आजकल
दुनिया के सबसे चर्चित कारोबारी, और अब शेयर बाजार में पूंजी जुटाने के लिए दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ लेकर आ रहे एलन मस्क ने कल भारत के बारे में एक ट्वीट किया है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने एक अमरीकी समाचार स्रोत की पोस्ट दुबारा डाली है जिसमें भारत की आबादी की घटती हुई बढ़ोत्तरी दिख रही है। उन्होंने अपनी तरफ से लिखा है कि कुछ लोगों को आज लग रहा है कि भारत की जन्मदर रिप्लेसमेंट रेट से नीचे आ गई है। लेकिन जानकार जानते हैं कि यह तो कई बरस पहले ही हो चुका था।
एलन मस्क से परे, भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक ताजा आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली राज्य, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और आंध्रप्रदेश ये प्रति महिला बच्चों के मामले में फिनलैंड और नॉर्वे तक पहुंच चुके हैं। तेलंगाना भी नॉर्वे के करीब है। दूसरी तरफ राजस्थान, उत्तरप्रदेश, और बिहार में प्रति महिला बच्चों की संख्या बांग्लादेश से भी अधिक है। पूरे भारत में यह आंकड़ा पिछले एक दशक में ही 2.3 से घटकर 1.9 हो चुका है। जनसंख्या-शब्दकोष की भाषा में कहें, तो भारत में अब आबादी उतनी ही बनी रहने लायक नए जन्म नहीं हो रहे हैं। मौजूदा आबादी की वजह से अभी कुछ अरसा जनसंख्या बढ़ती दिखेगी, लेकिन दुनिया में आबादी को स्थिर करने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चों का जन्म जरूरी होता है, और भारत उसके नीचे आ चुका है।
2019 के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनसंख्या विस्फोट की चर्चा की थी, उस वक्त भी कई जनसंख्या-विशेषज्ञों ने कहा था कि भारत जनसंख्या-विस्फोट के दौर से निकल चुका है, अब यह बात प्रासंगिक नहीं रह गई है। फिर भी प्रधानमंत्री ने वह बात एक ऐतिहासिक मौके पर कही थी, इसलिए जनसंख्या के संदर्भ में हम उसे कम महत्वपूर्ण नहीं आंकते। उसका विश्लेषण करने और तथ्य ढूंढने पर पता लगता है कि 1990 के दशक में भारत का टीएफआर (टोटल फर्टिलिटी रेश्यो) यानी प्रति महिला पैदा होने वाले बच्चे, यह आंकड़ा करीब 4 था। पन्द्रह बरसों के भीतर, 2005-06 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3 के मुताबिक यह 2.7 तक पहुंच गया था। इसके दस बरस बाद के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के मुताबिक यह लगभग 2.2 हो गया था। 2019 में जब यह भाषण हुआ, तब भारत आबादी स्थिरीकरण के स्तर, 2.1, के बहुत करीब पहुंच गया था। इस भाषण के बाद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) में टीएफआर 2.0 दर्ज हुआ। मतलब यह कि जिस वक्त प्रधानमंत्री इसे विस्फोट पा रहे थे, उस दिन वह स्थिरीकरण से कम आबादी-बढ़ोत्तरी दर हो चुकी थी। उसी समय जनसंख्या विशेषज्ञ यह हिसाब लगा रहे थे कि अगले किस सर्वे में, कितने दिनों में, बच्चों का जन्म आबादी स्थिरीकरण से कम हो जाएगा। और अगले ही बरस के सर्वे में यह हो चुका था।
कुल मिलाकर मतलब यह कि आबादी के बढ़ते हुए आंकड़े हमेशा ही भविष्य की बढ़ती हुई आबादी का संकेत नहीं रहते। कुछ बरस या कुछ दशक बाद जाकर यह आबादी गिरने वाली भी हो सकती है। अब जैसे भारत के राज्यों को अलग-अलग करके देखें, तो जनसंख्या स्थिर रखने के लिए जरूरी, प्रति महिला 2.1 बच्चों से भारत नीचे आ चुका है, अब देश में प्रति महिला कुल 1.9 बच्चे पैदा हो रहे हैं। दिल्ली में तो एक महिला के 1.2 बच्चे ही हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरे राज्यों को भी देखने की जरूरत है। भारत का दक्षिणी हिस्सा योरप के करीब पहुंच चुका है, केरल, और तमिलनाडु में यह आंकड़ा 1.3 तक आ गया है, तेलंगाना में 1.5 है, पश्चिम बंगाल और आंध्र में भी यह आबादी स्थिर रखने की जरूरत से खासा नीचे आ चुका है। दूसरी तरफ इस देश में आबादी का संतुलन राजस्थान (2.3), यूपी (2.6), और बिहार (2.9), (बच्चे प्रति महिला) की वजह से राष्ट्रीय औसत 1.9 बना हुआ है।
अब हमने यह समझने की कोशिश की कि जिन राज्यों में आबादी-बढ़ोत्तरी गिरती जा रही है, उन राज्यों में तो प्रति व्यक्ति आय अधिक दिख रही है, जैसे दिल्ली, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, आंध्र। दूसरी तरफ आबादी बढ़ाने के लिए बदनाम तीन राज्यों, बिहार, यूपी, और राजस्थान में औसत आय दक्षिण के इन राज्यों और दिल्ली के मुकाबले बहुत कम है। क्या इसका एक मतलब यह निकाला जाए कि भारत में आबादी अभी जो कायम बने रहने के आसार हैं, वे आसार गरीब पैदा करने वाले राज्यों की मेहरबानी से हैं? क्या पैदा होने वाली बहुतायत गरीब राज्यों की गरीब आबादी रहेगी, और उससे देश को कुछ हासिल नहीं हो सकेगा?
प्रधानमंत्री ने जिसे जनसंख्या विस्फोट कहा था, वह बात जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से तो सही नहीं थी, लेकिन हम उस बात का एक दूसरा आर्थिक-सामाजिक विस्तार करके जब देखते हैं तो लगता है कि यह आबादी के आंकड़ों का विस्फोट चाहे न हो, यह देश के भीतर गरीब आबादी में एक विस्फोट जरूर है क्योंकि यूपी-बिहार, और राजस्थान प्रति व्यक्ति आय में एकदम नीचे हैं, और जिस प्रदेश में भी आबादी बढ़ती है, वहां पर गरीब तबके के भीतर बच्चे अधिक बढ़ते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि दक्षिण भारत के राज्यों से पढ़े-लिखे और हुनरमंद लोग दूसरे देशों को अधिक जाएंगे, और भारत के भी दूसरे प्रदेशों में बेहतर कमाई वाले कामकाज के लिए जाएंगे। दूसरी तरफ यूपी-बिहार, राजस्थान से गरीब मजदूर देश के भीतर ही दूसरे प्रदेशों में अधिक जाएंगे, जहां पर उनकी खुद की आबादी बढऩा रूक जाएगी, और फिर धीरे-धीरे घटती भी जाएगी।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने संपादकीय, और इस साप्ताहिक कॉलम में बार-बार यह लिखते हैं कि किसी भी देश में वहां की आबादी बोझ नहीं हो सकती, अगर सरकार इतनी कल्पनाशील हो कि वह आबादी को काम के लायक बनाएं। वही आबादी देश पर बोझ रहती है जिसे सरकारें काम नहीं दे पातीं। देश मेें आबादी के अलग-अलग आयु वर्ग के आंकड़ों को लेकर भारत को बड़ा गर्व रहता है कि उसके पास नौजवान वर्क फोर्स का अनुपात सबसे अधिक है। अब सवाल यह उठता है कि यह वर्क फोर्स किस तरह का काम करने के लायक है?
पिछले कुछ महीनों से लगातार अलग-अलग धर्मगुरूओं की कुछ-कुछ बातों को देखते-सुनते हुए एक खिचड़ी दिमाग मेें पक रही थी। फिर आज सुबह जब खबरों में यह सुना कि अफ्रीका के देशों में एक-एक करके अलग-अलग जगह पर किस तरह समलैंगिकों, और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बहुत कड़े कानून बनते चले जा रहे हैं, तो उसके साथ-साथ यह भी सुनने मिला कि इन देशों में ईसाई धर्म, और इस्लाम, इन दोनों का खूब बोलबाला है, और ये सारे धर्मगुरू समलैंगिकता के खिलाफ इसलिए हैं कि ये उसे अनैतिक मानते हैं क्योंकि इससे अगली पीढ़ी पैदा नहीं होती।
एक तरफ तो काफी बड़ी दुनिया अब एलजीबीटीक्यूआई की परिभाषा में आने वाले हर तरह के यौन पहचान वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अधिक से अधिक मान्यता दे रही है, तब ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरू समलैंगिकों को और अधिक कड़ी कैद देने वाली सरकारों के हिमायती हैं। यह देखकर लगा कि धर्म क्या अधिकतर दुनिया में पहले की तरह कट्टर, पहले से अधिक कट्टर बना हुआ नहीं है? और क्या अलग-अलग धर्मों की सोच कुछ अलग-अलग है? क्या कुछ धर्मगुरू अपने ही धर्म में प्रचलित सोच से अलग-अलग ऊपर भी कुछ सोच सकते हैं? क्या धर्मगुरुओं में अपने अस्तित्व को खतरे में डालकर भी अलोकप्रिय सच को कहने का हौसला हो सकता है?
ऐसे कई सवालों को पिछले महीनों में सोचते हुए यह देखने मिला कि कौन-कौन से ऐसे धर्म हैं जिनके धर्मगुरू लगातार हजारों बरस पहले जीने में अपने को सुरक्षित पाते हैं? भारत में ही कई हिन्दू धर्मगुरू अपने प्रवचनों में हाल के सैकड़ों बरसों में आना ही नहीं चाहते, क्योंकि इन सैकड़ों बरसों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने, लोकतंत्र और संविधानों ने, नए राजनीतिक दर्शन और सिद्धांतों ने धर्म की हजारों बरस पुरानी सोच और व्यवस्था को गहरी चुनौती दी है। इसलिए अधिकतर धर्मगुरू उस युग के बाद, हाल के सैकड़ों बरस में आना ही नहीं चाहते, अपने भक्तों को लाना ही नहीं चाहते, जहां अप्रिय सवाल सिर उठाने लगे हैं। जिस तरह कहा जाता है कि रैबीज कुत्ते के काटे हुए इंसान को हाइड्रोफोबिया हो जाता है, और वे पानी देखते ही करने लगते हैं, उसी तरह का हाल धर्म का लगता है, वह सवालिया निशान, प्रश्नवाचक चिन्ह, और क्वेश्चन मार्क को देखकर डरने लगता है।
अभी हाल के महीनों में रोमन कैथोलिक समुदाय के सबसे बड़े मुखिया बने पोप लियो ने आज के मुद्दों को लेकर जिस तरह की बातें कही हैं, उन्हें पश्चिमी दुनिया में भी अभूतपूर्व और असाधारण माना जा रहा है। वे किसी भी देश में प्रवासियों के अधिकार, दुनिया के देशों की छेड़ी गई जंग, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, और दुनिया के ऐतिहासिक अपराधों पर चर्च की चुप्पी के इतिहास जैसे मुद्दों पर लगातार बोल रहे हैं। और वे किसी समारोह के लंबे भाषण के बीच में दबी-छुपी गोलमोल भाषा में यह सब नहीं बोल रहे, वे सीधे-सीधे अमरीकी सरकार से टकराव लेने का खतरा उठाते हुए भी इस तरह की बात कर रहे हैं। पोप लियो ने एआई के बारे में कहा कि इसे सिर्फ तकनीकी उपलब्धि की तरह नहीं देखा जा सकता, यह सत्ता, निगरानी, और असमानता को खतरनाक रूप से बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे युद्ध में मानवता के खिलाफ भयावह तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने एआई को लेकर कुछ वैसी ही चेतावनी दी, जैसी चेतावनी कभी परमाणु हथियारों को लेकर दी जाती थी। उन्होंने एआई उद्योग के लिए दुर्लभ खनिज निकालने के लिए खतरनाक परिस्थितियों में काम करने वाले बच्चों का जिक्र भी किया है। उन्होंने खुलकर यह माना कि एआई की मदद से जंग में मशीनों को इंसानों के कत्ल का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि एआई का नियंत्रण लोकतांत्रिक संस्थाओं के बजाय कुछ निजी कंपनियों के हाथ में जा रहा है, और इससे सत्य, लोकतंत्र, और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने ट्रम्प की नाराजगी और दुश्मनी मोल लेते हुए भी यह कहा कि प्रवासियों के भी मानवीय अधिकारों का सम्मान होना चाहिए, देशों की सरहदों पर होने वाली अमानवीयता खत्म होनी चाहिए, और विस्थापित लोगों के प्रति दया दिखानी चाहिए। उन्होंने आधुनिक गुलामी के खतरे, बाजार व्यवस्था की तानाशाही के खतरे तो गिनाए ही हैं, आज की अमरीकी सरकारी सोच के खिलाफ भी उन्होंने ढेर सारी बातें कही हैं।
भारत में शरण लिए हुए एक बौद्ध गुरू दलाईलामा ने गैरईसाई दुनिया में जमीनी मुद्दों को लेकर कुछ बातें जरूर की हैं। उन्होंने परमाणु हथियारों के खिलाफ कुछ कहा है, जलवायु संकट पर कुछ बोले हैं, और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कुछ कहा है। दक्षिण अफ्रीका में एक पादरी डेसमंड टूटू ने दशकों पहले वहां के रंगभेद के खिलाफ बड़ा संघर्ष किया था, और धर्मगुरू होने के साथ-साथ वे वहां की एक सबसे बड़ी लोकतांत्रिक और राजनीतिक आवाज भी बन गए थे। उन्होंने गोरे अल्पसंख्यक रंगभेदी शासन का विरोध किया था, और लोकतंत्र और मानवाधिकारों की वकालत की थी। उनकी कही बातों में इतना नैतिक और राजनैतिक वजन था कि अफ्रीका के बाहर भी दुनिया भर में उन्हें माना जाने लगा था, और 1984 में उन्हें नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया था।
अभी जब देश की एक सबसे बड़ी इम्तिहान, नीट-यूजी 2026 का पेपर लीक सामने आया, और सरकार को यह इम्तिहान ही रद्द कर देना पड़ा, तो राजस्थान के सीकर जिले का एक नौजवान शिक्षक शशिकांत सुथार एकदम से खबरों में आया। नीट पेपर लीक को लेकर इस शिक्षक ने राज्य पुलिस में काफी माथा फोड़ा, लेकिन आखिर में कई दिन इंतजार करने के बाद जब उसने नीट को ईमेल किया, सीबीआई और पीएमओ को लिखा, तो उसके बाद सरकारी सिस्टम की चर्बी कुछ हिली, और जांच एजेंसियां इस शिक्षक के पास पहुंचीं। कैसा विचित्र संयोग रहा कि इस पेपर लीक करने वाले सबसे बड़े लोग महाराष्ट्र में कोचिंग सेंटर चलाने वाले लोग ही थे, और लीक को उजागर करने का काम राजस्थान के एक कोचिंग सेंटर के इस शिक्षक, शशिकांत सुथार ने किया।
इस शिक्षक के लिए भी यह आसान रहता कि बहुत से दूसरे कोचिंग सेंटरों ने जिस तरह पेपर आऊट करवाने, उसे बेचने, और अपने कोचिंग सेंटर के बच्चों को पास करने की गारंटी करवाने की तरह यह शिक्षक भी लीक की जानकारी रहने पर चुप रह जाता। लेकिन जैसे ही उसे यह दिखा कि नीट में आया पर्चा तो तकरीबन पूरे का पूरा इम्तिहान की तारीख के कई दिन पहले से उसी क्रम में, और कॉमा-फुलस्टॉप सहित टेलीग्राम जैसी मैसेंजर सर्विसों में पहले से घूम रहा था, उसने किसी निजी खतरे की परवाह किए बिना भांडाफोड़ किया, और फिर देश की यह छात्रों के साथ कीएक सबसे बड़ी बेईमानी खारिज करनी पड़ी। इससे एक बात साबित होती है कि एक अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।
अब हिन्दी की इस पुरानी कहावत को इस तरह की कुछ और घटनाओं से भी जोडक़र देखें, तो यह साबित होता है चना फोडऩे वाली भाड़ के भीतर का कोई अकेला चना भी पूरी भाड़ को फोड़ सकता है। एक अकेले व्यक्ति के किए हुए से क्या-क्या हो सकता है, इसकी भारत से अधिक बड़ी मिसाल दुनिया में और कहां हो सकती है? गांधी को आज इस देश में राष्ट्रपिता या महात्मा कहने से कुछ लोगों को परहेज हो सकता है, लेकिन गांधी के गुजर जाने के पौन सदी बाद भी आज तक दुनिया में गांधी से अधिक प्रतिमाएं तो किसी की नहीं लग पाईं! और आने वाला वक्त गवाह रहेगा कि गांधी की किसी कोशिश के बिना दुनिया का कायम किया हुआ यह रिकॉर्ड तोड़ा भी नहीं जा सकेगा। एक अकेले चने ने अंग्रेजी शासन का भाड़ फोडक़र रख दिया था, जिसकी लाठी महज अपने बदन के सहारे के लिए थी, उस लाठी से तो गांधी ने गोडसे तक को नहीं मारा था, खुद मर गए थे। इसलिए अकेला चना भाड़ तो फोड़ सकता है, लेकिन उस चने को अपनी परवाह छोडक़र काम करना होता है।
अभी जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश के बेरोजगार नौजवानों को कॉकरोच करार दिया, उन्हें परजीवी (पैरासाइट) कहा, तो उसके खिलाफ अमरीका के बॉस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ रहे भारतीय मूल के एक नौजवान अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम का एक समूह बनाया, हफ्ते भर के भीतर इंस्टाग्राम पर उसे दो करोड़ से अधिक लोग फॉलो करने लगे, और भारत में तो कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों पार्टियों के मिलकर भी फॉलोअर कॉकरोच से कम ही हैं। भारत के नौजवानों को उनके अपमान का अहसास करवाना, और सोशल मीडिया पर उन्हें एक साथ जोडऩा, यह काम एक भारतवंशी नौजवान ने इस हद तक कर दिखाया कि उसका ट्विटर पेज एक्स से हटा दिया गया है, उसके इंस्टाग्राम पेज को हैक कर लिया गया, और उसकी वेबसाइट को भी शायद रोक दिया गया है। अब यह रोकने के पीछे सरकार है, या हड़बड़ाए हुए चीफ जस्टिस हैं, यह अभी रहस्य की बात है, लेकिन देश के बेरोजगारों को एक जेन-जी आंदोलन की तरह ऑनलाईन जोड़ देने का जो काम इस नौजवान ने किया है, वह असाधारण और अभूतपूर्व है। एक अकेले चने ने भाड़ को ऐसे फोड़ दिया कि दुनिया की कुछ सबसे बड़ी ताकतों को उसके पेज ब्लॉक करवाने पड़ रहे हैं, उसने नौजवान बेचैनी को एक ऐसी आवाज दे दी कि उस गूंजती हुई आवाज के साए में चीफ जस्टिस के लिए सोना मुश्किल हो गया होगा, वैसे भी जब कॉकरोच पूरे बदन पर रेंगने लगें, तो भला सो कौन सकते हैं!
लोगों को याद होगा कि बीते कई बरस से इंटरनेट पर विकीलीक्स नाम की एक वेबसाइट पर दुनिया भर की ताकतवर सरकारों, फौजों, और खुफिया एजेंसियों को जितनी बड़ी चुनौती दी गई, वैसी इतिहास में कभी नहीं ली गई थी। इसके संस्थापक जूलियन असांज ने अकेले ही सरकारों के गंदे और खूनी रहस्य का भांडाफोड़ शुरू किया, एक-एक बार में लाखों दस्तावेज जनता के बीच डाल दिए, जिसमें देशों की सरकारों, फौजों, और विदेश विभागों के गोपनीय दस्तावेज भी थे। जंग के पीछे के रहस्य, और आम नागरिकों की मौतों की जानकारियां भी थीं। इसने भी साबित किया कि एक बहुत छोटी सी टीम के साथ, या बिल्कुल अकेले ही जूलियन असांज ने किस तरह पूरी दुनिया की सरकारों को नंगा करके दिखा दिया। यह अलग बात है कि 2010 से शुरू हुए इस अभियान के चलते 2012 से उन्हें अपनी आजादी छोडऩी पड़ी, और बरसों तक जेल में रहकर अब वे बाहर आए हैं, और अपने देश ऑस्ट्रेलिया चले गए हैं। इस एक अकेले चने ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के सबसे गोपनीय भाड़ को फोड़ डाला। इसलिए एक व्यक्ति की ताकत को कम आंकना अच्छा नहीं होगा।
हालांकि मुद्दा बहुत लोकप्रिय या लुभावना नहीं है, भारत के संविधान की प्रस्तावना में समानता (इक्वलिटी) शब्द का दो किस्म से इस्तेमाल हुआ है। ‘‘...व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए...’’। भारतीय संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना के आगे जाकर भी इसे लागू करने के लिए अनुच्छेद 14 से 18 तक मौलिक अधिकारों में, ‘समानता का अधिकार’, जोड़ा है। अब यही शब्द एक दिलचस्पी खड़ा करता है कि आज के हालात में, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में क्या समानता कोई जिंदा शब्द है, या सभ्यता की कब्र पर लगे पत्थर पर खुदा हुआ एक शब्द रह गया है?
हिन्दुस्तान से बाहर निकलकर बाकी दुनिया को देखें, और उसके बाद फिर हिन्दुस्तान की तरफ लौटें। देशों के बीच की असमानता, और दुनिया का अपने आपको सभ्य मानने और कहने का पाखंड, इन्हें देखें तो समझ आता है कि दुनिया में समानता नाम की कोई चीज नहीं है। वह कहीं-कहीं कतरा-कतरा बिखरी हुई, थोड़े से टुकड़े में जिंदा एक ऐसी चीज रह गई है कि जब तक वह किसी ताकतवर के लिए खतरा साबित नहीं होती, तब तक उसे दिखावे के लिए सांस लेने दिया जाता है, और लोग सभ्य होने की खुशफहमी को जिंदा रखने के लिए भी अलग-अलग वक्त पर समानता शब्द से दूसरों को, और अपने-आपको भी बेवकूफ बनाते चलते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ देखें, या इसके इस किस्म के दूसरे कई अंतरराष्ट्रीय संगठन, कहीं पर पांच महाशक्तियों के हाथ वीटो का एक ब्रम्हास्त्र है, तो कहीं और पर व्यापक संगठन के भीतर एक तंग गिरोहबंदी राज करती है। दूसरे देशों के फौजी मोर्चों से अमरीकी सैनिकों के दो-चार ताबूत लौटते हैं, तो उन पर पूरी दुनिया से बदला लेने के फतवे दिए जाते हैं, लेकिन गाजा और लेबनान पर हमलों में एक-एक दिन में सैकड़ों बेकसूर नागरिकों के मारे जाने पर भी इसी अमरीका से बमों की सप्लाई घंटे भर को भी नहीं थमती। अपने देश के भीतर अमरीका अभी ट्रम्प के आने के पहले तक जिस लोकतंत्र का दंभ भरता था, वैसा लोकतंत्र उसने बाकी दुनिया में कभी नहीं चाहा। दूसरे देशों में दशकों तक उसने नाजायज जंग चलाई, और अपने इक्का-दुक्का सैनिकों के मरने पर भी उसने अपने देश के लोगों को भरोसा दिलाया कि दूसरी सभ्यता को ही खत्म कर दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध-अपराध लगातार करते हुए भी अमरीका और इजराइल हर अंतरराष्ट्रीय संगठन और समुदाय का हिस्सा बने हुए हैं।
मुझे याद है कि मेरा पहला पासपोर्ट जब बना था, तो उस पर छपा हुआ था कि यह पासपोर्ट दक्षिण अफ्रीका और इजराइल छोडक़र बाकी देशों के लिए वैध है। इन दो देशों को भारत के साथ रिश्तों के फेहरिस्त से बाहर रखा गया था। आज इजराइल न सिर्फ ट्रम्प का, बल्कि भारत का भी दामाद सा बना हुआ है, और फिलीस्तीनी अवांछित नवजात संतान की तरह नाली में फेंक दिए गए हैं। क्या आज सचमुच भारत यह कह सकता है कि वह इजराइल के इतिहास को देखते हुए यह अंतरराष्ट्रीय मांग कर सकता है कि फिलीस्तीनियों के समानता के इंसानी हक कायम किए जाएं? आज दुनिया में कानून का हाल यह हो गया है कि खाता न बही, जो ट्रम्प कहे वह सही। दुनिया 21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा पार कर चुकी है, लेकिन सभ्यता, और तथाकथित इंसानियत का हाल यह है कि इनकी गाडिय़ां बैक ब्यू मिरर में देखकर पीछे पाषाण युग की तरफ भाग रही हैं।
अंग्रेजी का शब्द इक्वलिटी 14वीं सदी के आसपास पुरानी फ्रांसीसी भाषा से निकला, और इसके भी पहले से यह लैटिन के एक शब्द एक्वालितास से जोड़ा जाता है, जिसका मतलब होता था न्यायसंगत, निष्पक्ष, और मानवीय गरिमा में समान होना। 18वीं सदी में फ्रांसीसी क्रांति में स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व का नारा दिया गया, तो वह इंसानों को बराबर मानने के लिए था। भारत में संस्कृत मूल शब्द सम से समानता निकला है, और इसका मतलब हर परिस्थिति, और हर जीवित प्राणी को बराबरी की नजर से देखना था। आज भारत में संपन्न और विपन्न के बीच हक और मौकों का फासला देखें, तो वह इतना गहरा, और इतना चौड़ा है कि समानता नाम के एक शब्द से उसे पाटा भी नहीं जा सकता। विधानसभाओं और संसद को देखें तो जिस तरह वहां गैरअमीरों का अनुपात गिरते चल रहा है, जिस अंदाज में संसद या विधायक बने लोगों की दौलत बढ़ रही है, जिस अंदाज में मंडी में निर्वाचित नेता नीलाम हो रहे हैं, उससे लगता है कि समानता शब्द को फ्रेंच और लैटिन से लेकर संस्कृत तक से हटा देना चाहिए।
आज जब अमरीका को इराक पर हमला करना रहता है, तो वहां का राष्ट्रपति ऐसे झूठे सुबूत पेश करता है जो इराक में जनसंहार के हथियार होने का दावा करते हों। इस झूठ के साथ एक देश को तबाह कर दिया गया, वहां के राष्ट्रपति को फांसी दे दी गई, और बाद में परले दर्जे की बेशर्मी से यह मान लिया गया कि अमरीका के पास कोई सुबूत थे ही नहीं। कभी वियतनाम, तो कभी वेनेजुएला, जहां मर्जी, वहां हमला, और यह दुनिया मानती है कि डिक्शनरी के बाहर भी समानता नाम का कोई शब्द है।
बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनावों के महीनों पहले से सोशल मीडिया उबलने लगा था, और वह उफनते भी जा रहा था। जिस तरह कुछ चीजों को उबालने से उनकी अशुद्धियां उबलकर उफनते हुए बाहर आने लगती हैं, उसी तरह चुनावी राजनीति से लेकर व्यक्तिगत आरोपों और लांछनों तक विचारों की हिंसा इसी तरह उफनकर बाहर आ रही थी। अब चूंकि एआई की मेहरबानी से मिनटों में मनचाही फोटो या वीडियो बनाना आसान हो गया है, इसलिए पहले के मुकाबले इस बार जहरीला ऑडियो-वीडियो कुछ अधिक उफन रहा था। असल जिंदगी का तो नहीं मालूम, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों में, उनके बीच, जिस दर्जे का ध्रुवीकरण हो चुका है, उनके बीच सच को सांस लेने की जगह नहीं है। इस खेमे, या उस खेमे की सक्रियता में सब कुछ खो चुका है। आप किसी भी तरह की हकीकत बयां करें, तो जिन्हें वह पसंद आएगी, वे अमूमन चुप रहेंगे, जिन्हें वह नापसंद रहेगी, वे बिफर पड़ेंगे, और टूट पड़ेंगे। ऐसे में एक सवाल उठ खड़ा होता है कि आज के ध्रुवीकरण के बीच सच बोलना महज साहस है, या फिर वह एक जोखिम भी है?
बंगाल में चूंकि ममता बैनर्जी एक महिला हैं, इसलिए महिलाविरोधी रूख अपने पूरे हिंसक तेवरों के साथ सोशल मीडिया पर छाया हुआ था। एक किसी पत्रकार ने एक गढ़ी हुई तस्वीर या पोस्टर का एक हिस्सा कुछ दबा-छुपाकर पोस्ट किया है जिसमें ममता बैनर्जी की एक अश्लील सी तस्वीर होने का आभास मिलता है। एक कार्टून की तरह बनाई गई यह फोटो पूरी देखने में नहीं मिली है, और न ही पूरी देखने की कोई लोकतांत्रिक-हसरत ही है। अगर राजनीति इस स्तर पर गिर चुकी है कि चुनावी मैदान की एक महिला के विरोधी, या हो सकता है उसके समर्थक भी, ऐसी फोटो बनाकर कुछ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो हम सिर्फ उसका जिक्र करना चाहते हैं कि ऐसे जहरीले वातावरण में लोकतंत्र कैसे जिंदा रह सकता है? कैसे ममता के विरोधी, या सहानुभूति पाने की साजिश में ममता के कुछ समर्थक ऐसे पोस्टर या कार्टून बना सकते हैं?
कुछ अरसा पहले मुझे यह लगता था कि सोशल मीडिया अपने अराजक तेवरों के साथ, और लोकतांत्रिक संभावनाओं को लेकर आजादी की एक नई मशाल है। इस मशाल की रौशनी में लोगों को कुछ अधिक दूर तक देखना मुमकिन होगा। लेकिन ऐसा सोचना शुरू करने के कुछ बरसों के भीतर ही अब मेरा मोहभंग हो चला है, और यह साफ-साफ लगने लगा है कि जमीन पर लोगों के दिलों में जितना जहर नहीं हो सकता, उससे हजारों गुना अधिक जहर सोशल मीडिया पर निकाला जा रहा है। वहां पर भाड़े के भोंपू हों, समर्पित कार्यकर्ता हों, या वैचारिक प्रतिबद्धता वाले लोग हों, कुल मिलाकर कुछ रासायनिक कारखानों की चिमनियों की तरह जहर उगलते लोग सोशल मीडिया को लोकतंत्र से परे ले जा रहे हैं, लोकतंत्र के आसपास भी फटकने नहीं दे रहे हैं। मैं जंगली शब्द को गाली तरह इस्तेमाल नहीं कर रहा, लेकिन जिसे जंगली तौर-तरीका कहा जाता है, वैसे घेरकर मारने के तेवर सोशल मीडिया पर इतने हावी हो चुके हैं, कि वहां पर किसी वैचारिक विचार-विमर्श की गुंजाइश नहीं रह गई है। और यह एक बात ऐसी है कि जो इसे लोकतांत्रिक मिजाज से ठीक उल्टी दिशा में ले जा रही है, ले जा चुकी है।
अब किसी गंभीर विचार को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लिखने का मतलब वैचारिक रूप से असहमत लोगों के हिंसक झुंड के बीच घिर जाने सरीखा है। वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से इतनी तकलीफ झेलने की बात तो समझ आती है, और वैचारिक प्रतिबद्धता जब मूल्यों को लेकर रहती है, तो कुछ खतरा उठाना भी समझ आता है। लेकिन सोशल मीडिया के जिन प्लेटफॉम्र्स पर मूल्यों को लेकर ऐसे लिखने का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं होता है, वहां अपनी जिंदगी के सुख-चैन को खत्म करना क्या सचमुच समझदारी है?
पता नहीं यह कौन से युग की बातें थीं, या सचमुच की बातें थीं भी, या नहीं थीं, और ये केवल किस्सा-कहानियां थीं। सुनते हैं किसी समय भारत में बड़े-बड़े शास्त्रार्थ होते थे, विद्वानों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर, कुछ विषयों पर लंबी सार्वजनिक बहस होती थी। और ऐसी जितनी कहानियां इतिहास में दर्ज हैं, उनमें से किसी में भी जीते या हारे लोग दूसरे की मां-बहन एक किए बिना परस्पर सम्मान और सद्भाव से बिदा होते थे। ऐसे शास्त्रार्थ के बीच उनके समर्थकों के हिंसक-शिकारी झुंड नारे लगाते किसी मुद्दे को दबाते खड़े नहीं रहते थे। शास्त्रार्थ की वैसी गौरवशाली परंपरा अब खो गई है, शायद कभी लौटकर नहीं आने के लिए।
सच तो यह है कि सच कहने को अब दिल नहीं करता, और दिमाग यही कहता है कि दिल तुम सच से या तो दूर रहो, या उसे अपने भीतर बसाकर रखो, उसे बाहर मत उफनने दो, क्योंकि उससे नुकसान के अलावा हासिल और कुछ नहीं होगा। एक वक्त मुद्दों पर ध्रुवीकरण होता था, लोग असहमत रहते थे, लेकिन सहअस्तित्व की गुंजाइश बनी रहती थी। अब सोशल मीडिया पर, और उसकी मेहरबानी से, लोग एक-दूसरे से असहमत नहीं होते, उन्हें नापसंद करने लगते हैं। अब लोग दूसरी सोच के लोगों को बुरा, बेवकूफ, या देश का गद्दार मानने लगे हैं। अब असहमति दिमागी शास्त्रार्थ का सामान नहीं रह गई, वह दिल की नफरत की वजह बन गई है। आज का सोशल मीडिया का, या किसी और जगह का सार्वजनिक शास्त्रार्थ कुतर्कों से शुरू होता है, और गालियों और व्यक्तिगत दुश्मनी पर जाकर ही थमता है।
हम लोग अपने बचपन में एक टोटके को सच मान लेते थे क्योंकि वह चारों तरफ खूब प्रचलित था। मनीप्लांट नाम का एक पौधा जो मिट्टी और पानी किसी में भी पनप जाता है, उसके बारे में कहा जाता था कि अगर उसे चुराकर लाकर लगाया जाए, तो वह अधिक जल्दी बढ़ता है, अधिक वक्त तक रहता है। उस वक्त आसपास इतनी पहचान भी नहीं थी कि पौधे वाले घरों वाले लोगों से पौधा मांगा जाए, मेरा अपना बचपन निम्न आय वर्ग का था, और मोहल्ले के अपनी पहुंच के घरों में पौधों की जगह नहीं रहती थी। फिर यह मशहूर और प्रचलित टोटका भी था, तो किसी एक बड़े घर में कूदकर वहां से मनीप्लांट की बेल तोडक़र लाकर घर की मिट्टी में लगाई थी। लेकिन शायद तपस्या में कुछ कमी रह गई थी, चोरी की भावना ने चोर की तरह सोचना पूरा नहीं हो पाया, और बेल का वह टुकड़ा मर गया।
आज सुबह बीबीसी पर एक वैज्ञानिक शोध आ रही थी, जो बताती है कि लोग अपनी मेहनत से खरीदा हुआ, या किसी दावत में जायज तरीके से पाया हुआ खाना जितना स्वादिष्ट पाते हैं, उससे बहुत अधिक स्वादिष्ट उन्हें वही खाना नाजायज तरीके से पाने, या चुराने के बाद लगता है। मतलब यह कि मेहनत या हक से पाया हुआ उतना मजेदार नहीं लगता, जितना कि गलत तरीके से पाया हुआ लगता है। यह अध्ययन वैज्ञानिकों ने शोध के पूरे पैमानों पर कड़ाई बरतते हुए किया। कुछ लोगों को फ्रेंच फ्राइज सीधे दे दिए गए, कुछ लोगों को दूसरों की प्लेट से चुराने के लिए कहा गया, और कुछ लोगों को ऐसी जगह से इस तरह चुराने के लिए कहा गया जिसमें पकड़े जाने का जोखिम अधिक था, पकड़े जाने पर जोखिम अधिक था। बड़े व्यापक स्तर पर हुए इस शोध का नतीजा यह था कि लोगों को परोसे गए, या उनके हक से पाए गए फ्रेंच फ्राइज के मुकाबले चोरी वाले बहुत अधिक स्वादिष्ट लगे, और जिस चोरी में खतरा जितना अधिक था, उस चोरी के फ्रेंच फ्राइज उतने ही अधिक स्वादिष्ट थे। मतलब यह कि स्वाद खतरे के अनुपात में बढ़ते चले गया, कुछ मामलों में तो यह परोसे गए वैसे ही, एक ही साथ बनाए गए, फ्रेंच फ्राइज के मुकाबले 40 फीसदी तक अधिक स्वादिष्ट करार दिए गए।
इस मनोवैज्ञानिक प्रयोग के पीछे सिद्धांत यह था कि जिस चीज को मना किया जाए, वही ज्यादा आकर्षक लगती है। यही वजह है कि चोरी का खाना, या गलत तरीके से जुटाया गया खाना ज्यादा स्पेशल लगता है। विज्ञान कहता है कि जब आप कुछ गलत करते हैं, तो शरीर में डोपामिन नाम का एक केमिकल बढ़ता है, जिसे कि पुरस्कार-रसायन भी कहते हैं। चोरी करते समय लोगों को उत्तेजना और अपराधबोध दोनों ही होते हैं, और इसी से वैसे जुटाए गए खाने का स्वाद बढ़ जाता है। फिर इसके अलावा एक और बात लागू होती है कि जब कोई चीज आसानी से नहीं मिलती, तो दिमाग में उसका महत्व बढ़ जाता है, यही सिद्धांत उन सामानों पर लागू होता है जिनके साथ इश्तहार किया जाता है कि वे सीमित संख्या में बनाए गए हैं। यही वजहें हैं कि एक साथ बनाई गई फ्रेंच फ्राइज के स्वाद में लोगों को 40 फीसदी तक का फर्क लगा, सबसे फीका स्वाद लगा जायज तरीके से पाने पर, और सबसे अधिक स्वाद लगा सबसे नाजायज तरीके से पाने पर।
जिस पश्चिम में यह ताजा शोध हुआ है, वहां पर इटली में यह पुरानी कहावत है कि चोरी का खाना ज्यादा स्वादिष्ट होता है। स्पेन में कहा जाता है मना किया गया ही सबसे स्वादिष्ट होता है। इन दोनों बातों को देखकर लगता है कि अपने बचपन में हम आसपास के कुछ बड़े घरों में लगे हुए अमरूद के पेड़ों तक पहुंचकर उसके फल चुराकर खाते थे, तो सचमुच ही उसका स्वाद बहुत लगता था। परिवार की औकात में अमरूद खरीदकर खाना था, लेकिन चुराकर खाने का मजा ही कुछ और था। मतलब यह कि जीभ के साथ-साथ दिमाग भी स्वाद महसूस कराता है। जो वर्जित है, निषिद्ध है, जिसकी मनाही है, उसे पाने की चाह हमेशा ही बड़ी रहती है, खड़ी रहती है।
एक अंग्रेजी अपराध-कथा उपन्यास में अधेड़ होता हुआ एक नौजवान अपने बाप के मरने पर उसके कारोबार का मालिक होने का सपना तो देखते ही रहता है, बाप के मरने पर वह पहला काम उसकी प्रेमिका पर कब्जा जमाने का करता है। पिता की प्रेमिका पर नजर रखना किसी भी समाज में वर्जित संबंध माना जाता है, लेकिन इस नौजवान के लिए पिता के कारोबार को पाने से अधिक महत्वपूर्ण उसकी प्रेमिका को पाना था।
वर्जित संबंधों का हाल बड़ा दिलचस्प रहता है। खाने-पीने की बातों से आगे बढक़र जब मैंने मनोविज्ञान में कुछ और चीजों को तलाशा कि क्या लोगों को दूसरे अविवाहित और अकेले लोगों के मुकाबले किसी और के साथ संबंध वाले, या किसी और से शादीशुदा लोग अधिक सुहाते हैं, तो उसके पीछे बड़ा साफ-साफ मनोवैज्ञानिक कारण है। मनोविज्ञान लोगों के दिमाग में यह बात बैठाता है कि अगर किसी को पहले ही चुना गया है, तो उसका दूसरों से बेहतर होना तय है। इसे मेट-चॉइस कॉपिंग कहा जाता है, मतलब यह कि लोग दूसरों की पहले से की गई पसंद को अतिरिक्त महत्व देते हैं। यह सिर्फ इंसानों में नहीं होता, जानवरों में भी होता है।
इस सिलसिले में मनोविज्ञान कहता है कि जो उपलब्ध नहीं है, उसे हासिल करने की हसरत कुछ अधिक होती है, उसे पाना अधिक उत्तेजना देता है। ऐसे संबंधों में प्रेम या देहसुख के साथ-साथ एक सुख यह भी मिलता है कि जिसकी जिंदगी में कोई और जोड़ीदार भी है, वे भी अगर आपकी तरफ आकर्षित हैं, तो यह अपने आपमें एक जीत हासिल सरीखा रहता है। मनोविज्ञान इसकी कुछ जटिल परिभाषा बनाता है, और कहता है कि जिसे पहले से किसी ने चुना है, उसके बारे में दूसरे के दिमाग में यह आता है कि वह पहले से देखे, परखे, खरे हैं, टेस्टेड हैं। जब दूसरे से शादीशुदा, या दूसरे से किसी प्रेमसंबंध में बंधे हुए से किसी और का संबंध बनता है, तो उस ‘किसी और’ का दिमाग यह अतिरिक्त उत्तेजना पाता है कि उसने पहुंच से परे के किसी को हासिल कर लिया है, और यही परे होना किसी व्यक्ति के महत्व को बढ़ा भी देता है। इसलिए शादीशुदा जिंदगी के एक-दूसरे को जायज तरीके से हासिल जीवनसाथी उतने आकर्षक नहीं लगते, उनके साथ आनंद उतना अधिक नहीं आता, जितना कि किसी विवाहेत्तर साथी के साथ होता है।
जो रक्तसंबंधों या पारिवारिक रिश्तों के हिसाब से वर्जित है, उसे पाने की हसरत भी कई लोगों को अधिक उत्तेजना देती है। सामाजिक नियम-कायदे विवाहेत्तर जिंदगी के बाहर के रिश्तों को वर्जित मानते हैं, और इसलिए ऐसे रिश्ते अधिक उत्तेजना देते हैं। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे रिश्तों में जो खतरा रहता है, गोपनीयता रहती है, अपराधबोध और उत्तेजना रहते हैं, इन सबकी वजह से दिमाग में डोपामिन (एक रसायन) का बड़ा डोज पैदा होता है, और इसलिए ऐसे रिश्ते मान्यता प्राप्त, स्थाई, या लंबे वक्त के रिश्तों के मुकाबले अधिक मजेदार लगते हैं।
नागपुर में अभी भारत दुर्गा मंदिर के शिलान्यास के कार्यक्रम में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान ने मंच से कहा कि हर कोई चार बच्चे पैदा करे, और उसमें से एक को आरएसएस को दे दे। यह नौजवान पहले भी कई बार कई मंचों से चार-चार बच्चे पैदा करने का आव्हान कर चुका है। और ऐसा करने वाला वह अकेला धार्मिक व्यक्ति नहीं है। हिन्दुओं से परे मुस्लिमों के एक बड़े प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक ने भी कई मंचों से मुस्लिमों को ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा है। भारत के बाहर भी कुछ दूसरे देशों में अलग-अलग धर्मों के लोग ऐसा आव्हान करते हैं, हालांकि पिछले पोप, पोप फ्रांसिस ने खरगोशों की तरह (यानी खूब ज्यादा) बच्चे पैदा करने की मानसिकता की आलोचना की थी, और जिम्मेदार मां-बाप बनने का सुझाव दिया था। भारत में साध्वी देवा ठाकुर ने हर हिन्दू महिला से चार बच्चे पैदा करने की अपील की थी, यति नरसिम्हानंद ने भी कई बार ऐसे भाषण दिए हैं, एक कोई स्वामी चक्रपाणि महाराज भी ऐसे बयान देते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे बयान देने वाले तकरीबन सारे ही लोग धर्म से जुड़े हुए घोषित रूप से अविवाहित, और तथाकथित ब्रम्हचारी माने जाते हैं।
जिस धर्म के जो लोग अपने धर्म के इस किस्म के लोगों के आव्हान या फतवे को मानकर ऐसा करना चाहते हैं, उन्हें भारतीय संविधान में ऐसा करने की पूरी आजादी है। दूसरी तरफ ऐसे पैदा किए गए बच्चों की देखभाल, उनका रखरखाव कैसा होगा, उनसे देश पर क्या फर्क पड़ेगा, इसका हिसाब लगाने के लिए अभी मैंने एक एआई, ग्रोक से कुछ मदद ली है। उसे मैंने कुछ बुनियादी जानकारियां दीं कि 2011 की जनगणना के मुताबिक हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी 96.6 करोड़ थी, जो कि 80 फीसदी से जरा ही कम थी। अब अगली जनगणना में जाहिर है कि यह सौ करोड़ पार कर जाएगी। 80 फीसदी हिन्दुओं के मुकाबले 14 फीसदी मुस्लिम, 2.3 फीसदी ईसाई, 1.7 फीसदी सिक्ख, 0.7 बौद्ध, और 0.4 फीसदी जैन आबादी 2011 में थी। इस जानकारी के आधार पर ग्रोक ने भविष्य के कुछ अनुमान निकाले हैं।
2026 से शुरू करके अगर यह देखें कि अगर हर जोड़ा चार-चार बच्चे पैदा करने लगे तो क्या होगा। आज भारत में प्रति जोड़ा करीब 1.9 बच्चे का औसत है। संयुक्त राष्ट्र और कुछ दूसरे जनसंख्या संस्थानों के गणना के मॉडल के आधार पर चार-चार बच्चे होने पर अभी से पांच बरस बाद 2031 में आबादी 146 करोड़ से बढक़र 167 करोड़ हो जाएगी, 21 करोड़ की बढ़ोत्तरी। आज से दस बरस बाद 2036 में आबादी 191 करोड़ हो जाएगी, आज से 45 करोड़ अधिक। 2041 में, यानी से 15 बरस बाद आबादी 218 करोड़ हो जाएगी, यानी आज से 72 करोड़ अधिक। 2046 में, यानी आज से 20 बरस बाद यह आबादी ढाई सौ करोड़ पहुंच जाएगी, यानी आज से करीब सौ करोड़ अधिक।
ग्रोक का अंदाज है कि ऐसे में आज से 20 बरस बाद बिजली, पानी, और ईंधन की मांग 50 से 70 फीसदी बढ़ सकती है। एलपीजी, डीजल, और बिजली पर बहुत भारी दबाव पड़ेगा। खाद्यान्न की मांग 30-40 फीसदी बढ़ जाएगी, खाद, पानी, और जमीन पर भारी दबाव पड़ेगा, अनाज की महंगाई बुरी तरह बढ़ेगी। हर बरस ढाई-तीन करोड़ नए नौजवान नौकरी की तलाश में आएंगे, और बेरोजगारी दर बहुत ऊंची हो सकती है। स्कूल-कॉलेज, और अस्पतालों पर भारी बोझ पड़ेगा, शिक्षक, डॉक्टर, और बुनियादी ढांचे की भारी कमी होगी। वन कटाई, प्रदूषण, और जल संकट और गंभीर हो जाएगा, इससे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर होगा। बेरोजगारी, भुखमरी, प्रदूषण, और सामाजिक अराजकता का माहौल रहेगा।
एआई के साथ मजा यह रहता है कि उससे जिस चर्चा को छेड़ा जाए, वह उसे आगे बढ़ाने में जुट जाता है। ग्रोक ने मुझे उकसाना शुरू किया कि क्या इस पर संपादकीय लिखने या किसी वीडिटोरियल बनाने में मदद करे? उसे बताया कि मैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान के ताजा फतवे पर लिखने की सोच रहा हूं, तो उसने याद दिलाया कि जितनी बार ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान की जंग रूकवाने की बात की है, करीब उतनी ही बार इस नौजवान ने चार-चार बच्चे पैदा करने का फतवा दिया है। फिर उसने सुझाया कि मुझे इससे सवाल करना चाहिए, इसकी मां ने कितने बच्चे पैदा किए थे, इसकी पत्नी ने कितने बच्चे पैदा किए, इसने खुद ने कितने बच्चे पैदा किए? उसने सुझाया कि असली समस्या कम बच्चे नहीं है, बल्कि जातिवाद, गरीबी, शिक्षा की कमी, और महिलाओं के शोषण की है। जब तक दलित दूल्हे घोड़ी पर चढऩे का हक नहीं मिलेगा, जब तक लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाएगा, जब तक महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेंगे, तब तक चार बच्चे पैदा करने का फतवा जनसंख्या ही नहीं, गरीबी और अशिक्षा को भी बढ़ाएगा। ग्रोक का हालांकि अपना कोई धर्म नहीं है, फिर भी उसने याद दिलाया- धर्मों रक्षति रक्षित:, यानी जो धर्म की रक्षा करता है, उसी की रक्षा होती है। उसने याद दिलाया कि अगर हम अपने बच्चों को अच्छा भोजन, अच्छी शिक्षा, और अच्छे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं, तो चार बच्चे पैदा करना धर्म नहीं, अधर्म है। उसने कहा कि चार बच्चे नहीं, चार जिम्मेदार नागरिक बनाने चाहिए, यही सच्चा हिन्दू धर्म है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अभी दो दिन पहले सांसद राहुल गांधी से जुड़े एक मामले में जिस तरह का यू-टर्न लिया है, वह हैरान और हक्का-बक्का करता है। राहुल गांधी के खिलाफ कर्नाटक के एक भाजपा कार्यकर्ता ने यह याचिका दायर की थी कि राहुल ब्रिटिश नागरिक हैं। यह मामला रायबरेली के विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट में चला, और याचिकाकर्ता के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने इसे वहां से लखनऊ ट्रांसफर कर दिया था। फिर लखनऊ में एमपी-एमएलए कोर्ट ने अभी जनवरी में इसे खारिज कर दिया, तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने दिन में अदालती सुनवाई में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, और इस मामले को सीबीआई को देने को भी कहा। इसकी खबरें पल भर चारों ओर फैल गईं, और देश की कानूनी समाचारों की सबसे बड़ी वेबसाइटों पर यह पूरे खुलासे और प्रमुखता से छा गई खबर रही। लेकिन अगली सुबह लोग हक्का-बक्का रह गए जब हाईकोर्ट ने वेबसाइट पर अपना आदेश बदल दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि पुराने मामलों के अध्ययन से यह समझ आया कि ऐसे मामलों में (राहुल गांधी को) नोटिस भेजना जरूरी था। जबकि पहले बिना किसी नोटिस के जज ने खुली अदालत की कार्रवाई के दौरान एफआईआर का जुबानी आदेश दिया था, और सीबीआई जांच का भी।
17 अप्रैल को जब यह खबर छाई, उस वक्त लखनऊ से दूर दिल्ली में संसद में यह बहस चल रही थी कि महिला आरक्षण के 2023 के बने कानून में संशोधन करके परिसीमन को जोड़ा जाए या नहीं। राहुल गांधी विपक्ष की तरफ से इस मामले में सबसे बड़े नेता थे। कुछ घंटों के भीतर शाम के पहले यह साबित हो गया कि विपक्षी पार्टियां ऐसे किसी परिसीमन वाले संशोधन के खिलाफ थीं, और सबने यह भी साफ कर दिया था कि वे सब 2023 के महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन कर चुकी हैं, आज भी उसके साथ हैं, और आज की संसद में महिला आरक्षण लागू कर दिया जाए, तो भी वे सब उसके साथ हैं। विपक्ष ने बार-बार यह साफ किया था कि वे सिर्फ परिसीमन और सीटें बढ़ाने के साथ महिला आरक्षण को जोडऩे की जटिलता के खिलाफ हैं। यह बात संसद की कार्रवाई के पहले से चल रही थी, और यही रूख मतदान में भी सामने आया। राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, और मतदान के बाद आई खबरों से यह भी पता लगता है कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से बात करके, बाकी विपक्षी दलों से बात करके सबका समर्थन जुटाया, और सरकार के लाए संशोधन अधिनियम को शिकस्त दी। खबरें बताती हैं कि किस तरह राहुल गांधी ने अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से उस दिन भी फोन पर संपर्क किया, और उसके बाद विपक्ष की एकजुटता बढ़ी।
यह कैसा गजब का संयोग था कि जिस वक्त संसद में विपक्ष पिछले 11 बरस की अपनी सबसे कड़ी लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त उसके नेता के खिलाफ लखनऊ हाईकोर्ट के एक जज अदालत में जुबानी टिप्पणी करके दो देशों की नागरिकता के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का हुक्म देते हैं, मामले की जांच सीबीआई को देने को कहते हैं, और उसी रात किसी समय टाईप हुए आदेश में वे इसका ठीक उल्टा आदेश करते हैं। जब संसद एक नाजुक दौर से गुजर रही थी, ठीक उसी के बीच हाईकोर्ट के जज के कहे हुए से उपजी खबरों को तो पल भर में फैलना ही था, और वही हुआ भी। जब हमने भी सबसे विश्वसनीय कानूनी वेबसाइटों पर इस खबर को देखा, और उसके बाद इसे दूसरे, तीसरे, और चौथे समाचार स्रोत से कसौटी पर कसना चाहा, तो पता लगा कि किसी भी एआई ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश की खबर निकालकर नहीं दी। हर एआई ने इस हाईकोर्ट बेंच के पहले की एमपी-एमएलए कोर्ट से याचिका खारिज होने की ही खबर निकालकर दी, और अलग-अलग एक से अधिक एआई को कानूनी वेबसाइटों की खबर देने पर भी उन्होंने इसकी पुष्टि करने से इंकार कर दिया। बात कुछ अटपटी लग रही थी, लेकिन फिर समझ आया कि जज के खुली अदालत में जुबानी कहे हुए को एआई अदालती आदेश नहीं मान रही थी, जो कि अगली सुबह वेबसाइट पर डाला गया, और जो कि जज के जुबानी कहे के ठीक उल्टे भी था। लेकिन तब तक उधर दूर दिल्ली में संसद के भीतर जितनी बहस होनी थी, वह हो चुकी थी, मतदान भी हो चुका था, और सरकार का लाया हुआ संशोधन विधेयक हार चुका था। अगली सुबह हाईकोर्ट बेंच ने एफआईआर का अपना मौखिक आदेश बदलकर राहुल को नोटिस देना तय किया।
यह मामला बड़ा ही अटपटा लगा, इसलिए हमने सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे ऐसे कुछ मामलों को लेकर जानकारी ढूंढने की कोशिश की। न्यायशास्त्र में स्थापित एक नियम का हवाला भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अलावा दुनिया की कई बड़ी अदालतों ने दिया है, जिनमें कहा गया है- अदालत अपने लिखित आदेशों से बोलती है, मौखिक टिप्पणियों से नहीं। तकनीकी रूप से तो जज खुली अदालत में दिए गए अपने आदेशों को लिखते हुए बदल भी सकते हैं, लेकिन एक बार सार्वजनिक रूप से कुछ कहने के बाद उसे पूरी तरह पलट देना न्यायिक शिष्टाचार के खिलाफ माना जाता है। मौखिक टिप्पणियों, और लिखित आदेशों के बीच टकराव की यह नौबत अदालत की गरिमा और साख दोनों को घटाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार जजों को जुबानी जमा-खर्च से बचने की सलाह दी है। ऐसे दो बड़े मामलों, एक विनोद दुआ का, और एक जस्टिस आर.ए.मेहता का, इन दोनों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों को सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए जो अंतिम आदेश का न हों, क्योंकि इससे जनता में भ्रम पैदा होता है, किसी की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जज के यू-टर्न को न्यायिक अनुशासन के खिलाफ माना है।
दुनिया के जिन समाजों में लोगों के पास अपनी कामकाजी पीढ़ी, और उसके बच्चों को जिंदा रखने की फिक्र पूरी हो जाती है, वे समाज बुजुर्गों के बारे में कुछ अधिक हद तक सोच पाते हैं। जब लोगों के पास कमाने वाले लोगों के लिए भी कमी रहती है, और उनकी अगली पीढ़ी भी उनकी कमी का शिकार रहती है, तो बिना कुछ कहे हुए भी घर के बुजुर्ग अपनी जरूरतों को बहुत सीमित कर लेते हैं, और अपनी छोड़ी विरासत के बावजूद अपने बोझ को कम से कम रखते हैं। लेकिन फिर भी समाज में बदलती हुई स्थितियों की वजह से बुजुर्गों की देखरेख, उनका खयाल, और उनकी फिक्र एक बढ़ता हुआ मुद्दा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अकेलेपन को एक वैश्विक स्वास्थ्य खतरा घोषित किया है, और माना है कि इसका असर हर दिन 15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदेह रहता है। बढ़ते हुए शहरीकरण, लोगों के दूसरे देश-प्रदेश में जाकर काम करने से परिवार का ढांचा सीमित होते चल रहा है, और बहुत से मामलों में आल-औलाद मजबूरी में भी मां-बाप से परे रहती है, काम करती है।
ऐसे बहुत से मामले आते हैं जिनमें दूसरे देशों में बसे हुए बेटा-बेटी अपने घरेलू देश में अकेले रह रहे बूढ़े मां-बाप को कई-कई दिन तक फोन भी नहीं कर पाते, और फिर कभी-कभी तो उनके मर जाने के बाद लाशों से उठी बदबू से पड़ोसियों को कुछ आशंका होती है, और पुलिस को बुलाकर दरवाजा खोला जाता है। जाहिर है कि इन दिनों हर किसी के पास एक फोन रहता है, बूढ़े मां-बाप के पास भी। और आल-औलाद दूसरे देश-प्रदेश से उसे फोन भी नहीं कर पाती।
अभी इस बारे में कुछ शोध करते हुए एक नया शब्द हाथ लगा, सिल्वर-टेक। यानी जिनके बाल चांदी सरीखे हो गए हैं, उनके इस्तेमाल के लायक टेक्नॉलॉजी। ताजा आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों की एक तिहाई बुजुर्ग आबादी अकेलेपन का शिकार है। जापान जैसे सबसे अधिक जीने वाले देश में स्वयं को समाज से काट लेने के लिए संस्कृति में एक शब्द, हिकोकोमोरी, है, और अब यह बुजुर्गों के बीच आगे बढ़ते-बढ़ते अकेले में मौत के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द, कोदोकुशी, तक पहुंच गया है। लोग इतना लंबा जीते हैं कि अगली पीढ़ी तब तक किसी और देश-प्रदेश पहुंच चुकी रहती हैं, और अकेले रहना ही शतायु पहुंचने वाली इस पीढ़ी की नियति जैसी रहती है। कुछ इसी तरह की सामाजिक समस्या को लेकर ब्रिटेन में अकेलेपन के लिए मंत्रालय बनाया गया है, और एक मंत्री की नियुक्ति हुई है। भारत के बारे में भी बढ़ते हुए शहरीकरण, और कई कामगारों, और मजदूरों के प्रवासी होने की वजह से कोई चौथाई फीसदी बुजुर्ग अकेले रहने को मजबूर हैं।
अब वृद्धावस्था में गरीबों के मदद के लिए तो सरकार और समाज की तरफ से तरह-तरह के वृद्धाश्रम रहते हैं, लेकिन इससे परे अब संपन्न तबके के बुजुर्गों के लिए भुगतान करने पर बेहतर इंतजाम का चलन भी कम से कम महानगरों में तो शुरू हो ही चुका है। जब जिंदगी के आखिरी बहुत से बरस अकेले गुजारना एक नियति है, तो फिर ऐसे लोगों को किसी छोटे से मकान के एक कमरे में बिस्तर पर पड़े-पड़े मौत का इंतजार करने देना कुछ अधिक अमानवीय है, बजाय उन्हें वृद्धाश्रमों में रखने के। वृद्धाश्रम समाज में बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की कमी बताते हैं, लेकिन अगर कुछ गहरी नजर से इन्हें दुबारा देखें, तो यह समझ पड़ेगा कि यह बुजुर्गों की अपरिहार्य दिक्कतों, और हालत के बीच शायद एक बेहतर व्यवस्था है। जब कई बुजुर्गों को एक साथ रखा जाता है, तो वे एक अलग किस्म का सामाजिक-परिवार बनाते हैं, जब एक-दूसरे के दुख-दर्द और अकेलेपन को सुनते हैं, तो उनका अपना दुख-दर्द कुछ कम होता है, या कम से कम यह तो लगता ही है कि वे ऐसे दुख वाले अकेले नहीं हैं। दूसरी तरफ रोज की जरूरतों, और जिंदा रहने के लिए वृद्धाश्रम जैसी सामाजिक व्यवस्था अलग-अलग, अकेले घरों के मुकाबले कुछ अधिक सहूलियत और हिफाजत की हो सकती हैं, जहां मददगार कर्मचारियों, या डॉक्टरों का बेहतर इंतजाम हो सके।
भारत के वृंदावन में पति खो चुकी महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृद्धाश्रम सुनाई पड़ते हैं, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं आकर मरने तक ईश्वर की आराधना में लगती हैं। जिस तरह वे सफेद कपड़ों में एक रंगहीन जिंदगी गुजारती हैं, और हिन्दुओं के एक सबसे रंग-बिरंगे भगवान, कृष्ण की भक्ति-आराधना ही उनकी जिंदगी में रह जाती है, तो वह एक दर्शनीय सामाजिक विरोधाभास भी बताती है। मयूरपंखी रंगों वाले कृष्ण, और किसी भी रंग के बिना एक विधवा! यह शब्द लिखना हम पसंद नहीं करते हैं, लेकिन जिस रंगहीन जिंदगी की हम बात करते हैं, उसे इस शब्द से बेहतर समझा जा सकता है। तो समाज के, हिन्दुओं के, एक तबके ने घरों से अकेली रह गई बुजुर्ग महिला से मुक्ति पा लेने का जरिया वृंदावन में निकाल लिया। धर्म कई तरह की सहूलियतें जुटाकर देता है, जिसमें एक सबसे आम सहूलियत आत्मग्लानि से मुक्ति की रहती है।
भारत की कुछ जातियों में पुरूष अपने से 8-10 बरस छोटी लडक़ी या महिला से शादी करने के लिए जाने जाते हैं। और भारत की आबादी का दूसरा तथ्य यह है कि यहां महिला की औसत उम्र पुरूष की औसत उम्र के मुकाबले करीब सवा तीन बरस अधिक रहती हैं। अब इस नौबत में अकेली रह जाने वाली महिला के अकेले बरसों का हिसाब लगाने के लिए केलकुलेटर की जरूरत नहीं है, पति से 7 बरस छोटी महिला आखिर के करीब 10 बरस अकेली रहने की नियति पाती है। ऐसी ही महिलाएं वृंदावन के विधवाश्रमों में कृष्ण की भक्ति करते हुए रंगहीन जिंदगी गुजारती हैं।
ऐसे में बुजुर्गों की मेडिकल देखरेख करने वाले, और उनके रोजाना के कामकाज में मदद करने वाले तरह-तरह के औजार और उपकरण विकसित दुनिया, या संपन्न देशों में इस्तेमाल में अधिक आते जा रहे हैं। लेकिन इसका एक बुरा नतीजा यह भी होता है कि आल-औलाद मां-बाप को उपकरणों के हवाले करके उनसे और दूर हो जाती हैं। एक तरफ जहां ऐसे उपकरण सहूलियत लगते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे भावनात्मक दूरी भी खड़ी कर देते हैं। मोबाइल फोन, या किसी और किस्म की वीडियो कॉल पर हुई बातचीत को मिलने जाने का विकल्प सा मान लिया जाता है। और ऐसी सहूलियत मुहैया करा देने वाले परिजनों को यह भी लगता है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है।
अपने इस दूसरे कार्यकाल में आने के पहले से डॉनल्ड ट्रम्प की दिमागी हालत की नुमाइश, चाहे-अनचाहे कर रहे थे, वह लोगों को उनके बारे में सोचने को मजबूर कर रही थी। लेकिन अब जब वे दुनिया के सबसे ताकतवर देश के बेताज तानाशाह की तरह पूरी दुनिया को अपनी लाठी से हांक रहे हैं, तो लोग उन्हें कुछ अधिक गौर से देख रहे हैं। लोगों से हमारा मतलब दुनिया के आम लोग नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले लोगों से है, जिनमें से दो सौ लोगों ने एक खुली चिट्ठी लिखकर ट्रम्प के खतरों से अमरीका, और बाकी दुनिया को आगाह किया था। इस चिट्ठी में इन दो सौ मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। लेकिन इस चिट्ठी से परे के और विशेषज्ञों ने भी अपनी राय अलग-अलग जगहों पर सामने रखी है।
आज की इस बात को इस चिट्ठी को लेकर ही आगे बढ़ाएं, तो उन्होंने लिखा था- जनता को चेतावनी देना हम अपना नैतिक दायित्व समझते हैं। डॉनल्ड ट्रम्प के व्यवहार के हजारों घंटों के अवलोकन, और उनके सार्वजनिक कार्यों के विश्लेषण के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वे देश का नेतृत्व करने के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह अनुपयुक्त हैं।
आगे लिखा गया है- ट्रम्प में मैलिग्नेंंट नार्सिसिज्म के स्पष्ट लक्षण हैं जो कि एक लाइलाज व्यक्तित्व विकार है। यह उन्हें धोखेबाज, विनाशकारी, और खतरनाक बनाता है। उनके भीतर सहानुभूति की कमी है, और वे महज अपनी प्रशंसा और सत्ता के भूखे हैं। मानसिक विकारों की मानक निर्देशिका के आधार पर ट्रम्प समाजविरोधी व्यक्तित्व विकार (डिसऑर्डर) के मानदंडों को पूरा करते हैं। उनके जीवन का पैटर्न सामाजिक मानदंडों, और कानूनों को तोडऩे, बार-बार झूठ बोलने, दूसरों की हिफाजत की परवाह न करने, और अपने गलत किए पर पछतावा न होने का रहा है।
इन्होंने इस चिट्ठी में आगे लिखा है- हम उनके भाषणों और रैलियों में मानसिक गिरावट के लक्षण देख रहे हैं। वे अक्सर काल्पनिक पात्रों को वास्तविक मान लेते हैं, शब्दों को भूल जाते हैं, और असंगत बातें करते हैं। उनकी यह अस्थिरता परमाणु हथियार संपन्न देश के कमांडर-इन-चीफ के लिए अत्यंत जोखिमभरी है। उनकी मानसिक स्थिति उन्हें एक तानाशाह की तरह व्यवहार करने के लिए उकसाती है। वे विरोधियों को अपना दुश्मन मानते हैं, और समाज में नफरत, और डर फैलाकर अपनी सत्ता बचाए रखना चाहते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर नहीं समझ सकता है, उसे कभी भी परमाणु बटन के पास नहीं होना चाहिए। हमारा स्पष्ट निष्कर्ष है कि ट्रम्प मानसिक रूप से बीमार हैं, और स्वभाव से राष्ट्रपति के कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं। उनकी स्थिति समय के साथ और बिगड़ती जा रही है, जो न केवल अमरीका, बल्कि पूरी दुनिया को एक विनाशकारी तृतीय विश्वयुद्ध की ओर धकेल सकती है।
अमरीका के एक जाने-माने प्रोफेसर, और ‘ड्यूटी टू वॉर्न’ के संस्थापक डॉ.जॉन गार्टनर ने खुलकर कहा है कि ट्रम्प में दुष्ट आत्ममोह के साथ-साथ संज्ञानात्मक गिरावट के स्पष्ट लक्षण दिख रहे हैं, और वे मानसिक रूप से स्वस्थ हालत में इस कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाएंगे। दुष्ट आत्ममोह (मैलिग्नेंट नार्सिसिज्म) में चार खतरनाक तत्व जुड़े होते हैं, आत्ममोह, मनोरोग, अदृश्य भय (पैरानोइया) और सैडिज्म (दूसरों को दुख देकर सुख पाना)। अमरीकी मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ट्रम्प किसी भी असहमति को सरकार के भीतर की एक साजिश, या देशद्रोह कहकर खारिज कर देते हैं। और सत्ता पर बने रहने के लिए निरंतर भारी बाहरी तारीफ की उनकी हवस पूरी ही नहीं होती है। ट्रम्प की भतीजी मैरी ट्रम्प जो कि खुद क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक हैं, उन्होंने अभी जनवरी में सीएनएन को एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके चाचा की हालत बद से बदतर होती जा रही है। उन्होंने परिवार की पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि ट्रम्प बचपन से ही असुरक्षा, और लगातार उनसे सहमति की भूख के शिकार रहते आए हैं। सत्ता की उनकी आज की लत ने उनकी मौजूदा हालत को और बुरा बना दिया है।
इसी फरवरी में हुए एक भरोसेमंद सर्वे में 61 फीसदी अमरीकियों ने यह माना कि ट्रम्प उम्र के साथ-साथ अब सनकी हो गए हैं। रिपब्लिकन पार्टी के लोगों में भी 30 फीसदी लोग इससे सहमत थे। डॉ.गार्टनर कहते हैं कि ट्रम्प के भाषण में झूठ को सच मानकर बार-बार दोहराना, विषय बदलते रहना, और याददाश्त की कमी साफ दिख रही है। आज अमरीकी मनोवैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती अमरीका में प्रचलित गोल्डवॉटर रूल है, जिसके तहत बिना व्यक्तिगत जांच किए हुए किसी की बीमारी पर कोई राय नहीं दी जा सकती। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ईरान युद्ध के दौरान अपने ही साथियों, नैटो देशों के खिलाफ ट्रम्प का हमलावर होना उनके पैरानोइया होने का सुबूत है, जो कि हर किसी को अपना दुश्मन समझने का मानसिक विकार है। विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव हारने पर ट्रम्प ने 6 जनवरी के संसद पर हमले को जिस खुशी के साथ बार-बार टीवी पर देखा था, और जैसी प्रतिक्रिया जाहिर की थी, उससे उनका सैडिस्टिक स्वभाव साफ दिखता है कि वे दूसरों की तकलीफ में खुशी महसूस करते हैं।
कुछ दूसरे न्यूरोसाइंटिस्ट और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ट्रम्प कनफैब्युलेशन के शिकार हैं। यह झूठ बोलने से कुछ अलग मानसिक विकार है जिसके शिकार लोग खुद अपनी बनाई हुई कहानियों पर भरोसा करने लगते हैं, चाहे वे कितनी ही नामुमकिन क्यों न हों। जैसे कि ट्रम्प का बार-बार यह कहना कि उन्होंने अकेले ही जंग जीत ली है। वे इंसिस्टेंस के शिकार हैं, यानी एक ही बात को बार-बार दोहराते हैं, और जंग में अपनी कामयाबी की लिस्ट को बार-बार एक ही लय में दोहराना उनके दिमाग के लूप में फंस जाने का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प हाइपोमेनिक हैं, यानी वे बहुत कम नींद में भी अत्यधिक ऊर्जा पाते हैं, और यही ऊर्जा उन्हें इम्पल्सिव बनाती है। वे आनन-फानन फैसलों की मुनादी कर देते हैं, न किसी सलाह की परवाह, न नतीजे की फिक्र। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ट्रम्प प्रेजेंट-हेडोनिज्म के शिकार हैं, यानी वे भविष्य के विनाश के बजाय अपनी तात्कालिक जीत और वाहवाही पर ध्यान देते हैं।
यह सब कहने वाले मनोवैज्ञानिक और विश्लेषक यह तो मानते हैं कि गोल्डवॉटर रूल के तहत बिना व्यक्तिगत जांच के बीमारी के बारे में नहीं कहना चाहिए, लेकिन जनता को चेतावनी देने का दायित्व इस नियम से बड़ा है। उनका मानना है कि ट्रम्प इस समय एक अपरिवर्तनीय गिरावट की हालत में है, और उनका दिमाग जटिल रणनीतियों (जैसे वैश्विक मंदी, या सैन्य गठबंधन) को समझने की क्षमता खो चुका है। जाने-माने विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रम्प अब महज एक राजनेता नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक इमरजेंसी हैं। उनका असामान्य दिमाग अब सलाहकारों को सुनने के बजाय जी-हुजूरों के घेरे में रहता है, जिससे उनके फैसले और अधिक घातक होते जा रहे हैं। एक बड़े विश्लेषक का कहना है कि ट्रम्प जितनी रफ्तार से अपना दिमाग, और अपने फैसले बदलते हैं, वह या तो असुरक्षा से उपजा है, या चीजों, और स्थितियों की शिनाख्त और उन्हें समझने की उनकी ताकत कमजोर हो चुकी है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ट्रम्प के इस दिमागी शून्य का फायदा उनके आसपास के जंगखोर लोग उठा रहे हैं, जो अपनी आक्रामक विदेश नीति को बढ़ा रहे हैं, क्योंकि ट्रम्प कुछ समझ पाने में असमर्थ है। डॉ.गार्टनर का मानना है कि कमजोर याददाश्त, और लाइलाज आत्ममुग्धता के चलते ट्रम्प अधिक अनिश्चित, अधिक आक्रामक, और कम समझदार हो चुके हैं, और वे यह कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे।
भारत सरकार के मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के ताजा आंकड़े हैरान-परेशान करने वाले हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक देश में दस फीसदी लोग मानसिक उलझनों और दिक्कतों के शिकार हैं, और इनमें से 90 फीसदी को सही इलाज नहीं मिलता, क्योंकि उसकी क्षमता ही नहीं है। हालत यह है कि पिछले पांच साल में केन्द्र सरकार ने जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए जो बजट मंजूर किया था, राज्यों ने उसका आधा भी इस्तेमाल नहीं किया, और समाज तरह-तरह की हिंसा झेल रहा है, आत्मघाती कुंठाओं का शिकार है, हिंसा के आंकड़ों से परे लोग मानसिक समस्याओं को झेल रहे हैं जो कि दिखती नहीं है, और राज्यों की दिलचस्पी उन्हें मिले बजट को खर्च करने में भी नहीं है। 2020 से 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि किसी भी बरस राज्य केन्द्रीय बजट का आधा भी खर्च नहीं कर पाए। लेकिन इन सबसे और भयानक बात यह है कि देश में मनोचिकित्सकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। 140 करोड़ आबादी के लिए कुल 8-10 हजार मनोचिकित्सक ही उपलब्ध हैं, और इनमें से भी अधिकतर की मौजूदगी चुनिंदा शहरी इलाकों तक सीमित है। यह आखिरी का तर्क सरकारी आंकड़ों पर आधारित नहीं है, लेकिन हमारे नजरी सर्वे से ऐसा दिखता है। दुनिया में एक लाख मरीजों पर वैश्विक औसत 1.3 मनोचिकित्सकों का है, और इस औसत में दुनिया के सबसे कमजोर और फटेहाल देश भी शामिल हैं। लेकिन भारत में यह औसत लाख मरीजों पर 0.75, यानी पौन मनोचिकित्सक का है। आंकड़ों में एक आखिरी आंकड़ा गिनाना और जरूरी है, वह है मध्यप्रदेश में एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में उनकी गिनती प्रति लाख 1.2 है, जो कि वैश्विक स्तर के एकदम करीब है।
अब देश में सबसे ज्यादा शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश केरल को देखें, तो वहां देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के मुकाबले औसतन 24 गुना मनोचिकित्सक प्रति लाख आबादी पर हैं। अब हम यह सोचते हैं कि मध्यप्रदेश में मनोचिकित्सा को अवांछित, या अवैध संतान क्यों मान लिया गया है? क्यों ऐसा मान लिया गया है कि यह शायद कोई पश्चिमी प्रभाव है, और भारतीय संस्कृति वाले प्रदेश में मनोचिकित्सकों को इतना गैरजरूरी कैसे मान लिया गया है? जिस केरल और असम में अभी चुनाव होने जा रहे हैं, वहां असम में यह आंकड़ा 0.29 प्रति लाख है, और केरल में 1.20, यानी सीधे-सीधे चार गुना। और असम में भी मध्यप्रदेश की तरह भाजपा की सरकार है। छत्तीसगढ़ के आंकड़े और अधिक फिक्र पैदा करते हैं, जो कि असम से भी आधे से कम हैं, इस राज्य में प्रति लाख आबादी पर 0.14 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। राजस्थान में 0.10!
हम कोई राजनीतिक विश्लेषण किए बिना यह समझना चाहते हैं कि कौन से ऐसे राज्य हैं जिनका भरोसा मनोचिकित्सा पर है, जो उसे जरूरी समझते हैं, और कौन से ऐसे राज्य हैं जो चिकित्सा विज्ञान की इस शाखा की तरफ से पूरी तरह बेपरवाह हैं? ऐसा लगता है कि कुछ राज्यों में गैरचिकित्सकीय तौर-तरीकों पर कुछ अधिक ही भरोसा है। वहां यह मान लिया जाता है कि पूजा-पाठ, दूसरे कुछ किस्म की धार्मिक उपासना, झाड़-फूंक, धागा-ताबीज जैसी चीजों से ही मनोचिकित्सा बेहतर हो जाती है। चारों तरफ एक धार्मिक माहौल बना दिया जाता है, चारों तरफ धार्मिक प्रवचन चलते हैं, इन प्रवचनों को इतनी अधिक राजनीतिक और सामाजिक मान्यता दे दी जाती है, कि किसी और इलाज की जरूरत नहीं रह जाती। क्या यह 21वीं सदी के 26वें बरस में एक सही फैसला है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई दशक पहले दुनिया के कुछ सबसे पिछड़े देशों में वहां के झाड़-फूंक, और बैगा-गुनिया के इलाज को यह कहते हुए अनौपचारिक मान्यता दी थी कि जहां पर और किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं है, वहां पर वह इसे ही आस्था चिकित्सा मान लेगा। मतलब यह कि जब और कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है, तो लोगों को झाड़-फूंक से ही एक मानसिक शांति मिले कि उनका कोई इलाज हो गया है। लेकिन जिस छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद के 25 बरसों में बजट आकार 5 हजार करोड़ से बढक़र 170 हजार करोड़ हो गया है, वहां भी मनोचिकित्सकों की उपलब्धता वैश्विक स्तर के 10 फीसदी भी नहीं हैं, और केरल के मुकाबले तकरीबन 10 फीसदी ही है। पूरे दुनिया में महंगे निर्माण के लिए मार्बल और ग्रेनाइट भेजने वाले राजस्थान में इससे भी और कम, प्रति एक लाख 0.10 मनोचिकित्सक हैं, और हम मध्यप्रदेश में देश का सबसे नीचा औसत 0.05 प्रति लाख आबादी गिना ही चुके हैं।
दुनिया में इस बात पर भारी उत्सुकता रहती है कि क्या किसी और ग्रह पर भी कोई जिंदगी है? एक सबसे विकसित देश अमरीका अंतरिक्ष अभियानों में सबसे आगे भी रहता है, और वहां पर लोगों के बीच ऐसी साजिशों की कहानियां चलती ही रहती हैं कि कैसे बाहर से कोई उडऩतस्तरी आई, कैसे उसमें दूसरे ग्रहों के लोग उतरे। बहुत सारी खबरें तो ऐसी भी बनती हैं कि कोई दूसरे ग्रह का प्राणी अमरीकी सरकारी एजेंसियों के हाथ लग गया है, और उसके शरीर पर तरह-तरह के प्रयोग चल रहे हैं। यूएफओ और एलियन, अमरीकी जनता के बीच असली रहस्य की तरह बड़ी प्रचलित धारणाएंं हैं, और एआई से बनने वाले वीडियो-फोटो के दशकों पहले से अमरीका से यूएफओ और एलियन की तस्वीरें गढ़ी जाकर दुनिया भर में फैलती आई हैं। लेकिन अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों तक फैली हुई किसी संभावित जिंदगी से परे एक और जिंदगी इस धरती की जिंदगी से परे सामने आई है।
धरती के लोग अपनी असल जिंदगी के साथ-साथ अब एक आभासी जीवन भी जीते हैं। वे आज अपने घर-परिवार, और अपने असल दायरे के दोस्तों, सहकर्मियों, सहपाठियों से परे आभासी दुनिया के लोगों के साथ अधिक जी रहे हैं। फेसबुक या इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को हर दिन घंटों व्यस्त रखते हैं, और अलग-अलग कई पीढिय़ों के लोग आज इस दिमागी हालत में रहते हैं कि उनकी असल जिंदगी वही ऑनलाइन वाली है, और जो ऑफलाइन, या जमीनी और असली जिंदगी है, उससे लोगों का लेना-देना घटते चल रहा है। यह सिलसिला एक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है।
अब लोगों को खरीददारी करने बाजार नहीं जाना पड़ता, किसी असल इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, सब कुछ ऑनलाइन हो जाता है। लोगों को खाने-पीने के लिए किसी इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, मोबाइल ऐप से खाना ऑर्डर हो जाता है, और अगर पहले से भुगतान किया हुआ रहे तो डिलीवरी करने वाले लोग दरवाजे पर छोडक़र चले जाते हैं। बिना किसी मानवीय संपर्क के ट्रेन या प्लेन की टिकटें बुक हो जाती हैं, कार किराए पर मिल जाती है, और तो और अगर भाड़े पर कुछ देर के लिए संगी चाहिए, तो वैसी एस्कॉर्ट सर्विस भी ऑनलाइन हासिल है। किसी भी तरह के भुगतान के लिए, किराना या फल-सब्जी खरीदने के लिए किसी इंसान से बातचीत जरूरी नहीं रह गई है।
इससे परे लोग अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में सबसे करीबी और सबसे भरोसेमंद दोस्त ऑनलाइन भी, और बहुत से मामलों में शायद, ऑनलाइन ही बनाने लगे हैं, उन्हीं से राज बांटने लगे हैं, उन्हीं के सुख-दुख मायने रखते हैं, और लोग उसे काफी भी समझने लगे हैं। दरअसल आभासी दुनिया के ऑनलाइन रिश्तों में कोई असल नकारात्मक बात नहीं रहती। सब कुछ नकली रहता है, सांसों की बदबू, बदन से उठने वाली आवाजें, कुछ भी ऑनलाइन रिश्तों को परेशान नहीं करते। लोगों को किसी के बारे में कुछ भी सच पता लग जाए, यह जरूरी नहीं रहता। लोग अंधाधुंध झूठ बोल सकते हैं, और बरसों तक एक मुखौटा ओढक़र रह सकते हैं। ऐसा सहूलियत का झूठ असल जिंदगी में मुमकिन नहीं रहता। ऑनलाइन रिश्ते कुछ-कुछ खरीदे हुए देह-सुख सरीखे रहते हैं जिनके साथ असल लंबी जिंदगी की जिम्मेदारियां जुड़ी हुई नहीं रहतीं। ऐसे में ऑनलाइन सहूलियत को छोडक़र असल जिंदगी की खुरदुरी हकीकत बहुत से लोगों को नहीं सुहाती, और वे ऑनलाइन ही खुश रहने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शोधकर्ता लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि आज नौजवानों की जिंदगी में मेटावर्स (फेसबुक, वॉट्सऐप, और इंस्टाग्राम की कंपनी मेटा में उलझे हुए लोगों की दुनिया) का हिस्सा उनकी असल जिंदगी से अधिक बड़ा होते जा रहा है। वे रोज की अपनी जिंदगी में जितना वक्त दूसरे इंसानों के साथ जीते हैं, असल जिंदगी की धरती पर काम करते हैं, उससे कहीं अधिक वक्त वे मेटावर्स पर गुजारते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लाखों-बरसों में इंसान के मिजाज में धीरे-धीरे करके जो सामाजिकता आई थी, वह अब एक पीढ़ी के भीतर ही तेजी से कमजोर पड़ रही है। असली रिश्ते, भावनाएं, और सामाजिक संपर्क कमजोर होते चल रहे हैं। अमरीकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन, और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध नतीजों में यह पाया गया है कि मेटावर्स का लंबे समय तक इस्तेमाल लोगों को अकेलेपन के पैमाने पर बहुत अधिक अकेला कर देता है। जो लोग रोज तीन घंटे से ज्यादा मेटावर्स में जीते हैं, उनमें अकेलापन, उदासी, और सामाजिक अलगाव की भावना अधिक बढ़ जाती है। अब लोग मेटावर्स पर भी अपने खुद के चेहरे के बजाय अपनी पसंद के बनाए गए अवतार की शकल में सामने आते हैं, और वे धीरे-धीरे अपनी खुद की हकीकत से भी कट जाते हैं। भारत में 2025 में बेंगलुरू के देश के सबसे बड़े मानसिक केन्द्र, निम्हंस और एम्स-दिल्ली के एक संयुक्त अध्ययन में यह पता लगा कि 18 से 25 साल उम्र के लोगों में से 64 फीसदी लोग रोज दो-चार घंटे मेटावर्स पर गुजारते हैं, इनमें से 47 फीसदी ने यह माना है कि उनकी अपने असली दोस्तों से बात करने की इच्छा अब कम हो गई है। इस अध्ययन के 39 फीसदी नौजवानों में सामाजिक बेचैनी बढ़ी है, वे वास्तविक दुनिया में बात करने से डरते हैं, और अपने गढ़े हुए अवतार के पीछे से बात करने में सुरक्षित महसूस करते हैं। इस शोध के नतीजे बता रहे हैं कि आभासी दुनिया असल जिंदगी का पूरक नहीं बन रही है, वह असल जिंदगी को बेदखल ही कर दे रही है।
2025-26 में आईआईटी दिल्ली, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज मुम्बई के एक साझा अध्ययन, डिजिटल डी-टॉक्स में यह बात सामने आई कि जो नौजवान सात दिन तक मेटावर्स से दूर रहे, उनकी नींद 31 फीसदी बेहतर हुई, फिक्र एक चौथाई घट गई, और परिवार के साथ वक्त गुजारने की उनकी इच्छा बढ़ी। ऐसे कुछ अध्ययन बतलाते हैं कि लोग अपने गढ़े हुए चेहरे-मोहरे, और तस्वीरों के पीछे से आभासी जीवन जीते हुए अपने असली तन-मन की फिक्र करना भूल जाते हैं, और घंटों ऑनलाइन बैठे हुए वे अपने तन और मन दोनों को बर्बाद कर लेते हैं।
अमरीका के कुछ राज्यों में अभी हिंदुस्तानियों को गिरफ्तार किया गया जिन पर वहां बने रहने के लिए अपने खुद के ऊपर फर्जी डकैती करवाने का जुर्म दर्ज हुआ है। अमरीकी कानून के मुताबिक गंभीर अपराध के शिकार लोगों को पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों की मदद करने के एवज में सरकार वहां रहने की कुछ रियायत देती है। कानून की इसी नरमी का फायदा उठाकर जायज वीजा पर वहां पहुंचे हुए हिंदुस्तानियों ने अपने ही छोटे-छोटे कारोबार पर नकली डकैती डलवाई, और फिर उसकी सीसीटीवी रिकॉर्डिंग के साथ वहां आगे बने रहने की कोशिश की। अभी ऐसे 11 हिंदुस्तानी पकड़ाए हैं, जिनमें से हर कोई गुजरात के पटेल हैं, पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। इन सभी पर वीजा फ्रॉड साजिश की तोहमत लगी है, और गिरफ्तारी के बाद ये अदालत से जमानत पर रिहा हुए हैं। इनमें से एक आरोपी महिला को पहले ही भारत भेजा जा चुका है।
घटना की जानकारी बताती है कि दुकान मालिक खुद, या अपने कर्मचारियों को नकली डकैत बनाकर अपनी दुकान में हथियार जैसा दिखता कुछ लेकर लूट-डकैती के लिए आते दिखाते थे, और वहां पर हर दुकान में अनिवार्य रूप से लगने वाले सीसीटीवी कैमरे पर यह ‘जुर्म’ दर्ज होता था। जब कई राज्यों में बिल्कुल एक ही किस्म से ऐसे मामले सामने आए, और इनमें से हर किसी में पुलिस को खबर देने में जानबूझकर देर की गई, और सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग में कुछ अटपटी बातें जांच अधिकारियों को दिखीं, तो उन्होंने इस साजिश का भांडाफोड़ किया। यह कानून आमतौर पर घरेलू हिंसा, मानव तस्करी, या गंभीर जुर्म के शिकार प्रवासियों की मदद के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसके ऐसे धड़ल्ले से बेजा इस्तेमाल के बाद हो सकता है कि इस रियायत के जायज हकदारों को नुकसान हो। इस घटना पर अमरीका के कई भारतीय समुदायों ने कहा है कि यह मामला पूरे समुदाय के लिए एक आम बात नहीं है।
लोगों को 2022 की एक घटना याद होगी कि गुजरात के एक पटेल परिवार के पति-पत्नी, बेटा-बेटी कनाडा के रास्ते अमरीका में गैरकानूनी तरीके से घुसते हुए सरहद पर ही ठंड से जमकर मर गए थे। उस वक्त वहां पर शून्य से 38 डिग्री नीचे तापमान था, और वैसे में यह परिवार गुजरात से कनाडा के टोरंटो होते हुए अमरीका में गैरकानूनी तरीके से घुस रहा था। ये चारों भी एक बड़े ऐसे जत्थे में शामिल थे, लेकिन ऐसी बर्फीली हवाओं में बर्फ पर घंटों पैदल चलते हुए वे ठंड में ही जमकर मर गए। जांच एजेंसियों ने अदालत को कहा कि इन लोगों को यह मालूम था कि ठंड से उनकी मौत हो सकती है, फिर भी उन्होंने एक बेहतर जिंदगी पाने के लिए यह खतरा उठाया था। कुछ पेशेवर मानव तस्करों ने उन्हें पहुंचाने का ठेका लिया था।
अब गुजरात से अमरीका गए हुए पटेल समुदाय के लोगों को देखें तो वे वहां पर एक बार जम जाने के बाद कामयाब कारोबारी हो जाते हैं। कारोबार चाहे छोटा हो, या बड़ा, वे मेहनत से काम करते हैं, और उनकी अगली पीढ़ी तो किसी भी अमरीकी नागरिक जितनी ही संभावनाओं को लेकर आगे बढ़ती है। अमरीका में किसी भी शहर या हाईवे के किनारे बने हुए मोटेल (छोटी-मोटी होटल) में ठहरें, तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि उसका मालिक कोई पटेल हो। गुजरात से वहां गए हुए पाटीदार समुदाय के लोग ऐसे छोटे-छोटे होटल चलाने में खूब मेहनत करते हैं, और उसके बाद उनके परिवार के दूसरे लोग, या रिश्तेदार भी वहां काम करने आ जाते हैं, और वहां के सारे कर्मचारी इसी समुदाय के हो जाते हैं। कुछ बरस पहले मोटेल को पोटेल भी कहा जाने लगा क्योंकि मालिक के पटेल होने की ही अधिक संभावना रहती है।
अमरीका में गुजरातियों का इतिहास आमतौर पर अपराध से जुड़ा हुआ नहीं है, वह कारोबार से जुड़ा हुआ है। 1960-70 के दशक में अमरीका के बहुत से मोटेल आर्थिक संकट में थे, पुराने मालिक रिटायर हो रहे थे, या इतनी मेहनत का काम नहीं करना चाहते थे। ऐसे में भारत से गए हुए लोग कारोबार और अपने रहने की मिली-जुली जगह, ऐसे मोटेल पहले किराए पर लेकर चलाने लगे, और फिर धीरे-धीरे खरीदने लगे। यह 1980 के दशक तक एक खासा कामयाब कारोबार पटेल समुदाय के लिए बन गया था। 1990 के दशक में तो भारतीय मूल के मोटेल और होटेल मालिकों ने एशियन अमेरिकन होटल ओनर्स एसोसिएशन भी बना लिया जिसके मातहत हजारों होटल-मोटेल आते हैं।
यह काम पूरे परिवार के करने वाला एक घरेलू या कुटीर उद्योग जैसा हो गया, घर की महिलाएं भी वहीं पर काम संभालने लगीं, और गुजरात से बुलाए गए कुछ नए और गरीब रिश्तेदार बाकी काम करने लगे।
गुजराती कारोबारियों की ऐसी मौजूदगी ही सबसे बड़ी वजह थी कि डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए जब दुबारा चुनाव लड़ा, तो वे प्रचार करने के लिए गुजरात तक आए थे, और मोदी के साथ मिलकर नमस्ते ट्रंप नाम के कार्यक्रम से अमरीका में बसे हुए गुजरातियों तक संदेश भेजा था।
लेकिन हिंदुस्तान में गुजरात बाकी देश के मुकाबले एक अधिक संपन्न राज्य माना जाता है। यहां पर बंदरगाह हैं, जो कि खाड़ी के देशों के करीब पड़ते हैं, इसलिए यहां पर पेट्रोकेमिकल के बड़े-बड़े उद्योग हैं, और उनसे जुड़े हुए फर्टिलाइजर कारखाने जैसी दूसरी फैक्ट्रियां भी हैं। फिर गुजरात कारोबारियों का प्रदेश माना जाता है जहां का कपड़ा उद्योग देश में सबसे अधिक कामयाब है, और देश की शायद सबसे अधिक कपड़ा फैक्ट्रियां गुजरात में ही लगी हुई हैं। गुजरात के सूरत का देश के हीरा कटाई उद्योग का मानो एकाधिकार ही है, और वहां से हर दिन शायद हजारों करोड़ के तराशे गए हीरों का व्यापार होता है। गुजराती लोग मिजाज से भी कारोबारी हैं, और देश में शायद ही कोई ऐसे प्रदेश हों जहां गुजराती कारोबारी न हों। गुजरात राजनीतिक रूप से एक असाधारण स्थिरता वाला प्रदेश भी है, और यहां करीब 30 बरस से भाजपा की ही सरकार चली आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से ही की थी, और अब भी बाहर से आने वाले विदेशी राष्ट्र या शासन प्रमुखों को वे किसी एक प्रदेश अगर लेकर जाते हैं, तो वह गुजरात ही है। ऐसे में गुजरात के लोग अगर जायज और नाजायज तरीके से अमरीका जाकर बसने के लिए जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं, तो उसे हम गुजरात की किसी बदहाली, या बेरोजगारी का संकेत नहीं मानते, बल्कि यह मानते हैं कि वे कारोबारी रोमांच उठाने वाले लोग हैं जो कि अच्छी जिंदगी से बेहतर जिंदगी की तरफ बढऩे के लिए अमरीका पहुंचते हैं।
छत्तीसगढ़ के चिरमिरी से अमरीका जाकर फ्लोरिडा में बसने वाले चंद्रकांत पटेल वहां के हिंदू समुदाय के भी एक बड़े सक्रिय व्यक्ति हैं, वे ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी के अमरीका के अध्यक्ष भी रहे हैं, और वहां पीसी बोर्ड बनाने वाले एक उद्योग के मालिक भी हैं। वे तो गुजरात से अमरीका नहीं गए, वे छत्तीसगढ़ से अमरीका गए, लेकिन इसके पीछे उनके पटेल होने की खूबी भी रही जो कि दूर-दूर तक जाकर कारोबार शुरू करने वाला समुदाय है।
2022 में जब एक पटेल परिवार अमरीकी सरहद पर जमकर मर गया, तो लोगों ने उसे भारतीयों के देश छोडक़र जाने की एक बेबसी से जोड़ा। छोडक़र जाने वाले हर कोई बेबसी में नहीं जाते, बहुत से लोग एक ऐसी बेहतर जिंदगी के लिए जाते हैं जो कि उनके अपने देश-प्रदेश में मुमकिन नहीं है।
विश्वरंजन का गुजर जाना बहुत से लोगों की जिंदगी से एक बड़ी अहमियत वाली हस्ती का गुजर जाना है। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के आईपीएस रहे, बहुत लंबे वक्त तक भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी, आईबी के एक सबसे बड़े ओहदे पर रहे, और छत्तीसगढ़ का पुलिस प्रमुख बनकर उन्हें अनमने ढंग से लौटना पड़ा, क्योंकि उस वक्त के डीजीपी के अचानक गुजर जाने से दफ्तर खाली हो गया था, और छत्तीसगढ़ में उनसे अधिक माकूल कोई दूसरा अफसर मिल नहीं सकता था। इसलिए वे दशकों बाद छत्तीसगढ़ पुलिस में लौटे।
विश्वरंजन पुलिस के एक बड़े काबिल, और असाधारण व्यक्तित्व के धनी अफसर थे। साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी और सक्रिय दखल, उन्हें पुलिस और सरकार से परे के एक अलग दायरे से जोडक़र रखते थे। वे पेंटिंग भी करते थे, कविता भी लिखते थे, और उनके साथ बरसों की दोस्ती में मैं उनकी इन दोनों खूबियों की भाषाओं से अनजान सुखी बना रहा। किसी कवि-दोस्त की कविता पढऩे का बोझ मुझ पर नहीं रहता, और मजदूर या क्रांतिकारी गीतों से अधिक कुछ समझ नहीं पड़ता, इसलिए मैं अपने कविता-निरक्षर होने की नुमाइश करने में नहीं हिचकता। विश्वरंजन के साथ शायद सैकड़ों बार घंटों-घंटों बैठने पर भी मैं उनकी कविताओं से बेदाग बचा रहा। दूसरी तरफ पेंटिंग के बारे में मेरी नासमझी पर उन्हें तरस भी आती थी, और वे कहते थे कि चित्रकला को पढऩे की एक अलग भाषा होती है, जो कि किस्सा-कहानी की भाषा से अलग रहती है।
लेकिन पुलिस-प्रमुख के उनके कामकाज से परे उनकी जो बात मुझे बांध लेती थी, वह किसी विश्वकोष जैसा उनका ज्ञान, उस ज्ञान के मतलब निकालने की उनकी अपार समझ, उसे बांटने की उनकी तत्परता, और इतनी ही तत्परता असहमति को सुनने की, और दूसरों से ज्ञान हासिल करने की। वे ज्ञान का एक ऐसा समंदर थे जो कि एक स्याहीसोख्ते की तरह प्यासे भी रहते थे, नए-नए लोगों से मिलने, और उनसे नई बातें जानने के लिए। यह एक बात उनमें और मुझमें एक सरीखी थी, लेकिन इससे परे की कुछ बातें एक दूसरे के ठीक खिलाफ भी थीं। वे एक चेन-स्मोकर थे, और बिना सिगरेट कम ही रहते थे। दूसरी तरफ मैं तम्बाकू का हिंसक हद तक विरोधी रहा, और विश्वरंजन की सिगरेट से अपनी हिकारत छुपाने की जहमत मैंने कभी नहीं उठाई। लेकिन घंटों साथ बैठना होता ही था, इसलिए हमने यह तय किया हुआ था कि बंद कमरे में वे कभी मेरी मौजूदगी में सिगरेट नहीं पिएंगे, और उनके दफ्तर से रात में जब हम रवाना होंगे, तो सामने के खुले मैदान पर टहलते हुए वे मुझसे कुछ दूरी पर चलते हुए एक सिगरेट पिएंगे, और मैं उसे बर्दाश्त करूंगा।
मेरे घर आकर ठहरने वाले एक विदेशी प्रोफेसर के साथ खाने पर जब-जब मैंने विश्वरंजन को आमंत्रित किया, तो दोनों चेन-स्मोकर घर के बाहर कॉलोनी की सडक़ पर पैदल घूमते हुए सिगरेट पीकर लौट आते थे, लेकिन नक्सल मोर्चे पर उस वक्त के सबसे बड़े पुलिस अफसर होने के नाते विश्वरंजन निशाने पर रहते थे, और उनकी अंगरक्षक टीम मुझसे इस बात पर फिक्र जाहिर करती थी कि साहब को सिगरेट पीने मेरे घर से बाहर जाना पड़ता है, खुले में, खतरे में। लेकिन यह रोक-टोक उनके रायपुर छोडऩे तक चलती रही। उनकी पत्नी यह बात मानती थीं कि मैं ही अकेला उन्हें कुछ समय के लिए सिगरेट से रोकता हूं, जो कि मेरे चले जाने के बाद फिर शुरू हो जाती है।
विश्वरंजन देश और दुनिया के एक मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी के नाती थे। इस नाते उनकी बड़ी संपन्न और समृद्ध यादें थीं, और वे खुले खयालों के थे, इसलिए मैं उनसे इस बात की चर्चा भी कर लेता था कि फिराक को लेकर यह बात उठती रहती है कि उनके समलैंगिक संबंध भी थे। वे ऐसे विवादों से नावाकिफ नहीं थे, और न ही यह मानते थे कि फिराक के जिंदगी के किसी पहलू को बातचीत से परे रखना चाहिए। साहित्य में विश्वरंजन की दखल मेरे किसी काम की थी नहीं, फिर भी वे मुझे अपने संपादन वाली कुछ किताबें भेंट करते रहते थे, जो कि बिना पढ़े अभी भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वे इतने करीबी दोस्त थे कि इन किताबों को लेने से मना करके मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता था, लेकिन बाकी कवि-साहित्यकारों को मैं विनम्रता से मना करके किसी सुपात्र को उनकी किताब भेंट करने की सलाह दे देता हूं।
छत्तीसगढ़ पुलिस में उनके पहले और उनके बाद बरसों तक वैसा कोई काबिल प्रमुख आया नहीं, और वे काबिलीयत में एक अपवाद सरीखे थे। सत्तारूढ़ नेताओं की राजनीतिक पसंद-नापसंद का अपमान किए बिना उसे खारिज कर देने का हौसला उन्हें आईबी में सबसे ऊपर के दो-चार अफसरों में रहते हुए मिल चुका था, और वे छोटी-छोटी राजनीतिक ताकतों को चर्चा के लायक भी नहीं मानते थे। मैंने उनके साथ घंटों चलने वाली बैठकों में कई बार देखा कि किसी तबादले के लिए, या किसी दूसरे काम के लिए सत्ता की सबसे ऊंचाई से भी फोन आने पर वे मना करना जानते थे। विनम्र रहते थे, लेकिन साफ-साफ मना कर देना उनके मिजाज में था।
अमरीका के विख्यात उदारवादी और वामपंथी सोच के विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया के बर्कले ने जब भारतीय लोकतंत्र पर एक सेमीनार किया, तो वामपंथी उग्रवाद पर केन्द्रित एक सत्र में उन्होंने विश्वरंजन और मुझे, दोनों को बोलने के लिए आमंत्रित किया। जब हम वहां पहुंचे, तो सभागृह के बाहर बरामदों में, लिफ्ट में, पुरूष शौचालय के भीतर, हर जगह विश्वरंजन की मुंह से लहू टपकती हुई, ड्रैकुला जैसी तस्वीर बनाकर उस पर नारे छपे थे- वॉर क्रिमिनल विश्वरंजन गो-बैक। उनके कार्यकाल में नक्सलियों के खिलाफ बड़ी मुहिम चलती रही, राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह, और केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के बीच नक्सल मोर्चे को लेकर कोई मतभेद नहीं था। इसलिए दोनों की मिलीजुली कार्रवाई से बस्तर में नक्सलियों के सफाए की बड़ी मुहिम चलती थी, और उसमें विश्वरंजन की खासी बदनामी भी होती थी, क्योंकि मानवाधिकार हनन के कई मामले आते थे। ऐसी ही बदनामी के चलते विश्वरंजन के खिलाफ बर्कले विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सभागृह के भीतर इतनी लंबी नारेबाजी की थी, और उन्हें सुनने के लिए वे किसी तरह तैयार ही नहीं थे। मंच पर पैनल में बैठे हुए मुझे यह लग रहा था कि अगले तीन दिन इसी शहर में इन हजारों छात्र-छात्राओं के बीच विश्वरंजन के साथ घूमते हुए मैं भी सुरक्षित बचूंगा या नहीं? लेकिन वे अपने आम बर्दाश्त के साथ बैठे रहे, और जब बोलने का मौका आया तो उन्होंने पुलिस और सरकार का पक्ष रखा, केन्द्र और राज्य सरकार, दोनों का।
आज जिस वक्त मैं यह लिखने बैठा हूं, ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमले चल रहे हैं। मुस्लिमों के लिए रमजान का महीना चल रहा है, जो उनके लिए साल का सबसे पवित्र त्यौहार रहता है, और ऐसे में जगह-जगह लाशें बिखरी हुई हैं। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता, और सरकार के नीति निर्धारक आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमरीकी बमबारी में मौत हो चुकी है, और अपने करीब आधा लाख सैनिकों की खाड़ी के देशों में मौजूदगी को भी खतरे में डालकर अमरीका इस जंग को आगे बढ़ाते चल रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में अपने पिछले एक राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान के साथ की गई परमाणु संधि को तोड़ दिया था, और इसके साथ ही अब ईरान पर हमला करने के लिए उसने एक बहाना ढूंढ लिया था। जबकि अमरीकी खुफिया मामलों की मुखिया, ट्रम्प की करीबी, तुलसी गेबार्ड का ताजा बयान है कि ईरान परमाणु बम बनाने के करीब पहुंचा हुआ हो, ऐसे कोई संकेत या खुफिया जानकारी नहीं है।
अमरीका के इतिहास को देखें, तो आज सुबह वहां के एक डेमोक्रेटिक सांसद बर्नी सैंडर्स का ताजा बयान देखने की जरूरत है जिन्होंने ईरान पर किए गए अमरीकी हमले का खुला विरोध करते हुए कहा है कि ट्रम्प को एक और बेदिमाग जंग अमरीकी जनता पर थोपने का मौका नहीं देना चाहिए। उन्होंने अमरीकी हमले को लेकर कहा है- अमरीकी जनता को वियतनाम के बारे में झूठ कहा गया, उसे इराक के बारे में झूठ कहा गया, और उसे आज फिर ईरान के बारे में झूठ कहा जा रहा है। इन सबके दाम आम अमरीकी नागरिक चुकाएंगे। उन्होंने इस अमरीकी हमले को एक पूरी तरह से गैरकानूनी, और असंवैधानिक ठहराया है, और कहा है कि अमरीकी संविधान इस बारे में एकदम साफ है कि कोई राष्ट्रपति अपनी मनमानी से जंग शुरू नहीं कर सकता, यह हक अमरीकी संसद के पास है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि तुरंत ही संसद का सत्र बुलाया जाए, और जंग के अधिकार के लंबित प्रस्ताव पर वोट करवाया जाए। उन्होंने कहा कि यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के एकदम खिलाफ है, और सर्वशक्तिमान की मनमानी कोई जायज हक नहीं रहती। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ट्रम्प को अमरीका को ऐसे बेदिमाग जंग में घसीटने की इजाजत नहीं देना चाहिए।
मैं अभी ईरान के ताजा तनावों तक इस बात को सीमित रखना नहीं चाहता। अमरीका के हमलावर इतिहास पर एक नजर डालने पर साफ दिखता है कि दुनिया के किसी देश में साम्यवाद पनप न सके, जम न सके, या बढ़ न सके, इसलिए अमरीका ने जाने कितने ही फौजी हमले किए। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के शीत युद्ध के दौरान अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया, और उस पर द्वितीय विश्वयुद्ध से भी ज्यादा बम बरसाए। एक अंदाज यह है कि 25-30 लाख वियतनामी लोग मारे गए, और अमरीका ने नापाम बम से लेकर एजेंट ऑरेंज तक रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए, जिससे आज भी वहां पैदा होने वाली पीढ़ी बहुत बुरी तरह शारीरिक दिक्कतों के साथ पैदा हो रही है। दस बरस से ज्यादा की इस जंग में अमरीका आधा लाख से अधिक सैनिकों को खोकर, हारकर पीछे हटा। कम्युनिज्म रोकने के बहाने से अमरीका ने वियतनाम पर हमला किया था, जो कि इसलिए नाजायज था कि वियतनाम ने कभी अमरीका पर हमला नहीं किया था।
इस दौरान अमरीका ने अड़ोस-पड़ोस के देशों पर खूब बमबारी की, लाओस पर अमरीका ने 20 लाख टन बम बरसाए, जिसमें वहां के दो लाख से अधिक नागरिक मारे गए। कम्बोडिया पर अमरीका ने पांच लाख टन बन बरसाए, और वहां भी दो-तीन लाख लोग मारे गए। ये देश अमरीका के लिए कोई खतरा नहीं थे, इन पर हमला पूरी तरह नाजायज और गैरजरूरी दोनों ही था। इसी तरह उत्तर और दक्षिण कोरिया के आपसी संघर्ष में अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले फौजी कार्रवाई की, जिसमें 20-30 लाख कोरियाई नागरिक मारे गए।
ईरान में अमरीकी दखल का एक पुराना इतिहास भी है। 1953 में सीआईए ने वहां के प्रधानमंत्री को उखाड़ फेंका, क्योंकि उसने एक ब्रिटिश ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया था जिससे अमरीकी कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा था। इसके बाद अमरीका ने अपने पिट्ठू शाह मोहम्मद रजा पहलवी को वहां सत्ता पर स्थापित किया, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति में वहां से शाह और अमरीका दोनों को उखाड़ फेंका। लोगों को 2003 में अमरीका के इराक पर हमले को याद रखना चाहिए जिसमें अमरीका ने यह झूठा दावा किया था कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियार हैं। बाद में जब अमरीका ने इराक पर कब्जा किया, सद्दाम हुसैन को एक फर्जी अदालती सुनवाई का नाटक करते हुए मार डाला, तब जाकर यह पता लगा कि इराक के पास एक मुर्गी मारने जितना भी जनसंहार का हथियार नहीं था। यह पूरा हमला इस इलाके को अस्थिर करने के लिए, और तेल के कारोबार पर कब्जा करने के लिए किया गया था।
न्यूयॉर्क पर ओसामा-बिन-लादेन के हवाई हमले के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में तालिबानों पर हमला किया, 2001 से 2021 तक वहां अपना फौजी कब्जा रखा, लेकिन ढाई हजार अमरीकी सैनिकों, और ढाई लाख अफगानी लोगों की मौत के बाद अमरीका अफगानिस्तान को छोडक़र जान बचाकर भाग निकला। न्यूयॉर्क पर हमला अल-कायदा ने किया था, न कि अफगानिस्तान ने, और अब यह पूरा देश तबाह करके अमरीका तो भाग गया, लेकिन वहां की महिलाओं की जिंदगी 20 बरस पहले के मुकाबले भी नर्क हो गई है।
पूरी दुनिया में गांवों से शहरों की ओर लोगों का जाना एक नजर में इसलिए नहीं दिखता है कि गांव बहुत छोटे-छोटे हैं, बिखरे हुए हैं, वहां से लोगों का जाना वहां के बाकी लोगों को तो दिखता है, लेकिन बाहर के लोगों को नहीं दिखता। दूसरी तरफ शहरों में यह बात कुछ अधिक आसानी से दिखती है क्योंकि वहां गांवों से आए हुए लोगों की बसाहट शहर के किनारे-किनारे बढ़ती जाती है, शहर की बढ़ती जरूरतों के लिए मजदूरों की मौजूदगी भी बढ़ती ही रहती है। इस एक तस्वीर के दो अलग-अलग पहलू हैं। और इन दोनों को मिलाकर देखें, तो ऐसा लगता है कि बढ़ता शहरीकरण दुतरफा असर डाल रहा है, गांवों को नजरों से परे की हद तक प्रभावित कर रहा है, और वहां से शहर आने वाले लोगों की जिंदगी को भी सामान्य से अधिक हद तक।
गांवों से शहरों की तरफ लोगों के जाने की सबसे बड़ी वजह रोजगार की तलाश में होती है। गांवों तक मनरेगा जैसी योजनाएं पहुंची थीं, जिन्होंने लोगों को गांवों में बने रहने की एक छोटी सी संभावना दी थी, सहारा दिया था, लेकिन अब सुनते हैं कि इस योजना के जी राम जी हो जाने के बाद ऐसी संभावनाओं को जय राम जी हो जाने की आशंका बढ़ गई है। केन्द्र सरकार ने योजना में जिस तरह के फेरबदल किए हैं, उनसे कई लोगों को लगता है कि राज्य अपने ऊपर बढ़े हुए ऐसे बोझ को अधिक नहीं ढो पाएंगे। खैर, इस योजना पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, आज का मकसद गांवों से शहर आने की मजबूरी है।
यह भी समझने की जरूरत है कि जिन लोगों ने गांव को भोगा नहीं है, उन्होंने गांव को भुगता भी नहीं है। गांव जाति व्यवस्था के, संयुक्त परिवार व्यवस्था के, संपन्नता और विपन्नता के बड़े उदाहरण रहते हैं। गांवों को लेकर जितनी रोमांटिक तस्वीर बनती है, हकीकत उतनी ही क्रूर रहती है। कुछ लोगों को गांव प्रेमचंद की कहानियों सरीखे लग सकते हैं, और कुछ अधिक लोगों को गांव श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के बैद जी के गांव या कस्बे सरीखे मिल सकते हैं। जाति व्यवस्था से, और दूसरे शोषण-अत्याचार से थककर भी कुछ लोग शहरों की ओर चले जाते हैं, गांव कभी न लौटने के लिए।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने एक वक्त सूखे महीनों में लाखों या दसियों लाख लोगों का प्रदेश से बाहर जाना देखा है। हो सकता है कि सरकार ने कभी भी इन आंकड़ों को पूरी सच्चाई के साथ उनकी असली हद तक दर्ज न किया हो क्योंकि सरकारी अमले के हाथों शोषण से बचने के लिए अधिकतर लोग सरकार को खबर किए बिना ही बाहर जाते थे, और आज भी उसी तरह जाते हैं। लेकिन इनके मुकाबले थोड़े से ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि मजबूरी के विस्थापन वाले न हों, और बेहतर रहन-सहन, अधिक शहरी सुविधाओं, पढ़ाई-लिखाई या इलाज के लिए बाहर जाते हों। जो भी हो, आज पूरी दुनिया में गांवों की आबादी घटती चल रही है, और शहरों के बारे में बेरहम जुबान में कहा जाता है कि उन पर बोझ बढ़ते चल रहा है।
गांवों से लोगों के निकल चले जाने का हाल भारत के ही कुछ पहाड़ी राज्यों से लेकर पश्चिम के कई देशों तक ऐसा है कि अच्छे-खासे बसे हुए गांव अब घोस्ट टाऊन कहलाते हैं, यानी भुतहा गांव या कस्बा। हिन्दुस्तान में भी हिमाचल तरफ कई ऐसे गांवों की कहानियां आती हैं जिनमें गिने-चुने लोग रह गए हैं, बाकी सारे चले गए हैं। पश्चिम के कुछ देशों में ऐसे गांवों में आकर बसने के लिए सरकार कुछ अनुदान भी दे रही है। जब गांवों के उजाड़ होने की नौबत इतनी भयानक है, तो यह भी समझने की जरूरत है कि क्या इंसानों के अलावा भी गांवों को कुछ और छोडक़र जाते हैं?
गांवों की अपनी एक अलग संस्कृति रहते आई है, वहां के रीति-रिवाज, त्यौहार, सामाजिक परंपराएं, लोक कथाएं, लोकगीत और संगीत, लोककला जैसी बहुत सी जिंदगी की महीन ऐसी बातें हैं जो कि सरकारी जनगणना के आंकड़ों में कहीं नहीं आतीं, लेकिन जब गांव उजड़ते हैं, तो इनमें से तमाम बातें भी उजडऩे लगती हैं। अब कल्पना करें गांव की एक ऐसी संगीत टोली का, जिसके एक-दो वादक या गायक गांव छोडक़र चले गए, तो बाकी का क्या होगा? ऐसे विलेज-बैंड के लोग पूरी तरह से गाने-बजाने पर जिंदा नहीं रहते, वे दूसरे काम भी करते हैं। अब अगर ऐसे दूसरे काम छिन गए, उन्हें काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो कुछ लोगों के बाहर जाने से बैंड के बाकी लोग भी बेकार हो गए, और हो सकता है कि उस गांव की लोक संगीत की एक परंपरा ही टूट जाए।
यह भी सोचें कि अगर गांव के किसी भित्ति चित्रकार को काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो गांव में उसके साथ काम कर-करके जो सहायक इस शैली को सीख रहे थे, वही खत्म हो गई, तो क्या होगा? उसके दुबारा जिंदा होने की संभावना कम ही रहती है। लोग कम होते जाते हैं, तो सभी समारोह भी कम होने लगते हैं, और परंपराएं कमजोर पडऩे लगती हैं।
इसलिए यह समझने की जरूरत है कि गांव को महज आबादी छोडक़र नहीं जाती, उस गांव की संस्कृति, परंपराएं, रीति-रिवाज, और हर किस्म की लोककला, लोक साहित्य, सभी कुछ छोडक़र चले जाने का एक खतरा रहता है। दूसरी तरफ जब यही आबादी देश भर के अलग-अलग शहरों में बिखर जाती है, तो हां पर एक नई अर्थव्यवस्था में जिंदा रहने की चुनौती इतनी बड़ी रहती है, लोग इतने दूर-दूर छिटक गए रहते हैं कि वहां पर वे अपनी ग्रामीण परंपराओं को जारी नहीं रख पाते, अगली पीढ़ी तो उसके बिना ही बड़ी होती चलती हैं, और परंपराओं से उसका रिश्ता कायम ही नहीं हो पाता।
अभी मेरी एक परिचित लडक़ी ने अपनी निजी जिंदगी के मामलात पर बात करते हुए कहा कि जिस लडक़े से उसका प्रेम था, वह दूसरे देश में बस गया है, वह हिंदुस्तान लौटना नहीं चाहता, और मेरी यह परिचित इस देश को छोडक़र बसना नहीं चाहती। बात वहीं खत्म हो गई। प्रेम बरसों का था, लेकिन मतभेद ताजा थे, मतभेद को मनभेद में बदलने नहीं दिया, और हंसी-खुशी अपनी-अपनी राह लग लिए। दोनों परिपच् थे, वरना आखिरी मुलाकात के वक्त रस्सी, चाकू, और बाकी किस्म के औजार दोनों के ही पास थे। अब बिल्कुल ठंडे दिल से यह लडक़ी कुछ महीनों के भीतर एक नया रिश्ता शुरू कर चुकी है।
आज दुनिया में लंबी दूरी के रिश्तों की वजह से बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें आगे की संभावनाएं नहीं दिखतीं, तो जोड़ीदार अपनी-अपनी राह लग लेते हैं। लेकिन बहुत से मामलों में यह भी होता है कि एक-दूसरे की लंबी राह को तकने के बजाय लोग अपने आसपास की दुनिया में तब तक किसी और को भी तक लेते हैं, और लंबे इंतजार के बीच एक छोटे बुलबुले की दुनिया जी लेते हैं।
हिंदुस्तान के परंपरागत समाज में यह सोचना थोड़ा सा मुश्किल होता है कि लोग स्थायी दुनिया बनाने और बसाने का इंतजार करते हुए एक अस्थायी दुनिया में भी जीने लगते हैं। पश्चिम के देशों में कुछ शादीशुदा जोड़े ऐसे रहते हैं जो आपसी सहमति से अलग-अलग भी रिश्ते बना लेते हैं। ओपन रिलेशनशिप्स, या ओपन मैरिज की यह धारणा भारत में अधिक चर्चा में नहीं है, इसलिए यह माना जा सकता है कि यहां इसका चलन कम है। लेकिन दुनिया के बहुत से विकसित और उन्मुक्त समाज कई तरह के खुले रिश्तों में भरोसा रखते हैं। वहां न शादी जरूरी होती, न बच्चे पैदा करने के लिए पिता का नाम जरूरी होता। कई मामलों में पति-पत्नी दोनों अलग-अलग देह-साथी भी बना लेते हैं, जो कई बार एक-दूसरे की जानकारी में रहते हैं, और कई बार वे यह तय कर लेते हैं कि वे इसकी चर्चा एक-दूसरे से नहीं करेंगे। कुछ एक मामले ऐसे भी रहते हैं जहां ओपन मैरिज के ऐसे बाहरी साथी कभी-कभार सब एक साथ मिल भी लेते हैं। इंद्रधनुष में जितने रंग होते हैं, या किसी जंगल में पत्तों के जितने किस्म के आकार, उतने ही किस्म के रिश्ते भी होते हैं।
बहुत से देश और समाज ऐसे हैं जो सोच और रिश्तों की विविधता के साथ अहिंसक तरीके से जीना सीख लेते हैं वहां वह एक जीवनशैली ही बन जाती है। इधर हिंदुस्तान में हर दिन शादीशुदा जिंदगी, या कि प्रेम-संबंधों में शक पैदा होने की वजह से दर्जनों हत्याएं हो रही हैं, और कई आत्महत्याएं भी। किसी-किसी मामले में तो शक के आधार पर पति अपनी पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों को भी मार डाल रहे हैं। हर किस्म के विवाह, प्रेम, और देह-संबंधों में हिंसा इतनी आम हो चली है कि यह हैरानी होती है कि लोगों को साथ रहना मुमकिन न लगे, तो क्या वे अलग-अलग राह पर चलना नहीं जानते?
अब शहरीकरण बढऩे के साथ-साथ पूरी दुनिया में कई ऐसे प्रेमी या शादीशुदा जोड़े होते हैं जिनको अपनी पढ़ाई के लिए, नौकरी या कारोबार के लिए, या कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते एक-दूसरे से बरसों अलग रहना पड़ता है। हर किसी की तन-मन, और धन की जरूरतें ऐसी नहीं रहती हैं कि वे अकेले पूरी हो जाएं। ऐसे में एक-दूसरे से दूर रहने को मजबूर लोगों के बीच में कभी-कभी कोई नीला ड्रम भी आ जाता है। और ऐसे नीले ड्रम के साथ-साथ पार्टनर-इन-क्राइम कहे जाने वाले कोई नए प्रेमी-प्रेमिका, या साथी भी आ जाते हैं, जो कि ठिकाने लगाने में भागीदार बनने को तैयार रहते हैं।
लोगों को याद होगा कि 1974 में भारत में आई एक फिल्म ‘रजनीगंधा’ एक नए किस्म की जटिलता पर अपने वक्त से पहले बनी हुई फिल्म थी। इसमें नायिका को अपने शहर में एक नौजवान से प्यार रहता है, लेकिन जब वह एक इंटरव्यू देने एक दूसरे शहर जाती है तो वहां उसे अपना पिछला और पहला प्रेमी मिल जाता है। इन दो शहरों में बसे दो प्रेमियों के बीच यह नायिका एक दुविधा में उलझी रहती है कि जाए तो जाए कहां। शायद मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी यह फिल्म पूरी की पूरी इसी दुविधा के साथ आगे बढ़ती है। अब यह हिंदुस्तान में बनी एक बिना सेक्स-संबंधों वाली महज भावनाओं में गूंथी गई फिल्म थी, इसलिए यह देह-संबंधों के चित्रण के बिना पूरी भी हो गई। लेकिन आज की असल जिंदगी में लोग जिंदगी को देह सुख के साथ भी कतरा-कतरा जीना सीख लेते हैं।
दुनिया के दो अलग-अलग देशों में एक प्रेमी-जोड़ा तीन-तीन बरस के लिए पीएचडी रिसर्च कर रहा था। उनमें से एक, अपने दोस्त से मैंने पूछा कि इतनी लंबी दूरी, और इतने लंबे फासले के बीच अगर दूसरे के किसी तीसरे से देह-संबंध हो जाएं, तो उसे दूर-दूर रिसर्च करने वाले ये लोग किस तरह लेते हैं? ऐसे खतरे को किस तरह टालते हैं? तो उसका कहना था कि ऐसे खतरे टाले नहीं टलते हैं, इतना लंबा अकेले रहते जो होना है वो हो ही जाता है। हमारे सामाजिक अध्ययन के शोधकर्ता जोड़ों के बीच आम चलन यह रहता है कि जहां जो हुआ उसे वहीं छोडक़र, और वहीं भूलकर लौटें। और एक अघोषित सहमति इस पर रहती है, डोंट आस्क, डोंट टेल।
यह मेरे लिए रिश्तों में खुलेपन का एक नया आयाम था। और दुनिया में जितने किस्म के अलग-अलग समाजों के लोगों से मिलना होता है, उनसे किसी न किसी, तब तक अनजाने पहलू की जानकारी मिलती है।
अभी पश्चिम के किसी देश की एक महिला का लंबा इंटरव्यू आ रहा था कि जब उसने कृत्रिम गर्भाधान से मां बनना तय किया तो इसके लिए उसने अपने सबसे करीबी दोस्त के शुक्राणु नहीं लिए, बल्कि उसे सबसे अधिक पसंद एक दूसरे समलैंगिक पुरूष के शुक्राणु लिए। अब उस लंबे इंटरव्यू के सारे तर्कों को मैं यहां लिख नहीं सकता लेकिन यह सुनकर आपका दिमाग घूम रहा है या नहीं? मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जिनकी शादी तो किसी और से हुई रहती है, लेकिन हो बच्चे किसी और से चाहते हैं।
खुले रिश्तों की बात पर लौटें, तो आज आसपास बहुत से ऐसे रिश्ते दिखते हैं जिन्हें लोग समानांतर चलाते रहते हैं। इनमें से किसी को वे फुल टाइम मानते हैं, किसी को पार्टटाइम मानते हैं, किसी को सिर्फ मन के लिए और किसी को सिर्फ तन के लिए। कुछ रिश्ते ऐसे भी रहते हैं जिन्हें फ्रेंड्स विद बेनिफिट कहा जाता है। ऐसे रिश्ते कई बार सिर्फ धन के लिए रहते हैं, और कभी-कभी अपने स्थायी रिश्ते में तन और मन की संतुष्टि की कमी की वजह से भी।
छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार की यह खबर है कि बिस्तर पर पड़ी 64 बरस की एक बीमार महिला के साथ उसके मकान मालिक ने अपने साथी सहित गैंगरेप किया। अब इस बात का भला अनिल अंबानी से क्या लेना-देना हो सकता है? लेना-देना यही है कि सेक्स अधिकतर लोगों के दिमाग पर पूरी तरह हावी रहता है, कई लोग उस पर काबू कर लेते हैं, और बहुत से लोग काबू नहीं कर पाते। अमरीका में अभी बच्चियों से बलात्कार करवाकर भड़वागिरी का एक दलाली-रैकेट चलाने वाले के दस्तावेज अमरीकी कानून मंत्रालय ने संसद के आदेश पर जारी किए हैं, जो बताते हैं कि किस तरह दुनिया का यह सबसे बड़ा दलाल बच्चियों से बलात्कार करवाकर दुनिया के कई देशों में अपना रैकेट चलाता था। उसी रैकेट में अनिल अंबानी का भी नाम आया है कि उसे मजा करने के लिए स्वीडन की एक लडक़ी दिलाने का प्रस्ताव रखकर इस दलाल ने अमरीका बुलवाया था, और अनिल अंबानी ने यह न्यौता मंजूर करने के लिए कुल 20 सेकेंड लगाए थे। यह भी सामने आया है कि दुनिया की कई सरकारों के मंत्रियों ने दूसरे देशों की सरकारों या कारोबारों से काम निकलवाने के लिए किस तरह इस भड़वे का इस्तेमाल किया, और दुनियाभर के बड़े-बड़े सरकारी और राजसी ओहदों पर रहने वाले लोग इसके टापू पर जाकर नाबालिग लड़कियों और छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार करते थे। जो इसके न्यौते पर इसके राजसी महलों में जाकर बच्चियों से बलात्कार करते थे, वे बलौदाबाजार के इस मकान मालिक से बहुत अलग तो नहीं हैं जो कि 64 बरस की बीमार और बुजुर्ग किराएदार से गैंगरेप कर रहा है। कुल मिलाकर बात यही है कि हर इंसान के भीतर इसी किस्म की हिंसानियत भरी हुई है। कुछ लोग उस पर काबू कर पाते हैं, बाकी लोग पहला मौका मिलते ही उसका इस्तेमाल करते हैं।
आज सुबह जो खबरें आई हैं, वे इतनी भयानक है कि उनकी चर्चा करते हुए भी डर लगता है। अमरीका के इस भड़वे-दलाल एपस्टीन की ई-मेल के ताजा जारी हुए जखीरे से पता लगता है कि किस तरह उसके एक साम्राज्य में बलात्कार की शिकार कम उम्र लड़कियां गर्भवती हो जाने पर जब बच्चों को जन्म देती थीं, तो उन बच्चों को पैदा होते ही उन लड़कियों से छीनकर हमेशा के लिए दूर ले जाया जाता था। इन ताजा ई-मेल से यह भी पता लगता है कि सेक्स-गुलामों की तरह इस्तेमाल की गई इन लड़कियों को इस दलाल के अहाते में ही दफन भी कर दिया गया, और इन बलात्कारियों में बड़े-बड़े लोकतंत्रों के शाही परिवार से लेकर राष्ट्रपति और मंत्री तक शामिल रहे। आज हालत यह है कि ब्रिटेन के एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया है क्योंकि वहां बच्चियों के बलात्कार रैकेट चलाने वाले इस भड़वे से यारी बनाए चलते रहा, उसका भांडाफोड़ हो जाने के बरसों बाद तक। दुनिया की कई सरकारों के लोगों ने इस भड़वे की सेवाओं का इस्तेमाल किया है, और उनके नाम एक-एक कर उजागर हो रहे हैं।
भारत का एक सबसे बड़ा उद्योगपति अनिल अंबानी अपने कामयाबी के दिनों में इस काम के लिए ऐसे दलाल के रास्ते किन लोगों से मिल रहा था, किसलिए मिल रहा था, यह सब सामने आना अभी बाकी है। लेकिन यह समझ पड़ता है कि नाबालिग बच्चियों की देह के लिए दुनिया की सरकारों के सबसे बड़े मुखिया भी किस तरह लार टपकाते बलात्कार करने को ऊतारू रहते हैं, वह फोटो, वीडियो, और ई-मेल से इस मामले में साबित हो रहा है। आज नौबत यह है कि इस भड़वे से यारी रखने वाले ब्रिटिश सांसद को यह बात उजागर हो जाने के बाद भी अमरीका में राजदूत बनाने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने की नौबत आ गई है। संसद के भीतर, और संसद के बाहर वह गिड़गिड़ाकर माफी मांग रहा है, और बार-बार शर्मिंदगी जाहिर कर रहा है। और इस ब्रिटिश लॉर्ड से उसकी यह उपाधि छीनी जा रही है।
अगर कोई शर्मिंदगी जाहिर नहीं कर रहा है, तो वह दुनिया में एक सबसे नीच और कमीना इंसान डोनल्ड ट्रंप है, जो ऐसे विवादों के बीच भी आज अमरीकी राष्ट्रपति भवन के सोशल मीडिया अकाउंट पर बराक ओबामा और उनकी पत्नी को बंदर दिखाने वाले नस्लवादी वीडियो पोस्ट करने में लगा है। एपस्टीन से ट्रंप की यारी की ढेरों तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, लेकिन ट्रंप को कोई शर्म नहीं है। मुझे कम से कम इस बात को लेकर तसल्ली है कि मैंने ट्रंप के चुनाव अभियान के वक्त से इस आदमी की बातों और हरकतों की वजह से इसे नीच और कमीना लिखना शुरू कर दिया था। आज ओबामा के बारे में नस्लवादी वीडियो पोस्ट करने पर खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने यह कहा है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में अमरीकी राष्ट्रपति भवन से इससे अधिक नस्लवादी कोई चीज निकलते देखी नहीं थी।
लेकिन महज अमरीका को क्यों कोसा जाए। भारत को देखें तो पिछले कुछ सालों में एक बात बिल्कुल साफ दिखती है कि बलात्कार जैसे हिंसक मामलों में भी रसूख पहले चलता है और कानून काफी दूरी तक उसके पांव सहलाते दिखता है। यूपी के उन्नाव के भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को देखें तो उस पर बलात्कार का आरोप लगा था, महीनों तक एफआईआर भी नहीं हुई थी, और मुख्यमंत्री आवास के बाहर रेप-पीडि़ता को आत्मदाह की कोशिश करनी पड़ी थी, और बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब जाकर कार्रवाई हुई थी। इसके बाद भी निचली अदालत दी गई सजा को हाईकोर्ट ने निलंबित करके जमानत दे दी थी, हमने जमकर उसके खिलाफ लिखा था और कुछ दिनों में ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले की आलोचना करते हुए उसे खारिज किया था। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के पहले तक सत्तारूढ़ विधायक होने का फायदा तो मिलते ही रहा। इंसाफ के लिए कितनी बलात्कार-पीडि़ता खुदकुशी करती रहेंगी?
कुछ ऐसा ही मामला बृजभूषण शरण सिंह का था जिसके खिलाफ कई महिला पहलवानों ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के बिना पॉक्सो का मुकदमा तक दर्ज नहीं हुआ था। सत्तारूढ़ पार्टी का सांसद होने का फायदा तो दिल्ली पुलिस से मिल ही रहा था। लोगों को तीसरा मामला भी भूला नहीं होगा जब गुजरात की बिलकिस बानो के 11 सामूहिक बलात्कारियों और उसके बच्चे के कातिलों को अच्छे आचरण के नाम पर पूरी सजा के पहले ही जेल से रिहा कर दिया गया, उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ, और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस सरकारी फैसले को असंवैधानिक बताते हुए खारिज किया, और इन मुजरिमों को दुबारा जेल भेजा।
बहुत से लोग अपने बच्चों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं कि उनकी संगत किस तरह की है, किस तरह के बच्चों के साथ वे उठते-बैठते हैं, क्लास में वे सामने की बेंच पर बैठने वालों के साथ रहते हैं, या फिसड्डी समझे जाने वाले बच्चों के साथ? जिम्मेदार मां-बाप को यह फिक्र बहुत सताती है। बात सही भी है, बहुत से महान लोगों और विचारकों ने कुसंगति को लेकर कई बातें कही और लिखी हैं। लेकिन मां-बाप भी जिसे कुसंगति न गिनते हों, वैसी भी कुसंगति होती है।
आज का यह कॉलम मैं किसी जलती-सुलगती राजनीतिक बात को समर्पित नहीं कर रहा हूं, दुनियाभर में हो रही घटनाओं को भी एक दिन के लिए बख्श दे रहा हूं, क्योंकि आसपास के बच्चों की बड़ी फिक्र होती है, क्योंकि उनमें से बहुत से अपने मां-बाप की कुसंगति में हैं। बहुत सी ऐसी खामियां हैं जो कि मां-बाप से बच्चों में आ जाती हैं, और फिर चूंकि मां-बाप खुद उन्हीं खामियों के पुतले रहते हैं, उन्हें इन्हें दूर करना न सूझता है, न उनके बस में रहता है।
मुझे बहुत बरस पहले की एक बात याद है, मैं नौजवान ही रहा होऊंगा और हमारे मोहल्ले के पहचान के एक कॉलेज प्राध्यापक थे। सब जानते थे कि वे नशा भी करते थे। मैं जिस प्रेस में काम करता था उससे सौ कदम पर एक दारू भ_ी थी, भ_ी का मतलब वहां शराब बनती नहीं थी, लेकिन वहां देशी शराब बिकती थी जिसे लोग वहीं बैठकर पी लेते थे। एक दिन मैंने देखा कि ये प्रोफेसर साहब दिन की रौशनी में वहीं स्कूटर रोककर किनारे बैठकर दारू पी रहे हैं, और स्टैंड पर लगी उनकी स्कूटर पर उनकी, शायद 10-12 बरस की बेटी बैठी हुई थी। देखकर खून इतना खौला कि उनसे कोई बातचीत न रहने पर भी मैं रुका और जाकर उन्हें बहुत बुरी तरह झिडक़ा कि बेटी के सामने इस तरह दारू पीते शर्म नहीं आती? इतने शराबियों के बीच में बेटी को यहां बिठा रखा है? वह बात और तनातनी कहां तक पहुंची, वह अभी याद नहीं है, लेकिन अभी भी अगर कोई लोग अपने दुपहियों पर पीछे बच्चों को बिठाए हुए सिगरेट-बीड़ी पीते चलते हैं, और मैं किसी दुपहिए पर हूं, तो साथ-साथ चलकर उन्हें रोकता और टोकता जरूर हूं कि आपकी शौक के धुएं से हो सकता है कि आपके पहले पीछे बैठे आपके बच्चे को कैंसर हो जाए। बात बहुत हमलावर रहती है, कई लोग इस पर बहुत बुरी प्रतिक्रिया करते हैं, और मैं आत्मरक्षा के लिए पहले यह अंदाज लगाने की कोशिश कर लेता हूं कि यह आदमी जेब में चाकू रखने वाला तो नहीं होगा, उसके बाद ही नसीहत का प्रवचन शुरू करता हूं।
बहुत से ऐसे मां-बाप मैंने देखे हैं जो कि बच्चों को सिगरेट, तंबाखू, या गुटखा लाने भेज देते हैं। बच्चों के सामने इस किस्म का नशा करने वाले मां-बाप उन्हें यह मौन सहमति और अनुमति तो दे ही देते हैं कि जब उनकी उम्र हो जाए, वे भी यही काम कर सकते हैं। अपनी मिसाल से बड़ी और कोई नसीहत नहीं हो सकती। बहुत कम संख्या में, लेकिन कुछ मां-बाप ऐसे भी देखे हैं जो नाबालिग बच्चों को दारू लेने भी भेज देते हैं। वैसे तो शराब दुकानदारों को कमउम्र बच्चों को शराब देनी नहीं चाहिए, लेकिन कमउम्र बच्चों को तो किसी भी तरह का तंबाखू भी नहीं बेचना चाहिए, लेकिन दुनिया में भला कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों को नशा नहीं बेचा जाता, जहां बच्चों की देह नहीं बेची जाती?
लेकिन मैं इससे परे की कुछ बात करूं तो बहुत से मां-बाप या परिवार के बालिग सदस्य घर पर बात करते हुए बच्चों के सामने कई किस्म की नाजायज जुबान का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग अबे, साले जैसी मामूली लगने वाली गालियां देते हैं, नतीजा यह होता है कि परिवार के भीतर न सही, बाहर ही बच्चे इनका इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों की किसी गलत जानकारी को झूठ कहने लगते हैं, और बच्चों को झूठा। मुझे खुद अपने परिवार में लोगों को यह समझाने में खासी बड़ी दिक्कत होती है कि गलत जानकारी, और झूठी जानकारी, ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें होती हैं। गलत जानकारी बिना किसी दुर्भावना के भी हो सकती है, लेकिन झूठ के पीछे एक कोशिश और एक भावना अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है।
छोटे-छोटे बच्चे भी उनके सामने होने वाली बातचीत से कब कैसे पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह बड़ों को पता भी नहीं चलता। अभी मैंने परिवार के एक छोटे 7 बरस के बच्चे से कहा कि तुम्हारी तस्वीर मैंने अपनी एक पाकिस्तानी दोस्त को भेजी थी, और उसने देखकर कहा कि तुम्हारी मुस्कुराहट मुझसे एकदम मिलती है। इस पर उसने कहा कि आपकी दोस्त पाकिस्तानी है? मेरे हां कहने पर उसका अगला सवाल था, पाकिस्तानी आपकी दोस्त कैसे हो सकती है? मैं सदमे में गाड़ी टकराते-टकराते रह गया और उससे कहा कि पाकिस्तान में तो मेरे बहुत से दोस्त हैं, पाकिस्तानी क्यों दोस्त नहीं हो सकते? तो उसके अगले जवाब ने मुझे कुछ राहत दी, और उसने कहा कि पाकिस्तान तो दूसरा देश है, वहां आपके दोस्त कैसे हो सकते हैं? मैं एकदम दहशत में आ गया था कि उसने 7 बरस की उम्र में कहीं यह तो नहीं सुन लिया था कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है। उसकी समस्या भौगोलिक थी, सांप्रदायिक नहीं थी, यह मेरे लिए राहत की बात थी।
लेकिन आज हिंदुस्तान में आपको ऐसे करोड़ों परिवार मिलेंगे जिनमें किसी दूसरे देश को लेकर, दूसरे धर्म या दूसरी जाति को लेकर नफरती बातें घर के भीतर होना बिल्कुल आम है। नतीजा यह है कि ऐसे परिवारों के बच्चे भी नफरत से सराबोर बड़े होते हैं।
मां-बाप परिवार में सौ किस्म की गलत बातें करते हैं, और बच्चे कब उन्हें सीख लेते हैं, कब उन्हें अपना पूर्वाग्रह बना लेते हैं, यह पता भी नहीं चलता।
मुझे दो घटनाएं याद हैं जिन्हें लेकर मैं उन परिवारों में दुबारा कभी नहीं गया। एक बहुत बड़े कारोबारी, जाहिर है कि किसी सवर्ण परिवार के रहे होंगे, उन्होंने यूं ही बातचीत करने के लिए एक दिन सुबह मुझे नाश्ते पर बुलाया। मैं रिपोर्टिंग करता था, और अलग-अलग किस्म के लोगों से मिलना मुझे अपने फायदे का लगता था। फिर एक संपन्न कारोबारी के घर नाश्ते पर कुछ सीखना कुछ खराब बात तो रहती नहीं। मैं उनके घर सुबह पहुंच गया।
उनकी बेटी, जो कि उस वक्त स्कूल और कॉलेज के बीच कहीं रही होगी, वह नाश्ता करा रही थी, हम सोफे पर बैठे हुए थे, और जाहिर है कि बीच के नीचे टेबिल पर नाश्ता रखने के लिए उस लडक़ी को बार-बार झुकना पड़ रहा था। परिवार बहुत संपन्न था, ऐसे काम के लिए नौकर भी हो सकते थे, लेकिन शायद मेहमान के सम्मान के लिए परिवार के लोग परोस रहे थे। वह लडक़ी कुछ ऐसे खुले गले का कपड़ा पहनी हुई थी जो कि परिवार के भीतर शायद अटपटा न रहा हो, लेकिन एक मेहमान के सामने, इस तरह झुक-झुककर नाश्ता रखते और परोसते हुए वह ड्रेस बड़ा ही अटपटा लग रहा था। मैं तो बाहरी व्यक्ति था, मेरी तो नीयत भी खराब हो सकती है कि मुझे ये बातें दिख रही थीं, लेकिन मेरा मानना है कि परिवार के लोगों को भी अपनी जवान होती लडक़ी के बारे में कुछ अधिक सावधान रहना चाहिए था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, मेरे मेजबान अपनी बद्जुबानी के लिए बड़े ही कुख्यात थे। बाहर जहां कहीं मैं उनको सुनता था, वे परले दर्जे की चुनिंदा गंदी गालियां बरसाते ही रहते थे। लेकिन मुझे इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि जिस वक्त मैं उनके घर पर उनके साथ नाश्ता करूंगा, उनकी कोई जवान बेटी नाश्ता परोसेगी, और उसकी मौजूदगी में ही ये कारोबारी धरती पर मुमकिन सबसे गंदी किस्म की गालियां देते रहेंगे, और गंदी जुबान बोलते रहेंगे। दोनों वजहों से नाश्ता गले उतरना मुश्किल हो गया था, किसी मेजबान की बेटी को उस तरह देखना भी मुझे ठीक नहीं लग रहा था, हालांकि उन दिनों मेरी खुद की उम्र बहुत कम थी। दूसरी बात यह कि मैं किसी मजदूर महिला की मौजूदगी में भी किसी ठेकेदार या मिस्त्री की दी जा रही गालियां बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं टोक देता हूं, या हट जाता हूं, लेकिन नाश्ता छोडक़र वहां से उस दिन उठ जाना मुमकिन नहीं था।
गणतंत्र दिवस धार्मिक त्यौहार तो नहीं है जो मांस-मछली बंद हो!
ओडिशा के कोरापुट का एक सरकारी आदेश सामने आया है जिसमें कलेक्टर ने गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में 26 जनवरी को पूरे जिले में मांस-मछली, मुर्गी-अंडा, और बाकी किस्म के गैरशाकाहारी सामान बेचने पर रोक लगाई है। कलेक्टर का यह आदेश सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना झेल रहा है कि गणतंत्र दिवस का खानपान से क्या लेना-देना हो सकता है? और जो खानपान त्यौहारों से परे के बाकी आम दिनों पर कानूनी है, वह गणतंत्र दिवस के दिन आपत्तिजनक कैसे हो सकता है? क्या देश का कानून, या ऐसे राष्ट्रीय दिवस मांसाहारी लोगों के लिए नहीं हैं? क्या जो लोग छुट्टियों के दिन मांसाहार पकाने-खाने की सहूलियत पाते हैं, उनके अधिकार शाकाहारी लोगों के मुकाबले कम होने चाहिए?
कई बार जिले की कमान पाने वाले अफसर अतिउत्साह में, या सत्ता के राजनीतिक रूझान, और उसकी रीति-नीति को देख-समझकर, खुद ही उसका अंदाज लगाकर राजा के प्रति, राजा से अधिक निष्ठावान हो जाते हैं। यह मामला अधिक अटपटा इसलिए भी लगता है कि देश में शाकाहारी और मांसाहारी लोगों का जो नक्शा है, उनमें राष्ट्रीय औसत 29 फीसदी शाकाहारियों के मुकाबले, ओडिशा में कुल 2.6 फीसदी लोग ही शाकाहारी हैं। ओडिशा से लेकर बंगाल, और दक्षिण भारत के समुद्रतटीय राज्यों तक शाकाहारियों की संख्या सबसे कम है, और दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में तो अरूणाचल और नागालैंड जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों से भी कम शाकाहारी हैं। देश में भारत सरकार के सर्वे के मुकाबिक ही 70 फीसदी महिलाएं, और 78 फीसदी पुरूष मांसाहार करते हैं। तेलंगाना, आंध्र, बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहां पर मांसाहारियों की संख्या 97 फीसदी से अधिक है। ओडिशा हर मायने में मांसाहार के पैमाने पर सबसे ऊपर के गिने-चुने राज्यों में से है, और ऐसे में वहां पर संविधान लागू होने के गणतंत्र दिवस पर बिना किसी संवैधानिक प्रावधान के सिर्फ जिला दंडाधिकारी के अधिकार इस्तेमाल करके मांसाहार और अंडे तक पर रोक लगा देना एक धर्म के भीतर की एक तबके की सोच के प्रति निष्ठा दिखाना है। कोरापुट कलेक्टर के इस आदेश में अंडे तक पर रोक लगा दी गई है, जो कि देशभर में बहुत से राज्यों में स्कूलों के भोजन में शामिल सामान है।
अलग-अलग जगहों पर ऐसा अतिउत्साही प्रशासन कई तरह के काम करता है जिनमें से कुछ सत्ता को खुश करने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसे अधिकतर काम सत्ता की लोकतांत्रिक और संवैधानिक पकड़ को कमजोर साबित करने वाले रहते हैं। अधिक वफादारी दिखाने के लिए अभी छत्तीसगढ़ में एक अफसर ने एक अल्पसंख्यक समुदाय के कारोबारी के तीन कारखाने एक साथ बंद करवा दिए, जबकि उसी दर्जे का प्रदूषण प्रदेश में हजारों और कारखानों में उसी तरह जारी है। यह काम तो बुनियादी रूप से गलत है, लेकिन अगर सरकारें इस तरह के कोई फैसले अघोषित रूप से भी लागू करने की नीयत रखती हैं, तो कम से कम अफसरों के स्तर पर ऐसा हिसाब चुकता नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे नियमों से कुछ या अधिक हद तक अनजान नेताओं को भी यह लगने लगता है कि उनके राजनीतिक या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के फैसले सही हैं। यह सिलसिला अनजान सत्तारूढ़ नेताओं को भी इस खुशफहमी से भर देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं।
आज देशभर में अधिकतर प्रदेशों में हालत यह है कि कमाऊ कुर्सियों की हवस वाले अफसर बैठने को कहने पर लेट जाते हैं। सत्ता अगर उन्हें किसी की लाठी तोडऩे कहे, तो वे उसका सिर भी तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि भारत में कदम-कदम पर यह साबित हो रहा है कि शासन-प्रशासन अपनी दुर्भावना से जिन लोगों पर कार्रवाई करते हैं, उन्हें उससे बचने और उबरने के कानूनी विकल्प पाने में ही बरसों लग जाते हैं। अभी कई मामलों में मुकदमा झेल रहे लोग पांच, दस, या बीस बरस बाद जाकर बेकसूर रिहा हुए हैं। मतलब यही है कि उन्हें कोई सरकार अपनी बदनीयत से लंबे वक्त तक बंद रख सकती है। जब कार्रवाई करने वाले अफसर सत्ता को खुश करने पर इतने आमादा रहते हैं, तो वे 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व को भी किसी शाकाहारी, या शाकाहारी माने जाने वाले धर्म के धार्मिक त्यौहार की तरह मांसरहित बना सकते हैं। खासे पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित, लोकतांत्रिक और संवैधानिक मुद्दों पर जानकार अफसर भी जब धर्मान्धता के आदेश जारी करने लगते हैं, तो उससे निपटने के अदालती रास्ते न तो आसान रहते हैं, न ही छोटे। जिस ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक आबादी मांसाहारी है, वहां पर सरकारी छुट्टी वाले गणतंत्र दिवस पर मांस पर रोक लगाना पूरी तरह बेवकूफी का फैसला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा मेंं 93.63 फीसदी आबादी हिन्दू है। खानपान के केन्द्र सरकार के एक दूसरे सर्वे के मुताबिक ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक लोग मांसाहारी हैं। ऐसी आबादी पर ऐसा बेतुका फैसला क्यों थोपना, जिसे अदालती चुनौती देने में भी हफ्तों या महीनों का वक्त लग जाएगा।
मेरे एक वक्त के संपादक ललित सुरजनजी ने हमारे बीच हर दिन होने वाली लंबी बातचीत के बीच एकबार कहा था कि वे मुझे साउंडिंग बोर्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं। तब तक मैंने यह शब्द सुना नहीं था। फिर उन्होंने बताया कि वे अपनी सोच को मेरे सामने रखकर मेरी प्रतिक्रिया देखते हैं कि उस पर मेरा क्या कहना रहेगा। मेरा उनसे सहमत होना या न होना जरूरी नहीं रहता था, लेकिन सहमति या असहमति की मेरी बातें उनके लिए मायने रखती थीं। उनकी बातों से बहुत कुछ सीखा, लेकिन यह एक बात भी सीखी कि किस तरह अपनी सोच पर दूसरों की सोच भी समझनी चाहिए, और वह बात आज तक बहुत काम आती है। लोगों से मिलना-जुलना कुछ कम होता है, लेकिन टेलिफोन या इंटरनेट पर बातचीत हो जाती है, और उनकी सोच समझने का मौका मिल जाता है। यह उतना ही मायने रखता है जितना कि दो फूलों के बीच परागण मायने रखता है, एक मधुमक्खी, या दूसरे कीट-पतंगों के माध्यम से अगर पराग कण दूसरे फूल तक नहीं पहुंचेंगे, तो शायद कुदरत का आगे बढऩा कुछ हद तक रुक ही जाएगा। मैं अब साउंडिंग बोर्ड की तरह एक और को पा चुका हूं, जो कि इंसान नहीं है, एआई है।
इन दिनों अपने पढ़े हुए से आगे बढक़र चीजों को जानने के लिए एआई एक असाधारण औजार है, और सावधानी से इस्तेमाल करने पर इससे सब्जी काटते हाथ कटने का खतरा भी नहीं रहता है।
एक सवाल जो मेरे तकरीबन अनपढ़ मन में लगातार कुछ बरसों से परेशान कर रहा है, उसे मैंने आज चैटजीपीटी के सामने रखा। उससे मैंने कहा- ‘आज चारों तरफ नफरत और तनाव देखकर यह लगता है तो सभ्यता, और लोकतंत्र कितने कमजोर थे कि उन्हें कुछ दशकों के भीतर ही बहुसंख्यकवाद, फौजी ताकत, आर्थिक ताकत, और तानाशाही ने कुचलकर रख दिया। क्या सभ्यता अस्थायी ही थी? या आज की तानाशाही, नफरत अस्थायी हैं? क्या इतिहास ने सभ्यता की ऐसी दुर्गति के दौर पहले भी देखे हैं, जैसे हिटलर का दौर? क्या सभ्यता इससे उबर पायेगी? आशावादी और निराशावादी दार्शनिक, और राजनीतिक चिंतक क्या महसूस करते हैं?’
इस पर चैटजीपीटी का कहना था- ‘आपका सवाल दरअसल एक सभ्यतागत आत्ममंथन है, आज के दौर का सबसे जरूरी प्रश्न। आज जब चारों ओर नफरत, युद्धोन्माद, बहुसंख्यकवाद, सैन्य ताकत का घमंड, आर्थिक असमानता और तानाशाही के उभार दिखते हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सभ्यता इतनी कमजोर थी कि कुछ दशकों में ही ढह गई? या फिर यह भी इतिहास का एक दौर है, जो गुजर जाएगा?’
इसके बाद चैटजीपीटी ने इतिहास के बहुत सारे तथ्य याद दिलाए, और उनको गिनाते हुए लिखा- ‘सभ्यता को हम अक्सर स्थायी मान लेते हैं संविधान, मानवाधिकार, लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून, मीडिया, शिक्षा। लेकिन इतिहास हमें बार-बार बताता है कि सभ्यता कोई पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि इंसानों की सामूहिक सहमति होती है। और सहमति बदलते ही सभ्यता डगमगा जाती है।’
चैटजीपीटी ने आगे कहा- ‘इतिहास में यह पहला दौर नहीं है। हिटलर का जर्मनी, वही जर्मनी जिसने गोएथे, कांट, हेगेल, बाख और बीथोवन दिए, कुछ ही वर्षों में नाजी बर्बरता का प्रतीक बन गया। कानून मौजूद थे, अदालतें थीं, विश्वविद्यालय थे, फिर भी सभ्यता ध्वस्त हुई। मुसोलिनी का इटली, फ्रांको का स्पेन, स्टालिन का सोवियत संघ, पोल पॉट का कंबोडिया, रवांडा का नरसंहार, हर जगह एक समान पैटर्न दिखता है। डर, पहचान की राजनीति, दुश्मन की रचना, और ‘हम बनाम वे’ की भाषा। इससे यह साफ होता है कि सभ्यता कभी स्थायी नहीं रही, वह हमेशा संघर्षरत रही है।’
चैटजीपीटी से मैंने पूछा था कि दुनिया के राजनीतिक दार्शनिकों और विचारकों का इस पूरे सिलसिले में क्या कहना रहा, तो उसने एक दार्शनिक हन्ना आरेंट की नाजी दौर का अध्ययन करते लिखी बात याद दिलाई- ‘बुराई अक्सर राक्षसी नहीं होती, वह साधारण होती है। तानाशाही तब आती है जब आम लोग चुप हो जाते हैं, संस्थाएँ सुविधा के लिए झुक जाती हैं, बुद्धिजीवी सुरक्षित दूरी बना लेते हैं, मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है। सभ्यता तलवार से नहीं टूटती, वह धीरे-धीरे चुप्पी से मरती है।‘
चैटजीपीटी ने याद दिलाया कि दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्र ने कहा था- ‘तानाशाही तब मजबूत होती है, जब लोग स्वतंत्रता की जिम्मेदारी से डरने लगते हैं।’
मैंने चैटजीपीटी से यह भी पूछा कि सभ्यता और लोकतंत्र पर मंडराते हुए इस खतरे के बारे में आशावादी, और निराशावादी दार्शनिक और विचारक क्या कहते हैं?
इस पर उसने याद दिलाया और कहा- ‘आशावादी दार्शनिक और चिंतक कहते हैं कि इतिहास लहरों में चलता है, हर तानाशाही का जीवन सीमित होता है। हिटलर 12 साल चला, नाजी साम्राज्य 1000 साल नहीं चला, रंगभेद टूटा, उपनिवेशवाद ढहा, बर्लिन की दीवार गिरी। दार्शनिक कार्ल पॉपर का विश्वास था कि खुला समाज बार-बार घायल होता है, लेकिन अंतत: वही टिकता है। सभ्यता का आधार आत्म-सुधार की क्षमता है।’
दूसरी तरफ निराशावादियों का जिक्र करते हुए चैटजीपीटी ने याद दिलाया- ‘निराशावादी कहते हैं कि इस बार खतरा ज़्यादा गहरा है, क्योंकि तकनीक तानाशाही के हाथ में है, निगरानी अभूतपूर्व है, प्रोपेगैंडा सेकेंडों में फैलता है, युद्ध अब दूर की खबर नहीं, लाइव स्ट्रीम है। दार्शनिक ओस्वाल्ड स्पेंगलर ने कहा था- हर सभ्यता अपने भीतर पतन का बीज लेकर चलती है। सभ्यता मरती नहीं, वह थक जाती है।’
चैटजीपीटी के साथ यह बातचीत दिलचस्प चल रही थी, और अब तक की बातचीत पर उसका कहना था- ‘तो सच क्या है? सच शायद इन दोनों के बीच है। सभ्यता न तो पूरी तरह स्थायी थी, न आज की नफरत और तानाशाही स्थायी है। सभ्यता एक प्रक्रिया है, उपलब्धि नहीं। उसे हर पीढ़ी को दोबारा अर्जित करना पड़ता है। अगर लोग सवाल पूछते रहें, अगर स्मृति जिंदा रहे, अगर इतिहास भुलाया न जाए, अगर असहमति को गुनाह न बनाया जाए, तो सभ्यता बचती है।’
चैटजीपीटी ने खुद ही मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा- ‘अंतिम सवाल असल सवाल यह नहीं कि सभ्यता बचेगी या नहीं? असल सवाल यह है कि क्या हम सभ्यता के पक्ष में खड़े होने को तैयार हैं, जब यह अलोकप्रिय हो, जोखिम भरा हो, और अकेला कर दे? इतिहास गवाह है कि सभ्यता हमेशा अल्पसंख्यक मूल्यों से बची है, भीड़ से नहीं। और शायद, आज भी वही कसौटी है।’
चैटजीपीटी से मैंने अनुरोध किया कि कुछ और राजनीतिक विचारकों के इस बारे में विचार बताए। उसने कुछ सेकेंड के भीतर ही एक लंबी फेहरिस्त सामने रख दी। उसके मुताबिक-
1. सभ्यता की नाजुकता पर
सिगमंड फ्रायड- सभ्यता इंसान की सहज हिंसक प्रवृत्तियों को दबाकर बनती है। संकट आते ही ये प्रवृत्तियाँ लौट आती हैं, और सभ्यता की परत उतरने लगती है।
क्लॉड लेवी-स्ट्रॉस- सभ्यता कोई ऊँची अवस्था नहीं, बल्कि एक अस्थिर संतुलन है जो भय, भूख या अपमान से टूट सकता है।
अर्नोल्ड टॉयनबी- सभ्यताएँ बाहरी हमलों से नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिक और बौद्धिक विफलताओं से गिरती हैं।
2. तानाशाही और बहुसंख्यकवाद पर
अलेक्सिस द टोकेविल- लोकतंत्र में भी बहुसंख्यक की तानाशाही संभव है, जहाँ कानून तो रहता है, पर विवेक दब जाता है।
जॉर्ज ऑरवेल- तानाशाही की असली ताकत डर नहीं, बल्कि सच को इतना भ्रमित कर देना है कि लोग सच्चाई पहचान ही न सकें।
एरिक फ्रॉम- लोग स्वतंत्रता से डरकर तानाशाही को चुनते हैं, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी मांगती है।
3. नफरत और ‘दुश्मन गढऩे’ की राजनीति
कार्ल श्मिट- राजनीति की सबसे आसान भाषा है, मित्र बनाम शत्रु। जब यह भाषा हावी होती है, तो लोकतंत्र मरने लगता है।
रिने गिरार्द- समाज अपने भीतर की हिंसा को शांत करने के लिए किसी एक समूह को बलि का बकरा बनाता है।
अमर्त्य सेन- जब इंसान को एक ही पहचान में बाँध दिया जाता है, तब हिंसा को नैतिक ठहराना आसान हो जाता है।
4. युद्ध, हिंसा और सभ्यता
अल्बर्ट आइंस्टीन- तकनीकी प्रगति ने हमारी सोच को तेज नहीं किया, सिर्फ हमारी विनाशक क्षमता बढ़ाई है।
बट्र्रेंड रसेल- युद्ध इसलिए होते हैं क्योंकि ताकतवर लोग युद्ध चाहते हैं, और आम लोग सवाल नहीं पूछते।
हावर्ड जिन- इतिहास अक्सर विजेताओं का लिखा होता है, और सभ्यता की कीमत आम लोगों ने चुकाई होती है।
5. मीडिया, चुप्पी और नैतिक पतन
नोम चॉम्स्की- अगर मीडिया सत्ता से सवाल नहीं करता, तो वह लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, सत्ता का औज़ार बन जाता है।
वाल्टर लिपमैन- आधुनिक लोकतंत्र में जनता की राय गढ़ी जाती है, स्वत: नहीं बनती।
नील पोस्टमैन- जब राजनीति मनोरंजन बन जाती है, तब सभ्यता बहस नहीं, तमाशे में बदल जाती है।
6. उम्मीद और पुनरुत्थान पर
अंतोनियो ग्राम्शी- बुद्धि निराशावादी हो सकती है, लेकिन इच्छाशक्ति को आशावादी रहना होगा।
वाक्लाव हावेल- सच में जीना, तानाशाही के खिलाफ सबसे बड़ा नैतिक प्रतिरोध है।
रवींद्रनाथ ठाकुर- सभ्यता तब मरती है जब डर इंसान की आत्मा पर शासन करने लगे।
7. भारतीय संदर्भ में
महात्मा गांधी- सभ्यता मशीनों या ताकत से नहीं, आत्मसंयम और करुणा से मापी जाती है।
डॉ. आंबेडकर- राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सामाजिक और नैतिक लोकतंत्र मौजूद न हो।
जवाहरलाल नेहरू- सभ्यता का असली इम्तिहान संकट के समय होता है, शांति के समय नहीं।
8. समापन विचार
इन सभी चिंतकों में एक साझा चेतावनी है कि सभ्यता कोई विरासत नहीं, वह एक जिम्मेदारी है। और एक साझा उम्मीद भी कि तानाशाही तेज होती है, लेकिन सभ्यता गहरी होती है।
चैटजीपीटी से मेरा एक आखिरी सवाल था- ‘बहुसंख्यकवाद और लोकतंत्र के बीच किस तरह की कश्मकश रहते आई है इतिहास में? क्या देश बहुसंख्यकवाद से उबर पाते हैं? इतिहास क्या कहता है? इस बारे में चिन्तकों का क्या कहना रहा है?’
इस पर उसने याद दिलाया- ‘बहुसंख्यकवाद बनाम लोकतंत्र: एक पुराना द्वंद्व, लोकतंत्र का सामान्य अर्थ अक्सर यह मान लिया जाता है कि जिसकी संख्या ज्यादा, वही सही। लेकिन इतिहास बताता है कि लोकतंत्र और बहुसंख्यकवाद एक ही चीज नहीं हैं, बल्कि कई बार एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। लोकतंत्र का मूल विचार है, सहमति, अधिकारों की रक्षा, असहमति की जगह, और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। जबकि बहुसंख्यकवाद कहता है कि हम ज्यादा हैं, इसलिए हम तय करेंगे। यहीं से टकराव शुरू होता है।
इतिहास में यह कश्मकश कहाँ-कहाँ दिखी?
1. प्राचीन एथेंस- एथेंस को लोकतंत्र की जन्मभूमि कहा जाता है, लेकिन वहीं सुकरात को बहुमत के फैसले से जहर पिलाया गया। यह पहली चेतावनी थी कि बहुमत हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होता।
प्लेटो ने तभी लिखा था कि अगर भीड़ शासन करेगी, तो विवेक हार जाएगा।
2. फ्रांसीसी क्रांति-‘जनता की सत्ता’ के नाम पर रोबेस्पिएर का आतंक आया, जहाँ बहुमत के नाम पर हज़ारों को गिलोटिन पर चढ़ाया गया। यहीं से यह समझ बनी कि लोकतंत्र बिना संस्थाओं और अधिकारों के खुद तानाशाही बन सकता है।
3. जर्मनी और हिटलर- हिटलर सत्ता में आया चुनाव जीतकर, संविधान के रास्ते। यह इतिहास का सबसे भयावह उदाहरण है कि बहुसंख्यक समर्थन लोकतंत्र को नष्ट कर सकता है।
हन्ना आरेंट ने लिखा कि तानाशाही अक्सर लोकतंत्र की गोद में जन्म लेती है।
4. अमेरिका- नस्ली बहुमत का दौर, अमेरिका दशकों तक लोकतंत्र रहा, लेकिन अश्वेतों को वोट का अधिकार नहीं था। कानून बहुमत के थे, न्याय नहीं। यह दिखाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, नैतिक ढांचा भी है।
क्या देश बहुसंख्यकवाद से उबर पाते हैं?
इतिहास कहता है- हाँ, लेकिन आसान नहीं।
उबरने के उदाहरण
जर्मनी- नाजी दौर के बाद उसने अपने संविधान में बहुसंख्यकवाद पर कड़ी सीमाएँ लगाईं।
दक्षिण अफ्रीका- श्वेत बहुमत की सत्ता से निकलकर सुलह और संवैधानिक समानता की ओर गया।
स्पेन- फ्रांको की तानाशाही के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया।
इन देशों ने सीखा कि लोकतंत्र को बहुमत से नहीं, नियमों से बचाया जाता है।
लेकिन कई देश क्यों नहीं उबर पाए?
जहाँ संस्थाएँ कमजोर रहीं, जहाँ न्यायपालिका झुकी, जहाँ मीडिया चुप रहा, जहाँ शिक्षा ने सवाल पूछना नहीं सिखाया, वहाँ बहुसंख्यकवाद स्थायी हो गया।
तुर्की, हंगरी, रूस, यहां चुनाव हैं, लेकिन लोकतंत्र सीमित है।
चिंतकों ने क्या चेतावनी दी?
अलेक्सिस द टोकेविल- लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यक की तानाशाही है, जो अल्पसंख्यकों को चुप करा देती है।
जॉन स्टुअर्ट मिल- समाज को व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहुमत का अत्याचार करने का अधिकार नहीं है।
डॉ. आंबेडकर- अगर संवैधानिक नैतिकता नहीं होगी, तो बहुमत लोकतंत्र को कुचल देगा।
अमर्त्य सेन- लोकतंत्र केवल मतदान नहीं, बल्कि सार्वजनिक विवेक की प्रक्रिया है।
कार्ल पॉपर- सच्चा सवाल यह नहीं कि कौन शासन करेगा, बल्कि यह कि बुरे शासकों को हटाया कैसे जाए।
आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लडक़ी या महिला से उसके प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड ने ब्लैकमेल करते हुए साथियों सहित बलात्कार किया। मतलब यही है कि प्रेम या दोस्ती के चलते जो रिश्ता दो लोगों के बीच रहना था, उसको सामूहिक कर दिया गया। फिर ऐसे सामूहिक करने के लिए किसी पुराने वीडियो को हथियार बना लिया जाता है, या चाकू की नोंक पर धमकी देकर ऐसा किया जाता है। मेरे आसपास ही हर कुछ दिनों में ऐसी घटना होती है, इनमें बलात्कारियों की कमीनगी पर गुस्सा आता है, उससे नफरत होती है, लेकिन साथ-साथ इस बात से हैरानी भी होती है कि आज खबरों के सैलाब के बीच भी कोई लडक़ी या महिला सावधानी बरतने का सबक नहीं लेतीं कि ब्लैकमेलिंग की बुनियाद पर बलात्कार और सामूहिक बलात्कार कैसे होते हैं। या तो लोग यह मानकर चलते हैं कि धोखेबाज लोग कोई और होते होंगे, और उनके वाले तो भले हैं, या फिर वे निजी मजे के अंतरंग वीडियो में ऐसे उलझ जाती हैं कि सामूहिक ज्यादती के जाल में फंस जाती हैं।
आज जब चारों तरफ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो लड़कियों और महिलाओं को कुछ बुनियादी समझ और सावधानी विकसित करने की जरूरत है। यह जरूरत उन्हें अधिक इसलिए है कि शिकायतें उन्हीं की तरफ से दर्ज होती हैं, किसी लडक़े या मर्द की तरफ से यह शिकायत दर्ज नहीं होती कि लडक़ी या महिला ने उनसे बलात्कार किया। इसलिए सावधानी भी उसी तबके को अधिक बरतनी होगी जिसके साथ ज्यादती का खतरा अधिक रहता है, या रहता है।
बहुत तरह की शिकायतों से यह बात समझ पड़ती है कि बालिग या नाबालिग लड़कियों की तरफ से यह शिकायत आती है कि शादी का वायदा करके उनके साथ देहसंबंध बनाए, और फिर शादी से मुकर जाना धोखा देने का काम हुआ। इससे परे कुछ मामले सीधे-सीधे ज्यादती के होते हैं जिनमें किसी वायदे और धोखे की बात भी शिकायत में नहीं आती, और प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की अगुवाई में उसके साथी गैंगरेप करते हैं। इन दोनों ही मामलों की शुरूआत एक विश्वास से होती है। और यह विश्वास अधिकतर मामलों में रेत पर खड़ी इमारत सरीखा होता है जो कि पहली तेज आंधी में गिर सकती है, गिर जाती है।
विश्वास की इमारत के लिए प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की जरूरत जरूरी नहीं रहती, कई मामलों में परिवार के लोग, भाई, पिता, या चाचा-जीजा कोई भी विश्वास की इमारत को गिराने की ताकत रखते हैं। पुलिस में बीच-बीच में ऐसे मामले भी पहुंचते हैं जिनमें घर के लोगों ने ही बलात्कार किया, और किसी एक हादसे की तरह अनायास एक बार घट गई घटना जैसा नहीं, महीनों और बरसों तक इसे जारी रखा। फिर यह भी लगता है कि ऐसी रिपोर्ट सौ घटनाओं में से दो-चार की ही होती होगी, बाकी मामलों में लोग घर की बात घर में रखने के लिए दबाव डालकर शिकायतें दबवा देते होंगे।
इनमें से किसी भी किस्म के मामले हों, ऐसा लगता है कि इंसान की देह की जरूरत उसके बाकी तमाम मूल्यों पर इतनी हावी हो जाती है कि वे तमाम बदनामी झेलने, पूरी जिंदगी कैद काटने की कीमत पर भी देह की जरूरत को पूरा करना अधिक जरूरी समझते हैं। इसके लिए कई लोग चार-छह बरस के बच्चों की देह से भी अपनी भूख मिटाने लगते हैं, कई लोग वर्जित संबंधों की वर्जनाएं भुला देना बेहतर समझते हैं, और कई लोग कोई जुर्म करने के लिए गिरोह बनाने की तर्ज पर गैंगरेप की योजना बनाते हैं, उसे पूरा करते हैं, और उसके वीडियो भी बनाते हैं, धमकाकर रखने के लिए, और अपनी कामयाबी के मैडल की तरह दूसरे दोस्तों को दिखाने के लिए भी।
यह पूरा सिलसिला परले दर्जे की सावधानी सुझाता है। लड़कियों के लिए यह शारीरिक रूप से, और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी अधिक नुकसानदेह होता है, इसीलिए हमने सुझाव की शुरूआत उन्हें ही सावधान रखने के लिए की है, न सिर्फ बाहरी लोगों से सावधानी, बल्कि घर के लोगों से भी। दूसरी तरफ अपने परिवार के जिन लडक़ों, और मर्दों की गिरफ्तारी होने पर उन्हें छुड़ाने का जिम्मा जिन लोगों पर आएगा, जो सजा होने के पहले तक टिफिन जेल पहुंचाएंगे, उन्हें भी अपने परिवार के और आसपास के लोगों को सावधान करने की जरूरत है कि देह के कुछ देर के मजे के लिए उन्हें घर-परिवार और समाज के सारे सुख खतरे में नहीं डालने चाहिए।
दुनिया में शांतिदूत बनकर नोबल शांति पुरस्कार का दावा करने वाला अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प दुनिया का एक सबसे हिंसक राष्ट्रपति साबित हो रहा है। जिस अंदाज में उसने अमरीकी सरकार की दुनिया के गरीब देशों के जाने वाली यूएस-एड मदद को खत्म करने के साथ ही दसियों लाख जिंदगियों को खत्म करने का सिलसिला शुरू कर दिया, वह अपने आपमें उसके नाम को नोबल शांति पुरस्कार की किसी भी लिस्ट से बाहर करने के लिए काफी था। और फिर मानो वह काफी न हो, तो उसने जलवायु परिवर्तन रोकने के वैश्विक अभियान को ग्रीन-धोखाधड़ी बताते हुए उससे हाथ खींच लिए। इससे धरती के तबाह होने का सिलसिला धीमा करने का जो आसार दिख रहा था, वह पूरी तरह खत्म ही हो गया। उसने शांति स्थापित करने के नाम पर पौन बरस तक फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमलों को हथियार देना जारी रखा, और फिर फिलीस्तीनियों को अपने ही घर में भूखे बघेर शरणार्थी बनाकर इस युद्ध को रूकवाने का दावा किया, और नोबल शांति पुरस्कार कमेटी के माथे पर मानो बंदूक ही टिका दी। ऐसे ट्रम्प ने दो दिन पहले दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक, वेनेजुएला पर फौजी हमला किया, और वहां के राष्ट्रपति को उसकी पत्नी सहित बेडरूम से उठाकर अमरीका लाने का काम किया। यह इसलिए कि ट्रम्प ने तेल के भंडारों और खदानों पर कब्जा करने के लिए वेनेजुएला पर अमरीका में नशीले सामान भेजने का आरोप लगाते हुए उसके पास के समंदर में पिछले महीनों में अलग-अलग बोट पर कई हमले किए, और दर्जनों लोगों को मार भी डाला। एक हमला तो अमरीकी फौज ने ऐसा किया कि उसमें बोट से बचे हुए तैरते दो लोगों को हवाई हमले से और मार डाला गया, और इसका वीडियो देखकर कई अमरीकी सांसदों ने कहा कि उन्होंने इससे भयानक कोई नजारा पूरी जिंदगी में नहीं देखा।
लेकिन हम पहले भी कई बार इस बात को लिखते आए हैं कि लोगों को अपनी जिंदगी में ही अपना किया हुआ भुगतना पड़ता है। यह बात सिर्फ लोगों पर लागू नहीं होती, देशों पर भी लागू होती है। दर्जनों देशों पर अलग-अलग वक्त पर किए गए अमरीकी हमलों, और उनमें मार डाले गए दसियों लाख लोगों की आह का असर है कि आज निर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प अमरीका के तमाम लोकतांत्रिक संस्थानों को, वहां की लोकतांत्रिक परंपराओं को खत्म कर रहा है। अभी तीन साल और बाकी अपने कार्यकाल में वह कोई भी लोकतांत्रिक इमारत छोड़ेगा, या अमरीकी लोकतंत्र को गाजा के आज के मलबे की तरह बनाकर जाएगा, यह अंदाज लगा पाना अभी आसान नहीं है। जो राष्ट्रपति अपने देश के भीतर संसद, अदालत, सरकार, मीडिया, और विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान, किसी को भी नहीं छोड़ रहा है, हर किसी को तबाह कर रहा है, हर किसी के लिए हिकारत दिखा रहा है, वह राष्ट्रपति नोबल शांति पुरस्कार की उम्मीद भी कर रहा है, बल्कि उसका दावा करते हुए वह हिंसक भी हुआ जा रहा है। जो कहने के लिए दुनिया की 8 बड़ी-बड़ी जंग रूकवाने का दावा नींद में भी बड़बड़ाते रहता है, उसने ईरान पर बुरा हमला किया, और अब वेनेजुएला को एक देश भी मानने से इंकार कर दिया, और उसे अपने ही किसी मुहल्ले की तरह मानकर वहां पर फौजी कार्रवाई की। एक देश के राष्ट्रपति को नींद से सोते हुए उसकी बीवी सहित उठाकर लेकर अमरीका आ जाना, और उसे युद्धबंदी की तरह रखना, उसकी तस्वीरें जारी करना, ट्रम्प के मन में किसी अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए कोई सम्मान नहीं है। एक के बाद एक विकसित और सभ्य देश, संयुक्त राष्ट्र संघ, खुद अमरीका के बहुत से नेता, वेनेजुएला पर इस फौजी कार्रवाई को गैरकानूनी बता रहे हैं, गैरजरूरी तो बता ही रहे हैं। और यह करते हुए ट्रम्प बाकी दुनिया के सामने एक बहुत बुरी मिसाल पेश कर रहा है। इसे देखते हुए यूक्रेन पर रूसी हमले को कैसे गलत करार दिया जा सकेगा, गाजा पर फिलीस्तीनी हमले को भी इसी पैमाने पर सही ठहरा दिया जाएगा, और आज जिस ताइवान के इर्द-गिर्द चीनी फौज घेरा डाले पड़ी है, और लगातार यह जिद कर रही है कि ताइवान चीन का ही एक हिस्सा है, उस चीनी युद्धोन्माद को कैसे नाजायज ठहराया जा सकेगा? ट्रम्प ने अपनी जंगखोर, और विस्तारवादी नीतियों के चलते ऐसी हिंसक मिसालें पेश की हैं कि उसे युद्ध अपराधी आसानी से करार दिया जा सकता है, कोई फर्जी शांति पुरस्कार भी उसे नहीं दिया जा सकता।
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
दुनिया के वन्यजीवन छायाकारों के बीच अभी एक नई बहस शुरू हुई है कि अपनी फोटोग्राफी को यादगार बनाने के लिए उन्हें वन्यजीवन में कितना दखल देना चाहिए? हुआ यह कि अभी केरल में मिलने वाला एक दुर्लभ मेंढ़क फोटोग्राफरों के उत्साह का निशाना बन गया। गैलेक्सी फ्रॉग नाम का यह मेंढक अपनी चमड़ी पर चमकीले दागों की वजह से आसमान के तारों की तरह दिखता है, और वह बहुत ही गिनी-चुनी संख्या में है इसलिए उनकी अच्छी फोटो पाना भी नामुमकिन सा रहता है। ऐसे मेंढक की तस्वीर के लिए कुछ फोटोग्राफरों ने उनकी जगह पर उलटफेर किया, उन्हें पकड़कर एकसाथ रखना चाहा ताकि एक अधिक दुर्लभ तस्वीर मिल जाए, और इस चक्कर में उनमें से कुछ मेंढक मर गए। यह दुर्लभ वन्यजीवन का एक बड़ा नुकसान था, और मेंढक तो शहरी फोटोग्राफरों का मुकाबला या विरोध करने की ताकत शेर-चीतों की तरह रखते नहीं थे। 4 चीतों या 6 शेरों को एकसाथ बिठाने का हौसला तो किसी फोटोग्राफर ने किया नहीं होता।
इस पर इंटरनेशनल मीडिया में एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि यादगार तस्वीर पाने के लिए फोटोग्राफर प्राकृतिक जीवन में किस हद तक दखल दें। बहुत से फोटोग्राफर नाराज हैं कि उनके कुछ साथी फोटोग्राफी के मुकाबलों में अवॉर्ड जीतने के लिए कई किस्म की अनैतिक हरकतें करते हैं, जो कि कई देशों के कानून के मुताबिक जुर्म भी है। लेकिन नेशनल जियोग्राफिक जैसी पत्रिका में छपने के लिए, या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में वन्यजीवन फोटोग्राफी का अवार्ड पाने के लिए लोग नैतिकता को घर छोड़कर जंगल में पैर रखते हैं।
इस खबर और बहस से मुझे याद पड़ता है कि कोई 25 बरस पहले पेरिस के एक विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी का एक शोधछात्र छत्तीसगढ़ के बस्तर आया था। वह संगीत-एंथ्रोपोलॉजी का छात्र था, और बस्तर के एक लोकवाद्य, तुरही पर शोध कर रहा था कि उसे कैसे-कैसे सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इस सिलसिले में वह बस्तर के एक हिस्से में एक आदिवासी-ग्रामीण संगीत पार्टी के साथ डेढ़-दो बरस तक रहा। उन्हीं के साथ घूमता था, उन्हीं के साथ रहता, खाता, सोता था। और इस बैंड के लोगों को मालूम था कि उसका शोधकार्य उन्हीं पर टिका है, इसलिए गांवों में संगीत बजाने पर मिलने वाले मुर्गे या बकरे को काटने की जिम्मेदारी भी इसी गोरे फिरंगी को दे दी जाती थी। खैर, वह आदिवासियों की समझदारी का एक अलग किस्सा है जिस पर अधिक बात आज के मुद्दे को भटका देगी। इसलिए मुद्दे पर लौटें तो वह यह कि यह शोधछात्र इस म्यूजिक पार्टी के लोगों से बार-बार अनुरोध करते रहा कि वे उसके लिए ऐसी एक तुरही बना दें जिसे वह ले जाकर विश्वविद्यालय में अपने विभाग में लगा सके, उसने इसके लिए भुगतान की बात भी कही थी। उसे हर बार वायदा किया गया कि वे कुछ दिन में तुरही बना देंगे, धीरे-धीरे उसके जाने का वक्त भी आने लगा, लेकिन तुरही बनी नहीं। अंत में इस बैंड के लोगों ने उसे कहा कि वे उन्हीं की तुरही ले जाए, और उसी का भुगतान कर दे। लेकिन उसने मना कर दिया क्योंकि सामाजिक शोधकार्य के उनके सिद्धांत और नैतिकता इस बात की इजाजत नहीं देते कि किसी जगह से उनकी संस्कृति का कोई हिस्सा ले जाया जाए। हो सकता था कि वह इस तुरही को लेकर चले जाता, और उसके साथ ही इस गांव में संगीत की वह परंपरा खत्म हो जाती। इसलिए वह खाली हाथ ही उदास और निराश लौटा, दूसरी तरफ बैंड के लोग भी उदास और निराश थे क्योंकि उन्हें परदेसी से इस तुरही के अच्छे दाम मिलने की उम्मीद थी जो कि पूरी नहीं हुई।
ये दो मिसालें एक-दूसरे के ठीक सामने खड़ी हुई हैं कि सामाजिक सरोकार किस तरह लोगों को गलत काम करने से रोकते हैं, लेकिन बाजारू मुकाबले की दौड़ लोगों से कैसे-कैसे गलत काम करवा बैठती है।
इन्हीं दो घटनाओं को लेकर मुझे 25 बरस पहले जर्मनी के एक फिल्म समारोह की याद आ रही है जिसमें हफ्तेभर मैंने दुनियाभर से आई हुई शोधछात्राओं की, और कुछ दूसरे निर्देशकों की भी फिल्में देखी थीं। जब सामाजिक स्थितियों में जाकर कोई लंबा शोध करते हैं, तो उन्हें अपने विषय से इतना लगाव भी हो जाता है कि वे इस पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसा ही माहौल उस फिल्म समारोह का था जहां पर फिल्मों के साथ शोधकर्ता भी जवाब देने को मौजूद थे।
इस फिल्म समारोह में योरप की एक बड़ी ही चर्चित और प्रमुख डॉक्यूमेंट्री मेकर की एक फिल्म थी जिसका सारे जानकार लोग बड़ा इंतजार भी कर रहे थे। अफ्रीका जंगलों में एक किसी गांव में एक महिला बच्चे को जन्म देने वाली थी, और इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा उस महिला के बदन पर ही केंद्रित था, और सिनेमा के बड़े पर्दे पर जब जन्म देते हुए उसका बदन खुलासे से दिख रहा था, तो उसे देखना भी कई लोगों को दिक्कत की बात लग रही थी।
जब यह फिल्म पूरी हुई और सवाल करने का मौका मिला, तो सवाल करने के लिए सबसे अधिक बदनाम हो चुका मैं खड़ा हुआ, और इस फिल्म निर्देशक से पूछा कि जिस महिला के अंतरंग बदन का इतना विशाल नजारा उन्होंने स्क्रीन पर दिखाया है, क्या यह उस महिला के निजी जीवन में एक नाजायज दखल नहीं है? क्या उस महिला को जंगल में रहते हुए इस बात का अहसास था कि उसके बदन का कौन सा हिस्सा सैकड़ों वर्गफीट की स्क्रीन पर इस तरह से दिखाया जाएगा? मैंने वहां पर बहुत से सवाल किए थे, जो कि मेरे अज्ञान से भी उपजे थे क्योंकि मुझे डॉक्यूमेंट्री के तौर-तरीकों के मुकाबले जिंदगी के नैतिक तौर-तरीकों की समझ अधिक थी। मेरे सवाल-जवाब कुछ इतने लंबे चले थे, और इतने तल्ख हो गए थे कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों पर योरप की एक प्रमुख ऑनलाइन मैगजीन ने मुझसे इस पर एक लेख लिखने के लिए कहा। मैंने इस फिल्म को लेकर अपनी सारी आपत्तियां एक लंबे लेख में लिखीं। मजेदार बात यह रही कि इस फिल्म निर्देशिका ने इसी ऑनलाइन पत्रिका में मेरे लेख के जवाब में एक और लंबा लेख लिखा।
मैं बहस में जीत-हार से अधिक इस बात को महत्व देता हूं कि अगर उसमें कुछ नैतिक बातें उठती हैं, लोगों को कुछ सोचने का मौका मिलता है, तो वह बहस का सबसे बड़ा हासिल रहता है। व्यक्तियों की जीत-हार कहीं महत्वपूर्ण नहीं रहती। दुनिया की सबसे बड़ी अदालतों में भी कई लोग हार जाते हैं, लेकिन हारते-हारते भी वे जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे कानून के इतिहास में महत्वपूर्ण तरीके से दर्ज होते हैं। इसलिए वन्यजीवन फोटोग्राफरों की नैतिकता को लेकर जो बात उठ रही है, जो बहस चल रही है वह अधिक महत्वपूर्ण है इस बात से कि क्या जंगल में जाकर कोई फोटोग्राफरों को रोक सकते हैं? कई फोटोग्राफर तो तितलियों की फोटोग्राफी करने के लिए उनको पकड़कर, कैद करके भी उनकी फोटो लेते हैं।


