अभी मेरी एक परिचित लडक़ी ने अपनी निजी जिंदगी के मामलात पर बात करते हुए कहा कि जिस लडक़े से उसका प्रेम था, वह दूसरे देश में बस गया है, वह हिंदुस्तान लौटना नहीं चाहता, और मेरी यह परिचित इस देश को छोडक़र बसना नहीं चाहती। बात वहीं खत्म हो गई। प्रेम बरसों का था, लेकिन मतभेद ताजा थे, मतभेद को मनभेद में बदलने नहीं दिया, और हंसी-खुशी अपनी-अपनी राह लग लिए। दोनों परिपच् थे, वरना आखिरी मुलाकात के वक्त रस्सी, चाकू, और बाकी किस्म के औजार दोनों के ही पास थे। अब बिल्कुल ठंडे दिल से यह लडक़ी कुछ महीनों के भीतर एक नया रिश्ता शुरू कर चुकी है।
आज दुनिया में लंबी दूरी के रिश्तों की वजह से बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें आगे की संभावनाएं नहीं दिखतीं, तो जोड़ीदार अपनी-अपनी राह लग लेते हैं। लेकिन बहुत से मामलों में यह भी होता है कि एक-दूसरे की लंबी राह को तकने के बजाय लोग अपने आसपास की दुनिया में तब तक किसी और को भी तक लेते हैं, और लंबे इंतजार के बीच एक छोटे बुलबुले की दुनिया जी लेते हैं।
हिंदुस्तान के परंपरागत समाज में यह सोचना थोड़ा सा मुश्किल होता है कि लोग स्थायी दुनिया बनाने और बसाने का इंतजार करते हुए एक अस्थायी दुनिया में भी जीने लगते हैं। पश्चिम के देशों में कुछ शादीशुदा जोड़े ऐसे रहते हैं जो आपसी सहमति से अलग-अलग भी रिश्ते बना लेते हैं। ओपन रिलेशनशिप्स, या ओपन मैरिज की यह धारणा भारत में अधिक चर्चा में नहीं है, इसलिए यह माना जा सकता है कि यहां इसका चलन कम है। लेकिन दुनिया के बहुत से विकसित और उन्मुक्त समाज कई तरह के खुले रिश्तों में भरोसा रखते हैं। वहां न शादी जरूरी होती, न बच्चे पैदा करने के लिए पिता का नाम जरूरी होता। कई मामलों में पति-पत्नी दोनों अलग-अलग देह-साथी भी बना लेते हैं, जो कई बार एक-दूसरे की जानकारी में रहते हैं, और कई बार वे यह तय कर लेते हैं कि वे इसकी चर्चा एक-दूसरे से नहीं करेंगे। कुछ एक मामले ऐसे भी रहते हैं जहां ओपन मैरिज के ऐसे बाहरी साथी कभी-कभार सब एक साथ मिल भी लेते हैं। इंद्रधनुष में जितने रंग होते हैं, या किसी जंगल में पत्तों के जितने किस्म के आकार, उतने ही किस्म के रिश्ते भी होते हैं।
बहुत से देश और समाज ऐसे हैं जो सोच और रिश्तों की विविधता के साथ अहिंसक तरीके से जीना सीख लेते हैं वहां वह एक जीवनशैली ही बन जाती है। इधर हिंदुस्तान में हर दिन शादीशुदा जिंदगी, या कि प्रेम-संबंधों में शक पैदा होने की वजह से दर्जनों हत्याएं हो रही हैं, और कई आत्महत्याएं भी। किसी-किसी मामले में तो शक के आधार पर पति अपनी पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों को भी मार डाल रहे हैं। हर किस्म के विवाह, प्रेम, और देह-संबंधों में हिंसा इतनी आम हो चली है कि यह हैरानी होती है कि लोगों को साथ रहना मुमकिन न लगे, तो क्या वे अलग-अलग राह पर चलना नहीं जानते?
अब शहरीकरण बढऩे के साथ-साथ पूरी दुनिया में कई ऐसे प्रेमी या शादीशुदा जोड़े होते हैं जिनको अपनी पढ़ाई के लिए, नौकरी या कारोबार के लिए, या कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते एक-दूसरे से बरसों अलग रहना पड़ता है। हर किसी की तन-मन, और धन की जरूरतें ऐसी नहीं रहती हैं कि वे अकेले पूरी हो जाएं। ऐसे में एक-दूसरे से दूर रहने को मजबूर लोगों के बीच में कभी-कभी कोई नीला ड्रम भी आ जाता है। और ऐसे नीले ड्रम के साथ-साथ पार्टनर-इन-क्राइम कहे जाने वाले कोई नए प्रेमी-प्रेमिका, या साथी भी आ जाते हैं, जो कि ठिकाने लगाने में भागीदार बनने को तैयार रहते हैं।
लोगों को याद होगा कि 1974 में भारत में आई एक फिल्म ‘रजनीगंधा’ एक नए किस्म की जटिलता पर अपने वक्त से पहले बनी हुई फिल्म थी। इसमें नायिका को अपने शहर में एक नौजवान से प्यार रहता है, लेकिन जब वह एक इंटरव्यू देने एक दूसरे शहर जाती है तो वहां उसे अपना पिछला और पहला प्रेमी मिल जाता है। इन दो शहरों में बसे दो प्रेमियों के बीच यह नायिका एक दुविधा में उलझी रहती है कि जाए तो जाए कहां। शायद मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी यह फिल्म पूरी की पूरी इसी दुविधा के साथ आगे बढ़ती है। अब यह हिंदुस्तान में बनी एक बिना सेक्स-संबंधों वाली महज भावनाओं में गूंथी गई फिल्म थी, इसलिए यह देह-संबंधों के चित्रण के बिना पूरी भी हो गई। लेकिन आज की असल जिंदगी में लोग जिंदगी को देह सुख के साथ भी कतरा-कतरा जीना सीख लेते हैं।
दुनिया के दो अलग-अलग देशों में एक प्रेमी-जोड़ा तीन-तीन बरस के लिए पीएचडी रिसर्च कर रहा था। उनमें से एक, अपने दोस्त से मैंने पूछा कि इतनी लंबी दूरी, और इतने लंबे फासले के बीच अगर दूसरे के किसी तीसरे से देह-संबंध हो जाएं, तो उसे दूर-दूर रिसर्च करने वाले ये लोग किस तरह लेते हैं? ऐसे खतरे को किस तरह टालते हैं? तो उसका कहना था कि ऐसे खतरे टाले नहीं टलते हैं, इतना लंबा अकेले रहते जो होना है वो हो ही जाता है। हमारे सामाजिक अध्ययन के शोधकर्ता जोड़ों के बीच आम चलन यह रहता है कि जहां जो हुआ उसे वहीं छोडक़र, और वहीं भूलकर लौटें। और एक अघोषित सहमति इस पर रहती है, डोंट आस्क, डोंट टेल।
यह मेरे लिए रिश्तों में खुलेपन का एक नया आयाम था। और दुनिया में जितने किस्म के अलग-अलग समाजों के लोगों से मिलना होता है, उनसे किसी न किसी, तब तक अनजाने पहलू की जानकारी मिलती है।
अभी पश्चिम के किसी देश की एक महिला का लंबा इंटरव्यू आ रहा था कि जब उसने कृत्रिम गर्भाधान से मां बनना तय किया तो इसके लिए उसने अपने सबसे करीबी दोस्त के शुक्राणु नहीं लिए, बल्कि उसे सबसे अधिक पसंद एक दूसरे समलैंगिक पुरूष के शुक्राणु लिए। अब उस लंबे इंटरव्यू के सारे तर्कों को मैं यहां लिख नहीं सकता लेकिन यह सुनकर आपका दिमाग घूम रहा है या नहीं? मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जिनकी शादी तो किसी और से हुई रहती है, लेकिन हो बच्चे किसी और से चाहते हैं।
खुले रिश्तों की बात पर लौटें, तो आज आसपास बहुत से ऐसे रिश्ते दिखते हैं जिन्हें लोग समानांतर चलाते रहते हैं। इनमें से किसी को वे फुल टाइम मानते हैं, किसी को पार्टटाइम मानते हैं, किसी को सिर्फ मन के लिए और किसी को सिर्फ तन के लिए। कुछ रिश्ते ऐसे भी रहते हैं जिन्हें फ्रेंड्स विद बेनिफिट कहा जाता है। ऐसे रिश्ते कई बार सिर्फ धन के लिए रहते हैं, और कभी-कभी अपने स्थायी रिश्ते में तन और मन की संतुष्टि की कमी की वजह से भी।