राजपथ - जनपथ
भूपेश सरकार ने खुदकुशी की थी?
पूर्व सीएम भूपेश बघेल का जोगी परिवार से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। और अंतागढ़ प्रकरण के बाद भूपेश की वजह से ही पूर्व सीएम अजीत जोगी, और उनके बेटे अमित को कांग्रेस से बाहर निकलना पड़ा। और अब जब अमित तो किसी तरह कांग्रेस में वापसी की कोशिश कर रहे हैं, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल रोड़ा बनते दिख रहे हैं। अमित ने तो चैतन्य की गिरफ्तारी के खिलाफ बयान जारी कर भूपेश के साथ एक तरह से पुराने विवाद को खत्म करने के लिए पहल की, लेकिन भूपेश का रुख सकारात्मक नहीं दिख रहा है। भूपेश बघेल की हाल की एक टिप्पणी पर तो अमित जोगी खासे नाराज हैं।
हुआ यूं कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने हरेली के मौके पर अपने निवास में कार्यकर्ताओं को संबोधित कर कहा था कि जिसने भी उनके परिवार को गिरफ्तार किया है, उसकी सरकार गिर गई। भूपेश ने जोगी सरकार का उदाहरण दिया, और कहा कि उनके पिता को तत्कालीन सीएम अजीत जोगी ने गिरफ्तार कराया था। जोगी सरकार चली गई। उन्होंने रमन सरकार का भी उदाहरण दिया। उस समय भी परिवार के लोगों को गिरफ्तार किया गया था, इसके बाद रमन सिंह की सरकार चली गई। पूर्व सीएम ने आगे कहा कि चैतन्य को गिरफ्तार करने वाली साय सरकार का भी यही हाल होगा।
भूपेश बघेल के बयान पर अमित जोगी बिफर पड़े हैं। उन्होंने पूर्व सीएम को नसीहत दी कि स्व. अजीत जोगी, और स्व. नंदकुमार बघेल, दोनों हमारे बीच में नहीं हैं। उनके नाम को राजनीतिक हथियार बनाना अनुचित है। उन्होंने याद दिलाया कि नंदकुमार बघेल जी, खुद भूपेश बघेल के सीएम रहते गिरफ्तार हुए थे। अमित ने पूछा कि पूर्व सीएम ने इस पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया।
उल्लेखनीय है कि नंदकुमार बघेल को ब्राम्हण समाज के खिलाफ विवादित बयान देने के आरोप में सितंबर-2021 को रायपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तीन दिन जेल में रहने के बाद तत्कालीन सीएम भूपेश बघेल के पिता जमानत पर रिहा हुए थे। यह भी संयोग है कि खुद भूपेश सरकार की भी वापसी नहीं हो पाई।
आ बैल मुझे मार
पूर्व राज्यपाल रमेश बैस को उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाने की मांग करना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को भारी पड़ गया। बैज ने इस सिलसिले में पीएम को बकायदा चि_ी भी लिखी थी। प्रदेश के कई नेताओं ने बैज की शिकायत पार्टी हाईकमान से की थी, और फिर प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने फोन पर बैज को फटकार लगाई। इसके बाद बैज को सफाई देनी पड़ी है।
बैज ने जिस अंदाज में अपनी मांग को लेकर सफाई दी है, उससे भाजपा के कुछ नेताओं का पारा चढ़ गया है। बैज ने कहा कि पूर्व राज्यपाल रमेश बैस, ननकीराम कंवर, और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को भाजपा ने मार्गदर्शक मंडल में ढकेल दिया गया है। इसलिए उन्हें दिल्ली भेजना उचित रहेगा। चंद्राकर पार्टी के मुख्य प्रवक्ता हैं, और सीनियर विधायक हैं। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने बस्तर लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उनकी पीठ थपथपाई थी। अब जब बैज ने चंद्राकर को दिल्ली भेजने की वकालत कर दी है, तो विवाद बढऩा स्वाभाविक है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बैज ने उड़ता तीर अपने पर ले लिया है।
इसे कहते हैं ग्राउंड रिपोर्टिंग

कुछ दिन पहले दिल्ली के एक न्यूज चैनल रिपोर्टर ने गले तक पानी में डूबकर न्यूज कवर किया था और बताया था कि बारिश के बाद सडक़ों का क्या हाल हो गया है। मगर, छत्तीसगढ़ में भी कम साहसी पत्रकार नहीं है। यह दृश्य धमतरी मुख्य मार्ग का है जिसके गड्ढे की गहराई और कीचड़ की परवाह नहीं करते हुए एक रिपोर्टर पालथी मारे बैठे हैं, अपनी जिम्मेदारी निभा रहे है। इंस्टाग्राम पर उनका वीडियो वायरल है। वैसे हाल ही में नगरीय प्रशासन मंत्री ने सडक़ों के गड्ढों को लेकर अफसरों को फटकार लगाई है। उन्हें चेतावनी दी है कि दो माह के बाद सडक़ में में कोई गड्ढा दिखा तो उनकी खैर नहीं। मगर, तब तक तो मॉनसून जा चुका होगा। यानि, इस बारिश में गड्ढे भरने से तो रहे। अफसरों के लिए यही चैन की बात है। वैसे भी बारिश में सडक़ का काम तो हो नहीं पाता। मटेरियल मिलता नहीं, मिलता है तो डालते ही बह जाता है। इसलिए बिना यह सवाल किए, कि बारिश से पहले इन सडक़ों की देखभाल क्यों नहीं की गई, मरम्मत क्यों नहीं हो पाई, पिछले साल का बजट कहां चला गया- अक्टूबर महीने का इंतजार करना चाहिए। शायद तब वह सडक़ सन् 2026 की बारिश तक टिकी रहे।
27 जुलाई : विश्व निशानेबाजी के नक्शे पर जसपाल राणा का पहला स्वर्णिम हस्ताक्षर
नयी दिल्ली, 27 जुलाई। देश के निशानेबाजी के इतिहास में 27 जुलाई का दिन एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब जसपाल राणा ने इटली के मिलान शहर में 1994 में 46वीं विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप के जूनियर वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया। उन्होंने रिकॉर्ड स्कोर (569/600) बनाकर तहलका मचा दिया।
विश्व निशानेबाजी के नक्शे पर जसपाल राणा का यह पहला स्वर्णिम हस्ताक्षर था। उन्होंने इसके बाद बहुत-सी सफलताएं हासिल कर देश का नाम रोशन किया, लेकिन उनका यह पहला सुनहरा कदम हमेशा यादगार रहेगा।
देश-दुनिया के इतिहास में 27 जुलाई की तारीख पर दर्ज अन्य महतवपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है।
- 1789 : पहली संघीय एजेंसी ‘द डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेन अफेयर्स’ की स्थापना।
- 1862 : अमेरिकी शहर कैंटन में तूफान का कहर, 40 हजार लोगों की मौत।
- 1888 : फिलिप प्राट ने पहले इलेक्ट्रिक ऑटोमोबाइल का प्रदर्शन किया।
- 1897 : बाल गंगाधर तिलक को पहली बार गिरफ्तार किया गया।
- 1935 : चीन की यांग जी और होआंग नदी में बाढ़ से दो लाख लोगों की मौत।
- 1982 : तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लगभग 11 साल में पहली अमेरिकी यात्रा।
- 1987 : खोजकर्ताओं ने टाइटैनिक का मलबा खोजा।
- 1994 : निशानेबाज जसपाल राणा ने विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।
- 1996 : अमेरिका के जॉर्जिया प्रांत के अटलांटा शहर में आयोजित ओलंपिक खेलों के रंगारंग कार्यक्रम के दौरान बम धमाका।
- 2003 : प्रसिद्ध हास्य कलाकार बॉब होप का निधन।
- 2006 : रूसी प्रक्षेपण यान नेपर धरती पर गिरा।
- 2024: इजराइल ने गाजा के स्कूल पर हवाई हमले किये, बच्चों समेत 30 लोगों की मौत।
- 2024: कमला हैरिस ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए आधिकारिक तौर पर उम्मीदवारी की घोषणा की। (भाषा)
खाली कुलपति-कुर्सियां, और बोली!!
छत्तीसगढ़ से कुल 11 सरकारी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर स्थानीय, और बाहरी का विवाद छिड़ रहा है। दो दिन पहले एक और विवि, पंडित सुंदरलाल शर्मा (मुक्त) विवि में प्रो. डॉ. विरेन्द्र कुमार सारस्वत को कुलपति बनाया गया, जो कि आगरा विवि के प्रोफेसर हैं। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ के सरकारी विवि में जितनी भी नियुक्तियां हो रही है, उनमें प्रदेश के बाहर के शिक्षकों को कुलपति बनाकर लाया गया है।
ज्यादातर विवि में छत्तीसगढ़ के बाहर के प्रोफेसर कुलपति के पद पर काबिज हैं। रायपुर के रविशंकर विवि में यूपी के शिक्षक डॉ. सच्चिदानंद शुक्ला, बिलासपुर विवि में भी यूपी के डॉ. एडीएन वाजपेयी, खैरागढ़ संगीत विवि की कुलपति प्रो. लवली शर्मा भी यूपी के आगरा विवि से आई हैं। बस्तर विवि में कुलपति प्रो. मनोज कुमार श्रीवास्तव, और रायगढ़ विवि के कुलपति डॉ. ललित प्रकाश पटेरिया भी छत्तीसगढ़ के बाहर के हैं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, विवेकानंद तकनीकी विवि, और गाहिरा गुरू विवि अंबिकापुर में कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है।
सरकारी विवि में स्थानीय शिक्षकों की दावेदारी को नजर अंदाज कर बाहर से नियुक्तियों पर सवाल उठ रहे हैं। पहले भी विशेषकर कुलपतियों की नियुक्ति में स्थानीय व बाहरी का विवाद सुर्खियों में रहा है। कांग्रेस सरकार के समय राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने तो सीएम भूपेश बघेल पर स्थानीय के नाम पर समाज विशेष से कुलपति की अनुशंसा करने का आरोप लगा दिया था।
सरकार बदलने के बाद भी स्थिति बदली नहीं है। खैरागढ़ में तो विवि के कर्मचारियों ने कुलपति के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। खैरागढ़ विवि की कुलपति प्रो. लवली शर्मा पर पहले ही कई आरोप लगे हैं। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने तो बस्तर विवि के कुलपति पर भर्ती में गड़बड़ी का आरोप विधानसभा में लगाया था।
खास बात यह है कि विवि के कुलपतियों की नियुक्तियों में लेनदेन का भी हल्ला है। ऐसी चर्चा है कि विवेकानंद तकनीकी विवि के कुलपति पद के लिए एक सीआर से अधिक की बोली लगाई गई है। इन चर्चाओं में कितना दम है यह तो पता नहीं, लेकिन बाहर के विवादित शिक्षकों को कुलपति बनाया जाएगा, तो सवाल तो उठेंगे ही। वैसे कुलाधिपति अब इस बात पर जोर देने लगे हैं कि प्रदेश के प्रोफेसर कुलपति बन सकें।
चेतावनी की जुबान में धोखा है

पूंजी बाजार से लोग अभी बहुत रफ्तार से रकम निकाल रहे थे, तो म्युचुअल फंड चलाने वालों ने खूब इश्तहार करके लोगों को इससे रोकने की कोशिश की। बीबीसी के अंग्रेजी वल्र्ड न्यूज पॉडकास्ट में भारत के म्युचुअलफंडसहीहैडॉटकॉम की तरफ से एक-एक इश्तहार को लगातार तीन-तीन, चार-चार बार सुनाया जाता था। अब दो दिन पहले एक अखबार में म्युचुअल फंड में पूंजीनिवेश जारी रखने का हौसला देने वाला एक इश्तहार छपवाया गया, तो उसमें जितनी चेतावनी थी, वह हिन्दी इश्तहार में भी अंग्रेजी में छपवाई गई। जब कभी किसी इश्तहार में चेतावनी को छुपाना रहता है, तो वह दूसरी भाषा में दे दिया जाता है, और देश-प्रदेश की जिन संवैधानिक संस्थाओं को ऐसी तिकड़म पर नजर रखनी चाहिए, वे मानो ऐसे इश्तहारबाजों के दिए हुए नर्म गद्दों पर सोती रहती हैं।
खेत सरीखा बैंक

लोगों को हथियारों का शौक इतना अधिक दिखता है कि अभी राजधानी रायपुर में हमारे अखबार के दफ्तर के सामने खड़ी एक नई चमचमाती गाड़ी पर मशीनगन, और रिवाल्वर दोनों के फोटो लगे हुए दिखे। सामने एक नोटिस भी लगा था कि यह गाड़ी अतिआवश्यक बैंक कार्य में लगी हुई है। गाड़ी इतनी नई थी कि सजावट की रिबन तक नहीं निकली थी, लेकिन ऐसे हथियारों की तस्वीरें सज गई थीं, जिनका इस्तेमाल बैंक सुरक्षा की ड्यूटी गार्ड नहीं करते। लेकिन इतनी बारीकी को न जानने वाले लुटेरे हो सकता है कि इन तस्वीरों से ही डर जाएं, फिर चाहे भीतर मामूली बंदूक लिया हुआ गार्ड भी न हो। जिस तरह खेतों में पंछियों को दूर रखने के लिए इंसानी कपड़े पहानकर पुतला लगा दिया जाता है, उसी तरह बैंक की गाड़ी पर भारी-भरकम ऑटोमेटिक हथियार की फोटो लगा दी गई है। न वहां खेत में खम्भे पर टंगा इंसान होता, और न यहां ऐसे हथियार हैं।
दिल्ली दौरा और फेरबदल
सीएम विष्णुदेव साय 30, और 31 तारीख को दिल्ली में रहेंगे। संसद सत्र के बीच सीएम की केन्द्रीय मंत्रियों के साथ बैठक भी है। सीएम के दिल्ली दौरे की खबर से पार्टी के अंदरखाने में हलचल है। कई लोग सीएम के दिल्ली दौरे को कैबिनेट विस्तार से भी जोडक़र देख रहे हैं। इससे पहले भी उनके दिल्ली प्रवास पर कैबिनेट फेरबदल की अटकलें लगाई जाती रही हैं। इन चर्चाओं से पार्टी के वो सीनियर विधायक परेशान हैं, जिनका नाम संभावित मंत्रियों के रूप में मीडिया में उछलते रहा है।
पार्टी के एक पूर्व मंत्री ने कुछ लोगों के बीच दर्द बयां करते हुए कहा कि आम तौर पर 20-30 लोग ही मिलने के लिए आते हैं। मगर जैसे ही मीडिया में कैबिनेट विस्तार की खबर उड़ती है, अगले दिन मुलाकातियों की संख्या बढक़र सौ-डेढ़ सौ तक पहुंच जाती है। यही हाल कमोबेश सभी सीनियर विधायकों का है।
वैसे भी भाजपा में इस बार सीनियर विधायक ज्यादा संख्या में जीतकर आए हैं, जो पहले भी मंत्री रहे हैं। इनमें अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, विक्रम उसेंडी, लता उसेंडी, और राजेश मूणत हैं। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष रह चुके धरमलाल कौशिक को मंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार माना जाता है। पद तो दो खाली हैं, लेकिन दावेदारों की संख्या अधिक होने के कारण पार्टी में काफी कुछ बातें होते रहती है। एक-दो पूर्व मंत्रियों ने तो संभावित मंत्री के रूप में बधाई देने वालों को झिडक़ भी दिया है। अब जब सीएम दिल्ली जा रहे हैं, तो भले ही कैबिनेट को लेकर हाईकमान से कोई चर्चा न हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पर बात होते रहेगी। और यह तब तक जारी रहेगा, जब तक कैबिनेट विस्तार नहीं हो जाता।
इन दो गांवों ने बदल दी विकास की परिभाषा
अपने बीच अक्सर यह सोच हावी रहती है कि अगर आदिवासी इलाकों में उद्योग लगा दिए जाएं, खनिज निकाल लिए जाएं या पर्यटन उद्योग को कंपनियों के हवाले कर दिया जाए, तो वहां के लोग विकास करेंगे। लेकिन तिरिया और इससे पहले धुड़मारास गांव ने इस सोच को पूरी तरह से गलत साबित किया है।
बस्तर के इन दोनों गांवों ने दिखाया है कि विकास का असली मतलब होता है-अपनी जमीन, जंगल, संस्कृति और जीवनशैली को बचाते हुए आगे बढऩा। तिरिया गांव की ग्रामसभा ने 3,057 हेक्टेयर वनभूमि पर सामुदायिक वन अधिकार लेकर उसे खुद संभालने का फैसला किया। उन्होंने जंगल की रक्षा की, अवैध कटाई पर रोक लगाई, पारंपरिक ज्ञान के सहारे वन प्रबंधन की एक मिसाल कायम की।
जंगल बचाने के साथ-साथ यह आजीविका और आत्मनिर्भरता की भी कहानी है। तिरिया ने लघु वनोपज को संगठित तरीके से जुटाना और बेचना शुरू किया, इको-टूरिज्म मॉडल खड़ा किया, जिससे गांव को रोजगार भी मिला और बाहरी दुनिया को बस्तर की संस्कृति से जुडऩे का मौका भी। यहां की बंबू राफ्टिंग का आनंद ही अलग है।
याद होगा, बीते साल धुड़मारास गांव को भी संयुक्त राष्ट्र ने इसी तरह के टिकाऊ पर्यटन मॉडल के लिए सम्मानित किया था। इन गांवों ने दुनिया को यह बताया है कि आदिवासी समाज का विकास मॉडल राजनेताओं, वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों की सोच से कहीं ऊंचा है।
जब सरकारें बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के साथ मिलकर आदिवासी इलाकों को विकास के नाम पर खाली कराना चाहती हैं, तब तिरिया और धुड़मारास जैसे गांव उम्मीद की किरण बनकर सामने आए हैं। क्या सरकारें इनसे सीख लेगी, और इन पर अपनी योजनाएं थोपना बंद करेंगी?
आबकारी घोटाले में रियायत?

आबकारी घोटाले की ईओडब्ल्यू-एसीबी, और ईडी पड़ताल कर रही है। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने 23 आबकारी अफसरों पर एफआईआर किया है। सरकार ने इन सभी को सस्पेंड कर दिया है। यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में एक साथ अफसरों को सस्पेंड किया गया है। मगर घोटाले के खिलाफ मुहिम चला रहे भाजपा के ही कुछ नेता इससे संतुष्ट नहीं हैं।
चर्चा है कि एक नेता ने तो बकायदा पीएमओ को चि_ी तक लिख दी है। चि_ी में यह बताया गया कि दो आबकारी अफसरों को छोड़ दिया गया है। जबकि घोटाले में उनकी भी संलिप्तता रही है। एक अफसर तो पिछली सरकार में आबकारी उडऩदस्ता के प्रभारी भी थे।
ईओडब्ल्यू-एसीबी से परे ईडी की जांच तेजी से चल रही है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र को तो ईडी गिरफ्तार कर चुकी है। कुछ, और लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। चर्चा है कि दुर्ग-भिलाई के तीन, और कारोबारियों को ईडी ने नोटिस जारी किया है। ये सभी घोटाले की राशि को इधर-उधर करने में भूमिका निभाते रहे हैं। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...

पचपेड़ी नाका के नामकरण का विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है। रायपुर नगर निगम ने पार्षद अमर गिदवानी की सिफारिश पर पचपेड़ी नाका का नाम संत गोदड़ी बाबा के नाम करने की अनुशंसा की थी। स्थानीय विरोध के बाद नामकरण प्रस्ताव को वापस भी ले लिया गया था। मगर कुछ संगठनों ने सिंधी समाज के खिलाफ अभियान चलाया, तो मामला पुलिस तक पहुंच गया।
सिंधी समाज के प्रमुख नेता पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी, चैम्बर अध्यक्ष सतीश थौरानी, पूर्व अध्यक्ष अमर पारवानी की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल ने दो दिन पहले एसएसपी लाल उम्मेद सिंह से मुलाकात की। सिंधी नेताओं ने आरोप लगाया कि सिंधी समाज के संतों, और महापुरुषों पर अशोभनीय टिप्पणी की जा रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के पदाधिकारी अमित बघेल के खिलाफ लिखित में शिकायत भी की। कुछ वीडियो भी दिए हैं। मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
अमित सोशल मीडिया में नाम बदलने के प्रस्ताव के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं। एसएसपी ने सिंधी नेताओं को आश्वासन तो दिया है कि जांच कर कार्रवाई की जाएगी। मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं होने से सिंधी समाज के नेता नाखुश हैं। सुंदरानी जैसे नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर ज्यादा है कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार होने के बावजूद कार्रवाई में देरी हो रही है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
25 जुलाई : पहले टेस्ट ट्यूब शिशु का जन्म
नयी दिल्ली, 25 जुलाई। दुनिया के इतिहास में 25 जुलाई की तारीख पर विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि दर्ज है। दरअसल इसी दिन पहले टेस्ट ट्यूब शिशु का जन्म हुआ था। इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में 1978 में दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुई ब्राउन का जन्म हुआ। लगभग ढाई किलोग्राम वजन के लुई ब्राउन मध्यरात्रि के बाद सरकारी अस्पताल में पैदा हुए।
यह प्रणाली दुनियाभर के नि:संतान दंपतियों के लिए एक वरदान साबित हुई और लुई के जन्म की खबर फैलते ही अकेले ब्रिटेन के ही लगभग 5000 दंपती ने इस नयी प्रणाली के जरिए संतान प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की। आज यह पद्धति भारत समेत दुनियाभर में प्रचलित है और हर दिन हजारों महिलाएं इसके जरिए गर्भ धारण कर रही हैं। यह जान लेना दिलचस्प होगा कि इसके बाद आईवीएफ तकनीक की सफलता की याद में हर साल आईवीएफ तकनीक से जन्मे लुई जॉय ब्राउन के जन्मदिन यानी 25 जुलाई को ‘वर्ल्ड एंब्रियोलॉजिस्ट डे’ के रूप में मनाया जाता है।
देश-दुनिया के इतिहास में 25 जुलाई की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-
- 1689 : फ्रांस ने इंग्लैंड के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।
- 1813 : भारत में पहली बार नौका दौड़ प्रतियोगिता कलकत्ता में आयोजित।
- 1837 : इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ के इस्तेमाल का पहली बार सफलतापूर्वक प्रदर्शन।
- 1943 : इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ने सत्ता छोड़ी, जिसके बाद राजा विक्टर इमैनुएल ने मार्शल पायत्रो बादोग्लिओ को नया प्रधानमंत्री बनाया।
- 1948 : आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने भारतीय टीम के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल कर रिकॉर्ड बनाया।
- 1963 : अमेरिका, रूस और ब्रिटेन ने परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए।
- 1978 : दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुई ब्राउन का इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में जन्म।
- 1994 : जॉर्डन और इजराइल के बीच 46 वर्ष से चल रहा युद्ध समाप्त।
- 2000 : एयर फ्रांस का एक कॉनकार्ड विमान उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त होकर एक होटल पर गिरा। हादसे में 109 विमान यात्रियों के अलावा होटल में मौजूद चार लोग भी जान गंवा बैठे।
- 2007 : प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
- 2020 : भारत में कोविड-19 के मामले 13 लाख के पार, मृतकों की संख्या 31,358 हुई।
- 2021 : क्रोएशिया में सड़क दुर्घटना में 10 लोगों की मौत, 45 घायल।
- 2022 : द्रौपदी मुर्मू ने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वह जनजातीय समुदाय से आने वाली देश की पहली राष्ट्राध्यक्ष और इस शीर्ष संवैधानिक पद को ग्रहण करने वाली दूसरी महिला हैं
- 2023 : भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में ऊपर उठाने की पांचवीं कवायद सफलतापूर्वक पूरी की। (भाषा)
कुर्सी है ही ऐसी, कहीं छूटती नहीं
अन्नदाता जब खेत में उतरता है, तो न धूप की परवाह करता है, ना बारिश की। न खाल झुलसने का डर, न कीचड़ में सन जाने की चिंता। उसके लिए खेत ही कर्मभूमि है, जहां वक्त पर बोनी, रोपाई, निंदाई करना आजीविका की शर्त है। तभी जाकर फसल पकती है और हम सबका पेट भरता है।
छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंत्री और विधायक खुद को किसान बताते हैं। यह बात कागज पर तो दर्ज है ही, चुनावी हलफनामों में भी है। पर जैसे ही कुर्सी मिलती है, लगता है खेतों से रिश्ता छूट जाता है।
महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की यह तस्वीर भी कुछ ऐसा ही किस्सा बयान कर रही है। खेत में कुर्सी लगाकर आरामदायक रोपाई करती दिख रहीं मंत्री जी ने शायद यह तय किया था कि कैमरे में खेत में काम करने का लुक आना चाहिए, मेहनत नहीं।
रोपाई कोई आरामकुर्सी पर बैठकर चाय पीने जैसा काम नहीं है। मगर मंत्री जी ने कुर्सी लगाई, हाथ में रोपा लिया, कैमरे की क्लिक हुई, और किसान दिखने की प्रक्रिया पूरी हो गई। विपक्ष-समर्थक और सत्ता के बड़े नेता खेत में उतरकर फोटो खिंचवा रहे हैं, तो उन्होंने भी सोचा होगा कि पीछे क्यों रहा जाए।
मगर, यह तस्वीर बता रही है कि वह जमीन से नहीं जुड़ी रह पाई। कुर्सी मंत्री को खूब भली लगने लगी है। जब कीचड़ भरे खेत में उतरने की मजबूरी हो तब भी।
नेताओं की खेती

प्रदेश में अच्छी बारिश के बाद गांवों में धान की रोपाई रफ्तार चल रही है। भाजपा, और कांग्रेस के कई नेताओं की खेत में रोपा लगाते तस्वीर वायरल हो रही है। इनमें महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े तो कुर्सी पर बैठकर रोपाई करते ट्रोल हो गईं।
दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, और गृहमंत्री रहते ननकीराम कंवर की खेती-किसानी करते तस्वीर सुर्खियों में रही हैं। ये नेता राजनीति में व्यस्तता के बाद भी समय निकालकर किसानी का काम करते रहे हैं। खुज्जी की पूर्व विधायक छन्नी साहू, तो मनरेगा मजदूर रहीं हैं, और विधायक बनने के बाद भी वो समय निकालकर खेतों में काम करने चली जाती थीं। पिछले दिनों सामरी की विधायक उद्देश्वरी पैकरा की अपने गृह ग्राम भगवतपुर में रोपा लगाते तस्वीर वायरल हुई, तो बाकी नेताओं मेें भी ऐसा करने की होड़ मच गई।
उद्देश्वरी के पति सिद्धनाथ पैकरा दो बार विधायक रहे हैं। उद्देश्वरी भी विधायक बनने से पहले भी अपने खेतों में मजदूरों के साथ काम करती रही हैं। और जब महिला मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की तस्वीर वायरल हुई, तो कई लोगों ने उनके बारे में जानकारी जुटाई। यह पता चला कि लक्ष्मी घरेलू महिला रही हैं, और विधायक बनने से पहले जिला पंचायत की सदस्य रही हंै। उन्हें खेतों में उतर कर काम करने का कोई अनुभव नहीं रहा है। उनके पति का ईंटभ_े का व्यवसाय है, और पंचायत सचिव भी थे। स्वाभाविक है कि लक्ष्मी को बैठकर रोपा लगाने में दिक्कत महसूस हुई, तो उन्होंने कुर्सी मंगवा ली। बस फिर क्या था। सोशल मीडिया में लोग चुटकियां लेते नजर आए।
कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने खेत में काम करते राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम, और लक्ष्मी राजवाड़े की तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट किया, और अंतर बताने की कोशिश की। फूलोदेवी बिना कुर्सी के रोपा लगाते नजर आ रही हैं। कांग्रेस तो सत्ता में नहीं है, ऐसे में फुलो देवी का बिना कुर्सी के रोपा लगाते फोटो खिंचवाना गलत भी नहीं है।
कलेक्टर कॉन्फ्रेंस और फेरबदल
विधानसभा का मानसून सत्र से पहले सरकार ने एक बड़ी खेप में मैदानी अमले को इधर उधर कर दिया था। और अब सत्र निपटते ही राज्य प्रशासन में फेरबदल की खबरें आ रही है। इस बार बारी आईएएस, आईपीएस आईएफएस की होगी। लेकिन यह फेरबदल अभी नहीं कलेक्टर कॉन्फ्रेंस के बाद ही होने के संकेत हैं।
सीएम ने कल ही एक बैठक में कॉन्फ्रेंस आयोजित करने अपने सचिवों को निर्देशित किया है। इसमें बजट के बाद से कलेक्टरों और फिर सत्र में मंत्रियों के जरिए उनके सचिवों के परफार्मेंस का भी आकलन हो जाएगा। कुछ सचिव दोहरे तिहरे प्रभार में भी है। इतना ही नहीं नए निगम मंडल अध्यक्षों की भी अपने एमडी से पटरी नहीं बैठ रही।
कुछ ने तो नए नाम भी सरकार तक पहुंचा दिए हैं। इसी दौरान जिले वार कानून व्यवस्था की भी समीक्षा होनी स्वाभाविक है और एसपी आईजी भी बदले जाएंगे। इसे देखते हुए हाल में पदोन्नत की हरी झंडी हासिल करने वाले रापुसे के तीस अफसर भी जोड़ तोड़ में लग गए हैं। बड़े न सही छोटे जिलों में एसपी तो बन ही सकते हैं।
हाथी की सूंड में, मासूम की चीख
रायगढ़ सहित छत्तीसगढ़ के जिन जिलों को वन संपदा का वरदान मिला था, वहां अब यह शाप बन रहा है।
धर्मजयगढ़ के एक गांव में घुसे हाथी, घरों को तोड़ते हुए तीन लोगों की जान ले गए। तीन साल का मासूम सत्यम, जिसे शायद यह भी नहीं पता होगा कि हाथी क्या होता है, अपने ही घर में जान गवां बैठा। हाथी ने उसे रोता देख सूंड से उठाकर पटक दिया। एक महिला, खेत में काम करती हुई, जंगल और वन्य जीवों के बीच बिगड़ते संतुलन की कीमत चुका गई। एक और व्यक्ति, अपने ही घर में मलबे के नीचे दब गया, जिसे हाथी ने ढहा दिया था। यह सब एक ही रात में हुआ।
सरकार और प्रशासन की कथनी और करनी के बीच की खाई में आज इंसान और हाथी दोनों फंस चुके हैं। वन विभाग मॉनिटरिंग और सतर्कता की दुहाई देता है, पर हाथियों के हमले ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। जंगल को उद्योगपतियों के हवाले किया जा रहा है और हाथियों से कहा गया है, रास्ता बदलो। चाहे उस रास्ते में पडऩे वाले आदिवासियों को जान गंवानी पड़े, खेत बाड़ी नष्ट हो जाए। जानकार बताते हैं कि हाथी पचासों साल की स्मृतियों को अपने साथ लेकर चलता है। उन रास्तों को उजड़ता पा रहे हैं और बेचैन हैं। आज हालात ये हैं कि छत्तीसगढ़ के प्रभावित गांवों में ग्रामीण रात को यह सोचकर सो रहे हैं कि अगली बारी उसकी तो नहीं?
सोशल मीडिया की ताकत के आगे सत्ता का सरेंडर
कभी-कभी सोशल मीडिया सिर्फ लाइक-शेयर की दुनिया नहीं होती, बल्कि यह सत्ता के कान खींचने का तरीका भी बन जाती है। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के खड्डी खुर्द गांव की 22 वर्षीय लीला साहू ने यह साबित कर दिया। नौ महीने की गर्भवती लीला ने अपने गांव बगैया टोला से गजरी तक की 10 किलोमीटर की टूटी-फूटी सडक़ को लेकर ऐसा तूफान खड़ा किया कि नेताओं को मजबूरन झुकना पड़ा।
लीला पिछले साल से सडक़ की दुर्दशा पर आवाज उठा रही थी। गर्भवती महिलाओं के लिए एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाती थी। प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय सांसद तक, सबको टैग कर-करके उन्होंने वीडियो डाले, पर सबने प्रक्रियाधीन वाले वादों में उलझा कर रखा। इस बार बारिश ने सडक़ को दलदल बना दिया और लीला का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सांसद राजेश मिश्रा पर तंज कसा- जब सडक़ बनवाने की ताकत नहीं थी, तो वोट के समय वादा क्यों किया?
वीडियो वायरल हुआ, लेकिन नेताओं के बयान आग में घी डालने जैसे थे। सांसद बोले-डिलीवरी की तारीख बताओ, एक हफ्ता पहले हेलीकॉप्टर से उठा लेंगे। मंत्री राकेश सिंह ने व्यंग्य कसा था- क्या हर सोशल मीडिया पोस्ट पर डंपर लेकर निकल जाएं?, लीला ने पलटवार किया- किस-किस को हेलीकॉप्टर से उठाएंगे? हमें सडक़ चाहिए!
सोशल मीडिया पर लोगों के समर्थन तूफान ला दिया और 21 जुलाई को चमत्कार हो गया। जेसीबी और रोलर सडक़ पर उतर आए। हालांकि यह काम बिना किसी टेंडर के शुरू हुआ। कांग्रेस विधायक अजय सिंह ने दावा किया कि उन्होंने अपनी निधि से काम शुरू करवाया। भाजपा की ओर से कहा गया कि यह सांसद की मेहनत का नतीजा है। जो भी ले श्रेय, सडक़ बन रही है। मगर, लीला अभी भी चुप नहीं है। उसने कहा है कि हम अब सडक़ की क्वालिटी पर भी नजर रखेंगे।
लीला ने बता दिया कि सोशल मीडिया की ताकत से जनता बदलाव ला सकती है। सत्ता सुख में डूबे अहंकार को झुकने पर मजबूर कर सकती है।
एक अनार सौ बीमार

विधानसभा के कई सीनियर अफसर इस साल रिटायर हो रहे हैं। इनमें विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा भी हैं, जो कि नवंबर में रिटायर हो जाएंगे। हालांकि अब तक के जितने भी सचिव हुए हैं, उन सभी को रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन मिला है। दिनेश शर्मा की साख भी अच्छी है, लेकिन उनका क्या होता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। मगर सीनियर अफसरों की कुर्सी को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है।
दिनेश शर्मा के ठीक नीचे पद पर आरके अग्रवाल हैं, जो कि अपर सचिव के पद पर हैं। आरके अग्रवाल भी सितंबर में रिटायर होने वाले हैं। चर्चा है कि अग्रवाल भी एक्सटेंशन चाहते हैं। इन सबके बीच लोकसभा सचिवालय के अफसर अभय श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ विधानसभा में उप सचिव के पद पर हैं। श्रीवास्तव को पूर्व स्पीकर डॉ. चरणदास महंत लेकर आए थे। श्रीवास्तव की प्रतिनियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद एक साल का एक्सटेंशन मिला हुआ है। हल्ला है कि वो यहां संविलियन चाहते हैं। हालांकि इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है। यदि संविलियन होता है, तो वो भी शीर्ष पद के दावेदारों में शामिल हो जाएंगे। ये अलग बात है कि इसमें स्थानीय-बाहरी का भी पेंच फंसा हुआ है।
श्रीवास्तव से ऊपर अतिरिक्त सचिव श्रीमती विनीता वाजपेयी भी हैं। विनीता वाजपेयी दिवंगत स्पीकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की पुत्री भी हैं। विनीता वाजपेयी अगले साल रिटायर होंगी। वो विधानसभा की पहली महिला सचिव भी हो सकती हैं। कुल मिलाकर राज्य सचिवालय की तरह विधानसभा सचिवालय के शीर्ष पदों पर पदस्थापना को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
पुराना नेता गच्चा खा गया !!

भाजपा की एक खबर ने पार्टी रणनीतिकारों को परेशान कर रखा है। हुआ यूं कि कोंडागांव भाजपा के एक बड़े नेता संतोष कटारिया को खनिज निगम का अध्यक्ष बनाने के लिए कुछ लोगों ने 41 लाख रुपए ठग लिए। कटारिया ने इसकी शिकायत पुलिस में भी की है, और पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर जांच कर रही है।
कांग्रेस में तो ऐसे प्रकरण आते रहे हैं। पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल ने टिकट के लिए तत्कालीन प्रभारी सचिव चंदन यादव पर 7 लाख रुपए लेने के आरोप लगा दिए थे। डॉ. जायसवाल को पार्टी से सस्पेंड भी किया गया था। बाद में उन्होंने माफी भी मांग ली थी। मगर भाजपा में पद के लिए लेनदेन की लिखित शिकायत पहली बार सामने आई है।
हालांकि भाजपा में विधानसभा चुनाव से पहले टिकट दिलवाने के लिए खुद को आरएसएस का पदाधिकारी बताकर मध्यप्रदेश के एक व्यक्ति द्वारा एक-दो दावेदारों से पैसे ऐंठने के मामले की काफी चर्चा रही। मगर यह मामला पुलिस तक नहीं पहुंचा। इस बार भी निगम-मंडल ने पद के लिए कई लोगों ने दिल्ली, नागपुर तक दौड़ लगाई थी। इनमें से कई को निराशा हाथ लगी है। मगर संतोष कटारिया के प्रकरण से पार्टी के रणनीतिकार चिंतित हैं। कुछ लोग इसे डिजिटल अरेस्ट के नाम पर उगाही करने सरीखा बता रहे हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
कांग्रेस का चक्का जाम, भाजपा का रिवर्स गियर
कांग्रेस आज जनता के बीच सडक़ों पर उतरी है, मगर भाजपा ने एक दिन पहले पूरे विमर्श को ही पलट देने की जबरदस्त कोशिश की। उसने हर जिले में अपने मंत्रियों, विधायकों और प्रवक्ताओं को प्रेस के सामने उतार दिया। कांग्रेस ने चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को इस बात से जोड़ा है कि भूपेश बघेल विधानसभा में तमनार में कोयला खनन के लिए पेड़ों की कटाई का मुद्दा उठाने वाले थे, इसलिए ऐसा किया गया। भाजपा ने अपनी पत्रकार वार्ता में ईडी की कार्रवाई से अधिक तूल इस बात को उजागर करने पर दिया कि अपने कार्यकाल में भूपेश सरकार ने अडाणी के प्रति कितना प्रेम प्रदर्शित किया था। हसदेव में पेड़ों की कटाई और कोल ब्लॉक की मंजूरी में भूपेश बघेल सरकार की भूमिका को भाजपा ने दस्तावेजों के साथ सामने रखा। उस बयान को खूब उछाला, जब सीएम रहते हुए उन्होंने कहा था कि बिजली चाहिए तो कोयले का खनन करना ही पड़ेगा, जो चाहते हैं कि कोयले के लिए पेड़ न कटे उन्हें अपने घरों की बिजली बंद कर देनी चाहिए।
कांग्रेस ने चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को केवल ईडी की मनमानी कहने के बजाय, तमनार में हो रही पेड़ों की कटाई और अडाणी के कोयला ब्लॉक से जोड़ा। ऐसा करके चैतन्य की गिरफ्तारी को जनसरोकार और पर्यावरण की लड़ाई में बदलने का उद्देश्य रहा होगा। पर भाजपा ने एक दिन पहले पलटवार कर दिया। भाजपा ने बघेल को उसके ही पुराने रुख से घेरने की कोशिश की। हसदेव आंदोलन के दौरान बघेल सरकार की चुप्पी, विरोध करने वालों को अनदेखा करना और खनन परियोजनाओं को मंजूरी देना, ये सब एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच और उस वक्त के आंदोलनकारियों के बीच भी। भाजपा यह बताने में कामयाब दिख रही है कि जब सरकार थी, तब उनका यह विरोध कहां था? क्या केवल ईडी के विरोध में चक्का जाम किया जाता तो भाजपा को ऐसा मौका मिलता?
भारतमाला जांच और केस
रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला प्रोजेक्ट की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी कर रही है। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने विधानसभा प्रकरण को पुरजोर तरीके से उठाया था। सरकार ने भी माना था कि अपात्र लोगों को मुआवजा मिल गया, और अधिक भुगतान भी हुआ। जांच का हाल यह है कि प्रकरण टांय-टांय फिस्स होता दिख
रहा है।
जांच एजेंसी ने जिस जमीन कारोबारी हरमीत खनुजा को मुख्य आरोपी बताया है, उसे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। यही नहीं, उमा, और केदार तिवारी, जिन पर धोखाधड़ी कर मुआवजा लेने का आरोप है, वो भी जमानत पर रिहा हो गए। बाकी बचे प्रशासनिक अफसर, वो फरार हैं।
यानी छह महीने की कसरत के बाद भी जांच एजेंसी के हाथ खाली हैं। जो सफलता एजेंसी को शराब, और कोयला घोटाले में मिली थी। वैसा कुछ एजेंसी के अब तक हाथ नहीं लग पाया है। हालांकि रायपुर कमिश्नर ने एक और जांच बिठाई है। यह जांच चल रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ईओडब्ल्यू-एसीबी एक और प्रकरण दर्ज कर सकती है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
पार्टी ने वाड्रा को मुद्दा नहीं बनाया था
शराब घोटाला केस में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य की गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है। मगर हाईकमान का रुख इस मामले में ठंडा दिख रहा है। अलबत्ता, पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीट कर भूपेश परिवार के प्रति समर्थन जरूर जताया है, लेकिन बाकी बड़े नेता खामोश हैं।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल सोमवार को दिल्ली में थे, और उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से मुलाकात हुई थी। खडग़े का कल जन्मदिन था, और पूर्व सीएम ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। कहा जा रहा है कि चैतन्य की गिरफ्तारी के मसले पर कोई बात नहीं हुई। प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट चुप हैं। राहुल गांधी ने गिरफ्तारी के बाद पूर्व सीएम से फोन पर बात की थी, लेकिन सार्वजनिक तौर पर वो भी कुछ नहीं कह रहे हैं। उम्मीद थी कि एआईसीसी में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस होगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ।
पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि खुद राहुल गांधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा पिछले 10 साल से ईडी, और इनकम टैक्स के चक्कर लगा रहे हैं। मगर पार्टी इसको राजनीतिक मुद्दा बनाने से परहेज किया। पार्टी के कई लोगों का मानना है कि चैतन्य के मामले को ज्यादा तूल देने से भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी की लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में रोजमर्रा के धरना-प्रदर्शन के बजाए कानूनी लड़ाई लडऩा ही उचित होगा। देर सबेर पार्टी इससे दूरी बना सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
अमित का हाथ, चैतन्य के साथ !!
शराब घोटाला केस में चैतन्य की गिरफ्तारी का जनता कांग्रेस के मुखिया अमित जोगी ने भी विरोध किया है। उन्होंने चैतन्य की गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित करार दिया है। अमित, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के धुर विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में उनके चैतन्य के समर्थन में आने पर राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा हो रही है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है, कि जोगी कांग्रेस में आना चाहते हैं। उन्होंने तो पार्टी का कांग्रेस में विलय की भी घोषणा कर दी थी, लेकिन चर्चा है कि पूर्व सीएम के विरोध के चलते जोगी परिवार की कांग्रेस में वापसी नहीं हो पाई। अब जब अमित जोगी, बघेल परिवार के समर्थन में आगे आए हैं, तो पूर्व सीएम का जोगी परिवार के प्रति रुख बरकरार रहता है या फिर कोई परिवर्तन आएगा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
हमारी जमीन, तुम्हारा दफ्तर! अब बर्दाश्त नहीं..

1978 में जब कोल इंडिया ने एसईसीएल का गठन किया, तब यह तय हुआ था कि जिनकी जमीन जाएगी, उन्हें मुआवजा और नौकरी दोनों मिलेंगे। लेकिन यह व्यवस्था कागजों तक ही सीमित रही। कोरबा की कुसमुंडा और गेवरा जैसी खदानों के लिए जब जमीन का अधिग्रहण शुरू हुआ, तो सैकड़ों बाहरी लोग रहस्यमयी तरीके से जमीन के मालिक या मालिकों के रिश्तेदार बन बैठे और नौकरियों पर कब्जा कर लिया। असली जमीन मालिक,स्थानीय आदिवासी, किसान और गरीब परिवार- कागज, पटवारी और दलालों के खेल में पछाड़ खा गए।
उस वक्त भू-अर्जन अधिकारी कलेक्टर होते थे और पूरे खेल की चाभी तहसीलदार और पटवारी के हाथ में होती थी। नीति यह थी कि तीन एकड़ जमीन पर एक नौकरी, और जिनके पास इससे कम जमीन हो, उन्हें भी नौकरी के साथ मुआवजा मिलेगा। मगर वही हुआ था जो आज रायगढ़, बिलासपुर और अभनपुर की भारतमाला परियोजनाओं में हो रहा है। उस वक्त के एसईसीएल और कोल इंडिया के अफसरों ने फर्जी रिश्तेदार पैदा करने और नौकरियां दिलाने में खुद मदद की और अपने-अपने इलाके के लोगों को भर लिया।
सैकड़ों विस्थापितों ने अदालती लड़ाई लड़ी, कुछ को राहत मिली, पर एसईसीएल ने आनाकानी की। तीन दिन पहले कुसमुंडा खदान के बाहर विस्थापित महिलाओं का प्रदर्शन इसी लंबी लूट के विरोध में था। थकी-हारी महिलाएं कंपनी दफ्तर के मेन गेट पर पहुंचीं, अपनी पीड़ा को सामने लाने के लिए उन्होंने लाज के आखिरी छोर पर साडिय़ां तक उतार दीं। न तो प्रशासन शर्मिंदा हुआ, न एसईसीएल का प्रबंधन। जो सफाई बार-बार दी जाती थी, वही दी गई- जो फाइल राजस्व विभाग ने दी, हमने उसी के आधार पर नौकरी और मुआवजा दिया। लेकिन महिलाएं कह रही थीं, हमारी ज़मीन पर दूसरों को नौकरी मिल गई, और हमारा परिवार आज तक ठोकरें खा रहा है।
इस प्रदर्शन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी महिलाओं से कह रहे थे- यह कंपनी का दफ्तर है, तुम्हारा घर नहीं कि ऐसे घुसकर हंगामा करो!
महिलाएं आगबबूला हो गईं। ये जमीन हमारा है, तुम हटो यहाँ से! हमने जमीन दी, तुमने दफ्तर बना लिया और अब हमें ही हटने के लिए कह रहे हो?
जवाब किसी के पास नहीं था। अफसर चुप रहे, कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। महिलाएं लौट गईं। पर सवाल वहीं छोड़ गईं कि वे अपने हक के लिए कब तक लड़ पाएंगीं?
चर्चा में कम, पर बड़ा विस्फोटक है
शराब घोटाले के हो-हल्ले, और कार्रवाई के बीच राजीव भवन के कर्मचारी देवेन्द्र डड़सेना की गिरफ्तारी पर ज्यादा कोई चर्चा नहीं हो रही है। देवेन्द्र पांच दिन की ईओडब्ल्यू-एसीबी के रिमांड पर हैं। चर्चा है कि देवेन्द्र ने पूछताछ में कई ऐसे राज उगले हैं जिससे आने वाले दिनों में कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती है।
चर्चा है कि देवेन्द्र से पूछताछ के बाद कुछ और लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। देवेन्द्र को कांग्रेस के प्रदेश कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल का राजदार माना जाता है। वो रामगोपाल के सहयोगी के रूप में राजीव भवन में बतौर एकाऊंटेंट के तौर पर काम करते रहे हैं। जिस दिन रामगोपाल के यहां कार्रवाई हुई, तब देवेन्द्र भी गायब हो गए।
ईओडब्ल्यूृ-एसीबी ने उन्हें ढूंढ निकाला। बताते हैं कि देवेन्द्र के पास चुनावी चंदे से लेकर राजीव भवन के निर्माण के खर्चों की बारीक जानकारी है। देवेन्द्र न सिर्फ राजीव भवन बल्कि रामगोपाल के कारोबार का भी लेखा-जोखा रखते हैं। सुकमा में राजीव भवन के निर्माण में शराब घोटाले का पैसा लगने की बात पहले ही सामने आ चुकी है, और ईडी ने भवन को अटैच कर दिया है। न सिर्फ सुकमा बल्कि प्रदेश के ज्यादातर जिलों में रामगोपाल की निगरानी में राजीव भवन का निर्माण हुआ था। ईडी और ईओडब्ल्यू-एसीबी, दोनों जांच एजेंसी की नजर रामगोपाल के मार्फत हुए निर्माण कार्यों-खर्चों और जुटाए गए चंदों पर है। हल्ला तो यह भी है कि देवेन्द्र के रूप में जांच एजेंसी को एक ‘मास्टर की’ मिल गई है। देखना है घोटाले की जांच में जुटी एजेंसियों के लिए कितने मददगार साबित होते हैं।
प्रकृति की गोद में रोमांच और सुकून

अगर आप प्रकृति की शांति में कुछ पल बिताने और रोमांच से भरपूर यात्रा का अनुभव लेना चाहते हैं, तो रायपुर से लगभग 89 किलोमीटर दूर, महासमुंद जिले का धसकुड़ जलप्रपात एक बेहतरीन विकल्प है। सिरपुर से सिर्फ 7 किलोमीटर दूर ग्राम बोरिद में स्थित यह झरना, पहाड़ की ऊंचाई से गिरती सफेद जलधारा और चारों ओर फैली घनी हरियाली के साथ एक जीवंत चित्र की तरह प्रतीत होता है।
इन दिनों यह पर्यटकों को खूब लुभा रहा है। कैमरों में इसकी खूबसूरती को कैद करने लोग दूर-दूर से पहुंच रहे हैं। सिरपुर-कसडोल मार्ग से एक मोड़ पर दाईं ओर मुडऩे के बाद मुख्य सडक़ खत्म हो जाती है और रोमांच की असली शुरुआत होती है।
पथरीले पहाड़ी रास्ते किसी ट्रैकिंग ट्रेल जैसे लगते हैं। झरने के निचले हिस्से तक पहुंचने के लिए साहसिक चढ़ाई करनी होती है। यह जगह साहसिक यात्राओं के शौकीनों के लिए तो स्वर्ग है, लेकिन बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए यह ट्रैक थोड़ा कठिन और जोखिम भरा हो सकता है। (फोटो-विवरण/गोकुल सोनी)
13,000 को मिलने जा रहा बड़ा लाभ
केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देश पर गृह मंत्रालय ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। इसमें उसने कहा है कि वह ऐसी प्रतिनियुक्तियों में क्रमिक रूप से कमी करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकतम दो वर्ष के भीतर आईपीएस अफसरों की इन बलों में घुसपैठ कम करने कहा है। खासकर आईजी स्तर पर। इस कमी के बाद इस फैसले से केंद्रीय बलों के मूल 13,000 अधिकारियों को लाभ मिलने की संभावना है, जो अपने कैडर के भीतर एक संरचित पदोन्नति मार्ग की उनकी मांग को प्रभावी मान्यता देगा है।
बता दें कि गृह मंत्रालय आईपीएस और सीएपीएफ दोनों अधिकारियों के लिए कैडर-नियंत्रण प्राधिकरण है। वैसे यह केस बीते 10 वर्ष से चल रहा है। यह मामला 2015 का है, जब सीएपीएफ के ग्रुप ए अधिकारियों ने गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू), कैडर समीक्षा, पुनर्गठन और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने और एसएजी में आंतरिक पदोन्नति को सक्षम करने के लिए भर्ती नियमों में बदलाव की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
वर्तमान में, सीएपीएफ में डीआईजी के 20 प्रतिशत और आईजी के 50 प्रतिशत पद आईपीएस के लिए आरक्षित हैं। यदि लागू किया जाता है, तो 23 मई के फैसले से सीएपीएफ में आईपीएस का प्रभुत्व काफी कम हो जाएगा, जिसमें सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस शामिल हैं।
जवानों के सोशल मीडिया पेज डिलीट
बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों की सफलता के लिए रणनीतिक गोपनीयता आवश्यक है। यही कारण बताते हुए सुरक्षाबलों को सोशल मीडिया और इंटरनेट से पूरी तरह दूर रहने को कह दिया गया है। यदि कोई एकाउंट है तो उसे डिलीट कर दें। अफसरों के मुताबिक इससे संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने और जवानों की सुरक्षा पर खतरे की आशंका को टालने में मदद मिलेगी।
बस्तर के बीहड़ और दूरदराज जंगलों में तैनात जवान कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। इलाका भौगोलिक और जलवायु चुनौतियों से भरा है, वहीं दूसरी ओर अब मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाएं हाल के वर्षों में वहां पहुंचनी शुरू हुई हैं। इन तकनीकी माध्यमों के जरिए जवान अपनी ड्यूटी के दौरान थोड़े खाली समय में अपने परिवारों से जुड़ पाते थे, दोस्तों से संवाद कर पाते थे, और थोड़ी मानसिक राहत के लिए संगीत, समाचार या मनोरंजन के ज़रिए खुद को तनाव से दूर रख पाते थे। बस्तर में तनाव के कारण कई बार जवानों ने आत्मघाती कदम उठाए हैं। हालांकि ऐसा कोई रिसर्च नहीं है कि सोशल मीडिया संवाद से जुड़े रहने के बाद उनके तनाव में कोई कमी आई है, पर अपने परिवार-दोस्तों से सैकड़ों मील दूर रहने वाले जवानों के लिए यह मन बहलाव का जरिया तो है ही। जवान तो आदेश का पालन करेंगे, उनकी ट्रेनिंग भी ऐसी ही होती है। पर सभी तरह के सोशल मीडिया एकाउंट बंद करा देने का निर्देश क्या व्यावहारिक है? क्या तकनीकी जानकारों से मदद लेकर उनके लिए सेफ सर्फिंग की कोशिश नहीं हो सकती। अब तो लगभग सभी सोशल मीडिया एकाउंट्स एक्स (ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर ऐसे फीचर आ गए हैं कि आपकी एक्टिविटी को सिर्फ वे ही देख सकते हैं, जिन्हें आप चाहें। कुछ शर्तें भी तय की जा सकती हैं कि जवान क्या पोस्ट करें, क्या नहीं। कौन सी सूचना सोशल मीडिया पर साझा करें, कौन सी नहीं।
पप्पू बंसल कमजोर कड़ी?
आबकारी घोटाले की परतें खुलने लगी है। इस प्रकरण में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इन सबके बीच एक चर्चा यह भी है कि पूर्व सीएम के करीबी पप्पू बंसल सरकारी गवाह बन सकते हैं।
दरअसल, बंसल के बयान के बाद ही चैतन्य की गिरफ्तारी हुई है। इसके बाद से भूपेश बघेल अपने पुराने सहयोगी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद भी पप्पू बंसल को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है। पूर्व सीएम ने यह भी कहा कि पप्पू बंसल का ईडी दफ्तर आना-जाना है।
बताते हैं कि ईडी भूपेश के दो करीबी विजय भाटिया, और पप्पू बंसल पर काफी पहले से नजर रखे हुए थे। भाटिया तो ईडी की गिरफ्त में है, लेकिन उनसे ज्यादा कुछ उगलवा नहीं पाई है। मगर पप्पू बंसल से पूछताछ में काफी कुछ नई जानकारी सामने आई है।
पेेशे से बिल्डर पप्पू बंसल, भूपेश बघेल के राजनीतिक जीवन के शुरूआती दौर से जुड़े रहे हैं। उनका चुनाव मैनेजमेंट भी पप्पू बंसल ही देखते थे। जांच एजेंसी ने पप्पू बंसल के अलावा सरायपाली में रहने वाले उनके रिश्तेदारों के यहां भी दबिश दी थी। इसके बाद से पप्पू से काफी कुछ जानकारी जुटाने में ईडी सफल रही है। पप्पू बंसल की गिरफ्तारी न होना इस बात को इंगित कर रहा है कि वो सरकारी गवाह बन सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो चैतन्य के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है। वाकई ऐसा होगा यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
तारीफ़ में कोई तंगदिली नहीं
सीएम विष्णुदेव साय की एक विशेषता है कि वो अच्छे कामों पर अपने सहयोगियों का सार्वजनिक तौर पर तारीफ करने से नहीं चूकते हैं, और उनकी हौसला अफजाई करते हैं।
शनिवार को एक निजी कार्यक्रम में सीएम ने अपने साथ मंच पर मौजूद डिप्टी सीएम अरूण साव की खुले तौर पर तारीफ की। उन्होंने कहा कि साव के कार्यों का प्रतिफल है कि प्रदेश के सात नगरीय निकायों को स्वच्छता में ईनाम मिला है।
साय यही नहीं रूके, उन्होंने कहा कि नगरीय निकाय चुनाव के पहले सभी निकायों को विकास कार्यों के लिए धनराशि देकर विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाई। नगरीय निकाय चुनाव में जीत मिली। उन्होंने डिप्टी सीएम के लिए मंच से ताली बजवाई। डिप्टी सीएम अरूण साव ने खड़े होकर सबका अभिवादन भी किया। इसके बाद से सरकार और संगठन में सीएम के सबसे निकट कौन हैं, इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गईं हैं।
परिंदों का प्रेमालाप

इस तस्वीर में दिख रहे सुंदर पक्षी को स्पॉटेड मुनिया या नटमेग मुनिया कहा जाता है, जिसका वैज्ञानिक नाम लोंचुरा पंचुलता है। हिंदी में इसे चित्रित मुनिया या सुतरीया चिडिय़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत सहित दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में दिखाई देते हैं। इसके शरीर पर सुनहरे भूरे रंग के साथ सफेद और काले धब्बेदार पैटर्न होते हैं, जो इसे अन्य पक्षियों से अलग पहचान देते हैं। ये अक्सर झुंड में रहते हैं, और इन दिनों खेतों, झाडिय़ों में दिख रहे हैं। इस तस्वीर में दोनों मुनिया पक्षी एक कांटेदार तार पर पास-पास बैठे हैं। एक पक्षी दूसरे की ओर मुड़ा है, उसकी आँखों में उत्सुकता है, तो दूसरे ने मानो नजऱे चुरा ली हो... यह क्षण किसी प्रेमकाव्य की तरह लग रहा है। (तस्वीर प्राण चड्ढा)
दिव्यांगों की चिंता आखिर कब?
विधानसभा के हालिया सत्र में विधायक अजय चंद्राकर ने एक ऐसी गंभीर सच्चाई सामने रखी, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने बताया कि राज्य के 31 दिव्यांगजन महाविद्यालयों में से 30 में प्राचार्य के पद रिक्त हैं। इस पर मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े भी हैरान रह गईं। चंद्राकर ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि किसी आउटसोर्सिंग एजेंसी से तबलावादक, चित्रकला और गायन के लिए मैनपॉवर लिया जाता है। ऐसी सेवा देने वाले किसी संस्था का नाम तो आज तक उन्होंने नहीं सुना। मंत्री के पास इसका भी कोई साफ जवाब नहीं था। चंद्राकर ने यह भी सवाल उठाया कि दिव्यांगों के लिए बनी योजनाओं का बजट साल-दर-साल घट क्यों रहा है। मंत्री इस पर भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकीं।
कुछ आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 70 हजार दिव्यांग बच्चे हैं, लेकिन उनके लिए केवल 270 शिक्षक नियुक्त हैं, जबकि नियमानुसार यह संख्या 6,000 से अधिक होनी चाहिए। विशेष शिक्षक नहीं होने के कारण इन बच्चों को सामान्य विद्यार्थियों के बीच बैठाया जा रहा है, जिससे उनकी शिक्षा और विकास दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
समाज कल्याण विभाग ने बीते वर्ष केवल 100 विशेष शिक्षक पदों की भर्ती का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा था, लेकिन सदन में स्वयं स्वीकार किया गया कि अब तक उसकी स्वीकृति नहीं मिली है। यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में एक याचिका पर आदेश देते हुए ऐसे रिक्त पदों को शीघ्र भरने को कहा था।
सवाल यह है कि जब सामान्य विद्यार्थियों के लिए भी शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो रही, तब दिव्यांगों की परवाह कौन करेगा?
बिजली की रफ्तार से छेना?
मोबाइल ऐप के माध्यम से घर तक सामान पहुंचाने वाली कंपनियां अब गोबर से बने हुए छेने भी दस मिनट में पहुंचाने के इश्तहार कर रही हैं। छेना मंगवाने की ऐसी कौन सी हड़बड़ी किसी की जिंदगी में हो सकती है कि वे मोटरसाइकिल पर डिलिवरी करने वाले से सीलबंद पैकेट में छेने जैसा सामान मंगवाएं?

दिल्ली भूपेश के साथ
विधानसभा के आखिरी दिन शुक्रवार को जैसे ही पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की शराब घोटाला प्रकरण में गिरफ्तारी की खबर आई, तो इसकी प्रतिक्रिया रायपुर, दुर्ग, भिलाई से दिल्ली तक हुई। ईडी तो सुबह से ही पूर्व सीएम के भिलाई-3 निवास पर चैतन्य से पूछताछ कर रही थी। करीब साढ़े 10 बजे पूर्व सीएम विधानसभा के लिए निकल गए।
सदन की कार्यवाही चल रही थी, तभी उनके पास सूचना आई कि चैतन्य को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जा रहा है। चैतन्य से ईडी पहले भी पूछताछ कर चुकी थी। ऐसे में गिरफ्तारी का अंदेशा कम था। मगर जैसे ही उन्हें कोर्ट में पेश होने की सूचना आई, पूर्व सीएम ने नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत को इसकी जानकारी दी।
फिर सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर कोर्ट जाने का फैसला लिया गया। इसके बाद दिल्ली तक के नेताओं के फोन घनघनाने लगे।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी ने सीधे भूपेश बघेल से बात की। पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महासचिव के.सी.वेणुगोपाल ने भी भूपेश, और अन्य प्रमुख नेताओं से फोन पर चर्चा की। शीर्ष नेताओं ने कहा है कि पूरी पार्टी पूर्व सीएम के साथ खड़ी है।
इधर, चैतन्य बघेल कोर्ट पहुंचे तो कांग्रेस के तमाम विधायक वहां पहुंच चुके थे। बताते हैं कि चैतन्य ने अपने पिता पूर्व सीएम को कह दिया कि जमानत के लिए फिलहाल प्रयास न करें, वो ठीक हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। चैतन्य के हौसले की भूपेश समर्थक तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। फिलहाल हाईकमान के दखल के बाद पूरी कांग्रेस भूपेश परिवार के समर्थन में खड़ी दिख रही है। धरना-प्रदर्शन का दौर चल रहा है। विधिक जानकार बताते हैं कि चैतन्य के खिलाफ आरोप काफी गंभीर है। ऐसे में लड़ाई लंबी खिंचने के आसार दिख रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा एक निष्क्रिय दल
देशभर में निष्क्रिय राजनीतिक दलों की पहचान के लिए चुनाव आयोग की चल रही कार्रवाई के तहत, छत्तीसगढ़ में भी ऐसे दलों की भी जांच-पड़ताल हो रही है जिन्होंने सन् 2019 से कोई चुनाव नहीं लड़ा। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा ऐसे दलों को नोटिस जारी कर पूछताछ शुरू की गई है। पहले चरण में 9 दलों ने निर्वाचन कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। सभी ने अगला चुनाव लडऩे की मंशा जताई है।
चुनाव आयोग किसी दल का पंजीयन सीधे-सीधे रद्द नहीं कर सकता। पहले उन्हें नोटिस देकर सुनवाई का अवसर दिया जाता है। यदि कोई दल निर्धारित समय पर वार्षिक लेखा-जोखा जमा नहीं करता या उसके कार्यालय का पता अमान्य है, तो कारण बताओ नोटिस जारी होता है। यदि आयोग को लगे कि यह मामला धोखाधड़ी का है, तभी पंजीकरण रद्द किया जाता है।
सन् 2022 में देशव्यापी स्तर पर ऐसे दलों की पहचान के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया था, जिसमें 2,100 से अधिक दलों को नोटिस जारी किए गए थे। फिलहाल छत्तीसगढ़ में 56 पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, जिनमें से सक्रिय रूप से चुनाव लडऩे वाले दलों की संख्या महज आठ-दस ही है।
इन्हीं 9 दलों में एक नाम छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छमुमो) का भी है, जिसे अब निष्क्रिय की श्रेणी में गिना गया है। यह दल पहले राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की उपज था। इसकी स्थापना स्व. शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में हुई थी, जिनका संघर्ष औद्योगिक मजदूरों, किसानों और शराबबंदी जैसे मुद्दों के लिए था।
सन् 1993 में इस दल से, जनकलाल ठाकुर डौंडीलोहारा से विधायक बने थे। 2003 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 8 प्रत्याशी उतारे थे, जिन्हें कुल 35,000 से अधिक वोट मिले। छत्तीसगढ़ के पृथक राज्य बनने के बाद भी मोर्चा सक्रिय रहा, लेकिन बीते वर्षों में संसाधनों की कमी, संगठनात्मक कमजोरी और चुनावी अनुकूलताओं के अभाव में यह पार्टी चुनाव मैदान से दूर हो गई।
आज के संदर्भ में यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कई राजनीतिक दल पंजीकरण तो करा लेते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य चुनाव लडऩा नहीं, बल्कि पंजीकरण से मिलने वाले फायदे उठाना होता है। आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13्र के तहत ऐसे दलों को दान पर कर छूट मिलती है। चंदा देने वाले लोग दल को पैसा देते हैं और फिर 5-10 प्रतिशत कमीशन देकर वही पैसा वापस ले लेते हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ दलों को दल मान्यता की स्थिति के आधार पर सस्ती दरों पर कार्यालय के लिए भूमि भी मिलती है। सन् 2016 में जब आयोग ने ऐसी गतिविधियों की जांच शुरू की, तो 86 दलों का पंजीकरण रद्द किया गया और 253 दल निष्क्रिय घोषित हुए। अब तक 345 ऐसे दलों की पहचान की जा चुकी है जिनकी जांच जारी है।
एक ओर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसे दल हैं, जो वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों के साथ लोकतांत्रिक प्रणाली में योगदान देना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में चुनाव नहीं लड़ पा रहे। दूसरी ओर, सैकड़ों ऐसे पंजीकृत दल हैं जिनके लिए राजनीति एक बिना लागत का मुनाफे का कारोबार बन है। मगर चुनाव आयोग के पास ऐसी कोई प्रणाली नहीं है कि वास्तविक लोकतांत्रिक सोच को लेकर पंजीकरण कराने वाले और फर्जीवाड़ा करने के लिए पंजीकरण कराने वाले दल के बीच अंतर कर सके।
अगला सत्र, अगला भवन

तनाव भरे राजनीतिक माहौल में विधानसभा के मानसून सत्र का शुक्रवार को अवसान हुआ। इस भवन में विधानसभा का आखिरी सत्र था। सत्र के आखिरी दिन शराब घोटाला प्रकरण में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के निवास पर ईडी ने छापेमारी की, और उनके पुत्र चैतन्य बघेल को हिरासत में लिया है। इससे परे विधानसभा सचिवालय ने अगले सत्र की तैयारी भी शुरू कर दी है।
अगला सत्र नवा रायपुर के नए विधानसभा भवन में होगा। नए विधानसभा भवन का निर्माण तकरीबन पूरा हो चुका है, और आंतरिक साज-सज्जा का काम चल रहा है। चर्चा है कि पीएम नरेन्द्र मोदी एक से पांच नवम्बर के बीच नए विधानसभा भवन का उद्घाटन कर सकते हैं। पीएम सदन में विधायकों को संबोधित भी करेंगे।
विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 दिसंबर के आसपास होगा। इसकी तैयारी चल रही है। समय सीमा के भीतर सारा काम पूरा हो जाए, इसके लिए सीएम विष्णुदेव साय, डिप्टी सीएम अरुण साव, और स्पीकर डॉ. रमन सिंह के बीच बैठक हो चुकी है। मौजूदा विधानसभा भवन में करोड़ों के निर्माण हो चुके हैं, और नए भवन पर कई निगम-मंडलों की नजर है। हालांकि नए भवन में शिफ्ट होने के बावजूद करीब छह महीने पुराना भवन भी विधानसभा सचिवालय के पास ही रहेगा। इसके बाद सरकार किसी, और को आबंटित करने का फैसला ले सकती है।
पांच पेड़ों से बना पचपेड़ी नाका
रायपुर से जगदलपुर जाने वाले रास्ते पर सबसे बड़ा चौक है, पचपेड़ी नाका। राजधानी रायपुर का यह व्यस्तम चौक है। दूसरे शहर के लोग भी पचपेड़ी नाका को जरूर जानते हैं। नवीन नामकरण को लेकर पचपेड़ी नाका पर राजनीति गहराती जा रही है। इस चौक के नामकरण का इतिहास हमें पीएससी के एक अभ्यर्थी ने हमसे शेयर किया है......
अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में चुंगी कर लगाने के लिए शहर में चार नाकों - आमानाका, पुरानी बस्ती, लाखेनगर की स्थापना की। इनमें से एक पचपेड़ी नाका था। बताया जाता है कि अंग्रेज अफसरों ने अपने बैठने और छांव के उद्देश्य से पांच पेड़ लगवाए। कालांतर में पांच पेड़ों के कारण यह चौक पचपेड़ी (पच का मतलब पांच और पेड़ी का अर्थ होता है छोटा पौधा) और नाका होने के कारण पचपेड़ी नाका पड़ गया। ठीक इसी तरह आम की पेड़ों की बहुलता और नाके की उपस्थिति के कारण आमानाका नाम पड़ा। छत्तीसगढ़ी में आम को आमा से संबोधित किया जाता है। 1982 में पचपेड़ी नाका चौक से होते हुए रिंग रोड का निर्माण हुआ। इस चौक से उस समय माना एयरपोर्ट पर उतरने वाले एरोप्लेन आसानी से दिख जाते थे। जानकर आश्चर्य होगा कि इस चौक से भिलाई स्टील प्लांट की कई चिमनियों से उगलते धुआं को देखा जा सकता था।
पचपेड़ी नाका के उस पार राजधानी रायपुर की कई व्यापारिक गतिविधियों के अलावा निजी क्षेत्र के कई बड़े अस्पताल हैं, जिसके कारण यह चौक राजधानी रायपुर में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ में अपनी एक अलग पहचान रखता है। भाठागांव में नए बस स्टैंड के निर्माण के बाद इस चौक पर यात्रियों का भारी जमावड़ा लगा रहता है। रायपुर के अधिकांश घरों में सुसज्जित टाइल्स, फर्श, ग्रेनाइट कहीं न कहीं पचपेड़ी नाका क्षेत्र की याद दिलाते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र राजधानी का मार्बल हब भी है।
जब सडक़ नहीं होती, तब रास्ता अंधविश्वास

छत्तीसगढ़ के दो हालिया मामले- एक दक्षिणी छोर कांकेर से और दूसरा राज्य के उत्तर के बलरामपुर से। दोनों ही सरकार की बुनियादी विफलताओं की तस्वीर दिखाते हैं। दोनों जिले आदिवासी बहुल हैं, दोनों में संकट एक-सा है। जब राज्य अपने नागरिकों तक सडक़, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचाता, तब लोग अंधेरे रास्तों की ओर बढ़ जाते हैं, कोई मजबूरी में, कोई अंधविश्वास में।
कांकेर की सुनीता कोमरा की कहानी एक उम्मीद है। 9 महीने की गर्भवती महिला की हालत बिगड़ी, तो परिवार ने गांव में प्रसव कराने का जोखिम नहीं लिया। कीचड़, जंगल और बरसात के बीच चार किलोमीटर तक पैदल चलकर वह एंबुलेंस तक पहुंची। जान जोखिम में थी, लेकिन उसने सिस्टम पर भरोसा किया। यह सोचकर कि अस्पताल तक पहुंच पाई तो मां और गर्भस्थ का बचाव मुमकिन है।
दूसरी तरफ बलरामपुर की घटना है। पिता ने अपने बीमार बेटे को बचाने के लिए एक मासूम की बलि चढ़ा दी। 15 माह पहले की इस घटना का खुलासा कल हुआ। आखिर खुद एक छोटे बच्चे का बाप होते आरोपी को क्यों लगा कि किसी दूसरे बच्चे की बलि चढ़ा देना ही इलाज का आखिरी रास्ता है? क्यों वह डॉक्टर के पास नहीं गया? सीधा जवाब है- क्योंकि उसके पास कोई डॉक्टर था ही नहीं। अस्पताल की दूरी ने उसे तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक की तरफ मोड़ दिया।
इन दोनों घटनाओं में फर्क जरूर है, पर कारण एक है- आधारभूत ढांचे का अभाव। कांकेर में सडक़ नहीं थी, बलरामपुर में स्वास्थ्य सेवा। नतीजा, एक ओर जान जोखिम में डालकर बच्चा जन्मा, दूसरी ओर एक बच्चे की जान ले ली गई।
क्या जागरूकता केवल प्रचार से आएगी? जमीन पर स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और सडक़ें भी चाहिए। जब तक ये नहीं होंगे, तब तक सुनीता जैसी महिलाएं कीचड़ में घिसटती रहेंगी और बलरामपुर जैसी जगह में फिर कोई मासूम तंत्र-मंत्र का शिकार होगा।
ऐसा नाम, कैसे करेंगे बुरा काम?
छत्तीसगढ़ में सरकारी खरीदी अंतरिक्ष छूते दामों पर करने के कुछ आरोप हवा में तैर रहे हैं, और सरकार उनका खंडन करने की कोशिश भी कर रही है। सच तो जांच के बाद पता लगेगा, और हो सकता है कि बाकी 73 पहलुओं की तरह इसमें भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को दखल देनी पड़े। फिलहाल सप्लायर कंपनियों की जो लिस्ट अंधाधुंध दामों के टेंडर भरने के लिए सामने आई है, वह जरा भी भरोसेमंद नहीं लग रही है। भला श्रीराम, ओम, और मां बनभौरी नाम की कंपनियां कैसे कोई भ्रष्टाचार कर सकती हैं?
कोई पत्थर नहीं चला था !!

आरंग के भाजपा विधायक गुरु खुशवंत साहेब की गाड़ी पर पिछले दिनों कथित तौर पर पत्थरबाजी की घटना पर खूब हो हल्ला मचा। यह घटना बेमेतरा जिले के नवागढ़ के पास हुई थी। उस वक्त भाजपा विधायक एक कार्यक्रम से निकल रहे थे, तभी सडक़ पर एक पत्थर गाड़ी पर लगा, और गाड़ी का शीशा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना की सूचना मिलते ही सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने तुरंत गुरु खुशवंत साहेब से बात की, और पुलिस को जांच के लिए कहा।
बताते हैं कि पुलिस ने मामले की जांच की, और घटना स्थल पर टीम पहुंची। जांच पड़ताल के बाद यह बात सामने आई है कि गाड़ी पर किसी ने पत्थर नहीं फेंका। बल्कि उस वक्त तेज हवा चल रही थी। मुख्य सडक़ के किनारे बिजली का तार टूट गया, और बिजली के पोल पर लगा चीनी मिट्टी का फ्यूज प्लग टूटकर गाड़ी पर लगा। इससे शीशा टूट गया। सडक़ सुनसान थी, और आसपास कोई नहीं था। खुद गुरु खुशवंत साहेब ने कहा है कि घटनास्थल के आसपास कोई नहीं था। जांच रिपोर्ट डिप्टी सीएम को भेज दी गई है।

हालांकि गुरु के समर्थक, उन पर हमले की साजिश की आशंका जता रहे हैं। इससे परे गुरु खुशवंत साहेब सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर चुके हैं। उनके पिता सतनामी समाज के प्रमुख गुरु बालदास अगले दिन घटना स्थल पर गए भी थे। अब जांच रिपोर्ट आने के बाद क्या कुछ होता है यह देखना है।
दो और बनेंगे आईएएस
खबर है कि केन्द्र सरकार ने राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस अवार्ड के लिए दो पद मंजूर कर लिए हैं। इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। आईएएस अवार्ड के लिए वरिष्ठता क्रम में अफसरों का रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
दो पद के लिए छह नाम भेजे जाएंगे। इनमें लीना कोसाम, सौमिल रंजन चौबे, राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, देवनारायण कश्यप, छन्नूलाल मारकंडे, सुरेन्द्र प्रसाद वैद्य, और वीरेन्द्र बहादुर पंच भाई के नाम हैं। लीना कोसाम, और सौमिल रंजन चौबे के खिलाफ किसी तरह के कोई प्रकरण नहीं हैं। ऐसे में दोनों के आईएएस अवार्ड होने में कोई तकनीकी दिक्कत नहीं है।
चर्चा है कि दिल्ली में अगले महीने डीपीसी हो सकती है। इसमें चीफ सेक्रेटरी के अलावा डीओपीटी, और यूपीएससी के सदस्य रहेंगे। सब कुछ समय पर हुआ, तो दोनों अफसरों को अगस्त के आखिरी अथवा सितंबर में आईएएस अवार्ड हो जाएगा।
कुलपति से पहले छात्र नाखुश थे, अब कर्मचारी
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संगीतज्ञ और म्यूजिक थैरेपिस्ट डॉ. लवली शर्मा ने अप्रैल माह में खैरागढ़ स्थित इंदिरा गांधी कला एवं संगीत विश्वविद्यालय में कुलपति का पदभार संभाला था। लेकिन पदभार ग्रहण के महज तीन माह के भीतर ही वे दो विवादों में घिर चुकी हैं।
ताजा विवाद विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों के साथ सामने आया है। कर्मचारियों की पदोन्नति और समयबद्ध वेतनमान की मांग को लेकर संगठन ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिया था। इस पर मीडिया से बातचीत के दौरान कुलपति डॉ. शर्मा ने कथित रूप से कर्मचारियों को गुणहीन और अभिशाप कह दिया। कर्मचारियों के अनुसार, उनके लिए अनावश्यक और अप्रशिक्षित जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया।
डॉ. शर्मा की टिप्पणी से कर्मचारी संगठन नाराज है। उन्होंने इसे स्थानीयता और जातिगत अपमान से जोड़ते हुए कुलपति से माफी मांगने और अपने बयान पर खेद प्रकट करने की मांग की है।
इससे पहले भी, डॉ. लवली शर्मा की नियुक्ति को लेकर विवाद हो चुका है। 12 अप्रैल को जैसे ही उनके नाम की अधिसूचना जारी हुई, सत्ताधारी दल से जुड़ी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उनकी नियुक्ति को रद्द करने की मांग उठाई थी। हालांकि नियुक्ति पर रोक नहीं लगी। पदभार ग्रहण करने के बाद भी एबीवीपी ने खैरागढ़ में रातभर प्रदर्शन किया।
एबीवीपी का आरोप है कि ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय में जब डॉ. शर्मा संगीत एवं कला संकाय की डीन थीं, तब उन पर भ्रष्टाचार और एक विवादित प्रोफेसर को बचाने के आरोप लगे थे। संगठन ने नियुक्ति रद्द न होने की स्थिति में चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी दी थी, हालांकि आगे बात नहीं बढ़ी।
प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों में लंबे समय तक कुलपतियों के पद रिक्त रहे हैं। खैरागढ़ विश्वविद्यालय में भी करीब एक साल तक कुलपति का कार्यभार रायपुर संभागायुक्त के पास था।
यह विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संस्थान माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों से अधिक लगातार विवादों के कारण चर्चा में आ रहा है।
देवेंद्र के बदले तेवर
विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है। पिछले सत्रों की भांति इस बार भी विशेषकर प्रश्नकाल में सत्ता, और विपक्ष के सदस्यों के बीच स्वाभाविक रूप से नोकझोंक देखने को मिल रही है। मंगलवार को जल जीवन मिशन योजना को लेकर सवाल-जवाब के बीच पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, और देवेन्द्र यादव के बीच जमकर तकरार हुई। इस मामले में स्पीकर डॉ. रमन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा।
कांग्रेस सदस्य देवेंद्र यादव पिछले सत्रों में ज्यादातर मौकों पर खामोश रहते थे, लेकिन बलौदाबाजार आगजनी मामले पर जेल से छूटने के बाद देवेन्द्र के तेवर बदले दिख रहे हैं। वो सदन के भीतर अलग-अलग विषयों को लेकर आक्रामक नजर आ रहे हैं। अजय के साथ सदन के भीतर गरमा गर्मी तो हुई, लेकिन थोड़ी देर बाद दोनों की नजरें आपस में मिली, तो देवेन्द्र यादव ने अजय को देखकर तुरंत हाथ जोड़, और कान पकडक़र माफी भी मांग ली। अजय ने भी सिर हिलाकर एक तरह से उन्हें माफी दे दी। ये अलग बात है कि दोनों के बीच तकरार की रील्स काफी वायरल हो रही है।
चातुर्मास में ‘महाराज’ का बयान कैसे
रावतपुरा मेडिकल कॉलेज की मान्यता के लिए घूस देने के मामले में जांच के घेरे में आए रावतपुरा श्री रविशंकर महाराज के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर तो कर लिया है, लेकिन आगे पूछताछ रुकी है। वजह यह है कि चातुर्मास चल रहा है, और रावतपुरा महाराज सागर में चातुर्मास कर रहे हैं। यानी वो चार महीने एक ही स्थान पर रहेंगे।
पिछले दिनों रावतपुरा महाराज के कार्यक्रम में मध्य प्रदेश सरकार के कई मंत्री उपस्थित थे। रावतपुरा संस्थान प्रबंधन के तमाम लोगों ने चुप्पी साध ली है। कोई भी इस विषय पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। रेरा चेयरमैन संजय शुक्ला के खिलाफ भी सीबीआई ने एफआईआर किया है।
अभी तक रावतपुरा संस्थान के कुल पांच लोगों के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर दर्ज किया है, लेकिन गिरफ्तारी सिर्फ एक डायरेक्टर की हुई है। बाकियों का क्या होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
पानी के बीच खड़ा अनोखा मंदिर

राजधानी रायपुर से पाटन मार्ग पर स्थित परसदा गांव के पास एक बेहद खास स्थान है, जहाँ प्रकृति की शांत छांव और आस्था की गूंज एक साथ महसूस होती है। खारून नदी के बीचों बीच स्थित ‘ठकुराईनटोला’ मंदिर एक धार्मिक स्थल तो है, पर इस बारिश के मौसम में खूबसूरत प्राकृतिक आकर्षण भी है।
बरसात के दिनों में जब खारून नदी पूरे यौवन पर है, यह मंदिर चारों तरफ से पानी से घिर गया है। मंदिर का प्रतिबिंब नदी के शांत जल में झलकता है, पक्षियों की चहचहाहट गूंजती है और ठंडी हवा का स्पर्श मन को सुकून से भर देता है। इस नजारे को देखने वालों की आंखें कुछ पल के लिए ठहर जाती हैं। सरकार ने हाल ही में नदी पर एक भव्य लक्ष्मण झूला का निर्माण करवाया है, जो नदी के दोनों किनारों को जोड़ता है। बताया जा रहा है कि झूले का लोकार्पण इसी महीने होने वाला है।
छुट्टियों और वीकेंड पर यह स्थान सैलानियों से गुलजार होने लगा है। लोग नदी में स्नान का आनंद भी लेते हैं, क्योंकि इसकी गहराई यहां पर बहुत अधिक नहीं है। एक बार इस ठंडी और निर्मल जलधारा में डुबकी लगाने के बाद दिनभर की थकान जैसे छू-मंतर हो जाती है। (तस्वीर व विवरण- गोकुल सोनी)
लिख के मेरा पदनाम एक्स पे मिटा दिया !
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के एक ट्वीट से पार्टी में हलचल मची है। दरअसल, बैज को जन्मदिन पर भिलाई विधायक देवेंद्र यादव ने एक्स पर बधाई दी, तो उन्होंने ट्वीट कर देवेन्द्र को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष लिख आभार माना। हालांकि थोड़ी देर बाद बैज ने ट्वीट को डिलीट भी कर दिया, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास को कटाक्ष करने का मौका मिल गया, और उन्होंने ट्वीट को डिलीट करने पर देवेन्द्र यादव का अपमान कऱार दिया। मगर कांग्रेस के कई नेता बैज के ट्वीट को गंभीरता से ले रहे हैं, और पार्टी संगठन में संभावित बदलाव से जोडक़र भी देख रहे हैं।
वैसे भी कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्ति की परंपरा रही है। दिवंगत मोतीलाल वोरा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने, तब डॉ चरणदास महंत को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। और जब धनेन्द्र साहू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो डॉ महंत को अध्यक्ष पद से हटा कर कार्यकारी बना दिया गया। बाद में जब भूपेश बघेल ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली, तो डॉ शिव कुमार डहरिया, और रामदयाल उईके को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था।
अब बैज ने भले ही गलती से देवेन्द्र यादव को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष लिख दिया, लेकिन पार्टी के कुछ लोग सही भी मान रहे हैं। बलौदा बाजार आगजनी प्रकरण के बाद से देवेन्द्र यादव का कद पार्टी के भीतर काफी बढ़ा है। जेल से छूटने के अगले दिन सीधे राहुल गांधी से मिलकर आ गए। उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी गई है। पिछले दिनों पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री केसी वेणुगोपाल यहां आए, उन्होंने देवेन्द्र से कुछ देर अलग से चर्चा की। यादव बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले देवेन्द्र सामाजिक समीकरण में फिट बैठते हैं। ऐसे में प्रदेश में उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा। मगर खुद बैज पद पर बने रहेंगे,इसको लेकर पार्टी के कुछ लोगों को शंका है। देखना है आगे प्रदेश कांग्रेस में क्या कुछ होता है।
शिक्षक भर्ती की चिंता घटकर आधी हुई

विधानसभा में पूछे गए सवाल और सरकार से मिले जवाब अक्सर उन दावों से बिल्कुल अलग होते हैं, जो राजनीतिक मंचों से, खासकर चुनाव अभियानों के दौरान किए जाते हैं।
मार्च 2025 के पिछले सत्र में विधायक राघवेंद्र सिंह ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों की जानकारी मांगी थी। तब सरकार ने बताया था कि 56,601 पद खाली हैं। अब 14 जुलाई से शुरू हुए सत्र में यही सवाल दोबारा पूछा गया, तो सरकार की ओर से जवाब मिला कि केवल 25,907 पद खाली हैं। यानी, सिर्फ चार महीने में 30,694 पदों की आवश्यकता कम रह गई है।
हाल ही में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण और कम दर्ज संख्या वाले स्कूलों के विलय की प्रक्रिया पूरी की गई है। इस पर शिक्षक संगठनों और विपक्ष, कांग्रेस ने विरोध जताते हुए दावा किया था कि इससे 30 हजार से अधिक शिक्षकों के पद समाप्त हो जाएंगे। अब विधानसभा में दिए गए जवाब ने इस दावे को पुख्ता कर दिया है। मान लें कि वर्तमान में 25,907 (करीब 26 हजार) पद ही रिक्त हैं- तो भी यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इन पदों पर भर्ती कब होगी? सरकार ने अब तक इस पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है।
दूसरी ओर, शिक्षा विभाग में हाल ही में बड़े पैमाने पर तबादले किए गए हैं, जिनमें कई जिला शिक्षा अधिकारी भी शामिल हैं। इनमें से कुछ अधिकारियों पर युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में पक्षपात और अनियमितता के आरोप हैं। कई प्रभावित शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की है।
युक्तियुक्तकरण का उद्देश्य संतुलित समायोजन बतलाया गया था, ताकि किसी भी स्कूल में शिक्षक की कमी न रहे। लेकिन सत्र की शुरुआत होते ही प्रदेश के कई स्कूलों में शिक्षक न होने के कारण छात्र और पालक सडक़ों पर उतर आए हैं।
युक्तियुक्तकरण के बाद बदली हुई तस्वीर यह है कि अब बेरोजगारों को 56 हजार रिक्त पदों पर भर्ती के लिए आंदोलन नहीं करना होगा, सिर्फ 26 हजार पदों के लिए करना है। सरकार के लिए भी मोदी की गारंटी पूरा करने का बोझ घटकर आधा रह गया है।
थाने की कुर्सी पर विधायक

जयपुर के हवामहल क्षेत्र के विधायक बालमुकुंद आचार्य की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है, जिसमें वे थानेदार की कुर्सी पर बैठकर सामने बैठे पुलिस स्टाफ को निर्देश देते नजर आ रहे हैं। बताया गया कि इलाके में कांवडिय़ों के साथ कुछ झड़प की स्थिति बन गई थी, जिसके बाद विधायक खुद थाने पहुंचे और पुलिस वालों को समझाने लगे कि कानून-व्यवस्था कैसे संभालनी है।
विधायक की इस भूमिका को लेकर बहस छिड़ गई है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इस घटना को "बेहद शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण" बताया है, जबकि स्थानीय प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की ओर से अब तक कोई आपत्ति नहीं जताई गई है। न ही थानेदार के खिलाफ किसी तरह की प्रशासनिक कार्रवाई की गई है।
कुछ राज्यों में जनप्रतिनिधियों का रौब-दाब अब भी सीमाओं से परे, पूरी तरह कायम है। अपने छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में में ऐसा नजारा कम ही देखने को मिला है। पिछली सरकार में तो कई मौकों पर खुद सत्तारूढ़ दल के विधायकों पर एफआईआर दर्ज हो जाती थी, और उन्हें बचाने कोई आगे भी नहीं आता था।
15 जुलाई : जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा
नयी दिल्ली, 15 जुलाई। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 15 जुलाई को ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान करने का ऐलान किया गया था। उन्हें यह सम्मान 1955 में प्रदान किया गया था।
वर्ष 1954 में शुरू किया गया यह सम्मान किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी दूसरी ऐसी शख्सियत रहीं, जिन्हें प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
15 जुलाई 2023 को चेक गणराज्य की 24 वर्षीय खिलाड़ी मार्केटा वोंद्रोसोवा महिला एकल के फाइनल में ओन्स जाबेउर को सीधे सेटों में पराजित करके विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट का खिताब जीतने वाली सबसे कम रैंकिंग की और पहली गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी बन गई। वोंद्रोसोवा ने दोनों सेट में पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए 2022 की उपविजेता और छठी वरीयता प्राप्त जाबेउर को 6-4, 6-4 से हराकर अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब हासिल किया।
टूर्नामेंट शुरू होने से पहले यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वोंद्रोसोवा चैंपियन बनेगी। असल में वह खिताब जीतने के लक्ष्य के साथ ऑल इंग्लैंड क्लब में नहीं आई थी। लेकिन उनका यह दौरा यादगार बन गया और वह ग्रैंड स्लैम चैंपियन बनकर घर लौटीं।
देश-दुनिया के इतिहास में 15 जुलाई की तारीख पर दर्ज महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है:-
- 1904 : अमेरिका के लॉस एंजिलिस में पहला बौद्ध मंदिर बना।
- 1910 : एमिल क्रेपलिन ने एलॉइस अल्जाइमर के नाम पर अल्जाइमर बीमारी का नाम दिया।
- 1916 : दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग की शुरूआत।
- 1926 : बॉम्बे (अब मुम्बई) में पहली मोटरबस सेवा की शुरुआत।
- 1955 : प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की।
- 1961 : स्पेन ने पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकारों को स्वीकार किया।
- 1968 : अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच वाणिज्यिक विमान सेवा की शुरुआत।
- 1979 : भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने पद से इस्तीफा दिया।
- 2000 : सिएरा लियोन में सैन्य कार्यवाही द्वारा सभी भारतीय सैनिक बंधक मुक्त।
- 2002 : अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारे उमर शेख को पाकिस्तानी अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई।
- 2004 : माओवादियों से वार्ता में नेपाल के प्रधानमंत्री ने विदेशी मध्यस्थता मंजूर की।
- 2018 : फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से हराकर दूसरी बार फुटबॉल विश्व कप का खिताब अपने नाम किया।
- 2020 : जायडस कैडिला ने कोविड-19 टीके का मनुष्यों पर परीक्षण शुरू किया।
- 2023 : उत्तर पूर्वी कांगो में संदिगध चरमपंथियों के हमले में 12 लोगों की मौत।
- 2024 : के पी शर्मा ओली ने चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। (भाषा)
कार्रवाई की रफ्तार भी तो देखिये
पहली बार विधायक बनीं, पहली बार मंत्री बनीं, और पहली ही बार में आरोप लग गया। मासूम बच्चों की थाली तक हल्की पड़ गई! बच्चों की थाली में छेद और अलमारी में दीमक लगने का राज तो गोदाम में ही दम तोड़ देता, यदि मीडिया में खबर नहीं चलती।
मामला बाल विकास विभाग में 40 करोड़ के सप्लाई टेंडर का है। जांच रिपोर्ट आई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि यह रकम सिर्फ 28 करोड़ है। लोग कह रहे हैं, जांच के नाम पर खानापूर्ति हो गई। जो सामान उनसे लिया गया था बदलकर नया ले लिया गया। यानि गड़बड़ी पकड़े जाने की सजा केवल इतनी है कि आप उसे ठीक कर लो। छह एजेंसियों को ब्लैक लिस्टेड करने की बात वजन के साथ कही गई है। पर जो सप्लाई के धंधे में लगे हैं वे बताते हैं कि इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। एक फर्म के पीछे, चार, छह, दस और फर्म होते हैं। बदलकर दूसरे नामों से टेंडर में भाग लिया जा सकता है। अब फर्म अपना नाम बदलकर फिर से आएगी, फिर वही थाली, वही आलमारी, वही तवा, बस नया पर्चा और नया बोर्ड लगाकर! विभाग फिर आंख मूंदकर क्वालिटी चेक करेगा, फिर जांच कमेटी बनेगी, फिर दूसरी थाली-अलमारी भेज दी जाएगी। जिन अधिकारियों की आंख के सामने घटिया थाली, खोखली अलमारी खपा दी गई उन पर तो कुछ कार्रवाई हुई थी। अफसरों से लेकर बाबुओं तक की कुर्सी सुरक्षित है। किसी के खिलाफ कोई एफआईआर भी नहीं।
पूरी कार्रवाई बड़ी मजबूरी में, सावधानी के साथ की गई प्रतीत हो रही है। ताकि जिन लोगों को हिस्सा मिला है और उन पर कोई आंच न आए, जिन लोगों ने हिस्सा-बंटवारे में भाग लिया उनका भी बाल बांका न हो। आंगनबाड़ी के बच्चे तो वही खाएंगे जो आप देंगे। कोई शिकायत करेगा तो वही रटी-रटाई लाइन फिर सुनने को मिलेगी- गुणवत्ता के कोई समझौता नहीं होगा।
इस दृश्य पर कांग्रेस को आपत्ति

इस तस्वीर में कुछ असहज करने वाली बात आपको दिखाई दे रही है? भाजपा के वरिष्ठतम आदिवासी नेताओं में से एक पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर, राज्यपाल रमेन डेका के सामने खड़े होकर कोई बात कर रहे हैं। यह कोरबा प्रवास के दौरान की तस्वीर है। हाल ही में राज्यपाल ने यहां का दौरा किया था। कांग्रेस ने और पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के सोशल मीडिया पेज पर इस तस्वीर को पोस्ट किया गया है। कंवर का अपमान हुआ, यह कहा जा रहा है। वजह राज्यपाल के बैठे होने पर नहीं। बगल में ध्यान से देखें तो कलेक्टर अजीत वसंत दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस को आपत्ति है कि वे क्यों बैठे हुए हैं? जब वरिष्ठ आदिवासी नेता कंवर खड़े हैं तो उन्हें आराम से इस तरह नहीं बैठना चाहिए। आप आकलन करें कि क्या कांग्रेस की यह आपत्ति सही है। कलेक्टर ने शायद यह मानकर खड़े होने की जरूरत महसूस की होगी कि कंवर वर्तमान में सरकार में किसी पद में नहीं। वे केवल जनप्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे सत्तारूढ़ दल से हैं या नहीं। यह भी देखना होगा कि क्या यह स्थिति राज्यपाल से कंवर की मुलाकात के दौरान पूरे समय थी, या फिर कुछ देर के लिए यह संयोग बना। उन्हें बैठने के लिए कहा गया या नहीं कहा गया?
सभी के कान ही कैसे खराब?
प्रदेश के कबीरधाम, मुंगेली सहित कई जिलों में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट के आधार पर नौकरी पाने वालों पर शिकंजा कसा है। करीब सवा सौ अफसर-कर्मी हैं, जिनकी दिव्यांगता सर्टिफिकेट को फर्जी बताया जा रहा है। मुंगेली जिले में दिव्यांग सर्टिफिकेट धारी 27 अफसर-कर्मियों को नोटिस जारी कर मेडिकल जांच की अद्यतन स्थिति की जानकारी मांगी गई है।
इन अफसर-कर्मियों को राज्य मेडिकल बोर्ड से दिव्यांगता की जांच कराने के लिए कहा गया था, लेकिन किसी ने भी जांच नहीं कराई। कुछ तो हाईकोर्ट चले गए। अब इन सभी को बर्खास्त करने की तैयारी चल रही है। खास बात ये है कि 27 में से 24 ने खुद को श्रवण बाधित (बहरा) बताकर दिव्यांगता सर्टिफिकेट हासिल की है। यह बात भी सामने आई है कि मुंगेली जिले के आधा दर्जन गांवों में करीब सात से आठ सौ युवाओं ने फर्जी सर्टिफिकेट बनाया है। इन सभी ने खुद को श्रवण बाधित बताया है।
कथित श्रवण बाधित युवा डिप्टी कलेक्टर से लेकर अन्य ऊंचे पदों पर हैं। इन्हें नौकरी से निकालने के लिए आंदोलन भी चल रहा है। फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट प्रकरण पर हाईकोर्ट भी गंभीर है, और इस पर इसी हफ्ते सुनवाई होनी है। देखना है कि प्रकरण पर आगे क्या कुछ होता है।
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक
भ्रष्टाचार के किसी मामले में जांच होती है, तो कई बार ऐसे प्रकरण भी सामने आ जाते हैं जो कि फाइलों में नस्तीबद्ध हो चुके होते हैं। कुछ इसी तरह का मामला रावतपुरा मेडिकल कॉलेज से जुड़ा है। पिछले दिनों सीबीआई ने मान्यता के लिए एनएमसी की टीम को घूस देने के मामले में कॉलेज प्रबंधन से जुड़े पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है। इनमें से एक कॉलेज के डायरेक्टर जेल में हैं। बाकी चार लोगों के खिलाफ फिलहाल गिरफ्तारी जैसी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
खुद रावतपुरा महाराज भी प्रकरण की जांच के घेरे में आ गए हैं। राज्य सरकार भी मामले पर काफी गंभीर है, और कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए कदम उठा रही है। रावतपुरा संस्थान से जुड़े रायपुर मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. अतिन कुंडू के खिलाफ भी सीबीआई ने प्रकरण दर्ज किया है।
राज्य सरकार ने कुंडू के मामले की जानकारी ली, तो उनके पुराने प्रकरण भी सामने आ गए। कुंडू का पांच साल पहले अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज तबादला हुआ था। काफी कोशिशों के बावजूद कुंडू अपना तबादला रूकवाने में सफल नहीं हो पाए, तो वे छुट्टी पर चले गए। इस दौरान वे रायपुर के ही एक अन्य निजी मेडिकल कॉलेज संस्थान रिम्स में सेवा देने लगे। यानी सरकार और रिम्स, दोनों जगह से वेतन प्राप्त करते रहे। इस मामले की शिकायत भी हुई थी। जांच में पुष्टि भी हुई, लेकिन वो मामला दबवाने में सफल रहे। अब डॉ. कुंडू सीबीआई के घेरे में आ गए हैं, तो राज्य सरकार ने पुरानी फाइल खोल दी है। अब उनके बच निकलने की संभावना खत्म होती दिख रही है। देखना है आगे क्या होता है।
बीजेपी जागेगी?
हर शहर में न सिर्फ त्यौहारों के पहले, बल्कि अब तो साल भर तरह-तरह की सेल चलती रहती है। बड़ी होटलों से लेकर सार्वजनिक सभा भवनों तक कई किस्म के नए-पुराने सामानों को तरह-तरह के झांसे वाले इश्तहार देकर बेचा जाता है। अखबारों में पूरे-पूरे पेज के इश्तहार छपते हैं, और इनमें दावे देखने लायक रहते हैं। अभी आज चल रही ऐसी एक बिक्री के बारे में लिखा गया है कि उसका मकसद सेल लगाकर माल बेचना नहीं है। कंपनी पर बैंक का अत्यंत दबाव होने के कारण कंपनी अपनी प्रीमियम स्टॉक की सस्ती बिक्री करने पर मजबूर है। इश्तहार में लिखा गया है- हमारी कंपनी के द्वारा न पहले कभी सेल लगाई गई है, न इसके बाद कभी लगाई जाएगी।
दिलचस्प बात यह है कि पूरे पेज के इश्तहार में कंपनी का कोई जिक्र ही नहीं है। ऐसे खुले झूठे दावों पर समाज या सरकार की तरफ से किसी कार्रवाई की जागरूकता भी नहीं है। ऐसा ही एक दूसरा इश्तहार एक दूसरे होटल में लगी सेल का है, जो कह रहा है कि उच्च मुद्रास्फीति की वजह से कंपनी के गोदाम में स्टॉक ओवरफ्लो हो गया है, इसलिए हम आपको इतना बड़ा डिस्काउंट दे रहे हैं।
अब यह वाला दावा कुछ अधिक दिलचस्प इसलिए है कि इसे देखकर जब हमने जानने की कोशिश की कि भारत में मुद्रास्फीति की क्या हालत है, तो पता लगा कि ग्राहक मूल्य सूचकांक एकदम गिरा हुआ है क्योंकि कई कारोबार में मुद्रास्फीति एकदम नीचे आ गई है, और थोक मुद्रास्फीति भी रिकॉर्ड नीचे है।
अब देश की ऐसी अर्थव्यवस्था के रहते हुए भी अगर कोई फर्जी कंपनी फर्जी कारोबार के लिए इश्तहार देकर देश को उच्च मुद्रास्फीति का शिकार बतला रही है, तो फिर देश-प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी की भी तो कोई जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी सेल में जाकर धंधेबाजों से पूछे कि देश की अर्थव्यवस्था पर ऐसा झूठा इल्जाम क्यों लगाया जा रहा है। लेकिन जब तक किसी पार्टी का ऐसा कोई कार्यक्रम टाईप होकर न आ जाए, तब तक भला किसको परवाह है कि देश की अर्थव्यवस्था का नाम हो रहा है, या वह बदनाम हो रही है।
परदेश का मोह

राज्य सरकार के अफसरों की विदेशों से आमदरफ्त जारी है। वहीं विधानसभा के मानसून सत्र के बाद सरकार के मंत्रियों के विदेश दौरे शुरू होने वाले हैं। एक-दो मंत्रियों के विभाग में विदेश यात्रा के लिए प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।
बड़े राजनीतिक ओहदेदारों के विदेश दौरों की अनुमति पीएमओ ही देता है। ऐसे में एक बड़े ओहदेदार को दूसरी बार अनुमति न दिए जाने को लेकर चर्चाएं हैं। हालांकि देश के किसी भी राज्य के ऐसे ओहदेदार को अब तक विदेश दौरे की अनुमति नहीं दी गई है। अपने साहब भी पूरी तैयारी से गए कूच किए थे लेकिन अनुमति न मिलने पर दिल्ली में ही भेंट मुलाकात कर लौट आए। बताया जा रहा है कि साहब एक प्रयास और करने वाले हैं। इससे परे स्पीकर अक्टूबर में कामनवेल्थ संसदीय सम्मेलन में भाग लेने अफ्रीकी देश जाने वाले हैं।
पहले जिला, फिर प्रदेश
प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी तैयार हो गई है, लेकिन सूची अभी जारी नहीं की जाएगी। पार्टी के रणनीतिकारों की पिछले दिनों मैनपाट में एक बैठक हुई है, जिसमें यह तय किया गया कि पहले जिलों की कार्यकारिणी घोषित की जाएगी।
मैनपाट में प्रशिक्षण शिविर के बाद से जिलों में हलचल शुरू हो गई है। कार्यकारिणी के लिए नाम लिए जा रहे हैं। महामंत्री, और उपाध्यक्ष पदों के लिए स्थानीय प्रमुख नेताओं से रायशुमारी की प्रक्रिया चल रही है। चर्चा है कि इस माह के अंत तक जिला, और फिर प्रदेश की कार्यकारिणी घोषित कर दी जाएगी।
तबादले, खुशी कम, गम अधिक
प्रदेश में तबादलों पर फिर रोक लग गई है। अब सिर्फ समन्वय के जरिए ही तबादले हो सकते हैं। वैसे इस बार स्कूल शिक्षा समेत आधा दर्जन विभागों में तबादलों पर पहले से रोक लगी थी। पार्टी ने कार्यकर्ताओं की सिफारिश को तवज्जो देने के लिए मंत्रियों को आदेश भी दिए थे। मगर ज्यादातर जिलों से आई सूची को महत्व ही नहीं दिया गया।
चर्चा है कि रायपुर में तो बकायदा कोर कमेटी ने तबादले का प्रस्ताव तैयार किया था, और संबंधित विभाग के मंत्रियों को भेजा था। कहा जा रहा है कि रायपुर की सूची में से इक्का-दुक्का नामों को ही तबादला सूची में जगह मिल पाई। इसको लेकर संगठन के पदाधिकारी नाराज बताए जाते हैं। इसकी शिकायत भी हुई है। अब तबादले पर रोक लग गई है, इसलिए अब अगले सीजन का इंतजार करना होगा।
समंस की चाय-पानी- खुराक बंद
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले ने ई-समंस और वारंट तामिली की जो नई डिजिटल शुरुआत की है । यह राज्य का पहला जिला बन गया है, जहां समंस, वारंट अब कागज-पत्तर की बजाय मोबाइल एप और पोर्टल से जारी और तामील किए जा रहे हैं। इससे पुलिस और कोर्ट के बीच सीधा डिजिटल ट्रैक बन गया है -किसे कब समंस दिया गया, किसने रिसीव किया, कहां दिया गया, सबकी फोटो और तारीख पोर्टल पर देखी जा रही है।
फायदा ये कि अब कोई यह बहाना नहीं बना पाएगा कि समंस मिला ही नहीं। पहले यह आम बात थी कि कई नेता, रसूखदार लोग या उनके गुर्गे समंस को हाथ में लेने से ही इंकार कर देते थे। अब सिस्टम डिजिटल हो गया है तो उम्मीद है कि वह पुरानी लापरवाही, जोड़-तोड़ और सेटिंगबाजी बंद होगी। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वाकई बड़े-बड़े नेताओं, अफसरों और रसूखदारों तक भी ई-समंस पहुंचेगा?
अभी शुरुआत है — देखना होगा कि जो लोग समंस को अब तक टालते रहे, या समंस देने वाले को चाय-पानी के बहाने लौटा देते थे, वे नई डिजिटल व्यवस्था में कहां तक टिक पाएंगे। पुलिस को यह दिखाना होगा कि यह ई-समंस सब पर बराबरी से चलेगा, सिर्फ कमजोरों पर नहीं।
सौदान सिंह से खलबली
लंबे समय तक प्रदेश भाजपा संगठन के कर्ता-धर्ता रहे सौदान सिंह एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने रायपुर आए तो उनसे मिलने के लिए पार्टी नेताओं का तांता लगा रहा। सौदान सिंह पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनकी कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में प्रदेश भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन से बंद कमरे में लंबी चर्चा हुई।
छत्तीसगढ़ भाजपा की कार्यकारिणी घोषित होनी है, ऐसे में सौदान सिंह की नितिन नबीन के साथ बैठक को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि नबीन ने पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर सौदान सिंह से राय भी ली है। अगले दिन सौदान सिंह और नितिन नबीन को अलग-अलग फ्लाईट से पटना जाना था। नबीन के लिए पटना से सरकारी विमान आने वाला था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया, और वे सौदान सिंह के साथ नियमित फ्लाईट से कोलकाता गए। और फिर वहां से पटना पहुंचे। दोनों नेता केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कार्यक्रम में शामिल हुए। कुछ लोगों का अंदाज है कि सौदान सिंह के करीबी कुछ नेताओं को संगठन में अहम दायित्व मिल सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
खंडन का मुंडन
आखिरकार रायपुर नगर निगम ने पचपेड़ी नाका का नामकरण संत गोदड़ी बाबा के नाम करने का प्रस्ताव वापिस ले लिया। इस प्रस्ताव को लेकर चौतरफा विरोध हो रहा था। खुद आरडीए के अध्यक्ष नंदकुमार साहू ने आपत्ति जताई थी। छत्तीसगढ़ क्रांति सेना, और छत्तीसगढ़ समाज पार्टी जैसे कई संगठनों ने खुलकर इसका विरोध किया था। सौ से अधिक आपत्तियां आई थी।
भाजपा में ही सबसे ज्यादा विरोध हो रहा था। शुक्रवार को विरोध को देखते हुए मेयर मीनल चौबे ने बयान दिया कि पचपेड़ी नाका का नाम बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यह महज अफवाह है।
मेयर का कथन सही नहीं है। बताते हैं कि एमआईसी सदस्य अमर गिदवानी बाबा गोदड़ी वाले धाम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने एमआईसी में पचपेड़ी नाका का नाम गोदड़ी बाबा के नाम करने का प्रस्ताव एमआईसी में रखा, तो सर्वसम्मति से नाम बदलने के लिए सहमति दे दी गई। इसके बाद जोन क्रमांक-10 ने एमआईसी में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित होने के बाद अखबारों में विज्ञापन जारी कर विधिवत आपत्ति-दावे मंगाए थे। 9 जुलाई को आपत्ति-दावा जमा करने के आखिरी दिन तक सौ से अधिक आपत्तियां आ चुकी थी। कुछ संगठनों ने नाम बदलने पर आंदोलन की धमकी दी थी। भारी विरोध और राजनीतिक नुकसान को देखते हुए प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया गया।
पंजाब से छोड़-छुट्टी की हसरत?
हल्ला है कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने पंजाब कांग्रेस का प्रभार छोडऩे की इच्छा जताई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बघेल को छह माह पहले ही पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था। कहा जा रहा है कि पूर्व सीएम छत्तीसगढ़ में ही ज्यादा से ज्यादा समय देना चाहते हैं। उनकी जल, जंगल, और जमीन के मुद्दों को लेकर पदयात्रा की योजना है।
हालांकि पूर्व सीएम ने खुले तौर पर इच्छा जाहिर नहीं की है, लेकिन पार्टी के लोगों के बीच इसकी काफी चर्चा हो रही है। पंजाब में इसी साल विधानसभा के चुनाव भी हैं। कांग्रेस यहां पूरी ताकत झोंक रही है। ऐसे में हाईकमान पूर्व सीएम की जगह कोई नया प्रभारी बनाएगी या फिर, बघेल ही पद पर बने रहेंगे, यह देखना है।
खराब नतीजों पर भी बच गए क्योंकि...

स्कूल शिक्षा विभाग में डेढ़ सौ से अधिक अफसरों-कर्मचारियों के तबादले हुए हैं। तबादलों में उन अफसरों को किनारे किया गया है, जिन्हें संबंधित जिला या फिर ब्लॉकों में 10वीं या 12वीं के खराब नतीजों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। सूची में रायपुर डीईओ विजय खंडेलवाल का भी नाम है, जिन्हें महासमुंद डाइट का प्राचार्य बनाया गया है।
खास बात ये है कि रायपुर के सरकारी स्कूलों में अतिशेष शिक्षकों की संख्या काफी अधिक थी। मगर दसवीं बोर्ड में रायपुर जिला 30 वें नंबर पर रहा है। सीएम विष्णु देव साय ने खराब नतीजे पर महासमुंद, और जीपीएम के डीईओ को निलंबित कर दिया था, लेकिन रायपुर डीईओ विजय खंडेलवाल बचे रहे।
खंडेलवाल को सांसद बृजमोहन अग्रवाल का करीबी माना जाता है। यही वजह है कि उन पर कार्रवाई नहीं हो पाई थी। रायपुर में हिमांशु भारती को लाया गया है, जो पहले भी रायपुर डीईओ रह चुके हैं। कुछ इसी तरह की शिकायत सरगुजा संभाग के शिक्षा अफसरों के खिलाफ भी आई थी। यहां के संयुक्त संचालक हेमंत उपाध्याय, और डीईओ अशोक सिन्हा को भी हटा दिया गया है। पहली बार स्कूल शिक्षा विभाग में आमूल चूल परिवर्तन हुआ है। देखना है कि आने वाले समय में इसका क्या नतीजा निकलता है।
कर्मों से पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे?

कोरबा में जलभराव की समस्या को देखने निकले पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि पाली-सराईपाली कोयला खदान में भाजपा गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। साथ ही उन्होंने कुसमुंडा खदान में बड़े पैमाने पर कोयला और डीजल चोरी होने की बात भी कही।
पूर्व मंत्री के आरोप गंभीर हैं, लेकिन उतने नहीं जितना उन्होंने खुद कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में लगाए थे, खासकर 2023 के चुनाव नतीजों के बाद। तब उन्होंने अपनी हार का ठीकरा, अपनी ही सरकार की कार्यशैली पर फोड़ा था। उनका कहना था कि पूरी सरकार सिर्फ चुनिंदा लोगों के भरोसे चलती रही, बाकी मंत्रियों को ताकत ही नहीं दी गई। साजिश के तहत आईएएस-आईपीएस अफसरों ने विकास कार्यों को रोकने साजिश रची। कलेक्टरों ने पैसों के भुगतान रोक दिए। कबाड़ और डीजल चोरी को संरक्षण मिला। बाहर के गुंडों को कोरबा में बसाया गया और अपराध कराए गए, ताकि हमारी बदनामी हो। वैसे, हाल ही में कोयला खदान में वर्चस्व को लेकर खूनी संघर्ष भी हुआ, जिसमें एक जान चली गई थी। ऐसे में जयसिंह अग्रवाल की चिंता जायज है, लेकिन वे खुलकर यह नहीं कह पाए कि जब हमारी अपनी सरकार थी तब भी चोरी-रंगदारी रोक नहीं पाए, हाथ बंधे थे। अब भाजपा सरकार है, जिसने तब इसे बड़ा मुद्दा बनाया था, तो अब तो चोरी-रंगदारी बंद होनी चाहिए।
इधर, भाजपा के जिला अध्यक्ष गोपाल मोदी ने अग्रवाल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कोयला लेवी घोटाले में जेल गए अफसरों और कारोबारियों के नाम गिना डाले। कहा कि ये सब उन्हीं की सरकार के खास थे।
दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं कि भाजपा सरकार पर कांग्रेस को आक्रामक रहना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि जैसे ही कांग्रेस हमला बोलती है, भाजपा नेता घाव कुरेद देते हैं। यह उतनी पुरानी बात नहीं कि आम लोगों के दिमाग से मिट गई हो। सत्ता में रहते कुछ लोग मजे लूटते रहे और अब हार के बाद पूरे संगठन को उन पांच सालों का बोझ उठाना पड़ रहा है।
चंद्रमा के गड्ढ़ों जैसा हाइवे!

बारिश के बाद छत्तीसगढ़ के हाईवे की हालत देखकर लोग सोच रहे हैं कि विकास की मंजिल तक अपना प्रदेश क्या इन रास्तों से ही गुजरकर पहुंचेगा ? दूर से तस्वीर देखें तो ऐसा लगेगा, जैसे चांद या मंगल ग्रह की सतह हो। लेकिन गौर से देखो तो समझ आता है कि ये हमारे अंबिकापुर-बलरामपुर राष्ट्रीय हाईवे, या कबीरधाम-जबलपुर बाईपास या बिलासपुर का मोकपा बाईपास हो सकता है।
पूरी सडक़ में बड़े-बड़े गड्ढे, पानी और कीचड़ से भरे रास्ते, कहीं गाड़ी पलटी तो कहीं लोग घंटों जाम में फंसे। हालत यह है कि गाडिय़ां और जान दोनों खतरे में पड़ गई हैं। ऊपर से जनता के करोड़ों रुपये भी इसी कीचड़ में बह गए।
पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने सोशल मीडिया पर सडक़ की फोटो डालते हुए तंज कसा कि भाजपा के डबल इंजन सरकार में छत्तीसगढ़ में डबल भ्रष्टाचार चल रहा है।
.....इसलिए रेड, सर्वे ठंडे पड़े हैं
बुधवार को ट्रेड यूनियनों ने देशभर में हड़ताल की। मोदी काल में करीब तीन साल बाद यह हड़ताल हुई। नौ से दस संगठनों की यह हड़ताल उनके नजरिए हिस्सेदारी के मुताबिक सफल रही। बैंक बीमा डाक टेलीफोन और आयकर कर्मचारी एक पंडाल में जुटे। इसी दौरान आयकर विभाग के अधिकारी कर्मचारियों से चर्चा हो रही थी। हमने पूछ लिया, क्या सर हड़ताल कर रहे आज कल फुर्सत में हैं लगता हैं।
रेड, सर्वे नहीं कर रहे हैं। पिछला अंतिम रेड सर्वे कब हुआ हम अखबार वाले भूल गए। वो कहने लगे, आप लोग ही नहीं हम लोगों को भी याद नहीं। कारण पूछा तो कहने लगे- दिल्ली महानिदेशालय से लेकर सर्किल स्तर तक पूरा महकमा इन दिनों आयकर रिफंड क्लेम, आयकर अपील के मामले निपटाने में जुटा हुआ है। ताकि ब्याज की भरपाई से बचा जा सके। अपील हारने पर हर माह हाफ पर्सेंट ब्याज देना पड़ता है। जो एग्जाई रूप में करोड़ों रुपए होते हैं। इससे बचने वित्त मंत्रालय से ही निर्देश हैं, इसलिए रेड, सर्वे ठंडे पड़े हैं। और फिर अब 18-19 राज्यों में डबल इंजन की सरकारें हैं। सब अपने ही हैं। कार्रवाई खतरे से खाली नहीं है। कहने लगे यह काम इस समय सीबीआई, ईडी ने सम्हाला रखा है। और हम लोग फुर्सत में हैं।
सुरक्षा निधि चेक विभाग ने भुनाया
प्रदेश में तकनीकी विकास और तकनीकी शिक्षा विकास के लिए दो विभाग कार्यरत हैं। इनमें एक तकनीकी शिक्षा विभाग और दूसरा सूचना प्रौद्योगिकी विभाग। ये विभाग अपने अपने तरीके से स्वयं या निजी उपक्रमों की मदद से छत्तीसगढ़ को डिजिटल बनाने जुटे हुए हैं। इसमें एक विभाग ने देश की नामी गिरामी आईटी कंपनी से अनुबंध किया हुआ है। यह अनुबंध एक दशक पहले हुआ था। कंपनी ने अपनी वफादारी साबित करने डेढ़ सौ करोड़ से अधिक की सुरक्षा निधि जमा कर रखा है। कंपनी ने शुरुआत में अच्छा काम किया और फिर उसके काम पर उंगलियां उठने लगी। पिछली सरकार ने कंपनी के किए काम का भुगतान भी रोका और काम भी नहीं दिया।
सरकार बदली तो भी हालात जस के तस बने हुए हैं। और अब खबर है कि कंपनी की सुरक्षा निधि के चेक को विभाग ने भुना लिया है। अब इसे लेकर कंपनी और विभाग आमने-सामने हो गए हैं। कंपनी इसे गैर कानूनी कह रही तो विभाग काम के अभाव में इस पर अपना हक जता रहा। इस द्वंद्व में कंपनी अपने विधि विशेषज्ञ से रायशुमारी कर रही है। अब देखना है कि कंपनी कोर्ट जाती है या नहीं।
फिर जोड़ी के दिन आयेंगे? फिर ढाई....

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े रायपुर आए, तो उन्होंने राजीव भवन में पहले पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी, और फिर प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारियों के साथ मंत्रणा की। वे साइंस कॉलेज मैदान में कार्यकर्ताओं के उत्साह, और सभा में भीड़ देखकर गदगद थे। बैठक में उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव में हार के लिए कार्यकर्ता जिम्मेदार नहीं हैं, यह स्पष्ट हो गया है।
उन्होंने पूर्व सीएम भूपेश बघेल, और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव से कहा कि आप लोग साथ-साथ दौरा क्यों नहीं करते हैं? खडग़े का इशारा पार्टी नेताओं के तमनार दौरे की तरफ था। पूर्व सीएम, और अन्य नेता तमनार में पेड़ कटाई का जायजा लेेने अलग-अलग गए थे।
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत से खडग़े ने कहा कि आप सबसे सीनियर हैं। इसलिए समन्वय बनाने की जिम्मेदारी भी आपकी है। खडग़े की टिप्पणी के बाद पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि जय-वीरू की जोड़ी (भूपेश, और टीएस सिंहदेव) फिर बन सकती है। यह जोड़ी प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही टूट गई थी। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
सेवादल के सम्मान की हिदायत
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़ेे, प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज से नाखुश दिखे। सभा में बैज ने सेवादल के कार्यकर्ताओं को कई बार डपट दिया था। एक-दो बार यह कहते सुने गए कि सेवादल, आप लोग व्यवस्था ठीक करिए। उस वक्त तो खडग़े ने कुछ नहीं कहा। बाद में राजीव भवन की बैठक में कह दिया कि सेवादल के कार्यकर्ता किसी के नौकर नहीं हैं।
उन्होंने बैज का नाम लिए बिना कहा कि आप लोगों को सेवादल के कार्यकर्ताओं से ठीक से ट्रीट करना चाहिए। ये पार्टी का झंडा उठाते हैं, और उनके सम्मान से पेश आना चाहिए। सभा के दौरान खडग़े कई बार नारेबाजी से नाराज भी हुए। और जब पूर्व सीएम भूपेश बघेल के समर्थन में एजाज ढेबर के समर्थकों ने नारेबाजी की, तो खडग़े ने डपट दिया, और कहा कि अपना जोश चुनाव के समय दिखाना।
पानी के साथ लोहा फ्री
बीजापुर जिले के गंगालूर के इलाके में बहने वाली नदी बेरुकी की यह तस्वीर है। पानी का रंग पूरी तरह लाल हो चुका है। इसी पानी का इस्तेमाल नहाने और मवेशियों के निस्तार के लिए करीब तीन दर्जन गांवों के लोग कर रहे हैं। ग्रामीण रोग का शिकार हो रहे हैं और मवेशियों की मौत हो रही है। ग्रामीण बोतलों में पानी भरकर कलेक्ट्रेट गए, कलेक्टर ने आश्वासन दिया, जल्द समाधान होगा। विधायक ने भी कहा कि समस्या गंभीर है, हल निकालने के लिए अधिकारियों से चर्चा करेंगे। इस पानी में लौह अयस्क मिला हुआ है। ग्रामीणों के मुताबिक बैलाडीला में एनएमडीसी के खनिज से निकले अयस्क की धुलाई के काम के बाद पानी नदी में छोड़ा जा रहा है। पिछले दिनों प्रभावित ग्रामीण करीब 50 किलोमीटर सफर करके बीजापुर भी पहुंचे थे, मगर एनएमडीसी के दफ्तर में किसी जिम्मेदार अधिकारी से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी, जबकि उन्हें मिलने के लिए समय दिया गया था। फिलहाल तक तो उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
दहाड़ की फिक्र नहीं, तो चिंघाड़ की किसे चिंता?
2014 से 2024 के बीच भारत सरकार ने ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों में करीब 1.7 लाख हेक्टेयर जंगल को विकास कार्यों, खासकर खनन के लिए मंजूरी दे दी। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कोयला और खनिज खनन का है।
सरिस्का टाइगर रिजर्व, जो अरावली की पहाडिय़ों में है और रणथंभौर जैसे टाइगर कॉरिडोर से जुड़ा है, वहां हाल ही में केंद्र सरकार के स्थायी वन्यजीव बोर्ड ने 48.39 वर्ग किमी संरक्षित जंगल को खनन के लिए हरी झंडी दे दी। बदले में 90.91 वर्ग किमी उजाड़ जंगल जोड़ देने की बात कही गई। मानो, हीरा लेकर कांच का टुकड़ा देना- यहां हीरे की जगह पर आप संगमरमर को रख सकते हैं। पर्यावरण एक्टिविस्ट कह रहे हैं कि जो जंगल बदले में दिया जा रहा है, दरअसल वह वन्यजीवों के अनुकूल ही नहीं। इस फैसले से 50 खदानों को मंजूरी मिल गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट 1990 से लेकर 2024 तक कई बार खनन रोकने के आदेश दे चुका है। 15 मई 2024 को तो कोर्ट ने यहां 68 खदानों को बंद करने का आदेश दिया और राजस्थान सरकार को फटकार भी लगाई। बावजूद इसके खनन की इजाजत मिल गई। पर्यावरणविद कह रहे हैं कि यह टाइगर कॉरिडोर पर सीधा हमला है।
अब छत्तीसगढ़ की सुनिए। हसदेव अरण्य के जंगलों में भी यही कहानी दोहराई जा चुकी है और यह अब भी जारी है। ये वही इलाका है जहां हाथियों का प्राकृतिक रहवास हैं। और एलिफेंट कॉरिडोर बनाने का फैसला लिया जा चुका है। यह विरोध थमा भी नहीं है कि रायगढ़ जिले के मडग़ांव और सरितोला गांवों के बीच 200 एकड़ जंगल साफ कर दिया गया। यहां के गारे-पेलमा सेक्टर-2 में महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी और अदाणी समूह मिलकर नई कोयला खदान शुरू करने जा रहे हैं।
राजस्थान की तरह स्थानीय आदिवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता यहां पर भी पिछले कई वर्षों से जंगल बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने वन अधिकार अधिनियम, 2006 और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के उल्लंघन के खिलाफ एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट तक दस्तक दी है। कई ग्राम सभाओं ने खनन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए, लेकिन उनकी असहमति को फर्जी दस्तावेजो से बदल दिया गया, और जंगल को काटने का फ्री पास जारी कर दिया गया। जब प्राथमिकता सिर्फ मुनाफा और उद्योगपतियों की सुविधा हो, तो न आदिवासी की आवाज सुनी जाएगी, न अदालत के आदेशों का मान रखा जाएगा। जिन बाघों की आबादी बढ़ाने के लिए नए-नए टाइगर रिजर्व बनाए जा रहे हों, उनकी फिक्र नहीं हो तो, हाथियों की फिक्र कौन करेगा?
डीजीपी लेट होने की वजह
डीपीसी के बाद भी डीजीपी के आदेश को लेकर सस्पेंस कायम है। केन्द्र सरकार ने दो नाम का पैनल राज्य को भेज दिया है। राज्य सरकार किसी एक नाम पर मुहर लगाकर आदेश जारी करेगी। आईपीएस के वर्ष-92 बैच के अफसर अरुण देव गौतम डीजीपी के प्रभार पर हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि गौतम का ही नियुक्ति आदेश जारी होगा।
आदेश जारी होने में विलंब क्यों हो रहा है, इसको लेकर कई तरह की चर्चा है। एक चर्चा यह भी है कि 15 जुलाई को कैट में डीजीपी पद पर पदोन्नति के खिलाफ सीनियर आईपीएस पवन देव की याचिका पर सुनवाई होगी। पवन देव ने डीजीपी पद पर डीपीसी को लेकर याचिका दायर की है। हालांकि इस प्रकरण में कैट ने स्थगन नहीं दिया। पवन देव भी 92 बैच के अफसर हैं, और सीनियरिटी में नंबर-वन पर हैं। जानकारों का मानना है कि कैट की सुनवाई पर सरकार की नजर है, और कुछ अप्रत्याशित नहीं होता है, तो विधानसभा सत्र निपटने के बाद डीजीपी की नियुक्ति आदेश जारी हो सकता है।
प्रशासन में तेजी के लिए निजी कंसल्टेंसी
सरकारी काम में लालफीताशाही रोकने केंद्र और राज्य सरकारों ने कई प्रयास किए। कई पुराने औचित्यहीन नियम उप नियमों को खत्म भी किया। और केंद्र राज्य स्तर पर प्रशासनिक सुधार आयोग भी बनाए। छत्तीसगढ़ में भी सबसे पहले प्रथम मुख्य सचिव स्व.अरुण कुमार और फिर पूर्व सीएस एसके मिश्रा आयोग बनाया गया। उसके सुझाव भी आए। इनमें एक था विभागों में कुछ हाईटेक प्रोफेशनल को आउटसोर्स कर संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्त किया जाए। नियुक्तियां हुई भी। अब इनकी उपादेयता को लेकर दावे प्रतिदावे हो रहें हैं। लेकिन कामकाजी सुझाव लागू करने को लेकर वही किंतु परंतु का लोचा रहा है। इन सुझावों को ताक पर रख केंद्र सरकार ने एक बार फिर नए सिरे से सुझाव जुटाने की पहल की है। इस बार ये सुझाव किसी सरकारी आयोग से नहीं निजी कंसल्टेंसी फर्म से लेने की तैयारी है।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने नौकरशाही में सुधार के लिए एक निजी सलाहकार को नियुक्त किया है। सलाहकार नौकरशाही सुधारों के लिए एक रोडमैप की सिफारिश कर सकता है। केंद्र ने सुधार के क्षेत्रों की पहचान करने और आवश्यक बदलावों को लागू करने के लिए इस बाहरी विशेषज्ञता की मांग की है। यह कंसल्टेंट नौकरशाही के मौजूदा सेटअप का विश्लेषण करने, उनमें आ रही बाधाओं की पहचान करने और लागू किए जा सकने वाले समाधानों के सुझाव करने की उम्मीद है। डीओपीटी इसे डिजिटल प्रशासन को अपनाने और दक्षता को बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया कदम बता रहा है।
सत्ता की नजाकत को यूं समझाया

मैनपाट के चिंतन शिविर में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की सांसदों-विधायकों के लिए एक नसीहत थी। कहा- पद अस्थिर है। यदि ठेकेदारों और रिश्वत से समझौता कर लिया गया तो दोबारा चुनकर आने की बात न सोचें। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की रेस में शामिल बताया जा रहा है। जब वे सांसदों विधायकों के साथ मैनपाट भ्रमण पर निकले तो अनोखी जगह उल्टा पानी गए। जब उन्होंने कागज की नाव को पानी में डाला तो ऐसा लगा मानो नड्डा के भाषण के इस बात को वे प्रयोग करके समझा रहे हैं। नाव ढलान से चढ़ाई की तरफ गई जो अपनी तासीर के मुताबिक थोड़ी दूर जाकर पलट गई। कागज की नाव एक मुहावरा है जो किसी भी अस्थिर, अस्थायी या कमजोर चीज के लिए इस्तेमाल होता है।
मोबाइल बाहर, राज भीतर
मैनपाट में भाजपा का प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। पहले दिन तीन सत्र हुए। वैसे तो प्रशिक्षण कार्यक्रम सुबह 8 बजे से शुरू होना था, लेकिन कई सांसद-विधायकों के विलंब से पहुंचने की वजह से देर से शुरू हुआ और रात साढ़े 10 बजे तक चला।
उद्घाटन सत्र में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा की टिप्पणी काफी चर्चा में रही। उन्होंने मंत्री-विधायक और सांसदों को आगाह किया कि भ्रष्टाचार की शिकायत नहीं आनी चाहिए। भ्रष्टाचार की वजह से सरकार बनती-बिगड़ती है। नड्डा यही नहीं रूके, उन्होंने सांसद-विधायकों को आम लोगों के प्रति संयमित व्यवहार रखने की सलाह भी दी।
पहले दिन सत्र में पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बी.एल. संतोष का भी उद्बोधन हुआ। चूंकि सारे विधायक और सांसदों के मोबाइल बाहर ही रखवा लिए गए थे। इसलिए बैठक की बातें ज्यादा नहीं निकल पाई।
भाजपा के वकील चर्चा में

प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री नरेशचंद्र गुप्ता के ट्वीट की काफी चर्चा हो रही है। उन्होंने शराब घोटाला मामले पर ईओडब्ल्यू-एसीबी की कार्रवाई को संदिग्ध, और मनमाना बता दिया।
उन्होंने जांच एजेंसी पर घोटाले के आरोपियों को बचाने का मढ़ दिया। गुप्ता के ट्वीट की गुंज मैनपाट तक सुनी गई। चर्चा है कि कुछ नेताओं ने गुप्ता से पूछताछ भी की है।
बताते हैं कि गुप्ता विधानसभा, और लोकसभा चुनाव में पार्टी के चुनाव आयोग से जुड़े कार्यों के प्रमुख रहे हैं। पार्टी में सबसे ज्यादा शिकायत गुप्ता ने की थी। और तो और सरकार बनने के बाद डीजीपी अशोक जुनेजा के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत पर कार्रवाई होना तो दूर जुनेजा को एक्सटेंशन मिल गया। वो सम्मानजनक तरीके से रिटायर भी हो गए। ऐसे कई मामले हैं जिन्हें पार्टी ने गुप्ता ने उठाया, और कार्रवाई नहीं हुई। अब जब अपनी सरकार की एजेंसी पर सवाल उठाए हैं, तो पार्टी के अंदरखाने में हलचल है। कुछ लोग इसे अनुशासन से जोडक़र भी देख रहे हैं। देखना है कि पार्टी गुप्ता के ट्वीट को किस रूप में लेती है।
दारू बंदी!!

मैनपाट शिविर की व्यवस्था में सरगुजा, और अन्य जगहों के नेताओं की ड्यूटी लगाई गई है। हालांकि उन्हें शिविर में प्रवेश की अनुमति नहीं है, लेकिन वो खाने-पीने से लेकर अलग-अलग इंतजाम देख रहे हैं। इन सबके बीच जिला प्रशासन के एक आदेश की काफी चर्चा रही है।
प्रशासन ने दो दिन मैनपाट में शराब बिक्री पर रोक लगा दी है। चर्चा है कि यह आदेश पार्टी के रणनीतिकारों की सलाह पर निकाला गया है। मगर, वो छोटे कार्यकर्ता नाखुश रहे जो व्यवस्था के बहाने समय निकालकर पार्टी करने की उम्मीद से थे। इन सबको प्रशासन का आदेश पसंद नहीं आया।
हमले के लिए पेड़ का सहारा

बारिश के बीच रायपुर के साईंस कॉलेज मैदान में कांग्रेस की जनसभा भीड़ के मामले में सफल रही है। खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, और प्रभारी महामंत्री के.सी.वेणुगोपाल ने प्रदेश के नेताओं की तारीफ की। खडग़े की सभा और बैठक का निचोड़ यह रहा कि पार्टी आने वाले दिनों में जल, जंगल, और जमीन के मुद्दे पर आंदोलन तेज करेगी।
सभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत, पूर्व सीएम भूपेश बघेल और अन्य वक्ताओं ने हसदेव-तमनार में पेड़ कटाई के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। खडग़े ने राजीव भवन की बैठक में पेड़ कटाई के मामले में आंदोलन के साथ-साथ कानूनी विकल्प का भी रास्ता तलाशने की नसीहत दी है।
सभा में भाजपा के एक पेड़ माँ के नाम अभियान पर कटाक्ष किया गया, और नया नारा निकला कि एक पेड़ माँ के नाम, और पूरा जंगल अडानी के नाम।
तिब्बती मेजबान
मैनपाट के खुशनुमा माहौल में भाजपा का तीन दिनी प्रशिक्षण शिविर आज शुरू हुआ। शिविर में हिस्सा लेने के लिए मंत्रियों, सांसदों-विधायकों के देर रात तक मैनपाट पहुंचने का सिलसिला चलता रहा। सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ट्रेन से तडक़े अंबिकापुर पहुंचे, और फिर मैनपाट के लिए रवाना हो गए।
बस्तर के एक-दो विधायक तो परिवार साथ लेकर पहुंचे थे, लेकिन शिविर में तो सिर्फ विधायक के ही रहने का इंतजाम था। मैनपाट में भी सारे रिसार्ट पहले से ही बुक हो चुके हैं। लिहाजा, पार्टी कार्यकर्ताओं ने परिवार वालों के लिए मैनपाट से दूर कार्यकर्ताओं के घर ठहरने की व्यवस्था की।
मैनपैट में दशकों से बेस तिब्बती भी मेहमाननवाजी में पीछे नहीं रहे। और अपने यहां रूकने की व्यवस्था की। सरकार पर्यटन क्षेत्रों में होम स्टे को बढ़ावा दे रही है। पूरा कार्यक्रम तिब्बती समाज के सामुदायिक भवन में हो रहा है। यहां समाज के लोगों ने बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा के 90 साल पूरे होने के मौके पर जन्मदिवस को उत्साहपूर्वक मनाया। इसमें भाजपा के नेता भी शामिल हुए।
सरगुजा का स्वाद
सरगुजा में भारी बारिश हो रही है, और इसके बीच सोमवार से मैनपाट में भाजपा का प्रशिक्षण शिविर शुरू हो रहा है। अंबिकापुर में तो बारिश के चलते लोगों के घरों में पानी घुस गया है, लेकिन ऊंचाई पर स्थित मैनपाट का माहौल खुशनुमा हो चला है। शिविर को सरगुजिया टच देने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं।
शिविर की व्यवस्था में जुटे स्थानीय भाजपा नेताओं ने विधायक-सांसदों के लिए खास तौर सरगुजिया भोजन का बंदोबस्त किया है। अतिथियों को लजीज पुट्टु, और कोचई (अरबी) पत्ते की सब्जी के साथ-साथ सुगंधित सरगुजिया चावल परोसे जाएंगे। शिविर में शाकाहार पर जोर दिया गया है, इसलिए नॉनवेज की व्यवस्था नहीं है। इससे नॉनवेज के शौकीन नेताओं को निराश होना पड़ सकता है।
कुछ बड़े नेताओं ने अपने निज सहायक, और सुरक्षा कर्मियों को भी शिविर स्थल के आसपास ठहराना चाह रहे थे, लेकिन उन्हें साफ तौर पर मना कर दिया गया। शिविर स्थल के आसपास दो किमी तक बाहरी व्यक्ति के प्रवेश की अनुमति नहीं होगी।

रेल लाइन में लिए मौका
भाजपा के प्रशिक्षण शिविर को लेकर काफी उत्सुकता है। पूरी विष्णुदेव साय कैबिनेट तीन दिन मैनपाट में रहेगी। इन सबके बीच सरगुजा रेल संघर्ष समिति ने अंबिकापुर-रेणुकूट रेल लाइन की मांग को लेकर बकायदा एक ज्ञापन तैयार किया है।
समिति के सदस्यों ने सभी विधायक-सांसदों तक अपना मांग पत्र पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। समिति के सदस्यों ने उक्त रेल लाइन की मांग को लेकर रेणुकूट से अंबिकापुर तक करीब डेढ़ सौ किमी तक पदयात्रा की थी। खास बात ये है कि इस रेल परियोजना को लेकर स्थानीय विधायकों के बजाए तखतपुर के विधायक धर्मजीत सिंह ज्यादा मुखर रहे हैं।
उन्होंने विधानसभा में अशासकीय संकल्प लाया था, और सर्वसम्मति से पारित भी हुआ था। मगर यह परियोजना अभी सर्वे की स्थिति में ही है। अब पूरे विधायक-सांसदों का समर्थन मिले, इसके लिए समिति के सदस्यों ने कोशिश में लगे हैं, ताकि पिछड़े सरगुजा इलाके में रेल सुविधाओं का विस्तार हो सके। देखना है कि विधायक-सांसदों का क्या रुख रहता है।
जो उम्मीद से हैं
भाजपा का प्रशिक्षण शिविर के बाद 14 जुलाई से विधानसभा का पावस सत्र शुरू हो रहा है। अब सत्र तक साय कैबिनेट के विस्तार की संभावना नहीं दिख रही है। विस्तार आगे कब होगा, यह भी तय नहीं है। मगर कई विधायक प्रयासों में कोई कमी बाकी नहीं रखे हुए हैं। इन सबके बीच एक महिला विधायक ने पीताम्बरा पीठ दतिया में तीन दिन तक पूजा कराई है। पीताम्बरा पीठ की काफी मान्यता है, और विशिष्ट लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए यहां अनुष्ठान भी कराते हैं।
महिला विधायक को कैबिनेट में जगह पाने की उम्मीद थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब भगवान का ही सहारा है। इन सबके बीच महासमुंद जिले के एक नए नवेले विधायक ने मंत्री बनने के लिए जिस तरह जोड़तोड़ कर रहे हैं, उसकी भी काफी चर्चा है। खास बात यह है कि कई सीनियर विधायक पहले से ही दौड़ में हैं। ऐसे में नए नवेले विधायक को अपने लिए काफी उम्मीद दिख रही है। उनके करीबियों का दावा है कि संघ परिवार भी नए नवेले विधायक के समर्थन में है। कैबिनेट विस्तार कब होगा, यह तय नहीं है। फिलहाल तो सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमा-लट्ठा।


