विचार/लेख
-गोकुल सोनी
आज जब लोग किसी के अतीत को लेकर तरह-तरह की कहानियां गढ़ लेते हैं, तो मुझे अपने जीवन का एक सच्चा और दिलचस्प प्रसंग याद आ जाता है। यह सुनकर शायद आपको थोड़ा आश्चर्य हो, लेकिन सच यही है, मैं भी कभी चाय बेचता था। यह कोई रूपक या राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि मेरे जीवन का बिल्कुल सच्चा अनुभव है। यह कहानी है वर्ष 1977 की, जब जीवन मुझे छोटे-छोटे कामों के जरिए बड़े सबक सिखा रहा था।
उस समय रायपुर के गांधी मैदान के पास स्थित बंदोबस्त कार्यालय को पहले चकबंदी ऑफिस कहा जाता था। बाद में जब यहां लैंड रिकॉर्ड का काम शुरू हुआ तो इसे बंदोबस्त कार्यालय के रूप में जाना जाने लगा। इसी कार्यालय परिसर में मेरे एक बेहद करीबी पारिवारिक सदस्य चपरासी के पद पर कार्यरत थे। उन्हें वहीं रहने के लिए एक सरकारी मकान मिला हुआ था और पूरा परिवार उसी परिसर में रहता था।
उस कार्यालय में बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी काम करते थे। इसके अलावा वहां पटवारी प्रशिक्षण भी चलता था, जिसमें रोज लगभग 60-70 प्रशिक्षु आते थे।
लेकिन आसपास चाय की कोई दुकान नहीं थी। चाय पीने के लिए लोगों को कोतवाली चौक या कालीबाड़ी चौक तक जाना पड़ता था। तब मेरे उस पारिवारिक सदस्य के मन में एक विचार आया, क्यों न यहीं चाय बनाकर लोगों को पिलाई जाए ?
बस फिर क्या था, सरकारी क्वार्टर में ही चाय बननी शुरू हो गई और धीरे-धीरे कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी वहीं आकर चाय पीने लगे। देखते ही देखते यह छोटी-सी व्यवस्था एक चलती-फिरती दुकान बन गई।
दुकान अच्छी चलने लगी तो लोगों की टेबल तक चाय पहुंचाने के लिए एक लडक़ा रखा गया। उसका नाम था मेघनाथ, जो उत्कल (ओडिशा) का रहने वाला था। जब कभी मेघनाथ छुट्टी पर चला जाता, तब चाय पहुंचाने की समस्या खड़ी हो जाती। ऐसे ही एक दिन मेरे रिश्तेदार ने मुझसे कहा, गोकुल, जरा अमुक साहब के पास चाय छोड़ आओ। बस यहीं से मेरी भी इस ‘चाय सेवा’ में एंट्री हो गई।
धीरे-धीरे दफ्तर के कई अधिकारी-कर्मचारी मुझसे ही चाय मंगाने लगे। मेघनाथ मौजूद रहता तब भी लोग कहते, गोकुल को भेज दो, वही चाय लेकर आए। इसकी एक छोटी-सी वजह थी। मैं चाय का गिलास थोड़ा ज्यादा भरकर दे देता था। उस समय मुझे न घाटे की चिंता थी, न मुनाफे की, बस लोगों को भरपूर चाय मिलनी चाहिए, यही सोचकर गिलास थोड़ा उदारता से भर देता था।
उन दिनों वहां के आयुक्त ए.के. वाजपेयी (ढ्ढ्रस्) और उपायुक्त श्रीवास्तवजी सहित कई अधिकारियों तक भी मैं चाय पहुंचाया करता था। करीब दो-चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। उस समय वहां काम करने वाली सुवार्ता जॉन मैडम मुझे छोटे भाई की तरह स्नेह देती थीं। वे अक्सर समझाती थीं, तू ये चाय-वाय छोड़ और पढ़ाई पर ध्यान दे।
इसी बीच मेरे बड़े भैया की भी उसी कार्यालय में सरकारी नौकरी लग गई। धीरे-धीरे मैंने चाय पहुंचाने का काम छोड़ दिया और पढ़ाई की ओर ध्यान देने लगा। वैसे भी चाय की दुकान चलाने वाले मेरे अपने पारिवारिक सदस्य ही थे, इसलिए मैं वहां पूरी तरह मुफ्त सेवा देता था। कभी किसी प्रकार का पारिश्रमिक नहीं लिया।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया। कई वर्ष बाद जब मैं नवभारत अखबार में पत्रकार बन गया, तो एक दिन किसी कवरेज के सिलसिले में उसी बंदोबस्त कार्यालय जाना हुआ। वहीं अचानक जॉन मैडम मिल गईं। जब उन्होंने मुझे एक बड़े अखबार के पत्रकार के रूप में देखा, तो वे बेहद खुश हुईं। मुझे आज भी याद है, उनकी आंखें खुशी से भर आई थीं। शायद उन्हें उस समय का वह चाय पहुंचाने वाला लडक़ा याद आ गया था।
यह है मेरे जीवन का वह छोटा-सा अध्याय जब मैं चाय पहुंचाया करता था। कुछ लोगों को यह कहानी शायद अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह मेरे जीवन की एक सच्ची घटना है। उस दौर के कई अधिकारी-कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जॉन मैडम भी अब रिटायर होकर संभवत: बैरन बाजार क्षेत्र में रहती हैं। मेघनाथ अब अपनी खुद की बढ़ईपारा में चाय दुकान संचालित करता है।
जीवन की यही खूबसूरती है कभी हम छोटे-छोटे काम करते हुए बड़े सपने देखते हैं, और वही अनुभव आगे चलकर हमारी पहचान बन जाते हैं।
आपको मेरे जीवन की यह सच्ची घटना कैसी लगी, जरूर बताइयेगा। आपके विचार और प्रतिक्रियाएँ हमेशा मुझे प्रेरणा देती हैं।
(इस तस्वीर को मेरे निवेदन पर ्रढ्ढ ने बनाकर दिया है। उसका आभार)
(लेखक छत्तीसगढ़ के सबसे वरिष्ठ सक्रिय न्यूज-फोटोग्राफर हैं। वे फेसबुक पर दिलचस्प संस्मरण लिखते ही रहते हैं।)
-सईदुज्जमां
गोल्ड यानी सोना काफी लंबे वक़्त से ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम का हिस्सा रहा है। इसे अनिश्चितता से बचाव और संपत्ति को अलग-अलग रूप में रखने का तरीका माना जाता है।
भारत में सोना घरेलू बचत और खर्च का अहम हिस्सा है, इसलिए यह दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है।
हाल के हफ्तों में सोने की कीमतों में गिरावट आई है। रॉयटर्स के मुताबिक, 28 फरवरी से अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद सोना 10 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है।
पिछले हफ्ते, एक लेख में शशि थरूर ने कहा कि, ‘भारत में गोल्ड यानी सोने की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन उत्पादन अभी भी बहुत कम है।’
भारत में गोल्ड की स्थिति
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के पास असल में कितना सोना है?
हमने यह सवाल इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर की प्रमुख प्रोफेसर सुंदरावल्ली नारायणस्वामी से पूछा।
उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘कई तरह के आंकड़े हैं, कुछ सही हैं और बाकी अनुमान हैं। आरबीआई के पास करीब 800-820 टन सोना है। आर्थिक रूप से निकाला जा सकने वाला सोना करीब 70-80 टन है।’
आर्थिक रूप से निकाला जा सकने वाला सोना वह होता है जिसे मौजूदा तकनीक से फायदे के साथ माइन किया जा सके, यानी निकाला जा सके।
प्रोफेसर सुंदरावल्ली कहती हैं, ‘भारत में अच्छी गुणवत्ता वाला सोना कम है, इसलिए यहां खनन प्रतिस्पर्धी नहीं है।’
उन्होंने कहा कि, ‘भारतीय घरों में बहुत सारा सोना है। घरों में मौजूद सोने को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन आमतौर पर इसे 25 हज़ार से 27 हज़ार टन माना जाता है।’ जब उनसे इस आंकड़े का आधार पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यह एक सामान्य अनुमान है, जिसे ज्य़ादातर लोग मानते हैं।
उन्होंने कहा कि, ‘हर साल 600 से 700 टन सोना आयात होता है और निर्यात बहुत कम है, इसलिए यह सोना घरों में जमा हो गया है।’
भारत से आगे कितने देश?
वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, फरवरी 2026 तक भारत के पास करीब 880 टन आधिकारिक सोना था।
इस मामले में भारत दुनिया में नौवें स्थान पर है। अमेरिका, जर्मनी, आईएमएफ, इटली, फ्रांस, रूस, चीन और स्विट्जऱलैंड भारत से आगे हैं।
हालांकि, आधिकारिक भंडार भारत की सोने की कहानी का केवल एक हिस्सा हैं।
थरूर ने अपने लेख में कहा कि, ‘हमारे पास करीब 500 मिलियन टन गोल्ड ओर यानी सोने का अयस्क(यानी वह पत्थर/मिट्टी जिसमें सोना होता है) है, लेकिन उत्पादन बहुत कम है।’
नेशनल मिनरल इन्वेंटरी के मुताबिक देश में कुल 518।23 मिलियन टन सोने का अयस्क है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारा सोना आसानी से निकाला जा सकता है। इसमें से 494।50 मिलियन टन निकालना मुश्किल है, जबकि 23।72 मिलियन टन को रिज़र्व माना जाता है।
बचा हुआ संसाधन उसे कहा जाता है, जहां सोना हो सकता है, लेकिन उसे निकालना महंगा और मुश्किल है। वहीं रिजर्व उसे कहा जाता है, जहां से सोना निकालना किफायती और फायदे का सौदा है।
प्राइवेट कंपनियां निवेश क्यों नहीं करना चाहती
प्रोफ़ेसर सुंदरावल्ली नारायणस्वामी के मुताबिक, ‘यह 500 मिलियन टन सोने का अयस्क है, असली सोना नहीं है। औसतन 1-3 ग्राम प्रति टन के हिसाब से इसमें सिर्फ 500-600 टन सोना होगा।’
इंडियन मिनरल्स ईयरबुक 2024 के मुताबिक, 2023-24 में भारत ने सिर्फ 1.6 टन सोने का उत्पादन किया। जबकि दुनिया में साल 2023 में करीब 3,300 टन सोना निकला, जिसमें चीन ने अकेले 375 टन उत्पादन किया।
भारत की क्षमता और उत्पादन के बीच अंतर कई वजहों से है। सोने की खदानों की खोज करना महंगा और जोख़िम भरा है। सरकार के पास सीमित संसाधन और तकनीक है, और निजी कंपनियां भी बिना पक्के सबूत के निवेश नहीं करना चाहतीं।
संतोष मल्होत्रा यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट में विजिटिंग प्रोफेसर हैं, वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। प्रोफेसर संतोष ने बीबीसी से कहा, ‘माइनिंग यानी खनन एक महंगा काम है। इसमें लोगों और तकनीक पर बड़ा निवेश चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है। निजी कंपनियां भी तभी आती हैं जब उन्हें भरोसा होता है।’
दुनिया की राजनीति में कुछ शब्द बार-बार लौटते हैं, ‘सुरक्षा’, ‘राष्ट्रहित’, ‘लोकतंत्र’, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक और शब्द चुपचाप केंद्र में आ गया है: ‘ईश्वर’। जब बड़े नेता युद्ध, सैन्य कार्रवाई या भू-राजनीतिक टकराव को ‘ईश्वर की इच्छा’ या ‘नैतिक कर्तव्य’ की भाषा में पेश करने लगते हैं, तब सवाल केवल नीतियों का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी सभ्यता की दिशा का हो जाता है। डॉनल्ड ट्रम्प के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट होकर सामने आई, जहाँ धार्मिक समूहों, खासतौर पर अमेरिकी इवैंजेलिकल ईसाइयों, का समर्थन केवल राजनीतिक गठजोड़ नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक समीकरण का हिस्सा था। इस समीकरण में इजऱाइल का समर्थन, ईरान का विरोध, और ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कहानी एक साथ गुँथ जाती है। यही वह जगह है जहाँ राजनीति और धर्म की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।
ट्रंप ने कई मौकों पर अपने समर्थकों से यह कहा कि अमेरिका ‘ईश्वर की कृपा से महान है’ और यह कि देश का मिशन केवल आर्थिक या सैन्य नहीं, बल्कि नैतिक भी है। उनके करीबी कुछ नेताओं और सलाहकारों ने इससे भी आगे जाकर यह संकेत दिया कि अमेरिका की विदेश नीति ‘दिव्य योजना’ का हिस्सा हो सकती है। उदाहरण के लिए, कुछ धार्मिक-राजनीतिक मंचों पर यह विचार खुलकर सामने आया कि इजऱाइल की सुरक्षा केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि बाइबिल की भविष्यवाणियों से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में ईरान को अक्सर ‘दुष्ट सत्ता’ यानी बुराई के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। यह भाषा सामान्य कूटनीति की नहीं होती; यह उस मानसिकता की भाषा है जहाँ संघर्ष को नैतिक युद्ध के रूप में देखा जाता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी, क्या ये नेता सच में धर्म के नाम पर युद्ध को जायज़ मानते हैं, या यह केवल राजनीतिक रणनीति है? जवाब सीधा नहीं है। एक स्तर पर यह साफ़ है कि धार्मिक भाषा लोगों को जोड़ती है। जब कोई नेता ‘ईश्वर’, ‘दैवीय जि़म्मेदारी’, ‘दुष्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह सीधे भावनाओं को छूता है। इससे समर्थकों में एक तरह की नैतिक ऊर्जा पैदा होती है, जो सामान्य राजनीतिक तर्कों से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि अमेरिकी इवैंजेलिकल समुदाय के कुछ हिस्सों में वास्तव में यह विश्वास मौजूद है कि मध्य पूर्व में होने वाली घटनाएँ ‘अंत-काल’, अंत समय, की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इस सोच में इजऱाइल का अस्तित्व और उसकी रक्षा एक धार्मिक जिम्मेदारी बन जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ता है, तो वह केवल भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं रह जाता। उसे एक ऐसी कथा में बदल दिया जाता है जिसमें अमेरिका ‘अच्छाई’ का प्रतिनिधि है और उसका विरोध करने वाले ‘बुराई’ के। यह व्याख्या खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह जटिल वास्तविकताओं को सरल नैतिक फ्रेम में बदल देता है। जब कोई संघर्ष ‘भले बनाम बुरे ’ का संघर्ष बन जाता है, तो संवाद, समझौता और कूटनीति के लिए जगह बहुत कम बचती है। यही कारण है कि कई बार ऐसे नेताओं के बयान बेहद आक्रामक और युद्धोन्मुखी लगते हैं, क्योंकि वे केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक युद्ध की भाषा में बात कर रहे होते हैं।
-कपिल सिब्बल
मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है। कहने को तो इसका मकसद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) में बदलाव करना है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो सके। लेकिन इस पूरी कवायद की टाइमिंग और कानूनी बारीकियों को देखें, तो यह महिला आरक्षण से जुड़ा कम और अगले, 2029 के, लोकसभा चुनावों से जुड़ा ज्यादा नजऱ आता है।
पहला सवाल इस विशेष सत्र के समय पर ही उठता है। यह तब हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। वहां 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में सत्र बुलाकर सरकार विपक्षी सांसदों, खासकर टीएमसी को, इस मुश्किल में डाल रही है कि वे अपनी जनता के बीच चुनाव प्रचार करें या दिल्ली आकर संसद में वोट दें?
यह कोई अनजाने में की गई चूक नहीं, बल्कि विपक्ष को परेशान करने की सोची-समझी कोशिश है। अगर सरकार की नीयत में खोट नहीं होता, तो क्या यह काम 29 अप्रैल के बाद नहीं किया जा सकता था? जाहिर है, इसका मकसद मतदाताओं के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाना और विपक्ष के चुनाव प्रचार में खलल डालना है।
2023 में जब 106वां संविधान संशोधन हुआ था, तो अनुच्छेद 334 ए में यह साफ लिखा गया था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। अब सरकार अचानक अपने ही बनाए कानून से पीछे हट रही है। वह नई जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के पुराने आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है।
ऐसा क्यों किया जा रहा है? जब देश के रजिस्ट्रार जनरल खुद कह चुके हैं कि नई जनगणना दिसंबर 2027 तक पूरी हो जाएगी, तो फिर 15 साल पुराने डेटा के आधार पर देश का राजनीतिक नक्शा क्यों बदला जा रहा है? जवाब साफ है, अपनी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाओं को बदलना।
कानूनी तौर पर अनुच्छेद 334 ए कहता है कि परिसीमन केवल महिला आरक्षण लागू करने के उद्देश्य के लिए ही होगा, यानी केवल यह तय करने के लिए कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसे ‘जनरल डिलिमिटेशन’ का जरिया बनाकर पूरी संसद की संरचना बदलना असंवैधानिक है।
सरकार यहां महिला सशक्तिकरण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है। जम्मू-कश्मीर और असम में हमने देख लिया है कि कैसे परिसीमन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया। मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हमला संविधान के ‘मूल ढांचे’ पर है, जिसे कोई भी विपक्ष स्वीकार नहीं कर सकता।
इस योजना का सबसे खतरनाक पहलू भारत के संघीय ढांचे को तबाह करना है। केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा।
गणित सीधा है: आज उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39। अगर सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो यूपी की सीटें बढक़र 120 हो जाएंगी और तमिलनाडु केवल 59 पर सिमट जाएगा। यानी दोनों राज्यों के बीच जो अंतर पहले 41 सीटों का था, वह बढक़र 61 हो जाएगा।
नीयत साफ हो, तो कभी भी लागू किया जा सकता है...
-कपिल सिब्बल
मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है. कहने को तो इसका मकसद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) में बदलाव करना है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो सके. लेकिन इस पूरी कवायद की टाइमिंग और कानूनी बारीकियों को देखें, तो यह महिला आरक्षण से जुड़ा कम और अगले, 2029 के, लोकसभा चुनावों से जुड़ा ज्यादा नज़र आता है.
पहला सवाल इस विशेष सत्र के समय पर ही उठता है. यह तब हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं. वहां 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है. ऐसे में सत्र बुलाकर सरकार विपक्षी सांसदों, खासकर टीएमसी को, इस मुश्किल में डाल रही है कि वे अपनी जनता के बीच चुनाव प्रचार करें या दिल्ली आकर संसद में वोट दें?
यह कोई अनजाने में की गई चूक नहीं, बल्कि विपक्ष को परेशान करने की सोची-समझी कोशिश है. अगर सरकार की नीयत में खोट नहीं होता, तो क्या यह काम 29 अप्रैल के बाद नहीं किया जा सकता था? जाहिर है, इसका मकसद मतदाताओं के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाना और विपक्ष के चुनाव प्रचार में खलल डालना है.
2023 में जब 106वां संविधान संशोधन हुआ था, तो अनुच्छेद 334 ए में यह साफ लिखा गया था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा. अब सरकार अचानक अपने ही बनाए कानून से पीछे हट रही है. वह नई जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के पुराने आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है.
ऐसा क्यों किया जा रहा है? जब देश के रजिस्ट्रार जनरल खुद कह चुके हैं कि नई जनगणना दिसंबर 2027 तक पूरी हो जाएगी, तो फिर 15 साल पुराने डेटा के आधार पर देश का राजनीतिक नक्शा क्यों बदला जा रहा है? जवाब साफ है, अपनी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाओं को बदलना.
कानूनी तौर पर अनुच्छेद 334 ए कहता है कि परिसीमन केवल महिला आरक्षण लागू करने के उद्देश्य के लिए ही होगा, यानी केवल यह तय करने के लिए कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इसे ‘जनरल डिलिमिटेशन’ का जरिया बनाकर पूरी संसद की संरचना बदलना असंवैधानिक है.
सरकार यहां महिला सशक्तिकरण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है. जम्मू-कश्मीर और असम में हमने देख लिया है कि कैसे परिसीमन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया. मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हमला संविधान के ‘मूल ढांचे’ पर है, जिसे कोई भी विपक्ष स्वीकार नहीं कर सकता.
इस योजना का सबसे खतरनाक पहलू भारत के संघीय ढांचे को तबाह करना है. केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा.
गणित सीधा है: आज उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39. अगर सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो यूपी की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी और तमिलनाडु केवल 59 पर सिमट जाएगा. यानी दोनों राज्यों के बीच जो अंतर पहले 41 सीटों का था, वह बढ़कर 61 हो जाएगा.
यह उन दक्षिण भारतीय राज्यों को सीधे तौर पर ‘सजा’ देना है, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है. अमेरिका की सीनेट में हर राज्य के दो ही प्रतिनिधि होते हैं, ताकि संतुलन बना रहे. लेकिन भारत में जनसंख्या के नाम पर उत्तर भारत को फायदा पहुंचाकर दक्षिण की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है. यह देश की एकता के लिए घातक है.
अगर प्रधानमंत्री वास्तव में महिला आरक्षण को तुरंत लागू करना चाहते हैं, तो उन्हें किसी विशेष सत्र या पुराने डेटा वाले परिसीमन का प्रपंच रचने की जरूरत नहीं है. इसका समाधान बहुत आसान है: लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में से ही तुरंत 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीजिए. सारा विपक्ष इस पर आपके साथ खड़ा होगा.
लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि ‘नारी शक्ति’ तो केवल एक बहाना है, असली मकसद ‘राजनीतिक शक्ति’ पर कब्जा करना है. विपक्ष को एकजुट होकर संघीय ढांचे पर इस हमले का विरोध करना चाहिए. हमें आरक्षण चाहिए, लेकिन परिसीमन की साजिशों वाली शर्तों के साथ नहीं.
-चित्रगुप्त
भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या, प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे के बीच का संतुलन नई कसौटी पर परखा जाने वाला है। 2011 की जनगणना के आधार पर तय लोकसभा सीटों का वितरण अब उस सामाजिक-जनसांख्यिकीय वास्तविकता से मेल नहीं खाता जो 2026 तक आकार ले चुकी है। उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश, में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र-तेलंगाना, ने अपेक्षाकृत स्थिर या धीमी वृद्धि दर्ज की है। इसके बावजूद संसद की संरचना अपरिवर्तित है, जिससे प्रतिनिधित्व का अनुपात असमान होता जा रहा है। यह असमानता केवल संख्यात्मक नहीं है; यह लोकतांत्रिक वैधता और राजनीतिक संतुलन दोनों को प्रभावित करती है। यदि एक सांसद उत्तर भारत में कहीं अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है और दक्षिण में अपेक्षाकृत कम, तो “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत व्यवहार में कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
लोकतंत्र का मूल विचार यह है कि हर नागरिक की राजनीतिक आवाज़ समान महत्व रखे, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह समानता धीरे-धीरे धुंधली हो रही है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में एक सांसद 30 लाख से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि दक्षिण भारत में यह संख्या लगभग 18–20 लाख के आसपास है। यह अंतर केवल सांख्यिकीय असमानता नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव के वितरण में भी असंतुलन पैदा करता है। यदि इसे समय रहते संबोधित नहीं किया गया, तो यह असंतोष का कारण बन सकता है, खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहाँ लोग पहले से ही खुद को कम प्रतिनिधित्व वाला महसूस कर सकते हैं। इसलिए जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास लोकतांत्रिक दृष्टि से आवश्यक प्रतीत होता है, लेकिन यहीं से एक और जटिल प्रश्न सामने आता है, क्या केवल जनसंख्या ही प्रतिनिधित्व का एकमात्र आधार होना चाहिए?
यहीं पर नीति प्रोत्साहन की बहस सामने आती है, जो इस मुद्दे को और संवेदनशील बना देती है। दक्षिण भारत के राज्यों ने दशकों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में निवेश कर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया। यह राष्ट्रीय नीति का ही हिस्सा था, जिसे प्रोत्साहित किया गया और जिसके कारण 1976 में लोकसभा सीटों को “फ्रीज़” कर दिया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो। अब यदि नई जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास होता है और दक्षिण भारत की सीटें घटती हैं, तो यह उनके लिए एक तरह से “नीति की सजा” जैसा महसूस हो सकता है। दूसरी ओर, उत्तर भारत के राज्य यह तर्क देते हैं कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुसार होना चाहिए, न कि पिछली नीतिगत सफलताओं या असफलताओं के आधार पर। यही वह नैतिक और राजनीतिक द्वंद्व है, जहाँ कोई भी समाधान पूरी तरह निष्पक्ष नहीं दिखाई देता।
इस बहस का तीसरा और शायद सबसे जटिल आयाम है, संघीय संतुलन। भारत केवल एक लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक संघीय गणराज्य है, जहाँ राज्यों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक पहचान है। यदि लोकसभा में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ती हैं, तो उत्तर भारत का राजनीतिक प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिण भारत का हिस्सा घट सकता है। इससे नीति-निर्माण की दिशा भी प्रभावित हो सकती है, क्योंकि संसद में बहुमत ही राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तय करता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह चिंता पहले से मौजूद है कि वे कर संग्रह में अधिक योगदान देते हैं, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति धीरे-धीरे उत्तर की ओर खिसक सकती है। यह स्थिति केवल राजनीतिक असंतुलन ही नहीं, बल्कि संघीय ढांचे में अविश्वास को भी जन्म दे सकती है, जो लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकता है।
दुनिया के अन्य लोकतंत्रों ने भी ऐसे ही संकटों का सामना किया है, और उनके अनुभव भारत के लिए उपयोगी संकेत देते हैं। अमेरिका ने दो सदनों की व्यवस्था के माध्यम से इस संतुलन को साधा, जहाँ एक सदन पूरी तरह जनसंख्या आधारित है, वहीं दूसरा राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देता है। कनाडा ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रांत की सीटें कम न हों, भले ही उसकी जनसंख्या वृद्धि धीमी हो। जर्मनी ने संसद की सीटों को लचीला रखा और असंतुलन होने पर सीटें बढ़ाने का रास्ता अपनाया। ऑस्ट्रेलिया ने छोटे राज्यों के लिए न्यूनतम प्रतिनिधित्व की गारंटी दी। इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी देश इस समस्या का “एकमात्र सही समाधान” नहीं ढूँढ पाया; सभी ने परिस्थितियों के अनुसार संतुलन बनाने की कोशिश की है।
भारत के लिए भी समाधान एकल नहीं, बल्कि बहु-स्तरीय होना चाहिए। लोकसभा की सीटों को बढ़ाना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है, जिससे उत्तर भारत को अधिक प्रतिनिधित्व मिले और दक्षिण भारत की मौजूदा सीटें बरकरार रहें। इसके साथ ही राज्यों के लिए न्यूनतम सीटों की गारंटी दी जा सकती है, ताकि नीति प्रोत्साहन का सिद्धांत कमजोर न पड़े। राज्यसभा की भूमिका को मजबूत करना भी एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, क्योंकि यह संघीय संतुलन का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अतिरिक्त, वित्त आयोग और अन्य संस्थागत तंत्रों के माध्यम से उन राज्यों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। इस तरह एक ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकता है जिसमें लोकतंत्र, नीति और संघीय संतुलन, तीनों को एक साथ जगह मिल सके।
अंततः यह प्रश्न केवल संविधान या गणित का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि का है। भारत को यह तय करना होगा कि वह अपने लोकतंत्र को केवल संख्याओं के आधार पर चलाना चाहता है, या वह एक ऐसा संतुलित मॉडल विकसित करना चाहता है जिसमें विविधता, न्याय और स्थिरता, तीनों का सम्मान हो। आने वाले वर्षों में यह बहस और तेज़ होगी, और उसका समाधान भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की सबसे बड़ी परीक्षा होगा। क्योंकि अंततः संसद की ताकत उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसकी न्यायपूर्ण संरचना में निहित होती है। (chatgpt की मदद से तैयार)
-जसिंता केरकेट्टा
हर समाज के भीतर स्त्रियां दरअसल दलित हैं। दलित मतलब दमित, शोषित, दोयम दजऱ्ा। सवर्ण समाज के भीतर भी बहुत सी स्त्रियां दमित और शोषित हैं। व्यवस्था की नींव में चुन दी गईं। इसलिए जब वे पूरे आक्रोश के साथ कविता में प्रतिरोध करती हैं, तब दलित और आदिवासी स्त्रियों को उनकी पीड़ा समझ में आती है। बहुत से पुरुषों को भी, जो इंसान के रूप में स्त्री-पुरुष से परे अपने भीतर वही संघर्ष कर रहे हैं। अपने भीतर और बाहर उस पीड़ा को दलित समाज, आदिवासी समुदाय और इंसान होने की जद्दोजहद में दूसरी जाति के कुछ लोगों ने भी अपने भीतर महसूस किया है। ऐसे में प्रतिरोध की हर पंक्ति के साथ उनका खड़ा होना स्वाभाविक ही है। तब भी हमेशा आत्ममंथन की ज़रूरत बनी रहती है। सामूहिक रूप से भी और अकेले भी।
सवर्ण समाज के भीतर स्त्रियां इंसान के रूप में न स्वीकारे जाते हुए दूसरे तरह से दमित हैं। इसे सह जाने के एवज में मुआवजे के रूप में ज़रूर उन्हें प्रिविलेज भी मिलता है। इन सब संघर्ष के अलग-अलग रूप हैं, तब भी दलितों की पीड़ा की तरह वह एहसास, अनुभव उन्हें कभी नहीं हो सकेगा। उस आक्रोश के भीतर भी स्त्री या पुरुष के रूप में सवर्ण होने का भाव कहीं गहरे बना ही रहेगा। और वह अनायास ही भाषा, व्यवहार में चला आएगा। कई बार बहुत सतर्कता के बाद भी, थोड़ी सी नींद और बेखय़ाली के बीच ही। दरअसल समाज व्यक्ति के भीतर निश्चित रूप से रहता है और अपनी भाषा भी बोलता रहता है, चाहे वह एक स्त्री हो या पुरुष। इसलिए साधारण बोलचाल में, प्रकट रूप में, छिपे हुए रूप में, हंसी में और कभी-कभी व्यंग्य में भी अक्सर यह सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई पडऩे लगता है। और वह दृश्य-अदृश्य रूप से शोषित समाज को बार-बार अपमानित महसूस भी कराता है। जो भाषा सवर्ण समाज और पुरुष दोहराते हैं, उसे सवर्ण स्त्री के लिए भी उसी तरह दोहरा देने में कोई हिचक नहीं होती। यह स्वत: ही होता है। आवेग में, प्रतिरोध में, व्यापक भलाई की चाहत में या कभी-कभी बेहोश प्रेम में भी। पर जीवन भर, पीढ़ी दर पीढ़ी अपमान भरे शब्द सुनने वाले कोई दलित समाज या आदिवासी समुदाय की कोई स्त्री या पुरुष भी उस वाक्य को क्या उसी तरह दोहरा सकता है? बहुत रातों तक यह सोचने पर लगा, यह कोई नहीं कर सकता।
यह भी ध्यान देने की बात है कि हर बात में जो कानून की बात करते हैं, वह जानते ही हैं कि देश में 1989 में अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट ने जातिसूचक संबोधन और अपमान दोनों पर पाबंदी लगाई है। इसे दंडनीय भी माना है। इन सबको ध्यान रखने की जिम्मेदारी लेखक, कवि के ऊपर भी है। और उस समाज के ऊपर भी जिससे कोई लेखक, कवि बोलते, देखते, सुनते हुए उसे आत्मसात भी करता है। और उन लोगों को भी यह ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो समूह की शक्ति का उपयोग कर किसी व्यक्ति की आलोचना करने, सुधार की गुंजाइश रखने के बदले दंड देने, भय को बनाए रखने के वर्चस्ववादी ढांचे की तरफ जाने को ही आसान रास्ता समझते हैं। बदलाव का यही एकमात्र ढांचा देख पाते हैं।
याद आता है। कुछ साल पहले एक आदिवासी लेखक ने आदिवासी स्त्रियों के प्रति जब दूसरी जाति के पुरुष द्वारा उपयोग की गई भाषा को हूबहू वैसे ही रख देने की कोशिश की थी, तब पूरा आदिवासी समाज सन्न रह गया था। इतना आहत हुआ कि उन्होंने उनकी किताब जला दी, उनके किताब पर बैन लगाने की मांग की। और इससे उनकी नौकरी भी प्रभावित हुई। निश्चित रूप से आदिवासी समाज के भीतर भी अलग तरह से स्त्रियों पर नियंत्रण और शोषण मौजूद है, पर भाषा की दृष्टि से ऐसी भाषा का उपयोग जैसा लेखक के हिंदी अनुवाद में था, सबको हिला देने वाली भाषा थी, जिसका आदिवासी समाज अभ्यस्त नहीं रहा है।
-ओशो
कन्फ्यूशियस ने एक बार चेतावनी दी थी कि बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहना, हैरानी की बात है कि उन्हें आपसे दूर कर सकता है।
यह कहानी ढाई हजार साल पुरानी है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यह आज के दौर के लिए ही लिखी गई हो।
ली वेई नाम का एक बूढ़ा आदमी महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के पास एक सवाल लेकर गया, जो आज भी बहुत से बुज़ुर्गों को परेशान करता है, अपनी पूरी जि़ंदगी औलाद के लिए लगा देने के बाद भी, हम बुढ़ापे में खुद को अकेला क्यों महसूस करते हैं?
ली वेई ने अपनी औलाद के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। उसने बहुत मेहनत की ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी न हो।
जब बच्चे बड़े हो गए और अपनी जि़ंदगी जीने लगे, तो ली वेई ने अपना घर बेच दिया और बेटे के पास रहने चला गया, यह सोचकर कि अब वह प्यार और अपनापन पाएगा।
लेकिन उसे वह खुशी नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी। घर भरा हुआ था, लेकिन उसका दिल खाली था।
सब लोग दिन भर व्यस्त रहते, शाम को थक कर आते और सुकून चाहते। वे उसकी बातें आधे मन से सुनते, उसके सुझावों से चिढ़ जाते और उसकी मौजूदगी को बोझ समझने लगे।
वह जितना करीब आने की कोशिश करता, वे उतना ही दूर होते गए।
ली वेई ने कन्फ्यूशियस से अपना दुख कह सुनाया, गुरुजी! मैंने अपनी जि़ंदगी बच्चों के लिए दे दी। सोचा था उनके साथ रहकर सुकून मिलेगा, लेकिन मैं खुद को उनके बीच नापसंद महसूस करता हूँ। ऐसा क्यों?’
कन्फ्यूशियस ने उसे तीन आसान सबक़ सिखाए।
पहला सबक- पानी का बर्तन
उन्होंने एक बर्तन को पानी से भर दिया और पूछा कि अगर इसमें और पानी डालूँ तो क्या होगा?’
ली वेई ने कहा-यह छलक जाएगा।
कन्फ्यूशियस बोले-
बिल्कुल, रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। जब हम खुद को ज़बरदस्ती किसी ऐसी जगह डालते हैं जो पहले से भरी हो, तो संतुलन बिगड़ जाता है।
तुम अपने बच्चों के घर में फिर से केंद्र बनना चाहते हो, लेकिन अब उनकी जिंदगी और उनके बच्चे ही उनका केंद्र हैं।
दूसरा सबक- दो पेड़
उन्होंने पास के दो पेड़ों की ओर इशारा किया।
जब पेड़ बहुत पास-पास होते हैं तो क्या होता है?
ली वेई ने कहा- वे एक-दूसरे को रोकते हैं और कमजोर हो जाते हैं।
कन्फ्यूशियस ने कहा-
जि़ंदगी में भी यही होता है। ज़्यादा नजदीकी भी समस्या बन जाती है। बढऩे के लिए जगह जरूरी है।
तीसरा सबक-मु_ी भर रेत
कन्फ्यूशियस ने रेत को कसकर मु_ी में पकड़ा।
- शुभांगी मिश्रा
केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों को जो तीन ड्राफ़्ट बिल (मसौदा विधेयक) भेजे हैं उनमें दो बड़े ऐतिहासिक बदलाव प्रस्तावित हैं- पहला, लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और दूसरा, संसद के निचले सदन यानी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना।
इन विधेयकों को 16 से 18 अप्रैल को बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।
ये तीन विधेयक हैं-
केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026)
ये 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था। इसी वजह से, 2023 का ये क़ानून संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित होने के बावजूद कई लोगों ने चिंता जताई थी कि इस आरक्षण को लागू होने में एक दशक से भी अधिक समय लग सकता है।
अगर ये तीनों विधेयक पारित हो जाते हैं, तो 2029 के अगले आम चुनाव में इस आरक्षण का रास्ता साफ हो सकता है।
हालांकि, मंगलवार को विपक्षी नेताओं ने इन तीनों विधेयकों की आलोचना की है।
विपक्षी दलों ने इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया और इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया।
सबसे तीखी आलोचना लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव को लेकर हो रही है। कई विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई कि सीटों के पुनर्निर्धारण का जो आधार है वो दक्षिणी राज्यों के लोकसभा में प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है।
आइए इन तीनों विधेयकों के प्रस्तावों और उनसे जुड़े विवादों को समझते हैं।
1. लोकसभा सीटों की संख्या 850
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी- 815 राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से। फि़लहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है।
विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके।
अनुच्छेद 81 के इन्हीं प्रावधानों की वजह से 1976 से ही लोकसभा की सीटों की संख्या में इज़ाफ़ा नहीं हुआ है।
तो अगर मौजूदा लोकसभा का आधार 1971 की जनगणना थी, तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किस आधार पर दिया जा रहा है?
इस सवाल का जवाब डीलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक 2026) में है, जिसे भी विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।
इस विधेयक के उद्देश्यों के बारे में कहा गया है परिसीमन (डीलिमिटेशन) की प्रक्रिया ‘ताजा प्रकाशित जनगणना’ के आधार पर होगी। आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी। यानी इस विधेयक का आधार होगी 2011 में हुई जनगणना। और यही वह बिंदु है जिस पर दक्षिणी राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी होने की चिंता है।
अब तक हर राज्य को मिलने वाली संसदीय सीटों की संख्या इस आधार पर तय होती रही है कि किसी राज्य की आबादी और उसकी निर्वाचन सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग बराबर रहे। यानी पूरे भारत में हर एक सीट लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी।
2. दक्षिण भारतीय राज्यों की आपत्ति
दशकों तक भारत में जनसंख्या वृद्धि असमान रही है, जिसमें दक्षिणी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। अध्ययनों से पता चलता है कि अगर मौजूदा परिस्थितियों में आबादी के अनुपात में सीटें तय करने का यही मानदंड लागू किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर हो जाएगा।
राजनीतिक टिप्पणीकार अदिति फडणिस ने बीबीसी से कहा, ‘दक्षिणी राज्यों ने, जिन्हें आम तौर पर प्रगतिशील माना जाता है, परिवार नियोजन की नीति को बेहतर रूप से अपनाया है और छोटे परिवारों को बढ़ावा देने की कोशिश की है। दक्षिणी राज्यों को लग रहा है कि जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण की उनकी यह कोशिश उन्हें नुकसान की स्थिति में डाल देगी।’
दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि परिवार नियोजन पर बेहतर काम करने का उन्हें इनाम मिलने के बजाय नुकसान झेलना पड़ेगा और सीटों को तय करने का आधार जनसंख्या ही होगा तो ज़्यादा जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में सीटें दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़ जाएंगी और संसद में इन राज्यों से जुड़े मुद्दों को वरीयता दी जाने लगेगी।
सरकार बार-बार यह आश्वासन देती रही है कि संसद की मौजूदा संरचना में राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, लेकिन चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने मंगलवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा कि इसे सुनिश्चित करने के लिए इन तीनों विधेयकों में कुछ भी नहीं है।
मंगलवार को दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने भी अपनी चिंता जताई।
एक वीडियो संदेश में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश ‘लोकतंत्र पर हमला’ है।
उन्होंने कहा, ‘जब केंद्र सरकार ने हमसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, छोटे परिवार रखने और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को कहा, तो हमने (तमिलनाडु ने) उसका पालन किया। क्या अब अनुशासित तरीके से काम करने की यही सज़ा है?’
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष और बीजेपी के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि वो दक्षिणी राज्यों के साथ मिलकर सीटें बढ़ाने के ‘प्रो-राटा मॉडल’ का विरोध करें।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच प्रस्तावित 850 सीटों के पुनर्गठन का सटीक ढांचा अभी साफ़ नहीं है।
विधेयक में कहा गया है कि इसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला परिसीमन आयोग अंतिम रूप देगा, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे।
गौरतलब है कि विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि भविष्य में किस जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया जाएगा, यह संसद साधारण बहुमत से तय कर सकेगी। फिलहाल इसके लिए संविधान संशोधन की ज़रूरत होती है- यानी संसद में दो-तिहाई बहुमत।
-गीता पांडे
हाल में आई एक वेब सिरीज ने भारत में मैरिटल रेप (पत्नी का बलात्कार) जैसे गंभीर मुद्दे की ओर एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा है।
यह ऐसा मुद्दा है जिसे भारत अब तक अपराध घोषित करने से हिचकता रहा है।
‘चिरैया’, नाम की ये सिरीज हाल ही में जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई है और इसे अब तक लाखों लोग देख चुके हैं। ये हाल के महीनों में इस प्लेटफ़ॉर्म की सबसे लोकप्रिय हिंदी सिरीज़ में शामिल हो गई है।
मीडिया आलोचकों ने इस सिरीज की तारीफ की है क्योंकि यह एक ऐसे विषय को सामने लाती है जिसे आमतौर पर समाज में छिपाकर रखा जाता है। इसने सोशल मीडिया पर सहमति और महिला विरोधी सोच पर बहस छेड़ दी है। हालांकि कुछ लोगों ने इसे ‘पुरुष विरोधी’ और ‘शादी की पवित्रता’ को कमजोर करने की ‘कोशिश’ भी बताया है।
सिरीज़ की स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा बताती हैं कि कहानी दो महिलाओं-कमलेश और पूजा के इर्द-गिर्द घूमती है।
कमलेश का किरदार दिव्या दत्ता ने निभाया है।
कमलेश एक मिडिल क्लास हाउसवाइफ हैं, जो मानती हैं कि महिलाओं को घर और रसोई तक ही सीमित रहना चाहिए।
वहीं पूजा (ये किरदार प्रसन्ना बिष्ट ने निभाया है) पढ़ी-लिखी, जागरूक और बराबरी में विश्वास रखने वाली महिला है।
दोनों की दुनिया तब टकराती है जब पूजा की शादी कमलेश के देवर अरुण से होती है।अरुण को कमलेश ने बेटे की तरह पाला है।
अरुण एक आदर्श पति लगता है, लेकिन शादी की पहली रात ही वह पूजा के साथ बलात्कार करता है, जिससे उसके सपने टूट जाते हैं।
जब पूजा इसका विरोध करती है, तो अरुण कहता है, ‘मैंने वही लिया जो मेरा हक़ है।’
वह यह भी कहता है कि भारत में मैरिटल रेप अपराध नहीं है, इसलिए इसके खिलाफ कोई कानून नहीं है।
सहमति की अहमियत दिखाती है सिरीज
दिव्या दत्ता कहती हैं कि यह सिरीज़ सहमति की अहमियत दिखाती है। खासकर शादी जैसे रिश्ते में, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है।
वह कहती हैं, ‘मैरिटल रेप पर बात करना बहुत मुश्किल है। हर महिला जिसे यह झेलना पड़ता है, सोचती है कि यह सिफऱ् उसकी अपनी कहानी है। उसे डर रहता है कि अगर वह बोलेगी तो बदनामी होगी और घर टूट जाएगा।’
सिरीज़ में जब जख़्मी और परेशान पूजा अपने साथ हो रहे व्यवहार के बारे में बोलती है तो उसे अपने ही परिवार से ‘समझौता करने’ की सलाह मिलती है। उसे कहा जाता है कि सच बोलने से केवल बदनामी होगी।
कमलेश शुरुआत में मानती है कि शादी में सेक्स के लिए सहमति अपने आप मिल जाती है।
लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका नजरिया बदलता है और वह सच का साथ देने का फैसला करती है, भले ही उसे अपने ‘कम्फर्ट जोन’ से बाहर आना पड़े। अंत में वह पूजा का साथ देती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में शादीशुदा महिलाओं में से लगभग 6.1 फीसदी को कभी-ना-कभी यौन हिंसा झेलनी पड़ी है।
लेकिन वर्षों से चल रहे आंदोलनों के बावजूद भारत उन तीन दर्जन देशों में शामिल है, जहां मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता।
पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में भी ये अपराध नहीं माना जाता।
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। लेकिन सरकार, धार्मिक संगठनों और पुरुष अधिकार संगठनों ने कानून में बदलाव का विरोध किया है।
इस मामले में मौजूदा कानून औपनिवेशिक दौर का है। अगर पत्नी नाबालिग नहीं है तो ये पति को पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाने को अपराध नहीं मानता।
पिछले साल एक मामले को लेकर काफ़ी आक्रोश दिखा था। उस मामले में पत्नी के साथ ‘बलात्कार के दोषी’ शख़्स को अदालत ने इस आधार पर बरी कर दिया कि भारत में मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता।
स्क्रिप्ट राइटर दिवी निधि शर्मा कहती हैं, ‘यह अन्याय हमारे घरों और आसपास ही हो रहा है। सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इसके खिलाफ कोई कानूनी या सामाजिक सहारा नहीं है। इसलिए एक लेखक के रूप में मैंने इस पर काम करना जरूरी समझा
- किरण पांडे
सीएसई का विश्लेषण बताता है कि 2026 में 1 मार्च से 7 अप्रैल तक 38 दिनों में 24 राज्यों में 29 दिन बेमौसमी घटनाएं हुईं और 13 राज्यों की 6,27,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसलें प्रभावित हुई
भारतीय खेती-बाड़ी के लिए मॉनसून को लंबे समय से सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला मौसम माना जाता रहा है। जून से सितंबर के बीच होने वाली भारी बारिश और बाढ़ की वजह से देश के बड़े इलाकों में फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लेकिन सीएसई द्वारा 2022 से लेकर अप्रैल 2026 की शुरुआत तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
इस विश्लेषण के अनुसार खेती से जुड़े जोखिमों के समय और उनके पैमाने दोनों में ही अब बदलाव देखा गया है। “भारत के मौसम आपदाओं पर आधारित इंटरैक्टिव एटलस” के अनुसार अब मॉनसून के साथ-साथ मॉनसून से पहले का मौसम भी फसलों के लिए एक नया और अधिक जोखिम वाला समय बनता जा रहा है।
मॉनसून से पहले फसलों को होने वाला नुकसान और बढ़ रहा है। मॉनसून से पहले के समय में होने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि अब फसलों को पहले से कहीं अधिक नुकसान पहुंचा रही है। जबकि एक समय ऐसा भी था जब खेती-बाड़ी के लिहाज से इस समय को काफी सुरक्षित माना जाता था।
पिछले चार सालों में से तीन साल (2022, 2024 और 2025) ऐसे रहे हैं जब मॉनसून से पहले के मौसम में खराब मौसम की घटनाओं, विशेषकर ओलावृष्टि की वजह से देश के एक बड़े इलाकों में फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई थीं।
विश्लेषण कहता है कि 2026 में भी यह सिलसिला जारी है। इस साल मॉनसून से पहले के मौसम के शुरुआती 38 दिनों (1 मार्च से 7 अप्रैल तक) में ही कम से कम 24 राज्यों में 29 दिन हुआ है। कम से कम 13 राज्यों की 6,27,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसलें प्रभावित हुई हैं। इनमें उत्तर प्रदेश (3,47,366.43 हेक्टेयर), महाराष्ट्र (2,04,704 हेक्टेयर) और बिहार (45,000 हेक्टेयर) जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं।
ये आंकड़े वास्तविक नुकसान से कम भी हो सकते हैं क्योंकि 11 अन्य प्रभावित राज्यों (जिनमें पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्य भी शामिल हैं) के आंकड़े अभी इसमें शामिल नहीं किए गए हैं। कुल मिलाकर केवल एक महीने से कुछ अधिक समय में ही 6,20,000 हेक्टेयर से अधिक का इलाका प्रभावित हुआ है। इस हिसाब से 2023 के बाद से मॉनसून से पहले के मौसम में फसलों को होने वाला यह दूसरा सबसे बड़ा नुकसान है।
2023 में पूरे मौसम के दौरान लगभग 6,36,000 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुईं थी। केवल मार्च 2026 में ही कम से कम 1,95,000 हेक्टेयर फसल को नुकसान पहुंचा। यह आंकड़ा पिछले पांच सालों में सबसे अधिक नुकसान को दिखाता है। इसकी तुलना में मार्च 2023 में लगभग 1,20,000 हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ था।
इसी तरह अप्रैल के केवल पहले सप्ताह में ही 7 अप्रैल 2026 तक उपलब्ध अनुमानों के अनुसार 4,26,000 हेक्टेयर से अधिक फसलें प्रभावित हुई हैं। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में अकेले इस नुकसान का 80 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा प्रभावित हुआ है।
कृषि विभाग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार गत 5 अप्रैल को लगभग 30 मिलीमीटर बारिश और ओलावृष्टि से जिले में लगभग 3,43,069 हेक्टेयर में खड़ी गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है। इन घटनाओं का समय बहुत अहम है। मार्च और अप्रैल का महीना गेहूं, सरसों और दालों जैसी रबी की फसलों की कटाई का समय होता है।
अब विश्लेषण में देखा गया है कि मौसम की मार कम समय में ही बार-बार पड़ रही है और विशेषकर ठीक कटाई से पहले आ रही है, जिससे किसानों को नुकसान की भरपाई का बहुत कम मौका मिल पाता है। सीजन की शुरुआत के उलट, इस चरण में खराब हुई फसलों को दोबारा नहीं बोया जा सकता, जिससे किसानों की पूरी आमदनी खत्म हो जाती है।
- तारन प्रकाश सिन्हा
बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा, संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा की नजर से। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि बस्तर का दूसरा चेहरा, जो कहीं अधिक गहरा, पुराना और जीवंत है, लगभग ओझल हो गया। जबकि सच यह है कि बस्तर केवल संघर्ष का भूगोल नहीं है; वह सभ्यता, स्मृति, श्रम, जंगल, जल, कला और समुदाय का प्रदेश है। अब जब हालात पूरी तरह बदल गए है जब भय और असुरक्षा की रात व्यतीत हो गई , नया सबेरा आ गया तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है, अब आगे क्या? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, अब बस्तर का रास्ता कैसा हो?
मेरे विचार से इसका उत्तर सीधा है, बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोकविश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।
उदाहरण के लिए बड़ेडोंगर को देखिए। वहां जब राजा नहीं रहा, तो लोगों ने नींबू को ही “लिमऊ राजा” का प्रतीक मान लिया। एक चट्टान पर बैठकर, धूप-दीप के साथ, लोग सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है। यह कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक बुद्धि का प्रमाण है। यह बताती है कि यहां निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते, बल्कि साथ बैठकर बनाए जाते हैं। यही वह बुनियादी बात है जिसे हमें बस्तर के विकास में भी समझना होगा।
दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हुए हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा है, तो यह केवल भाषिक संयोग नहीं, बल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है। आज जब दुनिया प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और टिकाऊ वस्त्रों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा भर नहीं रह जाता; वह रोजगार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर बन सकता है। यदि इसे सही डिज़ाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए, तो कोसा बस्तर की अर्थव्यवस्था का बड़ा स्तंभ बन सकता है।
बस्तर शब्द की एक और लोक-व्याख्या “बांस तरी” से भी जुड़ती है, अर्थात बाँसों के नीचे या बाँसों के बीच बसा भूभाग। यह व्याख्या भी केवल भाषा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि बस्तर की भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई की ओर संकेत करती है। बस्तर में बाँस हर जगह है, लेकिन बाँस आधारित उद्योग अभी भी अपनी पूरी संभावना तक नहीं पहुंचा। जबकि आज बाँस केवल टोकरी या परंपरागत उपयोग की चीज नहीं रह गया है। उससे फर्नीचर, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी उत्पाद, अगरबत्ती स्टिक, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और कई प्रकार के सूक्ष्म उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। बस्तर में बाँस केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि एक बड़ी हरित अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन सकता है।
दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में पूरी तरह से डिजिटल जनगणना शुरू हो गई है। लाखों कर्मचारी घर-घर जाकर डेटा जुटा रहे हैं। यह पहली बार है जब लोगों को खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने की सुविधा भी दी गई है।
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन का लिखा –
भारत में 1 अप्रैल से पूरी तरह से डिजिटल जनगणना का काम शुरू हो गया है। इसके लिए, 30 लाख से भी ज्यादा कर्मचारियों को काम पर लगाया गया है। साथ ही, सरकार ने लोगों को यह सुविधा भी दी है कि वे खुद एक ऑनलाइन पोर्टल (सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल) पर जाकर अपनी जानकारी भर सकें।
पहले चरण में, अधिकारी घरों की सूची बनाने और घरों की स्थिति पर ध्यान देंगे। इस दौरान 33 पैमानों पर डेटा इक_ा किया जाएगा। इसमें घर बनाने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री, बिजली और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच, और स्मार्टफोन और गाडिय़ों जैसी चीजों का मालिकाना हक शामिल है।
इस बार जनगणना में हर इमारत की जियो-टैगिंग भी की जाएगी। इसका मतलब है कि हर घर और बिल्डिंग की सही भौगोलिक स्थिति रिकॉर्ड की जाएगी। इससे यह पक्का हो सकेगा कि देश का कोई भी इलाका या मकान गिनती से छूट न जाए और हमें देश के बुनियादी ढांचे की एकदम सही जानकारी मिल सके।
अगले साल की शुरुआत में होने वाला दूसरा चरण पूरी तरह से आबादी पर केंद्रित होगा। इसमें विस्तृत जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक डेटा इक_ा किया जाएगा। जैसे, हर व्यक्ति की उम्र, पढ़ाई और वह क्या काम करता है, इसकी पूरी जानकारी ली जाएगी। डिजिटल तकनीक की मदद से सरकार यह समझने की कोशिश करेगी कि लोग एक शहर से दूसरे शहर क्यों जा रहे हैं और बच्चों के जन्म की दर क्या है। अधिकारियों का मानना है कि इस डेटा से भारत की बदलती आबादी की विस्तृत प्रोफाइल तैयार करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, सबसे खास बात यह है कि इस जनगणना में सभी समुदायों की जातियों की विस्तृत गिनती भी शामिल होगी। 1931 के बाद पहली बार ऐसा किया जा रहा है।
भारत की जनगणना के पीछे छिपे एजेंडों का डर
1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच, भारतीय नागरिकों के पास अपना सारा जरूरी डेटा खुद बताने का विकल्प है। सरकार की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, ‘खुद जानकारी देने की यह प्रक्रिया सुरक्षित और वेब-आधारित सुविधा है, जो 16 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। पहली बार, लोग जनगणना कर्मचारियों के आने से पहले, अपनी सुविधा के अनुसार अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं।’
इसमें आगे कहा गया है, ‘जनगणना शासन चलाने का एक बहुत जरूरी जरिया है। इसी आधार पर अगले दस सालों के लिए भारत के विकास की योजनाएं तैयार की जाएंगी।’
हालांकि, जिन लोगों को तकनीक से जुड़ी ज्यादा जानकारी नहीं है, उनके लिए ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल करना मुश्किल होगा। खासकर ऐसे लोग जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। ऐसे में उनका डेटा इक_ा करने के लिए जनगणना कर्मचारियों को ही उनके घर जाना होगा। लेकिन इस पुराने तरीके की भी अपनी अलग चुनौतियां हैं, जैसे डेटा दर्ज करने में होने वाली देरी या गलतियां।
जनगणना शुरू होने से पहले ही आलोचकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या लाखों कर्मचारियों को इतने कम समय में इतनी बड़ी आबादी का डेटा संभालने की सही ट्रेनिंग मिल पाएगी? क्या वे इतनी बड़ी संख्या में मौजूद घरों की सही से गिनती कर पाएंगे? कुछ लोगों को यह भी डर है कि घर के मालिकों को बिना किसी उचित मदद के खुद ही अपनी गिनती करने के लिए या फिर किसी अनौपचारिक बिचौलिए के जरिए अपना डेटा भेजने के लिए बढ़ावा दिया जा सकता है।
सबसे अहम बात यह है कि आलोचकों को इस बात की चिंता है कि राजनीतिक फायदे के लिए डेटा में हेर-फेर किया जा सकता है। इस जनगणना का डेटा 2027 में जारी होने की संभावना है। यह डेटा, भारत के सामने आने वाले राजनीतिक रूप से कुछ सबसे ज्यादा संवेदनशील फैसलों में अहम भूमिका निभाएगा। जैसे, जाति जनगणना से लेकर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करने तक।
भरोसे का सवाल
पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। पुराने तरीके से डेटा इक_ा करने का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि उस वक्त भी फर्जी कर्मचारियों या स्थानीय स्तर पर आंकड़ों में हेराफेरी का डर रहता था, लेकिन तब कम नुकसान की आशंका होती थी। इसकी वजह यह थी कि सारा डेटा कागजों पर दर्ज किया जाता था और उसे प्रोसेस करने में काफी समय लगता था।
आज जब भारत कागज से डिजिटल की ओर बढ़ रहा है, तो सारा डेटा लगभग तुरंत ही सेंट्रल सिस्टम में पहुंच जाएगा। इस बार की जनगणना में जाति, धर्म, कमाई और पलायन जैसी बहुत ही निजी और संवेदनशील जानकारी भी ली जा रही है। इससे जोखिम और बढ़ जाता है। खासकर तब, जब इस डेटा को दूसरे सरकारी डेटाबेस (जैसे आधार या वोटर आईडी) के साथ जोडक़र देखा जाए।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस। वाई। कुरैशी ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘ये नए जोखिम नहीं हैं, लेकिन डिजिटलीकरण से इनका दायरा बढ़ जाता है। जो चीज पहले स्थानीय और सीमित स्तर पर थी, वह अब पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर सुरक्षा के उपाय नाकाम हो जाएं।’
कुरैशी ने आगे कहा, ‘डिजिटल की ओर यह बदलाव मायने रखता है, लेकिन असली मुद्दा भरोसे का है, न कि तकनीक का।’ उन्होंने ‘उच्च राजनीतिक दांव' की ओर इशारा किया, जैसे परिसीमन— यानी किसी राज्य या निर्वाचन क्षेत्र के लिए प्रतिनिधियों की संख्या तय करने की प्रक्रिया और लैंगिक कोटा।
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि जनगणना की सफलता ‘ऐप्लिकेशन पर कम, बल्कि पारदर्शिता, ऑडिट और इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि इसे कितना निष्पक्ष और समावेशी माना जाता है।’
कुरैशी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जाति-आधारित जनगणना से आरक्षण के कोटे का स्वरूप बदल सकता है और तनाव पैदा हो सकता है। वहीं, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से देश में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई ज्यादा बढऩे का खतरा है।
वह बताते हैं, ‘इसमें निजता से जुड़ी चिंताओं और डेटा के दुरुपयोग के डर को भी जोड़ दें, तो असली चुनौती केवल जनगणना को पूरा करना नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा, संघीय संतुलन और राजनीतिक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना है।’
वे छोड़ गए थे दर्द..
वे छोड़ गए थे अनाथ बच्चे..
और सिसकती हुईं विधवाएं!
उन्हीं में दो महिलाएं थीं,अत्तर कौर और रत्तन देवी, जिनकी हिम्मत इतिहास में दर्ज है ।
अत्तर कौर उस वक्त गर्भवती थीं, जब उनके पति भगमल भाटिया को गोली मार दी गई। उस रात, खून और मौत के बीच, वो अपने पति की लाश के पास बैठी रहीं।
मरते हुए अजनबियों को पानी पिलाया, उनके दर्द में साथ बैठीं, जबकि उनका खुद का दिल टूट चुका था।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹50,000 लेकर आए, उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम। उन्हें लगा, शायद इससे अत्तर कौर 'आगे बढ़ पाएंगी'। लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। दो बार!
मना इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी, वो अकेली थीं, अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।
बल्कि इसलिए किया क्योंकि उनके शब्दों में, "इस पैसे को लेने का मतलब, मेरे पति की शहादत को बेच देना होगा।"
रत्तन देवी को जब गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, तो वो भागकर बाग़ पहुंचीं, और वहां अपने पति की लाश देखी।
कर्फ्यू था, कोई मदद नहीं कर सकता था।
.तो वो पूरी रात वहीं रुकीं, अपने पति की लाश की अकेले रखवाली की।
अगली सुबह, उसे चारपाई पर उठाकर घर ले आईं।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹25,000 लेकर आए।
रत्तन देवी का जवाब था, "मैं अपने पति के हत्यारों से पैसे नहीं लूंगी।"
इन दो महिलाओं ने न हथियार उठाए, न नारे लगाए।
लेकिन अपने दर्द, अपने इनकार और अपनी ख़ामोशी से, उन्होंने विरोध किया।
और ये विरोध, हमेशा याद रखा जाना चाहिए!
(द बेटर इंडिया)
"यह हमारा अंतिम और बेस्ट ऑफ़र है, अब देखना यह है कि क्या ईरानी इसे क़बूल करते हैं. शुक्रिया." इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने सामने रखी मेज़ को दो बार थपथपाया और प्रेस कॉन्फ़्रेस ख़त्म कर दी.
पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई.
इस बात की जानकारी अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने दी, जो बातचीत के लिए पाकिस्तान आए थे. रविवार सुबह 6 बजे के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में जेडी वेंस ने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच फ़ासला कम करने और समझौता कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन "बुरी ख़बर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच सके."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह ख़बर अमेरिका के लिए उतनी बुरी नहीं है जितनी ईरान के लिए है, "कोई समझौता नहीं हुआ है और हम अमेरिका वापस लौट रहे हैं."
पाकिस्तान के कहने पर अमेरिका और ईरान दो हफ़्ते के संघर्ष विराम पर राज़ी हुए थे और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए इस्लामाबाद आए थे. दोनों पक्षों के बीच बातचीत इस्लामाबाद के सेरेना होटल में हुई.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि बातचीत बेनतीजा रही, लेकिन उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि समझौता न होने का दो हफ़्ते के अस्थायी संघर्ष विराम पर क्या असर पड़ेगा.
प्रेस कॉन्फ़्रेस के क़रीब दो घंटे बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेस की और कहा कि पाकिस्तान अमेरिका-ईरान बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहेगा, "यह ज़रूरी है कि दोनों पक्ष संघर्ष विराम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखें."
बातचीत क्यों टूटी?
अमेरिका और ईरान शांति वार्ता की नाकामी के लिए अलग-अलग वजहें बता रहे हैं.
बातचीत के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हमने बहुत साफ़ कर दिया था कि हमारी 'रेड लाइन्स' क्या हैं, हम किन बातों पर समझौता कर सकते हैं और किन पर नहीं."
जेडी वेंस के मुताबिक़, "और उन्होंने (ईरान) तय किया है कि वे हमारी शर्तें क़बूल नहीं करेंगे."
इस मौके पर पत्रकारों ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति से पूछा, "कृपया साफ़-साफ़ बताइए कि किन शर्तों को ख़ारिज किया गया?"
जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि वह बंद कमरे में 21 घंटे चली बातचीत की पूरी जानकारी नहीं देंगे, लेकिन "सीधी बात यह है कि हम उनसे (ईरान से) यह भरोसा चाहते हैं कि वे परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे और ऐसी क्षमता हासिल करने के लिए ज़रूरी उपकरण भी नहीं जुटाएंगे."
"यह अमेरिकी राष्ट्रपति का मुख्य लक्ष्य है और हमने बातचीत के ज़रिए इसे हासिल करने की कोशिश की."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि ईरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता पहले ही नष्ट की जा चुकी है, "लेकिन क्या हमें ईरान में यह इच्छा दिख रही है कि वे कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे? अभी तक हमें ऐसी इच्छा नहीं दिखी है."
एक सवाल के जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत के दौरान ईरान की फ़्रीज़ संपत्तियों पर भी चर्चा हुई, लेकिन हम उस मुकाम तक नहीं पहुंच सके जहां ईरान हमारी शर्तें मान लेता.
"मुझे लगता है कि हमने काफ़ी लचीलापन दिखाया. राष्ट्रपति ने हमें कहा था कि आपको अच्छी नीयत से बातचीत में जाना है और समझौते तक पहुंचने की पूरी कोशिश करनी है. हमने वही किया, लेकिन अफ़सोस कि कोई प्रगति नहीं हुई."
जेडी वेंस से पूछा गया कि बातचीत के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से कितनी बार संपर्क किया और उन्होंने क्या कहा.
इस पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने जवाब दिया, "हम राष्ट्रपति के साथ लगातार संपर्क में थे, पिछले 21 घंटों में हमने कितनी बार बात की, मुझे नहीं पता... शायद दर्जन भर बार."
"हम एडमिरल कूपर (सेंटकॉम कमांडर), मार्को रुबियो (विदेश मंत्री), पीट हेगसेथ (रक्षा मंत्री) और पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के संपर्क में थे. हम लगातार संपर्क में थे क्योंकि हम अच्छी नीयत से बातचीत कर रहे थे."
प्रेस कॉन्फ़्रेंस को ख़त्म करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हम समझ बनाने के एक आसान सा प्रस्ताव दिया है. यह हमारी अंतिम और सबसे बेहतर पेशकश है, अब देखना यह है कि ईरानी इसे क़बूल करते हैं या नहीं."
इस संक्षिप्त प्रेस कॉन्फ़्रेस के बाद जेडी वेंस रावलपिंडी के नूर ख़ान एयर बेस गए और वहां से अमेरिका के लिए रवाना हो गए. उन्हें पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इसहाक़ डार और गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने विदा किया.
ईरानी मीडिया- अमेरिका ने लचीलापन नहीं दिखाया
ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक़, अमेरिका की "ग़ैर-वाजिब मांगों" ने युद्ध ख़त्म करने की बातचीत को बाधित किया.
ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने टेलीग्राम पर पोस्ट में कहा, "ईरानी प्रतिनिधिमंडल की तरफ़ से कई कोशिशों के बावजूद, अमेरिकी पक्ष की ग़ैर-वाजिब मांगों ने बातचीत की प्रगति को रोक दिया. इस तरह बातचीत ख़त्म हो गई."
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात इस्लामाबाद पहुंचा, जबकि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ़, जेरेड कुशनर और अन्य अमेरिकी अधिकारी शनिवार सुबह पाकिस्तानी राजधानी पहुंचे.
दोनों प्रतिनिधिमंडलों ने अलग-अलग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, विदेश मंत्री इशाक़ डार और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत अन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की.
इन बैठकों के बाद पाकिस्तानी सरकार के बयानों में कहा गया कि पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका जारी रखेगा और उम्मीद जताई गई कि शनिवार को होने वाली बातचीत विवाद के हल की दिशा में एक क़दम होगी.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने बीबीसी उर्दू को बताया कि पहले ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच पाकिस्तान के ज़रिए संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, जिसके बाद दोनों पक्षों ने पाकिस्तानी अधिकारियों की मौजूदगी में ढाई घंटे तक बातचीत की.
इसके बाद एक घंटे का विराम लिया गया और पेश की गई मांगों के तकनीकी पहलुओं पर ईरानी और अमेरिकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा हुई.
पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़, तकनीकी मुद्दों पर संदेशों का आदान-प्रदान देर रात तक जारी रहा.
ईरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने दावा किया है कि बातचीत बेनतीजा रहने की वजह अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होना था.
तस्नीम के मुताबिक़, ईरानी संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में आए प्रतिनिधिमंडल ने सेना प्रमुख से कम से कम दो बार और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से एक बार मुलाक़ात की, "ताकि ज़रूरी इंतज़ाम किए जा सकें और बातचीत की शुरुआत में ही अमेरिका के वादाख़िलाफ़ी के ख़िलाफ़ औपचारिक विरोध दर्ज कराया जा सके."
ईरानी न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत 21 घंटे से ज़्यादा चली. इस दौरान ईरान ने बार-बार अपने प्रस्ताव पेश किए और "अमेरिकी पक्ष को हक़ीक़त की तरफ़ लाने की कोशिश की."
तस्नीम न्यूज़ एजेंसी का दावा है कि "हर चरण पर अमेरिका की ज़्यादा मांगों ने साझा ढांचा बनने में रुकावट डाली. अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होने की वजह से बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई."
ख़बर में आगे कहा गया कि अगली बातचीत के दौर के समय, जगह और प्रक्रिया को लेकर अभी तक कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है.
सेरेना होटल से एक किलोमीटर दूर शनिवार को माहौल?
बिरयानी, फ़्राइड राइस, चिकन, कबाब और मिठाइयां भी... ये मेन्यू इस्लामाबाद के सेरेना होटल का नहीं था, जहां शनिवार को ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच सीधी बातचीत हुई.
बल्कि यह नज़ारा एक किलोमीटर दूर जिन्ना कन्वेंशन सेंटर का था, जहां दुनिया भर से आए पत्रकारों के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे.
अगर कोई और मौक़ा होता तो पाकिस्तानी सरकार की इन तैयारियों की तारीफ़ होती, लेकिन वहां असल में देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे, जो 'एक्सक्लूसिव' ख़बर की तलाश में आए थे और पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही अमेरिका-ईरान बातचीत को कवर कर रहे थे.
होटल के बाहर सड़क पर बसें खड़ी थीं, जो पत्रकारों को जिन्ना कन्वेंशन सेंटर ले जा रही थीं, जहां सुरक्षा कारणों से गाड़ियों और ग़ैर-अधिकृत लोगों के आने पर रोक थी.
बस में विदेशी पत्रकारों का उत्साह साफ़ दिख रहा था.
मैंने एक विदेशी मीडिया संस्थान से जुड़ी महिला पत्रकार को फ़ोन पर यह कहते हुए भी सुना कि "सारी निगाहें पाकिस्तान पर हैं."
जानकारी की कमी लेकिन खाने की भरपूर व्यवस्था
कुछ देर बाद हम जिन्ना कन्वेंशन सेंटर पहुंचे, जहां दर्जनों देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे. यह एक मेला था जहां हर तरह की भाषाएं सुनाई दे रही थीं. कोई अंग्रेज़ी में, कोई उर्दू में, कोई पश्तो में और कोई दूसरी यूरोपीय भाषाओं में कैमरे और फ़ोन पर रिपोर्टिंग कर रहा था.
मैं सोच रहा था कि यहां काम कैसे चलेगा. मैंने एक विदेशी महिला पत्रकार से पूछा, "क्या आपको पता है कि यहां से एक किलोमीटर दूर सेरेना होटल में ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच बैठकों में क्या हो रहा है?" उसने जवाब दिया, "शायद कन्वेंशन सेंटर के बाहर कुछ पत्रकारों को जानकारी हो, लेकिन यहां किसी को कुछ नहीं पता."
मैंने यही बात अलग-अलग शब्दों में दूसरे पत्रकारों से भी सुनी. पूरा दिन यहां बिताने के बावजूद मैंने कोई ऐसा सरकारी अधिकारी नहीं देखा जो पत्रकारों को बता सके कि अंदर क्या चल रहा है.
स्थानीय और विदेशी पत्रकार एक-दूसरे से बार-बार यही सवाल पूछते रहे कि क्या किसी को बातचीत के बारे में कुछ पता है? जानकारी की कमी और धीमे इंटरनेट ने पूरे दिन पत्रकारों को परेशान किया.
इस बीच सेरेना होटल में पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत जारी थी. उनसे जुड़ी ख़बरें लेते समय मेरा संपर्क भी धीमे इंटरनेट की वजह से कई बार टूट गया.
दुनिया भर से इस्लामाबाद आए पत्रकार यह दुआ करते दिखे कि उन्हें खाली हाथ वापस न लौटना पड़े. यह एक बड़ी ख़बर थी और संघर्ष का ख़त्म होना, इससे बड़ी ख़बर नहीं हो सकती.
इसके लिए कन्वेंशन सेंटर में बैठे पत्रकार बातचीत के स्थल सेरेना होटल पर नज़र बनाए हुए थे.
जिस ख़बर का पत्रकार इंतज़ार कर रहे थे, वह रविवार सुबह 6 बजे के बाद आई, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एलान किया कि बातचीत बेनतीजा रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-उमर नांगियाना और सारा हसन
पाकिस्तान फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ़्ते के सीजफायर पर बनी सहमति में मदद करने की अपनी सफलता का जश्न मना रहा है।
साथ ही पाकिस्तान के नेता शांतिवार्ता की मेज़बानी की तैयारी कर रहे हैं।
शनिवार से शुरू होने वाली इस बातचीत से पहले, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दो दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई है।
यह बातचीत असल में होगी या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन शहर ने फिर भी खुद को पूरी तरह इसके लिए तैयार कर लिया है। सडक़ों पर सन्नाटा है, क्योंकि करीब 10 हजार पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। लेकिन दुनिया के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।
दुनिया भर के देश लड़ाई खत्म होते ही होर्मुज़ स्ट्रेट के फिर से खुलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। युद्ध से पहले इस रास्ते से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल की सप्लाई होती थी। पाकिस्तान का भी काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है।
सोशल मीडिया में गर्व और उत्साह
अगर बातचीत सफल नहीं होती है और पाकिस्तान को पड़ोसी देश ईरान के साथ जंग में घसीटा जाता है तो फिर उसे ‘बुरे सपने जैसे हालात’ का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले साल सऊदी अरब के साथ एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया था।
सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल बासित कहते हैं कि पाकिस्तान ने ‘यह साफ कर दिया है कि वह सऊदी अरब को दिए गए अपने वादे को निभाएगा।’
बासित बताते हैं कि इसका नतीजा यह हो सकता है, ‘पाकिस्तान की तीन सीमाओं पर माहौल गरमा जाए।’
वह यहां पाकिस्तान के अपने दूसरे पड़ोसियों अफग़़ानिस्तान और भारत के साथ चल रहे तनाव का जि़क्र कर रहे हैं। वह कहते हैं, ‘पाकिस्तान अपने चार में से दो प्रांतों में चल रहे विद्रोहों से लड़ रहा है। पाकिस्तान यह सब झेल नहीं सकता।’
बावजूद इसके पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर गर्व और उत्साह छाया हुआ है। अलग-अलग तरह के मीम्स वायरल हो रहे हैं।
बासित कहते हैं, ‘यह इस मायने में एक जीत है कि दुनिया का कोई भी दूसरा देश युद्धविराम करवाने में कामयाब नहीं हो पाया। और हम एक संभावित बड़ी तबाही के कगार पर खड़े थे। पाकिस्तान ने उस तबाही को टाल दिया।’
यह सफलता उस देश के लिए बेहद ज़रूरी थी, जिसने सालों तक राजनीतिक उथल-पुथल, महज़ दो साल पहले कर्ज चुकाने में नाकाम होने की कगार पर खड़ी कमजोर अर्थव्यवस्था, और भारत के साथ जबरदस्त दुश्मनी का सामना किया है। तो आखिर पाकिस्तान ने यह कमाल कैसे कर दिखाया?
ट्रंप के पसंदीदा
पाकिस्तान बेहतर स्थिति में है, क्योंकि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देश उस पर भरोसा करते हैं।
सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद मुशाहिद हुसैन सैयद के मुताबिक, ‘सुलह की इस प्रक्रिया की अगुवाई पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर कर रहे हैं।’
आसिम मुनीर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहते हैं।
मुनीर को शायद पाकिस्तान का सबसे ताकतवर इंसान माना जा सकता है। क्योंकि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां सेना ने लंबे समय से राजनीति में अहम भूमिका निभाई है।
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी बताती हैं, ‘ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के तुरंत बाद, मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया था और उन्हें ‘दो शुरुआती जीत’ दिलाई थीं।’
सीआईए की खुफिया जानकारी पर काम करते हुए, फील्ड मार्शल ने 2021 के काबुल हवाई अड्डे पर हुए बम धमाके के कथित मास्टरमाइंड को तब अमेरिकियों के हवाले कर दिया, जब वे अफग़़निस्तान से निकल रहे थे।
इस आत्मघाती हमले में कम से कम 170 अफग़़ान और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।
लोधी कहती हैं, ‘ट्रंप इतने शुक्रगुजार थे कि उन्होंने कांग्रेस में अपने पहले भाषण में इसका जिक्र किया।’
लोधी कहती हैं कि दूसरी जीत यह थी, ‘जिस तरह पाकिस्तान ने उन्हें यह बताया कि भारत के साथ एक बड़े युद्ध को रोकने में उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप) अहम भूमिका निभाई थी।’
पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में से एक है, जिन्होंने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया है। इसकी डोनाल्ड ट्रंप को लंबे समय से चाहत थी।
वह कहती हैं, ‘याद रखिए कि ट्रंप को उस टैरिफ युद्ध से असल में कोई खास खुशी नहीं मिल रही थी, जिसे वे दुनिया के लगभग हर देश पर थोप रहे थे। इसलिए उन्हें सचमुच उस चीज़ की जरूरत थी, जो उन्हें पाकिस्तान से मिली।’
पाकिस्तान ने अपने अहम खनिजों तक अमेरिका को पहुंच देने का भी वादा किया है। इसे अमेरिका अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हित के तौर पर देखता है।
पाकिस्तान के फ्रंटियर वक्स ऑर्गनाइज़ेशन देश में अहम खनिजों का खनन करने वाली मुख्य संस्था है और सेना के अधीन काम करती है।
सितंबर 2025 में इसने एक अमेरिकी कंपनी के साथ पांच सौ मिलियन डॉलर के निवेश का समझौता किया। ये प्रधानमंत्री आवास पर हुआ, जिसमें मुनीर भी मौजूद थे।
इसके बाद जनवरी में, पाकिस्तान ने वर्ल्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स की एक सहयोगी कंपनी के साथ एक समझौता किया।
वल्र्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स एक क्रिप्टोकरेंसी वेंचर है जिसकी सह-स्थापना ट्रंप और उनके परिवार ने की थी। इस समझौते के तहत, कंपनी अपने स्टेबलकॉइन को देश के डिजिटल-पेमेंट सिस्टम में शामिल कर सकती है। इससे ट्रंप के करीबी लोगों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी मज़बूत हुए हैं।
-दयानिधि
आजकल बच्चों के लिए चमकीले और रंग-बिरंगे कपड़े बहुत लोकप्रिय हैं। फैशन की दुनिया इतनी तेज हो गई है कि बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं और नए कपड़े चाहिए होते हैं। लेकिन हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि ये चमकीले कपड़े बच्चों के लिए खतरा भी बन सकते हैं। मरीअन यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में हुई जांच में यह पाया गया कि बाजार में बिक रहे बच्चों के कई कपड़े सीसे (लेड) से अधिक मात्रा में प्रभावित हैं।
जांच की शुरुआत
इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाली शोधकर्ता के द्वारा अपनी बेटी में उच्च स्तर का सीसा पाया गया था, जो खिलौनों की सतह से आया था। उस समय अमेरिका में सीसे की कड़ी सीमाएं नहीं थीं। आज, यूएस कंज़्यूमर प्रोडक्ट सेफ्टी कमिशन बच्चों के उत्पादों जैसे कपड़ों और खिलौनों में सीसा की अधिकतम सीमा 100 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) निर्धारित करता है।
शोधकर्ता ने देखा कि बहुत से माता-पिता इस समस्या से अनजान हैं। इसीलिए उन्होंने अपने अंडरग्रेजुएट छात्रों के साथ मिलकर बच्चों के रोजमर्रा के सामान में भारी धातु के खतरों का अध्ययन करना शुरू किया।
कपड़ों में सीसा कैसे आता है
अध्ययन से पता चला है कि बच्चों के कपड़ों में सीसा केवल जिपर, बटन या स्नैप्स में ही नहीं होता, बल्कि सीधे कपड़े की फैब्रिक में भी पाया जा सकता है। कुछ निर्माता लीड (द्वितीय) एसीटेट का इस्तेमाल करते हैं ताकि कपड़े में रंग लंबे समय तक चमकदार और टिकाऊ बने रहें। यह तरीका सस्ता होता है और चमकीले रंग बनाने में मदद करता है।
बच्चों के लिए खतरे
सीसा किसी भी उम्र के लिए हानिकारक है, लेकिन छोटे बच्चे सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। यह उनके मस्तिष्क, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और व्यवहार पर गंभीर असर डाल सकता है। बच्चे अक्सर अपने कपड़े मुंह में डालते या चबाते हैं, जिससे शरीर में सीसा आसानी से प्रवेश कर सकता है। अध्ययन में पाया गया कि अगर बच्चे कपड़े चबाएं, तो उनका शरीर सुरक्षित सीमा से अधिक सीसा ग्रहण कर सकता है।
जांच के परिणाम
शोधकर्ताओं ने 11 रंगीन शर्टों का अध्ययन किया। ये शर्ट चार अलग-अलग रिटेलर्स से खरीदी गई थीं, जिनमें फास्ट फैशन और डिस्काउंट ब्रांड शामिल थे। उन्होंने पाया कि सभी कपड़े 100 पीपीएम के सरकारी सुरक्षा मानक से अधिक थे। सबसे अधिक सीसा लाल और पीले रंग की शर्टों में पाया गया। यह संकेत देता है कि चमकीले रंग वाले कपड़े बच्चों के लिए ज्यादा जोखिमपूर्ण हो सकते हैं।
मुंह में डालने से सीसा का असर
दूसरे चरण में शोधकर्ताओं ने यह देखा कि अगर बच्चे कपड़े मुंह में डालते या चबाते हैं तो कितना सीसा शरीर में प्रवेश कर सकता है। उन्होंने पेट की स्थितियों को नकली तौर पर बनाया और गणना की। उनके निष्कर्ष से पता चला कि यह व्यवहार एफडीए की रोजमर्रा की सुरक्षित सीमा से अधिक सीसा ग्रहण करवा सकता है।
गुजरात का पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्म स्थान है. इस शहर में पहली बार एक शराब की दुकान खुल रही है, जहां सरकारी परमिटधारक शराब ख़रीद सकेंगे.
पोरबंदर के लॉर्ड्स होटल की शराब की बिक्री से जुड़ी दो साल पुरानी अर्ज़ी को गुजरात के गृह विभाग ने मंज़ूरी दे दी है.
इस मंज़ूरी के बाद पोरबंदर ज़िले में रहने वाले और शराब का परमिट रखने वाले लोग वहाँ से शराब ख़रीद सकेंगे. गुजरात में पर्यटक, स्वास्थ्य कारणों से शराब का सेवन करने वाले लोगों और कॉरपोरेट इवेंट में हिस्सा लेने वालों को राज्य में शराब पीने के लिए ख़ास तरह के परमिट जारी होते हैं.
पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्मस्थान है. महात्मा गांधी शराबबंदी के पक्ष में थे और उनके विचारों की वजह से ही गुजरात में शराबबंदी का क़ानून लागू किया गया था.
कुछ लोग इसे 'रूटीन प्रक्रिया' बता रहे हैं तो कई लोग इससे नाराज़ भी हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने कई लोगों से बात करके यह जानने की कोशिश की कि पोरबंदर में शराब बेचने को मंज़ूरी पर उनकी क्या राय है.
गौर करने वाली बात यह भी है कि गुजरात के अलग अलग इलाक़ों में शराब पकड़े जाने की ख़बरें लगातार मीडिया में आती रहती हैं.
गुजरात विधानसभा में भी राज्य सरकार ज़िलेवार शराब से जुड़े आंकड़े पेश करती है. हाल ही में राज्य सरकार ने सदन में बताया था कि पिछले दो साल में पुलिस ने पूरे राज्य से अवैध ढंग से बेची जा रही कुल 42 करोड़ रुपये की शराब ज़ब्त की है.
गुजरात में शराब को लेकर क़ानून क्या कहता है?
गुजरात में शराबबंदी का क़ानून मुख्य रूप से गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 के तहत लागू है.
इस क़ानून के मुताबिक राज्य में शराब का उत्पादन, बिक्री, ख़रीद, भंडारण, परिवहन और सेवन आम तौर पर प्रतिबंधित है. राज्य में शराब की बिक्री और सेवन के लिए सरकार लाइसेंस, परमिट या कोई विशेष अनुमति जारी करती है.
इसी एक्ट की धारा 11 और 12 के अनुसार शराब की बिक्री या सेवन केवल क़ानूनी अनुमति के आधार पर ही की जा सकती है.
यानी गुजरात में शराब की पूरी तरह खुले तौर पर बिक्री की इजाज़त नहीं है, लेकिन कुछ ख़ास वर्ग के लोगों के लिए नियंत्रित परमिट की व्यवस्था की गई है.
गुजरात में शराब की परमिट शॉप एक क़ानूनी दुकान होती है, जो आमतौर पर किसी होटल में होती है, जहां सिर्फ़ वैध परमिट रखने वाले लोगों को ही शराब बेची जा सकती है.
ये परमिट पर्यटकों, विदेशी नागरिकों, दूसरे राज्यों के निवासियों, हेल्थ परमिट रखने वाले लोगों या ख़ास मौकों के लिए अनुमति पाने वालों को दिए जाते हैं.
क़ानून के मुताबिक ऐसे परमिटधारक तय मात्रा में ही शराब ख़रीद सकते हैं और उसका सेवन कर सकते हैं.
परमिट शॉप के लिए राज्य के गृह या एक्साइज़ विभाग से मंज़ूरी लेना ज़रूरी होता है. यह कोई आम खुली शराब की दुकान नहीं होती, बल्कि एक नियंत्रित बिक्री केंद्र के रूप में काम करती है.
पोरबंदर के परमिट शॉप के मालिक क्या कहते हैं?
इस बारे में जब बीबीसी गुजराती ने शराब परमिट शॉप के मालिक विक्रमभाई ओडेदरा से बात की.
उन्होंने बताया, "हमारी जानकारी के मुताबिक पूरे ज़िले में करीब 1500 परमिटधारक हैं. ये सभी लोग अब तक जूनागढ़, जामनगर और मोरबी जैसे शहरों में जाते थे. अब उन्हें अपने परमिट के आधार पर क़ानूनी शराब लेने के लिए इतनी दूर नहीं जाना पड़ेगा, उन्हें यहीं उपलब्ध हो जाएगी."
ओडेदरा ने इस परमिट शॉप के लिए क़रीब दो साल पहले आवेदन किया था.
वह कहते हैं, "क़रीब दो साल पहले से हमने यह मंज़ूरी लेने की प्रक्रिया शुरू की थी. सबसे पहले ज़िला स्तर पर आवेदन किया था. वहां से मंज़ूरी मिलने के बाद हमने राज्य स्तर की कमिटी के सामने अपनी बात रखी. इसके बाद पूरा शुल्क भरने पर हमें यह परमिट मिला है."
ओडेदरा ने इसके लिए क़रीब 9 लाख रुपये ख़र्च किए हैं. आगे भी ओडेदरा हर तीन महीने में सरकार को 6 लाख रुपये का भुगतान करेंगे.
पोरबंदर के लोगों ने शराबबंदी को लेकर क्या कहा?
आबकारी विभाग के मुताबिक, इस समय पोरबंदर में क़रीब 1400 से 1500 परमिटधारक हैं, जिनमें विदेशी पासपोर्ट रखने वाले लोग और हेल्थ परमिटधारक भी शामिल हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर एक्साइज़ विभाग के अधिकारी बालुभाई कमरटा से बातचीत की.
वह कहते हैं, "हमारे पास सिर्फ़ दो ही अर्ज़ियां आई हैं, जिनमें से एक को मंज़ूरी मिल चुकी है और दूसरी अभी कलेक्टर कार्यालय में विचाराधीन है. कोई भी आवेदन आने पर उसकी ठीक से जांच की जाती है, उसके बाद आगे की कार्रवाई होती है."
बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर के रहने वाले लोगों से भी बात की.
निजी कंपनी में काम करने वाले विनोदभाई आहीर कहते हैं, "महात्मा गांधी की धरती पर शराब को क़ानूनी तौर पर उपलब्ध कराना एक बड़ी ग़लती है. जिस चीज़ का वह जीवन भर विरोध करते रहे, उसे उनकी जन्मभूमि पर क़ानूनी रूप से दुकानों में बेचने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए."
हालांकि दूसरी तरफ़, पोरबंदर में एक एनजीओ चलाने वाले वीनेशभाई गोस्वामी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "महात्मा गांधी पूरे देश के राष्ट्रपिता हैं, उन्हें सिर्फ़ पोरबंदर से जोड़कर देखना सही नहीं है. वह पोरबंदर से ज़्यादा अहमदाबाद और दिल्ली में रहे. अगर उनके सम्मान में शराबबंदी लागू करनी है, तो वह हर जगह होनी चाहिए, सिर्फ़ उनके जन्मस्थान पर ही नहीं."
वह आगे कहते हैं, "पोरबंदर में इतने लोगों को परमिट को क्यों परमिट दिया गया? और अगर उन्हें परमिट दिया गया है, तो उन्हें परमिट शॉप भी मिलनी ही चाहिए."
पोरबंदर के वरिष्ठ पत्रकार परेश पारेख का मानना है, "कई लोग चाहते हैं कि शराबबंदी हटा दी जाए. ख़ास तौर पर युवा पीढ़ी यह मानती है कि शराब आसानी से मिलनी चाहिए. हालांकि दूसरी तरफ़ ऐसे भी कई लोग हैं, जो मानते हैं कि पोरबंदर महात्मा गांधी की धरती है, इसलिए यहां परमिट शॉप नहीं होनी चाहिए."
हालांकि उनका यह भी दावा है कि पोरबंदर में शराब का ग़ैरक़ानूनी कारोबार तो सालों से चलता आ रहा है.
'कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था'
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने गांधी विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों से भी बातचीत की.
गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति और पूर्व ट्रस्टी सुदर्शन आयंगर कहते हैं, "कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था. अगर इस सरकार में गांधी के लिए आदर सम्मान होता, तो पोरबंदर में यह अनुमति नहीं दी जाती. गांधी विचारधारा से जुड़े हुए बहुत से लोग हैं, पूरी दुनिया में उनका सम्मान है, पूरी दुनिया उन्हें मानती है. ऐसे में उनके जन्मस्थान को तो अलग रखा जा सकता था."
इसी तरह गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति अनामिक शाह कहते हैं, "जिस तरह किसी धार्मिक स्थल के आस-पास क्या बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा, इस पर नियंत्रण रखा जाता है, उसी तरह पोरबंदर में परमिट शॉप पर नियंत्रण क्यों नहीं रखा जा सकता? और अगर पर्यटन की बात की जाए, तो ऐसे लोग नहीं होते जो गांधी के जन्मस्थान पर आकर शराब पीना चाहें."
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश एन शाह ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "एक समय था जब राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में शराबबंदी को तार्किक बनाने की बात करते थे, और अब वह बात ज़मीनी स्तर पर नज़र आ रही है. हालांकि इसका नुक़सान यह है कि जिस चीज़ का गांधी विरोध करते थे, वही शराब धीरे धीरे ज़्यादा सुलभ होती जा रही है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-डॉ. संजीव खुदशाह
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के रायपुर में रामकृष्ण नामक एक निजी अस्पताल में सीवर को साफ करते समय तीन सफाई कर्मियों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि यह तीनों सफाई कर्मचारी बिना उपकरण के सीवर में घुसे थे जहां पर जहरीली गैस रिलीज होने के कारण उनकी मौत हो गई। रायपुर में ऐसे सैकड़ो निजी अस्पताल हैं, कल कारखाने हैं, होटल, मॉल है, जहां पर हर महीने सीवर की सफाई करनी पड़ती है। इससे पहले भी अशोका बिरियानी नामक होटल में सीवर के भीतर जाने के कारण दो व्यक्तियों की मौत हो गई थी।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 1993 से 2025 तक पूरे देश में 1313 व्यक्तियों की मौत सीवर में जाने के कारण हुई है। यह आंकड़ा गंभीर है आधुनिक युग में जब विज्ञानिक तकनीक की सारी सुविधाएं मौजूद हैं सीवर साफ करने के लिए। मशीन का आविष्कार हो चुका है। इसके बावजूद आखिर क्यों एक मनुष्य को मानव मल साफ करने के लिए सीवर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह एक बहुत ही घृणित कार्य है। इसके लिए पूरी भारतीय सभ्यता को शर्मिंदा होना पड़ता है। एक ओर हम जहां चांद में कदम रख रहे हैं दूसरी ओर हमारे पास सीवर साफ करने के लिए मशीन का प्रयोग करने की इच्छा शक्ति नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि थोड़े पैसे बचाने के लिए एक गरीब मजलूम को महीने पर, दिहाड़ी पर, काम करने वाले मजदूर को हम सीवर जैसी गंदगी साफ करने के लिए टैंक के भीतर घुसने को मजबूर कर देते हैं। यह एक मानवीय अपराध तो है ही साथ-साथ संवैधानिक अपराध भी है। उसके लिए जो मजदूर को यह घृणित कार्य करने के लिए मजबूर कर रहा है।
केंद्र शासन का हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 का कानून कहता है कि किसी मनुष्य को सीवर में उतारना अपराध है और यदि मौत होती है तो नियोक्ता को सजा और पीडि़त को भारी भरकम मुआवजा देना पड़ेगा। बावजूद इसके सीवर में मौत का सिलसिला नहीं थम रहा है। बहुत सारे नियोक्ता अपने संस्थान में व्यक्तियों को मल उठाने, सीवर में घुसने और घृणित कार्य में लगाए हुए हैं।
सोच में बदलाव की जरूरत
भारत के कुछ लोगों की सोच आज भी सामंती है वह गरीब पिछड़े और दलितों से चंद पैसे के एवज में ख़तरनाक एवं घृणित काम में लगा देते हैं। उनको लगता है की इनके जान की कोई कीमत नहीं है। कानून का भी इन्हें कोई डर नहीं है तभी लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं।
करीब 20-25 वर्षों से सफाई कर्मचारियों की बीच काम करने वाले सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन कहते हैं की ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सीवर में मौत होने पर 30 लाख रुपए मुआवजा एवं परिवार का पुनर्वास किये जाने का प्रावधान है। लेकिन करीब 50त्न लोगों को यह मुआवजा अब तक नहीं मिला है। वह कहते हैं कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग में काम आने वाली मशीन का निर्माण भारत में नहीं होता है न ही इसे बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट किया जाता है। इसलिए भारत में इस तरह की मशीन की भारी कमी है। जिस नगर निगम में ऐसी 100 मशीन होनी चाहिए वहां पर दो या तीन मशीन होती है। कई नगर निगम/पंचायत के पास में ये मशीन है भी नहीं।’ वह कहते हैं कि ‘सरकार को इस मामले में पहल करना चाहिए ताकि बहुत बड़ी मात्रा में मशीनों का उत्पादन हो सके। हम चंद्रयान के लिए तो संसाधन जुटा लेते हैं लेकिन इस मामले में मौन हो जाते हैं।’
-दिलीप कुमार पाठक
इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढऩा सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे ‘अशिक्षा’ के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था-‘शिक्षा के बिना इंसान की बुद्धि मर जाती है और बुद्धि के बिना उसका विकास और नैतिकता हमेशा के लिए रुक जाती है।’
ज्योतिबा फुले के जीवन का सबसे साहसी अध्याय उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले के साथ जुड़ा है। उन्होंने किसी बड़े मंच से केवल भाषण देने के बजाय, बदलाव की शुरुआत अपने घर से की। उस कट्टर समाज की कल्पना कीजिए, जहाँ औरतों का पढऩा एक महापाप माना जाता था, वहाँ ज्योतिबा अपनी पत्नी के हाथ में कलम और किताब थमा रहे थे। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने निकलती थीं और उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था, तो ज्योतिबा एक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहते थे। यह उन दोनों का अटूट साहस और जिद ही थी, जिसने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत के पहले स्कूल का रास्ता खोला और सदियों पुराने बंद दरवाजे हमेशा के लिए तोड़ दिए। फुले के सुधार केवल स्कूलों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहे।
पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले विधानसभा चुनाव किसी के लिए सत्ता में बने रहने की लड़ाई है तो किसी के लिए कुर्सी हथियाने की और किसी के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा की.
इस बात पर अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इसमें कौन जीतेगा और कौन विपक्ष की भूमिका में रहेगा. राजनीति पर बहस करने वाले अक़सर कहते हैं कि चुनावी गणित हमेशा सीधा नहीं होता.
इसकी वजह यह है कि चुनाव कभी मुद्दों पर होते हैं और कभी नतीजा उम्मीदवारों पर निर्भर होता है. इसमें कई बार एकदम अलग समीकरण काम करते हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव के इस समीकरण में कई राजनेता अहम भूमिका निभा रहे हैं. इनमें से कोई चुनाव लड़ रहा है तो कोई दूसरों के समर्थन में प्रचार कर रहा है. कई लोग बंगाल के रहने वाले नहीं हैं- लेकिन ये लोग किसी न किसी तरीके से इस चुनाव के अहम किरदार के तौर पर उभरे हैं.
ये लोग कौन हैं और कौन सी बात उनके पक्ष या विरोध में जा सकती है, इस रिपोर्ट में इसी का ज़िक़्र किया गया है.
ममता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने चुनाव अभियान के दौरान अक़सर कहती हैं कि राज्य की सभी 294 सीटों पर वही उम्मीदवार हैं. उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी उनको एकमात्र और अद्वितीय नेता बताते हैं.
संसदीय लोकतंत्र में ममता बनर्जी चार दशक से भी लंबे समय से सक्रिय हैं. उन्होंने वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासन का अंत किया था. राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद बीते 15 साल से वह लगातार सत्ता में हैं.
बीते कुछ साल के दौरान उनकी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगते रहे हैं. राज्य में विभिन्न मुद्दों पर आम लोगों की नाराज़गी भी सामने आती रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का एक गुट मानता है कि इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह चुनावी लड़ाई उनकी पार्टी के लिए आसान नहीं होगी.
क्यों बढ़त हासिल है
ममता बनर्जी लंबे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री के बजाय दीदी के तौर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास करती रही हैं. महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, जनसंपर्क औऱ लड़ाकू नेता की छवि ने आम लोगों में उनकी अलग पहचान बनाई है. वह बार-बार कहती रही हैं कि तृणमूल कांग्रेस संगठन की नींव मज़बूत करने के लिए वह कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकेंगी.
उनकी पार्टी भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार मुखर रही है. ममता बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा के मुद्दे पर सक्रिय रही हैं. इसके साथ ही वह लगातार आरोप लगाती रही हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सवाल पर भाजपा पर आरोप लगाने के साथ ही इस मुद्दे पर राज्य के लोगों के हित में दलील देने के लिए वह वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं. तृणमूल कांग्रेस ममता की इस तारणहार वाली भूमिका का भी बड़े पैमाने पर प्रचार कर रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और हाल में शुरू की गई युवा साथी जैसी योजनाएं इस महीने होने वाले चुनाव पर असर डाल सकती हैं.
कई लोग मानते हैं कि बीते कई चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिला और मुसलमान वोटरों की उल्लेखनीय भूमिका रही है. यह दोनों तबके इस चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
इन वजहों से दिक्कत हो सकती है
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और जबरन चंदा उगाही जैसे कई आरोप लगे हैं. शिक्षा और नगर निगम में होने वाली बहालियों में भ्रष्टाचार के अलावा राशन घोटाले जैसे मामले सामने आए हैं. इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेता और मंत्री जेल भी जा चुके हैं.
दूसरी ओर, कोलकाता, दुर्गापुर और सिलीगुड़ी समेत राज्य के विभिन्न इलाक़ों में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर राज्य में बड़े पैमाने पर आक्रोश का माहौल रहा है. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या की घटना की जांच में अपनी भूमिका और राज्य में महिला सुरक्षा के सवाल पर राज्य सरकार कटघरे में खड़ी रही है.
कई लोग मानते हैं कि ये मुद्दे सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ जा सकते हैं. भ्रष्टाचार के अभियुक्त नेताओं को पार्टी में शामिल करने और उनको टिकट देने के मुद्दे पर विपक्ष तृणमूल के ख़िलाफ़ हमलावर रहा है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी
पश्चिम बंगाल पर लंबे समय से भाजपा की निगाहें टिकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव के पहले से ही बंगाल का दौरा करते रहे हैं.
इस महीने के विधानसभा चुनाव से पहले भी तस्वीर ऐसी ही नज़र आ रही है. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का सवाल हो या फिर वोटरों का दिल जीतने के लिए बंगाली अस्मिता के समर्थन का, पार्टी बार-बार आम लोगों को यह समझाने का प्रयास करती रही है कि बंगाल उसके लिए बेहद अहम है.
बढ़त कहां है
भाजपा प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की छवि को सामने रख कर चुनाव लड़ना चाहती है. यह एक बड़ा फैक्टर हो सकता है. दूसरी ओर, अमित शाह को भाजपा का मुख्य चुनावी रणनीतिकार माना जाता है.
यह दोनों नेता अपनी जनसभा और चुनावी रैलियों में केंद्र सरकार की विकास योजनाओं का ब्योरा देने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस पर केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के आम लोगों तक न पहुंचने देने के भी आरोप लगा रहे हैं.
भाजपा इसके साथ ही सीमा पार से घुसपैठ, भ्रष्टाचार और चंदा उगाही के आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधती रही है. इस चुनाव में भी पार्टी ने इसे ही अपना हथियार बनाया है.
आरोप और आलोचना
बीते कुछ वर्षों में बंगाल में भाजपा की नींव मज़बूत हुई है. लेकिन इसके बावजूद यह देखना ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी को सामने रखकर बंगाल में चुनाव जीतना पार्टी के लिए कितना आसान होगा.
दूसरी ओर, एसआईआर और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटने के मुद्दे पर उसकी आलोचना हो रही है.
तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल बंगालियों की सांस्कृतिक विरासत और मानसिकता के साथ भाजपा के मतभेदों के लिए उसकी आलोचना करती रही हैं. वह भाजपा के ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के भी आरोप लगाती रही है.
अभिषेक बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी दक्षिण 24-परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं. वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. लेकिन इससे उनका महत्व ज़रा भी कम नहीं होता.
तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की रणनीति, पैसों और चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों से लेकर पार्टी संगठन मज़बूत करने तक हर काम में उनकी अहम भूमिका है.
फ़ायदा
पार्टी के पुराने नेताओं की भीड़ में अभिषेक बनर्जी एक ऐसा युवा चेहरा हैं जो पहले ही संसदीय राजनीति में कामयाबी हासिल कर चुके हैं. उन्होंने पार्टी की नींव मज़बूत करने पर ख़ास ध्यान दिया है.
उनकी 'ब्वॉय नेक्स्ट डोर' वाली छवि ने जनसंपर्क में मदद की है. वह आम लोगों के बीच पार्टी की एक स्मार्ट औऱ साफ-सुथरी चमकती छवि पेश करने में भी कामयाब रहे हैं.
कई लोग उनको भविष्य का नेता मानते हैं.
नुक़सान
विपक्ष ने अभिषेक के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और आर्थिक गड़बड़ियों का आरोप लगाया है. इसके अलावा कांग्रेस की तरह ही तृणमूल कांग्रेस पर भी 'परिवारवाद' के आरोप लग रहे हैं.
कुछ विश्लेशकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों से पार्टी की छवि पर असर पड़ सकता है.
शुभेंदु अधिकारी
कभी ममता बनर्जी के नज़दीकी रहे और अब भाजपा के महत्वपूर्ण नेता शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता के तौर पर सक्रिय भूमिका में रहे हैं. भाजपा उनके सहारे नंदीग्राम जीतना चाहती है. वह उनका ही इलाक़ा है. इसके साथ ही ममता बनर्जी को सीधी चुनौती देते हुए इस बार कोलकाता की भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.
बढ़त होने की वजह
शुभेंदु ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था.
बीते कुछ साल के दौरान विपक्ष के ताकतवर नेता के तौर भाजपा की ओर से वह सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे हैं. पूर्व मेदिनीपुर और आसपास के इलाकों में उनका ख़ासा असर है.
आरोप
विपक्षी नेता उनके ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के आरोप लगा रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे का जमकर प्रचार कर रही है.
एसआईआर की पूरक सूची में नंदीग्राम से जिन वोटरों के नाम कटे हैं उनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. यह मुद्दा राज्य में भाजपा के लिए परेशानी की वजह भी बन सकता है.
हुमायूं कबीर
चुनावी समीकरणों के लिहाज से वह भले केंद्रीय किरदार नहीं हों, सबकी निगाहें हुमायूं कबीर पर टिकी हैं.
कबीर को किसी दौर में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का करीबी माना जाता था. लेकिन कांग्रेस के बाद वह पहले भाजपा और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. यानी वह कभी न कभी तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों में रह चुके हैं.
चुनाव से पहले उन्होंने 'आम जनता उन्नयन पार्टी' नाम के नए राजनीतिक दल का गठन किया है. विधानसभा चुनाव से पहले बाबरी मस्जिद की नकल पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने के फैसले और उसके शिलान्यास के ज़रिये उन्होंने राजनीतिक हलके में हलचल मचा दी थी.
इस चुनाव में उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ सीटों पर समझौता किया था. हालांकि शुक्रवार, 10 अप्रैल को ओवैसी की पार्टी ने इस गठबंधन से बाहर निकलने का फ़ैसला किया.
प्रभाव
कबीर फ़िलहाल मुर्शिदाबाद जिले के नौदा और रेजिनगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. उस इलाके में उनका ख़ासा असर है. माना जा रहा है कि चुनाव में इस इलाके के मुसलमान अहम भूमिका निभा सकते हैं. उनकी पार्टी कुल 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसमें नंदीग्राम और भवानीपुर सीटें भी शामिल हैं.
आलोचना
कई बार दल बदलने और विवास्पाद बयानों के कारण उनकी आलोचना होती रही है. भाजपा और तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान वोटों में सेंध लगा कर वह दूसरे दलों को फ़ायदा पहुंचाने का प्रयास करेंगे.
विशेषज्ञों का क्या कहना है
इन राजनेताओं और विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में एक सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक के तौर पर ममता बनर्जी की काफ़ी अहमियत है. दूसरी ओर, मोदी और शाह भाजपा के कर्ता-धर्ता हैं. इस राज्य में मोदी और शाह के अलावा भाजपा के पास कोई अलग चेहरा नहीं है. नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रचार होता है और अमित शाह प्रचार करवाते हैं. भाजपा पश्चिम बंगाल पर कब्ज़े के लिए बेताब है."
शुभेंदु अधिकारी के बारे में उनका कहना था, "वह खुद भाजपा के उत्पाद नहीं हैं. उल्टे भाजपा ने उनका अधिग्रहण किया है. उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि उन्होंने पिछली बार नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था."
शिखा मुखर्जी के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी ममता के बाद पार्टी में नंबर दो हैं. उन्होंने ज़मीन पर काफ़ी काम किया है. इसके साथ ही संगठन को मज़बूत करने के साथ ही रैलियां भी आयोजित की हैं.
लेकिन वह हुमायूं कबीर को ज़्यादा महत्व देने के लए तैयार नहीं हैं. शिखा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि हुमायूं कबीर को इतनी अहमियत दी जानी चाहिए. वह कुछ दिन पहले भाजपा में थे उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अब अपनी अलग पार्टी बना ली है. कल वह कहां होंगे, यह कहना मुश्किल है."
राजनीतिक विश्लेषक उज्ज्वल राय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कहते हैं, "ये दोनों जब भी किसी चुनाव में जाते हैं तो उसका महत्व बढ़ जाता है. यह दोनों पहले भी बंगाल के दौरे पर आए थे. लेकिन चुनाव पर कोई असर नहीं डाल सके थे. इस बार भाजपा एसआईआर के मुद्दे पर काफ़ी उत्साहित है और वह इस बार चुनाव में कामयाबी हासिल करना चाहती है."
उनका कहना था, "ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त हैं और उनकी छवि लड़ाकू नेता की है. उनके साथ अभिषेक बनर्जी भी हैं. विपक्षी दल आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी की नाकामियों को ही अपना चुनावी मुद्दा बनाते हैं."
राय कहते हैं, "यह याद रखना होगा कि ममता का सबसे बड़ा करिश्मा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता के तौर पर है. वह एसआईआर को राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा मुद्दा बना रही हैं कि भाजपा को इस पर जवाब देना पड़ रहा है. दिलचस्प बात यह है कि एक सत्तारूढ़ पार्टी दूसरी सत्तारूढ़ पार्टी से सवाल कर रही है."
उनका कहना था कि एसआईआर का मुद्दा फिलहाल बाकी तमाम मुद्दों पर भारी पड़ रहा है.
वह कहते हैं, "रोटी, कपड़ा और मकान जैसे लोगों की मौलिक ज़रूरतें अब पृष्ठभूमि में चली गई हैं. अब एसआईआर पर ही सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है."
राय का कहना था, "तृणमूल कांग्रेस लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यकों के नाम सूची से काटे जा रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा समझाना चाहती है कि अवैध वोटरों के नाम ही सूची से कटे हैं और इनमें से ज़्यादातर तृणमूल कांग्रेस का वोट बैंक थे. दोनों पार्टियां आक्रामक रणनीति के सहारे आगे बढ़ रही हैं."
वह शुभेंदु अधिकारी की भी अहमियत बताते हैं, "शुभेंदु अधिकारी की ख़ासियत यह है कि उनका चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम है और वह एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री को हराया है. इस बार वह नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से भी चुनाव लड़ रहे हैं."
राय के मुताबिक, शुभेंदु के ऐसा करने के दो कारण हैं. पहला यह कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि नंदीग्राम में ममता को हराने के बाद अब वह उनको उनके घर भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं.
दूसरा यह कि वह मुख्यमंत्री की चुनावी रणनीति में सेंध लगाते हुए उनके वोट तंत्र को ढहाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सोच यह है कि इससे ममता को भवानीपुर में ज़्यादा समय देना पड़ेगा और वह राज्य के दूसरे हिस्सों में ज़्यादा प्रचार करने का समय नहीं निकाल सकेंगी. इससे भाजपा को सहूलियत होगी.
राय की निगाह में हुमायूं कबीर बेहद दिलचस्प भूमिका में हैं.
वह कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों के ज़्यादा वोट मिलते हैं. इसलिए हुमायूं कबीर अहम हो गए हैं. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है. वह यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों की एकमात्र हितैषी है और तृणमूल कांग्रेस अब तक महज़ वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल करती रही है. वह बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद भी बना रहे हैं."
राय का कहना था, "दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस उन पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगा कर भाजपा को फायदा पहुंचाने के आरोप लगा रही है. लेकिन दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि वह दरअसल दूसरे तरीके से ममता बनर्जी की ही मदद कर रहे हैं. इससे खेल दिलचस्प हो गया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ सालों से छात्र संगठनों की गतिविधियां सीमित करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं. जेएनयू और जेएमआई के बाद अब डीयू प्रशासन ने भी नए दिशानिर्देश जारी किए हैं.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) उच्च शैक्षिक संस्थान होने के साथ ही बहस, असहमति और राजनीतिक चेतना का मंच रहा है. आर्ट्स फैकल्टी, चाय की दुकानों के कोने और पोस्टरों से भरी दीवारें इसकी पहचान है. यहां छात्र राजनीति से अरुण जेटली, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, विजय गोयल और अजय माकन जैसे कई बड़े नेता निकले. वही विश्वविद्यालय परिसर अब बदल रहा है.
फरवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान यूट्यूबर रुचि तिवारी के साथ कथित तौर पर बदसलूकी हुई. इसके बाद डीयू प्रशासन ने छात्र सभाओं पर प्रतिबंध की घोषणा की. दिल्ली हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने पुराने फैसले में बदलाव किया.
23 मार्च को डीयू ने एक नोटिफिकेशन जारी कर नए दिशानिर्देश बताए. इसके मुताबिक कैंपस में किसी भी तरह का प्रोटेस्ट, सभा, मार्च, रैली या कार्यक्रम के लिए 72 घंटे पहले अनुमति लेना जरूरी है. इसके लिए आयोजकों को स्थानीय पुलिस और प्रॉक्टर को लिखित आवेदन देना होगा.
बिना अनुमति किसी भी आयोजन पर निलंबन या अन्य कार्रवाई हो सकती है. साथ ही, बाहरी लोगों के शामिल होने पर भी रोक लगाई गई है. छात्र संगठन इस नोटिफिकेशन को कैंपस की लोकतांत्रिक संस्कृति पर सीधा प्रहार बता रहे हैं.
कोविड के बाद से बदलने लगा 'प्रोटेस्ट कल्चर'
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के संयुक्त सचिव अमन, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी कर रहे हैं. नए नियमों को वह एक पैटर्न का हिस्सा मानते हैं. अमन बताते हैं कि पहले, प्रदर्शन करने से पूर्व वह केवल मौरिस नगर पुलिस स्टेशन को सूचित करते थे. उनके मुताबिक कई ऐसे उदाहरण हैं जहां प्रदर्शन बीच में रोका गया, छात्रों पर हमले हुए और खासकर छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा होती रही है.
नए नोटिफिकेशन के अनुसार अब सूचना देने की बजाय अनुमति लेनी पड़ेगी. अमन का आरोप है कि कोविड महामारी के बाद कॉलेज खुलने के साथ ही प्रशासन की सख्ती बढ़ गई. विरोध करने वाले छात्रों को निलंबित या निष्कासित किया जाने लगा है. वह कहते हैं, "छात्रों में डर बिठाया जा रहा है. कंपलसरी अटेंडेंस, एक्सट्रा क्लासेज और लंबे लेक्चर्स के माध्यम से छात्रों को जानबूझकर कक्षाओं में व्यस्त रखा जाता है, ताकि वे प्रदर्शन में शामिल होने न जाएं."
'पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं'
इस साल 12 फरवरी को इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट्स फैकल्टी के बाहर हमला हुआ. यह कार्यक्रम ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने आयोजित किया था. आईसा (डीयू) अध्यक्ष सावी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में पक्षपात का आरोप लगाया, "हम देख रहे हैं कि ये पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को लगभग हर आयोजन के लिए अनुमति मिल जाती है. कल ही मैंने एक पोस्टर देखा, जिसमें वे नॉर्थ कैंपस के गर्ल्स हॉस्टल में आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित कर रहा है. कुलपति (वीसी) मुख्य अतिथि हैं. हमें अक्सर साधारण स्टडी सर्कल करने की भी इजाजत नहीं मिलती. यह सत्ता का दुरुपयोग है."
सावी आगे बताती हैं, "पहले हम आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद स्टैचू के सामने प्रदर्शन करते थे. कोविड के बाद यह जगह सीमित कर दी गई. अब केवल गेट नंबर 4 पर ही प्रदर्शन की अनुमति है. जबकि आरएसएस आर्ट्स फैकल्टी के अंदर शाखा लगाता है. हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अगर एक विचारधारा को अपनी बात रखने की आजादी दी जा रही है, तो हमें भी वही अधिकार मिलना चाहिए."
भगत सिंह की विचारधारा से प्रेरित 'दिशा छात्र संगठन' डीयू में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. नए नोटिफिकेशन के बावजूद 27 मार्च को उन्होंने 'शहीद दिवस' के अवसर पर एक सभा बुलाई, जिसे पुलिस ने बीच में रोक दिया. संगठन का आरोप है कि संबंधित नोटिफिकेशन इसलिए लाया गया ताकि छात्र, प्रशासन के खिलाफ आवाज न उठा सकें, फिर चाहे प्रशासन कोई भी गलत काम क्यों न कर रहा हो.
'दिशा छात्र संगठन' के सदस्य योगेश मीणा लॉ फैकल्टी में पढ़ाई करते हैं. वह कहते हैं, "दूसरी ओर प्रशासन फीस में बढोतरी जैसे किसी भी फैसले पर छात्रों से कोई राय नहीं लेता. फैसला सीधे उनके ऊपर थोप दिया जाता है. हमें अपने ही कैंपस में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए."
अनुशासन बनाए रखना जरुरी
वैचारिक रूप से आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन 'एबीवीपी' के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि उनका संगठन डीयू प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ है और छात्रों के साथ खड़ा है.
वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के छात्र संगठन 'एनएसयूआई' के सदस्य और पूर्व डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री कहते हैं, "शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को सीमित करने वाला कोई भी कदम खतरनाक है. लेकिन, कैंपस में व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है. इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो अनुशासन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दोनों को बनाए रखे."
डीयू के प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह का तर्क है कि वे विरोध प्रदर्शन नहीं रोक रहे हैं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित किया जा रहा है. वर्तमान में डूसू की संयुक्त सचिव दीपिका झा ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम इस फैसले में डीयू प्रशासन के साथ हैं, क्योंकि कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है."
-अनिल माहेश्वरी
उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे की शादी के बाद, मीडिया मुगल रजत शर्मा के बेटे की शादी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खूब सुर्खियाँ बटोरीं। इस समारोह में भारतीय समाज के नामी-गिरामी लोग शामिल थे।
लगभग 18 वर्ष पहले, टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े मीडिया उद्योगपति समीर जैन की बेटी त्रिशला ने अपने प्रेमी सत्येन गजनानी से अजमेर में विवाह किया था। लडक़ा-लडक़ी की इच्छा के अनुसार इस शादी में केवल 50 लोग शामिल हुए। यह शादी इतनी सादगीपूर्ण थी कि इसमें भारत के राष्ट्रपति भी शामिल हो सकते थे, फिर भी इसका मीडिया में कोई उल्लेख नहीं हुआ। कहीं कोई तस्वीर नहीं। आज गूगल पर खोजने पर भी इस विवाह का कोई जिक्र नहीं मिलता। निमंत्रण कार्ड की जगह समीर जैन ने ‘स्पीकिंग ट्री’ कॉलम के लेखों से युक्त एक पुस्तक भेजी थी।
नवभारत टाइम्स के संपादक एस.पी. सिंह की शादी में पाँच मुख्यमंत्रियों तक ने भाग लिया था। राज्य संवाददाताओं को वीआईपी मेहमानों को अशोका होटल में आयोजित इस विवाह समारोह तक लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। आनंद स्वरूप वर्मा ने इस पर ‘मैरेज ऑफ एन एडिटर’ शीर्षक से विस्तृत लेख लिखा था।
बिरला परिवार परंपरागत तरीकों का पालन करता रहा है। ‘तुम्हें बहुत अधिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी,’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उस संकोची युवती से कहा, जो अपने भावी पति के साथ उनसे मिलने आई थी। यह 1941 की सर्दियों का समय था और वे महाराष्ट्र के वर्धा के पास सेवाग्राम में थे। युवा जोड़े ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक समाप्त होने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और फिर बापू से आशीर्वाद लेने पहुँचे। बापू ने पूछा, ‘क्या तुम दोनों आपस में तालमेल बैठा पाओगे? क्यों न थोड़ा समय लेकर फिर से विचार करो?’ लेकिन लडक़ी अपने निर्णय पर अडिग थी, और लडक़ा भी।
मार्च 1942 में, पारंपरिक मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े किसी जोड़े का इस तरह, वह भी लडक़े के पिता की अनुपस्थिति में, सगाई करना असामान्य था। लेकिन बी.के. बिरला और सरला बिरला के साथ यही हुआ। देश के हृदय में स्थित एक सादे घर में, बापू, कस्तूरबा गांधी, सरदार पटेल और विशेष रूप से जमनालाल बजाज की उपस्थिति में, जिन्होंने इस जोड़े को मिलाया था। गांधीजी की सावधानी का कारण यह था कि सरला बिरला के पिता और कांग्रेस नेता ब्रिजलाल बियानी प्रगतिशील विचारों के थे और उन्होंने अपनी बेटी को पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज भेजा था, जबकि उस समय मारवाड़ी परिवारों की महिलाओं के लिए पढ़ाई वर्जित मानी जाती थी।
फरवरी 2025 में, अरबपति शादियों की परंपरा से हटते हुए, अडानी समूह के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक गौतम अडानी ने सादगी को अपनाया। उनके बेटे जीत अडानी ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया, और इस अवसर पर सामाजिक कार्यों के लिए 10,000 करोड़ का योगदान दिया गया।
-संदीप राय
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल जंग में दो हफ़्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है। लेकिन उसने पाकिस्तान का नाम लेने या उसके प्रयासों का जि़क्र करने से परहेज किया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, ‘हम युद्धविराम के फैसले का स्वागत करते हैं। हमें उम्मीद है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी। जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं कि मौजूदा जंग को समाप्त करने के लिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीति ज़रूरी है।’
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जंग ने पहले ही काफी तबाही मचा दी है, ‘इसने वैश्विक तेल और ऊर्जा सप्लाई और व्यापार प्रणाली को बाधित कर दिया है। हम आशा करते हैं कि कमर्शियल और तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजऱ सकेंगे।’
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत, जहाँ एक ओर दुनिया भर से कई नेता पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, वहीं भारत के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत को लेकर भी चुप्पी साधे रखी।
पाकिस्तान की प्रशंसा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस युद्धविराम के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना हो रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान का जिक्र किया।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने यह निर्णय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ और सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर लिया है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना की।
उन्होंने अपने बयान में कहा, ‘ईरान की ओर से, मैं अपने मित्र देश पाकिस्तान, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के प्रति क्षेत्र में जंग ख़त्म करने के लिए, उनके अथक प्रयासों की तारीफ़ करता हूँ।’
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने संघर्ष को कम करने में पाकिस्तान सहित मध्यस्थों की भूमिका की भी सराहना की ।
उन्होंने लिखा, ‘हम तनाव कम करने के प्रयासों के लिए पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब सहित सभी वार्ताकारों के प्रयासों का आभार व्यक्त करते हैं और उनका समर्थन करते हैं।’ यूरोपीय यूनियन कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेन ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया है।
विदेश नीति पर सवाल
विपक्षी पार्टियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान के ‘बढ़ते कद’ को लेकर भारतीय विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं।
विपक्षी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने युद्धविराम पर अपनी पार्टी की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘पाकिस्तान ने जो किया है, वही भारत को करना चाहिए था। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल को ‘फादरलैंड’ कहते हैं, तो वे युद्धविराम की चर्चा कैसे कर सकते हैं?’
प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, ‘पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीजफ़ायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है।’
‘28 फऱवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था। ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं। इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया।’
उन्होंने लिखा, ‘विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था। लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है।’
कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, ‘बीजेपी सरकार की ग़लतियों के कारण पाकिस्तान को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभाने का मौका मिला, जबकि भारत एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में बेहतर स्थिति में था।’
लेकिन शिवसेना-यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, ‘भारत को अमेरिका और ईरान के बीच किसी बातचीत की मेज़ पर क्यों होना चाहिए था? आलोचना समझ नहीं आती, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं थी। पाकिस्तान के लिए यह ऐसा है जैसे कोई कछुआ जो पैसे लेकर कहे कि वह संकट सुलझा देगा, जैसा कि भारत के विदेश मंत्री ने सर्वदलीय बैठक में अच्छे तरीके से बताया।’
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने एक्स पर लिखा, ‘युद्धविराम से होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया, वही होर्मुज़ स्ट्रेट जो युद्ध शुरू होने से पहले सबके लिए खुला और आसानी से इस्तेमाल करने लायक था। तो आखिर इस 39 दिन के युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?’
पाकिस्तान: मध्यस्थ या संदेश वाहक?
ईरान जंग में पाकिस्तान को क्या डिप्लोमेसी में भारत की तुलना में बढ़त मिली है?
इसे लेकर विपक्षी दलों में तो आम राय है लेकिन विश्लेषकों और पत्रकारों की राय मिली-जुली है। अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत इसे ‘शार्ट टर्म कूटनीति’ कहते हैं।
-डॉ. संजीव खुदशाह
यदि किसी आदिवासी व्यक्ति को जंगली कहकर जलील करना हो या किसी दलित को घोड़ी पर चढऩे नहीं देना हो या मटका छूने पर जान से मारना हो, इंटरव्यू में नंबर काटना हो या किसी भी प्रकार का भेदभाव करना हो, तो जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन जब लाभ देना हो तो इसके लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जाति प्रमाण पत्र हासिल करना आज के दिन में एक टेढ़ी खीर हो गई है। 1950 के बंदोबस्त का अभिलेख या स्कूल का रिकॉर्ड मांगा जाता है। जिसमें जाति का उल्लेख हो। अनुसूचित जाति जनजाति के ऐसे सदस्य जिनके पूर्वजों के पास में जमीन जायदाद थी अथवा शिक्षित थे। उनका तो जाति प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। लेकिन जिनके पूर्वजों के पास जमीन जायदाद नहीं थी, अशिक्षित, गरीबी के हाल में थे, शोषण के शिकार थे। तो उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है क्योंकि उनके पास 1950 का दस्तावेज नहीं होता है। छत्तीसगढ़ में 13 फीसदी अनुसूचित जाति एवं 30 फीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है। जाति प्रमाण पत्र पर काम करने वाले संतोष बोरकर जी कहते है कि एक अनुमान के मुताबिक लगभग आधी आबादी का जाति प्रमाण पत्र 1950 के दस्तावेज नहीं होने के कारण नहीं बन पाता है। इसके पीछे उनकी गरीबी, लाचारी, पूर्वजों की नासमझी भी कहीं जा सकती है। लेकिन यह आज भी वैसे ही भेदभाव के शिकार हो रहे हैं जैसे की और लोग होते हैं। इनकी कुल संख्या में वे लोग शामिल हैं जिनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है। यानी जनगणना में गणना, उनकी तो उस जाति के तौर पर हो रही है। इस गणना के हिसाब से योजनाएं बनाई जा रही है,आरक्षण दिए जा रहे हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाने के कारण वे सब, सरकारी योजनाओं से वंचित है। इस कारण एक बड़े तबके में असंतोष व्याप्त है।
छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र बनाने की समस्या को लेकर बरसों से मांग की जाती रही है और इसके लिए ज्ञापन पत्र व्यवहार आदि किया जाता रहा है। ऐसे ही पत्र व्यवहार के परिणाम स्वरूप केंद्र शासन ने व्यवहारिक परेशानी से सहमत होते हुए 10 जून 1925 को एक आदेश जारी किया। जिसमें यह स्पष्ट किया गया की जाति प्रमाण पत्र बनाने हेतु अभिलेख प्रस्तुत करने का नया कट ऑफ डेट 25 अगस्त 2000 होगा. यह नया कट ऑफ डेट ओबीसी के लिए भी मान्य होगा जो पहले 1984 था। यह आदेश शासन की वेबसाईट में उपल्बध है। इसको लेकर छत्तीसगढ़ में हलचल है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति के सचिव श्री संतोष बोरकर बताते है कि मुख्य सचिव ने अपने सभी कलेक्टरों को निर्देश पालन करने का पत्र जारी किया है लेकिन फिलहाल यह जमीनी स्तर पर लागू होते हुए नहीं दिख रहा है। इसका कारण है 2013 में शासन द्वारा जारी किए गए नियम। इस नियम में 1950 का दस्तावेज मांगा जाता है और यह नियम अभी भी लागू है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा सरकार से यह मांग की गई है कि 10 जून 2025 के आदेश के अनुसार इस नियम में भी परिवर्तन किया जाए और संबंधित जिम्मेदार पीठासीन अधिकारी को आदेशित किया जाए। तब कहीं जाकर इस आदेश को जमीन स्तर पर लागू किया जा सकेगा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में इस आदेश को लागू कर दिया है। पीडि़त लोग अपने-अपने स्तर पर नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि एवं अफसरों से भेंट कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि यथाशीघ्र यह आदेश लागू किया जाए। ताकि जनता में असंतोष कम हो और राहत मिल सके।


