नयी दिल्ली, 4 फरवरी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ बुधवार को उच्चतम न्यायालय में स्वयं अपनी दलीलों को रखा और निर्वाचन आयोग पर राज्य को कथित तौर पर बेवजह निशाना बनाने और वहां के नागरिकों के अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया।
बनर्जी ने न्यायालय से ‘‘लोकतंत्र को बचाने’’ और निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के निष्पक्ष एसआईआर को सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। उन्होंने दावा किया कि जारी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा कई जीवित व्यक्तियों को मृत घोषित कर दिया गया है।
उन्होंने एक बार निर्वाचन आयोग को ‘‘व्हाट्सएप आयोग’’ कहा था, जो स्पष्ट रूप से निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन अधिकारियों को व्हाट्सएप पर कथित रूप से भेजे जा रहे निर्देशों की ओर इशारा था।
बनर्जी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और श्याम दीवान ने किया। बनर्जी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से व्यक्तिगत रूप से अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति मांगी।
उन्होंने कहा कि उनके राज्य को कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है और एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग को छह पत्र लिखे जाने के बावजूद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है।
उन्होंने न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ से कहा, ‘‘उनकी एसआईआर प्रक्रिया केवल नाम हटाने के लिए है, शामिल करने के लिए नहीं।’’
बनर्जी ने आरोप लगाया, ‘‘पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है’’ और पूछा कि असम में यही मापदंड क्यों नहीं अपनाया जा रहा है।
सुनवाई की शुरुआत में दीवान ने दलीलें पेश कीं और बाद में ममता उनके बगल में खड़ी नजर आईं।
इसके बाद, बनर्जी ने पीठ से अदालत से अपनी दलीलों को रखने की अनुमति देने का अनुरोध किया।
उन्होंने पूछा, ‘‘क्या आप मुझे सिर्फ पांच मिनट का समय दे सकते हैं।’’
प्रधान न्यायाधीश ने जवाब में कहा कि अदालत उन्हें अपनी दलीलें पेश करने के लिए पांच मिनट नहीं, बल्कि 15 मिनट का समय देगी।
उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया के कारण नागरिकों को हो रही कठिनाइयों को उजागर किया और कहा कि लोग इस बात से खुश हैं कि उच्चतम न्यायालय ने इस प्रक्रिया में आधार को एक दस्तावेज के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया है।
बनर्जी ने आरोप लगाया कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद, निर्वाचन आयोग आधार कार्ड स्वीकार नहीं कर रहा है और मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए मतदाताओं से अन्य दस्तावेज मांग रहा है।
उन्होंने पूछा, ‘‘अन्य राज्यों में निवास प्रमाण पत्र, परिवार पंजीकरण कार्ड आदि जैसे दस्तावेज मान्य हैं... वे चुनाव के समय केवल बंगाल को ही निशाना बना रहे हैं। इतनी जल्दी क्या थी?’’
उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया, जिसमें आमतौर पर दो साल लगते हैं, राज्य में त्योहारों और फसल कटाई के मौसम के दौरान भी तीन महीने की छोटी अवधि में पूरी की जा रही है।
बनर्जी ने यह भी दावा किया कि जारी प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा कई जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया है।
इसके बाद, उन्होंने एसआईआर कवायद में शामिल अधिकारियों की मौत का मुद्दा उठाया।
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि राज्य सरकार ने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए उपजिलाधिकारी जैसे द्वितीय श्रेणी (ग्रेड-2) के केवल 80 अधिकारियों की सेवाएं प्रदान की हैं।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस प्रक्रिया के लिए केवल आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं जैसे निम्न श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों को ही उपलब्ध कराया गया है।
बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि राज्य ने निर्वाचन आयोग द्वारा मांगी गई हर चीज उपलब्ध कराई है।
अपनी दलीलों की शुरुआत में, बनर्जी ने रवींद्रनाथ टैगोर को उद्धृत करते हुए कहा, ‘‘समस्या यह है कि हमारे वकीलों ने शुरू से ही हमारा पक्ष रखा, लेकिन सब कुछ खत्म होने के बाद भी हमें न्याय नहीं मिल रहा है। जब न्याय बंद दरवाजों के पीछे हो रहा है, तो हमें कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं एक बंधुआ मजदूर हूं महोदय... मैं एक साधारण परिवार से हूं और मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं।’’
जब निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील ने बीच में दखल दिया, तो बनर्जी ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘कृपया मुझे बोलने की अनुमति दें महोदय!’’
बनर्जी ने दावा किया कि निर्वाचन आयोग ने तार्किक विसंगति सूची पर शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया है।
जब निर्वाचन आयोग के वकील ने उनकी दलीलों पर आपत्ति जताई, तो प्रधान न्यायाधीश कांत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘मैडम बोलने के लिए इतनी दूर तक आई हैं।’’
सुनवाई के दौरान, पीठ ने टिप्पणी की कि ‘‘पात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची में बने रहना चाहिए’’।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हर समस्या का समाधान होता है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी निर्दोष व्यक्ति इससे वंचित न रह जाए।
अपनी दलीलें समाप्त करते हुए, बनर्जी ने उन्हें बहस करने का अवसर देने के लिए पीठ के प्रति आभार व्यक्त किया और उनसे ‘‘लोकतंत्र को बचाने’’ का आग्रह किया।
पीठ ने नोटिस जारी कर निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से उनकी याचिका पर नौ फरवरी तक जवाब मांगा है। (भाषा)