विचार/लेख
-राजेश डोबरियाल
ईरान पर इसराइल-अमेरिका के हमले के बाद मध्य-पूर्व में छिड़ी जंग की वजह से दुनिया के कई देशों की तरह बांग्लादेश में भी ईंधन का संकट पैदा हो गया है।
देश में पेट्रोल पंपों पर गाडिय़ों की लाइनें लग रही हैं और लोग शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें ज़रूरत के मुताबिक तेल नहीं दिया जा रहा है।
इस सबके बीच भारत से बांग्लादेश को 5000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति की गई है।
बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट में मदद के लिए भारत से 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल और देने की मांग की है लेकिन अभी भारत की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं दिया गया है।
बांग्लादेश की बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के साथ भारत के संबंध पारंपरिक रूप से अच्छे नहीं रहे हैं हालांकि फरवरी में तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने उसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था। लेकिन कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि भारत को इस संकट के समय में बांग्लादेश की तेल, ख़ासकर डीज़ल, की आपूर्ति कर उसकी मदद करनी चाहिए क्योंकि वह चीन से भी मदद मांग चुका है।
उनका यह भी कहना है कि चीन भारत के पड़ोस में अपनी स्थिति मज़बूत करने का कोई मौका शायद ही गंवाएगा।
भारत, चीन दोनों से मांगी मदद
बांग्लादेश ने संकट से निपटने के लिए भारत को पत्र लिखकर अतिरिक्त 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति करने की गुज़ारिश की है। ढाका में भारतीय उच्चायुक्त प्रणॉय कुमार वर्मा ने 11 मार्च को बांग्लादेश के विद्युत, ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्री इकबाल हसन महमूद टुकू से मुलाकात की थी।
इसके बाद टुकू ने कहा, ‘उन्होंने कहा कि वे हमारे प्रस्ताव की समीक्षा करेंगे और निर्णय लेंगे। अभी वे खुद संकट में हैं।’
बांग्लादेश पेट्रोलियम निगम (बीपीसी) के अनुसार बीपीसी और भारत की सरकारी स्वामित्व वाली नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड के बीच हुए एक पूर्व समझौते के तहत बीते बुधवार को बांग्लादेश में 5,000 टन डीज़ल पहुंचा।
इस बीच, बांग्लादेश ने दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में चीन से सहायता भी मांगी है। यह भी बताया गया है कि सरकार के ऊर्जा मंत्री और राज्य मंत्री ने हाल ही में ढाका में चीनी राजदूत याओ वेन के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की।
टुकु का कहना है कि सरकार ऊर्जा आयात के लिए वैकल्पिक स्रोत वाले देशों के साथ बातचीत कर रही है।
भारत में हर साल हजारों बच्चे बिछड़ते हैं, कई कभी नहीं लौटते
झारखंड के राजा गोपे की कहानी, जो छह साल की उम्र में ट्रेन में भटक कर केरल पहुँच गया और तेरह साल बाद घर लौटा, भारत में खोए बच्चों की एक बड़ी और अक्सर अनदेखी समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। रेलवे स्टेशन, मेले, बस अड्डे और शहरों की भीड़ में हर साल हजारों बच्चे अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होती है। इनमें से कई बच्चे कभी वापस नहीं मिलते। लेकिन कुछ मामलों में सालों बाद ऐसे पुनर्मिलन भी होते हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगते। राजा गोपे का मामला ऐसा ही है, लेकिन यह अकेला नहीं है। पिछले दो दशकों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बच्चे हजारों किलोमीटर दूर पहुँच गए और वर्षों बाद परिवार तक लौट सके।
रेलवे स्टेशन: बिछोह का सबसे बड़ा मंच
भारत में बच्चों के खोने की सबसे आम जगह रेलवे स्टेशन और ट्रेन यात्राएँ मानी जाती हैं। देश के विशाल रेल नेटवर्क में रोज़ लाखों लोग यात्रा करते हैं। भीड़, शोर और जल्दबाजी के बीच छोटे बच्चे अक्सर पल भर में नजरों से ओझल हो जाते हैं।
कई बार बच्चा गलत ट्रेन में चढ़ जाता है, और कुछ घंटों में वह अपने राज्य से सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर पहुँच जाता है। जब तक परिवार खोजबीन करता है, बच्चा किसी और शहर में पहुँच चुका होता है। भाषा बदल जाती है, पहचान खो जाती है और बच्चे के लिए घर लौटना लगभग असंभव हो जाता है।
इसी तरह की एक घटना बिहार के एक बच्चे के साथ हुई थी, जो 2000 के दशक में ट्रेन में भटक कर राजस्थान पहुँच गया था। वह वर्षों तक एक बाल गृह में रहा और बाद में पहचान के आधार पर अपने परिवार तक पहुँच पाया।
सरू ब्रियरली: भारत से ऑस्ट्रेलिया तक
भारत में खोए बच्चों की कहानियों में सबसे प्रसिद्ध मामला सरू ब्रियरली का है।
1986 में मध्य प्रदेश के खंडवा रेलवे स्टेशन पर पाँच साल का सरू अपने बड़े भाई के साथ ट्रेन में बैठा था। भाई काम की तलाश में गया था और सरू स्टेशन पर इंतजार कर रहा था। लेकिन वह एक खाली ट्रेन में चढ़ गया और सो गया।
जब उसकी आँख खुली, तब ट्रेन हजारों किलोमीटर दूर कोलकाता पहुँच चुकी थी।
सरू को बाद में एक अनाथालय भेज दिया गया और अंततः उसे एक ऑस्ट्रेलियाई दंपती ने गोद ले लिया।
करीब 25 साल बाद उसने गूगल अर्थ की मदद से अपने पुराने इलाके की खोज की और अंततः अपने असली परिवार को ढूँढ निकाला। उसकी कहानी पर बाद में फिल्म “लायन” भी बनी।
ट्रेन से तमिलनाडु पहुँचा उत्तर भारत का बच्चा
कुछ साल पहले एक मामला सामने आया जिसमें उत्तर भारत का एक बच्चा ट्रेन में भटक कर तमिलनाडु पहुँच गया था।
वह अपने घर से निकलकर रेलवे स्टेशन पहुँच गया था और किसी ट्रेन में चढ़ गया। बाद में रेलवे पुलिस ने उसे बचाया और एक बाल गृह में भेज दिया।
बच्चा अपनी भाषा के अलावा कुछ नहीं बोल पाता था। अधिकारियों को केवल उसके नाम और गाँव के धुंधले उच्चारण के आधार पर खोज करनी पड़ी। महीनों की कोशिश के बाद उसका परिवार ढूँढा जा सका।
ऐसे मामलों में भाषा सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। बच्चा जिस राज्य में पहुँचता है वहाँ उसकी भाषा कोई नहीं समझता, और वह स्थानीय भाषा नहीं समझ पाता।
दिल्ली से हरियाणा, फिर उत्तर प्रदेश
एक और मामला दिल्ली में सामने आया था जहाँ एक छोटा बच्चा अपने परिवार से बिछड़कर ट्रेन में बैठ गया और हरियाणा पहुँच गया। वहाँ से वह किसी और ट्रेन में चढ़ गया और उत्तर प्रदेश पहुँच गया।
रेलवे पुलिस ने उसे पकड़कर बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया।
परिवार की पहचान करने में कई महीने लग गए, क्योंकि बच्चा अपने घर का पूरा पता नहीं बता पा रहा था। अंततः पुलिस ने स्कूल के नाम और इलाके की कुछ यादों के आधार पर उसके परिवार को ढूँढ लिया।
सोशल मीडिया का नया दौर
पहले ऐसे मामलों में बच्चों को परिवार तक पहुँचाना बेहद कठिन होता था।
लेकिन पिछले एक दशक में सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभानी शुरू की है। अब किसी बच्चे की फोटो या वीडियो वायरल हो जाए तो कई बार कुछ ही दिनों में उसका परिवार मिल जाता है।
राजा गोपे के मामले में भी यही हुआ। एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया गया जिसमें उसने अपने गांव के बारे में कुछ धुंधली यादें बताईं। उसी वीडियो के आधार पर झारखंड के लोगों ने पहचान कर ली।
यह तकनीक और सामुदायिक सहयोग का एक नया उदाहरण है।
रेलवे चिल्ड्रेन और अन्य संस्थाएँ
भारत में कई संस्थाएँ विशेष रूप से रेलवे स्टेशनों पर भटकते बच्चों की मदद के लिए काम करती हैं।
रेलवे चिल्ड्रेन इंडिया, चाइल्डलाइन, और विभिन्न राज्य सरकारों के बाल संरक्षण विभाग ऐसे बच्चों को बचाने, उनकी देखभाल करने और परिवार तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।
रेलवे स्टेशनों पर कई जगह अब ऐसे हेल्प डेस्क बनाए गए हैं जहाँ अकेले या संकट में दिखने वाले बच्चों को तुरंत संरक्षण में लिया जा सकता है।
बिछोह की मनोवैज्ञानिक कीमत
जो बच्चे वर्षों तक परिवार से दूर रहते हैं, उनके लिए घर लौटना भी आसान नहीं होता।
वे नई भाषा, नए दोस्तों और नई जिंदगी के साथ बड़े हो चुके होते हैं। कई बार उन्हें अपने ही गांव में अजनबी जैसा महसूस होता है।
राजा गोपे के मामले में भी यही स्थिति बताई जाती है। वह मलयालम बोलने लगा था और अपनी मूल भाषा लगभग भूल चुका था। उसके लिए झारखंड लौटना एक तरह से नई जिंदगी शुरू करने जैसा है।
हर साल हजारों बच्चे
भारत में बच्चों के लापता होने का मुद्दा अभी भी गंभीर है।
कई मामलों में बच्चे मानव तस्करी, बाल मजदूरी या अन्य शोषण का शिकार भी हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में वे केवल भटक जाते हैं, और फिर वर्षों तक पहचान के बिना किसी और शहर में जीवन बिताते हैं।
राजा गोपे और सरू ब्रियरली जैसे मामलों में कहानी का अंत सुखद रहा। लेकिन हर कहानी का अंत ऐसा नहीं होता।
एक उम्मीद की कहानी
राजा गोपे की घर वापसी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि कभी-कभी समय, तकनीक और मानवीय प्रयास मिलकर असंभव लगने वाली दूरी को भी मिटा सकते हैं।
छह साल का जो बच्चा एक गलत ट्रेन में बैठकर अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर चला गया था, वही अब एक जवान के रूप में अपने गांव वापस लौटा है।
यह केवल एक परिवार का मिलन नहीं है, यह उस उम्मीद की कहानी है जो वर्षों के बिछोह के बाद भी खत्म नहीं होती।
-टॉम लैम
अमेरिका और इसराइल के ईरान के साथ युद्ध ने सोशल मीडिया और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। क्या चीन इस मौके का फ़ायदा उठाकर ताइवान पर हमला कर सकता है, जबकि अमेरिकी सेना का ध्यान मध्य पूर्व पर केंद्रित है।
1950 के दशक में चीन ने ऐसा कदम उठाया था, जब अमेरिका मध्य पूर्व में सैन्य अभियान में व्यस्त था। लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखाई दे रही है। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ताइवान के आस-पास चीन की सैन्य गतिविधियां काफी कम हो गई हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम चीन की ओर से कूटनीतिक संकेत हो सकता है, क्योंकि मार्च के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि चीन ट्रंप की इस यात्रा के दौरान ताइवान समेत कई मुद्दों पर समझौते का माहौल बनाना चाहता है। इसके अलावा, अमेरिका की वेनेज़ुएला और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों पर सैन्य कार्रवाइयों ने चीन की ऊर्जा आपूर्ति को भी प्रभावित किया है।
इससे भी ताइवान के ख़िलाफ़ संभावित सैन्य कार्रवाई कठिन हो सकती है।
ताइवान पर चीन की वर्तमान सैन्य स्थिति
इतिहास में एक उदाहरण मौजूद है। 1958 में चीनी नेता माओत्से तुंग ने किनमेन और मात्सु द्वीपों पर गोलाबारी की थी।
ये द्वीप चीन के तट के पास हैं, लेकिन आज भी ताइवान के नियंत्रण में हैं। उस समय अमेरिका लेबनान में सैन्य कार्रवाई कर रहा था।
उस समय, माओ ने ताइवान और लेबनान को 'दो फंदे' बताया था जो अमेरिका को जकड़े हुए हैं।
उनका मानना था कि किनमेन और मात्सु पर हमला करके चीन मध्य पूर्व के लोगों के अमेरिका विरोधी संघर्ष का समर्थन कर रहा है।
लेकिन इस बार चीन ने ईरान युद्ध का फ़ायदा उठाकर ताइवान के आस-पास सैन्य गतिविधियां नहीं बढ़ाई हैं, जबकि अमेरिका ने अपने कुछ सैन्य संसाधन मध्य पूर्व की ओर भेज दिए हैं।
उदाहरण के तौर पर अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को दक्षिण चीन सागर से मध्य पूर्व भेजा गया था।
यूएसएस अब्राहम लिंकन ने 14 जनवरी को दक्षिण चीन सागर से मध्य पूर्व की ओर यात्रा शुरू की थी और 26 जनवरी को इसकी संभावित स्थिति ओमान के तट के पास थी।
इसके अलावा अमेरिका दक्षिण कोरिया से एंटी-मिसाइल सिस्टम थाड को भी मध्य पूर्व में तैनात करने की योजना बना रहा है।
इन कदमों से कुछ लोगों को चिंता है कि इससे चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिरोध क्षमता कम हो सकती है।
फिर भी मार्च में अब तक केवल दो चीनी लड़ाकू विमान ताइवान के एयर डिफेंस ज़ोन में देखे गए हैं, जो हाल के वर्षों में ताइवान के हवाई क्षेत्र में चीन के विमानों की सबसे कम घुसपैठ का रिकॉर्ड है।
ताइवान के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ट्रंप की यात्रा से पहले सकारात्मक माहौल बनाना चाहता है और यह संकेत देना चाहता है कि वह ताइवान के मुद्दे को फिलहाल बल प्रयोग से नहीं सुलझाएगा।
हालांकि ताइवान के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि चीन अमेरिकी सुरक्षा समर्थन और हथियारों की बिक्री को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है।
शी-ट्रंप की बैठक का क्या होगा एजेंडा
बीजिंग में होने वाली संभावित बैठक में शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कई बड़े मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है। दोनों महाशक्तियां अब भी ताइवान, ट्रेड और अन्य मसलों को सुलझाने के रास्ते तलाश रही हैं।
अमेरिकी मीडिया के अनुसार, चीन ताइवान के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ समझौता करने की कोशिश कर सकता है।
ख़ासकर ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री पर चर्चा, व्यापारिक टैरिफ़ कम करने और सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लगे निर्यात प्रतिबंध हटाने जैसे मुद्दे इसमें शामिल हो सकते हैं।
वहीं अमेरिका उम्मीद करेगा कि बीजिंग रूस और ईरान से कम तेल खरीदे और अमेरिका से अधिक तेल, गैस, सोयाबीन और बोइंग विमान खरीदे। इसके अलावा अमेरिका ये भी चाहेगा कि चीन दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) के निर्यात नियंत्रण में भी ढील दे।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वेनेज़ुएला और ईरान के ख़िलाफ़ हाल की अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयाँ चीन की तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं।
ग़ैर आधिकारिक चीनी अनुमानों के अनुसार, 2025 में चीन ने वेनेज़ुएला से रोज़ाना लगभग 4।63 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया।
यह वेनेज़ुएला के कुल तेल निर्यात का लगभग 70–80 फ़ीसदी और चीन के कुल तेल आयात का करीब 7 फ़ीसदी था।
ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के युद्ध का असर चीन पर और भी अधिक पड़ रहा है।
विश्लेषण के अनुसार 2025 में ईरान ने अपने कुल निर्यात का लगभग 99 फ़ीसदी हिस्सा चीन को निर्यात किया, जो चीन के समुद्री रास्ते से आने वाले कुल कच्चे तेल आयात का करीब 13 फ़ीसदी था। इस बीच, 2025 में होर्मुज़ जलडमरूमध्य से रोज़ गुजरने वाले 1।49 करोड़ बैरल तेल में से लगभग 50 लाख बैरल चीन के लिए था, जो उसके कुल रोज़ाना आयात का लगभग 43।3 फ़ीसदी था।
ताइवान के मीडिया ने एक फ्रांसीसी अर्थशास्त्री के हवाले से कहा है कि चीन की ऊर्जा पर निर्भरता ताइवान के ख़िलाफ़ संभावित सैन्य कार्रवाई में बाधा बन सकती है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए लगातार ऊर्जा आपूर्ति ज़रूरी होती है।
हालांकि मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि चीन के पास अपने रणनीतिक भंडार में लगभग 1।4 अरब बैरल कच्चा तेल मौजूद है। यदि मध्य पूर्व से तेल आयात पूरी तरह बंद भी हो जाए तो यह भंडार लगभग छह महीने तक आपूर्ति की कमी को पूरा कर सकता है।
ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री
चीन विदेशी पेट्रोल, डीज़ल पर निर्भरता कम करके घरेलू स्तर पर उत्पादित रेन्यूवबल एनर्जी की ओर तेजी से बदलाव लाने की कोशिश भी कर रहा है।
इसका मकसद राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मूल रूप से सुरक्षित करना और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूत आधार तैयार करना और आत्मविश्वास बढ़ाना है।
लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी (ब्रेस्ट कैंसर कोलैबोरेटर्स)’ के अनुसार 1990 से 2023 के बीच भारत में स्तन कैंसर के मामले 477।8 प्रतिशत बढ़े। वहीं मरने वालों की तादाद भी 352.3 प्रतिशत बढ़ी।
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया के लगभग हर देश में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तमाम स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बावजूद मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित 204 देशों के अध्ययन के आधार पर, साल 2023 में दुनिया भर में करीब 23 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के नए मामले सामने आए। जबकि इसकी चपेट में आने से 7।6 लाख से अधिक महिलाओं की मौत हो गई।
अगर रोकथाम और जल्दी जांच पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में इस बीमारी का बोझ और बढ़ेगा। अनुमान है कि साल 2050 तक लगभग 35 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले सामने आ सकते हैं। वहीं हर साल होने वाली मौतों की संख्या भी बढक़र 14 लाख तक पहुंचने का अंदेशा है। भारत के आंकड़े भी चिंताजनक हैं। साल 1990 के बाद से देश में स्तन कैंसर के मामलों में तेज उछाल देखा गया है। साल 2023 में स्तन कैंसर के लगभग 2।03 लाख नए मामले दर्ज किए गए, जो 1990 की तुलना में करीब 477।8 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है। इसी अवधि में मरने वालों की संख्या भी बढक़र 1।02 लाख तक पहुंच गई। यह 1990 के मुकाबले 352।3 प्रतिशत अधिक है।
विश्वस्तर पर स्तन कैंसर के मामले बढ़े
स्तन कैंसर दुनिया में महिलाओं में मिलने वाला सबसे आम कैंसर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हर मिनट चार महिलाओं में स्तन कैंसर का पता चलता है। विभिन्न देशों में स्तन कैंसर का असर भी अलग है। स्तन कैंसर से होने वाली मौत की दर बांग्लादेश में 91 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 78 प्रतिशत, भारत में 74 प्रतिशत, जापान में 52 प्रतिशत और फिलीपींस में 41 प्रतिशत देखी गई है। लाओस में यह सबसे ज्यादा 214 प्रतिशत है। जबकि चीन में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की दर में लगभग 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
स्तन कैंसर का बढ़ता बोझ अब कम और मध्यम-आय वाले देशों की ओर और अधिक बढ़ रहा है। इन देशों में अक्सर कैंसर का देर से पता चलता है। इलाज की सीमित सुविधा होने के कारण मृत्यु दर अधिक रहती है। भारत जैसे मध्यम-आय वाले देशों में स्तन कैंसर का आर्थिक दबाव भी बढ़ेगा। साल 2021 में इससे जुडा कुल आर्थिक बोझ लगभग 74 हजार करोड़ रुपये था। यह 2030 तक एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारत में क्यों बढ़ रहा है स्तन कैंसर
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि स्तन कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। इसके खतरे से जुड़े कई कारक होते हैं। डॉ। कुशाग्र गौरव भटनागर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एंडोक्राइन और ब्रेस्ट सर्जन हैं। वह डीडब्ल्यू को बताते हैं कि मोटापा, अधिक शराब का सेवन, सिगरेट पीना और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसे लाइफस्टाइल फैक्टर स्तन कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर भी स्तन कैंसर हो सकता है। साथ ही कई शोध बताते हैं कि जिन महिलाओं में पहली गर्भावस्था देर से होती है या जिनके बच्चे नहीं होते, उनमें स्तन कैंसर का खतरा अधिक होता है। डॉ। कुशाग्र आगे कहते हैं, ‘एस्ट्रोजन महिलाओं में यौन और शारीरिक विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हार्मोन है। गर्भावस्था और स्तनपान (ब्रेस्टफीड) से महिलाओं में एस्ट्रोजन के लंबे समय तक अधिक प्रवाह का जोखिम कम हो सकता है। अब महिलाएं देर से शादी कर रही हैं। वे 30 साल के बाद गर्भ धारण करती हैं। ऐसे में स्तन कैंसर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।’
डॉ. अभिषेक शंकर दिल्ली के एम्स अस्पताल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। वह बताते हैं कि वायु प्रदूषण भी शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘2023 में शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर अधिक होता है, वहां रहने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर होने की संभावना 28 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि अधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों जैसे दिल्ली में स्तन कैंसर के मामले ज्यादा होंगे।’
कम उम्र की महिलाओं को भी खतरा
साल 2023 में 55 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में प्रति लाख लगभग 161 नए स्तन कैंसर के मामले दर्ज किए गए। वहीं 20 से 54 साल की महिलाओं में यह संख्या प्रति लाख 50 नए मामले रही। यह 1990 के बाद से इस उम्र की महिलाओं में स्तन कैंसर के 29 प्रतिशत अधिक मामले हैं। इसलिए जागरूकता और समय पर जांच बेहद महत्वपूर्ण है। स्तन कैंसर की पहचान के लिए मैमोग्राफी, पीईटी स्कैन, एमआरआई मैमोग्राफी और थर्मोग्राफी जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं। इनकी मदद से बीमारी का पता पहले से ज्यादा जल्दी लगाया जा सकता है।
डॉ. अनिल ठकवानी शारदा केयर एंड हेल्थ सिटी अस्पताल में ऑन्कोलॉजी विभाग के एचओडी और सीनियर कंसल्टेंट हैं। वह 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं को नियमित रूप से स्क्रीनिंग टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। डॉ।.अनिल बताते हैं, ‘स्तन में या उसके आसपास अगर कोई छोटी-सी गांठ भी महसूस हो, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए। अक्सर यह दर्द नहीं करती और इसी वजह से लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। स्तन कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से इसका इलाज संभव है और मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकता है।’
ईरान के साथ चल रहे तनाव के चलते ऊर्जा और खाद की कीमतें बढ़ रही हैं. खाने पीने की चीजों में फिर से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. किसानों को डर है कि संसाधनों की कमी के कारण इस साल पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है.
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन का लिखा-
ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से गायब होते तेल और एलएनजी टैंकरों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. आखिर ऐसा हो भी क्यों न, ईरान और ओमान के बीच मौजूद इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चा तेल और एलएनजी गुजरता है. यह तेल और गैस खाड़ी देशों से पूरी दुनिया को भेजा जाता है.
हालांकि, असली संकट उन जहाजों को लेकर है जिनमें दुनिया भर में खेती के लिए जरूरी खाद और खाड़ी देशों के लिए भोजन भरा होता है. संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के लिए यह समुद्री रास्ता जीवन रेखा है. इसके बंद होने का मतलब है कि इन रेगिस्तानी देशों में खाने-पीने की चीजें खत्म हो सकती हैं.
मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनी ‘सिग्नल ग्रुप' के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है.
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के मुताबिक, दुनिया भर में व्यापार होने वाले यूरिया, जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है, का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. इसमें से अकेले कतर पूरी दुनिया की सप्लाई के 10 फीसदी हिस्से का उत्पादन करता है.
जब पिछले हफ्ते ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हब ‘रास लफ्फान' पर हमला किया था, तो कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा. इस वजह से लाखों टन जरूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल (प्रिकर्सर्स) जहां के तहां रुक गए.
ईरान युद्ध के बढ़ते असर से, पिछले छह साल में दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए तीसरा सबसे बड़ा खतरा पैदा हो गया है. इससे पहले पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी और फिर 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध का सामना कर चुकी है. उस समय रूस ने यूक्रेन के उन खेतों और बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया था जहां से अनाज का निर्यात होता था.
जब से ईरान युद्ध शुरू हुआ है, खाद की कीमतें 10 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं. हालांकि, वे अभी भी रूसी टैंकों के यूक्रेन में घुसने के बाद के हफ्तों की तुलना में लगभग 40 फीसदी कम हैं.
फसल की पैदावार पर पड़ सकता है असर
विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी' के मुताबिक, हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है. इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया भर में खाद की किल्लत पैदा हो सकती है. इससे मक्का, गेहूं और चावल जैसी फसलों की पैदावार गिरने का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि ये फसलें पूरी तरह से नाइट्रोजन (यूरिया) पर निर्भर होती हैं.
वॉशिंगटन में मौजूद ‘इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट' (आईएफपीआरआई) के सीनियर रिसर्च फेलो जोसेफ ग्लॉबर ने डीडब्ल्यू को बताया, "खाद की बढ़ी हुई कीमतें इस बात पर असर डालेंगी कि किसान कौन सी फसल उगाना चाहते हैं. खेती की लागत को बढ़ने से बचाने के लिए, किसान उन फसलों को चुन सकते हैं जिन्हें कम खाद की जरूरत होती है, बजाय उन फसलों के जिनमें बहुत ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत पड़ती है.”
ग्लॉबर ने आगे कहा, "खाद की कीमतें बढ़ने से गरीब देशों के किसान उसे खरीद नहीं पाएंगे और मजबूरी में कम खाद का उपयोग करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं, तो इससे फसलों की पैदावार को भारी नुकसान पहुंच सकता है.”
इस हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध ‘लगभग खत्म हो गया है.' इसके बावजूद, यूनाइटेड किंगडम के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) का कहना है कि ईरान ने बुधवार को होर्मुज में या उसके पास कम से कम तीन जहाजों पर फायरिंग की. यह इस बात का संकेत है कि तेहरान इस समुद्री रास्ते को लगभग बंद रखने पर अड़ा हुआ है.
गुरुवार तड़के खाड़ी क्षेत्र में और भी हमलों की खबरें मिली हैं. इनमें एक मालवाहक जहाज और कई तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की खबर है.
कमोडिटी एक्सपर्ट का कहना है कि होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, खाद की वैश्विक आपूर्ति उतनी ही ज्यादा ठप होने लगेगी.
डच बैंक ‘आईएनजी' ने इस महीने की शुरुआत में एक रिसर्च नोट में चेतावनी दी थी, "अगर आपूर्ति में रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो भारत, ब्राजील, दक्षिण एशिया और यूरोपीय संघ के कुछ हिस्सों में खाद की उपलब्धता काफी कम हो जाएगी. ये देश और इलाके मुख्य रूप से खाद के आयात पर निर्भर हैं.”
रूस, चीन, अमेरिका और मोरक्को जैसे अन्य खाद उत्पादकों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बहुत कम है. इसलिए, वे इस कमी को पूरा करने के लिए तुरंत उत्पादन नहीं बढ़ा पाएंगे. चीन ने फॉस्फेट और नाइट्रोजन खादों के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन अब उसे ये पाबंदियां हटाने के लिए दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री ग्लॉबर ने कहा, "पोटाश या फॉस्फेट के विपरीत, नाइट्रोजन का उत्पादन कहीं भी किया जा सकता है जहां प्राकृतिक गैस या कोयला उपलब्ध हो. पोटाश और फॉस्फेट के लिए तो आपको उन खनिजों की खदानों पर निर्भर रहना पड़ता है. लेकिन असली समस्या प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतें हैं, जिसकी वजह से नाइट्रोजन का उत्पादन बढ़ाना घाटे का सौदा साबित हो सकता है.”
मध्य पूर्व में पिछले दो हफ्ते से जारी युद्ध का असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है. भारत के लाखों लोग मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों में रहते हैं. उड़ानें बंद होने के कारण लोग लौट नहीं पा रहे हैं.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
ईरान के खिलाफ इस्राएल और अमेरिका के युद्ध के चलते भारत के लाखों लोग खाड़ी के देशों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की है. इधर भारत में बैठे उनके परिजन दिन-रात हालात जानने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी सुरक्षित वापसी की दुआ कर रहे हैं. हालांकि भारत सरकार की तरफ से यहां फंसे हजारों यात्रियों की अब तक सकुशल वापसी कराई गई है लेकिन बड़ी संख्या में अभी भी लोग वापस आने के लिए परेशान हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 28 फरवरी को युद्ध छिड़ने के बाद 1 से 7 मार्च के बीच खाड़ी क्षेत्र से 52 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है. इनमें से 32 हजार लोगों ने भारतीय विमानों से यात्रा की जबकि बाकी लोग विदेशी एअरलाइंस से वापस आए.
खाड़ी देश और एशिया को छोड़ यूरोप क्यों जा रहे हैं नेपाली श्रमिक
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस कान्फ्रेंस में बताया, "भारत सरकार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रही है, खासकर उन पर जो ट्रांजिट के दौरान या फिर अल्पकालिक यात्राओं के दौरान वहां फंस गए हैं. क्षेत्र में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय अधिकारियों के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ अपने स्थान पर स्थित भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास द्वारा जारी की जा रही एडवाइजरी का पालन करें.”
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राएल की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के बाद इस क्षेत्र में हालात तेजी से बदले हैं. कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे अस्थायी रूप से बंद हैं और उड़ानें रद्द कर दी गई हैं. इसका सीधा असर इन देशों में रह रहे लोगों पर पड़ रहा है जो वहां कामकाज या फिर पढ़ाई और पर्यटन के लिए जाते हैं. खाड़ी के अलग-अलग देशों में भारत के करीब एक करोड़ लोग रहते हैं.
90 लाख से ज्यादा भारतीय हैं खाड़ी के देशों में
खाड़ी देशों यानी फारस की खाड़ी में बसे छह देशों में भारतीयों की एक बड़ी आबादी रोजगार के लिए जाती है. विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. रोजगार की उपलब्धता और बेहतर वेतन वहां जाने के लिए लोगों को आकर्षित करता है. अकेले उत्तर प्रदेश से करीब पचीस लाख लोग इन देशों में हैं, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के. हालांकि अन्य इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग इन देशों में रह रहे हैं. बड़ी संख्या में घूमने के लिए भी लोग इन देशों का रुख करते हैं. लेकिन अब हवाई सेवाएं ठप होने से बहुत से लोगों को वहीं रुकना पड़ा है और यहां उनके घरों में बेचैनी का माहौल है.
बनारस के रहने वाले दुर्गेश कुमार दुबई में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "रोजगार की तलाश और ज्यादा पैसे कमाने के लिए अभी दो महीने पहले ही यहां आए थे लेकिन यहां तो युद्ध छिड़ गया है. हालांकि आम लोगों को बहुत खतरा तो नहीं है, लेकिन फिर भी हम लोग डरे हुए हैं. काम करने के बाद चुपचाप अपने-अपने कमरों में रहने चले जाते हैं. हर समय इस बात का खतरा बना रहता है कि कहीं कोई मिसाइल आकर न गिर जाए.”
हालांकि कई लोगों का ये भी कहना है कि रिहायशी इलाकों में किसी तरह का कोई डर नहीं है. नीरज निषाद गोरखपुर के रहने वाले हैं. दुबई के अलकूज में रहते हैं और पेंटिंग के ठेकेदार हैं. उनका कहना है कि शुरुआत में थोड़ा डर का माहौल था, लेकिन अब स्थिति सामान्य है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में नीरज निषाद कहते हैं, "यहां तो सब कुछ ठीक है. हां, बाहरी इलाकों में जरूर थोड़ा डर का माहौल है. पर हम लोग जहां हैं, वहां कोई डर नहीं है. हालांकि यहां से कुछ दूरी पर एक हफ्ते पहले एक मिसाइल गिरी थी लेकिन उसके बाद से कोई ऐसी घटना नहीं हुई. रिहायशी इलाकों में मिसाइल या बम नहीं गर रहे हैं.”
सुरक्षित लेकिन खौफ बरकरार
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के भी सैकड़ों लोग सऊदी अरब और यूएई सहित कई खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. युद्ध के बाद बने तनाव से उनके परिवार की चिंताएं बढ़ गई हैं. मुरादाबाद के जमील कहते हैं कि उनका बेटा सऊदी अरब में नाई का काम करता है. उनके मुताबिक, "बेटा जहां रहता है उस बिल्डिंग को युद्ध शुरू होने के बाद खाली करा लिया गया था. बेटे और उसके साथी सुरक्षित जगह पर तो हैं, फिर भी हम लोगों को हर समय उनकी फ्रिक बनी रहती है. कई बार बात भी नहीं हो पाती, इसलिए चिंता बढ़ जाती है.”
अमेरिका, कनाडा पीछे छूटे, अब पढ़ाई के लिए कहां जा रहे भारतीय?
यूपी से बड़ी संख्या में लोग पढ़ाई के लिए ईरान का रुख करते हैं लेकिन लड़ाई के बाद से वहां भी अफरा-तफरी मची हुई है. संभल के मौलाना गुफरान नकवी पिछले दो साल से ईरान में पढ़ाई कर रहे हैं. उनके भाई मोहम्मद फहमान नकवी बताते हैं कि जहां वे रह रहे है, वहां स्थिति सामान्य है लेकिन खौफ बना रहता है.
बाराबंकी जिले के दर्जनों लोग ईरान के कुम शहर और अन्य इलाकों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो धार्मिक शिक्षा या फिर जियारत के लिए वहां गए थे. कई परिवारों का संपर्क वहां रह रहे अपने परिजनों से टूट चुका है.
इस्राएल जाने पर रोक!
इस बीच, उत्तर प्रदेश के 300 कामगारों के इस्राएल जाने पर 21 मार्च तक रोक लगा दी गई है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रूप से यह फैसला लिया है. उत्तर प्रदेश श्रम एवं सेवायोजन विभाग और एनएसडीसी के साथ इस्राइल की टीम ने पिछले महीने कानपुर में इन कामगारों का चयन किया था. इस्राइल में शटरिंग कारपेंटर, आयरन वेल्डिंग, प्लास्टरिंग और सिरेमिक टाइलिंग के काम के लिए इन श्रमिकों का चयन हुआ है.
लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत उन लोगों को हो रही है जो खाड़ी के देशों से आना चाहते हैं. कई लोग पहले से ही योजना बनाए थे आने की लेकिन हवाई मार्ग बंद होने और फ्लाइट रद्द होने के कारण नहीं आ पा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, युद्ध की स्थितियों के बावजूद भारत से खाड़ी देशों की ओर जाने वालों की कमी नहीं दिख रही है. गौरव दुबे गोरखपुर में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं. उनके पास हर साल हजारों लोग थाईलैंड, इंडोनेशिया और खाड़ी देशों में जाने के लिए हवाई टिकट लेते हैं. उनका कहना है कि ट्रैवल एजेंसियों का व्यापार भी ठप सा हो गया है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में गौरव दुबे कहते हैं कि पिछले 12 दिन से गिनती के टिकट बिके हैं. उनके मुताबिक, "यहां से ज्यादातर लोग रोजी-रोजगार के लिए जाते हैं. यदि फ्लाइट सामान्य रूप से जाएं तो जाने वालों की कमी नहीं और यहां उनके परिजन भी परेशान नहीं हैं. लेकिन सामान्य फ्लाइट को स्पेशल फ्लाइट का नाम दे दिया गया है और किराया ज्यादा वसूला जा रहा है. बनारस से दुबई और शरजाह के लिए 17-18 हजार रुपये में सामान्य तौर पर टिकट मिल जाता है लेकिन अब यही टिकट 25-30 तीस हजार रुपये में मिल रहा है.”
14 मार्च नदियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई दिवस
- दिलीप कुमार पाठक
नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि उन महान सभ्यताओं की धडक़न हैं जो हज़ारों सालों से इनके किनारों पर पनपी और फली-फूलीं। लेकिन आज 14 मार्च को जब पूरी दुनिया ‘नदियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई दिवस’ मना रही है, तो सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि क्या हमने अपनी इन जीवनरेखाओं को सिर्फ एक गंदा नाला बनकर रहने के लिए छोड़ दिया है? भारत जैसे देश में, जहाँ नदियों को माँ और देवी का दर्जा देकर उनकी आरती उतारी जाती है, वहाँ की जलधाराओं में घुलता जहर हमारी गहरी होती दोहरी मानसिकता का प्रतीक बन चुका है। हम सुबह श्रद्धा के साथ घाटों पर दीप दान करते हैं और शाम होते-होते उसी पवित्र जल में फैक्ट्रियों का ज़हरीला रसायन, प्लास्टिक और शहर का सारा सीवेज बहा देते हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो नदियाँ सदियों से हमें जीवन और शुद्धता देती आ रही हैं, आज वे खुद इंसानी लालच के बीच अपने अस्तित्व के लिए तड़प रहीं हैं।
हैरानी की बात यह है कि हम मंगल ग्रह पर पानी ढूंढ रहे हैं, लेकिन अपनी धरती पर बहते अमृत को गटर बना रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर साल हज़ारों करोड़ रुपये सफाई के नाम पर बहाए जाते हैं, लेकिन परिणाम ‘ढाक के तीन पात’ ही रहते हैं। जब तक जन-जन में नदी के प्रति संवेदना नहीं जगेगी, तब तक हर सरकारी योजना केवल फाइलों का पेट भरेगी, नदियों का नहीं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की लगभग 70 प्रतिशत नदियाँ प्रदूषित हो चुकी हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में 350 से अधिक ऐसे नदी क्षेत्रों की पहचान की है जो अब ‘डेड जोन’ में बदल चुके हैं, जहाँ ऑक्सीजन का स्तर शून्य है और जलीय जीवन समाप्त हो चुका है। यमुना जैसी पौराणिक नदी दिल्ली के पास पहुँचते ही इसी मौत के जाल में फँस जाती है। इतना ही नहीं, गंगा जैसी जीवनदायिनी नदी के किनारे बसे सैकड़ों शहरों का औद्योगिक कचरा आज भी बिना शोधन के सीधे जलधारा में मिल रहा है, जो जल प्रदूषण के साथ-साथ गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है।
इच्छा मृत्यु : न्यायालय ने दी सम्मान से मृत्यु की अनुमति
-प्रमोद भार्गव
निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 12 साल से कोमा में रहते हुए कृत्रिम जीवन रक्षा उपायों से जीवित 32 वर्ष के हरीश राणा को मौत की अनुमति दे दी।देश के इतिहास में इच्छा मृत्यु की यह पहली कानूनी इजाजत है। अब हरीश के जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाएंगे और उसकी जीवन-लीला प्राकृतिक रूप से मौत को प्राप्त हो जाएगी।न्यायालय की न्यायमूर्ति जेबी पारडीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने परोक्ष इच्छा-मृत्यु की इजाजत मांगने वाली याचिका की स्वीकार करते हुए एम्स दिल्ली को निर्देश दिया है कि 'वह तय करे कि जीवन रक्षक उपकरण और प्रणाली एक सुनियोजित ढंग से हटाई जाए,ताकि व्यक्ति की गरिमा बनी रहे तथा उसे कोई पीड़ा झेलनी न पड़े।वैसे भी उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, यह स्थिति सिर्फ दुख दे रही है।'हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के छात्र रहने के दौरान 2013 में पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए थे। तब से वे कोमा में हैं।उनके पिता अशोक राणा ने उक्त याचिका अदालत में दाखिल की थी।
2018 में कॉमन काज की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों की पीठ ने परोक्ष इच्छा-मृत्यु (पैसिव इथुनीशिया)को मान्यता से जुड़ा फैसला दिया था। न्यायालय ने कहा था कि जो लोग गंभीर रूप से बीमार हैं और लिविंग विल (इच्छा-पत्र) बना चुके हैं, उनको सम्मान के साथ मरने का अधिकार है। उन्हें कानूनी पेंच में नहीं फंसाना चाहिए और चिकित्सा विषेशज्ञ को भी ऐसे मामले संज्ञान में लेना चाहिए। अतएव न्यायालय का निष्कर्ष था कि अगर कोई व्यक्ति अपना उपचार बंद कराना चाहता है तो उसे अनुमति देने का भी नियम होना चाहिए। न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस निर्णय में मृत्यु के अधिकार को भी मौलिक अधिकार माना है। लिविंग विल के मायने जीवित होने का दस्तावेज या वसीयत है। इसके जरिए मरणासन्न व्यक्ति या उसके परिजन अपनी इच्छा के जरिए इच्छा-मृत्यु की मांग कर सकते हैं।चिकित्सा विशेषज्ञों की समिति की राय पर इच्छा मृत्यु की पहल की जा सकती है।इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में ही यह पहली अनुमति अदालत ने दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में दिए परिप्रेक्ष्य फैसले में इस तथ्य को मान्यता दी है कि असाध्य रोग से ग्रस्त रोगी इच्छा-पत्र (वसियत) लिख सकता है। न्यायालय का यह फैसला चिकित्सकों को लाइलाज मरीजों के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देता है। अदालत ने कहा है कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को निष्क्रिय या मूर्चि्छत अवस्था में शारीरिक पीड़ा सहने नहीं देना चाहिए। अग्रिम इच्छा-पत्र लिखने की यह अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। इसमें उल्लेख है कि जब तक संसद से इस सिलसिले में कानून नहीं बन जाता तब तक फैसले में दिए दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। कौन किस तरह से इच्छा-पत्र लिख सकता है और किस आधार पर मेडिकल बोर्ड इच्छा-मृत्यु के लिए सहमति दे सकता है, इनके आधार बिंदू फैसले में दिए गए हैं। इस फैसले के बाद रोगी के रिश्तेदार और मित्रों को वसियत के निष्पादन का अधिकार मिल गया था। इस वसियत के लिखे जाने के बाद मेडिकल बोर्ड रोगी को प्राणवायु देने वाले उपकरणों को हटाने पर विचार कर सकता है।
इच्छामृत्यु की हमें पहली जानकारी भीष्म पितामह द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार मौत का वरण करने की मिलती है। जैन धर्म में ऋषि-मुनी संथरा के जरिए स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जब कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी या दुर्घटना के चलते ऐसी नीम-बेहोशी की हालत में आ जाए कि उसकी स्मृति का लोप होने के साथ खाने-पीने व दिनचर्याओं से निवृति की शक्ति का क्षरण हो जाए और वह अपने अस्तित्व का बोध भी न कर पाए तो ऐसे दुर्लभ कष्ट से मुक्ति के लिए मौत जरूरी लगने लगती है। ऐसी हालात में रोगी को जीवन रक्षक प्रणाली पर टिकाए रखना उसे यातना देने की तरह है। उसके इस कष्टदायी जीवन से परिजन और शुभचिंतक भी अप्रत्यक्ष रूप से यातना ही भोगते है। परिजनों को आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है। हरीश के पिता अशोक की पुत्र की इस लाइलाज बीमारी से दिल्ली का घर बिक गया। पिता जीवन-यापन के लिए क्रिकेट मैदानों में सैंडविच बेचकर गुजारा करने को मजबूर थे।
भारत में यह मुद्दा तब देशभर में विचार व बहस का विषय बना था, जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दया मृत्यु के लिए शीर्ष न्यायालय में गुहार लगाई गई थी। बलात्कार और हत्या की निर्मम दुष्टता के चलते कोमा में पहुंची अरुणा ने 42 साल तक जीवन रक्षक प्रणाली पर टिके रहने की यातना भोगी। अरुणा को सामान्य अवस्था में लाने की जब सभी चिकित्सा कोशिशें व्यर्थ हो गई, तब अदालत में उन्हें इच्छा मृत्यु देने की याचिका लगाई गई थी। किंतु अदालत ने इसे उचित नहीं ठहराया था। 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में इस आशय की अर्जी भी लगाई थी की अरुणा का इलाज संभव नहीं है, लिहाजा उसे जीवन रक्षक प्रणाली से मुक्त करने की इजाजत दी जाए। जिससे उसे, अंतहीन कष्टों से छुटकारा मिले। लेकिन इच्छा-मृत्यु वैध है या अवैध इसके अंतिम निष्कर्ष पर अदालत नहीं पहुंच पाई थी। लिहाजा उसने निष्क्रिय अवस्था में पड़े व्यक्ति की जीवन रक्षा प्रणाली हटाकर उसे मौत का वरण करने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने का सवाल उठाते हुए सभी राज्य व केंद्र शासित प्रांतों को नोटिस जारी करके सलाह मांगी। तब के प्रधान न्यायमूर्ती आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय खंडपीठ ने इच्छा-मृत्यु पर विचार आमंत्रित करने के पक्ष में तर्क दिया था कि यह मसला संविधान ही नहीं बल्कि नैतिकता, धर्म और चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ा है, इसिलए इसे विचारना जरूरी है। इसके उलट केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार कहती रही कि यह एक तरह की अत्महत्या है, जिसकी अनुमति भारत में नहीं दी जा सकती, क्योंकि इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी गई तो इसका दुरुपयोग हो सकता है ?
-विष्णु नागर
शाब्दिक अर्थ में लिखने की मेज की बात करें तो ऐसी कोई मेज मेरी कभी रही नहीं ।घर में संयोग से आज एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन मेजें इक_ा हो गई हैं। उसमें एक मेज पर मेरा छोटा बेटा अपने लिखने-पढऩे का काम करता है। एक पर टीवी जी ससम्मान विराजित हैं। एक पर प्रेस करने के कपड़े इक_ा होते रहते हैं और वहां एक इलेक्ट्रिक प्रेस भी रखी है मगर लिखने के लिए घर में कभी मैंने मेज का इस्तेमाल नहीं किया। हां पत्रकार था तो आफिस में कुर्सी-मेज पर काम करना पड़ता था। अनेक लेख भी मेज पर बैठकर लिखे हैं मगर रचनात्मक लेखन कभी कुर्सी- टेबल पर नहीं किया।करना आता ही नहीं। कभी पलंग पर पेट के बल लेटकर लिखता था, इधर- उधर कागज बिखरे रहते थे। आजकल उस पर पीठ टिका कर लिखता हूं। ड्राईंगरूम में रखे सोफे का भी इसके लिए इस्तेमाल करता हूं।मतलब यह कि टेबल-कुर्सी के अलावा कोई भी और साधन मेरे लिए उपयुक्त है। इसी तरह मैं महंगी कलम से भी नहीं लिख सकता। मन में न जाने क्या भूत बैठा है।दस या अधिक से अधिक बीस रुपए की कलम ही मेरे काम आती है। कुछ काम सीधे मोबाइल पर भी करता हूं, जैसे यह टिप्पणी लिखी है। हां इसके लिए थोड़े से नोट्स डायरी में लिये थे। इसके अलावा मुझे कोई खास किस्म का कागज नहीं चाहिए। कागज कोई भी हो। बिना लाइनों का हो या लाइनों का! नया हो या पुराना! पत्रकार और लेखक के नाते मेरे पास भेंट में मिली डायरियों का भंडार है, जो मेरे जीवित रहने तक आराम से चल जाएगा। आजकल कोशिश करता हूं कि कच्चा-पक्का कोई भी रचनात्मक या गैर रचनात्मक विचार आए या कोई तथ्य नोट करना हो तो उसमें उसे नोट कर लूं, ताकि ढूंढऩे में आसानी हो।लिख-लिखकर बहुत सी पुरानी डायरियों को समय-समय पर नष्ट भी करता जाता हूं,ताकि मेरे बाद मेरी सन्तानों को व्यर्थ का भार न ढोना पड़े!
न मैं लिखने के लिए कभी पहाड़ों पर गया और न किसी समुद्र किनारे, न किसी कमरे में बंद रहा। वैसे भी मैं उपन्यासकार नहीं हूं और एक लिखा भी था तो नौकरी के दौरान समय मिलने पर छह साल में कंप्यूटर पर लिखा था।मैं बहुत देर तक घर के अंदर देर तक चुप तो रह सकता हूं मगर घंटे दो घंटे या हद से हद तीन घंटे बाद एकांत से घबरा जाता हूं। आसपास कोई होना चाहिए।
दुनिया माने या न माने, मुझे अपने कवि होने का भ्रम है और सामान्यत: कवियों को लिखने के लिए किसी भी तरह के तामझाम की जरूरत नहीं पड़ती। यूं तो कहानियां भी लिखी हैं और उनके कुछ संग्रह भी हैं मगर उसके लिए भी किसी अतिरिक्त बाहरी वातावरण की जरूरत नहीं पड़ी।लिखा और भी विधाओं में है मगर सब इसी साधारण ढंग से! जीवन में योजनाबद्ध ढंग से कुल दो काम किए : एक, रघुवीर सहाय की जीवनी और दूसरा, सुदीप बनर्जी पर मोनोग्राफ। वे भी घर के वातावरण में ही लिखे! सामग्री जुटाने के लिए जरूर बाहर गया।मिला।
एक समय था,जब मुझे घर के अंदर लिखते समय एकांत की जरूरत पड़ती थी और उसमें कोई विध्न पड़ता था तो क्रोध आता था।अब नहीं आता। डायरी के अंदर पेन पड़ा रहता है, जहां भी हूं, जो भी सूझ रहा है, झट नोट कर लेता हूं। बाद में ऐसा बहुत सा लिखा व्यर्थ लगता है तो उससे पीछा भी छुड़ा लेता हूं। कुछ से पीछा छुड़ाना इतना आसान भी नहीं होता!
अक्सर अपने लिखे पर काफी काम करने की कोशिश करता हूं। डायरी में अक्सर अनेक ड्राफ्ट बनाता हूं। इसमें अनेक बार उस रचना की आरंभिक शक्ल काफी बदल जाती है। फिर उसे मोबाइल पर नोट करता हूं और उसके बाद भी छपने तक काम चलता रहता है। एक बार में मुझसे लिखना सध नहीं पाता। भाषा, विचार और कल्पना तीनों को बार -बार संवारना पड़ता है।दूसरा किसी रचनात्मक विचार का बस एक सिरा पकड़ में आता है। बाद में उस पर काम करते-करते और कुछ आगे सूझता है या नहीं भी सूझता! इस सबके बावजूद कोई रचना उत्कृष्ट ही बनेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती!
बाकी जीवन को देखना-समझने की कोशिश करना अनेक तरह से चलता रहता है, जिसके लिए किसी टेबल-कुर्सी की दरकार नहीं। सडक़ पर अनेक बार बिना किसी उद्देश्य के भटकना, अखबार और किताबें पढऩा, संगीत सुनना, बेहतरीन फिल्म बीच-बीच में देखना, लोगों से मिलना,उनकी बातें सुनना,भीड़-भाड़ में घुसना, ये सब लिखने में सहायक बनते हैं। पत्रकारिता-खासकर रिपोर्टिंग के अनुभव ने काफी दिया -
फिर भी जितना अभी तक किया है, इतना अच्छा नहीं है कि संतोष हो!जीवन कितना विराट और सघन है और मेरा प्रयत्न कितना तुच्छ! जब तीन-चौथाई जिंदगी बीत चुकी है और बाकी एक चौथाई बची है या नहीं, इसका पता नहीं, तब यह अहसास और गहरा होता जा रहा है। शारीरिक अक्षमताएं रचनात्मक क्षमताओं को भी प्रभावित करती हैं पर इसी सब के बीच जितना और जो हूं, वो हूं पर हार मानना नहीं चाहता!
(वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश ने ‘लिखने की मेज’ शीर्षक से एक पुस्तक संपादित की है, जिसमें 125 लेखकों की टिप्पणियां शामिल हैं। उसमें मेरी यह टिप्पणी भी है।)
पूर्व क्रिकेटर और अब तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आज़ाद ने टी-20 वर्ल्ड कप ट्रॉफी को मंदिर में ले जाने की आलोचना की है. उनके इस बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है.
1983 में वर्ल्ड कप विजेता भारतीय टीम के सदस्य रहे कीर्ति आज़ाद ने कहा है कि जीतने वाली टीम में हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी थे लेकिन ट्रॉफी मंदिर ले जाई गई. इंडियन टीम को इस पर शर्म आनी चाहिए.
आज़ाद के इस बयान के बाद चैंपियन टीम के कोच गौतम गंभीर, टीम में शामिल ईशान किशन समेत कई पूर्व खिलाड़ियों और राजनीतिक नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है.
रविवार को भारत ने टी-20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड को 96 रन से हरा दिया था.
टी20 वर्ल्डकप की ट्रॉफी जीतने के बाद भारतीय टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव, कोच गौतम गंभीर और आईसीसी चेयरमैन जय शाह अहमदाबाद के एक हनुमान मंदिर पहुंचे थे. इस पर कीर्ति आज़ाद ने कमेंट किया था.
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट शेयर करते हुए लिखा, "शेम ऑन टीम इंडिया. हमने 1983 में कपिल देव की कप्तानी में वर्ल्ड कप जीता था, हमारी टीम में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और सिख थे. हम ट्रॉफी को अपनी धार्मिक जन्मभूमि, अपनी मातृभूमि भारत हिंदुस्तान में लेकर आए. आख़िर भारतीय क्रिकेट ट्रॉफी को क्यों घसीटा जा रहा है?"
उन्होंने आगे लिखा, "मस्जिद क्यों नहीं? चर्च क्यों नहीं? गुरुद्वारा क्यों नहीं? यह टीम भारत का प्रतिनिधित्व करती है- सूर्यकुमार यादव या जय शाह के परिवार का नहीं! सिराज ने इसे कभी मस्जिद में प्रदर्शित नहीं किया. संजू इसे कभी चर्च में नहीं ले गए. यह ट्रॉफी हर धर्म के 140 करोड़ भारतीयों की है. यह किसी एक धर्म की जीत का जश्न नहीं है!"
गौतम गंभीर ने क्या कहा?
भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर ने कीर्ति आज़ाद के बयान पर निराशा जताई है.
एएनआई के पॉडकास्ट में गौतम गंभीर ने कहा, "देखिए मैं इसके बार में क्या बोलूं. इस सवाल का जवाब देना भी बेकार है. पूरे देश के लिए एक बड़ा पल है. अगर आप मुझसे पूछे, तो यह हमारे पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ा पल है. मुझे लगता है कि यह ज़रूरी है कि हम वर्ल्ड कप विनर का जश्न मनाएं. इसीलिए मैंने कुछ बातें कहीं; कुछ बातों को उठाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि ये बातें सिर्फ़ उनकी (खिलाड़ियों की) कामयाबी को कमज़ोर करेंगी. अगर आप उन 15 खिलाड़ियों की कामयाबी और उनकी कोशिशों को कमज़ोर करना चाहते हैं, तो कल कोई भी उठकर कुछ भी बयान देगा और हम उसे गंभीरता से लेना शुरू कर देंगे, जो लड़कों के लिए सही नहीं है."
गौतम गंभीर ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ मैच के बाद खिलाड़ी जितने दवाब में थे और फिर वह चैंपियन बने, इस तरह के बयान उनकी कामयाबी को डिग्रेड करेंगे.
उन्होंने कहा,"कल्पना कीजिए कि लड़कों ने कितना कुछ झेला होगा. साउथ अफ्रीका के ख़िलाफ़ एक मैच हारने के बाद उन पर कितना प्रेशर रहा होगा. आज, अगर आप ऐसा बयान दे रहे हैं, तो आप सचमुच अपने ही खिलाड़ियों और अपनी ही टीम को नीचा दिखा रहे हैं, जो नहीं करना चाहिए."
ईशान किशन ने आज़ाद के कमेंट पर क्या कहा
पटना पहुंचे ईशान किशन ने एयरपोर्ट पर मीडिया से बात की. इस दौरान उनसे कीर्ति आजाद के कमेंट को लेकर सवाल किया गया, जिस पर उन्होंने कहा, "इतना अच्छा वर्ल्ड कप जीते. अच्छे सवाल आप लोग करिएगा. ये कीर्ति आज़ाद क्या बोले? इस पर मैं क्या बोलूं? कुछ अच्छा सवाल करिए."
कांग्रेस सांसद तारिक़ अनवर ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "कीर्ति आज़ाद बिल्कुल सही हैं. जो कुछ उन्होंने कहा है उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ. ये हमारे यहां परंपरा नहीं रही है कि ट्रॉफी को लेकर मंदिर या मस्जिद या दूसरी जगह जाएं. ये गलत परंपरा की शुरुआत है."
अहमदाबाद में हनुमान मंदिर के महंत ईश्वरदास महाराज ने कहा, "मैं कहना चाहता हूँ कि ये हमारी आस्था, श्रद्धा और दर्शन से जुड़ा है. लेकिन जो ये नहीं समझते वो इस पर सवाल उठाते हैं."
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, "मैं नहीं जानता कि ये किसने किया, लेकिन भारत सनातनियों से जुड़ा है. भारत की पहचान क्रिश्चियन और मुसलमानों से नहीं है."
शिव सेना के नेता कृष्णा हेगड़े ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "इसे धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है. भारतीय टीम को ये आज़ादी है कि वे जहाँ ट्रॉफी ले जाना चाहते हैं, ले जा सकते हैं. उन्हें कीर्ति आज़ाद से परमिशन लेने की ज़रूरत नहीं है. कीर्ति आज़ाद को ऐसे भड़काऊ भाषण देकर समुदायों के बीच बंटवारे की कोशिश नहीं करनी चाहिए."
पूर्व भारतीय स्पिन गेंदबाज और आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद हरभजन ने कहा कि भारतीय कप्तान और कोच के मंदिर जाने पर इस तरह के सवाल नहीं खड़े किए जाने चाहिए और यह उनकी आस्था है.
हरभजन ने कहा, ''उनकी बातें मत सुनिए. देखिए खेल और राजनीति को अलग रखिए. आपकी आस्था है आप मंदिर जाइए, गुरुद्वारे जाइए या कहीं भी जाइए. अगर वह कहीं गए भी हैं, तो यह उनकी इच्छा है.'
कौन हैं कीर्ति आज़ाद
ईएसपीएन क्रिकइंफो के मुताबिक दाएं हाथ के बल्लेबाज़ और ऑफ़ ब्रेक गेंदबाज़ कीर्ति आज़ाद ने भारत के लिए 7 टेस्ट मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 135 रन बनाए.
आज़ाद ने 1981 में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ वेलिंगटन में अपने टेस्ट करियर की शुरुआत की थी.
वनडे मुक़ाबलों की बात करें तो उन्होंने टीम इंडिया की तरफ से पहला मुक़ाबले 6 दिसंबर 1980 को ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खेला था.
उन्होंने 25 वनडे मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 269 रन बनाए. वनडे में उनका सर्वोच्च स्कोर 39 रन (नाबाद) रहा.
कीर्ति आज़ाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली, पर वे 1980 लेकर 1990 के मध्य तक दिल्ली क्रिकेट के आधार स्तंभ रहे.
उनके नेतृत्व में ही दिल्ली ने 1991-92 में 16 साल के अंतराल के बाद रणजी ट्रॉफ़ी जीतने का कारनामा दिखाया था.
यह भी संयोग है कि दिल्ली जिन पांच मौक़ों पर रणजी चैंपियन बनी, उनमें खेलने वाले कीर्ति अकेले खिलाड़ी हैं.
कीर्ति आज़ाद 2002 से 2006 के बीच उत्तर क्षेत्र की ओर से राष्ट्रीय चयनकर्ता भी रहे.
यह वो दौर था जब एमएस धोनी, पार्थिव पटेल, एल बालाजी, आकाश चोपड़ा, इरफ़ान पठान, गौतम गंभीर और श्रीसंत जैसे क्रिकेटरों ने अपना डेब्यू किया था.
इसके अलावा कीर्ति आज़ाद इंडियन प्रीमियर लीग के भी कटु आलोचक रहे हैं.
उन्होंने इसे मैच फ़िक्सिंग को बढ़ावा देने वाला टूर्नामेंट बताया था. आईपीएल से जुड़े विवादों में उन्होंने यह भी कहा था कि बीसीसीआई से जुड़ाव होने पर उन्हें ग़ुस्सा भी आ रहा है और शर्म भी.
क्रिकेट से रिटायरमेंट लेने के बाद कीर्ति आज़ाद राजनीति में आ गए थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-संदीप राय
इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग का आर्थिक असर अब और साफ़ नजऱ आने लगा है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने और खाड़ी देशों की रिफ़ाइनरियों पर हो रहे हमलों से कच्चे तेल का संकट गहरा गया है।
शनिवार रात को ईरान की राजधानी तेहरान में एक बड़े तेल डिपो पर हमले के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। सोमवार को एक ही ट्रेडिंग सेशन में कच्चे तेल की क़ीमतें 23 डॉलर तक चढ़ गईं थीं और अंत में यह 103 डॉलर प्रति बैरल पर थमीं।
दरअसल, बढ़ती अनिश्चितता के बीच ख़बर आई है कि जी-7 देश अपने स्ट्रैटेजिक तेल रिज़र्व से 300 से 400 मिलियन बैरल तेल जारी कर सकते हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, जापानी वित्त मंत्री सतसुकी कतायामा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने जी-7 देशों से अपने रिज़र्व को चरणबद्ध तरीक़े से खोलने को कहा है।
आईईए में 30 देश हैं, जिन्हें 90 दिनों की ज़रूरत का तेल भंडार रखना ज़रूरी होता है।
रॉयटर्स का कहना है कि जापान अपने अपनी कुल खपत के 95त्न के लिए आयात पर निर्भर है और उसके पास सबसे बड़ा तेल रिजर्व है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बहुत कम समय के लिए तेल का बढ़ा दाम, वैश्विक शांति के लिए बहुत छोटी सी क़ीमत है।
लेकिन ट्रेडिंग डॉट कॉम के सीईओ पीटर मैकगियर ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकते हैं।
तेल के दामों पर नजऱ रखने वाले द स्पेक्टेटर इंडेक्स के मुताबिक़, कच्चे तेल के दाम में 30 फीसदी, ब्रेंट क्रूड ऑयल में 26 फीसदी, हीटिंग ऑयल में 22 फीसदी और पेट्रोल में 14 फीसदी का उछाल आया।
एशिया के शेयर बाज़ारों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली। कारोबारी सत्र के दौरान दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम, भारत और चीन के शेयर बाज़ार 1 से 6 फीसदी तक लुढक़ गए।
जाहिर है इस उथल-पुथल का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत को रूसी तेल खरीदने की 30 दिन की मोहलत दी है, ये कहते हुए कि इससे तेल के दाम नियंत्रित करने में सहूलियत होगी।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने इस पर सफाई दी कि ‘यह अस्थायी कद़म है, जिसका मक़सद ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल के बाज़ार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है।’
लेकिन बढ़ते संघर्ष ने कई देशों को एहतियाती क़दम उठाने पर मजबूर किया, जिसमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बेटी और पाकिस्तान के पंजाब सूबे की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ ने कहा है कि सरकारी अधिकारियों को दी जाने वाली ईंधन सप्लाई में कटौती की जाएगी।
एक्स पर उन्होंने लिखा, ‘जब तक पेट्रोलियम संकट का समाधान नहीं हो जाता, प्रांतीय मंत्रियों के लिए आधिकारिक ईंधन आपूर्ति निलंबित रहेगी। मैंने सरकारी अधिकारियों के वाहनों के लिए पेट्रोल और डीज़ल भत्ते में तुरंत 50 प्रतिशत कटौती के आदेश भी दिए हैं।’
अनिश्चितता के बीच भारत पर असर
विदेश नीति विशेषज्ञ हर्ष वी पंत ने बीबीसी हिन्दी के एक कार्यक्रम में कहा कि ‘जिस तरह के हालात हैं उसमें तेल के दाम बढऩे तय हैं और वैश्विक महंगाई पर भी इसका असर होगा। आईएमएफ़ की ओर से बार बार कहा जाने लगा है कि अब कुछ भी हो सकता है और इसके लिए देशों को तैयार रहना चाहिए।’
उन्होंने कहा, ‘मौजूदा स्थिति में दुनिया की जो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं उन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जबकि कमज़ोर अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही हैं। और ट्रंप का जो बयान है उससे यही लगता है कि या तो उन्हें दीर्घकालिक असर की कोई परवाह नहीं है या उन्हें इसकी समझ नहीं है।’
ऐसे में भारत की रणनीति क्या होगी, इस पर वो कहते हैं, ‘भारत अपने तेल आयात का डायवर्सिफिक़ेशन करता रहा है। जब यूक्रेन का युद्ध शुरू हुआ तो भारत ने रूस से भारी मात्रा में तेल लेना शुरू कर दिया, जबकि उसके पहले महज कऱीब 2 प्रतिशत ही तेल आयात करता था।
वो कहते हैं, ‘उस समय भारत ने ये सबक लिया था। लेकिन इस समय मजबूरी ये है कि संघर्ष के दायरे में पश्चिम एशिया आ गया है और यह वैश्विक तेल बाजार का केंद्र है तो ऐसे में इसका असर होना लाजिमी है।’
उनके अनुसार, ‘एक समय कहा जा रहा था कि लैटिन अमेरिकी देश वेनेज़ुएला से तेल आयात होगा, लेकिन यह कितना हो पाता है, ये आने वाले समय में ही पता चलेगा।’
मलेशियाई एयरलाइंस की फ्लाइट एमएच 370, 2014 में रडार से ओझल हो गई थी। इसमें 239 लोग सवार थे, और तब से ना विमान का और ना लोगों का कोई सुराग मिल पाया।
डॉयचे वैले पर रजत शर्मा की रिपोर्ट –
मलेशियाई एयरलाइंस की फ्लाइट एमएच 370 की ताजा तलाश जनवरी में खत्म हो गई। यह तलाश बिना किसी नतीजे के समाप्त हुई है। एमएच 370 विमान 2014 में उड़ान भरने के बाद गायब हो गया था और आज भी विमानन जगत का सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है। मलेशिया के परिवहन मंत्रालय ने 8 मार्च को यह जांच खत्म होने की जानकारी दी है।
239 लोगों को ले जा रहा यह बोइंग 777 विमान 8 मार्च, 2014 को रडार की स्क्रीन से अचानक ओझल हो गया था। यह फ्लाइट कुआलालंपुर से बीजिंग जा रही थी। इसके यात्रियों में से दो-तिहाई चीनी नागरिक थे। बाकी यात्रियों में मलेशिया, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के अलावा भारत, अमेरिका, नीदरलैंड और फ्रांस के नागरिक शामिल थे। विमानन इतिहास की सबसे बड़े खोज और पड़ताल अभियानों के बावजूद, ना तो वह विमान मिला और ना ही वे ब्लैक बॉक्स बरामद हुए। जाहिर है, इसके यात्रियों का भी आज तक कोई पता नहीं चला।
दिसंबर 2025 में शुरू हुई इस नई तलाश में लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर का इलाका तलाशा गया। मलेशिया के परिवहन मंत्रालय ने बयान में कहा, इन कोशिशों में मलबे की सही जगह का कोई सुराग नहीं मिला है। ब्रिटेन और अमेरिका की खोजी कंपनी ओशन इन्फिनिटी ने इस तलाश की कमान संभाली थी। ताजा अभियान 23 जनवरी को पूरा हुआ।
-संजीव चंदन
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने जेडीयू ज्वाइन कर लिया है और जैसा कि दृश्यों में है 50 वर्षीय निशांत कुछ नेताओं की छाया में और पिता की निगरानी में राजनीति सीखेंगे।
भारत कई प्रकार के पाखंड का देश है, उसमें से एक पाखंड है- राजनीति में वंशवाद पर हंगामा। लोग अपनी सुविधा से करते हैं। अपने मामले में अपने बेटे ( बेटी दूसरी चॉइस होती है) को अपना सब सौंप देने वाले लोग इसपर सबसे अधिक हंगामा करते हैं।
जदयू में निशांत की मांग भारतीय समाज के वंशवादी चरित्र की ही मांग थी और लंबे समय तक इसे रोक रखने वाले नीतीश भी अंतत: सहमत हो गए। सवाल है कि निशांत के बिना क्या जदयू मनीष वर्मा या संजय झा, या श्रवण कुमार के साथ बची रह सकती थी? वैसे बची रहने की उम्मीद अभी कम ही हुई है।
सवाल है कि तेजस्वी यादव या लालू प्रसाद की किसी संतान के बिना राजद की विरासत साबुत बची रहेगी, रहती? हां, नीतीश कुमार के पास यह सुविधा नहीं है कि वे अपने कुछ पुत्रों/पुत्रियों में से योग्य का चुनाव करते-सारा फूल उन्हें महादेव पर ही देना था-क्षमता, योग्यता/ अयोग्यता तो राजनीति तय कर देगी, समय तय कर देगा।
सवाल है कि रामविलास पासवान की विरासत चिराग पासवान को ही नहीं सौंप दिया समाज ने- चाचा भी विलेन हुए और बहनोई भी, पितृसत्ता ऐसे ही काम करती है।
अखिलेश यादव के आगे चाचा शिवपाल यादव सरेंडर हुए, अन्यथा सपा की जान आधी से भी कम हो जाती। जान रहती भी या नहीं, पता नहीं।
बसपा को भी अंतत: वंशवाद के दायरे में ही आना पड़ा, हालांकि बहन जी को वहां चुनाव का विकल्प था। कांशीराम जी ने जब लोकतंत्र की महान घटना को अंजाम दिया था, तब तक वंशवाद का मुद्दा भारतीय राजनीति का मुद्दा था ही था।
सवाल है कि जदयू या राजद ही क्यों? राहुल गांधी के बिना कांग्रेस की कल्पना ही कितने लोग कर पा रहे हैं? जैसे निशांत वैसे राहुल। हां, वहां सोनिया को प्रियंका का च्वाइस है, कांग्रेस जनों को भी-लेकिन समाज में पितृसत्ता भी कोई चीज होती है, पाखंडियों के बीच जारी पितृसत्ता।
आज जो पटना में हुआ, वह एक अनिवार्य दृश्य था बिहार की राजनीति में। जदयू सत्ता के लिए अवसरवादियों का एक संगठन है। एक दौर में वह बदलाव का एजेंडा लेकर चला था, अलग-अलग कारणों से लालू प्रसाद की सत्ता का विकल्प पैदा करने की आकांक्षा वाले समूहों के लिए अम्ब्रेला संगठन! नीतीश जी सबके नेता थे, सबकी उम्मीद।
आज के दृश्य से यह जरूर कोशिश होगी कि संजय झा, ललन सिंह, विजय चौधरी पर उठ रही उंगलियां थोड़ी कम होंगी। लेकिन इसमें भी शह और मात का खेल है। मात किसे मिली वह आज भी स्पष्ट है और वक्त भी बताएगा। अचानक के राजनीतिक घटनाक्रम में बहुत सी कथाएं होती हैं, समाने आएंगी। मोहन भागवत की कथा जग जाहिर है।
इन सबके बीच राजनीति का नया अध्याय शुरू होगा बिहार में-बीजेपी का पंजा मजबूत होगा। वंशवाद के भीतर से नेता उभरेंगे आदि। लोहिया आदि द्वारा उभारा गया वंशवाद का मुद्दा सामयिक था, उसी समय खत्म हो गया था, जब उस मुद्दे पर नारा लगाते नेताओं का वंश बना।
फिलहाल तो निशांत कुमार को मंगलकामनाएं!
-डॉ. परिवेश मिश्रा
सदियों से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलितों को अलग थलग कर, अपमानित और प्रताडि़त कर, जिस अमानवीय स्थिति में पहुँचाया गया था, उसकी मजबूत जड़ों को हिलाने के जितने श्रेय का अधिकार अंग्रेजों ने अर्जित किया था उतना उन्हें दिया नहीं गया। समाज सुधार या दलितों का उद्धार उनका लक्ष्य कतई नहीं था यह अलग बात है। लेकिन जड़ों को ढीला करने की उपलब्धि उनके खाते में अवश्य जाती है। यह काम मुख्य रूप से ब्रिटिश फ़ौज और रेलवे के माध्यम से हुआ था।
राय बहादुर पंडित सर शीतला प्रसाद बाजपेयी के पिता अवध के एक ताल्लुकेदार थे। उनके पुत्र सर गिरिजाशंकर बाजपेयी आज़ादी मिलने के समय विदेशी मामलों में सबसे वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी थे। पंडित नेहरू ने विदेश मंत्री का जि़म्मा अपने पास रख कर गिरिजाशंकर बाजपेयी को विदेशी मामलों के लिए अपना मुख्य सलाहकार तथा विदेश मंत्रालय का सेक्रेटरी जनरल नियुक्त किया था। (आगे चलकर इनके तीन में से दो बेटे भारत के विदेश सचिव बने। तीसरे दून स्कूल के हेडमास्टर रहे)।
1915 में युवा गिरिजाशंकर जब आईसीएस के इंटरव्यू के लिए पहुंचे तब उनसे पूछा गया था कि क्या उन्होंने पंडित सीताराम पांडे की आत्मकथा पढ़ी है? बाजपेयी ने अपने जवाब से इंटरव्यू लेने वालों को हैरान कर दिया। उन्होंने कहा कि हाँ, अवधी में लिखी मूल पाण्डुलिपि को पढ़ा है जिसे सीताराम पांडे ने गिरिजाशंकर के दादा के हवाले छोड़ा था।
रायबरेली के समीप गांव तिलोई के पंडित सीताराम पांडे ( हालाँकि तब सरनेम लिखने का चलन नहीं था) ने 1812 से 1860 तक उस फौज में नौकरी की जिसे आम जनता उनकी वर्दी के रंग के कारण लाल पलटन और अंग्रेज़ बंगाल नेटिव आर्मी कहते थे। एक अंग्रेज़ अधिकारी के प्रोत्साहन पर सेवानिवृत्ति के बाद उनकी लिखी आत्मकथा का अंग्रेज़ी अनुवाद बाद में भारत आने वाले सभी अंग्रेज़ फ़ौजी अधिकारियों को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता था। इसकी मूल पांडुलिपि किसी के पास सुरक्षित रह गई यह जानकारी सभी को चौंकाने वाली थी।
1815 के आसपास सीताराम की टुकड़ी आगरा से बुंदेलखंड की ओर मार्च करते समय शायद चंबल घाटी के इलाक़े में थी जब पिंडारियों से हुई मुठभेड़ में इनके कंधे में गोली लगी और ये बुरी तरह घायल होकर लुढक़ते हुए पहाड़ी जैसे स्थान की तलहटी में पहुंच कर दो दिन बेहोश पड़े रहे। होश आने पर गायों के गले में बँधी घंटियों की आवाज़ कान में पड़ी। कुछ घंटों के बाद एक धूल धूसरित बच्ची ने इन्हें देखा। इशारे से बताया प्यास बहुत लगी है। उस बच्ची ने पास ही मवेशियों के लिए खोदे गए गड्ढे नुमा कुएँ से मटमैला पानी निकाल कर इन्हें दिया जो इन्होंने हथेलियों को जोड़ कर पी लिया। बाद में गांव वाले आये, उठाकर इन्हें अपने बीच ले गए। आश्रय देने वालों की जाति का अनुमान करना इस जनेऊ और चोटीधारी ब्राह्मण सैनिक के लिए मुश्किल नहीं था। यहां इन्होंने अगले दो दिन अपने सामान के साथ बची सूखी रोटियां खा कर बिताए।
घायल होने के कारण नौकरी का पहला अवकाश मिला। स्वास्थ्य लाभ के दौरान गांव को बच्चों को कि़स्से सुनाने के दौरान एक दिन यह कि़स्सा भी सुना बैठे जो आसपास मँडराते बड़ों के कानों में पड़ गया। सिपाही जी जाति से बहिष्कृत हो गए। वापस शामिल होने के लिए पूजा-हवन के बाद पूरे गांव को जो भोज कराना पड़ा उसमें तब तक की सारी कमाई खप गई थी।
सिलसिला चल निकला। हर छुट्टी पर कोई न कोई कारण तैयार मिलता और यह भोज होता। लेकिन सीताराम पांडे हर बार लौट कर फ़ौज में जाते रहे। हालाँकि पानी पीना पिलाना बड़ा मुद्दा बना रहा। 1857 में जब मातादीन भंगी को मंगल पांडे ने पानी पिलाने से इंकार किया तभी बात कारतूस और गोमांस से होते आगे बढ़ी थी। लेकिन फाँसी पर दोनों लटके। 1860 के बाद हुए फ़ौज के पुनर्गठन पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा। ब्राह्मण-क्षत्रिय बहुलता वाली इनकी जैसी इकाइयां भंग कर दी गईं। अस्तित्व में आई नयी रेजिमेंटों में जातियों का अनुपात बड़ा फ़ैक्टर था। आगे चलकर, 1941 में तो पूरी की पूरी महार रेजिमेंट ही खड़ी कर दी गई।
जब फ़ौज अफग़़ानिस्तान गयी तब तक रेल आ चुकी थी। सिपाहियों से ठुंसे रेल डिब्बों में शारीरिक स्पर्श की वर्जना भी जाती रही।
रेल के आने के साथ और भी बातें हुईं। श्रम के लिए गाँव से पलायन की परंपरा ने जड़ें पकडऩा शुरू की। पहाड़ों, नदियों, जंगलों, पथरीले मैदानों को काटना, बराबर करना, साथियों के साथ भारी रेल पांतों को कंधे पर ढो कर ले जाना जैसे काम मज़बूत और समर्पित वर्क-फ़ोर्स की मांग करते थे। ज़मींदारों और बड़े भू-स्वामियों का बेगार करते और गाँव में अपमानित होते भूमि-हीन वर्ग को पहली बार जीविकोपार्जन के लिए विकल्प मिला।
देश भर में रेल्वे में भारी संख्या में दलितों को नौकरियाँ मिलीं। आमतौर पर वे ‘गैंगमैन’ कहलाए। गाँवों से बैलगाडिय़ों में लद कर आने वाले अनाज की बोरियों को पीठ पर लादकर डिब्बों तक पहुँचाने वाले कुली, या छोटे स्टेशन से दूर, कई बार जंगल में, सिग्नल तक जा कर केरोसिन डाल कर बत्ती जलाने वाले, या सौ किलो से भारी ‘कपलिंग’ को हाथों से उठाकर इंजन से जोड़ते और अलग करते ‘पॉईँट्समैन’, वर्कशॉप के मज़दूर, जो भी नाम और काम हो, इन्हें पहले टेन्ट में और उसके बाद पहली बार रेलवे क्वार्टर में रहने का अवसर मिला जहाँ उसी स्थान में, और कभी-कभी तो उसी क्वार्टर में, शूद्र भी रहा करते थे। इन घरों के बीच एक कुआं होता था और पहली बार इन्हें उसी कुएँ से खींचकर पानी पीने का मौक़ा मिला जिससे दूसरे पीते थे। गाँव में अन्य जातियों और इनके बीच कपड़े पहनने की अलग-अलग शैलियाँ निर्धारित थीं। रांगेय राघव ने एक स्थान पर लिखा था, धोती की लंबाई (या ऊँचाई) और समाज में दर्जा, विपरीत दिशा में चलते हैं। धोती जितने नीचे तक, दर्जा उतना ऊँचा। और इसका उलट भी। फौज की तरह रेलवे की यूनिफॉर्म ने यह अंतर मिटा दिया। स्टेशन मास्टर लगभग हमेशा अंग्रेज़ रहे जिनके घर के काम के नाम पर पहली बार किसी ग़ैर-दलित के घर के अंदर प्रवेश का मौका मिला। गार्ड और ड्राइवर भी आसपास ही रहते थे जो अपनी ड्यूटी के दौरान रेलवे से मिली लकड़ी की काली बड़ी संदूक में कपड़े-लत्ते के अलावा दो-तीन दिन का राशन पानी ले कर चला करते थे। इन संदूकों को घर से लाने ले जाने का काम यही ‘बॉक्समैन’ करते थे। हालांकि, कुछ गार्ड और ड्राइवर उन जातियों के थे जिनकी महिलाएँ इन संदूकों को न केवल स्वयं घर की दहलीज तक पहुँचा देती थीं बल्कि पति को सख़्त हिदायत देतीं कि रेल में लोड होने के बाद गंगा जल वैसे ही छिडक़ लें जैसा संदूक की वापसी पर वे स्वयं करती थीं। लेकिन बहुतेरे एंग्लो-इंडियन थे जिनके घरों में इनके प्रवेश पर रोक नहीं थी। धीरे ही सही, बरसों की सड़ चुकी व्यवस्था में दरार आना शुरू हो गईं।
रेलवे की नौकरी ने पहली बार इन दलितों के बच्चों को स्कूल पहुँचने का मौका दिया। हैदराबाद में कैमिस्ट्री के प्रोफेसर रहे डॉ. वाय.बी. सत्यनारायण के गांव से निकाले गये दादा नरसैया रेलवे में एक छोटे से स्टेशन पहुंच कर गैंगमैन बन गये थे। पिता बलिया की पास के गांव के स्कूल जाने की जि़द तो दादा पूरी नहीं कर पाए किंतु मस्जिद के मौलाना ने अक्षर ज्ञान देकर पूरे कुनबे और बिरादरी में पहला साक्षर खड़ा कर दिया था। जैसा उन्होंने अपनी पुस्तक ‘माय फादर बलिया’ में लिखा, चूँकि रेल अंग्रेजों की थी, जब दादा के बाद रेलवे सेवा में आ चुके पिता बलिया अंग्रेज स्टेशन मास्टर की अनुशंसा के साथ बेटे सत्यनारायण को लेकर पास के गाँव के स्कूल पहुंचे तो किसी की हिम्मत नहीं हुई दाखिले के लिए इंकार करने की।
भारत के कुछ राज्यों में टीनएजर बच्चों के मोबाइल और सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के बारे में सोचा जा रहा है। वहीं कई विशेषज्ञों और पेरेंट्स का मानना है कि बैन करने के बजाय एक जिम्मेदार डिजिटल नीति अपनाई जानी चाहिए।
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
अर्पिता मुखर्जी मुंबई में एक कंटेंट क्रिएटर हैं। वह फैशन, लाइफस्टाइल और पैरेंटिंग से जुड़े रोजमर्रा के अनुभवों पर रिलेटेबल कंटेंट बनाती हैं। उनके दोनों बच्चे कपड़ों के ब्रांड्स के लिए शूट किया करते थे। लेकिन अर्पिता ने इसे बंद करने का फैसला किया।
उन्हें डर है कि बच्चों की तस्वीरों से आपत्तिजनक कंटेंट बनाकर ऑनलाइन फैलाया जा सकता है। लेकिन अर्पिता यह भी मानती हैं कि अचानक सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से समस्याएं बढ़ सकती है, क्योंकि अधिकांश किशोर पहले से ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और कई इससे कमाई भी कर रहे हैं।
हाल ही में भारत के कुछ राज्यों ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया है। कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया और मोबाइल उपयोग पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस विषय पर विभिन्न पक्षों से राय ली जा रही है। एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने चिंता जताते हुए कहा कि डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के चलते बच्चों की सीखने की क्षमता पर प्रभाव पड़ रहा है। इसी तरह आंध्र प्रदेश और गोवा भी स्कूली छात्रों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए संभावित कानून पर विचार कर रहे हैं।
भारत से पहले कई देश इस दिशा में महत्वपूर्ण फैसले ले चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों को बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, यूट्यूब, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और एक्स पर अकाउंट बनाने और उपयोग करने से रोकने वाला व्यापक कानून लागू किया है। इसके तुरंत बाद स्पेन यूरोप का पहला देश बन गया जिसने भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की योजना घोषित की। स्पेनिश प्रधानमंत्री का कहना है कि एज वेरिफिकेशन में सख्ती और कंपनियों की जवाबदेही के जरिए बच्चों को हानिकारक कंटेंट, लत और दुष्प्रभावों से बचाना जरूरी है।
वहीं मेटा का कहना है कि सिर्फ प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के मामले में मेटा ने बताया कि उसने बच्चों के कई अकाउंट हटाए हैं। साथ ही सरकारों से मिलकर काम करने की अपील की है जिससे बच्चों के लिए ऑनलाइन स्पेस को सुरक्षित बनाया जा सके।
विज्ञापन से बच्चों को बचाना जरुरी
अर्पिता ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘शुरू से ही मैंने सोच-समझकर कदम उठाए हैं। मेरे बच्चे कोई भी वीडियो या यूट्यूब हमेशा टीवी पर देखते हैं, ताकि स्क्रीन का उपयोग नियंत्रित हो। मैं उन्हें खाना खाते समय या शांत कराने के लिए मोबाइल नहीं देती। मैं चाहती हूं कि वे अपने आसपास के माहौल से सीखें। न कि एक ही जगह बैठकर स्क्रीन में खो जाएं।’
उनकी मुख्य चिंता विज्ञापनों को लेकर है। रील्स पर एडल्ट कंटेंट और फिल्मों से जुड़े कई विज्ञापन दिखाई देते हैं। यदि सोशल मीडिया पर सख्ती बढ़ेगी, तो ये विज्ञापन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर शिफ्ट हो सकते हैं। अर्पिता कहती हैं, "उन पर निगरानी व नियंत्रण और भी मुश्किल हो जाएगा। बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। जिस काम को उनसे दूर किया जाता है, उसे पाने की इच्छा और बढ़ जाती है। इसलिए केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय कंपनियों के लिए स्पष्ट नियम और जवाबदेही तय करना जरुरी है।’
क्यों लग जाती है सोशल मीडिया की लत?
बैन के लिए इसी आयु वर्ग को इसलिए चुना गया है क्योंकि इस उम्र में बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता। डॉ। नेहा बंसल पेरेंटिंग और बाल्यावस्था विशेषज्ञ हैं। वह समझाती हैं, "दिमाग का एक हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहा जाता है, वह फैसला लेने, आत्म-नियंत्रण और जोखिम का आकलन करने के लिए जिम्मेदार है। यह हिस्सा किशोरावस्था में विकसित हो रहा होता है।’
इसी कारण ऐसा माना जाता है कि इस आयु वर्ग के बच्चे सोशल मीडिया के दबाव को संभालने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उनका लिम्बिक सिस्टम भी अधिक सक्रिय रहता है। जिससे वे भावनात्मक रूप से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ऑनलाइन कंटेंट, तुलना या ट्रोलिंग का उन पर गहरा असर पड़ सकता है। जो बच्चे तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, उनमें गुस्सा, चिड़चिड़ापन और व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित हो रही हैं। वे खुद को परिवार से अलग कर बातचीत कम कर देते हैं।
नेहा आगे कहती हैं, "माता-पिता डॉक्टर के पास तब आते हैं जब उनके बच्चों पर सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के दुष्प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। मोटापे के मामलों में लगभग 80 प्रतिशत तक वृद्धि देखी जा रही है। बच्चों में नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। माता-पिता की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखें, संतुलन बनाए और उन्हें स्वस्थ डिजिटल आदतें सिखाएं।’
-दिलनवाज पाशा
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने गुरुवार को दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास में ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई को श्रद्धांजलि दी।
उन्होंने ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका में भारत की तरफ़ से संकेत भी लिखा।
ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई की शनिवार को अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले के दौरान मौत हो गई थी।
ख़ामेनेई की मौत के पांच दिन बाद गुरुवार को पहली बार भारत ने संवेदना व्यक्ति की है।
हालांकि, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने युद्ध के पहले दिन ईरानी विदेश मंत्री सय्यद अब्बास अराग़ची से फ़ोन पर बात ज़रूर की थी लेकिन इस बातचीत के बाद जारी किए गए प्रेस नोट में भारत की तरफ़ से शोक संवेदना प्रकट करने या अमेरिका-इसराइल के हमले की आलोचना करने का कोई जिक़़्र नहीं था।
भारत ख़ामेनेई की मौत के पांच दिनों तक ख़ामोश रहा। भारत में विपक्षी दलों ने सरकार की ईरान के मुद्दे पर ख़ामोशी को लेकर सवाल उठाए हैं।
साल 2024 में जब एक हेलीकॉप्टर क्रैश में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत हुई थी तब भारत ने एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया था।
रईसी की मौत के बाद भारत सरकार के प्रवक्ता ने कहा था, ‘स्वर्गीय गरिमामय व्यक्तियों को श्रद्धा के प्रतीक के रूप में भारत सरकार ने फैसला किया है कि 21 मई (मंगलवार) को पूरे भारत में एक दिन का राजकीय शोक मनाया जाएगा।’
वहीं, साल 2020 में जब अमेरिका ने एक हवाई हमले में ईरान के शीर्ष जनरल क़ासिम सुलेमानी को मारा था तब भारत ने इस पर बयान जारी करते हुए तनाव को चिंताजनक बताया था।
तब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा था, ‘हमने नोट किया है कि एक वरिष्ठ ईरानी नेता को अमेरिका ने मार गिराया है।’
इस बयान में कहा गया था, ‘बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा भारत के लिए सर्वोपरि महत्व रखती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि स्थिति और बिगड़े नहीं।’
वहीं, पिछले साल जून में अमेरिका-इसराइल ने ईरान के परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर हमले किए थे, उसके तुरंत बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान से फ़ोन पर बात की थी और बढ़ते तनाव को लेकर ग़हरी चिंता ज़ाहिर की थी।
यही नहीं, शुरुआती हिचक के बाद भारत ने एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) और ब्रिक्स के अमेरिका-इसराइल के हवाई हमले की आलोचना करने वाले बयानों पर भी हस्ताक्षर किए थे।
जून 2025 में चले 12 दिनों के संघर्ष के दौरान ईरान ने भारत को विशेष छूट देते हुए भारतीय छात्रों को वापस ला रहे भारतीय विमानों के लिए अपने हवाई क्षेत्र को खोल दिया था।
क्या है वजह?
अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत ने किसी राजकीय शोक की घोषणा नहीं की है और ना ही हवाई हमले में उनकी मौत की खुल कर आलोचना की।
ये सवाल भी उठ रहा है कि भारत के ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर शोक संवेदना प्रकट ना करने या मौजूदा संघर्ष के दौरान ईरान के स्कूल और अस्पतालों पर हुए हमलों की आलोचना ना करने का क्या कारण है।
विश्लेषक इसे वैश्विक राजनीति और बदलते परिदृश्य से जोडक़र देख रहे हैं।
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक लेख में भारत की ख़ामोशी की वजहों की तरफ़ संकेत करते हुए लिखा, ‘भारत ने हमलों की आलोचना नहीं की है, जिसे समझा जा सकता है क्योंकि हमने यूक्रेन में रूस के सैन्य दख़ल की आलोचना भी नहीं की थी।’
सिब्बल ने तर्क दिया, ‘यह मुद्दा आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की कूटनीति की परीक्षा लेगा, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह चुप्पी भारत की उस व्यापक नीति के अनुरूप है जिसमें महाशक्तियों के संघर्षों में उलझने से परहेज किया जाता है, जब इसके मूल हित (जैसे अमेरिका, इजऱाइल और खाड़ी देशों के साथ संबंध) दांव पर होते हैं।’
वहीं ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक टिप्पणी में भारत के पूर्व राजदूत राकेश सूद ने भारत की चुप्पी के तीन अहम कारण बताए हैं।
पूर्व राजदूत राकेश सूद का कहना है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी को मौजूदा जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना होगा। उनके मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं।
वे कहते हैं कि पहला कारण यह है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा जटिल हो चुकी है और भारत को कई प्रतिद्वंद्वी हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।
दूसरा, पिछले कुछ दशकों में ईरान के साथ भारत के रिश्ते सीमित होते गए हैं, भले ही चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट मौजूद हों। तीसरा, ख़ामेनेई ने बीते वर्षों में कश्मीर और भारत में अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सार्वजनिक टिप्पणियां की थीं, जिन्हें नई दिल्ली ने सकारात्मक रूप से नहीं लिया। सूद के मुताबिक इन सभी कारकों ने मिलकर भारत के लिए इस मामले में सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देना और भी जटिल बना दिया।
वहीं जेेएनयू के प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैपीमोन जैकब ने भारत की कूटनीतिक रणनीति को ‘संतुलित संदेश की कला’ कहा है।
उनके मुताबिक विदेश मंत्री एस। जयशंकर ने इसराइल और ईरान — दोनों देशों के अपने-अपने समकक्षों से अलग-अलग बातचीत में तनाव कम करने की अपील की। साथ ही विदेश मंत्रालय के बयान में ‘देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान’ की बात कही गई, जिसे बिना अमेरिका या इसराइल का नाम लिए उनके हमलों की एक तरह की आलोचना के रूप में देखा गया।
जैकब के अनुसार यह रुख़ भारत के लिए एक व्यावहारिक संतुलन साधने की कोशिश है, क्योंकि इस क्षेत्र में उसकी ऊर्जा ज़रूरतें, बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी और व्यापार व कनेक्टिविटी से जुड़े महत्वपूर्ण हित दांव पर लगे हैं।
बिहार के एक मंत्री ने चालू विधानसभा सत्र में माना कि राज्य के कई इलाकों में पीने के पानी में नाइट्रेट और लेड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। राज्य सरकार की इस स्वीकारोक्ति ने पेयजल की गुणवत्ता को लेकर फिर से बहस छेड़ दी है।
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार का लिखा-
बिहार विधानसभा के चालू सत्र में राज्य के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) के जिम्मेदार मंत्री की इस स्वीकारोक्ति ने एक बार फिर पेयजल की गुणवत्ता को लेकर बहस छेड़ दी है। प्रदेश के कई हिस्सों में ग्राउंड वाटर में आयरन, आर्सेनिक व फ्लोराइड तो पहले से ही चिंता का सबब बनी हुई थी।
दरअसल, सत्ता पक्ष के विधायक दुलाल चंद्र गोस्वामी सहित अन्य सदस्यों ने सीमांचल के कई इलाकों में दूषित पेयजल के कारण कैंसर के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए बिहार विधानसभा में सरकार का ध्यान आकृष्ट किया था। उनका कहना था कि नल-जल योजना का पानी इतना दूषित है कि लोग इसके बदले हैंडपंप का पानी पी रहे हैं। इस पर विभागीय मंत्री ने स्थिति की भयावहता को स्वीकार किया तथा सदन को बताया कि 14 जिलों के पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है और 12 जिले में आयरन पाया गया है।
ग्राउंड वाटर के दूषित होने के कारण राज्य सरकार पेयजल के रूप में सतही जल के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। जिस हैंडपंप से नाइट्रेट निकल रहा, उस पर लाल निशान लगाए जा रहे हैं। नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा से शिशुओं में मेथेमोग्लोबिनेमिया या ब्लू बेबी सिंड्रोम हो सकता है। वयस्क थोड़ी ज़्यादा मात्रा को सहन कर सकते हैं, किंतु लगातार उपयोग उनके लिये भी हानिकारक है।
पानी में कहीं यूरेनियम, नाइट्रेट तो कहीं कैडमियम
बिहार के सीमांचल के इलाके जैसे पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, कटिहार का ग्राउंड वाटर पीने के लायक नहीं रह गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्णिया और किशनगंज के ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट और आर्सेनिक की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा भारतीय मानक ब्यूरो के द्वारा निर्धारित मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई है।
इसी तरह इन इलाकों के सहित राज्य के 33 जिलों में आयरन की मात्रा एक ग्राम प्रति लीटर से अधिक दर्ज की गई है। कहीं यूरेनियम तो कहीं कैडमियम तो कहीं क्रोमियम जैसी भारी धातुओं की मात्रा भी निर्धारित मानक से अधिक पाई गई है। फर्टिलाइजर का अंधाधुंध उपयोग, सीवेज का रिसाव तथा औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान ही भूगर्भीय जल में हानिकारक तत्वों की बढ़ती मात्रा का मुख्य कारण माना जा रहा है। महावीर कैंसर संस्थान, पटना के वैज्ञानिकों के शोध में यह साफ हो गया राज्य में गंगा नदी के मैदानी इलाकों में आर्सेनिक युक्त पानी से गॉल ब्लैडर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले 10-11 सालों में गंगा के मैदानी इलाकों में खासकर कैंसर के मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके अलावा अल्जाइमर और फ्लोरोसिस जैसी बीमारी भी फैल रही है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के करीब सभी जिलों में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन का प्रदूषण पेयजल को दूषित बना रहा है। 20 जिलों के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक तो अन्य में फ्लोराइड की उच्च मात्रा पाई गई है। जल विशेषज्ञों के अनुसार ग्राउंड वाटर की गुणवत्ता में गिरावट के कई कारण हैं। इनमें शहरीकरण, तेजी से बढ़ता औद्योगीकरण, औद्योगिक और नगर निकायों के कचरे का बिना उपचार निस्तारण, खेती में उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, सिंचाई के लिए भूगर्भीय जल का मनमाना दोहन और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव शामिल हैं।
भारत में कम से कम 26 फीसदी नौकरियां खत्म हो सकती हैं। आईएमएफ और सिट्रिनी रिसर्च के ताजा अध्ययनों में इसके बारे में गंभीर चेतावनी दी गई है। इसका सबसे बुरा असर कालेज से निकल कर नौकरी शुरु करने वाले युवाओं पर पड़ेगा।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
नौकरियों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के असर पर आईएमएफ की ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें कहा गया है कि नौकरियों पर इसका असर सुनामी के जैसा होगा। इससे पूरी दुनिया में औसतन 40 प्रतिशत नौकरियां प्रभावित होंगी लेकिन कुछ विकसित देशों में यह आंकड़ा 60 फीसदी तक पहुंच सकता है।
इससे सबसे ज्यादा खतरा कालेज से निकल कर नौकरी के बाजार में कदम रखने वाले युवाओं को है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी कर्मचारियों की छंटनी और नए कर्मचारियों की भर्ती पर रोक की दिशा में बढ़ रही हैं।
आईएमएफ प्रमुख की चेतावनी
आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जार्जीवा ने इस रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि एआई की वजह से शुरुआती स्तर की नौकरियों के अलावा सूचना तकनीक (आईटी) और वित्तीय क्षेत्र की नौकरियों पर सबसे ज्यादा असर पडऩे का अंदेशा है। इससे देश की प्रमुख आईटी कंपनियों को गंभीर झटका लग सकता है।
जार्जीवा ने कहा है कि कालेज से निकल कर आईटी सेक्टर में काम करने वाले युवाओं के काम का ज्यादातर हिस्सा एआई के जरिए संभव है। इससे नई पीढ़ी के बड़े हिस्से के सामने बेरोजगारी का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 के दौरान 1।90 करोड़ युवाओं ने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। क्रिस्टालिना का कहना है कि एआई का विरोध करने का कोई मतलब नहीं है। उसे सही तरीके से अपनाना होगा। सुनियोजित तरीके से इसके इस्तेमाल की स्थिति में संभावित अभिशाप एक वरदान बन सकता है। एआई और इस पर आधारित तकनीक भारत की जीडीपी में 0।7 फीसदी की वृद्धि कर सकती है।
दूसरी ओर, ‘सिट्रिनी रिसर्च’ की ‘द 2028 ग्लोबल इंटेलिजेंस क्राइसिस’ शीर्षक एक रिपोर्ट ने भी वैश्विक वित्तीय बाजारों में हडक़ंप मचा दिया है। इसमें कहा गया है कि एआई की वजह से कार्पोरेट मुनाफा व उत्पादकता बढऩे के कारण कागज पर अर्थव्यवस्था तो मजबूत नजर आएगी। लेकिन बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म होने के कारण लोगों की आय कम हो जाएगी। इसका असर उनकी खर्च करने की क्षमता पर पडऩा स्वाभाविक है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, एआई निकट भविष्य में कोडिंग, प्रोग्रामिंग, वित्तीय विश्लेषण और कानून के क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों की जगह ले लेगा। इसमें वैश्विक क्लाइंट्स के एआई की मदद लेने के कारण भारत में आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों पर गंभीर असर पडऩे और डालर के मुकाबले रुपए की कीमत में गिरावट का भी अंदेशा जताया गया है। इस रिपोर्ट के सह-लेखक अलाप शाह ने सरकार से इस संकट से निपटने के लिए एआई टैक्स लगाने का भी सुझाव दिया है।
इन सभी ने पाकिस्तानी सरकार को चि_ी लिखकर कहा है कि इमरान ख़ान एक महान क्रिकेटर थे और अब वह जेल में हैं। सुनने में यह भी आया है कि वह बीमार भी हैं। इंसानियत दिखाएं और उनके साथ अच्छा बर्ताव करें।
इसके साथ यह भी कहा है कि जब क्रिकेट मैच खत्म होता है तो उसके साथ दुश्मनी भी खत्म हो जाती है। इमरान खान एक बेहतरीन क्रिकेटर थे, उनके साथ न्याय होना चाहिए और उनके साथ इंसानों वाला व्यवहार किया जाना चाहिए।
यहीं से यह एतराज़ आया है कि इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज और भारत के कप्तानों ने तो इस पत्र पर साइन/हस्ताक्षर कर दिए हैं। लेकिन पाकिस्तान के जो कप्तान रहे हैं, जो हमेशा इमरान ख़ान को कभी इमरान भाई, कभी ख़ान साहब और कभी स्किपर-स्किपर कहते हैं, उन्होंने इस पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए।
ताना यह है कि वे हमारी सरकार से डर गए हैं। वसीम अकरम और जावेद मियांदाद जैसे लोग भी आखिरकार पाकिस्तानी ही हैं।
अगर बाकी देश डरा हुआ है, जज डरे हुए हैं, वकील डरे हुए हैं और कई रिटायर्ड जनरल भी डरे हुए हैं तो इन कप्तानों का डर भी जायज़ है।
लेकिन साथ ही उन्हें यह भी समझ होगी कि अगर पाकिस्तान में चि_ी लिखकर किसी व्यक्ति को जेल से निकाला जा सकता तो अब तक सभी जेलें खाली हो चुकी होतीं।
रिहाई का ‘साइंस’ और ‘आर्ट’
अगर पाकिस्तान में कोई व्यक्ति जेल चला जाए और वह इमरान ख़ान जैसा नेता भी हो, तो उसे जेल से बाहर निकालना एक साइंस और एक आर्ट भी।
साइंस यह है कि कोर्ट के दरवाज़े खटखटाओ, जजों को कानून समझाओ, उन्हें शर्मिंदा करो और बड़े, ताकतवर, महंगे वकील हायर करो। इसके साथ ही अमेरिका, सऊदी अरब से सिफारशें डलवाओ और दुआएं भी करते जाओ। यह एक आर्ट भी है और वो ये है कि जिन्होंने व्यक्ति को जेल में डाला है , उन्हें छोटी-मोटी धमकी दो कि पूरी खलकत हमारे कैदी के साथ है और उसने एक दिन जेल तोडक़र उस व्यक्ति को बहार निकाल ही लेना है।
इसके साथ ही, बंद दरवाज़ों के पीछे कुछ डील भी करो। यह वादा करो कि हमारे आदमी को छोड़ दिया जायेगा। वह चुपचाप घर बैठ जाएगा या फिर उसे देश निकाला दे दीजिये। वह दुबई, लंदन में बैठकर अल्लाह-अल्लाह करेगा।
हमारा आदमी छूट जाएगा और आपकी जान भी बच जाएगी। इसी आर्ट के अंदर एक फाइन आर्ट भी होती है। यह आर्ट होता है कि हमारा आदमी बहुत बीमार है। उसे अस्पताल भेजो, अगर अस्पताल भी नहीं भेजें तो हंगामा करो कि अगर हमारा आदमी तुम्हारी जेल में मर गया तो उसका खून तुम्हारे सिर पर आएगा।
हमारे कई बड़े नेता नवाज़ शरीफ़, आसिफ अली जऱदारी और कई दूसरे लोग इस साइंस और आर्ट को मिलाकर जेल से बाहर निकलते रहे हैं।
अब इमरान ख़ान की पार्टी ने भी पहले साइंस ट्राई किया, वकीलों, जजों और जलसे-जुलूसों वाला साइंस अपनाया , लेकिन वह काम नहीं आया।
जज चुप हैं और कह देते हैं कि हमारी तो जेल वाले भी नहीं सुनते। अब इमरान ख़ान की बीमार वाली आर्ट फिल्म भी चल चुकी है। चार दिन माहौल बना रहा पर हकूमत ने नहीं सुनी।
सरकार का भी यही सोचना होगा कि इस उम्र का इतना फिट इंसान दुनिया में कहीं कोई नहीं है तो वह कितना बीमार होगा। ऊपर से इमरान ख़ान की पार्टी में राजनीतिक कार्यकर्ता कम हैं और आशिक ज़्यादा हैं। या तो वे रोते हैं, या वे कोसते हैं, या फिर दुआ मांगते हैं। लेकिन उनकी दुआ कबूल नहीं हो रही हैं और वे एक-दूसरे को कोसने लगते हैं।
एक प्रेमी से पूछा गया कि अगर तुम सच्चे प्रेमी हो तो सबसे पहले इमरान खान को जेल से बाहर तो निकलवाओ। अगर कोई डील भी करनी पड़ी तो ख़ान बाहर आ कर खुद ही इनसे निपट लेगा।
वे कहते हैं - नहीं, हमारा खान मरता मर जाए पर हम उसे डील नहीं करने देंगे।
यहाँ जब शासक इतने ताकतवर हों और प्रेमी भी इतने ताक़तवर हों कि वे अपने प्यार में अपनी प्रेमिका की जान कुर्बान करने को तैयार हों। ऐसे में जेलों के ताले खोलने के लिए साइंस भी कोई
बड़ी ही ढूंढऩी पड़ेगी और आर्ट भी कोई नई सीखनी पड़ेगी।
रब्ब राखा
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
-सुशांत आचार्य
किसी राष्ट्र की पहचान उसकी सीमाओं से ही नहीं, उसकी भाषाओं से भी बनती है। भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति रही है, लेकिन विडंबना यह है कि यही विरासत आज उपेक्षा और आधुनिकता के दबाव में धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता का प्रतीक है। किसी भी समाज की आत्मा उसकी भाषा में बसती है। स्थानीय बोलियाँ और भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि वे हमारी परंपराओं, लोकज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृतियों की जीवित धरोहर हैं। आज जब बाजारवाद और आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब इन बोलियों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 19,500 मातृभाषाएँ और बोलियाँ दर्ज की गईं। भाषाई मानकों के आधार पर देश में लगभग 121 प्रमुख भाषाएँ हैं, जिनके दस हजार से अधिक बोलने वाले हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। विभिन्न अध्ययनों और यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आकलन के अनुसार भारत में लगभग 400 से 450 भाषाएँ सक्रिय रूप से प्रचलित हैं। ये आंकड़े हमारे देश की भाषाई समृद्धि को दर्शाते हैं, लेकिन अनेक छोटी भाषाओं का तेजी से लुप्त होना चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि पिछले बीस वर्षों में भारत में लगभग 20 से 30 छोटी भाषाएँ या बोलियाँ पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा लगभग 200 से अधिक भाषाएँ विभिन्न स्तरों पर विलुप्त होने के कगार पर हैं। कई भाषाएँ ऐसी हैं जिनके बोलने वाले केवल कुछ सौ या कुछ दर्जन लोग ही बचे हैं। जब किसी भाषा का अंतिम बोलने वाला व्यक्ति इस संसार से विदा होता है, तो उसके साथ उस भाषा की सांस्कृतिक विरासत भी विलुप्त हो जाती है।
स्थानीय बोलियाँ और भाषाओं का क्षेत्र भले ही सीमित होता है, पर उनका महत्व बहुआयामी है। वे किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें और पारंपरिक ज्ञान इन्हीं भाषाओं में सुरक्षित रहते हैं। कृषि, वनस्पति, जलवायु और घरेलू चिकित्सा से जुड़ा ज्ञान मातृभाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता है। मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के बौद्धिक विकास को भी सुदृढ़ करती है और उनकी सामाजिक समझ को बढ़ाती है।
भाषाओं के लुप्त होने के पीछे कई कारण हैं, जैसे तेजी से बढ़ता शहरीकरण, रोजगार की खोज में पलायन, शिक्षा और प्रशासन में बड़ी भाषाओं का वर्चस्व या उन्हें प्राथमिकता, तथा डिजिटल माध्यमों में स्थानीय भाषाओं की सीमित उपस्थिति। आज अनेक परिवारों में नई पीढ़ी से मातृभाषा में संवाद कम होता जा रहा है, जिससे भाषाई हस्तांतरण की कड़ी टूट रही है।
भारत में कई भाषाएँ और बोलियाँ आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। अंडमान द्वीप की बो और आका-बो जैसी भाषाएँ उनके आखिरी बोलने वाले व्यक्ति के निधन के साथ पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, और उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक धरोहर भी विलुप्त हो गई। वहीं अनेक भाषाएँ अत्यंत लुप्तप्राय स्थिति में हैं। बिरहोर, जो झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में बोली जाती है, नई पीढ़ी में घटते प्रयोग के कारण संकट में है। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलों में प्रचलित धुरवी, बघेली, मढिय़ा, दोरली, भतरी और हल्बी जैसी भाषाएँ भी हिंदी और शहरी प्रभाव के कारण कमजोर होती जा रही हैं। इसी प्रकार गोंडी भाषा, हालांकि यह एक बड़े क्षेत्र में बोली जाती है, पर इसकी कई उपबोलियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं। इन भाषाओं को बचाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक पहचान और ऐतिहासिक धरोहर को बचाए रखने का प्रयास है।
-फणीन्द्र दाहाल
नेपाल में पांच मार्च को होने वाले चुनावों से पहले कुछ भारतीय विश्लेषकों ने टिप्पणी की है कि उन्हें यहां किसी को भी बहुमत मिलने की संभावना नहीं दिखती और ज़रूरत पड़ने पर भारत अपनी नीति में बदलाव कर सकता है.
भारतीय सेना के एक रिटायर जनरल ने कहा है कि कुछ सरकारी अधिकारियों ने वामपंथी दलों की सीटों में कमी का विश्लेषण किया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत, जिसने अपनी विदेश नीति में 'पड़ोसी पहले' का सिद्धांत अपनाया है, चुनावों के बाद अपनी नेपाल नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगा.
उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में कोई भी दल आए, भारत नेपाल को उसके राजनीतिक बदलाव के दौर में सहयोग करेगा.
वहीं, एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि नेपाल में जो भी दल सत्ता में आएगा, भारत उसके साथ सहयोग करेगा और नेपाल की इच्छा के अनुसार 'शांति, विकास और स्थिरता' के लिए मदद करेगा.
हाल के वर्षों में, नेपाल में राजशाही के साथ एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग बढ़ रही है, जबकि भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने वाली आबादी का एक वर्ग इस मुद्दे के प्रति सहानुभूति रखता है.
हालांकि, भारतीय अधिकारी इन मुद्दों से खुद को दूर रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं, और जैसे-जैसे मतदान की तारीख क़रीब आ रही है, भारत नेपाली सरकार को चुनाव कराने के लिए आवश्यक साजोसामान मुहैया करा रहा है.
नेपाल में पिछले साल सितंबर महीने में जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार गिर गई थी और वहां चुनाव की ज़रूरत पड़ी.
क्या कह रहे हैं भारतीय जानकार
कुछ दिन पहले, भारत के मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान की वेबसाइट पर नेपाल के चुनाव पर एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसमें विश्लेषण किया गया कि चुनाव में कोई भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं करेगी.
इंस्टीट्यूट के रिसर्च फ़ेलो निहार आर. नायक ने लिखा, "किसी भी पार्टी के स्पष्ट बहुमत हासिल करने की संभावना बहुत कम है और चुनाव के बाद (सरकार गठन) की चर्चाएं या तो सीपीएन-यूएमएल या राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसडब्लूपी) पर केंद्रित रहने की उम्मीद है."
इस टिप्पणी में सीपीएन (यूएमएल) को देश भर में एक मज़बूत संगठन और गठबंधन बनाने के अनुभव वाली ताकत के रूप में बताया गया है, जबकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसडब्लूपी) को युवाओं के बीच में मज़बूत शक्ति बताया गया है.
इस टिप्पणी में कहा गया है कि किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति में दोनों ही दल गठबंधन बनाकर इसका नेतृत्व करने के प्रयास में दिखाई दे रहे हैं.
भले ही इस साल के चुनाव में नेपाल में किसी एक दल को बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा हो लेकिन यह चुनाव इस बात को तय कर सकता है कि इन दोनों दलों में नेपाल की अगली गठबंधन सरकार पर किसका नियंत्रण होगा.
नेपाल के मामलों पर क़रीबी नज़र रखने वाले भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता का कहना है कि आगामी चुनाव से नेपाल के शक्ति समीकरण में उल्लेखनीय बदलाव आने की उम्मीद भारत सरकार के कुछ अधिकारी कर रहे हैं.
घटेंगे कम्युनिस्ट पार्टियों के वोट?
मेहता के विश्लेषण के अनुसार, इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है.
अलग-अलग लोगों से बातचीत के बाद उन्हें यह भी लगा कि नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें घट सकती हैं.
उनका कहना है, "हालांकि ऐसी बातें सरकार कभी सार्वजनिक रूप से नहीं कहती. लेकिन हमारे विश्लेषण के मुताबिक नेपाल की संसद में पहले लगभग 60 प्रतिशत तक रही कम्युनिस्ट दलों की उपस्थिति इस बार घट सकती है. चुनाव के बाद उनका प्रतिनिधित्व 40 से 47 प्रतिशत तक सीमित रह सकता है."
उन्होंने कहा कि ऐसे परिणाम से भारत और अमेरिका दोनों खुश होंगे और इससे भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती में दिखाई दे रही समस्या को हल करने में भी मदद मिल सकती है.
उन्होंने कहा, "माओवादी और अन्य वामपंथी दल भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती के ख़िलाफ़ खड़े होते रहे हैं. यहां यह अपेक्षा है कि अगर गैर-कम्युनिस्ट सरकार बनती है तो वह अग्निवीर योजना को मंजूरी दिलाने में सहूलियत दे सकती है."
'अग्निपथ' योजना के तहत भर्ती होने वाले 'अग्निवीरों' में से 75 प्रतिशत को चार वर्ष की सेवा के बाद एक निश्चित राशि देकर सेवा से बाहर करने का नियम है, जबकि केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सैन्य सेवा में रखकर पेंशन का लाभ दिया जाएगा. भारत सरकार द्वारा यह नियम लागू किए जाने के बाद से नेपाल इस पर असंतोष जताता रहा है.
जून 2022 में इस योजना के लागू होने के बाद से नेपाल से भारतीय सेना में होने वाली भर्ती स्थगित है.
इतने अहम क्यों हैं इस बार के चुनाव?
नेपाल में भ्रष्टाचार के अंत और सुशासन की मांग को लेकर हुए जेन ज़ी आंदोलन से पैदा हुई असहज परिस्थितियों के बीच प्रतिनिधि सभा चुनाव एलान किया गया था.
इससे पहले ख़बरें आई थीं कि भारत और नेपाल के कुछ साझेदार मित्र देशों का जोर था कि नेपाल में चुनाव पांच मार्च की घोषित तारीख पर ही हो.
औपचारिक चुनावी अभियान शुरू होने से पहले ही आगामी चुनाव को नई और पुरानी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जा रहा है.
ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति संबंध के वाइस प्रेसिडेंट हर्ष वी पंत का मानना है कि जेन ज़ी प्रदर्शनों के दौरान उभरे युवाओं के गुस्से के मद्देनज़र नीतिगत सुधारों के लिहाज़ से यह चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण होगा.
उन्होंने बीबीसी नेपाली सेवा को बताया, "मुझे लगता है कि यह बेहद महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि जेन ज़ी प्रदर्शनों ने राजनीतिक अभिजात्य वर्ग को झटका दिया है. युवाओं ने सड़कों पर जो आक्रोश व्यक्त किया है, उससे ठोस नीतिगत सुधार की एक तरह की अपेक्षा पैदा हुई है. राजनीतिक सुधार, चुनावी प्रक्रिया में सुधार और नीतिगत बदलाव से जुड़े होने के कारण इस चुनाव का परिणाम अहम रहेगा."
उन्होंने आगे कहा, "आखिरकार केवल निर्वाचित सरकार ही इन सुधारों के लिए कदम उठा सकती है. सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार ने कुछ पहल की है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता केवल नई निर्वाचित सरकार से ही आएगी. मेरा मानना है कि जब नई सरकार ज़िम्मेदारी संभालेगी, तब नीतियां तय करते समय उस दौरान उठे मुद्दों पर ज़रूर विचार किया जाएगा."
सोशल मीडिया साइट्स पर प्रतिबंध के बीच युवाओं ने पिछले साल सितंबर में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने और सुशासन की मांग को लेकर राजधानी में व्यापक प्रदर्शन किया. विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई. हालात पर नियंत्रण लाने में विफल रहने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया था.
ओली सहित कई प्रमुख दलों के नेताओं को सेना के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था. उस समय दो दिनों में कुल 77 लोगों की मौत हुई थी और 84 अरब रुपये से अधिक की संपत्ति को क्षति हुई थी. उसी राजनीतिक संकट के बीच सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी सरकार ने प्रतिनिधि सभा को भंग करते हुए चुनाव कराने की सिफ़ारिश की थी.
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के नेपाल अध्ययन केंद्र से जुड़े एक प्रोफ़ेसर एनपी सिंह का मानना है कि विशेष परिस्थितियों में हो रहा यह चुनाव इस बार 'निर्णायक' साबित हो सकता है.
उन्होंने कहा, "नेपाल में दलों ने पिछले 17-18 वर्षों में केवल अपने निहित स्वार्थों पर ध्यान दिया. पांच महीने में एक सरकार और उसके पांच महीने बाद दूसरी सरकार बनने जैसी स्थिति थी. लोकतंत्र को संभाल पाना मुश्किल हो गया था."
उन्होंने कहा, "बड़े विध्वंस के बाद यह चुनाव हो रहा है, इसलिए यह निर्णायक दिखता है. जनता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उनके सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध दल ही निर्वाचित हों. सरकार के ख़िलाफ़ ही विद्रोह हुआ था, इसलिए नागरिकों का सरकार पर भरोसा कायम होना ज़रूरी है. ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र टिक नहीं सकेगा."
चुनाव को स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में बताते हुए भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि निर्वाचित सरकार नेपाल और भारत दोनों के हित में है.
भारतीय सेना के एक अन्य सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसबी अस्थाना ने कहा, "भारत ने हमेशा किसी भी पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई है और इसी वजह से मुझे लगता है कि प्रदर्शनों के बावजूद आधिकारिक तौर पर (नेपाल के बारे में) ज्यादा बयान नहीं दिए गए हैं."
उन्होंने कहा, "हम स्थिरता वाला नेपाल चाहते हैं और वहां लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बनते देखना चाहते हैं. लेकिन संबंध आगे कैसे बढ़ेंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्ता में कौन आता है और उसका झुकाव किस दिशा में है."
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय की एक जर्जर इमारत इन दिनों दो समुदायों के बीच विवाद की वजह बन गई है. इस परिसर में नमाज और हनुमान चालीसा पढ़ने को लेकर विवाद हो रहा है
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
उत्तर प्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय में पिछले चार दिन से इस बात को लेकर विवाद हो रहा है कि परिसर के भीतर स्थित लाल बारादरी नाम की एक पुरानी इमारत में नमाज पढ़ी जाए या फिर हनुमान चालीसा. पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय के कुछ मुस्लिम छात्र यहां नमाज पढ़ते आ रहे थे लेकिन 22 फरवरी को इस इमारत को अचानक बंद कर दिया गया.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इमारत को बंद करने के पीछे उसकी जर्जर हालत को वजह बताया लेकिन मुस्लिम समुदाय का कहना है कि ऐसा जानबूझकर किया गया. इमारत बंद होने के बाद मुस्लिम छात्र लाल बारादरी के बाहर ही नमाज पढ़ने लगे और उनके हिन्दू दोस्तों ने सुरक्षा के लिए एक मानव श्रृंखला बनाकर हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की. लेकिन इमारत बंद होने के बावजूद वहां नमाज पढ़ने की वजह से पुलिस ने कुछ छात्रों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया और 13 छात्रों को नोटिस भेज दिया.
वहीं मंगलवार को नमाज पढ़ने के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ छात्रों ने परिसर के बाहर बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया. पुलिस फिर आई और पाठ कर रहे छात्रों को वहां से भगा दिया. कुछ छात्रों को हिरासत में भी लिया गया.
नमाज के जवाब में हनुमान चालीसा
मंगलवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में सड़क पर नमाज और इफ्तारी किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया और परिसर में मौजूद अवैध मजारों की जांच कर उन्हें ध्वस्त करने की मांग की है. एबीवीपी के छात्रों का कहना है कि लाल बारादरी में कोई मस्जिद नहीं है. जबकि दूसरी ओर एनएसयूआई, समाजवादी छात्र सभा और आईसा से जुड़े छात्र लाल बारादरी का ताला खुलवाने की मांग कर रहे हैं. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लाल बारादरी के आस-पास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है.
मोहम्मद अखलाक मॉब लिंचिंग केस में पीड़ित पक्ष को न्याय की आस
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रवक्ता प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव ने मीडिया से बातचीत में कहा, "लाल बारादरी अत्यंत जर्जर अवस्था में है और सुरक्षा कारणों से यहां प्रवेश प्रतिबंधित किया गया है. इमारत के बाहर चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं. साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से इसके जीर्णोद्धार को लेकर पत्र भी लिखा गया है. इमारत की जर्जर अवस्था और लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही इसे बंद करने का फैसला किया गया है, इसके अलावा इसके पीछे कोई वजह नहीं है.”
लेकिन मुस्लिम छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने ये फैसला दक्षिणपंथी संगठनों के दबाव में किया है. विश्वविद्यालय के एक छात्र रईस अहमद ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम लोग हमेशा यहां रमजान में इबादत करने आते थे लेकिन लाल बारादरी के मस्जिद वाले हिस्से को अचानक बंद कर दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ लोगों के दबाव में आकर ऐसा किया. इमारत की हालत आज से नहीं बल्कि कई साल से ऐसी ही है. लेकिन अब तक नहीं ढही तो रमजान के वक्त ही थोड़ी ढह जाती. इसका ठीक से रखरखाव नहीं किया गया है, इसे जानबूझ कर जर्जर किया गया है.”
क्या है लाल बारादरी?
दरअसल, ऐतिहासिक तौर पर विश्वविद्यालय परिसर में स्थित लाल बारादरी एक इमामबाड़ा है जिसे अवध के नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने बनवाया था. यह करीब दो सौ साल पुरानी इमारत है और विश्वविद्यालय की स्थापना के पहले से ही यहां मौजूद है.
यूपी विधान परिषद के सदस्य और बीजेपी नेता संतोष सिंह लखनऊ विश्वविद्लाय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे हैं. अपनी फेसबुक पोस्ट पर लाल बारादरी की चर्चा करते हुए उन्होंने इसके जीर्णोद्धार की जरूरत बताई है. वो लिखते हैं, "35 साल पहले भी लाल बारादरी का काफी हिस्सा गिर चुका था. बचे हिस्से में लाल कैंटीन, यूको बैंक, शिक्षक संघ कार्यालय हुआ करते थे. लाल बारादरी तब भी बहुत जर्जर थी और इसे बंद करने की बात होती थी. कैंटीन बंद भी हो गई.”
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ल भी इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं. ज्ञानेंद्र शुक्ल बताते हैं, "लाल बारादरी बादशाही बाग का हिस्सा है. ये तो हमारे समय में ही यानी नब्बे के दशक में ही काफी जर्जर अवस्था में थी. कोई आता-जाता भी नहीं था यहां और न ही यहां हमने कभी किसी को नमाज पढ़ते देखा है. वैसे भी नमाज पढ़ने के लिए यहां आस-पास कई मस्जिदें हैं. हां, पिछले कुछ साल से लोग वहां नमाज पढ़ने जाने लगे थे. दूसरी बात ये भी है कि नमाज पढ़ने वालों के समर्थन या विरोध में विश्वविद्यालय के कोई छात्र तो हैं नहीं, ये सब राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों के लोग हैं.”
हालांकि विश्वविद्यालय के कुछ पुराने छात्रों का कहना है कि यहां अध्यापक और छात्र दोनों ही कभी-कभी नमाज पढ़ने आते थे, लेकिन कभी कोई विवाद नहीं हुआ. लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति रह चुकीं प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि न सिर्फ लाल बारादरी में नमाज पढ़ी जाती रही बल्कि पिछले तीन-चार दशक में ऐसी कई घटनाएं होती रहीं जो विश्वविद्यालय में सांप्रदायिक विभाजन पैदा कर रही थीं, लेकिन किसी ने कोई आपत्ति नहीं की.
कैंपस में धार्मिक गतिविधियां
डीडब्ल्यू से बातचीत में प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं, "व्यक्तिगत रूप से मैं विश्वविद्यालय कैंपस में किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधियों के बिल्कुल खिलाफ हूं. लेकिन मेरा अनुभव ये है कि हम लोगों के देखते-देखते परिसर में जगह-जगह मूर्तियां स्थापित होती गईं. सांस्कृतिक कार्यक्रम की आड़ में त्योहारों के दौरान हवन-पूजन होने लगे."
यह सब लंबे समय से होता रहा लेकिन किसी को ऐतराज नहीं हुआ. लंबे समय से कुछ छात्र और कुछ अध्यापक लाल बारादरी में कभी-कभी नमाज पढ़ने भी जाते थे, लेकिन अब जब अचानक इसे घेर दिया गया तो सवाल उठेगा ही. दरअसल, लखनऊ में जिस दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत थे, उसी समय लाल बारादरी के सामने एक बाड़ लगाने का काम किया जा रहा था.”
अब यूपी के फतेहपुर में ‘मकबरे में मंदिर’ का विवाद आया सामने
प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में इस तरह की सांप्रदायिक गतिविधियों का असर सीधे तौर पर समाज पर पड़ता है. हाल के दिनों की कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए वो कहती हैं, "पूरे देश में एक समझ फैली है कि बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ कुछ भी कर सकते हैं. रेप जैसे घृणित कृत्य तक का धर्म के आधार पर समर्थन और विरोध हो रहा है. इसी का नतीजा दिख रहा है कि अल्पसंख्यकों पर कोई भी हमला कर देता है. पुलिस कार्रवाइयों में भी भेदभाव साफ दिखता है. लेकिन इन सबके बीच एक अच्छा संकेत यह है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग इस भेदभाव के खिलाफ सामने आ रहे हैं. यह प्रतीकात्मक साझेदारी बहुत जरूरी है.”
150 साल बाद भारत में‘वंदे मातरम’ पर क्यों हो रही है राजनीति
पिछले दिनों यूपी के ही बदायूं में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक युवक तीन बुजुर्ग मुसलमानों को गालियां देते हुए पीट रहा था और कोई बचाने के लिए भी नहीं आया. यहां तक कि उन बुजुर्ग मुसलमानों ने भी कोई प्रतिवाद नहीं किया. हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद युवक को गिरफ्तार कर लिया गया.
पीड़ितों में से एक अब्दुल सलाम की शिकायत पर थाना इस्लामनगर में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और फिर अभियुक्त अक्षय को गिरफ्तार कर लिया. यही नहीं, दो दिन पहले, मेरठ जिले की एक मेट्रो ट्रेन में कुछ मुस्लिम यात्रियों को देखकर भीड़ ने जय श्रीराम और वंदे मातरम जैसे नारे लगाने लगे..
-रेहान फजल
कहा जाता है कि अगर कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में राजनीतिक ज़मीन तैयार न की होती, तो लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार बिहार की सियासत में उस जगह पर नहीं पहुँच पाते जहाँ वे पहुंचे।
कर्पूरी ठाकुर कम ही समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इसके बावजूद उनकी सादगी, ईमानदारी और आम लोगों से जुड़ाव के कारण उनको आज तक याद किया जाता है।
जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा उनके पुश्तैनी गाँव पितौंझिया गए तो वो ये देखकर अपने आँसू नहीं रोक पाए कि बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर का घर मिट्टी का बना हुआ था।
एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर कभी कर्पूरी ठाकुर के सचिव और आगे चलकर केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा अपनी आत्मकथा 'रेलेंटलेस' में लिखते हैं, ‘एक दिन मैं उनके निजी सचिव लक्ष्मी प्रसाद साहू के साथ समस्तीपुर जि़ले में उनके गाँव गया। वहाँ मेरा परिचय उनकी पत्नी से कराया गया।’
‘वो मुझे देखकर बहुत खुश हुईं। लेकिन उनके घर में मेरे बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं थी। उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पीकर जाएं। उन्होंने लकड़ी का चूल्हा जलाकर हमारे लिए चाय बनाई। मैं ये देखकर दंग रह गया कि उस घर में आधुकनिकता या आराम की एक भी चीज़ मौजूद नहीं थी।’
उनकी बहू आशा रानी ने एक बार बताया था, ‘किसी ने मेरे ससुर कर्पूरी ठाकुर से पूछा था कि आपने अपने घर को पक्का क्यों नहीं बनवाया तो उनका जवाब था, 'अगर मैं अपने घर को पक्का बनवा लेता हूँ तो आम लोग मुझसे जुड़ाव नहीं महसूस करेंगे।’
अंग्रेजी की अनिवार्यता को किया समाप्त
कर्पूरी ठाकुर को बिहार में शिक्षा नीति में बड़े बदलावों के लिए याद किया जाता है।
1967 में जब वो राज्य के उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री थे तो उन्होंने मैट्रिक पास करने के लिए अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया था।
संतोष सिंह और आदित्य अनमोल उनकी जीवनी ‘द जननायक, कर्पूरी ठाकुर वॉयस ऑफ़ द वॉयसलेस’ में लिखते हैं, ‘एक बार जब टीएनबी कॉलेज भागलपुर में उनकी जनसभा में आए एक प्रोफ़ेसर सीपी सिंह ने ये कहकर उन पर कटाक्ष किया कि उन्होंने अंग्रेज़ी इसलिए हटाई क्योंकि खु़द उनकी अंग्रेज़ी कमज़ोर है। तो कर्पूरी ठाकुर ने हिंदी का पहले से तैयार भाषण छोडक़र अपना पूरा भाषण अंग्रेजी में दिया। वो ये बताना चाह रहे थे कि अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है, ज्ञानी होने का सर्टिफिकेट नहीं।’
उसी तरह जब उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए 26 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया तो देश-विदेश के कई पत्रकार पटना में जमा हुए। तब भी उन्होंने विदेशी पत्रकारों के लिए अंग्रेजी में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया।
उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार को भेजा गया हर पत्र हिंदी में होता था लेकिन साथ में अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था।
मार्शल टीटो की नज़दीकी
कर्पूरी ठाकुर पहली बार सन 1952 में तेजपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे। उसी वर्ष वो अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भाग लेने वियना और यूगोस्लाविया गए। वहाँ उनकी मुलाक़ात यूगोस्लाविया के नेता मार्शल टीटो से हुई।
विष्णु देव रजक अपनी किताब ‘कर्पूरी ठाकुर का राजनीतिक दर्शन' में लिखते हैं, ‘इस यात्रा के बाद कर्पूरी ठाकुर और मार्शल टीटो में नजदीकी बढ़ गई। इसके बाद जब भी मार्शल टीटो भारत आए उन्होंने ख़ास तौर से कर्पूरी ठाकुर से मुलाक़ात की। सन 1959 में जब कर्पूरी एक बार फिर यूगोस्लाविया गए तो टीटो ने उन्हें काले रंग का एक ओवरकोट उपहार में दिया।’
सन् 1967 में जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के उप-मुख्यमंत्री बने तो मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा की तुलना में उनकी ही चर्चा अधिक रही।
नरेश कुमार विकल और हरिनंदन साह ‘सप्तक्रांति के संवाहक, जननायक कर्पूरी ठाकुर स्मृति ग्रंथ’ में लिखते हैं, ‘एक बार पुराने सचिवालय में एक अधिकारी कर्पूरी ठाकुर को एक लिफ़्ट के पास ले गया जिस पर एक पट्टिका पर लिखा हुआ था- ‘सिर्फ अधिकारियों के प्रयोग के लिए।' ये देखकर कर्पूरी ठाकुर बहुत नाराज़ हुए। उन्होंने तुरंत वो पट्टिका हटवा दी ताकि उस लिफ़्ट का इस्तेमाल हर कोई कर सके। हालांकि सरकारी अधिकारियों ने इसका विरोध किया लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने उनकी एक न सुनी।’
वित्त मंत्री के तौर पर कर्पूरी ठाकुर ने उन किसानों से मालगुज़ारी लेने पर रोक लगा दी जिनके पास साढ़े तीन एकड़ से कम जमीन थी। ये फ़ैसला लोहिया के नारे 'जिस खेती से लाभ नहीं, उस पर लगे लगान नहीं’ को देखते हुए किया गया था।
इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तारी से बचे कर्पूरी ठाकुर
इमरजेंसी के दौरान कर्पूरी ठाकुर उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो भूमिगत हो गए थे और जिन्हें गिरफ़्तार नहीं किया जा सका था। 27 जून, 1975 को वो सीमा पार कर नेपाल चले गए थे। वहाँ उन्होंने अपना समय सीमावर्ती इलाकों हनुमान नगर, विराटनगर और छतरा में बिताया था।
संतोष सिंह और आदित्य अनमोल लिखते हैं, ‘नेपाल सरकार पर भारत सराकर का बहुत दबाव था कि कर्पूरी ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया जाए। ठाकुर का तर्क था कि अगर वीपी कोइराला भारत में रह सकते हैं तो वो नेपाल में क्यों नहीं रह सकते। नेपाल की सरकार चाहती थी कि कर्पूरी ठाकुर के बदले भारत सरकार कोइराला को उनके हवाले करे लेकिन किन्हीं कारणों से इस बात पर सहमति नहीं बन पाई थी।’
‘नेपाल सरकार ने उन्हें भारत के हवाले तो नहीं किया लेकिन उनकी हर गतिविधि पर नजऱ रखी जाने लगी। इस बीच कर्पूरी नेपाल में ब्रिटिश, अमेरिकी, इसराइली और चीनी दूतवासों के लगातार संपर्क में रहे। 5 सितंबर, 1975 को कर्पूरी ठाकुर वेश बदल कर भारत लौट आए।
‘उनके बेटे रामनाथ ठाकुर ने हमें बताया कि बिहार में कुछ दिन भूमिगत रहने के बाद वो नेपाली पोशाक में मद्रास गए जहाँ भूमिगत नेताओं से उनकी मुलाक़ात हुई। वो मौलवी का वेश बनाकर बंबई भी गए जहाँ उन्होंने लोक संघर्ष समिति की बैठक में भाग लिया। सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के लिए 10 हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित किया था।’
उनके प्रधान सचिव रहे यशवंत सिन्हा लिखते हैं, ‘वो एक जननेता थे जो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे। यहाँ तक कि उन्हें सरकारी काम करने तक का समय नहीं मिलता था। मैंने उनके जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उनका दैनिक कार्यक्रम बनाना शुरू किया। लेकिन पहले दिन से उन्होंने उन कार्यक्रमों की धज्जियाँ उड़ाना शुरू कर दिया।’
‘जब ये साफ़ हो गया कि व्यवस्थित जीवन उनके बस का नहीं है तो हमने तय किया कि हम रोज़ उन्हें दो-तीन घंटे के लिए दफ्तर के बाहर किसी जगह पर ले जाएंगे ताकि वो फाइलों को निपटा सकें। हम शाम को अक्सर फुलवारी शरीफ़ में बिहार मिलिट्री पुलिस के गेस्ट हाउस में चले जाते। जब लोगों को उसके बारे में भी पता चल जाता तो हम जगह बदल देते।’
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ़ को रद्द किया तो ऐसा लग रहा था कि भारत समेत दुनिया भर के कई देश राहत की सांस लेंगे.
ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को शर्मनाक बताया था और जजों पर व्यक्तिगत हमले किए थे. अब ट्रंप उन देशों को चेतावनी दे रहे हैं जो अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखते हुए ट्रेड डील पर फिर से विचार करने के लिए सोच रहे हैं.
सोमवार को ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में उन देशों को धमकी दी है कि उन्हें और बुरे नतीजों का सामना करना पड़ेगा.
ट्रंप ने लिखा है, ''कोई भी देश सुप्रीम कोर्ट के बकवास फ़ैसले की आड़ में हमसे 'गेम खेलना' चाहता है, ख़ासकर वे देश जिन्होंने वर्षों और यहाँ तक कि दशकों तक अमेरिका को छला है, तो उन्हें और उँचे टैरिफ़ का सामना करना होगा. अभी जिस टैरिफ़ पर सहमति बनी है, उससे कहीं ज़्यादा बुरे परिणाम भुगतने होंगे.''
'भारत ने दौरा टाला'
22 फ़रवरी को अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग और ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने ख़बर दी थी कि भारत ने इस हफ़्ते अपना व्यापार प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन भेजने की योजनाओं को टाल दिया है.
ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स का कहना है कि मुख्य रूप से जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को रद्द कर दिया है, ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति है और इसी को देखते हुए भारत ने इसे टालने का फ़ैसला किया है.
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''भारत के वाणिज्य मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि दोनों देशों के अधिकारियों के बीच चर्चा के बाद यात्रा को स्थगित करने का फ़ैसला किया गया. यात्रा के लिए कोई नई तारीख़ तय नहीं की गई है."
रॉयटर्स के मुताबिक़ प्रतिनिधिमंडल रविवार को रवाना होने वाला था ताकि एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए वार्ता की जा सके. दोनों देश एक ऐसे ढांचे पर सहमत हुए थे, जिसके तहत अमेरिका कुछ भारतीय निर्यातों पर लगाए गए 50% टैरिफ़ को कम करेगा जो भारत के रूसी तेल ख़रीद से जुड़े थे.
अमेरिकी टैरिफ़ को 18% तक घटाया जाना था जबकि भारत ने पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर की क़ीमत के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदने पर सहमति दी थी.
पिछले हफ़्ते वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अंतरिम समझौता अप्रैल में लागू हो सकता है, बशर्ते प्रतिनिधिमंडल की वॉशिंगटन यात्रा के दौरान लंबित मुद्दों का समाधान हो जाए.
ट्रंप की नई धमकी को भारत के ख़िलाफ़ भी लोग देख रहे हैं. ट्रंप की ट्रुथ पोस्ट को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने लिखा है, ''उन्होंने भारत के संदर्भ में 'छलने' वाली बात का उपयोग किया है, जो भारत के साथ फ्रेमवर्क डील पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के प्रभाव के बारे में मीडिया के एक प्रश्न के उत्तर में कहा गया. उनकी अहंकार से प्रेरित सोच एक गंभीर समस्या है.''
ट्रंप की इस पोस्ट पर अमेरिका के विदेश और वाणिज्य मंत्रालय में सलाहकार रहे इवान ए फेइजेनबॉम ने एक्स पर लिखा है, ''ट्रंप ने कनाडा पर टैरिफ़ बढ़ाने की धमकी दी थी क्योंकि उन्हें ओंटारियो के उस टेलीविजन विज्ञापन से आपत्ति थी, जिसमें रोनाल्ड रीगन के शब्दों को हूबहू उद्धृत किया गया था. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ़ इसलिए बढ़ाया क्योंकि फोन कॉल पर वहां के राष्ट्रपति के बोलने के लहजे से नाराज़गी थी.''
''पिछले हफ़्ते ट्रंप ने 24 घंटे से भी कम समय में टैरिफ 10% से बढ़ाकर 15% करने की घोषणा कर दी और इसके लिए क़ानून की उसी धारा का सहारा लिया, जिसके ख़िलाफ़ उनका अपना जस्टिस डिपार्टमेंट सुप्रीम कोर्ट में दलील दे चुका था. उन्होंने ब्राज़ील पर दुनिया की सबसे ऊंची टैरिफ दर लगा दी क्योंकि वे इस बात से नाराज़ थे कि वहाँ उनके एक राजनीतिक सहयोगी पर मुक़दमा चलाया जा रहा था.''
''उन्होंने भारत पर रूसी तेल ख़रीद से जुड़ा टैरिफ़ लगा दिया जबकि चीन पर ऐसा कोई टैरिफ़ नहीं लगाया, जो वास्तव में भारत से अधिक रूसी तेल ख़रीदता है. इसके बावजूद ट्रंप को लगता है कि टैरिफ़ को लेकर 'खेल' दूसरे देश खेल रहे हैं.''
भारत ने अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जिससे माना जाए कि इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के साथ हुए द्विपक्षीय व्यापार समझौते से पीछे हटने पर विचार कर रहा है.
क्या भारत को फ़ायदा होगा?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत सावधानीपूर्वक क़दम बढ़ा रहा है. भारत अपने व्यापारिक हितों का संतुलन साधते हुए और ट्रंप प्रशासन के साथ टकराव से बचने की कोशिश कर रहा है. भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर बस इतना कहा था कि वह इसका अध्ययन कर रहा है.
विश्व व्यापार संगठन में भारत के पूर्व राजदूत जयंत दासगुप्ता ने ब्लूमबर्ग टेलीविजन की हसलिंडा अमिन से कहा कि भारत को "अमेरिका के साथ संवाद जारी रखना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि उनके मन में क्या है, वे कौन से क़दमों पर विचार कर रहे हैं. उनके साथ बातचीत करनी चाहिए. हमें स्पष्ट नहीं है कि यह किस दिशा में आगे बढ़ेगा."
भारत ने रूसी तेल की ख़रीद कम की है लेकिन यह रुख़ बनाए रखा है कि वह अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और बाज़ार की परिस्थितियों के आधार पर कच्चा तेल ख़रीदने का अधिकार सुरक्षित रखता है.
एमकाय ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड की अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा ने ब्लूमबर्ग से कहा, ''भारत अब अपने अमेरिकी व्यापार समझौते पर फिर से विचार कर सकता है, ख़ासकर जब रूसी तेल ख़रीद से संबंधित टैरिफ़ का ख़तरा ख़त्म हो गया है. हालांकि ट्रंप के साथ संबंध बनाए रखने के लिए भारत ख़रीद में कटौती जारी रख सकता है. अब भारत वार्ताओं में अधिक अनुकूल शर्तों की मांग कर सकता है.''
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी ट्रंप का दावा है कि वह अपनी इच्छा अनुसार ही काम करेंगे. हालांकि ट्रंप ने अदालत के फ़ैसले की अवहेलना करने का कोई संकेत नहीं दिया है बल्कि उन्होंने जल्द ही अन्य, अधिक सीमित, उपलब्ध तंत्रों का उपयोग करते हुए नए टैरिफ़ लगाने की ओर रुख किया.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में ट्रंप के लिए सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह रही है कि कंजर्वेटिव जजों ने भी उनका साथ नहीं दिया. यहाँ तक कि जिन दो जजों को ट्रंप ने ख़ुद नियुक्त किया था, उन्होंने भी टैरिफ़ को अवैध बताया.
अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''सालों से कंजर्वेटिव जजों को ट्रंप के "आज्ञाकारी" के रूप में चित्रित किया गया है. ऐसे में जब जज अपेक्षित ढंग से काम नहीं करते, तो राष्ट्रपति की समान सोच या असंतोष की आलोचना करना कुछ हद तक विरोधाभासी प्रतीत होता है.''
''अब भी कुछ उदारवादी चिंतक यह देखकर हैरानी व्यक्त कर रहे हैं कि कोई कंजर्वेटिव जज ट्रंप के ख़िलाफ़ निर्णय कैसे दे सकता है. क़ानूनविद् नोआ फेल्डमैन लिखते हैं, "लगभग एक दशक बाद चीफ़ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरकार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ खड़े होने का रास्ता खोज लिया."
भारत की तैयारी
जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि मिडिल पावर वाले देशों को सुपर पावर वाले देशों की राजनीति के दौर से निपटने के लिए अपने आर्थिक संबंधों को गहरा करना चाहिए. शायद भारत ऐसा कर भी रहा था. भारत ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड डील को अंजाम दिया था ताकि अपने कारोबार की निर्भरता अमेरिका से कम करे.
राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रशासन की तरफ़ से भारत के ख़िलाफ़ कई आक्रामक बातें कही गईं लेकिन मोदी सरकार की तरफ़ से बहुत ही सधी हुई प्रतिक्रिया आती थी.
कहा जा रहा है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों को लाभ हो सकता है, क्योंकि ट्रंप के टैरिफ़ समाप्त होने से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ़ दरें कम होंगी. मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, चीन से आने वाले सामान पर औसत टैरिफ 32% से घटकर 24% रह सकता है जबकि एशिया के लिए औसत टैरिफ़ दर 20% से घटकर 17% हो सकती है.
हालाँकि ट्रंप ने बाद में 15% टैरिफ़ की घोषणा की. यह यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिन्होंने पहले 10% की कम दरों पर समझौते किए थे.
ब्रिटिश चैंबर्स ऑफ कॉमर्स का अनुमान है कि इस वृद्धि से यूके के अमेरिका को निर्यात की लागत में लगभग चार अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है और लगभग 40,000 ब्रिटिश कंपनियाँ प्रभावित हो सकती हैं.
यह फ़ैसला ऐसे समय आया है, जब ट्रंप अगले महीने बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वार्ता की तैयारी कर रहे हैं, जिससे उनकी मोलभाव की स्थिति कमज़ोर हो सकती है.
ब्लूमबर्ग के अनुसार, अमेरिकी अधिकारी यह कहते रहे हैं कि व्यापार साझेदारों के साथ पहले हुए समझौते यथावत रहेंगे. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने उन्हें "अच्छे समझौते" बताया. फिर भी, सभी देश इससे सहमत हों, यह ज़रूरी नहीं है. यूरोपीय संसद के व्यापार प्रमुख ने संकेत दिया है कि जब तक ट्रंप प्रशासन अपनी नीति स्पष्ट नहीं करता, ईयू–अमेरिका व्यापार समझौते की पुष्टि रोकने का प्रस्ताव रखा जा सकता है.''
''इसी तरह, भारतीय अधिकारियों ने भी अनिश्चितता का हवाला देते हुए इस हफ़्ते अमेरिका में अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने से जुड़ी वार्ताएँ स्थगित कीं. आगे क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है. लेकिन यह निश्चित है कि वैश्विक व्यापार वार्ताओं में दबाव बनाने के लिए ट्रंप का सबसे प्रभावशाली साधन अब कमज़ोर पड़ गया है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
सुबह की ठंडी हवा में फ़ज्र की अज़ान की आवाज़ धीरे-धीरे आ रही थी. नल्हड़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू के बाहर बैठी आशूबी की आंखें दरवाजे़ पर टिकी थीं.
कुछ घंटे पहले तक उन्हें यक़ीन था कि उनका 14 साल का बेटा शारिक़ जल्द ठीक हो जाएगा. उनके लिए आख़िर यह सिर्फ़ बुख़ार ही तो था.
लेकिन उस सुबह डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि अब कुछ नहीं किया जा सकता. वह धीमी आवाज़ में कहती हैं, "रात तक तो ठीक था… सुबह देखा तो डॉक्टर पंपिंग कर रहे थे."
चौदह साल के शारिक़ 25 जनवरी को अचानक बीमार पड़ने से पहले तक बिल्कुल ठीक थे. बुख़ार आने के 48 घंटों के भीतर ही उनकी मौत हो गई. शारिक़ का लिवर फे़ल हुआ था.
हरियाणा के पलवल ज़िले का छांयसा गांव पिछले कुछ हफ्तों से ऐसी ही कहानियों से भरा हुआ है. अचानक बीमारी, तेज़ी से बिगड़ती सेहत और कुछ ही दिनों में मौत.
19 जनवरी से 11 फ़रवरी के बीच छांयसा में कम से कम 15 मौतें हुईं, इनमें चार नाबालिग़ बच्चे हैं. प्रशासन ने इन मौतों में से कम से कम सात को पीलिया और हेपेटाइटिस बी से जोड़ा है.
अब छांयसा की हवा में सिर्फ़ धूल ही नहीं बल्कि अनिश्चितता और डर भी घुले नज़र आते हैं.
गांव में डर और सवाल
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से क़रीब 90 किलोमीटर दूर छांयसा गांव की आबादी क़रीब छह हज़ार है.
गांव की गलियों में बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन यहां बड़े लोगों की बातचीत में 'मौत' और 'डर' जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं.
जनवरी के आख़िरी हफ्ते से गांव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे. परिवारों के मुताबिक़, शुरुआत अक्सर बुख़ार से होती थी, कुछ को पेट दर्द, कुछ को पीलिया जैसे लक्षण होते थे फिर अचानक हालत बिगड़ जाती थी.
11 साल के हुज़ैफ़ा की मां बताती हैं, "एक दिन बुख़ार आया था. दवा ली तो ठीक लग रहा था. उसी रात तबियत बिगड़ गई. अस्पताल पहुंचे तो बोले लिवर काम नहीं कर रहा."
डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी तो हुज़ैफ़ा की मां तुरंत तैयार हो गईं. लेकिन उसके लिए भी वक़्त नहीं था.
आंखों में आंसू लिए वह कहती हैं, "मैं अपना लिवर देने को तैयार थी, लेकिन बाद में डॉक्टरों ने कहा कि बच्चा अब नहीं बच पाएगा."
48 घंटों में मौत और बढ़ती बेचैनी
टिन पड़े बिना प्लास्टर के अधबने मकान के खुले दरवाज़े से मोटा पर्दा पड़ा दिखाई देता है.
22 साल के दिलशाद की कुछ महीने पहले ही शादी हुई थी. उनकी बीवी अब इद्दत कर रही हैं.
दिलशाद चेन्नई में काम करते थे और 9 फ़रवरी को बुख़ार की हालत में घर लौटे. परिजनों में पहले गांव में इलाज कराया और फिर नल्हड़ मेडिकल कॉलेज ले गए.
उनकी मां कहती हैं, "आईसीयू में रखा… 48 घंटे में ख़त्म हो गया सब."
उनके पिता हकीमुद्दीन कहते हैं, "हमने ऐसा कभी नहीं देखा. बुख़ार आए और चार-पांच दिन में आदमी ख़त्म."
दिलशाद का भी मरने वाले बाक़ी लोगों की ही तरह लिवर फे़ल हुआ था.
गांव में मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग बातें भी सुनाई देती हैं. कुछ लोग कहते हैं कि पंद्रह तो कुछ बीस तक मौतों का दावा करते हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को 19 जनवरी से 11 फ़रवरी के बीच गांव में कम से कम पंद्रह मौतों का पता चला है, जिनमें कई बुज़ुर्ग थे जिनकी मौत घर पर ही बीमारी से हुई.
लेकिन प्रशासन के अनुसार, कम से कम सात मौतें अचानक बीमार पड़ने से हुई हैं और अभी तक इन मौतों के स्पष्ट कारण की पुष्टि नहीं की जा सकती.
यहीं से शुरू होती हैं- जांच और खड़े होते हैं कई सवाल भी.
प्रशासन क्या कर रहा है?
स्वास्थ्य विभाग ने 2 फ़रवरी से गांव में हेल्थ कैंप लगाया है और अब तक एक हज़ार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई है. ब्लड सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि जांच की जा सके.
सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर संजय शर्मा बताते हैं, "क़रीब 1100 सैंपल लिए गए हैं. 2100 से ज़्यादा घरों की स्क्रीनिंग की गई है."
वह कहते हैं, "हमने गांव में क्लोरीनेशन भी किया है, बीमारी से बचाने के लिए हेपेटाइटिस बी की वैक्सीन भी 209 लोगों को लगा दी है. इसके अलावा पानी की जांच भी की जा रही है, हेवी मेटल टेस्ट किए गए हैं."
ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "अब तक सात मौतें हुई हैं, मरने वालों में चार केस हेपेटाइटिस-बी पॉज़िटिव थे. इसके अलावा जांच के दौरान गांव में 17 हेपेटाइटिस-सी के कंफ़र्म केस मिले हैं. फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है."
लेकिन प्रशासन के दावों और गांव के लोगों की बेचैनी के बीच एक फ़ासला महसूस होता है.
गांव वाले पूछ रहे हैं, अगर बीमारी पहले से थी, तो अचानक इतनी मौतें क्यों हुईं?
क्या पानी है मौतों की वजह?
छांयसा में मीठा भूजल नहीं है. गांव में लगभग हर घर के बाहर पानी के टैंक दिखते हैं.
शारिक़ की मां आशूबी एक बाल्टी से लौटे में पानी निकालकर दिखाते हुए कहती हैं, "पीने का पानी ख़रीदना पड़ता है."
वह गांव में एक टैंक से रोज़ाना दो बाल्टी पानी भरकर लाती हैं.
घरों तक पाइपलाइन तो बिछी है, लेकिन लोगों का कहना है कि उसमें पीने का पानी नहीं आता.
दिलशाद के पिता हक़ीमुद्दीन कहते हैं, "मौतों की एक वजह पानी भी हो सकता है. हमारे गांव में लोग बासी पानी पीते हैं, एक बार टैंक में पानी डलवाते हैं और महीना भर उसी पर गुज़ारा करना होता है."
यही नहीं, छांयसा गांव के आस-पास भरा पानी भी एक बड़ी समस्या है. गांव के बाहर एक बड़े इलाक़े में बारिश का पानी ठहरा है.
गांव के पास से गुज़रती गुरुग्राम नहर पर खड़े होकर पानी को देखते हुए साफ़ समझ आता है कि लोग चिंतित क्यों हैं. पानी काला और बदबूदार है.
स्थानीय कार्यकर्ता रामेश्वर कहते हैं, "इसमें इंडस्ट्रियल केमिकल आता है. अगर पानी में हाथ डाल दो तो खुजली हो जाती है. छांयसा और आसपास के गांवों की पचास हज़ार एकड़ ज़मीन बारिश के पानी में डूबी है. पानी यहां से बाहर निकल ही नहीं पाता है."
क्या इस पानी का लिवर की बीमारी से कोई संबंध है? प्रशासन अभी इसकी पुष्टि नहीं करता.
हालांकि, ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "हमने पानी के टेस्ट कराए हैं, अभी रिपोर्ट नहीं आई है."
गांव के बाहर बरसाती पानी जमा है. खेतों में पानी भरा है. कुछ किसान बताते हैं कि खेती प्रभावित हो चुकी है.
एक स्थानीय व्यक्ति कहते हैं, "12 महीने पानी खड़ा रहता है. खेती ख़त्म हो गई."
गांव की भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय बदलाव बीमारी की कहानी में एक नई परत जोड़ते हैं.
स्थानीय कांग्रेस विधायक के बेटे नाज़िम चौधरी कहते हैं, "इस समस्या की जड़ नहर में आ रहा प्रदूषित पानी है. इंडस्ट्रियल वेस्ट की वजह से इलाक़े में ज़मीन में एक परत बन गई है और ज़मीन पानी को सोख नहीं पा रही है. जब तक गंदा पानी साफ़ नहीं होगा, यहां समस्याएं बनीं रहेंगी."
बजट का इंतज़ार
वहीं ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ दावा करते हैं कि सरकार लोगों तक साफ़ पानी पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.
डॉक्टर वशिष्ठ कहते हैं, "मुख्यमंत्री का निर्देश साफ़ है, जहां भी इस तरह का प्रदूषित पानी आता है, वहां एसटीपीज़ बनाए जाएं. सरकार इस पर काम कर रही है, हम उम्मीद करते हैं कि पानी साफ़ करने के प्लांट लगाने के लिए हमें और बजट मिलेगा, ताकि पानी को साफ़ करके ही हम आगे खेत में और लोगों के उपयोग के लिए भेज पाएं."
लेकिन नाज़िम चौधरी कहते हैं कि जब तक दिल्ली से प्रदूषित पानी आना नहीं रुकेगा तब तक इन ग्रामीण इलाक़ों में प्रदूषित पानी का समाधान नहीं होगा.
हालांकि ऐसी कोई वैज्ञानिक शोध रिपोर्ट नहीं है जो पलवल के गांवों में हो रही मौतों या पानी के जमाव को सीधे तौर पर यमुना नदी के प्रदूषण से जोड़ती हो.
गांव में सरकारी अस्पताल लेकिन इलाज कर रहे झोलाछाप
गांव से क़रीब एक किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है. वहां तक जाने वाली सड़क कच्ची है.
ग्रामीण कहते हैं कि डॉक्टर नियमित नहीं मिलते.
मुस्तकीम नाम के एक ग्रामीण कहते हैं, "यहां पहुंचने का रास्ता ही पानी से भरा रहता है, लोग किसी तरह अस्पताल पहुंचें भी तो डॉक्टर मौजूद नहीं रहते. मजबूरी में लोग झोलाछाप से इलाज कराते हैं."
यहां मौजूद कई और ग्रामीण भी ऐसे ही आरोप लगाते हैं.
मुस्तकीम कहते हैं, "सब कह रहे हैं कि पानी की वजह से लोग मरे हैं, यह एक वजह हो सकती है लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि संक्रमण झोलाछाप डॉक्टरों के यहां से फैला हो."
गांव में हाल के दिनों में जान गंवाने वाले लोगों में एक समानता है- लगभग सभी ने पहला इलाज गांव में अवैध डॉक्टर से लिया था.
प्रशासन भी मौतों के ग़लत इलाज से जुड़े होने की आशंका से इनकार नहीं कर रहा है.
सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी संजय शर्मा कहते हैं, "हम झोलाछाप डॉक्टरों पर भी कार्रवाई कर रहे हैं, यह जांच भी की जा रही है कि कहीं संक्रमण उनके यहां से तो नहीं फैला."
ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ कहते हैं, "हेपेटाइटिस बी और सी ब्लड बॉर्न संक्रमण हैं. ऐसी आशंका भी है कि झोलाछाप डॉक्टरों ने एक ही सीरिंज का बार-बार इस्तेमाल किया हो. हमने कुछ झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई भी की है."
मौतों की वजह तक पहुंचने के लिए यहां राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की टीम ने भी जांच की है. दिल्ली के आरएमएल अस्पताल की टीमों ने भी गांव का दौरा किया है.
डॉक्टर वशिष्ठ कहते हैं, "कई बार कोई आउटब्रेक होता है तो उसको तुरंत डायग्नोज़ करना इतना आसान नहीं होता है, क्योंकि जो मौतें हुई हैं, वह पहले हो चुकी हैं. सभी टीमें वहां पर हैं, नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल की टीम है, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज नल्हड़ की टीम ने भी सैंपल लिए हैं, दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल की टीम ने भी दौरा किया है. सभी डॉक्टर और एपिडेमियोलॉजिस्ट अपना काम कर रहे हैं."
वह कहते हैं, "जब तक सभी रिपोर्टें नहीं आ जातीं तब तक पुख़्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अचानक हुई इन मौतों की असली वजह क्या है."
'सबसे तंदुरुस्त था मेरा बेटा'
पीलिया, हेपटाइटिस बी और लिवर फेल होने से अचानक हुई ये मौतें सिर्फ़ छांयसा गांव तक सीमित हैं.
ज़िला उपायुक्त डॉक्टर हरीश वशिष्ठ और स्वास्थ्य अधिकारी संजय शर्मा के मुताबिक़, आसपास के गांवों से ऐसा कोई मामला रिपोर्ट नहीं हुआ है.
फिलहाल, छांयसा गांव में मौतों का सिलसिला थम गया है लेकिन यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि एक ही गांव में, अचानक इतनी मौतें कैसे हुईं?
गांव के जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनकी ज़िंदगी उजड़ गई है.
आशूबी सवाल करती हैं, "मेरा बेटा गांव में सबसे तंदुरुस्त था, उसके अब्बा उसे पहलवान बनाना चाहते थे, मैं कैसे मान लूं कि वह बुख़ार से मर गया, उसका लिवर अचानक कैसे फे़ल हो गया?"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


