आजकल
विश्वरंजन का गुजर जाना बहुत से लोगों की जिंदगी से एक बड़ी अहमियत वाली हस्ती का गुजर जाना है। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के आईपीएस रहे, बहुत लंबे वक्त तक भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी, आईबी के एक सबसे बड़े ओहदे पर रहे, और छत्तीसगढ़ का पुलिस प्रमुख बनकर उन्हें अनमने ढंग से लौटना पड़ा, क्योंकि उस वक्त के डीजीपी के अचानक गुजर जाने से दफ्तर खाली हो गया था, और छत्तीसगढ़ में उनसे अधिक माकूल कोई दूसरा अफसर मिल नहीं सकता था। इसलिए वे दशकों बाद छत्तीसगढ़ पुलिस में लौटे।
विश्वरंजन पुलिस के एक बड़े काबिल, और असाधारण व्यक्तित्व के धनी अफसर थे। साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी और सक्रिय दखल, उन्हें पुलिस और सरकार से परे के एक अलग दायरे से जोडक़र रखते थे। वे पेंटिंग भी करते थे, कविता भी लिखते थे, और उनके साथ बरसों की दोस्ती में मैं उनकी इन दोनों खूबियों की भाषाओं से अनजान सुखी बना रहा। किसी कवि-दोस्त की कविता पढऩे का बोझ मुझ पर नहीं रहता, और मजदूर या क्रांतिकारी गीतों से अधिक कुछ समझ नहीं पड़ता, इसलिए मैं अपने कविता-निरक्षर होने की नुमाइश करने में नहीं हिचकता। विश्वरंजन के साथ शायद सैकड़ों बार घंटों-घंटों बैठने पर भी मैं उनकी कविताओं से बेदाग बचा रहा। दूसरी तरफ पेंटिंग के बारे में मेरी नासमझी पर उन्हें तरस भी आती थी, और वे कहते थे कि चित्रकला को पढऩे की एक अलग भाषा होती है, जो कि किस्सा-कहानी की भाषा से अलग रहती है।
लेकिन पुलिस-प्रमुख के उनके कामकाज से परे उनकी जो बात मुझे बांध लेती थी, वह किसी विश्वकोष जैसा उनका ज्ञान, उस ज्ञान के मतलब निकालने की उनकी अपार समझ, उसे बांटने की उनकी तत्परता, और इतनी ही तत्परता असहमति को सुनने की, और दूसरों से ज्ञान हासिल करने की। वे ज्ञान का एक ऐसा समंदर थे जो कि एक स्याहीसोख्ते की तरह प्यासे भी रहते थे, नए-नए लोगों से मिलने, और उनसे नई बातें जानने के लिए। यह एक बात उनमें और मुझमें एक सरीखी थी, लेकिन इससे परे की कुछ बातें एक दूसरे के ठीक खिलाफ भी थीं। वे एक चेन-स्मोकर थे, और बिना सिगरेट कम ही रहते थे। दूसरी तरफ मैं तम्बाकू का हिंसक हद तक विरोधी रहा, और विश्वरंजन की सिगरेट से अपनी हिकारत छुपाने की जहमत मैंने कभी नहीं उठाई। लेकिन घंटों साथ बैठना होता ही था, इसलिए हमने यह तय किया हुआ था कि बंद कमरे में वे कभी मेरी मौजूदगी में सिगरेट नहीं पिएंगे, और उनके दफ्तर से रात में जब हम रवाना होंगे, तो सामने के खुले मैदान पर टहलते हुए वे मुझसे कुछ दूरी पर चलते हुए एक सिगरेट पिएंगे, और मैं उसे बर्दाश्त करूंगा।
मेरे घर आकर ठहरने वाले एक विदेशी प्रोफेसर के साथ खाने पर जब-जब मैंने विश्वरंजन को आमंत्रित किया, तो दोनों चेन-स्मोकर घर के बाहर कॉलोनी की सडक़ पर पैदल घूमते हुए सिगरेट पीकर लौट आते थे, लेकिन नक्सल मोर्चे पर उस वक्त के सबसे बड़े पुलिस अफसर होने के नाते विश्वरंजन निशाने पर रहते थे, और उनकी अंगरक्षक टीम मुझसे इस बात पर फिक्र जाहिर करती थी कि साहब को सिगरेट पीने मेरे घर से बाहर जाना पड़ता है, खुले में, खतरे में। लेकिन यह रोक-टोक उनके रायपुर छोडऩे तक चलती रही। उनकी पत्नी यह बात मानती थीं कि मैं ही अकेला उन्हें कुछ समय के लिए सिगरेट से रोकता हूं, जो कि मेरे चले जाने के बाद फिर शुरू हो जाती है।
विश्वरंजन देश और दुनिया के एक मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी के नाती थे। इस नाते उनकी बड़ी संपन्न और समृद्ध यादें थीं, और वे खुले खयालों के थे, इसलिए मैं उनसे इस बात की चर्चा भी कर लेता था कि फिराक को लेकर यह बात उठती रहती है कि उनके समलैंगिक संबंध भी थे। वे ऐसे विवादों से नावाकिफ नहीं थे, और न ही यह मानते थे कि फिराक के जिंदगी के किसी पहलू को बातचीत से परे रखना चाहिए। साहित्य में विश्वरंजन की दखल मेरे किसी काम की थी नहीं, फिर भी वे मुझे अपने संपादन वाली कुछ किताबें भेंट करते रहते थे, जो कि बिना पढ़े अभी भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वे इतने करीबी दोस्त थे कि इन किताबों को लेने से मना करके मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता था, लेकिन बाकी कवि-साहित्यकारों को मैं विनम्रता से मना करके किसी सुपात्र को उनकी किताब भेंट करने की सलाह दे देता हूं।
छत्तीसगढ़ पुलिस में उनके पहले और उनके बाद बरसों तक वैसा कोई काबिल प्रमुख आया नहीं, और वे काबिलीयत में एक अपवाद सरीखे थे। सत्तारूढ़ नेताओं की राजनीतिक पसंद-नापसंद का अपमान किए बिना उसे खारिज कर देने का हौसला उन्हें आईबी में सबसे ऊपर के दो-चार अफसरों में रहते हुए मिल चुका था, और वे छोटी-छोटी राजनीतिक ताकतों को चर्चा के लायक भी नहीं मानते थे। मैंने उनके साथ घंटों चलने वाली बैठकों में कई बार देखा कि किसी तबादले के लिए, या किसी दूसरे काम के लिए सत्ता की सबसे ऊंचाई से भी फोन आने पर वे मना करना जानते थे। विनम्र रहते थे, लेकिन साफ-साफ मना कर देना उनके मिजाज में था।
अमरीका के विख्यात उदारवादी और वामपंथी सोच के विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया के बर्कले ने जब भारतीय लोकतंत्र पर एक सेमीनार किया, तो वामपंथी उग्रवाद पर केन्द्रित एक सत्र में उन्होंने विश्वरंजन और मुझे, दोनों को बोलने के लिए आमंत्रित किया। जब हम वहां पहुंचे, तो सभागृह के बाहर बरामदों में, लिफ्ट में, पुरूष शौचालय के भीतर, हर जगह विश्वरंजन की मुंह से लहू टपकती हुई, ड्रैकुला जैसी तस्वीर बनाकर उस पर नारे छपे थे- वॉर क्रिमिनल विश्वरंजन गो-बैक। उनके कार्यकाल में नक्सलियों के खिलाफ बड़ी मुहिम चलती रही, राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह, और केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के बीच नक्सल मोर्चे को लेकर कोई मतभेद नहीं था। इसलिए दोनों की मिलीजुली कार्रवाई से बस्तर में नक्सलियों के सफाए की बड़ी मुहिम चलती थी, और उसमें विश्वरंजन की खासी बदनामी भी होती थी, क्योंकि मानवाधिकार हनन के कई मामले आते थे। ऐसी ही बदनामी के चलते विश्वरंजन के खिलाफ बर्कले विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सभागृह के भीतर इतनी लंबी नारेबाजी की थी, और उन्हें सुनने के लिए वे किसी तरह तैयार ही नहीं थे। मंच पर पैनल में बैठे हुए मुझे यह लग रहा था कि अगले तीन दिन इसी शहर में इन हजारों छात्र-छात्राओं के बीच विश्वरंजन के साथ घूमते हुए मैं भी सुरक्षित बचूंगा या नहीं? लेकिन वे अपने आम बर्दाश्त के साथ बैठे रहे, और जब बोलने का मौका आया तो उन्होंने पुलिस और सरकार का पक्ष रखा, केन्द्र और राज्य सरकार, दोनों का।
आज जिस वक्त मैं यह लिखने बैठा हूं, ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमले चल रहे हैं। मुस्लिमों के लिए रमजान का महीना चल रहा है, जो उनके लिए साल का सबसे पवित्र त्यौहार रहता है, और ऐसे में जगह-जगह लाशें बिखरी हुई हैं। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता, और सरकार के नीति निर्धारक आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमरीकी बमबारी में मौत हो चुकी है, और अपने करीब आधा लाख सैनिकों की खाड़ी के देशों में मौजूदगी को भी खतरे में डालकर अमरीका इस जंग को आगे बढ़ाते चल रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में अपने पिछले एक राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान के साथ की गई परमाणु संधि को तोड़ दिया था, और इसके साथ ही अब ईरान पर हमला करने के लिए उसने एक बहाना ढूंढ लिया था। जबकि अमरीकी खुफिया मामलों की मुखिया, ट्रम्प की करीबी, तुलसी गेबार्ड का ताजा बयान है कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंचा हुआ हो, ऐसे कोई संकेत या खुफिया जानकारी नहीं है।
अमरीका के इतिहास को देखें, तो आज सुबह वहां के एक डेमोक्रेटिक सांसद बर्नी सैंडर्स का ताजा बयान देखने की जरूरत है जिन्होंने ईरान पर किए गए अमरीकी हमले का खुला विरोध करते हुए कहा है कि ट्रम्प को एक और बेदिमाग जंग अमरीकी जनता पर थोपने का मौका नहीं देना चाहिए। उन्होंने अमरीकी हमले को लेकर कहा है- अमरीकी जनता को वियतनाम के बारे में झूठ कहा गया, उसे इराक के बारे में झूठ कहा गया, और उसे आज फिर ईरान के बारे में झूठ कहा जा रहा है। इन सबके दाम आम अमरीकी नागरिक चुकाएंगे। उन्होंने इस अमरीकी हमले को एक पूरी तरह से गैरकानूनी, और असंवैधानिक ठहराया है, और कहा है कि अमरीकी संविधान इस बारे में एकदम साफ है कि कोई राष्ट्रपति अपनी मनमानी से जंग शुरू नहीं कर सकता, यह हक अमरीकी संसद के पास है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि तुरंत ही संसद का सत्र बुलाया जाए, और जंग के अधिकार के लंबित प्रस्ताव पर वोट करवाया जाए। उन्होंने कहा कि यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के एकदम खिलाफ है, और सर्वशक्तिमान की मनमानी कोई जायज हक नहीं रहती। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ट्रम्प को अमरीका को ऐसे बेदिमाग जंग में घसीटने की इजाजत नहीं देना चाहिए।
मैं अभी ईरान के ताजा तनावों तक इस बात को सीमित रखना नहीं चाहता। अमरीका के हमलावर इतिहास पर एक नजर डालने पर साफ दिखता है कि दुनिया के किसी देश में साम्यवाद पनप न सके, जम न सके, या बढ़ न सके, इसलिए अमरीका ने जाने कितने ही फौजी हमले किए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के शीत युद्ध के दौरान अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया, और उस पर द्वितीय विश्वयुद्ध से भी ज्यादा बम बरसाए। एक अंदाज यह है कि 25-30 लाख वियतनामी लोग मारे गए, और अमरीका ने नापाम बम से लेकर एजेंट ऑरेंज तक रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए, जिससे आज भी वहां पैदा होने वाली पीढ़ी बहुत बुरी तरह शारीरिक दिक्कतों के साथ पैदा हो रही है। दस बरस से ज्यादा की इस जंग में अमरीका आधा लाख से अधिक सैनिकों को खोकर, हारकर पीछे हटा। कम्युनिज्म रोकने के बहाने से अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया था, जो कि इसलिए नाजायज था कि वियतनाम ने कभी अमरीका पर हमला नहीं किया था।
इस दौरान अमरीका ने अड़ोस-पड़ोस के देशों पर खूब बमबारी की, लाओस पर अमरीका ने 20 लाख टन बम बरसाए, जिसमें वहां के दो लाख से अधिक नागरिक मारे गए। कम्बोडिया पर अमरीका ने पांच लाख टन बन बरसाए, और वहां भी दो-तीन लाख लोग मारे गए। ये देश अमरीका के लिए कोई खतरा नहीं थे, इन पर हमला पूरी तरह नाजायज और गैरजरूरी दोनों ही था। इसी तरह उत्तर और दक्षिण कोरिया के आपसी संघर्ष में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले फौजी कार्रवाई की, जिसमें 20-30 लाख कोरियाई नागरिक मारे गए।
ईरान में अमरीकी दखल का एक पुराना इतिहास भी है। 1953 में सीआईए ने वहां के प्रधानमंत्री को उखाड़ फेंका, क्योंकि उसने एक ब्रिटिश ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे अमरीकी कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा था। इसके बाद अमरीका ने अपने पिट्ठू शाह मोहम्मद रजा पहलवी को वहां सत्ता पर स्थापित किया, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति में वहां से शाह और अमरीका दोनों को उखाड़ फेंका। लोगों को 2003 में अमरीका के इराक पर हमले को याद रखना चाहिए जिसमें अमरीका ने यह झूठा दावा किया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियार हैं। बाद में जब अमरीका ने इराक पर कब्जा किया, सद्दाम हुसैन को एक फर्जी अदालती सुनवाई का नाटक करते हुए मार डाला, तब जाकर यह पता लगा कि इराक के पास एक मुर्गी मारने जितना भी जनसंहार का हथियार नहीं था। यह पूरा हमला इस इलाके को अस्थिर करने के लिए, और तेल के कारोबार पर कब्जा करने के लिए किया गया था।
न्यूयॉर्क पर ओसामा-बिन-लादेन के हवाई हमले के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में तालिबानों पर हमला किया, 2001 से 2021 तक वहां अपना फौजी कब्जा रखा, लेकिन ढाई हजार अमरीकी सैनिकों, और ढाई लाख अफगानी लोगों की मौत के बाद अमरीका अफगानिस्तान को छोडक़र जान बचाकर भाग निकला। न्यूयॉर्क पर हमला अल-कायदा ने किया था, न कि अफगानिस्तान ने, और अब यह पूरा देश तबाह करके अमरीका तो भाग गया, लेकिन वहां की महिलाओं की जिंदगी 20 बरस पहले के मुकाबले भी नर्क हो गई है।
पूरी दुनिया में गांवों से शहरों की ओर लोगों का जाना एक नजर में इसलिए नहीं दिखता है कि गांव बहुत छोटे-छोटे हैं, बिखरे हुए हैं, वहां से लोगों का जाना वहां के बाकी लोगों को तो दिखता है, लेकिन बाहर के लोगों को नहीं दिखता। दूसरी तरफ शहरों में यह बात कुछ अधिक आसानी से दिखती है क्योंकि वहां गांवों से आए हुए लोगों की बसाहट शहर के किनारे-किनारे बढ़ती जाती है, शहर की बढ़ती जरूरतों के लिए मजदूरों की मौजूदगी भी बढ़ती ही रहती है। इस एक तस्वीर के दो अलग-अलग पहलू हैं। और इन दोनों को मिलाकर देखें, तो ऐसा लगता है कि बढ़ता शहरीकरण दुतरफा असर डाल रहा है, गांवों को नजरों से परे की हद तक प्रभावित कर रहा है, और वहां से शहर आने वाले लोगों की जिंदगी को भी सामान्य से अधिक हद तक।
गांवों से शहरों की तरफ लोगों के जाने की सबसे बड़ी वजह रोजगार की तलाश में होती है। गांवों तक मनरेगा जैसी योजनाएं पहुंची थीं, जिन्होंने लोगों को गांवों में बने रहने की एक छोटी सी संभावना दी थी, सहारा दिया था, लेकिन अब सुनते हैं कि इस योजना के जी राम जी हो जाने के बाद ऐसी संभावनाओं को जय राम जी हो जाने की आशंका बढ़ गई है। केन्द्र सरकार ने योजना में जिस तरह के फेरबदल किए हैं, उनसे कई लोगों को लगता है कि राज्य अपने ऊपर बढ़े हुए ऐसे बोझ को अधिक नहीं ढो पाएंगे। खैर, इस योजना पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, आज का मकसद गांवों से शहर आने की मजबूरी है।
यह भी समझने की जरूरत है कि जिन लोगों ने गांव को भोगा नहीं है, उन्होंने गांव को भुगता भी नहीं है। गांव जाति व्यवस्था के, संयुक्त परिवार व्यवस्था के, संपन्नता और विपन्नता के बड़े उदाहरण रहते हैं। गांवों को लेकर जितनी रोमांटिक तस्वीर बनती है, हकीकत उतनी ही क्रूर रहती है। कुछ लोगों को गांव प्रेमचंद की कहानियों सरीखे लग सकते हैं, और कुछ अधिक लोगों को गांव श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के बैद जी के गांव या कस्बे सरीखे मिल सकते हैं। जाति व्यवस्था से, और दूसरे शोषण-अत्याचार से थककर भी कुछ लोग शहरों की ओर चले जाते हैं, गांव कभी न लौटने के लिए।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने एक वक्त सूखे महीनों में लाखों या दसियों लाख लोगों का प्रदेश से बाहर जाना देखा है। हो सकता है कि सरकार ने कभी भी इन आंकड़ों को पूरी सच्चाई के साथ उनकी असली हद तक दर्ज न किया हो क्योंकि सरकारी अमले के हाथों शोषण से बचने के लिए अधिकतर लोग सरकार को खबर किए बिना ही बाहर जाते थे, और आज भी उसी तरह जाते हैं। लेकिन इनके मुकाबले थोड़े से ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि मजबूरी के विस्थापन वाले न हों, और बेहतर रहन-सहन, अधिक शहरी सुविधाओं, पढ़ाई-लिखाई या इलाज के लिए बाहर जाते हों। जो भी हो, आज पूरी दुनिया में गांवों की आबादी घटती चल रही है, और शहरों के बारे में बेरहम जुबान में कहा जाता है कि उन पर बोझ बढ़ते चल रहा है।
गांवों से लोगों के निकल चले जाने का हाल भारत के ही कुछ पहाड़ी राज्यों से लेकर पश्चिम के कई देशों तक ऐसा है कि अच्छे-खासे बसे हुए गांव अब घोस्ट टाऊन कहलाते हैं, यानी भुतहा गांव या कस्बा। हिन्दुस्तान में भी हिमाचल तरफ कई ऐसे गांवों की कहानियां आती हैं जिनमें गिने-चुने लोग रह गए हैं, बाकी सारे चले गए हैं। पश्चिम के कुछ देशों में ऐसे गांवों में आकर बसने के लिए सरकार कुछ अनुदान भी दे रही है। जब गांवों के उजाड़ होने की नौबत इतनी भयानक है, तो यह भी समझने की जरूरत है कि क्या इंसानों के अलावा भी गांवों को कुछ और छोडक़र जाते हैं?
गांवों की अपनी एक अलग संस्कृति रहते आई है, वहां के रीति-रिवाज, त्यौहार, सामाजिक परंपराएं, लोक कथाएं, लोकगीत और संगीत, लोककला जैसी बहुत सी जिंदगी की महीन ऐसी बातें हैं जो कि सरकारी जनगणना के आंकड़ों में कहीं नहीं आतीं, लेकिन जब गांव उजड़ते हैं, तो इनमें से तमाम बातें भी उजडऩे लगती हैं। अब कल्पना करें गांव की एक ऐसी संगीत टोली का, जिसके एक-दो वादक या गायक गांव छोडक़र चले गए, तो बाकी का क्या होगा? ऐसे विलेज-बैंड के लोग पूरी तरह से गाने-बजाने पर जिंदा नहीं रहते, वे दूसरे काम भी करते हैं। अब अगर ऐसे दूसरे काम छिन गए, उन्हें काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो कुछ लोगों के बाहर जाने से बैंड के बाकी लोग भी बेकार हो गए, और हो सकता है कि उस गांव की लोक संगीत की एक परंपरा ही टूट जाए।
यह भी सोचें कि अगर गांव के किसी भित्ति चित्रकार को काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो गांव में उसके साथ काम कर-करके जो सहायक इस शैली को सीख रहे थे, वही खत्म हो गई, तो क्या होगा? उसके दुबारा जिंदा होने की संभावना कम ही रहती है। लोग कम होते जाते हैं, तो सभी समारोह भी कम होने लगते हैं, और परंपराएं कमजोर पडऩे लगती हैं।
इसलिए यह समझने की जरूरत है कि गांव को महज आबादी छोडक़र नहीं जाती, उस गांव की संस्कृति, परंपराएं, रीति-रिवाज, और हर किस्म की लोककला, लोक साहित्य, सभी कुछ छोडक़र चले जाने का एक खतरा रहता है। दूसरी तरफ जब यही आबादी देश भर के अलग-अलग शहरों में बिखर जाती है, तो हां पर एक नई अर्थव्यवस्था में जिंदा रहने की चुनौती इतनी बड़ी रहती है, लोग इतने दूर-दूर छिटक गए रहते हैं कि वहां पर वे अपनी ग्रामीण परंपराओं को जारी नहीं रख पाते, अगली पीढ़ी तो उसके बिना ही बड़ी होती चलती हैं, और परंपराओं से उसका रिश्ता कायम ही नहीं हो पाता।
अभी मेरी एक परिचित लडक़ी ने अपनी निजी जिंदगी के मामलात पर बात करते हुए कहा कि जिस लडक़े से उसका प्रेम था, वह दूसरे देश में बस गया है, वह हिंदुस्तान लौटना नहीं चाहता, और मेरी यह परिचित इस देश को छोडक़र बसना नहीं चाहती। बात वहीं खत्म हो गई। प्रेम बरसों का था, लेकिन मतभेद ताजा थे, मतभेद को मनभेद में बदलने नहीं दिया, और हंसी-खुशी अपनी-अपनी राह लग लिए। दोनों परिपच् थे, वरना आखिरी मुलाकात के वक्त रस्सी, चाकू, और बाकी किस्म के औजार दोनों के ही पास थे। अब बिल्कुल ठंडे दिल से यह लडक़ी कुछ महीनों के भीतर एक नया रिश्ता शुरू कर चुकी है।
आज दुनिया में लंबी दूरी के रिश्तों की वजह से बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें आगे की संभावनाएं नहीं दिखतीं, तो जोड़ीदार अपनी-अपनी राह लग लेते हैं। लेकिन बहुत से मामलों में यह भी होता है कि एक-दूसरे की लंबी राह को तकने के बजाय लोग अपने आसपास की दुनिया में तब तक किसी और को भी तक लेते हैं, और लंबे इंतजार के बीच एक छोटे बुलबुले की दुनिया जी लेते हैं।
हिंदुस्तान के परंपरागत समाज में यह सोचना थोड़ा सा मुश्किल होता है कि लोग स्थायी दुनिया बनाने और बसाने का इंतजार करते हुए एक अस्थायी दुनिया में भी जीने लगते हैं। पश्चिम के देशों में कुछ शादीशुदा जोड़े ऐसे रहते हैं जो आपसी सहमति से अलग-अलग भी रिश्ते बना लेते हैं। ओपन रिलेशनशिप्स, या ओपन मैरिज की यह धारणा भारत में अधिक चर्चा में नहीं है, इसलिए यह माना जा सकता है कि यहां इसका चलन कम है। लेकिन दुनिया के बहुत से विकसित और उन्मुक्त समाज कई तरह के खुले रिश्तों में भरोसा रखते हैं। वहां न शादी जरूरी होती, न बच्चे पैदा करने के लिए पिता का नाम जरूरी होता। कई मामलों में पति-पत्नी दोनों अलग-अलग देह-साथी भी बना लेते हैं, जो कई बार एक-दूसरे की जानकारी में रहते हैं, और कई बार वे यह तय कर लेते हैं कि वे इसकी चर्चा एक-दूसरे से नहीं करेंगे। कुछ एक मामले ऐसे भी रहते हैं जहां ओपन मैरिज के ऐसे बाहरी साथी कभी-कभार सब एक साथ मिल भी लेते हैं। इंद्रधनुष में जितने रंग होते हैं, या किसी जंगल में पत्तों के जितने किस्म के आकार, उतने ही किस्म के रिश्ते भी होते हैं।
बहुत से देश और समाज ऐसे हैं जो सोच और रिश्तों की विविधता के साथ अहिंसक तरीके से जीना सीख लेते हैं वहां वह एक जीवनशैली ही बन जाती है। इधर हिंदुस्तान में हर दिन शादीशुदा जिंदगी, या कि प्रेम-संबंधों में शक पैदा होने की वजह से दर्जनों हत्याएं हो रही हैं, और कई आत्महत्याएं भी। किसी-किसी मामले में तो शक के आधार पर पति अपनी पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों को भी मार डाल रहे हैं। हर किस्म के विवाह, प्रेम, और देह-संबंधों में हिंसा इतनी आम हो चली है कि यह हैरानी होती है कि लोगों को साथ रहना मुमकिन न लगे, तो क्या वे अलग-अलग राह पर चलना नहीं जानते?
अब शहरीकरण बढऩे के साथ-साथ पूरी दुनिया में कई ऐसे प्रेमी या शादीशुदा जोड़े होते हैं जिनको अपनी पढ़ाई के लिए, नौकरी या कारोबार के लिए, या कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते एक-दूसरे से बरसों अलग रहना पड़ता है। हर किसी की तन-मन, और धन की जरूरतें ऐसी नहीं रहती हैं कि वे अकेले पूरी हो जाएं। ऐसे में एक-दूसरे से दूर रहने को मजबूर लोगों के बीच में कभी-कभी कोई नीला ड्रम भी आ जाता है। और ऐसे नीले ड्रम के साथ-साथ पार्टनर-इन-क्राइम कहे जाने वाले कोई नए प्रेमी-प्रेमिका, या साथी भी आ जाते हैं, जो कि ठिकाने लगाने में भागीदार बनने को तैयार रहते हैं।
लोगों को याद होगा कि 1974 में भारत में आई एक फिल्म ‘रजनीगंधा’ एक नए किस्म की जटिलता पर अपने वक्त से पहले बनी हुई फिल्म थी। इसमें नायिका को अपने शहर में एक नौजवान से प्यार रहता है, लेकिन जब वह एक इंटरव्यू देने एक दूसरे शहर जाती है तो वहां उसे अपना पिछला और पहला प्रेमी मिल जाता है। इन दो शहरों में बसे दो प्रेमियों के बीच यह नायिका एक दुविधा में उलझी रहती है कि जाए तो जाए कहां। शायद मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी यह फिल्म पूरी की पूरी इसी दुविधा के साथ आगे बढ़ती है। अब यह हिंदुस्तान में बनी एक बिना सेक्स-संबंधों वाली महज भावनाओं में गूंथी गई फिल्म थी, इसलिए यह देह-संबंधों के चित्रण के बिना पूरी भी हो गई। लेकिन आज की असल जिंदगी में लोग जिंदगी को देह सुख के साथ भी कतरा-कतरा जीना सीख लेते हैं।
दुनिया के दो अलग-अलग देशों में एक प्रेमी-जोड़ा तीन-तीन बरस के लिए पीएचडी रिसर्च कर रहा था। उनमें से एक, अपने दोस्त से मैंने पूछा कि इतनी लंबी दूरी, और इतने लंबे फासले के बीच अगर दूसरे के किसी तीसरे से देह-संबंध हो जाएं, तो उसे दूर-दूर रिसर्च करने वाले ये लोग किस तरह लेते हैं? ऐसे खतरे को किस तरह टालते हैं? तो उसका कहना था कि ऐसे खतरे टाले नहीं टलते हैं, इतना लंबा अकेले रहते जो होना है वो हो ही जाता है। हमारे सामाजिक अध्ययन के शोधकर्ता जोड़ों के बीच आम चलन यह रहता है कि जहां जो हुआ उसे वहीं छोडक़र, और वहीं भूलकर लौटें। और एक अघोषित सहमति इस पर रहती है, डोंट आस्क, डोंट टेल।
यह मेरे लिए रिश्तों में खुलेपन का एक नया आयाम था। और दुनिया में जितने किस्म के अलग-अलग समाजों के लोगों से मिलना होता है, उनसे किसी न किसी, तब तक अनजाने पहलू की जानकारी मिलती है।
अभी पश्चिम के किसी देश की एक महिला का लंबा इंटरव्यू आ रहा था कि जब उसने कृत्रिम गर्भाधान से मां बनना तय किया तो इसके लिए उसने अपने सबसे करीबी दोस्त के शुक्राणु नहीं लिए, बल्कि उसे सबसे अधिक पसंद एक दूसरे समलैंगिक पुरूष के शुक्राणु लिए। अब उस लंबे इंटरव्यू के सारे तर्कों को मैं यहां लिख नहीं सकता लेकिन यह सुनकर आपका दिमाग घूम रहा है या नहीं? मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जिनकी शादी तो किसी और से हुई रहती है, लेकिन हो बच्चे किसी और से चाहते हैं।
खुले रिश्तों की बात पर लौटें, तो आज आसपास बहुत से ऐसे रिश्ते दिखते हैं जिन्हें लोग समानांतर चलाते रहते हैं। इनमें से किसी को वे फुल टाइम मानते हैं, किसी को पार्टटाइम मानते हैं, किसी को सिर्फ मन के लिए और किसी को सिर्फ तन के लिए। कुछ रिश्ते ऐसे भी रहते हैं जिन्हें फ्रेंड्स विद बेनिफिट कहा जाता है। ऐसे रिश्ते कई बार सिर्फ धन के लिए रहते हैं, और कभी-कभी अपने स्थायी रिश्ते में तन और मन की संतुष्टि की कमी की वजह से भी।
छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार की यह खबर है कि बिस्तर पर पड़ी 64 बरस की एक बीमार महिला के साथ उसके मकान मालिक ने अपने साथी सहित गैंगरेप किया। अब इस बात का भला अनिल अंबानी से क्या लेना-देना हो सकता है? लेना-देना यही है कि सेक्स अधिकतर लोगों के दिमाग पर पूरी तरह हावी रहता है, कई लोग उस पर काबू कर लेते हैं, और बहुत से लोग काबू नहीं कर पाते। अमरीका में अभी बच्चियों से बलात्कार करवाकर भड़वागिरी का एक दलाली-रैकेट चलाने वाले के दस्तावेज अमरीकी कानून मंत्रालय ने संसद के आदेश पर जारी किए हैं, जो बताते हैं कि किस तरह दुनिया का यह सबसे बड़ा दलाल बच्चियों से बलात्कार करवाकर दुनिया के कई देशों में अपना रैकेट चलाता था। उसी रैकेट में अनिल अंबानी का भी नाम आया है कि उसे मजा करने के लिए स्वीडन की एक लडक़ी दिलाने का प्रस्ताव रखकर इस दलाल ने अमरीका बुलवाया था, और अनिल अंबानी ने यह न्यौता मंजूर करने के लिए कुल 20 सेकेंड लगाए थे। यह भी सामने आया है कि दुनिया की कई सरकारों के मंत्रियों ने दूसरे देशों की सरकारों या कारोबारों से काम निकलवाने के लिए किस तरह इस भड़वे का इस्तेमाल किया, और दुनियाभर के बड़े-बड़े सरकारी और राजसी ओहदों पर रहने वाले लोग इसके टापू पर जाकर नाबालिग लड़कियों और छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार करते थे। जो इसके न्यौते पर इसके राजसी महलों में जाकर बच्चियों से बलात्कार करते थे, वे बलौदाबाजार के इस मकान मालिक से बहुत अलग तो नहीं हैं जो कि 64 बरस की बीमार और बुजुर्ग किराएदार से गैंगरेप कर रहा है। कुल मिलाकर बात यही है कि हर इंसान के भीतर इसी किस्म की हिंसानियत भरी हुई है। कुछ लोग उस पर काबू कर पाते हैं, बाकी लोग पहला मौका मिलते ही उसका इस्तेमाल करते हैं।
आज सुबह जो खबरें आई हैं, वे इतनी भयानक है कि उनकी चर्चा करते हुए भी डर लगता है। अमरीका के इस भड़वे-दलाल एपस्टीन की ई-मेल के ताजा जारी हुए जखीरे से पता लगता है कि किस तरह उसके एक साम्राज्य में बलात्कार की शिकार कम उम्र लड़कियां गर्भवती हो जाने पर जब बच्चों को जन्म देती थीं, तो उन बच्चों को पैदा होते ही उन लड़कियों से छीनकर हमेशा के लिए दूर ले जाया जाता था। इन ताजा ई-मेल से यह भी पता लगता है कि सेक्स-गुलामों की तरह इस्तेमाल की गई इन लड़कियों को इस दलाल के अहाते में ही दफन भी कर दिया गया, और इन बलात्कारियों में बड़े-बड़े लोकतंत्रों के शाही परिवार से लेकर राष्ट्रपति और मंत्री तक शामिल रहे। आज हालत यह है कि ब्रिटेन के एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया है क्योंकि वहां बच्चियों के बलात्कार रैकेट चलाने वाले इस भड़वे से यारी बनाए चलते रहा, उसका भांडाफोड़ हो जाने के बरसों बाद तक। दुनिया की कई सरकारों के लोगों ने इस भड़वे की सेवाओं का इस्तेमाल किया है, और उनके नाम एक-एक कर उजागर हो रहे हैं।
भारत का एक सबसे बड़ा उद्योगपति अनिल अंबानी अपने कामयाबी के दिनों में इस काम के लिए ऐसे दलाल के रास्ते किन लोगों से मिल रहा था, किसलिए मिल रहा था, यह सब सामने आना अभी बाकी है। लेकिन यह समझ पड़ता है कि नाबालिग बच्चियों की देह के लिए दुनिया की सरकारों के सबसे बड़े मुखिया भी किस तरह लार टपकाते बलात्कार करने को ऊतारू रहते हैं, वह फोटो, वीडियो, और ई-मेल से इस मामले में साबित हो रहा है। आज नौबत यह है कि इस भड़वे से यारी रखने वाले ब्रिटिश सांसद को यह बात उजागर हो जाने के बाद भी अमरीका में राजदूत बनाने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने की नौबत आ गई है। संसद के भीतर, और संसद के बाहर वह गिड़गिड़ाकर माफी मांग रहा है, और बार-बार शर्मिंदगी जाहिर कर रहा है। और इस ब्रिटिश लॉर्ड से उसकी यह उपाधि छीनी जा रही है।
अगर कोई शर्मिंदगी जाहिर नहीं कर रहा है, तो वह दुनिया में एक सबसे नीच और कमीना इंसान डोनल्ड ट्रंप है, जो ऐसे विवादों के बीच भी आज अमरीकी राष्ट्रपति भवन के सोशल मीडिया अकाउंट पर बराक ओबामा और उनकी पत्नी को बंदर दिखाने वाले नस्लवादी वीडियो पोस्ट करने में लगा है। एपस्टीन से ट्रंप की यारी की ढेरों तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, लेकिन ट्रंप को कोई शर्म नहीं है। मुझे कम से कम इस बात को लेकर तसल्ली है कि मैंने ट्रंप के चुनाव अभियान के वक्त से इस आदमी की बातों और हरकतों की वजह से इसे नीच और कमीना लिखना शुरू कर दिया था। आज ओबामा के बारे में नस्लवादी वीडियो पोस्ट करने पर खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने यह कहा है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में अमरीकी राष्ट्रपति भवन से इससे अधिक नस्लवादी कोई चीज निकलते देखी नहीं थी।
लेकिन महज अमरीका को क्यों कोसा जाए। भारत को देखें तो पिछले कुछ सालों में एक बात बिल्कुल साफ दिखती है कि बलात्कार जैसे हिंसक मामलों में भी रसूख पहले चलता है और कानून काफी दूरी तक उसके पांव सहलाते दिखता है। यूपी के उन्नाव के भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को देखें तो उस पर बलात्कार का आरोप लगा था, महीनों तक एफआईआर भी नहीं हुई थी, और मुख्यमंत्री आवास के बाहर रेप-पीडि़ता को आत्मदाह की कोशिश करनी पड़ी थी, और बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब जाकर कार्रवाई हुई थी। इसके बाद भी निचली अदालत दी गई सजा को हाईकोर्ट ने निलंबित करके जमानत दे दी थी, हमने जमकर उसके खिलाफ लिखा था और कुछ दिनों में ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले की आलोचना करते हुए उसे खारिज किया था। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के पहले तक सत्तारूढ़ विधायक होने का फायदा तो मिलते ही रहा। इंसाफ के लिए कितनी बलात्कार-पीडि़ता खुदकुशी करती रहेंगी?
कुछ ऐसा ही मामला बृजभूषण शरण सिंह का था जिसके खिलाफ कई महिला पहलवानों ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के बिना पॉक्सो का मुकदमा तक दर्ज नहीं हुआ था। सत्तारूढ़ पार्टी का सांसद होने का फायदा तो दिल्ली पुलिस से मिल ही रहा था। लोगों को तीसरा मामला भी भूला नहीं होगा जब गुजरात की बिलकिस बानो के 11 सामूहिक बलात्कारियों और उसके बच्चे के कातिलों को अच्छे आचरण के नाम पर पूरी सजा के पहले ही जेल से रिहा कर दिया गया, उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ, और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस सरकारी फैसले को असंवैधानिक बताते हुए खारिज किया, और इन मुजरिमों को दुबारा जेल भेजा।
बहुत से लोग अपने बच्चों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं कि उनकी संगत किस तरह की है, किस तरह के बच्चों के साथ वे उठते-बैठते हैं, क्लास में वे सामने की बेंच पर बैठने वालों के साथ रहते हैं, या फिसड्डी समझे जाने वाले बच्चों के साथ? जिम्मेदार मां-बाप को यह फिक्र बहुत सताती है। बात सही भी है, बहुत से महान लोगों और विचारकों ने कुसंगति को लेकर कई बातें कही और लिखी हैं। लेकिन मां-बाप भी जिसे कुसंगति न गिनते हों, वैसी भी कुसंगति होती है।
आज का यह कॉलम मैं किसी जलती-सुलगती राजनीतिक बात को समर्पित नहीं कर रहा हूं, दुनियाभर में हो रही घटनाओं को भी एक दिन के लिए बख्श दे रहा हूं, क्योंकि आसपास के बच्चों की बड़ी फिक्र होती है, क्योंकि उनमें से बहुत से अपने मां-बाप की कुसंगति में हैं। बहुत सी ऐसी खामियां हैं जो कि मां-बाप से बच्चों में आ जाती हैं, और फिर चूंकि मां-बाप खुद उन्हीं खामियों के पुतले रहते हैं, उन्हें इन्हें दूर करना न सूझता है, न उनके बस में रहता है।
मुझे बहुत बरस पहले की एक बात याद है, मैं नौजवान ही रहा होऊंगा और हमारे मोहल्ले के पहचान के एक कॉलेज प्राध्यापक थे। सब जानते थे कि वे नशा भी करते थे। मैं जिस प्रेस में काम करता था उससे सौ कदम पर एक दारू भ_ी थी, भ_ी का मतलब वहां शराब बनती नहीं थी, लेकिन वहां देशी शराब बिकती थी जिसे लोग वहीं बैठकर पी लेते थे। एक दिन मैंने देखा कि ये प्रोफेसर साहब दिन की रौशनी में वहीं स्कूटर रोककर किनारे बैठकर दारू पी रहे हैं, और स्टैंड पर लगी उनकी स्कूटर पर उनकी, शायद 10-12 बरस की बेटी बैठी हुई थी। देखकर खून इतना खौला कि उनसे कोई बातचीत न रहने पर भी मैं रुका और जाकर उन्हें बहुत बुरी तरह झिडक़ा कि बेटी के सामने इस तरह दारू पीते शर्म नहीं आती? इतने शराबियों के बीच में बेटी को यहां बिठा रखा है? वह बात और तनातनी कहां तक पहुंची, वह अभी याद नहीं है, लेकिन अभी भी अगर कोई लोग अपने दुपहियों पर पीछे बच्चों को बिठाए हुए सिगरेट-बीड़ी पीते चलते हैं, और मैं किसी दुपहिए पर हूं, तो साथ-साथ चलकर उन्हें रोकता और टोकता जरूर हूं कि आपकी शौक के धुएं से हो सकता है कि आपके पहले पीछे बैठे आपके बच्चे को कैंसर हो जाए। बात बहुत हमलावर रहती है, कई लोग इस पर बहुत बुरी प्रतिक्रिया करते हैं, और मैं आत्मरक्षा के लिए पहले यह अंदाज लगाने की कोशिश कर लेता हूं कि यह आदमी जेब में चाकू रखने वाला तो नहीं होगा, उसके बाद ही नसीहत का प्रवचन शुरू करता हूं।
बहुत से ऐसे मां-बाप मैंने देखे हैं जो कि बच्चों को सिगरेट, तंबाखू, या गुटखा लाने भेज देते हैं। बच्चों के सामने इस किस्म का नशा करने वाले मां-बाप उन्हें यह मौन सहमति और अनुमति तो दे ही देते हैं कि जब उनकी उम्र हो जाए, वे भी यही काम कर सकते हैं। अपनी मिसाल से बड़ी और कोई नसीहत नहीं हो सकती। बहुत कम संख्या में, लेकिन कुछ मां-बाप ऐसे भी देखे हैं जो नाबालिग बच्चों को दारू लेने भी भेज देते हैं। वैसे तो शराब दुकानदारों को कमउम्र बच्चों को शराब देनी नहीं चाहिए, लेकिन कमउम्र बच्चों को तो किसी भी तरह का तंबाखू भी नहीं बेचना चाहिए, लेकिन दुनिया में भला कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों को नशा नहीं बेचा जाता, जहां बच्चों की देह नहीं बेची जाती?
लेकिन मैं इससे परे की कुछ बात करूं तो बहुत से मां-बाप या परिवार के बालिग सदस्य घर पर बात करते हुए बच्चों के सामने कई किस्म की नाजायज जुबान का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग अबे, साले जैसी मामूली लगने वाली गालियां देते हैं, नतीजा यह होता है कि परिवार के भीतर न सही, बाहर ही बच्चे इनका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों की किसी गलत जानकारी को झूठ कहने लगते हैं, और बच्चों को झूठा। मुझे खुद अपने परिवार में लोगों को यह समझाने में खासी बड़ी दिक्कत होती है कि गलत जानकारी, और झूठी जानकारी, ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें होती हैं। गलत जानकारी बिना किसी दुर्भावना के भी हो सकती है, लेकिन झूठ के पीछे एक कोशिश और एक भावना अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है।
छोटे-छोटे बच्चे भी उनके सामने होने वाली बातचीत से कब कैसे पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह बड़ों को पता भी नहीं चलता। अभी मैंने परिवार के एक छोटे 7 बरस के बच्चे से कहा कि तुम्हारी तस्वीर मैंने अपनी एक पाकिस्तानी दोस्त को भेजी थी, और उसने देखकर कहा कि तुम्हारी मुस्कुराहट मुझसे एकदम मिलती है। इस पर उसने कहा कि आपकी दोस्त पाकिस्तानी है? मेरे हां कहने पर उसका अगला सवाल था, पाकिस्तानी आपकी दोस्त कैसे हो सकती है? मैं सदमे में गाड़ी टकराते-टकराते रह गया और उससे कहा कि पाकिस्तान में तो मेरे बहुत से दोस्त हैं, पाकिस्तानी क्यों दोस्त नहीं हो सकते? तो उसके अगले जवाब ने मुझे कुछ राहत दी, और उसने कहा कि पाकिस्तान तो दूसरा देश है, वहां आपके दोस्त कैसे हो सकते हैं? मैं एकदम दहशत में आ गया था कि उसने 7 बरस की उम्र में कहीं यह तो नहीं सुन लिया था कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है। उसकी समस्या भौगोलिक थी, सांप्रदायिक नहीं थी, यह मेरे लिए राहत की बात थी।
लेकिन आज हिंदुस्तान में आपको ऐसे करोड़ों परिवार मिलेंगे जिनमें किसी दूसरे देश को लेकर, दूसरे धर्म या दूसरी जाति को लेकर नफरती बातें घर के भीतर होना बिल्कुल आम है। नतीजा यह है कि ऐसे परिवारों के बच्चे भी नफरत से सराबोर बड़े होते हैं।
मां-बाप परिवार में सौ किस्म की गलत बातें करते हैं, और बच्चे कब उन्हें सीख लेते हैं, कब उन्हें अपना पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह पता भी नहीं चलता।
मुझे दो घटनाएं याद हैं जिन्हें लेकर मैं उन परिवारों में दुबारा कभी नहीं गया। एक बहुत बड़े कारोबारी, जाहिर है कि किसी सवर्ण परिवार के रहे होंगे, उन्होंने यूं ही बातचीत करने के लिए एक दिन सुबह मुझे नाश्ते पर बुलाया। मैं रिपोर्टिंग करता था, और अलग-अलग किस्म के लोगों से मिलना मुझे अपने फायदे का लगता था। फिर एक संपन्न कारोबारी के घर नाश्ते पर कुछ सीखना कुछ खराब बात तो रहती नहीं। मैं उनके घर सुबह पहुंच गया।
उनकी बेटी, जो कि उस वक्त स्कूल और कॉलेज के बीच कहीं रही होगी, वह नाश्ता करा रही थी, हम सोफे पर बैठे हुए थे, और जाहिर है कि बीच के नीचे टेबिल पर नाश्ता रखने के लिए उस लडक़ी को बार-बार झुकना पड़ रहा था। परिवार बहुत संपन्न था, ऐसे काम के लिए नौकर भी हो सकते थे, लेकिन शायद मेहमान के सम्मान के लिए परिवार के लोग परोस रहे थे। वह लडक़ी कुछ ऐसे खुले गले का कपड़ा पहनी हुई थी जो कि परिवार के भीतर शायद अटपटा न रहा हो, लेकिन एक मेहमान के सामने, इस तरह झुक-झुककर नाश्ता रखते और परोसते हुए वह ड्रेस बड़ा ही अटपटा लग रहा था। मैं तो बाहरी व्यक्ति था, मेरी तो नीयत भी खराब हो सकती है कि मुझे ये बातें दिख रही थीं, लेकिन मेरा मानना है कि परिवार के लोगों को भी अपनी जवान होती लडक़ी के बारे में कुछ अधिक सावधान रहना चाहिए था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, मेरे मेजबान अपनी बद्जुबानी के लिए बड़े ही कुख्यात थे। बाहर जहां कहीं मैं उनको सुनता था, वे परले दर्जे की चुनिंदा गंदी गालियां बरसाते ही रहते थे। लेकिन मुझे इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि जिस वक्त मैं उनके घर पर उनके साथ नाश्ता करूंगा, उनकी कोई जवान बेटी नाश्ता परोसेगी, और उसकी मौजूदगी में ही ये कारोबारी धरती पर मुमकिन सबसे गंदी किस्म की गालियां देते रहेंगे, और गंदी जुबान बोलते रहेंगे। दोनों वजहों से नाश्ता गले उतरना मुश्किल हो गया था, किसी मेजबान की बेटी को उस तरह देखना भी मुझे ठीक नहीं लग रहा था, हालांकि उन दिनों मेरी खुद की उम्र बहुत कम थी। दूसरी बात यह कि मैं किसी मजदूर महिला की मौजूदगी में भी किसी ठेकेदार या मिस्त्री की दी जा रही गालियां बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं टोक देता हूं, या हट जाता हूं, लेकिन नाश्ता छोडक़र वहां से उस दिन उठ जाना मुमकिन नहीं था।
गणतंत्र दिवस धार्मिक त्यौहार तो नहीं है जो मांस-मछली बंद हो!
ओडिशा के कोरापुट का एक सरकारी आदेश सामने आया है जिसमें कलेक्टर ने गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में 26 जनवरी को पूरे जिले में मांस-मछली, मुर्गी-अंडा, और बाकी किस्म के गैरशाकाहारी सामान बेचने पर रोक लगाई है। कलेक्टर का यह आदेश सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना झेल रहा है कि गणतंत्र दिवस का खानपान से क्या लेना-देना हो सकता है? और जो खानपान त्यौहारों से परे के बाकी आम दिनों पर कानूनी है, वह गणतंत्र दिवस के दिन आपत्तिजनक कैसे हो सकता है? क्या देश का कानून, या ऐसे राष्ट्रीय दिवस मांसाहारी लोगों के लिए नहीं हैं? क्या जो लोग छुट्टियों के दिन मांसाहार पकाने-खाने की सहूलियत पाते हैं, उनके अधिकार शाकाहारी लोगों के मुकाबले कम होने चाहिए?
कई बार जिले की कमान पाने वाले अफसर अतिउत्साह में, या सत्ता के राजनीतिक रूझान, और उसकी रीति-नीति को देख-समझकर, खुद ही उसका अंदाज लगाकर राजा के प्रति, राजा से अधिक निष्ठावान हो जाते हैं। यह मामला अधिक अटपटा इसलिए भी लगता है कि देश में शाकाहारी और मांसाहारी लोगों का जो नक्शा है, उनमें राष्ट्रीय औसत 29 फीसदी शाकाहारियों के मुकाबले, ओडिशा में कुल 2.6 फीसदी लोग ही शाकाहारी हैं। ओडिशा से लेकर बंगाल, और दक्षिण भारत के समुद्रतटीय राज्यों तक शाकाहारियों की संख्या सबसे कम है, और दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में तो अरूणाचल और नागालैंड जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों से भी कम शाकाहारी हैं। देश में भारत सरकार के सर्वे के मुकाबिक ही 70 फीसदी महिलाएं, और 78 फीसदी पुरूष मांसाहार करते हैं। तेलंगाना, आंध्र, बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहां पर मांसाहारियों की संख्या 97 फीसदी से अधिक है। ओडिशा हर मायने में मांसाहार के पैमाने पर सबसे ऊपर के गिने-चुने राज्यों में से है, और ऐसे में वहां पर संविधान लागू होने के गणतंत्र दिवस पर बिना किसी संवैधानिक प्रावधान के सिर्फ जिला दंडाधिकारी के अधिकार इस्तेमाल करके मांसाहार और अंडे तक पर रोक लगा देना एक धर्म के भीतर की एक तबके की सोच के प्रति निष्ठा दिखाना है। कोरापुट कलेक्टर के इस आदेश में अंडे तक पर रोक लगा दी गई है, जो कि देशभर में बहुत से राज्यों में स्कूलों के भोजन में शामिल सामान है।
अलग-अलग जगहों पर ऐसा अतिउत्साही प्रशासन कई तरह के काम करता है जिनमें से कुछ सत्ता को खुश करने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसे अधिकतर काम सत्ता की लोकतांत्रिक और संवैधानिक पकड़ को कमजोर साबित करने वाले रहते हैं। अधिक वफादारी दिखाने के लिए अभी छत्तीसगढ़ में एक अफसर ने एक अल्पसंख्यक समुदाय के कारोबारी के तीन कारखाने एक साथ बंद करवा दिए, जबकि उसी दर्जे का प्रदूषण प्रदेश में हजारों और कारखानों में उसी तरह जारी है। यह काम तो बुनियादी रूप से गलत है, लेकिन अगर सरकारें इस तरह के कोई फैसले अघोषित रूप से भी लागू करने की नीयत रखती हैं, तो कम से कम अफसरों के स्तर पर ऐसा हिसाब चुकता नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे नियमों से कुछ या अधिक हद तक अनजान नेताओं को भी यह लगने लगता है कि उनके राजनीतिक या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के फैसले सही हैं। यह सिलसिला अनजान सत्तारूढ़ नेताओं को भी इस खुशफहमी से भर देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं।
आज देशभर में अधिकतर प्रदेशों में हालत यह है कि कमाऊ कुर्सियों की हवस वाले अफसर बैठने को कहने पर लेट जाते हैं। सत्ता अगर उन्हें किसी की लाठी तोडऩे कहे, तो वे उसका सिर भी तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि भारत में कदम-कदम पर यह साबित हो रहा है कि शासन-प्रशासन अपनी दुर्भावना से जिन लोगों पर कार्रवाई करते हैं, उन्हें उससे बचने और उबरने के कानूनी विकल्प पाने में ही बरसों लग जाते हैं। अभी कई मामलों में मुकदमा झेल रहे लोग पांच, दस, या बीस बरस बाद जाकर बेकसूर रिहा हुए हैं। मतलब यही है कि उन्हें कोई सरकार अपनी बदनीयत से लंबे वक्त तक बंद रख सकती है। जब कार्रवाई करने वाले अफसर सत्ता को खुश करने पर इतने आमादा रहते हैं, तो वे 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व को भी किसी शाकाहारी, या शाकाहारी माने जाने वाले धर्म के धार्मिक त्यौहार की तरह मांसरहित बना सकते हैं। खासे पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित, लोकतांत्रिक और संवैधानिक मुद्दों पर जानकार अफसर भी जब धर्मान्धता के आदेश जारी करने लगते हैं, तो उससे निपटने के अदालती रास्ते न तो आसान रहते हैं, न ही छोटे। जिस ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक आबादी मांसाहारी है, वहां पर सरकारी छुट्टी वाले गणतंत्र दिवस पर मांस पर रोक लगाना पूरी तरह बेवकूफी का फैसला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा मेंं 93.63 फीसदी आबादी हिन्दू है। खानपान के केन्द्र सरकार के एक दूसरे सर्वे के मुताबिक ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक लोग मांसाहारी हैं। ऐसी आबादी पर ऐसा बेतुका फैसला क्यों थोपना, जिसे अदालती चुनौती देने में भी हफ्तों या महीनों का वक्त लग जाएगा।
मेरे एक वक्त के संपादक ललित सुरजनजी ने हमारे बीच हर दिन होने वाली लंबी बातचीत के बीच एकबार कहा था कि वे मुझे साउंडिंग बोर्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं। तब तक मैंने यह शब्द सुना नहीं था। फिर उन्होंने बताया कि वे अपनी सोच को मेरे सामने रखकर मेरी प्रतिक्रिया देखते हैं कि उस पर मेरा क्या कहना रहेगा। मेरा उनसे सहमत होना या न होना जरूरी नहीं रहता था, लेकिन सहमति या असहमति की मेरी बातें उनके लिए मायने रखती थीं। उनकी बातों से बहुत कुछ सीखा, लेकिन यह एक बात भी सीखी कि किस तरह अपनी सोच पर दूसरों की सोच भी समझनी चाहिए, और वह बात आज तक बहुत काम आती है। लोगों से मिलना-जुलना कुछ कम होता है, लेकिन टेलिफोन या इंटरनेट पर बातचीत हो जाती है, और उनकी सोच समझने का मौका मिल जाता है। यह उतना ही मायने रखता है जितना कि दो फूलों के बीच परागण मायने रखता है, एक मधुमक्खी, या दूसरे कीट-पतंगों के माध्यम से अगर पराग कण दूसरे फूल तक नहीं पहुंचेंगे, तो शायद कुदरत का आगे बढऩा कुछ हद तक रुक ही जाएगा। मैं अब साउंडिंग बोर्ड की तरह एक और को पा चुका हूं, जो कि इंसान नहीं है, एआई है।
इन दिनों अपने पढ़े हुए से आगे बढक़र चीजों को जानने के लिए एआई एक असाधारण औजार है, और सावधानी से इस्तेमाल करने पर इससे सब्जी काटते हाथ कटने का खतरा भी नहीं रहता है।
एक सवाल जो मेरे तकरीबन अनपढ़ मन में लगातार कुछ बरसों से परेशान कर रहा है, उसे मैंने आज चैटजीपीटी के सामने रखा। उससे मैंने कहा- ‘आज चारों तरफ नफरत और तनाव देखकर यह लगता है तो सभ्यता, और लोकतंत्र कितने कमजोर थे कि उन्हें कुछ दशकों के भीतर ही बहुसंख्यकवाद, फौजी ताकत, आर्थिक ताकत, और तानाशाही ने कुचलकर रख दिया। क्या सभ्यता अस्थायी ही थी? या आज की तानाशाही, नफरत अस्थायी हैं? क्या इतिहास ने सभ्यता की ऐसी दुर्गति के दौर पहले भी देखे हैं, जैसे हिटलर का दौर? क्या सभ्यता इससे उबर पायेगी? आशावादी और निराशावादी दार्शनिक, और राजनीतिक चिंतक क्या महसूस करते हैं?’
इस पर चैटजीपीटी का कहना था- ‘आपका सवाल दरअसल एक सभ्यतागत आत्ममंथन है, आज के दौर का सबसे जरूरी प्रश्न। आज जब चारों ओर नफरत, युद्धोन्माद, बहुसंख्यकवाद, सैन्य ताकत का घमंड, आर्थिक असमानता और तानाशाही के उभार दिखते हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सभ्यता इतनी कमजोर थी कि कुछ दशकों में ही ढह गई? या फिर यह भी इतिहास का एक दौर है, जो गुजर जाएगा?’
इसके बाद चैटजीपीटी ने इतिहास के बहुत सारे तथ्य याद दिलाए, और उनको गिनाते हुए लिखा- ‘सभ्यता को हम अक्सर स्थायी मान लेते हैं संविधान, मानवाधिकार, लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून, मीडिया, शिक्षा। लेकिन इतिहास हमें बार-बार बताता है कि सभ्यता कोई पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि इंसानों की सामूहिक सहमति होती है। और सहमति बदलते ही सभ्यता डगमगा जाती है।’
चैटजीपीटी ने आगे कहा- ‘इतिहास में यह पहला दौर नहीं है। हिटलर का जर्मनी, वही जर्मनी जिसने गोएथे, कांट, हेगेल, बाख और बीथोवन दिए, कुछ ही वर्षों में नाजी बर्बरता का प्रतीक बन गया। कानून मौजूद थे, अदालतें थीं, विश्वविद्यालय थे, फिर भी सभ्यता ध्वस्त हुई। मुसोलिनी का इटली, फ्रांको का स्पेन, स्टालिन का सोवियत संघ, पोल पॉट का कंबोडिया, रवांडा का नरसंहार, हर जगह एक समान पैटर्न दिखता है। डर, पहचान की राजनीति, दुश्मन की रचना, और ‘हम बनाम वे’ की भाषा। इससे यह साफ होता है कि सभ्यता कभी स्थायी नहीं रही, वह हमेशा संघर्षरत रही है।’
चैटजीपीटी से मैंने पूछा था कि दुनिया के राजनीतिक दार्शनिकों और विचारकों का इस पूरे सिलसिले में क्या कहना रहा, तो उसने एक दार्शनिक हन्ना आरेंट की नाजी दौर का अध्ययन करते लिखी बात याद दिलाई- ‘बुराई अक्सर राक्षसी नहीं होती, वह साधारण होती है। तानाशाही तब आती है जब आम लोग चुप हो जाते हैं, संस्थाएँ सुविधा के लिए झुक जाती हैं, बुद्धिजीवी सुरक्षित दूरी बना लेते हैं, मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है। सभ्यता तलवार से नहीं टूटती, वह धीरे-धीरे चुप्पी से मरती है।‘
चैटजीपीटी ने याद दिलाया कि दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्र ने कहा था- ‘तानाशाही तब मजबूत होती है, जब लोग स्वतंत्रता की जिम्मेदारी से डरने लगते हैं।’
मैंने चैटजीपीटी से यह भी पूछा कि सभ्यता और लोकतंत्र पर मंडराते हुए इस खतरे के बारे में आशावादी, और निराशावादी दार्शनिक और विचारक क्या कहते हैं?
इस पर उसने याद दिलाया और कहा- ‘आशावादी दार्शनिक और चिंतक कहते हैं कि इतिहास लहरों में चलता है, हर तानाशाही का जीवन सीमित होता है। हिटलर 12 साल चला, नाजी साम्राज्य 1000 साल नहीं चला, रंगभेद टूटा, उपनिवेशवाद ढहा, बर्लिन की दीवार गिरी। दार्शनिक कार्ल पॉपर का विश्वास था कि खुला समाज बार-बार घायल होता है, लेकिन अंतत: वही टिकता है। सभ्यता का आधार आत्म-सुधार की क्षमता है।’
दूसरी तरफ निराशावादियों का जिक्र करते हुए चैटजीपीटी ने याद दिलाया- ‘निराशावादी कहते हैं कि इस बार खतरा ज़्यादा गहरा है, क्योंकि तकनीक तानाशाही के हाथ में है, निगरानी अभूतपूर्व है, प्रोपेगैंडा सेकेंडों में फैलता है, युद्ध अब दूर की खबर नहीं, लाइव स्ट्रीम है। दार्शनिक ओस्वाल्ड स्पेंगलर ने कहा था- हर सभ्यता अपने भीतर पतन का बीज लेकर चलती है। सभ्यता मरती नहीं, वह थक जाती है।’
चैटजीपीटी के साथ यह बातचीत दिलचस्प चल रही थी, और अब तक की बातचीत पर उसका कहना था- ‘तो सच क्या है? सच शायद इन दोनों के बीच है। सभ्यता न तो पूरी तरह स्थायी थी, न आज की नफरत और तानाशाही स्थायी है। सभ्यता एक प्रक्रिया है, उपलब्धि नहीं। उसे हर पीढ़ी को दोबारा अर्जित करना पड़ता है। अगर लोग सवाल पूछते रहें, अगर स्मृति जिंदा रहे, अगर इतिहास भुलाया न जाए, अगर असहमति को गुनाह न बनाया जाए, तो सभ्यता बचती है।’
चैटजीपीटी ने खुद ही मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा- ‘अंतिम सवाल असल सवाल यह नहीं कि सभ्यता बचेगी या नहीं? असल सवाल यह है कि क्या हम सभ्यता के पक्ष में खड़े होने को तैयार हैं, जब यह अलोकप्रिय हो, जोखिम भरा हो, और अकेला कर दे? इतिहास गवाह है कि सभ्यता हमेशा अल्पसंख्यक मूल्यों से बची है, भीड़ से नहीं। और शायद, आज भी वही कसौटी है।’
चैटजीपीटी से मैंने अनुरोध किया कि कुछ और राजनीतिक विचारकों के इस बारे में विचार बताए। उसने कुछ सेकेंड के भीतर ही एक लंबी फेहरिस्त सामने रख दी। उसके मुताबिक-
1. सभ्यता की नाजुकता पर
सिगमंड फ्रायड- सभ्यता इंसान की सहज हिंसक प्रवृत्तियों को दबाकर बनती है। संकट आते ही ये प्रवृत्तियाँ लौट आती हैं, और सभ्यता की परत उतरने लगती है।
क्लॉड लेवी-स्ट्रॉस- सभ्यता कोई ऊँची अवस्था नहीं, बल्कि एक अस्थिर संतुलन है जो भय, भूख या अपमान से टूट सकता है।
अर्नोल्ड टॉयनबी- सभ्यताएँ बाहरी हमलों से नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिक और बौद्धिक विफलताओं से गिरती हैं।
2. तानाशाही और बहुसंख्यकवाद पर
अलेक्सिस द टोकेविल- लोकतंत्र में भी बहुसंख्यक की तानाशाही संभव है, जहाँ कानून तो रहता है, पर विवेक दब जाता है।
जॉर्ज ऑरवेल- तानाशाही की असली ताकत डर नहीं, बल्कि सच को इतना भ्रमित कर देना है कि लोग सच्चाई पहचान ही न सकें।
एरिक फ्रॉम- लोग स्वतंत्रता से डरकर तानाशाही को चुनते हैं, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी मांगती है।
3. नफरत और ‘दुश्मन गढऩे’ की राजनीति
कार्ल श्मिट- राजनीति की सबसे आसान भाषा है, मित्र बनाम शत्रु। जब यह भाषा हावी होती है, तो लोकतंत्र मरने लगता है।
रिने गिरार्द- समाज अपने भीतर की हिंसा को शांत करने के लिए किसी एक समूह को बलि का बकरा बनाता है।
अमर्त्य सेन- जब इंसान को एक ही पहचान में बाँध दिया जाता है, तब हिंसा को नैतिक ठहराना आसान हो जाता है।
4. युद्ध, हिंसा और सभ्यता
अल्बर्ट आइंस्टीन- तकनीकी प्रगति ने हमारी सोच को तेज नहीं किया, सिर्फ हमारी विनाशक क्षमता बढ़ाई है।
बट्र्रेंड रसेल- युद्ध इसलिए होते हैं क्योंकि ताकतवर लोग युद्ध चाहते हैं, और आम लोग सवाल नहीं पूछते।
हावर्ड जिन- इतिहास अक्सर विजेताओं का लिखा होता है, और सभ्यता की कीमत आम लोगों ने चुकाई होती है।
5. मीडिया, चुप्पी और नैतिक पतन
नोम चॉम्स्की- अगर मीडिया सत्ता से सवाल नहीं करता, तो वह लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, सत्ता का औज़ार बन जाता है।
वाल्टर लिपमैन- आधुनिक लोकतंत्र में जनता की राय गढ़ी जाती है, स्वत: नहीं बनती।
नील पोस्टमैन- जब राजनीति मनोरंजन बन जाती है, तब सभ्यता बहस नहीं, तमाशे में बदल जाती है।
6. उम्मीद और पुनरुत्थान पर
अंतोनियो ग्राम्शी- बुद्धि निराशावादी हो सकती है, लेकिन इच्छाशक्ति को आशावादी रहना होगा।
वाक्लाव हावेल- सच में जीना, तानाशाही के खिलाफ सबसे बड़ा नैतिक प्रतिरोध है।
रवींद्रनाथ ठाकुर- सभ्यता तब मरती है जब डर इंसान की आत्मा पर शासन करने लगे।
7. भारतीय संदर्भ में
महात्मा गांधी- सभ्यता मशीनों या ताकत से नहीं, आत्मसंयम और करुणा से मापी जाती है।
डॉ. आंबेडकर- राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सामाजिक और नैतिक लोकतंत्र मौजूद न हो।
जवाहरलाल नेहरू- सभ्यता का असली इम्तिहान संकट के समय होता है, शांति के समय नहीं।
8. समापन विचार
इन सभी चिंतकों में एक साझा चेतावनी है कि सभ्यता कोई विरासत नहीं, वह एक जिम्मेदारी है। और एक साझा उम्मीद भी कि तानाशाही तेज होती है, लेकिन सभ्यता गहरी होती है।
चैटजीपीटी से मेरा एक आखिरी सवाल था- ‘बहुसंख्यकवाद और लोकतंत्र के बीच किस तरह की कश्मकश रहते आई है इतिहास में? क्या देश बहुसंख्यकवाद से उबर पाते हैं? इतिहास क्या कहता है? इस बारे में चिन्तकों का क्या कहना रहा है?’
इस पर उसने याद दिलाया- ‘बहुसंख्यकवाद बनाम लोकतंत्र: एक पुराना द्वंद्व, लोकतंत्र का सामान्य अर्थ अक्सर यह मान लिया जाता है कि जिसकी संख्या ज्यादा, वही सही। लेकिन इतिहास बताता है कि लोकतंत्र और बहुसंख्यकवाद एक ही चीज नहीं हैं, बल्कि कई बार एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। लोकतंत्र का मूल विचार है, सहमति, अधिकारों की रक्षा, असहमति की जगह, और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। जबकि बहुसंख्यकवाद कहता है कि हम ज्यादा हैं, इसलिए हम तय करेंगे। यहीं से टकराव शुरू होता है।
इतिहास में यह कश्मकश कहाँ-कहाँ दिखी?
1. प्राचीन एथेंस- एथेंस को लोकतंत्र की जन्मभूमि कहा जाता है, लेकिन वहीं सुकरात को बहुमत के फैसले से जहर पिलाया गया। यह पहली चेतावनी थी कि बहुमत हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होता।
प्लेटो ने तभी लिखा था कि अगर भीड़ शासन करेगी, तो विवेक हार जाएगा।
2. फ्रांसीसी क्रांति-‘जनता की सत्ता’ के नाम पर रोबेस्पिएर का आतंक आया, जहाँ बहुमत के नाम पर हज़ारों को गिलोटिन पर चढ़ाया गया। यहीं से यह समझ बनी कि लोकतंत्र बिना संस्थाओं और अधिकारों के खुद तानाशाही बन सकता है।
3. जर्मनी और हिटलर- हिटलर सत्ता में आया चुनाव जीतकर, संविधान के रास्ते। यह इतिहास का सबसे भयावह उदाहरण है कि बहुसंख्यक समर्थन लोकतंत्र को नष्ट कर सकता है।
हन्ना आरेंट ने लिखा कि तानाशाही अक्सर लोकतंत्र की गोद में जन्म लेती है।
4. अमेरिका- नस्ली बहुमत का दौर, अमेरिका दशकों तक लोकतंत्र रहा, लेकिन अश्वेतों को वोट का अधिकार नहीं था। कानून बहुमत के थे, न्याय नहीं। यह दिखाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, नैतिक ढांचा भी है।
क्या देश बहुसंख्यकवाद से उबर पाते हैं?
इतिहास कहता है- हाँ, लेकिन आसान नहीं।
उबरने के उदाहरण
जर्मनी- नाजी दौर के बाद उसने अपने संविधान में बहुसंख्यकवाद पर कड़ी सीमाएँ लगाईं।
दक्षिण अफ्रीका- श्वेत बहुमत की सत्ता से निकलकर सुलह और संवैधानिक समानता की ओर गया।
स्पेन- फ्रांको की तानाशाही के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया।
इन देशों ने सीखा कि लोकतंत्र को बहुमत से नहीं, नियमों से बचाया जाता है।
लेकिन कई देश क्यों नहीं उबर पाए?
जहाँ संस्थाएँ कमजोर रहीं, जहाँ न्यायपालिका झुकी, जहाँ मीडिया चुप रहा, जहाँ शिक्षा ने सवाल पूछना नहीं सिखाया, वहाँ बहुसंख्यकवाद स्थायी हो गया।
तुर्की, हंगरी, रूस, यहां चुनाव हैं, लेकिन लोकतंत्र सीमित है।
चिंतकों ने क्या चेतावनी दी?
अलेक्सिस द टोकेविल- लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यक की तानाशाही है, जो अल्पसंख्यकों को चुप करा देती है।
जॉन स्टुअर्ट मिल- समाज को व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहुमत का अत्याचार करने का अधिकार नहीं है।
डॉ. आंबेडकर- अगर संवैधानिक नैतिकता नहीं होगी, तो बहुमत लोकतंत्र को कुचल देगा।
अमर्त्य सेन- लोकतंत्र केवल मतदान नहीं, बल्कि सार्वजनिक विवेक की प्रक्रिया है।
कार्ल पॉपर- सच्चा सवाल यह नहीं कि कौन शासन करेगा, बल्कि यह कि बुरे शासकों को हटाया कैसे जाए।
आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लडक़ी या महिला से उसके प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड ने ब्लैकमेल करते हुए साथियों सहित बलात्कार किया। मतलब यही है कि प्रेम या दोस्ती के चलते जो रिश्ता दो लोगों के बीच रहना था, उसको सामूहिक कर दिया गया। फिर ऐसे सामूहिक करने के लिए किसी पुराने वीडियो को हथियार बना लिया जाता है, या चाकू की नोंक पर धमकी देकर ऐसा किया जाता है। मेरे आसपास ही हर कुछ दिनों में ऐसी घटना होती है, इनमें बलात्कारियों की कमीनगी पर गुस्सा आता है, उससे नफरत होती है, लेकिन साथ-साथ इस बात से हैरानी भी होती है कि आज खबरों के सैलाब के बीच भी कोई लडक़ी या महिला सावधानी बरतने का सबक नहीं लेतीं कि ब्लैकमेलिंग की बुनियाद पर बलात्कार और सामूहिक बलात्कार कैसे होते हैं। या तो लोग यह मानकर चलते हैं कि धोखेबाज लोग कोई और होते होंगे, और उनके वाले तो भले हैं, या फिर वे निजी मजे के अंतरंग वीडियो में ऐसे उलझ जाती हैं कि सामूहिक ज्यादती के जाल में फंस जाती हैं।
आज जब चारों तरफ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो लड़कियों और महिलाओं को कुछ बुनियादी समझ और सावधानी विकसित करने की जरूरत है। यह जरूरत उन्हें अधिक इसलिए है कि शिकायतें उन्हीं की तरफ से दर्ज होती हैं, किसी लडक़े या मर्द की तरफ से यह शिकायत दर्ज नहीं होती कि लडक़ी या महिला ने उनसे बलात्कार किया। इसलिए सावधानी भी उसी तबके को अधिक बरतनी होगी जिसके साथ ज्यादती का खतरा अधिक रहता है, या रहता है।
बहुत तरह की शिकायतों से यह बात समझ पड़ती है कि बालिग या नाबालिग लड़कियों की तरफ से यह शिकायत आती है कि शादी का वायदा करके उनके साथ देहसंबंध बनाए, और फिर शादी से मुकर जाना धोखा देने का काम हुआ। इससे परे कुछ मामले सीधे-सीधे ज्यादती के होते हैं जिनमें किसी वायदे और धोखे की बात भी शिकायत में नहीं आती, और प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की अगुवाई में उसके साथी गैंगरेप करते हैं। इन दोनों ही मामलों की शुरूआत एक विश्वास से होती है। और यह विश्वास अधिकतर मामलों में रेत पर खड़ी इमारत सरीखा होता है जो कि पहली तेज आंधी में गिर सकती है, गिर जाती है।
विश्वास की इमारत के लिए प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की जरूरत जरूरी नहीं रहती, कई मामलों में परिवार के लोग, भाई, पिता, या चाचा-जीजा कोई भी विश्वास की इमारत को गिराने की ताकत रखते हैं। पुलिस में बीच-बीच में ऐसे मामले भी पहुंचते हैं जिनमें घर के लोगों ने ही बलात्कार किया, और किसी एक हादसे की तरह अनायास एक बार घट गई घटना जैसा नहीं, महीनों और बरसों तक इसे जारी रखा। फिर यह भी लगता है कि ऐसी रिपोर्ट सौ घटनाओं में से दो-चार की ही होती होगी, बाकी मामलों में लोग घर की बात घर में रखने के लिए दबाव डालकर शिकायतें दबवा देते होंगे।
इनमें से किसी भी किस्म के मामले हों, ऐसा लगता है कि इंसान की देह की जरूरत उसके बाकी तमाम मूल्यों पर इतनी हावी हो जाती है कि वे तमाम बदनामी झेलने, पूरी जिंदगी कैद काटने की कीमत पर भी देह की जरूरत को पूरा करना अधिक जरूरी समझते हैं। इसके लिए कई लोग चार-छह बरस के बच्चों की देह से भी अपनी भूख मिटाने लगते हैं, कई लोग वर्जित संबंधों की वर्जनाएं भुला देना बेहतर समझते हैं, और कई लोग कोई जुर्म करने के लिए गिरोह बनाने की तर्ज पर गैंगरेप की योजना बनाते हैं, उसे पूरा करते हैं, और उसके वीडियो भी बनाते हैं, धमकाकर रखने के लिए, और अपनी कामयाबी के मैडल की तरह दूसरे दोस्तों को दिखाने के लिए भी।
यह पूरा सिलसिला परले दर्जे की सावधानी सुझाता है। लड़कियों के लिए यह शारीरिक रूप से, और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी अधिक नुकसानदेह होता है, इसीलिए हमने सुझाव की शुरूआत उन्हें ही सावधान रखने के लिए की है, न सिर्फ बाहरी लोगों से सावधानी, बल्कि घर के लोगों से भी। दूसरी तरफ अपने परिवार के जिन लडक़ों, और मर्दों की गिरफ्तारी होने पर उन्हें छुड़ाने का जिम्मा जिन लोगों पर आएगा, जो सजा होने के पहले तक टिफिन जेल पहुंचाएंगे, उन्हें भी अपने परिवार के और आसपास के लोगों को सावधान करने की जरूरत है कि देह के कुछ देर के मजे के लिए उन्हें घर-परिवार और समाज के सारे सुख खतरे में नहीं डालने चाहिए।
दुनिया में शांतिदूत बनकर नोबल शांति पुरस्कार का दावा करने वाला अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प दुनिया का एक सबसे हिंसक राष्ट्रपति साबित हो रहा है। जिस अंदाज में उसने अमरीकी सरकार की दुनिया के गरीब देशों के जाने वाली यूएस-एड मदद को खत्म करने के साथ ही दसियों लाख जिंदगियों को खत्म करने का सिलसिला शुरू कर दिया, वह अपने आपमें उसके नाम को नोबल शांति पुरस्कार की किसी भी लिस्ट से बाहर करने के लिए काफी था। और फिर मानो वह काफी न हो, तो उसने जलवायु परिवर्तन रोकने के वैश्विक अभियान को ग्रीन-धोखाधड़ी बताते हुए उससे हाथ खींच लिए। इससे धरती के तबाह होने का सिलसिला धीमा करने का जो आसार दिख रहा था, वह पूरी तरह खत्म ही हो गया। उसने शांति स्थापित करने के नाम पर पौन बरस तक फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमलों को हथियार देना जारी रखा, और फिर फिलीस्तीनियों को अपने ही घर में भूखे बघेर शरणार्थी बनाकर इस युद्ध को रूकवाने का दावा किया, और नोबल शांति पुरस्कार कमेटी के माथे पर मानो बंदूक ही टिका दी। ऐसे ट्रम्प ने दो दिन पहले दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक, वेनेजुएला पर फौजी हमला किया, और वहां के राष्ट्रपति को उसकी पत्नी सहित बेडरूम से उठाकर अमरीका लाने का काम किया। यह इसलिए कि ट्रम्प ने तेल के भंडारों और खदानों पर कब्जा करने के लिए वेनेजुएला पर अमरीका में नशीले सामान भेजने का आरोप लगाते हुए उसके पास के समंदर में पिछले महीनों में अलग-अलग बोट पर कई हमले किए, और दर्जनों लोगों को मार भी डाला। एक हमला तो अमरीकी फौज ने ऐसा किया कि उसमें बोट से बचे हुए तैरते दो लोगों को हवाई हमले से और मार डाला गया, और इसका वीडियो देखकर कई अमरीकी सांसदों ने कहा कि उन्होंने इससे भयानक कोई नजारा पूरी जिंदगी में नहीं देखा।
लेकिन हम पहले भी कई बार इस बात को लिखते आए हैं कि लोगों को अपनी जिंदगी में ही अपना किया हुआ भुगतना पड़ता है। यह बात सिर्फ लोगों पर लागू नहीं होती, देशों पर भी लागू होती है। दर्जनों देशों पर अलग-अलग वक्त पर किए गए अमरीकी हमलों, और उनमें मार डाले गए दसियों लाख लोगों की आह का असर है कि आज निर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प अमरीका के तमाम लोकतांत्रिक संस्थानों को, वहां की लोकतांत्रिक परंपराओं को खत्म कर रहा है। अभी तीन साल और बाकी अपने कार्यकाल में वह कोई भी लोकतांत्रिक इमारत छोड़ेगा, या अमरीकी लोकतंत्र को गाजा के आज के मलबे की तरह बनाकर जाएगा, यह अंदाज लगा पाना अभी आसान नहीं है। जो राष्ट्रपति अपने देश के भीतर संसद, अदालत, सरकार, मीडिया, और विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान, किसी को भी नहीं छोड़ रहा है, हर किसी को तबाह कर रहा है, हर किसी के लिए हिकारत दिखा रहा है, वह राष्ट्रपति नोबल शांति पुरस्कार की उम्मीद भी कर रहा है, बल्कि उसका दावा करते हुए वह हिंसक भी हुआ जा रहा है। जो कहने के लिए दुनिया की 8 बड़ी-बड़ी जंग रूकवाने का दावा नींद में भी बड़बड़ाते रहता है, उसने ईरान पर बुरा हमला किया, और अब वेनेजुएला को एक देश भी मानने से इंकार कर दिया, और उसे अपने ही किसी मुहल्ले की तरह मानकर वहां पर फौजी कार्रवाई की। एक देश के राष्ट्रपति को नींद से सोते हुए उसकी बीवी सहित उठाकर लेकर अमरीका आ जाना, और उसे युद्धबंदी की तरह रखना, उसकी तस्वीरें जारी करना, ट्रम्प के मन में किसी अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए कोई सम्मान नहीं है। एक के बाद एक विकसित और सभ्य देश, संयुक्त राष्ट्र संघ, खुद अमरीका के बहुत से नेता, वेनेजुएला पर इस फौजी कार्रवाई को गैरकानूनी बता रहे हैं, गैरजरूरी तो बता ही रहे हैं। और यह करते हुए ट्रम्प बाकी दुनिया के सामने एक बहुत बुरी मिसाल पेश कर रहा है। इसे देखते हुए यूक्रेन पर रूसी हमले को कैसे गलत करार दिया जा सकेगा, गाजा पर फिलीस्तीनी हमले को भी इसी पैमाने पर सही ठहरा दिया जाएगा, और आज जिस ताइवान के इर्द-गिर्द चीनी फौज घेरा डाले पड़ी है, और लगातार यह जिद कर रही है कि ताइवान चीन का ही एक हिस्सा है, उस चीनी युद्धोन्माद को कैसे नाजायज ठहराया जा सकेगा? ट्रम्प ने अपनी जंगखोर, और विस्तारवादी नीतियों के चलते ऐसी हिंसक मिसालें पेश की हैं कि उसे युद्ध अपराधी आसानी से करार दिया जा सकता है, कोई फर्जी शांति पुरस्कार भी उसे नहीं दिया जा सकता।
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
दुनिया के वन्यजीवन छायाकारों के बीच अभी एक नई बहस शुरू हुई है कि अपनी फोटोग्राफी को यादगार बनाने के लिए उन्हें वन्यजीवन में कितना दखल देना चाहिए? हुआ यह कि अभी केरल में मिलने वाला एक दुर्लभ मेंढ़क फोटोग्राफरों के उत्साह का निशाना बन गया। गैलेक्सी फ्रॉग नाम का यह मेंढक अपनी चमड़ी पर चमकीले दागों की वजह से आसमान के तारों की तरह दिखता है, और वह बहुत ही गिनी-चुनी संख्या में है इसलिए उनकी अच्छी फोटो पाना भी नामुमकिन सा रहता है। ऐसे मेंढक की तस्वीर के लिए कुछ फोटोग्राफरों ने उनकी जगह पर उलटफेर किया, उन्हें पकड़कर एकसाथ रखना चाहा ताकि एक अधिक दुर्लभ तस्वीर मिल जाए, और इस चक्कर में उनमें से कुछ मेंढक मर गए। यह दुर्लभ वन्यजीवन का एक बड़ा नुकसान था, और मेंढक तो शहरी फोटोग्राफरों का मुकाबला या विरोध करने की ताकत शेर-चीतों की तरह रखते नहीं थे। 4 चीतों या 6 शेरों को एकसाथ बिठाने का हौसला तो किसी फोटोग्राफर ने किया नहीं होता।
इस पर इंटरनेशनल मीडिया में एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि यादगार तस्वीर पाने के लिए फोटोग्राफर प्राकृतिक जीवन में किस हद तक दखल दें। बहुत से फोटोग्राफर नाराज हैं कि उनके कुछ साथी फोटोग्राफी के मुकाबलों में अवॉर्ड जीतने के लिए कई किस्म की अनैतिक हरकतें करते हैं, जो कि कई देशों के कानून के मुताबिक जुर्म भी है। लेकिन नेशनल जियोग्राफिक जैसी पत्रिका में छपने के लिए, या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में वन्यजीवन फोटोग्राफी का अवार्ड पाने के लिए लोग नैतिकता को घर छोड़कर जंगल में पैर रखते हैं।
इस खबर और बहस से मुझे याद पड़ता है कि कोई 25 बरस पहले पेरिस के एक विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी का एक शोधछात्र छत्तीसगढ़ के बस्तर आया था। वह संगीत-एंथ्रोपोलॉजी का छात्र था, और बस्तर के एक लोकवाद्य, तुरही पर शोध कर रहा था कि उसे कैसे-कैसे सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इस सिलसिले में वह बस्तर के एक हिस्से में एक आदिवासी-ग्रामीण संगीत पार्टी के साथ डेढ़-दो बरस तक रहा। उन्हीं के साथ घूमता था, उन्हीं के साथ रहता, खाता, सोता था। और इस बैंड के लोगों को मालूम था कि उसका शोधकार्य उन्हीं पर टिका है, इसलिए गांवों में संगीत बजाने पर मिलने वाले मुर्गे या बकरे को काटने की जिम्मेदारी भी इसी गोरे फिरंगी को दे दी जाती थी। खैर, वह आदिवासियों की समझदारी का एक अलग किस्सा है जिस पर अधिक बात आज के मुद्दे को भटका देगी। इसलिए मुद्दे पर लौटें तो वह यह कि यह शोधछात्र इस म्यूजिक पार्टी के लोगों से बार-बार अनुरोध करते रहा कि वे उसके लिए ऐसी एक तुरही बना दें जिसे वह ले जाकर विश्वविद्यालय में अपने विभाग में लगा सके, उसने इसके लिए भुगतान की बात भी कही थी। उसे हर बार वायदा किया गया कि वे कुछ दिन में तुरही बना देंगे, धीरे-धीरे उसके जाने का वक्त भी आने लगा, लेकिन तुरही बनी नहीं। अंत में इस बैंड के लोगों ने उसे कहा कि वे उन्हीं की तुरही ले जाए, और उसी का भुगतान कर दे। लेकिन उसने मना कर दिया क्योंकि सामाजिक शोधकार्य के उनके सिद्धांत और नैतिकता इस बात की इजाजत नहीं देते कि किसी जगह से उनकी संस्कृति का कोई हिस्सा ले जाया जाए। हो सकता था कि वह इस तुरही को लेकर चले जाता, और उसके साथ ही इस गांव में संगीत की वह परंपरा खत्म हो जाती। इसलिए वह खाली हाथ ही उदास और निराश लौटा, दूसरी तरफ बैंड के लोग भी उदास और निराश थे क्योंकि उन्हें परदेसी से इस तुरही के अच्छे दाम मिलने की उम्मीद थी जो कि पूरी नहीं हुई।
ये दो मिसालें एक-दूसरे के ठीक सामने खड़ी हुई हैं कि सामाजिक सरोकार किस तरह लोगों को गलत काम करने से रोकते हैं, लेकिन बाजारू मुकाबले की दौड़ लोगों से कैसे-कैसे गलत काम करवा बैठती है।
इन्हीं दो घटनाओं को लेकर मुझे 25 बरस पहले जर्मनी के एक फिल्म समारोह की याद आ रही है जिसमें हफ्तेभर मैंने दुनियाभर से आई हुई शोधछात्राओं की, और कुछ दूसरे निर्देशकों की भी फिल्में देखी थीं। जब सामाजिक स्थितियों में जाकर कोई लंबा शोध करते हैं, तो उन्हें अपने विषय से इतना लगाव भी हो जाता है कि वे इस पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसा ही माहौल उस फिल्म समारोह का था जहां पर फिल्मों के साथ शोधकर्ता भी जवाब देने को मौजूद थे।
इस फिल्म समारोह में योरप की एक बड़ी ही चर्चित और प्रमुख डॉक्यूमेंट्री मेकर की एक फिल्म थी जिसका सारे जानकार लोग बड़ा इंतजार भी कर रहे थे। अफ्रीका जंगलों में एक किसी गांव में एक महिला बच्चे को जन्म देने वाली थी, और इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा उस महिला के बदन पर ही केंद्रित था, और सिनेमा के बड़े पर्दे पर जब जन्म देते हुए उसका बदन खुलासे से दिख रहा था, तो उसे देखना भी कई लोगों को दिक्कत की बात लग रही थी।
जब यह फिल्म पूरी हुई और सवाल करने का मौका मिला, तो सवाल करने के लिए सबसे अधिक बदनाम हो चुका मैं खड़ा हुआ, और इस फिल्म निर्देशक से पूछा कि जिस महिला के अंतरंग बदन का इतना विशाल नजारा उन्होंने स्क्रीन पर दिखाया है, क्या यह उस महिला के निजी जीवन में एक नाजायज दखल नहीं है? क्या उस महिला को जंगल में रहते हुए इस बात का अहसास था कि उसके बदन का कौन सा हिस्सा सैकड़ों वर्गफीट की स्क्रीन पर इस तरह से दिखाया जाएगा? मैंने वहां पर बहुत से सवाल किए थे, जो कि मेरे अज्ञान से भी उपजे थे क्योंकि मुझे डॉक्यूमेंट्री के तौर-तरीकों के मुकाबले जिंदगी के नैतिक तौर-तरीकों की समझ अधिक थी। मेरे सवाल-जवाब कुछ इतने लंबे चले थे, और इतने तल्ख हो गए थे कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों पर योरप की एक प्रमुख ऑनलाइन मैगजीन ने मुझसे इस पर एक लेख लिखने के लिए कहा। मैंने इस फिल्म को लेकर अपनी सारी आपत्तियां एक लंबे लेख में लिखीं। मजेदार बात यह रही कि इस फिल्म निर्देशिका ने इसी ऑनलाइन पत्रिका में मेरे लेख के जवाब में एक और लंबा लेख लिखा।
मैं बहस में जीत-हार से अधिक इस बात को महत्व देता हूं कि अगर उसमें कुछ नैतिक बातें उठती हैं, लोगों को कुछ सोचने का मौका मिलता है, तो वह बहस का सबसे बड़ा हासिल रहता है। व्यक्तियों की जीत-हार कहीं महत्वपूर्ण नहीं रहती। दुनिया की सबसे बड़ी अदालतों में भी कई लोग हार जाते हैं, लेकिन हारते-हारते भी वे जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे कानून के इतिहास में महत्वपूर्ण तरीके से दर्ज होते हैं। इसलिए वन्यजीवन फोटोग्राफरों की नैतिकता को लेकर जो बात उठ रही है, जो बहस चल रही है वह अधिक महत्वपूर्ण है इस बात से कि क्या जंगल में जाकर कोई फोटोग्राफरों को रोक सकते हैं? कई फोटोग्राफर तो तितलियों की फोटोग्राफी करने के लिए उनको पकड़कर, कैद करके भी उनकी फोटो लेते हैं।
जम्मू के किश्तवाड़ जिले में चल रही एक हाइड्रो पॉवर परियोजना के एक बड़े अफसर ने स्थानीय भाजपा विधायक पर राजनीतिक और धार्मिक आधार पर नियुक्तियां करने का दबाव डालने का आरोप लगाया है। रतले परियोजना के संयुक्त मुख्य परिचालन अधिकारी हरपाल सिंह ने 13 दिसंबर को एक वीडियो संदेश जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि किश्तवाड़ की भाजपा विधायक शगुन परिहार इस योजना में मजदूरों और ठेकेदारों को धार्मिक आधार पर नियुक्त करने के लिए दबाव डाल रही हैं। उन्होंने वीडियो में कहा है कि एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह से बांह मरोडऩे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह परियोजना तकनीकी और सुरक्षा की दृष्टि से एक संवेदनशील प्रोजेक्ट है, और यहां पर नियुक्तियां और ठेके योग्यता के आधार पर होने चाहिए न कि राजनीतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर। अगर सही वातावरण में काम करने नहीं दिया गया तो इससे बांध की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ सकता है। शगुन परिहार पहले भी विवादों में रही हैं, और अक्टूबर में उन्होंने विधानसभा के भीतर एक भाषण में अपने निर्वाचन क्षेत्र की हिन्दू आबादी को राष्ट्रवादी लोग कहकर संबोधित किया था, जिस पर विपक्ष की कड़ी आपत्ति के बाद विधानसभा अध्यक्ष को उनकी टिप्पणी रिकॉर्ड से हटानी पड़ी थी।
अब जम्मू से थोड़ा नीचे उतरें, और यूपी आ जाएं, तो यहां पर राजधानी दिल्ली से लगे हुए नोएडा की अदालत ने यूपी सरकार से पूछा है कि क्या कत्ल के मामले को आज तक कभी सरकार ने ही वापिस लिया है? फास्ट ट्रैक अदालत के अतिरिक्त जिला जज सौरभ द्विवेदी ने यह सवाल यूपी सरकार की इस अर्जी पर किया कि गोमांस के शक में घर से निकालकर जिस अखलाक को भीड़ ने मार डाला था, उस भीड़ के सारे आरोपियों पर से सरकार सारे आरोप वापिस ले लेना चाहती है। अखलाक का मामला भारत में भीड़त्या के मामलों की शुरूआत माना जाता है। 2015 में 55 बरस के अखलाक को इस आरोप के साथ घर से निकालकर मार डाला गया था कि उसने घर पर गोमांस रखा है। बाद में प्रयोगशाला की जांच में पाया गया कि वह गोमांस नहीं था। इस मामले में डेढ़ दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें से तीन नाबालिग भी थे। बाकी सबकी जमानत हो चुकी है, और मामला अदालत में इंच-इंच घिसट रहा है। अब योगी सरकार सारे आरोपियों पर से सारे आरोप वापिस लेना चाहती है। इन आरोपियों में से जो पहले दस गिरफ्तार हुए थे, उनके नाम रूपेन्द्र, विवेक, सचिन, हरिओम, श्रीओम, विशाल, शिवम, संदीप, सौरभ, और गौरव हैं।
एक तीसरा मामला बिहार के नवादा जिले का है जहां भीड़ द्वारा पीटे गए एक मुस्लिम फेरीवाले मोहम्मद हुसैन की कल मौत हो गई। वह इस जिले का ही रहने वाला था, और 20 साल से गांव-गांव जाकर कपड़े बेचता था। उसने मरने के पहले वीडियो-कैमरे पर जो बयान दिया, वह दिल दहलाने वाला है। हमलावरों ने उसके पैंट उतारकर उसके धर्म की जांच की, उंगलियां पेंचिस से तोड़ीं, गर्म लोहे से जलाया, सीने पर चढक़र पीटा, ग्लास तोडक़र उससे कान और उंगलियां काटे, उंगलियों को ईंटों से कुचला, गर्म रॉड से जलाया, बिजली के झटके दिए, और उसके बदन के भीतर पेट्रोल भी भर दिया। बुरी तरह जख्मी हालत में उसे अस्पताल में भर्ती किया गया, और अपने परिवार का वह अकेला कमाऊ सदस्य चल बसा। जिन हत्यारों की शिनाख्त हो पाई है, उनमें सोनू कुमार, रंजन कुमार, सचिन कुमार, और श्रीकुमार अब तक गिरफ्तार हुए हैं।
इन तीन मामलों से भी जिनका दिल न दहलता हो, उन्हें अपने दिल की जांच जरूर करवानी चाहिए, और दिमाग की भी। उन्हें किसी मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक की सेवाएं लेकर अपनी धार्मिक भावनाओं के बारे में भी विश्लेषण करवाना चाहिए कि वह सचमुच आस्था ही है, या आस्था की खाल ओढ़ी हुई कातिल भावना है? जिन लोगों को इन तीनों घटनाओं के खतरे नहीं समझते हैं, उनके लिए मध्यप्रदेश के रायसेन की एक खबर है। वहां पर उदयपुरा इलाके के एक गांव में भरत सिंह धाकड़ और उनके परिवार का गांव ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया है, उन्हें किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाता। इसकी वजह है कि भरत सिंह और उसके दो साथी, मनोज पटेल, और सत्येन्द्र रघुवंशी एक दलित परिवार में श्राद्ध पर भोजन कर आए थे। गांव ने पंचायत करके फरमान जारी किया कि दलित के यहां भोजन करना गोहत्या से बड़ा पाप है। इसके लिए गंगा स्नान कर शुद्धिकरण करना होगा, और गांव में भंडारा कराना होगा। जब पंचायत में भरत सिंह ने सवाल उठाया कि दलित के घर भोजन उसने किया तो उसके पिता का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है, तो उसे जवाब मिला कि अगर पिता को दोष से मुक्त रखना है, तो मुंडन कराकर जीते जी उनका पिंडदान कर दो, और संबंध तोडऩे की घोषणा कर दो, तभी वे तुम्हारे पाप से मुक्त माने जाएंगे।
एक वक्त जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, और अब सिर्फ कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अभी भारत की चुनावी हकीकत के बारे में कुछ गंभीर बातें कही हैं। वे देश के एक छोटे बना दिए गए प्रदेश के हैं, लेकिन उन्होंने जो बात कही है वह देश के आज के विपक्ष के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक जायज और जरूरी हैं। वे गिनीचुनी लोकसभा सीटों के सीएम हैं, लेकिन उन्होंने यूपी, बिहार, महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेशों के विपक्षी नेताओं के सोचने-विचारने का एक मुद्दा सामने रखा है। उन्होंने कहा कि विपक्षी ‘इंडिया गठबंधन’ अभी वेंटिलेटर पर है, दूसरी तरफ भाजपा की चौबीसों घंटे चलने वाली चुनावी मशीन से मुकाबला करने की चुनौती उसके सामने है। उन्होंने कहा कि वे अपने पिता की ईवीएम की धांधली वाली बात से सहमत नहीं हैं। वे ईवीएम पर शक नहीं करते। दूसरी तरफ उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि भाजपा हर चुनाव ऐसे लड़ती है मानो उसकी जिंदगी दांव पर लगी हो, और हम (विपक्ष) कभी-कभी चुनाव ऐसे लड़ते हैं मानो हमें कोई परवाह ही नहीं है। उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के चौबीस घंटे राजनीति के मॉडल की चर्चा करते हुए कहा कि वे एक चुनाव होते ही अगले क्षेत्र में चले जाते हैं, दूसरी तरफ भाजपाविरोधी पार्टियां चुनाव के दो महीने पहले पांव धरती हैं, और अगर नामांकन की आखिरी तारीख तक भी इन पार्टियों में चुनावी गठबंधन हो जाए, तो विपक्ष किस्मत का बुलंद होगा। उन्होंने भविष्य के लिए कहा कि भाजपा को गंभीर चुनौती देने का अकेला तरीका विपक्ष के सबसे बड़े घटक दल कांग्रेस के इर्द-गिर्द एकजुट होना है क्योंकि भाजपा के अलावा वह अकेली ऐसी पार्टी है जिसकी पूरे देश में मौजूदगी है। उमर अब्दुल्ला ने मंजूर किया कि क्षेत्रीय दलों की सीमित भौगोलिक पहुंच की सीमाएं हैं।
आज जब भाजपा विरोधी पार्टियां बिहार में औंधेमुंह गिरी हुई हैं, बंगाल के चुनाव को वामपंथी और कांग्रेसी मानो अपनी-अपनी आराम कुर्सियों पर अधलेटे पड़े हुए दूर से देख रहे हैं, तब भाजपा ने बंगाल की एक-एक विधानसभा सीट के लिए देश भर से अपने संगठन के नेता तय कर दिए, जैसे कि उसने बिहार में किए थे। मोदी और शाह की अगुवाई में भाजपा इस अंदाज में बिहार का चुनाव लड़ी है कि एक भी सीट हार जाने पर देश की सत्ता ही उनके हाथ से निकल जाएगी। दूसरी तरफ राहुल-पार्टी, और लालू-पार्टी मतदान खत्म हो जाने तक दोस्ताना मुकाबले में लगे हुए थे, और जीत के किसी गणित या समीकरण से उन्हें ऐसा ही परहेज था जैसा कि गणित नापसंद करने वाले किसी छात्र का होता है। भाजपा की बंगाल की तैयारी का हाल यह है कि आज कोलकाता में रामदेव और धीरेन्द्र शास्त्री की मौजूदगी में गीता पाठ होने जा रहा है जिसमें पांच लाख लोगों के आने की उम्मीद जताई गई है, और तैयारी की गई है।
किसी राज्य की सत्ता में रहने पर भी भाजपा के सबसे बड़े केन्द्रीय नेता चुनाव के पहले के महीनों में वहां इतनी बार दौरा करते हैं कि पार्टी के हर कार्यकर्ता चौकन्ने होकर खड़े हो जाते हैं। यह पार्टी एक समय संसद में लोकसभा में दो सदस्यों की रह गई थी, वहां से लेकर अभी तक उसने लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने का एक रिकॉर्ड बनाया है, साथ ही विपक्ष को कई तरह से मटियामेट भी कर दिया है।
उमर अब्दुल्ला की यह बात तो सही है कि इंडिया गठबंधन की पार्टियों को कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही एकजुट होना पड़ेगा, क्योंकि वही एक राष्ट्रीय पार्टी इस गठबंधन में है, बाकी तमाम पार्टियां एक या दो प्रदेशों तक ही सीमित हैं। लेकिन कांग्रेस का हाल देखने लायक है। उसके आज के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी पार्टी के किसी पद पर नहीं हैं, वे लोकसभा में विपक्ष के नेता जरूर हैं, लेकिन अपने संगठन में वे सबसे बड़े पदाधिकारी नहीं हैं। दूसरी तरफ मल्लिकार्जुन खरगे सरीखे जैसे बुजुर्ग और दलित नेता पार्टी के अध्यक्ष जरूर बनाए गए हैं, लेकिन वे पार्टी की नीतियां तय नहीं करते, उनकी घोषणा नहीं करते, यह सारा काम राहुल गांधी करते हैं, जो कि अपने पार्टी संगठन के प्रति किसी तरह जवाबदेह नहीं हैं। यूपीए सरकार के दौरान वे मनमोहन मंत्रिमंडल के विधेयक के मसौदे को दिल्ली प्रेस क्लब में फाडक़र फेंक चुके हैं, और गठबंधन सरकार को मंत्रिमंडल से पास उस विधेयक को खारिज करना पड़ा था। वे कांग्रेस के राजकुमार हो सकते हैं, वे विपक्ष के सबसे चर्चित नेता भी हो सकते हैं, लेकिन इन दोनों बातों से वे मोदी और शाह के मुकाबले के नेता नहीं बन सकते।
मोदी और शाह को देखें, तो वे रात-दिन राजनीति करते, चुनावी तैयारी करते, और प्रचार करते ही दिखते हैं। इस बीच वे बंद कमरे में जितनी भी देर सरकारी काम करते हों, उसका जो हिस्सा सार्वजनिक होता है, वह मतदाताओं को प्रभावित करने वाला होता है। देश की अर्थव्यवस्था, लोगों की जमीनी दिक्कत, बेरोजगारी, या आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को मोदी और शाह उसी तरह अनदेखा करते हुए भावनात्मक प्रचार में लगे रहते हैं जैसा अनदेखा करने के लिए कहा जाता है कि कुत्ते भौंके हजार, हाथी चले बजार। न तो हम मोदी-शाह को हाथी कह रहे, न ही विपक्ष को कुत्ता कह रहे, लेकिन भाजपा के नेताओं को देखें तो वे किसी भी वास्तविक संकट या समस्या से अपने को पूरी तरह निर्लिप्त रखते हुए प्रचार में जुटे रह सकते हैं।
दूसरी तरफ दो चुनाव प्रचारों के बीच राहुल गांधी कब किस देश चले जाते हैं, किसलिए जाते हैं, वहां क्या करते हैं, यह सब रहस्य बना रहता है। अब बाकी तमाम तिकड़म और तैयारी के साथ-साथ 365 दिन चौबीसों घंटे चुनावी राजनीति करने वाले मोदी और शाह के मुकाबले राहुल गांधी की राजनीति पार्टटाईम शौकिया काम करने वाले की दिखती है। कुछ तो पारिवारिक विरासत की वजह से, और कुछ अपनी पार्टी की पूरे देश में मौजूदगी की वजह से कांग्रेस और राहुल गांधी अपने विपक्षी गठबंधन के केन्द्र में बने रहते हैं, फिर चाहे वे फिल्म में अतिथि कलाकार की तरह कुछ देर के लिए ही क्यों न आते हों।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया को लेकर अभी कुछ सख्त सोच जाहिर की है, और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के साथ-साथ सरकार पर भी थोड़ी अधिक जिम्मेदारी डाली है। एक मामले की सुनवाई चल ही रही है कि अदालत ने इस बारे में कहा कि अब सोशल मीडिया सिर्फ निजी अभिव्यक्ति का मंच नहीं रहा, उस पर लिखी बातें नफरत, हिंसा, या अफवाह को फैलाने की ताकत रखती है। उसने पारंपरिक मीडिया के बारे में कहा कि अखबार में छपने वाली बात की जिम्मेदारी तय होती है, लेकिन सोशल मीडिया पर पांच सेकेंड में झूठ देश भर में फैल जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान की अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन यह आजादी सीमाविहीन नहीं है। अदालत ने कहा कि झूठ, नफरत, मानहानि, और धार्मिक उकसावा, इन सब पर सीमा लागू होती है। अदालत ने सरकारी कामकाज के बारे में भी कहा कि सोशल मीडिया ने अफसरों को डराने-धमकाने के नए तरीके बना लिए हैं। जायज सरकारी काम करने पर भी सोशल मीडिया की टिप्पणियां अधिकारियों को मानसिक रूप से तोड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि क्या मौजूदा आईटी कानून काफी है, क्या और नियमों की जरूरत है?
जब सुप्रीम कोर्ट ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जरूरी सीमा रेखा खींचने लगे, तो फिर सरकार को भला और क्या चाहिए? सरकार तो लोगों की अभिव्यक्ति पर तरह-तरह की सीमा रेखा खींचने की शौकीन ही रहती है। परंपरागत मीडिया पर काबू थोड़ा आसान रहता है, और ऐसे में अराजकता की हद तक आजाद सोशल मीडिया पूरी तरह बेकाबू रहता है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट खुद होकर सरकार से पूछ रही है कि क्या उसे इस अराजकता पर काबू पाने के लिए कोई नए नियम-कानून चाहिए, तो सरकार के लिए तो मानो उसका पसंदीदा संगीत बजा दिया गया। लेकिन बात सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं है कि सोशल मीडिया से वही अकेली परेशान है। सरकार के पास तो आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई करने के लिए बहुत सारे अधिकार हैं, लेकिन अगर सरकार किसी हमलावर दस्ते पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर ऐसे दस्ते के हमले के शिकार लोग अपने को बचा नहीं पाते। आज भारत में सोशल मीडिया पर सरकार से बेकाबू लोग अराजक हो रहे हों, ऐसी नौबत कम है। सरकार को पसंद लोग अराजक अधिक हो रहे हों, ऐसी नौबत अधिक है। ऐसे में इन लोगों पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती है।
सोशल मीडिया के साथ जाने किसने और कब मीडिया शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। पहले ही परंपरागत प्रेस बाद में प्रचलित हुए मीडिया शब्द के भीतर एक अल्पसंख्यक हो चुका है, अपने नीति-सिद्धांतों की पोटली थामे हुए, दबा-सहमा सा बैठा रहता है प्रेस, और मीडिया के दायरे में आने वाले बाकी लोग सडक़ों पर बेकाबू जानवरों की तरह मटरगश्ती करते हैं। अब मानो मीडिया नाम का यह बेकाबू और अराजक तबका काफी नहीं था, अब सोशल मीडिया नाम का एक और बड़ा तबका खड़ा हो गया है जिसमें दुनिया के हर ऑनलाईन नागरिक शामिल हैं। समंदर के पानी की भला कौन सी बूंद बाकी बूंदों के प्रति जवाबदेह हो सकती है? सोशल मीडिया का हाल कुछ ऐसा ही है। ऐसे में भारत के सुप्रीम कोर्ट को इस देश की सरहद के भीतर से सोशल मीडिया पर कहा और लिखा जाने वाला अगर खटक रहा है, तो वह सरकार के लिए कुछ हद तक काबू का हो सकता है, और बहुत हद तक बेकाबू बना रहेगा क्योंकि इंटरनेट की टेक्नॉलॉजी की बुनियादी खूबी या खामी यही है।
लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि जब कभी सरकार के हाथ किसी चीज को रोकने के लिए कोई अधिकार लगता है, तो जुर्म तो बाद में रूकते हैं, पहले तो उन जायज बातों को रोका जाता है जो कि सरकार को नापसंद रहती हैं। आज भी आईटी एक्ट के तहत देश भर में सरकारें उन्हीं बातों को अधिक रोकती हैं जो राजनीतिक रूप से उन्हें व्यक्तिगत तौर पर नापसंद रहती हैं। फिर सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों न हो, उसका बर्दाश्त तब एकदम कम हो जाता है जब बात उस पर आ जाती है। हमने ममता को भी कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार करते देखा है। सरकार की व्यक्तिगत पसंद और नापसंद को तानाशाही की हद तक ले जाने के लिए आज किसी भी राज्य की पुलिस अंग्रेजीराज की पुलिस के मुकाबले कहीं अधिक अलोकतांत्रिक होकर काम करती हैं। देश में एक सुप्रीम कोर्ट भी है, और उसके सामने एक जवाबदेही की नौबत आ सकती है, यह आशंका भी किसी राज्य की पुलिस की अराजकता को कम नहीं करती।
यह बात है तो लोकल, लेकिन आज के वक्त किसी भी लोकल बात की एक ग्लोबल संभावना भी रहती है, और किसी ग्लोबल बात की लोकल संभावना। शायद इसीलिए बहुत बरस पहले मैंने अपने ब्लॉग का नाम इन दोनों को मिलाकर बने हुए एक शब्द, ग्लोकल पर रखा था। अब अमरीका में चार-चार बरस के लिए सरकार चुनी जाती है, कुछ देशों में पांच बरस के लिए। भारत भी उन्हीं में से है, और यहां केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और पंचायत सरकारें पांच-पांच बरस के लिए बनती हैं। माना तो यही जाता है कि जनता के एक बार वोट देने के बाद ये सरकारें पांच बरस तक काम करें, लेकिन राजभवन और विधानसभा अध्यक्ष के दफ्तर 21वीं सदी के ऐसे नए नीलामघर बन गए हैं कि सरकारें कई बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पातीं। लेकिन वह एक अलग बहस का मुद्दा हो जाएगा, आज मेरे इर्द-गिर्द छत्तीसगढ़ में जो मुद्दा है, वह तो पांच बरस पूरी चलने वाली सरकारों के साथ भी आने वाली दिक्कत का मुद्दा है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक सरकारी कॉलेज के विशाल मैदान का बेजा इस्तेमाल करके वहां पर बनाए गए एक खानपान के बाजार को तोड़ दिया गया। इस पर म्युनिसिपल के करोड़ों खर्च हुए थे, और पिछली कांग्रेस सरकार के वक्त भाजपा के स्थानीय विधायक जो कि उस समय भूतपूर्व विधायक थे, वे इसके खिलाफ अड़े हुए थे। कल उन्होंने इसे तुड़वाकर दम लिया। उनकी आपत्ति यह नहीं थी कि एक मैदान के बड़े हिस्से को घेरकर बाजार क्यों बनाया गया, उनकी आपत्ति यह थी कि वहां पर कुछ और बनाया जाना चाहिए था। कांग्रेस और भाजपा की सत्ता के बीच फंसे हुए इस बाजार के कल हट जाने के बाद भी आज यह आवाज कहीं से नहीं आ रही कि खेल के एक मैदान का एक बड़ा हिस्सा काटकर जो पूरी तरह से अनैतिक और गैरकानूनी इस्तेमाल किया गया था, उस इस्तेमाल को ही खत्म किया जाना चाहिए था। जमीन चाहे सरकार की हो, अगर वह मैदान के इस्तेमाल में आ रही है, आधी सदी से उसका यही उपयोग बना हुआ है, तो कोई सरकार भी वहां बाजार नहीं बना सकती। लेकिन हाईकोर्ट तक जाकर किसी ने यह मुद्दा नहीं उठाया। बात अहंकारों के टकराव तक सीमित रह गई कि शहर के किस मैदान को काटकर कौन वहां चौपाटी बनाए, कौन अपने लोगों को दुकानें बांटे, कौन उसका श्रेय ले।
इसी राजधानी रायपुर में प्रदेश का एक सबसे बड़ा जंगला, फौलादी स्काईवॉक सात बरस बाद अब आगे बनना शुरू हो रहा है। उसे भाजपा सरकार के ताकतवर मंत्री रहे राजेश मूणत ने बनवाना शुरू किया था, और वह शहर के कुछ सबसे व्यस्त सडक़-चौराहों पर आवाजाही के लिए हवा में टंगा हुआ पुल सरीखा था। कांग्रेस की भूपेश सरकार पांच बरस तक यही तय नहीं कर पाई थी कि उसे पूरा करना है, या उसे गिराना है। अब भाजपा की सरकार बनी, तो इसी पार्टी की पिछली सरकार का बनवाया हुआ यह ढांचा पूरा करना उसकी जिम्मेदारी भी थी, और इस बार विधायक बन जाने पर भी मंत्री नहीं बनाए गए राजेश मूणत का दबाव भी था। भाजपा के ही पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह इस बार विधानसभा अध्यक्ष हैं, और मूणत उन्हीं के करीबी सहयोगी रहे, इसलिए मूणत की प्रतिष्ठा के इस प्रोजेक्ट को पूरा करना सरकार पर एक बड़े दबाव सरीखा था। अब उसके लिए ठेका हो गया है, और काम आगे बढ़ रहा है। हालांकि जानकारों का यह कहना है कि शहर के बीचोंबीच बनने जा रहे इस गैरजरूरी माने जा रहे स्काईवॉक की वजह से शहर के बीच से कभी कोई मेट्रो नहीं जा पाएगी, या कोई फ्लाईओवर नहीं बन पाएगा। उन संभावनाओं को यह फौलादी ढांचा खत्म कर देता है। लेकिन सरकारों की अपनी राजनीतिक पसंद रहती हैं, और लोकतंत्र निर्वाचित सरकारों को कैसे भी फैसले लेने की छूट देता है।
अब जिस तरह शहर में या बाकी प्रदेश में एक सरकार की पसंद, प्रतिष्ठा, और उसके अहंकार के प्रोजेक्ट पांच बरस के बाद अगर दुबारा तय किए जाएंगे, तो प्रदेश में सारे ही निर्माण पुर्जे खोलकर दुबारा कहीं और खड़े करने वाले ही बनाने चाहिए। इमारतों की जगह शामियाने बनाने चाहिए, और लोहे की जगह बांस का इस्तेमाल करना चाहिए। कोई भी सरकार आते ही शुरू के छह महीनों में अपनी पसंद से ऐसे अस्थाई ढांचे खड़े कर ले, पिछले ढांचे खुलवा दे, और इस काम में मनरेगा की मजदूरी भी मंजूर कर दे तो कई लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा।
ऐसा लगता है कि जब एक-एक करके कोई सरकार केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और वार्ड तक, चार इंजन की सरकार हो जाती है, तो उसमें मुसाफिर डिब्बे लगाने की कोई जरूरत भी नहीं रह जाती। जब चार-चार इंजन की सरकार चल रही है, तो फिर पांच बरस जनता की क्या जरूरत है? वह तो पैदल भी चल सकती है, उसने हजारों किलोमीटर पैदल चलकर दिखाया हुआ भी है। एक रेलगाड़ी में चार इंजनों का असर अब देखने मिल रहा है, जब म्युनिसिपल के फैसलों का जनता से कोई लेना-देना नहीं रह गया। राज्य सरकार और म्युनिसिपल एक ही पार्टी की सरकारों के हैं, इसलिए उनके बीच भी आपस में किसी जवाब-तलब की जरूरत नहीं रह गई है।
बिहार चुनाव के, पहले सस्पेंस, और फिर जश्न में डूबे हिन्दुस्तान में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह शायद अकेले ही रहे जिन्होंने पड़ोसी पाकिस्तान में सत्ता-संतुलन में आए एक भूचाल पर फिक्र जाहिर की। बाकी लोगों को अभी तक इस बदली हुई नौबत का खतरा समझने का वक्त शायद नहीं मिला। पिछले चार दिनों में पाकिस्तान दुनिया का अकेला ऐसा परमाणु हथियार संपन्न देश बन गया है जहां पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पूरी तरह से फौज के मुखिया का एकाधिकार हो गया है। निर्वाचित प्रधानमंत्री, या मनोनीत राष्ट्रपति भी इस परमाणु-कमान से बाहर हो गए हैं, और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल का दर्जा प्राप्त जनरल असीम मुनीर अब इस एक मामले में राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से भी ऊपर बिठा दिए गए हैं। इसके लिए 12 नवंबर को संसद के निचले सदन में संविधान संशोधन 234-4 वोटों से पास हुआ, और 14 नवंबर को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने इस पर दस्तखत करके इसे कानून का दर्जा दे दिया।
फिर मानो यह काफी नहीं था, तो पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के पर कतर दिए गए, और अब वह सिर्फ सिविल और क्रिमिनल मामलों की अपील का कोर्ट रह गया है। संवैधानिक विवादों पर विचार के लिए एक नया फेडरल कांस्टीट्यूटशनल कोर्ट बना दिया गया। इससे अब मौजूदा सुप्रीम कोर्ट का खुद होकर किसी मामले की सुनवाई करना खत्म हो गया है। इसका विरोध करते हुए वहां के दो सबसे बड़े जजों ने इस्तीफे भी दे दिए हैं।
हमने पहले ही दिन इस परमाणु खतरे की चर्चा अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर की थी, और अब जैसे-जैसे इसकी जानकारी सामने आ रही है, इसके खतरे बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं। दुनिया में आज जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, उन 9 देशों में से कहीं भी बिना निर्वाचित या लोकतांत्रिक-राजनीतिक नेता के, अकेले फौजी को परमाणु फैसले लेने का हक नहीं है। अमरीका में राष्ट्रपति को परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का आखिरी हक है। रूस में राष्ट्रपति को मुख्य अधिकार है लेकिन रक्षामंत्री और फौजी जनरल की मंजूरी से वे यह फैसला लेते हैं। चीन में राष्ट्रपति को अधिकार है, और उनकी मंजूरी से ही सेना यह कर सकती है। भारत में प्रधानमंत्री परमाणु कमान के अध्यक्ष हैं, और कैबिनेट की कमेटी की मंजूरी जरूरी है। ब्रिटेन में प्रधानमंत्री को अधिकार है लेकिन संसद की एक किस्म की मंजूरी लगती है। फ्रांस में राष्ट्रपति को अधिकार है लेकिन वे सेना की सलाह से ऐसा कर सकते हैं। इजराइल में प्रधानमंत्री और मंत्री मिलकर यह तय करते हैं। उत्तर कोरिया में वहां के शासक किम जोंग-ऊन को नागरिक-मिलिट्री कमांडर के रूप में यह अधिकार है। पाकिस्तान में अभी जनरल मुनीर को जो अधिकार दिया गया है, उस पर कोई नागरिक-नेता निगरानी नहीं रख सकते, सवाल नहीं पूछ सकते।
भारत पर पाकिस्तान के जितने भी हमले पिछले पौन सदी में हुए हैं, उनमें से कुछ हमले फौजी पहल पर हुए, या फौजी तानाशाह ने भी किए। दुनिया में किसी भी फौज का रूख लोकतांत्रिक नहीं रहता, क्योंकि उसकी पूरी सोच ही दुश्मन को हराने, तबाह करने, और जंग को जीतने के लिए बनाई गई रहती है। पाकिस्तान की फौज कई बार की फौजी तानाशाही का खून चखने के बाद लोकतंत्र से वैसे भी दूर हो गई है, और वहां फौजियों का राज निर्वाचित नेताओं के ऊपर रहते आया है। निर्वाचित नेताओं को कभी जेल डालना, कभी प्रधानमंत्री बनाना, कभी ओहदे से हटा देना उनका पसंदीदा शगल रहते आया है। पाकिस्तानी फौजी जनरलों का रूख देश के इस्लामिक ढांचे के मुताबिक धर्म से लदा हुआ भी रहते आया है, और धर्म लोकतंत्र में नाजुक मौकों पर कभी लोकतांत्रिक फैसला नहीं लेने देते।
फिर पाकिस्तानी फौज के मौजूदा जनरल असीम मुनीर की ताकत को देखें, तो हाल की भारत-पाकिस्तान फौजी लड़ाई के बाद उन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई है, जो कि दुनिया में फौज की परंपराओं के खिलाफ है। फील्ड मार्शल ऐसे फौजी मुखिया को ही बनाया जाता है जिसने दो अलग-अलग मोर्चों पर देश की फौज की अगुवाई की हो। पाकिस्तान और भारत के गिने-चुने दिनों के टकराव में ऐसी कोई नौबत नहीं आई थी, न ही इस लड़ाई में पाकिस्तान की कोई जीत हुई थी कि जिसके एवज में असीम मुनीर को यह सम्मान दिया जाए। दुनिया में फौजों की सदियों पुरानी इस परंपरा को तोडक़र इस फौजी अफसर को जिंदगी भर के लिए फील्ड मार्शल का ओहदा दिया गया है। अब ऐसी अलोकतांत्रिक और बेतहाशा ताकत से लैस एक धर्मालु फौजी के हाथ भारत की ताकत के आसपास के ही परमाणु हथियार दे दिए गए हैं। दोनों देशों के पास डेढ़-डेढ़ सौ के आसपास परमाणु हथियारों का अंदाज है।
बिहार की राजनीति वैसे भी जातिवाद से लेकर कुनबापरस्ती तक, और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए मतलबपरस्ती तक, कई किस्म की खराब बातों से घिरी रहती है। बाहुबलियों का बोलबाला रहता है, और आमतौर पर किसी पार्टी को उन्हें टिकट देने से परहेज नहीं रहता। ऐसे में बिहार में चल रहे चुनाव के बीच अलग-अलग पार्टियों के भाड़े के भोंपू, या समर्पित सैनिक, जो भी हों, वे झूठ की लड़ाई लडऩे में जुटे हुए हैं। अब मुफ्त के एआई औजारों की मदद से कोई भी पोस्टर बनाना आसान हो गया है, इसलिए नेताओं के, या किसी और के भी, पहली नजर में अविश्वसनीय लगने वाले बयान पोस्ट किए जा रहे हैं। इस बार झूठ और फरेब एक कदम आगे बढ़ गया है, ऐसे बयानों वाले पोस्टरों के किसी कोने में किसी प्रमुख अखबार, टीवी चैनल, या डिजिटल मीडिया का ब्राँड भी लगा दिया जाता है। मीडिया के नाम से धोखाधड़ी, और जालसाजी करना, अफवाहों को विश्वसनीय बनाना नया नहीं है, आधी सदी से ज्यादा हो चुका है जब भारत में किसी अफवाह को फैलाने और विश्वसनीय बनाने के लिए उसके साथ कहा जाता था कि यह बीबीसी रेडियो पर आई है।
आज सोशल मीडिया पर जिस तरह के झूठ पोस्ट किए जा रहे हैं, झूठे पोस्टर पोस्ट किए जा रहे हैं, उनकी जांच-पड़ताल करने, और उन्हें रोकने के लिए ये प्लेटफॉर्म कुछ करते नहीं दिख रहे हैं, जबकि वे भारत में रिकॉर्ड संख्या में अपने इस्तेमाल से इश्तहारों की मोटी कमाई करते हैं। केन्द्र या जिस राज्य सरकार को झूठ और अफवाह पर कार्रवाई करनी चाहिए, वहां पर सत्तारूढ़ पार्टियों के अपने चुनावी-राजनीतिक हित रहते हैं, और राज किसी भी पार्टी का रहे, फैलाए गए, और जा रहे झूठ में एक हिस्सा तो सत्ता के पसंदीदा झूठ का भी रहता है। जब राजनीतिक दलों के बीच परस्पर सहमति से झूठ का मुकाबला चलता है, तो जख्म तो आम जनता की समझ को झेलने पड़ते हैं, क्योंकि वह हर झूठ की शिनाख्त नहीं कर पाती।
झूठ के ऐसे मुकाबले में भाड़े के भोंपुओं, और समर्पित कार्यकर्ताओं से परे कई दूसरे लोग भी अपनी पसंद के चुनिंदा झूठ को फैलाने में लग जाते हैं। मैंने फेसबुक पर कई बार यह लिखा भी है कि आप अपनी विश्वसनीयता खोकर किसी और की विश्वसनीयता स्थापित करने में कामयाबी नहीं पा सकते। लेकिन लोग इस हड़बड़ी में रहते हैं कि सबसे ताजा वाला झूठ कोई और उनसे पहले पोस्ट न कर दे। लोगों को यह भी अंदाज रहता है कि आज के वक्त देश का कानून इतना कड़ा है कि किसी प्रदेश की सत्ता को आपका झूठ पसंद न हो, तो आप तुरंत एक एफआईआर का खतरा झेल सकते हैं। फिर भी लोग जुटे रहते हैं झूठ फैलाने में, और अपने पसंदीदा को आगे बढ़ाने में, और खुद को नापसंद को नीचा दिखाने में।
आज जब एआई किसी भी तस्वीर में लिखी गई बातों को पढ़ सकती है, उसकी भाषा बदलकर भी देख सकती है, किसी फोटो को पोस्ट करने पर वह उसकी लिखी बातों को अलग-अलग समाचार माध्यमों पर जाकर परख सकती है कि वे सच हैं या झूठ हैं, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते? आज किसी बड़े अखबार, या बड़े समाचार चैनल के नाम से एक पोस्टर बनाकर एक झूठ को फैलाया जा रहा है, जिसे हम ही एक मिनट या उससे भी कम में परख लेते हैं कि यह सच है, या झूठ है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपनी जांच-पड़ताल की असीमित क्षमता के रहते हुए भी ऐसा क्यों नहीं करते हैं?
कुछ चर्चा आज किताबों की की जाए। मेरे अपने ज्ञान, और उसकी जमीन पर उपजी और विकसित मामूली समझ में किताबों का बड़ा हाथ रहा। किताबें मुझे हमेशा हैरान करती रहीं कि लेखक कितना कुछ सोच लेते हैं, कितना अच्छा लिखते हैं, और उनसे अच्छा लिखना भला कितना मुश्किल काम होगा। एक किस्म से किताबों से मालिकाना हक के बजाय पाठक का रिश्ता हमेशा मुझे बेहतर लगते रहा। अपनी खरीदी किताबों को कभी पढ़ पाया, और कभी महीनों या बरसों तक वे अनछुई रह गईं। लेकिन एक वक्त लाइब्रेरी से सीमित समय के लिए लाई गई किताब का पढऩा तेज रफ्तार हड़बड़ी से होता था, और दूसरों से मांगकर ली गई किताब की रफ्तार भी ठीकठाक रहती थी, क्योंकि पहली किताब लौटाने पर दूसरी के मिलने की भी गुंजाइश रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे किताबें कुछ महंगी होती चली गईं, कुछ दूसरे खर्च हावी होते चले गए, और अब पहले के मुकाबले किताबें खरीदना कम हो गया। लाइब्रेरी जाना तो बंद ही हो गया।
लेकिन जब कभी किताबों की दुकान पर जाता हूं, उनके दाम देखकर हैरान रहता हूं। साहित्य की किताबों का हर पन्ना एक-एक रूपए से ज्यादा दाम का रहता है। जिल्द मजबूत रहती है, और उसे खरीदने के लिए जेब और दिल का और अधिक मजबूत होना जरूरी रहता है। आज की चारों तरफ की आपाधापी के बीच किताबें बहुत से लोगों की खरीदी की लिस्ट में प्राथमिकता नहीं पातीं। टीवी, मोबाइल फोन, और इंटरनेट का री-चार्ज ही कोई लोगों पर भारी पड़ता है। अभी चौथाई सदी पहले तक तो इनमें से एक का भी खर्च नहीं था। इन तीनों से जुड़े हुए कई और तरह के खर्च अब लोगों पर आ गए हैं, साइकिल से लोग अब पेट्रोल-गाडिय़ों पर आ गए हैं, और जेब तेजी से खाली होने लगी है। फिर यह भी है कि पढऩे का एक विकल्प टीवी, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, और कम्प्यूटर बन गए हैं। इसके बाद अब किताबें पढऩे की जरूरत सीमित रह गई है, खरीदने की ताकत और भी अधिक सीमित रह गई है।
मेरी साहित्य में दिलचस्पी स्कूली जिंदगी के बाद खत्म हो गई, तब तक चुनिंदा साहित्य पूरा पढ़ लिया था, और बाद में गैरसाहित्यिक सामाजिक विषयों पर पढऩा शुरू हुआ, तो साहित्य कम जरूरी लगने लगा। आज इनमें से किसी भी तरह की किताबें जिस दाम पर बिकती हैं, वे दाम मुझे कुछ हैरान करते हैं। छपाई और जिल्द की 50 रूपए लागत वाली किताब सौ रूपए में बिके, तो उसे काफी लोग खरीद सकते हैं, और ग्राहक अधिक होने से लेखक, प्रकाशक, और दुकानदार, इन सबको कुल मिलाकर फायदा उतना ही हो सकता है जितना कि दाम चार गुना रखकर ग्राहक एक चौथाई पाकर होता होगा। लेकिन आंकड़ों से परे भी एक बड़ा नुकसान किताबों के महंगे होने की वजह से हो रहा है, कि किताब खरीदना और पढऩा, यह चलन के बाहर हो चला है। मैं यह बात आंकड़ों के आधार पर नहीं कह रहा हूं, लेकिन लेखकों, प्रकाशकों, ग्राहकों, और पाठकों से सुनी हुई बातों के आधार पर कह रहा हूं।
यह बात मेरी समझ से परे है कि किसी किताब का जिल्द मजबूत करके उसे महंगे दाम पर बेचा जाए, फिर चाहे गिने-चुने ग्राहक उसे खरीदें। मैंने बरसों पहले एक प्रयोग किया था, 1998 के पहले तक के मेरे अखबारी-लेखन के चुनिंदा हिस्से को लेकर उसका एक संकलन छापा था। इसमें हमने टायपिंग और प्रूफ रीडिंग का खर्च नहीं जोड़ा था, ऑफसेट की छपाई के लिए जो बटर पेपर प्रिंट निकलता था, उसकी लागत भी नहीं जोड़ी थी। मेरे एक दोस्त प्रिंटर, विमल प्रिंटर्स के विजय बांठिया ने अपना समय निकालकर इस पूरी किताब की योजना में मेरी एक-एक फरमाईश पूरी की। इसके लिए बहुत ही कम चलने वाला गैरसफेद, हल्का पीला कागज कहीं से ढूंढकर बुलवाया गया, टाईप फेस से लेकर फॉण्ट, कॉलम, स्पेसिंग जैसी चीजों पर खूब बारीकी से मेहनत की गई। मेरे दो परिचित, भाषा-विज्ञान के प्रोफेसर रमेश चन्द्र मेहरोत्रा, और सुलझी हुई सोच वाले एक नौजवान अपूर्व गर्ग ने मेरे दिए हुए कॉलम, संपादकीय, इंटरव्यू में से अपनी-अपनी पसंद छांटकर बताई। उन्हें भी कोई मेहनताना नहीं दिया गया। पांच हजार कॉपियां छापी गईं, और हर कॉपी पर मेरी जिद पर एकदम साधारण और सस्ते बोरे वाले जुट-कपड़े का कवर चढ़ाया गया। असाधारण बड़े आकार की यह किताब पांच सौ पेज की थी, क्योंकि मुझे छोटे आकार का कोई काम करना अच्छा नहीं लगता था।
पांच सौ पेज पर इतना कुछ था कि सौ रूपए में ऐसी सजिल्द किताब को खरीदना लोगों को 1998 में भी सस्ता लगता था। लेकिन यह एक प्रयोग था, जो कि कोई संभव कारोबारी मॉडल नहीं था। इसमें किसी दुकानदार का कमीशन शामिल नहीं था, मेरे दोस्तों की दुकानों से यह किताब बिकी जो कि पेट्रोल पम्प से लेकर जूतों की दुकान तक थी। और शायद किसी दूसरे लेखक को यह बात अच्छी भी नहीं लगती कि शो-केस में जूतों के बीच उसकी किताब बेचने के लिए रखी जाए। फिर भी हमने 90 फीसदी किताबें अपने अखबार के अलग-अलग शहरों के दफ्तर से, दोस्तों के कारोबार से बेच डालीं। यह कोई कारोबारी तरीका नहीं था, सिर्फ एक प्रयोग था, लेकिन इससे एक बात जरूर समझ में आई कि किताब की लागत काफी कम रहती है, और वह ग्राहक के हाथों तक पहुंचने में चार गुना से अधिक महंगी हो जाती है, कुछ मामलों में शायद उससे भी अधिक।
मैंने अपने एक परिचित और दोस्त प्रकाशक, रायपुर के सुधीर शर्मा से भी यह समझने की कोशिश की कि किताबों को सस्ता क्यों नहीं किया जा सकता? जिल्द जरूरी क्यों है, कागज और छपाई महंगी क्यों जरूरी हैं? उनका कहना है कि लेखक खुद भी चाहते हैं कि किताब उम्दा छपे। मैंने कई लेखकों को भडक़ाने की कोशिश की कि बहुत कम दाम पर किताब छापकर कम दाम में बेचने से खरीददार इतने अधिक हो सकते हैं कि कमाई उतनी ही हो जाए, या उससे भी अधिक बढ़ जाए। लेकिन कई लोगों का यह मानना है कि किताबों के खरीददार सीमित हैं, और किताब महंगी रहे या सस्ती, बिकेगी उतनी ही।
मैंने केरल जैसे राज्य में देखा है जहां एक वक्त तरह-तरह की बहुत सस्ती पत्रिकाएं बिना किसी महंगी छपाई, महंगे कवर के सस्ते में बिकती थीं, और एक-एक ग्राहक वैसी कई पत्रिकाएं खरीदते थे। अब किसी चर्चा में मिसाल देना ही सबसे खतरनाक रहता है, ज्ञानी लोग मलयालम भाषा और हिन्दी के फर्क को तुरंत बता सकते हैं, केरल और हिन्दी प्रदेशों के ग्राहक-पाठक की जागरूकता का फर्क तुरंत बता सकते हैं। लेकिन केरल की मिसाल देना मेरा मकसद नहीं है। उसके बिना भी मैं अपनी इस बात पर कायम हूं कि कमाई कम रखकर और संख्या बढ़ाकर चलाया गया कारोबार अधिक स्थिर और स्थाई रहता है। चीनी कंपनियां एकदम ही कम मुनाफे पर इतना अधिक उत्पादन करके बेच देती हैं कि दुनिया की कोई भी दूसरी कंपनी उनका मुकाबला नहीं कर सकतीं। मेरा मानना है कि किताबों को एकदम सस्ता करके अगर बेचा जाए तो शुरू में प्रकाशक और दुकानदार को अटपटा लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे इन दोनों को भी यह समझ आ सकता है कि एक-एक किताब पर सौ-सौ रूपए कमाने के बजाय उससे चार गुना किताबों पर 25-25 रूपए कमाना अधिक फायदे का इसलिए होगा कि ग्राहक-पाठक नाम के जंतु की नस्ल भी आगे बढ़ेगी। आज गिनी-चुनी मुर्गियों का गला काटकर लोग खुश हैं, बजाय इसके कि रोज उसके अंडे का फायदा पाएं। ग्राहक अगर बनेंगे, बढ़ेंगे, तो वे किताबों के कारोबार को भी आगे बढ़ाएंगे।
भारत में सूचना का अधिकार आए 20 बरस हो रहे हैं, और देश के साथ-साथ हर प्रदेशों में ये आयोग जनता को सूचना के अधिकार के तहत सरकारों से न मिलने वाली जानकारी को दिलाने के लिए बनाए गए हैं। जिस सोच के साथ यह अधिकार बना था, और यूपीए सरकार के समय कांग्रेस पार्टी के काबू के बाहर के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सीधा प्रभाव था, और उसी के चलते यह कानून बना था। बाद में हर पार्टी की सरकारों को यह समझ में आया कि यह तो सरकारों का भांडाफोड़ कर देने वाला कानून है, तो उसे कमजोर करने की तरह-तरह की राजनीतिक साजिशें शुरू हो गईं। अभी आई एक रिपोर्ट बताती है कि प्रदेशों के 29 आयोगों में लाखों शिकायतें पड़ी हुई हैं, और वहां सदस्यों की कुर्सियां खाली हैं, सरकारी विभागों से सूचना न मिलने के खिलाफ की गई अपीलें धूल खा रही हैं, और इस कानून का मकसद ही शिकस्त पा चुका है। इस क्षेत्र में काम करने वाले एक एनजीओ, सतर्क नागरिक संगठन ने आंकड़े सामने रखे हैं कि आज कुछ राज्यों में प्रदेश सूचना आयोग जिस रफ्तार से वहां आई अपीलों को निपटा रहा है, उस हिसाब से वहां आज की अपील पर फैसले में 29 बरस लग सकते हैं। तेलंगाना में 29, त्रिपुरा में 23, छत्तीसगढ़ में 11, एमपी और पंजाब में 7-7 साल लग सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और दो आयुक्तों के खाली पद अदालती स्थगन से नहीं भरे जा सके हैं, और इस स्थगन के पहले भी यहां की कुर्सियां खाली पड़ी थीं। आज इस छोटे से राज्य में 43 हजार मामले सूचना आयोग में पड़े हैं। अब तक आयोग ने जो आदेश दिए थे उनमें से बहुत से ऐसे हैं जिन पर आयोग ने सरकारी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है, और ऐसी साढ़े 5 करोड़ की जुर्माना राशि भी आयोग तक अभी नहीं आई है। हैरानी की बात यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में अभी जून के महीने तक कुल साढ़े 18 हजार आवेदन ही सूचना आयोग में थे, जो कि छत्तीसगढ़ के आधे से भी कम हैं।
जिन लोगों को सूचना आयोग की जरूरत और उसके असर का अंदाज नहीं है, उनके लिए यह बताना काम का होगा कि सरकारी विभागों से आमतौर पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ी से जुड़ी जानकारी लोग आरटीआई में मांगते हैं, और विभाग की पूरी दिलचस्पी इसमें रहती है कि कोई जानकारी किसी तरह न दी जाए। कहावत-मुहावरे में सांप के किसी खजाने पर कुंडली मारकर बैठने की जो बात कही जाती है, वह सांप पर तो लागू नहीं होती, लेकिन सरकारी विभागों पर जरूर लागू होती है, जहां अधिकारियों का निजी, और वर्गहित इससे जुड़ा रहता है कि कोई जानकारी बाहर न चली जाए। सरकार में नीचे से लेकर ऊपर तक यही सोच रहती है कि आरटीआई को बेअसर कैसे किया जाए। यही वजह है कि कई-कई साल सूचना आयुक्तों की कुर्सियां खाली रखी जाती हैं। झारखंड में अभी पिछले बरस तक पांच साल से सूचना आयोग ठप्प पड़ा हुआ था। केन्द्रीय सूचना आयोग में भी नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट के कई बार के आदेश के बाद हो पाईं।
लेकिन यह गिरावट सिर्फ सूचना के अधिकार के मामले में नहीं है, देश में और प्रदेशों में जितने तरह के संवैधानिक आयोग बनाए गए हैं, उन सबमें नियुक्तियां सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से होती हैं, और फिर वहां मनोनीत लोग अपने को नियुक्त करने वाले लोगों के हित बचाने में लग जाते हैं। राज्य और केन्द्र के स्तर पर मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल संरक्षण परिषद या आयोग, पर्यावरण से जुड़ी हुई संवैधानिक संस्थाएं, कॉलोनी और निर्माण से जुड़े हुए रेरा जैसे संवैधानिक संगठन, ऐसे बहुत से दफ्तर हैं जिन्हें बनाया तो इसलिए गया था कि वे सरकार में, या सरकार द्वारा किए गए गलत कामों पर नजर रखें, कार्रवाई करें, सरकारों को रोकें। लेकिन इनमें उन्हीं राज्यों की अदालतों या सरकारी विभागों से रिटायर होने वाले लोगों को भर दिया जाता है, या फिर सत्तारूढ़ पार्टी के पसंदीदा लोगों को। मतलब यह कि सरकार के बिठाए पिट्ठू मिट्ठू की तरह हाँ में हाँ मिलाते हैं, और जनता को मिलने वाला एक संवैधानिक हक मिलना शुरू होने के पहले ही खत्म होना शुरू हो जाता है।
मैं बरसों से इस बात को उठाते आ रहा हूं कि किसी भी राज्य के ऐसे किसी भी संवैधानिक आयोग में, या किसी नियामक संस्था में उस राज्य के लोगों को मनोनीत नहीं करना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टैलेंट-पूल बनाना चाहिए, और कोई राज्य अपने संवैधानिक ओहदों के लिए उस पूल में से ही लोगों को छांट सके, या फिर केन्द्रीय स्तर पर बनाई गई एक संवैधानिक संस्था उसी तरह लोगों को किसी राज्य भेज सके, जिस तरह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केन्द्रीय स्तर से ही तय करके राज्यों में भेजा जाता है।
शहरों में गाड़ियां तोहफों से लदी हुई दिख रही हैं, पीछे की सीटें तरह-तरह के बक्सों से भरी हुई हैं और सरकारी कॉलोनियों, संपन्न बस्तियों, (बड़े पत्रकारों के घरों पर भी) तोहफे पहुंच रहे हैं। जो लोग ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए हैं उनके पड़ोसी भारी मन के साथ देखते ही रह जाते हैं कि चुनिंदा पड़ोसियों के घर किस तरह आवाजाही लगी हुई है। यह तो दुनिया का रीति-रिवाज है कि जब तक जो लोग किसी प्रभाव के पद पर रहें, उन्हें उगते, और उगे हुए सूरज की तरह सलामी मिलती रहती है, रिटायर होते ही, या ताकत के किसी ओहदे से हटते ही जिस तरह लोगों के यहां आना-जाना खत्म हो जाता है, उससे भी शायद रिटायर्ड लोग अधिक रफ्तार से बूढ़े होने लगते हैं। ताकत की अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है, लेकिन तोहफों की चर्चा जरूर की जा सकती है।
कई लोगों के तोहफे ऐसे रहते हैं कि जिनमें पैकिंग ही सबकुछ रहती है। बड़े-बड़े बक्से, भीतर मखमली कपड़ों से बने हुए खांचे में रखी हुई कांच की बोतलों में मानो नमूने के लिए थोड़ा-थोड़ा सा मेवा रखा रहता है। मेवे और पैकिंग के अनुपात को देखें तो छाती बैठने लगती है और लगता है कि इस पैकिंग की जगह सिर्फ मेवा ही भेज दिया जाता तो वह दस गुना हो सकता था। जितने अधिक संपन्न लोगों की तरफ से, और जितने ताकतवर लोगों को तोहफे जाते हैं, उनमें पैकिंग का अनुपात उतना ही अधिक होता है। बड़ी सी डोली के भीतर छोटी सी नाजुक और छरहरी दुल्हन जिस तरह एक कोने में सिमटी रहती है, कुछ उसी तरह काजू-किशमिश बड़ी सी पैकिंग में किनारे बैठे रहते हैं। बच्चों की छीना-झपटी में कुछ मेवा, कुछ चॉकलेट और कुछ मिठाई जिस रफ्तार से खत्म होते हैं, उतने ही लंबे वक्त तक ये पैकिंग छाती पर बैठकर मूंग दलती रहती है। महंगी और खूबसूरत पैकिंग को फेंकते बनता नहीं, किसी को तोहफे में दी नहीं जा सकती, और वह घर के एक कोने में सहेजी हुई, और साथ-साथ उपेक्षित भी पड़ी रह जाती है। उसकी जिंदगी दीवाली की रौशनी में कुछ मिनट मंडराकर जलकर गिर जाने और फिर मर जाने वाले पतंगों सरीखी ही रहती है। कुछ मिनटों में मेवा पेट में और पैकिंग छाती पर।
त्यौहारों के दिखावे से परे अगर पर्यावरण के हिसाब से देखा जाए तो सारे ही महंगे तोहफे धरती पर बड़ा महंगा बोझ बढ़ाते हैं, और छोड़ जाते हैं। इतनी पैकिंग को बनाने में जितने सामान लगते हैं, और जितनी बिजली खर्च होती है, उससे धरती पर कार्बन फुटप्रिंट खासा बढ़ता है। कम से कम उसके भीतर के खाने-पीने के माल-मत्ते के अनुपात में। सौ ग्राम खाओ और पांच सौ ग्राम छाती पर ढोते रह जाओ।
मुझे सबसे अच्छे तोहफे वे लगते हैं जो किसी जूट की, या रेशमी कपड़े की मामूली सी थैली में रखे हुए मेवे के मामूली से पैकेट रहते हैं। सौ ग्राम पैकिंग और नौ सौ ग्राम मेवा। यह जरूर हो सकता है कि अभी-अभी एक अंबाइन की एक फोटो आई थी जिसमें वह एक ऐसा बटुआ थामे हुए थी जिसमें मेवा तो सौ ग्राम भी नहीं आया रहता, लेकिन जिसका दाम 15 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। 18 कैरेट वाइट गोल्ड से बना हुआ यह बटुआ ताश की एक गड्डी भी नहीं समा सकेगा, लेकिन जिसके ऊपर हीरे ही हीरे जड़े हैं, और जिसे दुनिया का सबसे महंगा बटुआ बताया जा रहा है। मुझे आने वाले तोहफों में से कई इसी दर्जे के लगते हैं। हो सकता है कि अंबाइन को अपने दो-चार क्रेडिट कार्ड और एक मोबाइल फोन के लिए 15 करोड़ की यह पैकिंग अच्छी लगती हो, लेकिन मेरे लिए तो दीवाली के बाद ये खाली बक्से काजू-किशमिश के गिने-चुने दानों की याद दिलाते हुए मुंह चिढ़ाते बैठे रहते हैं।
आज 12 अक्टूबर को राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि है, आज ही के दिन वे 1967 में 57 बरस की उम्र में गुजर गए थे। वे भारत की कुछ सबसे प्रमुख यूनिवर्सिटी, बीएचयू, और कलकत्ता में पढ़े थे, और उसके बाद तीन-चार बरस जर्मनी में भी। वे अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं से अनजान व्यक्ति नहीं थे, लेकिन गांधीवादी परिवार के होने के नाते वे शुरू से ही गांधी के आंदोलन से जुड़ गए, और कांग्रेस से भी। वे जर्मनी में रहते हुए भी उस वक्त के अविभाजित भारत के लाहौर में भगत सिंह को फांसी दिए जाने के खिलाफ वहां पर प्रदर्शन करते रहे, और बर्लिन विश्वविद्यालय से पीएचडी हासिल करने के बाद भारत आकर राजनीतिक आंदोलनों, और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे। नेहरू-गांधी और सुभाषचन्द्र बोस जैसे अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों के साथ उनका लगातार जीवंत राजनीतिक संपर्क रहा, इन लोगों से लोहिया की सहमति-असहमति के दौर भी चलते रहे, वे नेपाल से लेकर गोवा तक के आंदोलनों में उनकी ऐतिहासिक भागीदारी रही।
और एक वक्त ऐसा भी आया जब आजाद भारत में लोहिया जनसंघ के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे।
लेकिन किसी की जन्मतिथि, या पुण्यतिथि पर लिखने की मेरी कोई नीयत रहती नहीं है। लोहिया का अंग्रेजी भाषा के बारे में लिखा गया एक बयान आज सामने आया जिससे यह लिखने का सूझा। उनका कहना था- ‘अंग्रेजी हिन्दुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुंचा रही है कि वह विदेशी है, बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह इसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार कर शोषण करने का अधिकार है अंग्रेजी।’
अंग्रेजी भाषा के बारे में लोहिया के कहे हुए को उनके नाम से परे भी एक तथ्य और तर्क के रूप में सोचने की जरूरत है। फिलहाल तो चूंकि उनके नाम के साथ यह किताबों में अच्छी तरह दर्ज है कि उन्होंने इस विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा था, इसलिए मैं उनके नाम के साथ ही कुछ और बातें यहां पर दे रहा हूं। उनका मानना था- अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि सत्ता का औजार बन चुकी है, जिसने भारत के लोकतंत्र, और समानता दोनों को कमजोर किया। उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी शासन की भाषा बनी रही, इसलिए सत्ता उन्हीं लोगों के हाथ में रही, जो अंग्रेजी जानते थे। उन्होंने लिखा था भारत में अंग्रेजी जानने वाले लोग नए गोरे बन गए हैं। उनका कहना था अंग्रेजी से समाज में एक भाषाई वर्ण व्यवस्था बन गई है जिसमें ऊपर अंग्रेजी बोलने वाले सत्ता और नौकरशाही से जुड़े वर्ग हैं, और नीचे हिन्दी, उर्दू, तमिल, बंगला आदि बोलने वाले लोग। लोहिया ने कहा था कि अगर सरकार की भाषा जनता की भाषा न हो, तो लोकतंत्र एक मजाक बन जाता है, जिस लोकतंत्र की भाषा जनता न समझे, वह लोकशाही नहीं, अफसरशाही है।
वे चाहते थे कि संसद, अदालत, विश्वविद्यालय, और प्रशासन सभी जनभाषाओं में चलें ताकि जनता खुद निर्णय प्रक्रिया में भाग ले सके। उनका कहना था कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा में गरीबों को हमेशा नीचे, और अमीरों को ऊपर रखा क्योंकि जो बच्चे अंग्रेजी नहीं जानते, उनकी योग्यता कभी साबित ही नहीं हो सकती। लोहिया का कहना था कि अंग्रेजी से न सिर्फ आर्थिक बल्कि मानसिक गुलामी भी पनपी है जिससे एक वर्ग खुद को दूसरों से ज्यादा समझदार समझने लगा। उन्होंने इसे मानसिक स्वतंत्रता से जोडक़र कहा- जो अपनी भाषा छोड़ देते हैं वे सोचने की आजादी खो देते हैं। अंग्रेजी में सोचने वाले भारतीय, भारतीय नहीं रह जाते, वे अंग्रेज मानसिकता वाले बन जाते हैं। अदालतों में अंग्रेजी देखकर लोहिया ने नाराजगी से कहा था- जहां न्याय की भाषा जनता की नहीं, वहां न्याय जनता का नहीं। उन्होंने कहा कि अदालतों की अंग्रेजी भाषा में गरीबों को न्याय पाने से वंचित रखा, क्योंकि वे न मुकदमा समझ सकते थे, न दलीलें।
1950-60 के दशक में लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। वे मानते थे कि अंग्रेजी हटाना सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई है। उनका अंग्रेजी विरोध कोई संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं था, बल्कि समानता का आंदोलन था।
दरअसल, 1967 में लोहिया के जाने के बाद से अब तक गंगा में बहुत सा गंदा पानी बह चुका है, इसलिए उनके सारे तर्कों को आज तथ्यों की तरह नहीं सोचा जा सकता। जब उन्होंने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया, तो भारत में तीन चौथाई से अधिक लोग पूरी तरह निरक्षर थे, और अंग्रेजी पढऩे-लिखने वाले लोग एक फीसदी से भी कम थे। आज तीन चौथाई से अधिक लोग साक्षर हैं, और दस-बारह फीसदी लोग अंग्रेजी को अलग-अलग स्तर तक जानते-समझते हैं। फिर यह भी कि 1951 में अंग्रेजी जानने वाली आधा फीसदी आबादी अब 20-25 गुना बढक़र 10-12 फीसदी हो चुकी है। लेकिन एक बात जो उस वक्त से आज तक नहीं बदली है, वह यह है कि बड़ी अदालतों, और सरकार के ऊंचे स्तर के सारे कामकाज आज भी अंग्रेजी में होते हैं।
भारत के बहुत से राष्ट्रवादी नेता समय-समय पर इस देश के विश्वगुरू बनने के बारे में काफी कुछ कहते हैं, और कई नेता तो भारत के विश्वगुरू बन चुकने की बात भी कहते हैं। भारत की संस्कृति, और उसके इतिहास पर गर्व करने वाले नेताओं के नाम की लंबी फेहरिस्त बन सकती है जो कि इसे विश्वगुरू की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं। बिना लोगों के नाम के अगर सिर्फ उनकी टिप्पणियां मैं यहां लिखूं, तो किसी ने कहा है कि महत्व इस बात में है कि भारत विश्वगुरू बने, और अब दुनिया के प्रति भारत के योगदान देने की घड़ी आ गई है। एक और बयान में कहा गया कि भारत को एक ऐसी भूमिका निभाने की ओर बढऩा चाहिए, जहां वह ज्ञान, नैतिकता, संस्कृति आदि में विश्वगुरू की मिसाल बन सके। एक बयान में कहा गया कि भारत के विश्वगुरू बनने से रोकने के लिए वैश्विक और आंतरिक स्तर पर गलत धारणाएं फैलाई जा रही है। देश के कुछ बड़े-बड़े चर्चित मंत्री यह कहते हैं कि भारत को विश्व नेतृत्व के लिए तैयार रहना चाहिए, कुछ यह भी कहते हैं कि भारत विश्व नेतृत्व बन चुका है।
ये बयान किसके हैं, और कब दिए गए हैं, यह अहमियत नहीं रखता। फिर हमें इस देश के विश्वगुरू बनने से भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि दुनिया में गुरू शिष्य प्रणाली हमेशा से रहती आई है, और आज भी किसी न किसी रूप में यह जारी है। अब ऐसे में हर कोई गुरू बनना चाहेंगे, और अगर भारत के लोग यह चाहते हैं कि उनका देश बाकी देशों के शिष्य बनने की कीमत पर खुद गुरू बने, तो इस चाहत में कुछ भी अटपटा नहीं है। बस यही सोचने की जरूरत है कि क्या इस चाहत को पूरा करने के लिए यह देश तैयार है? क्योंकि अधूरी चाहत के चलते राहत नहीं मिल पाती है।
अब हम थोड़ा सा गुरू शिष्य प्रणाली को देखें, तो हर गुरू कभी न कभी शिष्य रहते हैं, और जब वे एक ईमानदार और गंभीर शिष्यभावना से सीखते हैं, तो ही वे आगे चलकर कभी गुरू बनने के लायक हो सकते हैं। गुरू बनने के लिए कोई परमाणु रहस्य नहीं लगता, लेकिन अपने आपको शिष्य मानकर खासा अरसा सीखना जरूर पड़ता है, तभी कोई गुरू बन सकते हैं। भारत में पहली-दूसरी के बच्चों को पढ़ाने के लिए भी लोगों को खुद बारह बरस स्कूल, और कम से कम छह बरस कॉलेज की पढ़ाई करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर वे प्रायमरी के गुरू बन सकते हैं। अब ऐसे में दुनिया का गुरू बनने के लिए दुनिया से थोड़ा सा अधिक समझदार, अधिक जानकार, और अधिक सरोकार वाला होना तो चाहिए ही।
किसी को भी शिष्य बनने के लिए यह जरूरी है कि उनके दिमाग में यह बड़ा साफ रहे कि उनका क्या-क्या सीखना बाकी है। अब मिसाल के तौर पर हम एक सभ्य, और गुरू बनने के अभिमान से ग्रस्त इंसान को देखें, तो उन्हें साफ-सुथरा रहना, और आसपास को साफ-सुथरा रखना आना चाहिए। जिस कुदरत के बनाए हुए कुत्ते-बिल्ली भी अपने बैठने की जगह को साफ करके बैठते हैं, उसी कुदरत के बनाए हुए इंसान योरप जैसे सभ्य इलाकों में तो हर जगह को साफ-सुथरा रखते हैं, लेकिन इस विश्वगुरू को अपनी दीवारों पर जगह-जगह लिखना पड़ता है कि देखो गधा पेशाब कर रहा है। चारों तरफ जब तक गंदगी फैलाने का हक न मिल जाए, उसका इस्तेमाल न हो जाए, तब तक लोगों को यह भरोसा ही नहीं होता कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है। अपने आपको यह आत्मविश्वास दिलाने के लिए लोगों को हर साफ-सुथरी जगह को गंदी करने का हक लगता है, ऐसा गंदा विश्वगुरू दुनिया के साफ-सुथरे हिस्सों को गुरू मानने के लिए कुछ अटपटा लगेगा।
दुनिया का एक बड़ा हिस्सा बड़ा सभ्य है, और जहां पर लोगों को बारी-बारी से कुछ लेना या देना रहता है, वहां लोग कतार में लगते हैं। जापान की ट्रेनों की तस्वीरें आती हैं कि किस तरह ट्रेन के बाहर लोग कतार लगाए खड़े रहते हैं, और आखिरी मुसाफिर के उतर जाने के बाद चढऩे वाले चढऩा शुरू करते हैं। देश के दर्जनों सभ्य देशों में यही हाल है। भारत में राशन से लेकर सिनेमा टिकट तक, और ट्रेन से लेकर बस तक जिस तरह की धक्का-मुक्की चलती है, वह विश्व गुरू में थोड़ी सी अटपटी लगेगी, और विश्वगुरू का नियुक्ति-पोस्टिंग ऑर्डर लेकर काम संभालने के पहले कतारों के बारे में थोड़ा सोचना पड़ेगा।
जिस देश की 99 फीसदी गंभीर और वजनदार गालियां माँ और बहन पर केन्द्रित हैं, और उनके भी बदन के कुछ खास हिस्सों तक, और बची एक फीसदी गालियां देश के एक खास प्रदेश में बेटी पर केन्द्रित हैं, तो विश्वगुरू के मुंह से यह सब शिष्यों को थोड़ा सा अटपटा लगेगा। शिष्यों के सामने अच्छी मिसाल पेश करनी पड़ेगी, और 2047 में विश्वगुरू बनने के पहले तक इस आदत को छोडऩे के लिए नई पीढ़ी के सामने अभी से बेहतर मिसाल रखनी होगी। महिलाओं के साथ इस देश में जो सुलूक होता है, उसे योरप और पश्चिम के बाकी देश थोड़ा सा अटपटा पाएंगे, और उम्मीद करेंगे कि गुरूजी जिंदा महिलाओं की उतनी इज्जत तो करें, जितनी कि वे मिट्टी-पत्थर की प्रतिमाओं की करते हैं। हालांकि शिष्यों की विश्वगुरू से ऐसी उम्मीद कुछ ज्यादती होगी, फिर भी पश्चिम की सोच में कुछ खोट है, और वहां के छात्र-देश विश्वगुरू की क्लास में पीछे से चॉक वगैरह फेंक भी सकते हैं, इसलिए लैंगिक समानता के बारे में कुछ सोचना चाहिए।
जिन देशों में ईमानदारी से टैक्स पटाने, बिना किसी के देखे टिकट खरीदने की बुरी आदत पड़ी हुई है, उन्हें भी यह विश्व गुरू शुरू में कुछ निराश कर सकता है, जब तक कि विश्व गुरू उन देशों को भी टैक्स चोरी न सिखा दे, और बारह बरस के बच्चे को दूध पीता बताकर बिना टिकट सफर करना न सिखा दे। विश्वगुरू और शिष्य देशों के बीच रिश्तों की एक बुनियाद बनाना जरूरी रहेगा, और उसके लिए विश्वगुरू को दूसरे देशों को अपने टक्कर का भ्रष्ट बनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी, यह काम आसान नहीं रहेगा।
नेपाल में हुए बड़े जनआंदोलन के बाद के सत्तापलट को लेकर भारत में भी यह सुगबुगाहट चल रही थी कि श्रीलंका के बाद बांग्लादेश, और बांग्लादेश के बाद नेपाल, इन सत्तापलटों के बाद क्या भारत में भी उसका कुछ असर हो सकता है? भारतीय संसद के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संविधान बचाने, और चुनाव आयोग का भांडाफोड़ करने के अभियान के तहत भारत में भी नौजवानों के बारे में यह कहा कि वे लोग संविधान बचाएंगे। नेपाल के जनआंदोलन से शुरू शब्दावली, जेन-जी, यानी 25-30 बरस उम्र के नौजवान, जेन-जी का इस्तेमाल राहुल गांधी ने किया, तो उस पर बड़ी जलती-सुलगती प्रतिक्रिया आई कि वे इस देश में लोगों को बगावत के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन अभी उस राजनीतिक विवाद पर मैं बात नहीं कर रहा। मैं लद्दाख में चल रहे जनआंदोलन में अचानक हिंसा आने, और आगजनी करने के बाद वहां के अहिंसक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से उपजे माहौल की बात कर रहा हूं। सोनम को लेह के 15 डिग्री तापमान से गिरफ्तार करके राजस्थान के जोधपुर में 36 डिग्री तापमान पर ले जाकर वहां की जेल में रखा गया है, और इसे लोग आंदोलन को तोडऩे की एक सरकारी हरकत बता रहे हैं।
अब फेसबुक पर एक पत्रकार-साहित्यकार दोस्त, दिनेश श्रीनेत ने आज ही यह लिखा है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अलग-अलग हिन्दी साहित्यकारों के फेसबुक पेज पर जाकर देखा कि इस ताजा जलते-सुलगते मुद्दे पर कौन क्या लिख रहे हैं, तो उन्हें बड़ी निराशा हुई कि हिन्दी साहित्यकार अपने आपमें मगन पड़े हुए हैं, अपनी किताबों, आयोजनों, और मंच की बात कर रहे हैं, रॉयल्टी और पुरस्कार की बात कर रहे हैं, लेकिन वे देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों, और उनके पीछे के आंदोलनों पर कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। उनकी निराशा हम आज इसी पेज पर इस कॉलम के नीचे देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उससे परे कुछ और बातों पर सोचने की जरूरत है।
हिन्दी साहित्य में कई बड़े-बड़े साहित्यकारों को लेकर यह चर्चा उठती है कि जिंदगी के असल मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती, और लोग अपनी-अपनी पसंदीदा विधा में गुलमोहर के सुर्ख रंग से लेकर बादलों तक पर लिखते रहते हैं, और बस्तियों को जलाने से उठे काले बादल उन्हें नहीं दिखते, और न ही बिखरा हुआ सुर्ख लहू उनकी कोई टिप्पणी पाता। बहुत से लोग नामी-गिरामी साहित्यकारों की वकालत करते हैं कि वे अखबारों के लिए रिपोर्टिंग तो कर नहीं रहे हैं कि हर ताजा घटना पर उन्हें लिखना ही है। वे अपनी विधा में लिखी गई कविताओं और कहानियों में भी अपने ‘किस्म से, अपनी शैली में’ प्रतिरोध दर्ज करते हैं।
मैं इन दोनों बातों के बीच एक अलग ही शून्य में देखकर यह सोचता हूं कि किसी कवि या साहित्यकार को, या उपन्यासकार को आसपास हो रही घटनाओं पर साहित्य की रचना करना जरूरी न लगे, वहां तक तो बात ठीक है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हुए भी जो लोग आज की दुनिया के जुल्म और ज्यादती पर कुछ भी नहीं लिखते, क्या वे किसी भी किस्म का लेखक होने का हक रखते हैं? मैं कविता पढ़ता नहीं, समझता भी नहीं, लेकिन इतना समझता हूं कि जिस कवि के पास कविता लिखने को शब्द हैं, भाव हैं, उसके पास फिलीस्तीन के बारे में, नेपाल के बारे में, किसी भीड़त्या के बारे में, अफगानिस्तान की महिलाओं के बारे में कुछ भी, एक टिप्पणी भी लिखने लायक शब्द तो रहते होंगे? जो लेखक, कवि, साहित्यकार ऐसे ऐतिहासिक जुल्म के बारे में, बेइंसाफी के बारे में अगर कोई टिप्पणी लिखना भी जरूरी नहीं समझते, तो यह समाज को उनसे मिलने वाली एक आम निराशा है, इसका उनकी साहित्यिक विधा से कुछ भी लेना-देना नहीं है।
मैं कुछ और अधिक खुलासे से अपनी बात रखूं, तो वह यह है कि कोई कवि कवि होने के अलावा साक्षर भी तो है, और कवि होने के अलावा इंसान भी तो है, उसके लिए कविता से परे भी कुछ शब्द लिखना मुमकिन है। इसके बावजूद अगर गाजा को लेकर, अपने देश की साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर कुछ वाक्यों की कोई छोटी सी टिप्पणी लिखने के बजाय अगर वे अपने ही सम्मान, अलंकरण, पुरस्कार, और काव्यपाठ में मगन हैं, तो फिर वे कवि हो सकते हैं, मेरी नजर में इंसान नहीं हो सकते। मेरा तो यही मानना है कि इंसान और जानवरों में शायद सामाजिक समझ और सरोकार का ही एक बड़ा फर्क है जो कि इंसानों को अधिक अहंकार का हकदार बनाता है। लोग अगर आसपास बिखरे लहू के लालरंग के बजाय किसी सुहागन के सिंदूर के लालरंग पर कविता लिखते हैं, तो यह उनका बुनियादी हक तो है, लेकिन यह मुझे हक्का-बक्का भी करता है।
जिनके पास आंखें हैं, और जो देख सकते हैं, जिनके पास कान हैं, और जो सुन सकते हैं, जिनके पास नाक है, और जो आसपास जलती हुई चीजों को सूंघ सकते हैं, जिनके पास दिमाग है, और वे आसपास की हिंसा और बेइंसाफी को समझ सकते हैं, वे अगर अपने होठों और जुबान का इस्तेमाल इन मुद्दों पर न करें, अपनी की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों से दुनिया के जख्मों के लिए म र ह म टाईप न कर सकें, तो इसमें उनके भीतर के कवि की कोई कमी नहीं है, उनके भीतर की तथाकथित इंसानियत की ही कमी है। मैंने दिनेश श्रीनेत के जिस लेख के कुछ हिस्से पढक़र ही इस मुद्दे पर लिखना तय किया, हो सकता है कि मैं उससे कहीं पर प्रभावित रहूं, और कहीं मैं उससे अलग भी सोच और लिख रहा होऊंगा। लेकिन मेरा यह मानना है कि जिन लोगों के पास अक्षर हैं, वे दुनिया के कुछ सबसे गहरे जख्मों के हिज्जे भी न लिख सकें, तो उन्हें साक्षर क्यों माना जाए? साक्षर होना तो पढऩे-लिखने की एक बड़ी छोटी सी तकनीकी क्षमता है, जिसे कोशिश करके तोते को भी सिखाया जा सकता है। लेकिन तोते को सामाजिक-सरोकारी शायद नहीं बनाया जा सकता।
हॉलैंड की संसद में कल एक महिला सांसद ने खलबली मचा दी जब वे फिलीस्तीन के झंडे के रंगों का ब्लाऊज पहनकर वहां पहुंची। जाहिर तौर पर यह टॉप फिलीस्तीन के साथ हमदर्दी और एकजुटता दिखाने के लिए था। सदन के भीतर स्पीकर वहां की धुर दक्षिणपंथी पार्टी के थे, और उन्होंने इस पर आपत्ति की, और कहा कि सांसदों के कपड़े निष्पक्ष रहने चाहिए। लेकिन यह महिला सांसद सदन से बाहर जाने के पहले कुछ वक्त अपने अधिकार और जिम्मेदारी पर अड़ी रही। उसने स्पीकर को चुनौती भी दी कि अगर वह नियम तोड़ रही है तो उसे शारीरिक रूप से सदन से निकाल दिया जाए, लेकिन फिर वह वहां से बाहर चली गई।
फिर जब वह सदन में लौटी तो उसने तरबूज की तस्वीर वाला टॉप पहन रखा था जो कि फिलीस्तीन का ही प्रतीक माना जाता है। तरबूज का छिलका हरे रंग का होता है, भीतर गूदा लाल होता है, बीज काले होते हैं, और छिलके और गूदे के बीच का रंग सफेद होता है। इस तरह तरबूज फिलीस्तीनी झंडे के हर रंगों वाला होता है। अब इस पर विरोध करने का हक सदन में किसी को नहीं था, और सदन की कार्रवाई का यह पूरा हिस्सा सोशल मीडिया पर उसे पूरी दुनिया की तारीफ दिला रहा है, लगभग पूरी दुनिया की, मुझे यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि फिलीस्तीनियों की मौत का जश्न मनाते हुए लोगों को भी इस महिला का यह हौसला सुहा रहा होगा।
हॉलैंड की डच-पॉलिटिक्स इन दिनों दक्षिणपंथियों के उभार की शिकार है, और सदन में जब कुछ लोगों ने फिलीस्तीनी झंडे वाले पिन अपने कोट या टाई पर लगा रखे थे, दक्षिणपंथी सांसदों ने गाजा में इजराइली बंधकों के समर्थन में पीली रिबीन बांध रखे थे। हॉलैंड में आज सरकार ने गाजा में इजराइली फौजी कार्रवाई को जनसंहार मानने से इंकार कर दिया है, और वहां के कई सांसद इसका विरोध कर रहे हैं। इस सांसद, एस्थर आउवहांड, ने अपने देश की सरकार की नैतिक मुर्दानगी का विरोध करने के लिए फिलीस्तीनियों के साथ ऐसी एकजुटता दिखाई थी।
अपने देश की सरकार की नीतियों के खिलाफ जाकर, देश के बहुसंख्यक ईसाई तबके की नाराजगी का खतरा उठाकर भी एक महिला सांसद ने यह हौसला दिखाया है। अभी मेरे पास यह लिखने की कोई वजह नहीं है कि हॉलैंड की ईसाई बहुसंख्यक जनता इस महिला सांसद के साथ रहेगी, या उसके विरोध करेगी, फिर भी राजनीतिक रूप से मैंने इसे खतरा उठाना लिखा है। अब लिखते-लिखते जब मैं इस बारे में पढ़ रहा हूं तो भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के आंकड़े बता रहे हैं कि हॉलैंड की 65 फीसदी आबादी अपनी सरकार की इजराइल-गाजा नीति के खिलाफ है। हॉलैंड का मीडिया बताता है कि कुल 18 फीसदी लोग सरकारी नीति का समर्थन कर रहे हैं। 60 फीसदी वोटर चाहते हैं कि वहां का मंत्रिमंडल इजराइल के खिलाफ अधिक कड़ा प्रस्ताव पारित करे। 59 फीसदी लोग यह मानते हैं कि इजराइली कार्रवाई अनुपातहीन है। आधे से ज्यादा डच आबादी यह मानती है कि हॉलैंड को, इजराइल को हथियारों की सप्लाई बंद कर देना चाहिए, और इजराइली सामानों का बहिष्कार भी करना चाहिए। 33 फीसदी लोग तुरंत ही एक फिलीस्तीनी राज्य को मान्यता देने के पक्ष में हैं, और इससे भी अधिक लोग वहां पर मानवाधिकार कुचले जाने को लेकर फिक्रमंद हैं। आधी से ज्यादा आबादी यह मानती है कि इजराइल नस्लभेद कर रहा है। आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा, 64 फीसदी यह मानता है कि गाजा में तुरंत युद्धविराम होना चाहिए, और यह भी कि गाजा में जितनी मानवीय मदद की जरूरत है उतनी जाने देने की इजाजत इजराइल दे।
हॉलैंड के आंकड़े बताते हैं कि वहां पर 6 फीसदी आबादी मुस्लिम है, जाहिर है कि मतदाताओं में इससे अधिक अनुपात तो मुस्लिम वोटरों का हो नहीं सकता। फिर भी वहां के बहुत से सांसद और कुछ पार्टियां इजराइली हिंसा और जुल्म के खिलाफ अपने ईसाई, या नास्तिक हो चुके वोटरों के बीच एक तकरीबन सौ फीसदी मुस्लिम गाजा के साथ खड़ी हुई है। जिन पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इजराइल का जमकर विरोध किया है, उनमें आधा दर्जन राजनीतिक दल हैं, और संसद की डेढ़ सौ सीटों में से करीब 45 सांसद इन पार्टियों के हैं।
मैं फिलीस्तीन के मुद्दे पर इतनी बारीकी से इसलिए पढ़ और लिख रहा हूं कि गाजा पर इजराइली जुल्म, अवैध कब्जे, और फौजी हमलों के खिलाफ जख्मी फिलीस्तीनियों से एकजुटता दिखाने के लिए एशिया से गाजा गए हुए एक अमन-कारवां में कोई 15 बरस पहले मैं भी शामिल था। मैं उस वक्त बीबीसी-लंदन, और कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों के लिए साथ-साथ रिपोर्टिंग भी कर रहा था, और अपने हुनर से फोटोग्राफी भी कर रहा था। मैंने इजराइलियों के जुल्म के शिकार लोगों को रूबरू देखा हुआ है, उनकी बातें सुनी हुई हैं। हमारे ठीक पहले एक दूसरा शांति-कारवां वहां गया था, और उस पर इजराइली हमले में करीब 12 लोग मारे गए थे। हमारे कारवां पर भी फौजी हमले, या किसी और किस्म के हमले की आशंका बनी हुई थी, लेकिन इजराइल ने ऐसा कोई हमला इसलिए नहीं किया कि हममें 50 से अधिक हिन्दुस्तानी थे, और भारत इजराइली निर्यात का आधे से अधिक का अकेला खरीददार है। दुनिया का कोई समझदार कारोबारी इतने बड़े ग्राहक देश के बहिष्कार का खतरा नहीं उठाता।
लेकिन हॉलैंड की इस बहादुर महिला सांसद, और हमारे सरीखे कारवां की याद से परे आज की हिन्दुस्तान की एक और वजह है जिससे इस बारे में यहां लिखना हो रहा है। आज इस देश में मुस्लिमों से नफरत करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि इस बात पर खुश हैं कि गाजा में हो, या कहीं और, मुस्लिम जहां भी मारे जा रहे हैं, वे धरती पर से घट तो रहे हैं। यह एक अलग बात है कि ऐसी हिंसक और नफरती सोच रखने वाले लोग आज एक अखंड भारत की कल्पना भी करते हैं जिससे बांग्लादेश, पाकिस्तान सब आज के भारत में मिल जाएंगे। उन्हें यह समझ नहीं पड़ता कि इन दोनों मुस्लिम-बहुल देशों को मिलाकर बने अखंड भारत में मुस्लिमों का अनुपात तो बहुत अधिक बढ़ जाएगा, और इसके साथ-साथ न तो नफरतियों को नापसंद लोगों को पाकिस्तान धकेला जा सकेगा, और न ही आज जिन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया कहा जाता है, उन्हें कहीं निकाला जा सकेगा।


