राजपथ - जनपथ
कैसे लगी आग...
बीजापुर के एक गोदाम में आग लगने से 18 हजार मानक बोरा तेंदूपत्ता खाक हो गया। इसकी कीमत करीब 12 करोड़ रुपये आंकी गई है। खास बात यह है कि बीजापुर में तेंदूपत्ता संग्रहण का काम लघु वनोपज संघ के माध्यम से हो रहा था और आगजनी से सीधे-सीधे संघ को नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि वन विभाग ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। सिर्फ डीएफओ रमेश कुमार जांगड़े को हटाकर मुख्यालय में अटैच किया गया है। मगर आगजनी को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
बताते हैं कि तेंदूपत्ता संग्रहण के बाद आगजनी की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, मगर पूरा नुकसान नहीं होता था। आग लगने की सूचना मिलते ही तेंदूपत्ता ठेकेदार सक्रिय हो जाते थे और मजदूरों को काम में लगाकर आग बुझाने की कोशिश करते थे। इससे काफी नुकसान बच जाता था। इस बार आगजनी में गोदाम में रखा पूरा तेंदूपत्ता खाक हो गया। चूंकि वन अमला खुद संग्रहण करा रहा था, तो पूरा 18 हजार मानक बोरा तेंदूपत्ता कैसे खाक हो गया? यह भी बताया जा रहा है कि बड़ी मात्रा में हरा तेंदूपत्ता भी था, जो आसानी से जलता नहीं है। संग्रहण कार्य से जुड़े वन अधिकारी-कर्मचारी यह कह रहे हैं कि मजदूर उपलब्ध नहीं थे, इसलिए गोदाम से तेंदूपत्ता नहीं निकाल पाए। आग कैसे लगी, इसका भी कोई स्पष्ट कारण पता नहीं चल पाया है।
हल्ला है कि तेंदूपत्ता की फर्जी खरीद भी हुई थी। ऐसे में मामले को दबाने के लिए आग लगाई गई है। फिलहाल तो आगजनी को लेकर जितने मुंह, उतनी बातें हो रही हैं। वन मंत्री केदार कश्यप और लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष रूप सिंह सलाम जिम्मेदारों को नहीं बख्शने की बात कह रहे हैं। एमडी अनिल साहू भी चार दिन तक बीजापुर में डेरा डाले हुए थे। मगर एक बात साफ है कि यह मामला आसानी से किसी के गले नहीं उतर रहा है। पुलिस भी मामले की जांच कर रही है। देखना है कि आगे क्या कुछ निकलकर बाहर आता है।
अब बाउंसर रिकवरी एजेंट नहीं
कोई भी बैंक अब निजी सुरक्षा एजेंसी और सिक्स पैक, डोले-शोले वाले बाउंसर्स को लोन रिकवरी एजेंट नहीं बना सकेंगे। इतना ही नहीं टाइम बे-टाइम कॉल भी नहीं कर सकेंगे। इसके लिए रिकवरी एजेंट का पढ़ा लिखा बैंकों से ट्रेनिंग वह भी इंस्टीट्यूट आफ बैंकिंग एंड फाइनेंस से पास आउट होना जरूरी है। यह प्रोटोकॉल आरबीआई ने तय कर दिया है।
आरबीआई ने ग्राहकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए लोन रिकवरी के नियमों में बदलाव किया है। बैंक अब उन्हीं लोगों को लोन रिकवरी एजेंट बना सकेंगे जिन्होंने इंस्टीट्यूट आफ बैंकिंग एंड फाइनेंस (आईआईबीएफ) से प्रशिक्षण प्राप्त किया हो। लोन रिकवरी एजेंट के लिए आईआईबीएफ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। इसके अलावा बैंकों को लोन लेने वाले ग्राहकों को अपनी रिकवरी एजेंसी और एजेंट की पूरी जानकारी भी देगा।
रिकवरी एजेंसी में बैंक अगर कोई बदलाव करता है तो बदलाव के बारे में भी उधार लेने वालों को सूचित करना होगा। नए नियम अक्टूबर से लागू होंगे। बैंक की तरफ से नियुक्त रिकवरी एजेंसी को इस बात की गारंटी देनी होगी कि उनके एजेंट लोन रिकवरी के लिए निर्धारित सभी नियमों का पालन करेंगे। बैंक के कर्मचारी या रिकवरी एजेंट किसी भी ग्राहक को रिकवरी संबंधित फोन कॉल सुबह आठ बजे से शाम सात बजे के बीच ही कर सकेंगे।
लोन रिकवरी एजेंट को ग्राहक के घर भेजने से पहले बैंक कम से कम एक दिन पहले ई-मेल या फोन मैसेज के जरिये एजेंट की पूरी जानकारी देगा। अगर ग्राहक का ई-मेल या फोन नंबर नहीं है तो तीन दिन पहले ग्राहक के पते पर नोटिस भेजा जाना चाहिए। नए नियमों के मुताबिक, अगर लोन लेने वाले ने उधार से संबंधित कोई शिकायत बैंक में दर्ज करा रखी है तो उस शिकायत के निपटान तक लोन लेने वाले के पास बैंक किसी कर्मचारी या रिकवरी एजेंट को नहीं भेज सकता है।
कर्ज लेने वाले के पास बैंक कर्मचारी या रिकवरी एजेंट की तरफ से किए जाने वाले सभी कॉल की तारीख और समय दर्ज किए जाएंगे। अगर कॉल के दौरान बातचीत रिकॉर्ड की जा रही है तो इसकी जानकारी भी ग्राहकों को दी जाएगी। इस रिकॉर्डिंग को छह माह तक रखा जा सकेगा। बैंक को कॉल रिकॉर्ड करने का कारण भी बताना होगा। लोन की रिकवरी के लिए बैंक ग्राहक के मोबाइल या टैबलेट में किसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करेगा। अगर मोबाइल फोन बैंक से उधार लेकर नहीं खरीदा गया है तो बैंक फोन को लोन रिकवरी के नाम पर सीज नहीं कर सकेंगे।
छत्तीसगढ़ में सेहत का हाल
हाल ही में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की ताजा रिपोर्ट-एनएफएचएस-6 जारी की गई है। इसमें छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य, पोषण, परिवार कल्याण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कई बिंदु शामिल हैं। राज्य स्तर के विस्तृत आंकड़े फैक्टशीट में उपलब्ध हैं, लेकिन कुल मिलाकर राज्य में कई सकारात्मक बदलाव दिखे हैं।
पहले कुछ अच्छी बातों की जानकारी दें। राज्य में संस्थागत प्रसव की दर काफी अच्छी है एनएफएचएस-5 में पहले से ही 85 प्रतिशत से अधिक थी। अब यह 90.6 प्रतिशत हो चुका है जो राष्ट्रीय औसत 88.6 से ज्यादा है। इसके चलते मातृ एवं शिशु मृत्यु दर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं को एंटीनेटल केयर मिलने में सुधार हुआ है। 12 से 23 महीने तक के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण कवरेज 87.1 प्रतिशत तक बढ़ा है। स्टंटिंग यानि ऊंचाई के हिसाब से कम वजन की दर 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत रह गया है। टोटल फर्टिलिटी रेट अर्थात टीएफआर नियंत्रण में है। गर्भनिरोधकों के उपयोग में भी वृद्धि हुई है। महिलाओं में स्वास्थ्य बीमा कवरेज के लिए भी जागरूकता बढ़ी है।
मगर, कुछ क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जैसे अपने राज्य में 15 से 49 वर्ष के बच्चों और महिलाओं में एनीमिया की दर पहले से ही ऊंची थी। एनएफएचएस-5 में बच्चों में 67 प्रतिशत थी। एनएफएचएस-6 में भी यह एक बड़ी समस्या बनी हुई है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।
इधर, हालांकि बच्चों में स्टंटिंग घटी है, लेकिन वेस्टिंग, अंडरवेट और डाइट की में अभी भी कमी है। एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग में भी गिरावट देखी गई है। इसके अलावा वयस्कों, विशेषकर महिलाओं में ओवरवेट यानि मोटापे की समस्या बढ़ रही है। हाई ब्लड शुगर और हाइपरटेंशन के मामले भी बढ़ रहे हैं।
सर्वे में कहा गया है कि अनावश्यक सिजेरियन डिलीवरी बढ़ रही है। यह पूरे देश का हाल है और छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं है। यह 27.2 प्रतिशत तक है, जो कि प्राइवेट अस्पतालों में अधिक है। छत्तीसगढ़ में इस पर नजर रखने की जरूरत है।
स्टंटिंग, एनीमिया आदि की जो समस्या पाई है वह बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में अधिक है, क्योंकि वहां स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में कमी है। आयुष्मान भारत और नेशनल हेल्थ मिशन योजनाओं का अधिक लाभ दूरस्थ स्थानों में पहुंचाने की जरूरत है।
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी?
भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। कहा जा रहा है कि पार्टी हाईकमान राज्यों से नामों पर मंथन कर रहा है और छत्तीसगढ़ से भी आधा दर्जन नेताओं को जगह मिल सकती है। सीएम विष्णुदेव साय की हालिया दिल्ली यात्रा के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से हुई मुलाकात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। बताया जाता है कि दोनों नेताओं के बीच प्रदेश से संभावित नामों पर चर्चा हुई। इसके बाद राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री शिवप्रकाश की साय से हुई लंबी मुलाकात ने अटकलों को और बल दिया है।
चर्चा है कि इस बार संगठन में नए चेहरों को प्राथमिकता मिल सकती है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लता उसेंडी को यथावत रखा जा सकता है, जबकि प्रदेश अध्यक्ष किरण देव, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और वित्त मंत्री ओपी चौधरी के नाम भी चर्चा में हैं। इन चारों नेताओं का पहली बार विधायक बनना और कोर कमेटी में शामिल होना उनके पक्ष में माना जा रहा है। बस्तर सांसद महेश कश्यप को राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाए जाने की भी चर्चा है।
प्रदेश भाजपा की निगाहें नए प्रभारी की नियुक्ति पर भी टिकी हैं। सीएम विष्णु देव साय, प्रदेश अध्यक्ष किरण देव और दोनों डिप्टी सीएम 10 तारीख को दिल्ली में रहेंगे। इस दौरान संगठन में नियुक्ति, और अन्य विषयों पर पार्टी हाईकमान से चर्चा हो सकती है।माना जा रहा है कि संगठन से जुड़े अहम फैसले 14-15 जून के आसपास सामने आ सकते हैं।
युवक कांग्रेस चुनाव को लेकर जोड़ तोड़
युवक कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव ने कांग्रेस के भीतर नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव और वर्तमान युवक कांग्रेस अध्यक्ष आकाश शर्मा ने एक ऐसा दांव चला है, जिसने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोनों नेताओं ने बलौदाबाजार-भाटापारा युवक कांग्रेस अध्यक्ष और जिला पंचायत सदस्य शैलेन्द्र बंजारे के नाम को आगे बढ़ाया है और उनके समर्थन में सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं।
शैलेन्द्र बंजारे का नाम बलौदाबाजार आगजनी कांड में भी सामने आया था और वे जेल भी जा चुके हैं। बावजूद इसके उन्हें कांग्रेस के कुछ राष्ट्रीय नेताओं का समर्थन मिलने की चर्चा है। बंजारे अनुसूचित जाति वर्ग से हैं। यह कहा जा रहा है कि बंजारे युवक कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं, तो अजा वर्ग में कांग्रेस की पकड़ मजबूत होगी और इसका सीधा फायदा विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।
दूसरी ओर, पूर्व सीएम भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अध्यक्ष पद के कई दावेदार इन वरिष्ठ नेताओं से लगातार संपर्क साध रहे हैं। ऐसे में यदि देवेन्द्र यादव और आकाश शर्मा की रणनीति सफल होती है, तो शैलेन्द्र बंजारे की दावेदारी को मजबूत समर्थन मिलना तय माना जा रहा है।
दिलचस्प हुआ मुकाबला
सूरजपुर जिले की शिवनंदनपुर नगर पंचायत का चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। दो दिन पहले कांग्रेस के दो प्रमुख नेता टीएस सिंहदेव और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने पार्टी के जिले के महामंत्री नरेंद्र जैन के खिलाफ आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज होने पर अनशन किया था, और उनकी मांगें कुछ हद तक पूरी भी हुईं। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के धरना-प्रदर्शन से कार्यकर्ताओं में जोश आया है, लेकिन भाजपा भी इसका जवाब देने में जुटी है।
यह बात सामने आई है कि जिस नरेन्द्र जैन के समर्थन में कांग्रेस नेताओं ने धरना-प्रदर्शन और अनशन किया था, उनके सगे भाई राजेश जैन शिवनंदनपुर के एक वार्ड से भाजपा पार्षद प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं। भाजपा इसे आधार बनाकर यह बताने की कोशिश कर रही है कि कार्रवाई राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित नहीं थी। साथ ही यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते यहां का माहौल गरमाया।
प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने पहले एक दिन की भूख हड़ताल की घोषणा की थी, लेकिन जैसे ही टीएस सिंहदेव ने आमरण अनशन का ऐलान किया, बैज ने भी अनशन पर बैठने की घोषणा कर दी। वैसे तो शिवनंदनपुर कांग्रेस का गढ़ रहा है। पहले यह ग्राम पंचायत था, और यहां के ज्यादातर सरपंच कांग्रेस समर्थित ही रहे हैं। मगर इस बार यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
धूप से नहीं उड़ा कमल का रंग

(फोटो-प्राण चड्ढा)
पहली नजर में इसे देखकर किसी को लग सकता है कि तेज धूप के कारण कमल का रंग उड़ गया है, लेकिन वास्तव में यह दुर्लभ श्वेत कमल है, जो सामान्यत: दिखाई देने वाले गुलाबी कमलों की तुलना में कम मिलता है। बिलासपुर से लगभग 13 किलोमीटर दूर स्थित कोपरा जलाशय की जैव विविधता का यह एक आकर्षण है।
दिसंबर 2025 में कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में रामसर साइट का दर्जा मिला। इसके साथ ही यह छत्तीसगढ़ की पहली और फिलहाल एकमात्र रामसर साइट बन गई। यहां प्रवासी पक्षियों, जलीय वनस्पतियों, मछलियों और विविध पारिस्थितिक तंत्र का समृद्ध संसार है। श्वेत कमल इसी प्राकृतिक धरोहर का जीवंत हिस्सा है, जो जलाशय की शांत सतह पर खिलकर तालाब की शोभा बढ़ाता है। एक स्थानीय बच्ची अपने हाथों में श्वेत कमल थामे मुस्कुराती दिखाई दे रही है। बच्ची के हाथों में सजा यह कमल मानो बता रहा है कि स्थानीय लोगों का इस जगह से कितना लगाव है।

कर्नाटक में अमल में आया 36गढ़ का फार्मूला
कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के इस्तीफे की चर्चाओं के बीच एक बार फिर ढाई-ढाई साल के सीएम फार्मूले पर चर्चा तेज हो गई है।
छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर ढाई-ढाई साल के फार्मूले की खूब चर्चा हुई थी, लेकिन यह फार्मूला अमल में नहीं आ पाया। कर्नाटक में भी कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद इसी तरह का फार्मूला लागू किया। इसके तहत सिद्धरमैया को तीन साल बाद कुर्सी छोडऩी पड़ी और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के सीएम बनने का रास्ता साफ हो गया।
कर्नाटक में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते डीके शिवकुमार सीएम पद के स्वाभाविक दावेदार थे। मगर पार्टी हाईकमान ने विधायकों की राय और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम पद के लिए राजी किया गया और उन्हें ढाई साल बाद सीएम बनाने का भरोसा दिया गया।
बहुत कम लोगों को मालूम है कि डीके शिवकुमार, छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल के फार्मूले का हश्र देखकर शुरुआत में तैयार नहीं थे। उन्होंने इस फार्मूले को लेकर विस्तार से जानकारी ली और दिल्ली में टीएस सिंहदेव को लंच पर आमंत्रित किया। सिंहदेव ने उन्हें उस समय की पूरी परिस्थितियों से अवगत कराया। बाद में शिवकुमार, पार्टी की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के बाद डिप्टी सीएम पद के लिए तैयार हुए।
खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ में सीएम पद के लिए ढाई-ढाई साल के फार्मूले से सोनिया गांधी अलग थीं। यह फार्मूला खुद भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव तत्कालीन कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया को लेकर राहुल गांधी के पास पहुंचे थे। वजह यह थी कि हाईकमान की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए ताम्रध्वज साहू का नाम तय किया गया था, जिसके लिए भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और डॉ. चरणदास महंत तैयार नहीं थे। राहुल गांधी ने भूपेश और सिंहदेव के फार्मूले को मंजूरी दी और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गए।
बाद में ढाई साल पूरे होने पर भूपेश समर्थक 53 विधायकों ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। इससे हाईकमान पर दबाव बढ़ा और अंतत: भूपेश बघेल पूरे पांच साल सीएम बने रहे।
दिलचस्प यह भी है कि सरकार बनने के समय सिंहदेव समर्थक विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा मानी जाती थी, लेकिन सीएम बनने के बाद अधिकांश विधायक भूपेश बघेल के साथ चले गए। हाईकमान को भूपेश बघेल की राजनीतिक ताकत के आगे झुकना पड़ा। कर्नाटक में भी इस बार कमोबेश ऐसी ही स्थिति रही, लेकिन वहां हाईकमान ने सख्ती दिखाई और डीके शिवकुमार के सीएम बनने का रास्ता साफ कर दिया।
बीन बजाएं बाहर आ जाएगा....

बुधवार को मंत्रालय के श्रम विभाग में सांप घुस आया था। यह विभाग पांच मंजिला भवन के ग्राउंड पर डी गेट के पास है। इसके ठीक बगल के नगरीय प्रशासन विभाग में भी पिछले माह एक सांप घुसा था। अलमारी के नीचे घुसे इस सांप 29 अप्रैल को मार दिया गया था। कल का सांप फाइलों के बीच मुड़ कर सोया, फंसा हुआ था। पता नहीं कब से, फाइलों के बीच था, कल एक फाइल को खोजते समय दिखाई दिया। यह ख़बर फैलते ही कर्मचारी के वाट्सएप ग्रुप तरह तरह की रोचक टिप्पणियों से भर गया।
पहली ही सूचना पर जवाब आया कि-बीन बजाएं बाहर आ जाएगा। तो जवाब आया श्रम विभाग में आया है और फाइल में छिपा है कहीं फाइल सक्ती के वेदांता ब्लास्ट मामले की तो नहीं।
एक ने कहा - मंत्रालय में सेटअप स्वीकृति की खबर सुनकर सांप भी काम करने आ गया लगता है। या फिर इसका भी आई कार्ड बन गया होगा भंडारे का।
करीब एक-पौन घंटे की मशक्कत के बाद जंगल सफारी के स्नेक कैचर बुलाकर सांप को पकड़ा गया। पूरे खेत खलिहान में बने महानदी इंद्रावती भवन में बीते वर्षों में भी कई बार सांप घुसते रहे हैं। एक बारगी इंद्रावती भवन के तीसरे फ्लोर में घुसा था।
इन वाकयों को याद करते हुए टिप्पणी हुई कि मंत्रालय में सर्प मित्र की पदस्थापना होनी चाहिए। जवाब मिला-खुद के यहां सांप घुसा तो ही सर्पमित्र भर्ती की याद आई। वैसे भी बहुत सांप मंत्रालय में हैं जिनका रंग काला है। इनमें दुध नाग भी होगें । किसी ने कहा ढोढिय़ा है। तब स्नेक कैचर के हवाले से बताया कि कल का सांप धामन था। चलो इसी बहाने सांप की प्रजाति की पहचान हो गई और यह भी कि कौन से सांप से बचना चाहिए।
इंद्रधनुषी झबरी शेकरू बारनवापारा में

छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभयारण्य के देवपुर जंगल में दुर्लभ जायंट मालाबार स्क्विरल देखने को मिला है। रंग-बिरंगे शरीर और लंबी झबरी पूंछ वाली यह विशाल गिलहरी अपने आप में प्रकृति का अद्भुत नमूना है।
इसका वैज्ञानिक नाम रतूफा इंडिका है। प्राणी विज्ञान के छात्र और वन विभाग के अफसर इसे इंडियन जायंट स्क्विरल, मालाबार जायंट स्क्विरल कहते हैं। महाराष्ट्र में शेकरू जैसा आसान नाम चलता है, क्योंकि इसे वहां राजकीय वन्यजीव का दर्जा मिला हुआ है।
माना जाता है, भारत में पाई जाने वाली गिलहरियों में यह सबसे बड़ी प्रजाति है। पूंछ सहित इसकी लंबाई लगभग तीन फीट तक पहुंच जाती है। मगर, इसका सबसे रिझा देने वाली बात इसका बहुरंगी शरीर है। बैंगनी-भूरा, गहरा लाल, क्रीम, पीला और काला रंग। ये सब मिलाकर इसे किसी चित्रकार की बनाई कलाकृति जैसी शक्ल देती है। सामान्य तौर पर हम भूरे रंग की गिलहरियों से ही परिचित हैं, जो आंगन, गार्डन में दिख जाती हैं। इसका रूप उनसे बहुत अलग है।
यह जीव पूरी तरह वृक्षों पर रहने वाला यानी आर्बोरियल या कहें, वृक्षवासी है। बंदर और लंगूर की तरह कभी-कभी ही जमीन पर उतरते हैं। ऊंचे पेड़ों की शाखाओं पर तेजी से दौड लेते हैं। एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक 15 से 20 फीट तक छलांग लगा लेते हैं। इसकी लंबी और घनी पूंछ हवा में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। खतरा महसूस होने पर यह पेड़ के तने से चिपककर खुद को छिपा लेती है।
शेकरू की और विशेषता बताएं तो यह मोटे तौर पर फल, बीज, फूल, पेड़ों की छाल और पत्तियां खाती हैं। कभी-कभी कीड़े-मकोड़े और पक्षियों के अंडे भी इसका भोजन बनते हैं। वन पारिस्थितिकी में इसकी भूमिका जरूरी होती है, क्योंकि यह बीजों को जंगल में फैलाकर नए पौधों के उगाने में मदद करती है। इस वजह से इसे जंगलों के प्राकृतिक पुनर्जीवन का सहयोगी जीव भी कहते हैं।
आम तौर पर शेकरू पश्चिमी घाट, सतपुड़ा क्षेत्र, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के घने जंगलों में पाई जाती है। छत्तीसगढ़ के बार नवापारा में इसका दिखना इसलिए खास माना जा सकता है क्योंकि यह केवल उन्हीं क्षेत्रों में जीवित रह पाती है जहां जंगल अपेक्षाकृत शांत हो और घना हो। बता दें, वन्यजीव वैज्ञानिक इसे इंडिकेटर स्पीशीज- यानी स्वस्थ वन वातावरण का संकेत देने वाली प्रजाति मानते हैं।
यह जानकर आपको अच्छा लग सकता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ-आईयूसीएन ने इसे लीस्ट कंसर्न श्रेणी में रखा है। यानि इनके जल्दी लुप्त होने का खतरा नहीं है। मगर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी लगातार घटते जंगल, वन कटाई से इनकी जीने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
बार नवापारा अभयारण्य को लेकर और बात करें तो यहां पहले से ही गौर, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, चार सींगी हिरण, सांभर, चीतल और 250 से अधिक पक्षी प्रजातियों का ठिकाना है। ऐसे में जायंट मालाबार स्क्विरल की मौजूदगी यह बताती है कि छत्तीसगढ़ के जंगल अभी भी देश की महत्वपूर्ण जैव-विविधता धरोहरों में शामिल हैं।
टेबल के नीचे फसल लहलहा रही...
सरकार के कुछ मंत्रियों के पीए को लेकर काफी कुछ बातें हो रही हैं। कई को तो बदला भी जा चुका है। ऐसे ही भाजपा के अंदरूनी मामलों के एक जानकार ने फेसबुक पर एक मंत्री के पीए का फोटो पोस्ट किया है। पोस्ट में मंत्रीजी के पीए पर तंज कसते हुए लिखा है कि उनकी मेहनत की फसल टेबल के नीचे लहलहाती है। जैसे ही फसल पककर तैयार होती है, साहब दो-तीन महीने में अपना हिस्सा समेटते हैं, और सीधे गोवा उड़ जाते हैं। वहां भी बीच समंदर में खड़ी केसिनो जहाज में वे नोटों के ऐसे बीच बोते हैं कि पूछो ही मत। इस पोस्ट की पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।
संघर्ष साथ ला देता है
नगर पंचायत उपचुनाव के बहाने कांग्रेस में एकजुटता देखने को मिल रही है। ऐसी एकता विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय चुनावों के दौरान नजर नहीं आई थी, जिसका खामियाजा पार्टी को हार के रूप में भुगतना पड़ा। अब जबकि विधानसभा चुनाव में करीब ढाई साल का समय बचा है, पार्टी के दिग्गज नेता आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आते दिखाई दे रहे हैं।
एकजुटता का यह नजारा उस वक्त देखने को मिला, जब सूरजपुर जिले की शिवनंदनपुर नगर पंचायत चुनाव के दौरान कांग्रेस के एक महामंत्री के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। यहां कांग्रेस चुनाव के प्रभारी डॉ. प्रेमसाय सिंह और अमरजीत भगत हैं। कांग्रेस ने भाजपा नेताओं के दबाव में पुलिस पर झूठा प्रकरण दर्ज करने का आरोप लगाया। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव भी मौके पर पहुंच गए।
दोनों नेता धरने पर बैठ गए। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी उनके साथ रहे। इससे पहले टी.एस. सिंहदेव और भूपेश बघेल एक ही कार में दिखाई दिए, जिसकी स्टेयरिंग टी.एस. सिंहदेव संभाल रहे थे। यही नहीं, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की रामभद्राचार्य को लेकर की गई टिप्पणी पर भी भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव उनके समर्थन में सामने आए।
पहली नजर में दिग्गज नेताओं के बीच दूरियां कम होती दिख रही हैं। इसका असर यह है कि छोटे से नगर पंचायत चुनाव में कांग्रेस बेहतर स्थिति में नजर आ रही है, जबकि भाजपा को यहां कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखाई दे रहा है और आने वाले दिनों में सरकार के खिलाफ अभियान तेज करने की रणनीति पर काम शुरू हो गया है। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
बाहर रहते हुए ही इंपैनल
केन्द्र सरकार ने देशभर के वर्ष-2001 से लेकर वर्ष-08 बैच तक के 68 अफसरों आईजी पद के लिए इंपैनल किया है। छत्तीसगढ़ कैडर से दो अफसर नीथू कमल और डी श्रवण भी इंपैनल हुए हैं। खास बात ये है कि दोनों अफसर केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं।
नीथू कमल सीबीआई, तो डी श्रवण एनआईए में पदस्थ हैं। तीन अफसर इंपैनल होने से रह गए, इनमें आईजी प्रशांत अग्रवाल, पारूल माथुर, और बालाजी सोमावार हैं। पारूल माथुर के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, तो बालाजी राव को लेकर कहा जा रहा है कि उनका एक साल का सीआर जमा नहीं हो पाया था। ऐसे में तीनों के लिए फिलहाल केंद्रीय एजेंसियों में जाने के इंतजार करना पड़ सकता है।
चमगादड़ों की इंसानों को चेतावनी
इस बार की गर्मी केवल तापमान के आंकड़े नहीं तोड़ रही, बल्कि भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी भी बनकर आ रही है। कोरबा के पाली में नौकोनिया तालाब के किनारे हाल ही में जो दृश्य दिखा, उसने सबको चिंतित कर दिया। सैकड़ों चमगादड़ पेड़ों से नीचे गिर पड़े। कई पेड़ों पर उल्टे लटके-लटके ही मर गए। इसी तरह से सैकड़ों चमगादड़ों की कांकेर में जान चली गई। शुरुआती जांच में वन विभाग के अफसरों और जानकारों ने उनकी मौत का कारण भीषण गर्मी और लू को माना है।
चमगादड़ अपनी जान की कीमत चुका कर हमें आगाह कर रहे हैं कि राज्य तेजी से पर्यावरणीय असंतुलन की चपेट में आ रहा है। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, महासमुंद और राजनांदगांव जैसे शहर इस वर्ष कई बार देश के सबसे गर्म शहरों की सूची में शामिल रहे। मौसम विभाग ने लगातार लू की चेतावनी जारी की है। कई जिलों में दिन का तापमान 45 डिग्री से ऊपर पहुंच गया, जबकि रात में भी राहत नहीं मिल रही है।
चमगादड़ बेहद संवेदनशील जीवों में से हैं। वे वातावरण में बदलाव का असर जल्दी झेलते हैं। उनका शरीर अधिक गर्मी सहन नहीं कर पाता। जब तापमान 42 डिग्री के पार पहुंचता है तो वे हीट स्ट्रोक का शिकार होने लगते हैं। कोरबा के पाली और बस्तर के कांकेर इलाके में भी यही हुआ। वहां लोगों ने लगातार कई दिनों तक चमगादड़ों को पेड़ों से गिरते देखा, पर बेबस थे। बचाने का कोई उपाय उनके पास नहीं था।
गौर करने की बात है कि चमगादड़ पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होते है। वे खेतों में नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाते हैं, कई पेड़ों और फूलों के परागण में मदद करते हैं और बीज फैलाकर जंगलों के विस्तार में भूमिका निभाते हैं। यदि ऐसे काम के जीव बड़ी संख्या में मरने लगें तो इसका असर खेती, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन पर पड़ता है।
पृथ्वी के बढ़ते तापमान के चलते संवेदनशील शारीरिक क्षमता वाले जीवों पर शामत दुनियाभर में आने लगी है। इसी साल ऑस्ट्रेलिया में भीषण गर्मी के दौरान हजारों फ्रूट बैट्स की मौत हो चुकी है। यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्सों में भी गर्मी का असर वन्यजीवों पर दर्ज किया जा चुका है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव पहले से ज्यादा लंबी और घातक होती जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ की बात करें तो पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर जंगल कटे हैं। कोरबा में हसदेव अरण्य तबाह होने जा रहा है। रायगढ़ जिले में भी कोयला खदानों, ताप विद्युत संयंत्रों और औद्योगिक परियोजनाओं का विस्तार हुआ है। जंगल कम होने से जमीन की नमी घट रही है। इसका नतीजा गर्म हवाओं का प्रकोप बढ़ जाना होता है। इधर तालाब, नदियां और छोटे जल स्रोत भी तो सिकुड़ते ही जा रहे हैं। शहरों में तेजी से बढ़ती कंक्रीट की इमारतों ने ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाया है। इसके चलते रायपुर जैसे शहरों का तापमान दुनिया के सर्वाधिक गर्म इलाकों में शामिल हो चुका है।
वैसे वन विभाग ने पाली क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई है। चमगादड़ों के बसेरे वाले पेड़ों पर और आसपास पानी का छिडक़ाव किया जा रहा है। पर ये अस्थायी और सीमित उपाय हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्थायी उपायों से काम नहीं चलेगा। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, जल स्रोतों का संरक्षण, बेतरतीब उद्योगों और अव्यावहारिक खनन पर नियंत्रण जरूरी है। शहरों में खाली पड़े जगहों पर बड़े पैमाने पर पौधरोपण होना चाहिए। चमगादड़ों की सामूहिक आहूति हम इंसानों को संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक खिलवाड़ मत करिये। जंगल और पानी बचाकर रखिए, जैव विविधता की जरूरत को नजरअंदाज मत करिये। अभी तो लू से एक दो मौतों की ही खबर आई है, आज चमगादड़ ही गिर रहे हैं। हालात नहीं सुधरे तो इंसानों की बारी आने में देर नहीं लगेगी।
साहब की चुनावी तैयारी
छठवीं विधानसभा का आधा कार्यकाल लगभग बीत चुका है। सत्तारूढ़ भाजपा संगठन ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक कर अगले चुनाव में तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस में फिलहाल वैसी हलचल नहीं है। वहां प्रदेश अध्यक्ष का भविष्य तय होने के बाद कमर कसी जाएगी। दोनों प्रमुख दलों की ऐसी हलचल के बीच कुछ नौकरशाह भी माननीय बनने की जुगत बिछाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में नौकरशाहों का नेता बनने का स्ट्राइक रेट अच्छा है। स्व. अजीत जोगी के बाद, डीएसपी आर के राय, श्याम लाल कंवर,आईएएस ओपी चौधरी, नीलकंठ टेकाम प्रमुख हैं ही।
कुछ कृषि अधिकारी, पटवारी, हवलदार, टीआई भी विधायक चुने गए। इनमें से कुछ को एक ही बार अवसर मिला। बहरहाल अगले चुनाव को लेकर ताजा नाम एक टेक्नोक्रेट का हलचल में है। साहब अपने साथ साथ पत्नी के लिए भी सक्रिय हो गए हैं। टिकट चाहे जिसे मिल जाए। ये टिकट भाजपा, कांग्रेस किसी की भी चलेगी। साहब अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते हैं और उनकी जाति के लोग कोरबा जिले की सीट से पहले भी चुने जा चुके हैं। वैसे साहब सेवा स्थल पर विस्तार (एक्सटेंशन) के लिए भी सक्रिय हैं। इनके दो समकक्षों को दो दो बार मिल चुका है। सो उम्मीद बढ़ गई है। और मातहत दावेदार अभी उतने वरिष्ठ नहीं है। एक्सटेंशन मिला तो अगले एक साल सेवा भावना का विस्तार तेजी से होगा। साहब और मैडम की सक्रियता चर्चा में है। देखना होगा आगे क्या नतीजे आते हैं।
बैज के लिए आखिरी मौका ?
नगरीय निकाय और पंचायतों के उपचुनाव चल रहे हैं। इनमें नगरीय निकाय के चुनाव दलीय आधार पर हो रहे हैं। वैसे तो चुनाव को लेकर ज्यादा बातें नहीं हो रही हैं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के कार्यकाल का आखिरी चुनाव है। लिहाजा, उन्होंने पार्टी के तमाम प्रमुख नेताओं को प्रचार में लगा दिया है।
पांच नगर पंचायत अध्यक्ष और पार्षदों के कुल 71 पदों के लिए 1 जून को वोटिंग होगी। नगरीय निकायों के चुनाव ईवीएम से होंगे, जबकि पंचायतों के चुनाव में मतपत्रों का उपयोग होगा। जिन पांच नगर पंचायतों में अध्यक्ष के चुनाव हो रहे हैं, उनमें सूरजपुर जिले की शिवनंदनपुर, जांजगीर-चांपा जिले की बम्हनीडीह, राजनांदगांव जिले की घुमका नगर पंचायत, बलौदाबाजार जिले की पलारी और कवर्धा जिले की सहसपुर लोहारा सीट शामिल हैं।
कांग्रेस ने पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल, विधायक रामकुमार यादव, राघवेंद्र सिंह, बालेश्वर साहू और व्यास कश्यप को बम्हनीडीह चुनाव की कमान सौंपी है। खुद नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत चुनाव प्रचार पर नजर रखे हुए हैं।
सूरजपुर जिले की नगर पंचायत शिवनंदनपुर के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व मंत्री अमरजीत भगत और डॉ. प्रेमसाय सिंह संभाल रहे हैं। यह नगर पंचायत महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र भटगांव का हिस्सा है। लिहाजा, उनकी भी प्रतिष्ठा दांव पर है। इसी तरह कवर्धा जिले की सहसपुर लोहारा सीट पर कांग्रेस के प्रचार की कमान राजनांदगांव ग्रामीण विधायक इंदरशाह मंडावी और विधायक भोलाराम साहू संभाल रहे हैं। गृहमंत्री विजय शर्मा का विधानसभा क्षेत्र होने के कारण यहां मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। बलौदाबाजार जिले की पलारी नगर पंचायत में पूर्व मंत्री अनिला भेडिय़ा कांग्रेस प्रत्याशी का प्रचार कर रही हैं, तो भाजपा ने पर्यटन बोर्ड की अध्यक्ष नीलू शर्मा को प्रभारी बनाया है।
प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उपलब्धियां लगभग शून्य रही हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी को विधानसभा, लोकसभा और फिर नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अब बैज का कार्यकाल 10 जून को खत्म हो रहा है। ऐसे में उपचुनाव के बहाने उन्हें खुद को साबित करने का आखिरी मौका माना जा रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि चुनाव में कांग्रेस को सफलता मिलती है, तो बैज को बदलना आसान नहीं रहेगा। यही वजह है कि बैज पूरा जोर लगा रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
उदंती-सीतानदी में रहस्यमयी बाघिन

छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में एक रहस्यमयी बाघिन की मौजूदगी ने इन दिनों वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों को हैरान कर रखा है। करीब चार साल उम्र की यह बाघिन अचानक कैमरा ट्रैप में नजर आई, लेकिन देश के किसी भी टाइगर डेटाबेस में उसके पंजों या शरीर की धारियों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
अप्रैल और मई में मिले ताजा कैमरा ट्रैप फोटो से पुष्टि हुई है कि यह बाघिन अब भी उदंती-सीतानदी के जंगलों में सक्रिय है। इससे पहले जनवरी में उसकी पहली तस्वीर सामने आई थी। इसके बाद वन विभाग ने उसकी पहचान के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को तस्वीरें भेजीं, लेकिन देश के किसी भी दर्ज टाइगर रिकॉर्ड से उसकी धारियां मेल नहीं खाईं।
जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी में जांच के दौरान उसके मल के नमूनों से पुष्टि हुई कि वह मादा बाघ है। हालांकि वह कहां से आई, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। आसपास के राज्यों ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जंगलों में भी इस बाघिन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला। विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर मादा बाघिनें अपने जन्म क्षेत्र से बहुत दूर नहीं जातीं, जबकि नर बाघ लंबी दूरी तय करते हैं। ऐसे में बिना किसी रिकॉर्ड के इस बाघिन का यहां तक पहुंचना बेहद असामान्य माना जा रहा है।
कभी बाघों के लिए पहचाने जाने वाले उदंती-सीतानदी रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों से बाघों की संख्या लगातार घट रही थी। 2014 में यहां तीन बाघ दर्ज किए गए थे, लेकिन 2018 तक केवल एक बाघ बचा था। इसके बाद यहां केवल गुजरने वाले नर बाघ ही कभी-कभार दिखाई देते रहे।
वन विभाग उदंती में बाघों के पुनर्वास की योजना बना रहा था और इसके लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को प्रस्ताव भी भेजा गया था। अब इस बाघिन की मौजूदगी ने उम्मीद जगा दी है कि शायद प्रकृति खुद इस जंगल को फिर से बाघों का घर बनाने लगी है।
कड़वाहट के बाद कदमबोशी
कांग्रेस पार्टी में अक्सर घर का झगड़ा चौक-चौराहों में फैल जाता है। सत्ता से दूर होने के बाद भी यह संघर्ष खत्म नहीं होता। इन दिनों प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की संभावित नई नियुक्ति को लेकर यही हो रहा है।
पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव के बयानों से साफ है कि वे हाईकमान का आदेश मिलते ही इस पद को संभालने के लिये राजी हैं, वहीं वर्तमान अध्यक्ष दीपक बैज को लगता है कि लगातार पार्टी की हार के बावजूद उनके लिए कोई शक्ति हाईकमान में मौजूद है, जिससे एक कार्यकाल उनको फिर मिल जाएगा। कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष प्राय: मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो ही जाते हैं, ऐसा मध्यप्रदेश के जमाने से चला आ रहा है और दूसरे कई राज्यों में भी ऐसा देखा जा रहा है।
बैज और सिंहदेव के बीच बयानों में कड़वाहट के बीच रविवार 24 मई को आदिवासी मछुआरों के सम्मेलन में इन दोनों नेताओं की आपस में पहली मुलाकात हुई। बैज, सिंहदेव का पैर छूते देखे गए लेकिन उससे ज्यादा राजनीतिक शिष्टाचार का संदेश डॉ. चरण दास महंत ने दिया। बुका में सम्मेलन के दौरान जब लंच का मौका आया तो महंत ने अपनी जगह छोड़ी और बैज तथा सिंहदेव को एक साथ अगल-बगल बिठा दिया। वे इसके पहले अलग-अलग बैठने के लिए जगह ढूंढ चुके थे। डॉ. महंत ने कहा आप दोनों एक साथ बैठकर लंच करें, मैं आप दोनों के बीच में नहीं आऊँगा। डॉ. महंत की यह तरकीब काम आई और फिर दोनों नेता हंस-हंसकर बात करते हुए भी दिखे। कांग्रेस के भीतर मौजूद अंदरूनी कलह को थोड़ा शांत करने में इससे मदद मिली। देखना होगा, कि अध्यक्ष पद की रेस में इससे क्या फर्क पड़ेगा।
पंजे की असली पसंद?
पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर फेरबदल की चर्चा चल रही है। कुछ राज्यों में अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म हो रहा है, वहां भी नियुक्तियां होनी हैं। इनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल 10 जून को खत्म हो रहा है। उनकी जगह पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का नाम प्रमुखता से उछला है। इन सबके बीच किसी आदिवासी को ही प्रदेश की कमान सौंपने की वकालत भी की गई है।
हालांकि प्रदेश अध्यक्ष बदलने की चर्चाओं पर प्रदेश कांग्रेस के दो बड़े नेता पूर्व सीएम भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत खुले तौर पर कुछ भी कहने से परहेज कर रहे हैं। मगर दोनों की पसंद अलग-अलग बताई जा रही है। चर्चा है कि डॉ. महंत, सिंहदेव के पक्ष में बताए जाते हैं। जबकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे से किसी आदिवासी को ही प्रदेश की कमान सौंपने के पक्षधर बताए जाते हैं।
यह तर्क दिया जा रहा है कि महिला कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष का पद ओबीसी से लिया गया है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद आदिवासी वर्ग से होना चाहिए। इसके लिए पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के अलावा मोहला-मानपुर के विधायक इंदरशाह मंडावी का नाम भी उछला है।
प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की भी खबर है। साहू के खरगे से मधुर संबंध हैं। उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। एक खबर यह भी है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर विवाद जारी रहता है, तो नियुक्ति कुछ समय के लिए टल भी सकती है। वैसे भी जून के आखिरी हफ्ते में जिला अध्यक्षों का प्रशिक्षण शिविर बस्तर में होने जा रहा है। इसमें खरगे के अलावा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी शिरकत करेंगे। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
पार्टी के भीतर नोटिसबाजी
सरगुजा संभाग के एक जिले में भाजपा के जिलाध्यक्ष ने युवा मोर्चा के पदाधिकारी को नोटिस जारी किया है। युवा मोर्चा पदाधिकारी ने सार्वजनिक तौर पर मंच से पार्टी के विधायक की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे।
बताते हैं कि भाजयुमो नेता, महिला विधायक के करीबी रहे हैं, लेकिन ठेका-सप्लाई को लेकर दबाव बनाने पर विधायक ने भाजयुमो नेता को किनारे कर दिया। इसके बाद से भाजयुमो नेता विधायक के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। एक-दो ऑडियो भी वायरल हुए हैं, जिनमें कथित तौर पर विधायक निजी चर्चा में अपनी ही पार्टी के नेताओं पर नाराजगी जाहिर कर रही हैं।
वायरल ऑडियो के पीछे भी भाजयुमो नेता का हाथ माना जा रहा है। बताते हैं कि विधायक ने पारिवारिक सदस्य की बीमारी की वजह से चुप्पी साध रखी है, लेकिन वे कानूनी कार्रवाई भी कर सकती हैं। पार्टी के लोगों के बीच झगड़ा चल रहा है, तो कांग्रेस के लोग मजे ले रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।


राजधानी रायपुर में एक कार की नंबरप्लेट पर लगी ये लाइट जलती होंगी, तो नंबरप्लेट कौन पढ़ पाते होंगे?
कोई और तर्क बाकी नहीं रहा
सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रकरण में करीब तीन महीने पहले राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर के खिलाफ कार्रवाई कर दी। अफसर स्थानीय सांसद के मार्फत बहाली की कोशिश में हैं। सांसद भी अफसर के मुरीद रहे हैं। उन्होंने अफसर की बहाली की कोशिशें शुरू कर दीं।
बताते हैं कि सांसद, सीएम से काफी समय से अकेले में मुलाकात की कोशिश कर रहे थे, ताकि अफसर की बहाली का रास्ता साफ हो सके। सीएम पिछले दिनों सांसद के क्षेत्र में आए, तो उन्हें सीएम के सामने अपनी बात रखने का मौका मिल गया।
सांसद ने जैसे ही अफसर की बहाली के लिए भूमिका बांधनी शुरू की, वहां बैठे मंत्रीजी ने तुरंत टोक दिया और अफसर को भ्रष्ट बताते हुए कार्रवाई को उचित ठहरा दिया। फिर क्या था, सांसद के पास कोई और तर्क नहीं रह गया। बात वहीं खत्म होकर रह गई।
डीजल की बिक्री पर नया आदेश
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण डीजल-पेट्रोल संकट गहराता जा रहा है। सरकार का आधिकारिक बयान यह है कि ईंधन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं है, लेकिन लोग जरूरत से अधिक घबराकर खरीदारी कर रहे हैं, जिसके चलते कई पेट्रोल पंप जल्दी खाली हो रहे हैं। इधर, 22 मई को राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा जारी आदेश कुछ अलग संकेत देता है।
सामान्य उपभोक्ताओं के लिए कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल की बिक्री केवल वाहनों की टंकी में ही की जाए। नियम का उल्लंघन होने पर संबंधित लोगों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी। आदेश के दूसरे हिस्से में कुछ परिस्थितियों में इस प्रतिबंध में शिथिलता दी गई है। रबी फसल की कटाई और खरीफ सीजन की तैयारी में लगे किसानों को छूट दी जाएगी। इसके अलावा, रेलवे, कलेक्टर द्वारा चिन्हित सडक़ निर्माण, भवन निर्माण तथा अस्पताल, मोबाइल टॉवर जैसे समय-सीमा वाले निर्माण कार्यों के लिए भी राहत का प्रावधान किया गया है।
आदेश के तीसरे बिंदु में बताया गया है कि यह छूट कैसे मिलेगी। इसके लिए संबंधित व्यक्ति को अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) के पास आवेदन करना होगा। आवेदन की जांच और संतुष्टि के बाद एसडीएम संबंधित रिटेल आउटलेट संचालक को ईंधन वितरण का आदेश जारी करेंगे।
किसान और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोग इस व्यवस्था को अव्यावहारिक बता रहे हैं। कृषि कार्यों से जुड़े हजारों लोगों के पास ट्रैक्टर और डीजल पंप हैं। ट्रैक्टरों की पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं। कई जिलों में कलेक्टरों ने अपने स्तर पर राशनिंग भी शुरू कर दी है और डीजल-पेट्रोल देने की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है। सवाल यह है कि डीजल पंपों के लिए किसान बार-बार एसडीएम कार्यालय के चक्कर कैसे लगाएंगे? क्या एसडीएम स्तर पर हर आवेदन की जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव होगा?
रासायनिक खाद की आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए भी निर्देश जारी किए जा चुके हैं। निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाले डीजल की आपूर्ति के लिए पहचान का अधिकार कलेक्टर या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को दिया गया है। लेकिन इसकी परिभाषा बहुत सीमित रखी गई है, जिसमें अस्पताल, मोबाइल टॉवर और सडक़ निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं। जबकि बारिश से पहले इन दिनों बड़े पैमाने पर निजी निर्माण कार्य भी चल रहे हैं। ऐसे निर्माण कार्यों को ईंधन कैसे मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है। इन निर्माण कार्यों से हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है।
इधर, कुछ जिलों में पेट्रोल पंप संचालकों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उन्होंने सामान्य दिनों की तुलना में अधिक मात्रा में डीजल किसे और क्यों बेचा। पता चला कि उद्योगों को अतिरिक्त आपूर्ति की गई थी। संभव है कि कई उद्योगों ने जरूरत से ज्यादा भंडारण भी कर लिया हो। लेकिन 22 मई के आदेश में उद्योगों की स्वाभाविक आवश्यकताओं को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
पिछले 10-11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम तीन बार बढ़ चुके हैं। लोगों को पहले से इसकी आशंका थी, इसलिए कहीं बड़ा असंतोष देखने को नहीं मिला। बल्कि आम धारणा यह बन रही है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से धान की खेती पर आधारित है। वहीं गांवों से शहरों में आने वाले हजारों भूमिहीन मजदूरों की आजीविका निर्माण कार्यों और उद्योगों पर निर्भर करती है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल की आपूर्ति वास्तविक जरूरतों के अनुरूप सुनिश्चित करने की व्यवस्था इस आदेश में दिखाई नहीं देती।
एक खास मुलाकात
छत्तीसगढ़ में साहू समाज एक बड़ा वोट बैंक है। इसीलिए सरकार कोई भी इस वर्ग को छत्तीसगढ़ में हमेशा प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। कांग्रेस ने ताम्रध्वज साहू को सीएम का संभावित चेहरा बनाया था, सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में। समाज के लोग समझ रहे थे कि वे ही मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। दिल्ली में जब कांग्रेस हाईकमान की ओर से नाम तय किया जा रहा था तब खबर भी उड़ गई थी कि वे फाइनल कर दिए गए हैं। पटाखे फूटे। पर 2023 के चुनाव में भाजपा ने साहू समाज को सर्वाधिक टिकट दिए, सर्वाधिक जीत कर भी आए। उसके बाद 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी यह सिलसिला बना रहा। परिणाम यह रहा कि ताम्रध्वज महासमुंद से चुनाव हार गए। इधर, लंबे समय तक भाजपा में हाशिये पर रहे तोखन साहू ने बिलासपुर लोकसभा सीट से बंपर जीत हासिल की। केवल जीत ही नहीं, अनेक दिग्गजों को किनारे लगाते हुए उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह बनाई। इस तस्वीर में ताम्रध्वज साहू, तोखन साहू के साथ नजर आ रहे हैं, जो उनसे उनके दिल्ली निवास पर मिलने गए थे।
बिना मोबाइल प्रशिक्षण

जिलों में भाजपा का प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। रायपुर जिले के पदाधिकारियों का प्रशिक्षण शिविर अग्रसेन धाम में सुबह 9 बजे से शुरू हुआ। इस शिविर में रायपुर जिले के सातों विधायक शामिल हुए। खास बात यह है कि विधायकों और पार्टी के सभी आमंत्रित नेताओं को मोबाइल बाहर रखने के लिए कह दिया गया। वो कार्यक्रम के दौरान किसी से चर्चा नहीं कर पाएंगे।
प्रशिक्षण शिविर में पार्टी के कोई राष्ट्रीय नेता तो नहींआए, लेकिन प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय प्रमुख रूप से मौजूद रहे। कुल मिलाकर ढाई सौ से अधिक पदाधिकारी व आमंत्रित नेता शिरकत कर रहे हैं। सभी को दो दिन प्रशिक्षण स्थल में ही रहना होगा। उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं है। पहले से ही जिला पदाधिकारियों की ऑनलाईन मीटिंग में तमाम बातों को लेकर विस्तार से जानकारी दे दी गई है। सरकार के ढाई साल बाकी हैं, और आने वाले दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं को किस तरह का काम करना चाहिए, इस पर मंथन हो रहा है। शिकवा-शिकायतें भी सुनी जाएगी। निराकरण के लिए भी यथासंभव प्रयास किए जाएंगे। कुल मिलाकर अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर प्रशिक्षण शिविर को काफी अहम माना जा रहा है। देखना है कि शिविर में क्या कुछ निकलकर बाहर आता है।
मंत्रालय में गढक़लेवा

मंत्रालय परिसर में संचालित निजी होटल के कैंटीन से अधिकारी कर्मचारियों का मन 20-22 दिन में ही भर गया है। वहां के व्यंजनों से नहीं उनकी कीमत से। जेब पर भारी कैंटीन की जगह कर्मचारी संघ की पहल पर गढक़लेवा का संचालन शुरू हो गया है। संघ के अध्यक्ष ने सभी सदस्य अधिकारी कर्मचारियों को सूचना वायरल कहा कि वे अधिक से अधिक संख्या में गढक़लेवा पहुंचकर इस पहल को सफल बनाएं। हमें अपनी माटी के स्वाद और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। सभी से आग्रह है कि भोजन और नाश्ते के लिए हमारे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के केंद्र गढक़लेवा का उपयोग करें। गढक़लेवा से भोज्य पदार्थ अपनाकर हम न सिर्फ शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन पाएंगे, बल्कि स्थानीय संस्कृति और रोजगार को भी संबल देंगे।
इस सामूहिक सहयोग से हम जल्द ही इस वर्तमान कैंटीन को बंद करवाकर, पुन: टेंडर की प्रक्रिया शुरू करवाएंगे, ताकि हमें बेहतर सुविधाएं मिल सकें। इस पर कर्मचारियों ने ठंड में तो ठीक है लेकिन गर्मी बारिश में गढक़लेवा की दूरी पर एतराज़ जताया है। इसे
पुराने स्थान पर डी गेट के सामने ही खोलना चाहिए। इसके अलावा मंत्रालय के बाहर एक ग्रामीण महिला ने भी भोजनालय शुरू किया है। जो बड़ी भीड़ खींच रही है। उसकी पूरी थाली दाल- भात, भाजी, बरी-बिजौरी आदि छत्तीसगढ़ डिशेज़ के साथ 70 रूपए में उपलब्ध है। देखना है कि पनीर मिक्सवेज के दौर में यह कितनी सफल होते हैं।
खर्च में कटौती की आंच
केन्द्र सरकार इन दिनों सरकारी खर्च में कटौती को लेकर गंभीर नजर आ रही है। चर्चा है कि कम बजट और अधिक प्रशासनिक खर्च वाले आधा दर्जन छोटे विभागों को बंद करने या बड़े विभागों में समाहित करने पर विचार चल रहा है। इनमें आयुष, मछली पालन, पुरातत्व, लघु सिंचाई, हाथकरघा-हस्तशिल्प जैसे विभागों के नाम लिए जा रहे हैं। यदि ऐसा फैसला होता है, तो इसका असर राज्यों पर भी पड़ सकता है।

राज्य के अफसर-कर्मचारी इस संभावित फैसले पर नजर टिकाए हुए हैं। उनका मानना है कि केंद्र की तर्ज पर राज्यों में भी संबंधित विभागों के पुनर्गठन या समापन की नौबत आ सकती है। खास बात यह है कि आयुष विभाग का विस्तार मोदी सरकार के आने के बाद ही हुआ था, जिसमें आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी को एक साथ लाया गया। छत्तीसगढ़ में इसका अलग संचालनालय है और यहां गतिविधियां भी बेहतर मानी जाती हैं।
इसी तरह मछली पालन और पुरातत्व जैसे विभाग लंबे समय से अस्तित्व में हैं। हाथकरघा और हस्तशिल्प विभागों की गतिविधियां भले सीमित हों, लेकिन इसमें रोजगार की पर्याप्त संभावनाएं हैं। दिक्कत यह है कि पर्याप्त बजट नहीं मिलने से योजनाएं अटकी रहती हैं। अब देखना है कि खर्च घटाने की मुहिम में केन्द्र सरकार इन विभागों को लेकर क्या रुख अपनाती है।
रजिस्टरों पर दीमक या साजिश?
.jpg )
महंत घासीदास संग्रहालय में दुर्लभ दस्तावेजों और एक्सेशन रजिस्टरों के नष्ट होने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। यह मामला तब सामने आया, जब अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क से जुड़ी अवलोकितेश्वर की बेशकीमती कांस्य प्रतिमा को वापस लाने के लिए संग्रहालय के रिकॉर्ड खंगाले गए। जांच में पता चला कि छह में से पांच एक्सेशन रजिस्टर नष्ट हो चुके हैं, जिनमें पुरातत्व अवशेषों का पूरा रिकॉर्ड दर्ज था। बताया गया कि रजिस्टरों को दीमक चट कर गई।
मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि एक्सेशन रजिस्टरों में संग्रहालय में सुरक्षित पुरावशेषों, कलाकृतियों और चोरी हुई वस्तुओं की पूरी जानकारी रहती है। अब जब रिकॉर्ड ही नष्ट हो गए, तो तीन दशक पहले चोरी हुई अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा को वापस लाने की प्रक्रिया जटिल हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस प्रतिमा की कीमत करीब दो मिलियन डॉलर बताई जा रही है। फिलहाल अतिरिक्त संचालक को नोटिस जारी कर प्रारंभिक जांच शुरू कर दी गई है।
मगर यह भी चर्चा है कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश में पुराने एक्सेशन रजिस्टर मौजूद हैं, जिन्हें राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ नहीं लाया गया। अब पुरातत्व संचालनालय ने मध्यप्रदेश सरकार को पत्र लिखकर रिकॉर्ड मांगा है। हालांकि राज्य गठन के बाद मिले पुरावशेषों और चोरी की घटनाओं का विवरण वहां मिलना मुश्किल माना जा रहा है। कुछ लोगों का दावा है कि रजिस्टर महज दीमक से नहीं, बल्कि जानबूझकर नष्ट किए गए हैं। यही वजह है कि मामले को लेकर हाईकोर्ट जाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।

यह तस्वीर 14 फरवरी 2010 की है। उस समय पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर देशभर में राजनीतिक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। उसी क्रम में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी बाकी मंत्रियों के साथ सांकेतिक रूप से सायकल चलाकर विरोध जताया था और पेट्रोल पंप पहुंचकर अलग अंदाज में प्रदर्शन किया था। (फोटो और जानकारी गोकुल सोनी) उस वक्त छत्तीसगढ़ में पेट्रोल के दाम 48-49 रुपये के बीच थे।
सुशासन तिहार के बाद तबादले?
प्रदेश में जनगणना का काम चल रहा है। इसी बीच तबादलों को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि सरकार के कुछ मंत्री और भाजपा के कई नेता चाहते हैं कि तबादलों से रोक हटाई जाए। सरकार के पास यह विकल्प है कि जनगणना कार्य से जुड़े स्कूल शिक्षा और राजस्व विभाग के अमले को छोडक़र बाकी विभागों में तबादलों की छूट दी जाए। इस पर विचार-मंथन भी शुरू हो गया है।
मध्यप्रदेश में भी तबादलों पर लगा बैन हटाया गया है और वहां 1 जून से 15 जून तक तबादले होंगे। मध्यप्रदेश की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी कर्मचारी संगठनों ने तबादले शुरू करने की मांग रखी है।
हालांकि प्रदेश में अभी सुशासन तिहार चल रहा है, जिसके तहत जनसमस्याओं के निराकरण के लिए कैंप लगाए जा रहे हैं। पूरा मैदानी अमला फिलहाल इसी अभियान में व्यस्त है। ऐसे में माना जा रहा है कि सुशासन तिहार खत्म होने के बाद सरकार तबादलों पर लगी रोक हटाने पर फैसला ले सकती है।
पहले से बनी तबादला नीति में जिले के भीतर तबादले का अधिकार प्रभारी मंत्रियों को दिया गया था। अब चर्चा है कि कुछ संशोधनों के साथ नई तबादला नीति जारी हो सकती है। इस पर अंतिम फैसला कैबिनेट बैठक में लिया जा सकता है। अब देखना है कि सरकार क्या निर्णय लेती है।
बस्तर मॉनिटरिंग करेंगे विजय शर्मा
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के जगदलपुर दौरे के दौरान कई बड़ी घोषणाएं की गईं। इनमें वर्ष 2031 तक बस्तर को विकसित संभाग बनाने का लक्ष्य भी शामिल है। सहकारिता विभाग भी संभाल रहे अमित शाह के नेतृत्व में बस्तर विकास का रोडमैप तैयार किया जा रहा है।
इस दौरान उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे के लिए राज्य सरकार की भूमिका की सराहना करते हुए सीएम विष्णुदेव साय को सफल सीएम बताया। अमित शाह ने डिप्टी सीएम विजय शर्मा की भी खुलकर तारीफ की।
बताया जा रहा है कि बस्तर विकास योजना की मॉनिटरिंग में विजय शर्मा की सीधी भूमिका रहेगी। हाल ही में विजय शर्मा गुजरात दौरे पर गए थे, जहां उन्होंने सहकारी क्षेत्र में दुग्ध उत्पादन और वितरण व्यवस्था का अध्ययन किया। अब गुजरात के सहकारी दुग्ध मॉडल को बस्तर में लागू करने पर विचार चल रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर के आदिवासी परिवारों को मुफ्त गाय-भैंस देने की योजना पर भी काम कर रही है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के सहयोग से इस दिशा में शुरुआती काम शुरू हो चुका है।
हालांकि सहकारिता विभाग मंत्री केदार कश्यप के पास है, लेकिन बस्तर में सहकारिता आधारित योजनाओं की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी विजय शर्मा को मिलने की चर्चा है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में बस्तर में क्या बदलाव होता है।
जंगल की खामोश चौकी पर मैकू की याद

अचानकमार टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच, वीरान सडक़ किनारे एक छोटा-सा मठ है। यह उस वन प्रहरी की स्मृति है, जिसने जंगल की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवा दी, लेकिन डर के आगे पीछे नहीं हटा।
मठ है बिंदावल गांव के मैकू गोंड की याद में। उस फायर वॉचर की, जिसे 10 अप्रैल 1949 को एक बाघिन ने अपना शिकार बना लिया था। उस दिन वह अपने एक साथी के साथ जंगल की निगरानी पर निकला था। अचानक बाघिन ने हमला किया। साथी किसी तरह बच निकला, लेकिन मैकू जंगल की मिट्टी में हमेशा के लिए समा गया।
उस समय न वन्यजीव संरक्षण कानून थे, न शिकार पर सख्त पाबंदी। तीन दिन तक मचान में बैठकर रेंज अधिकारी एम.डब्ल्यू.के. खोखर उस आदमखोर बाघिन का शिकार करने में कामयाब हुए।
विडंबना देखिए, जिस दौर में मैकू मारा गया, तब वन्यजीवों की हत्या रोकने के लिए कानून तक नहीं थे। लेकिन आज, सख्त कानून होने के बावजूद शिकारी अब भी जंगलों में घूम रहे हैं। कहीं करंट बिछाकर, कहीं जहर मिलाकर, तो कहीं फंदे लगाकर बाघ, तेंदुए और दूसरे वन्यजीवों को मारा जा रहा है। ऐसे समय में मैकू गोंड की यह स्मृति और भी प्रासंगिक हो जाती है। जंगलों को केवल कानून नहीं बचाते, उन्हें बचाते हैं मैकू जैसे लोग जो जान जोखिम में डालकर भी जंगल की चौकीदारी करते हैं।
( प्राण चड्ढा के फेसबुक वाल से)
एसपीजी को चाहिए आईपीएस
स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) में ऑफिसर्स की कमी हो गई है। वैसे यह कमी, हर केंद्रीय गोपनीय सुरक्षा एजेंसी में बनी हुई है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को अपने अपने यहां के इच्छुक आईपीएस अफसरों को एसपीजी में डेपुटेशन पर भेजने आधिकारिक पत्र लिखा है। इस सर्वोच्च हाई प्रोफाइल सुरक्षा बल ने जूनियर खासकर एसपी, डीआईजी स्तर के अफसरों की मांग की गई है। एसपीजी में इनके तय पद पूरी तरह नहीं भर पा रहे हैं।
मुख्य सचिवों से कहा गया है कि इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा आईपीएस अफसरों तक पहुंचाया जाए। प्रतिनियुक्ति के लिए योग्य एवं इच्छुक आईपीएस डीआईजी की फाइल तुरंत प्रभाव से गृह मंत्रालय को प्रेषित करें। दो सप्ताह पहले यह मैसेज भेजा गया था। इसमें कहा गया है कि बतौर डीआईजी के पद पर आने वाले अधिकारियों के लिए 14 साल की सेवा अनिवार्य है। ऐसे इच्छुक आईपीएस अधिकारियों का प्रतिनियुक्ति आवेदन, तीस दिन के अंदर गृह मंत्रालय को भेजा जाए। इसके साथ उनके विजिलेंस स्टेटस के बारे में भी सूचित किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व इस एजेंसी में प्रतिनियुक्ति से लौटे एक आईपीएस अफसर ने कहा कि जूनियर पोस्ट पर बड़ी किल्लत है। इस वजह से प्रधानमंत्री के एक साथ दो से तीन देशों या देश के भीतर भी 3-4 अलग अलग राज्यों के दौरे होने पर एडवांस पार्टी की तैनाती में कमी से जूझना पड़ता है। इस विशेष सुरक्षा दस्ते को अभी और लोगों की जरूरत है। देश में एसपीजी की सुरक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत को ही दी गई है।
बहरहाल गृह मंत्रालय के इस पत्र के बाद राज्य के युवा आईपीएस अफसरों के लिए इस हाई प्रोफाइल डेपुटेशन पर जाने के रास्ते खुल गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ से, केंद्र में डेपुटेशन कोटे से कम ही आईपीएस अफसर गए हैं या अनुमति दी गई है। राज्य के 142 आईपीएस अधिकारियों के कैडर में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए कोटा 31 अफसरों का है। जनवरी 26 की डेट में 8 ही डेपुटेशन पर गए हैं। उसके बाद के इन 4 महीने में तीन और अफसर गए हैं। अभी 19 और जा सकते हैं। यहां बता दें कि इस प्रतिष्ठित फोर्स में पूर्व में छत्तीसगढ़ से एडीजी विवेकानंद, एसपी अमित कांबले पदस्थ रहे चुके हैं।
सोता रहा सिस्टम, शिक्षकों पर रिकवरी का संकट
छत्तीसगढ़ के पंचायत संवर्ग से शिक्षा विभाग में संविलियित सहायक शिक्षकों के सामने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 मई के आदेश के बाद गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वे मानसिक पीड़ा से गुजर ही रहे हैं, साथ ही उनकी भविष्य की आर्थिक योजनाएं भी खतरे में पड़ गई हैं।
दरअसल, हाईकोर्ट ने पंचायत नियमों के तहत नियुक्त सहायक शिक्षकों (जिन्हें पहले शिक्षा कर्मी कहा जाता था) को स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षकों की श्रेणी में मानने से इंकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें नियमित शिक्षकों की तरह 10 वर्ष की सेवा पर क्रमोन्नत वेतनमान या समान वेतन पाने का अधिकार नहीं है।
इस आदेश के तुरंत बाद शिक्षा विभाग और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिलों के कलेक्टरों, जिला शिक्षा अधिकारियों तथा जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को पत्र भेजकर तुरंत समीक्षा करने और अधिक वेतन प्राप्त कर चुके शिक्षकों के चिह्नांकन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक (पंचायत) संवर्ग के 82,066 स्वीकृत पदों में से 77,628 पद भरे हुए हैं। वर्ष 1998-2008 के आसपास नियुक्त और 2011-2015 के दौरान 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले कई शिक्षकों को शासन के आदेश क्रमांक 411 (22/2011) के तहत अस्थायी रूप से क्रमोन्नत वेतनमान स्वीकृत किया गया था। यह लाभ केवल 1 नवंबर 2011 से 30 अप्रैल 2013 तक प्रभावी था, लेकिन इसके बाद भी क्रमोन्नत वेतनमान का भुगतान जारी रहा। 2015 से 2021 तक इन शिक्षकों को अतिरिक्त वेतन और एरियर मिला।
हाईकोर्ट ने 1,188 शिक्षकों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने मांग की थी कि उनकी पंचायत संवर्ग में दी गई सेवा को भी वरिष्ठता और क्रमोन्नति के लिए गिना जाए। अदालत ने राज्य सरकार की दलील मानी कि 1 जुलाई 2018 को संविलियन के बाद से ही उनकी सेवा अवधि की गणना होगी।
दरअसल, अस्थायी आदेश के आधार पर पहले से क्रमोन्नत वेतनमान दिया जाता रहा और 30 अप्रैल 2013 के बाद भी इसे जारी रखा गया। अब यह पूरा लाभ वसूली के दायरे में आ गया है। राज्य स्तर पर हजारों शिक्षक इस प्रक्रिया में फंस सकते हैं और प्रत्येक से 8 लाख से 20 लाख रुपये तक की वसूली की जा सकती है। विभिन्न जिलों में शिक्षा अधिकारी दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं और जल्द ही संबंधित शिक्षकों को नोटिस जारी कर वसूली प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए सरकारी खजाने से गलत तरीके से हुई निकासी को वापस लेना जरूरी है, लेकिन इन शिक्षकों का क्या होगा? वे 15-20 लाख रुपये तक की बड़ी रकम एक साथ कैसे लौटा पाएंगे? क्या उनके वेतन से कटौती शुरू कर दी जाएगी? इन्होंने उसी वेतन के आधार पर बच्चों की पढ़ाई, परिवार का पालन-पोषण, इलाज और अन्य जिम्मेदारियों की योजना बनाई थी। अब रिकवरी के भय से कई शिक्षक मानसिक दबाव में हैं। कई सेवानिवृत्ति के करीब हैं और कुछ पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
फिर भी एक उम्मीद बाकी है-रिकवरी के खिलाफ हाईकोर्ट जाना। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि यदि कर्मचारी से कोई छल-कपट नहीं हुआ है और विभाग की गलती से अधिक भुगतान हुआ है, तो उससे रिकवरी नहीं की जा सकती। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी हाल के कई मामलों में इसी आलोक में फैसले दिए हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की गई वसूली को वापस खाते में डालने के भी आदेश दिए हैं।
जिन शिक्षकों को अधिक वेतन दिया गया, उन्हें नोटिस जारी करना आसान है, लेकिन क्या उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जिन्होंने वर्षों तक करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान होने दिया और इसे वे रोकने में विफल रहे? उनसे ही वसूली क्यों नहीं की जानी चाहिए?
भाजपा की ‘बस पॉलिटिक्स’..
देशभर में ईंधन बचाने को लेकर चल रहे अभियान का असर अब भाजपा के तौर-तरीकों में भी दिखने लगा है। वीवीआईपी कारकेड में कटौती के बाद राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्री भी सीमित वाहनों के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। भाजपा संगठन ने भी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पेट्रोल-डीजल बचत के लिए व्यावहारिक संदेश देने की हिदायत दी है।
इसी कड़ी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रायपुर दौरे के दौरान भाजपा नेताओं ने अलग-अलग गाडिय़ों के बजाय सामूहिक रूप से बस से एयरपोर्ट पहुंचकर एक संदेश देने की कोशिश की। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, सांसद बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, महापौर मीनल चौबे और राज्यसभा सदस्य लक्ष्मी वर्मा समेत कई नेता एक साथ बस से एयरपोर्ट पहुंचे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी को भी बस से जाना था, लेकिन रायगढ़ से लौटने में देरी होने के कारण वे सीधे एयरपोर्ट पहुंचे। भाजपा कार्यसमिति की बैठक में भी कई नेताओं को ई-रिक्शा से कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पहुंचते देखा गया।
बताते हैं कि भाजपा में अब प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेताओं के स्वागत में अलग-अलग वाहनों की बजाय सामूहिक परिवहन को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया है। कांग्रेस भले ही इसे 'नौटंकी' बता रही हो, लेकिन बढ़ती ईंधन खपत और पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच इसे सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
एक ही जाति, फिर भी सादगी
सामान्यत: कोर्ट मैरिज को अंतरजातीय होने या किसी पारिवारिक विरोध से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के रायकोना गांव के इस विवाह ने यह धारणा तोड़ दी। यह विवाह इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह यह है कि यह शादी किसी मजबूरी या सामाजिक विरोध के कारण नहीं, बल्कि पूरी सहमति, समझदारी और सादगी के संकल्प के साथ हुई। रघुनाथ साहू और योगेश्वरी साहू, जो एक ही समाज और आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों से आते हैं, उन्होंने पारंपरिक धूमधाम, बारात, डीजे और लाखों रुपये के खर्च से दूरी बनाते हुए कलेक्ट्रेट में विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया।
शादियां सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनती जा रही हैं। कई परिवार कर्ज तक लेने को मजबूर हो जाते हैं, ऐसे समय में इस विवाह को समाज को नई दिशा देने वाला उदाहरण माना जा सकता है। कोर्ट मैरिज के फैसले को दोनों परिवारों ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि खुशी के साथ विवाह समारोह में शामिल होकर नवदंपती को आशीर्वाद दिया।
सख्ती के संकेत...
सरगुजा संभाग के एक जिले में कुछ समय पहले हुए कलेक्टर के तबादले से कारोबारी वर्ग और कुछ स्थानीय नेताओं ने राहत की सांस ली थी। वजह यह थी कि पूर्व कलेक्टर जमीन कब्जे और अफरा-तफरी के मामलों में लगातार कार्रवाई कर रहे थे। मगर नए कलेक्टर ने आते ही इससे भी ज्यादा सख्त रुख अपना लिया है।
जमीन कब्जे और गड़बडिय़ों से जुड़े मामलों में तेजी से कार्रवाई शुरू होने के बाद कई प्रभावशाली लोग भी इसकी जद में आ गए हैं। इनमें सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ चेहरे भी बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि प्रभावित लोगों ने स्थानीय विधायक के जरिए पार्टी के शीर्ष नेताओं तक शिकायत पहुंचाई। संगठन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने पूरी बात शांतिपूर्वक सुनी, लेकिन उसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई और तेज हो गई।
संकेत साफ माने जा रहे हैं कि अनियमितताओं को लेकर सरकार अब किसी तरह की ढिलाई के पक्ष में नहीं है। जिला प्रशासन के साथ-साथ पुलिस प्रशासन को भी कड़ाई बरतने के निर्देश बताए जा रहे हैं। एक एसएसपी को तो केवल इस वजह से नोटिस जारी होने की चर्चा है कि उन्होंने सत्ताधारी दल से जुड़े एक कारोबारी के खिलाफ कार्रवाई में नरमी दिखाई थी। आने वाले दिनों में ऐसे और कदम देखने को मिल सकते हैं।
पुलिस महकमे में बड़ी हलचल
आईपीएस के 92 बैच के अफसर अरुण देव गौतम अब पूर्णकालिक डीजीपी बन चुके हैं और अगले साल फरवरी में सेवानिवृत्त होंगे। इसके साथ ही पुलिस विभाग में बड़े स्तर पर फेरबदल की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कहा जा रहा है कि तबादला सूची लगभग तैयार है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक में शामिल होने के लिए जगदलपुर पहुंचे हैं। उनके साथ सीएम विष्णु देव साय समेत उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के सीएम भी मौजूद हैं। माना जा रहा है कि परिषद की बैठक के बाद पुलिस विभाग की सूची जारी हो सकती है।
कुछ दिन पहले ही 43 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए थे, जिनमें आधा दर्जन कलेक्टर भी शामिल थे। अब पीएचक्यू से लेकर जिलों के एसपी स्तर तक बदलाव की तैयारी बताई जा रही है। कुछ एसएसपी एक ही जिले में ढाई साल से पदस्थ हैं, इसलिए उन्हें नई जिम्मेदारी मिल सकती है। यही नहीं,करीब आधा दर्जन एसपी अलग-अलग कारणों से बदले जा सकते हैं। कुछ अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें भी बताई जा रही हैं।
विधानसभा चुनाव में अभी ढाई साल का समय है, लेकिन सरकार अभी से जिलों में प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है। अब सबकी नजर आने वाली सूची पर टिकी है।
इधर इंतजार,उधर अगली किस्त...
प्रदेश के अभा सेवा अफसर और विद्युत कंपनी के कार्मिकों ने 2 प्रतिशत का पिछला महंगाई भत्ते एरियर्स समेत खर्च कर लिया है और राज्य प्रशासन के लोग अभी घोषणा का इंतजार ही कर रहे हैं। वैसे भी वे 26 वर्षों में 88 महीने के डीए का डेफिसिट झेल रहे हैं। और अब पांच लाख अधिकारी कर्मचारियों के जले में नमक गिरने वाला है।
बहरहाल केंद्र सरकार ने जुलाई की दूसरी किस्त घोषित करने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (एआईसीपीआई इंडेक्स) का अध्ययन शुरू कर दिया है। यह आकलन अप्रैल से होता है। दूध, सब्जी, अनाज ,पेट्रोल और रोजमर्रा की अन्य चीजों की बढ़ती कीमतों एआईसीपीआई इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर कर्मचारियों को अगले डीए रिवीजन में फायदा मिल सकता है।
यानी केंद्रीय अमले को यह किस्त भी 3-4 महीने की एरियर्स के साथ सितंबर अक्टूबर में मिलेगी।
वैसे तो केंद्रीय कर्मचारियों को आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का बेसब्री से इंतजार है लेकिन अगले कुछ महीनों में लक्ष्मी बरसने वाली है। सरकार साल 2026 की दूसरी छमाही के डीए देगी। इस बार केंद्रीय कर्मचारियों के डीए में 3 परसेंट बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो डीए बढक़र 63 परसेंट हो जाएगा। वैसे अक्टूबर में केंद्रीय कर्मियों, रेल अमले को डीए के साथ दीपावली बोनस की भी बंपर लाटरी खुलने वाली है। ऐसे में अगली छमाही बल्ले बल्ले वाली होगी।
आसमानी डायनासोर...
अचानकमार टाइगर रिजर्व केवल बाघों और पेड़ों की सघनता ही नहीं, बल्कि दुर्लभ और खूबसूरत पक्षियों की दुनिया भी है। तस्वीर में दिखाई दे रहा यह आकर्षक पक्षी रेड-नेप्ड आइबिस है। आमतौर पर इसे लाल सिर वाला काला आइबिस या काली सुंडी कहा जाता है। लंबे मुड़े हुए चोंच, चमकदार काले पंख और सिर पर लाल रंग की त्वचा इसे बेहद अलग पहचान देते हैं।
वैसे, अचानकमार के जंगल, घासभूमि और जलस्रोत इस तरह के पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय बनते जा रहे हैं। यहां हर साल बर्ड वाचिंग कैंप भी लग रहे हैं। मोर, हॉर्नबिल, ईगल, उल्लू, वुडपेकर और कई प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी पक्षी प्रेमियों को रोमांचित करती है। हाल के वर्षों में दुर्लभ इंडियन वल्चर यानी गिद्धों की संख्या में भी यहां उम्मीद जगाने वाली बढ़ोतरी देखी गई है। आसमानी डायनासोर कहे जाने वाले ये गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी माने जाते हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में ये बड़ी भूमिका निभाते हैं।
ये मौसम यानि, बरसात से पहले और गर्मियों के अंतिम दिनों में अचानकमार पक्षियों की गतिविधियों को करीब से देखने का सबसे खूबसूरत समय होता है। जंगल की नमी, पेड़ों की हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट यहां आने वालों को प्रकृति के बेहद करीब ले जाती है। (तस्वीर अनुभव शर्मा द्वारा खींची गई और सोशल मीडिया पर साझा की गई है।)
मोहब्बत छोडक़र सामान ले गया चोर..
अंबिकापुर के कांग्रेस दफ्तर में छत के रास्ते से चोर घुसा और उसने दो-चार नहीं, लोहे के कुल 73 सामान उखाड़े और अपने साथ ले गया। इनमें नल, फ्लश सिस्टम, वॉश बेसिन आदि शामिल थे। कांग्रेस दफ्तर में कुछ जरूरी दस्तावेज रहे होंगे, जिनमें चोर की दिलचस्पी नहीं रही होगी। रुपये-गहने ढूंढने की कोशिश भी शायद उसने नहीं की होगी, क्योंकि वह यहां तीसरी बार घुसा था। जी हां, यह तीसरी चोरी थी। और तीसरी बार सफलतापूर्वक चोरी संपन्न हो जाने की खुशी में वह एक पर्चा भी वहां छोडक़र गया, जिसमें लिखा था- आई लव अंबिकापुर। यानी, अंबिकापुर से मोहब्बत है।
शायद पुलिस उसे अब तक पकड़ नहीं पाई है, इसलिए वह खुश होगा। दो बार चोरियां हो जाने के बावजूद कांग्रेस भवन में सुरक्षा व्यवस्था कुछ नहीं थी, इस बात ने भी उसे प्रभावित किया होगा। सबसे बड़ी बात, उसे पता था कि भवन में 73 की संख्या में ऐसे सामान बाथरूम और टॉयलेट में लगे हैं, जिन्हें वह कबाड़ में बेच सकता है। चोरी गए सामान की कीमत पार्टी के लोगों ने करीब 80 हजार रुपये बताई है।
वैसे, नशे के चंगुल में फंसे लोग प्राय: लोहे का सामान ही चुराते हैं। इसे कबाडिय़ों के पास आसानी से खपाया जा सकता है। चोर, मोहब्बत का इजहार करते हुए पर्चा छोड़ गया और सामान कबाड़ी की दुकान ले गया। सिस्टम पर उसका भरोसा बना हुआ है।
हकीकत के इतर रेलवे का नया लोगो
स्टेशन, गंदगी भरे ट्रेनों की लेटलतीफी, उनमें चोरियां, टीटीई द्वारा बेटिकिट यात्रियों को बोगी से धकेलने और दोयम दर्जे की यात्री सुविधाओं की हकीकत से इतर रेलवे ने अपनी पहचान बदल रहा है। बोर्ड ने हालांकि इस बदलाव पर दावा किया है कि उसने हमेशा से अपने लोगो और पहचान को समय के साथ अपडेट किया है, ताकि वह आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। नए लोगो के माध्यम से, रेलवे ने यह संदेश दिया है कि वह अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं को समझता है और उन्हें बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस नए लोगो के साथ, भारतीय रेल ने अपने ब्रांड को और अधिक आकर्षक और पहचानने योग्य बनाने का प्रयास किया है। नए लोगो के माध्यम से, यात्रियों को एक नई पहचान और अनुभव मिलेगा, जो उन्हें भारतीय रेल के साथ जुडऩे में मदद करेगा। चेंज आफ लोगो को लेकर जारी सूचना के अनुसार अब पुराने और नीले रंग के 17 स्टार वाले लोगो की जगह लाल रंग का 18 स्टार वाला लोगो इस्तेमाल होगा। अब एक स्टार अधिक वाले लोगो के साथ नई पहचान बनाने जा रहा है। आगामी एक जून से इसे पूरे देश में जारी कर दिया जाएगा।
भारतीय रेल ने दक्षिण तट रेलवे विशाखापट्टनम के गठन के बाद अपने आधिकारिक लोगो में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। रेलवे बोर्ड ने रेल इंजन के फ्रंट फोटो को घेरे हुए 18 लाल सितारों वाले संशोधित लोगो को मंजूरी दे दी है। रेलवे बोर्ड द्वारा जारी आदेश के अनुसार, दक्षिण तट रेलवे को भारतीय रेल का 18वां दक्षिण तट रेलवे जोन एक जून से औपचारिक रूप से परिचालन शुरू करेगा। बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे, उत्पादन इकाइयों, पीएसयू और प्रशिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे एक जून से नए लोगो का उपयोग करें।
आस्था से अधिक समरसता की तस्वीर

ऐसे समय में जब देश में धर्म और पहचान को लेकर बहसें अक्सर तनाव का रूप ले लेती हैं, यह तस्वीर एक अलग और सकारात्मक संदेश देती दिखाई देती है। सूरजपुर कलेक्टर रेना जमील सुशासन तिहार के मौके पर मुख्यमंत्री के प्रवास की तैयारी को देखने के लिए कुदरगढ़ गई थीं। वहां के मंदिर में उन्होंने श्रद्धा के फूल चढ़ाए और लोगों ने यह तस्वीर कैद कर ली। मुस्लिम समुदाय से आने वाली महिला अधिकारी का परंपरा और संस्कृति के प्रति सम्मान के नजरिये से भी इसे देखा गया। समाज की खूबसूरती उसकी विविधता में निहित है, इस भाव को उन्होंने मजबूत किया।
2019 बैच की, रेना जमील की आईएएस के मुकाम तक पहुंचने की कहानी भी संघर्ष और धैर्य की मिसाल है। धनबाद, झारखंड में पिता मैकेनिक थे। आठवीं तक ही मां की भी पढ़ाई थी और खुद उनकी शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई। यूपीएससी की ओर रुझान बढ़ा तो पहले प्रयास में सन् 2016 में इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस मिली। दूसरे प्रयास में प्रारंभिक भी पास नहीं कर पाईं। लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा और अंतत: तीसरी बार में आईएएस बनने का सपना पूरा किया।
इतना किया, सोनवानी के बच्चों पर भी रहम कर देते !
सीजी पीएससी 2021 भर्ती घोटाले में क्या सिर्फ नाममात्र की गड़बडिय़ां थीं? क्या केवल तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों का चयन ही गलत था और बाकी सभी नियुक्तियां पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता पर थीं? अगर ऐसा ही था, तो फिर पूरे प्रदेश में इतना बड़ा राजनीतिक तूफान क्यों खड़ा किया गया? चुनावी मंचों से लेकर सीबीआई जांच तक जिस मामले को युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी लूट बताया गया, वह दो चार रिश्तेदारों तक सिमटकर कैसे खत्म हो गया?
सीजी पीएससी में दो सौ के आसपास पदों के लिए लाखों युवा अपनी जवानी झोंक देते हैं। गांवों के गरीब घरों से लेकर शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों तक, अभ्यर्थी वर्षों तक किताबों में सिर खपाते हैं। लेकिन 2021 की चयन सूची सामने आते ही ऐसा लगा जैसे प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि सत्ता, पहुंच और रिश्तेदारी का बंद कमरा खुल गया हो। लोगों ने देखा कि कई मलाईदार पद प्रभावशाली अफसरों, नेताओं और रसूखदार परिवारों के बच्चों से भर गए हैं।
पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर ने सबसे पहले दो दर्जन से ज्यादा संदिग्ध नाम सार्वजनिक किए। वे मामले को हाईकोर्ट ले गए। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और विधानसभा चुनाव सिर पर था। मामला धीरे-धीरे इतना विस्फोटक बन गया कि भाजपा ने इसे चुनावी हथियार बना लिया।
तत्कालीन सीजी पीएससी चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी, जो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सचिव भी रह चुके थे, आरोपों की गोलाई में आए। सीबीआई की जांच और चार्जशीट में दावा किया गया कि ऐसे सवाल तैयार कराए गए जिनके जवाब केवल चुनिंदा लोगों को ही पता हो सकते थे। पेपर लीक की गई, नियमों में बदलाव किया गया, रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने और चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने जो जतन करना था किया गया।
इसके बाद परिणाम में जो नाम सामने आए, उसने पूरे सिस्टम की साख हिला दी, जो 2003 से ही दरक रही थी। चेयरमैन साहब का बेटा नितेश सोनवानी डिप्टी कलेक्टर, भतीजा साहिल सोनवानी डीएसपी, बहू मीशा कोसले डिप्टी कलेक्टर और रिश्तेदार दीपा आदिल जिला आबकारी अधिकारी बन गए। तत्कालीन पीएससी सचिव जीवन किशोर ध्रुव आईएएस के बेटे सुमित ध्रुव को भी डिप्टी कलेक्टर बना दिया गया। बजरंग पॉवर वाले उद्योगपति श्रवण कुमार गोयल पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने बेटे शशांक गोयल और बहू भूमिका कटियार को डिप्टी कलेक्टर बनवाने के लिए 45 लाख रुपये रिश्वत दी। उनको भी बुक किया गया।
सीबीआई की लगभग 400 पन्नों की चार्जशीट में 29 आरोपी नामजद किए गए। इनमें पीएससी अधिकारी, कारोबारी, कोचिंग संचालक और चयनित अभ्यर्थी शामिल थे। टॉप-20 चयनितों में से 13 प्रभावशाली परिवारों से जुड़े पाए गए। बारनवापारा के जंगल में विशेष तैयारी कराई गई। और बताएं तो गवर्नर के सचिव अमृत खलखो के एक ही पते पर रहने वाले दो बच्चे एक ही बार में, एक ही परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर बन गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी आईपीएस अधिकारियों के बच्चे, कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदार और कई ताकतवर परिवारों के नाम सूची में मिले। यही वे नाम थे, जिन पर चुनाव अभियान के दौरान पूरे प्रदेश में सवाल उठे। मगर आज स्थिति यह है कि सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों को छोडक़र लगभग सभी को नियुक्ति और पोस्टिंग मिल चुकी है।
यहीं पर एक जरूरी सवाल खड़ा होता है। अगर बाकी सब पाक-साफ थे, तो फिर पूरे प्रदेश को यह क्यों बताया गया कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हुआ है? अगर चयन निष्पक्ष थे, तो चुनावी मंचों से लेकर टीवी डिबेट तक इसे बिग स्कैम क्यों कहा गया? बीजेपी के तमाम प्रवक्ताओं के चुनाव से पहले दिए गए बयानों को निकालें और आज सवाल करें, कि भाई सब फुस्स क्यों हो गया है। अगर केवल दो-चार लोग दोषी थे, तो फिर सीबीआई जांच, गिरफ्तारियां, छापेमारी और राजनीतिक भाषणों का इतना बड़ा तमाशा क्यों खड़ा किया था?
विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा ने युवाओं के गुस्से को राजनीतिक मुद्दा बनाया। सत्ता में आते ही मामला सीबीआई को सौंपा गया। शुरुआत में लगा कि अब पूरी परतें खुलेंगी। गिरफ्तारियां हुईं। सरकार ने जीरो टॉलरेंस का नारा दिया। लेकिन धीरे-धीरे जांच की धार कुंद पड़ती गई। मामला सिमटता गया। बड़े नाम गायब होते गए। और आखिर में कहानी वहीं आकर खत्म हुई, जहां अक्सर खत्म होती है। कुछ लोगों पर कार्रवाई, बाकी सब क्लीन।
सीबीआई कई संदिग्ध चयनितों के खिलाफ ठोस चार्जशीट तक पेश नहीं कर सकी। अदालत में पर्याप्त सबूत नहीं रखे जा सके। इसके बाद चयनित उम्मीदवार हाईकोर्ट पहुंचे। सरकार ने टालमटोल की, लेकिन हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जॉइनिंग देने का आदेश दे दिया। अब दो दिन पहले ज्यादातर चयनित अभ्यर्थी डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर बैठ चुके हैं। उसी तरह जैसे 2003 के पीएससी में गलत तरीके से चुने गए स्टे वाले अयोग्य लोग, काबिल पदों पर बैठे हैं। ईमानदार प्रतिभाशालियों का हक एक बार फिर लुट गया है।
वादा किया गया था कि यूपीएससी जैसी कड़ी और पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी। कहा गया था कि सीजी पीएससी का पूरा ढांचा बदला जाएगा। लेकिन आज तक न ठोस गाइडलाइन दिखी, न संरचनात्मक सुधार। पीएससी की विश्वसनीयता पहले से दांव पर थी, जो अब लगभग ध्वस्त हो चुकी है।
सीबीआई पर शक नहीं है। उसे कुछ मिला ही नहीं होगा। इतनी चालाकी से काम किया होगा कि गलत चयन के खिलाफ सबूत ही जुटाने में संस्था नाकाम रह गई हो। और यह पहली बार नहीं है। बिरनपुर हत्याकांड को भी चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव का बड़ा मुद्दा बनाया गया। कई सीटों पर राजनीतिक फायदा लिया गया। लेकिन बाद में सीबीआई जांच में मामला सांप्रदायिक नहीं, बल्कि आपसी विवाद का निकला।
नए वनबल प्रमुख को लेकर अटकलें तेज
प्रदेश में नए वनबल प्रमुख की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। मौजूदा वनबल प्रमुख वी. श्रीनिवास राव 31 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन अब तक नए प्रमुख की नियुक्ति के लिए डीपीसी की तारीख तय नहीं हो पाई है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सरकार फिलहाल चार पीसीसीएफ में से किसी एक वरिष्ठ अधिकारी को वन बल प्रमुख का अतिरिक्त प्रभार सौंप सकती है।
वनबल प्रमुख की नियुक्ति में अब केवल वरिष्ठता ही निर्णायक नहीं रह गई है। इसका उदाहरण मौजूदा प्रमुख वी. श्रीनिवास राव हैं, जिन्हें पांच पीसीसीएफ में सबसे जूनियर होने के बावजूद यह जिम्मेदारी दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बार जल्दबाजी में फैसला लेने के मूड में नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि श्रीनिवास राव के साथ 1989 बैच के पीसीसीएफ तपेश झा भी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में नए वनबल प्रमुख की दौड़ में लघु वनोपज संघ के एमडी अनिल साहू, कौशलेन्द्र कुमार और पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं। हालांकि 31 मई के बाद ओपी यादव भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं।
ओपी यादव फिलहाल एपीसीसीएफ हैं, लेकिन उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नति देने के लिए डीपीसी पहले ही हो चुकी है। संभावना जताई जा रही है कि 31 मई को ही उनके पीसीसीएफ पदोन्नति आदेश जारी हो सकते हैं।
दूसरी ओर, अनिल साहू सबसे वरिष्ठ दावेदार माने जा रहे हैं, लेकिन वे 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसी वजह से प्रशासनिक स्तर पर यह सुझाव भी सामने आया है कि फिलहाल किसी अधिकारी को अस्थायी तौर पर वनबल प्रमुख का प्रभार दिया जाए और जुलाई के बाद नियमित नियुक्ति की जाए। इससे पहले डीजीपी के मामले में भी ऐसा प्रयोग किया जा चुका है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार वन विभाग की इस अहम नियुक्ति को लेकर क्या फैसला करती है।
चीप रेंज की शराब चाहिए...
सुशासन तिहार चल रहा है। सीएम और सरकार के मंत्री, जिलों का दौरा कर जनसमस्याओं के निराकरण के लिए पहल कर रहे हैं। सभी 33 जिलों का प्रशासन तिहार में जुटा हुआ है। इसी बीच सुशासन तिहार में कुछ मांगे ऐसी भी आई है कि जो चर्चा का विषय बन गया है। मसलन, पिथौरा में ग्रामीणों ने आबकारी अफसरों को बकायदा ज्ञापन सौंपकर चीप रेंज की गोवा ब्रांड की शराब उपलब्ध कराने की मांग की है।
यह कहा गया कि शराब दुकानों में महंगी विदेशी शराब ही उपलब्ध है। जबकि ग्रामीण इलाकों में सस्ती शराब पसंद की जाती है। दरअसल, सरकार ने कांच की बोतल में शराब बेचने का नियम बनाया है। इसके चलते देशी शराब की आपूर्ति कम हो रही है। देशी शराब निर्माताओं ने प्लास्टिक की बोतल में शराब के लिए 31 मई तक का समय मांगा है। सरकार ने सहमति दे दी है। प्लास्टिक की बोतल के लिए बाटलिंग प्लांट लगाए जा रहे हैं। एक जून से देशी शराब प्लास्टिक की बोतल में उपलब्ध हो सकेगी। तब ग्रामीणों की शिकायतों का निराकरण भी हो जाएगा।
साव की टिप्पणी से हलचल
प्रदेश भाजपा कार्यसमिति में डिप्टी सीएम अरूण साव की एक टिप्पणी ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। साव ने कहा था कि भाजपा अब बनिया-जैन पार्टी नहीं रही, बल्कि उसकी स्वीकार्यता व्यापक हो चुकी है और देश के 73 फीसदी हिस्सों में पार्टी का विस्तार हो चुका है। उनकी इस टिप्पणी को लेकर संगठन के भीतर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। खासकर बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेता इसे गैरजरूरी टिप्पणी मान रहे हैं।
दरअसल, अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा को अक्सर बनिया-जैन पार्टी कहकर निशाना बनाते थे। उस समय सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे और लखीराम अग्रवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। सरकार जाने के बाद भी पार्टी की यह छवि लंबे समय तक बनी रही। हालांकि भाजपा को केवल बनिया-जैन पार्टी ही नहीं, बल्कि सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी के तौर पर भी देखा जाता रहा, जहां ओबीसी और दूसरे वर्गों को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा होती थी।
महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार को कभी सेठजी-भट्टजी की सरकार कहा जाता था। शरद पवार ने उस दौर में मुख्यमंत्री मनोहर जोशी पर लगातार जातीय समीकरणों को लेकर निशाना साधा था। इसके बावजूद मौजूदा समय में देवेन्द्र फडणवीस जैसे ब्राह्मण नेता मराठा बहुल महाराष्ट्र में लंबे समय तक प्रभावशाली बने रहे। इससे परे पिछड़े तेली समाज से आने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने ओबीसी और अन्य वर्गों में भी मजबूत पकड़ बनाई।
छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन की कमान समय-समय पर ताराचंद साहू, लखीराम अग्रवाल, डॉ. रमन सिंह, शिवप्रताप सिंह, विष्णुदेव साय, धरमलाल कौशिक और अरूण साव जैसे नेताओं के हाथों में रही है। रमन सरकार के दौरान बनिया-जैन समाज से आने वाले बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और गौरीशंकर अग्रवाल जैसे नेता कैबिनेट मंत्री और स्पीकर रहे। आबादी के अनुपात में इस समाज को मिले बड़े प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सवाल भी उठते रहे, लेकिन इन नेताओं की संगठन और सरकार में मजबूत पकड़ तथा स्वीकार्यता के कारण यह मुद्दा ज्यादा नहीं उभरा।
अब हालात बदल चुके हैं। मौजूदा सरकार में बनिया समाज से अकेले राजेश अग्रवाल मंत्री हैं, जबकि संगठन में दूसरे वर्गों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। ऐसे माहौल में अरूण साव की टिप्पणी ने पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेताओं की नाराजगी भी सामने आ रही है। उनका कहना है कि पार्टी को खड़ा करने और विस्तार देने में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में कांग्रेस की पुरानी टिप्पणियां एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
देखें छत्तीसगढ़ के कितने अनुकरणीय
अब राज्यों में गुड गवर्नेंस या नवाचार के नाम पर सचिव के विभाग में रहते या कलेक्टर के जि़ले में पोस्टिंग रहते तक नहीं चलेंगे। उनकी कंटीन्यूटी के लिए भी केंद्र सरकार मेकेनिज्म बनाने जा रही है। इसके लिए पहले राज्यों में चल रही ऐसी योजनाओं या कार्यक्रमों को केंद्र ने मंगाया है।
केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी डॉ. टी वी सोमनाथन ने सभी केंद्रीय सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिव को एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सीलेंस को इंस्टीट्यूशनल बनाने और क्रॉस-स्टेट लर्निंग को बढ़ावा देने 'इनोवेटिव गवर्नेंस प्रैक्टिस' को डॉक्यूमेंट करने का निर्देश दिया है। नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी ) की अगुवाई में, इस स्टडी का मकसद देश भर में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की अलग-अलग सफलता की कहानियों को मॉडल के रूप में बदलना है।
भारत सरकार के सेक्रेटरी और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी को लिखे एक लेटर में, सोमनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑल इंडिया, सेंट्रल और स्टेट सर्विसेज़ में अधिकारियों का बहुत ज़्यादा अनुभव देश के लिए बहुत कीमती है। सभी अधिकारियों को आगामी 31 मई, तक अपनी एंट्री जमा करने के लिए कहा गया है। अधिकारी इंग्लिश, हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में नोट्स जमा कर सकते हैं। हालांकि फ़ॉर्मेट फ्लेक्सिबल है, लेकिन नोट्स टाइप किए हुए होने चाहिए (हाथ से लिखे नहीं) और ज़्यादा से ज़्यादा सात पेज के होने चाहिए। एंट्री पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के किसी भी एरिया को कवर कर सकती हैं, जिसमें आसान वर्कफ़्लो में बदलाव से लेकर बड़े डिजिटल बदलाव तक शामिल हैं। सरकार ने एक सख्त मल्टी-टियर वेटिंग प्रोसेस बताया है ताकि यह पक्का हो सके कि सिफऱ् सबसे असरदार प्रैक्टिस ही आर्काइव की जाएं।
एनसीजीजी पहले नोट्स की रेलिवेंस और इंपॉर्टेंस की जांच करेगा।सबमिशन में किए गए क्लेम का इंडिपेंडेंट वेरिफिकेशन किया जाएगा। कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में सीनियर अधिकारियों का एक हाई-लेवल पैनल फाइनल रिव्यू करेगा। चुनी हुई प्रैक्टिस को कैबिनेट सेक्रेटेरिएट और एनसीजीजी के ऑफिशियल पोर्टल पर साथियों के लिए रेफरेंस गाइड के तौर पर अपलोड किया जाएगा। यह पत्र महानदी भवन को भी मिला है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ से कितनी एंट्रियां जाती हैं और कितने एनसीजीजी की फेहरिस्त में शामिल होती हैं। क्योंकि यहां भी हर जिले में कई नवाचार चल रहे हैं और उन्हें अनुकरणीय बताया जा रहा है।
राजधानी के लिए कब तक होगी ईंधन की बर्बादी
छत्तीसगढ़ की राजधानी अटल नगर-नया रायपुर को विकसित हुए लगभग 20 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे न तो मंत्री और न ही अफसर राजधानी मानते हैं। पुरानी राजधानी रायपुर से नया रायपुर की 17 से 28 किलोमीटर है, जो एक्सप्रेसवे पर 30-45 मिनट का सफर है। रोजाना हजारों कर्मचारी, अधिकारी और मंत्रालयीन स्टाफ निजी वाहनों, सरकारी गाडिय़ों तथा काफिलों के साथ आना-जाना करते हैं। ईंधन संकट के इस दौर में भी इस बर्बादी को रोकन के का उपाय नहीं सोचा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और लोग पैनिक हो रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मितव्ययिता आह्वान पर अपने काफिले को कम किया है और सरकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने की घोषणा की है। मंत्रियों ने भी प्रतीकात्मक कदम उठाए, लेकिन निचले स्तर पर अफसरों से अभी काफी कुछ अमल कराना बाकी है। कुछ अफसरों ने साइकिल पर दफ्तर जाते हुए फोटो खिंचवाई है लेकिन जिनका घर दफ्तर से 25 किलोमीटर दूर हो, वह कैसे कर पाएगा।
इधर भाजपा के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल ने कहा है कि अधिकारियों को कार पूलिंग का निर्देश दिया जाए। हर रोज सैकड़ों गाडिय़ां 40-50 किमी राउंड ट्रिप करती हैं। यदि औसतन 10-12 किमी प्रति लीटर माइलेज मानें तो एक गाड़ी प्रतिदिन 5 लीटर ईंधन खपत करती है। हजारों वाहनों को जोडक़र देखें तो लाखों रुपये का ईंधन रोजाना बर्बाद हो रहा है।
वैसे समस्या की जड़ गहरी है। नया रायपुर में मंत्रालय, सचिवालय और अन्य सरकारी इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी पुराने रायपुर में ही रहते हैं। मंत्रियों का शिफ्ट होना हुआ, पर उनका स्टाफ और अफसर नहीं। आवासीय कॉलोनियों का विकास हुआ है, लेकिन आवंटन और रहना जरूरी नहीं किया। शाम होते ही नया रायपुर जगमगाती रोशनी के बीच घोस्ट सिटी बन जाती है। असल में पेट्रोल डीजल की खपत तब घटेगी जब आवंटित बंगलों, आवासों में अधिकारियों, कर्मचारियों को रहना अनिवार्य किया जाएगा। जिनको आवास नहीं मिले हैं, उन्हें जल्दी आवंटित किया जाना चाहिए। तब तक कार पूलिंग जरूरी करना चाहिए। जिन अफसरों को फिर भी अपनी गाड़ी से ही 50 किलोमीटर आना जाना हो, उनके इंधन और गाड़ी का खर्च सरकार मत उठाए। अधिकारियों, कर्मचारियों के फेडरेशन ने वर्क फ्रॉम होम का सुझाव दिया है, या कहें मांग रखी है। मगर, बहुत सी फाइलें अब भी डिजिटल नहीं हैं, सरकारी दफ्तरों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है जो कर्मचारी- अधिकारी से मिलकर ही संतुष्ट हो पाते हैं। पर, सप्ताह के कुछ दिनों के लिए लागू हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आजमाया जा सकता है कि किन कामों को घर से किया जा सकता है। इन सबके बीच, छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से नवा रायपुर, काम के लिए आने वालों की परेशानी कम नहीं हुई है। वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर इनकी संख्या और स्टापेज कम हैं। इनके लिए नि:शुल्क और रियायती बसें अधिक संख्या में होनी चाहिए। बैटरी चलित बसों का छत्तीसगढ़ के कई शहर इंतजार कर रहे हैं। घोषणा पूरी ही नहीं हुई है।
अगली पीढ़ी की बारी?
प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर चुनावी गतिविधियां शुरू हो रही हैं। चुनाव सीनियर कांग्रेस का नहीं, बल्कि युवक कांग्रेस के पदाधिकारियों का होना है। इसमें पार्टी के सीनियर नेता भी खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं। चर्चा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपनी पसंद के युवा चेहरे को बैठाने के लिए मंथन कर रहे हैं।
युवक कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष आकाश शर्मा और उनकी टीम का कार्यकाल खत्म हो रहा है। जल्द ही चुनाव प्रक्रिया शुरू होने वाली है। आकाश शर्मा भी निर्वाचन के जरिए ही अध्यक्ष बने थे। चर्चा है कि युवक कांग्रेस चुनाव को लेकर देवेन्द्र यादव खास दिलचस्पी ले रहे हैं। आकाश शर्मा को भी उनका करीबी माना जाता है।
सुनत हैं कि देवेंद्र यादव, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वर शरण सिंहदेव (आदी बाबा) को युवक कांग्रेस का चुनाव लड़ाने के लिए प्रयासरत हैं। चर्चा है कि इस सिलसिले में उन्होंने टीएस सिंहदेव से बातचीत भी की है। बताया जाता है कि सिंहदेव ने कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सहमति होने पर ही आदित्येश्वर शरण सिंहदेव को चुनाव लडऩे की अनुमति दी जाएगी। हालांकि भूपेश बघेल ने अब तक अपने इरादे साफ नहीं किए हैं। युवक कांग्रेस का चुनाव लडऩे के इच्छुक कई नेता उनसे मुलाकात कर रहे हैं।
इसी तरह नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत के पुत्र सूरज महंत को भी आगे लाने की कोशिशें चल रही हैं। पूरे घटनाक्रम पर महंत भी फिलहाल खामोश बताए जा रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य नेता पुत्र भी चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।
कमी नहीं फिर भी दिक्कत!
प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कमी का हल्ला है। सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ कर दिया है कि पेट्रोल-डीजल के स्टॉक में कोई कमी नहीं है। बावजूद इसके अफवाह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पेट्रोल-डीजल के लिए पंपों में गाडिय़ों की कतार देखी जा सकती है।
पेट्रोलियम कंपनियों का दावा है कि स्टॉक में कोई कमी नहीं है, तो सवाल उठ रहा है कि किल्लत क्यों है? पेट्रोल पंप डीलर्स कंपनियों पर तोहमत लगा रहे हैं। इन सबके बीच रायपुर कलेक्टर डॉ गौरव कुमार सिंह ने गुरुवार को बैठक रखी। बैठक में पेट्रोलियम कंपनियों और डीलर्स को आमने-सामने बिठाकर कमी पर चर्चा की गई। पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ किया कि स्टॉक में कमी नहीं है, जबकि डीलर्स ने कहा कि उन्हें मांग के अनुरूप पेट्रोल-डीजल उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
कंपनी प्रतिनिधियों की तरफ से यह भी कहा गया कि शहर में दोपहर के समय टैंकर नहीं पहुंच पाते हैं। इस पर कलेक्टर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अब टैंकर 24 घंटे पहुंचेंगे। इसके लिए उन्होंने यातायात पुलिस को भी निर्देश दिए।
चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि अफवाह के चलते लोग अधिक मात्रा में पेट्रोल-डीजल खरीद रहे हैं और इस वजह से स्टॉक जल्दी खत्म हो रहा है। कलेक्टर ने कंपनियों और डीलर्स को सख्त हिदायत दी कि किसी तरह की किल्लत नहीं होनी चाहिए।
दीपावली भेंट में मानहानि की नोटिस

अब तक अमुमन मानहानि के दावे, केस और वकील की नोटिस दलीय नेताओं, बड़े बिजनेस मैन के बीच होते सुनते और पढ़ते रहे हैं। आज हम सरकारी कर्मचारियों के बीच मानहानि नोटिस और उसके असर की जानकारी दे रहे हैं। राज्य मंत्रालय में खानपान से जुड़े एक विभाग से ऐसी ही खबर गलियारों में सुनी जा रही है। बड़े स्टाफ वाले इस विभाग के कर्मचारी अलग अलग विभागों में तबादले कराने लगे हैं। दरअसल बात कुछ छमाह से चल रही है। दीपावली के समय सौजन्य भेंट का विवाद, इस स्तर तक पहुंच गया है।
विभाग के निगम, और उसके काम में हिस्सेदार ठेकेदारों ने दीपावली पर भेंट दिया था। कर्मचारी कहते हैं कि यह भेंट अकेले एक ही अधिकारी ने रख लिया। इस संदेह के पीछे छिपा संदेश साहब तक पहुंचा। वे परेशान कि उधो का लेना न माधव का देना। बेवजह बदनामी का तनाव अलग। काफी पड़ताल के बाद साहब ने उन कर्मचारियों की फेहरिस्त बनाई जो यह प्रचार कर रहे थे। फिर वकील से संपर्क, सलाह ली। फिर क्या था एक दिन सूचीबद्ध कर्मचारी के हाथ मानहानि की नोटिस पहुंची। ऐसी नोटिस अभी प्रचार में शामिल अन्य के लिए भी स्पीड पोस्ट हो चुकी है। बस इसी से घबराए दुष्प्रचारक विभाग से तबादला कराने में सक्रिय हो गए हैं। इनके तबादले से प्रभावित दूसरे कर्मचारियों ने तहकीकात की तो पूरा खुलासा हुआ। अब वे ही कहने लगे हैं कि प्रचार करो जब पूरे तथ्य हों। वर्ना एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना ही बेहतर होगा।
एआई से बनी अखबार की कतरन

सोशल मीडिया पर इन दिनों पुराने अखबारों की ऐसी तस्वीरें खूब साझा की जा रही है, जिनको पहली असली लगती है। तस्वीर में अंग्रेजी अखबार द हिंदू की हेडिंग और 1967 की तारीख दिखाई गई है। इसमें एक बच्चे को मगरमच्छ पकडऩे वाला बहादुर बच्चा बताया गया है, जबकि बाद में उसे छिपकली निकाला जाना दर्शाया गया है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन और उनके पुराने दावों से जोडक़र व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
यह तस्वीर एआई से तैयार की गई फर्जी सामग्री है। तस्वीर में कई ऐसी कमियां हैं, जिनसे इसकी वास्तविकता आप तुरंत पकड़ सकते हैं। सबसे पहले, अखबार के डिजाइन और फॉन्ट का संतुलन पुराने द हिंदू के वास्तविक संस्करणों से मेल नहीं खाता। हिंदी और अंग्रेजी टेक्स्ट की शैली अलग-अलग और अस्वाभाविक है। कई जगह अक्षरों का आकार असमान है तथा शब्दों के बीच की दूरी भी अनियमित है,
इसके अलावा खबर के भीतर प्रयुक्त भाषा भी कृत्रिम और हास्य-प्रधान है, जबकि उस दौर में समाचार लिखने की शैली अधिक औपचारिक होती थी। तस्वीर में छपी कुछ छोटी हेडिंग और टेक्स्ट धुंधले तथा अर्थहीन नजर आते हैं। फोटो और लेआउट में भी अस्वाभाविक चमक है।
सांसद-विधायक कार्यकर्ताओं संग बिताएंगे रात
भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक गुरुवार को प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में आयोजित हुई। बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश विशेष रूप से मौजूद रहे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस भी मंच के बजाय आम सदस्यों के बीच बैठे नजर आए, जिसकी कार्यकर्ताओं के बीच काफी चर्चा रही।
कार्यसमिति में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में पार्टी की जीत पर चर्चा हुई तथा वहां प्रचार के लिए गए नेताओं को बधाई दी गई। इस दौरान शिव प्रकाश ने संगठन पदों को लेकर कार्यकर्ताओं को नसीहत देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को पद देना संभव नहीं है, लेकिन पार्टी के लिए निरंतर काम करते रहना चाहिए।
बैठक में जिला स्तर पर चिंतन शिविर आयोजित करने का फैसला भी लिया गया। इन शिविरों में सांसद, विधायक और संबंधित जिले के मंत्री शामिल होंगे। दो दिन तक जिला पदाधिकारी एक साथ रहकर संगठन, आगामी कार्यक्रमों, स्थानीय समस्याओं और आपसी विवादों पर मंथन करेंगे।
रायपुर जिले का चिंतन शिविर 23 और 24 मई को अग्रसेन धाम में प्रस्तावित है। इसमें सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल होंगे। खास बात यह रहेगी कि सांसद-विधायकों को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ रात्रि विश्राम करना होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन शिविरों से संगठन को लेकर क्या नए संकेत और फैसले सामने आते हैं।
टॉपर मॉडल का भय तोडऩे वाला रिजल्ट
बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।
श्रीनगर स्टेशन पर रुकी एक उम्र की यात्रा
पिछली बार आया था तो श्रीनगर तक रेल नहीं आई थी। इस बार श्रीनगर रेलवे स्टेशन को अपने कैमरे में सहेज कर साथ लेता आयाज् साथ में उसकी अनुभूति भी।
तस्वीर में बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार, 80 वर्षीय सतीश जायसवाल श्रीनगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं। सामने हिमालय की पहाडिय़ां हैं, ऊपर खुला आसमान और बीच में चमचमाती रेल पटरियां। सतीश के शब्द उस पीढ़ी की स्मृति है जिसने कश्मीर को कभी दूर, कठिन और लगभग दुरूह यात्रा की तरह देखा था। अभी इसी महीने कश्मीर रेल के जरिए देश के कोने-कोने से जुड़ रहा है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग या छत्तीसगढ़ के किसी छोटे शहर में बैठा एक साधारण यात्री अब यह सोच सकता है कि वह भी कुछ ही घंटों में श्रीनगर की वादियों तक पहुंच सकता है।
लगे हाथ इस नई सुविधा के बारे में आपको बताते चलें। जम्मू-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस शुरू हो चुकी है, दो ट्रेनें हैं। एक सुबह छूटती है दूसरी दोपहर में। शुरुआती दस दिनों में लगभग 45 हजार यात्रियों ने सफर किया। भीड़ इतनी है कि 20 कोच वाली दोनों ट्रेनें भी लगभग पूरी क्षमता से चल रही हैं।
इस ट्रेन से सफर करके लौटे एक पर्यटक का कहना है कि लंबी जोखिम सडक़ यात्रा भी नहीं करनी है, महंगी हवाई उड़ानों पर निर्भरता भी नहीं रही। जम्मूतवी से वंदे भारत ट्रेन लगभग पांच घंटे में यात्रियों को घाटी तक पहुंचा रही है। रास्ते में चेनाब और अंजी जैसे अद्भुत पुल मिलेंगे। लंबी सुरंगें और पहाड़ों के बीच रेल गुजरती है। मान लो कि यह यात्रा ही रोमांचक पर्यटन है।
कश्मीर हमेशा सुंदर था, लेकिन अब वहां तक पहुंचना भी सुंदर हो गया है।
लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत
छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सोमवार को बिलासपुर प्रवास के दौरान लगरा स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने आम नागरिकों की तरह अपनी ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी कराई। बिना किसी विशेष व्यवस्था के उन्होंने निर्धारित नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं और पांच वर्षों के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया।
दोपहर करीब दो बजे शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान डॉ. महंत ने अपनी बारी आने का इंतजार किया। इसके बाद उन्होंने फोटो खिंचवाने से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर तक की सभी जरूरी प्रक्रियाएं सामान्य आवेदक की तरह पूरी कीं। कुछ ही समय में उनका ड्राइविंग लाइसेंस अगले पांच साल के लिए रिन्यू हो गया।
काम पूरा होने के बाद उन्होंने आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों का सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सादगी और नियमों के पालन को लेकर चर्चा होती रही। डॉ. महंत ने अपने इस अनुभव को सोशल मीडिया पर भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि वे नियमों का पालन करें और अपने जरूरी दस्तावेज समय-समय पर अपडेट रखें। उन्होंने आरटीओ कार्यालय की व्यवस्था और कर्मचारियों के सहयोग की भी सराहना की।
कांग्रेस में बदलाव अगस्त से पहले या...
प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। इसी बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया है। वह बिलाईगढ़ गए थे और फिर रायगढ़ पहुंचकर कोयला खदान प्रभावितों से भी मिले। वह पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के घर जाकर मेल-मुलाकात भी कर रहे हैं। सिंहदेव की सक्रियता को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है। वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी रुचि प्रदेश अध्यक्ष बनने में है।
दीपक बैज का कार्यकाल अगस्त में खत्म हो रहा है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें बदला जा सकता है। सिंहदेव के दौरों को इससे जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा है कि सिंहदेव यूं ही सक्रिय नहीं हुए हैं। करीब दो माह पहले उनकी राहुल गांधी से डेढ़ घंटे तक अकेले में चर्चा हुई थी। इसके बाद ही वह ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे।
हालांकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पूर्व सीएम की दखल के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बालोद विधायक संगीता सिन्हा की नियुक्ति हुई। जबकि टीएस सिंहदेव ने पूर्व विधायक छन्नी साहू का नाम आगे बढ़ाया था। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व सीएम की ओर से अभी कोई नया नाम सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि वह पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। फिलहाल नई नियुक्ति तक कांग्रेस में खींचतान जारी रहने के आसार हैं।
घोटाले जब लोक अदालत जाने लगें...
सन् 2003 के सीजी पीएससी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुलह की पहल ने वंचित याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पुराने जख्म फिर कुरेद दिए हैं। यह याद रखना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पहले लोक सेवा आयोग के खिलाफ जो फैसला दिया था, उसके पीछे साफ-साफ भर्ती घोटाला पाया जाना था। अदालत में यह साबित हुआ था कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई, अंकों में हेराफेरी हुई, अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और पात्र उम्मीदवारों को या तो चयन से बाहर कर दिया गया या फिर छोटे पदों पर समायोजित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्केलिंग प्रक्रिया को दोबारा निर्धारित करते हुए पूरी चयन सूची नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन इस फैसले पर अमल हो पाता, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से उन अभ्यर्थियों को स्थगन मिल गया, जिनकी स्थिति नई चयन सूची बनने के बाद प्रभावित हो रही थी। कई लोगों को निचले पदों पर जाना पड़ता या चयन सूची से बाहर होना पड़ता। सन् 2007 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक अंतिम फैसला नहीं आ सका है।
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर उस समय सवाल उठे थे, वे सवाल आज भी कायम हैं। कई अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बन चुके हैं। कुछ जिलों में कलेक्टर हैं तो कुछ मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी, जो खुद को वंचित मानते हैं, छोटे पदों पर वर्षों से सेवा कर रहे हैं। उनकी सेवा अवधि अब इतनी हो चुकी है कि वे चाहें तो वीआरएस लेकर पेंशन के हकदार बन सकते हैं।
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से लोक अदालत का सुझाव सामने आया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है, लोक सेवा आयोग ने की है या फिर किसी पक्षकार ने इसका सुझाव दिया है। लेकिन मूल याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उनका कहना है किहमें सुलह नहीं, न्याय चाहिए।
दिलचस्प बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में थी और यह लगभग तय माना जा रहा था कि फैसला सीजी पीएससी के खिलाफ जाएगा, तब भी आयोग की ओर से समझौते की पेशकश की गई थी। जिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे डिप्टी कलेक्टर पद के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें याचिका वापस लेने की शर्त पर वही पद देने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उस समय भी याचिकाकर्ताओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्हें कथित भ्रष्ट चयन प्रक्रिया ने बाहर कर दिया।
वैसे, लोक अदालत में भी न्याय ही होता है। वहां दोनों पक्षों की सहमति से समाधान निकलता है और तभी आदेश पारित होता है जब सभी पक्ष संतुष्ट हों। लेकिन यदि इस मामले में लोक अदालत के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाता है, तो उसकी शक्ल क्या होगी?
एक संभावना यह हो सकती है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा की बची हुई अवधि के लिए वही अवसर दिया जाए, जो हाईकोर्ट के फैसले से पहले प्रस्तावित था। इसके लिए राज्य शासन और लोक सेवा आयोग दोनों की सहमति जरूरी होगी।
दूसरा सवाल उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों को लेकर है, जिन्होंने कथित रूप से गलत आधार पर चयन किया। क्या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की बात भी समझौते का हिस्सा होगी? अब तक वे कानून के शिकंजे से लगभग बाहर ही रहे हैं।
सबसे जटिल प्रश्न उन अधिकारियों को लेकर है, जो वर्षों से कथित गलत चयन के आधार पर सेवा लाभ लेते रहे हैं। क्या उन्हें पद से हटाया जाएगा? क्या पदावनत किया जाएगा? व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन और जोखिम भरा कदम होगा। संभव है कि लोक अदालत में वे पक्षकार ही न हों, और यदि कोई प्रतिकूल निर्णय हुआ तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
ऐसे में समझौते का स्वरूप शायद कुछ ऐसा हो सकता है, अतीत को पीछे छोडक़र भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करो। जिन अभ्यर्थियों को पीडि़त माना जा रहा है, उनकी सेवा के अभी भी कुछ वर्ष शेष हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर ले लिया जाए। लेकिन क्या उन्हें एरियर सहित पिछला वेतन, वरिष्ठता और पेंशन गणना का लाभ भी मिलेगा? स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।
एक बड़ा सवाल और भी खड़ा होता है, क्या सरकारी भर्तियों में हुए घोटालों का समाधान लोक अदालत के जरिए किया जा सकता है? यदि सीजी पीएससी-2003 मामले में लोक अदालत कोई रास्ता निकालने में सफल होती है, तो फिर क्या सीजी पीएससी-2021 में हुए घोटाले के लिए भी ऐसे ही समाधान का रास्ता निकल जाएगा?
मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?
ईडी ने अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की जांच तेज कर दी है। ताजा खबर यह है कि जांच एजेंसी ने बैंक के आधा दर्जन ऐसे खातों का पता लगाया है, जिनमें करोड़ों का लेनदेन हुआ है। इन खातों का ब्यौरा मांगा गया है। यह भी जानकारी सामने आई है कि बैंक से जुड़ी शाखाओं में वर्ष 2013-14 से गड़बड़ी शुरू हो गई थी और करीब 10 साल बाद इसका खुलासा हुआ।
बताते हैं कि बैंक में करोड़ों की गड़बड़ी की जानकारी विभाग के आला अफसरों को पहले से थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस ने धोखाधड़ी के प्रकरण में बैंक अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, तब जाकर राज्य स्तरीय जांच टीम बनाई गई। यह टीम कई बार अंबिकापुर गई, लेकिन गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी नहीं जुटा पाई। अब ईडी ने जांच शुरू की है, तो राज्य स्तरीय जांच टीम से भी पूछताछ हो सकती है।
भारतमाला परियोजना में राज्य की एजेंसी ने पहले छोटी मछलियों पर ही कार्रवाई की थी, लेकिन ईडी ने कई बड़े लोगों को भी घेरे में लिया, जो अब तक जांच से बचे रहे थे। हालांकि बैंक घोटाले में अभी तक ईडी की ओर से कोई नई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन चर्चा है कि कई प्रभावशाली लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
छत्तीसगढ़ की गलती केरल में दोहराती कांग्रेस
पांच राज्यों के नतीजे आए एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके, शपथ-ग्रहण भी हो चुका, लेकिन एक राज्य, केरल जहां कांग्रेस को सरकार बनानी है, अभी तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल नहीं हुआ है। वैसे तो वहां के विधायक दल ने कांग्रेस हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया है, पर विधायकों के तीन गुट हैं, जो अलग-अलग नामों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि समर्थक शक्ति प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अतीत से पता चलता है कि ऐसे मामले में भारतीय जनता पार्टी के उलट कांग्रेस हाईकमान मजबूती से और जल्दी फैसला नहीं ले पाता। सन् 2018 में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई तो पार्टी नेतृत्व के सामने यही संकट था। अंत में दोनों दावेदारों को ढाई-ढाई साल का टर्म देने की बात हुई। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया था और सिंहदेव अपने टर्म के लिए हाईकमान के फैसले की प्रतीक्षा करते रहे। बघेल खेमे को दिल्ली में विधायकों की परेड कर बताना पड़ा कि बहुमत उनके साथ है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डी. शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल का समझौता हुआ, प्रचारित था, पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं है और शिवकुमार के समर्थकों में असंतोष देखा जा रहा है। केरल में अजीब स्थिति है। यहां ढाई-ढाई साल की सांत्वना से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यहां तीन दावेदार हैं। पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे बीडी सतीसन, वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आईयूएमएल ने सतीसन के नाम का समर्थन किया है, लेकिन उन्हें वेणुगोपाल के नाम पर आपत्ति है। उसका कहना है कि उन्होंने तो विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस समय वे सांसद हैं। मगर, दिलचस्प यह है कि केरल में अधिकांश टिकट वेणुगोपाल ने ही फाइनल किए हैं, और 40 से अधिक विधायक उन्हें सीएम बनाना चाहते हैं। कांग्रेस यहां 63 सीटों पर विजयी रही, गठबंधन के साथ उसे 102 सीटें मिली हैं।
याद कीजिए सन् 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया। सीएम बनने की कतार में जिन नामों की चर्चा थी, उनको भी निराश होना पड़ा। उसके पहले के लोकसभा चुनाव में सारे सीटिंग सांसदों की टिकट काट दिया था। पर, कांग्रेस के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार होने के दौरान छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई ने एक दूसरे को निपटा दिया। ऐसा ही कुछ ढुलमुल रवैया कांग्रेस हाईकमान का मध्यप्रदेश और राजस्थान के मामले में देखा गया। मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे कर दिया, जबकि वे सीएम के दावेदार थे। उनके समर्थक विधायकों ने मिलकर सरकार ही गिरा दी। सन् 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक झटके में शिवराज सिंह चौहान के टर्म को समाप्त कर दिया, मगर सिंधिया को भी मौका नहीं दिया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बीच में तो नहीं गिरी, पर छत्तीसगढ़ की तरह 2023 के चुनाव में गिर गई। यहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जबरदस्त खींचतान है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मामले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, अभी अगला विधानसभा चुनाव दूर है। दरअसल, कांग्रेस के पास यह समस्या तब से है, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है। प्रदेश के असंतुष्ट नेताओं को वैकल्पिक किसी बड़े ओहदे में बिठा देने का विकल्प नहीं है।
जब रायपुर की बैलगाडिय़ों में भरती थी ‘हवा’

एक ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद कहानी समझे ( गोकुल सोनी )
आज मैं आपको रायपुर का एक ऐसा किस्सा सुनाना चाहता हूं, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद सुनकर हंस भी दे और हैरान भी हो जाए।
जब महापौर जीप में बैठकर करते थे शहर का दौरा...........
सत्तर के दशक की बात है। उन दिनों तरुण दादा एक बार पहले भी रायपुर के महापौर रह चुके थे। शायद तब महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का हुआ करता था। उसी दौर में आर.एन. मूर्ति जी और स्वरूपचंद जैन जी भी महापौर बने थे। उस समय नगर निगम के पास एक पेट्रोल से चलने वाली सफेद रंग की जीप हुआ करती थी। तरुण दादा उसी जीप में सामने बैठकर पूरे शहर का दौरा किया करते थे।
आज की तरह न बड़ी-बड़ी गाडिय़ों का काफिला होता था और न चमक-दमक। शहर छोटा था, लोग सीधे थे और काम भी धीरे मगर टिकाऊ होता था।
जब सडक़ बनाना किसी तपस्या से कम नहीं था..........
आज तो रातों-रात मशीनें आकर सडक़ बना देती हैं। लेकिन उस समय एक किलोमीटर सडक़ बनने में तीन-चार दिन लग जाते थे।
सडक़ किनारे भ_ी बनाई जाती थी। उसमें लकडिय़ां जलती रहती थीं। ऊपर डामर के खाली ड्रम को काटकर बड़ी कढ़ाई जैसी बनाई जाती थी, जिसमें डामर पिघलाया जाता था।
फिर मजदूर रेत, गिट्टी और डामर का घोल तैयार करते और हाथों से सडक़ बिछाते थे। बाद में स्टीम इंजन वाली भारी-भरकम रोड रोलर उसे दबाकर समतल करती थी। उस दौर में सडक़ बनाना केवल काम नहीं, मेहनत और धैर्य का इम्तिहान था।
बैलगाडिय़ां बनीं नई समस्या............
चूंकि सडक़ें इतनी मेहनत से बनती थीं, इसलिए उनकी देखरेख भी बहुत जरूरी मानी जाती थी। उसी समय शहर में बड़ी संख्या में बैलगाडिय़ां चलती थीं। खासकर गुढियारी के थोक बाजार से सामान दुकानों तक पहुंचाने के लिए हमाल और व्यापारी बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करते थे।
उन बैलगाडिय़ों के पहियों पर मोटे लोहे का पट्टा चढ़ा होता था, जिसे छत्तीसगढ़ी में च्च्बाटज्ज् कहते हैं। यही लोहे की बाट नई डामर वाली सडक़ों को जल्दी खराब कर देती थी। अधिकारियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।
बैलगाड़ी बंद करें या लोगों की रोजी बचायें ?.............
कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि शहर में बैलगाडिय़ों के चलने पर रोक लगा दी जाए। लेकिन परेशानी यह थी कि सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी उन्हीं बैलगाडिय़ों पर टिकी थी। उन्हें बंद करना आसान नहीं था।
फिर किसी ने एक अनोखा सुझाव दिया — क्यों न बैलगाड़ी के पुराने लकड़ी और लोहे वाले पहियों की जगह ट्रक के टायर लगा दिए जाएं ? बस, यहीं से रायपुर में एक नया प्रयोग शुरू हुआ।
नगर निगम के सामने लग गई भीड़..........
नगर निगम से आदेश निकला कि जिसके पास भी बैलगाड़ी है, वह अपना पंजीयन कराए। फिर क्या था, नगर निगम कार्यालय के सामने बैलगाड़ी वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने गाड़ों का रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचे।
धीरे-धीरे पुरानी लोहे की बाट वाले पहिए हटाए गए और उनकी जगह ट्रक के टायर वाले पहिए लगाए जाने लगे। उस समय रायपुर की सडक़ों पर बैलगाड़ी और ट्रक के टायर का यह अनोखा मेल लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया था।
जब बैलगाड़ी में भी भरती थी हवा..........
अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए, एक तरफ बैलगाड़ी खड़ी है, सामने बैल बंधे हैं और दूसरी तरफ पंचर दुकान वाला मशीन से उसके टायर में हवा भर रहा है। आज यह सुनने में सामान्य लगेगा, लेकिन उस समय यह दृश्य इतना अनोखा था कि लोग रुक-रुककर देखते थे।
जब मैं नया-नया फोटो जर्नलिस्ट बना था, तब मैंने पहली बार ऐसा दृश्य देखा। देखा तो पहले भी था तब एक फोटोजर्नलिसट का नजरिया नहीं था। मुझे वह इतना अलग लगा कि मैंने तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली। बाद में वह फोटो नवभारत अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।
धीरे-धीरे खत्म हो गया वह दौर............
फिर समय बदला। शहर में तीन पहिया ऑटो आये, मेटाडोर आये और धीरे-धीरे ट्रक के टायर वाली बैलगाडिय़ां सडक़ों से गायब होने लगीं। बताते हैं कि कुछ साल पहले तक कन्हैया साहू नाम के एक गाड़ीवान ऐसी बैलगाड़ी चलाते दिखाई दे जाते थे। लेकिन उनके निधन के बाद रायपुर से यह दृश्य भी हमेशा के लिए खत्म हो गया।
अब केवल यादों में बची
हैं वे बैलगाडिय़ां..........
आज की पीढ़ी शायद यकीन भी न करे कि कभी रायपुर में ऐसी बैलगाडिय़ां चलती थीं जिनमें ट्रक के टायर लगे होते थे और पंचर दुकानों पर उनमें हवा भरी जाती थी। लेकिन यही तो पुराने रायपुर की खूबसूरती थी। यह शहर हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा किस्सा छुपाकर बैठा है, जिसे सुनते ही पुराना दौर आंखों के सामने चलती तस्वीर की तरह जीवंत हो उठता है।
पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर
गरियाबंद के माडागांव के समाधान शिविर में पीएम आवास के लिए एक कमार दंपत्ति ने जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैर पकडक़र गुहार लगाई, तो हडक़ंप मच गया। इसकी खबर सोशल मीडिया के जरिए सीएम हाउस तक पहुंची, तो मामले को संज्ञान में लिया गया। कमार जनजाति राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं। जब कमार दंपत्ति ने प्रखर चंद्राकर के पैर पकड़े, तो वो हड़बड़ा गए। प्रखर धमतरी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने तुरंत इसकी पड़ताल करवाई। यह पता चला कि परिवार का नाम पूर्व के आवास सर्वे में शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि वे लंबे समय तक उड़ीसा में निवासरत थे।
यह बात सामने आई, कि वर्ष 2011, 2018 और 2024 के सर्वेक्षण के दौरान भी परिवार गांव में मौजूद नहीं था। हाल ही में परिवार के छत्तीसगढ़ लौटने के बाद पीएम जनमन योजना के तहत उनका सर्वे पूरा कर लिया गया है और जल्द ही आवास स्वीकृत करने का भरोसा दिलाया गया।
चूंकि सीएम हाउस ने मामले को संज्ञान में लिया, तो प्रशासन ने समाधान शिविर में परिवार का राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी बना दिए। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अफसरों ने परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। परिवार को तुरंत राहत देने की कोशिश की गई।
व्यापारी कल्याण बोर्ड को लेकर हलचल
पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब प्रदेश के निगम-मंडलों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की चर्चा तेज हो गई। इन्हीं में व्यापारी कल्याण बोर्ड के गठन की भी तैयारी है। भाजपा के संकल्प पत्र में व्यापारी वर्ग के लिए बोर्ड के गठन का वादा किया गया था। अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए व्यापारी नेताओं में होड़ मची है।
भाजपा के कई व्यापारी नेता अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में उन्हें भी बोर्ड अध्यक्ष के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, पार्टी के दो पूर्व विधायक लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी की भी दावेदारी है। दोनों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली थी।
यही नहीं, कई और व्यापारी नेताओं के नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें सुभाष अग्रवाल, और सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा का नाम भी लिया जा रहा है। बरलोटा चैम्बर के अलग-अलग पदों पर रहे हैं। इन सबके बीच निगम मंडलों में उपाध्यक्ष, और संचालक मंडल के सदस्यों के पदों पर भी नियुक्तियां हो सकती हैं। ऐसे करीब सौ से अधिक पद रिक्त हैं जिन पर नियुक्तियां होनी है। नामों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। देखना है सूची कब तक जारी होती है।
स्टेशनों से मिटेंगे अंग्रेजों के निशां मगर...
एक तरफ सरकार घर घर से ऐतिहासिक पांडुलिपियां, और सनातनी प्रतीक चिन्हों के संग्रह का देशव्यापी अभियान छेड़े हुए है और दूसरी ओर
मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के रखे गए नाम बदलने, उनके बनाए गए भवनों को तोडऩे का सिलसिला जारी रखे हुए है। राजभवन को लोक भवन किया जा चुका है तो अब सिविल लाइन बदलने वाला है। इस श्रृंखला में रेलवे ने भी अपने कदम बढ़ाएं हैं। वह भी मोस्ट अर्जेंटलि।
रेलवे बोर्ड ने देशभर के सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल के बीएनआर (बंगाल नागपुर रेलवे)रेलवे के उन तमाम प्रतीकों, प्रथाओं और अवशेषों को हटा दिया जाए, जो गुलामी की याद दिलाते हैं। इसके बाद से रेलवे का हर छोटा- बड़ा कर्मचारी -अधिकारी निशां ढूंढने में जुट गया है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन के रेलवे स्टेशनों में वैसे तो ऐसे निशां नहीं के बराबर हैं। जो है उसे हटाने के लिए तोड़ा जाना होगा। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर स्टेशन भवन की। यह स्टेशन बिल्डिंग लगभग 135 से 137 साल पुरानी है, जिसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान 1889-1890 में हुआ था। कुछ इतना ही नागपुर स्टेशन भी इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन भी बिलासपुर जोन में आता है। पूर्व के वर्षों में इन पुरानी इमारत को अभी भी एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की भी योजना रेलवे ने बनाई थी। अब तोडऩे का तो नहीं अंग्रेजों की यादें मिटाने का आदेश आया है। निकट भविष्य में तोड़ा नहीं जाता है तो अमृत भारत स्टेशन योजना में स्वरूप बदला जाएगा। रायपुर स्टेशन में भी प्लेटफार्म नंबर एक के दाहिने सिरे में रेल डाक दफ्तर के पास अंग्रेज़ों का बनाया एक छोटा सा केबिन हुआ करता था।जो रेल मंडल बनने के बाद प्लेटफॉर्म विस्तार में तोड़ दिया गया था। इसके अलावा यहां कोई निशान बाकी नहीं रह गए हैं। अब यह सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि निशां मिटाने के बाद अफसरों से अंग्रेजियत मिट पाएगी। इससे सहमत, असहमत होकर रेलवे बोर्ड के इस आदेश की जानकारी शेयर करने वाले एक अफसर ने कहा कि रेलवे अब ब्रिटिश विरासत के बोझ से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।
सरकारी छात्रावास का ऐसा प्रचार
सरकारी मदद से चलने वाले संस्थानों का इस तरह का प्रचार कम ही देखने को मिलता है। बिलासपुर के आदिवासी विकास विभाग ने अपने छात्रावासों में दाखिले का रंग बिरंगा पर्चा कराया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि छात्रावासों में साफ-सुथरा भवन, लगातार बिजली, बिस्तर की पूरी व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अलग कमरा, अच्छा खाना, खेलकूद, योग, संगीत और कला जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी मुफ्त मिलेगा।
इतना ही नहीं, पर्चों में अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं, ताकि छात्र-छात्राएं सीधे संपर्क कर प्रवेश ले सकें। अच्छी पहल लगती है। अगर सचमुच छात्रावासों में ऐसी सुविधाएं मिलें, तो बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह राहत की बात होगी। कौन पालक नहीं चाहेगा, यहां उनके बच्चों को मौका मिल जाए। फिर, अगर कोई कमी भी रही, तो छात्र सीधे शिकायत भी कर सकेंगे, क्योंकि विभाग ने खुद इन सुविधाओं का वादा किया है।
लेकिन इस पूरे प्रचार का दूसरा मतलब भी निकल जाता है। सवाल है कि क्या सरकारी छात्रावासों में अब पर्याप्त संख्या में छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों की तरह आदिवासी छात्रावासों में भी बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। कल इनको भी बंद नहीं करना पड़ जाएगा?
याद कीजिए, पिछले दो साल में कई सरकारी स्कूल- जिनमें शहरी स्कूल, आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूल भी थे-यह कहकर बंद कर दिए गए कि वहां बच्चों की संख्या कम हो गई है। यदि सरकारी स्कूल भी इसी तरह लोगों को बुलाते नजर आते, हमारे यहां आइए, अच्छे शिक्षक हैं, बढिय़ा भवन है, खेल का मैदान है, अच्छी पढ़ाई होती है, तो शायद उनको बंद करने की नौबत नहीं आती।
पुराना वीडियो, नया हंगामा
एमसीबी जिले के कांग्रेस नेता और चिरमिरी के पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बना है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो। वीडियो में वे सडक़ पर कार की बोनट पर केक काटते नजर आ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे वीडियो सामने आते ही पुलिस तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है, खासकर तब से जब हाईकोर्ट ने सडक़ पर केक काटने और सार्वजनिक जगहों पर हुड़दंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
लेकिन इस मामले में कहानी थोड़ी अलग है। डॉ. जायसवाल खुद थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि वायरल किया जा रहा वीडियो नया नहीं, बल्कि साल 2021 का है। इसे हाल का बताकर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तारीख का वीडियो बताया जा रहा है, उस दिन वे शिर्डी में थे, जिसके सबूत हैं उनके पास।
डॉ. जायसवाल का तर्क है कि सडक़ पर केक काटने जैसे मामलों पर सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश हाईकोर्ट ने साल 2025 में दिए। अदालत के निर्देश आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया।
हो सकता है उनका स्पष्टीकरण सही हो। उन्होंने भी खुद मान लिया है कि वीडियो 2021 का है। उस समय वे विधायक थे और संभव है कि समर्थकों के उत्साह में ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बने हों।
मगर, यह भी याद रखना चाहिए कि सडक़ पर इस तरह आयोजन करना 2025 से पहले भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन था। ट्रैफिक बाधित करना, सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति कार्यक्रम करना और शांति भंग करना, इन सबको लेकर कानून तब से मौजूद थे। फर्क सिर्फ इतना है कि बाद में जब पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के कई मामलों में कार्रवाई नहीं की, तब हाईकोर्ट को सख्त टिप्पणी कर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नसीहत दी गई।
तारीफ और महत्व
पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा खेमे में भी उत्साह का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा शनिवार को कोलकाता पहुंचे और नए सीएम सुवेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए।
समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। मंच पर विजय शर्मा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ठीक पीछे खड़े नजर आए। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने तंज कसते हुए पोस्ट किया कि बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले गृहमंत्री को मंच पर कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, पीएसओ की जगह खड़े हैं।
इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया। भाजपा समर्थकों ने पलटवार करते हुए लिखा कि बड़े नेताओं के भरोसेमंद लोग अक्सर मंच के पीछे रहकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तस्वीरों से ज्यादा अहमियत भूमिका की होती है।
इसी बीच विजय शर्मा की ओर से जारी एक वीडियो ने चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में सीएम विष्णुदेव साय, अरुण साव और विजय शर्मा, सुवेन्दु अधिकारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई देते नजर आ रहे हैं। इस दौरान सुवेन्दु अधिकारी, विजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं कि विजय ने नामांकन रैली में खूब मेहनत की है।
अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि जब मेहनत की खुलकर सराहना हो रही हो, तब मंच पर कौन बैठा और कौन खड़ा रहा, यह बहस ज्यादा मायने नहीं रखती।
ऑक्सीजन के जंगल पर विकास की कुल्हाड़ी
नवा रायपुर जाने के रास्ते के माना-तूता इलाके में फैला करीब चालीस-पैंतालीस बरस पुराना जंगल इन दिनों बेचैन है। जिन दरख्तों ने बरसों तक इस शहर को सांसें दीं, तपती हवाओं को थामा, मिट्टी को जिंदा रखा और परिंदों को आशियाना दिया, आज उन पर कुल्हाडिय़ां चल रही हैं। वजह है सरकार का महत्वाकांक्षी चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी और ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर प्रोजेक्ट। इसके लिए तकरीबन सौ एकड़ वन भूमि को विकास के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक डेढ़ सौ से दो सौ पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में लगभग पांच हज़ार और पेड़ों को गिराने की तैयारी है। रायपुर और नवा रायपुर के बीच मौजूद यह जंगल केवल हरियाली का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे शहर का ऑक्सीजन जोन माना जा सकता है। शहर जिस तेजी से सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा है, उस दौर में यह वन इलाका एक नेमत की तरह बचा हुआ है।
सरकार का कहना है कि चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ को मूवी प्रोडक्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनाएगी। परियोजना में अत्याधुनिक स्टूडियो, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जैसे सेट, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, होटल, कन्वेंशन सेंटर, मल्टीप्लेक्स और व्यापारिक ढांचे को विकसित किए जाने की योजना है। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को रोजगार और नए मौके मिलेंगे।
अब यहीं पर जो दूसरी परियोजना लाई जा चुकी है , वह है- ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर। उसका भी हिसाब छोटा-मोटा नहीं है। इस परियोजना को फिल्म निर्माण वाली चित्रोत्पला परियोजना से ही जोड़ा गया है। पर्यटन, संस्कृति और इनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों का विकास किया जाएगा।
दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 95 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। छत्तीसगढ़ सरकार को स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट, डेवलपमेंट ऑफ ग्लोबल लेवल ऑइकॉनिक टूरिज्म सेंटर्स योजना के तहत वित्तीय सहायता मिली है। चित्रोत्पला के लिए करीब 96 करोड़ और कन्वेंशन सेंटर के लिए 52 करोड़ की मदद केंद्र ने की है। हमारे आपके टैक्स की इतनी रकम खर्च होने के बावजूद यह पीपीपी, यानि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप मॉडल में है। पीपीपी वाले लोग इसे तैयार कर रहे हैं और यही लोग उन ग्रामीणों को धमका रहे हैं, जो जंगल काटने के विरोध में उतरे हैं। कह रहे हैं, जंगल को बर्बाद करने की हमको सरकार से मंजूरी मिली हुई है। नवा रायपुर में कितनी ही खाली जमीन पड़ी हुई है, वहां क्यों नहीं एलॉट किया?
छागल से अनजान पीढ़ी
इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे ‘छागल’ कहते थे। 4-5 दशक पहले ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था, और न कोई कैम्पर थे न मिल्टन की बोतलें थीं। गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था। गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था, जिसका सिरा एक और बोतल के मुंह जैसा होता था और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन, बस,जीप के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे,बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के अंदर भरे पानी को ठंडा करती थी। वो प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी। यह हमारे पूर्वजों की पानी की व्यवस्था थी। सबसे बड़ी बात यह है अगर रास्ते में किसी राहगीर ने छागल देखकर ठंडा पानी पीने के लिए मांग लिया तो कोई उसे मना नहीं करता था क्योंकि भीषण गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना ईश्वर की आज्ञा होती है। पानी खरीदा जा सकता है या बेचा जा सकता है-यह कल्पना भी नहीं थी। अब 20 रूपए में एक लीटर पानी खरीदने वाली पीढ़ी छागल को नहीं जानती। मल्टिनैशनल वाटर कंपनियों ने अपने कारोबार के लिए छागल के पानी को सेहत के लिए नुकसानदायक जो बता रखा है।
आईबी में गए आंजनेय वार्ष्णेय
छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अधिकारी आंजनेय वाष्र्णेय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। वर्ष-2018 बैच के आईपीएस वाष्र्णेयकी पोस्टिंग इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में हुई है। वे हाल तक सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी के रूप में पदस्थ थे और शुक्रवार को उन्हें रिलीव कर दिया गया।
आंजनेय वाष्र्णेय इससे पहले बीजापुर और धमतरी जिले के एसपी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद राज्य पुलिस महकमे में सीमित स्तर पर फेरबदल की चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि कोंडागांव जिले में भी एसपी का पद फिलहाल खाली चल रहा है। वहां एएसपी को एसपी का प्रभार दिया गया है, जबकि एसपी पंकज चंद्रा प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद गए हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कुछ जिलों के एसपी बदलने की संभावना जताई जा रही है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर जयदीप सिंह पहले ही आईबी में सेवाएं दे रहे हैं।
धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?
छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन जैसे ही चालू हुआ, शराब की दुकानों का माल खत्म हो गया। लोग भटक रहे हैं। बंधु, वित्तीय वर्ष बदल चुका है। अब इस मौके पर अफसरों ने सोचा नहीं कि ये शादी का भी सीजन है। बड़ी संख्या में बाराती भटक रहे हैं, चेहरे उतरे हुए हैं-क्या खाक डांस करेंगे।
सुशासन में शराब न मिले, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उन शराब प्रेमी रसूखदारों को छोड़ दें, जिनके पास अनाप-शनाप कमाई हैं, मगर आम जनता की हालत को महसूस करिये। परिवार में कलह का, हिंसा का, सडक़ों पर उत्पात का, सडक़ दुर्घटनाओं का कारण यही शराब बनती है।
इन दिनों अंग्रेजी के जान-पहचान वाले ब्रांड की केवल बोतल मिल रही है, लिटिल गायब है। लोग बार्टर करके खरीद रहे हैं, चार लोग मिलकर पौवा-पौवा बांट रहे हैं। देसी की तो बात ही छोड़ दीजिए, शटर गिरा हुआ है। अकेले रायपुर में रोजाना साढ़े 12 हजार पेटी का नुकसान। पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हर रोज 180 हजार पौवा। निर्माताओं और सरकार को मिलाकर रोजाना 50 करोड़ से ज्यादा की क्षत्ति।
सुशासन में कोई घोषित योजना नहीं थी कि शराब की किल्लत पैदा की जाएगी, मगर सुशासन दिख रहा है।
इस हालात को देखते हुए यह तो कह ही सकते हैं कि व्यक्ति परिस्थितिजीवी होता है। शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग जरूर इधर-उधर देसी-महुआ तलाश करते हुए भटकेंगे, बाकी ज्यादातर लोग घर में पत्नी और बच्चों के साथ दाल रोटी खाएंगे। शराब से बचे पैसे का बढिय़ा सा सप्लीमेंट खाना- चिकन, अंडा, आमलेट, चॉकलेट, आइसक्रीम वगैरह घर लेकर जाएंगे।
अब, असल में शराब की किल्लत क्यों खड़ी हुई, उसे समझ लेते हैं। सुशासन वगैरह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह नई आबकारी नीति 2026-27 का हिस्सा है। आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन ने इसे आर्थिक दक्षता और व्यवस्था में सुधार का कदम बताया है। प्लास्टिक बोतल अपनाने की वजह यह बताई गई है कि इससे कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकेगा। परिवहन के दौरान लोड कम पड़ेगा, तो भी खर्च कम होगा- क्योंकि प्लास्टिक बोतल हल्की होंगीं। बाकी राज्यों से तस्करी के जरिये जो दारू आती है, वह कांच की बोतलों में आती है, इससे सच का तुरंत पता चल जाएगा। दावा किया गया है कि इससे मिलावट के मामले भी कम मिलेंगे।
सरकार का तर्क सुनकर लगता है, जैसे किसी योगी ने अचानक संन्यास ले लिया हो। मगर, यह फेयर डिसीजन नहीं है। प्लास्टिक को बढ़ावा देने के सरकार के फैसलों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने एक याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लगाई है। सिंघवी की याचिका विशेषत: शराब की प्लास्टिक बोतलों को लेकर नहीं है, इस पर सुनवाई 13 मई को होने वाली है। मगर, प्लास्टिक वाली नई आबकारी नीति के खिलाफ ऋषि एंटरप्राइजेज ने सीधे-सीधे एक अलग याचिका दायर कर रखी है। पिछले एक अप्रैल को उसकी सुनवाई हुई थी, जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, पर सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके आगे का डेवलपमेंट अभी मालूम नहीं है। मामला लंबित है।
इधर, डिस्टिलरीज अलग ना-नुकुर कर रहे हैं। जैसे ही सरकार ने प्लास्टिक बोतलों का फरमान निकाला, खाली बोतलों की कीमत उत्पादक कंपनियों ने 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी। आबकारी नीति में प्रावधान किया गया है कि केवल फूड ग्रेड और रियूजेबल प्लास्टिक बोतल हों। बोतलें मजबूत भी हों और हल्की भी हों, ब्रैकेज प्रूफ हों। मैटेलिक कैप की अनुमति नहीं है, कैप भी प्लास्टिक की ही होनी चाहिए। ऋषि कंपनी ने जो हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, उसमें उनकी ओर से दावा किया गया है कि इतने कड़े नियम को फॉलो करना तो किसी शराब निर्माता के लिए संभव ही नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे रहे लोगों का की ओर से दावा यह भी किया गया है कि सालाना करीब 16 हजार टन प्लास्टिक कचरा छत्तीसगढ़ में बढ़ जाएगा, बोतल सिर्फ डस्टबिन में डालें, इस नियम का पालन शराब पीने वाला कोई आदमी नहीं करने वाला।
तो सुशासन में इस सूखे का आनंद लीजिए।
...कौन बनेगा नया वन प्रमुख?
वन विभाग के शीर्ष पद हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए प्रस्तावित डीपीसी अपरिहार्य कारणों से टल गई है। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी. श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उनके उत्तराधिकारी के चयन को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह पद मुख्य सचिव और डीजीपी के समकक्ष वेतनमान वाला होता है और परंपरा रही है कि सबसे वरिष्ठ पीसीसीएफ को ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है।
हालांकि पिछली सरकार में यह परंपरा तब टूटी थी, जब वी. श्रीनिवास राव को पांच वरिष्ठ पीसीसीएफ को सुपरसीड कर इस पद पर पदोन्नत किया गया था। अब डीपीसी टलने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है? मौजूदा सरकार में मुख्य सचिव अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा को पहले ही सेवा विस्तार मिल चुका है। हालांकि देश में अब तक किसी भी राज्य में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को एक्सटेंशन मिलने का उदाहरण नहीं है।
मंगलवार को वन विभाग की एसीएस ऋचा शर्मा का तबादला कर उन्हें पंचायत विभाग भेज दिया गया। उनकी जगह एसीएस मनोज पिंगुआ को वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इसी प्रशासनिक बदलाव के कारण डीपीसी टली है।
दूसरी तरफ लघुवनोपज संघ के एमडी अनिल साहू वरिष्ठता सूची में सबसे ऊपर हैं, लेकिन वे जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय और पीसीसीएफ कौशलेन्द्र कुमार के नाम पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। विभागीय गलियारों में अरुण पाण्डेय को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) का पद विभाग में दूसरे नंबर का अहम पद माना जाता है। अब सबकी नजर नई डीपीसी तारीख पर टिकी है।
...क्या ऐसा संभव है?
अब प्रशासनिक अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोडक़र सम्मान करना पड़ेगा। यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से राज्यों को भेजे गए निर्देशों में कही गई है। छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों को भेजे गए इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिवों को दी गई है।
दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग भी लगभग हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में इसी तरह का परिपत्र जारी करता रहा है, लेकिन इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ था। लिहाजा दिल्ली से ही आदेश आ गया।
निर्देशों में साफ कहा गया है कि सांसद-विधायक कार्यालय या बैठक में आएं तो अधिकारी उठकर उनका अभिवादन करें, हाथ जोड़े और पानी तक पूछें। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल उठाना और जवाब देना भी अनिवार्य बताया गया है। यदि बैठक में होने के कारण कॉल रिसीव नहीं हो पाए तो बाद में कॉल बैक करना होगा। उनके पत्रों और प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण कर जानकारी भी देनी होगी।
डीओपीटी ने यह भी माना है कि तमाम निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इसलिए अब इसे आचरण नियमावली से जोड़ दिया गया है। यानी उल्लंघन पर कार्रवाई भी संभव है।
हालांकि अफसरशाही इसे हर साल जारी होने वाला ‘रूटीन रिमाइंडर’ मान रही है। मगर हाल के दिनों में कुछ घटनाओं ने इस आदेश को और चर्चा में ला दिया है। खाद्य मंत्री ने एक अधिकारी, विधायक रोहित साहू ने एक पटवारी को जूते से मारने की घटना और प्रतापपुर विधायक शकुंतला पोर्ते द्वारा मंच से राजस्व अधिकारियों को ‘गुरूर छोडऩे’की चेतावनी अभी भी चर्चा में है। अब देखना यह है कि यह आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित रहता है या वास्तव में अफसरों के व्यवहार में भी बदलाव दिखता है।
प्रकृति हमें पुकार रही है, आइये इसे सुनें..
छत्तीसगढ़ शायद केवल 36 गढ़ों की भूमि नहीं है। इससे अधिक गढ़ों का साक्षात स्वरूप है, यदि जंगलों की ओर निकल जाएं। अनगिनत घने साल-बांस के जंगलों को, लहराती नदियों, झरनों, गुफाओं और पठारों को किन गढ़ों में गिना जाएगा? दूसरे राज्यों का भ्रमण करने के पहले अपने छत्तीसगढ़ को ही ठीक से घूम लेना चाहिए, सरगुजा से लेकर बस्तर के छिपे दूरस्थ इलाकों तक। अपने यहां लगभग 44 प्रतिशत इलाका वनाच्छादित है, जो देश के कुल वनों का लगभग 12 प्रतिशत है। अनेक जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों का आश्रय है। देशभर में राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की भरमार है, मगर सेंट्रल इंडिया को जोडऩे वाली कड़ी छत्तीसगढ़ ही है। अचानकमार, इंद्रावती, कांगेर, उदंती-सीतानदी, तमोर पिंगला में दूसरे राज्यों से पहुंचने वाले बाघ बताते हैं कि यह उनके लिए स्वर्ग है। बाघ ही नहीं, तेंदुआ, भालू, जंगली भैंस-बायसन, गौर और हिरणों का यह इलाका है। सैकड़ों पक्षी प्रजातियों, सरीसृपों और कीट-पतंगों का भी घर है। अब तो बारनवापारा काले हिरणों की बढ़ती आबादी के चलते राष्ट्रीय वन्यजीव-मानचित्र में अलग स्थान बना चुका है।

ऐसे मौके पर छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार और वन्यजीव प्रेमी प्राण चड्ढा, जो एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं, ने फेसबुक पर एक पोस्ट दर्ज की है। ऑरेंज ओक लीफ- हम आप शायद इसे नहीं समझ पाएंगे, यदि इस नाम से कोई पुकारेगा। यह तितली की एक दुर्लभ प्रजाति है। आंतरिक रूप से अनंत सौंदर्य और जीवन लिप्सा से भरपूर। सूखे पत्ते की तरह यह जीव दिखता है। मगर, जैसे ही पंख खोलती है- नीले, नारंगी और काले रंगों की चकाचौंध बिखेर देती है। शिकारियों से बचने के लिए वह प्राय: अपने पंखों को बंद रखती है। यह तस्वीर अचानकमार अभयारण्य से ली गई है। यह तितली छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यभारत के अन्य जंगलों में भी पाई जाती है। हम हाथी जैसे विशालकाय जानवरों की बात करते हैं लेकिन ऐसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, कीट और तितलियों का भी अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, वन कटाई और मानवीय अतिक्रमण के चलते संकट में है। कार्बन संग्रहण, जल संरक्षण और आदिवासी संस्कृति के भी संरक्षण में इन छोटे-छोटे कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है।
महिला अफसरों पर भरोसा, विकास कार्यों पर फोकस
सीएम विष्णु देव साय ने बुधवार को 43 आईएएस अफसरों के तबादले कर प्रशासन में बड़ा फेरबदल किया। इस बदलाव में सरकार ने एक तरफ लंबे समय से एक ही विभाग संभाल रहे अफसरों की जिम्मेदारियां बदलीं गईं। दूसरी तरफ, कुछ अहम विभागों में नए प्रयोग भी किए हैं।
सबसे चर्चित फैसला गृह विभाग को लेकर रहा। राज्य गठन के बाद पहली बार किसी महिला आईएएस अफसर को गृह विभाग की कमान सौंपी गई है। 1997 बैच की सीनियर आईएएस निहारिका बारिक सिंह को गृह विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया है। इससे पहले एके विजयवर्गीय, राबर्ट हरंगडोला, आरपी बगई, एनके असवाल और बीवीआर सुब्रमण्यम जैसे वरिष्ठ अफसर इस विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
फेरबदल में एसीएस ऋचा शर्मा, मनोज पिंगुआ, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आर संगीता, बसवराजु, डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुकेश बंसल समेत कई अफसरों के प्रभार बदले गए हैं। इनमें अधिकांश अफसर दो साल से ज्यादा समय से एक ही विभाग में कार्यरत थे। सीएम सचिवालय में पदस्थ मुकेश बंसल से वित्त विभाग लेकर लोक निर्माण विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार निर्माण कार्यों, खासकर सडक़ों और अधोसंरचना परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। सुशासन तिहार के दौरान सरगुजा क्षेत्र में खराब सडक़ों को लेकर मुख्यमंत्री की नाराजगी भी सामने आई थी। ऐसे में पीडब्ल्यूडी में यह बदलाव सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
यही नहीं, आबकारी विभाग की जिम्मेदारी दुबारा एक महिला अफसर को सौंपी गई है। पहले यह विभाग आर संगीता संभाल रही थीं, जबकि अब खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले को आबकारी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। एक और उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 33 में से 10 जिलों में महिला कलेक्टर बनाई गई हैं।
मनिंदर कौर ऐसी तीसरी अफसर...

केंद्र सरकार ने श्रीमती डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी की प्रतिनियुक्ति दो वर्ष बढ़ा दी है। वह कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। वह अगस्त 28 तक केंद्र में बनी रहेंगी। इस वृद्धि के साथ वह छत्तीसगढ़ कैडर की ऐसी तीसरी अफसर हो गई हैं जो एक दशक से अधिक समय से केंद्र में सेवाएं दे रहीं हैं।
केन्द्रीय अधिकारी-कर्मचारी ही सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष है। ऐसे में एक अधिकारी कर्मचारी की कुल सेवावधि 30-38 वर्ष रहती है। प्रदेश में सबसे ज्यादा पहले सबसे ज्यादा समय तक बीवीआर सुब्रमण्यम ने दो से तीन चरणों में 15-16 वर्ष तक पीएमओ, वर्ल्ड बैंक, जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के रूप में सेवाएं दी है। वे रिटायर भी दिल्ली से ही हुए। उनके बाद अमित अग्रवाल को भी 12 वर्ष से अधिक हो रहे हैं। इसी तरह से स्व. एम. गीता भी राज्य गठन के बाद मप्र, फिर केंद्र में सेवाओं के 15 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ आईं थीं। मनिंदर कौर को भी दो चरणों में 12 वर्ष हो गए हैं। तीन वर्ष के कूलिंग ऑफ पीरियड के बाद कोई भी अभा सेवा का अफसर फिर से प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। वैसे भी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस केंद्र के अफसर होते हैं वह जब चाहे बुला सकता है। एक तरह से वे राज्य में प्रतिनियुक्ति पर माने जा सकते हैं। और फिर केंद्र रिजल्ट ओरिएंटेड अफसरों को ही बुलाता है।
बहरहाल मनिंदर के अतिरिक्त उनके पति गौरव द्विवेदी को भी दो चरणों में 10 वर्ष बीत रहे हैं। गौरव द्विवेदी भी केंद्रीय प्रसार भारती में सीईओ हैं। इनके अलावा एसीएस ऋचा शर्मा भी 7 वर्ष केंद्र में सेवाएं दे चुकी थीं। सीएस विकासशील भी 7 वर्ष केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रहे। उनकी पत्नी निधि छिब्बर भी, अभी नीति आयोग में प्रतिनियुक्ति पर हैं। इनके अलावा पूर्व सीएस अमिताभ जैन, एसीएस मनोज पिंगुवा, सुबोध सिंह, सोनमणि बोरा, निहारिका बारिक, रोहित यादव,पी. संगीता, अमित कटारिया,रजत कुमार आदि भी 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लौटे हैं।
उधर, आईपीएस अधिकारियों में स्वागत दास, बिनय कुमार सिंह, रवि सिन्हा तो केंद्र में 20-25 वर्ष रहकर रिटायर हुए। दिवंगत पूर्व डीजीपी विश्वरंजन जरूर छत्तीसगढ़ लौटे। इन अफसरों के अलावा अमित कुमार ऐसे अकेले आईपीएस हैं जो 7 वर्ष से अधिक डेपुटेशन पर रहे। वहीं आईएफएस कैडर में छत्तीसगढ़ का ऐसा अफसर नहीं जो 5 वर्ष से अधिक प्रतिनियुक्ति पर रहा हो।


