राजपथ - जनपथ
राज्यसभा एक सीट 21 दावेदार
प्रदेश से राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव को लेकर राजधानी से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज हो गई है। नामांकन की तारीख नजदीक आते ही राजनीतिक गतिविधियां भी रफ्तार पकड़ रही हैं। भाजपा में चुनाव को लेकर पार्टी रणनीतिकारों की बैठक हो चुकी है और संभावित नामों पर मंथन जारी है। संगठनात्मक संतुलन, सामाजिक समीकरण और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद को ध्यान में रखकर अंतिम निर्णय लिए जाने की चर्चा है।
वहीं कांग्रेस खेमे में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त ने सरगर्मी और बढ़ा दी है। एक सीट के लिए करीब 21 नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। इनमें वे नेता भी शामिल हैं जिनकी विधानसभा चुनाव में टिकट कट गई थी और अब वे राज्यसभा के जरिए सक्रिय राजनीति में नई पारी की उम्मीद लगाए हैं। दावेदारों में पूर्व मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पूर्व सलाहकार राजेश तिवारी भी सक्रिय बताए जा रहे हैं। हालांकि भूपेश बघेल स्वयं राज्यसभा जाने की संभावना से इनकार कर चुके हैं। इसके अलावा पूर्व मंत्री अमरजीत भगत, शिवकुमार डहरिया, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और निवर्तमान राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम का नाम भी चर्चा में है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी नेतृत्व अनुभव, निष्ठा, क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन में किसे प्राथमिकता देता है। अगले कुछ दिनों में तस्वीर साफ होने की संभावना है।
आसमान खुला है, पर उड़ान बाकी
लोकसभा में 12 फरवरी को तृणमूल कांग्रेस की सांसद सजदा अहमद ने सरकार से पूछा कि क्या ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के विकास के लिए सिविलियन ड्रोन पर कोई राष्ट्रीय रोडमैप है? राज्यवार आंकड़े क्या हैं? स्वास्थ्य, कृषि और आपदा प्रबंधन में इनके उपयोग को कैसे बढ़ाया जा रहा है?
जवाब केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने दिया। उन्होंने बताया कि ड्रोन रूल्स 2021 (25 अगस्त 2021) और उसके बाद 2023-24 के संशोधनों से ड्रोन नीति को बेहद उदार बनाया गया है। 90 फीसदी भारतीय हवाई क्षेत्र को ग्रीन जोन घोषित कर दिया गया है, जहां बिना अनुमति उड़ान संभव है। पंजीकरण, डी-रजिस्ट्रेशन और ट्रांसफर की प्रक्रिया सरल की गई है। हालांकि दुरुपयोग रोकने के लिए टाइप सर्टिफिकेशन, वैध रिमोट पायलट सर्टिफिकेट और हथियार-विस्फोटक पर सख्त प्रतिबंध जैसे प्रावधान लागू हैं।
इसी सवाल के जवाब में बताया गया कि 31 जनवरी 2026 तक देश में 38,475 ड्रोन रजिस्टर्ड हैं। मगर, जब हम राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालते हैं तो अपने प्रदेश की तस्वीर चौंकाती है। महाराष्ट्र में 8210, तमिलनाडु में 5878, तेलंगाना में 3657 और कर्नाटक में 3258 ड्रोन पंजीकृत हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में यह संख्या सिर्फ 161 है। यानी देश के कुल ड्रोन का 0.4 प्रतिशत से भी कम।
यह स्थिति तब है जब हमारे पास सरगुजा और बस्तर जैसे विशाल वन क्षेत्र हैं, खनिज संपदा है, और दूर-दराज आदिवासी अंचल हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं आज भी चुनौती बनी हुई हैं। वनों में अवैध कटाई, शिकार रोकने, अवैध खनन रोकने और दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में दवाएं और वैक्सीन पहुंचाने के लिए इनकी मदद ली जा सकती है। दूसरे राज्य, जहां इसका इस्तेमाल हो रहा है, वहां फर्क दिख रहा है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में ड्रोन से प्रेसिजन फार्मिंग हो रही है। इससे कीटनाशक की 30-40 प्रतिशत और पानी की 90 प्रतिशत तक बचत हो जाती है। गुजरात में औद्योगिक सर्वे और इंफ्रास्ट्रक्चर मैपिंग में उपयोग हो रहा है। तेलंगाना में दवाओं की डिलीवरी और आपदा प्रबंधन में ड्रोन काम आ रहे हैं। इन राज्यों ने ड्रोन को तकनीकी खिलौना नहीं, बल्कि आर्थिक औजार माना है।
इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने अवैध खनन रोकने में सीमित ही सही ड्रोन का उपयोग शुरू किया है। कहीं-कहीं दवाएं भी भेजी गई। कृषि क्षेत्र में भी सीमित स्तर पर फसल मॉनिटरिंग और स्प्रेइंग हो रही है। केंद्र की सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन और नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत 40 से 75 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलती है। महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। लेकिन सच यह है कि छत्तीसगढ़ ने अभी तक अपनी अलग, स्पष्ट और आक्रामक ड्रोन नीति नहीं बनाई है। ड्रोन सिर्फ उडऩे वाली मशीन नहीं है। यह विकास की नई भाषा है। केंद्र ने नियम आसान कर दिए हैं, आसमान खोल दिया है। अब जिम्मेदारी राज्यों की है कि वे इस अवसर को पकड़ें। समय-समय पर सरकारें विभिन्न विषयों पर नीतियां घोषित करती हैं। लोकसभा में आया जवाब छत्तीसगढ़ को अपनी ड्रोन प्रमोशन पॉलिसी बनाने के बारे में सोचने का मौका देता है।
रतन टाटा, बीवीआर और अंडमान
एनजीटी ने पिछले दिनों 81 हजार करोड़ के ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही हिंद महासागर में भारत की सामरिक ताकत बढ़ाने और मलेशिया, मालदीव, सिंगापुर की तरह इस? द्वीप समूह को पर्यटन स्टेट बनाने की 2021 की योजना जमीन पर उतरने तैयार है। यह कांसेप्ट प्लान आते ही देश के शीर्ष उद्योग एवं हास्पिटैलिटी ग्रुप टाटा का इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड वहां 4 द्वीपों में इको-टूरिज्म रिसॉर्ट विकसित करने आगे आया । यह दिवंगत रत्न टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट भी बताया जाता है। एनजीटी के पेंच से प्रोजेक्ट आगे बढ़ नहीं पा रहा था। जुलाई -23 में वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पोर्ट ब्लेयर के उद्घाटन से लौट कर गृह मंत्री अमित शाह ने इस स्ट्रैटेजिकल और टूरिज्म के ड्रीम, मेगा प्रोजेक्ट की नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम को जिम्मेदारी दी। बीवीआर, छत्तीसगढ़ कैडर के रिटायर्ड आईएएस हैं। शाह ने ही उन्हें मोदी 2.0 में जम्मू-कश्मीर का मुख्य सचिव बनाया और धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले राज्य को वर्तमान विभाजित स्वरूप देने में सफल रहे।
बहरहाल एनजीटी में अंतिम सुनवाई से पहले बीवीआर ने टीम के साथ ग्रेट निकोबार द्वीपसमूह का दौरा किया और हर आपत्ति पर आंसर पेपर पेश किया।संयोग रहा कि इस टीम के दौरे के चंद रोज बाद ही रायपुर और चेन्नई के पत्रकारों का दल भी अंडमान के चार द्वीपों का भ्रमण किया था। वहीं अंडमान वन विभाग के अफसरों ने टीम के दौरे और टाटा के प्रोजेक्ट की जानकारी दी। बीवीआर का नाम सुनते ही हमने कहा- ये मेगा प्रोजेक्ट धरातल पर उतार कर रहेगा। वन अफसरों ने बताया टाटा समूह एवीस द्वीप, नील द्वीप, लॉन्ग द्वीप और स्मिथ द्वीप पर इको-रिजॉर्ट्स विकसित करेगा। लॉन्ग आइलैंड के लालाजी-बे में लगभग 391 करोड़ की लागत से 220 कमरे, और नील आइलैंड में 172 करोड़ से 120 कमरों वाला रिसॉर्ट शामिल है। 35 किमी तक विस्तारित, 1500-2000 की आबादी वाले लांग इस आइलैंड में कभी प्लाईवुड फैक्ट्री हुआ करती थी। जो बंद हो गई है। यह द्वीप बहुत खूबसूरत लोकेशन पर है। टाटा समूह का रिजार्ट आने पर रोजग़ार बढ़ेगा। एक और अहम संयोग,इस प्रोजेक्ट का आर्किटेक्चरल प्लान बनाने वाले दिल्ली की फर्म का एक योजनाकार (नाम प्रकाशित करने से मना किया) हमारे रायपुर का है। यहां बता दें कि टाटा समूह का हेवलॉक द्वीप पर पहले से मौजूद ‘ताज एक्जोटिका’ का निर्माण बिना पेड़ काटे किया गया है।
स्वीपर प्रसव कराए तो और क्या होगा?
सरगुजा जिले के लखनपुर विकासखंड में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) कुन्नी की घटना ने फिर से प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उजागर कर दिया। 16 फरवरी को एक गर्भवती महिला गौरी यादव को प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल लाया गया, तो वहां डॉक्टर और स्टाफ नर्स मौजूद ही नहीं थे। नतीजतन, वहां मौजूद स्वीपर ने डिलीवरी कराने की कोशिश की और नवजात की मौत हो गई। बच्चे की स्थिति 'ब्रिज प्रेजेंटेशन' थी। यह एक जटिल मामला था, मगर सामान्य हालात में भी किसी स्वीपर से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह डॉक्टर-नर्स के काम को संभाल लेगा। दोषियों को सख्त सजा देने के आश्वासन के साथ सीएमएचओ ने मामले की जांच बैठाने का ऐलान किया है। मगर, यह किसी एक परिवार की पीड़ा नहीं है। आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में सरकारी अस्पतालों की दशा दयनीय है। स्टाफ की कमी, उपकरणों का अभाव और प्रशिक्षण की कमी जैसी समस्याएं आम हैं। सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल जिलों में डॉक्टरों के गायब रहने से भगवान भरोसे वाली व्यवस्था चल रही है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में मातृ और शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों, सीएचसी और पीएचसी में केवल 30-40 प्रतिशत पद भरे हुए हैं। रात की ड्यूटी पर अक्सर कोई नहीं होता। इस घटना में भी अस्पताल में सिर्फ तीन स्टाफ नर्स थीं, जिनमें से अधिकांश छुट्टी पर थीं। ऐसे में स्वीपर को प्रसव जैसा संवेदनशील काम करना पड़ा।
छत्तीसगढ़ ने अपनी स्थापना की 25 सालों में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं, जो व्यवस्था की जड़ों में सड़ांध को दर्शाते हैं। 2014 में बिलासपुर जिले के तखतपुर में आयोजित नसबंदी कैंप में 83 महिलाओं की सर्जरी औसत 2 से 3 मिनट के भीतर कर दी गई। इस कैंप में 11 महिलाओं की मौत हो गई थी, जबकि दर्जनों गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। जांच में पता चला कि एक ही डॉक्टर ने एक बंद अस्पताल भवन के अस्वच्छ वातावरण में दर्जनों ऑपरेशन किए और दवाइयों में जहर था। घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचाया, लेकिन सुधार के नाम पर सिर्फ कुछ अधिकारियों को निलंबित या बर्खास्त किया गया। इसी तरह 2021 में अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में चार नवजातों की मौत हुई। यहां ऑक्सीजन की कमी और स्टाफ की लापरवाही सामने आई थी। अक्टूबर 2024 में दंतेवाड़ा के सरकारी अस्पताल में मोतियाबिंद सर्जरी के बाद 13 मरीजों को आंखों में संक्रमण हो गया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी कई बार स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर चिंता जताई है। 2025 में कोर्ट ने रायपुर के एम्स और अन्य सरकारी अस्पतालों की खराब स्थिति पर स्वत: संज्ञान लिया, जहां रीएजेंट और मेडिकल किट की कमी जैसी समस्याएं उजागर हुईं।
समस्या पूरे सिस्टम की है। विशेषज्ञों और तकनीशियनों की भर्तियों को टालकर केवल भवन बनाने और उपकरण की खरीदी में रुचि लेना, ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ डॉक्टरों की गैरहाजिरी ऐसी समस्याएं हैं जिस पर कोई भी स्वास्थ्य मंत्री या विभागीय सचिव गहरी रूचि लेकर समाधान का इरादा नहीं दिखाते। नतीजतन, गरीब और ग्रामीण आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित है।
लखनपुर के मामले में स्वीपर ने नेक नीयत से ही प्रसव की जिम्मेदारी ली होगी, पर उसकी अपनी क्षमता है। डॉक्टर-नर्स क्यों मौजूद नहीं थे इस पर सवाल है। जिस मां ने अपने नवजात को खोया है, क्या उसे कोई मुआवजा मिलेगा?
लोकसभा की तर्ज पर आसंदी

जैसा कि हमने इसी कालम में पिछले दिनों बताया था उसी अनुरूप नई विधानसभा के सदन में आसंदी की व्यवस्था में बदलाव किया गया है। इसे लोकसभा, राज्यसभा की तर्ज पर नया रूप दिया गया है। पहला यह कि अध्यक्ष की आसंदी की ऊंचाई कम की गई है। दूसरी यह कि आसंदी के दोनों तरफ यानी दाएं बाएं सिरे से वहां पहुंचा जा सकेगा। वैसे दोनों ओर से एंट्री एग्जिट का उपयोग, नए चुनाव उपरांत सदस्यता की शपथ के बाद अध्यक्ष के अभिवादन के दौरान किया जाता है। इससे पुरानी विधानसभा में 25 वर्ष और इस नए भवन में भी पिछले शीत सत्र तक एक ही तरफ की व्यवस्था थी। शीत सत्र के बाद सचिवालय ने सदन के भीतर की बनावट में कुछ बदलाव किया है। जो इसे लोकसभा की आसंदी का लुक दे रहा है।
52 एकड़ में 350 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बना नया विधानसभा भवन की खामियों दिक्कतों को शीत सत्र के दौरान सचिवालय ने नोट किया था। कुछ सुधार ली गई हैं और शेष को। मानसून सत्र तक दूर किया जाएगा।
प्रमुख खामियों में सदन में अध्यक्ष और सचिव की आसंदी को शेष सदस्यों से काफी दूर रखा जाना शामिल है। इसे पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने भी सदन में चर्चा के दौरान इंगित किया था। उन्होंने आसंदी की ऊंचाई कम करने कहा था ताकि अध्यक्ष सदन में प्रवेश करते नजर आएं।
निगम-मंडल पदाधिकारियों को नसीहत
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार और संगठन इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि मनोनीत निगम, मंडल, आयोग एवं प्राधिकरणों के साथ ही कुछ जिलों में जो उपरोक्त संस्थाओं के अनुरूप अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, उनको वेतन और भत्ते बंद कर दिए जाए। क्योंकि अधिकांश निगम मंडलों, संस्थाओं की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और सरकार भी उन्हें आर्थिक मदद करने की स्थिति में नहीं है। क्योंकि सरकार की मुफ्त की योजनाओं में 37 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि सरकार और संगठन के नेताओं के बीच प्रारंभिक चर्चा के मुताबिक सभी मनोनीत नेताओं की एक बैठक लेकर यह संदेश दिया जाएगा कि आप लोगों को जन सेवा के हिसाब से पदों पर नियुक्त किया गया है, उसे ईमानदारी से निर्वहन करें। यह भी निर्णय लिया कि अगर किसी को इस विषय पर आपत्ति हो तो वह अपने पद से त्यागपत्र दे सकते हैं।
इसमें यह बात भी सामने आयी कि सिर्फ वाहन पर महीने डीजल पेट्रोल की खपत की भी एक सीमा तक ही अनुमति होगी। यह सरकार या उपरोक्त संस्थाओं से उन्हें प्राप्त होगी, जो जनहित में काम करने के लिए आने-जाने में कहीं कोई परेशानी ना हो।
सरकार और संगठन के बीच इस बात पर भी चर्चा हुई कि कुछ स्थानों पर शिकायतें आ रही है कि अवैध वसूली हो रही है, अगर यह सही है तो इसे नियंत्रित करना होगा या फिर ऐसे चेहरों की पहचान कर उन्हें पद से हटाया जाए, जैसे इन निगम मंडलों में कई पुराने नेताओं को वंचित रखा गया है। इसके पीछे लक्ष्य है कि अगले दो वर्ष में सरकार और संगठन की छवि जनसाधारण के बीच खराब ना हो। दरअसल भाजपा के ये पदाधिकारी कांग्रेस काल के पदाधिकारियों के कमाई के तौर तरीके इन नेताओं ने अफसरों से सुन सीख कर इस्तेमाल कर रखे हैं।
अधिक बोलने से उपजी दिक्कत
रमजान के मौके पर सरकारी मुस्लिम अधिकारी-कर्मचारियों को एक घंटा पहले कार्यालय छोडऩे की अनुमति देने की खबर सोशल मीडिया में छाई रही। कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त राज्य वक्फ बोर्ड के चेयरमैन डॉ. सलीम राज ने तो बकायदा एक बयान जारी कर सरकार के फैसले की सराहना की, और कहा कि विष्णुदेव साय सरकार हर जाति, धर्म, और पंथ व समाज की आस्था का सम्मान कर रही है, और यह पीएम नरेंद्र मोदी की सोच सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का ही स्वरूप है। बाद में सरकार ने इसका खंडन किया, और पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक विकास विभाग ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कर्मचारियों को एक घंटे पहले छोडऩे संबंधी कोई आदेश जारी नहीं किया गया।
प्रदेश में सरकारी नौकरियों में वैसे भी मुस्लिम अधिकारी-कर्मचारियों की संख्या काफी कम है। उनकी तरफ से एक घंटा पहले कार्यालय छोडऩे की मांग भी नहीं की गई थी। ये अलग बात है कि राज्य बनने के बाद से मुस्लिम अधिकारी-कर्मचारियों को रमजान के मौके पर एक घंटा पहले कार्यालय छोडऩे की अनुमति मिलती रही है। रमन सिंह सरकार में भी यह अनुमति थी। मगर भूपेश बघेल सरकार ने जब पुराने आदेश को जारी रखा तो कुछ संगठनों की तरफ से आपत्ति आई, और नवरात्र व अन्य हिन्दु त्यौहारों में भी इस तरह की छुट्टी देने की मांग की गई। मगर उस समय भी इस पर कोई ज्यादा विवाद नहीं हुआ। अब परिस्थितियां बदल गई है। और अब जब वक्फ बोर्ड चेयरमैन डॉ. राज ने अपने लेटर हेड से सरकार के आदेश की सूचना दी, तो विवाद खड़ा हो गया। और फिर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। अब डॉ. राज के पास खामोश रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा।
मटरगश्ती करते बच्चे
तेलीबांधा तालाब के किनारे मटरगस्ती करते बच्चों को देख अचानक बचपन की एक मीठी याद ताजा हो सकती है। बोरा दौड़- मोबाइल और वीडियो गेम के दौर में यह खेल भले ही कम दिखता हो, लेकिन छत्तीसगढ़ की गलियों और गांवों में इसकी धडक़न अब भी जिंदा है। तस्वीर में बच्चे बड़े उत्साह से बोरे में फुदकते दिख रहे हैं। चेहरों की मुस्कान बता रही है कि असली खुशी महंगे खिलौनों में नहीं, ऐसे ही सादे खेलों में छिपी होती है। कभी स्कूल के वार्षिकोत्सव में, तो कभी मोहल्ले की प्रतियोगिता में, बोरा दौड़ सबसे ज्यादा तालियां बटोरती थी। यह खेल संतुलन, हिम्मत और दोस्ती की सीख भी देता है।
एक अकेले गधे का आकर्षण
यह गधा आम नहीं है,यह विरला है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि यह पूरे अंडमान द्वीप के लांग आईलैंड में एक मात्र रह गया है। हाल में रायपुर और चेन्नई के पत्रकारों का संयुक्त दल वहां अध्ययन भ्रमण पर गया था। इस लांग आईलैंड पर समुद्र के भीतर टेलीफोन केबल परियोजना को देखा। वहीं पर इस गधे के बारे में जानकारी मिली। बस फिर क्या था दोनों ही शहर के पत्रकार उसे ढूंढने में लग गए। सभी पीपली लाइव फिल्म के टीवी चैनल के पत्रकारों की तरह 35 किमी लंबे आइलैंड के 9 किमी के दायरे में तलाशते रहे। आखिरकार वह आइलैंड के बीएसएनएल एक्सचेंज के पास मिला।
इसके बारे में आयलैंड के प्रधान (सरपंच) बी कामराज ने बताया कि कुछ वर्षों पहले यहां स्थापित प्लाईवुड फैक्ट्री (अब बंद) में लकड़ी आदि सामान ढोने पश्चिम बंगाल से दो नर- मादा गधे लाए गए थे। इनके दांपत्य जीवन से परिवार बढक़र 7 तक जा पहुंचा। प्रधान बताया कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र होने के कारण यह प्रजाति अधिक आक्रोशित होती है, नतीजतन आपसी झगड़े में इन गधों में से 6 मार दिए गए। यह एक ही बच गया है। यह सुनकर पत्रकारों ने गूगल सर्च किया और इस द्वीप को एक मात्र गधे वाला देश का एकमात्र प्रदेश का दर्जा दे दिया । हालांकि गूगल पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे कम गधे बताता है।
गूगल सर्च में पता चला कि 2019 की 20वीं पशुधन गणना के अनुसार, भारत में गधों की सबसे अधिक आबादी राजस्थान (लगभग 23,000+) में है, जबकि पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम में इनकी संख्या सबसे कम है, जहां कुछ राज्यों में इनकी संख्या 100 से भी नीचे है। देश में गधों की आबादी 2012 से 2019 के बीच 61 प्रतिशत से अधिक घटकर 1.2 लाख के करीब रह गई है।
धान खरीदी में फिर नई धांधली
इस बार छत्तीसगढ़ सरकार धान खरीदी के बढ़ते वित्तीय बोझ को कम करने के लिए कई प्रतिबंध लगा चुकी है। सख्त निगरानी की गई, यहां तक कि घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन किया गया ताकि अवैध भंडारण और बिक्री रोकी जा सके। लेकिन इसके बावजूद, खरीदी व्यवस्था में लगे कर्मचारी और अधिकारी सरकार को ठगने से बाज नहीं आ रहे हैं। करोड़ों रुपये के धान संग्रहण केंद्रों से रहस्यमय ढंग से गायब हो रहे हैं और जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई है। कलेक्टर के आदेश पर भी एफआईआर नहीं हो रही है। सक्ती और सूरजपुर जिलों से आई ताजा खबरें बता रही है कि इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए कोशिश ऊपर के स्तर से नहीं हो रही है।
सक्ती जिले में 2024-25 के दौरान धान भंडारण केंद्रों से बड़े पैमाने पर कमी की रिपोर्ट आई है। मार्केटिंग फेडरेशन की रिपोर्ट के मुताबिक जिले के तीन केंद्रों से कुल 66,680 क्विंटल धान गायब पाया गया है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 21 करोड़ रुपये है। परिवहन, गन्नी बैग, सूतली, कुली और सुरक्षा पर हुए खर्च को मिलाकर सरकार को लगभग 25 करोड़ का नुकसान हुआ है। मामला सामने आए चार महीने बीत चुके हैं और अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ औपचारिक जांच चल रही है, जो कब पूरी होगी पता नहीं। जिला विपणन अधिकारी ने अभी से कहना शुरू कर दिया है कि धान के गायब होने का कारण स्पष्ट नहीं है।
सूरजपुर जिले के एक धान खरीदी केंद्र सावरवन में भौतिक सत्यापन से 32,838 क्विंटल धान की कमी पाई गई, जिसकी कीमत 10 करोड़ से ज्यादा है। कलेक्टर के आदेश के बावजूद इस मामले में एफआईआर नहीं दर्ज हुई। प्रशासनिक छापों में आधा दर्जन से ज्यादा केंद्रों में करीब 20 करोड़ की कमी मिली है। एक फरवरी को भैयाथान के एसडीएम के निर्देश पर जांच टीम ने सावरवन केंद्र का आकस्मिक निरीक्षण किया। तो रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में बड़ा अंतर मिला। 82,095 बोरे धान गायब। 7,961 ज्यादा खाली बोरे मिले । जांच के दौरान रजिस्टर और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे मिलान ही अधूरा रहा रहा। जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि दस्तावेज जब्त कर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज की जाए, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार की सख्ती के बावजूद सिस्टम में भ्रष्टाचार जारी है। किसानों से धान खरीदकर भंडारण तक की प्रक्रिया में लाखों का खेल हो रहा है। जांच के नाम पर महीनों बीत जाते हैं, और बहाने जैसे चूहे खा गए या दीमक ने नष्ट कर दिया, दिए जाते हैं। फिर नया घोटाला हो जाता है और लोग पुरानी गड़बड़ी भुला देते हैं।
स्मृति स्तंभ में जीवन की कहानी
जंगल की नीरवता के बीच खड़ा यह मृतक स्मृति स्तंभ बस्तर की आत्मा का सजीव प्रतीक है। दूर से देखने पर यह रंगों से सजा एक साधारण ढांचा लगता है, लेकिन पास जाने पर इसमें एक पूरे जीवन की कहानी उकेरी दिखाई देती है। आदिवासी समाज में ही ऐसे स्मृति स्तंभ देखने को मिलेंगे।
इन पर बनी चित्रकारी मानो दिवंगत के जीवन का दस्तावेज है। कहीं खेती-बाड़ी के दृश्य हैं, कहीं पशु, कहीं नृत्य और उत्सव, तो कहीं रोजमर्रा के कामकाज। इससे मालूम होता है कि वह व्यक्ति कैसा जीवन जीता था, उसे क्या प्रिय था और समाज में उसकी क्या पहचान थी।
आदिवासी परंपरा में मृत्यु को यहां अंत नहीं माना जाता। स्मृति के रूप में व्यक्ति समाज के बीच जीवित रहता है। यह स्तंभ उन्हीं यादों का प्रहरी बनकर खड़ा है जो आने वाली पीढिय़ों को अपनी जड़ों, संस्कृति और सामुदायिक रिश्तों से जोडक़र रखेगा।
राज्यसभा के लिए जोड़तोड़
प्रदेश से राज्यसभा की दो रिक्त सीटों के लिए चुनाव होना है। इसे लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में हलचल तेज हो गई है। दोनों ही पार्टी को एक-एक सीट मिलना तय है। भाजपा में अब तक परंपरा रही है कि स्थानीय नेता को ही राज्यसभा भेजा जाए, इसलिए इस बार भी कई दावेदार सक्रिय नजर आ रहे हैं।
हालांकि इस बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का नाम भी चर्चा में है। लेकिन उनके गृह राज्य बिहार में पांच सीटों पर चुनाव हो रहा है, ऐसे में उनके बिहार से राज्यसभा जाने की संभावना अधिक मानी जा रही है।
इधर, प्रदेश में कई पूर्व विधायक अपनी संभावनाएं टटोल रहे हैं। प्रदेश भाजपा महामंत्री (संगठन) पवन साय करीब दो महीने बाद बंगाल से रायपुर पहुंचे तो उनसे मिलने नेताओं में होड़ लगी रही। पवन साय इन दिनों पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में रहकर 50 विधानसभा सीटों पर संगठन मजबूत करने में जुटे हैं।
रायपुर आगमन के बाद वे धमतरी में आरएसएस की बैठक में शामिल हुए। समयाभाव के कारण वे अधिक नेताओं से नहीं मिल पाए, लेकिन गुरुवार शाम को कोलकाता रवाना होते समय एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में पार्टी पदाधिकारी और कार्यकर्ता उनसे मिलने पहुंचे। इसमें विभिन्न मोर्चा-प्रकोष्ठों के पदाधिकारी भी शामिल थे।
भाजपा हमेशा राज्यसभा प्रत्याशी को लेकर चौंकाने का इतिहास रखती है। उदाहरण के तौर पर, विधानसभा चुनाव में लैलूंगा सीट से टिकट नहीं मिलने के बाद भी देवेन्द्र प्रताप सिंह को बाद में राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किया गया था, जिससे पार्टी के भीतर भी आश्चर्य हुआ था। स्वयं उन्हें भी इसकी उम्मीद नहीं थी।
भाजपा हारे हुए नेताओं से परहेज नहीं करती। उनकी राजनीतिक उपयोगिता को देखते हुए राज्यसभा भेजने का फैसला लेती रही है। विधानसभा चुनाव हारने के बाद रामविचार नेताम, और फिर लोकसभा चुनाव हारने के बाद सरोज पांडेय को राज्यसभा भेजा गया था। ऐसे में इस बार भी कई पराजित नेता उम्मीद लगाए बैठे हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नायब तहसीलदार से आईएएस
प्रदेश के 9 अधिकारियों को भारतीय प्रशासनिक सेवा का अवार्ड मिला है। इनमें 7 अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं, जबकि दो अधिकारियों का चयन अन्य सेवा संवर्ग से हुआ है। खास बात यह है कि पहली बार एक साथ दो अफसरों को अन्य सेवा से आईएएस अवार्ड हुआ है।
वित्त सेवा से ऋषभ पाराशर और जीएसटी विभाग के अधिकारी तरूण कुमार किरण को आईएएस अवार्ड प्राप्त हुआ है। अन्य सेवा संवर्ग से आईएएस में चयन की प्रक्रिया अलग होती है, जिसमें साक्षात्कार के माध्यम से चयन किया जाता है।
सरकार ने विभिन्न विभागों से 10 अधिकारियों के नाम भेजे थे। इनमें ऋषभ पाराशर, तरूण कुमार किरण के अलावा श्रुति प्रसन्ना नेरकर, पवन कुमार गुप्ता, विनय गुप्ता, पी.एल. साहू, अभिषेक त्रिपाठी, राकेश पुराम, संतोष मौर्या और धीरज नशीने शामिल थे। इनमें से पाराशर और किरण का चयन हुआ।
डिप्टी कलेक्टर से आईएएस बनने वालों में वीरेंद्र पंचभाई का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने नायब तहसीलदार के रूप में सेवा की शुरुआत की थी, इसके बाद डिप्टी कलेक्टर बने और अब आईएएस में पहुंचे हैं। राज्य गठन के बाद पंचभाई ऐसे पहले अधिकारी हैं जिन्होंने इतना लंबा सफर तय किया है। आमतौर पर डिप्टी कलेक्टर पद से शुरू करने वाले ही प्रमोशन के बाद आईएएस तक पहुंचते हैं।
कहां है एनईपी की स्वास्थ्य समिति ?
धमतरी जिले के दहदहा गांव के सरकारी मिडिल स्कूल में कक्षा 6 से 8 के 14 लड़कियों सहित 35 छात्रों ने बीते पांच महीनों के दौरान अपनी कलाई पर ब्लेड, पिन या दूसरी नुकीली धातु से चोटें पहुंचा ली। जांच में इसे 'पीयर इमिटेशन' बताया गया, बिना किसी मनोवैज्ञानिक विकार या नशे के।
इसे छात्रों में सहपाठी दबाव (पीयर प्रेशर) के खतरा बताया है। इसे युवा होते किशोरों के बीच आत्मविश्वास को तोडऩे और नकारात्मक व्यवहार के रूप में देखा जाता है, जिससे वे खुद को चोट को भी पहुंचा सकते हैं। धमतरी के स्कूल में यह नकल के चलते संक्रामक हो गया, जो शिक्षा संस्थानों में अब तक देखी जा रही समस्या- जैसे मारपीट की घटनाओं से अलग है।
मामले में जिला शिक्षा अधिकारी ने स्कूल प्रिंसिपल को शो-कॉज नोटिस दी है। शिक्षकों की सतर्क रहना चाहिए, कक्षा के बाहर की गतिविधियों नजर रखनी चाहिए यह बात ठीक है, पर वास्तव में अब तो शिक्षकों का छात्रों के साथ संवाद की ही कड़ी टूटती जा रही है। ऐसे बहुत कम शिक्षा संस्थानों में देखा जा रहा है, जहां बच्चों के साथ भावनात्मक लगाव रखते हुए, घुल-मिलकर उनके लक्ष्यों, प्रयासों पर बात करते हों। निजी स्कूल व्यावसायिक हो चुके हैं, जिनके शिक्षकों के लिए सिर्फ मार्कशीट के नंबर मायने रखते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों के शिक्षक नौकरी के स्थायित्व के चलते निश्चिंत होते हैं और बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण को अपना दायित्व मानकर नहीं चलते।
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य समिति अनिवार्य करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( एनईपी 2020) पर चर्चा इस मौके पर जरूरी है। इसमें विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग पोर्टल और गोपनीय शिकायत तंत्र बनाना शामिल है। यह प्रावधान छात्रों में तनाव, अवसाद रोकने की जरूरत को देखते हुए किया गया।
छत्तीसगढ़ सरकार लगातार दावा करती है कि एनईपी के प्रावधानों को लागू करने वाला वह अग्रणी राज्य है, मगर अब तक स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य समिति का गठन ही नहीं किया गया है। स्कूलों की बात तो तब की जाए, जब ब्लॉक या जिला स्तर पर गठित किया जा चुका हो। राज्य स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य समिति की बैठक जरूर पिछले माह (जनवरी 2026 में) डीपीआई के संचालक ने ली थी। इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई थीं। जैसे- शिक्षा व्यवस्था के भीतर मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य घटक के रूप में शामिल करने पर जोर दिया गया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब में मानसिक रूप से स्वस्थ, सशक्त और तनाव मुक्त हों। बैठक में मानसिक स्वास्थ्य को शैक्षणिक वातावरण का अहम हिस्सा बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया था। मगर, धमतरी की घटना से साफ हो गया कि ये बड़े इरादे जमीन पर लागू नहीं हो पाए।
जंगल में एक नई तीसरी आंख
फोटो में दिखाई दे रही यह सौर ऊर्जा से संचालित सीसीटीवी कैमरा अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) की सुरक्षा का नया उपकरण है। अब तक यहां जानवरों की आवाजाही दर्ज करने के लिए ही ट्रैप कैमरे लगे हुए थे अब वाहनों के मूवमेंट पर भी नजर होगी। जहां-जहां बैरियर हैं लगाए जा रहे हैं। यह कैमरा 4जी सिम कार्ड के माध्यम से जुड़ता है, जिससे मोबाइल ऐप के जरिए रिमोट मॉनिटरिंग की जा सकती है। इसमें पीटीजेड (पैन-टिल्ट-जूम) फीचर, ह्यूमन डिटेक्शन, टू-वे ऑडियो और नाइट विजन जैसी उन्नत सुविधाएं हैं। जंगल में यदि कोई बैरियर पार करता है या अनधिकृत वाहन प्रवेश करता है, तो यह तुरंत उसे कैद कर लेता है। पूरे समय सक्रिय रहने वाला यह कैमरा आवाजाही को रिकॉर्ड करता है, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। यदि आप ऐसी जगह पर जहां बिजली नहीं है, इसे इंस्टाल करना चाहें तो समान मॉडल 6,999 से 15,000 रुपये तक मिल जाएंगे। पर सोलर पैनल का अतिरिक्त खर्च करना होगा।
छत्तीसगढ़ का असम कनेक्शन
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रामेन डेका की पुत्री आयुष्मिता डेका ने सक्रिय राजनीति में कदम रख दिया है। असम की राजनीति में अपनी पहचान रखने वाले रामेन डेका भाजपा के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं। वे दो बार सांसद रह चुके हैं और असम प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाल चुके हैं। लंबे समय से उनके सक्रिय राजनीति में लौटने की अटकलें लगती रही थीं, लेकिन उन्होंने स्वयं आगे आने के बजाय अपनी पुत्री को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।
आयुष्मिता अमेरिका में कार्यरत थीं और हाल ही में नौकरी छोडक़र असम लौटी हैं। उन्होंने विधिवत भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। चर्चा है कि वे मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत किसी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। मंगलदोई दरांग जिले में आता है और इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वयं रामेन डेका कर चुके हैं। यहां उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है और पूरा इलाका भाजपा का गढ़ माना जाता है। राजनीतिक हलकों में कयास है कि आयुष्मिता के लिए चुनावी राह बहुत कठिन नहीं होगी। हाल ही में राज्यपाल रामेन डेका की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता भी आयुष्मिता की राजनीतिक सक्रियता पर नजर रखे हुए हैं। पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय इस समय असम कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का पर्यवेक्षक बनाया गया है। इन परिस्थितियों में राज्यपाल की पुत्री के संभावित चुनावी पदार्पण की चर्चा छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भी तेज है।
बस्तर में जश्न का मौका आ गया?

दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी पारंपरिक लुंगी पहनकर बैलाडीला के एक दूर गांव में पहुंचकर ग्रामीणों के बीच बैठे, समस्याएं सुनीं और जरूरी सामान बांटा। यह प्रतीकात्मक जरूर है लेकिन बताता है कि डर की जगह संवाद ले रहा है।
यह लावा-पुरेंगल गांव है, जहां आज तक कोई विधायक या बड़ा अफसर नहीं पहुंचा। अब तक यह इलाका नक्सलियों के प्रभाव में था। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, कागर और ग्रीन हंट अभियानों में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, राज्य पुलिस और डीआरजी ने डेढ़ साल से काम किया। 2024 में नक्सली हिंसा 81 प्रतिशत तक घटने का दावा किया गया है। 2025 के आंकड़े आएंगे तो शायद यह संख्या और कम हो जाएगी। इस बीच सडक़ों, फोर्टिफाइड थानों, ड्रोन निगरानी और अपडेटेड सरेंडर नीति ने दबाव बनाया है। पीएम आवास के तहत हजारों घरों की मंजूरी मिली और सडक़ कनेक्टिविटी ने दूर गांवों को जोड़ा है, जहां बसें भी चलने लगी हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या के पूरी तरह खात्मे की बात की है। इस समय 300 जवान फिर बचे-खुचे नक्सलियों की तलाश में हैं।
मगर, अब असली चुनौती शुरू होने वाली है, जिसकी परीक्षा जनप्रतिनिधियों को देनी है। अटामी का दौरा उसकी शुरुआत मान सकते हैं। सरेंडर नक्सलियों की सुरक्षा होगी? सम्मानजनक रोजगार मिलेगा और सामाजिक स्वीकृति मिलेगी। इतिहास बताता है कि 1980 के जनजागरण या 2005 के सलवा जुडुम जैसी गलतियां दोहराना महंगा पड़ेगा। समय से पहले जश्न खतरनाक है। लावा-पुरेंगल तक विधायक का पहुंचना उम्मीद जगाता है, पर स्थायी शांति और विकास के लिए नई ऊर्जा चाहिए, उससे भी कहीं अधिक, जितनी नक्सलियों के सफाए में खपाई गई है।
एआई का एक जलसा जंगल में
नई दिल्ली में आर्टिफिशियल महाकुंभ का आयोजन हो रहा है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा एआई समागम बताया जा रहा है। बड़े-बड़े मंच, नामी विशेषज्ञ, भविष्य की तकनीक पर लंबी चर्चा- सब कुछ हो रहा है। लेकिन क्या एआई सिर्फ सेमिनार और स्टार्टअप पिच तक सीमित है? या फिर वह जमीन पर लोगों की जान भी बचा रहा है? इस सवाल का एक जवाब छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से मिल रहा है।
उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में तैनात 2017 बैच के आईएफएस अधिकारी वरुण जैन ने एआई का ऐसा इस्तेमाल किया है, जिसने मानव-हाथी संघर्ष की तस्वीर बदल दी। जहां पहले हाथियों के अचानक गांव में घुस आने से मौतें होती थीं, वहां अब मोबाइल पर पहले से अलर्ट पहुंच रहा है।
कुछ साल पहले तक स्थिति यह थी कि जब हाथी गांव की ओर बढ़ते थे, तो ढोल बजाकर या मुनादी कर सूचना दी जाती थी। यह तरीका धीमा था और कई बार देर हो जाती थी।
इसके देखते हुए जैन ने एआई आधारित छत्तीसगढ़ एलीफेंट ट्रैकिंग एंड अलर्ट सिस्टम तैयार किया। जून 2023 में लॉन्च इस प्रणाली में जंगल में गश्त करने वाले हाथी मित्र दल मोबाइल ऐप के जरिए हाथियों के पदचिह्न, मल या झुंड की लोकेशन दर्ज करते हैं। नेटवर्क मिलते ही डेटा अपलोड होता है और एआई तुरंत विश्लेषण कर 10 किलोमीटर दायरे के गांवों की पहचान कर लेता है।
इसके बाद व्हाट्सएप, एसएमएस और ऑटोमैटिक वॉइस कॉल के जरिए ग्रामीणों, पंचायत प्रतिनिधियों और कोटवारों को चेतावनी भेज दी जाती है। किसी अलग ऐप की जरूरत नहीं, बस मोबाइल नंबर रजिस्टर होना चाहिए।
दावा किया जा रहा है कि इस तकनीक के बाद उदंती क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह मॉडल इतना सफल माना जा रहा कि अब इसे छत्तीसगढ़ के 15 हाथी प्रभावित वन मंडलों में लागू किया जा चुका है।
यह मॉडल केवल चेतावनी तक सीमित नहीं है। हाथियों की गतिविधियों के डेटा से कॉरिडोर मैपिंग, भोजन स्रोत विकसित करने और दीर्घकालिक वन प्रबंधन में भी मदद मिल रही है। भविष्य में वाइब्रेशन सेंसर जोडऩे की योजना है, जिससे हाथियों की हलचल पहले से पकड़ में आ सके।
आईएफएस जैन को इस पहल के लिए इको वॉरियर अवार्ड 2024 से सम्मानित किया जा चुका है। लोग सही कहते हैं कि अन्य तकनीकों, अविष्कारों की तरह एआई का भी सही दिशा में इस्तेमाल समाज को सुरक्षित बना सकता है।
आज जब एआई को लेकर डर और भ्रम दोनों हैं, नौकरी जाएगी या नहीं, मशीन इंसान से आगे निकल जाएगी या नहीं-तब अपने राज्य में मौजूद यह उदाहरण बताता है कि एआई इंसान का दुश्मन नहीं, सहयोगी बन सकता है।
अब डीजे भजन!
भजन गायन का अंदाज तेजी से बदल रहा है। मंचों पर तेज संगीत, लाइटिंग इफेक्ट और डांस के साथ भजन प्रस्तुत करने का चलन बढ़ गया है। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में इस तरह का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगा है। अब रायपुर में भी इसकी शुरुआत हो रही है। यहां इंडोर स्टेडियम में होली के पहले 28 तारीख को डीजे बीट्स पर भजन संध्या का आयोजन किया गया है।
इस मौके पर फूलों की होली खेली जाएगी। इसके आयोजनकर्ताओं में से एक भाजपा प्रवक्ता उज्जवल दीपक हैं। इसमें सैकड़ों युवाओं के जुटने की उम्मीद जताई जा रही है। डांस के साथ भजन का ट्रेंड तेजी से फैल रहा है। इसको लेकर मतभेद भी हैं। कुछ लोग इसे भक्ति की गंभीरता से समझौता मानते हैं। हालांकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि डांस, और आधुनिक संगीत के जरिए युवा भक्ति से जुड़ते हैं तो इसमें बुराई नहीं है। कुल मिलाकर डीजे बीट्स पर भजन संध्या के आयोजन को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है।
अरण्य में फिर सुपरसीड या... ?
बजट सत्र के बाद वन मुख्यालय में बड़ा फेरबदल होगा। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। इसके बाद पीसीसीएफ स्तर के दो अफसर तपेश झा और अनिल साहू भी क्रमश: जून और जुलाई में रिटायर होंगे। चर्चा है कि फेरबदल सीनियर आईएफएस अफसरों के रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।
हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए कौशलेंद्र कुमार और अरुण कुमार पांडे के नाम चर्चा में हैं। कौशलेन्द्र 92 बैच के हैं, तो पाण्डेय 94 बैच के हैं। मगर अरुण पाण्डेय वर्तमान में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के बाद नंबर-2 के पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) के पद पर हैं। इसके बाद 94 बैच के प्रेम कुमार, और ओपी यादव का नंबर है। दोनों ही पीसीसीएफ के पद पर हैं, लेकिन प्रेम कुमार भी जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की रेस से बाहर माना जा रहा है।
वैसे अरण्य में वर्तमान पीसीसीएफ श्रीनिवास राव समेत पूर्ववर्ती कई अन्य के सुपरसीड कर बनाने की भी परंपरा रही है। राव तो पांच सीनियर पीसीसीएफ को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बने थे। उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वो अपना कार्यकाल पूरा कर रिटायर हो रहे हैं। इस बार तो सरकार के पास विकल्प सीमित है, ऐसे में ज्यादा उठा पटक करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
तीन अनुपूरक अब नहीं
चर्चा है कि इस बार भी सरकार अनुपूरक बजट पेश नहीं करेगी। बताया तो यह गया है कि आजादी के बाद अविभाज्य मप्र काल से चली आ रही तीन अनुपूरक बजट की परंपरा को वित्त विभाग ने खत्म कर दिया है। प्रथम अनुपूरक मानसून सत्र में, द्वितीय शीत सत्र में और तृतीय अनुपूरक बजट सत्र में सालाना बजट से पहले पेश होते रहे हैं।
तीन अनुपूरक यह व्यवस्था वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने पिछले वित्तीय वर्ष से ही शुरू की। पिछले साल सरकार ने एक ही अनुपूरक बजट पेश किया था। जो 7329 करोड़ से अधिक का था। ऐसा करने के लिए सरकार ने अपने पहले वर्ष में एक संशोधन विधेयक पारित भी किया था। इसमें आकस्मिकता निधि को 100 से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया है। ताकि बड़ी जरूरत के खर्च, योजनाएं इस निधि का उपयोग कर शुरू की जा सके। और उसके बाद अनुपूरक बजट में लेकर कार्योत्तर स्वीकृति की औपचारिकता करा ली जाए। इसी वजह से बीते शीत सत्र में भी द्वितीय अनुपूरक पेश नहीं किया था। और अब साल के अंतिम महीनों के लिए तीसरा अनुपूरक भी नहीं लेगी।
इसके पीछे एक पॉलिटिकल माइलेज लेने की भी मंशा बताई गई है। वह यह कि पूर्व के वर्षों की तरह 2000-3000 हजार करोड़ के तीन अलग-अलग अनुपूरक बजट लेने के बजाय एक साथ हजारों करोड़ का बड़ा बजट नजर आए। इससे विपक्ष की वह मांग भी पूरी होती है जिसमें विपक्षी विधायक चर्चा में कहते रहे हैं कि छोटे छोटे अनुपूरक मांगों के बजट के बजाय कुछ और राशि लेकर फलां फलां योजना भी स्वीकृत कर लेती सरकार। ऐसा कर सरकार भी कह सकती है कि राज्य विकास के लिए पैसे की कमी नहीं की जाएगी और हमने हजारों करोड़ का अनुपूरक बजट दिया है। इसी अनुरूप ही सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए भी आठ माह पहले मानसून सत्र में 35 हजार करोड़ का अनुपूरक लिया था। इस बार भी तृतीय अनुपूरक बजट न लेकर सीधे सालाना बजट पेश किया जाएगा। शायद इसीलिए बजट को आंकड़ों की बाजीगिरी कहा जाता है।
पुलिस की नसीहत, अपनों को समझाओ

रायपुर पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद विशेषकर नशे के कारोबार, और जुआ-सट्टा पर तेज कार्रवाई हो रही है। देर रात तक चलने वाले होटलों-रेस्टोरेंट, और पब की नियमित जांच हो रही है। इससे लोगों में सकारात्मक संदेश जा रहा है। इससे विशेषकर पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला को बधाई-शुभकामनाएं देने सामाजिक, और व्यापारिक संगठनों का तांता लगा है।
डॉ. संजीव शुक्ला रायपुर के हैं, और यहां एसपी रह चुके हैं। लिहाजा, हर संगठन के लोग उनसे व्यक्तिगत तौर पर परिचित भी हैं। वो लोगों से सुझाव लेने में भी परहेज नहीं करते हैं। पिछले दिनों एक सामाजिक संगठन के लोग पहुंचे, तो कानून व्यवस्था को लेकर बात हुई। पुलिस कमिश्नर ने उन्हें बता दिया कि उनके ही समाज के लोग जुआ-सट्टा से सबसे ज्यादा जुड़े हैं, और उन पर रोजाना प्रकरण दर्ज हो रहे हैं। उन्होंने समाज के लोगों को समझाइश दी कि वो युवा पीढ़ी को इससे दूर रहने के लिए प्रेरित करें। समाज के लोगों ने कमिश्नर की बात को गंभीरता से लिया, और उन्हें भरोसा दिया कि इस दिशा में समाज की तरफ से भी पहल की जाएगी।
दरअसल, पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि ऑनलाइन सट्टेबाजी में पकड़े गए एक-दो लोगों ने बकायदा दुबई में जाकर ट्रेनिंग भी ली थी। अब तक 10 करोड़ रूपए से अधिक ऑनलाइन सट्टेबाजी के प्रकरण दर्ज हुए हैं।
भ्रष्ट गठजोड़ का भयावह दौर
छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में अवैध कारोबार के साथ का गठजोड़ अब खतरनाक रूप ले चुका है। बस्तर में अपेक्षाकृत शांति के बाद खनन माफियाओं और उन्हें संरक्षण देने वाले तत्वों की सक्रियता बलरामपुर-रामानुगंज, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में बढ़ती दिख रही है।
मई 2025 में बलरामपुर जिले के सनावल थाना क्षेत्र में अवैध रेत खनन रोकने गई पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम पर हमला हुआ था। इस हमले में सिपाही शिवभजन सिंह की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या कर दी गई थी। आरोप लगे थे कि अवैध खनन करने वालों को परोक्ष संरक्षण प्राप्त था।
अब उसी जिले के कुसमी क्षेत्र में आदिवासी किसान रामनरेश राम की हत्या हो गई। पर दोनों मामलों में बड़ा फर्क है। सनावल की घटना में अवैध रेत निकालने वालों को प्रशासन का परोक्ष मदद मिल रहा था, इस बार अनुविभाग के सबसे बड़े अफसर एसडीएम ने उनका खुद नेतृत्व किया। लाठी रॉड से ग्रामीणों को इतना पीटा गया कि एक किसान की मौत हो गई। पुलिस वाले किसी के कहने पर दूसरे किसी बेकसूर को थाने में लगाकर जरूर पीट सकते हैं, पर एसडीएम जैसे अफसर की ऐसी निष्ठा नहीं देखी गई जिसमें उन पर हत्या का आरोप लग जाए। एसडीएम के साथ कथित तौर पर वे लोग थे, जिनकी अवैध बॉक्साइट से लदे ट्रक को हंसपुर के ग्रामीणों ने रोक लिया था।
बलरामपुर-रामानुगंज जिला मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड की सीमाओं से सटा है। कुछ जिलों से तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र जैसे राज्य भी जुड़े हैं। ऐसे क्षेत्रों में अक्सर रेत, बॉक्साइट, सोना, धान, शराब और मादक पदार्थों की तस्करी की खबरें सामने आती रही हैं। दिसंबर 2024 में मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में मावी नदी में अवैध खनन का विरोध करने पर ग्रामीणों के साथ मारपीट की घटना भी सामने आई थी।
सीमावर्ती जिलों में कमजोर निगरानी और राजनीतिक दबाव अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। कुछ अफसर ऐसे इलाकों को स्वर्ग मानते हैं क्योंकि ये राजधानी से काफी दूर हैं। ईमानदार अफसरों को माफिया बर्दाश्त नहीं करते। उनकी राजनीतिक पहुंच होती है- वे काम में खनन डालने वाले अफसरों को टिकने नहीं देते। किसने सोचा था कि 25 बरस में ही छत्तीसगढ़ उस दौर में पहुंच जाएगा जब अफसर अवैध कारोबारियों के शिकंजे में इस तरह जकड़ जाएंगे कि वे हत्या तक की वारदात को फ्रंट पर आकर अंजाम देने लगेंगे।
घरों के बाहर लकड़ी के ढेर

जशपुर के किसी गांव से ली गई यह तस्वीर एक पोस्ट से है, जिसमें बताया गया है कि जिस गांव में जाएं घरों के सामने लकडिय़ों के ऐसे ढेर दिख जाते हैं। लोग जंगल की ओर सुबह दैनिककर्म स्नान आदि के लिए जाते हैं और लौटते में यह सोचकर कि खाली हाथ क्यों जाएं, लकड़ी उठा लाते हैं। छोटी झाडिय़ों को काट कर भी ले आते हैं। यह एक वर्षों से चली आ रही परंपरा है कि जंगल की तरफ जाओ और लौटो तो बाड़ी घेरने या खाना पकाने के लिए लकड़ी ले आओ। अब गैस सिलेंडर की सेवा गांवों में पहुंच चुकी है, इसलिये ऐसी लकडिय़ों की खपत कम हो गई है, पर लकड़ी लेकर जंगल से लौटने की आदत नहीं बदली है। इसलिये लकड़ी के ढेर बन जाते हैं।
वन अफसर का जंगल राज फरमान
छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा वन्यजीव अपराधों को रोकने के लिए लोगों से सामाजिक बहिष्कार को हथियार बनाने का निर्देश दिया है। पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ अरुण कुमार पांडेय ने अपने मातहतों को निर्देश दिया है कि गांव के मुखिया, धार्मिक नेताओं और सामाजिक प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ मिलकर शिकारियों के सामाजिक बहिष्कार करने की हिदायत दी गई है।
माना कि जंगल की सुरक्षा आवश्यक है और अवैध शिकार एक गंभीर अपराध है, जिस पर कठोर सजा होनी चाहिए। मगर, सामाजिक बहिष्कार करने का आह्वान कानून की किस किताब में लिखा है। कहीं, वाइल्डलाइफ की कमान संभाल रहे अफसर अपने विभाग की नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए उकसाने वाला परिपत्र तो नहीं जारी कर रहे हैं। वे किस हक से कह रहे हैं कि जंगल में संविधान और कानूनों की अवहेलना कर जंगल का कानून चलाया जाए। वन अधिकारी खुद को न्यायपालिका से ऊपर मानकर सिविल डेथ जैसे अमानवीय तरीके अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
पेट्रोलिंग की कमी, नए स्टाफ की भर्ती न होना और मैदानी अमले की शिकारियों से साठगांठ जैसी समस्याएं लंबे समय से जंगलों को असुरक्षित बना रही हैं। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में एक गर्भवती बाइसन को बिजली के जाल में फंसाकर मार डाला गया और उसके शव को विकृत किया गया। इसी तरह, गुरु घासीदास नेशनल पार्क में एक युवा नर बाघ की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई, जो संभावित शिकार का मामला था। कबीरधाम जंगलों में बाइसन से लेकर तेंदुए तक इलेक्ट्रिक ट्रैप्स से मारे जा रहे हैं, और सुरजपुर जिले में रेवती वन में एक बाघ का शव मिला जिसके नाखून और दांत गायब थे, जो स्पष्ट रूप से शिकार का संकेत है। कटघोरा के पाली रेंज में कुछ दिन पहले सूअर के लिए बिछाए गए जाल में तेंदुआ फंस गया। ये घटनाएं विभाग की निगरानी की कमजोरी को दर्शाता तो है ही, मैदानी स्तर पर साठगांठ को उजागर करती हैं, जहां शिकारी बेधडक़ घूमते हैं।
हैरानी की बात यह है कि राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप भी इस अनाप-शनाप आदेश पर स्पष्ट रुख नहीं अपना रहे। वे सिर्फ जंगलों और लोगों के हित की दुहाई देकर दाएं-बाएं की बात कर रहे हैं। क्या मंत्री को नहीं पता कि ऐसे अतिरिक्त-न्यायिक उपाय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हैं? वे वन्यजीव संरक्षण के नाम पर मानवाधिकारों को कुचलने की मंजूरी देते हुए लग रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में वैसे भी सामाजिक बहिष्कार एक बड़ी कुरीति रही है। इससे पीडि़त परिवार को रोजी-रोटी के लाले पड़ जाते हैं। मतांतरण, अंतरजातीय विवाह, टोने-टोटके नाम पर समाज के वही ठेकेदार सामाजिक बहिष्कार को प्रश्रय देते हैं, जिनसे पीसीसीएफ आह्वान कर रहे हैं। आज वे अफसरों के कहने पर ये काम करेंगे, कल दूसरी किसी वजह से उन ग्रामीणों को भी समाज से बाहर कर सकते हैं, जिनसे निजी दुश्मनी है।
मनरेगा पर रैली की तैयारी
प्रदेश कांग्रेस एक बड़ी रैली की रूपरेखा तैयार कर रही है। रैली की तिथि और स्थान अभी तय नहीं हुए हैं, लेकिन होली के बाद इसके आयोजन की संभावना है। रैली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के शामिल होने की चर्चा है। यह रैली मनरेगा कानून को समाप्त किए जाने के विरोध में प्रस्तावित है। जिला स्तर पर प्रदर्शन हो चुके हैं और अब प्रदेश स्तर पर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है।
बताया जाता है कि हाल ही में दिल्ली में महारैली के आयोजन को लेकर चर्चा हुई थी। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज सहित अन्य नेताओं ने प्रभारी सचिन पायलट से मुलाकात की। पायलट ने प्रदेश कांग्रेस को रैली की तैयारियों में जुटने के निर्देश दिए हैं। पार्टी की रणनीति कृषि कानूनों के विरोध की तर्ज पर मनरेगा के मुद्दे पर भी व्यापक आंदोलन खड़ा करने की है।
दरअसल, पिछली बार मनरेगा मद की राशि को पीएम आवास योजना में खर्च किए जाने का आरोप लगा था। पिछली सीजन में मनरेगा के काम लगभग ठप रहे, जबकि मजदूरी देने की गारंटी तय है। होली के बाद सामान्यत: मनरेगा कार्य शुरू हो जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस केंद्र और प्रदेश सरकार को किसान-मजदूर विरोधी करार देते हुए घेरने की तैयारी में है। हालांकि केंद्र सरकार ने मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत-जीरामजी कानून लागू करने का दावा किया है, जिसे मनरेगा से बेहतर बताया जा रहा है। कुल मिलाकर मनरेगा और जीरामजी को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमाने के आसार हैं।
...और उसके पहले गुटबाजी भी
सूरजपुर जिला कांग्रेस के पदाधिकारियों की सूची जारी होते ही विवाद खड़ा हो गया है। करीब डेढ़ दर्जन पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने वाले नेताओं को पूर्व डिप्टी सीएम टी. एस. सिंहदेव का समर्थक माना जाता है।
दरअसल, सूरजपुर जिला अध्यक्ष शशि सिंह की नियुक्ति के बाद से पार्टी के भीतर खींचतान चल रही है। शशि, दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री हैं और युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय पदाधिकारी भी हैं। वह राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर की पदयात्रा में शामिल रही थीं। इस वजह से संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। बताया जा रहा है कि शशि सिंह द्वारा जारी सूची में ऐसे नेताओं को अहम जिम्मेदारी दी गई है, जो जोगी परिवार के करीबी रहे हैं और सिंहदेव विरोधी माने जाते हैं। इसकी शिकायत प्रभारी सचिव जरिता लेट फलांग तक पहुंची है, जो सरगुजा संभाग की प्रभारी भी हैं। प्रदेश नेतृत्व मामले को सुलझाने की कोशिश में जुटा है, लेकिन फिलहाल विवाद थमता नजर नहीं आ रहा।
मंजिल से ज्यादा कीमती जिंदगी है...
धमतरी के पास 14 फरवरी को छुट्टी पर घर लौट रहे सीआरपीएफ के तीन जवानों समेत चार लोगों की सडक़ हादसे में जान चली गई। इससे कुछ दिन पहले 11 फरवरी को मध्यप्रदेश के सागर जिले में चार आरक्षकों की इसी तरह मौत हो गई थी। वहां की घटना के बाद डीजीपी ने निर्देश जारी किया कि जवान रात 12 बजे से सुबह 5 बजे के बीच लंबी दूरी की यात्रा से बचें। यह आदेश भले ही एक राज्य और एक विभाग तक सीमित हो, लेकिन सवाल बड़ा है, क्या इस तरह से समय तय करना व्यावहारिक है? हजारों ट्रक, बसें और टैक्सियां रातभर चलती हैं। समय की पाबंदी, डिलीवरी का दबाव और सुबह की ट्रेन, फ्लाइट जैसी मजबूरियां होती हैं।
अनुभवी चालक जानते हैं कि रात की ड्राइविंग अलग अनुशासन मांगती है। वे 2-3 घंटे बाद 20-30 मिनट का ब्रेक लेते हैं, दिन में 6-7 घंटे की नींद सुनिश्चित करते हैं, नशे और भारी फास्ट फूड से बचते हैं। ढाबों, पेट्रोल पंपों के पास आराम करने वाले कई ड्राइवर तो चूल्हा लेकर चलते हैं- अपना खाना खुद बनाते हैं ताकि सुस्ती न आए। समस्या अक्सर निजी वाहन चालकों के साथ होती है, जो कम अनुभव और बिना आराम के लंबा सफर तय कर लेते हैं।
2022 के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में सडक़ हादसों में मौत की दर राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी रही। जाहिर है, इनमें से कई दुर्घटनाएं झपकी आने की वजह से हुई होंगी। मोटर व्हीकल एक्ट 1988 में शराब पीकर गाड़ी चलाने पर सख्त सजा (धारा 185) है, लेकिन थकान को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान सीमित हैं। हालांकि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड के तहत वाहनों में ड्राइवर ड्राउजिनेस वार्निंग सिस्टम लागू करने की दिशा में काम चल रहा है, जो झपकी आने पर अलर्ट देता है। दुनिया के कई देश ऐसी दुर्घटनाओं से चिंतित हैं। यूरोपीय संघ में ड्राइवर अधिकतम 9 घंटे ड्राइव कर सकते हैं और हर 4-5 घंटे बाद 45 मिनट का ब्रेक जरूरी है। अमेरिका में 11 घंटे ड्राइविंग के बाद 10 घंटे आराम अनिवार्य है। ऑस्ट्रेलिया में थकान प्रबंधन के लिए अलग-अलग स्तर पर व्यवस्था है। इन देशों में थकान को दुर्घटना का बड़ा कारण माना गया है। भारत में भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 3 घंटे बाद 15-30 मिनट का ब्रेक लें।
तो हमें क्या करना चाहिए? हर लंबी यात्रा में 2-3 घंटे बाद रुकें। पर्याप्त नींद लें। वाहन की लाइट, ब्रेक और टायर की जांच करें, सीट बेल्ट पहनें, खान-पान को लेकर सतर्क रहें। हाई-बीम का सीमित उपयोग करें। और सबसे जरूरी अगर आंखें भारी लगें, तो गाड़ी रोक दें-ताकि देर से सही गंतव्य तक पहुंच सकें।
आबकारी नीति को लेकर हलचल
सरकार की नई आबकारी नीति एक अप्रैल से प्रभावशील हो रही है। अब कांच के बजाय प्लास्टिक की बोतलों में शराब मिलेगी। पिछले साल 67 नई शराब दुकानें खोलने का फैसला लिया गया था, लेकिन अलग-अलग इलाकों में भारी विरोध के चलते 35 शराब दुकानें नहीं खुल पाईं। अब इन दुकानों के लिए स्थल परिवर्तित कर उन्हें खोलने की योजना है।
पिछली सरकार में बड़ा आबकारी घोटाला हुआ था। इसकी गूंज देशभर में हुई। पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा सहित दर्जनभर से अधिक अधिकारी और कारोबारी जेल में रहे। कुछ अब भी जेल में हैं। घोटाले की जांच केंद्र और राज्य की एजेंसियां कर रही हैं।
सरकार ने पिछली गड़बडिय़ों से सबक लेते हुए आबकारी कारोबार में पारदर्शिता लाने की कोशिश की है, और इस वजह से आबकारी राजस्व भी तकरीबन दोगुना हो रहा है। बावजूद इसके, आबकारी नीति को लेकर सत्तारूढ़ दल में कुछ असहमति के सुर सुनाई दे रहे हैं।
बताते हैं कि चित्रकूट के भाजपा विधायक विनायक गोयल नई शराब दुकानें खोलने के खिलाफ हैं और उन्होंने इस मसले पर पार्टी और सरकार के भीतर अपना पक्ष रखा है। कुछ और विधायक भी नई आबकारी नीति के विरोध में बताए जाते हैं। विपक्ष तो खुला विरोध कर रहा है। विधानसभा के बजट सत्र में यह मुद्दा प्रमुखता से उठ सकता है।
सीनियर भाजपा विधायकों के तेवर
विधानसभा का बजट सत्र 23 तारीख से शुरू हो रहा है। 27 फरवरी को बजट पेश होगा। सत्र में इस बार 1200 से अधिक सवाल लगे हैं। पिछले सत्रों में सत्तापक्ष के विधायक अजय चंद्राकर, धरमलाल कौशिक, राजेश मूणत और सुशांत शुक्ला ने सरकार के मंत्रियों को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बजट सत्र में भी सत्तारूढ़ दल के विधायकों के तेवर देखने को मिल सकते हैं।
हालांकि, इस बार पार्टी ने सरकार की छवि पर कोई आंच न आए, इसे लेकर रणनीति बनाई है। सत्र के एक दिन पहले यानी 22 तारीख को भाजपा विधायक दल की बैठक हो सकती है। बैठक में क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल और महामंत्री (संगठन) पवन साय प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे। बैठक में सदन के भीतर पार्टी के विधायकों को तेवर नरम रखने के सुझाव दिए जा सकते हैं।
दूसरी तरफ, विपक्ष ने भी बजट सत्र के लिए जोरदार तैयारी की है। राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान भी टोका-टाकी हो सकती है। कुल मिलाकर, बजट सत्र के हंगामेदार रहने के आसार हैं।
समिति और चांदी
छत्तीसगढ़ में बजट सत्र शुरू होने वाला है। इस दौरान सरकारी विभाग विधायकों को सप्रेम भेंट की अघोषित परंपरा का निर्वाह करते हैं कुछ विभाग अपने विभागीय उत्पाद के गिफ्ट पैक देते हैं तो कुछ मार्केट परचेसिंग से बड़े गिफ्ट देते हैं। यह परंपरा केंद्रीय विभागों में भी चलायमान है। हाल में एक समिति का दल छत्तीसगढ़ के प्रवास पर आया था। दल को राज्य में कार्यरत 35 केंद्रीय विभागों आयकर, टेलीफोन, डाक, सेंट्रल जीएसटी रेलवे आदि आदि में राजभाषा की उपयोगिता और उपयोग की स्थिति, उसके स्तर आंकने के साथ सुधार के उपाय सुझाना था। समिति के सदस्यों में से 14 आए। इसके मुखिया छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य से कभी विपक्ष के निर्वाचित हुआ करते थे और अब भाजपा के हो गए हैं। समिति की आवभगत बारातियों की तरह करने की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य निगम को नोडल विभाग की तरह दी गई और इस खर्च की शेयरिंग सभी 35 विभागों को करना था। इसमें गिफ्ट का खर्च शामिल नहीं था। वह विभागों के अफसरों को अपने इंतजाम से करना था।
खाद्य विभाग ने गिफ्ट पैक तय कर सभी को बता दिया था- हर प्रतिनिधि को हर विभाग 100 ग्राम चांदी का एक एक सिक्का और उनकी की पत्नियों के नाम सूट पीस। उस दौरान चांदी की कीमत 25800 प्रति सौ ग्राम रही थी। इस तरह से हर सदस्य को 35 विभागों से कुल 9 लाख 3000 रुपए की 3.50 किलो चांदी उपहार स्वरूप मिली। और सूट की कीमत पता नहीं चल पाया। सस्ता तो दिए नहीं होंगे। सार यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के विभागों ने इतनी महंगा शिष्टाचार निभाया तो दिल्ली, उप्र, हरियाणा, तमिलनाडु कर्नाटक जैसे बड़े धन्यवाद राज्यों की सौजन्यता की कीमत तो और अधिक होती होगी। यही और ऐसी अन्य समितियां 5 साल के कार्यकाल में लगभग हर राज्य का दौरा कर लेती हैं। बस इशारा काफी है।
लेकिन कई लोगों का तजुर्बा है कि उपहार में देने वाले चांदी के सिक्के अलग बनते हैं, जिनमें आधी चाँदी भी नहीं होती। दान की बछिया के दाँत कौन गिनते हैं?
नाम की राजधानी, कबाड़ ऐसा!
सडक़ों के किनारे गाडिय़ों का कबाड़, या कबाड़-गाडिय़ां रास्ता रोकते पड़ी रहती हैं। अब शहरियों की कमाई का हाल यह हो गया है कि कोई इस कबाड़ को चुराकर बेचते भी नहीं है। राजधानी रायपुर में महाराष्ट्र मंडल के बगल में जाने कब से सडक़ और नाली के बीच पड़े ये स्कूटर जंग से सड़ चुके हैं, कोई चोरी भी नहीं कर रहा, और न कोई हटा रहा है।
क्या शादी अपनी मर्जी से की?
10 फरवरी को छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री कन्या विवाह कार्यक्रम के तहत प्रदेशभर में छह हजार से अधिक जोड़े वैवाहिक जीवन में बंधे। महंगाई और परंपराओं के दबाव के बीच आम परिवारों के लिए विवाह का खर्च किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं। गरीब परिवारों की स्थिति और भी कठिन होती है। अक्सर उन्हें कर्ज लेना पड़ता है, जिसे चुकाने में वर्षों लग जाते हैं। सामूहिक विवाह में शामिल नवदंपतियों को गृह उपयोगी सामग्री के साथ 35 हजार रुपये की नगद सहायता भी दी गई, जो छोटे काम धंधा करने वालों और मजदूर वर्ग के लिए विशेष आकर्षण होता।
आयोजन की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग पर होती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अधिक से अधिक जोड़ों को जोडऩे की जिम्मेदारी दी जाती है। व्यावहारिक स्तर पर कई बार यह दायित्व दबाव में बदल जाता है। ऐसी शिकायतें सामने आ चुकी हैं कि पहले से विवाहित, यहां तक कि बच्चों वाले दंपतियों को भी सामूहिक विवाह में लाकर बिठा दिया गया। प्रोत्साहन राशि पाने के उद्देश्य से भी जोड़े भाग लेते देखे गए। अन्य योजनाओं की तरह इस योजना पर भी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। घटिया बर्तन, पंखे और अन्य सामग्री की खरीद के मामले समय-समय पर उजागर हुए।
मगर, इन सबके बीच एक जरूरी सवाल उठता है, जिसे बैकुंठपुर विधायक भैयालाल राजवाड़े ने अपने इलाके के पटना गांव में आयोजित समारोह में उठाया। उन्होंने युवाओं से पूछा- क्या यह विवाह आपकी आपसी सहमति से हो रहा है या केवल पारिवारिक निर्णय है? आप एक-दूसरे को कितना जानते हैं? क्या आंगनबाड़ी या दूसरे विभाग के किसी कर्मचारी ने कहा कि शादी कर लो? ये सवाल असहज अवश्य थे, परंतु जरूरी भी। युवा जोड़े उत्तर देने में असमर्थ दिखे और विवाह की तैयारियों में व्यस्त रहे।
विधायक ने सवाल पूछकर यह इशारा किया है कि योजना का उद्देश्य आर्थिक सहारा देना है, न कि विवाह जैसे जीवन भर फैसले में सरकार या किसी बाहरी व्यक्ति का हस्तक्षेप करना। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल जानकारी देने तक सीमित होती है। यदि प्रलोभन या दबाव में संबंध तय होते हैं, तो भविष्य में सामाजिक और पारिवारिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
कांग्रेस की घरेलू सुगबुगाहट
अप्रैल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव के ठीक बाद कांग्रेस में फेरबदल के संकेत हैं। अप्रैल-मई में बतौर प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का तीन साल का कार्यकाल पूरा होगा। उनका कार्यकाल बढ़ेगा या नहीं, इस पर फैसला होगा।
यही नहीं, बैज के साथ-साथ सचिन पायलट पर भी फैसला होगा। पायलट केरल के चुनाव प्रभारी हैं। वे पिछले दो साल से छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। चर्चा है कि वे छत्तीसगढ़ के प्रभार से मुक्त होना चाहते हैं और उन्होंने अपनी भावनाओं से पार्टी हाईकमान को अवगत करा दिया है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि पायलट की जगह नए प्रभारी की नियुक्ति होगी। पिछले दिनों जिलाध्यक्षों की बैठक में पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भविष्य को लेकर भी संकेत दिए हैं। उन्होंने कह दिया है कि भविष्य में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति जिलाध्यक्षों में से की जाएगी। यानी जिस जिलाध्यक्ष का परफॉर्मेंस सबसे बेहतर होगा, उन्हें प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी। छत्तीसगढ़ में भले ही तुरंत यह व्यवस्था लागू न हो, लेकिन कुछ बड़े बदलाव हो सकते हैं। बैज अध्यक्ष रहें या न रहें, प्रदेश संगठन में दो कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति तय मानी जा रही है। पहले भी प्रदेश कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति होती रही है। कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति जाति समीकरण को ध्यान में रखकर की जाएगी। इसको लेकर पार्टी के अंदरखाने में अभी से चर्चा शुरू हो गई है। देखना है आगे क्या होता है।
अनूठी जोड़ी

पिछले दिनों इस अनूठी जोड़ी से मिलने और इन्हें सुनने का मौका मिला। इनमें जो स्त्री हैं, वे विद्या राजपूत हैं। विद्या ट्रांस वूमेन हैं। बस्तर की रहने वाली हैं, इनका जन्म पुरुष शरीर में हुआ, मगर इन्हें बहुत जल्द समझ आ गया कि इनका मन स्त्री का है।
पुरुष से स्त्री बनने और दुनिया को बताने में इन्हें काफी वक़्त लगा और उतना ही संघर्ष भी था, क्योंकि समाज के लिये यह सब स्वीकार कर पाना सहज नहीं है। वे विनय से विद्या बनीं, फिर छत्तीसगढ़ में ट्रांसजेंडरों के अधिकार के लिये संघर्ष करने लगीं।
दूसरे पॉपी देवनाथ हैं, त्रिपुरा के। ये जन्म से स्त्री थे, मगर इनका मन पुरुषों वाला था। 2014 के नालसा जजमेंट के बाद इन्होंने तय किया कि अब वे स्त्री के शरीर में नहीं रहेंगे। सर्जरी और दवाओं के बाद इन्होंने अपना मनचाहा पुरुष का शरीर पाया।
फिर ये दोनों करीब आये, विवाह किया, साथ रहते हैं और शरीर और मन के बीच लैंगिक उथल पुथल से जूझ रहे लोगों की मदद करते हैं।
हम लोग जो परंपराओं से इंसानों को दो लिंगों में बांटते आये हैं और जिनके लिये शरीर ही लिंग है, उनके लिये यह सब देखना, समझना और स्वीकार करना आज भी मुश्किल है।
अपने आसपास रोज ऐसे लोगों को देखता हूं, जो अपने समाज के पूर्वाग्रह के बीच विकसित हुए हैं और तमाम पढ़ाई, लिखाई के बाद भी। अच्छे संस्थानों से जुडक़र भी अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते। खासकर धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और लिंग के पूर्वाग्रह। आज दुनिया की तीन चौथाई समस्या इन्हीं पूर्वाग्रहों की वजह से है।
इन्हीं पूर्वाग्रहों की वजह से विद्या और पॉपी जैसे लोगों को अपने पसंद का जीवन जीने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है। आज प्रेम का दिन है और प्रेम को सहज रूप से हम आज भी स्वीकार नहीं कर पाते। इसके पीछे भी हमारे दकियानूसी पूर्वाग्रह ही हैं।
इसलिए अगर आप सचमुच प्रेम में विश्वास रखते हैं तो सबसे जरूरी है, पूर्वाग्रहों से मुक्ति और अपने नजरिये को खुला रखना। थोड़ा संवेदनशील बनना और दूसरों की भावनाओं को समझना, उन्हें सम्मान देना।
वेलेंटाइन डे की शुभकामनाएं
— पुष्य मित्र
रेरा बिल्डरों के हित में, जागो ग्राहक!
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के एक मामले की सुनवाई के दौरान रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी को लेकर कहा कि यह संस्था अब बिल्डरों के हितों को बढ़ावा देने वाली संस्था बन गई है और इसे बंद कर देना बेहतर होगा, क्योंकि यह डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की ही मदद कर रही है, जबकि घर खरीदार निराश, हताश और ठगे हुए महसूस कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में भी सीजी रेरा की स्थापना 2017 में हुई थी, और इसका उद्देश्य रियल एस्टेट सेक्टर को पारदर्शी बनाना, प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करवाना और खरीदारों की शिकायतों का निपटारा करना था। यह बिल्डरों को प्रोजेक्ट रजिस्टर करने, समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित करने और खरीदारों को मुआवजा देने का प्रावधान करता है। छत्तीसगढ़ में सीजी रेरा ने अब तक कई प्रोजेक्ट्स को रजिस्टर किया है और शिकायतों का निपटारा किया है। मगर यह केवल रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स से संबंधित शिकायतों पर ही कार्रवाई करता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के प्रकाश में सीजी रेरा के भी कुछ फैसलों पर सवाल उठे हैं। स्काई लाइफ रायपुर के फेज एक के मामले में सीजी रेरा ने खरीदार की क्लेम को खारिज कर दिया और डेवलपर की कैंसिलेशन और रिफंड की नीति को सही ठहराया। अथॉरिटी ने कहा कि खरीदार ने ऊंची राशि के भुगतान का कोई सबूत नहीं दिया और डेवलपर ने अनुबंध का उल्लंघन नहीं किया। आम तौर पर खरीदार बिल्डर के दावों की गहराई से जांच नहीं करता। न ही शिकायत होने पर जरूरी दस्तावेज जमा कर पाता है। अनुबंध की बारिकियों को भी पढ़ा नहीं जाता।
रेरा के पास बहुत सी शक्तियां हैं। वह अनियमितताओं के आधार पर जुर्माना तो लगा ही सकता है, प्रोजेक्ट में देरी होने पर उपभोक्ता को ब्याज दिला सकता है। रेरा के आदेश का पालन नहीं करने पर कारावास तक का प्रावधान है और प्रॉपर्टी बेचकर वसूली करने का भी। इसके अलावा रेरा कोई फाइनल अथॉरिटी भी नहीं है। रेरा ने खरीदार का कोई क्लेम खारिज किया तो उसे हाईकोर्ट में चुनौती भी दी जा सकती है। इसके अलावा रेरा की सुनवाई पर भरोसा न हो तो उपभोक्ता विवाद परितोषण आयोग में भी केस दायर किया जा सकता है।
रायपुर के ही प्लॉट बाय बैक के एक मामले में आयोग ने पाया था कि बिल्डर ने अनुचित व्यापार किया। आदेश दिया गया कि बिल्डर प्लॉट की दोगुनी कीमत लौटाए। कानून का लाभ उठाने के लिए उसके नियम-अधिनियमों के बीच गोते भी लगाने पड़ते हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ में अनेक प्रोजेक्ट्स देरी से चल रहे हैं। बिल्डर को खरीदारों से मिले फंड को डायवर्ट करने की भी शिकायते हैं। प्रोजेक्ट में देरी हो तो खरीदारों को ब्याज मिलना चाहिए, लेकिन रेरा की निगाह में ऐसे प्रोजेक्ट होने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए ऐसी सुविधा नहीं दी गई है। वहीं फंड डायवर्सन को लेकर रेरा में सख्त नियम है। खरीदारों से मिली 70 फीसदी राशि एक अलग बैंक खाते में जमा दिखाना है। शेष राशि से प्रोजेक्ट का काम करना है। प्रोजेक्ट में देरी इस अनियमितता की वजह से कई बार होती है। किसी भी कॉलोनी या प्रोजेक्ट की प्लानिंग या लेआउट, एक बार लॉंच होने के बाद तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक दो तिहाई खरीदारों से सहमति न ले ली जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से सबक लिया जा सकता है। पता होना चाहिए कि रेरा केवल अपने यहां रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स को लेकर सुनवाई करता है। हर प्रोजेक्ट के अनुबंध को ध्यान से पढऩा जरूरी है और सबूत साथ में रखा जाए। और यह ध्यान रखें कि रेरा के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया सकता है। वैसे, यह सुविधा बिल्डरों के पास भी है।
राहत की सांस
सरकार के पशुधन विकास विभाग की ओर से रायपुर जिले के 50 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण के लिए विशाखापट्टनम भेजा गया है। यहां किसान मुर्गी-बकरी पालन और मछली पालन की आधुनिक तकनीकों से अवगत होंगे।
बुधवार को धरसीवां, आरंग, अभनपुर और मंदिर हसौद क्षेत्र के किसान रवाना होने पहुंचे, लेकिन इस दौरान हंगामे की स्थिति बन गई। तीन-चार किसानों ने यह कहते हुए विरोध जताया कि यात्रा लंबी है और बस में एसी की सुविधा नहीं है। उनका कहना था कि लंबी दूरी के लिए बेहतर व्यवस्था का आश्वासन दिया गया था। विभागीय अधिकारियों ने किसानों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन कुछ किसान जाने से इनकार करते रहे। इसी बीच अभनपुर विधायक इंद्र कुमार साहू भी कुछ किसानों के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने नाराज़ किसानों को समझाने की कोशिश की, हालांकि प्रारंभिक तौर पर बात बनती नजर नहीं आई। फिर भी तीन-चार किसान लौट गए।
बाकी किसान विधायक की समझाइश पर बस में बैठकर विशाखापट्टनम के लिए रवाना हुए। विधायक इस बात से चिंतित थे कि किसानों की नाराजगी मीडिया की सुर्खियां न बन जाए। वो समझाने बुझाने में लगे रहे। और बस रवाना हुई, तो उन्होंने राहत की सांस ली।
लखमा को इजाजत?

पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा के उस आवेदन पर विचार चल रहा है, जिसमें उन्होंने विधानसभा के बजट सत्र में शामिल होने की अनुमति मांगी है। स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने कवासी लखमा के आवेदन पर विधानसभा सचिवालय से अभिमत मांगा है। सचिवालय इससे मिलते-जुलते प्रकरणों का अध्ययन कर रहा है।
दरअसल, पूर्व मंत्री कवासी लखमा को सशर्त जमानत मिली हुई है। जमानत अवधि में उन्हें प्रदेश से बाहर रहना होगा। वो ओडिशा के मलकानगिरी में शिफ्ट भी हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लखमा के विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा लेने पर फैसला स्पीकर पर छोड़ दिया है।
राज्य बनने के बाद जेल में बंद किसी विधायक को विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं मिली है। जबकि खुद लखमा के अलावा देवेन्द्र यादव जेल में थे। हालांकि दोनों सदस्यों की तरफ से विधिवत आवेदन नहीं आए थे।
वर्तमान में कवासी लखमा का प्रकरण थोड़ा अलग है। उन्हें जमानत मिल चुकी है। कोर्ट इस मामले में स्थिति साफ कर दी है। जम्मू-कश्मीर के सांसद इंजीनियर अब्दुल राशिद शेख का मामला लखमा जैसा ही है। हालांकि वो जेल में हैं। उनके मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने संसद की कार्रवाई में हिस्सा लेने के लिए कस्टडी पैरोल दी है।
शेख वर्ष-2017 में एनआईए द्वारा दर्ज किए गए आतंकी मामले में आरोपी हैं है। लखमा के मामले में विधानसभा सचिवालय ने अभी अभिमत नहीं दिया है, लेकिन पुराने उदाहरण को देखते हुए अंदाजा लगाया जा रहा है कि लखमा को सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति मिल सकती है। विधानसभा का बजट सत्र 23 फरवरी से शुरू हो रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
असम बेहतर होगा
पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार के लिए प्रदेश के भाजपा नेताओं को भेजा जा सकता है। इसकी सूची भी बन रही है। मगर ज्यादातर भाजपा नेता बंगाल जाने से बचना चाहते हैं। वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा अन्य राज्यों की तुलना में काफी ज्यादा होती है। इस मामले में बंगाल ने बिहार को पीछे छोड़ दिया है।
पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय को टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था। विजयवर्गीय किसी तरह बचे थे। उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई थी। कुछ भाजपा नेताओं का सोचना है कि बंगाल में वैसे भी पार्टी की सरकार नहीं है। ऐसे में वहां चुनाव प्रचार जोखिम भरा भी है।
ये अलग बात है कि प्रदेश भाजपा के महामंत्री (संगठन) पवन साय बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। वो करीब 50 विधानसभा सीटों के प्रभारी हैं। चूंकि पवन साय खुद बंगाल में मेहनत कर रहे हैं, ऐसे में यहां के नेताओं की वहां प्रचार में जाने के लिए मजबूरी भी है। फिर भी कुछ लोग चाहते हैं कि बंगाल के बजाए उनकी ड्यूटी असम में लग जाए। कुल मिलाकर भाजपा के अंदरखाने में इस पर काफी चर्चा हो रही है।
अध्ययन यात्रा या सैर-सपाटा?
जशपुर जिले की जिला पंचायत सदस्य आशिका कुजूर ने सरकारी अध्ययन-प्रशिक्षण यात्राओं की वास्तविकता सामने रखी है। उनकी पहली फेसबुक टिप्पणी व्यंग्य से भरी है। कहती हैं कि हम जनप्रतिनिधि जनता के पैसों से घूम रहे हैं। गांवों में पेयजल की समस्या है, बिजली आपूर्ति अनियमित है, स्कूल और आंगनबाड़ी जर्जर हैं, मनरेगा की स्थिति कमजोर है, किसान धान बेचने के लिए संघर्ष कर रहा है। स्वयं जनप्रतिनिधियों को महीनों से मानदेय नहीं मिला है। साल भर हो चुके जिला पंचायतों में निर्वाचन को, 15वें वित्त आयोग की राशि न मिली है। तब हम करोड़ों रुपये की अध्ययन यात्रा पर है। इस यात्रा के लिए सैकड़ों करोड़ का बजट बताया जा रहा है। वास्तविक राशि चाहे कम या अधिक हो, परंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि एक ओर विकास निधि कागजों में अटकी है और दूसरी ओर सामूहिक भ्रमण पर उदार व्यय दिख रहा है।
दूसरी पोस्ट में आशिका कुजूर ने कार्यक्रम के शेड्यूल पर सवाल उठाए हैं। छत्तीसगढ़ के विभिन्न संभागों से जिला पंचायत सदस्यों को 5-6 दिन के प्रशिक्षण हेतु मुंबई भेजा गया। उद्देश्य था, एक महानगर की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को समझकर अपने क्षेत्र में लागू करने योग्य अनुभव प्राप्त करना। किंतु तीन दिनों में केवल एक दिन औपचारिक प्रशिक्षण हुआ। शेष समय भ्रमण, धार्मिक स्थलों की यात्रा तथा मॉल दर्शन में बीता। मॉल के सामान इतने महंगे कि एक माह के मानदेय से एक चश्मा तक नहीं खरीदा जा सकता।
सार्थक प्रशिक्षण राज्य के भीतर भी हो सकता था। बस में बैठ सडक़ों और इमारतों को देख लेने मात्र से विकास की कार्यप्रणाली नहीं सीखी जा सकती। नही महंगे मॉल में घूम आना स्थानीय अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण का पाठ पढ़ा सकता है। जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट एजेंडा, विषय-विशेषज्ञों के सत्र, स्थानीय निकायों के साथ संवाद और व्यावहारिक कार्यशालाओं की आवश्यकता होती है। अंशिका ने यह भी इंगित किया कि जनप्रतिनिधियों को पूर्व सूचना तक नहीं दी जाती कि अगले दिनों का कार्यक्रम क्या होगा। भीड़ को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना प्रशिक्षण नहीं कहलाता। यह समय और संसाधनों का अपव्यय प्रतीत होता है।
पोस्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षण और एक्सपोजर विजिट लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक अंग हैं। जनप्रतिनिधियों को नवीन मॉडल, प्रशासनिक दक्षता और शहरी नियोजन के उदाहरण देखने चाहिए। किंतु योजना की गुणवत्ता जनप्रतिनिधियों के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए। जब मूलभूत विकास कार्य लंबित हों और मानदेय बकाया हो, तब अध्ययन यात्राओं की पारदर्शिता और उपयोगिता पर सवाल और भी अधिक जरूरी है।
कुजूर ने लिखा है कि यदि जनता के धन से कार्यक्रम आयोजित हो रहा है, तो उसका प्रतिफल भी जनता को दिखना चाहिए। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे सीखकर लौटें और उसे अपने क्षेत्र में लागू करें; वहीं सरकार का दायित्व है कि वह ऐसी यात्राओं को सार्थक, सुविचारित और परिणामोन्मुख बनाए। अन्यथा यह धारणा मजबूत होती जाएगी कि प्रशिक्षण के नाम पर केवल सैर-सपाटा हो रहा है और यह लोकतांत्रिक विश्वास के लिए बड़ा खतरा है।
बता दें, आशिका कुजूर प्रदेश युवक कांग्रेस की महासचिव हैं। वे राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में चलकर पहली बार चर्चा में आई थी।
डी.एड अभ्यर्थियों की उम्मीद जागी
डी.एड प्रशिक्षित अभ्यर्थी 50 से अधिक दिनों से नवा रायपुर के तूता धरनास्थल पर मौजूद हैं। इनमें से अनेक लोग आमरण अनशन भी कर रहे हैं। कई अभ्यर्थियों ने शिक्षा मंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री को खून से पत्र लिखकर अपनी नियुक्ति की मांग की है। आंदोलनरत कई अभ्यर्थियों की हालत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पूर्व में हाईकोर्ट ने रिक्त पदों पर दो माह के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया था। वह समय सीमा कब से खत्म हो चुकी है। इस समय 2300 पद ऐसे हैं जिन पर डी. एड प्रशिक्षित बेरोजगारों को नियुक्त किया जा सकता है। खास बात यह है कि यह मुद्दा अब प्रदेश के बाहर भी ध्यान खींच रहा है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। मुंडा ने एक आदिवासी बी.एड पात्र युवती के पत्र का हवाला देते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्णय के अनुपालन में सहायक शिक्षक भर्ती 2023 के अंतर्गत योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति लंबित है। मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने की कृपा करें। मुंडा केंद्र में मंत्री रह चुके हैं, झारखंड की कमान संभाल चुके हैं। पूर्व कहलाने के दौरान इस तरह का पत्र लिखना आसान हो जाता है, फिर भी आंदोलनरत युवाओं में समाधान की एक उम्मीद तो पैदा हो ही गई है। वैसे, आश्वासन छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से भी मिल चुका है। आंदोलन शुरू होने के करीब एक सप्ताह बाद उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा था कि सरकार के संज्ञान में हर एक विषय है, समय के साथ हर मामले में निर्णय लेकर समाधान किया जा रहा है। मगर, वह समय अभी तक आया नहीं है और आंदोलन जारी है। आश्वासन तो था लेकिन कुछ भी ठोस नहीं था। इसीलिए अभ्यर्थियों ने पिछले दिनों शिक्षा मंत्री के बंगले का घेराव भी किया और आंदोलन अभी जारी है।
तनाव मुक्ति के लिए प्रशिक्षण
सरकार गुड गवर्नेंस के लिए आर्ट ऑफ लिविंग संस्थान का सहयोग लेने जा रही है। संस्थान के शिक्षक राज्य सरकार के अधिकारियों-कर्मचारियों को तनावमुक्त रहने और कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रशिक्षण देंगे।
आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर जब यहां आए थे, तब सरकार से जुड़े लोगों के साथ प्रारंभिक चर्चा हुई थी। बस्तर के आदिवासी इलाकों के साथ-साथ नवा रायपुर में खडग़वां जलाशय के पास संस्थान का भव्य आश्रम बनाने की भी तैयारी है। इसके लिए संस्थान को 40 एकड़ जमीन आबंटित की गई है।
पहले चरण में आर्ट ऑफ लिविंग के प्रशिक्षकों ने सभी जिलों में जाकर कैदियों को योग आदि का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। अब प्रदेश के सभी जिलों में धीरे-धीरे अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की कक्षाएं शुरू करने की योजना है। निमोरा ग्रामीण विकास संस्थान में आर्ट ऑफ लिविंग की नियमित कक्षाएं शुरू करने पर भी विचार चल रहा है, ताकि नवनियुक्त अधिकारी-कर्मचारियों को तनावमुक्त रहने का प्रशिक्षण दिया जा सके।
संस्थान ने कुछ राज्यों में जल-संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए हैं। इसी तरह की कुछ योजनाएं छत्तीसगढ़ में भी प्रस्तावित हैं।
106 साल पुराना सरकारी अखबार
अंडमान के दौरे पर गए रायपुर के पत्रकारों का एक दल पोर्ट ब्लेयर में एक ऐसे अखबार के दफ्तर पहुंचा, जो बड़े निजी मीडिया समूहों के दबदबे वाले भारत में भी सरकार द्वारा मुद्रित, प्रकाशित और प्रसारित होता है। यह अखबार 3.50 लाख आबादी वाले द्वीप अंडमान के पोर्ट ब्लेयर से निकलता है — और यह आज से नहीं, बल्कि अपनी स्थापना के समय से ही ऐसा हो रहा है।
‘द टेलीग्राम’ नाम के इस अखबार की शुरुआत अंग्रेजों ने 1920 में की थी और तब से आज तक इसका प्रकाशन एक दिन भी नहीं रुका। अंग्रेजों के जाने के बाद तीन साल तक यहां काबिज रहे जापानियों ने भी इसका प्रकाशन जारी रखा, हालांकि उन्होंने इसका नाम बदलकर ‘सिंह भूम’ कर दिया था। जापानियों के जाने के बाद से लेकर आज तक केंद्र शासित अंडमान-निकोबार प्रशासन ही इसका मुद्रक और प्रकाशक है।
इस अंग्रेजी अखबार का एक हिंदी संस्करण भी है — ‘द्वीप समाचार’, जिसका प्रकाशन 46 वर्षों से हो रहा है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यह अखबार आज भी उसी भवन से प्रकाशित होता है, जहां अंग्रेजों ने इसकी शुरुआत की थी। ब्लैक-एंड-व्हाइट से रंगीन छपाई, 8 पेज के टैब्लॉयड से 20 पेज के ब्रॉडशीट तक का सफर भी इसी भवन में तय हुआ।
इस अखबार में पहले अंग्रेजी शासन की खबरें प्रमुख होती थीं, जबकि आज लेफ्टिनेंट गवर्नर, केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन की गतिविधियों के साथ समुद्री हलचल से जुड़ी खबरें अनिवार्य रूप से प्रकाशित होती हैं। कहा जाए तो समुद्री गतिविधियों की जानकारी देना इस सरकारी अखबार की मुख्य आवश्यकता है। इसमें ज्वार-भाटा, तूफानों के अलर्ट और अन्य जरूरी समुद्री सूचनाएं नियमित रूप से दी जाती हैं।
संपादकीय विभाग में संपादक के साथ केवल एक सहयोगी है, जो समाचार लेखन के साथ पेज सज्जा की जिम्मेदारी भी कंप्यूटर ऑपरेटर और डिजाइनरों की मदद से निभाता है। दिन भर इसी ऑफसेट प्रिंटिंग मशीन पर अंडमान-निकोबार प्रशासन के राजपत्र, गजट, बिल, सरकारी नोटशीट, रसीदें और अन्य स्टेशनरी छपती हैं — और उसके बाद सरकारी अखबार का मुद्रण होता है। इसमें विज्ञापन भी निजी कंपनियों के नहीं, बल्कि सरकारी होते हैं।
पोर्ट ब्लेयर की बहुभाषी आबादी को देखते हुए बंगाली पाठकों के लिए ‘सन्मार्ग’, तमिल पाठकों के लिए ‘थांती’ और ‘दिनमान तमिल’, तथा अंग्रेजी के लिए ‘द हिंदू’ जैसे अखबार चेन्नई, कोलकाता और हैदराबाद से हवाई मार्ग द्वारा यहां पहुंचाए जाते हैं।
निलंबन के पीछे की कहानी
आईएफएस के वर्ष-2015 बैच के अफसर मनीष कश्यप को सरकार ने सस्पेंड कर दिया है। कश्यप पर वन सचिव से फोन पर अभद्रता-गाली गलौज का आरोप है। यह पहला प्रकरण है जब किसी ऑल इंडिया सर्विस के अफसर को अपने सीनियर से बदसलूकी करने पर सस्पेंड किया गया है। कश्यप चार साल में दूसरी बार सस्पेंड हुए हैं।
पिछली बार जून-2022 में तत्कालीन सीएम भूपेश बघेल ने सूरजपुर प्रवास के दौरान गौठान योजना को लेकर गलत जानकारी देने पर सस्पेंड किया था। कुछ समय बाद वो बहाल भी हो गए थे। बताते हैं कि डीएफओ मनीष कश्यप पहले भी अपने सीनियर अफसरों से भिड़ते रहे हैं, और इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई थी।
कश्यप कांकेर जिले में पदस्थ थे, तब भी उनकी एक एपीसीसीएफ स्तर के अफसर से कहासुनी हुई थी। मामला वन मुख्यालय तक पहुंचा था। तब उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पिछली सरकार में कोरिया में पोस्टिंग के दौरान उनके व्यवहार-कार्यप्रणाली को लेकर जिले के दो विधायक अंबिका सिंहदेव, और गुलाब कमरो ने तत्कालीन वन मंत्री मो.अकबर से शिकायत की थी। इसके बाद कश्यप को हटाया गया और उन्हें मुख्यालय में अटैच किया गया था।
ताजा मामला एपीसीसीएफ स्तर के अफसर से जुड़ा हुआ है, जो कि वन सचिव के पद पर हैं। गत 23 जनवरी को भारत सरकार की प्रस्तावित बैठक से जुड़ी जानकारी के लिए उन्हें फोन किया तो उन्होंने कुछ बातों को लेकर अपने सीनियर अफसर पर बरस पड़े। आरोप है कि मनीष कश्यप ने उन्हें गाली-गलौज भी की है। वन सचिव ने इसकी जानकारी एसीएस (वन) श्रीमती ऋचा शर्मा को दी। सीएस विकासशील ने मामले को गंभीरता से लिया। इससे जुड़ी जानकारी भी जुटाई गई। इसके बाद सीएम ने कश्यप के सस्पेंशन प्रस्ताव पर मुहर लगा दी।
अंडमान में खुर्सीपार, रविवि की यादें
देश के लिए बंगाल की खाड़ी का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले अंडमान निकोबार में कोई छत्तीसगढिय़ा मिल जाए और उससे बातों के बाद यही कहा जा सकता है कि सबले बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा। यहां तो छत्तीसगढ़ से ताल्लुक रखने वाले चार लोग मिले। रायपुर से पहुंचे हम 9 पत्रकारों से मिल बहुत गदगद हो गए। एक तेजेश्वर राव तो पोर्ट ब्लेयर के मूल निवासी हैं और कांग्रेस की दांडी यात्रा के समय रायपुर के कांग्रेस नेता संजय सिंह ठाकुर के संपर्क में आया। बदले हुए राजधानी रायपुर की तारीफ करते नहीं थका। फिर हमारी मुलाकात एनडीआरएफ बटालियन के सब इंस्पेक्टर नरसिंह मूर्ति से हुई। वह तो रविशंकर विश्वविद्यालय के पास आउट हैं। उन्होंने रविवि में गुजारे दिनों का एक किस्सा भी बताया। कहा जब मैंने एडमिशन लिया तो सहपाठियों में मुझसे मिलने की होड़ लग गई। मेरे अंडमान से आने की खबर पर वो देखने आते। वे मुझे कोई समुद्री आदिवासी समझ, पहनावा शारीरिक डील डौल देखना चाहते थे। कतार लग गई और जब 15 वें ने देखा तो बोल पड़ा यह तो कपड़े पहनता है। तीसरे व्यक्ति रहे आर्मी अफसर सुनील ओझा। भिलाई के खुर्सीपार में बचपना गुजरा। चर्चा में एक एक गली और वहां की गंदगी में बता उसी खुर्सीपार को खोज रहे थे। वे कहते वैसी ही चाकूबाजी, छीना झपटी आज भी होती होगी। क्राइम रेट बहुत था। हमारे दुर्ग भिलाई के दो साथियों का हामी भरना स्वाभाविक है चौथे रहे एनडीआरएफ के डिप्टी कमांडेंट आर श्रीधर के चेहरे पर बस्तर खासकर सुकमा से नक्सलियों के खात्मे की खबरों से बड़ी खुशी झलक रही थी। वो 2018-22 के बीच चिंतलनार में पोस्टेड थे।
ननकी का मोदी के नाम शिकायती पत्र
प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर की एक बार फिर अपनी ही सरकार से नाराजगी जाहिर हुई है। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता विजय भतपहरी के खिलाफ जांच कराने की मांग की है। कंवर ने लिखा है कि इस अफसर ने अपने चहेते ठेकेदारों को अनुचित तरीके से लाभ पहुंचाकर भारी भ्रष्टाचार किया है। अपनी और अपने रिश्तेदारों के नाम पर अवैध संपत्ति अर्जित की है। इनके खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो और ईओडब्ल्यू में अनेक शिकायतें और एफआईआर दर्ज है लेकिन राजनीतिक पहुंच और काली कमाई के बल पर वे सभी जांच और और आपराधिक कार्रवाई को रोकने में कामयाब हो जाते हैं। कंवर ने सन् 2011 और 2015 में दर्ज आपराधिक मामलों का विवरण भी अपने पत्र में दिया है। कंवर ने दो तीन फर्मों के नाम लिखकर कहा है कि इनके जरिये घटिया काम कराए जा रहे हैं। कंवर की मांग यह भी है कि जितने भी निर्माण कार्य पूरे किए गए हैं, उनकी जांच मेरे समक्ष कराई जाए।
कंवर अपनी मुखरता के चलते अपनी सरकार के लिए प्राय: असहज स्थिति खड़ी कर देते हैं। उनके दावों का कोई खंडन भी नहीं करता और आरोप सही हों तो जांच की कार्रवाई भी नहीं होती। कुछ माह पहले कोरबा में कलेक्टर को उनकी मंशा के अनुरूप हटा देने के बाद सरकार के जवाबदेह अफसरों और मंत्रियों को लगा होगा कि शायद अब कंवर मुसीबत खड़ी न करें। मगर, इस बार उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। शायद उन्हें लगा हो कि राज्य में मंत्री और अफसर सरकार को किस तरह से चला रहे हैं, यह प्रधानमंत्री की जानकारी में लाना चाहिए।
धान खरीदी, घाटा बढ़ रहा

प्रदेश में धान खरीदी सरकार के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। सरकार समर्थन मूल्य से करीब साढ़े 7 सौ रुपए अधिक यानी 31 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीद रही है। इस खरीफ सीजन में समर्थन मूल्य पर एक करोड़ 42 लाख टन धान खरीद की गई। 24 लाख पंजीकृत किसानों को कुल 34 हजार करोड़ भुगतान किया गया है। इसमें करीब 32 हजार करोड़ रुपए किसानों के खाते में जा चुके हैं। फिलहाल समर्थन मूल्य 2369 रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया गया है। बाकी अंतर की राशि बाद में दी जाएगी। दिलचस्प बात ये है कि पिछले साल के मुकाबले इस खरीफ सीजन में 7 लाख टन धान की कम खरीदी हुई है।
यह पहला मौका है जब धान खरीद में कमी आई है। आमतौर पर धान खरीद का आंकड़ा लगातार बढ़ता रहा है, लेकिन इस बार लक्ष्य से कम धान खरीद हुई है। वैसे तो सरकार ने एक करोड़ 60 लाख टन धान खरीद के लिए तैयारी कर रखी थी, लेकिन 18 लाख टन धान कम खरीदी हुई । इससे परे गत वर्ष की तुलना से 7 लाख टन कम धान खरीद सरकार ने करीब 21 सौ करोड़ रुपए बचाए हैं।
दरअसल, समर्थन मूल्य से धान खरीद एक बड़ा राजनीति मुद्दा रहा है, लेकिन इससे सरकार को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। एक जानकारी के मुताबिक पिछले खरीफ सीजन में धान खरीद से करीब 10 हजार करोड़ का बोझ बढ़ा था। इस बार कम खरीद के बावजूद आंकड़ा इसके आसपास ही रहने के आसार हैं।
वकील के बदले वकील?
राज्यसभा की दो रिक्त सीट के लिए चुनाव की अधिसूचना अगले महीने जारी होगी। राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम, और सुप्रीम कोर्ट के वकील केटीएस तुलसी का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इस बार विधानसभा की संख्या बल के आधार पर भाजपा, और कांग्रेस को एक-एक सीट मिलेगी।
कांग्रेस से वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी के फिर छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में जाने की संभावना नहीं है। उनके बदले एक और बड़े वकील अभिषेक मनु सिंघवी के नाम की अभी से चर्चा हो रही है। अभिषेक मनु सिंघवी, तेलंगाना से राज्यसभा सदस्य हैं। उनका भी कार्यकाल खत्म हो रहा है।
तेलंगाना के कई नेता सिंघवी के बजाए स्थानीय नेता को ही राज्यसभा में भेजे जाने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। ऐसे में सिंघवी के लिए छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में जाने का विकल्प है। सिंघवी छत्तीसगढ़ के प्रमुख कांग्रेस नेताओं का केस लड़ चुके हैं।
हालांकि यहां भी कांग्रेस में स्थानीय नेता को ही राज्यसभा में भेजे जाने की वकालत की जा रही है। कुछ नेता आने वाले दिनों में इस सिलसिले में पार्टी हाईकमान से चर्चा भी कर सकते हैं। दूसरी तरफ, भाजपा में यह तय है कि किसी स्थानीय को ही राज्यसभा में भेजा जाएगा। कई हारे हुए बड़े नेता इसके लिए प्रयासरत हैं। कुल मिलाकर आने वाले दिनों में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल रहेगी।
20 साल में ही कॉरिडोर में आया मंत्रालय
बीस साल पहले नवा रायपुर में जब नए मंत्रालय भवन की योजना बनाई गई थी तब प्लानर और डेवलपर्स ने 50 वर्ष की जरूरत के मुताबिक निर्माण का दावा किया था। मिनिस्टीरियल, सेक्रेटरियल और एडमिनिस्ट्रेटिव तीन ब्लॉक के पांच मंजिल वाले महानदी भवन ने आकार लिया। एकड़ों में फैले भवन में बड़े अनुभाग कक्ष के साथ एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक में 156 और मिनिस्ट्रियल सेक्रेटेरिएल ब्लाक में 220 कक्ष हैं। हम भवन का नाप जोख इसलिए बता रहे हैं कि अब दो दशक में ही यह भवन छोटा पडऩे लगा है। ऐसा नहीं है कि इन वर्षों में मंत्रालय कैडर में बहुत अधिक भर्तियां हो गई हों।
केवल तीन बार की भर्ती के आंकड़े मिलते हैं और उससे कहीं अधिक लोग रिटायर हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं है कि सचिवों की संख्या बढ़ गई हो। उसके बावजूद स्थानाभाव की यह समस्या संसदीय सचिवों के लिए बने कमरों में आला सचिवों का कब्जा। तो फील्ड अफसर कहे जाने वाले डिप्टी कलेक्टरों के साथ राज्य कैडर वाले ओएसडी की आरामतलब नौकरी के लिए मंत्रालय में पोस्टिंग लेने से आई है। पुराने लोग बड़े बड़े कमरे में बने हुए हैं और नयों को कमरे देने कई अनुभागों में पार्टिशन करके चेंबर बनाने पड़े हैं । और कुछ को जीएडी से ही कह दिया जाता है कि मंत्रालय में कक्ष नहीं मिलेगा। उसके बाद भी मंत्रालय पोस्टिंग का क्रेज़।
दूसरी समस्या एनआईसी जैसे कई दफ्तरों का महानदी भवन में बने रहना। ऐसी हालत में कमरों की मारामारी की इस समस्या से निपटने जीएडी ने भवन के भूतल के ओपन कॉरिडोर में एक दर्जन नए कमरे बनाए हैं। जहां जीएडी के ही अनुभाग को शिफ्ट किए जाने की चर्चा है। यह प्रयोग सफल हुआ तो कहीं ऐसा न हो कि हर मंजिल के कॉरिडोर में कमरों का अंबार लग जाए। वैसे मंत्रालय अधीक्षण शाखा और जीएडी के बीच चर्चाओं में परिसर के भीतर उपलब्ध खाली जमीन पर एक नया भवन बना लिया जाए तो समस्या 50 वर्ष आते तक हल हो सकती है।
कमाऊ पूत की थाली
रेल बजट को लेकर बढ़-चढक़र दावे किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लिहाज से रेल बजट को ऐतिहासिक करार दिया जा रहा है। केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में रेलवे की अधोसंरचना विकास के लिए 7470 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। मगर अब जानकारी छनकर आ रही है, उसमें कोई खास बात नहीं दिख रही है।
कुछ जागरूक लोगों ने रेलवे के रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं। यह बात सामने आई है कि बिलासपुर जोन 9462 करोड़ के फायदे में है। उस अनुपात में छत्तीसगढ़ में यात्री सुविधाएं नहीं बढ़ी है। इससे परे सेंट्रल रेलवे और वेस्ट सेंट्रल रेलवे जो कि क्रमश: 787, और 3572 करोड़ के घाटे में हैं। वहां बुलेट ट्रेन और हाईस्पीड ट्रेन व मेट्रो चलाई जा रही है। ये दोनों जोन महाराष्ट्र और गुजरात में आते हैं, और रेलवे ने इन्हीं राज्यों पर विशेष रूप से फोकस किया है। छत्तीसगढ़ में परमालकसा-खरसिया कॉरीडोर के अलावा अन्य रेल लाइन बिछाने की योजना है। खास बात ये है कि यहां से यात्री सुविधाओं के बजाय कोयला परिवहन का उपयोग ज्यादा होगा।
सुदूर आदिवासी अंचल रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना पर काम चालू होने वाला है। लेकिन यहां भी खनिज परिवहन के लिए ज्यादा उपयोग होगा। हालांकि कुछ वंदे भारत जैसी कुछ ट्रेन जरूर चली है। नए रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ है, लेकिन जिस हिसाब से मुनाफा बढ़ा है, उससे यहां मेट्रो हाईस्पीड ट्रेन चलाए जाने की उम्मीद जताई जा रही थी, जो कि फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आ रही है।
शांति के प्रतीक पर अनदेखा संकट

शाम ढलते ही घरों की मुंडेर पर आ बैठने वाले कबूतर शांति, प्रेम और सह-अस्तित्व के प्रतीक माने जाते हैं। नीले-धूसर पंखों की यह सुंदर छवि अब शहरों में एक अलग ही बहस का कारण बन गई है। पक्के मकानों, बंद बालकनियों और सीमित खुली जगहों के बीच आज इंसान और कबूतर आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। डर और असमंजस के साथ।
चिकित्सकों और शोधों ने चेताया है कि कबूतरों की बीट और पंखों से उडऩे वाले सूक्ष्म कण हवा के जरिए फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं। इससे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। अस्थमा और सांस संबंधी रोगियों के लिए यह जोखिम और भी गंभीर बताया जा रहा है। राजस्थान के कुछ शहरों में कबूतरों की बढ़ती संख्या के साथ इन बीमारियों के मामलों में इजाफा होना इसकी वजह बताई जा रही है।
देश के कई शहरों में पुरानी इमारतों के सामने कबूतरों को दाना डालने की पुरानी परंपरा है। कहा जा रहा है कि के कारण बढ़ते प्रदूषण और बर्ड फ्लू का खतरा बढ़ रहा है। अब जयपुर, बेंलगूरु और मुंबई के कुछ शहरों में कबूतरों के लिए सार्वजनिक दाना डालने पर 5000 रुपये तक दंड का प्रावधान कर दिया गया है। एक ओर स्वास्थ्य का सवाल है, तो दूसरी ओर पक्षी के लिए करुणा और परंपरा।
कई पक्षी प्रेमियों को कबूतरों के साथ इस तरह का बर्ताव करने पर आपत्ति है। उनका कहना है कि मानव ने जब जंगल छीने, खुले आकाश को कंक्रीट में बदला, तब इन कबूतरों का प्राकृतिक आश्रय भी छिन गया। आज जंगल उनके नहीं रह गए। अब शहरों से विदा होकर कहां जाएंगे। क्या चील, बाज की तरह ये भी लुप्त हो जाएंगे? मगर, इसके अस्तित्व को तो बचाकर रखना ही होगा- वरना राष्ट्रीय समारोहों में शांति के प्रतीक के रूप में किसे उड़ाया जाएगा? यह तस्वीर बिलासपुर के नरेंद्र वर्मा ने खींची है।
आसंदी की ऊंचाई कुछ कम हुई
बजट सत्र में नए विधानसभा भवन में सदन का परिदृश्य बीते शीत सत्र से बदला नजर आएगा। छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऊंचा कद्दावर स्थान रखने वाले स्पीकर रमन सिंह की आसंदी में भी कुछ बदलाव किया गया है।यह बदलाव सचिवालय ने पिछले सत्र के अनुभव को देखते हुए किया है। वे सदस्यों को तब तक नजर नहीं आते जब तक आसंदी तक नहीं पहुंचते या बैठ नहीं जाते।
पुरानी विधानसभा में सदन में प्रवेश करते ही दिख जाते थे।ऐसा नए भवन में अध्यक्ष की आसंदी की ऊंचाई बढऩे से हुआ है। यह ऊंचाई भी शीत सत्र के समय बढ़ाई जब आसंदी से सदन के नेता और नेता प्रतिपक्ष नजर नहीं आ रहे थे। इस वजह से ही सदन में प्रवेश करने पर अध्यक्ष भी नजर नहीं आ रहे थे। इस पर शीत सत्र में पूर्व सीएम कांग्रेस विधायक भूपेश बघेल ध्यानाकृष्ठ कर चुके थे। बघेल ने कहा था कि अध्यक्ष महोदय, आसंदी पर आने के बाद ही नजर आते हैं। दरअसल प्रवेश करते समय अध्यक्ष के दिखने पर दोनों पक्षों के सदस्य अभिवादन करते हैं। और कुछ हंसी ठिठोली भी हो जाया करती थी।आसंदी की ऊंचाई बढऩे से यह अध्यक्ष के आसन पर पहुंचने के बाद हो पा रहा था।
इसे गंभीरता से लेते हुए सचिवालय ने आसन की ऊंचाई कुछ कम की है। जो बजट सत्र में सुविधाजनक होगी।एक और बदलाव कांग्रेस विधायकों की बैठक में भी दिखेगा। शराब घोटाले में एक साल बाद अंतरिम जमानत मिलने के बाद कांग्रेस विधायक कवासी लखमा कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं। वरिष्ठ विधायक को उपयुक्त स्थान देने विपक्ष की भी बैठक व्यवस्था बदलेगी।
चिमनानी की पोस्ट से खलबली
सरकार निगम-मंडलों, और आयोगों में एक-एक कर नियुक्तियां कर रही है। खास बात ये है कि नियुक्तियों में आरएसएस की सिफारिशों को भी तव्वजो दी जा रही है। इन सबके बीच सिंधी अकादमी में भी नियुक्तियों को लेकर सिंधी समाज, और भाजपा में काफी बहस हो रही है।
अकादमी में अध्यक्ष और संचालक मंडल के सदस्यों की नियुक्ति जल्द होने की संभावना है। इसी बीच भाजपा के प्रवक्ता अमित चिमनानी ने एक वाट्सएप ग्रुप में संभावना जताई कि सिंधी अकादमी का अध्यक्ष कोई महिला हो सकती है। चूंकि चिमनानी पार्टी के प्रवक्ता भी हैं इसलिए उनके पोस्ट को गंभीरता से लिया जा रहा है, और कई पुरूष दावेदार सक्रिय हो गए हैं। कुछ ने तो महिला को अकादमी का अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना पर एतराज किया है।
बताते हैं कि सिंधी समाज के एक संत ने अकादमी की नियुक्तियों को लेकर अपनी तरफ से कुछ सिफारिशें की है। इनमें भिलाई की एक सामाजिक कार्यकर्ता को अकादमी का अध्यक्ष बनाए जाने का सुझाव दिया है। इस पद पर प्रदेश के प्रमुख भाजपा के सिंधी समाज के नेताओं की नजरें हैं। नाम लीक हो गए तो विवाद भी खड़ा हो गया है। हालांकि आदेश अभी जारी नहीं हुए है, और कुछ लोग नए नाम की संभावना जता रहे हैं। फिलहाल तो नामों को लेकर गरमा-गरमी चल रही है। देखना है आगे क्या होता है।
प्रतिनियुक्ति और हलचल

पीएचक्यू में जल्द ही एक और बदलाव हो सकता है। आईपीएस के वर्ष-2004 बैच के अफसर अभिषेक पाठक केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट रहे हैं। पाठक गुजरात में बीएसएफ में पोस्टेड रहे हैं। उनके इस माह के आखिरी में लौटने की संभावना जताई जा रही है। इससे परे रेंज में पदस्थ एक आईजी ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जताई है। वो पारिवारिक कारणों से रेंज से हटना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, कवर्धा एसपी धर्मेन्द्र सिंह छवाई के पत्र को लेकर पीएचक्यू में हलचल है। छवाई ने पदोन्नति न होने पर नाराजगी जताई है, और डीजीपी को कड़ा पत्र लिखा है। छवाई कैट में भी जा सकते हैं। इन सबके बीच उनके पत्र को लेकर शासन स्तर पर प्रतिक्रिया हुई है। जल्द ही इस मामले में कोई एक्शन हो सकता है। देखना है आगे क्या हो सकता है।
असम से खास रिश्ता
पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। भाजपा, असम और पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी की इन्हीं दो राज्यों में सबसे ज्यादा उम्मीद है। असम में तो सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है।
असम में भाजपा ने स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर अन्य राज्यों से नेताओं को प्रचार में भेज रही है। छत्तीसगढ़ से डिप्टी सीएम अरुण साव को असम की 9 विधानसभा सीटों का प्रभारी बनाया गया है। क्षेत्रीय महामंत्री ( संगठन) अजय जम्वाल भी वहां संगठन का काम देख चुके हैं।
छत्तीसगढ़ का असम से खास रिश्ता रहा है। अंग्रेजों के जमाने में बड़े पैमाने पर छत्तीसगढ़ी लोग वहां चाय बागानों में काम के लिए ले जाए गए थे, और वो वहां रच बस गए। अभी कई विधानसभा सीटों पर छत्तीसगढ़ के मूल के लोग निर्णायक भूमिका में हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद मिनीमाता भी असम की रहने वालीं थीं। उनका जन्म असम के नागांव जिले के साइनाबागन में हुआ था। उनका विवाह सतनामी समाज के गुरू अगमदास से हुआ, और विवाह के बाद वे छत्तीसगढ़ आईं और सामाजिक व राजनीति में सक्रिय रहीं।
इसी पूर्व केंद्रीय मंत्री और असम से भाजपा के राज्यसभा सदस्य रामेश्वर तेली की जड़ें भी छत्तीसगढ़ से जुड़ी रहीं हैं। उनकी भी पहचान चाय बागान के मजदूर नेता के तौर पर है। असम और छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच पुराने संबंधों को देखते हुए भाजपा और कांग्रेस, छत्तीसगढ़ के नेताओं को अहम जिम्मेदारी दे रही है। कांग्रेस से पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय असम कांग्रेस का प्रभारी सचिव हैं , तो पार्टी ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल सीनियर ऑब्जर्वर बनाया है। कई और नेता प्रचार के लिए भेजा जा रहा है। कुल मिलाकर असम में छत्तीसगढ़ी नेता चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे।
महानदी पर सुनवाई निरंतर हो पाएगी?
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे महानदी जल विवाद को लेकर गुरुवार को लोकसभा में एक बार फिर सवाल उठा। ओडिशा के सांसद प्रदीप पुरोहित द्वारा पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय जलशक्ति राज्य मंत्री राजभूषण चौधरी ने बताया कि दोनों राज्य विवाद के समाधान के लिए विभिन्न स्तरों पर आपसी बातचीत कर रहे हैं।
इसी बीच, 7 फरवरी को महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को सुनवाई के लिए तलब किया है। यह सुनवाई ऐसे समय में हो रही है, जब ट्रिब्यूनल का वर्तमान कार्यकाल 13 अप्रैल 2026 को समाप्त होने वाला है। मालूम हो कि ट्रिब्यूनल का गठन 12 मार्च 2018 को हुआ था, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण और बाद में लंबे समय तक अध्यक्ष पद रिक्त रहने से सुनवाई की प्रक्रिया बाधित रही। इन्हीं कारणों से ट्रिब्यूनल का कार्यकाल अब तक दो बार बढ़ाया जा चुका है।
अब तक दोनों राज्यों के साथ ट्रिब्यूनल की कुल 49 बैठकें हो चुकी हैं। 7 फरवरी को 50वीं बैठक होगी, लेकिन इस बैठक से किसी ठोस समाधान की उम्मीद बेहद कम मानी जा रही है। संभावना है कि दोनों राज्य इस सुनवाई में केवल यह जानकारी साझा करेंगे कि सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए उनके बीच अब तक किस स्तर तक बातचीत हुई है। किसी निष्कर्ष या सहमति पर दोनों राज्य अभी तक नहीं पहुंच सके हैं। इस बात का अनुमान स्वयं ट्रिब्यूनल के रजिस्ट्रार ने हाल ही में ओडिशा सरकार को लिखे गए एक पत्र में लगाया है।
गौरतलब है कि ओडिशा ने 7 फरवरी की सुनवाई को टालने के लिए पिछले महीने ट्रिब्यूनल से अनुरोध किया था। ओडिशा का तर्क था कि उस दिन महाधिवक्ता ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित नहीं हो पाएंगे। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए कहा कि सुनवाई की कार्यवाही पहले से निर्धारित है और आवश्यकता होने पर महाधिवक्ता को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जा सकती है।
पिछली सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को यह सुझाव दिया था कि वे संयुक्त रूप से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कार्यकाल विस्तार का अनुरोध करें। लेकिन अब तक ऐसा कोई साझा पत्र केंद्र को नहीं भेजा गया है। ओडिशा ने अलग से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर ट्रिब्यूनल का कार्यकाल नौ महीने बढ़ाने की मांग जरूर की है, जिस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
यदि ट्रिब्यूनल का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया गया, तो 7 फरवरी की बैठक अंतिम बैठक साबित हो सकती है, क्योंकि ट्रिब्यूनल को अब तक हुई सुनवाई और प्रगति पर अपनी रिपोर्ट भी तैयार करनी होगी। कुल मिलाकर मौजूदा हालात यही संकेत देते हैं कि यदि ट्रिब्यूनल का कार्यकाल तीसरी बार नहीं बढ़ाया गया, तो महानदी जल विवाद के समाधान की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है। संभावना तभी बनेगी, जब ट्रिब्यूनल को आगे कुछ और समय मिले।
चलते-फिरते मिल रही नसीहत
सडक़ों पर दौड़ते ट्रकों के पीछे लिखी पंक्तियां अक्सर हमें गुदगुदा देती हैं। मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं। लेकिन इन पंक्तियों में छिपी सच्चाई कई बार समाज की हकीकत पर सीधे चोट करती है।
इस ट्रक के पीछे लिखा है कि वह तुम्हें डीपी दिखाकर गुमराह करेगी, मगर तुम आधार कार्ड पर अड़े रहना। यह आज के डिजिटल दौर की बड़ी सच्चाई है। सोशल मीडिया पर लोग खुद को जैसा हैं, उससे कहीं ज़्यादा बेहतर, सुंदर और आकर्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। कई बार ये तस्वीरें असली होती ही नहीं। फिल्टर, एडिटिंग होती है या किसी और की फोटो तक इस्तेमाल कर ली जाती है। इसके चलते फरेब और जालसाजी के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं।
ट्रक वाले की सलाह है कि अगर किसी से नज़दीकी बढ़ानी है, भरोसा करना है, तो सिर्फ सोशल मीडिया की डीपी पर नहीं, आधार कार्ड जैसे असली पहचान पर भरोसा कीजिए। आधार कार्ड में लगी तस्वीर प्राय: उतनी अच्छी होती नहीं, पर हकीकत के सबसे करीब होती है।
अफसरों की चुनाव ड्यूटी
देश के पांच राज्यों में चुनाव के चलते केन्द्रीय चुनाव आयोग ने छत्तीसगढ़ के 30 आईएएस, और आईपीएस अफसरों को पर्यवेक्षक बनाया है। इन अफसरों की दिल्ली में ट्रेनिंग चल रही है। इस बार पर्यवेक्षकों की ड्यूटी में कुछ बदलाव किया गया है। मसलन, अधिसूचना जारी होने के बाद से सभी पर्यवेक्षकों को अपने क्षेत्र में रहना होगा।
पहले चुनाव में नामांकन दाखिले के आखिरी दिन केन्द्रीय पर्यवेक्षक संबंधित चुनाव क्षेत्र में पहुंचते थे। मगर इस बार पहले दिन से चुनाव क्षेत्र में रहना होगा। यानी सात दिन की अतिरिक्त ड्यूटी होगी। इस बार सचिव स्तर के अफसरों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। इनमें ऋतु सैन, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, नीलम एक्का, एस प्रकाश, भुवनेश यादव, आर भारतीदासन, अंकित आनंद, अब्दुल कैसर हक, शम्मी आबिदी, हिमशिखर गुप्ता, शिखा राजपूत तिवारी, राजेश सिंह राणा, अवनीश शरण, धर्मेश साहू, पीएस एल्मा, रमेश शर्मा, और सारांश मित्तर हैं। पांच आईपीएस अफसरों को भी पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। इनमें डॉ. आनंद छाबड़ा, रतनलाल डांगी, अजय कुमार यादव, अंकित गर्ग, और बद्रीनारायण मीणा हैं।
आईपीएस की रवानगी
केन्द्र सरकार ने वर्ष-2011 बैच से आईपीएस अफसरों की आईजी, या समकक्ष पदों पर पदोन्नति के लिए दो साल की केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति अनिवार्य कर दी है। केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को पत्र भी जारी किए हैं। खास बात ये है कि स्टेट सर्विस से आईपीएस अवार्डी ज्यादातर अफसर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने से परहेज़ करते रहे हैं। राज्य बनने के बाद अब तक एक भी अवार्डी अफसर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं गए। मगर नए निर्देश के बाद उन्हें अब प्रतिनियुक्ति पर जाना होगा।
इससे परे छत्तीसगढ़ कैडर के अभी 8 अफसर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। कुछ और अफसर जाने की तैयारी कर रहे हैं। खबर है कि पीएचक्यू में पदस्थ डीआईजी स्तर के दो अफसर यूनाइटेड नेशंस में प्रतिनियुक्ति पर जाने के इच्छुक हैं। इसके लिए केंद्र ने आवेदन बुलाए हैं। कुल 7 अफसर वहां पदस्थ किए जाने हैं। अफसरों की पोस्टिंग न्यूयॉर्क में ही रहेगी। यही वजह है कि अन्य राज्यों के कई आईपीएस अफसर भी वहां प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए प्रयासरत हैं।
छत्तीसगढ़ के जिन दो डीआईजी स्तर के अफसरों ने युनाइटेड नेशन में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन दिया है, उनमें एक का आवेदन केन्द्रीय गृहमंत्रालय को फारवर्ड भी कर दिया है। देखना है कि उन्हें काम करने का अवसर मिलता है या नहीं।
तब छत्तीसगढ़ भी टाइगर स्टेट कहलाएगा

बस्तर वन मंडल के बकावंड वन परिक्षेत्र और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की हालिया गतिविधियां दर्ज की गई हैं। जनवरी में दो बार जगदलपुर के निकट टोकापाल ब्लॉक के खंडियापाल और वजाबंड गांवों में ग्रामीणों ने बाघ के पगचिन्ह देखे थे। यह बाघ अब बारनवापारा की ओर बढ़ गया है। वन विभाग का अनुमान है कि यह बाघ बचेली की ढलानों से होते हुए भानपुरी रेंज और कांगेर वैली की ओर बढ़ रहा है, जो संभवत: महाराष्ट्र की सीमाओं से आया हुआ है। इसी तरह, अचानकमार अभयारण्य में मध्यप्रदेश के कान्हा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से बाघों का प्रवेश हो रहा है। सन् 2024 के दिसंबर में कान्हा से एक बाघ ने लगभग 450 किलोमीटर की दूरी तय करके अचानकमार पहुंचा था। हाल ही में यहां एक पर्यटक परिवार को बाघ का दर्शन हुआ। ऐसा दुर्लभ मौका पर्यटकों को कई साल बाद मिला।
इधर, भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य में भी बाघों की हलचल बढ़ी है। कैमरा ट्रैप से चार से अधिक बाघों और बाघिनों की उपस्थिति की पुष्टि हुई है, जिनमें प्रभु झोल, चिल्फी और झलमाला जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ग्रामीणों को अक्सर पगचिन्ह दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में बाघों के लिए अनुकूल वातावरण मौजूद है। चीतल, सांभर और जंगली सूअर और जल स्रोतों की उपलब्धता बाघों को छत्तीसगढ़ के जंगलों की ओर आकर्षित कर रही है। पड़ोसी राज्यों में बाघों की बढ़ती आबादी के कारण भी ये बाघ छत्तीसगढ़ की ओर रुख कर रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या वन विभाग इन बाघों के संरक्षण के लिए तैयार है? बीते माह, जनवरी में अचानकमार अभयारण्य के कुतेरपानी क्षेत्र में एक दो साल के नर बाघ की मौत हो गई, जिसे इलाके के लिए जंग का नतीजा बताया गया। वन विभाग को इसकी जानकारी कई दिनों बाद मिली, जब पेट्रोलिंग टीम ने शव देखा। पोस्टमॉर्टम से पता चला कि गर्दन की हड्डी टूटी हुई थी और काटने के निशान थे। यह घटना वन विभाग की निगरानी और सक्रियता में कमी को सामने लाता है। यदि समय पर पता चलता, तो शायद संघर्ष को रोका जा सकता था या घायल बाघ को बचाया जा सकता था। पिछले चार सालों का आंकड़ा देखें तो लगभग 10 बाघों की खालें जब्त की गई हैं, जो शिकार और अवैध व्यापार की समस्या को समस्या को सामने लाता है।
बाघों के संघर्ष का सात-आठ दिनों बाद पता चलना, शिकार और तस्करी की घटनाओं का बढऩा यह बताता है कि वन विभाग को अपनी निगरानी प्रणाली को काफी दुरुस्त करने की जरूरत है। देश मध्यप्रदेश, जो सर्वाधिक बाघों वाला राज्य है वहां कैमरा ट्रैप, रेडियो कॉलर और ड्रोन का भरपूर उपयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ ने 121 वन्यजीव कॉरिडोर चिन्हित किए हैं, जहां से बाघों और दूसरे वन्यजीवों का राज्य में प्रवेश व भ्रमण हो सकता है, पर इन्हें संरक्षित और विकसित करने के लिए कोई ठोस योजना अब तक घोषित नहीं है। उदंती सीतानदी अभयारण्य में सौर ऊर्जा आधारित जल स्रोतों की स्थापना की गई है, इसे राज्य भर के अभयाण्यों में अपनाया जा सकता है । छत्तीसगढ़ के वनों में बाघों की वापसी एक शुभ संकेत है, जो अपने राज्य को भी टाइगर स्टेट बनाने की क्षमता रखती है। लेकिन यदि वन विभाग ने तत्परता नहीं दिखाई, तो ये मेहमान बाघ स्थायी निवासी बनने के बजाय खो सकते हैं।
प्रतिनियुक्ति से नफा-नुकसान

2010 बैच के देश भर के 24 आईएएस अफसरों को डीओपीटी ने केंद्रीय विभागों में संयुक्त सचिव के लिए नामजद (इंपैनल) किया है। इस बैच के छत्तीसगढ़ के चार अफसरों में से तीन जेपी मौर्य, रानू साहू, सारांश मित्तर को शामिल ही नहीं किया है। पहले दो को क्यों शामिल नहीं किया गया होगा यह सब जानते हैं। जेपी का तो राज्य में ही प्रमोशन रोक दिया गया है। तो रानू निलंबित है। जब तक कोयला,डीएमएफ घोटाले में दूध और पानी अलग नहीं हो जाते मौर्य दंपति को ऐसे लाभ नहीं मिल पाएंगे। इस बैच के चौथे अफसर कार्तिकेय गोयल , राज्य के जनगणना आयुक्त के पद पर पहले से ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं।
बहरहाल अगले एक दो महीने में केंद्रीय विभागों में छत्तीसगढ़ के कुछ अफसरों को सचिव बनने का अवसर मिलता दिख रहा है। बताया गया है जो इस वर्ष 11 सचिव स्तर के अफसर रिटायर होने जा रहे हैं। डीओपीटी ने उनके उत्तराधिकारियों के चयन की कवायद शुरू कर दी है। पहली वेकेंसी संसद के बजट सत्र के बाद भरी जाएगी। इसके लिए 1994,95 बैच के आईएएस अधिकारियों को इंपैनल किया जाना है। इनमें 94 बैच से छत्तीसगढ़ से ऋचा शर्मा, निधि छिब्बर, विकास शील, मनोज पिंगुवा, 95 से मनिंदर कौर द्विवेदी और गौरव द्विवेदी प्रमुख हैं। इनमें से निधि केंद्र में नीति आयोग में ही है तो विकास शील राज्य में मुख्य सचिव हैं। उनके केंद्र में जाने की संभावना नहीं है। उनसे वरिष्ठ ऋचा शर्मा, कनिष्ठ पिंगुवा जाने तैयार हैं। द्विवेदी दंपति दिल्ली में ही हैं। सलेक्ट हुए तो उनका बस पदनाम ही बदलेगा। वैसे अभी भी दोनों सचिव के समकक्ष ही कार्य कर रहे हैं।
रेल टेल से ट्रेनें चलें या मंत्रालय...
पिछले वर्ष अप्रैल से मंत्रालय में और बीते दो माह से कलेक्टोरेट तक ई आफिस में सरकारी कामकाज होने लगा है। इस पर कर्सर क्लिक कर तेजी से काम करने वाले अधिकारी कर्मचारी प्रमाण पत्र भी लेने लगे हैं। बड़े बड़े साहब और सरकार को लग रहा है कि यह सब कुछ सरकारी इंटरनेट कनेक्शन से स्मूदली हो रहा है। पर सच्चाई एकदम अलग है। पिछले दो तीन महीने में ऐसी कई खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं कि नेटवर्क बंद होने से मंत्रालय में काम ठप रहा। इस समस्या से निपटने अधिकारी कर्मचारियों ने एक रास्ता निकाला कि सरकारी नेट डिस्कनेक्ट होने पर अपने मोबाइल नेटवर्क को कनेक्ट कर काम कर लिया जाए। दरअसल यह समस्या मंत्रालय में इस्तेमाल नेटवर्क के बेतहाशा ओवरलोड होने की वजह से आ रही है। पूरे मंत्रालय में वाई फाई नेटवर्क भारतीय रेलवे के नेटवर्क रेल टेल का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूरे रेलवे का अपना देशव्यापी नेटवर्क पूरा इसी पर चल रहा है। टिकिट रिजर्वेशन से लेकर ट्रेन संचालन सब कुछ।इतने बड़े नेटवर्क के आनलाइन लोड के बाद भला मंत्रालय को बाधारहित कनेक्टिविटी रेलटेल से कैसे मिल पाएगी, समझ से परे है। बताया जा रहा है कि रेल टेल का वाइ फाई महानदी भवन के मंत्री ब्लाक में ही चलता है शेष सेक्रेटरी और एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लाक में अधिकारी कर्मचारी स्वयं के जियो, एयरटेल, आईडिया, बीएसएनएल के पर्सनल डेटा से काम करने मजबूर हैं। इस समस्या को लेकर कर्मचारी संघ के नेता इस दौरान कई बार मुख्य सचिव, सचिव जीएडी से गुहार लगा चुके हैं। संघ के सदस्य अपने अध्यक्ष सचिव को उलाहना देने लगे हैं कि वाई फाई के संबंध मुख्य सचिव से हुई चर्चा का कोई सकारात्मक परिणाम मिलेगा या आगे इसी प्रकार चलना है? इससे समझा जा सकता है कि निकट भविष्य में यदि इंद्रावती भवन और जिलों को भी रेल टेल से कनेक्ट कर दिया गया तो सरकारी कामकाज कर्सर की तरह गोल गोल घूमता रहेगा। बिल्कुल लेट लतीफ ट्रेनों की तरह..!
प्लास्टिक बोतलों के पहाड़ से कैसे बचेंगे?
छत्तीसगढ़ सरकार ने 2026-27 की एक्साइज पॉलिसी में सरकारी दुकानों से बिकने वाली शराब को प्लास्टिक बोतलों में पैक करने का फैसला लिया है। निर्णय नए वित्तीय वर्ष से यानि एक अप्रैल से लागू होगा। छत्तीसगढ़ जैसे भारी खपत वाले राज्य में प्लास्टिक बोतलों के उपयोग को लेकर इतना बड़ा फैसला तो सरकार ने ले लिया लेकिन ऐसी कोई नीति घोषित नहीं की है जो इससे जुड़ी स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रदूषण संबंधी चिंताओं का समाधान करे।
सरकार ने मुख्य रूप से ब्रेकेज और डैमेज से होने वाले नुकसान को कम करना इसका कारण बताया है। कांच की बोतलों में ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के दौरान टूटने से आर्थिक नुकसान होता है। दरअसल, प्लास्टिक बोतलें सस्ती और हल्की होती हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन लागत घटती है। शराब निर्माताओं के लिए भी प्लास्टिक आसान और सस्ता विकल्प है। कांच की बोतलों के मुकाबले प्लास्टिक बोतलों पर खर्च 30 प्रतिशत तक कम हो जाता है। कुछ रिपोर्ट्स में अनुमान लगाया गया है कि इस नई नीति के चलते सरकार का भी सालाना राजस्व 400 करोड़ तक बढ़ सकता है।
छत्तीसगढ़ जैसे उच्च खपत वाले राज्य में कांच की बोतल बंद होने से इसका निर्माण करने वाले उद्योगों को भारी नुकसान होगा, वहीं प्लास्टिक बोतल बनाने वालों को एक बड़ा बाजार मिलेगा। मगर, श्रमिकों के वर्ग में भी हलचल है। कल दुर्ग जिला मुख्यालय में दर्जनों महिलाओं ने प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। ये महिलाएं नई आबकारी नीति के विरोध में हैं। इनका कहना था कि कांच की खाली बोतलों को धोकर वे अपना परिवार पाल रही हैं। एक दिन में 10 से 15 कट्टा बोतलों को धोने के बदले उनको 400 रुपये तक की कमाई होती है, जो बंद हो जाएगी। इनका दावा है कि पूरे प्रदेश में हजारों महिलाएं इस काम में लगी हुई हैं, सबका रोजगार छिनेगा।
मगर इससे भी बड़ा मुद्दा स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित है। आम तौर पर शराब कांच की बोतलों में रखी जाती है। माना जाता है कि प्लास्टिक में ऑक्सीजन घुस सकता है, जो शराब के फ्लेवर और क्वालिटी को खराब कर देता है। शराब प्लास्टिक से केमिकल्स, जैसे एथिलीन ग्लाइकॉल को घोल सकती है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे इलाके में, जहां गर्मी अधिक पड़ती है। लंबे समय तक स्टोरेज में यह समस्या बढ़ सकती है। प्लास्टिक से माइक्रोप्लास्टिक्स और केमिकल्स शराब में घुल सकते हैं, जो कैंसर, डिमेंशिया जैसी बीमारियों के कारण होते हैं।
प्लास्टिक बोतलें शराब का सेवन करने वालों की ही समस्या नहीं है। सबको पता है कि प्लास्टिक कंटेनर आसानी से प्रदूषण फैलाते हैं और रीसाइक्लिंग मुश्किल होती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने 2019 में प्लास्टिक बोतलों में शराब बेचने का फैसला लिया था जिसे पर्यावरण के लिए संकट मानते हुए बाद में वापस ले लिया गया। महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा, और राजस्थान ने भी प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा रखा है, या कांच पर स्विच कर लिया है।
मगर कई राज्यों में प्लास्टिक बोतलों पर शराब मिलती है। जैसे केरल में 80 प्रतिशत शराब प्लास्टिक बोतलों में बिकती हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश भी ऐसे ही राज्य हैं। ऐसे ज्यादातर राज्यों में सस्ती या देसी वैरायटी या फिर 90 एमएल की बोतल प्लास्टिक की होती हैं। मगर, कुछ राज्यों ने पर्यावरण संबंधी खतरों को कम करने के लिए कुछ उपाय भी किए हैं। केरल और तमिलनाडु में डिपॉजिट स्कीम चलती है, जिसमें शराब के साथ 10 या 20 रुपये अतिरिक्त लिए जाते हैं। यह राशि बोतल वापस करने पर लौटा दी जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने प्लास्टिक बोतलों को डिस्पोज ऑफ करने की कोई पॉलिसी अभी घोषित नहीं की है। शायद, 1 अप्रैल से पहले तय हो।
लखमा के तो पड़ोस में है दूसरा प्रदेश
करीब पौने चार सौ दिन जेल में गुजारने के बाद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा की रिहाई हो रही है। लखमा पर 34 सौ करोड़ के शराब घोटाले में संलिप्तता के आरोप हैं। उनके खिलाफ ईडी, और ईओडब्ल्यू-एसीबी ने केस दर्ज किया था। लखमा को सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिली है। जमानत की एक शर्त में यह भी है कि उन्हें जमानत अवधि में राज्य के बाहर रहना होगा। खास बात ये है कि लखमा कई और आरोपियों की तुलना में सुविधाजनक स्थिति में रहेंगे।
कोयला घोटाले के आरोपी रानू साहू, समीर विश्नोई, और अन्य को भी जमानत अवधि में दूसरे राज्यों में रहना पड़ रहा है। मगर लखमा को बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। लखमा सुकमा जिले के कोंटा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका विधानसभा दो राज्य ओडिशा के मलकानगिरी, और आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से सटा हुआ है।
लखमा दोनों ही जगहों पर आते-जाते रहे हैं। दोनों राज्यों में पार्टी प्रत्याशियों का प्रचार करने जा चुके हैं। वहां उनका अच्छा नेटवर्क भी है। लखमा के करीबी लोग मलकानगिरी में रहने की व्यवस्था कर रहे हैं। उन्हें तीन दिन बाद प्रदेश छोडऩा पड़ेगा। वो एक-दो दिन में ही प्रदेश छोड़ देंगे। कुल मिलाकर प्रदेश छोडऩे के बाद भी वो घर के नजदीक ही रहेंगे। और अपने विधानसभा से जुड़े लोगों के संपर्क में भी रहेंगे।
बृजमोहन के बागी तेवर

संसद की कार्रवाई ठप होने के बाद परिसर में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी से चर्चा करते दो भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल व विनय सहस्त्रबुद्धे की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई।
चर्चा में मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी शामिल थे। चूंकि राहुल गांधी की पीएम नरेंद्र मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से कटुता जगजाहिर है। ऐसे में बृजमोहन, और विनय सहस्त्रबुद्धे के अनौपचारिक बातचीत को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।
बृजमोहन प्रदेश में भाजपा की राजनीति में सबसे सीनियर होने के बाद भी केंद्र में मंत्री नहीं बनाए गए। राज्य सरकार से भी उनकी अलग-अलग विषयों को लेकर तनातनी चल रही है। जंबूरी मामले को लेकर तो खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट गए हैं। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने तो एक कार्यक्रम में यहां तक कह दिया था कि बृजमोहन भाजपा के भीतर ‘अपने’ आदमी हैं। ऐसे में राहुल, और सोनिया के साथ तस्वीर को लेकर कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं कि बृजमोहन को नुकसान उठाना पड़ सकता है। चूंकि चुनाव में काफी वक्त बाकी है, ऐसे में बृजमोहन से जुड़े लोग इससे बेपरवाह है।
पुरानी आकांक्षाएं फिर रह गईं अधूरी
कभी रेलवे बजट को लेकर एक अलग ही रोमांच हुआ करता था। केंद्रीय बजट से ठीक पहले पेश होने वाला रेल बजट देशभर की निगाहें खींच लेता था। जितनी उत्सुकता वित्त मंत्री के भाषण को लेकर रहती थी, लगभग उतनी ही रेल मंत्री के एलानों को लेकर भी होती थी। रेल मंत्री का रुतबा कुछ अलग ही माना जाता था। वित्त मंत्री पूरे देश के लिए, तो रेल मंत्री अपने-अपने इलाकों के लिए खास समझे जाते थे।
इसी दौर में कई रेल मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों और अपनी राजनीतिक छवि को मजबूत करने के लिए बड़े फैसले किए। ममता बनर्जी ने दुरंतो एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें शुरू कीं। मध्यप्रदेश को माधवराव सिंधिया के कार्यकाल में नई रेल सेवाओं की सौगात मिली। बिहार के लालू प्रसाद यादव ने गरीब रथ चलाकर आम यात्रियों के हितैषी होने की छवि गढ़ी। इन मंत्रियों के दौर में यात्री किराया या तो बढ़ा ही नहीं, या फिर नाममात्र की वृद्धि हुई। कई रियायतें दी गईं- हालांकि इनमें से अधिकांश अब वापस ली जा चुकी हैं। छत्तीसगढ़, खासकर बिलासपुर में रेलवे जोन की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन चला। यह देश के सबसे अधिक कमाई करने वाले डिवीजनों में से एक है, इसलिए इसका हक बनता है। लेकिन उसी दौरान बेंगलुरु में सीके जाफर शरीफ के रहते हुए और हाजीपुर में रामविलास पासवान रेल मंत्री के होने के चलते नए जोन घोषित हो गए। इसके बाद बिलासपुर में आंदोलन और उग्र हुआ, तब जाकर कहीं जाकर यहां रेलवे जोन की मंजूरी मिली।
केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद रेलवे बजट को केंद्रीय बजट में मिला दिया गया। इसके पीछे सोच चाहे जो रही हो, लेकिन नतीजा यह हुआ कि रेल मंत्री की व्यक्तिगत छवि और घोषणाओं का दौर खत्म हो गया है। रेल मंत्री का कद अलग नहीं होता, वे बाकी मंत्रियों की कतार में होते हैं। अब किराया घटाने-बढ़ाने या नई ट्रेनें शुरू करने जैसे फैसले बजट भाषण का हिस्सा नहीं होते। इन्हें कभी भी, किसी भी समय घोषित कर दिया जाता है। इसके बावजूद रेलवे आम आदमी की जिंदगी से इतना गहराई से जुड़ा है कि बजट आते ही लोग यह देखने लगते हैं कि उनके राज्य को क्या मिला। नई लाइनें, नई ट्रेनें, किराए में राहत, इन सवालों के जवाब हर बार खोजे जाते हैं। हाल के वर्षों में रेलवे आवंटन को राज्यवार बताने की परंपरा शुरू हुई है, जिसके लिए बजट के बाद रेल मंत्री वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
इस बार छत्तीसगढ़ के लिए 7,470 करोड़ रुपये के आवंटन का दावा किया गया। बताया गया कि यह पिछले साल से 545 करोड़ रुपये अधिक है और यूपीए दौर की तुलना में कई गुना ज्यादा है। आंकड़ा वाकई बड़ा है, लेकिन खुशी इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि वर्षों से लंबित जन-आकांक्षाओं को इसमें जगह नहीं मिली। बस्तर को राजधानी से जोडऩे वाली रेल लाइन पर कोई घोषणा नहीं हुई। अंबिकापुर-रामानुजगंज-गढ़वा, सरडेगा-पत्थलगांव-अंबिकापुर, खरसिया-नया रायपुर-परमालकसा और कटघोरा-कवर्धा-डोंगरगढ़ जैसी नई लाइनों पर रेलवे ने सैद्धांतिक सहमति तो दे रखी है, लेकिन बजट में इनके लिए कोई प्रावधान नहीं है।
दर्जनभर से अधिक नई ट्रेनों की मांग लंबे समय से उठाई जा रही हैं। सांसदों ने रेल मंत्री से मुलाकात की, संसद में सवाल लगाए, लेकिन मजबूत प्रतिनिधित्व होने के बावजूद कुछ भी खास नहीं मिला। छत्तीसगढ़ के लिए घोषित अधिकांश राशि पुरानी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और ऐसी कनेक्टिविटी पर खर्च होने वाली है, जिससे रेलवे को माल ढुलाई में फायदा हो। स्टेशनों के सौंदर्यीकरण के लिए भी रकम रखी गई है, लेकिन यह सब रेलवे की कारोबारी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया लगता है।
बिना ट्रेन नए स्टेशन बुढ़ा रहे!
प्रदेश में रेल सुविधाओं का विस्तार हुआ है। रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण भी किया गया है। इस साल भी रेलवे के बजट में करीब 75 सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है। तमाम दावों के बावजूद प्रदेश की दर्जनभर रेलवे स्टेशन ऐसी है, जहां यात्री ट्रेनें नहीं रुक रही है। यहां सिर्फ माल परिवहन हो रहा है।
कांकेर सांसद भोजराज नाग ने रेलवे की एक बैठक में अंतागढ़ में यात्री टे्रन नहीं रूकने पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा कि रेलवे स्टेशन तो बना दिए गए हैं, लेकिन टे्रनें नहीं रूक रही है। ऐसे में रेल सुविधाओं के विस्तार का कोई मतलब नहीं है। राज्यसभा सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह भी रेलवे की कई बैठकों में रेल सुविधाओं के विस्तार को लेकर सवाल खड़े कर चुके हैं।
नई जानकारी यह है कि रायगढ़ इलाके में आधा दर्जन से अधिक रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ है। मगर यहां यात्री ट्रेनें नहीं रूकती है। इन स्टेशनों में खरसिया से धरमजयगढ़ के बीच आधा दर्जन स्टेशनों का निर्माण हुआ है। इनमें गुरदा, छाल, घरघोड़ा, कारी छापा, कुडूमकेला, और धरमजयगढ़ हैं। खास बात यह है कि आज तक इन स्टेशनों में यात्री ट्रेनें नहीं रुकी है। अब ये नए स्टेशन खंडहर होते जा रहे हैं। सीएम विष्णुदेव साय, और स्थानीय सांसदों ने रेल मंत्री से स्टॉपेज के लिए मांग की है। देखना है आगे क्या होता है।
अफसर नहीं चाहते अधिक बैठकों का सत्र
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र को लेकर प्रशासनिक कामकाज शुरू हो गया है। विधानसभा से लेकर मंत्रालय, समेत सभी दफ्तरों में हलचल बढ़ गई है। विधायक भी प्रश्न जमा करने लगे हैं। इस दौरान सभी एक ही मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि इतना छोटा सत्र कैसे निपटेगा सरकारी कामकाज। विधानसभा सचिवालय के मुताबिक रजत जयंती वर्ष में यह 25 वर्षों में सदन की बैठकों के लिहाज से सबसे छोटा सत्र होगा। बीते ढाई दशक में भी छोटे सत्र होते रहे हैं लेकिन समय से पहले अवसान होने की वजह से। इस बार 15 दिन के सत्र की अधिसूचना ही पहली बार जारी की गई।
एक ओर कॉमनवेल्थ संसदीय समूह भारत के प्रमुख लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला छोटी विधानसभाओं की अधिक बैठकों पर जोर दे रहे हैं? तदनुसार विधानसभा स्पीकर रमन सिंह भी कम से कम रजत जयंती वर्ष में अधिक बैठकों वाले सत्र के इच्छुक थे। उन्होंने 20 बैठकों वाले सत्र के लिए सरकार से रायशुमारी भी की। लेकिन अधिसूचना जारी हुई छोटे सत्र की। ऐसा सत्र तो कांग्रेस काल में भी नहीं बुलाया गया। पूर्व स्पीकर और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत भी अधिक दिनों के सत्र के पैरोकार रहे हैं।अब मंत्रालय से विधानसभा तक विचारों का एक ही द्वंद्व कि आखिर अफसर क्यों नहीं चाहते अधिक बैठकों वाला सत्र?
सत्र के निर्णय से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि सत्र के आयोजन में खर्च हमारा, और अधिक दिन बैठक कर अपनी पोल खुलवाने का अवसर विपक्ष को कैसे दें दें? रही बात 15 दिनों में कार्यवाही की तो पहला सप्ताह अभिभाषण, बजट प्रस्तुति में निकल जाएगा। फिर 5-7 दिन का होली अवकाश। उसके बाद विभागों के बजट पर चर्चा। देर रात तक बैठकर काम निपटाना होगा। तभी 20 मार्च तक विधि विधाई कार्य पूरे होंगे या फिर विधेयक अगले सत्र तक मुल्तवी करने होंगे।
स्वाद ही नहीं, सेहत के लिए भी खास
इन दिनों छत्तीसगढ़ के शहरों और कस्बों में फुटपाथों पर सजे बेर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। सर्दी के मौसम में मिलने वाला यह छोटा-सा फल स्वाद और सेहत दोनों के लिए खास है। कच्चे बेर हल्के खट्टे होंगे, जबकि पके बेर मीठे और रसदार हो जाते हैं। इनमें विटामिन-सी, आयरन और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है।
छत्तीसगढ़ में बेर का उत्पादन बस्तर संभाग, कांकेर, नारायणपुर, धमतरी, महासमुंद और सरगुजा अंचल के ग्रामीण इलाकों में अधिक होता है। यह कम पानी और अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में भी उग जाता है, इसलिए आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह आजीविका का एक बड़ा साधन भी है। लोक चिकित्सा में बेर को खांसी, सर्दी और कमजोरी में उपयोगी माना जाता है। सस्ते दाम और पौष्टिक गुणों के कारण बेर तक हर वर्ग की पहुंच है। यह तस्वीर बिलासपुर पं. देवकीनंदन चौराहे से प्राण चड्ढा ने ली है।
कुत्ते, इंसान, और रंग
आम बोलचाल में कुत्तों को कलर ब्लाइंड मान लिया जाता है कि वे रंग नहीं देखते और सिर्फ काले-सफेद में देखते हैं। लेकिन विज्ञान का कहना है कि वे कुछ रंग देख सकते हैं। जो भी हो, राजधानी रायपुर में चौबे कॉलोनी और समता कॉलोनी के दर्जनों परिवार यह मानते हैं कि कुत्ते रंग देख सकते हैं। इससे भी आगे बढक़र वे यह मानते हैं कि बोतल में कोई रंगीन पानी भरकर चारदीवारी से बाहर टांग देने पर उसके आसपास कुत्ते आकर गंदा नहीं करते। एक महिला ने पूछने पर बताया कि यह नील का पानी है, लेकिन कुछ और घरों में लाल और पीला पानी भी टंगा हुआ था। अब पता नहीं कुत्ते ट्रैफिक सिग्नलों की तरह लाल रंग देखकर वहां फारिग होने से स्टॉप हो जाते हैं, या कोई और वजह है, लेकिन कम से कम जिस एक महिला से बात की गई उनका तो कहना है कि यह रंगीन बोतल टांगने के बाद से वहां किसी कुत्ते ने गंदा नहीं किया है।
विज्ञान के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को इस पर कुछ काम करना चाहिए कि क्या रंगीन बोतल टंगी होने से कुत्तों पर सचमुच ऐसा कोई असर पड़ता है? अभी तक हम लाल, पीला, रंगहीन या सुनहरा लिक्विड बोतल में भरा होने से इंसानों पर तो उसका खासा असर देखते आए हैं, कुत्तों पर असर एक शोध का विषय है।
शिवराज के वायदे का क्या होगा?

केन्द्रीय कृषि, और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान जब भी छत्तीसगढ़ आते हैं, तो वो यहां के नेताओं से गर्मजोशी से मिलते हैं। चौहान अविभाजित मध्यप्रदेश में भाजयुमो के अध्यक्ष थे। तब से उनका छत्तीसगढ़ आना-जाना है। चौहान की रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल से घनिष्ठता है, और यहां के छोटे-बड़े नेताओं से व्यक्तिगत रूप से परिचित हैं। मगर बतौर मंत्री चौहान के विभागों से छत्तीसगढ़ को उतनी मदद नहीं मिल पा रही है, जितनी उनसे अपेक्षा रही है।
चौहान से कृषि, और ग्रामीण विकास के मद में राशि बढ़ाने का आग्रह किया जा चुका है। मनरेगा की राशि बढ़ाने की मांग की गई थी। अंबिकापुर में चौहान ने घोषणा भी की थी, लेकिन यह अब तक बढ़ नहीं पाई है। पिछले दिनों उन्होंने रायपुर में कृषि और पंचायत-ग्रामीण विभाग की समीक्षा बैठक की। यह बैठक घंटों चली। वो दुर्ग जिले के दो गांव में भी गए, और वहां ग्रामीणों से रूबरू हुए। उन्होंने ग्रामीणों से नकली खाद, और बीज की शिकायत पर कड़ा कानून बनाने की भी बात कही। कुल मिलाकर चौहान के व्यवहार से ग्रामीण खुश भी नजर आए।
कृषि, और ग्रामीण विकास से जुड़ी कई प्रस्ताव उनके सामने रखे गए। चौहान ने राज्य के एक तरह से हर प्रस्ताव पर सहमति जताई, और यह कहा कि छत्तीसगढ़ के लिए उनका विशेष प्रेम है। अब देखना है कि उनका दिया हुआ आश्वासन पूरा होता है या नहीं।
बजट प्रतिक्रिया धीमी-धीमी
केन्द्रीय बजट को लेकर भाजपा ने काफी तैयारी कर रखी थी, लेकिन बजट पेश होने के बाद प्रमुख नेताओं को प्रतिक्रिया देने में काफी संकोच हुआ। इसकी वजह यह थी कि छत्तीसगढ़ के लिए बजट में अलग से कुछ नहीं था।
कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में बजट भाषण का सीधा प्रसारण के लिए विशाल एलईडी लगाया गया था। यहां सीएम विष्णुदेव साय, और क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल प्रमुख रूप से मौजूद थे। उनके साथ दो विधायक पुरंदर मिश्रा व सुनील सोनी भी थे। व्यापारी संगठन और अन्य वर्गों के लोगों को भी कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में आमंत्रित किया था। पूरा हॉल भरा था। जैसे-जैसे बजट भाषण आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे शेयर बाजार का सेंसेक्स गिरता नजर आया। वहां लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर शेयर बाजार क्यों गिर रहा है।
छत्तीसगढ़ के लिए बजट में कुछ नहीं था, तो प्रतिक्रिया देना भी आसान नहीं था। मीडिया का जमावड़ा लगा रहा, और फिर ऐसी प्रतिक्रिया आई, जो कि हर बजट के लिए प्रासंगिक हो सकती है। व्यापारी संगठन के लोग भी थोड़ी देर खामोश रहे, और इसी बीच सभी को भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। भोजन करने के बाद व्यापारी, और अन्य संगठनों ने केन्द्र सरकार की हल्की फुल्की तारीफ करते हुए प्रतिक्रिया दी। सभी मंत्रियों को अलग-अलग जिलों में भेजा गया था। मगर वो भी प्रतिक्रिया देने में काफी असहज दिखे।
तेंदूपत्ता सुलग रहा है
तेन्दूपत्ता के टेंडर में बड़ी गड़बड़ी होते-होते रह गई। अफसरों ने तो गड़बड़ी कर दी थी, लेकिन कुछ सुबूत छोड़ दिए थे, और फिर मामला इतना बढ़ गया कि सीएम तक शिकायत पहुंच गई। विभाग की प्रमुख महिला अफसर ने टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अफसरों को धमकाया, तो आनन-फानन में गड़बड़ी को दुरूस्त कर लिया गया।
हुआ यूं कि पिछले दिनों तेन्दूपत्ता का ऑनलाईन टेंडर हुआ। इस बार अच्छी बोली आई थी, और फिर 586 लॉट स्वीकृत भी कर दिए गए। बाद में संशोधित कर 429 लॉट स्वीकृति दिखाई गई। इस पूरी प्रक्रिया में वेबसाइट से पहले के स्वीकृति आदेश को हटा दिया गया। इसके खिलाफ तेन्दूपत्ता ठेकेदारों ने मोर्चा खोल दिया। पहले तो लघु वनोपज संघ के अफसरों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में संघ के पदाधिकारियों तक बात पहुंचाई गई, और वह दस्तावेज भी दिखाए गए।
संघ के पदाधिकारियों ने सीएम तक तेन्दूपत्ता के टेंडर में गड़बड़ी की शिकायत की। विभाग की प्रमुख महिला अफसर तक जानकारी पहुंची, तो वो काफी खफा हुईं, और उन्होंने साफ तौर पर जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दे दी। फिर क्या था, आनन-फानन में सारी गड़बडिय़ां ठीक की गई, और पूर्व में जो लॉट स्वीकृत किए थे, उसे फिर जारी किया गया।
जितना बड़ा बजट, उतना बड़ा प्रचार भी

केन्द्रीय बजट के प्रचार-प्रसार के लिए इस बार भाजपा ने जो रणनीति अपनाई है, वो पहले कभी नहीं देखी गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन देश भर के संगठन मंत्रियों की बैठक ले चुके हैं। बजट को लोगों तक कैसे बेहतर ढंग से पहुंचाया जा सके, इसके लिए पखवाड़े भर से बैठकें होती रही। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेता जुड़े थे।
बजट भाषण से पहले सभी जिलों से प्रमुख नेताओं को प्रशिक्षण दिया गया, और फिर सबने एक साथ बजट भाषण सुना। बजट पर प्रतिक्रिया देने के लिए पार्टी ने पूर्व वित्तमंत्री अमर अग्रवाल की अगुवाई में एक कमेटी बनाई है। इसमें वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी, खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह, उपाध्यक्ष नंदन जैन, और अमित चिमनानी हैं। इन सभी को बजट पर प्रतिक्रिया देने के लिए अधिकृत किया गया था। खास बात ये है कि कमेटी का गठन भी पार्टी हाईकमान ने किया था। गांव-कस्बों-नगरों तक बजट के प्रावधान पहुंचे, और लोगों के बीच सकारात्मक माहौल बने, इसके लिए काफी कोशिशें हुई है। सभी ने मजबूती से बजट के प्रावधानों, और आम जनता को होने वाले फायदों से अवगत कराया। छत्तीसगढ़ में तो अभी कोई चुनाव नहीं है, लेकिन पांच राज्यों के चुनाव अगले तीन महीने में होने वाले हैं। केन्द्रीय बजट से राज्यों के चुनावों में कितना फायदा मिलता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
लाठी-डंडों से रोकना पड़ रहा अवैध खनन

छत्तीसगढ़ का मैनपाट इलाका अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है, लेकिन यहां बॉक्साइट की भरपूर मात्रा भी मौजूद है। इसी इलाके के बरिमा गांव में भी बॉक्साइट के भंडार हैं। राज्य खनिज विकास निगम ने आसपास की जमीन को सात साल के लिए लीज पर लिया था, लेकिन अब लीज की मियाद खत्म हो चुकी है। निगम ने एक निजी कंपनी को खनन का ठेका सौंपा था।
हाल ही में कंपनी के कर्मचारी गांव पहुंचे और बॉक्साइट निकालने के लिए नई जगह पर मिट्टी हटाने का काम शुरू कर दिया। करीब दो महीने तक वे मिट्टी हटाते रहे, लेकिन जब बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनें लाकर बॉक्साइट निकालने की तैयारी हुई, तो ग्रामीणों ने विरोध जताया। प्रभावित लोग ज्यादातर आदिवासी मांझी समुदाय के हैं। वे लाठी-डंडे लेकर खदान में घुस गए और कंपनी के कर्मचारियों को भगा दिया। ग्रामीणों का गुस्सा देखकर कर्मचारी और मजदूर भाग खड़े हुए। शुक्र है कि उस दिन कोई अप्रिय घटना नहीं घटी और किसी को चोट नहीं आई।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़, अंबिकापुर और बस्तर जैसे इलाकों में हाल के दिनों स्थानीय लोगों या जमीन मालिकों की सहमति लिए बिना खनन का प्रयास हो रहा है, जिससे तनाव बढ़ा है। यहां ग्रामीणों ने विरोध इसलिए किया क्योंकि यह उनकी निजी जमीन थी, जिसे उन्होंने अभी तक लीज पर नहीं दिया है। कोई मुआवजा नहीं दिया गया और न ही कोई रकम मिली। नियम के मुताबिक, स्थानीय राजस्व और खनिज विभाग के अधिकारियों को ग्रामीणों से बात करके उनकी मंजूरी लेनी चाहिए थी, उसके बाद ही खनन शुरू करना था।
राज्य खनिज विकास निगम तो सरकार की ही संस्था है। फिर प्रक्रियाओं का पालन करने से उसे क्या दिक्कत है? यह बात समझ से बाहर है। अगर खनन करने वालों से ग्रामीणों का टकराव और बढ़ता, तो हालात बिगडऩे पर आदिवासी लोग ही लाठी-डंडों से हमला करने के आरोप में जेल जाते।
अखिल भारतीय सेवाओं के कैडर
केंद्र सरकार ने आईएएस, आईपीएस आईएफएस और अन्य ऑल इंडिया सर्विसेज के लिए कैडर आवंटन नीति में बड़े बदलाव की घोषणा की है, जो यूपीएससी 2026 बैच से लागू होगी। डीओपीटी का दावा है कि यह नीति अधिक पारदर्शिता, के साथ वर्तमान ज़ोनल डिवीजनों को चार अल्फाबेटिकल ग्रुप से बदल देगी। आवंटन योग्यता, खाली पदों, स्पष्ट इच्छा और एक रोटेशनल साइकिल के आधार पर होगा। दोनों पॉलिसी के जानकार अध्ययनशील अफसर यहां बताते हैं कि इससे आईसीएमआर, आईसीएआर , इसरो और इन सेवाओं द्वारा देखे जाने वाले अन्य रिसर्च संस्थानों जैसे सरकारी संगठनों में पोस्टिंग पर असर पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ आईएएस एसोसिएशन के जानकार सदस्यों के मुताबिक 23 जनवरी को जारी इस नीति में कहा गया है कि संबंधित मंत्रालय किसी वर्ष की एक जनवरी को कैडर अंतराल के आधार पर रिक्तियों का निर्धारण करेंगे। इसने कैडर आवंटन की पूर्व की जोन प्रणाली की जगह बनाए गए नए समूह में सभी राज्य कैडर/संयुक्त कैडरों को वर्णानुक्रम में व्यवस्थित किया गया है और चार समूहों में विभाजित किया गया है।
ग्रुप-एक में एजीएमयूटी (अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश), आंध्र प्रदेश, असम-मेघालय, बिहार और छत्तीसगढ़ हैं। और ग्रुप-दो में गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल और मध्य प्रदेश शामिल हैं। समूह-तीन में महाराष्ट्र, मणिपुर, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम और तमिलनाडु शामिल हैं, जबकि समूह-चार में तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
कैडर नियंत्रण प्राधिकार अर्थात् कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) / गृह मंत्रालय (एमएचए) / पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ एंड सीसी), प्रत्येक कैडर के लिए अनारक्षित (यूआर) / अनुसूचित जाति (एससी) / अनुसूचित जनजाति (एसटी) / अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) / आंतरिक / बाहरी रिक्तियों सहित रिक्तियों का निर्धारण करेंगे।
कैडर-वार/श्रेणी-वार रिक्तियों का निर्धारण परीक्षा वर्ष के बाद वाले वर्ष की एक जनवरी को मौजूद कैडर अंतर के आधार पर किया जाएगा। राज्य सरकारें किसी विशेष सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई)/भारतीय वन सेवा परीक्षा के माध्यम से भरी जाने वाली रिक्तियों की कुल संख्या परीक्षा वर्ष के बाद वाले वर्ष की 31 जनवरी तक सूचित करेंगी।
बाड़े में कैद होने से बच गई कोटरी

कुदरत की ममता और इंसानी संवेदनशीलता का एक भावुक दृश्य कटघोरा वन मंडल के केंदई रेंज में देखने को मिला। जंगल में चरते हुए कोटरी (हिरण प्रजाति) का एक नन्हा बच्चा बकरियों के झुंड में इस तरह घुल-मिल गया कि किसी को उसकी मौजूदगी का अंदाज़ा तक नहीं हुआ।
ग्राम भूलसीभवना के ग्रामीण जब शाम के समय जंगल से बकरियों को चराकर गांव लौट रहे थे, तब अनजाने में यह मासूम हिरण का बच्चा भी झुंड के साथ गांव पहुंच गया। क्षेत्र में हिरण और कोटरी की आवाजाही आम है, लेकिन इस घटना ने सभी को चौंका दिया।
जब बकरियों को बाड़े में रखा जा रहा था, तभी बकरियों की सामान्य मिमियाहट से अलग एक कोमल और अनजानी आवाज सुनाई दी। आवाज पर ध्यान गया तो ग्रामीण हैरान रह गए। बकरियों के बीच हिरण का नन्हा बच्चा खड़ा था। बिना देर किए ग्रामीणों ने सजगता दिखाते हुए तुरंत वन विभाग को सूचना दी।
सूचना मिलते ही रेंजर अभिषेक दुबे के नेतृत्व में वन अमला मौके पर पहुंचा और हिरण के बच्चे को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ दिया। कुछ ही देर में मां कोटरी अपने बच्चे को पहचानते हुए उसे साथ लेकर जंगल के भीतर चली गई। यह दृश्य देखकर ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।
जिसके सौजन्य से..., वही बाहर!

बिलासपुर के पुलिस ग्राउंड में एक कवि सम्मेलन हो रहा है, जो कि जाहिर तौर पर हिन्दू कवि सम्मेलन है। मजे की बात है कि अखिल भारतीय हिन्दू शौर्य कवि सम्मेलन का नारा है- जात-पात की करो बिदाई, हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई।
अब देश में बाकी धर्म वालों के साथ भी अगर ऐसा ही भाई-भाई भाईचारा हो जाता तो?
खैर, इसके पोस्टरों पर लिखा हुआ है- यह आयोजन सिर्फ हिन्दुओं के लिए है। इसी सूचना के ठीक बगल में यह भी लिखा हुआ है कि प्रचार सौजन्य बिलासपुर के भाटिया परिवार का है।
मतलब यह कि जिसके सौजन्य से प्रचार हो रहा है वह भी कवि सम्मेलन में नहीं आ सकता!
कांग्रेस की बड़ी बैठक, जैसे थे
दो दिन पहले दिल्ली के एआईसीसी दफ्तर में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक की। बैठक को लेकर काफी उत्सुकता थी, और इसमें कोई अहम बातें निकलकर आने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यानी ‘ढाक के तीन पात’ होकर रह गई।
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट, और अन्य छह नेताओं को बैठक में बुलाया गया था। इनमें प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, ताम्रध्वज साहू, और राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम थे। दिलचस्प बात ये है कि बैठक जल्दबाजी में तय हुई थी। फिर भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बैज सारी तैयारी कर पहुंचे थे। बैठक में खरगे और राहुल गांधी ने प्रदेश के नेताओं को समन्वय बनाकर काम करने और एक साथ दौरा करने की साधारण-सी नसीहत दी। कोई ऐसी बात नहीं हुई, जिसको लेकर पार्टी में कोई संदेश पहुंचता। यह बैठक महज औपचारिकता बनकर रह गई है।
बैठक में शामिल कुछ बड़े नेताओं से करीबियों का मानना है कि ये बैठक हाईकमान ने अपनी सक्रियता दिखाने के लिए ली थी। दरअसल, राहुल गांधी पर आरोप लगते हैं कि वो पार्टी नेताओं से मिलने में परहेज करते हैं। इसको देखते हुए अलग-अलग राज्यों की बैठक बुलाई गई थी। मध्यप्रदेश की बैठक में जरूर राहुल गांधी ने थोड़े तेवर दिखाए थे, और पार्टी की नीति-रीति के खिलाफ बयानबाजी पर तुरंत कार्रवाई के लिए कहा है। मगर छत्तीसगढ़ की बैठक में ज्यादा कुछ निकलकर नहीं आया।
वाट्सएप संदेशों से सतर्क रहें...

फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पेज पर हाई प्रोफाइल हस्तियों, बड़े प्रशासनिक अफसरों का फर्जी एकाउंट बनाकर रुपये मांगने का चलन पुराना पड़ गया है। अब वाट्सअप पर ऐसी डिमांड ठग करने लगे हैं। ऐसे ही एक वाकया नारायणपुर पुलिस के सामने आया है। इसमें नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन के नाम का इस्तेमाल कर ठगी करने की कोशिश की गई। समय रहते सामने वाले ने इसकी जानकारी पुलिस को दे दी। वाट्सएप कन्वर्शन के दौरान आरोपी ने बकायदा अपना नाम, स्थान और बैंक एकाउंट का डिटेल दिया है।पुलिस को आशंका है कि इसमें बैंक एकाउंट के अलावा सारी जानकारी फर्जी हो सकती है।
पुलिस ने अपराध दर्ज किया है, मामले की जांच की जा रही है। मगर, यह मामला बताता है कि साइबर ठगों के पास लोगों की व्यक्तिगत सूचनाएं आसानी से पहुंच सकती है। बातचीत से पता चलता है कि जिस व्यक्ति को ठग ने रुपये वसूलने के लिए मेसैज किया है, वह कलेक्टर से परिचित है और ठग को यह बात मालूम है।


