के सात दशक पूरे हो गए हों तो इस पर विचार तो करना ही चाहिए।
दूसरी बात, आदिवासी सुमदायों को इस प्रावधान से अलग रखा जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार आश्वासन दिया है कि आदिवासी समुदायों को यूसीसी से बाहर रखा जाएगा। वे उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और असम के संदर्भ में ऐसा बयान दे चुके हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारिक बयान में अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी पर भी यूसीसी लागू होगा या नहीं। मगर, शाह के बयान के बाद मानकर चला जा सकता है कि यहां भी वही पॉलिसी रहेगी।
जो उच्चस्तरीय समिति देसाई की अध्यक्षता में बनाई गई है उसमें राज्य के नागरिकों, संगठनों और विशेषज्ञों से सुझाव लेने की बात कही गई है। छत्तीसगढ़ के गोंड, बैगा, उरांव, हलबा आदि में सदियों से कस्टमरी लॉ, यानि रीति रिवाज पर आधारित कानून चला आ रहा है। ये प्रथाएं संविधान की 5वीं अनुसूची पेसा और अनुच्छेद 13-3-ए के तहत संरक्षित भी है। यूसीसी में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे, गोद लेने के तरीके में रखे गए प्रावधान आदिवासी समुदाय की प्रथाओं से टकराते हैं। जैसे, बैगा और गोंड समूहों में बेटियों को पिता की संपत्ति, खासकर खेतों पर अधिकार नहीं मिलता या बहुत कम मिलता है। संपत्ति मोटे तौर पर पुत्रों या पुरुष वंशजों में बंटती है। मगर दूसरा पहलू यह भी है कि विवाह होते ही पति की संपत्ति पर उसका अधिकार हो जाता है। महिलाओं के प्रति आदिवासी समुदाय में यह कहीं अधिक प्रगतिशील प्रथा है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के भी कुछ फैसले आ चुके हैं। आदिवासी महिलाओं को तलाक लेने और दोबारा और तीसरी बार विवाह करने मामले में भी बड़ी आजादी है। वह अदालत गए बिना ही अपने पहले पति को छोडक़र दूसरा विवाह कर सकती है। इसकी मंजूरी और मान्यता उसे केवल समाज से लेनी पड़ती है।
आदिवासी नेता कहते हैं कि उनकी प्रथा महिलाओं को ज्यादा आजादी देती है, जबकि यूसीसी जैसे कानून जटिल हैं। छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने कई वक्तव्यों में माना है कि प्रथाएं आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान हैं। यूसीसी इन पर थोप दिया गया तो उनकी अस्तित्व पर खतरा है। आदिवासी समाज में महिलाओं को विवाह-तलाक में ज्यादा स्वतंत्रता है, जबकि संपत्ति में पुरुष-केंद्रित व्यवस्था समुदाय की रक्षा करती है। उनका यह भी कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, समुदाय की सामूहिक संपत्ति होती है। कानून के तहत बाहरी व्यक्ति को बेचना या हस्तांतरित करना प्रतिंबंधित तो अभी भी है पर यदि यूसीसी लागू हो गया तो यह सामूहिक संपत्ति या भूमि व्यक्तिगत मान लिया जाएगा और बाहरी लोगों के हाथ में जाने का खतरा बढ़ेगा।
वैसे सरकार का फैसला सिर्फ समिति के गठन तक सीमित है। समिति की रिपोर्ट, उस पर विधानसभा में चर्चा और कानून के पास हो जाने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
अफसरों की चुनाव ड्यूटी

भारतीय पुलिस सेवा के एक और अफसर त्रिलोक बंसल की अचानक चुनाव ड्यूटी लग गई, और उन्हें पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में पर्यवेक्षक बनाया गया है। उनकी चुनाव ड्यूटी लगने की पुलिस महकमे में काफी चर्चा है।
आईपीएस के वर्ष-2016 बैच के अफसर बंसल एसटीएफ में एसपी के पद हैं। उन्हें कुछ दिन पहले कोंडागांव एसपी का प्रभार दिया गया था। कोंडागांव एसपी पंकज चंद्रा आईपीएस अवार्ड होने के बाद डेढ़ महीने के ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद गए हैं।
बंसल का आर्डर 5 अप्रैल को निकला, और फिर पांच दिन बाद जॉइनिंग कर जिले के एक थाने का निरीक्षण करने पहुंचे थे तभी चुनाव आयोग से फोन आ गया, और उन्हें तत्काल प्रभाव से पश्चिम बंगाल पहुंचने कहा गया। उन्हें बांग्लादेश से सटे संवेदनशील चौबीस परगना जिले में पर्यवेक्षक बनाया गया है। आम तौर पर फील्ड अफसरों को पर्यवेक्षक नहीं बनाया जाता है, लेकिन बंसल इस मामले में अपवाद रहे।
पीएचक्यू ने भी इस मामले में चुनाव आयोग से बात करने की जरूरत महसूस नहीं की, और उन्हें रिलीव कर दिया गया। बंसल के अलावा दो और आईपीएस अफसर चुनाव ड्यूटी कर रहे हैं। इनमें डॉ. अजय यादव, अभिषेक मीणा भी हैं। कुल मिलाकर इस बार बंगाल में आधा दर्जन से अधिक आईएएस और आईपीएस अफसर चुनाव ड्यूटी कर रहे हैं।
जमीन के नीचे छिपे खतरे

नक्सलमुक्त घोषित कर देने का मतलब यह नहीं है कि रातोंरात बस्तर पूरी तरह बदल गया। जंगल के कच्चे रास्तों पर तैनात महिला कमांडो, हाथ में मेटल डिटेक्टर लिए, हर कदम पर छिपे खतरे को तलाश रही हैं।
प्रेशर आईईडी, कमांड आईईडी और टिफिन बम जैसे विस्फोटक आज भी जमीन के भीतर दफ्ऩ हैं, जो किसी भी वक्त जानलेवा साबित हो सकते हैं। मतलब यह है कि सुरक्षा बलों की लड़ाई सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि अदृश्य खतरों से भी है। बम स्क्वायड और डॉग स्क्वाड लगातार जोखिम उठाकर आम लोगों के लिए रास्ते सुरक्षित बना रहे हैं। बस्तर में माओवादी हिंसा से मुक्ति में महिला जवानों की जो भागीदारी रही है, उस पर अलग से कहानी लिखी जानी चाहिए।
नया हो या पुराना, है तो सही
राजधानी रायपुर के तेलीबांधा के एक रेस्टोरेंट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में रईसजादे हुक्का पीते दिख रहे हैं। वीडियो के वायरल होते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया, और पुलिसिया संरक्षण में हुक्का बार संचालित होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। मगर इससे जुड़ी कुछ और जानकारी छनकर सामने आ रही है।
पिछली सरकार में रेस्तरां और पब में हुक्का बार संचालित होते रहे हैं। इसके लिए लाइसेंस भी दिया जाता रहा है। मगर बाद में हुक्का बारों में मारपीट की घटनाओं, और युवाओं में नशे की बढ़ती लत के चलते भारी विरोध के बाद प्रतिबंधित कर दिया गया।
यह कहा जा रहा कि वायरल वीडियो चार साल पुराना है। जो युवक-युवती वीडियो में दिख रहे हैं, वो नामी उद्योगपतियों के परिवार के हैं। हालांकि पुलिस वायरल वीडियो की पड़ताल कर रही है। प्रकरण की जांच से जुड़े एक अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि अभी वीडियो कहां का है, यह स्पष्ट नहीं है। कब का है, यह पता लगाया जा रहा है। वीडियो में दिख रहे चेहरों की भी जानकारी जुटाई जा रही है।
वीडियो भले ही पुराना हो, लेकिन पुलिस पर आरोप लगाने के लिए पर्याप्त है। देखना है कि जांच में क्या कुछ निकलता है।
सारे जतन आज़माए
रिक्त पदों पर भर्ती की मांग को नवा रायपुर में धरने पर बैठे डीएड अभ्यर्थियों को 112 दिन हो चुके हैं। मगर उनकी मांगों से सरकार सहमत नहीं है। डीएड अभ्यर्थियों ने आस नहीं छोड़ी है, और जिस दिन कैबिनेट की बैठक रहती है, उसके पहले सुबह-सुबह मंत्रियों के घर धमक जाते हैं।
बुधवार को कैबिनेट की बैठक थी। आज भी पांच-पांच का दल बनाकर आंदोलनकारी डीएड अभ्यर्थी सुबह मंत्रियों के घर पहुंच गए। उनकी डिप्टी सीएम अरुण साव, ओपी चौधरी, राजेश अग्रवाल, लक्ष्मी राजवाड़े, और गुरु खुशवंत साहेब से मुलाकात हुई। सभी मंत्रियों का एक ही जवाब था कि मांगों पर कैबिनेट की बैठक में विचार किया जाएगा। हालांकि कैबिनेट के एजेंडे में डीएड अभ्यर्थियों का विषय नहीं है। ऐसे में चर्चा होने की उम्मीद नहीं है। फिर भी अभ्यर्थियों ने आस नहीं छोड़ी है।
आंदोलन भी अब पारंपरिक दायरे से निकलकर प्रतीकात्मक और भावनात्मक रूप ले चुका है। दंडवत प्रणाम से लेकर घुटनों के बल मार्च, दांडी यात्रा, न्याय कलश और जल समाधि तक हर तरीका अपनाया जा चुका है। हाल ही में 14 मंत्रियों के सामने आरती उतारकर सद्बुद्धि की प्रार्थना भी की गई।
इधर, पुलिस कार्रवाई भी कम नहीं रही। कई बार झड़प, अब तक 90 से ज्यादा अभ्यर्थियों की गिरफ्तारी, और झूठे मामलों में फंसाने के आरोप माहौल को और गरमा रहे हैं। तेज गर्मी में भी सैकड़ों अभ्यर्थी धरने पर बैठे हुए हैं। यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जब तक भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं होती, धरना जारी रहेगा। गेंद अब सरकार के पाले में है। देखना है आगे क्या होता है।
निजी स्कूलों में सब ठीक चल रहा?
शराब माफिया, रेत माफिया, कोल माफिया की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी माफिया होते हैं। कानूनन शिक्षा को सेवा के रूप में संचालित किया जा सकता है, लेकिन है तो यह एक संगठित कारोबार । छत्तीसगढ़ हो या कोई दूसरा राज्य, ऐसे उदाहरण मिलेंगे जब निजी स्कूल अपनी मनमानी करती हैं। किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी चुनिंदा चिन्हित दुकानों से खरीदने के लिए विवश किया जाता है। मध्यप्रदेश में इंदौर के कलेक्टर ने ऐसे मामलों में जो सख्ती दिखाई है, वह दूसरे राज्यों के लिए भी नजीर है। वहां शिकायतें मिलीं तो तीन-चार स्कूलों के प्राचार्यों, संचालकों और स्टेशनरी दुकानदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई। एफआईआर दर्ज कराने अभिभावकों को बच्चों के साथ थाने भेजा गया। रात दो बजे भी एफआईआर कराई गई। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ज्यादातर कानून एक समान है। हमारे यहां अशासकीय विद्यालय फीस विनियमन अधिनियम, 2020 लागू किया है। हाल ही में हाईकोर्ट ने इस कानून को संवैधानिक करार देते हुए सरकार के फीस नियंत्रण के अधिकार को वैध भी ठहरा दिया है।
शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के पास वही शक्ति है, जो मध्यप्रदेश में इंदौर या किसी अन्य जिले के कलेक्टर के पास है। जैसे-फीस में 8 फीसदी से ज्यादा वृद्धि नहीं की जा सकती। जो फीस बढ़ाई जाएगी उसका अनुमोदन जिला फीस निर्धारण समिति से कराना होगा, जिसमें अभिभावक भी सदस्य होते हैं। डीईओ को स्कूलों का नियमित निरीक्षण करना जरूरी है और शिकायतों की रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपना है। अनियमितता पाए जाने पर मान्यता रद्द करने, जुर्माना लगाने का अधिकार तो अधिनियम देता ही है, जिला फीस समिति के पास सिविल कोर्ट जैसे अधिकार भी होते हैं। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग भी बच्चों के मामले में संज्ञान लेने का अधिकार रखता है। कानून बहुत से हैं, जरूरी है कि शिक्षा विभाग और सरकार मनमानी को काबू में करने की इच्छा रखे। कुछ जिलों में कलेक्टर ऐसे मामलों में रुचि लेते हैं और कार्रवाई करते हैं। पर फिलहाल इंदौर में जैसा हुआ, छत्तीसगढ़ में कहीं, किसे जिले में दिखा नहीं। क्या यह मान लिया जाए कि निजी स्कूलों से अभिभावकों और बच्चों को कोई शिकायत ही नहीं है?
अजन्मे बच्चे की हिफाजत के लिए..
एक शौकिया वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर सामान्य तौर पर मैदान में पक्षियों की तलाश में आगे बढ़ रहा था। उसकी नजऱ जमीन पर नहीं थी, कदम अपने आप बढ़ते जा रहे थे। तभी अचानक टीं-टीं-टीं की तेज, बेचैन आवाज ने उसे रोक दिया। उसने नीचे देखा तोकुछ ही दूरी पर एक टिटिहरी अपने अंडों पर डटी बैठी थी।
उस क्षण वह खतरे को भांप चुकी थी, पर उडक़र खुद को बचाने के बजाय अपने अंडों की रक्षा में अडिग थी। वह घबराई तो थी पर भागी नहीं। बल्कि चीख रही थी कि यहां से दूर रहो। अकेली होती तो वह कब की उड़ चुकी होती, लेकिन मां थी। इस दुनिया में आने वाले बच्चों की रखवाली कर रही थी। ममता के लिए साहस और समर्पण भी जरूरी होता है। फोटो नरेंद्र वर्मा ने मोहनभाठा इलाके से ली है।
बचे हुए, बिखरे हुए, कितना खतरा?
प्रदेश में 27 सौ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किए हैं। इनमें नक्सल नेता भी शामिल हैं। सरकार नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा कर चुकी है। नक्सल प्रभावित इलाकों में फिलहाल शांति का माहौल है, लेकिन सुरक्षा बल अब भी अलर्ट मोड में हैं।
अंदाजा लगाया जा रहा है कि करीब 5 सौ से अधिक नक्सली सुरक्षा बलों के दबाव के चलते देश के अलग-अलग शहरों में चले गए हैं और सामान्य जीवन में काम-धंधे से जुड़ गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि ये नक्सली देर-सबेर फिर सक्रिय हो सकते हैं। हालांकि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने समर्पण किया है और भारी मात्रा में हथियार व नगदी भी बरामद हुई है, लेकिन यह शंका भी जताई जा रही है कि काफी हथियार और नगदी अब भी जंगलों में छिपाकर रखी गई हो सकती है। राजनांदगांव इलाके में कुछ आत्मसमर्पित नक्सलियों से पुलिस ने पूछताछ की है, लेकिन अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाया है। पुलिस लगातार सर्चिंग अभियान चला रही है, हालांकि अभी तक कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है। नक्सलवाद के खात्मे के दावों के बावजूद प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती फिलहाल यथावत रखी जाएगी। अब देखना यह है कि आगे स्थिति किस दिशा में जाती है।
सूची आई, राजनीति गरमाई
शहर जिला कांग्रेस के वार्ड अध्यक्षों की सूची आखिरकार जारी हो गई, लेकिन इसके साथ ही संगठन के भीतर नई खींचतान भी खुलकर सामने आ गई है। पहले शहर जिलाध्यक्ष श्रीकुमार मेनन की जारी सूची को पीसीसी ने खारिज कर दिया था। बाद में संशोधन कर नई सूची जारी की गई, जिसमें आठ नाम बदले गए। इन बदलावों को लेकर पार्टी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कहा जा रहा है कि कुछ स्थानीय नेताओं के दबाव में फेरबदल हुआ, जो इन दिनों पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज के करीबी माने जा रहे हैं। नई सूची में अजीत कुकरेजा, सुबोध हरितवाल और एजाज ढेबर की पसंद को जगह मिलने की भी चर्चा है। कुकरेजा तो दो वार्डों में अपनी पसंद के अध्यक्ष बनवाने में सफल बताए जा रहे हैं।
विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन दावेदार नेता अभी से अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। वार्ड अध्यक्षों की नियुक्ति उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है। हालांकि सूची जारी हो गई है, लेकिन नामों के फेरबदल से स्थानीय नेताओं के बीच असंतोष बढ़ गया है।
मामला अब प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट तक पहुंच गया है। उनके रायपुर दौरे के दौरान कुछ नेता सीधे मुलाकात कर अपनी नाराजगी जताने की तैयारी में हैं। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
टाइटैनिक त्रासदी से जुड़ी एक स्मृति
14-15 अप्रैल 1912 की रात दुनिया का सबसे भव्य जहाज आरएमएस टाइटैनिक अटलांटिक महासागर में समा गया। उस त्रासदी के साथ छत्तीसगढ़ के जांजगीर का भी एक भावनात्मक अध्याय जुड़ गया।
सन् 1906 में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया से भारत आईं एनी क्लेमर फंक उस दौर में जांजगीर पहुंचीं, जब लड़कियों की शिक्षा लगभग असंभव मानी जाती थी। 1907 में उन्होंने भीमा तालाब के पास एक किराए के कमरे में सिर्फ 17-18 बच्चियों के साथ स्कूल शुरू किया। वे घर-घर जाकर परिवारों को समझातीं और कहती थी, बेटियों को पढ़ाना जरूरी है। उनके इस प्रयास से जांजगीर में महिला शिक्षा की नींव पड़ी।
फरवरी 1912 में उन्हें एक टेलीग्राम मिला। उनकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं। वे नैला से मुंबई और फिर इंग्लैंड पहुंचीं। कोयला मजदूरों की हड़ताल के कारण उनका पहला जहाज रद्द हो गया। जल्द घर पहुंचने की बेचैनी में उन्होंने 13 पाउंड अतिरिक्त देकर टाइटैनिक का सेकेंड क्लास टिकट खरीदा। उस टिकट का नंबर 237671। हादसे के दो दिन पहले 12 अप्रैल 1912 को उन्होंने जहाज पर अपना 38वां जन्मदिन मनाया और 14–15 अप्रैल की रात जहाज हिमखंड से टकरा गया। कहा जाता है कि अफरा-तफरी के बीच उन्हें एक लाइफबोट में जगह मिल गई थी। मगर, उन्होंने एक मां को अपने बच्चों के लिए रोते देखा। उन्होंने बिना एक पल सोचे अपनी सीट उस महिला को दे दी और खुद पीछे हट गईं। और कुछ ही घंटों बाद जहाज के साथ समुद्र में समा गईं। उनका शव कभी नहीं मिला।
उनकी स्मृति में 1918 में जांजगीर में फंक मेमोरियल स्कूल का निर्माण किया गया। मिशन कंपाउंड में आज भी इसके अवशेष और शिलालेख मौजूद हैं। एनी फंक की कहानी हर पढ़ी-लिखी बेटी की मुस्कान है।
सोशल मीडिया ने लोगों को बड़ा कल्पनाशील बना दिया है।
नाम छूट गया था...
कल सोमवार को इसी कॉलम में बाटा जूते-चप्पल पर 99 पैसों तक के रेट वाली सामग्री प्रदेश के वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी की लिखी हुई थी। उनका नाम गलती से छूट गया था।
-संपादक
मुसीबत- फेल हो तो शादी, पास हो तब भी
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 10वीं बोर्ड परीक्षा में 3 लाख 23 हजार से अधिक विद्यार्थी शामिल हुए। अब उत्तर पुस्तिकाओं की जांच चल रही है और रिजल्ट का इंतजार किया जा रहा है। उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के दौरान पता चल रहा है कि जो लोग अपने उत्तीर्ण होने को लेकर सशंकित हैं, उन्होंने जवाब की जगह और भी कुछ-कुछ लिख डाला है। एक ने पूरी हनुमान चालीसा लिख डाली। किसी ने लिखा कि मुझे उत्तीर्ण कर दो तो 33 करोड़ देवी देवताओं का आपको आशीर्वाद मिलेगा।
मगर, कुछ मार्मिक पंक्तियां भी देखने को मिली हैं, मार्मिक ही नहीं हमारे सामाजिक विडंबना का आईना भी है। कॉपी जांचने वाले शिक्षकों की मानें तो एक छात्रा ने लिखा कि इस बोर्ड एग्जाम के तुरंत बाद मेरी शादी होने वाली है, आशीर्वाद स्वरूप मुझे पास कर दीजिए। इसके विपरीत, दूसरी छात्रा ने लिखा है कि सर, मुझे पास कर दीजिए, केवल पासिंग मार्क्स, 33 फीसदी। वरना घर वाले मेरी शादी कर देंगे। उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में शादी ही कॉमन फैक्टर है। मगर, परिस्थितियां अलग-अलग हैं। पहली छात्रा मान चुकी है कि उसे 10वीं के बाद शादी करनी है। वह शादी करने के लिए उत्सुक है, बस अपने साथ वह 10वीं पास का मेडल रखना चाहती है। वह खुशी-खुशी शादी के लिए राजी है या माता-पिता का दबाव है यह साफ नहीं है। दूसरी छात्रा शादी के नाम से डर रही है। उसे लग रहा है कि यदि वह पास नहीं हुई तो उसे बस शादी के काबिल समझा जाएगा, आगे पढऩे के लायक नहीं। लगता है, यही है हमारे समाज का वातावरण। 10वीं बोर्ड में पास या फेल होना अंतिम सत्य नहीं है। उच्च शिक्षा और कौशल से भविष्य बनाने के लिए यह नाकाफी है। फेल होने वालों को भी अवसर मिलता रहता है, पर माता-पिता पहले से तय कर लेते हैं कि बच्चियों के सारे सपने एक किनारे रखो, शादी कर दो और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाओ। पिछले कुछ समय से एग्जाम फियर से बचाने के लिए बच्चों की काउंसलिंग की जाती है, हेल्पलाइन नंबर जारी किए जाते हैं। शायद यह जरूरी है कि इसमें अभिभावकों को भी जोडऩा चाहिए। उनसे पूछा जाए कि दसवीं में बेटी या बेटा, फेल हो या पास, उसके लिए आपने क्या सोच रखा है?
नाम में क्या रखा है...

महान साहित्यकार विलियम शेक्सपियर की प्रसिद्ध उक्ति कि नाम में क्या रखा है...हमेशा चर्चा में रही है। सामान्य धारणा यही है कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके गुणों और कर्मों से होती है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में नाम और उसके उच्चारण की अपनी अहमियत भी सामने आ जाती है।
ऐसे ही नाम को लेकर नितिन नबीन इन दिनों चर्चा में हैं। उच्चारण और लिखावट की सहजता को ध्यान में रखते हुए अब वे नितिन नबीन की जगह ‘नितिन नवीन’ कहलाने लगे हैं।
बताते हैं कि भाजपा मुख्यालय से राज्यों के मीडिया सेल को निर्देश दिए गए हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के उपनाम ‘नबीन’ के स्थान पर ‘नवीन’ लिखा जाए।
नवीन, राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं और फिलहाल भी यह जिम्मेदारी उनके पास है। वे लंबे समय तक अपने नाम के साथ ‘नबीन’ ही लिखते आए हैं। दरअसल, बिहार और भोजपुरी में ‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग का चलन है, जिसके चलते ‘नवीन’ का उच्चारण ‘नबीन’ के रूप में प्रचलित रहा।
जब वे छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी सचिव बने, तब यहां मीडिया में उन्हें ‘नितिन नवीन’ लिखा जाने लगा था। बाद में पार्टी के मीडिया सेल ने स्पष्ट किया कि वे स्वयं ‘नबीन’ लिखते हैं। अब राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता और दिल्ली की बोलचाल की सहजता को देखते हुए ‘नवीन’ लिखने की शुरुआत हो गई है।
वीआरएस रोकने नई पहल ....

चर्चा है कि भविष्य में आयकर अधिकारियों खासकर आईआरएस अफसरों को एक सामान्य प्रचलित प्रक्रिया के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) नहीं मिलने वाली।
सरकार बिना उचित जांच-पड़ताल के किसी भी वीआरएस आवेदन को मंजूरी नहीं देगी। इस जांच में अफसर की सेवा अवधि भी शामिल होगी। बताया जा रहा है कि आयकर विभाग को औसतन हर साल वीआरएस के 20आवेदन मिलते हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि अब सरकार द्वारा ऐसे आवेदन की मंजूरी दिए जाने की संभावना कम ही है।
हम इस कालम में पहले भी बताते रहे हैं आयकर विभाग में वीआरएस की संख्या बढ़ती जा रही है। खासकर बीते एक दशक में अधिक ही रहा है। साल 2014 से 25 तक कुल 853 आईआरएस ने वीआरएस लिया था। इसके पीछे इस सर्विस का अब हाईप्रोफाइल न होने के साथ फेसलेस इंक्वायरी, सर्वे और रेड में लोकल कमिश्नरी के बजाय दूसरे सर्किल को जिम्मेदारी आदि आदि। इसका असर इंस्पेक्टर राज की समाप्ति पर भी पड़ा है। वीआरएस की बढ़ती संख्या को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने गृह मंत्रालय को इंटर डिपार्टमेंटल नोट भेजा है कि अब डीआरआई की तरह सीबीआई, ईडी में भी आईआरएस अफसरों की नियुक्ति की जाए। चूंकि इन एजेंसियों का भी समकक्ष काम है ऐसे में इन्फोर्समेंट में मदद भी मिलेगा। और जांच की क्वालिटी में भी पुलिसिया नजर के इतर सुधार आएगा। अब देखना होगा कि गृह मंत्रालय इस पर क्या और कब निर्णय लेता है।
99 पैसे वाली कहानी

बाटा एक ऐसा नाम है जिसने भारत में जूतों की दुनिया को एक अलग पहचान दी। बाटा ने भारत में 1931 में कदम रखा था। उस समय इसका नाम क्चस्ष्ट बाटा शू कम्पनी था, जो बाद में 1973 में बदलकर केवल बाटा रह गया। धीरे-धीरे यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया कि जूते का मतलब ही बहुत लोगों के लिए बाटा हो गया।
बाटा की पहचान दो बातों के कारण सबसे ज्यादा बनी, पहली उसकी बेजोड़ मजबूती और दूसरी उसकी अनोखी कीमत।
उस दौर के लोग बताते हैं कि बाटा का जूता पहनते-पहनते आदमी बोर हो जाता था, लेकिन जूता न टूटता था और न ही जल्दी खराब होता था। आज की तरह ‘सीजनल फैशन’ नहीं था। एक बार जूता खरीद लिया तो सालों तक साथ निभाता था। घर में जब नया जूता खरीदने की बात आती तो बुजुर्ग अक्सर कहते थे, बाटा ले लो, टिकाऊ रहेगा।
अब बात करते हैं उसकी कीमत की, जो अपने आप में एक अलग कहानी है।
मुझे आज भी 80 के दशक की वह बात याद है। उस समय हवाई चप्पल—जिसे हमारे छत्तीसगढ़ के गांवों में प्यार से ‘चट्टी’ कहा जाता है, की कीमत होती थी 12 रुपये 99 पैसे। चप्पल पहनकर चलने पर पैर से चट-चट की आवाज आती थी, इसलिए गांव में उसका नाम ही चट्टी पड़ गया।
दूसरे जूतों की कीमत होती थी 44 रुपये 99 पैसे। लोग बड़े आश्चर्य से पूछते थे, भाई, ये 99 पैसे का क्या चक्कर है ? सीधे-सीधे 13 रुपये या 45 रुपये क्यों नहीं रखते?
लेकिन बाटा की यही शैली थी। दुकान से जूता खरीदते समय बिल भी ठीक 12 रुपये 99 पैसे का बनता था। यदि ग्राहक 13 रुपये देता तो दुकानदार बाकायदा एक नया पैसा वापस भी करता था। उस समय वह एक पैसा भी बड़ी कीमत रखता था।
वैसे उस दौर में बाजार में विकल्प भी बहुत कम थे। बाटा और करोना के अलावा हवाई चप्पल की ज्यादा कंपनियां दिखाई नहीं देती थीं। गांवों में अक्सर शिक्षक, पटवारी और ग्राम सेवक जैसे सरकारी कर्मचारी ही बाटा की हवाई चप्पल पहनते दिखते थे, क्योंकि उस समय बारह रुपये भी कम रकम नहीं मानी जाती थी। आज जमाना बदल गया है। बाजार में दर्जनों कंपनियां हैं और हवाई चप्पल तो अब फुटपाथ तक पर मिल जाती है। लेकिन उस दौर के लोगों के लिए बाटा सिर्फ एक जूता नहीं, भरोसे का नाम था। ऐसा जूता जो सालों साथ निभाए, और ऐसी कीमत जो 99 पैसे के साथ भी लोगों की यादों में बस जाए।
सच कहें तो मजबूती और कीमत की यह छोटी-सी ‘99 पैसे वाली कहानी’ ही बाटा को उस समय की यादों में आज भी जिंदा रखे हुए है।
फ्री बीज़ पर बेअसर अदालतों की फटकार
जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, महिलाओं और युवाओं के लिए जिस तरह नगद हस्तांतरण या एकमुश्त आर्थिक मदद की बड़ी-बड़ी घोषणा की जा रही है, उससे लगता है कि छत्तीसगढ़ इन सबसे पीछे रह गया है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने सामान्य श्रेणी की महिलाओं के लिए हर माह 1500 रुपये और एससी एसटी वर्ग की महिलाओं को 1700 रुपये देने का ऐलान किया है। बंगालर युवा साथी योजना के तहत 21 से 40 साल के युवाओं को 1500 रुपये देने की घोषणा की गई है। भाजपा, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह पश्चिम बंगाल में टीएमसी को कड़ी टक्कर दे रही है, हर वयस्क महिला तथा बेरोजगार युवाओं के खाते में हर माह 3000 रुपये देने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस ने भी 2000 रुपये देने की घोषणा कर रखी है।
तमिलनाडु में डीएमके ने महिलाओं को दी जा रही मौजूदा राशि 1000 रुपये को बढ़ाकर 2000 रुपये करने की घोषणा की है। एक इल्लाथरासी कूपन जारी किया जा रहा है। इससे गृहणियां 8000 रुपये के घरेलू उपकरण खरीद सकती हैं। चुनाव से पहले यहां 1.31 करोड़ महिलाओं के खाते में 5000 रुपये ट्रांसफर किए गए हैं। यह रकम तीन महीने का एडवांस है और 2000 रुपये का विशेष पैकेज है। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू-भाजपा गठबंधन के लिए इसी तरह का एकमुश्त ट्रांसफर ट्रंप कार्ड बना था।
असम में महिलाओं को अरुनोदोई योजना 1250 रुपये की मदद पहुंचाती है। इसे एनडीए ने सत्ता में लौटने पर 3000 रुपये करने की घोषणा की है। महिला उद्यमिता योजना के तहत प्रत्येक महिला के लिए एक बड़ी रकम 72 हजार 500 रुपये देने का ऐलान किया गया है। कांग्रेस ने भी मासिक नगद के अलावा व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रत्येक महिला को 50 हजार रुपये देने का ऐलान किया है। एक अलग गारंटी में 25 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा शामिल है।
केरल में दोनों प्रमुख गठबंधन बराबरी पर हैं। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ने 60 लाख से अधिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन धारियों को 2000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करने का ऐलान किया है। एनडीए ने यहां 70 प्लस के वरिष्ठ नागरिकों को हर माह 3000 रुपये देने का ऐलान किया है। महिलाओं को 2500 रुपये प्रतिमाह और हर साल दो फ्री एलपीजी सिलेंडर भी दिए जाएंगे। फ्री-फ्री की घोषणा चुनाव से पहले थमने का नाम नहीं ले रही है, जिनकी सरकार है वह आचार संहिता लगने के ठीक पहले मोटी रकम मतदाताओं के खाते में डाल रही हैं।
इधर, मुंबई हाईकोर्ट ने दो दिन पहले महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई। कहा कि यदि वह अपने कर्मचारियों को पेंशन नहीं दे सकती, तो माझी लडक़ी बहन स्कीम को रोक देना चाहिए। बीएमसी की एक रिटायर्ड महिला कर्मचारी की याचिका पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी, जिसे 7वें पे कमीशन के हिसाब से पेंशन का भुगतान नहीं किया जा रहा है। सरकार ने वित्तीय स्थिति का हवाला दिया तो कोर्ट ने कहा- सरकार का पहला दायित्व अपने कर्मचारियों को उनके हक की राशि देना है। महाराष्ट्र में नगद हस्तांतरण का बजट 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है।
वैसे, छत्तीसगढ़ में भी आकार व बजट के हिसाब से राशि कम नहीं है। यहां इस योजना में 8200 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद कि केवाईसी के बाद सैकड़ों नाम काटे गए और दूसरी पेंशन योजनाओं का लाभ लेने वालों को कम भुगतान किया जा रहा है या नहीं किया जा रहा है।
केंद्रीय बजट के दौरान पेश किए जाने वाले आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्यों द्वारा फ्रीबीज और नकद हस्तांतरण पर कुल खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच रहा है। राज्यों का मिला-जुला राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.2 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और कर्ज 28 प्रतिशत के करीब। ऐसी योजनाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि पैसे कहां से जुटाएंगे, पता नहीं होता। इसका असर विकास की योजनाओं पर तो पड़ता ही है, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं पर भी दिखता है।
सुप्रीम कोर्ट में भी फ्री बीज़ को लेकर सुनवाई हो ही रही है। फरवरी 2026 में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि भारी राजस्व घाटे के बावजूद राज्य अपीलमेंट पॉलिसी चला रहे हैं। क्या राज्य रोजगार सृजन, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्कूल हॉस्पिटल बनाने के बजाय मुफ्त राशन, नगद, मुफ्त बिजली बांटने में लगे रहेंगे? कोर्ट ने राज्यों से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने पूछा है कि विकास के लिए पैसा कहां से आएगा, केवल जरूरतमंदों के लिए स्कीम क्यों नहीं चलाई जाती? राज्यों का जवाब आना बाकी है। राज्यों की वित्तीय स्थिति चरमरा रही है, बड़ी-बड़ी अदालतें इस पर चिंता जताकर फटकार लगा रही है, मगर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों को और कोई जरिया दिखाई नहीं दे रहा है।
आरटीआई के बाद अब क्यूआर कोड
सरकार ने गांवों में विकास कार्यों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए पंचायत स्तर पर क्यूआर कोड लगाने की पहल की है। इन क्यूआर कोड को स्कैन कर मनरेगा के पिछले पांच वर्षों में हुए कार्यों की पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। बीते छह महीनों में करीब पांच लाख लोगों ने इन क्यूआर कोड का उपयोग कर अपनी पंचायतों में हुए कार्यों की जानकारी ली है।
क्यूआर कोड लागू होने के बाद विकास कार्यों को लेकर शिकायतों में उल्लेखनीय कमी आई है। पहले आरटीई के तहत पंचायतों में सबसे अधिक जानकारी विकास कार्यों को लेकर मांगी जाती थी, लेकिन अब इसमें गिरावट देखी जा रही है। इस पहल की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी हो रही है।
हालांकि, इस व्यवस्था के बाद कुछ नए विवाद भी सामने आए हैं। कई पंचायतों में एक ही कार्य को मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत दिखाए जाने के मामले उजागर हुए हैं, जिससे अनियमितताओं की आशंका बढ़ी है। जनपद स्तर पर अब पूर्व सरपंचों के खिलाफ शिकायतें सामने आ रही हैं। गड़े मुर्दे उखड़ रहे हैं। दर्जनों पंचायतों में मनरेगा कार्यों में अनियमितता की शिकायतों पर कार्रवाई की मांग हुई है।
इसी बीच डीएमएफ के कार्यों की जानकारी के लिए भी क्यूआर कोड लगाने की मांग उठने लगी है। पिछली सरकार के दौरान डीएमएफ मद में खर्च को लेकर गड़बडिय़ों के आरोप लगे थे, जिसकी जांच केंद्र और राज्य स्तर की एजेंसियां कर रही हैं। अब देखना है कि आगे इस दिशा में क्या कदम उठाए जाते हैं।
फ्लाइओवर का विरोध ही विरोध
राजधानी रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक तक प्रस्तावित फ्लाईओवर योजना का विरोध तेज होता जा रहा है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और रायपुर के चारों विधायक पहले ही इस योजना के खिलाफ हैं, अब नगर निगम के पार्षद भी मुखर हो गए हैं।
चर्चा है कि भाजपा के करीब 40 पार्षदों ने फ्लाईओवर के बजाय सडक़ चौड़ीकरण के पुराने प्रस्ताव को लागू करने का सुझाव दिया है। इस सिलसिले उन्होंने मेयर मीनल चौबे से चर्चा की मांग भी की है।
इस मार्ग पर फ्लाईओवर बनाने की घोषणा आम बजट में की गई थी, जिसके लिए 10 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया था। पार्टी के भीतर ही विरोध के चलते अब इस योजना के क्रियान्वयन पर संशय की स्थिति है।
इस परियोजना की लागत पिछले 16 वर्षों में चार गुना तक बढ़ चुकी है। वर्ष 2008 के आसपास मुआवजा और चौड़ीकरण के लिए लगभग 40 करोड़ रुपए का अनुमान था, जो पिछले वर्ष बढक़र 137 करोड़ रुपए हो गया। वर्तमान में गाइडलाइन रेट बढऩे के कारण चौड़ीकरण या फ्लाईओवर, दोनों ही विकल्पों पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
चर्चा है कि फ्लाईओवर के निर्णय में बदलाव की संभावना भी जताई जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इसी मार्ग पर आगे स्काईवॉक का निर्माण जारी है। ऐसे में फ्लाईओवर बनने पर यातायात व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। अब अंतिम निर्णय क्या होता है, इस पर नजर बनी हुई है।
ऐसा एक सरकारी स्कूल
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर बनी नकारात्मक धारणाओं के बीच बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड स्थित एक शासकीय हाई स्कूल का अनुभव अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहां प्राचार्य के नेतृत्व में शिक्षकों के सामूहिक प्रयास ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद नवाचार और समर्पण से शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है। विद्यालय में प्रवेश द्वार से लेकर कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और अन्य कमरों तक दीवारों को शिक्षण सामग्री के रूप में उपयोग किया गया है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति, तीज-त्योहार, व्यंजन, खेल, लोककला और दर्शनीय स्थलों से जुड़े चित्र और जानकारी इस तरह प्रदर्शित हैं कि विद्यार्थी निरंतर उनसे सीखते रहें। विज्ञान प्रयोगशालाओं में प्रमुख वैज्ञानिकों के चित्र और उनके योगदान को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, वहीं पर्यावरण जैसे विषयों को रोचक तरीके से समझाने के लिए सांप-सीढ़ी जैसे माध्यम अपनाए गए हैं।
बैज से खफा कई जिला अध्यक्ष
प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अधिकांश जिला अध्यक्षों में प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के प्रति नाराजगी बढ़ती दिख रही है। इसकी मुख्य वजह संगठनात्मक नियुक्तियों का क्रम माना जा रहा है।
दरअसल, प्रदेश नेतृत्व ने जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले ही ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी थी। अब हालात यह हैं कि कई ब्लॉक अध्यक्ष स्वतंत्र तरीके से काम कर रहे हैं और जिला अध्यक्षों के निर्देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं। इसका सीधा असर संगठन की सक्रियता और समन्वय पर पड़ रहा है।
बताते हैं कि हाल ही में हुई जिला अध्यक्षों की बैठक में एक अध्यक्ष ने खुले तौर पर ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर प्रदेश अध्यक्ष को आड़े हाथों लिया। इतना ही नहीं, रायपुर शहर जिला अध्यक्ष द्वारा तैयार की गई वार्ड अध्यक्षों की सूची को भी प्रदेश स्तर पर निरस्त कर दिया गया, जिससे असंतोष और गहरा गया है।
मौजूदा स्थिति में कई जिला अध्यक्ष सीधे तौर पर प्रदेश नेतृत्व को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। चूंकि प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्ति की ओर है, इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रभाव भी सीमित माना जा रहा है। दूसरी तरफ , चयन प्रक्रिया से गुजरकर आए नए जिला अध्यक्ष खुद को पहले से अधिक सशक्त महसूस कर रहे हैं।
कहा जा रहा है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो असंतुष्ट जिला अध्यक्ष प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा भी खोल सकते हैं। पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के चुनावी व्यस्तता खत्म होने के बाद प्रदेश कांग्रेस का यह आंतरिक विवाद खुलकर सामने आ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
ताकि नाम शर्मिंदगी की वजह न बने...
स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों पर भर्ती, बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा के स्तर या गुणवत्ता में सुधार करना किसी भी राज्य की सरकार के लिए आसान नहीं है। इसलिये दूसरी तरफ ध्यान खींचने वाली घोषणाएं होती रहती हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प खबर राजस्थान से है। यहां सार्थक नाम अभियान मुहिम शुरू की गई है। उद्देश्य यह है कि बच्चों के ऐसे नाम बदल दिए जाएं, जो स्कूल या बाहर उनकी शर्मिंदगी, चिढ़ाने और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं। विभाग के मंत्री का कहना है कि रीति रिवाज, अंधविश्वास या अनजाने में माता-पिता कई बार बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं, जिसकी शर्मिंदगी बच्चों को जीवन भर भोगनी पड़ती है। इसलिए प्राइमरी स्कूल में उनका कोई अच्छा सा नाम बदलकर रख दिया जाए। विभाग ने ऐसे 3000 अच्छे नामों की सूची भी बनाई है। माता-पिता अपनी पसंद का नाम चुन सकते हैं।हां, यह काम दबाव में नहीं होना है, बल्कि स्वैच्छिक है। यह स्थिति छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों में है। लेकिन कुछ सवाल भी उठते हैं, जैसे बच्चे की गरिमा का असली आधार नाम नहीं, बल्कि स्कूल का माहौल, शिक्षक का व्यवहार और साथियों का सम्मान है। अगर स्कूल में शिक्षक ही बच्चे को उसके नाम से नहीं, बल्कि जाति-गांव-आर्थिक स्थिति से जोडक़र बुलाते हों, तो नाम बदलने से क्या फर्क पड़ेगा? बहुत से बच्चे कक्षा 5 तक पहुंचकर भी बुनियादी पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाते।
राजस्थान का जिक्र यहां इसलिये हो रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। वहां के शिक्षा मंत्री की एक दूसरी घोषणा भी है। उन्होंने कहा कि स्कूलों और विभाग के दफ्तरों में उन कर्मचारियों की पहचान करने के लिए एक अलग सूची तैयार की जाएगी, जो नशीले पदार्थों, गुटखा जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं या धूम्रपान में लिप्त होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को नशे की लत से उबरने में मदद करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि ये आदतें छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव न डालें। ऐसे अभियान की जरूरत तो छत्तीसगढ़ में भी है।
डीजीपी और सुप्रीम कोर्ट

देश में कार्यवाहक डीजीपी की परंपरा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च को अहम निर्देश जारी किए थे। यह निर्देश पुलिस सुधार से जुड़े प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार (2006) के तहत दिए गए, जिनका उद्देश्य पुलिस नेतृत्व में पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने राज्यों और यूपीएससी को दो सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। हालांकि एक माह बीतने के बाद भी छत्तीसगढ़ समेत दर्जन भर राज्यों में इसका पालन नहीं हो सका है। तेलंगाना, बिहार, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। तमिलनाडु में जरूर चुनाव आयोग ने चुनावी दृष्टिकोण से अस्थायी नियुक्ति की है, लेकिन अन्य राज्यों में अब भी अनिश्चितता कायम है।
छत्तीसगढ़ में लंबी प्रक्रिया और कई स्तर की आपत्तियों के बाद दो नामों को शॉर्टलिस्ट किया हैं उनमें कार्यवाहक डीजीपी अरुण देव गौतम और डीजी (जेल) हिमांशु गुप्ता हैं। पंजाब ने अपने कार्यवाहक डीजीपी गौरव यादव सहित डीजी और एडीजी स्तर के कुल 14 आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेज दिए हैं।
हल्ला है कि प्रदेश में एक प्रभावशाली मंत्री की अलग पसंद भी इस नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है, जबकि सरकार फिलहाल मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के पक्ष में नहीं दिख रही है। संकेत हैं कि नियमित डीजीपी की नियुक्ति अब 4 मई को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद ही संभव हो पाएगी।
फिलहाल केंद्र और राज्य दोनों ही चुनावी व्यस्तताओं में उलझे हुए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद डीजीपी नियुक्ति को लेकर स्थिति ‘ढाक के तीन पात’ जैसी बनी हुई है।
देवतुल्य की कविता
पार्टी ने 4 दिन पहले ही अपना 47वां स्थापना दिवस मनाया। उससे पहले पार्टी के बड़े छोटे नेताओं ने मंडल बूथ स्तर तक प्रशिक्षण अभियान चलाया। इसमें सभी ने पार्टी के उदय से लेकर अब तक का इतिहास बता कार्यकर्ताओं की मेहनत संघर्ष के कसीदे पढ़े। एक वरिष्ठ ने कहा सांसद विधायक मंत्री हमें कार्यकर्ता ही बनाते हैं। इससे भी आगे पार्टी कार्यकर्ताओं को पहले से ही देवतुल्य की संज्ञा दे चुकी है। इन चार दशकों में पार्टी ने कई उतार चढ़ाव भी देखे हैं। इस दौरान देवतुल्य वरिष्ठों के लिए मार्गदर्शक मंडल बना दिया गया और दूसरे दलों के पलायन कर्ताओं को मंच पर स्थान। अब ऐसे ही लोग देवतुल्यों को पार्टी की नैतिकता पढ़ा रहे। एक प्रशिक्षण वर्ग के दौरान राजधानी जिले के एक विधायक ने मंच से माइक पर कार्यकर्ताओं को क्या कुछ नहीं कहा। उन्हें गद्दार तक कहने से नहीं चूके। बात दूर तलक गई तो मीडिया पर ही आरोप लगाकर पल्ला झाड़ लिया कि तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। लेकिन विधायक के बिगड़े बोल से आहत पार्टी के एक ‘देवतुल्य’ ने एक कविता ही लिख डाली और कहा इस कविता का अवलोकन करिए और समय का इंतजार करिए....?
ख़ासा मुश्किल बंगाल
चुनावी ड्यूटी पर प्रदेश के करीब दर्जन भर आईएएस और आईपीएस अफसर इन दिनों पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु में पर्यवेक्षक बनकर तैनात हैं। इनमें से केरल, असम और तमिलनाडु में तैनात अफसर जहां आराम से और बेहतर माहौल में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में तैनात पर्यवेक्षकों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में ड्यूटी कर रहे अफसर एक तरह के दबाव में काम कर रहे हैं। इसकी बड़ी वजह राज्य सरकार और केंद्र के साथ-साथ चुनाव आयोग के बीच चल रही तनातनी को माना जा रहा है। चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास भी हालात को और ज्यादा संवेदनशील बना रहा है।
इस बार पहली बार अलग-अलग राज्यों से आए आईएएस अफसरों को जिले की बजाय विधानसभा-वार पर्यवेक्षक बनाया गया है। उनके साथ पुलिस और अन्य सेवाओं के अफसर भी तैनात हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर सुविधाओं की कमी और स्थानीय राजनीतिक दलों के दबाव की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
कुछ अफसरों का मानना है कि पश्चिम बंगाल जैसी परिस्थितियां उन्हें दूसरे राज्यों में कभी नहीं झेलनी पड़ीं, जबकि बाकी राज्यों में प्रशासनिक सहयोग और शांत माहौल के चलते ड्यूटी अपेक्षाकृत सुचारू ढंग से चल रही है।
दुर्घटनाओं का डरावना चेहरा
छत्तीसगढ़ में हर रोज कहीं न कहीं बस, ट्रक, कार या बाइक की टक्कर से परिवार उजड़ रहे हैं। कांकेर का उदाहरण सबसे ताजा है। नेशनल हाईवे-30 पर दो कारों की टक्कर हुई। एक ही परिवार के छह सदस्य मारे गए, तीन गंभीर घायल हुए। कुछ दिन पहले अंबिकापुर में एनएच 130 पर तेज स्कॉर्पियो ने बाजार से लौट रही तीन महिलाओं समेत चार लोगों को कुचल दिया। बालोद में 4 अप्रैल को दो अलग हादसों में दो मौतें हुईं। जशपुर में 6 मार्च को ब्रेक फेल होने से बस पलट गई, पांच लोगों की मौत हो गई। उसी दिन भाटापारा में ट्रक ने यात्री बस को टक्कर मारी, पांच मौतें हुईं।
कोरबा जिले की स्थिति तो बड़ी डरावनी है। पिछले तीन महीनों में यहां सडक़ हादसों में 110 लोगों की मौत हो चुकी है। बाइक सवारों की दुर्घटनाएं तो और अधिक हो रही हैं। 10 मार्च से लेकर अब तक रायगढ़, अंबिकापुर, बिलासपुर, कोरबा, कवर्धा और बलरामपुर-रामानुजगंज में कई हादसे हुए। एक जगह अज्ञात वाहन ने बाइक सवार को कुचला, दूसरी जगह बाइक ट्रक से टकराई। बिलासपुर में नशे में बाइक अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकराई। कोरबा में ट्रक ने तीन युवकों को कुचला, तीनों की मौके पर मौत हो गई। कवर्धा में हेलमेट पहने युवक की भी सिर की चोट से मौत हो गई। बलरामपुर में बाइक पुलिया के नीचे ही गिर गई और पीछे बैठी महिला की जान चली गई।
इन हादसों के एक नहीं कई कारण है। सबसे बड़ी समस्या तेज रफ्तार है। नशे में गाड़ी चलाना, ब्रेक फेल, खराब सडक़ें, गड्ढे, बिना हेलमेट पहने चलना, एक बाइक में तीन-चार लोगों का सवार होकर रफ्तार से चलना, ये सब मिलकर मौत को निमंत्रण देते हैं। सडक़ों पर किसान, मजदूर, युवा और महिलाएं सबकी जिंदगी दांव पर है।
अस्पतालों में घायलों की तादाद बढ़ रही है। ट्रैफिक पुलिस व परिवहन विभाग का सारा जोर टोल टैक्स और जुर्माने से राजस्व बढ़ाने पर है। पर, इसका दुर्घटनाओं के कम होने से सीधा संबंध है ही नहीं। एनएच पर पैट्रोलिंग की कमी है। स्टेट हाईवे पर तो बिल्कुल ही नहीं है। सीसीटीवी, स्पीड ट्रैकिंग कैमरे बहुत कम जगह लगे हैं। वाहनों की फिटनेस को लेकर कोई सख्ती ही नहीं है। ठीक तरह से चेकिंग हो तो हर चौराहे पर ऐसे मालवाहक ड्राइवर मिलेंगे, जिनके पास लाइसेंस ही नहीं हैं या फिर वे नशे में गाड़ी चला रहे हैं। खराब सडक़ें, संकेतकों का अभाव भी बड़े कारण है।
संलग्न तस्वीर कल हुई दुर्घटना की है। दुर्ग से दल्लीराजहरा जा रही बस स्टेयरिंग फेल होने के कारण खाई में गिर गई, जिसमें 20 से अधिक लोग घायल हो गए।
रफ्तार से मंज़ूरी
पखवाड़े भर पहले ही बजट सत्र में पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 26 को राज्यपाल के मुहर लगाए जाने की रफ़्तार पर विधानसभा से लेकर विधि विभाग तक सभी दांतों तले उंगली दबा रहे हैं। उन्हें लग रहा था कि कहीं किंतु परंतु लग कर क्वेरी हो सकती है?। पर ऐसा नहीं हुआ। वैसे 20 दिनों में महानदी भवन से लोक भवन तक यह सब हो चुका होगा। फिर दोनों ही क्यों तीनों भवन, विधानसभा भी तो ...। सभी प्रश्न हल कर लिए गए हैं।
पिछली बार 2008 के विधेयक पर 18-19 वर्ष बाद भी मुहर नहीं लग पाई और लोक भवन से वापस महानदी भवन भेज दिया गया। हालांकि नए विधेयक के लिए ऐसा करना संवैधानिक औपचारिकता थी। विधि के जानकार बताते हैं कि नए विधेयक में सरकार ने किसी तरह के परंतुक की भी गुंजाइश नहीं रख छोड़ी। कहा जा सकता है कि एक मुकम्मल है। मसलन धर्मांतरण की प्रक्रिया, कितने दिन पहले आवेदन, पुनर्विचार का अवसर, फिर अनुमति, ऐसा न होने पर सजा अर्थदंड, अंतर धर्म विवाह की स्थिति में प्रावधान आदि..आदि. 2008 के विधेयक में इन सबकी कमी थी। क्योंकि वो अविभाज्य मप्र के कानून का अनुपालन भर था। यह पूरी तरह से नया, मूल कानून कहलायेगा। ऐसे में बस इस नए कानून को लागू करने में समय समय पर आने वाली व्यवहारिक दिक्कतों को भर नियम बना कर सुधारा जा सकेगा। हालांकि हर ऐसे नए सुधार की सूचना सदन पटल पर सरकार को पेश करना होगा।
यह भी कहा जा रहा है कि खामियां निकालने वाले जुट गए हैं। वे इस पर स्टे के लिए कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। 2008 के कानून को भी सुप्रीम कोर्ट चुनौती दी गई थी। वह भी छत्तीसगढ़ के कानून को लेकर। इस पर कोर्ट ने 5 राज्यों से जानकारी मांगी थी। इस बार चुनौती के लिए काफी महीन अध्ययन करना होगा। वैसे पिछले ही दिनों सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरितों के डबल मुनाफे पर प्रश्न चिन्ह लगाया था। सो यह मुद्दा भी नहीं बन सकता। देखना होगा आगे क्या होता है।
बस्तर की रेल के लिए नया आश्वासन
छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल से अधिक बीत गए, लेकिन आज भी बस्तर जैसे अहम इलाके राजधानी रायपुर से रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ पाए हैं। इधर एक बार फिर रेल मंत्रालय ने घोषणा की है कि जगदलपुर रावघाट रेल लाइन के लिए डीपीआर तैयार हो गया है।
अभी तक सिर्फ घोषणाएं और अनुबंध होते रहे हैं, जमीन पर काम नहीं होता। कोरबा-अंबिकापुर रेल लाइन की भी यही हालत है। बस्तर और सरगुजा संभाग के लाखों लोग अभी भी बस, ट्रक या निजी वाहनों पर निर्भर हैं। यात्रा महंगी और समय लेने वाली हो जाती है।
रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन की मांग पुरानी है। 1995 में योजना आयोग ने दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक रेल मार्ग को मंजूरी दी थी। 1996-97 में पहला अनुबंध हुआ। 2007 में दूसरा अनुबंध। फिर 9 मई 2015 को दंतेवाड़ा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा में तीसरा अनुबंध हुआ। उस दिन सेल, एनएमडीसी, इरकान और सीएमडीसी ने मिलकर बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड (बीआरपीएल) बनाई। प्रधानमंत्री खुद मौजूद थे, पूरा बस्तर उत्साहित था। लेकिन आज 11 साल बाद भी एक इंच रेल नहीं बिछी।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव बार-बार आश्वासन देते हैं। बस्तरवासी लगातार आंदोलन करते रहते हैं। फिर भी काम शुरू नहीं हो पाता। अब रेलवे बोर्ड ने नया डीपीआर तैयार किया है। इस बार लागत बढक़र 3282.14 करोड़ रुपये हो गई है। दावा किया गया है इस लाइन को विद्युतीकरण के साथ बनाया जाएगा और ट्रेन 130 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ सकेगी। योजना खुश करती है, पर रेलवे बोर्ड ने इसे सिर्फ सैद्धांतिक मंजूरी दी है, बजट में कोई प्रावधान नहीं है, जबकि 3 साल में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
राज्य सरकार के अनुरोध पर अब रेलवे बोर्ड ने पूरा प्रोजेक्ट अपने हाथ में लेने का फैसला किया है। बीआरपीएल कंपनी में शेयर होल्डिंग, इरकान की भूमिका और सेल के बखेड़े ने सालों तक काम रोका। बीआरपीएल ने अलग से ठेकेदार से अनुबंध किया, लेकिन विवाद सुलझा नहीं। अगर यह लाइन बन गई तो बस्तर सीधे रायपुर से जुड़ जाएगा। यात्रियों का समय और पैसा दोनों बचेगा। माल ढुलाई सस्ती हो जाएगी। व्यापार बढ़ेगा। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास की रफ्तार तेज करने का मकसद भी पूरा होगा। पर बस्तर के लोग उम्मीद और निराशा के बीच झूल रहे हैं।
नतीजों से पहले एडमिशन
अभी न तो सीबीएसई न सीजी बोर्ड के 10-12 वीं और न ही 9,11 वीं लोकल परीक्षाओं के नतीजे घोषित हुए हैं। और न नए सत्र की मुकम्मल शुरुआत हुई है। लेकिन अखिल भारतीय स्तर के बड़े और स्थानीय निजी कोचिंग सेंटर के संचालक अपना कारोबार शुरू करने में जुट गए हैं। देश प्रदेश के बड़े सेंटर शैलेन्द्र नगर, देवेंद्र नगर, बैरन बाजार, शंकर नगर शांति नगर, कोटा, राजेन्द्र नगर के साथ कई स्कूलों में भी किराए पर संचालित हैं।
नतीजों से पहले ही वे 10-11 वीं के एडमिशन बुक करने लग गए हैं। खासकर कॉमर्स, साइंस और मैथ्स के लिए। अभिभावकों की शिकायत है कि बच्चों के साथ कंसल्टेशन के लिए कोचिंग सेंटर पहुंचने पर कोई भी टर्म कंडीशन नहीं बताया जाता। बस एक दो दिन के ट्रायल क्लासेस में बिठाने के बाद कहा जा रहा है कि बहुत कम सीटें बच गई हैं, एडमिशन कन्फर्म कर लीजिए। ऐसा तो स्कूलों में नहीं होता। कारण- उन्हें मालूम है कि बच्चों को पढ़ाना अभिभावकों की जिम्मेदारी से कहीं अधिक मजबूरी भी है।
उस पर इन सेंटर्स ने फीस भी इस वर्ष 20-50 फीसदी तक बढ़ा दिया है। यह भारी भरकम फीस भी एक या अधिकतम दो किश्त में जमा करने की बाध्यता। उसमें भी मसलन यह कि एक मुश्त देने पर 36 हजार और दो किश्त में 40 हजार रुपए देने होंगे। ड्राप लेकर डमी एडमिशन के इच्छुक बच्चों की फीस तो लाख डेढ़ लाख तय है। मानों इन लोगों ने माता पिता को लोन दिया हुआ हो और उस पर टर्म कंडीशन लागू कर रखा हो।
एडमिशन के बाद स्कूल में पढ़ाई जा रही किताबें, इन्हें मान्य नहीं है ये अपनी प्रिसक्राइब्ड महंगी किताबें खरीदवाएंगे। साथ ही ड्रेस कोड के नाम पर महंगे टी-शर्ट, एडिडास, नाइकी, स्कैचर्स, रिबाक और वुडलैंड के जूते भी। मोटे कमीशन के लिए इसका काउंटर भी सेंटर में ही खोल रखा है। अभिभावक पूछे तो कहते हैं कि दो अलग-अलग किताबों के गणित पढऩे से नॉलेज मजबूत होता है। कुछ एक महीने की पढ़ाई के बाद फैकल्टी के लूप होल उजागर होने पर भी बच्चे का पढऩा और अभिभावकों का पढ़ाना मजबूरी हो जाती है। दरअसल तीन वर्ष पहले लिए गए अपने फैसले को सरकार के भुला दिए जाने से ये सभी स्वछंद हो गए हैं। केंद्र सरकार ने सभी कोचिंग सेंटर को आयकर के दायरे में ला रखा है, लेकिन अब तक किसी से उनके आय-व्यय का हिसाब-किताब नहीं लिया।
उडऩे वाली गिलहरियों का शिकार
बस्तर जैसे सघन वन क्षेत्र, जहां जैव विविधता का खजाना मौजूद है, वहां ग्रामीण इलाकों में कई बार लोग परंपरागत या अज्ञानता के चलते ऐसे वन्यजीवों का शिकार कर लेते हैं जो संरक्षित प्रजाति के हैं और विलुप्ति के कगार पर हैं।
यह प्रजाति करीब 3 फीट तक लंबी हो सकती है और अपने आकर्षक रंगों व वृक्षों पर रहने की आदत के कारण जंगल की पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मालाबार गिलहरियों को स्थानीय लोग उडऩे वाला चूहा भी कहते हैं। इनको वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची एक में शामिल किया गया है। यानि इन्हें बाघों के समान ऊंची कानूनी सुरक्षा मिली हुई है। ऐसे में इनका शिकार एक बड़ा दंडनीय अपराध है। सोशल मीडिया पर अनेक मालाबार गिलहरियों के शिकार के बाद जश्न मनाते हुए दो युवकों की वीडियो क्लिप इस समय वायरल है। इस तस्वीर को बस्तर का बताया जा रहा है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में इनकी सुरक्षा के उपाय किए जाने का दावा वन विभाग के अधिकारी करते हैं। इसके लिए ड्रोन का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत ज्यादा है, ताकि लोग इनका शिकार करने से बचें।
‘ब्रांडेड’ बेइंसाफी और कुलीनता का पाखंड
आज के दौर में ‘नाम’ सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक विज्ञापन बन चुके हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस वैश्वीकरण ने हमें दुनिया भर के ब्रांड्स से जोड़ा, उसी ने हमें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के मामले में ‘अंधा’ बना दिया है। रायपुर की सडक़ों से लेकर बोस्टन के आलीशान क्लबों तक, राजनीतिक-सामाजिक बेइंसाफी का एक ऐसा तमाशा चल रहा है, जो अज्ञानता और अहंकार का मिला-जुला रूप है।
सडक़ों पर घूमता ‘नस्लवाद’
अभी कुछ अरसा पहले रायपुर की एक व्यस्त सडक़ पर एक युवक की पीठ पर बड़े अक्षरों में ‘NEGRO’ लिखा देखा गया। यह केवल एक टी-शर्ट का प्रिंट नहीं था, बल्कि हमारी उस संवेदनहीनता का ‘पोस्टर’ था जो दूसरों के सदियों पुराने दर्द को ‘फैशन’ मान बैठी है। ‘निग्रो’ वह शब्द है जिसने अमेरिका और अफ्रीका में करोड़ों इंसानों को बेडिय़ों, कोड़ों और अमानवीयता के अंधेरे में धकेला। आज पश्चिम के सभ्य समाज में इस शब्द को लेना भी ‘सोशल सुसाइड’ माना जाता है। लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ यह केवल एक ‘कूल’ दिखने वाला विदेशी शब्द है। यह अज्ञानता नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक घाव पर नमक छिडक़ने जैसा है जिसे दुनिया अभी भरने की कोशिश कर रही है।
Negro शब्द क्यों अस्वीकार्य है? नस्लवाद का प्रतीक- यह शब्द गुलामी (Slavery) और अलगाववाद (Segregation) के दौर की याद दिलाता है। इसे श्वेत वर्चस्व (White Supremacy) के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आज के दौर में, चाहे वह अमेरिका हो या भारत, इस शब्द का उपयोग करना न केवल असभ्य माना जाता है, बल्कि कई देशों में यह नफरत फैलाने वाली भाषा की श्रेणी में आता है। 1960 के दशक के बाद से, अश्वेत समुदाय ने इस शब्द को पूरी तरह से नकार दिया है। इसकी जगह अब ‘Black’ या "People of Colo" (POC) का सम्मानपूर्वक उपयोग किया जाता है।
‘हिटलर’ का देसी अवतार और जर्मनी का सबक
यही हाल ‘हिटलर’नाम का है। गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ के दुर्ग तक, ‘हिटलर’ नाम की दुकानें शान से चल रही हैं। रायपुर में रविशंकर यूनिवर्सिटी कैंपस की बेंचों पर छात्र इस नस्लवादी जनसंहारी तानाशाह का नाम गर्व से खुरचते हैं। हम जिसे ‘अनुशासन का प्रतीक’ मानकर पूज रहे हैं, वह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा जनसंहारी था।
जर्मनी ने अपने इतिहास से सबक लिया है। वहां के ‘क्रिमिनल कोड’ (Section)(a) के तहत आप अपने बच्चे या कुत्ते का नाम भी ‘हिटलर’ नहीं रख सकते। वहां नाजी सैल्यूट करना आपको सीधे जेल पहुँचा सकता है। लेकिन भारत में, हम इस ‘राक्षस’ को एक ब्रांड बना देते हैं। यह दर्शाता है कि हमारा नैतिक पैमाना कितना टूट चुका है कि हमें ‘शक्ति’ और ‘क्रूरता’ के बीच का फर्क समझ नहीं आता।
‘बोस्टन ब्राह्मण’- कुलीनता की ‘स्मगलिंग’
पॉलिटिकल इनकरेक्टनेस का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी उदाहरण है—‘बोस्टन ब्राह्मण’। 19वीं सदी में अमेरिकी अभिजात वर्ग (Elite) ने खुद को आम जनता से श्रेष्ठ दिखाने के लिए भारतीय ‘ब्राह्मण’ शब्द को उधार लिया। उन्होंने इसके पीछे के त्याग या पांडित्य को नहीं, बल्कि ‘पदानुक्रमा’ (Hierarchy) और ‘उच्चता’ को अपनाया।
इस शब्द को सबसे पहले 1860 में प्रसिद्ध लेखक और चिकित्सक डॉ. ओलिवर वेंडेल होम्स ने अपने उपन्यास ‘एल्सी वेनर’ में इस्तेमाल किया था। होम्स भारतीय दर्शन और वेदों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने देखा कि भारत में ‘ब्राह्मण’ समाज का वह हिस्सा हैं जो शिक्षित हैं, बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ माने जाते हैं और जिनके पास आध्यात्मिक और सामाजिक सत्ता है। उन्होंने बोस्टन के उन पुराने परिवारों के लिए यह शब्द चुना जो पीढिय़ों से अमीर थे, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े थे और राजनीति व व्यापार पर जिनका एकाधिकार था। होम्स ने उन्हें "The Brahmin Caste of New England" कहा।
आज अमेरिका में ‘Brahmin’ नाम का एक नामी ब्रांड है जो लग्जरी लेदर (चमड़े) के बैग बनाता है। यहाँ तक कि ‘Brahmin' नाम से बीयर (शराब) भी बेची जाती है।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, भारत का जो समुदाय पारंपरिक रूप से चमड़े के काम और मदिरापान को वर्जित मानता रहा, उसी का नाम पश्चिम के बाजार ने ‘एलीट’ दिखने के लिए ‘लेदर’ और ‘लिकर’ पर चिपका दिया।
चाहे वह ‘निग्रो’ जैकेट पहनकर बाइक दौड़ाना हो, या ‘हिटलर’ के नाम पर धंधा करना—यह सब एक ही मानसिक बीमारी के लक्षण हैं- हमदर्दी की कमी। हम दूसरों की संस्कृति और उनके संघर्षों को ‘लेबल’ बनाकर अपनी पीठ पर लाद रहे हैं।
जब शब्द अपनी गहराई खो देते हैं और केवल ‘ब्रांड’ बन जाते हैं, तो समाज अपना विवेक खोने लगता है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यही सिखाएंगे कि इतिहास का हर काला अध्याय केवल एक ‘टी-शर्ट प्रिंट’ है? यह समय अपनी ऐतिहासिक समझ को दुरुस्त करने का है, वरना हम ‘ब्रांडेड’ तो कहलाएंगे, लेकिन ‘सभ्य’ कभी नहीं।
आज भारत में सांप्रदायिक हरकतें करते घूमते नौजवान भगत सिंह की तस्वीर आते टी शर्ट पहनकर घूमते हैं. भगत सिंह पूरी, छोटी सी, जिंदगी जिन बातों के खिलाफ रहे, उन्हें करते हुए लोग उनके भक्त होने का दिखावा भी कर लेते हैं।
सत्ता की बिसात और विशेष ट्रेनें
सत्ता की बिसात बंगाल में बिछी है, लेकिन उसकी हलचल छत्तीसगढ़ की पटरियों पर महसूस की जा रही है। बंगाली बहुल भिलाई, रायपुर बिलासपुर कोरबा रायगढ़ रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों कुछ अलग ही नजारा है। खडग़पुर, हावड़ा और शालीमार जाने वाली हर ट्रेन हाउसफुल है। वेटिंग लिस्ट का आंकड़ा 200 के पार जा चुका है। लेकिन ये भीड़ ‘वोट’ की है। वजह साफ है, पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव। यात्रियों के इस रेले को देखते हुए रेलवे प्रशासन भी अलर्ट मोड पर है। लंबी वेटिंग लिस्ट को क्लीयर करने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन छत्तीसगढ़ से बंगाल और असम के लिए स्पेशल ट्रेनें चला रहा है। तो कुछ ट्रेनों में एक्स्ट्रा कोच भी जोड़े जा रहे हैं ताकि वोटर्स को उनके गंतव्य तक पहुंचाया जा सके। ये लंबी वेटिंग लिस्ट बता रही है कि इस बार बंगाल का चुनाव कितना दिलचस्प और अहम होने वाला है। रेलवे की स्पेशल ट्रेनें इन वोटर्स को सत्ता की मंजिल तक पहुंचाएगी या नहीं, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन मतदाताओं का उत्साह सिस्टम पर भारी पड़ता दिख रहा है। देश के दूसरे प्रदेशों से भी बंगाल के लिए विशेष ट्रेनें बुक हो चुकी हैं, गुजरात से चार।
सेव इंडिया, सेव बंगाल व्हाट्सएप ग्रुप
इस पर यह भी गौर करने वाला घटनाक्रम है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के दो दिग्गजों ने सेव इंडिया, सेव बंगाल नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है बंगालियों के बीच। इस ग्रुप का पहला सामूहिक कार्यक्रम 29 मार्च को मन की बात के साथ रजबंधा मैदान में हुआ। इसे सुनने के लिए विशेष रूप से बंगालियों के लिए तैयारी की गई थी। लजीज भोजन भी करवाया गया। पीएम को सुनने के बाद बंगालियों की मैराथन बैठक हुई । इसमें तय हुआ अभी नहीं तो कभी नहीं..। की रणनीति के अनुसार जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में है, यहां से सम्मानजनक ढंग से भेजा गया और भेजा जा रहा है ताकि बंगाल निवासी अपने रिश्तेदारों को भाजपा को वोट देने प्रेरित करें। इन परिवारों के सदस्य और चेहरे चिन्हित किए गए हैं। इनके साथ चार प्रोफेशनल नेता भी भारी लगेज के साथ भेजे गए हैं। ताकि उन पर नजर रखी जा सके।
नया चेहरा, या एक्सटेंशन?

क्या केंद्र सरकार मुख्य सचिव और डीजीपी की तरह हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को भी एक्सटेंशन देगी? यह सवाल इन दिनों प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। अपने मजबूत संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले राव के संभावित एक्सटेंशन को लेकर अभी से कयास शुरू हो गए हैं।
1990 बैच के आईएफएस अधिकारी राव को पिछली भूपेश बघेल सरकार ने पांच सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया था। मौजूदा सरकार ने भी उन्हें पद पर बरकरार रखा है। जहां तक एक्सटेंशन का सवाल है, तो राज्य में पहले ही अमिताभ जैन को तीन माह और अशोक जुनेजा को छह माह का एक्सटेंशन मिल चुका है। हालांकि फॉरेस्ट विभाग का इतिहास अलग रहा है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अब तक किसी भी पीसीसीएफ को एक्सटेंशन नहीं मिला है। अलबत्ता रिटायरमेंट के बाद संविदा नियुक्तियों के उदाहरण जरूर हैं। राव के बाद नए नए हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को लेकर भी हलचल तेज है। 1994 बैच के अरुण पाण्डेय स्वाभाविक दावेदार माने जा रहे हैं, जबकि इसी बैच के प्रेम कुमार भी दौड़ में शामिल हैं। इन सबके बीच 1995 बैच के ओपी यादव का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। ओपी यादव वर्तमान में कैम्पा का प्रभार संभाल रहे हैं। उनके बड़े भाई एसपी यादव यूपी कैडर के आईएफएस अधिकारी हैं और रिटायरमेंट के बाद केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। संपर्कों के लिहाज से ओपी यादव को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसमें सरगुजा कनेक्शन चर्चा का विषय है। अरुण पांडेय और ओपी यादव, दोनों ही सरगुजा के रहवासी हैं। ऐसे में अगर हेड आफ फारेस्ट फोर्स पद पर सरगुजा को प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाएगा। फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है कि राज्य सरकार राव के एक्सटेंशन के लिए प्रस्ताव भेजेगी या नहीं, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं तेज हैं। देखना है आगे क्या होता है।
सावधानी, निगरानी, या जासूसी?
प्रदेश के तकरीबन सभी जिलों में सर्वसुविधायुक्त भाजपा कार्यालय बन चुके हैं। यहां लाइब्रेरी के साथ-साथ बाहर से आने वाले कार्यकर्ताओं के ठहरने की भी व्यवस्था है। आम तौर पर ये कार्यालय संगठन की गतिविधियों से गुलजार रहते हैं, लेकिन सरगुजा के एक जिले का कार्यालय इन दिनों वीरान नजर आने लगा है।
हालत यह है कि केवल किसी बड़े पदाधिकारी के आने पर ही वहां रौनक लौटती है। बताते हैं कि जिलाध्यक्ष बदलते ही नए जिलाध्यक्ष ने कार्यालय में निगरानी के लिए वॉइस रिकॉर्डिंग वाला सीसीटीवी कैमरा लगवा दिया। इसके बाद से माहौल बदल गया है।
अब स्थिति यह बन गई है कि कार्यकर्ता कार्यालय जाने से कतराने लगे हैं। सीसीटीवी कैमरा तक तो ठीक माना जा रहा था, लेकिन वॉइस रिकॉर्डिंग से असहजता बढ़ गई है और इसे लेकर जासूसी जैसी चर्चा होने लगी है।
हालांकि, राजनीति में आस्था और गुट बदलते रहने की प्रवृत्ति भी आम मानी जाती है, ऐसे में कौन किसके साथ है, यह समझना भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अब विलुप्त प्राणी नहीं रहे काले हिरण
बरनावापारा में मिली सफलता से उत्साहित होकर वन विभाग अब गोमर्धा वन्यजीव अभ्यारण्य में काले हिरणों का एक और समूह लाने जा रहा है। दरअसल, ऐसा सौ साल बाद कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में काले हिरण अब विलुप्तप्राय वन्यजीव नहीं है। 1927 में अंतिम बार आधिकारिक तौर पर इसे देखा गया था। मगर, एक सदी बाद, अब राज्य में लगभग 130 काले हिरण स्वतंत्र रूप से बारनवापारा के जंगल में घूम रहे हैं और लगभग 80 काले हिरणों को छोड़े जाने की तैयारी हो रही है।
77 काले हिरणों का पहला जत्था यहां सन् 2018 में लाया गया। कोविड-19 महामारी के दौरान लगभग 15 जानवरों की मृत्यु हो गई। मगर अब यहां 130 काले हिरण हैं और खुले में छोड़े गए हैं। बाड़ों में भी 60 हिरणों को संरक्षित करके रखा गया है।
ब्लैकबक केवल देखने में आकर्षक जानवर नहीं हैं बल्कि वे पारिस्थितिकी संतुलन में भी विशेष भूमिका भी निभाते हैं। उनकी उपस्थिति अवांछित घास प्रजातियों के प्रसार को रोकते हैं और घास के मैदानों की उत्पादकता बढ़ाते हैं, जो अन्य वन्यजीवों के लिए भी अनुकूल होता है। वैसे काले हिरण गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में विचरण करते हैं, पर छत्तीसगढ़ से यह लगभग 100 साल से लुप्त था। दिल्ली और कुछ अन्य चिडिय़ाघरों से 8 साल पहले लाए गए काले हिरणों की आबादी में विस्तार हुआ है। अभयारण्यों में भी इन्हें खुला छोड़ दिया गया है।
ख़ाली विमान निराशा से भरा होता है!
पिछले दिनों अंबिकापुर से दिल्ली के लिए बहुप्रतीक्षित विमान सेवा पूरे तामझाम के साथ शुरू की गई। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज ने खुद यात्रियों का स्वागत कर मिठाई खिलाई, जिससे माहौल उत्साहपूर्ण बन गया। लेकिन शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद इस सेवा के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
सोमवार को अचानक फ्लाइट रद्द होने से यात्रियों को निराशा झेलनी पड़ी। यही नहीं,अंबिकापुर-कोलकाता विमान सेवा, जो बिलासपुर होकर संचालित हो रही है, उसमें यात्रियों की संख्या बेहद कम दिखी। अंबिकापुर से महज तीन यात्री ही रवाना हुए।
दोनों सेवाएं बिलासपुर के रास्ते संचालित हो रही हैं, लेकिन अंबिकापुर से अपेक्षित यात्री नहीं मिल पाने के कारण इनके संचालन को लेकर संशय गहराता जा रहा है। इससे पहले फ्लाईबिग की अंबिकापुर-बिलासपुर-रायपुर सेवा भी महज एक महीने में बंद हो चुकी है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार के प्रयासों से एलायंस एयर की यह नई पहल शुरू तो हुई, लेकिन कम यात्री संख्या इसे फिर से बंद होने की कगार पर ला सकती है। अब देखना है कि यह उड़ान लंबे जारी समय जारी रहती है या नहीं।
सब चंगा सी
पिछले दिनों विदेश मंत्री एस जयशंकर आईआईएम के दीक्षांत समारोह में शिरकत करने रायपुर आए, तो कई भाजपा नेता स्वागत के लिए एयरपोर्ट पहुंचे थे। स्वाभाविक तौर पर भाजपा नेताओं की चिंता पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की समस्या को लेकर थी। बताते हैं कि जयशंकर ने कम शब्दों में अपनी बात रखी, और आश्वस्त किया कि हमारी तैयारी पूरी है, और कोई समस्या नहीं आएगी।
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के चलते पूरी दुनिया में पेट्रोलियम संकट गहरा गया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी विशेषकर गैस की किल्लत हो रही है। कमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ चुके हैं, और रसोई गैस की समस्या पैदा हो गई है।
जाने-माने डिप्लोमेट और विदेश मंत्री जयशंकर इन समस्याओं से निपटने में अहम रोल अदा कर रहे हैं। वीआईपी लाउंज में विधायक सुनील सोनी और पुरंदर मिश्रा ने उनसे अनौपचारिक चर्चा भी की। सुनील सोनी से जयशंकर पहले से ही परिचित हैं।
सोनी सांसद थे तब पासपोर्ट और अन्य विषयों को लेकर जयशंकर से पहले भी मिल चुके हैं। मिश्रा खुद वित्तीय मामलों के गहरे जानकार हैं, मगर वो भी जयशंकर से खोदकर कुछ निकलवाने में असफल रहे। हल्के-फुल्के अंदाज में जयशंकर ने उनसे सिर्फ इतना ही कहा कि तमाम परिस्थितियों से निपटने की तैयारी पूरी है, और किसी तरह की कोई समस्या नहीं आएगी।
घर के भीतर मतभेद
पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी की जमीन पर जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना की तैयारी चल रही है। वैसे तो यह पिछली भूपेश बघेल सरकार का प्रपोजल था, और इस दिशा में काफी कुछ कार्रवाई हो चुकी थी। अब विष्णु देव साय सरकार ने पुराने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। हालांकि पूर्व मंडी अध्यक्ष, और धरसीवां से तीन बार विधायक रह चुके देवजी पटेल इसकी खिलाफत कर रहे हैं, और इसको लेकर फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए कानूनी सलाह ले रहे हैं। ये बात अलग है कि कोर्ट पहले भी उनकी याचिका खारिज कर चुकी है।
सरकार का तर्क है कि मंडी अब तुलसी-बाराडेरा में शिफ्ट हो चुकी है। ऐसे में खाली जमीन पर व्यावसायिक परियोजना गलत नहीं है। सरकार को उम्मीद है कि जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना से न सिर्फ रोजगार के नए अवसर होंगे, बल्कि ज्वेलरी कारोबार का बड़ा केन्द्र स्थापित होगा।
देवजी जिन बिंदुओं को लेकर कोर्ट जाने की सोच रहे थे, उसका समाधान पहले ही हो चुका है। पिछली सरकार ने एक दिन में ही जमीन का लैंड यूज बदल दिया था, और जमीन उद्योग विभाग के हवाले कर दी थी। ऐसे में परियोजना में रोक के लिए कानूनी विकल्प सीमित रह गए हैं। चूंकि यह कांग्रेस सरकार के समय की परियोजना थी, इसलिए कांग्रेस के लोग स्वाभाविक रूप से इसके पक्ष में हैं। भाजपा सरकार योजना को आगे बढ़ा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
टिड्डा नीलकंठ की चोंच में
जीवो जीवस्य भोजनम्, यह प्रकृति का शाश्वत सत्य है। सृष्टि में हर एक जीवन का एक चक्र है, जहां एक जीव दूसरे का आहार बनकर संतुलन बनाए रखता है। श्रीमद्भागवत में भी इसे जीवो जीवस्य जीवनम् भी कहा गया है। यानि एक जीव का जीवन दूसरे जीव के जीवन पर आधारित है।
नीलकंठ की चोंच में फंसा यह टिड्डा एक शिकार ही नहीं, बल्कि प्रकृति के उसी अनिवार्य संतुलन का प्रतीक है। विनाश ही नए सृजन का मार्ग बनाता है, और एक का अंत अनेक के अस्तित्व की शुरूआत है। टिड्डा फसलों के लिए हानिकारक हैं और नीलकंठ जैसे कई पक्षियों का आहार है। (तस्वीर प्राण चड्ढा)
खेतों का विलेन थाली का सुपर हीरो
छत्तीसगढ़ के किसान हों या राजस्थान के, ‘टिड्डी दल’ का नाम सुनते ही माथे पर पसीना आ जाता है। फसलों को चट कर जाने वाला यह ‘दुश्मन’ अब दुनिया के दूसरे कोनों में एक बिल्कुल अलग पहचान बना रहा है। जिस टिड्डे को हम खेतों से खदेडऩे के लिए थालियां पीटते थे, दुनिया अब उसे अपनी ‘खाने की थाली’ में बड़े चाव से सजा रही है। और बात सिर्फ भूनकर खाने तक सीमित नहीं है, अब तो बाकायदा इसका ‘प्रोटीन पाउडर’ बनाकर डिब्बों में बेचा जा रहा है।
मेक्सिको से इजरायल तक का सफर दुनिया में टिड्डा खाने का शौक कोई नया नहीं है। मेक्सिको में इसे ‘चैपुलिन्स’ (ष्टद्धड्डश्चह्वद्यद्बठ्ठद्गह्य) कहा जाता है और वहां यह मूंगफली की तरह स्नैक्स के रूप में बिकता है। थाईलैंड के नाइट मार्केट्स में इसे डीप-फ्राई करके सोया सॉस के साथ परोसा जाता है। लेकिन असली क्रांति आई है इजरायल और यूरोप में। वहां '॥ड्डह्म्द्दशद्य स्नशशस्रञ्जद्गष्द्ध' जैसी हाई-टेक कंपनियां अब टिड्डों की बाकायदा खेती कर रही हैं। उनका तर्क है कि गाय या भैंस पालने के मुकाबले टिड्डों को पालना पर्यावरण के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद है। ये कम पानी पीते हैं, कम जगह घेरते हैं और प्रदूषण भी नहीं फैलाते।
डिब्बे में बंद ‘पावरफुल’ पाउडर अब सबसे दिलचस्प मोड़, टिड्डे का प्रोटीन पाउडर। जिम जाने वाले शौकीनों के लिए यह नया ‘सुपरफूड’ बनकर उभरा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि टिड्डे के पाउडर में 60 से 70 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है, जो चिकन या मटन से कहीं ज्यादा है। इसका स्वाद भी कोई बुरा नहीं होता, बल्कि हल्का ‘नटी’ (अखरोट जैसा) होता है। इसे आटे में मिलाकर ‘प्रोटीन ब्रेड’ बनाई जा रही है और चॉकलेट शेक में घोलकर पिया जा रहा है। यानी जो टिड्डा कभी फसलों का काल था, वह अब ‘मसल बिल्डिंग’ का सबसे बड़ा जरिया बनता जा रहा है।
सावधानी भी है जरूरी लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप खेत में उड़ते किसी भी टिड्डे को पकडक़र आजमाने लगें। असल में, खेतों में टिड्डों को मारने के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों का छिडक़ाव किया जाता है, जो उन्हें जहरीला बना देता है। खाने और पाउडर बनाने के लिए जो टिड्डे इस्तेमाल होते हैं, उन्हें खास लैब या नियंत्रित ‘फार्म’ में उगाया जाता है।
निष्कर्ष भारत में शायद ही कोई जल्द ही ‘टिड्डा करी’ या ‘टिड्डा शेक’का आर्डर दे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचल बता रही है कि भविष्य की ‘फूड सिक्योरिटी’ इन्हीं छोटे-छोटे उडऩे वाले जीवों में छिपी है। तो अगली बार जब आप टीवी पर टिड्डी दल का हमला देखें, तो बस इतना सोचिएगा कि दुनिया के किसी कोने में कोई जिम का शौकीन शायद इसे ‘प्रोटीन पाउडर’ के रूप में अपनी डाइट में शामिल करने की तैयारी कर रहा होगा। खेतों का ‘विलेन’ वाकई अब ग्लोबल मार्केट का ‘सुपर हीरो’ बन चुका है!
खेल मैदान बचाने की मुहिम
राजधानी रायपुर में सरकारी और निजी आवासीय-व्यावसायिक परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है। इसकी वजह से खेल के लिए मैदान कम होते जा रहे हैं। इन सबको लेकर खिलाडिय़ों और जनप्रतिनिधियों में चिंता है। ये सभी खेल मैदान बचाने के लिए आगे आ रहे हैं। इन्हीं में से देवेन्द्र नगर टिंबर मार्केट के पास खाली जमीन को खेल मैदान के लिए सुरक्षित रखने के लिए मुहिम भी छेड़ दी गई है।
देवेन्द्र नगर इलाके की जमीन कृषि उपज मंडी के आधिपत्य में है। आसपास की जमीन अस्पताल और अन्य प्रयोजन के लिए आवंटित हो चुकी हैं। अस्पताल के आसपास करीब 5 एकड़ जमीन पर भी बिल्डरों की नजर है। उक्त जमीन खेल मैदान के रूप में उपयोग में आ रही है। अब इस जमीन को खेल मैदान के रूप में आरक्षित करने के लिए जनप्रतिनिधियों ने गुहार लगाई है। खिलाडिय़ों के साथ इस मुहिम में रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा भी शामिल हैं।
मिश्रा ने पिछले दिनों पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष जयंती पटेल और स्थानीय पार्षद व खेल संघ के पदाधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मुलाकात की।
मुख्यमंत्री को बताया गया कि रेलवे स्टेशन से आगे देवेन्द्र नगर, शंकर नगर और फाफाडीह के आसपास एक भी खेल मैदान नहीं बचा है। शंकर नगर बीटीआई ग्राउंड में भी आवासीय-व्यावसायिक परियोजना का प्रस्ताव है। ऐसे में पहले से खाली जमीन का किसी अन्य प्रयोजन में उपयोग करना उचित नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने उनकी बातें गंभीरता से सुनीं और भरोसा दिलाया कि मंडी की उक्त खाली जमीन का उपयोग किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं किया जाएगा। उन्होंने खेल मैदान के लिए जमीन आरक्षित रखने पर मौखिक सहमति दी है। खिलाड़ी अब इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अन्य संगठनों का सहयोग लेने की कोशिश कर रहे हैं।
केरलम् चुनाव में छत्तीसगढ़ के मुद्दे
जैसा कि राजनीतिक विश्लेषकों ने पहले ही संकेत दिए थे, छत्तीसगढ़ में ननों के साथ कथित दुर्व्यवहार और ईसाई समुदाय पर हुए हमलों के मुद्दे अब केरलम् की चुनावी बहस का हिस्सा बन चुके हैं। केरलम् के मुख्?यमंत्री पी. विजयन ने हाल ही में इन घटनाओं को लेकर कांग्रेस की भूमिका और उसकी ‘राजनीतिक ईमानदारी’ पर सवाल खड़े किए।
शनिवार को सोशल मीडिया के जरिए दिए गए बयान में विजयन ने कहा कि छत्तीसगढ़ में ननों पर हमले की खबर सामने आते ही राष्ट्रीय व राज्य स्तर के वामपंथी नेताओं ने तुरंत पीडि़तों की मदद के लिए कदम उठाए। केरलम् से कुछ कांग्रेस नेता भी वहां पहुंचे, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राज्य इकाई की ओर से अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी। उनके अनुसार, यह संवेदनशील मुद्दों पर कांग्रेस के अस्पष्ट और विरोधाभासी रवैया है।
दरअसल, यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि केरलम् सरकार छत्तीसगढ़ में ननों पर हमला करने वालों के प्रति नरम रुख अपना रही है। इसके जवाब में विजयन ने 2022-23 के दौरान आदिवासी ईसाइयों को कथित रूप से क्रिसमस और नए साल के समारोहों से बेदखल किए जाने का मुद्दा उठाया और पूछा कि उस समय कांग्रेस नेतृत्व क्या कर रहा था, जबकि राज्य में उसकी सरकार थी।
विजयन ने हाल ही में छत्तीसगढ़ में पारित धार्मिक स्वतंत्रता कानून को लेकर भी कांग्रेस को घेरा। उनका कहना है कि यह कानून मध्यप्रदेश के समान प्रावधानों वाला है, जिसे कांग्रेस ने वहां सत्ता में आने के बावजूद समाप्त नहीं किया। संभवत: वे कमलनाथ सरकार की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीपीआई(एम) अपने घोषणा पत्र में ऐसे कड़े कानूनों को समाप्त करने की बात कर चुकी है।
हालांकि, इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि जिन घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है, उनके संदर्भ और प्रकृति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं। कुछ घटनाएं स्थानीय विवादों से जुड़ी थीं, जिन्हें सीधे तौर पर धार्मिक उत्पीडऩ से जोडऩा विवादास्पद माना गया था। कुछ संगठनों ने पिछले नववर्ष और क्रिसमस पर भी हमले किए थे, मगर उनका जिक्र विजयन ने नहीं किया है।
राजनीतिक दृष्टि से यह भी स्पष्ट है कि केरलम् में भारतीय जनता पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में वामपंथी दल कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने की रणनीति अपनाते नजर आते हैं। यही कारण है कि कई मुद्दों पर, जहां भाजपा की आलोचना भी संभव है, वहां कांग्रेस को ही केंद्र में रखकर निशाना साधा जा रहा है।
कर्ज की नई योजना, बैंक के दरवाजे बंद
राज्य सरकार ने अपने पांच लाख अधिकारी कर्मचारियों के लिए वेतन के विरुद्ध अल्पावधि ऋण सुविधा 1 अप्रैल से शुरू कर दी है। इसके साथ ही अब इन्हें 5 लाख या अधिक कर्ज के लिए माडगेज, बीसियों दस्तावेज और उस पर बैंकों के आगे चिरौरी करने की झंझट से मुक्ति मिल जाएगी। यानी राज्य के अमले से बैंकों को बिजनेस मिलने के दरवाजे बंद हो जाएंगे। इस नई सुविधा में बस अधिकारी कर्मचारियों के पे एकाउंट और सेवावधि का आंकलन वह भी ऑनलाइन चेक करने के बाद मिनटों ही नहीं 30 सेकंड से 1 मिनट में लोन ट्रांसफर हो जाएगा।
बिल्कुल एटीएम कार्ड की तरह की सुविधा का दावा। क्योंकि यह इसका एप सरकार के ई कोष और कर्मचारी के सैलरी अकाउंट से कनेक्ट है। जहां तक ब्याज की दर का सवाल है तो वह भी वित्तीय बाजार दर से एक से सवाल डेढ़ प्रतिशत कम पर। आपका सिबिल स्कोर रेटिंग जितना मजबूत होगा लोन राशि उतनी अधिक होगी। यह स्कोर 7.50 प्वाइंट होने पर यानी कर्मचारी चाहे तो 5 लाख या अधिक तक का लोन ले सकते हैं। लोन अमाउंट , सेवावधि (लेंथ ऑफ सर्विस) पर तय होगी। इस पर ब्याज कुछ अधिक होगा लेकिन बैंकों से सवा डेढ़ प्रतिशत कम ही पड़ेगा। वेतन से किस्त कटौती पर ब्याज जीरो परसेंट अलग।
वैसे बैंक वाले किसी भी पर्सनल लोन 12 प्रतिशत से कम दे नहीं रहे। और बैंक शादी, बिमारी के लिए लोन कहाँ देते हैं। वहीं इस सुविधा में लोन बीमारी के इलाज, कार मकान, शादी जैसी जरूरत के लिए लोन एनी टाइम उपलब्ध है। और आने वाले दिनों में एजुकेशन और होम-लोन को भी शामिल करने की तैयारी की जा रही है। यह व्यवस्था असम, राजस्थान गोवा जैसे राज्यों में सफलता से लागू है। राजस्थान का अमला तो छत्तीसगढ़ से ढाई लाख अधिक है।
यह तो रही गुडी-गुडी बातें। अब इस पर कर्मचारियों के वाट्सएप ग्रुप में उठाए जा रहे सवालों पर। पहला यह कि सर्वाधिक अमले वाले मप्र ने क्यों लागू नहीं किया? किसी ने कहा-इसके लिए आपरेट किए जा रहे रिफाइन ऐप से लोन लेने पर ब्याज प्रतिशत ज्यादा है? एक ने सुझाव दिया कि- शासन इसके साथ व्यक्तिगत/होम लोन लेने पर बैंक को गारंटी दे तो इंटरेस्ट में एक प्रतिशत की कमी हो जाएगी।
एक अन्य ने कहा-एक माह के लिए सैलरी के बदले ठीक है। जरूरत तो यह है कि सरकारों द्वारा 81 माह का डकारा गया डीए दे दे, और अब समय पर महंगाई भत्ता,एरियर ,300 दिन अर्जित अवकाश जैसी सुविधा दे दे, तो किसी भी लोन योजना की जरूरत ही नहीं है। चौथे ने कहा-अरे ये भी सरकार की राजस्व प्राप्ति बढ़ाने की योजना है। ज्यादा खुश होने का नहीं है।
उसे जवाब मिला कि-जो हुआ उसका स्वागत करना चाहिए। बाक़ी के लिए प्रयास करें। जो कर्मचारी केवल वेतन से ही घर चला रहे हैं,उनसे पूछ लो तो अच्छा होगा। क्योंकि सरकारी कर्मचारी का जीवन लोन पे ही चलता है और लोन पे ही चलता रहेगा। अंत में एक सवाल से चर्चा खत्म हुई कि -इस योजना में 300 दिवस का ऋण ले सकते है क्या?
चुनाव ड्यूटी नहीं फिर भी रखवाली नहीं हो रही
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण-एनजीटी ने असम सरकार या कहें, राज्य निवार्चन पदाधिकारी के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 1600 वन कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर लगा दिया गया था। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह समाचार इसलिये खास है क्योंकि यहां के बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती रही है, वन कर्मचारी संगठनों के विरोध और अदालती आदेशों के बावजूद। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद से अब तक हुए लगभग सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन विभाग के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया है। चुनाव आयोग के नियमानुसार, सरकारी कर्मचारियों की कमी होने पर वन विभाग के मैदानी और कार्यालयीन स्टाफ का उपयोग मतदान दल और सुरक्षा व्यवस्था में किया जा सकता है।
2023 के विधानसभा चुनाव में सैकड़ों वनरक्षक, वनपाल और लिपकीय स्टाफ को पीठासीन या मतदान अधिकारी के तौर पर ड्यूटी दी गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ड्यूटी लगाई गई। विशेषकर बस्तर और सरगुजा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जहां वन विभाग के कर्मचारियों को भौगोलिक स्थिति की बेहतर समझ होती है, उन्हें अक्सर गाइड या मतदान दल के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता रहा है। हालांकि इनकी सटीक संख्या उपलब्ध नहीं है। बस्तर और सरगुजा संभाग के बड़े हिस्से में जंगल हैं और रास्ते दुर्गम हैं, इसलिए कई वन कर्मचारियों को रास्ता बताने के लिए गाइड के रूप में शामिल किया गया।
पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्टेट फॉरेस्ट रेंजर्स एसोसिएशन इसी बात को लेकर हाईकोर्ट चला गया था कि उनकी ड्यूटी चुनाव में लगाई जा रही है। एसोसिएशन का तर्क था कि क्षेत्रीय अमला न होने की वजह से वन क्षेत्र में चोरियां बढ़ेंगी। साथ ही गर्मी के दिनों में वनों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं. ऐसे में अगर वन विभाग का क्षेत्रीय अमला चुनाव ड्यूटी में लगा रहता है तो फिर इन घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन हो जाएगा। तब चुनाव आयोग ने अडरटेकिंग दी कि वन कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं लगाए जाएंगे।
फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी ने भी 2024 में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर वन कर्मियों को ड्यूटी से छूट देने का मशविरा दिया था। इन आदेशों बाद भारत निर्वाचन आयोग ने भी कम से कम दो बार पत्र लिखकर राज्यों से कहा कि कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी से बाहर रखा जाए।
छत्तीसगढ़ में भी कर्मचारी संगठन इसी तरह की मांग उठाते रहे हैं। पर इनकी मांग पूरी तरह नहीं मानी गई है। बस्तर संभाग में ही 1200 से अधिक वन कर्मचारी ड्यूटी पर बीते विधानसभा चुनाव के दौरान लगाए गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सरगुजा के जिला निर्वाचन अधिकारी को 800 से अधिक वन कर्मचारियों की सूची भेजी गई थी। वैसे इनमें से अधिकांश को रिजर्व मतदान दल के रूप में रखा गया था, पर चुनाव में सक्रिय भागीदारी तो हो ही गई। वे फील्ड पर नहीं थे।
वैसे राष्ट्रीय उद्यानों, चिडिय़ाघरों, वन्यजीव अभयारण्यों और टाइगर रिजर्व में तैनात कर्मचारियों को तथा उनके वाहनों को चुनाव ड्यूटी पर नहीं भेजा जाता है। माना जाता है कि इन स्थानों पर ड्यूटी की निरंतरता जरूरी होती है, अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ के साथ एक विशिष्ट परिस्थिति यह भी है कि यहां कई जिले हाथी प्रभावित हैं। इनके मूवमेंट पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। वहीं, बीते कई लोकसभा चुनाव गर्मियों के दिनों में हुए। इस मौसम में जंगलों में आग लगने, शिकार व चोरी की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
वैसे छत्तीसगढ़ में वनों से चोरी और शिकार का कोई मौसम नहीं है। बीते दो हफ्ते के भीतर ही करंट लगाकर जानवरों के शिकार की घटनाएं हुई हैं। शिकार के बाद मांस पकाते लोग पकड़े गए हैं। इलेक्शन अर्जेंट नहीं होने के बाद भी वन्यप्राणियों और वन संपदा की हिफाजत छत्तीसगढ़ में चुनौतीपूर्ण ही है। असम की परिस्थितियों के बारे में कुछ कह नहीं सकते, लेकिन यहां तो वन विभाग क्या, दूसरे कई और विभागों के अधिकारी कर्मचारी हैं, जो चुनाव ड्यूटी से बचने का कोई न कोई रास्ता ढूंढते रहते हैं।
पेट्रोल फिर महंगा, सौ के पार कीमत
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच आम उपभोक्ताओं पर भी असर दिखने लगा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर राहत के संकेत दिए थे। इसके बाद भाजपा नेताओं ने सरकार के इस फैसले की जमकर सराहना भी की थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी।
लेकिन ताजा घटनाक्रम में राज्य सरकार ने पेट्रोल की कीमत में एक रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमत अब 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है। नई दरें 1 अप्रैल से प्रभावी हो चुकी हैं। खास बात ये है कि पेट्रोल-डीजल राज्य सरकार के वैट के दायरे में आते हैं। पहले इन पर 25 प्रतिशत वैट और 1 प्रतिशत सेस लगाया जाता था, जिसे अब बढ़ाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया है। इस फैसले के बाद उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
केंद्र सरकार ने पहले ही कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी कर दी है। मगर रसोई गैस सिलेंडर की दरें यथावत हैं। हालांकि इसकी किल्लत चल रही है। संभावना जताई जा रही है कि अप्रैल के आखिरी में रसोई गैस सिलेंडर महंगी हो सकती है। तब तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निपट चुके होंगे।
पश्चिम एशिया संकट और डीए
केंद्रीय विभागों के ऑफिसर्स और कर्मचारी संघों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रायपुर के नेताओं की मानें, तो केंद्र सरकार जनवरी 2026 में केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाली डीए की अगली किस्त और पेंशनभोगियों को मिलने वाली डीआर की किस्त को शायद रोक सकती है। पहले सरकार इसकी घोषणा मार्च महीने में करती थी, लेकिन इस बार अभी तक इसकी घोषणा नहीं की गई है। जिससे यह शक और बढ़ गया है। वैसे ये नेता बताते हैं कि पूर्व के वर्षों में नए वेतन आयोग की गठन के बाद सरकार डीए नहीं देती है। बंद करती रही है। ऐसा होता रहा है। इन सूत्रों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी सरकार ने डीए और डीआर से जुड़ी कोई राहत नहीं दी थी।
इस बार कारण पड़ोस में हो रहा युद्ध संकट है। पश्चिम एशिया संकट की वजह से पैदा हुआ आर्थिक दबाव बताया जा रहा है।
केंद्र के इस कदम का छत्तीसगढ़ में कोई फर्क नहीं पडऩा है। क्योंकि यहां के कर्मचारी अधिकारी वैसे भी डीए, डीआर के डेफिसिट काम करने के आदि हो चुके हैं। इन्हें 2017-18 से जुलाई 25 तक 81 महीने से अधिक का बकाया नहीं दिया जा रहा है। यहां साल में एक ही किश्त मिल रही है। यह बकाया रकम देनी पड़ी तो सरकार का अपना बजट भी कम पड़ जाए। वैसे बकाया रकम लेने राज्यों के कर्मचारी संघ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने लगे हैं। हाल में जस्टिस दीपक मिश्रा ने डीए को कर्मचारियों का हक घोषित करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार को भुगतान करने का आदेश दिया है। इस दृष्टांत (साइटेशन) मानकर छत्तीसगढ़ पेंशनर महासंघ और कर्मचारी फेडरेशन ने भी बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने राज्य सरकार को 4 सप्ताह का समय दिया है। इस पर अगले सप्ताह सुनवाई होगी। देखना होगा कि सरकार क्या रुख अपनाती है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाईकोर्ट का रुख सभी जानते हैं।
नियुक्ति से पहले दिलचस्प चर्चा
सरकार के एक बोर्ड में अध्यक्ष और संचालकों की नियुक्ति को लेकर खासी हलचल है। नाम लगभग तय हो चुके हैं, लेकिन आधिकारिक आदेश अब तक जारी नहीं हो पाए हैं। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। बताते हैं कि आदेश जारी होने से पहले ही संभावित पदाधिकारियों की सूची लीक हो गई।
सूची सामने आते ही जिन नेताओं को पद नहीं मिला, उन्होंने मोर्चा खोल दिया। मामला सीधे पार्टी हाईकमान तक पहुंचा और नियुक्तियों में कथित लेनदेन के आरोप भी लगाए गए। शिकायतों के बाद हाईकमान ने स्थानीय स्तर के प्रमुख नेताओं से चर्चा की। जांच-पड़ताल में आरोपों को निराधार बताया गया और यह भी स्पष्ट हुआ कि असंतोष उन्हीं लोगों में है, जिन्हें पद नहीं मिल पाया।
दिलचस्प यह है कि अफवाहों को हवा देने वालों में पार्टी के कुछ बड़े चेहरे भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिससे अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। संकेत साफ हैं कि तय नामों में बदलाव की संभावना नहीं है।
हालांकि विरोधी खेमे ने फिलहाल आदेश जारी होने की प्रक्रिया को धीमा जरूर कर दिया है, लेकिन यह अड़चन ज्यादा समय तक टिकती नहीं दिख रही। माना जा रहा है कि जल्द ही अध्यक्ष और संचालकों की सूची औपचारिक रूप से जारी कर दी जाएगी।
देखना है कि सूची जारी होने के बाद यह असंतोष शांत होता है या फिर पार्टी के भीतर की यह खींचतान और गहराती है।
हिंदी की औपचारिक इज्जत करती संकेत पट्टिकाएं
देश में हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। मंत्रालयों, सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में राजभाषा के नाम पर बाकायदा अधिकारी नियुक्त हैं। मगर, वे हिंदी की इज्जत बढ़ाते हैं या अपने ज्ञान का मजाक उड़ाते हैं, समझ से परे है।
संलग्न तस्वीरें इसी विडंबना की गवाही देती हैं। जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट वर्तनी तक सही नहीं लिखी गई, तो दूसरी ओर नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े और नए हवाईअड्डे पर ‘अंतरराष्ट्रीय’ शब्द को ‘अंतर्राष्ट्रीय’ लिख दिया गयाहै। सवाल यह है कि क्या करोड़ों के बजट वाले विभागों में बुनियादी भाषिक शुद्धता भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती? अंग्रेज़ीजो इस देश की मूल भाषा नहीं है, उसमें इस तरह की लापरवाही शायद ही कभी दिखती है। यानी जो भाषा ओढ़ी गई है, उसके प्रति सावधानी अधिक है, और जो अपनी है, उसके साथ उपेक्षा।
यह चूक उन राज्यों में हो रही है, जहां हिंदी न केवल बोली जाती है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। इसके विपरीत, दक्षिण भारत के कई राज्यों में लोग प्रयासपूर्वक हिंदी लिखते-बोलते हैं। वहां छोटी-मोटी गलतियां दिख जाएं तो हिंदीभाषी लोग ही उनका मजाक उड़ाते हैं।
रोजमर्रा के प्रदर्शन से परेशानी
कांग्रेस ने प्रदेश में दो-चार जिलों को छोडक़र लगभग सभी जिला अध्यक्षों को बदल दिया है। नए जिलाध्यक्षों ने जिम्मेदारी संभालते ही कामकाज शुरू कर दिया है और कुछ का प्रदर्शन खासा बेहतर माना जा रहा है। इनमें रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन और दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर खासे चर्चा में हैं। दोनों की सक्रियता इतनी ज्यादा है कि स्थानीय स्तर पर ही इसे लेकर अलग तरह की प्रतिक्रिया सामने आने लगी है।
रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन तीन बार पार्षद रह चुके हैं और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके नेतृत्व में राजधानी में विभिन्न मुद्दों को लेकर कांग्रेस द्वारा लगभग रोज धरना-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही हाल दुर्ग ग्रामीण अध्यक्ष राकेश ठाकुर का भी है। वे भी लगातार अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और संगठन को सक्रिय बनाए हुए हैं।
हालांकि, इन लगातार हो रहे कार्यक्रमों से कार्यकर्ताओं में थकान की चर्चा भी सामने आ रही है। बताते हैं कि दुर्ग ग्रामीण के एक वरिष्ठ नेता इस मुद्दे को लेकर पूर्व सीएम भूपेश बघेल तक पहुंच गए। उन्होंने जहां राकेश ठाकुर की सक्रियता की सराहना की, वहीं यह भी कहा कि रोजाना के धरना-प्रदर्शन से कार्यकर्ता थक रहे हैं। नेता ने सुझाव दिया कि चुनाव में अभी समय है, ऐसे में कार्यक्रमों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। अब देखना होगा कि इस सलाह के बाद धरना-प्रदर्शनों की रफ्तार में कोई कमी आती है या नहीं।
कॉफी हाउस में छांछ पे चर्चा ...

भाजपा के पुराने नेताओं का ग्रुप एक बार फिर सिविल लाइन काफी हाउस में जुटा। सरगुजा से बस्तर के निवासी ये नेता इससे पहले वे होली के दो दिन पहले मिले थे। इनकी पिछले विचारों से सहमत इस बार कुछ नए नेता भी आ पहुंचे। 1 अप्रैल को बुलाया गया तो लगा अप्रैल फूल बना रहे होंगे लेकिन बैठक शुरू हुई तो सब कुछ साफ हो गया कि मन की बात हो रही। बैठक दोपहर की थी तो चाय-काफी मना किया कि चाय अब पच नहीं रही है और इसलिए गर्मी के मौसम में छांछ मंगाया गया और छांछ के सेवन के साथ चर्चा आगे बढी। पिछली बैठक की तरह सर्वानुमति यह बनी कि किसी का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। एक ने कहा कि अब तो मंडल से लेकर जिला होते हुए, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर पद वितरित करने की उम्र तय कर दी गई है, यह अलग बात है कि जिन्होंने उम्र तय की है उनकी उम्र 60 वर्ष से लेकर 75 वर्ष की हो चुकी है, लेकिन निचले स्तर पर नियम लागू है।
एक नेता जो पितृ संस्था से भी काफी नजदीकी रखते हैं ने कहा कि अब कहीं पर भी किसी भी बात की सुनवाई नहीं है, सिर्फ एक ही बात है हमें हर हालत में राज्य और केंद्र में सरकार चाहिए और अब उत्तर भारत से होते हुए हमें दक्षिण भारत में परचम लहराना है और जो चुनाव जीत सकते हैं। उनका कितना भी विरोध करिए, लेकिन आज वह चुनाव जीतने में सफल हैं। पितृ संस्था ने यह आंतरिक निर्णय ले लिया है।
और हां अब 2028 के विधानसभा चुनाव हो या 2029 के लोकसभा चुनाव सभी में 35 वर्ष से लेकर 55 वर्ष के उम्र के प्रत्याशियों का ही चयन होगा, चाहे वह किसी भी दूसरे पार्टी से क्यों ना आया हो और वह अगर चुनाव जीत सकते हैं, तो उन्हें टिकट मिलेगा, जिन्हें विरोध करना है वो करते रहें। यह निर्णय भी आंतरिक रूप से लिया जा चुका है।
तभी तीसरे नेता ने कहा कि अब तो जिला स्तर पर मार्गदर्शक मंडल कार्यालय खुलने चाहिए, क्योंकि पहले विदाई के समय शॉल और श्रीफल दिया जाता था, अब तो सिर्फ संकेत दिया जा रहा है कि आपकी उम्र हो चुकी है, अपनी पार्टी में 30 से 40 वर्ष तक सेवा दे चुके हैं आपकी सेवा का ही परिणाम है कि राज्यों में और केंद्र में भाजपा की सरकार और एनडीए की सरकार बन रही है और भविष्य में भी बने। बाकी जिसने संकेत समझ लिया, तो अपने घर पर विश्राम करना प्रारंभ कर दे। इन्होंने बताया कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा, जो असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद होगी, उसमें 35 वर्ष से 55 वर्ष तक के उम्र के लोगों को संगठन में महत्व दिया जाएगा, सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत पुराने लोगों को जिन्हें आवश्यक समझा जाएगा, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाएगा। यह भी बताया कि मंडल स्तर और जिला स्तर पर जारी प्रशिक्षण वर्ग में तीसरी आंख लगी हुई है और उसमें चेहरे भी चिन्हित किया जा रहे हैं, 2028 के विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए। क्योंकि लगभग तय है कि प्रत्याशियों के चेहरे बदले जाएंगे। वह भी बड़ी संख्या में चाहे छत्तीसगढ़ हो या चाहे देश या अन्य राज्य हो, सभी जगह यह नियम लागू किया जाएगा।
इसी बीच पितृ संस्था से जुड़े और भाजपा में भी सक्रिय रहे नेता ने कहा कि संघ ने भी अब प्रांत की योजना को समाप्त कर दिया और संभाग स्तर पर अपना संगठन को मजबूती देने के लिए कदम आगे बढ़ा चुकी है।
तब अंत में छाछ का आनंद लेते हुए एक नेता ने कहा कि अब तो घर बैठना ही उचित है। अंत में उठते-उठते एक मार्गदर्शक मंडल के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे, नेताजी ने कहा कि उपरोक्त सभी स्लोगन, जो 1980 में दिए गए थे उसे 2014 के बाद विलोपित कर दिए गए हैं। अंत में सभी ने कहा कि सही दिशा, स्पष्ट नीति घोषित तो नहीं की गई है लेकिन सभी के लिए पार्टी में संकेत लगभग यही है।
विकास की कीमत चुकाता मगरमच्छ

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में एक तालाब को सुंदर बनाने और जिपलाइन प्रोजेक्ट के लिए खाली किया जा रहा है। पानी घटते ही करीब 10 फीट लंबा एक मगरमच्छ अपने प्राकृतिक घर से बेघर होकर बाहर निकल आया। भूख और पानी की तलाश में भटकने लगा। स्थानीय लोगों में भय व्याप्त हो गया।
सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम पहुंची और जाल बिछाकर उसे पकड़ा। उसे सुरक्षित इंद्रावती नदी में छोड़ दिया गया। तत्काल तो समस्या टल गई लेकिन चिंता बनी हुई है। तालाब में थोड़ा-सा पानी बचा है। प्रोजेक्ट अभी अधूरा है और इस गर्मी में तालाब के फिर से भरने की संभावना भी नहीं दिखती। ऐसे में वहां वर्षों से रह रहे और कई मगरमच्छों का क्या होगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तालाब में पिछले 50 साल से मगरमच्छ रह रहे हैं। बावजूद इसके, पानी निकालने से पहले उनके पुनर्वास की कोई योजना नहीं बनाई गई। शायद इस घटना के बाद बचे हुए मगरमच्छों के प्रति संवेदना जागे।
गिड़गिड़ाएं नहीं, सुविधाएं दीजिए
सूरजपुर जिला मुख्यालय के अस्पताल में गंभीर हालत में पहुंची एक महिला के गर्भस्थ शिशु की जान प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की गुहार के बाद भी नहीं बचाई जा सकी। गुहार लगाने से बचना भी नहीं था। कथित तौर पर राजवाड़े कह रही थीं कि मेरा ही खून निकाल लो, मगर शिशु की जान बचा लो..। उनके पहुंचने से पहले से पहले परिजन विनती कर रहे थे कि डॉक्टर साहब कुछ करो। कथित तौर पर डॉक्टर ने कहा कि विधायक या मंत्री, चाहे जिसे बुला लो, कुछ नहीं होगा। स्थिति शर्मनाक ही कही जाएगी कि मंत्री जी पहुंच गईं, पर शिशु की जान नहीं बचाई जा सकी। अस्पताल परिसर में गंदगी, बदबू और अव्यवस्था फैली थी। डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों ने संवेदनहीनता दिखाई या नहीं, यह अलग मसला है लेकिन मोटे तौर पर मौत का कारण तो यही सामने आया है कि वहां ब्लड बैंक की सुविधा ही नहीं थी।
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नजर डालें तो यह अचरज में डालने वाली घटना है ही नहीं। मंत्री की मौजूदगी हो, जिला मुख्यालय का अस्पताल हो तब भी। तस्वीर चिंताजनक है, हालात बदतर। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर अभी भी 38 से 44, प्रति हजार जीवित जन्म के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर क्षेत्रों में यह दर और भी ऊंची पाई गई है। केरल जैसे राज्य से तुलना करें तो वहां एक हजार में केवल 5 शिशुओं की मौत होती है। यानी छत्तीसगढ़ के बच्चों के लिए जीवन का जोखिम सात से आठ गुना अधिक है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टरों की भर्ती केवल 28 प्रतिशत हो पाई है। मतलब 72 प्रतिशत पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसरों के 51 प्रतिशत पद खाली हैं, लगभग आधा। यह आम शिकायत है कि आदिवासी जिलों में डॉक्टरों की तैनाती की जाती है, मगर वे वहां कभी-कभार जाते हैं या फिर जाते ही नहीं। नर्स और स्टाफ भी ताला बंद कर गायब रहती हैं। ऐसे मामलों में भी नवजातों और प्रसूताओं की मौत की घटनाएं सरगुजा में हो चुकी हैं। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, जिसे लेकर दावा है कि यह प्रदेश के 2100 से अधिक गांवों में पहुंच रही हैं, कितने काम की हो सकती हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है। जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, जांच बिठाई जाती है, कभी-कभी कुछ लोग सस्पेंड कर दिए जाते हैं, पर जिला अस्पतालों में जांच उपकरण, ब्लड बैंक और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, तैनाती सुनिश्चित करना प्राथमिकता में नहीं है। फिर स्टाफ को चेतावनी दीजिए और सख्त कार्रवाई करिये।
...तो पार्टी में कद बढ़ेगा
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता असम और पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए गए हैं। पश्चिम बंगाल की 56 विधानसभा सीटों के बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रदेश भाजपा महामंत्री (संगठन) पवन साय संभाल रहे हैं।
खास बात यह है कि पश्चिम बंगाल में न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देशभर के भाजपा कार्यकर्ता जुटे हुए हैं। सरकार के आधा दर्जन निगम-मंडल के चेयरमैन फरवरी से ही वहां डटे हुए हैं। अब एक-एक कर कुछ विधायक और पूर्व विधायकों को भी बंगाल बुलाया गया है।
पूर्व मंत्री राजेश मूणत और शिवरतन शर्मा पहले से ही प्रचार में सक्रिय हैं। उनके साथ महासमुंद के विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा, दुर्ग ग्रामीण के ललित चंद्राकर, पूर्व विधायक रजनीश सिंह, मोतीराम चंद्रवंशी सहित दर्जनभर से अधिक विधायक-पूर्व विधायक बंगाल पहुंच चुके हैं।
पार्टी की रणनीति हर मतदाता तक पहुंच बनाने और उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करने की है। हालांकि अभी प्रचार शुरू ही हुआ है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा की घटनाएं काफी होती हैं, जिसे देखते हुए निर्वाचन आयोग नजर बनाए हुए है।
भाजपा के कार्यकर्ता भी सतर्क हैं और एक-दूसरे के संपर्क में बने हुए हैं। चुनाव प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि यदि चुनाव परिणाम अनुकूल आते हैं, तो पार्टी के भीतर उनका कद भी बढ़ेगा। देखना है आगे क्या होता है।
20 महीने का एरियर्स
8 वें केंद्रीय वेतन आयोग ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों से 30 अप्रैल तक नए वेतन-भत्तों को लेकर प्रस्ताव सुझाव मांगे हैं। सभी केंद्रीय व राज्य संगठनों के नेता आयोग की वेबसाइट पर फीडबैक देने में जुट गए हैं। इसी सिलसिले में वेतन भत्तों पर नए फिटमेंट फैक्टर को लेकर केंद्रीय अमले का जो आंकलन है उसके अनुसार, जिन कर्मचारियों का मूल वेतन 50,000 रुपये से कम है, उन्हें सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है; उन्हें लगभग 20 महीनों का बकाया (एरियर्स) और अलग-अलग फि़टमेंट फ़ैक्टर मिल सकते हैं। शुरुआती स्तर पर, लेवल 1 (18,000 रुपये) के कर्मचारियों को 3.6 लाख रुपये से 5.65 लाख रुपये के बीच भुगतान मिल सकता है, जबकि लेवल 8 (47,600 रुपए) के कर्मचारियों को 9.52 लाख रुपए से लेकर लगभग 14.94 लाख रुपए तक मिल सकते हैं।
फिटमेंट प्रस्तावित वेतन संशोधन में यह फैक्टर ही मुख्य आधार बना हुआ है। जहाँ 7वें वेतन आयोग ने इसे 2.57 पर तय किया था, वहीं समझा जा रहा है कि सरकार 2.0 और 2.57 के बीच के विकल्पों पर विचार कर रही है।
हालाँकि, कर्मचारी यूनियन 3.0 से 3.25 के ऊँचे दायरे की माँग कर रही हैं - एक ऐसा कदम जिससे न्यूनतम मूल वेतन 18,000 रुपये से बढक़र लगभग 54,000 रुपये तक पहुँच सकता है। वेतन आयोग के 10-वर्षीय चक्र के अनुसार, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी, 2026 से लागू होने की संभावना है। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है।
जीत का ऐलान, मगर जंग अभी बाकी
देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा नक्सलवाद के पूरी तरह खत्म होने की कल की गई घोषणा के बाद 31 मार्च की सुबह उम्मीद की नई रोशनी लेकर आई है। लेकिन इस तस्वीर में दिखते चेहरे एक अलग ही सच्चाई को बयान कर रहे हैं। जंग बंदूक की खत्म हो गई हो पर भूख, मजबूरी और बुनियादी सुविधाओं की बाकी है।
सोशल मीडिया पर आई यह तस्वीर बीजापुर जिले के जगरगुंडा की है। यह जगह कभी नक्सलियों की अघोषित राजधानी थी। नीली टीन की दीवार के सहारे बैठे और खड़े ये ग्रामीण सुबह 4 बजे अपने गांव करकेगुड़ा से निकले, सरकारी राशन 30 किलो चावल, 1 किलो नमक और थोड़ा सा गुड़ पाने के लिए। ये लोग अब तक इंतजार कर रहे हैं। इस कतार के लिए किसी ने दिनभर की मजदूरी छोड़ी, तो किसी ने उधार लेकर वाहन में सफर किया। यह इंतजार उनके जीवन की कठिनाई का आईना है। नक्सलवाद का खात्मा एक बड़ी कामयाबी है, मगर एक और जंग बाकी है। भूख के खिलाफ, गरीबी, अशिक्षा के खिलाफ, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के खिलाफ।
बीरगांव अब भी ‘गांव’
प्रदेश में गैस की किल्लत चल रही है। सरकार ने रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नए फरमान जारी किए हैं। इसमें शहरी इलाके में 25 दिन, और गांवों में बुकिंग के बाद 45 दिन में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध होगा। नई व्यवस्था तुरंत लागू भी हो गई है। मगर बीरगांव में एक नया विवाद शुरू हो गया है।
बीरगांव नगर निगम क्षेत्र के रहवासियों को सिलेंडर के लिए 45 दिन का इंतजार करने के लिए कहा गया है। इसको लेकर पिछले दो-तीन दिनों से बीरगांव इलाके के गैस एजेंसी के संचालकों, और उपभोक्ताओं के बीच विवाद चल रहा है। गैस एजेंसी संचालकों ने जिला प्रशासन, और स्थानीय गैस कंपनियों के प्रतिनिधियों से चर्चा की।
गैस कंपनियां बीरगांव को अब भी ग्रामीण क्षेत्र मान रही है। जबकि बीरगांव नगर पालिका से नगर निगम में तब्दील हो चुका है। यहां आबादी भी काफी बढ़ गई है। मगर सहुलियत अब भी ग्रामीण स्तर की है। जबकि बीरगांव नगर निगम के अधीन उरला और सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र भी आते हैं। आर्थिक रूप से बीरगांव कई और नगर निगम की तुलना में बेहतर स्थिति में है। मगर गैस कंपनियां मानने के लिए तैयार नहीं है, और उन्हें रसोई गैस के लिए शहर के बजाए ग्रामीण क्षेत्र के लिए तय किए गए नियम मान्य होंगे। यानी सिलेंडर के लिए उन्हें 45 दिन इंतजार करना होगा।
अंबिकापुर से नई विमान सेवा

पिछले दिनों अंबिकापुर से एक नई विमान सेवा की शुरुआत हुई। अंबिकापुर से बिलासपुर, और दिल्ली के अलावा कोलकाता के लिए भी विमान शुरू हुई है। सीएम विष्णुदेव साय ने एलाइंस एयर की नई विमान सेवा का वर्चुअल उद्घाटन किया। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज दिल्ली, और कोलकाता के लिए शुरू हुई विमान सेवा को अपनी प्रमुख उपलब्धि मान रहे हैं। वो खुद विमान से दिल्ली गए, और यात्रियों को मिठाई भी खिलाई।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव भी अंबिकापुर से विमान सेवा के लिए प्रयासरत रहे हैं। करीब सालभर पहले रायपुर-बिलासपुर-अंबिकापुर विमान सेवा शुरू हुई थी। फ्लाई बिग एयर लाइन कंपनी की ये विमान सेवा बमुश्किल तीन महीने ही चली, और फिर बाद में बंद हो गई। अब नए सिरे से रूट तय कर नई कंपनी ने विमान सेवा शुरू की है, लेकिन ये भी लंबे समय तक चलेगी इसको लेकर कुछ लोगों को शंका है। अंबिकापुर-दिल्ली विमान सेवा को लेकर मीडिया में काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया आई थी। पहले दिन ही 72 सीटर विमान फुल नहीं हो पाई। कुल 46 लोग ही दिल्ली के लिए उड़ान भरी। इसमें से 16 यात्री बिलासपुर से आए थे। अंबिकापुर से 30 लोग बैठे। इन सबको देखकर जानकार लोग मान रहे हैं कि ये सेवा भी लंबे समय तक नहीं चल पाएगी। वैसे भी निजी विमानन कंपनियां मुनाफे के आधार पर चलती है। अंबिकापुर से दिल्ली और कोलकाता के लिए रायपुर की तरह पैसेंजर मिलना मुश्किल है। रायपुर से तो दिल्ली के लिए आठ फ्लाइट चलती है, और सभी फुल रहती है। वैसा पेसेंजर रायपुर या बिलासपुर से मिलना मुश्किल है।
कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि बनारस और रांची को जोड़ा जाना चाहिए। तभी अंबिकापुर से विमान सेवा फायदेमंद रहेगी, और लोगों को भी सहुलियत होगी। अंबिकापुर से बनारस और रांची जाने वाली की संख्या काफी अधिक है। देखना है नई सेवा कितने दिन चलती है।
हार्न की जगह, ढेंचू-ढेंचू

दुनिया भर में मंडराते ईंधन संकट ने लोगों की चिंता तो बढ़ा रखी ही है, पर सोशल मीडिया पर ऐसे मौके भी गुदगुदाने, मुस्कान लाने वाले रचनात्मक काम जारी है। ऐसी ही एक तस्वीर फेसबुक में मिली है। एक गधा, जिसकी पीठ पर बाइक की सीट है, हेडलाइट और हैंडल तक फिट कर दिया गया है। सवारी तो गधे की होगी लेकिन फीलिंग बाइक चलाने की मिलेगी। तस्वीर देखकर लोग हिसाब लगाने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में बाइक की जगह डंकी को दौड़ाना सस्ता पड़ेगा? माइलेज का अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह गधे के मूड और चारे की क्वालिटी पर निर्भर करता है। कुछ लोग इसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नया आविष्कार भी बता रहे हैं। वही यूनिवर्सिटी, जिसने हाल ही में नई दिल्ली के एक एआई सम्मेलन में चीनी रोबोट को अपना बताकर प्रदर्शित कर दिया था।
महिला कांग्रेस की गतिविधियां शून्य
कांग्रेस में कोई फैसले में काफी विलंब होता है। इससे पार्टी नेता और कार्यकर्ता निराश भी रहते हैं। ताजा मामला प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ा है।
राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम के इस्तीफे के बाद से महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए पार्टी हाईकमान ने प्रक्रिया शुरू की, और पांच महिला नेत्रियों को शॉर्टलिस्ट कर इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया।
इंटरव्यू की जिम्मेदारी महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा को दी गई थी। जिन नेत्रियों का इंटरव्यू हुआ था उनमें पूर्व विधायक श्रीमती छन्नी साहू, संजारी-बालोद की विधायक संगीता सिन्हा, सिहावा की पूर्व विधायक श्रीमती डॉ. लक्ष्मी ध्रुव, और अन्य दो थे। इन सभी का जनवरी के पहले हफ्ते में इंटरव्यू हुआ था। मगर आज तक अध्यक्ष के नाम घोषित नहीं हो पाए हैं।
चर्चा है कि प्रदेश के बड़े नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए अलग-अलग नामों की सिफारिश की है। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने छन्नी साहू को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश की है, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने संगीता सिन्हा का नाम आगे बढ़ाया है। कहा जा रहा है कि बड़े नेता किसी एक नाम पर सहमत नहीं होने के कारण भी नियुक्ति में विलंब हो रहा है।
पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि किसी एक नाम पर सहमति बनाना काफी कठिन होता है। ऐसे में हाईकमान को दखल देकर सीधे नियुक्ति आदेश जारी करना चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसका प्रतिफल यह है कि महिला कांग्रेस की तमाम गतिविधियां ठप पड़ गई है जबकि महिलाओं से जुड़े रसोई गैस किल्लत जैसे मुद्दों पर पार्टी बड़ा माहौल नहीं बना पा रही है।
हिसाब अभी बाकी है...
अगर पुराना हिसाब-किताब बाकी है, तो आगे उसी व्यक्ति या संस्थान से दोबारा कारोबार करने में दिक्कत होना स्वाभाविक है, यह व्यापार का एक सामान्य नियम है। कुछ ऐसी ही स्थिति से सरकार के एक मंत्री को दो-चार होना पड़ा है।
चर्चा है कि मंत्रीजी अपने करीबियों को प्रदेश के एक पर्यटन स्थल पर घुमाने ले जाने की तैयारी में हैं। वहां कई रिसॉर्ट और होटल मौजूद हैं। मंत्रीजी के कार्यालय से जब बुकिंग के लिए फोन किया गया, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने अपने यहां पहले से कमरे उपलब्ध नहीं होने की बात कह दी।
मंत्रीजी के लिए तो सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरने का इंतजाम हो गया, लेकिन करीबियों के लिए व्यवस्था नहीं होने पर उन्हें एक सरकारी स्कूल में ठहराने का बंदोबस्त करना पड़ा।
अब सवाल उठता है कि कमरे खाली होने के बाद भी होटल और रिसॉर्ट संचालक आनाकानी क्यों कर रहे हैं। इसकी वजह भी दिलचस्प बताई जा रही है। बताते हैं कि कुछ महीने पहले इसी पर्यटन केंद्र में भाजपा का एक बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में वीवीआईपी पहुंचे थे। उस दौरान सभी होटल और रिसॉर्ट बुक किए गए थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब भुगतान की बारी आई, तो आयोजक पूरा हिसाब चुकाए बिना ही निकल गए। इससे संचालक नाखुश रहे। अब जब मंत्रीजी के करीबियों को ठहराने की बारी आई, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने इस बार एक सुर में मना कर दिया।
..तो छत्तीसगढ़ से तरबूज नहीं

खाड़ी देशों से हमारी कार बाइक को रफ्तार देने वाले पेट्रोल डीजल की आवक कम हुई है तो वहां के लोगों के गले को तर करने वाले तरबूज( कलिंदर )की जावक थम गई है। ईरान इजरायल युद्ध की वजह से इसका निर्यात पूरी तरह से बंद हो गया है। इस बार तो सीधे रायपुर एयरपोर्ट के कार्गो प्लेन से निर्यात की भी तैयारी थी। उत्पादन अच्छा होने के बाद भी निर्यात नहीं हो पा रहा है। हालांकि इसका फायदा स्थानीय बाजार को होगा। आम लोगों के लिए दाम अलग गिरेंगे। थोक सब्जी बाजार के अध्यक्ष श्रीनिवास रेड्डी की मानें तो पिछले सीजन में 20-25 हजार रुपए टन बिकने वाला तरबूज इस बार 10 हजार रुपए टन से कम पर आ गया है। रेड्डी के मुताबिक किसानों ने इस बार 10 हजार एकड़ में तरबूज बोया था। जहां प्रति एकड़ 35-38 टन का औसत उत्पादन आंका जाता है। यानी सीजन में कुल 6 लाख टन के आसपास होता। इसकी कीमत 300 करोड़ होती। लेकिन किसानों की मेहनत पर पेट्रोल छिडक़ दिया गया। यह सही है कि देश का बाजार 100 करोड़ लोगों का है लेकिन गिरे हुए भाव में बेचना होगा। उसके लिए भी अन्नदाता किसान को कारोबारियों की चिरौरी करनी पड़ रही है जो आपदा को अवसर बना कर औने पौने दाम में बेचने मजबूर कर रहे हैं। तरबूज उत्पादक किसानों का कहना है कि फरवरी के पहले सप्ताह 17 हजार रुपए के ऊंचे भाव में 100 ट्रक माल निर्यात हुआ था। उसके बाद से इतनी बड़ी खेप अब तक बुक नहीं हुई है, और तो और अधिक मांग वाले मुंबई, पुणे नासिक से भी आर्डर कम हो गया है। जबकि गर्मी अब अपने उच्चतम तापमान की ओर बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ के तरबूज उत्पादकों को अब स्थानीय बाजार का ही सहारा है। यही वजह है कि मुख्य बाजार के साथ शहरों के आवासीय कालोनी, हाइवे के किनारे तरबूज भरे छोटा हाथी, तूफान, ट्रेक्स,मेटाडोर देखे जा सकते हैं।
छुट्टियों पर राजनीति जरूर होती है...
सरकारी दफ्तरों में पांच दिवसीय सप्ताह के बीच सोमवार और शुक्रवार को पडऩे वाली छुट्टियों का बड़ा महत्व हो जाता है। कर्मचारियों के लिए ये राहत और निजी जीवन के संतुलन का अवसर होते हैं। शुक्रवार को अवकाश मिल जाए तो तीन दिन का लंबा वीकेंड, और सोमवार को छुट्टी हो तो चार दिन का। इस महीने के आखिरी दिनों में दो बड़े पर्व राम नवमी और महावीर जयंती ऐसे अवसर लेकर आए थे, जो कर्मचारियों को लंबा अवकाश दे सकते थे। लेकिन राज्य स्तर पर छुट्टियों का निर्धारण कुछ अलग तरह से हो गया।
राम नवमी की छुट्टी गुरुवार को घोषित की गई, जबकि कई कर्मचारी संगठनों का तर्क था कि वास्तविक उत्सव शुक्रवार को मनाया जा रहा है। इसी तरह महावीर जयंती का अवकाश मंगलवार को तय हुआ। परिणाम यह हुआ कि छुट्टियां बिखरी-बिखरी रहीं और कर्मचारियों को लगातार अवकाश का लाभ नहीं मिल पाया।
हालांकि कई कर्मचारी व्यवस्था के बीच रास्ता निकालने में माहिर होते हैं। उन्होंने दो दिन का वैयक्तिक अवकाश लेकर पांच दिन की छुट्टी का इंतजाम कर लिया। लेकिन यह जुगाड़ हर किसी के लिए संभव नहीं होता। खासकर उन कर्मचारियों के लिए, जिनकी छुट्टियां सीमित हैं या काम का दबाव अधिक है।
उधर पड़ोसी मध्यप्रदेश सरकार ने अपेक्षाकृत लचीला रुख अपनाया। वहां राम नवमी की छुट्टी को गुरुवार से बदलकर शुक्रवार कर दिया गया। महावीर जयंती का अवकाश भी मंगलवार से खिसकाकर सोमवार कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में कर्मचारी संगठनों ने अपने स्तर पर ज्ञापन सौंपे, लेकिन उनकी मांगों का असर नहीं दिखा। मगर, मध्यप्रदेश में कर्मचारियों ने राजनीतिक हस्तक्षेप का महत्व समझा। वहां के विधायकों ने छुट्टियों को बदलने के लिए मुख्यमंत्री को चि_ी लिखी। वहां मुख्यमंत्री ने सहमति दे दी। कर्मचारियों को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के विधायकों का साथ मिला।
वैसे छुट्टियों पर चर्चा करते हुए एक और बहस का एक और पक्ष हमेशा खुल जाता है। आम जनता अक्सर यह सवाल उठाती है कि सरकारी कर्मचारियों को आखिर इतनी छुट्टियां क्यों? राज्य बनने के बाद से कई ऐसे सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जा चुके हैं, जिसका मकसद राजनीतिक फायदा उठाना है।

विजयपत सिंघानिया का छत्तीसगढ़ कनेक्शन
रेमंड ग्रुप के पूर्व चेयरमैन और पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. विजयपत सिंघानिया के निधन की खबर ने उन लोगों को भी दुखी किया, जो छत्तीसगढ़ से उनके जुड़ाव को जानते हैं।
पुराने बिलासपुर जिले के गोपालपुर में, जो अब जांजगीर-चांपा जिले में शामिल हुआ है, उन्होंने रेमंड सीमेंट संयंत्र की स्थापना की थी। वे उन चुनिंदा उद्योगपतियों में थे, जिन्होंने निवेश के साथ छत्तीसगढ़ के साथ लगाव रखा। उनका हेलीकॉप्टर उतरता था, तो खुद ही कई बार पायलट होते थे। कुछ घंटों का प्रवास होता था, कभी-कभी एक दो दिन के लिए रुकते भी थे। उनके संयंत्र से स्थानीय लोगों को रोजगार मिला और कई व्यवसायियों को भी काम मिला। वे यहां के राजनीतिक और प्रबुद्ध लोगों से भी मिलने के लिए वक्त निकाल लिया करते थे। मजदूरों और संयंत्र के आसपास के जमीन मालिकों के साथ कई बार विवाद भी हुआ। खासकर खेती की जमीन को लाइम स्टोन के खनन से होने के नुकसान के चलते। पर, उन्हें सुलझा लिया गया। प्रशासन तब भी उनके पक्ष में होता था, लेकिन आज की तरह एकतरफा नहीं। तब प्रशासन ग्रामीणों की शिकायतें सुनता भी था और सिंघानिया अथवा फैक्ट्री प्रबंधन को बाध्य भी करता था, समाधान के लिए। हर बार समाधान निकल भी जाता था। रेमंड के कपड़े महंगे होते थे। मगर, अपने कर्मचारियों के लिए वे हर साल एक बार सेल लगवाया करते थे। यह सेल फैक्ट्री एरिया में लगा करती थी। रेमंड के कपड़ों का क्रेज आज भी है, पर उस वक्त ज्यादा ही था। शहर से भी लोग जाकर उस सेल में खरीदारी करते थे। बाद में उन्होंने यह फैक्ट्री लाफार्ज को बेच दी। इसी बीच उन्होंने गौ संवर्धन की एक योजना को हाथ में लिया। ग्रामीणों को अच्छे नस्ल की गायों को वितरित किया गया। एक मॉडल गौशाला भी फैक्ट्री परिसर में तैयार किया गया। पर, धीरे-धीरे विजयपत सिंघानिया का बिलासपुर आना बंद हो गया। बाद में उनका अपने बेटे, बहुओं से विवाद की खबरें यहां पहुंचने लगी। उन्हें परिवार से लगभग बेदखल कर एक फ्लैट में कैद करके रख दिया गया था। जो लोग उनसे मिला-जुला करते थे, उन्हें इन सूचनाओं ने पीड़ा पहुंचाई। आज जब उनके निधन की खबर आई है, छत्तीसगढ़ में जो लोग कभी उनसे मिल चुके हैं या उनकी वजह से नौकरी और व्यापार में सफल हो चुके हैं- उनको भी दुख हुआ है।
एक दिन में आया सिलेंडर
.jpg )
इन दोनों पर्चियों की तारीख पर गौर जरूर करें। 26 फरवरी को बुकिंग और 27 फरवरी को घर पर आ गया सिलेंडर। ग्राहक कह रहे हैं कि कुछ ही गैस कंपनियों की डिलीवरी फास्ट है। लेकिन ऐसा तो हो नहीं सकता कि उनके पास स्टॉक ज्यादा है और बाकी के पास कम। ये दोनों पर्चियां उन लोगों को चिढ़ा रही होंगी जो गैस कंपनी दफ्तरों के बाहर सुबह से कतार में खड़े हो रहे हैं, या तो उनके घर के सिलेंडर खत्म हो गए हैं, या जंग खत्म न होने की आशंका में वे आनन-फानन सिलेंडर लेने पहुंच रहे हैं। लेकिन सवाल ये भी है कि जब घरेलू गैस की बुकिंग 25 दिन के अंतराल में हो रही है तो क्या खपत इतनी बढ़ गई है कि लोगों के सिलेंडर पहले खाली हो रहे हैं, या फिर इसमें भी कहीं कोई गड़बड़झाला है! क्योंकि गैस की किल्लत की खबरों के बीच घरेलू सिलेंडरों के व्यावसायिक उपयोग के खुलासे धड़ल्ले से हो रहे हैं और कार्रवाई भी।
भारत सरकार ने कहा है कि देश के पास 60 दिनों का गैस भंडार है, लेकिन न तो कोई किल्लत की स्थिति है और न ही लॉकडाउन जैसी। केंद्र के निर्देशों के मुताबिक राज्य सरकार ने भी औपचारिक बैठक में सभी जिले के कलेक्टर्स को गैस सिलेंडर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जनता से कहा है कि गैस सिलेंडर की कोई कमी नहीं है, लोगों को अफवाह पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बता दें कि गैस सिलेंडर की जमाखोरी पर कार्रवाई भी चल रही है, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पखवाड़े भर में जमाखोरी के मामले में करीब 4 हजार सिलेंडर जब्त हुए, और करीब 100 एफआईआर।
गैस का ब्लैक मार्केट तो छलांगे मार रहा है, सोशल मीडिया पर कमेंट बताते हैं कि लोगों को 4-4 हजार में सिलेंडर मिल रहा है। ये वो लोग हो सकते हैं जिन्होंने कंपनी से कनेक्शन नहीं लिया होगा, या उनके घर पर एक सिलेंडर 25 दिन भी नहीं चलता होगा। हालात कह रहे हैं कि कटौती करनी होगी, जैसे पहले जंग के सबसे मुश्किल शुरुआती दौर में सरकार ने सिलेंडर सप्लाई के कोटे में कटौती की ताकि मारामारी न हो। सरकार को हालात काबू में दिखे तो अब कोटा बढ़ा दिया गया है। लेकिन लोगों को भी जंग के ऐसे मुश्किल हालातों में समझदारी दिखानी जरूरी है, न कि हड़बड़ी।
‘घर’ के बाहर भी जंग
असम चुनाव में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भी परीक्षा है। यहां केन्द्रीय मंत्री तोखन साहू के अलावा डिप्टी सीएम अरुण साव, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी डेरा डाले हुए हैं। जबकि कांग्रेस प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व सीएम भूपेश बघेल संभाल रहे हैं। खास बात ये है कि चुनाव प्रचार के दौरान छत्तीसगढ़ के कांग्रेस-भाजपा नेताओं के बीच जुबानी जंग भी चल रही है।
भूपेश ने असम के सीएम हिमंता बिस्वा शर्मा को ‘नकली कांग्रेसी’ बताकर माहौल गरम करने की कोशिश की है। हिमंता कांग्रेस में रह चुके हैं। भूपेश बघेल चुनावी सभाओं में हिमंता पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि असम में कांग्रेस का मुकाबला ‘नकली कांग्रेसी’ से है और भाजपा मुकाबले में नहीं है। इस पर भाजपा नेता जवाबी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं। और जब एक्साइज ड्यूटी घटाने के मामले पर पूर्व सीएम ने जब केंद्र की सरकार को घेरने की कोशिश की, तो वित्त मंत्री ओपी चौधरी जवाब देने के लिए आगे आ गए।
भूपेश ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती तेल कंपनियों के लिए राहत दी गई, और चाटुकारिता के लिए जनता को लाभ मिलने की अफवाह फैला रहे हैं। इस पर ओपी चौधरी ने एक्स पर लिखा कि कोविड जैसी आपदा के समय जब पूरी दुनिया संकट से जूझ रही थी, और लोग आर्थिक मुश्किलों में थे तब आपने पेट्रोल पर वैट बढ़ाकर आपदा को अवसर बनाकर वसूली की थी। उन्होंने आखिरी में लिखा कि साफ है कि आपके समय में आपदा वसूली का अवसर थी, मोदी जी के नेतृत्व में संकट में भी जनता को राहत देने का संकल्प है।
चुनावी माहौल है, तो प्रदेश के नेता बाहर जाकर भी लड़ रहे हैं।
एल्डरमैन की नियुक्ति जल्द
मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने म्युनिसिपलों में एल्डरमैनों की नियुक्ति कर दी है। मप्र के 123 म्युनिसिपल ने 429 एल्डरमैन नियुक्त हुए हैं। मप्र की नियुक्ति के बाद यहां भी हलचल शुरू हो गई है। हालांकि प्रदेश के बड़े नेता पांच राज्यों के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं, लेकिन पद के इच्छुक नेता मंत्रियों के संपर्क में हैं। कुछ ने तो पार्टी दफ्तर में बायोडाटा भी दे दिया है।
छत्तीसगढ़ में 667 एल्डरमैनों की नियुक्ति होनी है। पहले चर्चा यह भी थी कि एल्डरमैनों की नियुक्ति नहीं होगी। मगर मप्र में नियुक्ति होने के बाद यहां भी नियुक्ति की संभावना जताई जा रही है। साय सरकार आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है। म्युनिसिपलों का भी एक साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में जल्द से जल्द नियुक्ति के लिए दबाव बन रहा है। चर्चा है कि सबकुछ ठीक रहा तो मई में एल्डरमैनों की लिस्ट जारी हो सकती है। वजह यह है कि चार मई तक चुनावी व्यस्तता है, और इसके बाद फिर नियुक्तियों पर फैसला होगा। एल्डरमैनों के साथ ही निगम मंडलों के उपाध्यक्ष और सदस्यों की भी नियुक्ति के आसार हैं। देखना है आगे क्या होता है।
ब्लैक में सिलेंडर, पार्षद और विधायक
खाड़ी में चल रहे युद्ध के बीच पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की संभावित किल्लत को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें सतर्क हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की रात राज्यों के सीएम के साथ वर्चुअल बैठक में जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। बैठक में सीएम विष्णु देव साय यहां मंत्रालय से जुड़े थे। इसके बाद राज्य में समीक्षा शुरू हो गई है।
हालांकि, विशेषकर रसोई गैस की किल्लत के कारण कालाबाजारी पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल हो रहा है। इस बीच राजधानी रायपुर में खेलो इंडिया नेशनल ट्राइबल गेम्स का आयोजन चल रहा है, जिसमें देशभर से करीब 4 हजार खिलाड़ी पहुंचे हैं।
खिलाडिय़ों के खाने-पीने की व्यवस्था शहर के कई होटलों में की गई है। मैन्यू भी आयोजन समिति के अधिकारी तय कर रहे हैं, जिसमें एक समय चिकन परोसना अनिवार्य रखा गया है। लेकिन होटल समूह गैस की समस्या से जूझ रहे हैं। कई जगह चूल्हे और तंदूर का इस्तेमाल किया जा रहा है।
वहीं, लकड़ी और कोयले के दाम भी दोगुने से अधिक हो गए हैं। चिकन पकाने में ज्यादा समय लग रहा है जिससे होटल संचालकों की लागत बढ़ गई है। इस बड़े आयोजन से अच्छे मुनाफे की उम्मीद लगाए बैठे होटल व्यवसायियों को अब निराशा हाथ लग रही है। इससे परे रायपुर के एक पार्षद, जो होटल व्यवसाय से जुड़े हैं , वो गैस की समस्या को लेकर विधायक के पास पहुंचे। पार्षद ने उन्हें बताया कि कमर्शियल गैस सिलेंडर की उपलब्धता नहीं है, वो खुद ब्लैक में सिलेंडर लेने के लिए मजबूर हैं। विधायक ने तुरंत कालाबाजारी करने वालों कार्रवाई के लिए कहा, तो पार्षद ने टोक दिया। उन्होंने कहा कि यदि कार्रवाई हुई, तो ब्लैक में भी सिलेंडर मिलना बंद हो जाएगा। किसी तरह कार्रवाई के बजाय आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में प्रयास किया जाए, इससे ब्लैक मार्केटिंग रुक जाएगी। मगर कार्रवाई करना आसान है, लेकिन गैस उपलब्ध कराना कठिन हो गया है।
सुपरफूड की बंपर पैदावार फिर भी किसान लाचार

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर शहर इन दिनों मुनगा या सहजन की हरियाली से सराबोर है। मंडियों में रोज छोटे बड़े मालवाहकों में हरे-भरे मुनगा पहुंच रहे हैं।
मगर, बिलासपुर-जिसे सबसे अधिक मुनगा पैदा करने वाला जिला माना जाता है, की तिफरा थोक सब्जी मंडी में रोजाना 20 से 25 टन मुनगा आ रहा है, जबकि स्थानीय खपत मुश्किल से 10 से 15 टन तक ही सीमित है। नतीजा यह कि थोक भाव गिरकर 8 से 10 रुपये किलो रह गया है। शहर की दुकानों में 15 से 20 रुपये किलो में ही बिक पा रहा है। मजबूरी में उन्हें अपनी उपज बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भेजनी पड़ रही है। रोजाना 20-30 टन मुनगा बाहर जा रहा है, लेकिन वहां भी असली फायदा बिचौलियों की जेब में ही जा रहा है।
मुनगा साधारण फसल नहीं, बल्कि विशुद्ध छत्तीसगढ़ की आहार संस्कृति में शामिल सब्जी है और पोषण का खजाना है। इसे सुपरफूड यूं ही नहीं कहा जाता है। इसके पत्ते, फल, फूल और बीज सब उपयोगी हैं। इसमें दूध से कई गुना ज्यादा कैल्शियम, पालक से ज्यादा आयरन और संतरे से ज्यादा विटामिन सी पाया जाता है। यह इम्यूनिटी बढ़ाने, जोड़ों के दर्द में राहत और ब्लड शुगर नियंत्रित करने में भी मददगार है। इतनी उपयोगी चीज को उगाने वाले किसानों को उनकी मेहनत की कीमत नहीं रही है।
शहरों में मुनगा का उपयोग सीमित है। अगर इसे सरकारी पोषण योजनाओं, आंगनबाड़ी और मिड-डे मील में शामिल किया जाए, तो स्थानीय स्तर पर ही खपत बढ़ सकती है। अपने यहां कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स की भी भारी कमी है। अगर मुनगा से पाउडर, तेल, सूप या कैप्सूल बनाने के उद्योग स्थानीय स्तर पर लगें, तो यही फसल किसानों के लिए सोना बन सकती है।
एक और बड़ी समस्या विपणन व्यवस्था की है। स्थानीय किसानों के सामने परिवहन लागत उठाना मुश्किल हो जाता है और बाजार तक पहुंच घट जाती है। व्यापारी, ट्रक बुक कर दूसरे राज्यों में माल भेजते हैं, जिसकी लागत का हवाला देकर किसानों को पूरी कीमत नहीं दी जाती। थोक और चिल्हर कीमतों के बीच का बड़ा अंतर भी रहता है। इस चैनल पर किसान और उपभोक्ता दोनों ठगे जाते हैं।
छत्तीसगढ़ में धान के अलावा अनेक तिलहन-दहलन उत्पादों को एमएसपी में शामिल किया जा चुका है। क्या सब्जियों और फलों के लिए भी कोई सुरक्षा तंत्र नहीं होना चाहिए? केंद्र सरकार ने कई साल पहले ई-नाम जैसा प्लेटफॉर्म बनाया था ताकि देश की किसी भी मंडी में सही कीमत पर उत्पाद बेच सकें, पर छत्तीसगढ़ के आम किसान इस सेवा का लाभ कैसे उठाना है, यही नहीं जानता। रेलवे भी किसान एक्सप्रेस ट्रेन चलाती है, पर यह कई महीने में एकाध बार ही चलती है।
बंपर उत्पादन से यह तो तय हो जाता है कि छत्तीसगढ़ की जलवायु मुनगा उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल है। मगर, सरकार की नीतियां और बाजार की कमियां मुनगा किसानों की जेब नहीं भर रही है।
सलमान-कटरीना की पसंदीदा दुकान

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ न्यूज़ फोटोग्राफर गोकुल सोनी ने फेसबुक पर एक दिलचस्प फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है- ऑनलाइन शॉपिंग का ऐसा देसी वजऱ्न आपने कहीं नहीं देखा होगा। यहां DKR Collection में ON LINE Booking भी है। बस फर्क इतना है कि नेट नहीं, नेटवर्क वाला पड़ोसी चाहिए। Amazon, Flipkart वाले भी सोच में पड़ जाएं। भाई, ये ‘स्टार्टअप’ किस लेवल का जुगाड़ है। कुकरी तालाब गुढिय़ारी के इस शाप में सलमान और कटरीना भी कपड़े खरीदने की सोच रहे हैं।
मंडी से मंदिर तक आस्था और राजनीति
रायपुर की पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी भले ही अब तुलसी-बाराडेरा शिफ्ट हो चुकी हो, लेकिन पुराने परिसर की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गेट के बाहर स्थित राम-जानकी मंदिर आज भी श्रद्धा का बड़ा केंद्र बना हुआ है। 90 के दशक में बने इस मंदिर की खासियत यह है कि इसका निर्माण उस दौर में हुआ, जब देश में राम मंदिर, बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था। उस समय मंडी अध्यक्ष रहे मोहम्मद अकबर ने मंदिर का निर्माण कराया था।
आज भी परंपरा जारी है। नवरात्र में ज्योति कलश स्थापना के दौरान सबसे पहला नाम अकबर का ही लिया जाता है। उनके बाद के पदाधिकारियों में देवजी पटेल, सुरेखा महेश शर्मा और अनिता योगेंद्र शर्मा जैसे नाम भी इस परंपरा से जुड़े हैं। व्यापारी और किसान भी पीछे नहीं हैं। वे भी आस्था के इस सिलसिले में बराबर सहभागी हैं। रामनवमी के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना हो रही है, जिससे साफ है कि मंडी भले खाली हो गई हो, लेकिन आस्था अब भी आबाद है।
दूसरी ओर, इस खाली पड़ी जमीन पर जेम-ज्वेलरी पार्क बनाने का प्रस्ताव है, जिस पर सियासत गर्म है। मंडी से राजनीति की शुरुआत करने वाले कई नेताओं ने इसका विरोध किया है। देवजी पटेल इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट तक जा चुके हैं, और अब फिर से कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं। हालांकि पिछली सरकार ने पहले आपत्ति खारिज कर दी थी। वर्तमान में उनकी अपनी पार्टी सरकार ने भी देवजी की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया है। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि मंडी शिफ्ट हो चुकी है, ऐसे में खाली जमीन का अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग करना गलत नहीं है। मगर देवजी भाई पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में आगे क्या होगा, इस पर सबकी नजर है।
फोटो असली हो या नकली, सलाह खरी
एआई और फोटो-वीडियो एडिटिंग के दूसरे मामूली औजारों के इस वक्त में यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल रहता है कि असली क्या है और नकली क्या है? ऐसे में सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चित एक लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने आज अपनी तस्वीर के साथ एक पेट्रोल पंप पर लगे एक बैनर की फोटो पोस्ट की है । बारीकी से देखने पर, डिजिटल औजारों से परखने पर ऐसा लगता है कि यह बैनर कहीं और से लाकर इस फोटो पर जोड़ दिया गया है। जो भी हो बैनर असली हो या नकली, सलाह तो खरी है, और इस पर अमल में समझदारी भी है।
ईंधन संकट की आहट...
खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात का असर अब स्थानीय बाजार तक महसूस होने लगा है। ईंधन और रसोई गैस को लेकर संकट की चर्चाएं तेज हैं, और इसके साथ ही कालाबाजारी भी सिर उठाने लगी है।
प्रदेश में लगातार छापेमारी हो रही है, लेकिन हालात यह है कि कमर्शियल गैस सिलेंडर जहां तय कीमत करीब 1800 रुपये है, वहीं बाजार में 7 हजार रुपये तक बिकने की खबरें हैं। सरकार द्वारा होटल-रेस्टोरेंट को सीमित मात्रा (करीब 20 फीसदी) में ही कमर्शियल सिलेंडर देने के फैसले के बाद परेशानी और बढ़ गई है। इसका सीधा असर होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर पड़ रहा है। विकल्प के तौर पर डीजल चूल्हों की मांग बढ़ी है, लेकिन अब इनमें बने खाने में डीजल की गंध आने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जो नई चिंता का विषय बन गया है।
जिला प्रशासन ने पेट्रोल पंप संचालकों को ड्रम और जेरिकेन में पेट्रोल-डीजल देने पर सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं, यहां तक कि उल्लंघन पर पंप सील करने की चेतावनी भी दी गई है।
सरकार भले ही ईंधन और गैस की कोई कमी नहीं होने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी खबरें अलग कहानी कह रही हैं। पड़ोसी राज्यों के फैसले भी चिंता बढ़ा रहे हैं, महाराष्ट्र में ट्रक चालकों के लिए डीजल की सीमा तय की गई है, वहीं ओडिशा में रेस्टोरेंट्स को गैस की जगह पारंपरिक चूल्हे इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। अब देखना यह है कि यह संकट अफवाहों तक सीमित रहता है या वाकई बड़े असर के साथ सामने आता है।
शीर्ष फैसले का छत्तीसगढ़ पर असर..
छत्तीसगढ़ में वर्षों से प्रार्थना सभाओं पर संगठित हमले होते रहे हैं। पास्टरों पर लाठी-डंडों का प्रहार, महिलाओं-बच्चों की गरिमा का अपमान और सामाजिक बहिष्कार। ऐसे में 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला राज्य के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। इस फैसले के मुताबिक एक बार ईसाई या इस्लाम जैसे धर्म में सार्वजनिक रूप से प्रवेश कर लेने पर जन्म-आधारित जाति का लाभ तत्काल और पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के न केवल आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में बल्कि मैदानी इलाकों में भी धर्मांतरण के आरोप पर प्रार्थना सभाएं बाधित होती रही हैं। बस्तर के छिंदवाड़ गांव में एक दलित ईसाई परिवार के परिजन का शव तीन सप्ताह तक चीरघर में पड़ा रहा। ग्राम सभा के पारंपरिक रिवाज और पेसा कानून का हवाला देकर गांववालों ने शव दफनाने का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले में अंतत: शव को गांव के बाहर एक ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का आदेश हुआ। कुछ क्षेत्रों में दफनाए गए शव को निकालने के मामले भी आ चुके हैं। पादरियों के गांवों में प्रवेश को रोकने के ग्राम सभाओं के फैसलों को भी अदालत सही ठहरा चुकी है।
हाल ही में विधानसभा ने धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक पारित किया है, जो 1968 के पुराने कानून को बदल देता है। यह कानून जबरन, लालच, विवाह या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाता है, जिसमें सामूहिक धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास और अन्य अवैध मामलों में 10-20 साल की कैद के साथ भारी जुर्माने का प्रावधान है। पुराने कानून में केवल एक साल की सजा और 5 हजार रुपये का जुर्माना था।
दिलचस्प यह है कि पुराने कानून में भी सजा की दर बेहद कम रही या नगण्य रही है। वास्तव में लालच या धोखाधड़ी की बात को न तो धर्म परिवर्तन करने वाला स्वीकार करता है और न ही धर्मांतरित कराने वाला। इसलिये कानून कठोर बना देने का मतलब ऐसे मामलों में सजा की दर बढ़ जाएगी यह मान लेना सही नहीं होगा। दूसरी तरफ, शीर्ष अदालत ने आंध्रप्रदेश के जिस मामले को सुनकर यह फैसला दिया है वह अनुसूचित जाति से संबंधित है, जनजाति से नहीं। छत्तीसगढ़ में मत और धर्म बदलने वाले दोनों ही तरह के लोग हैं। मैदानी इलाकों में ओबीसी और एससी वर्ग के लोग तो आदिवासी बहुल इलाकों में एसटी वर्ग के। जिस केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, वह प्रार्थना सभा में हमले का मामला था। इस मामले में एससी अत्याचार अधिनियम के तहत आरोपियों पर कार्रवाई की मांग थी। मगर, अब साफ हो गया है कि प्रार्थना सभा में मौजूद लोग यदि अनुसूचित जाति के हैं और वे पुख्ता तौर पर धर्म बदल चुके हैं तो वे हमले की स्थिति में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर नहीं करा सकेंगे। मगर, बीएनएस में मौजूद सुरक्षा मिलती रहेगी।
काश! अपनी बाड़ी से डीजल उगा लेते
आज जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच तनाव ने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं, तब छत्तीसगढ़ में एक वक्त का पुराना नारा याद आता है- डीजल नहीं अब खाड़ी से, मिलेगा अपनी बाड़ी से। यह नारा कभी उम्मीदों का एक बड़ा गुब्बारा था। किसान मालामाल होने वाले थे मगर, ऐसा गुब्बारा निकला जो उडऩे से पहले ही फुस्स हो गया।
योजना क्या थी? छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाई गई। 2005 में तब के 16 जिलों में 16 करोड़ रतनजोत के पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया। 1.65 लाख हेक्टेयर बंजर और वेस्टलैंड पर खेती का लक्ष्य था। 2015 तक राज्य को बायोडीजल में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा गया। 2010 के बाद हर साल 40 अरब रुपये की कमाई बीज बेचकर होने वाली थी। राज्य के सरकारी वाहनों को 2007 तक रतनजोत डीजल पर चलाने का ऐलान किया गया था। भारतीय ऑयल के साथ क्रेडा बायोफ्यूल्स कंपनी बनाई गई। बंजर जमीन, वन विभाग की भूमि और यहां तक कि किसानों की खेती वाली जमीन पर भी पौधे लगाए गए। मनरेगा और बीज विकास निगम के जरिए लाखों पौधे मुफ्त बांटे गए। 7 नवंबर 2006 को सुंदरखेड़ा गांव में तब के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद रतनजोत का पौधा लगाया।
प्रचार चरम पर था। राज्य सरकार ने अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 350 करोड़ रुपये लगाए। केंद्र सरकार ने 2013 में ही नर्सरी के लिए 13.5 करोड़ रुपये दिए। 2005 में तो केंद्र से 15,000 करोड़ रुपये का निवेश मांगा गया था। हालांकि वह राशि मिली नहीं। तब की रमन सिंह सरकार ने बड़े उत्साह के साथ रतनजोत की खेती को बढ़ावा दिया था, सीएम ने अपनी सरकारी गाड़ी इसी डीजल से चलाकर दिखाई।
दावा किया गया था कि इससे बायोडीजल बनेगा और छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर हो जाएगा। गांव-गांव में पौधे लगे थे, लेकिन न डीजल निकला, न किसानों को फायदा मिला। रतनजोत के पौधे आज भी कई जगह सूखे खड़े मिल जाएंगे, किसी अधूरे वादे की याद दिलाते हुए।
मंत्रिमंडल की चर्चा!!
पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच सत्ता और संगठन—दोनों ही स्तर पर हलचल तेज हो गई है। चार मई को नतीजे आने के बाद कई राज्यों में सरकारों के भीतर बड़े फेरबदल की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। संकेत साफ हैं कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और ओडिशा में भी कैबिनेट में बदलाव संभव है।
छत्तीसगढ़ की बात करें तो भाजपा सरकार करीब ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मिड-टर्म रिव्यू की स्थिति बन रही है। पार्टी पहले भी गुजरात मॉडल पर बड़े प्रयोग कर चुकी है, जहां आधे कार्यकाल में पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया गया था। इसी फार्मूले की झलक लोकसभा चुनाव में भी दिखी थी, जब अधिकांश मौजूदा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर दांव खेला गया और नतीजे पार्टी के पक्ष में आए।
प्रदेश में भी इसी तरह के प्रयोग को लेकर अटकलें तेज हैं। अंदरखाने की खबर है कि मंत्रियों के प्रदर्शन का आकलन लगातार किया जा रहा है। संगठन और वैचारिक स्तर पर भी समीक्षाएं जारी हैं, और प्रमुख नेताओं के साथ लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन औसत माना जा रहा है, जिससे बदलाव की संभावना को और बल मिल रहा है।
इसी बीच एक और चर्चा यह है कि अनुभवी विधायकों को फिर से कैबिनेट में मौका दिया जा सकता है। इनमें अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, लता उसेंडी, विक्रम उसेंडी और पुन्नूलाल मोहिले जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं।
हालांकि समीकरण सिर्फ मंत्रिमंडल तक सीमित नहीं हैं। यह लगभग तय माना जा रहा है कि किसी वरिष्ठ विधायक को विधानसभा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन दिलचस्प यह है कि जो नेता पहले मंत्री रह चुके हैं, वे इस पद को लेकर खास उत्साहित नजर नहीं आ रहे।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, अटकलबाजियों का दौर जारी है। लेकिन इतना तय है कि जैसे ही चुनावी प्रक्रिया खत्म होगी, सत्ता के गलियारों में हलचल और तेज होगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पार्टी क्या वाकई गुजरात फार्मूला अपनाती है या फिर कोई नया राजनीतिक समीकरण सामने आता है।
बनवास का दर्द और अफसरों की कहानी
प्रदेश भाजपा में इस बार कार्यकारिणी गठन के बाद एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, नरेशचंद्र गुप्ता। संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले गुप्ता को नई कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल पाई। जबकि वो प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री रह चुके हैं। उनकी पहचान उन नेताओं में रही है, जो चुनावी मौसम में विरोधियों के खिलाफ पुख्ता शिकायतें तैयार कर चुनाव आयोग तक पहुंचाते थे।
गुप्ता की सक्रियता सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव अमिताभ जैन, डीजीपी अशोक जुनेजा और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉ. आनंद छाबड़ा सहित कई बड़े अफसरों के खिलाफ शिकायतों की झड़ी लगा दी थी। मामला पीएमओ तक पहुंचा और लंबे समय तक इन शिकायतों की चर्चा होती रही।
लेकिन, घटनाक्रम ने अलग ही मोड़ लिया। जिन अफसरों पर गुप्ता ने सवाल उठाए, वे बाद में और मजबूत स्थिति में नजर आए। अशोक जुनेजा को रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन मिला और उन्होंने सम्मानजनक तरीके से कार्यकाल पूरा किया। अमिताभ जैन रिटायरमेंट के बाद सीआईसी बन गए, जबकि डॉ. आनंद छाबड़ा प्रमोशन पाकर एडीजी बन गए।
यही वह बिंदु था, जहां से गुप्ता की अति सक्रियता पार्टी के भीतर असहजता का कारण बनने लगी। संगठन में यह संदेश गया कि लगातार शिकायतों की राजनीति उलटी भी पड़ सकती है। नतीजा, पहले कार्यालय मंत्री पद से हटे और अब कार्यकारिणी से भी बाहर हो गए।
हालांकि, राजनीति में संभावनाएं खत्म नहीं होतीं। निगम-मंडलों में नियुक्तियां बाकी हैं, जहां उनके लिए अभी भी गुंजाइश मानी जा रही है। लेकिन, उनके फेसबुक पोस्ट ने अंदरूनी पीड़ा उजागर कर दी, बनवास केवल जगह से नहीं होताज् अपनों के बीच अजनबी बनकर जीना भी बनवास है।
पेट्रोल-डीजल में अभी जेब ढीली नहीं होगी
खाड़ी देशों से कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कतें हैं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम ऊपर जा रहे हैं, लेकिन देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें थमी हुई हैं। प्रीमियर वेरियेंट के ईंधन और रसोई गैस के दाम में हुई थोड़ी बढ़ोतरी के साथ-साथ लोगों के भीतर यह सवाल घूम रहा है कि पेट्रोल-डीजल में राहत वैसे कब तक रहेगी। पिछले अनुभव बताते हैं कि यह सहूलियत स्थायी नहीं है। इस समय असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल व केंद्र शासित पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि बाकी राज्यों में कीमतें बढ़ा दी जाएं और इन राज्यों को छोड़ दिया जाए।
कुछ पुराने दिनों को याद कर लें। 2019 लोकसभा चुनाव के लिए मतदान चल रहा था तो कीमतें नहीं बढ़ीं। अंतिम चरण 19 मई को खत्म होते ही 20 मई से रोजाना बढ़ोतरी शुरू हो गई। अगले 9 दिनों में पेट्रोल 83 पैसे और डीजल 73 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया। 2022 के पांच राज्यों यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव हुए। पूरे 137 दिनों तक कीमतें पूरी तरह फ्रीज रहीं। चुनाव खत्म होते ही 22 मार्च 2022 से 80 पैसे प्रति लीटर बढ़ोतरी हुई और उसके बाद लगातार कई बार बढ़ाई गईं। ऐसा ही 2018 में कर्नाटक चुनाव और 2017 में गुजरात चुनाव के दौरान भी कीमतें अचानक स्थिर हो गई थीं और वोटिंग के बाद तेजी से बढ़ी।
जब क्रूड ऑयल के दाम निचले स्तर पर आ गए थे तब भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम कम नहीं किए गए थे। अब जब इसकी कीमत 60 से 70 प्रतिशत अधिक हो चुकी है तो जाहिर है हम- आप बढ़ी हुई कीमत का सामना करने से बचेंगे नहीं। पांच चुनावी राज्यों के मतदाताओं का हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी नाराजगी से बचने के लिए सरकार ने हमें भी थोड़े दिन के लिए सही राहत दी है और पुरानी कीमत पर पेट्रोल-डीजल खरीदने का मौका मिल रहा है। सबसे अंत में मतदान 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। तब तक कोई टेंशन नहीं लेना है।
परीक्षा की शुचिता कठघरे में..
2019 से 2024 तक 19 राज्यों में कम से कम 65 बड़े पेपर लीक हुए, जिनसे 1.7 करोड़ से अधिक युवा प्रभावित हुए। राजस्थान अकेला पेपर लीक की राजधानी बन चुका है, जहां 2015-2023 के बीच 14 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। छत्तीसगढ़ भी अब ऐसे राज्यों की सूची में शामिल हो गया है। 14 मार्च को छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12वीं हिंदी परीक्षा हुई। लेकिन परीक्षा से महज कुछ घंटे पहले ही प्रश्न-पत्र के कुछ प्रश्न व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। 23 तारीख को हुई परीक्षा समिति की बैठक में सबूतों की समीक्षा के बाद परीक्षा को निरस्त घोषित कर दिया गया है। अब पुनर्परीक्षा 10 अप्रैल को होगी। हजारों छात्र-छात्राएं, जिन्होंने महीनों की मेहनत से तैयारी की थी, साजिश का शिकार हो गए।
सीजीपीएससी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के अनेक मामलों के बाद ताजा घटना छत्तीसगढ़ में परीक्षा प्रणाली में गिरावट की ताजा कड़ी है। इसमें शामिल है प्रशासनिक लापरवाही, रिश्वतखोरी का जाल और नकल माफिया का संगठित नेटवर्क। अक्सर यह देखा गया है कि परीक्षा केंद्रों, प्रिंटिंग प्रेस या शिक्षा विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ मिलकर कोचिंग संस्थानों और माफियाओं का एक गठजोड़ काम करता है। सोशल मीडिया के जरिए पेपर का वायरल होना और सख्त निगरानी की कमी, परीक्षा प्रणाली को खोखला कर रहे हैं। एआई और सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जहां हर चीज डिजिटल है, इसका फायदा नकल और पेपर लीक करने वाले गिरोह तो उठा रहे हैं पर इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्थाएं नहीं उठा पा रहीं।
पेपर लीक पर एक समान कानून पूरे देश के लिए अब तक नहीं बना है। कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर कानून बनाए हैं। छत्तीसगढ़ ने तो हाल ही में परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम विधेयक 2026 पारित किया है, जिसमें 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ तक जुर्माने का कठोर प्रावधान है। लेकिन कानून को कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचने में अभी समय है। दोषियों को सजा दिलाने में ये नए प्रावधान कितने कारगर साबित होंगे यह भी बाद में पता चलेगा। क्या इस लीक की जांच निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी होगी? क्या बिना दबाव दोषियों को सजा मिल सकेगी?
जब आस्था शिखर छू लेती है

नवरात्रि को लेकर इन दिनों छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में मां के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना हो रही है, लेकिन कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां पहुंचना ही अपने आप में एक तपस्या बन जाता है।
ऐसा ही है, कोरबा जिले के गढक़टरा गांव से करीब 2 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित कंचन पहाड़। गांव के लोगों की श्रद्धा इतनी गहरी है कि हर शुभ कार्य से पहले वे यहां आकर माथा टेकते हैं, मन्नत मांगते हैं।
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता नहीं है। एक खड़ी, लगभग सीधी चट्टान और उस पर जीवनरेखा बनी बरगद की लटकती जड़ें। इन्हीं जड़ों को थामकर, पत्थरों की छोटी-छोटी दरारों में पैर टिकाते हुए ऊपर चढऩा पड़ता है। हर कदम पर जोखिम, हर पकड़ में सावधानी। जरा सी चूक और नीचे सीधे गहरी खाई। ऊपर पहुंचकर जो दृश्य दिखता है, वह अभिभूत कर देता है। दूर-दूर तक फैली पहाडिय़ों की श्रृंखला, शांत वातावरण और एक अलौकिक ऊर्जा का एहसास।
तबादलों की आहट
प्रदेश में जल्द ही बड़े प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट है। आईएएस और आईपीएस अफसरों की तबादला सूची कभी भी जारी हो सकती है। माना जा रहा है कि जिन अफसरों को एक ही विभाग में दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, उन्हें बदला जाएगा।
जनसंपर्क विभाग में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। मौजूदा आयुक्त रवि मित्तल की पीएमओ में उपसचिव के पद पर नियुक्ति हुई है। जिसके बाद इस पद पर नई नियुक्ति होगी।
वहीं, आईपीएस महकमे में भी हलचल है। 2020 बैच के एक युवा अधिकारी अध्ययन अवकाश पर जा रहे हैं, जबकि एक जिले की महिला एसपी लंबी छुट्टी पर रहेंगी। ऐसे में उनके स्थान पर नई पोस्टिंग तय है। चर्चा है कि आधा दर्जन से ज्यादा आईपीएस अफसरों के प्रभार में बदलाव हो सकता है।
‘बिहार दिवस’ पर चुप्पी
इस साल 22 मार्च को बिहार दिवस प्रदेश में लगभग खामोशी के साथ गुजर गया। न कोई बड़ा आयोजन हुआ, न ही औपचारिक राजनीतिक सक्रियता दिखी। खासकर भाजपा ने इस बार दूरी बनाकर रखी, जबकि पिछले साल इसी मौके पर कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, और उसी को लेकर विवाद भी खड़ा हुआ था।
दरअसल, पिछली बार बिहार दिवस मनाने के फैसले पर स्थानीय संगठनों, खासकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना ने कड़ा विरोध जताया था। उनका सीधा सवाल था—क्या बिहार में कभी छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस मनाया जाता है? इस बहस ने छत्तीसगढिय़ा बनाम बाहरी जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी हवा दी।
सोशल मीडिया में भी भाजपा को आलोचना झेलनी पड़ी। यहां तक आरोप लगे कि यह आयोजन बिहार प्रभारी नितिन नबीन को खुश करने के लिए किया गया था।
असल वजह राजनीतिक थी। उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल था और भाजपा वहां सक्रिय प्रचार में जुटी थी। इसलिए छत्तीसगढ़ में भी ‘बिहार कनेक्ट’ दिखाने की कोशिश की गई।
अब हालात बदल चुके हैं—बिहार में चुनाव खत्म हो चुके हैं और भाजपा गठबंधन की सरकार बन चुकी है। ऐसे में इस बार कोई राजनीतिक आवश्यकता नहीं दिखी। साथ ही, पिछली बार जैसे विवाद की पुनरावृत्ति से बचने के लिए भी इस मुद्दे से दूरी बनाना ही बेहतर समझा गया।
‘एआई’ बना नया बचाव कवच..
अब सियासत में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है—विवादित वीडियो और ऑडियो को ‘एआई जनरेटेड’ बताकर खारिज करना। हाल के घटनाक्रम इसे और स्पष्ट करते हैं।
पिछले दिनों रिकेश सेन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे। बताया गया कि यह वीडियो भिलाई के एक मॉल का है और पुराना (क्रिसमस के समय का) है। वीडियो सामने आते ही उन्होंने तुरंत पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजते हुए इसे एआई से बनाया गया फर्जी वीडियो बताया और कार्रवाई की मांग की। फिलहाल पुलिस इसकी जांच में जुटी है।
मामला यहीं नहीं थमा। पिछले दिनों विधानसभा में भी इस पर चुटकी ली गई। जब रिकेश सेन सवाल पूछने खड़े हुए, तो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वायरल वीडियो का जिक्र कर तंज कस दिया। रिकेश सेन ने जवाब में फिर यही कहा कि वीडियो एआई जनरेटेड है और इस पर एफआईआर दर्ज कराई जा रही है।
भूपेश बघेल ने पुराने एक और वीडियो का जिक्र छेड़ दिया, जो विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया में खूब चर्चा में था। उस वीडियो में कथित तौर पर प्रेम प्रकाश पाण्डेय के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग दिखाया गया था। इस पर भी रिकेश सेन ने फर्जी और एआई से तैयार करार दिया।
यह ट्रेंड सिर्फ एक दल तक सीमित नहीं है। कुछ महीने पहले कांग्रेस की महिला विधायक शेषराज हरबंश का भी एक ऑडियो वायरल हुआ था, जिसमें रेत के अवैध खनन को लेकर कथित बातचीत सामने आई। हालांकि उन्होंने इसे एआई जनरेटेड बताने के बजाय सीधे तौर पर खारिज किया और अपनी संलिप्तता से इनकार किया। साफ है कि अब एआई सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
एक तरफ यह ‘फेक कंटेंट’ से बचाव का हथियार है तो दूसरी तरफ असली-नकली की पहचान करना बड़ी चुनौती बनती जा रही है।


