विचार/लेख
शेंगेन वीजा के लिए भारतीयों छात्रों में होड़ बढ़ रही है। ऐसे में वीजा अपॉइंटमेंट और आवेदन खारिज होने की दर, दोनों बढ़ते जा रहा हैं। आखिर भारतीय छात्रों को यूरोप के लिए शेंगेन वीजा हासिल करने में क्या दिक्कतें आती हैं।
डॉयचे वैले पर सोनम मिश्रा का लिखा-
दूसरे देश पढऩे जाना हो या किसी काम के सिलसिले में, सबसे जरूरी चीज है वीजा। लेकिन शेंगेन वीजा के लिए आवेदन खारिज होने की सूची में भारतीय पूरी दुनिया में दूसरे नंबर पर आते हैं। 2024 में वीजा आवेदन खारिज होने के कारण भारतीय आवेदकों को 136 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा। यूरोपीय आयोग के अनुसार 2024 में भारत के सभी शेंगेन वीजा का लगभग 12 फीसदी आवेदन केवल जर्मनी के लिए था। इतना ही नहीं जर्मनी के लिए वीजा का सबसे अधिक आवेदन करने वाले तीन देशों में चीन और तुर्की के बाद अब भारत है।
पिछले साल शेंगेन वीजा के लिए भारत से कुल 11,08,239 आवेदन किए गए। जिसमें से लगभग 15 फीसदी यानी 1,65,266 आवेदन खारिज कर दिए गए। 2025 में भारतीयों के लिए शेंगेन वीजा की फीस लगभग 90 यूरो यानी 9,100 रूपये है। पर वीजा खारिज होने पर इस में से एक भी रुपया वापस नहीं मिलता। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, छात्र, जो पहले ही जद्दोजहद करके एडमिशन से लेकर फीस और टाइम पर वीजा आ जाने की उम्मीद में रहते हैं। एक तरफ बाहर जाकर पढऩे का खर्च पहले ही काफी भारी होता है और अगर ऐसे में वीजा की प्रक्रिया अटक जाए तो मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।
छात्रों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत
भारत में जर्मन दूतावास के अनुसार, जर्मनी भारतीय छात्रों के लिए शिक्षा के लिए पसंदीदा देश बनता जा रहा है। 2025 में छात्र वीजा आवेदनों में 35 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। जिस कारण जर्मनी में भारतीय छात्रों की संख्या 2024 में 46,000 से बढक़र 2025 में 54,000 हो गई है। और अनुमान है कि 2030 यह आंकड़ा बढ़ कर 1.14 लाख तक पहुंच सकता है।
इस बढ़ती रुचि के कारण अब सरकारी विश्वविद्यालयों में दाखिले और साथ ही साथ वीजा अपॉइंटमेंट के लिए भी प्रतियोगिता पहले से कई गुना बढ़ गई है। अक्टूबर और मार्च के सत्रों में पहले से कहीं ज्यादा आवेदन आ रहे हैं। जिस कारण छात्रों के लिए वीजा पाना पहले से बहुत ज्यादा मुश्किल हो रहा है।
समय रहते आवेदन करना जरूरी
24 साल के सौरभ सुमन को पिछले साल हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला। लेकिन वीजा समय पर ना मिलने के कारण उनका एक साल बर्बाद हो गया। इस साल वह वीजा हासिल करने की कोशिश में दोबारा लगे हुए हैं ताकि इस साल कम से कम वह समय पर अपने कोर्स के लिए जर्मनी पहुंच जाएं। जर्मन कॉन्सुलेट में काम करने वाली एक सहायक वीजा अधिकारी ने डीडब्ल्यू को बताया कि ऐसे में जरूरी है कि वीजा के लिए सही समय पर आवेदन किया जाए। आवेदन ज्यादा देर से नहीं करना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है कि आवेदन समय से पहले भी ना किया जाए। दोनों ही हालात में वीजा खारिज होने का खतरा बढ़ जाता है।
कहां से कर रहे हैं अप्लाई यह भी जरूरी
शेंगेन वीजा या सी-टाइप वीजा यानी 90 दिन या उससे कम दिन के वीजा के लिए प्रोसेसिंग समय 15 दिन का होता है। लेकिन यह समय तब शुरू होता है, जब पूरी तरह भरी एप्लीकेशन फॉर्म जर्मन कॉन्सुलेट में पहुंच गई है। ठीक इसी तरह, नेशनल वीजा या डी वीजा यानी 90 दिन से अधिक समय के वीजा के लिए प्रोसेसिंग समय केस के अनुसार निर्भर करता है। जैसे स्टूडेंट वीजा के लिए बारह हफ्ते यानी तीन महीने तक का वक्त भी लग सकता है। यह तब जब स्टूडेंट ने पूर्ण एप्लीकेशन सभी जरूरी कागजात के साथ वक्त रहते जमा किया हो।
अधिकारी ने बताया, ‘यह भी जरूरी है कि आवेदक कहां से आवेदन कर रहे हैं और वहां से जर्मन मिशन की दूरी कितनी है। अगर भारत से कोई शेंगेन वीजा के लिए आवेदन कर रहा है और भारत के सभी शेंगेन वीजा की प्रोसेसिंग मुंबई में होती है। ऐसे में आपका पासपोर्ट आपके शहर से मुंबई जाएगा और वापस आएगा, जो कि समय का अंदाजा लगाने में मददगार हो सकता है।’
भारत सरकार ने देश से नक्सलवाद के खात्मे के लिए 31 मार्च, 2026 की समयसीमा तय की है. सालभर में 350 से अधिक नक्सलियों की मौत हुई है और सैकड़ों नक्सलियों ने हथियार भी डाल दिए हैं. क्या यह नक्सलवाद के खात्मे का संकेत है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
सुरक्षाबलों ने झारखंड में तीन शीर्ष नक्सल नेताओं को मार गिराने की जानकारी दी है. न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, 15 सितंबर को हजारीबाग जिले में एक मुठभेड़ में इन नक्सलियों की मौत हुई. इन तीनों पर कुल मिलाकर एक करोड़ 35 लाख रुपये का इनाम था. इनमें से एक सहदेव सोरेन, नक्सलियों की केंद्रीय समिति का सदस्य था और उस अकेले पर एक करोड़ रुपये का इनाम था.
यह सुरक्षाबलों को नक्सलियों के खिलाफ मिल रही सफलता का एक ताजा उदाहरण है. इससे पहले, 13 सितंबर को प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के वरिष्ठ नेताओं में शामिल सुजाता ने तेलंगाना में पुलिस महानिदेशक के सामने आत्मसमर्पण किया था. द हिंदू की खबर के मुताबिक, आत्मसमर्पण करने से पहले सुजाता ने 43 सालों तक अंडरग्राउंड रहकर काम किया था.
साल भर में मारे गए 350 से अधिक माओवादी
छत्तीसगढ़ के बस्तर रेंज के आईजी पी सुंदरराज ने 16 जुलाई को मीडिया को सीपीआई (माओवादी) द्वारा जारी किए गए एक पत्र के बारे में बताया था. सुंदरराज के मुताबिक, इस पत्र में सीपीआई (माओवादी) ने स्वीकार किया था कि पिछले साल भर में देशभर में हुई मुठभेड़ों में उसके 350 से ज्यादा सदस्यों ने जान गंवाई है. इनमें केंद्रीय समिति के चार और राज्य स्तरीय समिति के 15 सदस्य शामिल थे.
द हिंदू अखबार की खबर के मुताबिक, सुरक्षाबलों को दण्डकारण्य क्षेत्र में सबसे ज्यादा सफलता मिली है, जो बस्तर रेंज के जिलों और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में फैला हुआ है. पुलिस आईजी सुंदरराज के मुताबिक, अकेले इसी इलाके में पिछले साल भर में 280 से ज्यादा माओवादी मारे गए हैं. यानी करीब 80 फीसदी नक्सली अकेले इसी इलाके में मारे गए हैं.
सुंदरराज ने डीडब्ल्यू हिंदी को बताया कि दण्डकारण्य क्षेत्र पिछले चार-पांच दशकों से नक्सली आंदोलन का केंद्र रहा है. उनके मुताबिक, घने जंगल और दुर्गम क्षेत्र होने की वजह से यह नक्सलियों की पसंद रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में राज्य और केंद्र सरकार दोनों ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि इस क्षेत्र का उपयोग नक्सलियों द्वारा सुरक्षित ठिकाने या छिपने के स्थान के रूप में ना किया जाए.
पुलिस और प्रशासन की रणनीति
पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सुरक्षाबलों ने 10 नक्सलियों का मारने की बात कही थी. इनमें नक्सलियों का एक सीनियर कमांडर भी शामिल था. अगस्त के आखिरी हफ्ते में छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में 30 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था. इससे पहले, 14 अगस्त को सुरक्षाबलों ने 1.16 करोड़ रुपये इनाम वाले दो नक्सलियों को मारने का दावा किया था.
आईजी सुंदरराज बताते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ बढ़त हासिल करने के लिए चार अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि सुरक्षा अभियानों की पहुंच बढ़ाई जा रही है, सुरक्षाबलों के कैंपों को विकास केंद्र के तौर पर विकसित किया जा रहा है, सड़कें बनाकर कनेक्टिविटी बढ़ाई जा रही है और स्थानीय समुदायों के अंदर सुरक्षाबलों के प्रति भरोसा पैदा करने के लिए भी उपाय किए जा रहे हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से कहा, "पहले भी हम बहुत सारे अभियान चला रहे थे लेकिन पिछले कुछ सालों में हमारे ऑपरेशनल बेस कैंपों की संख्या बढ़ी है, जिससे अब अभियानों की पहुंच बढ़ गई है.” उन्होंने बताया कि सुरक्षाबलों के बेस कैंपों को विकास केंद्रों के रूप में भी विकसित किया जा रहा है, जहां आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों को राशन की दुकानें, प्राइमरी स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं, जिससे स्थानीय लोगों में भरोसा बढ़ता है.
क्या बदल रहा है स्थानीय लोगों का नजरिया
नरेश मिश्रा छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय से बस्तर को कवर करते रहे हैं. वे कहते हैं कि यह नक्सलवाद के लिए बहुत मुश्किल का दौर है और नक्सल संगठनों ने अपने बयानों में इस बात को कबूल किया है. नरेश मिश्रा ने डीडब्ल्यू को बताया, "आत्मसमर्पण करने वाले कई नक्सलियों का कहना है कि वे इसलिए हथियार डाल रहे हैं क्योंकि उन्हें नहीं लगता कि वे लंबे समय तक इस लड़ाई को जारी रख पाएंगे."
नरेश मिश्रा कहते हैं कि यह एक बदलाव का दौर है. उनके मुताबिक जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षाबलों के कैंप खुलने शुरू हुए तो इनका बहुत विरोध हुआ, लेकिन इनकी वजह से स्थानीय लोगों को सुविधाएं भी मिलने लगीं. उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के लिए सरकारी सुविधाएं तो बढ़ रही हैं लेकिन उनकी स्वीकार्यता में समय लग रहा है.
हालांकि, मिश्रा सरकार के इस दावे पर संदेह करते हैं कि नक्सलवाद 31 मार्च, 2026 तक पूरी तरह खत्म हो जाएगा. वे कहते हैं, “भरोसे की जो समस्या लंबे समय से है, उसमें कुछ कदम सरकार आगे बढ़ी है. लेकिन गांवों में और नए क्षेत्रों में पूरी तरह से भरोसा कायम होने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा और अगर ऐसा हो पाया तभी एक तरह से नक्सलवाद का खात्मा होगा, जो मुझे नहीं लगता कि 2026 तक हो पाएगा”.
80 फीसदी कम हुई वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा
भारत की केंद्र सरकार ने हालिया समय में नक्सल आंदोलन के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद के खात्मे के लिए 31 मार्च, 2026 की समयसीमा तय की है. उन्होंने इसी महीने की शुरुआत में कहा था कि जब तक सभी नक्सली आत्मसमर्पण नहीं कर देते, पकड़े नहीं जाते या मारे नहीं जाते, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 12 अगस्त को लोकसभा को अपने लिखित जवाब में बताया था कि देश में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में कमी आई है. उन्होंने बताया कि साल 2010 से लेकर 2024 तक, वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसक घटनाओं में 81 फीसदी की कमी आई है और इनके परिणामस्वरूप होने वाली आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की मौतों में 85 फीसदी की कमी आई है.
नित्यानंद राय ने अपने जवाब में बताया कि साल 2013 में कुल 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे और अप्रैल 2025 में इनकी संख्या घटकर 18 पर आ गई है. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय नीति और एक्शन प्लान 2015 को अच्छी तरह से लागू करने की वजह से हिंसा में लगातार कमी आई है और वामपंथ उग्रवाद के भौगोलिक विस्तार में भी कमी आई है.
इसके साथ ही, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या भी बढ़ी है. प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के मुताबिक, साल 2024 में करीब 930 नक्सलियों ने समर्पण किया था. वहीं, साल 2025 के शुरुआती चार महीनों में ही 700 से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 12 जुलाई को एक्स पर बताया था कि पिछले 15 महीनों में छत्तीसगढ़ में 1,500 से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है.
ब्रेन ईटिंग अमीबा की वजह से जानलेवा बीमारी होती है. इससे संक्रमित होने के बाद इंसान का बचना बेहद मुश्किल हो जाता है. हालांकि, यह बीमारी संक्रामक नहीं है, यानी एक से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
एक इंसान के शरीर में औसतन 30 हजार अरब से भी ज्यादा कोशिकाएं होती हैं, वहीं, अबीमा एक ऐसा जीव होता है, जिसमें सिर्फ एक कोशिका होती है. इसी एक कोशिका के सहारे अमीबा अपना खाना ढूंढ़ता है, उसे खाता है, पचाता है और फिर अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकाल देता है. अक्सर जलाशयों में पाए जाने वाले अमीबा की एक प्रजाति ने इंसानों में सेहत को लेकर एक बड़ा डर पैदा कर दिया है.
दरअसल, भारत के केरल राज्य में इस साल ‘ब्रेन ईटिंग अमीबा' के 65 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और इसके चलते 18 लोगों की मौत हो चुकी है. इस अमीबा को वैज्ञानिक भाषा में ‘नेग्लीरिया फाउलराए' कहा जाता है. इसे ब्रेन ईटिंग अमीबा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह दिमाग में संक्रमण कर, दिमाग के टिशू यानी ऊतकों को नष्ट कर सकता है.
इंसानों में कैसे पहुंचता है यह अमीबा
अमेरिका के ‘रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र' (सीडीसी) की वेबसाइट के मुताबिक, ब्रेन ईटिंग अमीबा ताजे पानी की झीलों, जलाशयों, नदियों, गर्म झरनों और मिट्टी में पनपता है. जिन स्विमिंग पूलों का ठीक ढंग से रखरखाव नहीं किया जाता, वहां भी इस अमीबा के पनपने का खतरा होता है.
जिस पानी में यह अमीबा मौजूद होता है, उसमें नहाना बेहद खतरनाक होता है. दरअसल, नहाते समय यह अमीबा नाक के जरिए आपके शरीर में प्रवेश कर सकता है और फिर दिमाग तक पहुंच सकता है. इसके चलते, इंसानों में होने वाली बीमारी को प्राइमरी अमीबिक मैनिंगोइंसेफेलाइटिस (पीएएम) कहा जाता है. यह स्थिति बेहद दुर्लभ लेकिन जानलेवा होती है.
केरल में पिछले साल मई से लेकर जुलाई तक पीएएम के चार मामले सामने आए थे और चारों मामलों में पीड़ित बच्चों की मौत हो गई थी. इस साल सामने आए 67 मामलों में से 18 लोगों की मौत हो चुकी है. सीडीसी के मुताबिक, अमेरिका में 1962 से 2024 तक इसके 167 मामले सामने आए और उनमें से सिर्फ चार लोग ही जीवित बच सके.
किन देशों में पाया जाता है यह अमीबा
अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की वेबसाइट पर पिछले साल इस अमीबा के बारे में एक अध्ययन छपा था. इसके मुताबिक, अंटार्कटिका को छोड़कर दुनिया के हर देश में इस अमीबा की मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है. 1965 से 2018 के बीच, दुनिया भर में इसके करीब 380 मामले ही रिपोर्ट किए गए. जाहिर है कि यह काफी दुर्लभ है लेकिन साथ ही खतरनाक भी.
इस अध्ययन के मुताबिक, यह अमीबा इंसानों में तब प्रवेश करता है, जब इसका प्रजनन चक्र चल रहा होता है. इससे संक्रमित होने के बाद, लक्षण दिखने में एक से 14 दिन का वक्त लग सकता है. हालांकि, इस अमीबा से संक्रमित पानी को पीने से बीमारी नहीं फैलती क्योंकि उसके लिए पानी का नाक में जाना जरूरी होता है. इसके अलावा, यह बीमारी संक्रामक भी नहीं है, यानी एक से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती है.
दिमाग में जाकर क्या करता है यह अमीबा
सीडीसी के मुताबिक, ब्रेन ईटिंग अमीबा आमतौर पर बैक्टीरिया खाता है, लेकिन जब यह अमीबा इंसानों में प्रवेश करता है तो यह उनके दिमाग को खाने के स्रोत की तरह इस्तेमाल करता है. कई अध्ययनों में बताया गया है कि यह अमीबा तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा संवाद के लिए छोड़े जाने वाले रसायनों के प्रति आकर्षित होता है. इसके चलते वह नाक में घुसने के बाद, ओलफैक्ट्री नर्व से होते हुए दिमाग के सामने वाले हिस्से में पहुंच जाता है.
दिमाग में जाकर यह अमीबा दिमाग के ऊतकों को तो नष्ट करता है, साथ ही शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी हमला करता है. दरअसल, दिमाग में संक्रमण होने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली एक मजबूत प्रतिक्रिया देती है. इस प्रतिक्रिया से यह अमीबा तो नहीं मरता है लेकिन दिमाग में गंभीर सूजन हो जाती है.
इसके शुरुआती लक्षणों में उल्टी, बुखार, सिरदर्द और सुस्ती आदि शामिल हैं. बीमारी के गंभीर होने पर भ्रमित होने, गर्दन अकड़ने, रोशनी से डर लगने और दौरे आने जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. सीडीसी के मुताबिक, इसके लक्षण दिखने के एक से 18 दिन के भीतर ज्यादातर लोगों की मौत हो जाती है. आमतौर पर पीड़ित पहले कोमा में जाता है और फिर उसकी मौत होती है.
सामान के बदले सामान का विनिमय सिस्टम एक बार फिर रूस में बढ़ गया है. प्रतिबंधों से बचने के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है. कंपनियां गेहूं के बदले चायनीज कार और पटसन के बीजों के बदले निर्माण सामग्री हासिल कर रही हैं.
डॉयचे वैले पर निखिल रंजन का लिखा-
प्राकृतिक संसाधनों के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देश रुस ने तीन दशक पहले 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक संबंधों का सफर शुरू किया था.
आज भले ही रूस ने चीन और भारत के साथ संबंध मजबूत कर लिए हैं लेकिन अदलबदल वाली व्यवस्था का लौटना दिखा रहा है कि यूक्रेन युद्ध ने किस तरह से रूसी कारोबारी संबंधों पर असर डाला है.
अमेरिका, यूरोप और सहयोगी देशों ने रूस पर 25,000 से ज्यादा अलग अलग तरह के प्रतिबंध लगाए हैं. 2022 में यूक्रेन पर हमला करने और 2014 में क्रीमिया को अलग करने के बाद 2.2 ट्रिलियन डॉलर वाली रूसी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए समर्थन घटा है. अमेरिका ने तो रूसी तेल खरीदने की वजह से भारत पर भी भारी आयात शुल्क लगा दिया है.
भारत और चीन रूसी तेल ना खरीदें तो क्या होगा
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का कहना है कि रूसी अर्थव्यवस्था ने उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है. यह पिछले दो सालों में जी7 देशों की तुलना में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ी है, जबकि पश्चिमी देश इसके ढह जाने की भविष्यवाणी कर रहे थे. पुतिन ने कारोबारियों और अधिकारियों को आदेश दिया है कि वो हर तरीके से प्रतिबंधों का उल्लंघन करें.
रूसी अर्थव्यवस्था में तनाव के संकेत
हालांकि अर्थव्यवस्था पर तनाव के संकेत बढ़ते जा रहे हैं. रूसी सेंट्रल बैंक के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था पहले ही तकनीकी रूप से मंदी झेल रही है और साथ ही महंगाई की दर भी काफी ज्यादा है.
2022 में रूसी बैंकों को स्विफ्ट पेमेंट सिस्टम से बाहर करना और चीन के बैंकों को अमेरिका की धमकी ने दूसरे क्रम के प्रतिबंधों की आशंका पैदा की है. पेमेंट मार्केट से जुड़े एक सूत्र ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "चायनीज बैंकों को प्रतिबंधित बैंकों की सूची में डाले जाने का डर है इसलिए वे रूस से पैसा स्वीकार नहीं कर रहे हैं."
कैसे काम करता है सस्ते रूसी तेल का गणित?
यही डर विनिमय यानी अदल बदल वाली व्यवस्था के उभार के पीछे है जिसका पता लगाना काफी मुश्किल है. 2024 में रूस के अर्थव्यवस्था से जुड़े मंत्रालय ने 14 पन्ने का "विदेशी विनिमय लेनदेन गाइड" जारी किया. इसमें कारोबारियों को सलाह दी गई है कि प्रतिबंधों से बचने के लिए क्या तरीके अपनाए जाएं. यहां तक कि इसमें एक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बनाने का भी प्रस्ताव है जो अदल बदल के बाजार की तरह काम करेगा.
मंत्रालय के दस्तावेज में कहा गया है, "विदेशी व्यापार विनिमय विदेशी कंपनियों के साथ सामान और सेवाओं के लेन देन को बिना अंतरराष्ट्रीय भुगतान के संभव बनाएगा." इस तरह के भुगतानों में हाल तक बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि पिछले साल समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने खबर दी थी कि चीन की हाइनान लॉन्गपान ऑयलफील्ड टेक्नोलॉजी कंपनी मरीन इंजिनों के बदले में स्टील और एल्युमिनियम के अलॉय का लेन देन करने की फिराक में थी.
रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों से ईयू-भारत संबंधों पर कितना असर होगा?
कंपनी ने इस बारे में पूछने पर जवाब नहीं दिया. रॉयटर्स ने आठ ऐसे सामानों के लेन देन का पता लगाया है. इसके लिए कारोबारी सूत्रों, कस्टम सेवाओं के सार्वजनिक बयानों और कंपनी के स्टेमेंट को आधार बनाया गया है. इससे पहले इस तरह के लेन देन की खबर नहीं थी.
रॉयटर्स इस लेन देन का रूसी अर्थव्यस्था के लिए कुल कीमत या मात्रा का पता नहीं लगा सका लेकिन कारोबार से जुड़े तीन सूत्रों ने कहा कि यह व्यवस्था अब आम होती जा रही है.
रूसी और एशियाई उद्योगपतियों के एक संगठन के सचिव माक्सिम स्पास्की का कहना है, "विनिमय का विकास डॉलर को हटाने, प्रतिबधों के दबाव और सदस्यों में तरलता की समस्या का संकेत है." स्पास्की का कहना है कि विनिमय का तंत्र और आगे बढ़ने के आसार हैं.
रूसी कस्टम सेवा ने इस बात की पुष्टि की है कि अलग अलग देशों के साथ कई चीजों के लिए विनिमय किया जा रहा है. हालांकि बाजार के कुल लेन देन के सामने अब भी यह बहुत कम ही है.
रूस का विदेशी व्यापार मुनाफा जनवरी से जुलाई के बीच एक साल पहले की तुलना में करीब 14 फीसदी गिर कर 77.2 अरब डॉलर पर आ गया. ये आंकड़े फेडरल कस्टम सर्विसेज के हैं. इसी दौर में निर्यात 11.5 अरब डॉलर घट कर 232.6 अरब डॉलर पर आ गया जबकि आयात 11.5 अरब डॉलर बढ़ कर 155.4 अरब डॉलर पर जा पहुंचा.
अनाज के बदले कार
रॉयटर्स को जिन लेन देन का पता चला है उसमें एक है रूसी गेहूं के बदले चीनी कारें. एक सूत्र के मुताबिक डील में शामिल चीनी कार कंपनी ने कार के लिए भुगतान अनाज से करने के लिए कहा.
चीनी साझीदार ने युआन देकर चीन में खार खरीदे. इसी तरह रूसी साझीदार ने रूबल देकर अनाज खरीदे और फिर गेहूं के बदले कारों की लेनदेन की गई. अभी यह पता नहीं चल सका कि कितनी कारों के बदले कितना अनाज दिया गया. इसी तरह के दो और लेन देन में रूसी पटसन के बीजों के बदले निर्माण सामग्री दी गई. अनुमान है कि इसकी कीमत करीब 100,000 अमेरिकी डॉलर थी. चीन रूसी पटसन के बीजों का बड़ा आयातक है, वहां इनका इस्तेमाल औद्योगक प्रक्रियाओं और पोषण से जुड़े सामान बनाने में होता है.
इसी तरह एक लेनदेन में चीन से मशीनों के बदले उस तक धातुएं पहचाई गईं. चीनी सेनाओं को कच्चे माल से बदला गया और रूसी आयातक कंपनी ने अल्युमिनयम से इसके बदले भुगतान किया. इस तरह का सौदा पाकिस्तान से भी हुआ था. ऐसे लेनदेन ने रूस को प्रतिबंधों के दौर में पश्चिमी देशों का सामान भी लाने में मदद की है.
विनिमय से पहले हो चुकी है समस्या
1990 के देशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब वहां अदल बदल के जरिए व्यापार शुरू किया गया तो इससे वहां की अर्थव्यवस्था में काफी उथल पुथल हुई. तब बिजली से लेकर, आटा, चीनी, जूते जैसे चीजों के लिए यह तंत्र बनाया गया. हालांकि इसमें कीमत तय करने की मुश्किल थी और इसका कुछ लोगों ने भरपूर फायदा उठाया.
उस वक्त देश के पास तैयार मुद्रा नहीं थी इसके अलावा भारी महंगाई और बार बार मुद्रा के अवमूल्यन ने इस व्यवस्था की हालत बिगाड़ दी. अब मुद्रा की तो कमी नहीं है लेकिन विनिमय तंत्र इसलिए लाया जा रहा है ताकि रूस और चीन पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के डर का दबाव कम किया जा सके. रूस पश्चिमी देशों को अवैध तो चीन उन्हें भेदभावपूर्ण बताता है.
-भरत वर्मा
‘सो जा बेटे, रात के 12 बज रहे हैं, कब तक मोबाइल फोन देखते रहोगे?’
‘बस मम्मी, एक फिल्म खत्म कर रहा हूं, दिन में वाई-फाई नहीं मिलता ना!’
‘इस वाई-फाई का कुछ करना होगा!’
नोएडा में रहने वालीं सरिता और आठवीं क्लास में पढऩे वाले उनके बेटे अक्षर के बीच ये बातचीत एक रूटीन की तरह है। हफ़्ते में तीन-चार रातों को यह हो ही जाती है।
कुछ लोग कहते हैं कि वाई-फाई का मतलब ‘वायरलेस फिडेलिटी’ है, जैसे हाई-फाई का मतलब ‘हाई फिडेलिटी’ होता है। लेकिन इंडस्ट्री संगठन वाई-फाई एलायंस का कहना है कि वाई-फाई का कोई पूरा नाम नहीं है।
सीधी भाषा में कहें तो वाई-फाई वह तकनीक है, जो हमें तारों और कनेक्टरों के जाल में फंसे बिना इंटरनेट से जोड़ती है। इसके जरिए हम इंटरनेट से जानकारी हासिल कर सकते हैं और आपस में संपर्क कर सकते हैं।
वाई-फाई ऑन रहने से सेहत पर कुछ असर होता है?
वाई-फ़ाई कंप्यूटर और स्मार्टफ़ोन जैसे डिवाइस को बिना केबल के नेटवर्क से कनेक्ट कर देता है। ये एक वायरलेस राउटर का इस्तेमाल कर वायरलेस लोकल एरिया नेटवर्क (डब्ल्यूएलएएन) बनाता है।
मोबाइल फोन की लत से हम सभी वाकिफ़ हैं और अब वाई-फाई एक नई लत बनकर उभर रहा है। लेकिन इसका एक पहलू ऐसा भी है, जिसकी चर्चा कम होती थी, लेकिन अब ज़ोर पकडऩे लगी है।
अगर कोई देर रात तक मोबाइल फ़ोन, टैबलेट, कंप्यूटर या लैपटॉप पर मनोरंजन या काम की वजह से एक्टिव है तो इसकी संभावना बढ़ जाती है कि वाई-फ़ाई राउटर भी रात में ऑन ही रह जाए।
तो क्या वाई-फ़ाई ऑन रखने से हमारी सेहत पर कुछ असर होता है या उसे बंद करने से हेल्थ के लिए कुछ फायदे हो सकते हैं?
इस सवाल को और पैना करें तो क्या वाई-फ़ाई रात में ऑन रह जाना, इंसानी शरीर के न्यूरोलॉजिकल पक्षों या दिमाग़ को नुक़सान पहुंचा सकता है?
दिल्ली-एनसीआर की यशोदा मेडिसिटी में कंसल्टेंट (मिनीमली इनवेसिव न्यूरो सर्जरी) डॉक्टर दिव्य ज्योति से जब यह सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सीधे तौर पर ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि साइंटिफिक़ तौर पर अभी तक ऐसा कुछ साबित नहीं हुआ है।
डॉक्टर ने आगे कहा कि तार्किक रूप से देखें तो ऐसा सोचा जा सकता है क्योंकि ब्रेन के इम्पलसेस, इलेक्ट्रिकल इम्पलसेस होते हैं, और वाई-फाई या दूसरे अप्लायंसेज जो होते हैं, वो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (ईएमएफ) पर निर्भर करते हैं।
‘तो मुमकिन है कि ये दिमाग के इम्पलसेस के साथ दख़लअंदाजी करें, लेकिन अभी तक हमारे पास ये सोचने का कोई वैज्ञानिक कारण, स्पष्टीकरण या निष्कर्ष नहीं है। लेकिन तर्क तो यही कहता है कि हमें इससे जितना मुमकिन हो बचना चाहिए।’
ये ब्रेन इम्पलसेस होते क्या हैं?
ब्रेन इम्पलसेस वो इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नल होते हैं, जिसकी मदद से न्यूरॉन कम्यूनिकेट करते हैं, और सूचना को प्रोसेस करते हैं। इन नर्व इम्पल्स को एक्शन पोटेंशियल भी कहा जाता है।
जो नर्व इन इम्पल्स को दिमाग तक ले जाती है, वो है सेंसरी नर्व। यह दिमाग तक मैसेज लेकर जाती है, तभी हम और आप स्पर्श, स्वाद, गंध महसूस कर पाते हैं, साथ ही देख पाते हैं।
वाई-फाई राउटर का रात और दिन में असर
क्या वाई-फाई राउटर से रात में बचना चाहिए और दिन के समय क्यों नहीं?
इस पर डॉक्टर दिव्य ज्योति ने बीबीसी से कहा, ‘दिन और रात में शरीर और उसकी गतिविधियों में अंतर होता है। रात के समय शरीर की वेव्स अलग तरह की होती हैं, जो स्लीप वेव्स होती हैं। रात को सबसे ज़रूरी है अच्छी नींद मिलना और वो स्लीप साइकिल से तय होता है।’
उन्होंने कहा, ‘इसलिए कहा जाता है कि रात में इसे बंद कर देना चाहिए ताकि दिमाग को आराम मिले, साउंड स्लीप मिले, पूरी तरह रेस्ट मिले। लेकिन दिन के समय हमें काम करना होता है, तो नींद में दखल नहीं होती, लेकिन लॉजिक यही है कि ये एक्सपोजऱ जितना कम हो, उतना अच्छा।"
लेकिन क्या रात में वाई-फ़ाई से ही बचने की सलाह दी जाती है। मोबाइल फ़ोन का क्या, जो हम अक्सर अपने सिरहाने रखकर सोते हैं?
इस पर डॉक्टर का कहना है कि मोबाइल फोन भी माइक्रोवेव पर आधारित होते हैं। ये भी एक तरह की रेडिएशन पैदा करते हैं, बस इनकी फ्रीक्वेंसी अलग होती है। तर्क के तौर पर देखें तो ये भी दख़ल दे सकती हैं। यहाँ तक कि अगर आप मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल न भी करें तो भी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स मौजूद रहती हैं।
डॉक्टर दिव्य ज्योति ने कहा, ‘बैकग्राउंड रेडिएशन की बात करें तो उसकी तुलना में मोबाइल फोन और वाई-फाई से निकलने वाली रेडिएशन काफी कम होती हैं। क्या इन दोनों से एक्सपोजर बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है तो जवाब है नहीं। इसकी तुलना में बैकग्राउंड रेडिएशन को लेकर हमारा एक्सपोजर कहीं ज़्यादा है।’
जानकारों का कहना है कि हमारे घर-दफ्तर में हर तरह के एप्लायंसेज से रेडिएशन निकलती है। टीवी, फ्रिज से लेकर एसी तक। कोई भी इलेक्ट्रिक अप्लायंस हो, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स उससे जुड़े हैं ही।
कुछ विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर ईएमएफ़ के ओवरएक्सपोजऱ का डर है तो उस कमरे में राउटर लगाने से बचना चाहिए, जिसमें आप सोते हों। या फिर ऐसा मुमकिन ना हो तो सोने के पलंग से राउटर को ठीक-ठाक दूरी पर रख सकते हैं।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
मेडिकल लाइन के अलावा टेक्नोलॉजी से ताल्लुक रखने वाले एक्सपर्ट से भी इस विषय पर हमने चर्चा की।
उनका कहना है कि इस बारे में सटीक रूप से कोई जानकारी सामने नहीं है, जिसके कारण कन्फ्यूजन ज़्यादा है। ऐसे में स्टडी होनी चाहिए ताकि ये पता चल सके कि असल में इन वेव्स या ईएमएफ से कितना नुक़सान हो सकता है, और कैसे बचा जाना है।
टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट मोहम्मद फै़सल अली का कहना है कि ऐसी कोई स्टडी नहीं है, जो ये साबित कर सके कि हमें रात को वाई-फ़ाई बंद करना चाहिए, ताकि हमें अच्छी नींद आ सके।
‘या फिर वाई-फ़ाई ऑन रखने से ये हमारे न्यूरोलॉजिकल या किसी दूसरे सिस्टम को इम्पैक्ट करता है। लेकिन ये तो कहा ही जा सकता है कि किसी भी तरह के रेडियो वेव को लेकर ओवरएक्सपोजऱ लंबी मियाद में असर तो डाल ही सकता है। ये जेनेरिक बात है।’
अली ने बीबीसी से कहा, ‘साल 1995-96 से मोबाइल की शुरुआत मान लें तो इसका कुल सफऱ तीस साल का है और पिछले दस साल में भारत में मोबाइल और वाई-फ़ाई की ग्रोथ कहीं ज़्यादा हुई है।’
‘तो मुमकिन है कि आगे चलकर कोई स्टडी हो, जिसमें निष्कर्ष तक पहुंचा जा सके कि इन चीज़ों से ये-ये नुकसान हो सकते हैं, इसलिए लिमिट में ही इस्तेमाल करने चाहिए। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं है।’
यूनिसेफ के मुताबिक, पहली बार ऐसा हुआ है जब मोटापे के शिकार युवाओं की संख्या, दुबले पतलों से आगे निकल चुकी है.
डॉयचे वैले पर ओंकार सिंह जनौटी का लिखा-
यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रेन्स फंड (यूनिसेफ) ने 190 से ज्यादा देशों से आंकड़ें जुटाने के बाद पोषण रिपोर्ट तैयारी की है. रिपोर्ट के लिए बड़ी संख्या में घरों और परिवारों का सर्वे कर स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े भी जुटाए गए. रिपोर्ट के मुताबिक, 5 साल के बच्चों से लेकर 19 साल तक के युवाओं में अब कम वजन (अंडरवेट) के मामले 9.2 फीसदी हैं. 25 साल पहले यह दर 13 प्रतिशत थी. वहीं सन 2000 में इसी आयु वर्ग में मोटापे की दर 3 फीसदी थी, जो अब बढ़कर 9.4 परसेंट हो चुकी है.
बच्चों और युवाओं में मोटापे की दर सबसे ज्यादा अमीर और तेजी से विकास कर रहे देशों में बढ़ी है. दक्षिण अमेरिकी देश चिली में यह 27 फीसदी है, तो जर्मनी में 25 और अमेरिका व यूएई में 21 परसेंट बच्चे और युवा मोटापे का शिकार हैं. मोटापे की इस बढ़ती लहर से अब सिर्फ सब सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया ही बचे हैं.
मोटापा भी कुपोषण है
यूनिसेफ की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कैथरीन रसेल कहती हैं, "कुपोषण, अब सिर्फ कम वजन वाले बच्चों के बारे में नहीं है."
कई देशों में अब तक यह आम धारणा रही है कि औसत से कम वजन, कुपोषण की निशानी है, जबकि मोटापे जरूरत से ज्यादा बढ़िया खुराक की. लेकिन वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो मोटापा भी कुपोषण ही है. रसेल कहती हैं, "मोटापा, एक बढ़ती समस्या है, इसका बच्चों के स्वास्थ्य और विकास पर असर पड़ सकता है. बहुत ज्यादा प्रोसेस किया गया भोजन, तेजी से फलों, सब्जियों और प्रोटीन की जगह ले रहा है."
यूनिसेफ के मुताबिक बचपन से लेकर शुरुआती युवावस्था तक फल, सब्जियां, अनाज और प्रोटीन बेहद जरूरी होते हैं. ऐसी खुराक शारीरिक, मस्तिष्क संबंधी और मानसिक विकास में अहम भूमिका निभाती है.
मोटापे के खिलाफ मेक्सिको का चमकीला उदाहरण
यूनिसेफ की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि सस्ता, अल्ट्रा प्रोसेस्ड और फास्ट फूड मोटापे की दर को बढ़ा रहा है. ऐसा खाना बेचने के लिए बहुत पैसा खर्च कर लुभावने विज्ञापनों की बाढ़ सी बहाई जा रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक मोटापा, स्कूल में उपस्थिति, आत्मविश्वास, सामाजिक मेलजोल पर भी असर डाल सकता है. बचपन और किशोरावस्था में ऐसे अनुभवों से स्थापित होने वाली आदतों को बाद में बदलना बहुत ही मुश्किल होता है.
यूनिसेफ ने अपनी रिपोर्ट में मेक्सिको के कदमों की तारीफ की है. मेक्सिको सरकार ने सरकारी स्कूलों में दिए जाने वाले भोजन में बड़े बदलाव किए हैं. इन बदलावों के तहत अब बच्चों को अति संवर्धित, ज्यादा नमक या चीनी वाला भोजन परोसना बैन कर दिया गया है. इस प्रतिबंध में बहुत ज्यादा फैट वाले भोजन को भी शामिल किया गया है. इसका फायदा 3.4 करोड़ से ज्यादा बच्चों को हुआ है.
-संजीव शुक्ला
हमारी उम्र के अधिकांश लोगों ने अपना बचपन मोहल्ले में बिताया है, हममें आज भी वह मोहल्ला संस्कृति जीवित है ।
हम जब स्कूल में पढ़ा करते थे तब पूरे मोहल्ले में एक दो घरों में ही फ़ोन होता था और सारा मोहल्ला उनके नंबर को पीपी नंबर के रूप में अपने सारे परिचितों और रिश्तेदारों को दिया करता था यहाँ तक की कुछ उत्साही लोग अपने विजिटिंग कार्ड में भी पड़ोसी के नंबर को पीपी नंबर के रूप में लिख दिया करते थे। रोज-मोहल्ले के किसी ना किसी घर के लिए फोन उनके यहाँ आते वे अपने सब कम छोड़ पड़ोसी को बुलाने जाते और पड़ोसी को घर में बैठकर बात करने की सुविधा ही नहीं देते बल्कि एक टुकड़ा मीठा, कुछ ना हो तो गुड़ और पानी पिला कर विदा करते।
हम बचपन में रायपुर ब्राह्मण पारा में रहते थे पूरे मोहल्ले में सिर्फ दिलीप बैस जी के यहाँ ही टीवी हुआ करता था पूरा मोहल्ला शनिवार को फूल खिले हैं गुलशन गुलशन शुक्रवार को चित्रहार और रविवार को टीवी पर आने वाली हिंदी फि़ल्म देखने उनके घर जाया करता था , घर वाले सबके लिए दरी बिछा कर बैठ कर कार्यक्रम देखने का पूरा इंतजाम ख़ुशी ख़ुशी किया करते थे ।
इन दोनों प्रसंगों को मैं आज इस संदर्भ में याद कर रहाँ हूँ कि पहले मोहल्ले की संस्कृति कितनी जीवंत और मिलनसार हुआ करती थी, लोगों में कितना धैर्य और आत्मीयता हुआ करती थी। फिर हम धीरे धीरे मोहल्ले से निकल कर कॉलोनी में , फिर गेटेट कॉलोनी में, फिर फ्लैट में शिफ्ट होते गए और साथ ही साथ हमारी नजदिकयाँ कम होती गई, धीरज चुकता गया गया और हमे पता ही नहीं चला कब हम मोहल्ले से परिवार और परिवार से एकल परिवार तक का सफर पूरा कर लिए।
-अपूर्वा
हिंदी भाषा लगातार प्रगति करती चली गई, बदलती गई, नए परिधान पहन कर सुंदर होती गई, वैदिक संस्कृत, प्राकृत,अपभ्रंश, प्रादेशिक...उर्दू हिंदी।
महान हिंदी काव्य साहित्य रचे जाते रहे।
हिंदी 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा भारत की राजभाषा बनी।
देश के बड़े हिस्से की भाषा हिंदी। सोचिये हिंदी का क्षेत्र कितना व्यापक है? हिंदी मीडिया, हिंदी प्रकाशक, हिंदी फि़ल्में कितना कमाती हैं?
पर हिंदी को विकसित करने वाला हिंदी वैज्ञानिक, हिंदी का इलाज करने वाला हिंदी चिकित्सक, हिंदी को संवारने वाला हिंदी को सुंदर रूप देने वाला हिंदी ‘ब्यूटीशियन’ किस हाल में है ?
गोदान, मैला आँचल, संसद से सडक़ तक ,चाँद का मुँह टेढ़ा है ,अपनी खबर, चुका भी हूँ मैं नहीं, विकलांग श्रद्धा का दौर जैसी कालजयी हिंदी किताबों के लेखक किस हाल में रहे ? ये एक लम्बी सूची है और लेखकों की सूची भी लम्बी है ।
हिंदी लेखकों की पीड़ा की सूची और लम्बी है।
हिंदी मीठी भाषा है । आज मीठा दिवस है कायदे से।
कायदे से आज 14 सितम्बर के सरकारी मीठे-मीठे बोल बोलकर जयकारा लगा देना चाहिए और इतनी जोर से जयजयकार हो ,शोर हो कि हिंदी साहित्यकारों की दशा, उनकी चिंताएं, उनकी चिताएं!..भी यदि सजने को तैयार हो तो ये किसी को खबर न लगे ।
कभी मत सुनियेगा कि रही मासूम रजा साहब ने किस वेदना से कहा था
‘मैं इस दुनिया से क्या मांगूं
मेरी नज़्मों की कीमत इस जि़ंदगी ने कब दी थी
जो अब देगी’
उग्रजी की तबियत बिगडऩे पर जब बच्चनजी ने उन्हें कुछ देने की पेशकश की इज़ाज़त मांगी तो उग्रजी ने कहा था-
‘तुमसे पैसे लेकर तुम्हारे सामने कभी आने पर मुझे अहसान मंद होना पड़ता, वह मैं किसी के सामने नहीं हुआ हूँ। अहसानमंद तो मैं अपनी लाश उठाने वाले का भी न होना चाहूंगा। जब मैं मरुँ और तुमको ख़बर मिले तो मेरी लाश हरिजनों से उठवाकर बस्ती से दूर किसी नदी में फिकवा देना।’
ऐसा ही स्वाभिमान और संघर्ष सवालाख सॉनेट लिखने वाले त्रिलोचन जी का था। भयानक संघर्ष, गर्दिश ही गर्दिश पर अपने उसूलों स्वाभिमान से समझौता नहीं किया।
याद है एक सभा में कैसे निराला जी को कुर्सी से उठकर अपने शरीर के ऊपर एक पतला कम्बल, जो कई जगह से फटा था, उसे सबको दिखाकर कहना पड़ा था-
‘ये है आपकी हिंदी, इसे गौर से देखिये। सोच सकें तो सोचिये ।हम तो काम के आदमी हैं ,बातें कम करते हैं।’
परसाईजी ने लिखा है-‘कोई दिन गर्दिश से खाली नहीं है ओर न कभी गर्दिश का अंत होना है, ये ओर बात है शोभा के लिए कुछ अच्छे किस्म की गर्दिशें चुन ली जाएँ ।उनका मेकअप कर दिया जाए, उन्हें अदाएं सीखा दी जाएँ-थोड़ी चुलबुली गर्दिशें हो तो ओर अच्छा, और पाठक से कहा जाय-‘ले भाई देख मेरी गर्दिश’
ये कुछ सतही, प्रकाशित उद्धरण मैंने बताये । इसकी जितनी गहराई में जायेंगे हिंदी जिनसे चमकती है वो कितने अँधेरे में जीते रहे और आज भी जी रहे, ये पाएंगे।
सोवियत रूस ने कभी गोर्की के नाम पर एक पूरे शहर निजऩी नोवगोरोड को गोर्की नगर कर दिया था।
-सनियारा खान
स्वाभिमानी औरतों को हमेशा पितृसत्तात्मक समाज से लड़ते हुए जि़न्दगी गुजारनी पड़ती हैं। यहां मैं बात करना चाहूंगी एमी बिशेल की। वे ब्रिटेन की एक बहुत ही चर्चित लेखिका है। एक बार उन्हें एक पार्टी के लिए आमंत्रित किया गया था। वे उस पार्टी में अपनी ग्यारह साल की बेटी मेबेल को साथ लेकर गई थी। पार्टी के बीच में एक सत्तर साल के आदमी ने मेबल को ‘तुम तो बहुत ही सुंदर हो’ कहकर उसे घूर रहा था। उस आदमी के कारण मेबेल पूरे समय पार्टी में चुप सी रही और असहज महसूस कर रही थी। बेटी का चेहरा देखकर एमी भी समझ गई थी कि उसे पार्टी में मजा नहीं आ रहा है। लेकिन शिष्टाचार के कारण एमी उस आदमी को कुछ कह नहीं पाई। पार्टी खत्म होने के बाद मां-बेटी दोनों घर आ गए। घर आने के बाद एमी फिर से पूरी घटनाक्रम को याद कर के समझने की कोशिश कर रही थी। सभी पक्षों को ध्यान से सोचकर एमी को लगने लगा कि उससे एक बहुत बड़ी गलती हो गई है। पार्टी में ही सभी के सामने उस आदमी को कह देना चाहिए था कि उनका व्यवहार ग्रहण योग्य नहीं है। अब एमी मेबेल के पास जाकर उससे माफी मांगी। क्योंकि उनको लगा कि वे एक मां होकर भी बेटी के साथ होते हुए अन्याय को चुपचाप देख रही थी। बेटी को कैसा महसूस हो रहा था इस बात को छोडक़र वे एक अनजान आदमी क्या सोचेगा इस बात को लेकर फिक्र कर रही थी। बहुत देर तक बात करने के बाद दोनों ने मिलकर ये तय किया कि जिस तरह की बातों से वे अपमानित या असहज महसूस करे, उस तरह की बातें सुनकर वे खामोश न रहकर उसी समय विरोध जताएंगे। चाहे इसके लिए कोई उनको घमंडी समझे या अशिष्ट समझे! जहां सवाल आत्मसम्मान को लेकर उठता है, वहां किसी भी तरह से समझौता नहीं करना चाहिए। एमी बिशेल ने उनकी जि़ंदगी में घटनेवाली ऐसी ही कई घटनाओं के बारे में अपनी किताब ‘बैड मैनर्स’(Bad Manners) में लिखा है। व्यक्तिगत रूप से वे चाहती थी कि ज्यादा से ज्यादा मर्द ये किताब जरूर पढ़ें। तभी वे समझ पाएंगे कि उनकी किस प्रकार की हरकतों से औरतें अपमान और शर्म महसूस करती हैं! किसी औरत को स्वस्थ रूप से प्रशंसा कर पाना भी एक हूनर है और मर्दों को ये हूनर आना चाहिए। एमी जानती थी कि उनकी बेटी मेबेल की आँखें और बाल बहुत सुंदर हैं। लेकिन उसमें कई और अच्छी बातें भी थी। वह सरल स्वभाव की थी और उसे किताबें पढऩा बहुत पसंद था। पर उसकी इन बातों पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, लोग उसकी सुंदरता के कारण उसकी और ज़्यादा तारीफ करने लगें। एमी को भी उसे सजाने संवारने में मजा आता था। उसे नए-नए डिज़ाइन के कपड़े लेकर देती थी। उसकी बालों को अलग-अलग स्टाइल में बनवाती थी। लेकिन उस पार्टी वाली रात के बाद से जि़ंदगी को लेकर एमी का नजरिया ही बदल गया। उनको समझ में आया कि औरतों को बाहरी सुंदरता से ज़्यादा अंदर से हिम्मती होना जरूरी है। हिम्मत न होने के कारण ही वे अपनी बेटी को अपमानित होते देखकर भी उस अनजान आदमी से कुछ नहीं कह पाई। एमी खुद भी अपनी जिंदगी की कुछ घटनाओं को याद करती है। सिर्फ बारह साल की उम्र में ही एक आदमी ने उनके शरीर को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। पंद्रह साल की उम्र में एक रेस्टोरेंट के मैनेजर ने उनको अश्लील ढंग से छुआ था। उस दिन घर आकर एमी पूरी रात रो रही थी। ज़्यादातर बच्चियां, लड़कियां या महिलाओं के अंदर इस तरह की कई अनचाही बातें छुपी रहती हैं। एमी बिशेल की लिखी हुई इस किताब में समाज के हर नागरिक के लिए सीखने लायक कई प्रकार की बातें हैं। जैसे, लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए सभी को मिल कर सामने आना चाहिए।
-संजय श्रमण
यूरोप में दो भारतीय मिलते हैं तो इंगलिश में बातें करते हैं। दोनों को पता हो कि अगला/अगली हिन्दी बेल्ट से है फिर भी इंगलिश में ही बातें करते हैं। तमिल, तेलुगू या मलयाली भारतीय हों तो बात अलग है लेकिन हाय रे दुर्भाग्य, हिन्दी बेल्ट का आदमी हिन्दी नहीं बोलना चाहता।
परदेस में दो बंगाली मिलेंगे तो बांग्ला में बोलेंगे, दो तमिल या मलयाली पंजाबी मिलेंगे तो तमिल या मलयालम या पंजाबी में ही बातें करेंगे। इस बात का हिन्दी भाषी बड़ा मजाक बनाते हैं। हिन्दी बेल्ट वाले ना केवल इंगलिश पर आ जाते हैं बल्कि एक्सेंट भी मारने लगते हैं।
यूरोपीय या अमेरिकन लोगों से बात करने के लिए एक्सेंट ठीक है, लेकिन दो भारतीय हिन्दी भाषी एकदूसरे को एक्सेंट में काहे को बतियाते होंगे?
यहाँ एक और मज़ेदार बात है, पाकिस्तानी मित्र मिलें तो एकदम से उर्दू-हिन्दी शुरू हो जाती है और थोड़ी ही देर में हिन्दी उर्दू में हल्की फुलकी शायरी और गालियों तक आ जाते हैं। जब किसी मुद्दे पर अपने अपने नेताओं और मुल्क की बदहाली पर जी भर के उर्दू हिन्दी पंजाबी में गालियाँ दे देते हैं तो बड़ा भाईचारा बन जाता है। फिर इंगलिश में कभी बात नहीं होती।
लेकिन उफ्फ़़! हिन्दी बेल्ट के भारतीयों से परदेस में मिलना उतना अपनापन नहीं देता।
क्या कारण हो सकता है?
मैंने कई लोगों से पूछा, ख़ासकर यूरोपीय विश्वविद्यालयों में कई लोगों से इस विषय में बात की। वे कहते हैं कि भारतीयों में और कुछ अफ्रीकी देशों में ये बात बहुत ज़्यादा है। जहां भी उपनिवेशी क़ब्ज़ा रहा है, वहाँ अपनी भाषा के प्रति एक हीन भावना प्रवेश कर गई है।
भारत में अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी भाषियों में ये हीन भावना कुछ अधिक है। एक कारण तो ये कि हिन्दी बहुत ही नयी भाषा है। हिन्दी भाषी भारतीय आपस में भी, अपने बच्चों से भी इंगलिश में ही बातें करते हैं। यही हिन्दी-उर्दू बोलने वाले पाकिस्तानियों के बारे में भी है। इस पूरे ख़ित्ते में जहां भी हिन्दी का असर है, वहाँ अपनी भाषा के प्रति एक ख़ास हीन भावना है।
स्विट्जऱलैंड का आधा हिस्सा जर्मन प्रभाव में है और शेष आधा फ्ऱेंच प्रभाव में है। ये मोटा मोटा विभाजन है। ना इटली में न स्विट्जऱलैंड में इंगलिश बोलने को ज्ञान की या शिक्षित होने की निशानी माना जाता है। जर्मनी और फ्ऱांस में तो कतई इंगलिश की धौंस नहीं जमाई जा सकती। वे लोग जर्मन और फ्ऱेंच के आगे किसी भाषा को कुछ नहीं समझते। ब्रिटेन की तो राजभाषा भी लंबे समय तक फ्ऱेंच ही थी। ये बात कम ही लोग जानते हैं। भारत पर फिर से आते हैं।
भारतीयों में विशेष तौर पर हिन्दी भाषियों में ना जाने कब ये प्रवृत्ति घुस गई कि गऱीब किसानों, मज़दूरों, शिल्पकारों, मछुआरों, चरवाहों के शब्द मानक हिन्दी में शामिल नहीं करने हैं। शास्त्रीयता, शुद्धता, संस्कृतनिष्ठता इत्यादि ना जाने कितने तरह के आग्रह हैं जिनकी वजह से हिन्दी अपने ही देश में अपने ही लोगों में धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। सामान्य बोलचाल की हिन्दी में जीतने शब्द हैं वे लाखों की संख्या में हैं, लेकिन मानक हिन्दी में शब्द कम होते जाते हैं।
किसानों, मज़दूरों और ख़ास तौर से गाँव के गऱीबों से या झुग्गी झोपड़ी के मज़दूरों से बात करके देखिए, आपको कई नये शब्द मिलेंगे। उदाहरण के लिए ‘गरियाना’ ‘लतियाना’ ‘वाट’ ‘मूड’ ‘ख़ालिस’ ‘ख़लास’ ‘जुगाड़’ ‘खटारा’ ‘भंगार’ और ना जाने क्या क्या। ये सब उनकी हिन्दी में हैं लेकिन किताबी हिन्दी में ये नहीं आ रहे। किताबी हिन्दी में ऐसे शब्द मिलेंगे जो मु_ी भर लोगों को ही समझ में आ सकते हैं।
इसीलिए हिन्दी की किताबें अगर पाँच सौ भी बिक जाये तो चमत्कार हो जाता है, दो तीन हज़ार कॉपी होते ही किताब बेस्ट सेलर में आने लगती है । डेढ़ सौ करोड़ भारतीयों में कम से कम साठ करोड़ हिन्दी समझते होंगे उसमें से आधे भी शिक्षित हैं तो दो हज़ार प्रतियों के बेस्ट सेलर बन जाने का क्या मतलब हो सकता है?
हिन्दी को असल में संस्कृत की बीमारी लगी हुई है। उसे ज़मीन पर नहीं उतरना है, आकाश में देवलोक में ही लटके रहना है। जैसे संस्कृत गऱीबों से अछूतों से दूरी बनाकर रखती थी, वैसी ही हिन्दी भी है। हिन्दी में सरल और लोक के शब्दों को अपनाने से परहेज़ किया गया है। इसीलिए उर्दू आजकल उपेक्षित होने के बावजूद बहुत समावेशी और हिन्दी से कहीं ज़्यादा समृद्ध बन गई है। उर्दू ने जितने स्रोतों से शब्दों को लिया है वो गज़़ब की बात है। आम आदमी की हिन्दी भी बहुत समृद्ध है लेकिन उस हिन्दी में साहित्य कम ही मिलेगा।
इस कारण बोलने वाली हिन्दी और लिखी/पढ़ी जाने वाली हिन्दी में भारी अंतर पैदा हो गया है। ये अंतर इतना ज़्यादा है कि क्या बतायें।
मैं अक्सर इसे चेक करने के लिए विश्वविद्यालयों के बच्चों से बात करता हूँ। जान बूझकर कोई किताबी हिन्दी शब्द उछाल देता हूँ और सीधे उनकी आँख में झांकता हूँ। वे एकदम नकार देते हैं इन शब्दों को। जैसे ‘वास्तविकता’ ‘समावेश’ ‘आकर्षण’ ‘उपयोग’ ‘विश्राम’ ‘कर्तव्य’ ‘आभास’ ‘अभिव्यक्ति’ ‘आत्मविश्वास’ इत्यादि इत्यादि। वे इन शब्दों के इंगलिश अर्थ पूछते हैं। अगर डेढ़, ढाई, सवाया, पौना, पैंसठ, अठहत्तर, पच्चासी, पचपन जैसे शब्द कह दो तो वे हंसने लगते हैं कि कहाँ के गँवारों वाले शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं।
अब इस पीढ़ी से इंग्लिश में भी बात करके देख लीजिए। वहाँ भी वही हाल है। इंगलिश एक तो हमारी भाषा नहीं ऊपर से बिलकुल ही कम पढ़े लिखे प्राइवेट स्कूल के प्राइमरी सेकेण्डरी शिक्षकों से पढ़ी हुई ये पीढ़ी कितनी इंगलिश जान सकती है भला?
छोटे क़स्बे ही नहीं बल्कि अच्छे ख़ासे शहरों के प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के शिक्षकों से बात करके देखियेगा। उनके पास कुछ चुनिंदा शब्द होते हैं ‘कीप साइलेंस’ ‘डोंट टॉक’ ‘ओपन योर बुक’ ‘कम हियर’ ‘लिसन केयरफ़ुली’ ‘व्हाट आर यू डूइंग’ ‘व्हाई आर यू लाफि़ंग’ इस तरह के कुछ सिद्ध मंत्र होते हैं जिनके सहारे पहली से बारहवीं कक्षा तक की नैया पार लगती है। क्लास में पढऩे पढ़ाने की बात आते ही वे सीधे किताबें खोलकर ख़ुद पढऩे लगते हैं या दूसरों को रटाने लगते हैं। इंगलिश या हिन्दी में अपने विचार कैसे व्यक्त किए जायें? इस बात से उनका कोई वास्ता ही नहीं होता।
-राजीव सरदारीलाल
किसी भी देश को तरक्की पाने के लिए अन्य कारकों के अलावा वहां की उच्च शिक्षा का भी मजबूत होना एक महत्वपूर्ण कारक है ।अगर भारत को आगे तरक्की पाना है तो उच्च शिक्षा पर सर्वाधिक काम करने की जरूरत है।
उच्च शिक्षा की बेहतरी और उसे बढ़ावा देना तरक्की पाने का सबसे आसान, सस्ता एवं लंबे समय तक के लिए किए जाने वाला उपाय है जो देश के लिए सैकड़ो तरक्की के दरवाजे खोल देगा। इसका सबसे अच्छा उदाहरण देश में कंप्यूटर आने के बाद देश के युवाओं का उल्लेखनीय प्रदर्शन है।
क्या देश इस ओर काम कर रहा है ? क्या सरकारें इस काम पर पर्याप्त ध्यान और खर्च कर रही हैं? आइये आंकड़ों से स्थिथि को समझते है कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उच्च शिक्षा के नाम पर सबसे ज्यादा उल्लेख शिक्षा महाविद्यालयों का किया गया है। शिक्षा महाविद्यालयों की पूरे देश में क्या स्थिति है यह किसी से छुपी नहीं है। हाल के सालों में केंद्र सरकार की संस्था राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद जो भारत में शिक्षा पाठ्यक्रमों को संचालित एवं मान्यता देती है, उसने दो साल के पाठ्यक्रम वाले बी।एड। एवं डी।एड। के नए महाविद्यालयों के आवेदन लेने भी बंद कर दिए हैं। नए महाविद्यालय अब सिर्फ चार साल पाठ्यक्रम के खुलेंगे और उसकी गति भी अत्यंत धीमी है।
राज्य सरकार द्वारा संचालित संस्थाएं तो इन चार साल वाले पाठ्यक्रम को खोल पाने के लिए योग्य भी नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा तय मानकों पर राज्य की बहुत सारी संस्थाएं अमानक पाई गई हैं। जाहिर है मांग को देखते हुए देश में शिक्षा महाविद्यालय निजी ही खुलेंगे। इसके अलावा तकनीकी शिक्षा और अन्य पाठ्यक्रमों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। सरकारी उच्च शिक्षण संस्थाओं का योगदान लगातार घटता जा रहा है। तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा में सरकारी संस्थाएं शिक्षा के परिदृश्य से गायब होती जा रही है। देश में अभी की स्थिति में सत्तर प्रतिशत उच्च शिक्षण संस्थाएं निजी है।
नामी संस्थाओं जैसे आई.आई. टी., आई.आई.एम., आई.आई.एस.सी. जैसी संस्थाएं बहुत अच्छी हैं लेकिन बहुत कम हैं। इतने बड़े देश में ऐसी उत्कृष्ट संस्थाओं की संख्या नगण्य है। हम भले ऐसे चुनिन्दा संस्थाओं पर छाती ठोंक लें लेकिन बड़ी आबादी के लिए सरकारी विश्वविद्यालय और कॉलेजों की बहुत कमी है ।
अमेरिका लंबे समय से भारत के हस्तकला उद्योग का बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप के नए टैरिफ दर लागू होने के बाद से इस उद्योग पर संकट मंडरा रहा है. ऐसे में ग्रामीण कश्मीर के कारीगर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं.
डॉयचे वैले पर रिफत फरीद का लिखा-
65 वर्षीय अख्तर मीर भारत प्रशासित कश्मीर के हवल में मिट्टी और ईंटों से बने एक पुराने तीन-मंजिला घर में अपने पेपर-मैशे कारीगरों का नेतृत्व करते हैं. कारीगर फर्श पर पालथी मारकर बैठे हैं और वह फूलों और पक्षियों के रंग-बिरंगे डिजाइनों से फूलदान, हाथी और सजावटी डिब्बियां बना रहे हैं. उनके हाथ पूरी तरह रंगों से सने हुए है. इन रंगों की महक वर्कशॉप में जगह-जगह फैली हुई है.
पिछली तीन पीढ़ियों से मीर का परिवार इस नफीस कला को सिखाता और इसके प्रति जुनून को आगे बढ़ाता रहा है. आज, यह वर्कशॉप ना सिर्फ मीर की पारिवारिक विरासत है, बल्कि दर्जनों स्थानीय कारीगरों के लिए उनके परिवार पालने का सहारा भी है.
हर साल मीर और उनकी टीम अमेरिका और यूरोप भेजे जाने वाले क्रिसमस के लिए खास पेपर मैशे उत्पाद तैयार करती है. डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के भारत पर नए टैरिफ लगाए जाने के बाद इस बार त्योहारों का मौसम अलग हो सकता है.
मीर ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम नए टैरिफ को लेकर चिंता में हैं. अभी तक हमें क्रिसमस के लिए ऑर्डर नहीं मिले हैं.” उन्होंने कहा, "अगर हमें ऑर्डर नहीं मिले तो मेरे कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा.” हालांकि, चिंता की वजह सिर्फ ट्रंप के टैरिफ ही नहीं हैं. कश्मीरी कारीगर अपने बहुत से सामान सैलानियों को भी बेचते हैं. अप्रैल में पहलगाम हमले के बाद इस साल पर्यटकों की संख्या में भी भारी गिरावट आई है.
‘अब यह काम हमें खुशी नहीं देता'
शानदार कश्मीरी कालीन बुनने वाले लोग भी इस बात से चिंतित हैं कि कहीं अमीर अमेरिकी खरीदारों के नाम होने से उनका व्यापार ना खत्म हो जाए. उत्तर कश्मीर के कुंजर गांव के कालीन बुनकर अब्दुल मजीद ने कहा, "अब यह काम हमें खुशी नहीं देता, इसमें बस तनाव और अनिश्चितता है.”
अमेरिकी टैरिफ के आगे नहीं झुकेगा भारत
कई सालों से अमेरिका में कपड़े, कालीन और हस्तशिल्प की मांग ने कश्मीर के हस्तशिल्प उद्योग को काफी मजबूती दी है. रूस के तेल को लेकर वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच हुए विवाद के चलते अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर50 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया है.
इसके बाद विदेशी खरीदार, जो पहले से ही कश्मीरी हस्तशिल्प के लिए ऊंची कीमतें चुका रहे थे. उनके लिए अब नए टैरिफ लगने के बाद दाम और भी बढ़ गए हैं, जिससे मांग कम होने की आशंका है. इसकी वजह से हजारों कारीगरों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ सकती है.
हस्तशिल्प में इटली बन सकता है भारत का प्रतिद्वंद्वी
कश्मीर चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (केसीसीआई) ने अमेरिकी टैरिफ को हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए "विनाशकारी” करार दिया है.
केसीसीआई के अध्यक्ष जावेद अहमद टेंगा ने कहा, "हम मानते हैं कि सरकार इस पर काम कर रही है और निर्यातकों को प्रोत्साहन देकर व्यापार को काफी हद तक संतुलित कर सकती है.”
कश्मीर के हस्तशिल्प एवं हथकरघा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने डीडब्ल्यू को बताया कि कश्मीर से सामान खरीदने के बजाय अमेरिकी ग्राहक इटली जैसे देशों का रुख कर सकते हैं, जहां अमेरिकी टैरिफ केवल 15 फीसदी तक ही सीमित है.
अधिकारी ने कहा, "इसका मतलब साफ है कि कश्मीर का हस्तशिल्प बाजार से बाहर धकेला जा रहा है. कई अमेरिकी ग्राहकों ने पहले ही अपने ऑर्डर रोक दिए हैं, जिससे हमारे करघे और कारीगरों को काम में लगाना मुश्किल हो रहा है. इसका नतीजा बेरोजगारी हो सकता है.”
अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत खरीद रहा है रूस से सस्ता तेल
लगभग चार लाख कारीगरों के नाम राज्य सरकार के पास दर्ज हैं. एक अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, अगर उनके काम में कोई बड़ी बाधा आती है तो यह ना केवल रोजगार का नुकसान होगा, बल्कि इससे पारंपरिक कौशल भी खत्म हो सकता है.
अधिकारी ने कहा, "जब कोई कारीगर किसी और पेशे की ओर चला जाता है, तो हम ना सिर्फ मौजूदा कामगारों को खो देते हैं बल्कि भविष्य में इतनी उच्च-गुणवत्ता वाले सामान बनाने की क्षमता को भी गंवा बैठते हैं.”
अमेरिकी खरीदारों की पहुंच से बाहर हुए लग्जरी सामान
भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ के तनाव से पहले, निर्यात किए जाने वाले सामान पर सिर्फ 8 से 12 फीसदी आयात शुल्क लगता था. उस समय अमेरिकी खरीदार हर साल करीब 1.2 अरब डॉलर खर्च कर भारत के लगभग 60 फीसदी हस्तशिल्प उत्पाद खरीदते थे.
कश्मीरी हस्तशिल्प निर्यातक, मुजतबा कादरी ने बताया कि ट्रंप के टैरिफ ने इस क्षेत्र के हस्तशिल्प उद्योग को गहरी चोट पहुंचाई है. कादरी के अनुसार, लग्जरी सामान बढ़ती कीमतों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि खरीदार ऐसे सामान की खरीद को टाल देते हैं या कई बार तो बिल्कुल छोड़ ही देते हैं.
उन्होंने कहा, "50 फीसदी टैरिफ बढ़ने के बाद कश्मीर से अमेरिका जाने वाला हर सामान जैसे कि शॉल, कालीन, पेपर मैशे, लग्जरी और गैर-जरूरी श्रेणी में आ गया है.” मी एंड के नाम की कश्मीरी ऊन की बुनाई और निर्यात करने वाली कंपनी चलाने वाले कादरी ने बताया, "हमारी कंपनी के 80 फीसदी निर्यात अमेरिका जाते हैं. इसलिए इसका असर बहुत बड़ा होगा. जैसे एक शॉल जिसकी कीमत पहले 300 डॉलर थी. वह अब 450 डॉलर में बिकेगी. जो कि एक बड़ा उछाल है. जिसका नतीजा यह हो सकता है कि ज्यादातर लोग अपने ऑर्डर रद्द कर देंगे.”
कारोबार पर अनिश्चितता का साया
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नए टैरिफ के कारण भारत का निर्यात आधा हो सकता है. जिससे लगभग पांच से सात लाख कारीगरों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं. कश्मीर की राजधानी, श्रीनगर के बाहरी इलाके जोनिमर में रहने वाली शॉल बुनकर अफरोजा जान भी इस दबाव को महसूस कर रही हैं.
अपने घर के करघे पर दिनभर काम करने वाली 39 वर्षीय अफरोजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह बहुत मेहनत और मशक्कत का काम है. काम करते-करते मेरी आंखों में दर्द होता है, पीठ में भी तकलीफ होती है. लेकिन यह हमारा एकमात्र रोजगार है.”उन्होंने बताया , "हमारे डीलर ने भी कुछ ऑर्डर रद्द कर दिए हैं, यह कहकर कि बाजार में अनिश्चितता है.”
अफरोजा के पति और देवरानी भी लग्जरी शॉल बुनते हैं, जिन्हें बनाने में महीनों से लेकर सालों का समय भी लग जाता है. बड़े ऑर्डरों को पूरा करने के लिए उनके परिवार के दस से ज्यादा लोग मिलकर काम करते हैं. उन्होंने कहा, "अगर हम अपना काम खो देंगे तो इससे पूरा परिवार प्रभावित होगा.”
-अशोक पांडेय
हफ़्ते-दस दिन से पहाड़ों की सडकों पर यात्रा कर रहा हूँ। बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा, कम से कम दो-ढाई सौ जगहों पर पहाड़ों से मलबा टूट कर गिरा-बिखरा देखा।
चार जगह राजमार्ग बंद मिले, वापस लौट कर संकरे-अधपक्के-कच्चे रास्तों का सहारा लेना पड़ा - पहाड़ी गाँवों की जीवनरेखा माने जाने वाले इन रास्तों की दुर्दशा देखी।
अल्मोड़ा से हल्द्वानी जाने वाला रास्ता पिछले दो बरसों से स्थानीय अखबारों की सुखिऱ्यों में है - हर हफ्ते उस पर इतना मलबा आ जाता है कि यातायात बंद करना पड़ता है। बहुत दिक्कत होती है। बरसातों में यह दिक्कत आपदा की सूरत ले लेती है जब अमूमन दो-ढाई घंटे का हल्द्वानी-अल्मोड़ा का सफऱ छ: से दस घंटे तक ले लेता है। शुक्र मनाइए हमारे देश में लोगों के पास खूब समय है वरना पता नहीं जीवन कैसे चलता।
जनता को कम असुविधा हो इसके लिए सरकार ने जगह-जगह जेसीबी और पोकलैंड नाम के दैत्य तैनात किये हुए हैं – मलबा आते ही वे खडख़ड़ाते हुए मौक़े पर पहुँचते हैं और सौ मनुष्यों का काम अकेले करते हुए बड़ी-बड़ी चट्टानों को रास्ते से चुटकियों में हटा कर ट्रैफिक को सुचारु बना देते हैं। अवाक जनता हाथ बांधे उनके इस कारनामे को देखती रहती है – विज्ञान की तरक्की पर मुग्ध होती रहती है। एक जगह का मलबा हटता है तो दो जगह और आ जाता है। इन दैत्यों के लिए रोजगार ही रोजगार है!
यात्रा के दौरान मुझे ऐसी सैकड़ों मशीनें काम करती नजऱ आईं। जब बरसात नहीं होती, मौसम ठीक रहता है तो इन मशीनों को पहाड़ काटने, चट्टानों को भेदने और जवान पेड़ों को नेस्तनाबूद करने के काम में लगा दिया जाता है। सडकों पर पर्याप्त मलबा बिखेर देने के बाद इन मशीनों ने उसे निकटतम नदी-धारे के हवाले कर देना होता है – सारी सडक़ें इतनी चौड़ी की जानी हैं कि उन पर से एक साथ दो-दो टैंक गुजऱ सकें। आज के नीति-निर्धारकों ने पहाड़ों की उन्नति की यही परिभाषा गढ़ दी है।
जिन जगहों पर अब भी पुरानी सडक़ें बची रह गई हैं, उनके किनारों पर काटे गए पहाड़ों की सतह पर मजदूरों के सब्बल-गैंतियों के बनाए मानवीय निशान देखे जा सकते हैं। सडक़ के उन हिस्सों के आसपास मलबा नहीं के बराबर दीखता है। पचास मजदूर जितना पहाड़ एक हफ्ते में काटते थे, एक जेसीबी उतना पहाड़ आधे घंटे में काट देती है। सब्बल-गैंतियों की चोटों से उतना ही पहाड़ टूटता था जितनी ज़रूरत होती थी। इसके बरअक्स जेसीबी का लौह-पंजा जिस बेरहमी से पहाड़ की सतह को उधेड़ता है या पोकलैंड जिस क्रूरता के साथ साबुत चट्टान को तोड़ती है उसका असर कई मीटर आगे तक की चट्टानों पर पड़ता है।
परतदार चट्टानों से बना यह निचला हिमालयी इलाका है जिसमें कुमाऊँ-गढ़वाल की तमाम बस्तियां बसी हैं। एक चट्टान के कांपने का असर कितने किलोमीटर दूर तक जाता होगा, भूवैज्ञानिक बेहतर बता सकेंगे।
साल 2009 में समलैंगिक रिश्तों को अपराध बनाने वाले क़ानून को असंवैधानिक ठहराने का फ़ैसला हो या साल 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान पुलिस से कड़ी पूछताछ का मामला, डॉ. जस्टिस एस. मुरलीधर अपने कई फ़ैसलों से सुर्ख़ियों में रहे हैं.
वे अगस्त 2023 में ओडिशा हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के पद से रिटायर हुए. पिछले महीने उनकी संपादित एक किताब आई है- '(इन) कम्पलीट जस्टिस? सुप्रीम कोर्ट एट 75.' इसमें अलग-अलग पहलुओं पर क़ानून के कई जानकारों के लेख शामिल हैं.
जस्टिस मुरलीधर ने बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में इस किताब और न्यायपालिका से जुड़े कई मुद्दों के बारे में बात की.
बातचीत में न्यायपालिका की आज़ादी, जजों की भारत के गाँव की ज़िंदगी के बारे में समझ और जजों की नियुक्ति में सरकार की दख़लंदाज़ी जैसे मुद्दे प्रमुखता से आए.
'अधूरा न्याय'
हमने जस्टिस एस. मुरलीधर से जानना चाहा कि इस किताब के शीर्षक से ऐसा लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट से अधूरा न्याय मिला है. क्या ऐसा है?
उनका कहना था कि यह एक सवाल है जिसे इस किताब के 24 लेखों में विशेषज्ञ क़रीब से देखते हैं. उनका मानना था कि कोर्ट में हर प्रकार के मामले हैं. ऐसे मामले जिनमें पूरी तरह से न्याय मिला और ऐसे भी मामला जहाँ पूरा न्याय नहीं मिला.
उन्होंने बताया कि इस किताब में ऐसे बहुत सारे केस का विश्लेषण है जिसमें पूरी तरह इंसाफ़ नहीं मिला. वे जोड़ते हैं, "लेकिन जिन मामलों में पूरी तरह इंसाफ़ नहीं मिला, वे बहुत महत्वपूर्ण केस थे."
उन्होंने इसमें साल 1984 की भोपाल गैस त्रासदी, साल 1984 में सिखों के ख़िलाफ़ दंगों का उदाहरण दिया. उनके मुताबिक, "इन मामलों में निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि न्याय नहीं हुआ."
यही नहीं, जस्टिस मुरलीधर के मुताबिक कुछ मामले ऐसे भी थे जिनमें कोर्ट ने बहुत देरी से फ़ैसले दिए. वे इस सिलसिले में नोटबंदी (डिमॉनेटाइजेशन) और चुनावी बांड से जुड़े केस का उदाहरण देते हैं.
हालाँकि, उनके मुताबिक कई मामले ऐसे भी थे जिनमें सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों से लोगों के हक़ का दायरा बढ़ा. वे बताते हैं, "जैसे, साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने के लिए गाइडलाइन बनाई थी. उस वक़्त संसद ने कोई क़ानून नहीं बनाया था."
उन्होंने कहा कि शिक्षा के अधिकार के लिए भी सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से ही पहला क़दम उठाया गया था. उनके मुताबिक इसमें लोगों को मुफ़्त अनाज देने और पर्यावरण से जुड़े मामले भी शामिल हैं.
बाबरी मस्जिद- रामजन्मभूमि केस
किताब के परिचय में जस्टिस मुरलीधर ने अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि केस के साल 2019 में आए फ़ैसले का भी ज़िक्र किया है. उन्होंने लिखा है कि बाबरी मस्जिद की ज़मीन हिंदू पक्ष को देने का फ़ैसला बिना किसी क़ानूनी आधार के था.
जब हमने पूछा कि उनकी यह राय क्यों है तो उन्होंने कहा, "यह तो फ़ैसले में ही साफ़ लिखा है कि उन्होंने आस्था को भी मान्यता दी."
अगर वे जज होते तो इस मामले को कैसे तय करते? इस सवाल पर उनकी राय थी कि इस केस में मध्यस्थता पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए था.
गाँव के लोगों की ज़िंदगी और सुप्रीम कोर्ट के जज
किताब में एक लेख वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ का भी है.
उन्होंने इसमें एक सवाल उठाया है, "क्या सुप्रीम कोर्ट के जजों में भारत के गाँवों में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी की समझ है?" अपने लेख में उन्होंने कुछ केस का हवाला भी दिया है. इससे उन्हें लगता है कि जजों में गाँव में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी की समझ की कमी थी.
जस्टिस मुरलीधर का कहना है कि वे पी. साईनाथ की टिप्पणी से सहमत हैं. उन्होंने कहा, "बहुत सारे जज ऐसे हैं जो कभी भी गाँव में नहीं रहे हैं. इसमें मैं भी शामिल हूँ."
उन्होंने कहा कि ज़्यादातर जज मिडिल क्लास या उसके ऊपर की श्रेणी से आते हैं. कई हाई कोर्ट में तो बतौर जज नियुक्त होने के लिए सालाना आमदनी भी देखी जाती है.
उनका मानना था, "ऐसे में वकीलों की भी ज़िम्मेदारी होती है कि वे गाँव में रहने वाले लोगों का अनुभव भी अदालत के सामने लाएँ." इसके साथ ही जजों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे समझें कि भारत में लोग किन हालात में रहते हैं.
जस्टिस मुरलीधर ने कहा, "मेरी आशा हमेशा यह रहती है कि चीज़ें बेहतर होंगी."
जज किन पृष्ठभूमि से आ रहे हैं
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बहुत कम महिला और पिछड़े वर्ग के जज नियुक्त होते हैं. हमने जस्टिस मुरलीधर से पूछा, ऐसा क्यों? क्या अलग-अलग पृष्ठभूमि से जज नियुक्त होंगे तो फ़ैसले बेहतर नहीं आएँगे?
उनका कहना था, "हाँ, यह तो सही है कि रिप्रेजेंटेशन नहीं है. महिलाओं, पिछड़े वर्ग के लोगों, दलितों का न्यायपालिका में रिप्रजेंटेशन कम है. लेकिन ऐसे में 'टोकेनिज़्म' भी नहीं होना चाहिए." 'टोकेनिज़्म' यानी सिर्फ़ प्रतीक के तौर पर इन वर्गों से जज नियुक्त किए जाएँ.
वह कहते हैं, "हमने कई ऐसे मामले देखे हैं जिसमें महिला जज भी महिलाओं के मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं रहती हैं. रिप्रजेंटेशन ज़रूरी है लेकिन भारत के हर जज को संविधान में दिए गए सिद्धांतों को आत्मसात करना चाहिए."
'कॉलेजियम सिस्टम' पर उठने वाले सवाल
कॉलेजियम सिस्टम' जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया है. इसे सुप्रीम कोर्ट ने बनाया था. इस सिस्टम के तहत सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों को नियुक्त करने के लिए सरकार के पास नाम भेजते हैं.
हाल ही में, भारत के चीफ़ जस्टिस बीआर गवई के भतीजे और उनके चैम्बर के जूनियर वकील का नाम भी हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए भेजा गया है. इसकी आलोचना भी की गई.
हमने उनसे यह भी जानना चाहा कि 'कॉलेजियम' पर सरकार का कितना दबाव रहता है?
इन सब मुद्दों पर जस्टिस मुरलीधर की राय है, "यह धारणाओं की भी बात होती है. अगर मैं चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया हूँ तो मैं अपने कार्यकाल में इन नामों का भेजना टाल सकता हूँ."
'कॉलेजियम सिस्टम' की एक और आलोचना है कि ये प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. जस्टिस मुरलीधर का मानना है कि 'कॉलेजियम सिस्टम' में ज़्यादा पारदर्शिता लाने की ज़रूरत है.
साथ ही वे कहते हैं, "...और ऐसा नहीं है कि जज ही जज को नियुक्त करते हैं. इसमें केंद्र सरकार और (हाई कोर्ट के नामों के लिए) राज्य सरकार की भी भूमिका होती है."
-अशोक पांडेय
राजेश खन्ना की लोकप्रियता के किस्से सुनते बचपन कटा। बताते थे जब वह ‘कटी पतंग’ में लाल स्कार्फ पहनकर पियानो के सामने बैठा ‘प्यार दीवाना होता है’ गाता था तो लड़कियां बेहोश हो जाती थीं। ‘कटी पतंग’ लगी होती तो पिक्चर हॉल के सामने कम से कम दो एम्बुलेंस खड़ी रखे जाने का सरकारी ऑर्डर था। बाज हॉल अपने यहां ग्लूकोज चढ़ाने की व्यवस्था भी रखते थे।
किस्सा यह था कि जब वह एक दफा पीलीभीत आया तो सात लड़कियों ने सिर्फ इस बात पर जहर खा लिया था कि उन्हें उसके प्रोग्राम में जाने की इजाजत नहीं मिली। उसकी वह फोटो ब्लैक में बिका करती थी जिसमें वह दांतों में लाल गुलाब दबाए था। लड़कियाँ उस फोटो को सिरहाने रखकर सपना देखने का सपना देखती थीं।
कस्बाई लड़कियों द्वारा आत्महत्या किये जाने के मामले राजेश खन्ना के साथ देव आनंद के साथ भी जोड़े जाते थे। इसका असर यह हुआ कि अकेला होने पर मैं टेढ़ी चाल चलता ‘गाता रहे मेरा दिल’ किया करता।
जवानी फूटने की शुरुआत हुई तो पता नहीं कहाँ से जीतेन्दर नाम के महात्मा ने जीवन में घुसपैठ कर डाली।
तीस इंची मोहरी वाली सफेद बैलबॉटम के उस युग में इस पुण्यात्मा ने अस्सी के दशक के कई सालों तक देश भर के दर्जियों को कलाकारों में तब्दील करने का बीड़ा उठा लिया था।
कमीज सिलाने के लिए सिर्फ दो मीटर गबरडीन-पोलिएस्टर भर से काम नहीं चलता था। पीली जेब, नीली पट्टी और लाल कॉलर के लिए अलग से कटपीस ले जाने होते थे। किस कमीज में किस जगह कितनी चेनें लगेंगी इस हिदायत को दर्ज करने के लिए दर्जियों ने अलग से नोटबुकें बनाना शुरू किया।
जीतेन्दर के कहने पर ही सरकार ने जूतों के लिए अलग से ब्लूप्रिंट जारी किया।
तीखी नोक वाले सफेद जूतों के सामने पीतल की पट्टी, टखनों तक की चेन और तलुवों में कम से कम सात हॉर्स-शू कीलें लगाना अनिवार्य था ताकि पहनने वाला न सिर्फ गधे का बच्चा दिखाई दे उसकी पदचाप भी उसके वैसा होने की उद्घोषणा करे- खट-टक-खट-टक।
कहाँ तो सोचा था जवानी आते ही लड़कियों को अपनी मोहब्बत के लिए तरसा-तरसाकर आत्महत्या के लिए मजबूर कर दूंगा कहाँ जूते-कमीज के भूसा डिजायनों के अनुसंधान में आधी जवानी लपक गई।
-नीलम पांडेय
राजस्थान का अनैतिक धर्मांतरण निषेध विधेयक, 2025 में सख्त प्रावधान और कड़ी सजाएं शामिल हैं। इसमें जबरन और धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर आजीवन कारावास और बुलडोजर कार्रवाई जैसे कदम रखे गए हैं।
मंगलवार को राजस्थान विधानसभा में पारित इस विधेयक में कहा गया है कि पूर्वजों के धर्म में वापसी को धर्मांतरण की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है।
इसमें कहा गया है, ‘यदि कोई व्यक्ति मूल धर्म यानी पूर्वजों के धर्म में लौटता है, तो इसे इस अधिनियम के तहत धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। स्पष्टीकरण।- इस उपधारा के उद्देश्य से मूल धर्म यानी पूर्वजों का धर्म वह है, जिसमें उस व्यक्ति के पूर्वजों का विश्वास था, या वे स्वेच्छा और स्वतंत्र रूप से उसका पालन करते थे।’
विधेयक में लिखा है कि केवल ‘अनैतिक धर्मांतरण या इसके विपरीत’ के लिए की गई शादी को शून्य और अमान्य घोषित किया जाएगा। इसमें यह भी जोड़ा गया कि सबूत का भार आरोपी पर होगा।
‘धार्मिक धर्मांतरण गलत पहचान, गलत जानकारी, दबाव, डर, अनुचित प्रभाव, प्रचार, उकसावे, लालच, ऑनलाइन माध्यम या धोखाधड़ी, विवाह या विवाह के बहाने से नहीं किया गया है, यह साबित करने की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति पर होगी जिसने धर्मांतरण कराया है या उसके मददगार पर होगी,’ इसमें कहा गया है।
विधेयक डिजिटल माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण के प्रयासों का भी जिक्र करता है। इसमें कहा गया है, ‘एक धर्म से दूसरे धर्म में गलत पहचान, गलत जानकारी, दबाव, डर, अनुचित प्रभाव, लालच, ऑनलाइन माध्यम या धोखाधड़ी, विवाह या विवाह के बहाने से किए गए अनैतिक धर्मांतरण पर रोक लगाने और उससे जुड़े मामलों के लिए यह प्रावधान है।’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगी संगठन, जिनमें विश्व हिंदू परिषद (ङ्क॥क्क) शामिल है, राजस्थान में धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ के मामलों को लगातार उठाते रहे हैं। जुलाई में, वीएचपी के केंद्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा से मुलाकात कर ‘धर्मांतरण विरोधी कानून’ की मांग की थी।
विधेयक के पारित होने के साथ, राजस्थान अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे राज्यों की सूची में शामिल हो गया है, जहां पहले से ही धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। विपक्षी कांग्रेस इस विधेयक की आलोचना करती रही है और उसने राजस्थान विधानसभा में बहस में भाग नहीं लिया।
नया विधेयक पिछले विधेयक की तुलना में ज्यादा सख्त सजाएं देता है। पिछला विधेयक पिछले सत्र में पेश किया गया था लेकिन इस साल की शुरुआत में वापस ले लिया गया था।
उदाहरण के तौर पर, पूर्वजों के धर्म में वापसी को पिछले विधेयक का हिस्सा नहीं बनाया गया था। साथ ही, मंगलवार को पारित विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि धर्मांतरण से जुड़ी कोई भी जानकारी या शिकायत अब ‘कोई भी व्यक्ति’ दर्ज करा सकता है। पहले यह केवल पीडि़त व्यक्ति या उसके रिश्तेदार ही कर सकते थे।
इसी तरह, अगर कोई व्यक्ति किसी विदेशी या गैर-कानूनी संस्था से अनैतिक धर्मांतरण से जुड़े मामले में पैसे लेता है, तो उसे 10 साल से कम नहीं और 20 साल तक की कठोर सजा दी जा सकती है और 20 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
‘राजस्थान विधानसभा ने आज राज्य में धर्मांतरण की घटनाओं को खत्म करने के लिए एक सख्त कानून देने का काम किया है,’ गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेधम ने मीडिया से कहा।
कड़ी सजाएं
जबरन धर्मांतरण के लिए सजा और कड़ी की गई है, जिसमें कुछ मामलों में आजीवन कारावास भी शामिल है। विधेयक के अनुसार, धर्मांतरण में शामिल संस्थानों की इमारतों पर बुलडोजर कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, यह केवल उन संपत्तियों पर लागू होगा, जो सामूहिक धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल की गई हों या अतिक्रमण में दोषी पाई जाएं।
-ध्रुव गुप्त
हजारों सालों से ईश्वर की हमारी तलाश चल रही है। एक ऐसा ईश्वर जिसे किसी ने नहीं देखा। लेकिन माना जाता है कि यह ब्रह्मांड उसी की रचना है और हम सबके जीवन, मृत्यु और भाग्य पर उसका नियंत्रण है। धर्म और अध्यात्म दृष्टि में संसार का अतिक्रमण ही उसे पाने का रास्ता है। यह संसार मिथ्या है, अंधकार है जिसमें जाने कितनी योनियों से हम भटक रहे हैं। इस मिथ्या संसार में आवागमन से मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण ही जीवन का लक्ष्य है। यह जीवन के अस्वीकार का दर्शन है। इस संसार का अतिक्रमण कर यदि आप किसी मोक्ष या ईश्वर की तलाश में हैं तो यह आत्मरति के सिवा कुछ नहीं। तमाम मोह, इच्छाओं और गति से परे यदि कोई मोक्ष है तो वह शून्य की ही स्थिति हो सकती है। ऐसा शून्य जीवन की ऊर्जा के नष्ट होने से ही संभव है। ऊर्जा चाहे जीवन की हो या पदार्थ की, कभी नष्ट होती नहीं। उसका रूपांतरण होता चलता है। ईश्वर कहे जाने वाले विराट ब्रह्मांडीय ऊर्जा के हम अंश हैं। बहुत छोटी- छोटी ऊर्जाएं जो रूप बदल-बदलकर इसी प्रकृति में ही बनी रहेंगी। अगला कोई जीवन इस रूप में शायद न मिले लेकिन किसी न किसी रूप में हमें यहीं मिलेगा।
-ललित गर्ग
दुनिया में आत्महत्या आज एक गहरी एवं विडम्बनापूर्ण वैश्विक चुनौती बन चुकी है। हर साल लाखों लोग अपनी ही जिंदगी से हार मान लेते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल लगभग 7.2 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। यह सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक संकट भी है। 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है। यही वजह है कि हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। 2024 से 2026 तक इसकी थीम ‘चेंजिंग द नैरेटिव ऑन सुसाइड’ रखी गई है, जिसका उद्देश्य है आत्महत्या पर खामोशी तोडक़र इसे एक निष्क्रिय विषय से संवाद और सहयोग का सक्रिय विषय बनाना। आत्महत्या पर दृष्टिकोण का यह बदलाव आत्महत्या के बारे में लोगों की सोच और बातचीत के तरीके को चुनौती देता है, खुले और ईमानदार संवाद को बढ़ावा देता है जो कलंक को तोड़ता है और समझ को बढ़ावा देता है। आत्महत्या के अलावा जीवन में और भी बेहतर विकल्प हैं। इसके अलावा एक ऐसी समाज-व्यवस्था को बढ़ावा देना है जहां लोग मदद लेने में हिचहिचाए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोग के लिये आगे आये। निश्चित रूप से खुदकुशी सबसे तकलीफदेह हालात के सामने हार जाने का नतीजा होती है और ऐसा फैसला करने वालों के भीतर वंचना का अहसास, उससे उपजे तनाव, दबाव और दुख का अंदाजा लगा पाना दूसरों के लिए मुमकिन नहीं है। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है।
आत्महत्या जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है, यह मनुष्य होने के अर्थ और गरिमा को धूमिल करती है। जब जीवन जीने का साहस कमज़ोर पड़ता है तो व्यक्ति निराशा और अंधकार में डूबकर स्वयं को समाप्त करने की ओर बढ़ता है। वैश्विक स्तर पर यह एक गंभीर समस्या है, दुनिया भर से आते नए आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता को और उजागर करते हैं। 2021 में अनुमानित 7.27 लाख आत्महत्याएं हुईं और विश्व में हर 43 सेकेंड में कोई एक व्यक्ति खुदकुशी कर रहा है। 73 प्रतिशत आत्महत्याएं निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में होती हैं और सबसे अधिक असर युवा और गृहिणियों पर पड़ता है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या करने वाली महिलाओं में 51.5 प्रतिशत गृहिणियां थीं। आत्महत्या की दर दो दशकों में 7.9 से बढक़र 10.3 प्रति एक लाख हो गई है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में पारिवारिक कलह आत्महत्या का बड़ा कारण है। युवा वर्ग की महत्वाकांक्षा क्षमता से अधिक हो चुकी है, पारिवारिक सामंजस्य खत्म हो गया है, असफलता का डर और तनाव सहने की क्षमता कम हो गई है। यही कारण है कि पढ़ाई के दबाव, नौकरी में असफलता, रिश्तों के टूटने और आर्थिक अभाव से युवा और किशोर आत्महत्या की ओर धकेले जा रहे हैं।
भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी ) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में भारत में 1,70,924 आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है और आत्महत्या दर 12.4 प्रति लाख जनसंख्या रही। यह दर पिछले वर्षों की तुलना में सर्वाधिक है। इनमें 18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों की संख्या दो-तिहाई से अधिक है, जो दर्शाता है कि देश का युवा और कार्यशील वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है। राज्यवार आंकड़े भी चिंताजनक हैं-सिक्किम में आत्महत्या दर लगभग 43 प्रति लाख रही जबकि बिहार में यह 1 से भी कम है। आत्महत्या के पीछे अनेक सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कारण जुड़े हुए हैं। बेरोजग़ारी, गरीबी, पारिवारिक कलह, असफल प्रेम, नशे की लत और बीमारियां इसका बड़ा कारण बन रही हैं। मानसिक रोग और अवसाद ने इस समस्या को और गहरा किया है। एनसीआरबी के अनुसार 2018 से 2022 के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कारणों से आत्महत्या के मामलों में 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2022 के आँकड़े बताते हैं कि आत्महत्या के प्रमुख कारणों में 33 प्रतिशत मामले पारिवारिक समस्याओं से जुड़े थे, लगभग 19 प्रतिशत मामले बीमारियों के कारण हुए, जबकि 6-7 प्रतिशत मामले विवाह सम्बन्धी समस्याओं और 6 प्रतिशत मामले ऋण और कजऱ् से संबंधित थे। छात्र आत्महत्या का आंकड़ा भी बड़ा चिंताजनक है-2022 में यह कुल आत्महत्याओं का 7.6 प्रतिशत रहा। वैश्विक स्तर पर भी स्थिति गंभीर है, परंतु भारत में यह और ज्यादा जटिल इसलिए है क्योंकि यहां सामाजिक प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावादी जीवनशैली, परिवार का टूटता हुआ ढांचा और आर्थिक असमानता आत्महत्या की प्रवृत्ति को तेज़ कर रही है। आत्महत्या केवल एक जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह एक पूरे परिवार और समाज की आशाओं का विघटन है।
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं बल्कि समाज और सरकार दोनों को संयुक्त रूप से कार्य करना होगा। भारत सरकार ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम पारित करके आत्महत्या प्रयास को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और 2020 में ‘किरण’ नामक राष्ट्रीय हेल्पलाइन शुरू की जो 13 भाषाओं में चौबीसों घंटे सहायता उपलब्ध कराती है। 2022 में राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति बनाई गई जिसका लक्ष्य 2030 तक आत्महत्या दर में 10 प्रतिशत की कमी लाना है। इसमें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, परामर्श केंद्रों की स्थापना, रोजगार सृजन, परिवारिक संवाद को मजबूत करना, मीडिया की संवेदनशीलता और सामाजिक सहयोग जैसे उपायों पर जोर दिया गया है। साथ ही स्वयंसेवी संस्थाओं और हेल्पलाइन सेवाओं-जैसे आसरा, वंद्रेवाला, समैरिटन्स मुंबई-की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। आत्महत्या को रोकने का सबसे बड़ा उपाय यही है कि व्यक्ति को निराशा के अंधकार में छोडऩे के बजाय उसके जीवन में आशा, साहस और सहयोग का संचार किया जाए क्योंकि कठिनाइयों का समाधान आत्महत्या में नहीं बल्कि संघर्ष, विश्वास और सहारा देने वाले समाज में है।
अमेरिका लंबे समय से भारत के हस्तकला उद्योग का बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप के नए टैरिफ दर लागू होने के बाद से इस उद्योग पर संकट मंडरा रहा है. ऐसे में ग्रामीण कश्मीर के कारीगर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं.
डॉयचे वैले पर रिफत फरीद का लिखा-
65 वर्षीय अख्तर मीर भारत प्रशासित कश्मीर के हवल में मिट्टी और ईंटों से बने एक पुराने तीन-मंजिला घर में अपने पेपर-मैशे कारीगरों का नेतृत्व करते हैं. कारीगर फर्श पर पालथी मारकर बैठे हैं और वह फूलों और पक्षियों के रंग-बिरंगे डिजाइनों से फूलदान, हाथी और सजावटी डिब्बियां बना रहे हैं. उनके हाथ पूरी तरह रंगों से सने हुए है. इन रंगों की महक वर्कशॉप में जगह-जगह फैली हुई है.
पिछली तीन पीढ़ियों से मीर का परिवार इस नफीस कला को सिखाता और इसके प्रति जुनून को आगे बढ़ाता रहा है. आज, यह वर्कशॉप ना सिर्फ मीर की पारिवारिक विरासत है, बल्कि दर्जनों स्थानीय कारीगरों के लिए उनके परिवार पालने का सहारा भी है.
हर साल मीर और उनकी टीम अमेरिका और यूरोप भेजे जाने वाले क्रिसमस के लिए खास पेपर मैशे उत्पाद तैयार करती है. डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के भारत पर नए टैरिफ लगाए जाने के बाद इस बार त्योहारों का मौसम अलग हो सकता है.
मीर ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम नए टैरिफ को लेकर चिंता में हैं. अभी तक हमें क्रिसमस के लिए ऑर्डर नहीं मिले हैं.” उन्होंने कहा, "अगर हमें ऑर्डर नहीं मिले तो मेरे कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा.” हालांकि, चिंता की वजह सिर्फ ट्रंप के टैरिफ ही नहीं हैं. कश्मीरी कारीगर अपने बहुत से सामान सैलानियों को भी बेचते हैं. अप्रैल में पहलगाम हमले के बाद इस साल पर्यटकों की संख्या में भी भारी गिरावट आई है.
‘अब यह काम हमें खुशी नहीं देता'
शानदार कश्मीरी कालीन बुनने वाले लोग भी इस बात से चिंतित हैं कि कहीं अमीर अमेरिकी खरीदारों के नाम होने से उनका व्यापार ना खत्म हो जाए. उत्तर कश्मीर के कुंजर गांव के कालीन बुनकर अब्दुल मजीद ने कहा, "अब यह काम हमें खुशी नहीं देता, इसमें बस तनाव और अनिश्चितता है.”
अमेरिकी टैरिफ के आगे नहीं झुकेगा भारत
कई सालों से अमेरिका में कपड़े, कालीन और हस्तशिल्प की मांग ने कश्मीर के हस्तशिल्प उद्योग को काफी मजबूती दी है. रूस के तेल को लेकर वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच हुए विवाद के चलते अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर50 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया है.
इसके बाद विदेशी खरीदार, जो पहले से ही कश्मीरी हस्तशिल्प के लिए ऊंची कीमतें चुका रहे थे. उनके लिए अब नए टैरिफ लगने के बाद दाम और भी बढ़ गए हैं, जिससे मांग कम होने की आशंका है. इसकी वजह से हजारों कारीगरों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ सकती है.
हस्तशिल्प में इटली बन सकता है भारत का प्रतिद्वंद्वी
कश्मीर चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (केसीसीआई) ने अमेरिकी टैरिफ को हस्तशिल्प क्षेत्र के लिए "विनाशकारी” करार दिया है.
केसीसीआई के अध्यक्ष जावेद अहमद टेंगा ने कहा, "हम मानते हैं कि सरकार इस पर काम कर रही है और निर्यातकों को प्रोत्साहन देकर व्यापार को काफी हद तक संतुलित कर सकती है.”
कश्मीर के हस्तशिल्प एवं हथकरघा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने डीडब्ल्यू को बताया कि कश्मीर से सामान खरीदने के बजाय अमेरिकी ग्राहक इटली जैसे देशों का रुख कर सकते हैं, जहां अमेरिकी टैरिफ केवल 15 फीसदी तक ही सीमित है.
अधिकारी ने कहा, "इसका मतलब साफ है कि कश्मीर का हस्तशिल्प बाजार से बाहर धकेला जा रहा है. कई अमेरिकी ग्राहकों ने पहले ही अपने ऑर्डर रोक दिए हैं, जिससे हमारे करघे और कारीगरों को काम में लगाना मुश्किल हो रहा है. इसका नतीजा बेरोजगारी हो सकता है.”
अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत खरीद रहा है रूस से सस्ता तेल
लगभग चार लाख कारीगरों के नाम राज्य सरकार के पास दर्ज हैं. एक अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, अगर उनके काम में कोई बड़ी बाधा आती है तो यह ना केवल रोजगार का नुकसान होगा, बल्कि इससे पारंपरिक कौशल भी खत्म हो सकता है.
अधिकारी ने कहा, "जब कोई कारीगर किसी और पेशे की ओर चला जाता है, तो हम ना सिर्फ मौजूदा कामगारों को खो देते हैं बल्कि भविष्य में इतनी उच्च-गुणवत्ता वाले सामान बनाने की क्षमता को भी गंवा बैठते हैं.”
अमेरिकी खरीदारों की पहुंच से बाहर हुए लग्जरी सामान
भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ के तनाव से पहले, निर्यात किए जाने वाले सामान पर सिर्फ 8 से 12 फीसदी आयात शुल्क लगता था. उस समय अमेरिकी खरीदार हर साल करीब 1.2 अरब डॉलर खर्च कर भारत के लगभग 60 फीसदी हस्तशिल्प उत्पाद खरीदते थे.
कश्मीरी हस्तशिल्प निर्यातक, मुजतबा कादरी ने बताया कि ट्रंप के टैरिफ ने इस क्षेत्र के हस्तशिल्प उद्योग को गहरी चोट पहुंचाई है. कादरी के अनुसार, लग्जरी सामान बढ़ती कीमतों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि खरीदार ऐसे सामान की खरीद को टाल देते हैं या कई बार तो बिल्कुल छोड़ ही देते हैं.
उन्होंने कहा, "50 फीसदी टैरिफ बढ़ने के बाद कश्मीर से अमेरिका जाने वाला हर सामान जैसे कि शॉल, कालीन, पेपर मैशे, लग्जरी और गैर-जरूरी श्रेणी में आ गया है.” मी एंड के नाम की कश्मीरी ऊन की बुनाई और निर्यात करने वाली कंपनी चलाने वाले कादरी ने बताया, "हमारी कंपनी के 80 फीसदी निर्यात अमेरिका जाते हैं. इसलिए इसका असर बहुत बड़ा होगा. जैसे एक शॉल जिसकी कीमत पहले 300 डॉलर थी. वह अब 450 डॉलर में बिकेगी. जो कि एक बड़ा उछाल है. जिसका नतीजा यह हो सकता है कि ज्यादातर लोग अपने ऑर्डर रद्द कर देंगे.”
कारोबार पर अनिश्चितता का साया
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नए टैरिफ के कारण भारत का निर्यात आधा हो सकता है. जिससे लगभग पांच से सात लाख कारीगरों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं. कश्मीर की राजधानी, श्रीनगर के बाहरी इलाके जोनिमर में रहने वाली शॉल बुनकर अफरोजा जान भी इस दबाव को महसूस कर रही हैं.
अपने घर के करघे पर दिनभर काम करने वाली 39 वर्षीय अफरोजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह बहुत मेहनत और मशक्कत का काम है. काम करते-करते मेरी आंखों में दर्द होता है, पीठ में भी तकलीफ होती है. लेकिन यह हमारा एकमात्र रोजगार है.”उन्होंने बताया , "हमारे डीलर ने भी कुछ ऑर्डर रद्द कर दिए हैं, यह कहकर कि बाजार में अनिश्चितता है.”
अफरोजा के पति और देवरानी भी लग्जरी शॉल बुनते हैं, जिन्हें बनाने में महीनों से लेकर सालों का समय भी लग जाता है. बड़े ऑर्डरों को पूरा करने के लिए उनके परिवार के दस से ज्यादा लोग मिलकर काम करते हैं. उन्होंने कहा, "अगर हम अपना काम खो देंगे तो इससे पूरा परिवार प्रभावित होगा.”
नेपाल सरकार ने कहा है कि वे फेसबुक, एक्स और यूट्यूब समेत ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को अपने देश में ब्लॉक कर रहे हैं. नियमों के तहत रजिस्ट्रेशन ना करवाने की वजह से इन ऐप्स पर यह कार्रवाई की जा रही है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
नेपाल सरकार ने गुरुवार, 4 सितंबर को कहा कि फेसबुक और यूट्यूब समेत ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक किया जाएगा. सरकार का कहना है कि यह कंपनियां उन नियमों का पालन करने में विफल रही हैं, जिनके तहत उन्हें सरकार के पास अपना रजिस्ट्रेशन करवाना था. इनमें एक्स और लिंक्डइन जैसी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां भी शामिल हैं.
नेपाल के संचार एवं सूचना मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुड ने कहा कि करीब दो दर्जन सोशल नेटवर्क प्लेटफॉर्म, जो नेपाल में काफी इस्तेमाल किए जाते हैं, उन्हें नोटिस दिया गया था कि वे आगे आएं और अपनी कंपनियों को नेपाल में आधिकारिक तौर पर रजिस्टर करें. इसके लिए कंपनियों को बुधवार, 3 सितंबर तक का समय दिया गया था.
न्यूज एजेंसी एपी के मुताबिक, टिकटॉक और वाइबर समेत केवल पांच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को ही नेपाल में चलते रहने की अनुमति दी गई है क्योंकि इन कंपनियों ने सरकार के पास अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया था. इनके अलावा, दो अन्य कंपनियों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया जारी है. वहीं, कुल 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सरकार की कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं.
सरकार के फैसले का विरोध कर रही जनता
नेपाल सरकार चाहती है कि ये कंपनियां देश में अपना एक स्थानीय संपर्क, शिकायतों का समाधान करने वाला अधिकारी और नियमों के पालन के लिए जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करें. इसके लिए सरकार संसद में एक बिल भी लेकर आई है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को ठीक ढंग से प्रबंधित किया जाए और वे जिम्मेदार और जवाबदेह रहें.
इस बिल पर अभी संसद में पूरी चर्चा नहीं हुई है. इस बिल की यह कहते हुए आलोचना की जा रही है कि यह सेंसरशिप का औजार है और ऑनलाइन विरोध जताने वालों को सजा देता है. अधिकार समूहों ने इसे सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का प्रयास बताया है. आम लोग भी इस बिल का विरोध कर रहे हैं.
वहीं, नेपाली अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया की निगरानी के लिए कानून लाना जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इसके यूजर और प्लेटफॉर्म, दोनों इस बात के लिए जिम्मेदार और जवाबदेह रहें कि क्या शेयर किया जा रहा है, क्या पब्लिश हो जा रहा है और क्या कहा जा रहा है.
डिजिटल राइट्स नेपाल के अध्यक्ष भोलानाथ कहते हैं कि प्लेटफॉर्मों को अचानक से बंद करना, सरकार के "नियंत्रणकारी” रवैये को दिखाता है और "जनता के मौलिक अधिकारों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है.” उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया को विनियमित करना गलत नहीं है लेकिन पहले हमें इसे लागू करने के लिए कानूनी ढांचा तैयार करना होगा.
क्या हैं भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के नियम
नेपाल के पड़ोसी देश भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही सूचना प्रौद्योगिक नियम, 2021 के जरिए तय की जाती है. इसमें 11 तरह के कंटेंट को गैर-कानूनी बताया गया है और सोशल मीडिया कंपनियों के लिए ऐसे कंटेंट को अपने प्लेटफॉर्म से हटाना कानूनी तौर पर जरूरी होता है. ऐसा ना करने पर कंपनियों को आईटी एक्ट के अनुच्छेद 79(1) के तहत दी गई छूट वापस ली जा सकती है और उन्हें गैर-कानूनी कंटेंट के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.
भारत के आईटी रूल्स के अनुसार, अश्लील, पॉर्नोग्राफिक, बाल यौन शोषण से संबंधित और दूसरों की शारीरिक निजता का उल्लंघन करने वाले कंटेंट को सोशल मीडिया पर प्रतिबंधित किया गया है. सोशल मीडिया पर गलत सूचना साझा करने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है. साथ ही एआई की मदद से बनाए गए डीपफेक्स को भी बैन किया गया है.
किस नियम को लेकर होता है टकराव
आईटी रूल्स के तहत, भारत सरकार के पास यह अधिकार है कि वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को नियमों का उल्लंघन करने वाले कंटेंट को हटाने या भारत में उसे ब्लॉक करने के लिए कह सकती है और कंपनियों को इन आदेशों का पालन करना होता है. आईटी एक्ट के तहत, सरकार देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी कंटेंट को ब्लॉक करने का निर्देश दे सकती है.
भारत के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसके लिए सहयोग पोर्टल बनाया गया है, जिसके माध्यम से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को कंटेंट हटाने के लिए नोटिस भेजे जाते हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स कर्नाटक हाईकोर्ट में इस पोर्टल के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा है. एक्स का कहना है कि मोदी सरकार कंटेंट हटाने के नोटिस देने में नियमों का ठीक ढंग से पालन नहीं कर रही है और आईटी कानूनों का दुरुपयोग कर रही है. अभी इस मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है.
भारत में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाले एनजीओ ‘एजुकेट गर्ल्स’को 2025 का रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिला है। यह पहला भारतीय संगठन है, जिसे यह प्रतिष्ठित अवॉर्ड मिला है। साल 2007 में सफीना हुसैन ने इसकी शुरुआत की थी।
डॉयचे वैले पर आदर्श कुमार का लिखा-
भारतीय एनजीओ 'एजुकेट गर्ल्स' की स्थापना करने वालीं सफीना हुसैन का बचपन विषम परिस्थितियों में बीता। उन्हें गरीबी, हिंसा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। एक समय पर उन्हें अपना स्कूल भी छोडऩा पड़ा। उनके घरवाले कम उम्र में ही उनकी शादी करना चाहते थे, लेकिन इस कठिन समय में एक रिश्तेदार ने उनकी मदद की, जिसके चलते वो अपनी पढ़ाई पूरी कर पाईं। सफीना हुसैन ने मार्च 2024 में द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में यह जानकारी साझा की थी।
सफीना हुसैन ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और उसके बाद सैन फ्रांसिस्को में काम किया। साल 2007 में वे भारत लौटीं और गैर-लाभकारी संगठन ‘एजुकेट गर्ल्स' की स्थापना की। द हिंदू की खबर के मुताबिक, यह एनजीओ ग्रामीण और शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाकों में पांच से 14 साल की उम्र की लड़कियों की पहचान करता है और उन्हें स्कूलों में भर्ती करवाता है।
लड़कियों की शिक्षा में योगदान के लिए मिला अवॉर्ड
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फाउंडेशन ने अपने बयान में लिखा है कि ‘एजुकेट गर्ल्स' संगठन को ‘शिक्षा के माध्यम से लड़कियों और युवतियों की सांस्कृतिक रूढि़वादिता को दूर करने, उन्हें निरक्षरता के बंधन से मुक्त करने और उन्हें अपनी पूर्ण मानवीय क्षमता प्राप्त करने के लिए कौशल, साहस और क्षमता प्रदान करने की प्रतिबद्धता’ के लिए जाना जाता है।
फाउंडेशन द्वारा जारी की गई सूचना किट में बताया गया है कि सफीना हुसैन ने दो साल तक इस समस्या का अध्ययन किया और उसके बाद ‘फाउंडेशन टू एजुकेट गर्ल्स ग्लोबली' एनजीओ की स्थापना की, जिसे ‘एजुकेट गर्ल्स' भी कहा जाता है। इस एनजीओ ने अपने काम की शुरुआत राजस्थान से की। वहां उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के मामले में सबसे जरूरतमंद समुदायों की पहचान की।
ऐसी लड़कियां जो कभी स्कूल नहीं गई थीं या स्कूल छोड़ चुकी थीं, उनकी पहचान की गई और वापस स्कूल ले जाया गया। साल 2015 में इस एनजीओ ने कई नई पहलें कीं। उन्होंने दुनिया का पहला डेवलपमेंट इंपैक्ट बॉन्ड (डीआईबी) लॉन्च किया, जिसका मकसद आर्थिक मदद को हासिल किए गए लक्ष्यों से जोडऩा था। उनका यह प्रोजेक्ट खासा सफल रहा।
क्या किसी राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोकने का अधिकार है? हाल के महीनों में इस मुद्दे पर उपजे टकराव को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पांच-सदस्यीय संविधान पीठ में सुनवाई चल रही है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि किसी विधेयक को मंजूरी देने का मुद्दा पूरी तरह राज्यपाल के विवेक पर छोडऩे का मतलब आम लोगों की इच्छा को नकारना है। राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी विधेयक की विधायी क्षमता की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है। कोई व्यक्ति अदालत में किसी कानून को भले चुनौती दे सकता है। लेकिन राज्यपाल इसे रोक नहीं सकते।
दरअसल, पश्चिम बंगाल के अलावा केरल, हिमाचल, कर्नाटक और तमिलनाडु में हाल के महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जब राज्यपाल ने कई विधेयकों को रोक कर रखा हो और बार-बार सरकार से सफाई मांग रहे हों। इस मुद्दे पर टकराव और बयानबाजी का दौर भी तेज रहा है।
पश्चिम बंगाल के मामले को ही लें तो बीते साल कोलकाता के आर।जी। कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर के साथ रेप और उसकी हत्या की घटना के बाद राज्य सरकार ने सदन में अपराजिता विधेयक पारित किया था। इसके तहत 12 साल तक की उम्र की लड़कियों के साथ रेप के दोषियों को अनिवार्य रूप से मौत की सजा देने का प्रावधान था। इसके अलावा ऐसे मामलों के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट बना कर 21 दिनों में सुनवाई पूरी करने जैसे कई कड़े प्रावधान रखे गए थे। सरकार ने इसे मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा था। लेकिन महीनों लटकाने और कई बार विभिन्न बिंदुओं पर सफाई मांगने के बाद उन्होंने इसे राष्ट्रपति के पास बेज दिया। वहां से यह विधेयक फिर राजभवन होते हुए सरकार को पास लौट आया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई बार विधेयकों को मंजूरी देने में अनावश्यक देरी पर असंतोष जताती रही हैं। ममता आरोप लगा चुकी हैं कि विधेयकों को रोक कर राज्यपाल आनंद बोस राज्य प्रशासन को पंगु बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
संविधान पीठ कर रही है सुनवाई
इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी।आर। गवई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस विवाद की लगातार सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ सामने यह सवाल भी है कि क्या अदालत राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के विचार करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित कर सकती है।
बुधवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि स्वाधीनता के बाद ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती जिसमें राष्ट्रपति ने जनता की इच्छा का हवाला देते हुए संसद में पारित किसी विधेयक को मंजूरी नहीं दी हो। उनकी दलील थी कि किसी विधेयक की विधायी क्षमता का जांच अदालतों में होनी चाहिए। किसी राज्यपाल को इसे मंजूरी देने से इंकार करने का अधिकार नहीं है।
राष्ट्रपति के सवाल
इस विवाद में अदालत के हस्तक्षेप के बाद बीती मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत मिली शक्तियों के तहत सुप्रीम कोर्ट से सवाल किया था कि क्या न्यायिक आदेश राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति की ओर से विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकते हैं? उन्होंने शीर्ष अदालत से कुल 14 सवाल पूछे थे। उसके बाद संविधान पीठ ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की हद तक पहुंचते इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू की थी।
दरअसल, इससे पहले इस साल आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जे।बी।पादरीवाला और न्यायमूर्ति आर। महादेवन की खंडपीठ ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि किसी विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला नहीं ले पाने की स्थिति में राष्ट्रपति को इसकी उचित वजह बतानी होगी। अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत उसे राष्ट्रपति के फैसले की समीक्षा का अधिकार है।
उसके बाद ही राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से उस फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। इसमें पूछा गया था कि जब राज्यपाल के पास कोई विधेयक आता है तो उनके सामने कौन-कौन से संवैधानिक विकल्प होते हैं? क्या राज्यपाल फैसला लेते समय मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं? क्या राज्यपाल के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है? उनका सवाल था कि अगर संविधान में राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है तो क्या कोर्ट कोई समय सीमा तय कर सकता है? क्या राष्ट्रपति के निर्णय को भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? और क्या राष्ट्रपति के फैसलों पर भी कोर्ट समयसीमा तय कर सकता है?
राष्ट्रपति के इस प्रेसिडेंशियल रेफरेंस में ऐसे ही 14 सवाल थे।
आजकल स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर से भरी इस दुनिया में, बच्चों का किस उम्र में कितनी देर तक स्क्रीन देखना ठीक है? विशेषज्ञों की इस पर क्या राय है?
डॉयचे वैले पर आना कार्टहाउज का लिखा-
काफी रिसर्च और अध्ययन के बावजूद भी अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि बच्चों के लिए कितनी स्क्रीन टाइम सुरक्षित है और इसके लिए कोई अंतरराष्ट्रीय मानक भी नहीं है। जैसे हर बच्चा अलग होता है, वैसे ही उनकी जरूरतें भी अलग होती हैं। जब तक विज्ञान सही राय देने के लिए पर्याप्त डाटा जुटा पाता है। तब तक तकनीक और समाज कई कदम आगे बढ़ चुका होता है।
ऐसे में डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, नशा विशेषज्ञ और मीडिया शिक्षा से जुड़े लोग कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर सहमत हैं। यह सिद्धांत बच्चों की उम्र और उनके विकास के चरणों से जुड़े होते हैं और दुर्घटना से ‘सावधानी बेहतर है’ वाले नियम पर चलते हैं। मतलब, बाद में पछताने से बेहतर है कि पहले से ही यह मानकर चला जाए कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नुकसान पहुंचा सकते हैं।
दुनिया को जानने-समझने के लिए होते हैं जीवन के शुरुआती साल
जर्मनी में बच्चों के लिए एक ही नारा है, ‘तीन साल तक स्क्रीन से दूरी है जरूरी।’ बच्चों के लिए मीडिया गाइडलाइंस बनाने वाली बाल रोग विशेषज्ञ, उलरीके गैसर कहती हैं कि इस उम्र में बच्चों को स्क्रीन की कोई जरूरत नहीं होती है।
हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन इस पर थोड़ा नरम रुख अपनाता है। उनके अनुसार दो साल से ऊपर के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए, बल्कि जितना कम हो तो उतना अच्छा है।
जीवन के पहले एक से दो साल में बच्चों के लिए अपने आसपास की चीजों को देखना, छूना और समझना जरूरी होता है क्योंकि इस दौरान उनके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता विकसित होती है। यह तभी संभव हो सकता है, जब वे खुद ध्यान लगाना सीखें, न कि किसी स्क्रीन जैसी चीज के सामने बैठकर।
गैसर मानती हैं कि बच्चों को यह भी सिखाना जरूरी है कि उनकी जरूरतें तुरंत पूरी नही हो सकती है। जैसे रोने और माता-पिता से खाना मिलने के बीच थोड़ा समय लगता है। बच्चे के लिए यह समझना जरूरी है कि दुनिया को एक स्वाइप या बटन दबाकर बदला या गायब नहीं किया जा सकता है। इंतजार करना और स्वीकार करना जिन्दगी की कुछ बुनियादी सीखों में से एक है।
बच्चों के विकास का समय छीनती है स्क्रीन
येना यूनिवर्सिटी की बाल मनोवैज्ञानिक, यूलिया असब्रांड कहती हैं, ‘बच्चे दुनिया को काफी अलग तरीके से देखते हैं।’ यह बात फिल्मों और सोशल मीडिया पर भी लागू होती है। छोटे बच्चे जो कुछ भी वे देखते हैं, वह उन्हें सच लग सकता है। जिससे वे डर भी सकते हैं। इसलिए माता-पिता का बच्चों से पूछना जरूरी है कि ‘तुमने अभी क्या देखा?’ और ‘क्या तुम्हें उसके बारे में कोई सवाल है?’
विशेषज्ञों की चिंता यह है कि स्क्रीन पर बिताया गया समय बच्चों के असली विकास के समय को छीन लेता है यानी वह समय जिसमें उन्हें अपनी शारीरिक क्षमताओं को विकसित करना चाहिए, लोगों से मिलना-जुलना और सामाजिक अनुभव लेना चाहिए था।
हाल में शोध दिखते हैं कि स्क्रीन के सामने बिताए गए हर एक मिनट में बच्चे अपने माता-पिता के मुकाबले औसतन छह शब्द कम सुनते हैं। लंबे समय में यह बड़ी कमी पैदा कर देती है।
जितना ज्यादा समय बच्चे अकेले स्क्रीन के सामने बैठेंगे, उतनी ही उनकी भाषा कौशल बाद में कमजोर हो सकती है। स्क्रीन टाइम कम करने से बच्चों की भाषा, ध्यान, सामाजिक व्यवहार और हाथ-पैरों की बारीक गतिविधियों में सुधार देखा जा सकता है।
किंडरगार्टन:मेलजोल और कल्पना की दुनिया
बच्चे जब तक स्कूल नहीं जाते, तब तक उनके लिए यह बहुत जरूरी है कि वे अपने आसपास की दुनिया को देखे, चीजों को महसूस करें, जगह को समझें और दूसरों के साथ मेलजोल बढ़ाये। गैसर कहती हैं कि बच्चों को हर दिन कुछ घंटों तक ऐसा अनुभव मिलना चाहिए। जिसमें खेल के दौरान बच्चे सीखे कि दूसरों के विचार अलग भी हो सकते हैं और ऐसे में उन्हें बातचीत, जिद या समझौते का सहारा लेना पड़ सकता है और कभी-कभी कोई भी तरीके काम नहीं करते हैं।
यह समय बच्चों की कल्पना शक्ति विकसित करने के लिए जरूरी है। ताकि बच्चे दुनिया को समझना और गढऩा सीख सके ताकि वह खुद अपनी कल्पना से दुनिया बना सके। ऐसे में अगर उन्हें बार-बार स्क्रीन पर बनी बनाई चीजें दिखाई जाएंगी, तो उनकी कल्पना धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। इसलिए गैसर सलाह देती हैं कि इस उम्र में स्क्रीन टाइम को अधिकतम 30 मिनट तक ही सीमित रखना जरूरी है।
प्राथमिक स्कूल में मूल्यों की सीख
लगभग छह से नौ साल की उम्र के बीच बच्चे पहली बार अपने अंदर नैतिक दिशा-निर्देश विकसित करना शुरू करते हैं। ऐसे में गैसर पूछती है कि ‘क्या हम यह जिम्मेदारी इंटरनेट पर छोडऩा चाहते हैं?’ क्योंकि यही उम्र है, जब बच्चे अनुशासन, मेहनत, ज्ञान हासिल करने और खुद पर भरोसा करना सीखते हैं, न कि सिर्फ इंटरनेट पर मिली जानकारी पर निर्भर रहना। जर्मनी में इस उम्र के लिए सलाह दी जाती है कि बच्चों को अधिकतम 30 से 45 मिनट का स्क्रीन टाइम, वह भी माता-पिता की निगरानी में ही दिया जाए।
हालांकि, कम स्क्रीन टाइम हमेशा बेहतर है, लेकिन आजकल बहुत सी बातचीत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होती है। जैसा बाल मनोवैज्ञानिक, असब्रांड कहती हैं, ‘आपको एक के बदले दूसरी चीज से सौदा करना पड़ता है।’ उदाहरण के लिए, अगर बच्चा अपनी क्लास के व्हाट्सऐप ग्रुप में नहीं है, तो उसे अलग-थलग किया जा सकता है। खासकर आने वाले जीवन में यह स्थिति बच्चों के लिए और भी मुश्किल हो सकती है, इसलिए इसे पूरी तरह से नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है।
किशोरों की निगरानी मुश्किल
विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को स्मार्टफोन से पूरी तरह दूर रखना अब संभव नहीं है। इसलिए अब असली सवाल यह है कि मीडिया के बेहतर उपयोग की परिभाषा क्या हो सकती है। जर्मनी में डॉक्टर सलाह देते हैं कि 9 से 12 साल के बच्चों के लिए फुर्सत के समय में अधिकतम 45 से 60 मिनट स्क्रीन टाइम हो सकता है, 12 से 16 साल के बच्चों के लिए अधिकतम 1 से 2 घंटे और 16 से 18 साल के लिए लगभग 2 घंटे हो सकता है।
इस उम्र में बच्चे अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करते हैं इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से खुलकर सवाल पूछें और उन्हें यह दिखाने का मौका दें कि वे ऑनलाइन क्या देख रहे हैं। असब्रांड कहती हैं, ‘सबसे बड़ी समस्या तब होती है, जब बच्चे छुपकर कुछ करते हैं। जिस कारण उन्हें ग्रूमिंग जैसी खतरनाक स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।’ (ग्रूमिंग यानी जब कोई वयस्क बुरी नीयत से बच्चे का विश्वास जीतने की कोशिश करता है) कभी-कभी बच्चे माता-पिता से यह बात साझा करने की हिम्मत नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि ‘मुझे यह नहीं करना चाहिए था।’
-उमंग पोद्दार
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय श्रीनिवास ओक का मानना है कि आज अभिव्यक्ति की आज़ादी और पर्सनल लिबर्टी यानी व्यक्तिगत आज़ादी जैसे मौलिक अधिकार खतरे में हैं।
उनका कहना है, ‘सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी हो, अगर आप इतिहास देखें, तो सरकारों की इन मौलिक अधिकारों पर हमला करने की प्रवृत्ति हमेशा रही है।’
जस्टिस अभय ओक ने कऱीब 22 साल जज के तौर पर काम किया। वे इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए। इससे पहले वे बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीश और कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके थे।
न्यायपालिका कैसे बदली है? न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है? कैसे आज मौलिक अधिकार खतरे में हैं? बीबीसी हिन्दी से खास बातचीत में जस्टिस ओक ने इन्हीं सवालों के जवाब दिए हैं।
जस्टिस ओक बोले- ख़तरे में हैं मौलिक अधिकार
जस्टिस अभय ओक सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई अहम फैसलों का हिस्सा रहे हैं, जिनमें नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी पर जोर दिया गया। इन फैसलों में लोगों को जमानत देना और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की शक्तियों पर लगाम लगाने जैसे फैसले भी शामिल हैं।
जस्टिस ओक ने अपने कई सार्वजनिक भाषणों में न्यायपालिका की आज़ादी पर ज़ोर दिया है। वह यह भी कहते रहे हैं कि जजों को किसी को नाराज करने से घबराना नहीं चाहिए।
हाल में ही एक भाषण में जस्टिस अभय ओक ने कहा था कि नागरिकों के मौलिक अधिकार किसी न किसी रूप में हमेशा खतरे में रहते हैं। हमने उनसे पूछा कि उनकी नजर में ऐसे कौन से अधिकार हैं जो आज खतरे में हैं?
उन्होंने कहा कि दो अधिकार उनके दिमाग में आते हैं। एक, अभिव्यक्ति की आजादी और दूसरा, पर्सनल लिबर्टी, यानी व्यक्तिगत आजादी का अधिकार।
उन्होंने कहा, ‘मैं यह नहीं कह रहा कि बोलने की आज़ादी केवल कार्यपालिका की वजह से ख़तरे में है। यह नागरिकों की वजह से भी खतरे में है। हम नागरिक एक-दूसरे के बोलने की आजादी की इज़्जत नहीं कर रहे हैं।’ उनकी राय है कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान के दिए गए मौलिक अधिकारों की इज़्जत करे। जस्टिस अभय ओक कहते हैं, ‘हमें सच सुनना पसंद नहीं है।’
संविधान में व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार के बारे में उन्होंने कहा, ‘सिर्फ इसलिए कि आपके खिलाफ कोई अपराध का इल्जाम है, आपको गिरफ्तार करना जरूरी नहीं। अभियुक्त को गिरफ्तार किए बिना भी जाँच चल सकती है।’
‘कई ऐसे मामले हैं, जिनमें हम देखते हैं कि लोगों को झूठे मामलों में फंसाया जाता है और उन्हें ज़मानत नहीं मिलती। यह भी अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।’
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भारत में सभी को जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी का मौलिक अधिकार है।
हमने सवाल किया कि वे ‘राजद्रोह’ कानून के बारे में क्या सोचते हैं? यह अभी भी ‘भारतीय न्याय संहिता’ के तहत अपराध है।
उन्होंने कहा, ‘मेरी व्यक्तिगत राय है कि हमें ‘राजद्रोह’ से जुड़े क़ानून पर फिर से विचार करना चाहिए।’
महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति पर क्या बोले जस्टिस ओक?
कॉलेजियम व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सरकार के पास नामों की सिफ़ारिश भेजते हैं। सरकार इन नामों पर विचार करने के बाद उन्हें नियुक्त करती है। हमने उनसे जानना चाहा कि क्या कॉलेजियम जजों की नियुक्ति के लिए सही व्यवस्था है?
उन्होंने जवाब दिया कि कॉलेजियम व्यवस्था में अलग-अलग लोगों के विचार शामिल होते हैं। जैसे, इंटेलिजेंस ब्यूरो, केंद्र सरकार और राज्य सरकार।
उन्होंने कहा, ‘कॉलेजियम व्यवस्था में कुछ खामियां हो सकती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि हम कॉलेजियम व्यवस्था को ठीक से लागू नहीं कर रहे हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अभी इससे बेहतर कोई व्यवस्था है। हम ऐसी व्यवस्था नहीं रख सकते जिसमें कार्यपालिका (सरकार) को वीटो का अधिकार हो।’
इस साल 25 अगस्त को कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के लिए दो हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के नाम की सिफारिश की थी।
वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने इन सिफारिशों की आलोचना की। इनमें किसी महिला जज का नाम शामिल नहीं था। उनके मुताबिक, कम से कम तीन महिला जज, सिफारिश किए गए एक न्यायाधीश से सीनियर थीं।
सुप्रीम कोर्ट में आखिरी बार महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति साल 2021 में हुई थी।
इस बारे में पूछे जाने पर जस्टिस अभय का कहना था, ‘कम से कम एक महिला जज को हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के लिए विचार किया जाना चाहिए था। मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता कि उन्होंने उन तीन महिला न्यायाधीशों को क्यों नहीं चुना जो सिफारिश किए गए एक न्यायाधीश से सीनियर थीं।’
उन्होंने कहा, ‘मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि इन महिला जजों के बारे में विचार किया जाना चाहिए था।’
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर जस्टिस ओक की राय
हमने जस्टिस अभय ओक से यह भी पूछा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा कितना बड़ा है?
उन्होंने कहा, ‘अगर कोई प्रामाणिक रूप से कह रहा है कि (न्यायपालिका में) भ्रष्टाचार है तो मैं इसे नकारने की स्थिति में नहीं हूं।’
उनके अनुसार कुछ मामलों में हो सकता है कि कोई दलाल किसी जज का नाम इस्तेमाल करके मुवक्किलों या वकीलों से पैसा ले ले और जज को पता तक न हो।
जब हमने उनसे जानना चाहा कि क्या उन्होंने भ्रष्टाचार का कोई उदाहरण देखा है, तो जस्टिस अभय ओक ने कहा, हमें ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीशों के बारे में (भ्रष्टाचार की) शिकायतें मिलती हैं। हालांकि, मुझे कभी ऐसा मामला नहीं मिला, जिसमें बहुत ठोस सबूत हों।’
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर कथित रूप से बड़ी मात्रा में नकदी मिली थी। उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हमने इस विवाद पर उनकी राय जाननी चाही।
जस्टिस अभय ओक ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह उस कॉलेजियम का हिस्सा थे, जिसने जस्टिस यशवंत वर्मा को दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफऱ किया था।
कोर्ट से ज़मानत कब मिलती है?
कई मामले ऐसे हैं, जिनमें लोग सालों से जेल में हैं। उन्हें जमानत नहीं मिलती, मुक़दमा भी शुरू नहीं होता। जैसे, साल 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में कई अभियुक्त लगभग पांच सालों से जेल में हैं। वे ऐसे मामलों के बारे में क्या सोचते हैं?
जस्टिस अभय ओक ने जवाब दिया, ‘इस मामले में क़ानून बहुत साफ़ है। जब अदालत को लगे कि मुकदमे में बहुत ज़्यादा देरी हो रही है। मुक़दमा शुरू होने वाला नहीं है तो कोर्ट को ज़मानत देनी होती है। सिर्फ कुछ ख़ास मामलों को छोड़ दें, जिनमें अभियुक्त का पुराना आपराधिक इतिहास हो या वह ‘हिस्ट्री-शीटर’ हो।’
इसी सिलसिले में हमने उनसे यह भी जानना चाहा कि क्?या यह न्यायाधीश पर निर्भर करता है कि वे किसी को ज़मानत देना चाहते हैं या नहीं? उन्होंने जवाब दिया, ‘मुझे लगता है न्यायिक दृष्टिकोण एक समान होना चाहिए।’
उनके मुताबिक, खासकर ऐसे मामलों में जमानत देनी चाहिए, जिनमें मुकदमा लंबे वक्त से शुरू नहीं हुआ हो। बिना मुकदमा शुरू हुए कोई लंबे वक्त से जेल में पड़ा हो।
क्या जजों पर मीडिया का दबाव होता है?
जस्टिस अभय ओक लंबे वक्त तक न्यायाधीश रहे हैं। उन्होंने इस दौरान न्यायपालिका को कैसे बदलते हुए देखा?
इस बारे में जस्टिस ओक कहते हैं कि न्यायपालिका कई मायनों में बदली है। उनके अनुसार वकील अब लंबी दलीलें देने लगे हैं।
वह कहते हैं, ‘पहले लोग मजिस्ट्रेट कोर्ट या सेशंस कोर्ट से ज़मानत पा लेते थे। अब कई बार उन्हें हाई कोर्ट जाना पड़ता है।’
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ज़मानत मिलना क्यों मुश्किल होता है, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि कारण बताना मुश्किल है। उनकी राय है, ‘शायद मीडिया कवरेज या जज के दृष्टिकोण में बदलाव की वजह से। या इन सब वजहों की मिली-जुली बात भी हो सकती है।’
क्या अदालती कार्यवाहियों की ज़्यादा मीडिया कवरेज का असर जजों पर भी हुआ है?
इस सवाल पर जस्टिस अभय ओक ने कहा, ‘यह सब अलग-अलग न्यायाधीशों पर निर्भर करता है। शायद कुछ जज सोचते होंगे कि उनके फ़ैसले को कैसे देखा जाएगा। लेकिन आज भी कई जज हैं जिन्हें इन सबकी परवाह नहीं होती।’
हालाँकि, उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘कुछ हाई कोर्ट के फ़ैसलों से मुझे लगा कि शायद न्यायाधीश पर मीडिया में कवरेज का असर पड़ा है।’
उन्होंने ऐसे मामलों का जिक्र किया, जिनमें किसी को केवल छह महीने के लिए ज़मानत दी गई, जबकि यह साफ़ था कि मुकदमा खत्म होने में सालों लगेंगे।
-अशोक पांडेय
हवा को बींधती हुई इन पतली नोकीली मूंछों को आपने कभी न कभी जरूर देखा होगा। साल 2010 में हुए एक ओपिनियन पोल में इन्हें मानव सभ्यता की सबसे विख्यात मूंछें चुना गया। ये साल्वाडोर डाली की मूंछें है।
आधुनिक युग की सबसे बड़ी चित्रकार त्रयी वान गॉग-पिकासो-डाली में सबसे आकर्षक और विवादास्पद व्यक्तित्व के स्वामी साल्वाडोर डाली 1904 में स्पेन के फिगेरेस कसबे में जन्मे थे। मैड्रिड की आर्ट एकेडमी में पढ़ते हुए उन्होंने घोषित किया कि उनके काम को जज करने की औकात वहां की किसी भी फैकल्टी की नहीं है। उन्हें निकाल दिया गया। इसके बाद वे सीधे पेरिस गए जहां पाब्लो पिकासो और आंद्रे ब्रेतों से उनकी गहरी दोस्ती हुई। उसके बाद इनकी अगुवाई में बीसवीं सदी की चित्रकला का नया इतिहास लिखा गया। बेहद रंगबिरंगी और विवादों से भरपूर सृजनात्मक जिन्दगी जी चुकने के बाद 85 साल का होने के बाद डाली उसी फिगेरेस में मरे जहाँ पैदा हुए थे।
बहुत से मूंछ विशेषज्ञ आज भी मानते हैं कि इनके पीछे सत्रहवीं शताब्दी के बहुत बड़े चित्रकार दीएगो वेलास्केज की प्रेरणा थी। अलबत्ता जनवरी 1954 को एक अमेरिकी टीवी गेम-शो में हिस्सा लेते हुए साल्वाडोर डाली से जब पूछा गया -
‘ये आपकी मूंछ है या कोई लतीफा?’
अपनी ट्रेडमार्क मूंछ को हवा में दुलराते करते हुए डाली ने कहा था -
‘यह मेरी पर्सनालिटी का सबसे गंभीर हिस्सा है। यह एक साधारण हंगेरियन मूंछ है।’
प्रश्नकर्ता ने आगे जिज्ञासा जाहिर की कि वे उन्हें उस तरह हवा में खड़ा कैसे रख लेते हैं। इसपर डाली ने बताया कि वे अपनी मूंछों पर उसी ब्रांड का पोमेड इस्तेमाल किया करते हैं जिसे उनकी पिछली पीढ़ी के विश्वविख्यात फ्रेंच लेखक मार्सेल प्रूस्त किया करते थे। इस कदर प्रतिष्ठित साहित्यिक-कलात्मक विरासत से सृजित की गयी इन मूंछों को दुनिया भर में ख्याति मिलनी ही थी।
डाली के एक दोस्त होते थे फिलिप हॉल्समैन। अपने समय के सबसे बड़े फोटोग्राफरों में गिने जाने वाले फिलिप हॉल्समैन ने डाली के साथ मिल कर 1954 में ही उनकी मूंछों पर एक फोटो-बुक छपाई ‘डालीज़ मुस्टाश’। यह दो दोस्तों के बीच एक एब्सर्ड शाब्दिक और फोटोग्राफिक संवाद था जो अपने प्रकाशन के कुछ ही महीनों बाद एक कल्ट बन गया। दोनों ने किताब अपनी-अपनी बीवियों को समर्पित की। हॉल्समैन ने अपनी बीवी के लिए लिखा- ‘इवोन को जिसकी वजह से मुझे रोज़ हजामत करनी पड़ती है।’
उसी किताब को अपनी बीवी को डाली ने यूं समर्पित किया- ‘गाला नाम के फ़रिश्ते के लिए जो मेरी मूंछों की रखवाली भी करती है।’
किताब में डाली और उसकी मूंछों के कुल 28 फोटो हैं जिनमें से आखिऱी वाली के साथ दोनों के बीच हुए एक संवाद में हॉल्समैन पूछते हैं, ‘साल्वाडोर, अब जबकि मैं तुम्हारी मूंछों का राज जान गया हूँ, मुझे लगने लगा है तुम शायद पागल हो।’ डाली ने उत्तर दिया, ‘लेकिन यह निश्चित है कि मैं हर उस शख्स से कम पागल हूँ जिसने इस किताब को खरीद लिया है।’
डाली की मौत के बीस साल बाद मारिया पीलार आबेल नाम की एक औरत ने दावा किया कि वह डाली की अवैध संतान है और उसे अपने बाप की अकूत संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। लंबा कानूनी विवाद खींचा और आखिरकार 2017 में कोर्ट के आदेश पर डीएनए टेस्ट के लिए डाली के शरीर को कब्र से बाहर निकाला गया। डीएनए मैच नहीं हुआ और मारिया केस हार गयी।


