विचार/लेख
-सुसान चाको, ललित मौर्य
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक और न्यायिक सीमाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 14 मई, 2026 को दिए अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीवर लाइन बिछाने या दूसरे बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों का प्रबंधन और प्रशासन देखना अदालतों का काम नहीं है। ऐसी समस्याओं का समाधान करना संबंधित सरकारी एजेंसियों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भीड़भाड़ वाली कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए न तो हाई कोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट को प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका निभानी चाहिए। अदालतों का काम नीतियां बनाना या प्रशासनिक उपाय तय करना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है।
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि यह मामला तब सामने आया जब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने दिल्ली हाई कोर्ट के 18 जून 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उस आदेश में ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए खुद पहल करते हुए दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और एम्स को कई निर्देश जारी किए थे।
ये निर्देश ग्रीन पार्क एक्सटेंशन से अरबिंदो तक सीवर लाइन के डिजाइन और निर्माण से जुड़े मामले में दिए गए थे। हालांकि बाद में, 27 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के अमल पर रोक लगा दी। इसके बाद मामले पर विस्तार से सुनवाई हुई और केंद्र सरकार को भी इस मुद्दे पर विचार करने के लिए पक्षकार बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दिल्ली सरकार पहले ही पक्षकार है। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड सहित कई स्थानीय एजेंसियां भी मामले से जुड़ी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रीन पार्क, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के इलाकों के लोग जल निकासी की खराब व्यवस्था के कारण भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद ड्रेनेज व्यवस्था बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पर्याप्त नहीं रह गई है। इसी कमी के कारण इलाके में गंभीर जलभराव की समस्या भी पैदा हो रही है।
हालांकि साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इन समस्याओं का समाधान करना और कानून के अनुसार जरूरी कदम उठाना संबंधित सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश की मुद्रा की मज़बूती या कमज़ोरी वहाँ की अर्थव्यवस्था की सेहत की स्थिति बताती है.
आमतौर पर जिस देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही हो, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है.
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मौजूदा समय में भी बढ़िया है, इसके बावजूद 2018 से हर साल रुपया कमज़ोर हुआ है.
2013 में जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तब उन्होंने कमज़ोर होते रुपये को लेकर तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ एक कारगर राजनीतिक अभियान चलाया था.
उस समय बड़े बॉलीवुड सितारों, लोकप्रिय धर्मगुरुओं और कई मशहूर हस्तियों को यह कहते हुए देखा गया था कि भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 60 के स्तर तक पहुँच गया है.
अब अक्सर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते पाए गए हैं कि जब बीजेपी के शासनकाल में रुपया लगातार गिरते हुए 97 के क़रीब आ गया, तब उनमें से किसी के पास कोई टिप्पणी क्यों नहीं है.
अगर रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर जाता है तो सरकार की असहजता और बढ़ सकती है.
भारत में कमज़ोर रुपए का मतलब है कि आयात महंगे हो जाते हैं. इससे तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती हैं. इनमें से अधिकांश भारत विदेशों से ख़रीदता है.
कमज़ोर रुपया उन परिवारों के लिए फ़ायदा भी लेकर आता है जो विदेशों में काम कर रहे भारतीयों के पैसों पर निर्भर हैं क्योंकि हर डॉलर के ज़्यादा रुपये मिलते हैं.
भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस हासिल करने वाले देशों में से एक है.
मार्च 2025 तक के वर्ष में प्रवासी भारतीयों ने देश में 135 अरब डॉलर से अधिक भेजे थे.
हालांकि ईरान युद्ध के कारण पर्सियन गल्फ़ के देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों से आने वाला पैसा प्रभावित हो सकता है.
चिंताजनक हालात
भारतीय मुद्रा रुपए की जैसी हालत है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है.
एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 97 के क़रीब पहुँच चुका है. अभी 2026 में पाँच महीने भी नहीं पूरे हुए हैं और रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7.5% गिर चुका है.
रुपए को थामने की भारत की हर कोशिश बहुत कारगर साबित नहीं हो रही है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पर दबाव बढ़ रहा है कि वह कुछ ठोस क़दम उठाए.
सरकार रुपए की कमज़ोरी को काबू में करने के लिए कई क़दम उठा रही है लेकिन इसका असर अभी दिख नहीं रहा है. सरकार ने सोना और चांदी पर आयात शुल्क दोगुने से ज़्यादा बढ़ा दिए हैं.
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की है और खाद्य तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रही है. वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर घरेलू मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले बाद तेल की क़ीमतों में आई तेज़ बढ़ोतरी भारत के व्यापार घाटे को बढ़ा रही है. रुपए कमज़ोर होने का असर भारत के शेयर बाज़ार पर भी सीधा पड़ रहा है.
विदेशी निवेशक इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
रुपए कमज़ोर होने से विदेशी निवेशकों को डॉलर में रिटर्न कम मिलता है. ऐसे में ये उन देशों की ओर रुख़ कर रहे हैं, जिनकी मुद्राएं डॉलर के सामने डटकर खड़ी हैं.
वैश्विक निवेशकों को लग रहा है कि रुपया आगे और कमज़ोर हो सकता है.
ऐसा अनुमान भी है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुँच सकता है. यह एक ऐसा स्तर है, जिसे कभी अकल्पनीय माना जाता था.
सिटी ग्रुप का मानना है कि भारतीय कंपनियों के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने और निर्यातकों को अपनी विदेशी मुद्रा आय जल्दी भारत वापस लाने के लिए सख़्त नियम लागू किए जाने की संभावना है.
तेल की बढ़ती क़ीमतें
भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का मतलब है कि समान मात्रा में तेल ख़रीदने के लिए भारत को पहले से ज्यादा डॉलर ख़र्च करने पड़ रहे हैं.
इसके साथ ही पूंजी निकासी भी दबाव बढ़ा रही है. 2026 में वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ़ की घोषणा की तो रुपए में गिरावट और तेज़ हो गई.
इसके बाद अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया और तेल की क़ीमतें बढ़ गईं. रुपया एक बार फिर से दबाव में आया और यह बढ़ता ही जा रहा है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये की कमज़ोरी की असली वजह बाहरी नहीं बल्कि घरेलू संरचनात्मक कमज़ोरियां भी हैं, जिन्हें तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद दूर नहीं किया जा सका.
2025 में रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा था और 2026 में भी यही स्थिति बनी रही.
2025 में रुपये की कमज़ोरी के पीछे ट्रंप के दोहरे अंकों वाले टैरिफ, भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों का बाहर जाना और धीमी आर्थिक वृद्धि को माना गया.
मौजूदा कमज़ोरी इस डर को दर्शाती है कि ईरान युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा क़ीमतें महंगाई बढ़ाएंगी, आर्थिक वृद्धि को कमज़ोर करेंगी और भारत के चालू खाते के घाटे को और बढ़ा देंगी.
ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के अनुमान के अनुसार, अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल और गैस क़ीमतें युद्ध से पहले के स्तर से 50 प्रतिशत ऊपर रहती हैं तो भारत का आयात बिल हर महीने पाँच अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव क्या कारण मानते हैं?
20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने लिखा था, ''रुपए में कमज़ोरी हालिया संकट की कहानी नहीं है. असल में रुपया पिछले कई वर्षों से लगातार दबाव में रहा है क्योंकि भारत से बाहर पूंजी बाहरी और घरेलू दोनों कारणों से जा रही है. विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर अवसरों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर अन्य बाज़ारों की ओर बढ़ गए.
वैश्विक स्तर पर पूंजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपए पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आसपास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है.''
विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव
भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 690 अरब डॉलर पर आ गया है. यह फ़रवरी 2026 के रिकॉर्ड 728 अरब डॉलर के स्तर से नीचे है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है. लेकिन आयात बिल बढ़ने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर खर्च किए थे.
इसी अवधि में सोने का आयात 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया था. वहीं चांदी का आयात क़रीब 150 प्रतिशत बढ़कर 12 अरब डॉलर हो गया था. उर्वरक आयात भी पिछले वित्त वर्ष में 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर पहुँच गया था.
इन चार वस्तुओं तेल, सोना, चांदी और उर्वरक पर भारत का आयात बिल केवल चार वर्षों में दोगुने से भी अधिक हो गया है. ज़ाहिर है कि आयात बिल बढ़ता है तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च होता है. डॉलर कम होगा तो रुपया कमज़ोर होगा. यही वजह है कि सरकार अब इस बढ़ते आयात दबाव पर ब्रेक लगाने की कोशिश कर रही है.
निर्यात से ज़्यादा आयात
भारत अब भी जितना निर्यात करता है, उससे ज़्यादा आयात करता है. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ अब भी अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर दबाव बनाए हुए हैं. हालांकि भारत कई देशों से मुक्त व्यापार समझौता कर रहा है.
जब पूंजी बाहर जा रही हो और विदेशी मुद्रा का प्रवाह धीमा हो, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार ने अब पैनिक बटन दबाना क्यों शुरू कर दिया है.
विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोने के आयात को सीमित करना अपेक्षाकृत कम तकलीफ़देह विकल्प माना जा रहा है.
अप्रैल में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत पहुंच गई. क़रीब चार सालों की यह सबसे तेज वृद्धि है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.
जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
इलॉन मस्क की अपील को कोर्ट ने खारिज किया है कि ओपन एआई मुनाफा कमाने के लिए अपने बुनियादी मूल्यों के खिलाफ जा रहा है. लेकिन असल जीत-हार का सवाल इससे कहीं ऊपर है.
डॉयचे वैले पर सोनम मिश्रा की रिपोर्ट –
अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित ऑकलैंड फेडरल कोर्ट में सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसले में जूरी ने इलॉन मस्क द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया. मस्क ने आरोप लगाया था कि ओपन एआई ने अपने मूल उद्देश्य यानी "मानवता के हित में सुरक्षित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित करने" से भटककर मुनाफे की राह पकड़ ली है.
नौ सदस्यीय जूरी ने इस मामले में दो घंटे से भी कम समय में विचार-विमर्श कर फैसला ले लिया. जूरी ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी ओपन एआई मानवता के हित में काम करने के अपने मूल उद्देश्य से भटकने के आरोपों के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं है. इस फैसले में जूरी ने माना कि मस्क ने यह मुकदमा बहुत देर से दायर किया है. अदालत के अनुसार, मस्क को ओपन एआई की कारोबारी योजनाओं की जानकारी कई सालों पहले ही थी इसलिए अगस्त 2024 में दायर की गई उनकी याचिका कानूनी समय सीमा से बाहर थी. यह फैसला ओपन एआई के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि इससे कंपनी के संभावित आईपीओ (यानी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) का रास्ता लगभग साफ हो गया है. विश्लेषकों के मुताबिक ओपन एआई की वैल्यूएशन एक हजार अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जो कि टेक इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक होगा.
फैसले के बाद भी मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे. मस्क का आरोप है कि सैम ऑल्टमैन और ग्रेग ब्रॉकमैन ने एक "चैरिटी” को निजी मुनाफे की मशीन में बदल दिया. उन्होंने लिखा, "ऑल्टमैन और ब्रॉकमैन ने असल में एक चैरिटी को लूटकर खुद को अमीर बनाया. अब सिर्फ सवाल यह है कि उन्होंने यह कब किया!” उन्होंने आगे लिखा, "चैरिटी संस्थाओं को लूटने की ऐसी मिसाल कायम करना अमेरिका में दान और परोपकार की भावना के लिए बेहद विनाशकारी है.” वहीं अदालत की अध्यक्षता कर रहीं जज यवोन गोंजालेज रोजर्स ने संकेत दिया कि अपील में भी मस्क की राह आसान नहीं होगी. जज ने कहा, "जूरी के फैसले का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, यही वजह है कि मैंने उसी समय इस मामले को खारिज कर दिया.”
मुनाफे की लड़ाई
मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाए. मस्क का कहना था कि उन्होंने 2015 में ओपन एआई को एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में स्थापित करने में मदद की थी ताकि एआई तकनीक मानवता के हित में विकसित हो सके. लेकिन बाद में कंपनी ने माइक्रोसॉफ्ट और अन्य निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाकर खुद को मुनाफा कमाने वाली संस्था में बदल लिया. मस्क के वकीलों ने अदालत में दावा किया कि ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने निवेशकों और सह-संस्थापकों को गुमराह किया है. कई पूर्व कर्मचारियों और बोर्ड सदस्यों ने भी ऑल्टमैन की ईमानदारी पर सवाल उठाए हैं. मुकदमे के दौरान यह भी सामने आया कि 2023 में ऑल्टमैन को कुछ समय के लिए कंपनी बोर्ड से भी हटाया गया था क्योंकि उनके व्यवहार और पारदर्शिता को लेकर चिंताएं बढ़ रही थी.
दूसरी तरफ ओपन एआई ने मस्क के आरोपों को "प्रतिद्वंद्वी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश” करार दिया. कंपनी के वकीलों का कहना था कि मस्क खुद एआई बाजार में अपनी कंपनी एक्स एआई के जरिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और यह मुकदमा उसी कारोबारी लड़ाई का ही एक हिस्सा है. ओपन एआई के वकील विलियम सैविट ने अदालत के बाहर कहा, "जूरी के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि यह मुकदमा एक प्रतिस्पर्धी कंपनी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी.” उन्होंने आगे कहा, "मस्क अपने दावे कर सकते हैं और अपनी कहानियां सुना सकते हैं, लेकिन इस जूरी के नौ सदस्यों ने पाया कि उनकी बातें सिर्फ कहानियां ही थी, कोई तथ्य नहीं.”
अमेरिकी वित्तीय सेवा और निवेश कंपनी वेडबुश के विश्लेषक डैन आइव्स ने कहा कि इस फैसले से ओपन एआई के संभावित आईपीओ पर मंडरा रहा बड़ा कानूनी खतरा खत्म हो गया है. उन्होंने कहा, "ऑल्टमैन की छवि और नेतृत्व पर लगे दाग के बावजूद यह फैसला उनके और ओपन एआई के लिए एक बड़ी जीत है.” इस मामले में माइक्रोसॉफ्ट पर भी सहयोग और समर्थन देने के आरोप लगे थे. माइक्रोसॉफ्ट के एक अधिकारी ने गवाही में बताया कि कंपनी ने ओपन एआई के साथ साझेदारी पर लगभग 100 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं.
असल नुकसान किसका?
जज गोंजालेज रोजर्स ने मुकदमे की शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वह इस सुनवाई को एआई के खतरों पर बहस में नहीं बदलना चाहती हैं. इसके बावजूद नौकरी छिनने, मानसिक स्वास्थ्य पर असर और यहां तक कि मानव अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे जैसे एआई से जुड़े अनसुलझे सवाल पूरे मुकदमे के दौरान पृष्ठभूमि में बने रहे.
फेडरल कोर्ट के बाहर लगातार प्रदर्शनकारी जुटते रहे, जो मस्क और ऑल्टमैन दोनों के खिलाफ नारे लगा रहे थे. प्रदर्शनकारियों के पोस्टरों पर लिखा था कि इस लड़ाई में असली नुकसान आम लोगों का हो रहा है, जिनकी जिंदगी ऐसे उद्योग के कारण बदल रही है. जिसका नियंत्रण केवल कुछ अरबपतियों तक सीमित है. एक तरफ कंपनियां एआई से अरबों डॉलर कमाने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग नौकरी जाने, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, निगरानी तकनीक और फेक कंटेंट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.
कोलंबिया लॉ स्कूल की प्रोफेसर डोरोथी लुंद ने कहा, "यह मौजूदा दौर की एक अजीब तस्वीर पेश करता है, जहां इतनी महत्वपूर्ण तकनीक सरकारों की पहल के बजाय मस्क और ऑल्टमैन जैसे अरबपतियों की मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हाथों बनाई जा रही है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई अब केवल टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति भी बन चुका है. शिक्षा, पत्रकारिता, चिकित्सा, कानून और रोजगार जैसे क्षेत्रों में इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, जबकि इसपर नियंत्रण का अधिकार केवल कुछ गिने-चुने कॉर्पोरेट समूहों और व्यक्तियों के हाथों में सिमटता जा रहा है.
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की टेक पॉलिसी विशेषज्ञ सारा क्रेप्स के अनुसार, यह मुकदमा केवल मस्क और ऑल्टमैन के बीच का विवाद नहीं था, बल्कि यह विवाद उस दूरी के बारे में भी है, जो एआई बनाने वाले शक्तिशाली लोगों और उससे प्रभावित होने वाली आम जनता के बीच बढ़ती जा रही है.
-दिलनवास पाशा
भारत की तेल कंपनियों ने एक सप्ताह के भीतर दो बार तेल के दाम बढ़ाए हैं।
दिल्ली में अब पेट्रोल कऱीब 98 रुपए प्रति लीटर है वहीं डीज़ल के दाम भी 90 रुपए प्रति लीटर से ऊपर हैं। कुल बढ़ोतरी करीब चार रुपए प्रति लीटर की हुई है।
अमेरिका और इसराइल के फऱवरी के अंत में ईरान पर हमले के बाद से मध्य पूर्व में चल रहे संकट की वजह से होर्मुज़ जलडमरुमध्य से तेल नहीं निकल पा रहा है। विश्लेषक मान रहे हैं कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो तेल की क़ीमतें आगे और भी बढ़ सकती हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक़ तेल की बढ़ती क़ीमतों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है और पिछले छह महीनों में ये दिखा भी।
पिछले साल नवंबर में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें जब 60-65 डॉलर प्रति बैरल पर थीं, और तब रिज़र्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए आर्थिक वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था।
लेकिन इसके बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बने हालात की वजह से कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और मई 2026 में आरबीआई का कहना है मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर 6।9 फ़ीसद के आस-पास रह सकती है। यही नहीं, खुदरा महंगाई दर जो नवंबर 2025 में 0.7 प्रतिशत थी वह अब बढक़र 3.48 प्रतिशत हो गई है। इसका सीधा मतलब ये है कि भारत में खाना, किराया, ट्रांसपोर्ट और रोज़मर्रा के अन्य ख़र्च और महंगे हो गए हैं। 3.48 प्रतिशत की महंगाई दर अभी संकट का स्तर नहीं है लेकिन यह साफ़ है कि महंगाई तेज़ी से बढ़ रही है।
वहीं थोक महंगाई दर जहां नवंबर में बहुत कम थी वहीं अब यह 8।3 प्रतिशत है। यानी कंपनियों और उद्योगों की लागत बढ़ गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि उद्योगों का उत्पादन ख़र्च बढ़ रहा है जिसमें कच्चा माल, ईंधन, धातु, ट्रांसपोर्ट आदि की बढ़ती क़ीमतें शामिल हैं।
थोक महंगाई दर का बढऩा निकट भविष्य में उत्पादों की क़ीमतें बढऩे का संकेत होता है। हाल ही में भारत में दूध के दामों में भी दो रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हुई है।
मध्य पूर्व संकट के बाद से बदलते हालात
विश्लेषक मानते हैं कि महंगाई और विकास दर के संकेत देने वाले इन सूचकांकों में बढ़ोतरी की सीधी वजह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढऩा है।
नवंबर में ब्रेंट क्रूड तेल के दाम 60-65 डॉलर प्रति बैरल के बीच थे जो अब 100-110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। यानी कच्चे तेल के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं।
भारत सरकार ने कच्चे तेल के दामों में हो रही बढ़ोतरी के बावजूद मार्च से मध्य मई के बीच तेल के दाम नहीं बढ़ाए थे। विश्लेषक मान रहे हैं कि कई राज्यों में चुनावों की वजह से सरकार ये क़दम उठाने से बच रही थी।
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हो जाने के दो सप्ताह के भीतर ही तेल कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए हैं।
नरेंद्र तनेजा का कोट कार्ड
अर्थशास्त्री और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, ‘चुनावों की वजह से सरकार तेल के दाम बढ़ाने में हिचक रही थी, जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, भारत में तेल के दाम आगे भी बढ़ेंगे।’
भारत सरकार ने कच्चे तेल की क़ीमतों के बढ़ते प्रभाव को जनता तक पहुंचने से रोकने के लिए मार्च में एक्साइज़ ड्यूटी दस रुपए तक कम की थी।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘तेल के बारे में कहा जाता है कि यह 90 फीसदी राजनीति है। सरकार इसे केवल अर्थशास्त्र की नजऱ से नहीं देख सकती और उसे आम उपभोक्ता को बचाने के लिए हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा।’
तनेजा साफ़ कहते हैं, ‘यदि होर्मुज़ नहीं खुला और तेल वहां फंसा रहा तो भारत में आगे भी तेल के दाम बढऩा तय है। भारत सरकार के पास इस मामले में बहुत सीमित विकल्प हैं।’ बढ़ते तेल के दामों और गिरते आयात का असर भारत के रणनीतिक तेल भंडारों पर भी पड़ रहा है। नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘भारत के पास सिर्फ पचास दिन के ही स्ट्रेटेजिक रिज़र्व हैं। हम 57 लाख बैरल तेल प्रतिदिन खपत करते हैं, यदि यही चलता रहा तो इससे स्ट्रेटेजिक रिज़र्व पर दबाव बढ़ सकता है।’
वहीं, प्रोफेसर अरुण कुमार को लगता है कि भारत सरकार ऊर्जा संकट को भांपने में चूक गई और कदम उठाने में देरी कर दी।
प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि सरकार ने क़दम उठाने में लगभग 75 दिन की देरी कर दी। यदि सरकार ऊर्जा संकट का सही अंदाज़ा लगाकर रिफ़ाइंड उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा देती तो इससे हम क्रूड बचा सकते थे, अप्रैल महीने में हमने क्रूड से जो रिफ़ाइंड उत्पाद तैयार किए उसका पैंतीस प्रतिशत तक निर्यात कर दिया। यह उत्पाद घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने में काम आ सकते थे।’
विश्लेषक क्रूड के दाम और बढऩे की आशंका ज़ाहिर करते हैं। नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘यदि मध्य पूर्व संकट आगे छह महीने और खिंच गया तो क्रूड का 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना हैरान नहीं करेगा, ये स्थिति भारत के लिए और भी जटिल हो सकती है।’
प्रोफेसर अरुण कुमार भी ऐसी ही राय रखते हुए कहते हैं, ‘जब तक होर्मुज़ नहीं खुलेगा, ऊर्जा बाज़ार में संकट बरकऱार रहेगा और यदि यह लंबा चला तो यह भारत की अर्थव्यवस्था को सुस्ती में बदल सकता है।’
-देवदत्त पटनायक
*माझा प्रवास* 1857 के विद्रोह का एक भारतीय द्वारा लिखा गया सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी विवरण था। इसके शीर्षक का अर्थ था ‘मेरी यात्राएँ।’ यह पश्चिमी भारत के एक मराठी ब्राह्मण पुजारी विष्णुभट गोडसे द्वारा लिखा गया था। उन्होंने विद्रोह के दौरान उत्तर भारत की यात्रा की और कई घटनाओं को अपनी आँखों से देखा।
यह पुस्तक इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि इसमें रानी लक्ष्मीबाई और झाँसी के पतन का एक दुर्लभ प्रत्यक्ष विवरण मिलता है। गोडसे राजदरबारों में जाकर धन और दक्षिणा कमाने के लिए निकले थे, लेकिन रास्ते में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह छिड़ गया। ब्रिटिश सैन्य रिपोर्टों या बाद की राष्ट्रवादी कहानियों के विपरीत, उनके विवरण में एक भटकते ब्राह्मण के डर, अफवाहें, जातिगत पूर्वाग्रह और छोटी-छोटी रोज़मर्रा की बातें दर्ज हैं, जो एक टूटती हुई राजनीतिक दुनिया के बीच फँसा हुआ था।
पुस्तक का एक रोचक भाग लक्ष्मीबाई के पति, राजा गंगाधर राव के बारे में था। गोडसे के अनुसार, राजा की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद, वे दोबारा विवाह करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि वे किसी अमीर परिवार की लडक़ी की बजाय एक गरीब परंतु प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार की लडक़ी को पसंद करेंगे। लेकिन कई परिवारों ने इस रिश्ते से इनकार कर दिया क्योंकि राजा सार्वजनिक रूप से सामान्य पुरुषोचित व्यवहार न करने के लिए जाने जाते थे। लोग उन्हें ‘षंढ’ कहते थे।
पुस्तक में उनका वर्णन है कि वे स्त्रियों के कपड़े पहनते थे, जैसे पैठणी साडिय़ाँ और सोने की चोलियाँ, स्त्रियों की तरह बाल सजाते थे, और हार, चूडिय़ाँ, कंगन तथा नथ भी पहनते थे। वे महल में स्त्रियों के साथ बहुत समय बिताते और बातचीत करते थे। गोडसे ने यह अफवाह भी दोहराई कि राजा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ‘आठ प्रकार’ के षंढों में से एक थे, विशेष रूप से वे पुरुष जो बलवान, पुरुषोचित पुरुषों के साथ रहना पसंद करते थे।
फिर भी, गोडसे ने यह स्वीकार किया कि गंगाधर राव एक अच्छे और न्यायप्रिय शासक थे। प्रजा उन्हें पसंद करती थी और वे राज्य का संचालन कुशलता से करते थे, भले ही लेखक को उनका व्यवहार अजीब लगता हो।
उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों ‘एक जिला, एक व्यंजन’ पहल के तहत राज्य के पारंपरिक खाने की चीजों की जिला-वार सूची जारी की लेकिन इस सूची में राज्य के किसी भी जिले में किसी मांसाहारी व्यंजन को जगह नहीं मिली.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
यूपी के विभिन्न जिलों में कुछ खाद्य पदार्थ हैं जो लंबे समय से किसी जगह की खास पहचान रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी पहचान को जन-जन तक पहुंचाने और दूर-दराज तक के लोगों तक पहुंचाने के लिए एक खास पहल की और हर जिले की कुछ खास व्यंजनों के रूप ब्रांडिंग करते हुए एक सूची जारी की। सरकार के मुताबिक, इस सूची को जारी करने का मकसद बेहतर ब्रांडिंग, पैकेजिंग और बाजार तक आसान पहुंच के जरिए स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा देना है।
‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) पहल के तहत तैयार की गई इस सूची में राज्य के सभी 75 जिलों को वहां प्रचलित कुछ खास व्यंजनों के साथ जोड़ा गया है। इस सूची में आगरा के पेठे, मैनपुरी की सोन पापड़ी, मथुरा के पेड़े, अलीगढ़ की कचौड़ी, वाराणसी की ठंडई, लस्सी और बनारसी पान, जौनपुर की इमरती, मऊ का लिट्टी-चोखा जैसे व्यंजन सूची में शामिल हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि 75 जिलों के लिए 208 व्यंजनों की इस सूची में ऐसे तमाम व्यंजनों को जगह नहीं मिल पाई है जिनकी न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान है। इनमें लखनऊ के मशहूर गलावटी कबाब, अवधी बिरयानी, रामपुर का मटन कोरमा और सीक कबाब जैसे व्यंजन शामिल हैं। यानी इस सूची में किसी भी मांसाहारी व्यंजन को जगह नहीं दी गई है।
सिर्फ शाकाहारी व्यंजन ही क्यों?
राज्य के मध्यम और लघु उद्योग मंत्री राकेश सचान ने इसे योजना का प्रारंभिक चरण बताया है लेकिन तमाम खाद्य विशेषज्ञों और आम लोगों ने सरकार की इस चयनात्मक पहल पर सवाल उठाए हैं।
मीडिया से बातचीत में मंत्री राकेश सचान कहते हैं, ‘व्यंजनों की यह लिस्ट अंतिम नहीं है और लोगों की राय के आधार पर इसमें बदलाव किया जा सकता है। यह लिस्ट फ्लेक्सिबल है। स्थानीय सुझावों और लोगों की मांग के आधार पर मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद खाने की चीजें यानी कूजीन्स कभी भी बदली जा सकती हैं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बनी जिला-स्तरीय समितियों ने सर्वे और बातचीत के बाद ये सुझाव तैयार किए हैं। यदि भविष्य में अन्य चीजों के बारे में सुझाव दिया जाता है, तो उन्हें भी शामिल किया जा सकता है।’
यूपी सरकार ने एक जिला एक उत्पाद की तर्ज उत्तर प्रदेश दिवस के मौके पर इसी साल 24 जनवरी को एक जिला एक व्यंजन योजना की घोषणा की थी जिसे गत चार मई को कैबिनेट की मंजूरी मिली। इसके तहत राज्य के सभी 75 जिलों से संबंधित 208 व्यंजनों की सूची अब जारी की गई है। लेकिन इस सूची में एक भी मांसाहारी व्यंजन के शामिल न किए जाने पर बहस छिड़ गई है।
यूनेस्को की मान्यता
लखनऊ की संस्कृति और विरासत पर गहरी पकड़ रखने वाले मशहूर लेखक हफीज किदवई सरकार की इस सूची को जल्दबाजी में तैयार की गई बताते हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में हफीज किदवई कहते हैं, ‘सिर्फ लखनऊ के व्यंजनों की बात करें तो यूनेस्को यहां के मशहूर व्यंजनों यानी गलावटी कबाब, बिरयानी और चाट को वर्ल्ड हेरिटेज में रखा है। यही नहीं, दुनिया के पचास बेहतरीन व्यंजनों की सूची में लखनऊ के टुंडे कबाब को 15वें नंबर पर रखा गया है। तो सवाल ये है कि जब पूरी दुनिया आपके खानों (व्यंजनों) को रिकग्नाइज कर रही है तो आप खुद उसे खारिज करने में लगे हैं। लेकिन सवाल यही है कि ओडीओसी की लिस्ट देखकर कौन खाने आता है।’
हफीज किदवई कहते हैं कि इस सूची के पीछे तात्कालिक राजनीति के अलावा और कोई वजह नहीं हो सकती। वो कहते हैं, ‘सूची को ध्यान से देखिए तो साफ दिखेगा कि इसमें सिर्फ सरकार को खुश करने का मकसद दिखता है और कुछ नहीं। मसलन, आजमगढ़ के मशहूर व्यंजन में तहरी रखी गई है। अब आप ही बताइए कि तहरी खाने के लिए आजमगढ़ कौन जाएगा। सूची बनाने वालों को कम से कम ये तो देखना चाहिए था कि किसी व्यंजन का वास्तव में उस जिले से कोई वास्ता है भी या नहीं। लखनऊ का नॉन-वेज तो दो सौ साल पुराना है। आप इतने पुराने खाने को गायब तो कर नहीं सकते, क्योंकि हम लिस्ट से गायब कर देंगे, तो लोग इसे भूल जाएंगे। लखनऊ की रेवड़ी मशहूर है, चाट मशहूर है लेकिन लखनऊ में सबसे बड़ा आकर्षण जिन चीजों का है वो नॉन-वेज खानों का है, इसे आप कैसे इग्नोर कर सकते हैं।’
-इमरान कुरैशी
कर्नाटक में चार साल पहले हिजाब पहनने पर लगी पाबंदी की वजह से जिन छात्राओं की पढ़ाई में रुकावट आ गई थी, उन्होंने अब राहत की साँस ली है।
राज्य सरकार के सिर को ढँकने वाले हिजाब की अनुमति दिए जाने के बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई करने की नई योजना बनानी शुरू कर दी है।
दिलचस्प पहलू यह है कि इससे उन लोगों को भी राहत मिली है जिनके बच्चों को कुछ शिक्षकों ने जनेऊ पहनने से रोक दिया था। दक्षिण भारत में इसे जनीवारा कहा जाता है।
मंड्या के अपने कॉलेज में हिजाब विरोधियों को 'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे लगाकर जवाब देने की वजह से मुस्कान ख़ान 'हिजाब गर्ल' कहलाने लगी थीं। वह अब अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की योजना बना रही हैं।
दूसरी ओर, सुवर्णा तीर्था उम्मीद कर रही हैं कि अन्य छात्रों को वह पीड़ा न झेलनी पड़े, जो उनके बेटे आनंद एस तीर्था अभी झेल रहे हैं।
उन्हें मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा केंद्र में जाने से पहले अपना जनेऊ उतारने के लिए कहा गया था।
सुवर्णा तीर्था ने बेंगलुरु में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘स्पष्ट निर्देश थे कि जनेऊ नहीं उतारना है। लेकिन यह पिछले साल भी हुआ और इस साल भी।’
‘उसने पीयूसी बोर्ड परीक्षा में 94 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। अच्छे कॉलेज में प्रवेश के लिए पीयूसी बोर्ड परीक्षा के 50 प्रतिशत और सीईटी परीक्षा के 50 प्रतिशत अंक लिए जाते हैं।’
कर्नाटक सरकार ने इस हफ्ते की शुरुआत में 2022 में बीजेपी सरकार की ओर से लगाए गए हिजाब प्रतिबंध को रद्द करते हुए नया आदेश जारी किया।
नए आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘छात्रों को निर्धारित ड्रेस के साथ सीमित पारंपरिक और रीति-रिवाज आधारित प्रतीक पहनने की अनुमति है।’
आदेश के अनुसार, ‘स्वीकृति योग्य ऐसे धार्मिक और पारंपरिक प्रतीकों में पगड़ी, पवित्र धागे, शिव माला, रुद्राक्ष, हिजाब या अन्य समान सामुदायिक और पारंपरिक प्रतीक शामिल हो सकते हैं, जिन्हें छात्र आम तौर पर पहनते हैं। हालाँकि, यह अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान में बाधा नहीं डालना चाहिए।’
-मनीष आजाद
दुनिया जितना ‘मार्टिन लूथर किंग’ को जानती है, उतना उन्हीं के समकालीन ब्लैक लीडर ‘मैल्कम एक्स’ को नहीं जानती। जबकि आज उनके विचार कहीं ज्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं।
1966 में शुरू हुआ ब्लैक पैंथर आंदोलन सीधे-सीधे ‘मैल्कम एक्स’ के विचारों और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित रहा है। ब्लैक पैंथर की स्थापना के ठीक एक साल पहले 21 फरवरी 1965 को मैल्कम एक्स को उस समय 15 गोलियाँ मारी गईं, जब वे ‘हरलेम’ में एक लेक्चर देने जा रहे थे।
मैल्कम एक्स के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है कि मैल्कम एक्स का पूरा जीवन व उनके विचार काले लोगों के दूसरे महान नेता ‘मार्टिन लूथर किंग’ का एक तरह से ‘एंटीथीसिस’ रचता है। दोनों के विचारों व व्यक्तित्व की छाया थोड़ा बदले रूप में हमारे यहां के दलित आंदोलन में भी दिखाई पड़ती है। इसलिए मैल्कम एक्स को समझने का प्रयास कहीं न कहीं अपने देश के दलित आंदोलन को भी समझने का प्रयास है।
मैल्कम एक्स का जन्म 19 मई 1925 को अमेरिका के ‘ओमाहा’ में एक गरीब परिवार में हुआ था। इनके पिता एक राजनीतिक व्यक्ति थे और काले लोगों के आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदार थे। इसके अलावा प्रसिद्ध ब्लैक लीडर और ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’ अभियान के जनक ‘मार्कस गार्वे’ [Marcus Garvey] के समर्थक थे। इसी कारण से वे गोरों के प्रतिक्रियावादी गुप्त संगठन ‘कू क्लक्स क्लान’ [Ku Klux Klan] के निशाने पर थे। अंतत: जब मैल्कम एक्स महज 6 साल के थे तो 1931 में उनके पिता की हत्या इसी संगठन के कुछ लोगों ने कर दी। इस घटना ने मैल्कम को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया और गोरों के प्रति नफरत के बीज बो दिए। इसके अलावा एक अन्य घटना ने मैल्कम को बुरी तरह हिला दिया था। एक बार उनके घर में आग लग गई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया। फायर ब्रिगेड वालों ने जब देखा कि आग एक काले के घर में लगी है तो बिना आग बुझाए ही वापस लौट गए। बाद में अमेरिकी लोकतंत्र के प्रति उनके जो विध्वंसक विचार बने, उनमें इन घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब वह किशोरावस्था में थे तो उन्हें किसी छोटे अपराध के लिए 6 साल जेल की सजा काटनी पड़ी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि मैंने अपने जीवन की अधिकांश पढ़ाई इसी दौरान की। जेल से निकलने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू होती है। सबसे पहले उन्होंने ईसाई धर्म छोडक़र मुस्लिम धर्म ग्रहण कर लिया और काले मुस्लिम लोगों के संगठन ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ के सदस्य हो गए। उस दौरान ईसाई धर्म को गोरों के साथ जोडक़र देखा जाता था। इसी कारण इस दौरान बहुत से काले लोगों ने सामूहिक तौर पर प्रतिक्रियास्वरूप ईसाई धर्म छोडक़र इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। यहीं से मैल्कम एक्स के समाजवाद के प्रति झुकाव की भी शुरुआत होती है। गोरों की राष्ट्रीयता के विरुद्ध ‘नेशन ऑफ इस्लाम’, ‘ब्लैक नेशनलिज्म’ की बात करता था। इसलिए नौजवानों के बीच यह बेहद लोकप्रिय था।
नेशन ऑफ इस्लाम के लीडर ‘इलियाह मुहम्मद’ की कथनी और करनी में अंतर देखने और खुद समाजवाद की तरफ झुकने के कारण दोनों में काफी तनाव आ गया और अंतत: मैल्कम एक्स ने नेशन ऑफ इस्लाम छोडक़र ‘मुस्लिम मास्क’ की स्थापना की और अंतत: सेकुलर विचारधारा तक पहुँचते हुए अपनी मृत्यु के कुछ ही समय पहले ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ अफ्रो-अमेरिकन यूनिटी’ की स्थापना की।
इसी समय मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी सक्रिय थे। उनका ‘सिविल राइट्स मूवमेंट’ अपने उभार पर था। कालों के मताधिकार को व्यवहार में हासिल करने के लिए प्रसिद्ध ‘सेल्मा मार्च’ 1964 में ही हुआ था। इस घटना के 50 साल होने पर ‘सेल्मा’ नाम से एक फिल्म भी रिलीज हुई थी जो काफी चर्चित हुई थी।
बहरहाल ‘मैल्कम एक्स’ और ‘मार्टिन लूथर’ दोनों ही समस्या और समाधान को दो विपरीत नजरिए से देख रहे थे।
मार्टिन लूथर किंग को अमेरिकी लोकतंत्र के मूल्यों में काफी विश्वास था और वे इन मूल्यों और अमेरिकी राजनीति के बीच एक अंतर्विरोध व तनाव देख रहे थे। सरल शब्दों में कहें तो वे इसी व्यवस्था में अमेरिकी लोकतंत्र के ‘मूल्यों’ को जमीन पर उतारते हुए काले लोगों के अधिकारों की गारंटी चाहते थे।
जबकि मैल्कम ऐसे किसी अमेरिकी मूल्य के अस्तित्व से ही इंकार करते थे। बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र को ‘मैल्कम एक्स’ एक साम्राज्य के रूप में देखते थे। और इसके विध्वंस में ही काले लोगों की मुक्ति देखते थे। बाद में समाजवाद की ओर झुकने के बाद उन्होंने काले लोगों की मुक्ति को गोरे उत्पीडि़त मजदूरों व अन्य शोषित समुदायों के साथ जोडक़र देखना शुरू किया।
मैल्कम एक्स का कहना था कि अमेरिका विदेशों में ही नहीं बल्कि देश के अंदर भी एक उपनिवेश बनाए हुए है जिसमें मुख्यत: काले लोग और यहां के मूल निवासी ‘रेड इंडियंस’ हैं। मैल्कम एक्स का यह कथन सत्य के काफी करीब है।
कोलंबस के आने के समय आज के अमेरिका में वहां के मूल निवासियों की संख्या करीब 1 करोड़ 50 लाख थी। 1890 तक आते-आते यह महज 2 लाख 50 हजार तक रह गई। यानी 98 प्रतिशत लोग यूरोपीय लोगों की क्रूरता के शिकार हो गए। इस पर एक बहुत ही प्रामाणिक डॉक्यूमेंट्री ‘द कैनरी इफेक्ट’ है।
‘हावर्ड जिन’ ने अपनी किताब A PeopleÓs History of the United States में साफ बताया है कि अमेरिकी लोकतंत्र वहां के मूल निवासियों के जनसंहार और काले लोगों की गुलामी पर खड़ा है। मैल्कम एक्स इसी अर्थ में ‘भीतरी उपनिवेश’ की बात कर रहे थे। ऐसा ही भीतरी उपनिवेश ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी है। ऑस्ट्रेलिया के इस भीतरी उपनिवेश पर ‘जॉन पिल्जर’ ने बहुत ही बेहतरीन फिल्म ‘यूटोपिया’ बनाई है।
इसी संदर्भ में मैल्कम एक्स ने अल्जीरिया के क्रांतिकारी ‘फ्रांह्ल5 फैनॉन’ की बहुचर्चित किताब The Wretched of the Earth का कई बार जिक्र किया है। इसी अर्थ में एक जगह मैल्कम एक्स ने लिखा है- ‘‘यदि गोरों की वर्तमान पीढ़ी को उनका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे खुद ‘गोरे-विरोधी’ हो जाएंगे।’’ इस कथन के बहुत ही गहन मायने हैं।
हम भी भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि यदि ब्राह्मणों और ऊँची जाति की वर्तमान पीढ़ी को उसका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे भी ‘ब्राह्मणवाद विरोधी’ हो जाएंगी।
मार्टिन लूथर किंग जहां काले लोगों के गोरों के साथ एकीकरण के हिमायती थे वहीं मैल्कम इसके खिलाफ थे। और वर्तमान व्यवस्था में इसे असंभव मानते थे। इसलिए वे हर क्षेत्र में कालों की ‘अलग पहचान’ के हिमायती थे। काले लोगों में पैदा हुए मध्य वर्ग के वे मुखर आलोचक थे। उनके अनुसार यही वर्ग गोरे लोगों के साथ एकीकरण के लिए लालायित रहता है। भले ही इसके लिए उसे अपनी आत्मा ही क्यों न बेचनी पड़े। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की तरफ से देखें तो यह एकीकरण काले लोगों के एक हिस्से को राजनीतिक रूप से नपुंसक बनाने की साजिश है। इस संदर्भ में मैल्कम एक्स ने एक बहुत ही अच्छा रूपक दिया है। उन्होंने कहा कि जब आप मछली पकडऩे के लिए चारा डालते हैं तो मछलियों को लग सकता है कि आप उनके दोस्त हैं और उनके लिए चारा डाल रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि चारे के ऊपर एक हुक भी लगा है जो उन्हें अपने समुदाय से अलग करके उनकी जान ले लेगा। मैल्कम एक्स के इस कथन को हम अपने देश में भी लागू करके इसकी सच्चाई को परख सकते हैं।
-संजय श्रमण
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट आई है, बड़े शहरों में शहरी सीवर और नालों के पानी का खेती में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है और सेहत के साथ गंभीर खिलवाड़ हो रहा है। शहरों की ज़मीन का पानी सूख रहा है और किसान बेचारे कहीं से भी पानी लेने को मजबूर हैं।
ये सब देखकर भारत के नगरीकरण और उससे जुड़ी समस्याओं पर बहस होनी चाहिए, लेकिन नहीं होगी।
* * *
नगर, नागर, नगरीकरण और नागरिकता - ये भारतीय सभ्यता के लिए आधारभूत विशेषताएं रही हैं। हमने हड़प्पा मोहनजोदड़ो के जमाने से नगर बसाए हैं। इस देश की सभ्यता और संस्कृति के निर्माता नाग लोग रहे हैं, उन्हीं से नागरी और देवनागरी शब्द आए हैं।
लेकिन हड़प्पा के पतन के बाद बहुत सदियों तक हमारे समाज में नगरों के ख़िलाफ़ एक मनोविज्ञान निर्मित हुआ है। प्रोफ़ेसर निहार रंजन रे ने इसपर लिखा है। भारत में हड़प्पा के बाद हमारा समाज काफ़ी हद तक सामूहिक रूप से साथ रहने, साथ भोजन करने साथ नहाने और साथ काम करने में अक्षम होता गया है।
जब आप कई लोगों के साथ मिलकर कुछ अच्छा नहीं कर पाते हैं तो क्या होगा? यही होगा जो आज दिल्ली में हो रहा है। राजधानियाँ और राज-नगर उनकी स्वच्छता और व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। लेकिन भारत में राजधानी या महानगर का अर्थ स्वच्छता और व्यवस्था के अर्थ में क्या हो सकता है आप जानते ही हैं।
भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया को देखिए। जैसे गाँवों में कोई जजमान अपने कारिंदों या कमीनों को सिर्फ जिंदा रहने भर की जमीन दे देता था और कहता था ‘बच्चू अब काम पे लग जा.’ गांवों में जाकर देखिए बहुत बूढ़े लोगों से बात कीजिए आपको पता चलेगा भारत में गांव कैसे बसाए जाते थे। गांव पटेल या गांव का मुखिया अपने गाँव के लिए लोहा, लकड़ी, चमड़ा, कपड़ा, मिट्टी आदि-आदि के कारीगरों और सफ़ाई करने वालों को दूसरे गांवों या इलाकों से बुलवाते थे।
ये गऱीब कारीगर वहाँ आकार बसते थे, उनके अछूत या सछूत होने के अनुसार उन्हें ‘उचित दिशा’ और ‘उचित दूरी’ पर जगह दे दी जाती थी. फिर जजमानी के सिस्टम में उन्हें उनकी मेहनत का मुआवजा साल में चार छह बार दिया जाता था। वे अपना काम और रहने की जगह नहीं बदल सकते थे, ना जमीन खऱीद सकते थे, उन्हें अपने आवास, अपने पानी, अपने भोजन की व्यवस्था ख़ुद करनी होती थी। वे गाँव से या गाँव के व्यवस्थापकों से इस संबंध में कोई माँग नहीं कर सकते थे।
अब आज के शहरों को देखिए. ठीक यही मॉडल चल रहा है. इसे मैं भारत में ‘शहरीकरण का जजमानी मॉडल’ कहता हूँ।
शहरों की झुग्गी झोपडिय़ों में जाइए। वे लोग गाँव से शहर कैसे आते हैं? ठीक उसी तरह जैसे जजमानी व्यवस्था में होता था। बस अंतर इतना है कि पहले जजमान बुलाता था, आजकल कारखाना और बाजार बुलाता है। गांव आकर बसने वालों की फि़क्र ना जजमान को होती थी, ना आजकल शहरी नियंताओं और बाजार को होती है. वे कारीगर और गऱीब मज़दूर आदि कहीं भी जियें मरें, कुछ भी खायें पियें इन्हें कोई मतलब नहीं, बस अपनी औक़ात में रहते हुए अपना अपना काम करते रहिए। गांव में सोशल मोबिलिटी को रोकने में जजमानी सिस्टम बहुत ताकतवर भूमिका निभाता था। अब उसने शहर में आकर नया अवतार धर लिया है।
हड़प्पा के पतन के बाद नगरों के सामूहिक जीवन की शैली का पतन कैसे और क्यों हुआ? इसपर गहरी रिसर्च की आवश्यकता है। आपको सोलह महाजनपदों के काल में असल में महानगर दिखाई देंगे। रामायण महाभारत आदि में नगरों का वर्णन है, अशोक और उनके जैसे अन्य राजाओं के चक्रवर्तित्त्व के ऐतिहासिक अनुभव से राम, कृष्ण रावण, कौरव, पांडव आदि की कथाएँ जन्मीं। ये मगध साम्राज्य का शिखर काल था। फिर क्या हुआ? भारत में गुप्त काल में अचानक कुछ हुआ है। भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार एकदम से बहुत कमजोर हुआ है फिर इष्ट-देव, ईश्वर और ईश्वरभक्ति का जन्म हुआ। उसके बाद आज तक भारत लडख़ड़ा रहा है।
भारत के इस सभ्यतागत और नैतिक पतन पर कोई गंभीर बात करना भी कठिन है।
आज तो असंभव सा हो गया है।
दिल्ली में सीवर के पानी से ‘हरी-भरी’ मल्टीविटामिन सब्जी की खेती कोई छोटी-सी बात नहीं है. जमीन का पानी सूख रहा है और गरीब किसानों के पास कोई और उपाय नहीं है. ये कुदरत का तरीका है, आप जो विटामिन खाकर ‘छोड़ते’ हैं, वे आपकी थाली में वापस आ जाते हैं. कुदरत कह रही है तुम जो मुझे दोगे मैं वही तुम्हें दूँगी-‘तेरा तुझको अर्पण’
-मनीष आजाद
यह फिल्म ऑस्ट्रेलिया के एक ऐसे नासूर को छूती है जिस पर आमतौर पर कोई ऑस्ट्रेलियाई बात करना पसंद नही करता।
यह मुद्दा है ऑस्ट्रेलिया के ‘मूल निवासियों’ यानी काले लोगों का। अमरीका की तरह ही ऑस्ट्रेलिया में भी यूरोपियन के आने से पहले यहाँ एक भरी पूरी सभ्यता निवास करती थी, जिन्हे जीत कर और उनकी बड़ी आबादी को मारकर ही आस्ट्रेलिया पर कब्जा किया गया था। तभी से वहां के मूल निवासी एक गुमनामी का जीवन जीते हुए गोरे ऑस्ट्रेलियन लोगों के तमाम अत्याचारों को सह रहे हैं।
फिल्म देखकर यह समझ में आता है कि यह दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद से कहीं अधिक भयावह है।
मजेदार बात यह है कि जॉन पिल्जर दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय तक प्रतिबंधित रहे हैं, और इस प्रतिबंध का कारण था उनकी एक फिल्म जो उन्होने वहां के रंगभेद के खिलाफ बनाई थी।
दरअसल ‘यूटोपिया’ फिल्म जॉन पिल्जर की ही एक पुरानी फिल्म ‘दी सीक्रेट कन्ट्री’ [ञ्जद्धद्ग ह्यद्गष्ह्म्द्गह्ल ष्शह्वठ्ठह्लह्म्4] का विस्तार है। जॉन पिल्जर ने यह फिल्म 1985 में बनाई थी।
‘यूटोपिया’ फिल्म के प्रदर्शन के बाद एक इंटरव्यू में जॉन पिल्जर ने कहा कि ‘दी सीक्रेट कन्ट्री’ बनाने के दौरान, उन्हें बिल्कुल भी अनुमान नहीं था कि 25 साल बाद भी उन्हे इसी विषय पर फिल्म बनाने के लिए फिर बाध्य होना पड़ेगा, क्योकि स्थितियां तब से अब तक तनिक भी नहीं बदली है। वास्तव में इस फिल्म में पुरानी फिल्म के व्यूजुअल [1द्बह्यह्वड्डद्यह्य] का भी प्रयोग किया गया है। जिन्होने पुरानी फिल्म देखी है वे इसे महसूस कर सकते है।
जॉन पिल्जर उन लोगों के पास भी जाते है जिनसे वे 25 साल पहले अपनी पिछली फिल्म के दौरान मिले थे। इन 25 सालों का उनका अनुभव यह बताता है कि स्थितियां और खराब ही हुई है!
इस दौरान किसी ने पुलिस के हाथों अपना बेटा खो दिया है तो सरकारी एजेंसियों द्वारा बहुतों का बच्चा चुरा लिया गया है।
मूल निवासियों के बच्चों को चुराने की बात वहां बहुत सुनियोजित तरीके से घटित हुई। वहां के सामाजिक कार्यकर्ता इसे ‘पूरी पीढ़ी को चुरा लेने’ [ह्यह्लद्गड्डद्यद्बठ्ठद्द ड्ड द्दद्गठ्ठद्गह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ] की संज्ञा देते हैं।
यह एक तरह से उनकी कौम को छिन्न भिन्न कर देने और खत्म कर देने की साजिश थी।
चोरी किये हुए बच्चों को या तो गोरे लोगों के घरों में नौकर रख लिया जाता था या उन्हें किसी को गोद दे दिया जाता था।
दरअसल फिल्म की शुरुआत ही एक स्तब्ध कर देने वाले वक्तव्य से होती है। मूल निवासियों की ‘समस्या’ के समाधान के तौर पर एक खनन माफिया कहता है कि ‘मूल निवासियों के पीने के पानी में ऐसा केमिकल मिला देना चाहिए कि उनकी प्रजनन क्षमता खत्म हो जाये। इस तरह कुछ समय बाद उनकी पूरी कौम ही खत्म हो जायेगी।’
फिल्म की शुरुआत में खनन माफिया का यह वक्तव्य बाद में और साफ हो जाता है, जब यह पता चलता है कि जहां जहां ये मूल निवासी बसे हुए है, कमोबेश वहीं पर यूरेनियम के भंडार भी है। ऑस्ट्रेलिया में दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है।
फिल्म का यह हिस्सा निश्चय ही आपको भारत की याद दिलाएगा। यहां भी आदिवासियों के खिलाफ एक जंग जारी है, और वजह वही है-खनिज सम्पदा!
जॉन पिल्जर का कैमरा जब आस्ट्रेलिया के ‘वार मेमोरियल’ में आता है तो देखकर हैरानी होती है कि यहां मूल निवासियों की तस्वीरें जानवरों- मसलन हाथी, कंगारू आदि के साथ लगी हैं, जबकि गोरे ऑस्ट्रेलियाई लोगों की तस्वीरें अलग लगी हुई हैं।
यह चीज गोरे ऑस्ट्रेलियाई लोगों की मूल निवासियों के प्रति उनकी सोच को दर्शाता है।
क्या यही सोच हमारे यहां भी तमाम शहरी लोगों की अपने आदिवासी समुदाय के लोगों के प्रति नहीं है?
इस ‘वार मेमोरियल’ में आस्ट्रेलिया द्वारा किये गये तमाम युद्धों का जिक्र है, लेकिन यहां आने वाले पहले यूरोपियनों ने, जो भीषण और क्रूर युद्ध यहां के मूल निवासियों के खिलाफ छेड़ा था, उसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।
जॉन पिल्जर की यह फिल्म यह बताती है कि मूल निवासियों के खिलाफ यह युद्ध कभी नहीं रुका और बदले रूपों में यह आज भी जारी है। इस युद्ध का एक उदाहरण फिल्म में बहुत विस्तार से बताया है।
2007-08 में वहां के प्रमुख टीवी चैनल एबीसी [्रक्चष्ट] की तरफ से एक रिपोर्ट जारी हुई कि एक खास जगह रहने वाले सभी मूल निवासियों में उनके बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, क्योकि इस कौम के वयस्क‘पेडोफिल’ [क्कद्गस्रशश्चद्धद्बद्यद्ग] रोग से पीडि़त हैं और बड़े पैमाने पर ड्रग्स का इस्तेमाल करते है। ‘पेडोफिल’ से पीडि़त व्यक्ति सेक्स एडिक्ट हो जाता है और अपने आसपास के बच्चों को अपना शिकार बनाता है।
रिपोर्ट को विश्वसनीय बनाने के लिए एक आदमी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया गया और दावा किया गया कि यह उसी कौम का आदमी है और सुरक्षा कारणों से इसका चेहरा और पहचान छुपाई गयी है। यह रिपोर्ट एबीसी न्यूज चैनल पर हमारे यहां की तरह ही 24 घंटे दिखाई जाने लगी। इस 24 घंटे न्यूज चैनल को जान पिल्जर ने बहुत ही सटीक नाम दिया है- व्यूजुअल च्यूइंगम [1द्बह्यह्वड्डद्य ष्द्धद्ग2द्बठ्ठद्द द्दह्वद्व]
बहरहाल इस ‘व्यूजुअल च्यूइंगम’ की आड़ लेकर सरकारी एजेंसियां सक्रिय हो गयी और उस एरिया के मूल निवासियों पर पुलिस का छापा पडऩे लगा और बच्चों को बचाने के नाम पर उनसे उनके अपने बच्चे छीने जाने लगे; और उन्हें 200-300 किलोमीटर दूर के किसी अनाथालय में पहुंचाया जाने लगा।
बाद में कुछ साहसी व खोजी पत्रकारों ने इस पूरे अभियान का पर्दाफाश किया और पता लगा कि यह पूरी कहानी मूल निवासियों को बदनाम करने और उन्हे उस खास जगह से हटाने के लिए रची गयी थी, क्योंकि उस क्षेत्र में यूरेनियम होने की संभावना बताई जा रही थी।
यह भी साफ हुआ कि इस पूरे अभियान को वहां की खनन कंपनियां प्रायोजित कर रही थी। जिस व्यक्ति को मूल निवासियों के बीच का बताकर उसका वक्तव्य लगातार प्रसारित किया जा रहा था, वह सरकार का आदमी निकला और वह इस पूरे साजिश का हिस्सा था।
बाद में सरकार ने तो औपचारिक माफी मांग ली, लेकिन एबीसी न्यूज चैनल ने अपनी बेहयायी बरकरार रखी और कोई बयान नहीं दिया। फिल्म का यह हिस्सा बहुत ही ताकतवर और स्तब्ध कर देने वाला है।
-आर.के.जैन
18 मई 1974 की सुबह यानी आज से ठीक 51 साल पहले। प्रधानमंत्री आवास में सुबह से ही चहल-पहल थी। इंदिरा गांधी लोगों से मिल जरूर रही थीं, लेकिन अंदर से बेचैन थीं। उन्होंने करीब 8.30 बजे अपने सेक्रेटरी पीएन धर को आते देखा, तो लगभग दौड़ते हुए खुद ही उनके पास पहुंच गईं। इंदिरा ने पूछा- क्या हुआ? धर बोले- बुद्ध मुस्कुराए हैं। इतना सुनते ही इंदिरा ने सुकून की एक गहरी और लंबी सांस ली।
आज इस घटना को 51 साल पूरे हो चुके हैं। जब भारत ने पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया था। आज जानते हैं उस टेस्ट की सीक्रेट कहानी...
1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद मशहूर वैज्ञानिक होमी भाभा ने देश को परमाणु हथियार संपन्न बनाने पर काम शुरू कर दिया था, लेकिन 24 जनवरी 1966 को होमी भाभा की विमान दुर्घटना में मौत हो गई। भारत के न्यूक्लियर पावर बनने के सपनों को ये बड़ा झटका था।
भाभा के बाद विक्रम सारा भाई को एटॉमिक एनर्जी कमीशन यानी ्रश्वष्ट का अध्यक्ष बनाया गया। ये वो समय था जब भारत कर्ज में डूबा हुआ था। इस वक्त न्यूक्लियर टेस्ट की बात ठंडी पड़ गई। विक्रम साराभाई के निधन के बाद भाभा के शिष्य होमी सेठना को जिम्मेदारी मिली।
1971 मे पाकिस्तान से युद्ध में जब अमेरिका ने अपना 7वां बेड़ा भेजा और परमाणु बम की धमकी दी तो इंदिरा को लगा भारत को भी इसका जवाब तैयार करना होगा। इसके बाद इंदिरा ने परमाणु बम कार्यक्रम को तेजी से बढ़ा दिया।
1972 में इंदिरा ने परमाणु बम बनाने के लिए मौखिक आदेश दिया। तब होमी सेठना ने कहा कि मैडम हमें 18 महीने दीजिए। उस समय परमाणु बम परीक्षण के लिए 20 किलो प्लूटोनियम की जरूरत थी।
परमाणु ऊर्जा करार के तहत भारत ने कनाडा से प्लूटोनियम लिया था, जिसका उपयोग पूर्णिमा रिएक्टर के लिए किया जा रहा था। बाद में इसका उपयोग ऊर्जा की बजाय बम बनाने में किया गया। 1973 तक मटेरियल लेवल की सारी परेशानी लगभग दूर हो चुकी थी ।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के तत्कालीन निदेशक राजा रमन्ना अपनी बायोग्राफी ‘इयर्स ऑफ पिल्ग्रिमेज’में लिखते हैं कि परमाणु परीक्षण के लिए हमने पोकरण का चयन किया, क्योंकि यहां इतनी आबादी नहीं थी। न ही बहुत ज्यादा जमीनी संसाधन थे।
पोकरण रेंज के आसपास कई गांव हैं। ऐसा ही एक गांव खेतोलाई के स्कूल प्रिंसिपल सोहन राम विश्नोई बताते हैं कि 1960 के दशक में रक्षा विभाग ने उनके पिता और सैकड़ों किसानों को उनकी जमीन बेचने के लिए मजबूर किया था। तब ये जमीन चार रुपए बीघा पर खरीदी गई थी। लोग इसका विरोध कर रहे थे। 1974 में जब विरोध बढ़ा तो सरकार ने मुआवजा बढ़ाकर 20 रुपए बीघा कर दिया था।
आर्मी ने कुआं खोदा तो पानी निकल आया, जबकि सूखे कुएं की तलाश थी ।
नयूक्लियर वेपन आर्काइव के अनुसार, जोधपुर की 61 रेजिमेंट पुल और बंकर बनाने की एक्सपर्ट थी। उसे ही 107 मीटर गहरा एक शाफ्ट बनाने का काम सौंपा गया। जवानों को बस इतना बताया गया कि भूकंप को लेकर वैज्ञानिकों को कोई प्रयोग करना है।
लोकल कमांडर ने इसे यह कहकर टाल दिया था कि ये उनका काम नहीं है। इसके बाद सेनाध्यक्ष जनरल गोपाल गुरुनाथ बेवूर को दखल देना पड़ा। उन्होंने इसके मौखिक आदेश दिए कि ये अपना भी काम है। इसके बाद जवानों ने कुएं की खुदाई की।
बाहरी दुनिया को बताया गया कि ह्रहृत्रष्ट गैस के कुंओं के लिए खुदाई कर रही है। लोकल लोगों में बात फैलाई गई कि सेना के लिए पानी के कुएं खोदे जा रहे हैं। जनवरी 1974 में खुदाई के दौरान भूमिगत जल आ गया। खुदाई करने वाले जवान बहुत खुश हुए, लेकिन वैज्ञानिक बहुत निराश हुए। उन्हें परमाणु परीक्षण के लिए सूखा कुआं चाहिए था। वैज्ञानिकों ने उस कुएं को छोड़ दिया।
इसके बाद एक और गांव खेतोलाई में खुदाई की गई। सूखे कुएं की पहचान के लिए एक लोकल जल विशेषज्ञ को भी बुलाया गया। इस तरह से सेना ने तय समय 15 फरवरी 1974 को सूखा कुआं खोद दिया, जिसे वैज्ञानिक शाफ्ट कहते थे।
भारत की अहम हस्तियों की ओर से आईं हाल की दो टिप्पणियों ने भारत-पाकिस्तान संबंधों के भविष्य पर चर्चा को फिर से जि़ंदा कर दिया है।
दोनों ने ये संकेत दिया है कि संवाद के रास्ते खुले रखना महत्वपूर्ण है।
आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को ‘पाकिस्तान के साथ संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिएं।’ हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के प्रति कड़े रुख़ में कोई नरमी नहीं बरतनी चाहिए।
होसबाले के बयान के बाद पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज नरवणे ने भी संपर्क बनाए रखने के विचार का समर्थन किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं’ और उनकी रोज़मर्रा की चिंताएं समान हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच संपर्क बने रहने चाहिए क्योंकि इससे संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
इसके जवाब में, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन टिप्पणियों को 'सकारात्मक' बताया और कहा कि तनावपूर्ण संबंधों के बीच संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार करना स्वागत योग्य है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाज मजबूत होगी। पिछले कई महीनों से, बल्कि वर्षों से जो युद्ध भडक़ाने वाली बयानबाज़ी और आक्रामकता देखने को मिल रही है, वह ख़त्म होगी और इस तरह की और आवाज़ों के लिए रास्ता साफ़ करेगी। बेशक, अब देखना यह है कि भारत में इन बातों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं।’
उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान बैकचैनल संपर्कों को लेकर किसी भी अटकल पर टिप्पणी नहीं करेगा।
उन्होंने कहा, ‘अनौपचारिक बातचीत या बैकचैनल के बारे में- मुझे कोई जानकारी नहीं है और मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। अगर मुझे इस पर टिप्पणी करनी होती तो फिर कोई बैकचैनल नहीं रहेगा। बैकचैनल या अनौपचारिक बातचीत, नाम अपने आप में स्पष्ट है।’
पाकिस्तान में आरएसएस को व्यापक रूप से एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जो भारत की सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था के साथ कऱीब से जुड़ा हुआ है।
पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रियाएं
बीबीसी से बात करते हुए, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने इस बयान के अधिक अर्थ निकालने को लेकर सावधान रहने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान को इससे बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए।’
उन्होंने कहा, ‘जहाँ तक भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने का सवाल है, यह याद रखना ज़रूरी है कि भारत जम्मू-कश्मीर पर अब भी अडिग है। मैं इस विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए भारत की ओर से कोई प्रतिबद्धता नहीं देखता।’
बासित ने कहा कि इस्लामाबाद को ‘द्विपक्षीय संवाद की ऐसी एक और प्रक्रिया से बचना चाहिए, जो भारत को कश्मीर के अपने विलय को और मज़बूत करने में मदद करती है।’
उनके अनुसार, दोनों देश बैकचैनल कूटनीति के ज़रिए बातचीत कर सकते हैं, लेकिन 'कश्मीर और आतंकवाद' पर चर्चा केंद्र में बनी रहनी चाहिए।
वह यह भी तर्क देते हैं कि आरएसएस का यह बयान, ‘अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए पहले से सोचा-समझा लगता है’ और इसका उद्देश्य ऐसे समय में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को परखना भी हो सकता है, जब उनके मुताबिक भारत ‘पाकिस्तान और अमेरिका के बढ़ते आपसी तालमेल से असहज महसूस कर रहा है।’
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच हाल में संबंधों में आई गर्मजोशी के संकेतों के साथ-साथ अमेरिका चीन संबंधों का जि़क्र करते हुए, बासित कहते हैं, ‘चीन-अमेरिका शिखर बैठक भी एक तरह से भारत की तुलना में पाकिस्तान के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। क्वॉड भी ख़तरे में पड़ सकता है।’
ध्यान देने योग्य है कि ‘क्वॉड’- अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक समूह है- जिसे आम तौर पर चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव का मुक़ाबला करने के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जाता है।
भारत की इन वरिष्ठ हस्तियों के इन बयानों पर राजनेताओं, विश्लेषकों और टिप्पणीकारों की ओर से सावधानी भरी लेकिन काफ़ी हद तक सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आई हैं।
पाकिस्तान में आरएसएस की छवि को देखते हुए, कई लोगों ने अप्रत्याशित बताया। कई राजनेताओं और पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। पूर्व वित्त मंत्री असद उमर ने इन टिप्पणियों को एक महत्वपूर्ण घटना बताते हुए लिखा, ‘भारत के महत्वपूर्ण लोगों की ओर से पाकिस्तान के साथ फिर से जुडऩे की बात करते देखना अच्छा है।’
होसबाले और पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे, दोनों की टिप्पणियों का जि़क्र करते हुए उन्होंने कहा कि ‘दक्षिण एशिया में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों’ के हित के लिए ‘पाकिस्तान और भारत के बीच मतभेदों का समाधान होना बेहद ज़रूरी है।’
पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने इस बयान को ‘रुख़ में स्वागत योग्य बदलाव’ बताया और कहा कि बातचीत की शुरुआत भी ‘दोनों देशों की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकती है।’
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर संबंध सुधरते हैं तो ‘हिन्दू और मुस्लिम- दोनों तरह के अतिवादी कमज़ोर पड़ेंगे।’ पाकिस्तानी राजनेता मुशाहिद हुसैन सैयद ने इसे ‘ताजग़ी भरा सकारात्मक बयान’ बताते हुए स्वागत किया और लोगों के बीच संपर्क की अपील की सराहना की। उन्होंने इसे ‘समय की ज़रूरत’ बताया।
राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार रज़ा रूमी ने इन टिप्पणियों को ‘वास्तव में उत्साहजनक’ बताया, ख़ासकर ‘लोगों के बीच संपर्क, संवाद, वीज़ा और शांति स्थापित करने में नागरिक समाज की भूमिका’ के संदर्भ को।
उन्होंने कहा, ‘अब देखना यह है कि क्या भारतीय सरकार उस वैचारिक ताक़त की सलाह मानती है, जिसके सहारे उसकी सत्ता कायम है।’
वरिष्ठ पत्रकार कामरान यूसुफ़ ने कहा कि इन टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि ‘सीमा के उस पार कुछ समझ और सोच विकसित हो रही है कि भारत का मौजूदा रुख़ टिकाऊ नहीं है।’
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आरएसएस की प्रभावशाली भूमिका के बावजूद भारत के भीतर प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही है।
हालांकि, कुछ पर्यवेक्षक इस बयान से बहुत अधिक अर्थ निकालने को लेकर अब भी सतर्क बने हुए हैं। पत्रकार शहज़ाद इक़बाल ने कहा कि ‘भारतीय विदेश नीति में तत्काल बदलाव के कोई संकेत नहीं हैं’ और निकट भविष्य में दोनों देशों के संबंधों में बदलाव की संभावना कम है।
पूर्व शिक्षा मंत्री शफक़त महमूद ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि भारत से आने वाली ऐसी आवाज़ों का स्वागत करते समय पाकिस्तान का विदेश कार्यालय ‘स्वाभाविक रूप से सतर्क’ रहा है, क्योंकि ‘अतीत में ऐसी कई पहलें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचीं।’
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘अगर भारत में गंभीरता का इरादा दिखाई देता है’, तो उसे पाकिस्तान में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है।
कर्नाटक में सरकार ने ना केवल स्कूल-कॉलेजों में 2022 में हिजाब पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है बल्कि नए आदेश के तहत स्टूडेंट्स को हिजाब के अलावा कलावा, रुद्राक्ष और जनेऊ जैसे धार्मिक प्रतीकों को भी पहनने की अनुमति दी है।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 13 मई को स्कूलों और कॉलेजों में धार्मिक प्रतीकों को पहनावे के रूप में शामिल करने संबंधी एक नया आदेश जारी किया। इस नए आदेश के तहत छात्रों को स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म के साथ 'सीमित पारंपरिक और प्रथा-आधारित प्रतीक' पहनने की अनुमति दी गई है। इन पारंपरिक प्रतीकों में हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, हाथ में पहने जाने वाले कलावा और रुद्राक्ष जैसी चीजें शामिल हैं।
फरवरी 2022 में कर्नाटक की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनकर स्कूल-कॉलेज जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। राज्य सरकार का नया आदेश सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, सहायता प्राप्त संस्थानों और राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले निजी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होगा।
हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूनिफॉर्म अब भी अनिवार्य रहेगी, लेकिन इन प्रतीकों को अतिरिक्त वस्तुओं के रूप में पहना जा सकेगा। आदेश के मुताबिक, किसी भी छात्र को इन प्रतीकों को धारण करने की वजह से प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा और न ही उसे ऐसे प्रतीक पहनने या हटाने के लिए मजबूर किया जाएगा।
क्यों आया ये आदेश?
कर्नाटक सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने मीडिया को बताया कि ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब छात्रों को धार्मिक प्रतीकों की वजह से उनकी पढ़ाई-लिखाई में बाधा पहुंची है। उनका कहना था, "धार्मिक रीति-रिवाज छात्रों की शिक्षा और भविष्य के बीच बाधा नहीं बनने चाहिए। 24 अप्रैल की उस घटना से मुख्यमंत्री को बहुत दुख हुआ था जब बेंगलुरु में केसीईटी (कर्नाटक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा में हिजाब और जनेऊ पहनकर आए छात्रों को परीक्षा में प्रवेश देने से रोक दिया गया था। इस तरह की बातें बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। हमें यह फैसला बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था।’
‘हिजाब और पगड़ी की अनुमति, लेकिन बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पर रोक’ भारत में कंपनियों के नियम क्या कहते हैं?
कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व में मई 2023 में सरकार बनी थी और सत्ता में आने के बाद ही दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया ने कहा था कि उन्होंने राज्य में हिजाब पर प्रतिबंध के आदेश को वापस लेने का निर्देश दिया है। उस वक्त उन्होंने कहा था कि पोशाक और भोजन का चुनाव व्यक्तिगत है और किसी को भी इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
क्या था 2022 का हिजाब विवाद
कर्नाटक में पांच साल पहले हिजाब को लेकर विवाद उस वक्त सामने आया जब उडुपी जिले के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में हिजाब पहनकर आने वाली लड़कियों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोक दिया गया। छात्राओं का कहना था कि हिजाब उनकी आस्था और पहचान का हिस्सा है, जबकि कॉलेज प्रशासन ने ड्रेस कोड का हवाला देते हुए उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। छात्राओं के हिजाब पहनने के जवाब में कॉलेज में हिंदू विद्यार्थी भगवा गमछा पहनकर आने लगे और धीरे-धीरे यह विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैल गया। कई शिक्षण संस्थानों में इसकी वजह से सांप्रदायिक तनाव जैसी स्थिति आ गई।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली तत्कालीन बीजेपी सरकार ने स्कूल-कॉलेज में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार ने अपने आदेश में कहा था कि ‘समानता, अखंडता और सार्वजनिक कानून व्यवस्था को बिगाडऩे वाले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।'
सरकार के इस आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरकरार रखा। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां यह अभी भी लंबित है। सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था लेकिन दोनों न्यायाधीशों की राय इस पर बंटी हुई थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता (अब सेवानिवृत्त) ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया था, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इसकी अनुमति दी थी।
जस्टिस गुप्ता ने कहा था कि यह केवल एकरूपता को बढ़ावा देने और एक धर्मनिरपेक्ष वातावरण को प्रोत्साहित करने के लिए था लेकिन जस्टिस धूलिया ने राज्य और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर कक्षाओं में हिजाब पहनने के अधिकार को ‘पसंद का मामला' और ‘मौलिक अधिकार' बताया था।
बिहार में जघन्य अपराध एक साल में दोगुने से अधिक तो हो ही गए, जुवेनाइल क्राइम के मामले में भी राज्य पूरे भारत में शीर्ष पर पहुंच गया है.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट –
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इंडिया-2024 की रिपोर्ट के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि देश भर में जुवेनाइल क्राइम के मामले सबसे ज्यादा बिहार में क्यों बढ़ रहे हैं। ‘जुवेनाइल क्राइम’ का अर्थ है 18 साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया अपराध। इसके साथ ही, राज्य में नाबालिगों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी वृद्धि हुई है। जहां देशभर में जुवेनाइल क्राइम के मामलों में 2024 में 11।2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देश भर में सबसे अधिक किशोर अपराधी बिहार में हैं।
चिंता की बात यह है कि राज्य में विभिन्न श्रेणियों के अपराध में भी सौ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। बिहार में 2023 में हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे जघन्य अपराध के 52,165 मामले दर्ज हुए, वहीं 2024 में यह संख्या 1,07,303 पर पहुंच गई। हालांकि, बिहार में अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से कम है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रति एक लाख की आबादी पर औसत अपराध दर 406.8 है, वहीं बिहार में यह 272.6 है। खासकर अगर बच्चों के प्रति अपराध की बात करें तो देश में 2024 में 1,87,702 केस दर्ज किए गए, जो पिछले साल के 1,77,335 की तुलना में 5।8 प्रतिशत अधिक रहे।
किशोर कर रहे हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण
एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में बिहार में 5.037 आपराधिक वारदातों को किशोरों ने अंजाम दिया। जो पिछले साल के दर्ज 1,818 मामलों से 177 प्रतिशत अधिक है। 2024 में 42,633 नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 33,129 यानी 77.7 प्रतिशत 16 से 18 आयु वर्ग के थे। राज्य में किशोरों पर सबसे अधिक हत्या के प्रयास और शादी की नीयत से अपहरण के मामले हैं। 2024 में देशभर में किशोरों पर हत्या के प्रयास के 2004 मामले सामने आए, इनमें सर्वाधिक 673 मामले बिहार में दर्ज हुए। इसी तरह शादी की नीयत से किशोरों द्वारा अगवा किए जाने के सर्वाधिक 257 मामले प्रदेश में सामने आए।
सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय प्रकाश जुवेनाइल क्राइम में वृद्धि को सीधे बेरोजगारी की वजह से हुए पलायन से जोड़ते हैं। वे कहते हैं, ‘इसका मूल समझिए। घर का मुखिया रोजी-रोटी के जुगाड़ में परदेस चला जाता है। गांव-घर में महिलाएं रह जाती हैं। उन्हें भी भरण-पोषण के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। अब बच्चों को कौन देखेगा कि वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं?’
चिन्मय कहते हैं, ‘उनका मार्गदर्शन करने वाला तो गरीबी का शिकार होने के कारण घर से बाहर है या फिर पारिवारिक कलह या अन्य वजहों से साथ नहीं रह रहा। परिवार आर्थिक दबाव भी झेल रहा। ऐसी परिस्थिति में बच्चे राह भटकते हैं और अंतत: अपराध की ओर उनका झुकाव हो जाता है या इसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है।’ इससे साफ होता है कि यह केवल कानून व व्यवस्था की समस्या नहीं रही, बल्कि यह भविष्य में और गहराने वाले गंभीर पारिवारिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।
शराब माफिया और नशे के सौदागर भी जिम्मेदार
दबी जुबान से ही सही, लेकिन इसे स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं है कि शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है। इसके कर्ता-धर्ता शराब माफिया और उसके सिंडिकेट के लोग हैं। पत्रकार अक्षय बाजपेयी कहते हैं, ‘शराब के धंधेबाज बच्चों-किशोरों से कैरियर का काम लेते हैं। कई ऐसे मामले सामने भी आ चुके हैं। कुछ तो गरीबी के कारण जल्द से जल्द पैसा कमाने की ललक में इनके साथ हो जाते हैं, तो कई ऐश-मौज के लिए पैसे की चाह में उनका साथ देते हैं। अनाप-शनाप धन की चाह में वे अपराध करने से भी परहेज नहीं करते।’
अपने फायदे के लिए माफिया आपसी प्रतिद्वंदिता में उन्हें शह देते हैं और यहीं से उनका आपराधिक सफर शुरू हो जाता है। वे कहते हैं, ‘आजकल किशोरवय के लडक़े शराब या सूखे नशे के लती हो जा रहे और फिर इसके लिए जब कहीं से पैसा नहीं मिलता है तो वे अपराध का सहारा लेते हैं।’ किशोर अपराधियों के खिलाफ गंभीर अपराध के कम, जबकि अधिकतर मामले चोरी, छीन झपटी, वाहन चोरी और बलात्कार के होते हैं। पेशेवर संगठित गिरोह भी नाबालिगों का इस्तेमाल करते हैं। सूखे नशे या ड्रग्स के सौदागर भी इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए महिलाओं-नाबालिगों का सहारा लेते हैं।
ऐसे ही एक मामले में पकड़े गए एक किशोर का कहना था, ‘मेरे एक दोस्त ने बताया था कि पैकेट पहुंचाने का एक काम है। जो जगह बताई जाएगी, उसे वहां किसी को दे देना है। इसके बदले में उसे उतने पैसे मिलेंगे, जो घरवाले नहीं दे सकते। इसी लोभ में यह करने लगा, लेकिन दूसरी बार में ही पकड़ लिया गया। अगर मुझे कोई और काम यहां मिल जाता तो गलत काम क्यों करता।’अब यह किशोर अपने परिजन के साथ बिहार के बाहर काम कर रहा है।
-मोहन गुरुस्वामी
नेतृत्व में आज सबसे कमतर आंकी जाने वाली गुणवत्ता है सादगी। और वह एक पेन और नोटबुक लेकर तमिलनाडु विधानसभा में चली आई।
तस्वीर देखिए। मुख्यमंत्री। पहले दिन। विपक्ष उन पर मज़ाक उड़ा रहा है। कैमरे चल रहे हैं। और वह नोट्स ले रहे हैं। न तो बीच में बोल रहे हैं, न मेज़ थपथपा रहे हैं, न अपनी बेंचों को संकेत दे रहे हैं। बस लिख रहे हैं। पॉइंट बाय पॉइंट। चुपचाप।
ध्यान दीजिए कि यह कार्य स्वयं क्या है। पेन। कागज़। सुनना। लिखना। बस इतना। कोई आईपैड नहीं। कोई सहायक कान में फुसफुसा नहीं रहा। कैमरों के लिए कोई नाटकीय प्रतिक्रिया नहीं।
आलोचना होने पर सबसे सरल संभव प्रतिक्रिया, वास्तव में आलोचना सुनना, और वह भी एक ऐसे राज्य के सामने, जिसने राजनीतिक नाटक की हर किस्म देख ली है।
हम सन् दो हजार छब्बीस में प्रशिक्षुओं को नौकरी देते हैं जो समीक्षा बैठक में नोटबुक तक नहीं लाते। और यहाँ इक्यावन वर्षीय मुख्यमंत्री, तीन दशक की स्टारडम के बाद, अपनी पहली विधानसभा सत्र में नोट्स ले रहे हैं। इसे दोबारा पढि़ए।
तस्वीर के पीछे के आंकड़े यह हैं, तमिलनाडु, दो हजार चौबीस-पच्चीस। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि ग्यारह दशमलव उन्नीस प्रतिशत। भारत में सबसे ऊँची। चौदह वर्षों में पहली दहाई अंकों वाली वृद्धि। भारत की चार प्रतिशत भूमि। इसकी पाँच दशमलव छियालीस प्रतिशत आबादी। लगभग नौ प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद। तमिलनाडु वेत्की की सीटें एक सौ आठ। विश्वास मत जीत लिया गया, तेरह मई को।
यह कोई छोटा मंच नहीं है। फिर भी वह इसे छोटा-सा ही समझकर चल रहे हैं।
यह दक्षिण भारत और खासकर तमिलनाडु में क्यों काम करता है। दक्षिण भारतीय और खासकर तमिल डीएनए में कुछ ऐसी चीज़ है जो सादगी पर प्रतिक्रिया करती है। कृपया ध्यान दें कि यह शैली की अनुपस्थिति नहीं है, तमिल सिनेमा, तमिल संगीत, तमिल साहित्य में शैली की कोई कमी नहीं, बल्कि दिखावे की अनुपस्थिति है। सादा सफ़ेद वेष्टी में करुणानिधि। कुरता और चप्पलों में वोटिंग बूथ पर राजनिकांत। सादगी को अपनी महत्ता को कम आंकना माना जाता है, कि जो महत्ता आप मुझे दे रहे हैं, वह मुझ पर हल्के से बैठती है। मुझे पता है मैं कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ, यह एक मूल भाव है। राज्य ने पीढ़ी दर पीढ़ी उन लोगों के लिए सबसे गहरी स्नेह रखा है जिन्हें महत्वपूर्ण दिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
फ़्लैश बर्दाश्त किया जाता है। सादगी को प्यार किया जाता है।
विजय, भारत के सबसे व्यावसायिक फिल्म सितारों में से एक होने के बावजूद, हमेशा अपने सार्वजनिक जीवन में इसी रजिस्टर को लेकर चले हैं। कोई एयर-किसिंग नहीं। कोई डिज़ाइनर स्टबल इंटरव्यू नहीं। परिवार के इर्द-गिर्द कोई मैनेज्ड मीडिया सर्कस नहीं। जब भाजपा ने चुनाव के दौरान जोसेफ विजय नाम का अभियान उनके खिलाफ चलाया, तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। चुप रहे और इसे गुजऱ जाने दिया। करूर में एक हजार आठ सौ इक्कीस वोटों से हारने के बाद भी वही चुप्पी। अपनी शक्ल, बालों, नृत्य मुद्राओं पर मज़ाक उड़ाए जाने के बाद भी वही चुप्पी।
नोटबुक उसी प्रवृत्ति का प्रतीक है, कि मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूँ और मैं इसे सिर झुकाकर करूँगा। मैं प्रदर्शन नहीं करूँगा। मैं प्रतिक्रिया नहीं दूँगा। मैं सुनूँगा। नोट करूँगा। प्रक्रिया करूँगा।
यह ठीक वही तरीका है जिससे टेस्ट क्रिकेट का ओपनर नई गेंद खेलता है। वह पहली गेंद पर स्विंग नहीं करता। तीन छोड़ देता है। दो ब्लॉक करता है। सीम देखता है। कलाई देखता है। लंबाई देखता है। जब वह शॉट खेलता है, तब तक उसके पास डेटा होता है। शॉट सरल लगता है। होता नहीं है। वह पहले तीस मिनट की नोटबुक है।
विजय गेंदों को जाने दे रहे हैं। सीम देख रहे हैं। और बाकी सब कुछ। अगर आप धैर्य रखकर गहराई में देखें तो यह उनके अब तक के व्यवहार से पूरी तरह सुसंगत है।
उन्होंने दो दशक पहले सामाजिक कार्य शुरू किया। उनके माता-पिता ने इसे समय से पहले राजनीतिक वाहन में बदलने की कोशिश की। उन्होंने मुकदमा दायर किया। अपने ही माता-पिता के खिलाफ। संगठन बंद कर दिया। अभी तैयार नहीं।
उन्होंने इसे तभी पुनर्जीवित किया जब वे तैयार थे। स्थानीय निकाय चुनावों में मशीनरी परीक्षण किया। जीते। जबकि हम उनकी फिल्में देख रहे थे, उन्होंने बूथ-स्तरीय नेटवर्क बनाए।
हर चुनाव विश्लेषक के अलावा प्रदीप गुप्ता, एक्सिस माय इंडिया, वह व्यक्ति जो लोकसभा दो हजार चौबीस गलत बताकर लाइव टीवी पर रो पड़ा था, दो हजार छब्बीस में भी गलत। वह इतना शांत था।
जीतने के बाद वे एमके स्टालिन के अलवरपेट आवास पर गए। फूलों का गुच्छा। शॉल। गले मिलना। हाथ मिलाना। स्टालिन उनके शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आए थे। फिर भी विजय गए। स्टालिन ने इसे राजनीतिक शिष्टाचार कहा।
एक ऐसे राज्य में जिसकी राजनीतिक डीएनए कड़वाहट पर बनी है, एमजीआर बनाम करुणानिधि, अम्मा बनाम करुणानिधि, तमिल बनाम हिंदी, दक्षिण बनाम उत्तर, गोरे बनाम काले, पहले दिन ही एक मुख्यमंत्री का बदले की भावना के बजाय शिष्टता चुनना एक अलग तरह का शासन परिवर्तन है। और फिर, कृपया इस इशारे की सादगी पर गौर करें। उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति नहीं निकाली। बस उनके घर चले गए।
क्या उन्होंने सब कुछ सही किया? नहीं। सार्वजनिक वेतन पर ज्योतिषी की नियुक्ति गलती थी। उम्मीद की मुद्रा पर चुने गए नेता को फैसले अंधविश्वास को सौंपने नहीं चाहिए। उनकी तारीफ़ यह कि नियुक्ति वापस ले ली गई। तेज़ी से, सार्वजनिक रूप से दिशा सुधार, यह स्वयं एक संकेत था। उन्होंने स्पष्टीकरण नहीं जारी किया। बस उलट दिया। इसे नौसिखिए की गलती कह लीजिए। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि रस्सी लंबी नहीं होगी।
जैसा मैं देखता हूँ, उनकी कार्य प्रणाली सादा, स्वयं के प्रति जागरूक, स्पष्ट, सिर झुकाकर, विस्तार करने से पहले परीक्षण, बोलने से पहले सुनना, गलती होने पर दिशा सुधार करना है।
यह ठीक उसी कार्य प्रणाली जैसी है जो चेन्नई से जुड़े एक और व्यक्ति की है, जिन्होंने दशकों तक चुपचाप शहर, राज्य और देश के लिए कार्य किया है। अलग क्षेत्र। एक ही प्रक्रिया। कोई दिखावा नहीं। कोई शोर नहीं। परिणाम बोलते हैं।
वह व्यक्ति भी तमिलनाडु के लोगों के करीब रहा है। इसलिए नहीं कि उन्होंने खुद को उन पर प्रचारित किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने खुद को बिल्कुल प्रचारित नहीं किया।
एक और बात। तस्वीर में जो व्यक्ति है, उसका लगातार मज़ाक उड़ाया जाता है। उनकी शक्ल का, बालों का, नृत्य मुद्राओं का, उनकी जनछवि का। ठीक है। मज़ाक उड़ाइए। मैं भी अतीत में इसमें दोषी रहा हूँ।
लेकिन अगर पहले बहत्तर घंटे कोई प्रमुख संकेत हैं, तो तमिलनाडु और अगर मैं कह सकता हूँ, भारत को भी, शायद एक ऐसे नेता की प्राप्ति हुई है जो सत्ता के साथ धैर्य, ध्यान और लिखित रिकॉर्ड के साथ व्यवहार करता है।
राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, अपने पहले दिन, कमरे में सबसे सरल काम कर रहा है।
नोटबुक ही संदेश है।
-ध्रुव गुप्त
इन दिनों सनातन का हर तरफ शोर है। इस शोर में अनेक देवी -देवताओं और कुछ पौराणिक प्रसंगों की मेरी मानवीय और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं से नाराज होकर कुछ लोगों ने मुझे सनातन-द्रोही घोषित किया हुआ है। मैं नहीं जानता कि उन्हें सनातन की कितनी समझ है। हमारी संस्कृति में सनातन अर्थात शाश्वत वेदों को कहा गया है। वेदों को मानने वाले लोग सनातनी कहे जाते हैं। इन वेदों का सूत्र वाक्य है - एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति नेह ना नास्ति किंचन'। अर्थात एक ही ईश्वर है और उसके सिवा कोई दूसरा नहीं है -नहीं है, नहीं है, किंचित भी नहीं है। इस एक सत्य के सिवा वेदों में कोई पूजनीय नहीं है। वेदों में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों की प्रशंसा या स्तुति गाई गई हैं। जैसे अग्नि, वायु, नदी, सूर्य, उषा, पृथ्वी, सोम, अदिति, पूषा, वनस्पति आदि। स्तुति के पात्र तब के प्रतापी योद्धा इंद्र और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता अश्विन कुमार जैसे लोग भी हैं। वेदों के सार उपनिषदों में भी शक्तिपुंज के रूप में एक ही ईश्वर की मान्यता है। हम सब उसके अंश हैं। उपनिषदों के अनुसार यदि स्वयं के ऊर्जा की पहचान हो जाय तो ईश्वर की पहचान हो जाएगी। जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। समुद्र की एक बूंद को जान लो तो समुद्र को जान लोगे। आज के कई देवी-देवता, उनके असंख्य मंदिर और मूर्तियां वेदों की नहीं, पुराणों की उपज हैं। पुराण संभवत: हमारे इतिहास के गुप्त काल से लेकर मध्यकाल तक लिखे गए हैं। हमने जो धर्म और पूजा पद्धति आज अपनाई हुई है वह सनातन नहीं, बल्कि पौराणिक धर्म और पूजा पद्धति है।मैं यह नहीं कहता कि पुराणों के सभी देवी -देवता काल्पनिक हैं। इनमें कुछ ऐतिहासिक पात्र भी रहे होंगे जिनके उज्ज्वल चरित्र या कारनामों के कारण उन्हें देवता या भगवान का दर्जा दिया गया है।
मैं सनातन वेद और उपनिषद वाले ईश्वर को मानता हूं। विशुद्ध और निराकार ब्रह्मांडीय ऊर्जा। उसे जानने या उससे एकाकार होने का रास्ता यह है कि हमें इस सोच को अपने भीतर गहरे उतारना होगा कि हमसब एक ईश्वर या ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अंश हैं और इसीलिए यह समूची सृष्टि ही हमारे परिवार का विस्तार है। सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उस एकत्व से उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही ईश्वर से एकाकार होने का एकमात्र रास्ता है।
कुछ संकरे समुद्री रास्ते अब व्यापार ही नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बन गए हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ताइवान और मलक्का के जलडमरूमध्य अब दबाव की इस नई रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं।
डॉयचे वैले पर कैस्र्टन क्निप की रिपोर्ट –
क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोडऩे वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, ‘अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है।’
बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी। इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है।
फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है।’
खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं। यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।
समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम
मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया। इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं। नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता चुन रही हैं, जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है।
ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं।’ उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी इन तीन बातों पर टिकी होती है: ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति। जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है।
भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार
होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है। लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में ‘भूगोल की वापसी’ हो रही है। होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं। इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है। इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं।
विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में ‘फ्री ट्रांजिट' यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं। इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा।
समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं। इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती। यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे क=त्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने पिछली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार के 2022 के आदेश को रद्द करते हुए स्कूल और कॉलेज के छात्रों को हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, शिव माला और रुद्राक्ष पहनने की अनुमति दे दी है.
सरकारी आदेश में सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ "सीमित सामुदायिक या आस्था-आधारित प्रतीकों" की अनुमति दी गई है. यह नया नियम आगामी शैक्षणिक वर्ष से लागू होगा.
आदेश में कहा गया है, "हालांकि, ऐसे पारंपरिक और रीति-रिवाज आधारित प्रतीक यूनिफॉर्म के साथ सामंजस्यपूर्ण होने चाहिए और वे यूनिफॉर्म की मूल भावना या मक़सद को प्रभावित, परिवर्तित या कमज़ोर नहीं करने चाहिए."
इसमें यह भी कहा गया है कि इससे "अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान" में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए. परीक्षाओं में उपस्थिति से जुड़े नियम पहले जैसे ही रहेंगे.
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने पत्रकारों से कहा, "कई घटनाएं हुई हैं. 24 अप्रैल को एक छात्र से जनेऊ हटाने के लिए कहा गया था. ऐसी बातें हमारे बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए. मुझे लगता है कि हमें यह फ़ैसला बहुत पहले कर लेना चाहिए था."
उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद फ़रवरी 2022 में कर्नाटक और देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का कारण बना था. हाई कोर्ट की विभाजित पीठ के फ़ैसले के बाद यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
रुख़ में बदलाव क्यों?
कांग्रेस का यह क़दम ऐसे समय आया है, जब बेंगलुरु के एक कॉलेज ने मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश के लिए आयोजित सीईटी परीक्षा में जनेऊ पहनकर आए छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया था.
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह आदेश उस समय आया है, जब दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं केकांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को समर्थन न देने से पार्टी को झटका लगा था.
समुदाय की मांग थी कि सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा जाए क्योंकि वहां 60 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम समुदाय से थे. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने समर्थ शमनूर के पक्ष में फ़ैसला किया.
यह सीट समर्थ के दादा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमनूर शिवशंकरप्पा के पास थी. समर्थ के पिता एसएस मल्लिकार्जुन सिद्धारमैया सरकार में मंत्री हैं और उनकी मां लोकसभा सदस्य हैं.
इस विवाद के बाद पार्टी ने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रमुख और एमएलसी अब्दुल जब्बार को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया. वहीं मुख्यमंत्री ने अपने राजनीतिक सलाहकार और एमएलसी नसीर अहमद को भी हटा दिया.
समर्थ ने 5,708 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की लेकिन एसडीपीआई को 18,975 वोट मिले. इस उपचुनाव ने मुस्लिम समुदाय के भीतर काफ़ी बहस छेड़ दी.
सरकार का यह ताज़ा क़दम ऐसे समय आया है, जब राज्य मुस्लिम संगठनों के महासंघ की ओर से शनिवार को बेंगलुरु में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया जाना है.
उडुपी था केंद्र
हिजाब विवाद दिसंबर 2021 के अंत में उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ था. तब छह मुस्लिम छात्राओं को नई यूनिफॉर्म नीति का उल्लंघन करते हुए हिजाब पहनने के कारण क्लास में प्रवेश नहीं दिया गया.
दो छात्राओं को हिजाब पहनने पर क्लास छोड़ने के लिए कहा गया. 12 छात्राओं ने विरोध किया लेकिन आख़िरकार चार छात्राएं नई नीति के अनुसार, चलने को तैयार हो गईं.
चिक्कमंगलुरु ज़िले के कोप्पल सरकारी फर्स्ट ग्रेड कॉलेज में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई, लेकिन वहां यह विरोध के रूप में सामने आई. तब लड़के भगवा शॉल पहनकर कॉलेज पहुंचे.
हालांकि कॉलेज ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं, अभिभावकों और अन्य स्थानीय नेताओं की बैठक बुलाकर मामले को सुलझा लिया. वहां हिजाब और भगवा शॉल दोनों पर प्रतिबंध लगाया गया जबकि लड़कियों को यूनिफॉर्म से मेल खाने वाला दुपट्टा या स्कार्फ से सिर ढकने की अनुमति दी गई.
लेकिन यह मुद्दा धीरे-धीरे राज्य के कई अन्य ज़िलों में फैल गया. मंड्या ज़िले में हिजाब पहने छात्रा मुस्कान ख़ान के साथ नारेबाज़ी और विरोध की घटना हुई. उनके धार्मिक नारे लगाने के बाद कई हिस्सों में विरोध और प्रतिवाद शुरू हो गए, जिसके कारण कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद करने पड़े.
तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद सरकार के आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरक़रार रखा. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ यह अब भी लंबित है.
हिजाब पर कांग्रेस सरकार के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता आर. अशोक ने कहा, "कर्नाटक की कांग्रेस सरकार दावणगेरे उपचुनाव के परिणामों और अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक के भीतर बढ़ते असंतोष से घबरा गई है.''
''अपनी गिरती हुई वोट बैंक राजनीति को बचाने और 'डैमेज कंट्रोल' करने की हताश कोशिश में सिद्धरमैया सरकार ने एक बार फिर हिजाब विवाद को ज़िंदा कर दिया है. यह कांग्रेस की पुरानी रणनीति है, जब शासन में विफल हो जाओ तो ध्रुवीकरण का सहारा लो."
उन्होंने आगे कहा, सिद्धरमैया की तथाकथित 'धर्मनिरपेक्षता' की सच्चाई अब सबके सामने आ गई है. इस सरकार में हिजाब को स्वतंत्रता के नाम पर हरी झंडी दी जाती है जबकि भगवा शॉल पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाता है.''
''यह भेदभावपूर्ण नीति, जिसमें एक धर्म की पहचान को अधिकार और दूसरे की पहचान को नियमों का उल्लंघन माना जाता है. इससे साबित होता है कि कांग्रेस के लिए 'सेक्युलरिज्म' केवल हिंदुओं को निशाना बनाने और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का एक साधन भर है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-सुमैया नस्त्र
दशकों से फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा भरोसे को स्वाभाविक और गारंटीशुदा माना जाता था, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल की जंग इस समीकरण को बदलते दिख रहे हैं।
जंग के दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने अपने महत्वपूर्ण ठिकानों को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से निशाना बनाए जाने से पैदा हुई रक्षा चुनौतियों को न केवल मिसाइलों के रास्ते की निगरानी की बल्कि अमेरिकी मदद पर भी सावधानीपूर्वक नजऱ रखी।
उन्होंने ख़ुद को एक ऐसी जंग में खिंचा पाया जिसके बारे में उनके अधिकारियों का भी मानना था कि इस जंग से पहले उनसे सलाह तक नहीं ली गई।
क्या इस संकट ने अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के बीच सुरक्षा समझौतों की सीमा को सामने ला दिया है?
क्या यह युद्ध अमेरिकी सैन्य शक्ति पर उनकी निर्भरता को कम करेगा या इसके उलट इसे और मज़बूत करेगा?
ब्रिटेन का विकल्प और सोवियत संघ का डर
गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के सभी देशों का अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग है। अमेरिका सऊदी अरब, क़तर, बहरीन और कुवैत को ‘नेटो के बाहर के प्रमुख सहयोगी’ देश मानता है और संयुक्त अरब अमीरात को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ समझता है।
फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई, जब उसने इस क्षेत्र में एक प्रमुख विदेशी शक्ति के रूप में धीरे-धीरे ब्रिटेन की जगह ले ली।
फारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली दो फैक्टर पर आधारित थी- इलाके की भौगोलिक अहमियत और इसका विशाल तेल भंडार, साथ ही सोवियत प्रभाव का मुकाबला करने का रणनीतिक लक्ष्य।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से दो साल पहले ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने देश के लिए तेल और फारस की खाड़ी क्षेत्र के भविष्य की अहमियत को भांप लिया था।
साल 1943 में उन्होंने एलान किया था, ‘अमेरिका की रक्षा के लिए सऊदी अरब की रक्षा बहुत अहम है।’ रूजवेल्ट ने ये टिप्पणी सऊदी अरब को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करने और देश के साथ संबंधों को मज़बूत करने की जरूरत को सही ठहराने के लिए की थी।
साल 1945 में फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने मिस्र की स्वेज़ नहर में स्थित ‘ग्रेट बिटर लेक’ के जलक्षेत्र में युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर किंग अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से मुलाक़ात की। हालांकि उनकी चर्चाओं के आधिकारिक रिकॉर्ड में तेल का कोई जिक़्र नहीं है, फिर भी इस मुलाकात को आम तौर पर दोनों देशों के बीच ‘खास रिश्तों’ की शुरुआत माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और लेखक जेफरी एफ. गर्श ने बीबीसी अरबी को बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका के पास ‘दुनिया में सैन्य अड्डों और रसद सहायता का सबसे व्यापक और विस्तृत नेटवर्क था।’
उन्होंने आगे कहा कि उस समय अमेरिकी सेना ने ‘अपने विमर्श और नीतियों को विशेष रूप से फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर केंद्रित किया था। 1949 तक, जर्मनी में हवाई अड्डे के बाद, दहरान सबसे सक्रिय अमेरिकी विदेशी हवाई अड्डा बन गया था और युद्ध के बाद के समय में अमेरिकी वैश्विक अभियानों और तालमेल के लिए महत्वपूर्ण था।’
गर्श बताते हैं कि उस दौरान सैन्य अड्डे के समझौतों पर हस्ताक्षर करवाने में अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहायता के वादों ने अहम भूमिका निभाई। उनका कहना है कि अमेरिका सऊदी अरब के गोला-बारूद और सैन्य हथियारों की मांग को मानने के लिए तैयार था क्योंकि उसे डर था कि अगर वह इनकार करता है, तो सऊदी अरब सोवियत संघ से हथियार खरीदने लगेगा।
उनके मुताबिक़, बाहरी और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ 'जंग के बाद के दशक में सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी समझौतों को बढ़ाने का मुख्य कारण' बनी रहीं। हालाँकि अमेरिका के साथ गठबंधन का सऊदी अरब के भीतर विरोध था, यह विरोध 'इसराइल के लिए अमेरिकी समर्थन और फ़लस्तीन के विभाजन’ की वजह से पैदा हुआ था।
80 में दशक में अमेरिकी दबदबे का एलान
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से लेकर 1980 के दशक तक, अन्य खाड़ी देशों के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग सीमित पैमाने पर ही सही जारी रहा। इस सहयोग में सुरक्षा समझौतों और सैन्य प्रशिक्षण से लेकर घरेलू ठिकानों पर अमेरिकी सेनाओं की मेज़बानी तक शामिल थे।
उदाहरण के लिए 1971 में बहरीन के साथ हुए समझौते ने अमेरिका को जुफ़ैर में बंदरगाह बनाने के लिए पूर्व ब्रिटिश नौसैनिक ठिकाने के इस्तेमाल करने की अनुमति दी।
1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने फ़ारस की खाड़ी के प्रति ऐसी नीति अपनाई जिसमें ईरान और सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के 'दो स्तंभ' और अमेरिकी तेल हितों के रक्षक के रूप में देखा गया। क्योंकि अमेरिका शीत युद्ध में सोवियत संघ पर अपने दबदबे के लिए इसे ज़रूरी मानता था।
इस नीति के चलते अमेरिका ने इन दोनों देशों को हथियार मुहैया कराए और उनकी सेनाओं को व्यापक सैन्य प्रशिक्षण दिया।
साल 1973 के खाड़ी जंग के दौरान अमेरिका-खाड़ी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे क्योंकि अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने इसराइल का समर्थन करने वाले देशों, विशेष रूप से अमेरिका को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने ईरान के शाह और अमेरिका के कऱीबी सहयोगी मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर 'दो-स्तंभ' नीति का अंत कर दिया।
उसी साल सोवियत संघ ने अफग़़ानिस्तान पर आक्रमण किया। इन दो घटनाओं ने फ़ारस की खाड़ी में सोवियत प्रभाव की संभावना को लेकर अमेरिकी चिंताओं को बढ़ा दिया और अमेरिका को इस क्षेत्र में अपने तेल हितों की रक्षा के लिए एक पुख़्ता सैन्य ढांचा तैयार करने के लिए प्रेरित किया।
साल 1980 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने घोषणा की, ‘किसी भी विदेशी ताक़त द्वारा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के किसी भी कोशिश का सैन्य बल समेत सभी ज़रूरी साधनों से मुकाबला किया जाएगा।’
कई अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के शासनकाल में भी यही नज़रिया जारी रहा।
ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान 1981 में गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की स्थापना ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और ओमान के बीच सामूहिक सुरक्षा के लिए एक ढांचा दिया।
जीसीसी का मक़सद रक्षा तालमेल था, लेकिन इसका असर सीमित रहा और आखऱिकार अमेरिकी गारंटी क्षेत्रीय ख़तरों के ख़िलाफ़ मुख्य प्रतिरोध रणनीति बन गई।
साल 1980 के दशक में इराक़ और फ़ारस की खाड़ी के देशों के बीच तनाव बढ़ गया और 1990 में इराक़ ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया।
1990 और 1991 के साल, अमेरिकी नीति में ‘कार्टर डॉक्ट्रिन’ के लागू होने का चरम काल था।
खाड़ी युद्ध के दौरान, अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सऊदी अरब की रक्षा और कुवैत को मुक्त कराने के घोषित लक्ष्य के साथ ‘डेजर्ट शील्ड’ और ‘डेज़र्ट स्टॉर्म’ अभियान शुरू किए।
इस जंग ने जीसीसी देशों में बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की शुरुआत को पुख़्ता किया। यह एक ऐसी मौजूदगी थी जो इराक पर नो-फ्लाई जोन को लागू करने के लिए 1990 के दशक में भी जारी रही और इसे खाड़ी देशों की रक्षा करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करने की अमेरिका की क्षमता के प्रदर्शन के रूप में देखा गया।
वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के वरिष्ठ फ़ेलो सुल्तान अलामेर ने बीबीसी अरबी को बताया, 1980 के दशक में फारस की खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था इराक के कुवैत पर किए गए आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए अमेरिकी सहयोग ने यह सुनिश्चित किया कि इन देशों को किसी भी ज़मीनी आक्रमण या अन्य सैन्य ख़तरे से बचाया जाएगा।
2003 में अमेरिका के इराक़ पर आक्रमण और सद्दाम हुसैन का तख्तापलट फ़ारस की खाड़ी में अमेरिका की भूमिका में एक और महत्वपूर्ण मोड़ था।
फारस की खाड़ी के अरब देशों ने अपनी सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखा और अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया। इस दौरान अमेरिका ने बहरीन, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अपने ठिकानों को मज़बूत किया।
साथ ही, सद्दाम हुसैन के पतन ने ईरान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को ख़त्म कर दिया और तेहरान को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर दिया।
इसने जीसीसी देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया।
उसी साल अमेरिका ने घोषणा की कि वह सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान हवाई अड्डे से अपने विमान और अधिकांश सैन्य बलों को वापस बुला रहा है और फ़ारस की खाड़ी में स्थित अपने हवाई संचालन केंद्र को कतर के उदैद हवाई अड्डे पर ट्रांसफऱ कर रहा है।
इस बदलाव का दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ा।
इसके बाद के वर्षों में अमेरिका ने जीसीसी देशों के साथ कई सैन्य, रक्षा और आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें उन्नत हथियार प्रणालियों की बिक्री और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।
उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने पिछले साल अमेरिका में निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई थी।
पहले कहा गया कि सऊदी अरब 600 अरब डॉलर का निवेश करेगा और फिर व्हाइट हाउस ने पिछले नवंबर में घोषणा की कि ये निवेश एक ट्रिलियन डॉलर होगा। इसमें 142 अरब डॉलर का हथियार बिक्री कॉन्ट्रेक्ट भी शामिल है। इसे इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा बताया गया है।
हालांकि, हाल के वर्षों में, खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई ने चीन और यूरोप जैसी अन्य शक्तियों के साथ अपने संबंधों और साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश की है।
कुछ घटनाओं के एक साथ होने से खाड़ी देशों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ये सवाल है कि क्या अमेरिका पर निर्भरता अभी भी एक टिकाऊ विकल्प है?
उदाहरण के लिए, 2019 में सऊदी अरब के तेल भंडारों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों पर अमेरिका की सीमित प्रतिक्रिया ने निराशा का माहौल पैदा कर दिया।
सुल्तान अलामेर कहते हैं, ईरान पर हमला करने के बजाय, अमेरिका ने सऊदी अरब को कुछ एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजने का फ़ैसला किया। इस घटना से सऊदी अरब को यह स्पष्ट हो गया कि तेल भंडारों की रक्षा करने या फ़ारस की खाड़ी को ईरानी हमलों से बचाने के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता मज़बूत नहीं है।
उनके मुताबिक़, इस मुद्दे के कारण सऊदी अरब ने एक नई क्षेत्रीय नीति की ओर क़दम बढ़ाया।
2022 में अबू धाबी हवाई अड्डे पर हुए हूती हमलों की निंदा करने तक ही अमेरिका की सीमित भूमिका के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने भी इसी तरह की निराशा व्यक्त की थी।
2025 में ईरान और फिर इसराइल के कतर पर किए गए हमलों ने अमेरिका के साथ संबंधों की उपयोगिता के बारे में बहस को और भी हवा दी।
फ़ारस की खाड़ी में ग़ुस्सा और निराशा
28 फऱवरी को ईरान के साथ इसराइल-अमेरिकी युद्ध शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले, ओमान के विदेश मंत्री बदर बुसैदी ने घोषणा की कि ईरान-अमेरिका वार्ता में 'महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रगति' हुई है और एक समझौता होने ही वाला है।
जीसीसी के देशों ने ख़ुद को एक ऐसे युद्ध में उलझा हुआ पाया जिसने ईरान के साथ उनके संबंधों को वर्षों के प्रयासों के बाद टूटने के कगार पर ला दिया।
इन रिश्तों को बनाने के लिए इन देशों ने कड़ी मेहनत की थी। अतीत को भुलाते हुए ईरान और अधिकांश जीसीसी देशों के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली हुई थी।
ईरान के हमलों के बाद अरब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी गंभीर नुक़सान पहुंचा। पर्यटन, विमानन, निवेश और डेटा सेंटर्स को निशाना बनाने की वजह से सऊदी अरब, यूएई और क़तर जैसे देश ख़ासे प्रभावित हुए।
18 मार्च को ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित एक लेख में बदर बौसेदी ने अमेरिका पर अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खोने का आरोप लगाया और युद्ध को आपदा बताया।
कई अरब और पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने 9 मार्च को अमीराती अरबपति खलफ हबतूर के एक्स पर किए गए (बाद में हटाए गए) पोस्ट को खाड़ी देशों के अभिजात वर्ग के बीच अमेरिका के प्रति आक्रोश और युद्ध के परिणामों को लेकर उनकी चिंताओं का प्रतिबिंब माना।
ये पोस्ट रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणियों के जवाब में थे। लिंडसे ग्राहम ने खाड़ी देशों से अमेरिका और इसराइल का साथ देने का आग्रह किया था और इनकार करने पर उनके साथ रक्षा समझौतों पर पुनर्विचार करने की धमकी दी थी।
खलफ हबतूर के पोस्ट के एक हिस्से में लिखा था: हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है और हम यह भी जानते हैं कि किसने अपने तथाकथित सहयोगियों से सलाह लिए बिना पूरे क्षेत्र को इस ख़तरनाक टकराव में घसीटा है।।। हमें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत नहीं है जो मध्य पूर्व में हमें बचाने का दावा करे। हम इस बात से इनकार नहीं करते कि ईरान इस क्षेत्र के लिए कितना बड़ा ख़तरा है।।। लेकिन यह एक गंदा खेल है जिसमें कई शक्तियां हमारे क्षेत्र की क़ीमत पर आपस में लड़ रही हैं। हम दूसरों के हितों की रक्षा के लिए इस युद्ध में शामिल नहीं होंगे।
क़तर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता नायेफ़ बिन नाहर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवाद से निपटने के तरीक़े की आलोचना की।
उन्होंने 23 मार्च को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘आज ट्रंप ने अमेरिकी बाज़ार में क़ीमतों पर इसके प्रभाव के डर से ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमले को स्थगित कर दिया, लेकिन 20 दिनों से अधिक समय से खाड़ी देश ईरानी मिसाइलों के निशाने पर हैं और खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का नुक़सान हुआ है, लेकिन इससे उनका मन नहीं बदला है।’
-चैतन्य नागर
कृष्णमूर्ति पूरी दुनिया में जन सभाएं करते रहे, छोटे बड़े समूह में लोगों से बातें करते रहे। ईश्वर या भगवान जैसे शब्दों से हमेशा परहेज किया। किसी धर्म ग्रन्थ की पवित्रता या सत्ता को मानने से इंकार किया। नोबेल विजेता ऑल्डस हक्सले ने कृष्णमूर्ति की किताब 'फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम' की भूमिका में कहते हैं कि कृष्णमूर्ति को सुनना बुद्ध को सुनने के सामान है। उन्होंने मृत्यु के बाद जीवन, आत्मा और इस तरह की अस्पष्ट बातों पर कभी कुछ नहीं कहा, और बुद्ध की तरह अपने आतंरिक कलह, दु:ख और समाज में उसकी अभिव्यक्ति को समझने और ख़त्म करने के बारे में ही बोलते रहे। कुछ लोग उन्हें रेशनलिस्ट मानते हैं; कम्युनिस्ट उन्हें अधार्मिक रहस्यवादी कहते हैं। पर सच्चाई यह है कि कृष्णमूर्ति के दर्शन और चिंतन को किसी श्रेणी में रखा ही नहीं जा सकता। किसी भी मत या वाद को वह विभाजन का कारण मानते थे।
उनका मानना था कि वैश्विक संकट की जड़ें वास्तव में मानव चेतना में हैं, और बदलाव वहीँ होना चाहिए। बाहरी अव्यवस्था एक अपरीक्षित, अव्यवस्थित चेतना की ही अभिव्यक्ति है और वाह्य भले ही कितना ही व्यवस्थित क्यों न कर दिया जाए, यदि आतंरिक पर ध्यान न दिया जाये, तो वह वाह्य को नष्ट कर सकता है और अभी तक हुई सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियों का यही हश्र हुआ है। इन आंदोलनों ने संस्थागत, व्यवस्थागत परिवर्तन को अपनी ऊर्जा दी, पर इंसान की बेतरतीब, अव्यवस्थित चेतना को नहीं छुआ। कृष्णमूर्ति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की दिशा और दशा वास्तव में चित्त की आड़ी-तिरछी रेखाएं ही तय करती हैं। इस चित्त की दशा को न समझ कर यदि कोई बाहरी परिवर्तन किया जाए, तो न सिर्फ वह सतही और अस्थायी होगा, बल्कि एक बहुत बड़े भ्रम को भी जन्म देगा।
एक तरफ तो कृष्णमूर्ति भारतीय दार्शनिक परंपरा से कहीं जुड़े हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि प्राच्य दर्शन हमेशा से व्यक्तिगत चेतना में परिवर्तन की बात करता आया है, पर दूसरी ओर कृष्णमूर्ति अलग से कई ऐसे बिंदु उठाते हैं, जो उन्हें हर तरह की परंपरा से अलग भी करते है, और किसी नई परंपरा का निर्माण भी नहीं करते। हिन्दू धर्म की मुख्यधारा और इसकी बागी परंपरा—दोनों से छिटक कर वह दूर खड़े होते हैं और नए सिरे से जीवन और उसके बुनियादी सवालों पर संवाद करते प्रतीत होते हैं।
क्या कृष्णमूर्ति नास्तिक हैं? क्या वह मूल रूप से एक मनोवैज्ञानिक हैं? क्या उन्होंने दर्शन, धर्म और मनोविज्ञान का एक मिला जुला मिश्रण हमारे सामने प्रस्तुत किया? क्या कृष्णमूर्ति की शिक्षाएं बौद्धिकता में इतनी डूबी हुई हैं, कि वह बुद्धिजीवियों के सामने एक नयी तरह की चुनौती प्रस्तुत करते हैं और आखिर में बुद्धि को भी नकार देते हैं ? ऐसे कई सवाल हैं जो कृष्णमूर्ति के बारे में लोग उठाते हैं। यह तो जरुर कहा जा सकता है कि संगठित धर्मों का, गुरु शिष्य परंपरा का, धर्म ग्रंथों का इतना कठोर विरोध धर्म के इतिहास में किसी ने नहीं किया।
कुछ लोगों का मानना है कि कृष्णमूर्ति एक तरह से चरमपंथी या अब्सोल्युटिस्ट थे। वह अनर्किज़्म के अंतिम छोर पर खड़े प्रतीत होते हैं। इसलिए सतही समाज सुधार में उनका कोई भरोसा नहीं था। न ही वह किसी धार्मिक संगठन के थे, न ही राजनैतिक समूह के, न ही संप्रदाय के, न किसी देश के। अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी ने उनसे जब कहा उन्हें तो कम्युनिस्ट पार्टी में होना चाहिए, तो उन्होंने साफ़ कहा कि वह किसी भी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनका मानना था कि मत और वाद, संगठन और संप्रदाय विभाजन और युद्ध का कारण हैं। वह बार बार कहते रहे कि हम हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई नहीं बल्कि मानव हैं, शेष मानवता का हिस्सा हैं, एक दूसरे से बिलकुल भी अलग नहीं। उनका सवाल था: क्या हम इस धरती पर सहज होकर चलते फिरते रह सकते हैं, बगैर उसे नष्ट किये, खुद को और पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचाए बगैर?
-क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?
क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?
पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था।
पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था।
यानी फिलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाजार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है।
पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा
पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने के निर्देश दिए। साथ ही एक साल तक सोना न खऱीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की। और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की।
भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया। कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है।
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया।
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं। और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
‘पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करें’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का जिक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, ‘भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं। हमें अपनी जरूरत के पेट्रोल-डीजल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं। युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फ़र्टिलाइजऱ के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं। आसमान को भी पार कर गए हैं। पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है।’
पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाजों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है। ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है। भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफी हद तक निर्भर है।
ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं। भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीजल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और एलएनजी गैस के दाम भी बढऩे की आशंका है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है।
द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, ‘पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है। यह साफ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं। भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफर मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है।’
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए।
विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए गंभीर ख़तरे की आहट है, क्योंकि अगर होर्मुज की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की कीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी। वित्तीय घाटा बढ़ेगा। और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
सोना ना खऱीदने को क्यों कहा?
उन्होंने कहा, ‘सोने की खऱीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है। एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे। आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे।’
‘सोना नहीं खऱीदेंगे। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी’
क्यों कहा?
कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है। ऐसे में इन्हें खऱीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की जरूरत पड़ेगी। और जिसकी वजह से रुपया कमजोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा। इससे महंगाई बढऩे की आशंका है।
फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है।
कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर। विशेषज्ञों के मुताबिक इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना खरीदने की भी सलाह दी है।’
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था। 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था। यानी 2024-25 में यह 13.7 फीसदी बढ़ गया।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्वस यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था।
वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, ‘पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए। यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है। भारत में सोने की भारी मांग है। देश हर साल लगभग 800-900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है। कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है। वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24त्न ज़्यादा है।’
विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है। साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है। और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है।
-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
(भोपाल के भारत भवन में हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने पर ‘प्रणाम उदन्त मार्तंड’ के नाम से तीन दिन चले शानदार आयोजन के समापन समारोह में अध्यक्षता करने का मौका मिला। अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने जो कुछ कहा, उसकी खास-खास बातें)
* 30 मई 1826 को, 200 साल पहले हिन्दी का पहला समाचार पत्र शुरू हुआ था, जिसका नाम था उदन्त मार्तंड. साप्ताहिक अखबार था। संपादक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल।
* जिस जगह से अखबार शुरू हुआ, वह जगह थी कोलकाता। कोलकाता में लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं, हिन्दी बोलने वाले कम हंै, इसलिए उदन्त मार्तण्ड जैसा अखबार निकालना और चलाना बहुत बड़ी चुनौती थी।
* उदन्त मार्तंड हिन्दी का पहला अखबार था, लेकिन भारतीय भाषाओं में और भी अखबार पहले से छप रहे थे।
* बांग्ला भाषा में 'दिग्दर्शन' नाम का अखबार 1818 से छप रहा था। अखबार ईसाई मिशनरीज़ वाले निकाल रहे थे और उनका लक्ष्य धर्म प्रचार था।
* बांग्ला में ही का एक और अखबार था ‘समाचार दर्पण’। वह भी ईसाई धर्म प्रचार के लिए था।
* 1821 में राजा राममोहन राय ने ‘सम्वाद कौमुदी’ शुरू किया था. राजा राम मोहन राय बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति थे और उन्होंने महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ जमकर लिखा, बोला और काम किया था.
* 1822 में ही ‘चन्द्रिका’ नाम का अखबार शुरू हुआ और उसकी खास बात यह थी कि वह राजा राममोहन राय के क्रांतिकारी विचारों का विरोध करने वाला अखबार था। यह भी बांग्ला में ही था।
* राजा राममोहन राय ने 1822 में फारसी में एक अखबार शुरू किया था, जिसका नाम था ‘विरात-उल-अखबार’ यानी अखबार का दर्पण! 1822 में ही फारसी में एक और अखबार निकला ‘जाम-ए-जहांनुमा’ मतलब दुनिया को दिखाने वाला दर्पण।
* गुजराती भाषा में 1822 में ‘मुंबई समाचार’ (पहले नाम था बम्बई समाचार) शुरू हुआ था। यह अखबार आज भी छप रहा है और इसका नाम मुंबई समाचार कर दिया गया है।
* राजा राममोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर ने1822 में यानी आज से 204 साल पहले ‘बंग दूत’ नाम का अखबार शुरू किया था। मजेदार बात यह है कि यह अखबार चार भाषाओं में था- अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और हिन्दी । अंग्रेजो की हुकूमत थी, इसलिए अंग्रेजी जरूरी थी, अखबार बंगाल से निकला था, इसलिए बांग्ला जरूरी थी। अदालतों की भाषा फारसी हुआ करती थी, उसके लिए फारसी जरूरी थी और सबसे अंत में हिन्दी थी, क्योंकि हिन्दी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा तब भी थी।
* * *
उदन्त मार्तण्ड 30 मई 1826 को शुरू हुआ साप्ताहिक अखबार था, लेकिन डेढ़ साल के बाद ही 4 दिसंबर 1827 को उसका 79वां अंक निकलते ही बंद कर देना पड़ा।
उदन्त मार्तण्ड को बंद क्यों करना पड़ा? क्योंकि वह अखबार अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ था’ उसके पाठक देश भर में थे और वह अखबार डाक से पूरे भारत में भेजा जाता था. डाकखाने सरकारी थे और नीतियां अंग्रेजों की थी, उन्होंने डाक से समाचार पत्र भेजने का जो शुल्क रखा था वह इतना ज्यादा था कि उदन्त मार्तण्ड जैसे अखबार के लिए सर्वाइव करना मुश्किल हो गया. उदन्त मार्तण्ड की तरफ से बार-बार इस बारे में अपील की गई कि अगर अंग्रेजी के और मिशनरीज के अखबारों को भेजने का शुल्क नाम मात्र का है, तो हिन्दी के अखबार को डाक से भेजने पर इतना शुल्क क्यों लिया जाता है? अंग्रेजी हुकूमत उनकी बात क्यों सुनती, क्योंकि उदन्त मार्तण्ड का तो लक्ष्य ही था- ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’।
उदन्त मार्तण्ड को विज्ञापन का सपोर्ट नहीं था. हिंदुस्तानियों की पर्चेसिंग पावर कम थी। हिन्दी भाषा में साक्षरता का प्रतिशत भी बहुत सीमित था, जाहिर है अखबार का प्रचार-प्रसार आसान काम नहीं था।
डेढ़ साल के संघर्षों के बाद ‘उदन्त मार्तण्ड’ बंद करना पड़ा। जो सुविधाएँ ईसाई मिशनरीज के अखबारों को थीं, हिन्दी के पहले अखबार को बार-बार की अपील के बाद भी नहीं मिली थी।
हिन्दी का पहला अखबार निकलना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी, और उसका बंद होना उससे बड़ी ऐतिहासिक दुर्घटना!
* * *
आज 200 साल में हालात बहुत बदल चुके हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का सफर कई मंजिलें तय कर चुका है। भारत की आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता परवान चढ़ी और आज अपने पूरे शबाब पर है।
आज से 40 साल पहले तक देश के टॉप टेन सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में छह अखबार अंग्रेजी के हुआ करते थे, आज टॉप टेन बिकने वाले अखबारों में पांच अखबार हिन्दी के, दो मलयालम के, एक तमिल का, एक तेलुगु का और एक अंग्रेजी का है। टॉप 10 अखबारों में भी शुरू के टॉप चार यानी पहले नंबर से लेकर चौथे नंबर तक के, अखबार हिन्दी के हैं और और अंग्रेजी का सबसे बड़ा अखबार सातवें नंबर पर है।
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-जुगल पुरोहित
चार मई को आए चुनावी नतीजों ने इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि बीजेपी का विस्तार क्या क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए ख़तरा है?
पश्चिम और मध्य भारत में झारखंड स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को छोडक़र, बाकी सभी राज्यों में बीजेपी का दबदबा है। पूर्वोत्तर भारत में, मिजोरम को छोडक़र, बाक़ी सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सत्ता है।
दक्षिण भारत में हालांकि यह दबदबा कायम नहीं है। वहाँ बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की सरकार सिफऱ् आंध्र प्रदेश में है।
उत्तर भारत में, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब ही विपक्ष के गढ़ बचे हैं जबकि बाकी सभी राज्यों में बीजेपी की सत्ता है।
ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के अलावा, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव (केसीआर), तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और मायावती जैसे कई पूर्व शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों के नेता सत्ता से बाहर हैं।
क्षेत्रीय दलों ने भारत की राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रूप से 1989 में शुरू हुए गठबंधन के दौर के बाद अपनी जगह बनाई। 2014 से पहले तक दिल्ली में सत्ता की चाबी इन्हीं दलों के हाथों में रही है। वाजपेयी के समय में बीजेपी ख़ुद भी मज़बूत क्षेत्रीय ताक़तों के साथ गठबंधन करके ही उभरी थी।
लेकिन उनकी बढ़ती कमज़ोरी से अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या क्षेत्रीय दल बीजेपी के 'डबल इंजन वाली सरकार' के नारे के सामने कमज़ोर पड़ रहे हैं? या यह बीजेपी के प्रभुत्व का चरम है, जिसका मतबल है कि क्षेत्रीय राजनीति फिर से मज़बूत होगी?
क्या क्षेत्रीय पहचान अब काफ़ी नहीं है?
तीन दशकों से पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रहीं नीरजा चौधरी देश की चुनावी राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को रेखांकित करती हैं। उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, ‘इन चुनावों ने दिखाया है कि सामाजिक कल्याण और क्षेत्रीय पहचान जीत के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मेरा मानना ??है कि युवा मतदाता, जो बहुत महत्वाकांक्षी हैं, राजनीतिक समीकरणों को पुराने मतदाताओं की तरह नहीं देखते।’
‘वे सामाजिक उन्नति का रास्ता देखने पर प्रयोग करने के लिए ज़्यादा खुले हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु में विजय और पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चुना गया।’
लेकिन एक और अहम कारण भी है। रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने कहा, ‘वे किसी राजनीतिक दल से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि एक ऐसी कॉर्पोरेट संस्था से लड़ रहे हैं, जिसके पास अत्याधुनिक तकनीकी संसाधन हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की पहुंच से परे हैं।’
सरकार कहते हैं, ‘वे पैसे और नवीनतम एआई तकनीक के गठजोड़ से लड़ रहे हैं। क्षेत्रीय दलों को यह समझना होगा कि उनका दुश्मन एक ही है, यानी बीजेपी। लेकिन बीजेपी उन सभी से एक साथ नहीं लड़ेगी, बल्कि एक-एक करके उन्हें ख़त्म करेगी।’
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को ‘परिवारवाद’ वाली पार्टी नहीं बल्कि ‘जमीनी स्तर की’ पार्टी बताया है। पीएम मोदी का कहना है कि बीजेपी ने ‘विकास के प्रति नज़रिए और कोशिशों से’ लोकप्रियता हासिल की है।
लेखक और वरिष्ठ पत्रकार निलंजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मा और हिंदुत्व की अपील अब भी कायम है।
बीजेपी की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषक क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी की प्रगति के लिए उसकी गठबंधन रणनीति की ओर भी इशारा करते हैं।
बीजेपी आज सहयोगियों को किस नज़रिए से देखती है, इसके बारे में निलंजन मुखोपाध्याय एक उदाहरण देते हैं।
वह बताते हैं, ‘यह 2012 की बात है, जब मैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था। मेरी उनसे मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे पूछा कि बीजेपी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सहयोगी दलों को कैसे अपने खेमे में लाने की योजना बना रही है?’
‘उन्होंने इसका जवाब एक शब्द में दिया- जीतने की क्षमता। असल में, उनका कहना था कि सहयोगी दल बीजेपी से तभी जुड़ेंगे, जब उन्हें लगेगा कि पार्टी चुनाव में जीतने के क़ाबिल है।’
‘इससे व्यावसायिक दृष्टिकोण दिखता है। आज, उदाहरण के लिए जेडीयू को ही देख लीजिए, या हरियाणा में बीजेपी के मित्र बनाए गए छोटे दलों या शिवसेना को। बीजेपी ने उन्हें अपनी पहचान में ही शामिल कर लिया। जिससे इन दलों की नाममात्र की उपस्थिति के अलावा उनकी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं बची है।’ वहीं सरकार ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, ‘अगर हम तुलना करें कि बीजेपी ने सहयोगी दलों को कैसे गले लगाया और फिर उन्हें ख़त्म कर दिया।’
-ए. नंदकुमार
तमिलगा वेट्री कडग़म यानी टीवीके के नेता विजय ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद अपने पहले भाषण और पहले दिन की गतिविधियों के ज़रिए कई तरह के राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
विजय का पहला भाषण एक बहुआयामी राजनीतिक बयान था। इसमें सरकारी योजनाओं की घोषणाओं से लेकर पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की आलोचना, धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों से किए गए वादे और गठबंधन की राजनीति पर रोशनी डाली गई।
साथ ही ‘मैं एक आम आदमी हूं’ वाले नज़रिए के साथ, इसमें एक भावनात्मक अपील भी थी। भाषण के अलावा, उनके पहले दिन के कामों को भी राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
शपथ ग्रहण समारोह के बाद, विजय अपने आधिकारिक काम को शुरू करने के लिए सचिवालय गए और बाद में पेरियार स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। विजय ने लगभग साठ सालों तक डीएमके और एआईएडीएमके के शासन में रहे तमिलनाडु के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ा है।
उन्होंने अपने पहले ही दिन यह दिखाने की कोशिश की है कि राज्य की अगली राजनीतिक दिशा क्या होगी।
डीएमके पर पहला राजनीतिक हमला
मुख्यमंत्री के रूप में अपने भाषण में विजय का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की सीधी आलोचना थी।
विजय ने कहा कि पिछली सरकार ने खज़़ाना ख़ाली कर दिया और चली गई, और इस पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए।
साथ ही उन्होंने कहा कि अगर लोग उन्हें कुछ समय दें तो यह मददगार होगा।
पत्रकार कुबेंद्रन कहते हैं, ‘विजय को तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति को पूरी तरह समझने में कुछ समय लगेगा। उन्होंने इसके लिए खुलकर अनुरोध किया है।’
राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘विजय ने अपने शासन की शुरुआत में ही पिछली सरकार को आर्थिक चुनौतियों के लिए जि़म्मेदार ठहराने का राजनीतिक रुख़ अपनाया है। इसे भविष्य में संभावित वित्तीय संकटों या वादों को पूरा करने में देरी के लिए पहले से ही एक राजनीतिक स्पष्टीकरण तैयार करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।’
वो कहते हैं, ‘टीवीके कोई वैचारिक पार्टी नहीं है, बल्कि यह बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके जैसी अन्य पार्टियों की आलोचना करके उभरी है। इसने इन पार्टियों के ख़िलाफ़ वोट हासिल करके चुनाव जीता। विजय के भाषण से पता चलता है कि पार्टी अपनी विपक्ष की राजनीति जारी रखेगी।’
‘अब तक डीएमके विरोधी राजनीति का नेतृत्व एआईएडीएमके कर रही थी। अब विजय ने वह जगह ले ली है। यह रुख़ व्याप्त असंतोष से निपटने में मददगार साबित हो सकता है।’
डीएमके नेता एमके स्टालिन की इस पर तुरंत दिए गए बयान से पता चलता है कि विजय के भाषण का राजनीतिक प्रभाव पड़ा था।
स्टालिन ने कहा, ‘तमिलनाडु का कज़ऱ् निर्धारित सीमा के भीतर है। हमने पिछले फऱवरी के बजट में तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति स्पष्ट रूप से बताई थी। क्या आपको यह बात नहीं पता? उसके बाद ही आपने जनता से कई वादे किए। जिन लोगों ने आपको वोट दिया है, उन्हें धोखा न दें और गुमराह न करें।’
क्या बीजेपी का विरोध रहेगा जारी?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की शपथ ग्रहण समारोह में भागीदारी ने काफ़ी ध्यान आकर्षित किया।
विजय ने राहुल गांधी को 'भाई' कहकर संबोधित किया, जो यह दिखाता है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों के साथ अच्छे राजनीतिक संबंध बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की टीवीके की इच्छा थी। अब यह संभव हो पाया है।
रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘विजय ने सत्ता बचाने और अपने भविष्य के राजनीतिक मार्ग को सुरक्षित रखने की ज़रूरत को देखते हुए बीजेपी के ख़िलाफ़ रुख़ अपनाया है।’
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर राजा का कहना है, ‘भविष्य में बीजेपी विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन में विजय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।’
उन्होंने कहा, ‘राजनीति में विजय का पहला दिन तमिलनाडु के उन मतदाताओं के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला था, जो बीजेपी विरोधी हैं। बीजेपी विरोधी दलों पर ज़ोर देना और पेरियार स्मारक का उनका दौरा, ये सभी संकेत हैं कि विजय द्रविड़ राजनीतिक परंपरा को पूरी तरह से नकारने के रास्ते पर नहीं हैं।’
रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘मैं विजय की पेरियार स्मारक यात्रा को नीतिगत बयान के रूप में नहीं देखता। तमिलनाडु में कोई भी पार्टी पेरियार के बिना राजनीति नहीं कर सकती। विजय को भी पेरियार की ज़रूरत है।’
उनका कहना है कि विजय ने अन्य गठबंधन दलों को जो महत्व दिया है, वह समय की ज़रूरत है और इस रुख़ का रुझान भविष्य में और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
राजा का कहना है, ‘हालांकि विजय लगातार बीजेपी को वैचारिक शत्रु कहते रहे हैं, लेकिन उन्होंने डीएमके का जितना विरोध किया, उतना बीजेपी की सीधी और गंभीर आलोचना ज़मीनी स्तर पर नहीं की है।’
‘ऐसे में यह देखना होगा कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट और वीसीके जैसी बीजेपी विरोधी दलों के समर्थन से सरकार बनाने वाले विजय बीजेपी की आलोचना को और तेज़ करेंगे या केंद्र सरकार से सीधे टकराव से बचते हुए 'प्रशासनिक संतुलन' की राजनीति का रास्ता अपनाएंगे।’
क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?
क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?
पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था.
पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को "पूरी तरह अस्वीकार्य" बताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था.
यानी फ़िलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाज़ार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है.
पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा
पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने को कहा है. साथ ही एक साल तक सोना न ख़रीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की. और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की.
भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया. कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की ज़िम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है.
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
'पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करें'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का ज़िक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी.
उन्होंने कहा, "भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं. हमें अपनी ज़रूरत के पेट्रोल-डीज़ल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं. युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और फ़र्टिलाइज़र के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं. आसमान को भी पार कर गए हैं. पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है."
पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाज़ों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है. ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है. भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा ज़रूरतों के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफ़ी हद तक निर्भर है.
ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं. भारत को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) गैस के दाम भी बढ़ने की आशंका है. साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है.
द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, "पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है. यह साफ़ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं. भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफ़र मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है."
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए.
विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए एक चेतावनी जैसी है, क्योंकि अगर होर्मुज़ की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की क़ीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी. वित्तीय घाटा बढ़ेगा. और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
सोना ना ख़रीदने को क्यों कहा?
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लोगों से एक साल तक सोना ना ख़रीदने की भी अपील की.
उन्होंने कहा, "सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे."
"सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी."
कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है. ऐसे में इन्हें ख़रीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की ज़रूरत पड़ेगी. और जिसकी वजह से रुपया कमज़ोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा. इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है.
फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है.
कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर. विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना ख़रीदने की भी सलाह दी है."
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था. 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था. यानी 2024-25 में यह 13.7 फ़ीसदी बढ़ गया.
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व्स यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था.
वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, "पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए. यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है. भारत में सोने की भारी मांग है. देश हर साल लगभग 800–900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है. कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है. वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24% ज़्यादा है."
विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है. साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है. और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है.
वर्क फ़्रॉम होम के लिए क्यों कहा?
साथ ही पीएम मोदी ने वर्क फ़्रॉम होम का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि हम वर्क फ़्रॉम होम और ऑनलाइन मीटिंग जैसी सेवाओं को फिर शुरू करें.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये बयान भी पेट्रोल और डीज़ल की किफ़ायत से जुड़ा है.
क्योंकि उम्मीद जताई जा रही है कि इस से फ़्यूल का इस्तेमाल कम होगा. लोगों की घर से दफ़्तर आवाजाही कम होगी. बिजली और तेल का कुल इस्तेमाल कम होगा. और बचत होगी.
खाने के तेल के इस्तेमाल को कम करने को क्यों कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "ऐसे ही खाने के तेल का भी है. इसके आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ती है. हर खाने में तेल के उपयोग में कुछ कमी करें तो वो भी देशभक्ति का काम है. इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी. इससे देश के ख़ज़ाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के लोगों का भी स्वास्थ्य सुधरेगा."
भारत खाने के तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक है. भारत पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ़्लॉवर ऑयल को आयात करता है. भारत इंडोनेशिया, मलेशिया अर्जेंटीना और ब्राज़ील जैसे देशों से खाने के तेल (कुकिंग ऑयल) को आयात करता है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत अपनी कुल खाद्य तेल (कुकिंग ऑयल/एडेबल ऑयल) ज़रूरत का लगभग 55% से 60% आयात करता है. और इस क्रम में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा ख़र्च करना पड़ता है.
फ़र्टिलाइज़र्स को लेकर क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से अपील की कि केमिकल फ़र्टिलाइज़र्स पर अपनी निर्भरता कम करें. भारत दुनिया के सबसे बड़े फ़र्टिलाइज़र्स (उर्वरक) उपभोक्ताओं में है.
यूरिया, डीएपी, पोटाश, और इनके कच्चे माल का बड़ा हिस्सा भारत आयात करता है. इनकी कीमतें जुड़ी होती हैं- प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल, और वैश्विक सप्लाई चेन से.
यानी अगर पश्चिम एशिया संकट से तेल महंगा होता है, गैस महंगी होती है, शिपिंग प्रभावित होती है, तो उर्वरक भी महंगे हो जाते हैं. भारत में किसान सस्ती कीमत पर खाद खरीदते हैं क्योंकि सरकार भारी सब्सिडी देती है. ऐसे में अगर फ़र्टिलाइज़र्स यानी खाद की क़ीमतें बढ़ती हैं तो सरकार का सब्सिडी बिल बहुत बढ़ जाता है.
समर्थन और आलोचना
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीएम मोदी के इस भाषण के बाद कहा कि ये नाकामी का सबूत है, अब जनता को यह बताना पड़ रहा कि क्या ख़रीदें और क्या नहीं.
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे- सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम इस्तेमाल करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं, ये नाकामी के सबूत हैं."
उन्होंने लिखा, "12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है- क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहां जाएं, कहां न जाएं. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें. देश चलाना अब कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम के बस की बात नहीं."
शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, "मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष से निपटने में नीतिगत विफलता के बाद अब चुनावी फ़ैसलों का बोझ नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता और उनसे तेल बचाने, यात्रा कम करने या ख़रीदारी घटाने की अपील नहीं की जा सकती."
उन्होंने सरकार को समझाइश देते हुए कहा कि मंत्रियों और नेताओं के लंबे चौड़े मोटर काफ़िलों पर रोक लगाकर, बड़ी-बड़ी रैलियों को एक साल के लिए बंद करके और भव्य शपथ ग्रहण समारोहों को बंद करके, उन्हें वॉच फ़्रॉम होम (घर से देखकर) भी पेट्रोल और डीज़ल बचाया जा सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर कहती हैं, "चुनाव ख़त्म हो गए हैं और इसके साथ ही पीएम मोदी ने लोगों से ईंधन की बचत करने को कहा है और विदेश यात्रा पर ना जाने की सलाह दी है. वो शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और इटली के दौरे पर जा रहे हैं."
वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने लिखा, "वैश्विक संकट के इस दौर में मोदी जी ने देशवासियों से एक दूरदर्शी अपील की है. पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी-सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है. यह वैश्विक चुनौतियों के बीच देश को एक स्थिर, सशक्त और अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक सिद्ध होगा."
वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा तेल और गैस को लेकर की गई अपील पर देशवासी अमल करें."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


