विचार/लेख
सोशल मीडिया पर सनसनी के तौर पर उभरी सीजेपी एक महीने के भीतर ही देश में जगह जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। कई लोग इसमें युवाओं के नेतृत्व को लेकर उम्मीदें जता रहे हैं तो कइयों को इसके भविष्य को लेकर आशंकाएं भी हैं।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट -
देश के बेरोजगारों की कॉकरोच से तुलना के बाद इसी नाम से बनी कॉकरोच जनता पार्टी ने बनते ही युवाओं और देश की मीडिया में सनसनी पैदा कर दी। कुछ ही दिन के भीतर सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर बना लेने वाली पार्टी पहली बार जब आंदोलन के मैदान में उतरी तो वो लगभग फ्लॉप रही लेकिन पहले कार्यक्रम की परिस्थितियों और इसके फ्लॉप होने के बावजूद वो आंदोलन के मकसद को लेकर जिस तरह से सक्रिय है, उससे कई चर्चाएं जन्म ले रही हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने पिछले हफ्ते ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। पार्टी अभी कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर बनी थी और कुछ ही दिनों के भीतर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोवर बना लेने के बावजूद जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में महज कुछ सौ लोग ही पहुंचे। उनमें भी ज्यादा संख्या उन प्रतियोगी छात्रों और उनके परिजनों की थी जो ऐसे किसी भी मंच की तलाश में थे जहां उनकी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका मिले। प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग हुई और एक हफ्ते का अल्टीमेटम दिया गया।
रविवार को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में भी सीजेपी ने विरोध-प्रदर्शन किया जिसमें साउथ की फिल्मों के स्टार अभिनेता प्रकाश राज और सोनम वांगचुक भी शामिल हुए। यहां भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हुई। प्रकाश राज ने सीजेपी के समर्थन में कहा, ‘यदि आप इन युवाओं को ‘अर्बन नक्सल’, ‘पाकिस्तानी’ या ‘कॉकरोच’ कह रहे हैं, तो भी वे डरते नहीं हैं। वे अपने सपनों के लिए लड़ रहे हैं- चुप हो जाइए और उनकी बात सुनिए।’
इससे पहले सीजेपी ने महाराष्ट्र के पुणे, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और पंजाब के अमृतसर में भी विरोध प्रदर्शन किए जिसमें हृश्वश्वञ्ज पेपर लीक मामले, ष्टक्चस्श्व के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में कथित गड़बडिय़ों और परीक्षा से जुड़ी अन्य कथित खामियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई। हालांकि लखनऊ में सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके का विरोध भी हुआ और छात्रों ने उनके आंदोलन में जबरन घुसपैठ करने के आरोप लगाए।
अल्टीमेटम की अवधि बीत गई, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ और न ही होने की कोई संभावना है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि सीजेपी की आगे की राह क्या है। क्या यह युवाओं के छिट-पुट आंदोलन को एक व्यापक और राष्ट्रीय नेतृत्व दे पाएगी या फिर सनसनी की तरह प्रकट होने के बाद वैसे ही विलुप्त भी हो जाएगी।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन से उठ रहे सवाल
राजनीतिक विश्लेषक छात्रों के आंदोलन और सीजेपी के साथ युवाओं के जुडऩे के पीछे व्यवस्था के प्रति असंतोष और उनके आक्रोश को देख रहे हैं। लेकिन एक थ्योरी यह भी है कि सीजेपी को इस वजह से खड़ा किया गया और फिर पर्दे के पीछे से इसे समर्थन दिया जा रहा है ताकि इस असंतोष और आक्रोश को कमजोर और दिग्भ्रमित किया जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार झा कहते हैं, ‘युवाओं में असंतोष और नाराजगी तो है ही। और यह नाराजगी सडक़ों पर उनके होने वाले बार-बार के प्रदर्शनों में दिख भी रही है। लेकिन अब जब नीट पेपर लीक और सीबीएसई की धांधली के बाद कांग्रेस पार्टी के छात्र और युवा विंग भी इस आंदोलन में उतर आए, ऐसे में अचानक कॉकरोच पार्टी का बनना, आंदोलन में उतरना, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना ऊपर से तो दिखाता है कि छात्रों-युवाओं के समर्थन में है लेकिन जंतर-मंतर पर जिस तरह उसे प्रदर्शन की अनुमति मिली और सीजेपी ने भी जिस तरह पुलिस की इच्छानुसार प्रदर्शन किया, उससे ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये सत्तारूढ़ पार्टी की मुश्किलों को बढ़ाने नहीं बल्कि उसे कम करने का काम कर रही है।’
हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरह से युवाओं के मुद्दों और छात्रों की समस्याओं को उठाया है, उसे देखते हुए उनकी गतिविधियों को सीधे तौर पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक टूल्स को चुनौती के तौर पर भी देखा जा रहा है।
चूंकि प्रधानमंत्री अक्सर युवाओं की बात करते हैं, युवा आबादी का जिक्र करते हैं, देश को युवा देश बताते हैं, परीक्षा पर चर्चा करते हैं, ऐसे में परीक्षा में होने वाली धांधली और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को लोगों को सामने लाने का काम यदि सीजेपी कर रही है तो कहीं न कहीं, यह सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी करती दिख रही है।
बावजूद इसके, सीजेपी को इस तरह तो इसके प्रशंसक भी नहीं देख रहे हैं कि यह जेपी आंदोलन, वीपी सिंह, अन्ना हजारे जैसा कोई आंदोलन खड़ा कर पाएगा। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान असम की एक युवती रूपम गोस्वामी का कहना था, ‘पूरा सिस्टम खराब हो गया है। युवाओं-छात्रों की बात सुनी नहीं जा रही है। सिस्टम का विरोध करने पर डंडे बरसाए जाते हैं। ऐसे में हम क्या करें। हमारी समस्या को कोई भी उठा रहे हैं तो हम उसके साथ खड़े हैं।’
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि सीजेपी के नेताओं को कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और वो इतने परिपक्व दिखते भी नहीं हैं लेकिन युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्ति और मंच तो दिया ही है।
-देवेन्द्र नाथ शर्मा
आदिवासियों के लिए पेड़ मात्र वृक्ष नहीं, बल्कि देवस्वरूप हैं। इसलिए वे पेड़ों की पूजा-अर्चना करते हैं। उनका सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन पूरी तरह पेड़ों और जंगलों के इर्द-गिर्द घूमता है।
आज विकास के नाम पर जंगलों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे आदिवासी समाज भयभीत है। वे डरे-सहमे यह देख रहे हैं कि कब सरकार और कॉरपोरेट की मिलीभगत से उनके जंगलों पर कुल्हाड़ी चल जाए। ग्राम सभाओं की फर्जी सहमति लेकर जंगलों की कटाई के अनेक उदाहरण उनके सामने हैं।
वन विभाग के स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से जंगलों में अवैध पेड़ कटाई तो दशकों से जारी रही है, लेकिन अब विकास की आड़ में बड़े पैमाने पर हो रही कटाई ने आदिवासी समाज को गहरी चिंता में डाल दिया है। कई जिलों में आदिवासी अब जागरूक होकर पेड़ों की अवैध कटाई और सरकारी अनुमति से कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा बड़े स्तर पर वनों की कटाई के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं।
वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनका अस्तित्व इन जंगलों और पेड़ों से ही जुड़ा है। पेड़ों की कटाई से न केवल उनका जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होगा, बल्कि उन्हें विस्थापन का दंश भी झेलना पड़ेगा। साथ ही, देवतुल्य पेड़ों पर आश्रित वन्य जीव, पशु-पक्षी भी जीवन संकट में पड़ जाएंगे।
इसीलिए पिछले एक दशक में स्थानीय आदिवासी समूहों द्वारा जंगलों की रक्षा को लेकर कई आंदोलन किए गए हैं। उन्हें अब यह समझ आ चुकी है कि पर्यावरण और पेड़ों को बचाने की लड़ाई उन्हें खुद लडऩी होगी। सरगुजा, बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों तथा रायगढ़ जैसे क्षेत्रों में यह आंदोलन तेजी से गति पकड़ रहा है।
राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के अवसर पर जगदलपुर जिले के मुख्यालय में आदिवासी क्षेत्र की 20 से अधिक ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों ने ‘महाग्रामसभा’ का आयोजन किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के उद्देश्य से एकजुट हुए इन प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि जंगलों से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग तभी तक संभव है, जब तक उनका संरक्षण सुनिश्चित रहे। जंगल केवल लकड़ी या वनोपज का स्रोत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के समस्त जीवों का निवास, पोषण और जीवन का आधार हैं। आदिवासियों का संपूर्ण जीवन और आजीविका जंगलों पर ही निर्भर है।
इसी क्रम में बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में आलनार पहाड़ी से 7 जून को जल, जंगल और जमीन बचाने के उद्देश्य से हजारों आदिवासियों की पदयात्रा शुरू हो चुकी है, जो कई गांवों से होते हुए 11 जून को दंतेवाड़ा पहुंचेगी।
इसके पहले से सरगुजा संभाग में 1,70,000 हेक्टेयर में फैला मध्य भारत का फेफड़ा माने जाने वाला हसदेव अरण्य के जंगलों में पेड़ों की कटाई के विरुद्ध व्यापक जन आंदोलन दस वर्षों से चल ही रहा है । यह आंदोलन ‘हसदेव हरण बचाओ संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा लगातार चलाए जा रहा है । गत अक्टूबर में स्थानीय आदिवासी समुदाय द्वारा वन सत्याग्रह किया गया और खनन की स्वीकृति को रद्द करने के लिए ग्रामीणों ने 300 किलोमीटर की पदयात्रा भी की। इन लोगों का मानना है की खनन परियोजनाओं के चलते लाखों पेड़ों की कटाई से हाथियों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि इन जंगलों को कटना उनकी हजारों साल पुरानी संस्कृति व आजीविका का अंत तथा जंगलों की जैव विविधता की समाप्ति है।
-एंथनी जर्चर
अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी ख़त्म करने के लिए हुए समझौते की घोषणा ने डोनाल्ड ट्रंप को उनके जन्मदिन पर एक बेहद शानदार तोहफ़ा दिया है, हालांकि यह काफ़ी अनिश्चितताओं में लिपटा हुआ है।
समझौते का एलान करते हुए सोशल मीडिया पर की गई अपनी पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट कमर्शियल जहाज़ों के लिए खुल जाएगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।
ट्रंप ने रविवार को कहा, ‘तेल को निर्बाध बहने दो!’
उन्होंने आगे कहा कि पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों की नाकामियों के उलट उन्होंने एक 'बेहतरीन समझौता' कराया है, जो 'पूरे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा' लाएगा।
बेशक, इस तरह की बढ़ा-चढ़ाकर की गई बातें ट्रंप के लिए नई नहीं हैं।
पिछले साल गज़़ा युद्ध ख़त्म करने वाले समझौते को लेकर उनके 'हमेशा के लिए शांति' और 'ईमान, उम्मीद और ईश्वरीय शुरुआत' के दावे भी इतने ही बड़े थे, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त इन दावों से काफ़ी दूर रही है।
इस तरह के बड़े दांव वाले कूटनीतिक समझौतों में क़ामयाबी या नाकामी आमतौर पर बारीक़ ब्योरों पर निर्भर करती है। और यहां यही ब्योरे बहुत कम उपलब्ध हैं।
तेल की आवाजाही पर अभी भी आशंका
रविवार शाम फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा, यह बात 'इस समझौते में शामिल है' और अमेरिका इसके पालन की पुष्टि कर सकेगा।
इनमें से कुछ बातें आगे की बातचीत और मौजूदा युद्धविराम को 60 दिन बढ़ाने के दौरान होने वाली 'तकनीकी' वार्ताओं में तय की जाएंगी।
लेकिन अगर दशकों से ईरान को उसके परमाणु कार्यक्रम से पीछे हटाने के लिए किए गए प्रयासों से कुछ साफ़ हुआ है, तो वो यह है कि कोई गारंटी नहीं होती, चाहे अमेरिका को इस 'समझौता एमओयू' में कितना भी भरोसा क्यों न हो।
मानो इस बात को और स्पष्ट करने के लिए, ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने रविवार को एक बयान जारी कर कहा, ‘अंतिम बातचीत को तब तक टाल दिया जाएगा, जब तक समझौता ज्ञापन के तहत दूसरे पक्ष की प्रतिबद्धताओं को लागू नहीं किया जाता।’
वे प्रतिबद्धताएं क्या हैं और ईरान उनकी क्या व्याख्या करता है, इससे यह तय होगा कि यह समझौता टिकेगा या नहीं।
ऊर्जा बाज़ार के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल की आवाजाही युद्ध से पहले के स्तर पर तुरंत लौटने की संभावना नहीं है।
बड़ी संख्या में फंसे तेल टैंकरों को हटाने, बारूदी सुरंगों को साफ़ करने और सामान्य तेल आपूर्ति व उत्पादन बहाल करने में कई सप्ताह लग सकते हैं।
आधिकारिक हस्ताक्षर होने में अभी कई दिन बाकी हैं। ऐसे में ईरान और अमेरिका के पास समझौते की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अहम बिंदुओं पर सहमति बनाने का समय है, लेकिन इसके टूटने की आशंका भी बनी हुई है।
-हेमंत कुमार झा
ब्रिटेन के चर्चित अखबार ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 21 फरवरी, 2004 को बिहार पर एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’। इस रिपोर्ट में बिहार को भारत भूभाग के चित्र में एक अंधेरे धब्बे के रूप में रेखांकित किया गया था। रिपोर्टर ने इसके शीर्षक के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक वी. एस.नायपॉल की 1964 में प्रकाशित कृति ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’ से प्रेरणा ग्रहण की होगी।
इस रिपोर्ट में बिहार को भारत के सर्वाधिक पिछड़े, सर्वाधिक गरीब, सर्वाधिक ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था, अति भ्रष्ट और अकुशल प्रशासनिक व्यवस्था, चिंताजनक कानून व्यवस्था वाले एक अंधेरे धब्बेनुमा इलाके के रूप में तो विश्लेषित किया ही गया था, इसके भविष्य को लेकर भी यह कह कर आशंकाएं व्यक्त की गई थी कि बिहार के लोग अपने को देश के सबसे अधिक पिछड़े, सबसे अधिक गरीब लोगों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं और प्रशासनिक महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार, शैक्षिक क्षेत्र में व्याप्त अराजकता और भ्रष्टाचार आदि को ‘नॉर्मल’ मान कर जीने और एडजस्ट करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। उनमें राजनीतिक परिवर्तन की भूख है क्योंकि वे राजनीतिक रूप से जागरूक हैं लेकिन उनमें ऐसी इच्छाशक्ति का घोर अभाव है जो किसी समुदाय या किसी क्षेत्र के गुणात्मक विकास के लिए आवश्यक तत्व है। उनके दिलोदिमाग में भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट अफसरों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कब्र बन चुके अपने शैक्षिक संस्थानों के खिलाफ कोई प्रतिरोध की भावना जन्म नहीं लेती क्योंकि वे मान कर चलते हैं कि बिहार की और हम सबकी यही गति है।
उसी दौरान, यानी, इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के कुछ वक्त आगे या पीछे ‘इंडिया टुडे’ ने अपने एक संपादकीय में बिहार के संदर्भ में एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी...‘बिहार अगर देश से अलग होने की मांग करेगा तो देश के बाकी लोग उसकी इस मांग का समर्थन ही करेंगे’। मतलब कि देश के बाकी हिस्से के लिए बिहार एक तिरस्कृत और किसी सुधार की इच्छाशक्ति से रहित एक अराजक, अनगढ़ राज्य है जो अगर भारत से अलग होना चाहे तो बाकी सारा देश यही कहेगा कि...‘जा भाई, तू अपना खुद ही जान ले।’
बाकी देश को मालूम है कि बिहारी चाहे जिस अवस्थिति में रहेगा, भूख और गरीबी से बिलबिलाते हमारे महानगरों में रिक्शा-टेम्पू चलाने, फर्श पर पोछा लगाने, गेट पर सिक्युरिटी गार्ड के रूप में खड़ा रहने, फैक्ट्रियों में ठेका मजदूरी आदि करने के लिए आएगा ही आएगा।
लगभग उसी दौरान, संभवत: 2003 के किसी महीने में, बिहार की तत्कालीन सत्ता पर काबिज लालू प्रसाद यादव के आह्वान पर पटना में एक अति चर्चित रैली हुई थी जिसका नाम था...‘तेल पिलावन लाठी भजावन रैली।’ इस रैली की खबरें ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा आदि के मीडिया में भी चली थी और इसके उन दिलचस्प दृश्यों को देश-विदेश के टेलीविजन मीडिया में खूब हास्यजनक तरीके से दिखाया गया था जिनमें गांवों, कस्बों से लोग मोटे मोटे ल_ लेकर रैली में शामिल होने पटना की सडक़ों पर चले जा रहे हैं और शहर के शांतिकामी लोग और व्यवसायीगण किसी संभावित उपद्रव से आतंकित हो अपने घरों और दुकानों के दरवाजों को बंद किए खिड़कियों से झांक रहे हैं।
माना जाता है कि लालू के समग्र पिछड़ावाद की राजनीति के ताबूत में अंतिम कील इसी रैली के माध्यम से ठोकी गई थी और बिहार के अति पिछड़े समुदाय ने नीतीश और भाजपा के गठजोड़ में अपना राजनीतिक ठिकाना तय कर लिया था।
तब से बीस-बाईस साल बीते। उस दौरान जन्मे बच्चे अब बालिग हो चुके। लेकिन बिहार...? बाकी देश दुनिया के बरक्स बिहार आज भी कहां खड़ा है?
नीतीश के ‘सुशासन’ ने बिहार में संगठित अपराध के तंत्र पर प्रहार तो किया किंतु उसके समानांतर नौकरशाही में संगठित भ्रष्टाचार का जो तंत्र खड़ा हो गया उसकी ओर से नीतीश जी या तो आँखें मूंदे रहे या यह भी कह सकते हैं कि विवश रहे। उनके बीस वर्ष और एक अल्प कालावधि में जीतन राम मांझी के कार्यकाल में बिहार देश के सर्वाधिक भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के रूप में शुमार होता रहा।
पटना में रियल स्टेट की कीमतें देश के बड़े महानगरों के मुकाबले भी अधिक इसलिए हो गई क्योंकि छोटा बड़ा हर भ्रष्ट सरकारी अमला पटना में फ्लैट और जमीन खरीदने को अपनी कमाई की सार्थकता के रूप में लेने लगा।
भ्रष्ट सरकारी नौकरों के मकानों को जब्त कर उनमें स्कूल आदि खोलने की नीतीश कुमार की घोषणाएं कागजी ही साबित हुई। एकाध अफसरों के साथ ऐसा हुआ भी तो इसलिए कि ‘लॉबी’ ने उनसे राजनीतिक या निजी खुन्नस साधा।
कुल मिलाकर नीतीश कुमार के पूरे शासन काल में बिहार का प्रशासनिक अमला देश के सर्वाधिक भ्रष्ट तंत्र के रूप में चर्चित और ‘प्रतिष्ठित’ रहा और बिहार जनमानस ने इसके साथ ‘एडजस्ट’ कर लिया।
नियोजित शिक्षकों की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का खेल चला, खरीदार उसमें शामिल हो गए, बिहार स्तर की विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक का खेल चला, खरीदार उसमें शामिल हो गए, हर वाजिब काम में पैसा का खेल सरकारी कार्यालयों में चलता रहा, बिहारी जनमानस इसे ‘नॉर्मल’ मान कर एडजस्ट करती रही, बने बनाए पुल पुलिया निर्माण के तुरंत बाद या निर्माण के दौरान ही धंसते, गिरते रहे, बिहारी जनमानस इन खबरों को चटखारे ले ले कर पढ़ता सुनाता रहा, सडक़ें निर्माण के दौरान ही जमींदोज होती रहीं, टूटती रहीं, लोग इन्हें नॉर्मल मान कर आगे बढ़ते गए।
बिरयानी के बदले सेक्सुअल फ़ेवर मांगने को लेकर हिमांशु जांगड़ा पर उठा विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि एक नया विवाद सामने आ गया. यह मामला भी कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो से जुड़ा है, जहां हिमांशु ने विवादास्पद बातें की थीं.
ताज़ा विवाद के केंद्र में एक मेडिकल छात्रा सेजल पवार हैं. वह मुंबई में एमबीबीएस थर्ड ईयर की छात्रा हैं. लगभग तीन महीने पुराने शो में होस्ट प्रणीत मोरे क्राउड वर्क के दौरान सेजल से बात करते हैं. वह उनसे एनाटॉमी और पोस्ट मार्टम पर सवाल कर रहे थे.
सेजल बता रही हैं कि शवों की मेडिकल जांच कैसे होती है. इस बीच वह कहती हैं कि डॉक्टर कई बार मृत पुरुषों के जननांगों को लेकर मज़ाक करते हैं.
जब वह यह बात कर रही थीं तब भी प्रणीत ने उन्हें रोका नहीं, बल्कि हंसते हुए उकसाते रहे. यह वीडियो क्लिप तब वारयल नहीं हुई, बल्कि हिमांशु प्रकरण के बाद तेज़ी से फैली.
सोशल मीडिया पर सेजल पवार की इस टिप्पणी को लेते हुए यूज़र सवाल करने लगे कि वह तो मेडिकल प्रोफ़ेशन से हैं. जब वह शवों तक का सम्मान नहीं करेंगी, तो मरीज़ों के साथ कैसा व्यवहार करती होंगी.
यहां तक कि कई यूज़र उन्हें मेडिकल कॉलेज से निकालने तक की मांग तक कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर बात हो रही है कि मेडिकल छात्रों के अध्य्यन के लिए शरीर दान करने वाले मृतकों तक की गरिमा का ध्यान नहीं रखा जा रहा.
इस बीच, मुंबई के केईएम अस्पताल, जहां सेजल पढ़ रही हैं, उसका प्रशासन भी हरकत में आ गया. अस्पताल की ही दो सदस्यीय कमेटी वीडियो क्लिप की समीक्षा कर रही है और सेजल को छुट्टी पर भेज दिया गया है.
सीमा कौन तय करेगा - दर्शक, कानून या कॉमेडियन?
हिमांशु और प्रणीत अपने कथित मज़ाक के लिए पहले ही माफ़ी मांग चुके हैं. हाल में क्लिप वायरल होने के बाद सेजल पवार ने भी एक वीडियो डालकर माफ़ी मांगी.
उन्होंने कहा, "मैं पहली बार कॉमेडी शो में गई थी. मैंने वहां पर कई बातें की थीं. गाना भी गाया था. लेकिन वही कमेंट वायरल हो गया. मैं मानती हूं कि मैंने बहुत ग़लत बात की थी. अगर इससे किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो मैं माफ़ी चाहती हूं. आगे से ऐसा कभी नहीं होगा."
अब महाराष्ट्र साइबर सेल ने प्रणीत मोरे, हिमांशु जांगड़ा और सेजल पवार के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है.
एएनआई में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, उन पर आरोप भारतीय न्याय संहिता की धारा 75(1)(iv), 75(3), 294 और 353(2) के साथ-साथ आई टी एक्ट की धारा 67 के तहत लगाए गए हैं.
साइबर पुलिस का कहना है कि यूट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहे इस कंटेंट में महिलाओं और मृतकों से जुड़ी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं.
आरोप है कि कॉमेडियन प्रणीत मोरे के होस्ट किए गए प्रोग्राम्स की क्लिप रिकॉर्ड की गईं और उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाया गया ताकि कमर्शियल फ़ायदा हो सके.
प्रणीत मोरे के शो से जुड़ी दो वायरल क्लिप्स पर कार्रवाई के बाद बहस अब सिर्फ़ हिमांशु जांगड़ा या सेजल पवार तक सीमित नहीं रह गई है.
सवाल यह उठ रहा है कि क्या कॉमेडी के नाम पर अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट सामान्य होता जा रहा है. और अगर ऐसा है तो इसकी सीमा कौन तय करेगा - दर्शक, क़ानून या कॉमेडियन?
बीबीसी ने इस बारे में मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर रीमा भाटिया से बात की.
वह कहती हैं, "ह्यूमर अक्सर एक तरह का पावर प्ले होता है. यानी हम अक्सर उन्हीं लोगों या कम्युनिटी को लेकर मज़ाक करते हैं, जिनके बारे में हम मानते हैं कि हम उनसे बेहतर या ज़्यादा ताकतवर हैं. ट्रेडीशनली इसी तरह के मज़ाक होते रहे, जैसे वाइफ़ जोक्स, जिसमें पत्नी कमतर मानी जाती रही और हंसी का केंद्र रही."
"इसका उल्टा रिएक्शन भी होता है, यानी जिन लोगों को दबाया जाता रहा, वह पलटवार करते हैं. मेडिकल छात्रा की बात सुनें तो भी यही लगता है कि जैसे वह कहना चाहती हों कि देखो हम महिलाएं भी पुरुषों पर जोक्स कर सकती हैं. हालांकि नैतिक तौर पर दोनों ही पक्ष ग़लत हैं."
भारत ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया में आपत्तिजनक कंटेंट कॉमेडी की तरह परोसा जाने लगा है.
ब्रिटिश कॉमेडियन रिकी गेर्विस अपने डार्क ह्यूमर के लिए जाने जाते हैं. लेकिन साल 2009 में उन्होंने रेप को ही कॉमेडी का विषय बना दिया.
एक विवादास्पद जोक में गेर्विस एक काल्पनिक ड्रिंक ड्राइविंग का जिक्र करते हैं, जहां वह बूढ़ी महिला का बलात्कार कर देते हैं, जो अल्ज़ाइमर बीमारी से जूझ रही थी. कॉमेडियन का मज़ाक यहां खत्म होता है कि "चूंकि क़िस्मत से उसे अल्ज़़ाइमर था. इसलिए वह भरोसेमंद गवाह नहीं थी."
इस मज़ाक में शराब पीकर गाड़ी चलाने से लेकर रेप और बीमारी तक का इस्तेमाल किया गया. विवाद बढ़ने पर गेर्विस ने अपना बचाव किया था, यह कहते हुए कि उन्होंने व्यंग्य किया था.
क्या लोग अश्लील या बोल्ड पंचलाइन पर ज़्यादा हंसते हैं?
बीबीसी से बात करते हुए मध्य प्रदेश के इंदौर के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर उज्ज्वल सरदेसाई कहते हैं, "कई बार हम किसी ऐसी बात पर, जिसे हम ग़लत मानते हैं, नाराज़ होने की बजाय हंसकर प्रतिक्रिया देते हैं. मनोविज्ञान में इसे रिएक्शन फ़ॉर्मेशन कहा जाता है. यह एक तरह का डिफ़ेंस मेकेनिज़्म है. ऐसा तब होता है, जब हम किसी भी वजह से सीधा विरोध नहीं करना चाहते."
"कई बार ऑडियंस को यह डर भी रहता है कि कथित कॉमेडी पर उनका भड़क जाना उन्हें कम कूल दिखा सकता है. यही वजह है कि ऐसे लोग भी अश्लील मज़ाक पर हंसते हैं, जो उससे सहमति नहीं रखते. स्टैंड अप कॉमेडी में आमतौर पर लोग झेंप मिटाने के लिए हंसते हैं, या फिर जोक्स करते हैं."
अक्सर दिखता है कि किसी कॉमेडी शो में अचानक कोई द्विअर्थी बात आ जए तो कमरे या हॉल में हंसी की आवाज़ बढ़ जाती है.
इसके पीछे भी मनोविज्ञान है. अमेरिकी बिहेवियरल साइंटिस्ट ए पीटर मैकग्रा ने हंसी के मनोविज्ञान पर एक स्टडी की थी. 'बिनाइन वायलेशन- मेकिंग इममॉरल बिहेवियल फ़नी' नाम से यह अध्ययन पीयर-रिव्यूड जर्नल साइकोलॉजिकल साइंस में छपा था.
इसके मुताबिक, लोग अक्सर उन बातों पर हंसते हैं, जिनके बारे में अक्सर खुलकर बातचीत नहीं की जाती. यौन संबंध और शरीर कुछ ऐसे ही विषय हैं. मतलब जिस चीज़ को सोसायटी संवेदनशील मानती है, वही कॉमेडी में आ जाए तो लोगों को ज़्यादा मज़ेदार लगता है.
इसके लिए बाकायदा एक टर्म है- बिनाइन वायलेशन थ्योरी. इसके मुताबिक, हमें हंसी तभी आती है जब कोई बात या घटना किसी नियम को तोड़ती दिखे.
मसलन, कोई शख्स गिरता दिखे तो आसपास बहुत से लोग हंस पड़ते हैं अगर नुक़सान ज़्यादा गंभीर न हो.
लेकिन हर कोई क्यों नहीं हंसता?
एक ही मज़ाक सुनकर एक व्यक्ति जोर से हंस सकता है, जबकि दूसरा शख्स नाराज़ हो सकता है. दरअसल कॉमेडी की समझ का उम्र, परवरिश और व्यक्तिगत तजुर्बे से संबंध है. हो सकता है कि जो कॉमेडी एक कॉलेज छात्र को हंसाए, वही उसके परिवार में बड़ों को भद्दी लग जाए.
प्रोफ़ेसर रीमा भाटिया कहती हैं, "पढ़ाई-लिखाई, अनुभव कई चीजें के साथ सोच बदलती है. यही वजह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी किसी बात को मज़ाक मानने या न मानने की सोच भी बदलती है. मसलन, जोरू का ग़ुलाम टर्म को पहले ह्यूमर माना जाता है, आज बहुत कम लोग होंगे, जो ऐसी बात करें."
मज़ाक की आड़ में कई आपत्तिजनक बातों को नॉर्मलाइज किया जा रहा है. अगर लिंग या धर्म को लेकर बार-बार अपमानजनक बातें कॉमेडी की शक्ल में परोसी जाएं तो कुछ लोग उसे कम गंभीर मान सकते हैं.
प्रणीत मोरे के शो की क्लिप्स वायरल होने के बाद भी यही सवाल उठा. यूज़र मान रहे हैं कि जब महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा या कंसेंट जैसे विषयों पर बार-बार मज़ाक हो, तो उससे इन मुद्दों की गंभीरता कम हो सकती है.
लेकिन क्या इससे सीधे अपराध बढ़ते हैं?
अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जो यह साबित करता हो कि कॉमेडी शो देखने से कोई शख्स अपराध करने लगे. लेकिन चिंता उस माहौल को लेकर है, जो ग़लत को नॉर्मलाइज कर रही है.
इससे समाज की सोच ज़्यादा पूर्वाग्रही हो सकती है. खासकर तब, जबकि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डेटा के मुताबिक, साल 2021 से साल 2023 के बीच महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ दर्ज अपराधों में लगातार बढ़ोतरी दिखी.
इस दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले लगभग 4.28 लाख से बढ़कर लगभग 4.48 लाख हो गए, जबकि बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध लगभग 1.49 लाख से बढ़कर 1.77 लाख के करीब पहुंच गए.
यानी जो समूह पहले से ही वल्नरेबल है, उसके साथ हो रहे अपराधों पर हंसना उस पर ख़तरा बढ़ा सकता है.
लेकिन ऐसा नहीं कि सिर्फ़ एक ही जेंडर निशाने पर है.
महिलाओं के कपड़ों, शरीर, उम्र, शादी या रिश्तों पर जोक्स अक्सर सुनाई पड़ जाते हैं. लेकिन पुरुष भी इससे बचे हुए नहीं. उनकी ऊंचाई, गंजापन, कमाई, नौकरी, प्यार में असफलता, यहां तक कि तथाकथित मर्दानगी पर बहुत से मज़ाक चलते हैं.
एक पुरुष को कैसा होना चाहिए, कितना कमाना चाहिए, कितना मजबूत होना चाहिए, जैसी बातों को लेकर भी कई तरह के मज़ाक किए जाते हैं. जो इन पर खरे नहीं उतरते, वह कई बार मज़ाक का शिकार हो जाते हैं.
यानी कॉमेडी की दुनिया में महिलाओं और पुरुषों, दोनों से जुड़े स्टीरियोटाइप्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. सेजल, जो कि एक मेडिकल प्रोफे़शनल हैं, उनका मज़ाक भी मृत पुरुषों के जननांगों से जुड़ा हुआ था.
जब भी किसी कॉमेडी शो, फिल्म, वेब सीरीज़ या सोशल मीडिया वीडियो को लेकर विवाद होता है, एक शब्द बार-बार सुनाई देता है, अश्लीलता. लेकिन कब इन्हें अश्लील माना जा सकता है कि कार्रवाई हो?
इसका जवाब उतना सीधा नहीं है जितना पहली नज़र में लगता है.
इसपर बीबीसी से बातचीत के दौरान सुप्रीम कोर्ट की वकील सीमा कुशवाहा ने कहा, "कॉमेडी में इस्तेमाल होने वाली अश्लील भाषा को लेकर कोई अलग क़ानून नहीं है. ऐसे मामलों में कंटेंट के संदर्भ और उसके असर को देखा जाता है. अगर कंटेंट डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म पर है, तो आईटी एक्ट और दूसरी क़ानूनी धाराएं लग सकती हैं."
वह कहती हैं कि संविधान के अनुच्छेद 51A(e) में साफ़ कहा गया है कि महिलाओं का सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन यह फ़ंडामेंटल ड्यूटी है, जिसे न मानने पर सज़ा का कोई अलग क़ानून नहीं है.
ताज़ा विवाद को देखें तो ऐसा लगता है कि पुलिस ने सांकेतिक तौर पर एफ़आईआर की है. हिमांशु के मामले में अगर उसकी कथित डेट भी सामने आकर शिकायत करे तो सज़ा हो सकती है, वरना केस ख़ारिज होने के ज़्यादा चांस हैं.
हालांकि यहां यह बात भी है कि नैतिक और क़ानूनी जवाबदेही हमेशा एक सी नहीं होती. कोई बात नैतिक रूप से आपत्तिजनक हो सकती है, लेकिन हर मामले में उसे अपराध साबित करना आसान नहीं होता.
दरअसल भारतीय क़ानून में अश्लीलता की कोई एक या बिल्कुल साफ़ परिभाषा नहीं है. अक्सर अलग-अलग अदालतें अलग-अलग मामलों में यह तय करती हैं कि कौन-सी सामग्री अश्लील मानी जा सकती है और क्या नहीं.
क़ानून आम तौर पर यह देखता है कि क्या कोई कंटेंट ऐसा है, जो यौन उत्तेजना पैदा करने के इरादे से बना है, और क्या उसका सोसायटी पर ग़लत असर हो सकता है. एक ही शब्द अलग हालात में अलग तरह से देखा जा सकता है.
फ़िल्मों और ओटीटी प्लेटफ़ार्म पर गालियों के इस्तेमाल को लेकर भी अक्सर बहस होती है. लेकिन अदालतें सब पर रोक नहीं लगा देतीं. यौन चर्चा अश्लील नहीं, बल्कि ग़लत यह है कि किस इरादे से उस पर बात हुई.
ऐसे मामलों का संदर्भ खंगालने के बाद भारतीय न्याय संहिता और आईटी एक्ट के तहत कई धाराएं लगाई जाती हैं, जैसा ताज़ा मामले में हुआ.
अगर मज़ाक किसी धर्म, जाति या समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाला माना जाता है, तो अश्लीलता से अलग कई दूसरी आपराधिक धाराएं भी लग सकती हैं.
सेजल और हिमांशु के मामले में कानूनी प्रक्रिया आगे क्या मोड़ लेती है, यह अभी साफ़ नहीं है. लेकिन इस विवाद से एक बार फिर यह सवाल आ रहा है कि क्या कॉमेडी के नाम पर हर सब्जेक्ट को छूने की आज़ादी मिलनी चाहिए, या फिर कानून और समाज को इस पर कोई एक्शन लेना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (bbc.com)
-मृदुलिका झा
गुरुग्राम के एक युवक का डेट पर 370 रुपये खर्च करने के बाद ‘रिटर्न’ की उम्मीद करने वाला मज़ाक सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
दरअसल स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो में एक युवक हिमांशु जांगड़ा ने बताया कि वह एक लडक़ी के साथ डेट पर गए थे, जहां उन्होंने बिरयानी पर 370 रुपए खर्च किए थे। इसके बदले उन्होंने सेक्सुअल फेवर चाहा और लडक़ी की अनिच्छा के बावजूद उस पर हावी होने की कोशिश की।
उनके अश्लील मज़ाक को उसी वक्त रोकने की बजाय शो के होस्ट ने हंसते हुए इसे बढ़ावा दिया था।
जल्द ही शो की क्लिप वायरल हो गई और लोगों का गुस्सा भडक़ उठा कि महज ऑनलाइन इंगेजमेंट के लिए महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियों को क्या कॉमेडी की तरह परोसा जा सकता है?
क्लिप में क्या था?
‘हम दोनों ने 370 रुपये की बिरयानी खाई। फिर उसने कहा, ‘मुझे घर छोड़ दो।’ मैंने कहा, ‘भाई, अगर 370 रुपये चले गए तो मैं उन्हें ज़रूर वापस लाऊंगा’।’
ये हिमांशु जांगड़ा के शब्द थे। वही युवक जो प्रणीत मोरे के कॉमेडी शो में मौजूद था।
कॉमेडियन प्रणीत मोरे अपने शो में क्राउड वर्क करते रहे, यानी लाइव के दौरान वे दर्शकों से सीधे जुड़ते रहे और उसी बातचीत को कॉमेडी की तरह पेश करते रहे। इसी क्राउड वर्क के दौरान ऑडियंस में से 23 साल के हिमांशु जांगड़ा ने अपना डेटिंग अनुभव साझा करते हुए बिरयानी को ‘फेवर’ से जोड़ दिया।
शो के दौरान हिमांशु ने साफ-साफ कहा कि अगर उसने अपनी डेट को बिरयानी खिलाई है तो बदले में उसे शारीरिक सुख मिलना चाहिए।
बीबीसी न्यूज़ मराठी पर इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता और लैंगिक समानता पर प्रशिक्षण देने वाली लक्ष्मी यादव का नज़रिया छपा है।
इस आलेख में वह कहती हैं, ‘प्रणीत मोरे हिमांशु के बयान पर हंसे और ‘गुडग़ांव से कंटेंट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, उन्होंने हिमांशु को अपने शो का आधा घंटा भी दे दिया।’
इस दौरान, हिमांशु बताते रहे कि युवती की अनिच्छा के बाद भी वे आगे बढ़ते चले गए। तब भी प्रणीत हंसते हुए उसे बढ़ावा देते रहे। बाद में उन्होंने शो की इस क्लिप को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर भी पोस्ट किया।
सलमान ख़ान के शो में भी ऐसे मजाक कर चुके प्रणीत
इससे पहले, जब प्रणीत बिग बॉस में थे, तब भी उन्हें बैकलैश का सामना करना पड़ा था, लेकिन तब मामले ने इतना तूल नहीं पकड़ा था।
एक कॉमेडी शो के दौरान, प्रणीत ने ऑडियंस में एक लडक़ी की अंगूठी देखकर उससे कहा कि यह अंगूठी सलमान ख़ान के कंगन जैसी दिखती है। जब लडक़ी ने कहा कि उसे यह अंगूठी सलमान ख़ान से मिली है, तो प्रणीत मोरे ने उससे पूछा, ‘क्या तुम फार्महाउस गई थी?’
बाद में ‘वीकेंड वॉर’ पर सलमान ने इस घटना का जिक्र करते हुए प्रणीत को चेतावनी भी दी थी। उन्होंने कहा था, ‘आप सेलेब्स पर, और लोगों पर जोक्स करते हैं। कीजिए। लेकिन आपको लिमिट पता होनी चाहिए।’
प्रणीत ने उस समय सलमान की बात मानते हुए यही करने का आश्वासन दिया था, लेकिन इस बार उन्होंने मज़ाक के नाम पर भद्दी बात कर रहे दर्शक को रोकने की बजाए खुद उसे बढ़ावा दिया।
लैंगिक समानता पर प्रशिक्षण देने वाली लक्ष्मी यादव कहती हैं, ‘कला माने जाने वाले अधिकांश कॉमेडी शो में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा बेहद अश्लील, भद्दी और लिंगभेदपूर्ण होती है। ‘कूल’ दिखने के नाम पर, वे अक्सर कथित हार्मलेस चुटकुलों, महिलाओं के शरीर या उनके चरित्र और व्यक्तित्व पर अश्लील टिप्पणियां करते हैं।’
कुछ वक्त पहले यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया को लेकर भी इसी तरह का विवाद सामने आया था। रणवीर इलाहाबादिया, स्टैंड-अप कॉमेडियन समय रैना के यूट्यूब शो में गेस्ट जज के तौर पर शामिल हुए थे। शो के दौरान उन्होंने एक प्रतिभागी से उसके माता-पिता के यौन जीवन के बारे में बेहद अश्लील और आपत्तिजनक सवाल पूछे थे।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
रणवीर ने गिरफ्तारी से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, याचिका खारिज करते हुए अदालत ने उन्हें कड़ी फटकार लगाते हुए कहा, ‘तुम्हारा दिमाग गंदगी से भरा है, शोहरत कुछ भी बोलने का लाइसेंस नहीं है।’ इस मामले में रणवीर, सुरेश रैना और पांच अन्य लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज हुआ था।
‘ताजा मामले में भी कथित मज़ाक का यही पैटर्न दिखा। शो के होस्ट प्रणीत लगातार हिमांशु को भद्दी बात बोलने के लिए उकसाते रहे। यहां तक कि रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट की भी बात करते रहे।’
लक्ष्मी यादव सवाल करती हैं कि क्या सिर्फ प्रणीत और हिमांशु गलत हैं?
ंमुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि प्रणीत या शो में मौजूद किसी और ने हिमांशु को नहीं रोका, बल्कि यह भी है कि सभी ने बेहद संवेदनशील और निजी पलों को 'अश्लील चुटकुले' में बदल दिया। घटना के वायरल होने पर भी शायद ही किसी ने सोचा हो कि लडक़ी की शारीरिक या मानसिक स्थिति कैसी रही होगी।’
‘अगर आप ताजा मामले का वीडियो देखेंगे, तो आपको पता चलेगा कि जब हिमांशु बगीचे में अपनी प्रेमिका के साथ बिताए निजी पलों को बता रहा था, तब न केवल वह खुद उसका यौन उत्पीडऩ कर रहा था, बल्कि प्रणीत और उस शो में भाग लेने वाले सभी युवक अपनी कल्पनाओं और शारीरिक हाव-भाव से उसका और उसके जैसी अनगिनत लड़कियों का बलात्कार कर रहे थे।’
वे ताली बजा रहे थे और हंसते हुए बीच-बीच में भडक़ाऊ सवाल भी कर रहे थे। यौन उत्पीडऩ को कॉमेडी का रूप दे दिया गया। यहां तक कि इसके बाद प्रणीत ने हिमांशु को पांच हज़ार रुपये का इनाम दिया और उसकी तारीफ भी की।
लक्ष्मी आगे पूछती हैं कि जो युवक महिलाओं के बारे में ऐसी सोच रखते हैं, अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हैं, सोचने की बात है कि वे अपनी प्रेमिकाओं, साथी, माताओं और बहनों को किस नज़रिए से देखते होंगे!
लक्ष्मी कहती हैं, ‘बलात्कार केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होता है। वे सभी पुरुष, जो महिलाओं को ट्रोल करते हैं, उनके बारे में अश्लील टिप्पणियां करते हैं और महिलाओं के यौन शोषण के तरीके बताते हैं, वे बलात्कारी हैं।’
प्रणीत के ही शो का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें एक लेडी डॉक्टर मृतकों के प्राइवेट पार्ट का मजाक उड़ाती हुई दिख रही थी।
कॉमेडी शो में यौन उत्पीडऩ के लिए कौन जिम्मेदार है?
‘ह्यूमर और हल्केपन के बीच की लाइन क्रॉस करने वाले कंटेंट को लेकर बहस बढ़ती ही जा रही है। इस मामले में कई सेलिब्रिटीज भी नाराजग़ी दिखा रहे हैं। मराठी टेलीविजन अभिनेत्री अपूर्वा नेमलेकर ने कहा कि जो लोग दर्शक दीर्घा में बैठकर हंस रहे हैं, वे परजीवी हैं। एक दर्शक के तौर पर हमें जागने की ज़रूरत है। हमें चुनना होगा कि असल मनोरंजन क्या है। ऐसे ज़हरीले लोगों को मंच देना और उन्हें सोशल मीडिया स्टार बनाना बंद करें।’
कुछ लडक़े किसी लडक़ी के लिए कुछ करने के बदले में कुछ नहीं चाहते, उन्हें सिफऱ् शारीरिक सुख चाहिए होता है।
सामाजिक कार्यकर्ता और अविवाहित रेशमा थोसर और गीताश्री कहती हैं, ‘जैसे ही आप किसी लडक़ी की थोड़ी सी मदद करते हैं या उससे दोस्ती करते हैं, लडक़े तुरंत उसके साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश करने लगते हैं। वे आपके मैसेज में आकर सेक्स के बारे में पूछते हैं।’
बीबीसी ने भी अपने न्यूजक़ास्ट में इस मुद्दे को टटोला। शो में जुड़े यूट्यूबर और कॉमेडियन सतीश रे कहते हैं कि कंटेंट क्रिएशन की सीमा टूटती जाएगी, खासकर आने वाले दिनों में।
वह कहते हैं, हर किसी को दिखना है। वायरल होना है। उन्हें यह लगता है कि कुछ भी बोलकर वायरल हो जाऊं। वे नहीं जानते कि यह कॉमेडी है भी या नहीं। सतीश कहते हैं कि एक दिन कंटेंट क्रिएशन इस हद तक आगे निकल जाएगा कि सामान्य चीजें पसंद ही नहीं आएंगी। एक से एक अतरंगी चीजें होंगी, जिसमें किसी का लिहाज नहीं बचेगा।
लगातार हो रहे विरोध में मुंबई पुलिस भी शामिल दिखी, लेकिन जरा क्रिएटिव तरीके से।
सोशल मीडिया पर #BiryaniIsNotConsent हैशटैग के साथ पुलिस ने लिखा कि ?370 में एक प्लेट बिरयानी मिलती है। हमारी लॉक-अप में लंबे समय तक मुफ्त खाना मिलता है। हालांकि ट्रेंडिंग टॉपिक में शामिल होने का ये तरीका कइयों को पसंद नहीं आया। वे आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि पुलिस को महिला सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, न कि बेवजह क्रिएटिव बनने की कोशिश करनी चाहिए।
जर्मनी के राष्ट्रपति भवन ‘बेलव्यू पैलेस’ को मरम्मत के लिए बंद करने से पहले, वहां एक कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। इस प्रदर्शनी में सुर्खियां बटोरने वाली कांसे की मूर्ति के अलावा भी कई आधुनिक कलाकृतियां हैं।
डॉयचे वैले पर एलिजाबेथ ग्रेनियर की रिपोर्ट -
बेहद कामुक पोज में रखी गई हरे रंग की कांसे की यह कलाकृति, असल में एक जापानी सेक्स डॉल के धड़ की नकल है। अपनी इसी बनावट की वजह से यह कलाकृति मीडिया में खूब सुर्खियां बटोर रही है और सोशल मीडिया पर भी सबका ध्यान अपनी तरफ खींच रही है। अलेक्जेंड्रा बिर्केन की बनाई इस मूर्ति का नाम ‘ईवा’ है। यह वहां लगी कई आधुनिक कलाकृतियों में से बस एक है। यह पूरी प्रदर्शनी ‘बेलव्यू पैलेस’ में लगी है, जो जर्मनी के राष्ट्रपति और बड़े सरकारी समारोहों से जुड़ी एक बेहद खास और ऐतिहासिक राजनीतिक जगह है।
दो हफ्तों तक चलने वाली इस अनोखी (पॉप-अप) कला प्रदर्शनी का नाम ‘फ्राइराउम कुंस्ट’ (आर्ट एज फ्री स्पेस) रखा गया है, जो 13 से 28 जून तक चलेगी। प्रदर्शनी के उद्घाटन से पहले मीडिया से बात करते हुए जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने कहा, ‘हमें कला की जरूरत है। आजाद कला के बिना कोई भी लोकतंत्र खुद की कमियों को देखने और अपनी आलोचना करने की ताकत खो देता है। आजादी के बिना कोई भी कला, समाज के लिए अपनी अहमियत खो देती है।’
राष्ट्रपति की देखरेख में शहर की ‘एकेडमी ऑफ आर्ट्स’ की ओर से आयोजित की गई इस पॉप-अप प्रदर्शनी को एक तरह से बेलव्यू पैलेस से श्टाइनमायर को दी जाने वाली विदाई के तौर पर देखा जा सकता है। इस खास प्रदर्शनी के लिए बर्लिन की इस ऐतिहासिक इमारत को लगभग पूरी तरह खाली कर दिया गया है। बेलव्यू पैलेस में अब अगले आठ सालों तक मरम्मत का काम चलने वाला है। चूंकि, राष्ट्रपति श्टाइनमायर का दूसरा और आखिरी कार्यकाल अगले साल खत्म हो रहा है, इसलिए मरम्मत पूरी होने से पहले उनके यहां लौटने की कोई उम्मीद नहीं है। वे अब बर्लिन के सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पास एक अस्थायी निवास में शिफ्ट होने जा रहे हैं।
लोकतंत्र को कलात्मक आवाज की जरूरत
इस आधुनिक कला प्रदर्शनी में वीडियो और ऑडियो इंस्टॉलेशन, फोटोग्राफी और ऑयल से बनी पारंपरिक पेंटिंग को शामिल किया गया है। इसका असली मकसद लोगों को लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व, सत्ता के खेल और सार्वजनिक जीवन के बारे में सोचने को प्रेरित करना है। जर्मनी के संविधान ‘बेसिल लॉ’ में दी गई कला की आजादी, देश की कानूनी व्यवस्था में सबसे मजबूत मौलिक अधिकारों में से एक है।
इस इमारत के अंदर कदम रखने से पहले ही, महल की छत पर लगी क्रिस्टियान आवे की एक बहुत बड़ी कलाकृति दिखाई देती है, जिस पर ‘फ्राइराउम’ (यानी आजाद जगह) लिखा है। यह कलाकृति बाहर से ही संदेश देती है कि इस पूरी प्रदर्शनी का मुख्य मकसद कलाकारों की आजादी की वकालत करना है।
जैसे ही कोई इमारत के मुख्य हॉल (फॉयर) में कदम रखता है, उसे लगातार बार-बार गूंजती हुई ‘हैलो’ की आवाज सुनाई देती है। यह दरअसल कलाकार योखेन गैर्त्स द्वारा साल 1972 में किए गए एक परफॉर्मेंस आर्ट का हिस्सा है, जिसका नाम है ‘रूफेन बिस जुअर एरशॉप्फुंग’ यानी ‘थककर चूर हो जाने तक पुकारना।’
इस परफॉर्मेंस में, कलाकार ने एक खाली और शांत जगह में तब तक लगातार ‘हैलो’ कहा जब तक कि उसकी आवाज ने उसका साथ नहीं छोड़ दिया। इस कलाकृति को अपनी बात रखने या आवाज उठाने की सीमाओं पर एक टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है। खासकर, आज के ऐसे दौर में जहां सोशल मीडिया हर किसी को लगातार ध्यान खींचने की होड़ में धकेलता है। लोकतंत्र के नजरिए से देखें, तो जब देश के नागरिकों की पुकार अनसुनी रह जाती है, तो उनका गुस्सा और निराशा बढ़ती है, और यही निराशा आगे चलकर पूरे समाज को मानसिक रूप से थका देती है।
सीबीएसई ने बारहवीं कक्षा की परीक्षा में मूल्यांकन के लिए ओएसएम सिस्टम लागू किया लेकिन इस सिस्टम में इतनी खामियां मिलीं कि अब सीधे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट -
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन के लिए 2026 में ऑनस्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) तरीका अपनाया जिसकी काफी चर्चा हुई लेकिन बोर्ड परीक्षा के परिणाम के बाद ओएसएम की परीक्षा का भी परिणाम दिख गया। बोर्ड की परीक्षा में तो पिछली बार की तुलना में काफी ज्यादा बच्चे फेल हो गए लेकिन बोर्ड परीक्षा में शामिल छात्रों के लिहाज से देखें तो मूल्यांकन की ओएसएम प्रणाली तो लगभग पूरी तरह से फेल साबित हुई।
ओएसएम यानी ऑनस्क्रीन मार्किंग सिस्टम, डिजिटल मूल्यांकन की एक प्रक्रिया है जिसे सीबीएसई ने बारहवीं बोर्ड की परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं (कॉपियों) की जांच के लिए इस्तेमाल किया था। इसके तहत पहले सभी कॉपियों को स्कैन किया गया यानी उनकी डिजिटल तस्वीर खींची गई, फिर इन तस्वीरों को ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड कर दिया गया। उसके बाद परीक्षकों ने इन्हीं अपलोड तस्वीरों (जो छात्रों की उत्तर पुस्तिका की तस्वीरें थीं) को कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखकर नंबर दिया।
बोर्ड को लगा कि यह ऑनलाइन तरीका ज्यादा स्पष्ट और पारदर्शी होगा, समय की भी बचत होगी और ऊर्जा की भी। क्योंकि अभी तक तो कॉपियां जांचने का यही तरीका रहा है कि परीक्षा के बाद कॉपियों को इक_ा कर अध्यापकों के पास भेज दिया जाता था। संबंधित विषयों के अध्यापक उन कॉपियों के एक-एक पेज को पढ़ते थे और वहीं उनके नंबर चढ़ाते थे।
बोर्ड का दावा है कि उसने इस प्रक्रिया के लिए बड़े स्तर पर तैयारी की थी और सभी तरह की खामियों को दुरुस्त करने के बाद ही इसे अमल में लाया गया लेकिन विवाद शुरू होने से लेकर अब तक जिस तरह के और जितनी ज्यादा संख्या में मामले सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए बोर्ड के दावे पर कई सवाल उठ रहे हैं।
विरोध प्रदर्शन और इस्तीफे की मांग
सिस्टम पर विवाद शुरू होने के बाद पहले तो बोर्ड और सरकार ने गलती मानी ही नहीं, विवाद को निराधार बताते रहे, सवाल उठाने वालों पर ही सवाल उठने लगे लेकिन जब खामियों से संबंधित तमाम चीजें स्पष्ट रूप से सामने आने लगीं तो खुद शिक्षा मंत्री ने माना कि ‘हां, गलतियां हुई हैं।
सीबीएसई ने भी तकनीकी खामियों की बात स्वीकार करते हुए किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही। इस बीच, 18 लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों में से चार लाख से ज्यादा ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन्ड कॉपी की मांग कर डाली। उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन के लिए बोर्ड ने अपने पोर्टल को एक जून से दोबारा सक्रिय किया लेकिन पोर्टल खुले ही नहीं। तमाम शिकायतें उसके बाद भी आती रहीं।
विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सीबीएसई के चेयरमैन और सचिव का ट्रांसफर तो कर दिया, लेकिन विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी की छात्र और युवा इकाई इस पूरे मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। देश के अलग-अलग शहरों में लगातार विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च हो रहे हैं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है।
इस बीच, सीबीएसई ने बारहवीं कक्षा की कापियों और पुनर्मूल्यांकन से जुड़े डाटा को हैदराबाद स्थित कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड नाम की उस विवादित निजी कंपनी के सर्वर से हटाकर अपने सर्वरों पर ट्रांसफर कर दिया है जिस कंपनी पर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन तकनीकी खामियों के बावजूद बोर्ड ने पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया में कापियों की स्कैनिंग का काम अभी भी इसी कंपनी के पास रखा हुआ है।
सीबीएसई की ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली और उसके लिए जिस कंपनी को टेंडर दिया गया, उस प्रक्रिया में तमाम खामियों का पर्दाफाश किया। उन्होंने इस बारे में शिक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने प्रेजेंटेशन दिया और बताया कि किस तरह सीबीएसई ने टेंडर नियमों में बार-बार बदलाव करके एक विवादित कंपनी को ऑनलाइन कॉपियां जांचने का ठेका दिया। यही नहीं, ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं।
-प्रदीप कुमार
2026 का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल 11 जून से शुरू हो रहा है। पहली बार वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल की मेजबानी तीन देश मिल कर रहे हैं। 11 जून से 19 जुलाई तक होने वाले इस मुक़ाबले आयोजन अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा संयुक्त तौर पर कर रहे हैं।
तीन देशों के 16 शहरों में 104 मैचों के बाद दुनिया को पता चलेगा कि वर्ल्ड कप का बादशाह कौन बनेगा। अमेरिका के तेरह, मेक्सिको के तीन और कनाडा के दो शहरों में ये मुक़ाबले होंगे।
इस आयोजन के साथ मेक्सिको, वर्ल्ड कप की तीन बार मेज़बानी करने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा। इससे पहले 1970 और 1986 के वर्ल्ड कप का आयोजन मेक्सिको कर चुका है।
वैसे फ़ुटबॉल की दुनिया में बादशाहत के लिए होने वाले घमासान में यह पहला मौक़ा है जब दुनिया भर की 48 टीमों के बीच मुक़ाबला होगा। इससे पहले के सात वर्ल्ड कप आयोजनों के दौरान दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 32 टीमों के बीच मुकाबला होता था।
यानी इस बार दुनिया भर से 16 और देशों को वर्ल्डकप में हिस्सा लेने का मौक़ा मिल रहा है। पिछली वर्ल्ड कप के 64 मैचों की तुलना में ज़्यादा मुक़ाबले भी खेले जा रहे हैं। ऐसे में फीफा का अनुमान है कि इस बार कम से कम छह अरब दर्शक इन मुक़ाबलों को देखेंगे। यानी चार साल पहले क़तर में खेले गए वर्ल्ड कप आयोजन से एक अरब ज़्यादा दर्शक इन मुक़ाबलों का आनंद लेंगे। वल्र्ड कप के 23वें आयोजन में दुनिया के चार देश, केप वर्डे, कुरासाओ, जॉर्डन और उज़्बेकिस्तान की फुटबॉल टीमें अपना डेब्यू करने वाली हैं।
लेकिन भारतीय खेल प्रेमियों के लिए इसमें कोई उत्साह की बात नहीं है, क्योंकि अब तक भारत इस टूर्नामेंट में एक बार भी हिस्सा नहीं ले पाया है।
फीफा, भारत और 1950 का वो साल...
भारत फुटबॉल वर्ल्ड कप में कभी हिस्सा नहीं ले पाया हो, लेकिन आज की पीढ़ी के कम ही खेल प्रेमियों को मालूम होगा कि एक मौका ऐसा भी आया था, जब भारत वर्ल्ड कप फुटबॉल में हिस्सा ले सकता था।
यकीन करना भले मुश्किल हो लेकिन हक़ीक़त यही है कि भारतीय फ़ुटबॉल टीम आज से 76 साल पहले यानी 1950 में ब्राज़ील में खेले जाने वाले वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने वाली थी, लेकिन भारतीय टीम इसमें हिस्सा नहीं ले सकी।
दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के चलते 1942 और 1946 में वल्र्ड कप फुटबॉल का आयोजन नहीं हो सका था।
1950 में 12 साल के इंतज़ार के बाद वल्र्ड कप का आयोजन होने वाला था। ब्राज़ील में होने वाले वल्र्ड कप के लिए महज 33 देशों ने क्वालिफाइंग राउंड में खेलने पर सहमति जताई थी।
क्वालिफ़ाइंग ग्रुप 10 में भारत को बर्मा (म्यांमार) और फिलीपींस के साथ जगह मिली थी। लेकिन बर्मा और फिलीपींस ने क्वालिफाईंग राउंड से अपना नाम वापस ले लिया था। यानी भारत बिना खेले ही वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई कर गया था। इतिहास बहुत दूर नहीं था। भारतीय टीम को पहली बार वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल में अपना करतब दिखाने के लिए टिकट मिल चुका था।
भारत हिस्सा लेता तो कैसा प्रदर्शन करता?
1950 के वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल का जब फ़ाइनल राउंड ड्रॉ तैयार हुआ, तो भारत को पूल -3 में स्वीडन, इटली और पराग्वे के साथ जगह मिली।
अगर भारत इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेता, तो उसका प्रदर्शन कैसा होता?
इस बारे में दिवंगत फुटबॉल पत्रकार नोवी कपाडिय़ा ने वर्ल्ड कप फुटबॉल की गाइड बुक में लिखा है, उस दौर में पराग्वे की टीम बहुत मजबूत नहीं थी।
इटली ने अपने आठ मुख्य खिलाडिय़ों को टीम में अनुशासनहीनता के चलते शामिल नहीं किया था। टीम इतने बुरे हाल में थी कि ब्राज़ील पहुँचने के बाद टीम के कोच विटोरियो पोज्ज़ो ने इस्तीफा दे दिया था।
स्वीडन की टीम भारत के मुक़ाबले बहुत अच्छी स्थिति में थी। इस लिहाज से देखें तो भारत ग्रुप में दूसरे नंबर पर हो सकता था लेकिन टीम को बेहतरीन एक्सपोजऱ मिलता।
कैसी थी भारतीय फ़ुटबॉल की प्रतिष्ठा
1950 में भारतीय फ़ुटबॉल का बहुत ज़्यादा इंटरनेशनल एक्सपोजऱ नहीं था लेकिन टीम की प्रतिष्ठा अच्छा गेम खेलने वाले मुल्क के तौर पर थी।
इसकी झलक भारतीय टीम ने 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में भी दिखाई थी। फ्रांस जैसी मजबूत टीम से भारत महज 1-2 के अंतर से हारा था। उस दौर में टीम के फॉरवर्ड और ड्रिब्लर के खेल की बदौलत भारतीय फुटबॉल अपनी पहचान बनाने में जुटा था।
अहमद खान, एस रमन, एमए सत्तार और एस मेवालाल जैसे खिलाड़ी के लोग फैंस थे। लंदन ओलंपिक में भारत के ये तमाम खिलाड़ी नंगे पाँव फुटबॉल खेलने उतरे थे। हालाँकि राइट बैक पर खेलने वाले ताज मोहम्मद बूट पहन कर खेले थे।
ब्राज़ील वल्र्ड कप में क्यों नहीं हिस्सा ले सकी टीम
1950 के वल्र्ड कप में भारतीय फुटबॉल टीम ने आखिर क्यों नहीं हिस्सा लिया, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता है।
हालाँकि ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) ने जो अधिकारिक वजह बताई थी, उसके मुताबिक, टीम चयन में असहमति और अभ्यास के लिए पर्याप्त समय नहीं होने के चलते टीम ने नाम वापस लिया था। लेकिन इसको लेकर सालों तक कई चर्चाएँ होती रही हैं, इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा इस बात की हुई कि भारतीय खिलाड़ी नंगे पांव फ़ुटबॉल खेलना चाहते थे और फ़ीफ़ा को यह मंज़ूर नहीं था।
लेकिन नोवी कपाडिय़ा के अलावा वरिष्ठ खेल पत्रकार जयदीप बसु की हाल में आई किताब भी इस वजह को बहुत विश्वसनीय नहीं मानती है।
जयदीप बसु की संपादित किताब ‘बॉक्स टू बॉाक्स : 75 ईयर्स ऑफ द इंडियन फुटबॉल टीम’ में लिखा है, ‘फीफा के भारतीय खिलाडिय़ों के नंगे पांव खेलने पर आपत्ति का कोई सवाल ही नहीं था।’
लंदन ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले सात-आठ खिलाडिय़ों के हवाले से जयदीप बसु ने लिखा है, ‘उस टीम में शामिल सात-आठ खिलाडिय़ों के ट्रैवल बैग में स्पाइक बूट रखे हुए थे और ये खिलाडिय़ों के लिए अपनी पसंद का मामला था।’
दरअसल यह वह दौर था, जब फुटबॉल खिलाड़ी अपने पांव पर मोटी पट्टी बांध कर खेलना पसंद करते थे और 1954 तक यह चलन दुनिया के कई दूसरे देशों में भी मौजूद था।
स्वीडन में बढ़ते गिरोह अपराधों के बीच सरकार 13 साल के बच्चों को भी गंभीर आपराधिक मामलों में जेल भेजने के एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। यूरोप के कुछ अन्य देश भी ऐसा सोच रहे हैं।
डॉयचे वैले पर आंद्रेयास नॉल का लिखा-
आमतौर पर 13 से 14 साल के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए लेकिन स्वीडन में आपराधिक गुट दिनदहाड़े लोगों पर हमले करने और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे अपराधों को अंजाम देने के लिए किशोरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्वीडिश कानून के तहत 15 साल से कम उम्र के किशोरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। संगठित आपराधिक गिरोह इस बात का फायदा उठाते हैं।
अब बढ़ती गैंग हिंसा और संगठित अपराध से निपटने के लिए स्वीडन अपनी कानूनी व्यवस्था को सख्त करने पर विचार कर रहा है। संसद पहले ही ऐसे एक प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। इसके तहत अगर 15 से 17 वर्ष के किशोरों को गंभीर अपराधों में दोषी पाया जाता है तो उन्हें विशेष किशोर कारागारों में जेल की सजा दी जा सकती है।
इसके अलावा स्वीडिश सरकार गंभीर अपराधों के मामले में अपराध की न्यूनतम आयु को अस्थायी तौर पर 13 वर्ष तक घटाने की योजना बना रही है। यह प्रावधान हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बम विस्फोट और कई अन्य गंभीर अपराधों पर लागू किया जा सकता है। इस प्रावधान पर संसद जून के मध्य में मतदान करेगी और पांच वर्षों बाद इसके परिणाम की समीक्षा की जाएगी।
डेनमार्क की कोशिश हुई नाकाम
अपराध के लिए न्यूनतम उम्र को घटाने की बहस सिर्फ स्वीडन तक ही सीमित नहीं है। 2010 में डेनमार्क ने अपनी रूढि़वादी सरकार के नेतृत्व में अपराध की न्यूनतम उम्र को 15 से घटाकर 14 साल कर दिया था। इसके दो साल बाद ही इस सुधार को वापस ले लिया गया। इस सुधार के परिणाम पर हुए शोध में सामने आया था कि अपराध की न्यूनतम उम्र घटाने से कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके उलट प्रभावित युवाओं में दोबारा अपराध करने की संभावना बढ़ गई और स्कूल में उनका प्रदर्शन भी खराब हुआ।
डेनमार्क के इस कदम को अब कई विशेषज्ञ एक असफलता के तौर पर देखते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को कम उम्र में अपराधी घोषित कर देना असल में युवा हिंसा की समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि कम उम्र में अपराधियों के संपर्क में आने से किशोर और ज्यादा आपराधिक माहौल में खिंच सकते हैं।
नीदरलैंड्स में 12 साल की उम्र से सजा का प्रावधान लेकिन जेल का नहीं
अन्य यूरोपीय संघ देशों से तुलना में नीदरलैंड्स और आयरलैंड ऐसे देश हैं जहां अपराधी ठहराए जाने की न्यूनतम उम्र काफी कम है। नीदरलैंड्स में तो 12 वर्ष की आयु से ही किशोरों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। आयरलैंड में भी आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम उम्र 12 वर्ष ही है। हालांकि कुछ गंभीर अपराधों में जैसे हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों के लिए 10 या 11 वर्ष की आयु के बच्चों को भी आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इन देशों में कम आपराधिक उम्र का यह मतलब नहीं है कि बच्चों को भी वयस्कों की तरह कठोर जेल की सजा दी जाती है। नीदरलैंड्स में 12 से 15 वर्ष के किशोरों के लिए हिरासत में लिए जाने की अधिकतम अवधि एक वर्ष है और गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए 16 और 17 वर्ष के किशोरों के लिए अधिकतम सजा आमतौर पर दो वर्ष होती है। हालांकि, इन देशों में बच्चों को हिरासत में लेने का मकसद केवल बच्चों को सजा देना ही नहीं है, बल्कि उनकी शिक्षा और सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
जर्मनी और स्पेन में यदि 12 साल का किशोर कोई गंभीर अपराध करता है, तो उसे कानूनी रूप से अपराधी नहीं माना जाता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती है। इन देशों में भी युवाओं के लिए सामाजिक सेवाएं, पारिवारिक अदालतें और सुरक्षा संबंधी संस्थाएं हस्तक्षेप कर सकती हैं। कुछ मामलों में बच्चे को निगरानी केंद्रों में रखा जा सकता है, लेकिन इसे कानूनी रूप से आपराधिक सजा नहीं माना जाता है।
उन्हें अक्सर अपराधी के तौर पर नहीं बल्कि ऐसे नाबालिग के रूप में देखा जाता है, जिन्हें मदद की जरूरत है। स्पेन के कानून में यह बात विशेष रूप से स्पष्ट है। 14 साल से कम उम्र के किशोर आपराधिक कानून में नहीं, बल्कि देखभाल और बाल संरक्षण व्यवस्था की श्रेणी में आते हैं।
-दिनेश आकुला
उनकी मृत्यु के तेरह वर्ष बाद भी एक किस्सा मेरी स्मृतियों में आज भी उतना ही ताजा है।
रायपुर के लभांडी स्थित अपने निवास पर एक लंबी बातचीत के दौरान विद्या चरण शुक्ल ने मुझे 1977 की एक घटना सुनाई थी। आपातकाल समाप्त हो चुका था। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी और देश में उसके खिलाफ गुस्सा था। दिल्ली में आयोजित एक संगीत समारोह में देश के कई बड़े नेता मौजूद थे। मंच पर पंडित भीमसेन जोशी प्रस्तुति दे रहे थे।
गाते-गाते उन्होंने एक पंक्ति छेड़ी—
‘जिस नगरी में दया धरम नाहीं, उस नगरी में रहना क्या।’
सभागार में मौजूद लोगों ने तुरंत इसका राजनीतिक संदर्भ समझ लिया। हंसी, तालियां और फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया। उस समय आपातकाल के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक विद्या चरण शुक्ल पहली पंक्ति में बैठे थे। उन्होंने मुझे बताया था कि पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि अचानक लोग क्यों प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वे दाएं-बाएं देखने लगे। कुछ क्षण बाद उन्हें अहसास हुआ कि यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि आपातकाल पर जनता का फैसला था।
सालों बाद जब वे यह घटना मुझे सुना रहे थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। कोई कटुता नहीं थी। मानो वे स्वीकार कर चुके थे कि राजनीति में अंतत: इतिहास ही अंतिम निर्णय देता है।
मेरा विद्या चरण शुक्ल से परिचय 1994 में हुआ था। उस समय मैं स्नातक के प्रथम वर्ष में था और रायपुर के एक अंग्रेजी अखबार में प्रशिक्षु रिपोर्टर के रूप में काम शुरू किया था। इसके बाद लगभग दो दशकों तक उनसे अनगिनत मुलाकातें हुईं। कई बार घंटों तक चलने वाली बैठकों में उन्होंने भारतीय राजनीति के ऐसे किस्से सुनाए जिन्हें केवल वही बता सकते थे, क्योंकि वे उन घटनाओं के प्रत्यक्ष सहभागी रहे थे।
वे अक्सर 1957 के अपने पहले लोकसभा चुनाव की चर्चा करते थे। महासमुंद से दूसरी लोकसभा के लिए सांसद चुने जाने के साथ उनकी राष्ट्रीय राजनीति की यात्रा शुरू हुई थी। पांच दशकों से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने सत्ता के शिखर भी देखे और राजनीतिक एकांत भी। लेकिन एक बात कभी नहीं बदली-लोगों से उनका संवाद।
25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले और उसके बाद गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती होने तक मैंने उन्हें कभी गंभीर रूप से बीमार या अस्पताल में नहीं देखा था। वे उन नेताओं में थे जिन्हें देखकर लगता था कि समय भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रायपुर के बाहरी इलाके लभांडी में स्थित उनका विशाल निवास हमेशा समर्थकों से भरा रहता था। चाहे वे 10 जनपथ की कृपा में हों या उससे बाहर, उनके दरबार में लोगों का आना-जाना कभी नहीं रुका। दोस्ती निभाना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी। यही कारण था कि उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ शरद पवार का साथ दिया, भले ही इसके कारण उन्हें कांग्रेस छोडऩी पड़ी।
राजनीति के अलावा भी उनका एक अलग व्यक्तित्व था।
वे अपने स्वास्थ्य को लेकर बेहद सजग रहते थे। अक्सर गर्व से कहते थे कि उनकी कमर कभी 32 इंच से ज्यादा नहीं हुई। सुबह योग, फिर तैराकी और उसके बाद ताजे जूस से भरा एक बड़ा जग उनका रोज का कार्यक्रम था।
लेकिन इस अनुशासन के बीच उनकी एक कमजोरी भी थी-समोसा।
उन्हें समोसे बेहद पसंद थे। उससे भी ज्यादा रोचक था उन्हें खाने का उनका तरीका। वे समोसे को चाय में डुबोकर खाते थे। पहली बार यह देखकर मैं हैरान रह गया था। कोलकाता में जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने के बावजूद मैंने समोसा खाने का ऐसा अंदाज पहले कभी नहीं देखा था।
वे हँसते हुए कहते, ‘एक बार करके देखो, स्वाद की दुनिया बदल जाएगी।’
संगीत उनके जीवन का दूसरा बड़ा प्रेम था। जीवन के अंतिम दिनों तक वे संगीत सुनते रहे। हालांकि एक बात का उन्हें हमेशा अफसोस रहा। उन्हें लगता था कि इतिहास ने किशोर कुमार के गीतों पर लगे प्रतिबंध का दोष गलत तरीके से उनके सिर मढ़ दिया।
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने किशोर कुमार से कांग्रेस की एक रैली में गाने का अनुरोध किया था। किशोर कुमार ने मना कर दिया। इसके बाद उनके गीत आकाशवाणी और दूरदर्शन से गायब हो गए।
विद्या चरण शुक्ल हमेशा इस निर्णय में अपनी भूमिका से इंकार करते रहे।
वे कहते थे, ‘यह आकाशवाणी का फैसला था। न संजय गांधी ने मुझसे कहा था और न मैंने कोई आदेश दिया था।’
फिर मुस्कराकर जोड़ते थे, ‘मैं कभी किशोर कुमार से मिला नहीं, लेकिन उनके गीत आज भी सुनता हूं।’
आपातकाल को लेकर उनकी आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं थी।
2004 में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण रायपुर आए थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि आपातकाल के दौरान विद्या चरण शुक्ल संजय गांधी के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में थे। लक्ष्मण का आरोप था कि उनके कार्टूनों को लेकर उन्हें दिल्ली बुलाया जाता था और घंटों इंतजार कराया जाता था।
विद्या चरण शुक्ल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते थे।
वे कहते थे, ‘मैं केवल यह सुनिश्चित करता था कि सरकार के खिलाफ नकारात्मक प्रचार न हो।’
सही कौन था, यह इतिहास तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि आपातकाल की कहानी विद्या चरण शुक्ल के बिना अधूरी है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि वे वन्यजीवों के भी बड़े प्रेमी थे। नागपुर के मॉरिस कॉलेज से स्नातक करने के बाद उन्होंने ऑल्विन कूपर प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी शुरू की थी, जो मध्य भारत के जंगलों में वन्यजीव सफारी और फोटोग्राफी अभियानों का संचालन करती थी। खनन व्यवसाय में भी उनकी रुचि थी।
लेकिन उनकी असली पहचान राजनीति ही रही।
उन्होंने एक बार बताया था कि उनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल, जो अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे, ने अपने दोनों पुत्रों श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल को बुलाकर पूछा था कि कौन किस स्तर की राजनीति करेगा। जब बड़े भाई श्यामा चरण शुक्ल ने प्रदेश राजनीति चुनी, तब विद्या चरण शुक्ल ने राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता अपनाया।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने रायपुर को दूरदर्शन केंद्र दिलाया। उस समय यह देश का पांचवां दूरदर्शन केंद्र था। एक छोटे शहर के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मैंने उन्हें बहुत कम बार गुस्से में देखा। लेकिन नवंबर 2000 उनमें से एक था।
छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हो चुका था। विद्या चरण शुक्ल को विश्वास था कि वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्होंने पूरी राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली थी और बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन भी उनके साथ था।
लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने अजित जोगी को चुन लिया।
लभांडी स्थित उनके निवास पर उस दिन का माहौल आज भी याद है। दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव उन्हें मनाने पहुंचे थे। समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा और धक्का-मुक्की में दिग्विजय सिंह की शर्ट तक फट गई। बाद में विद्या चरण शुक्ल को इस घटना के लिए माफी मांगनी पड़ी।
अजित जोगी को लेकर उनकी नाराजगी कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
वे अक्सर कहते थे, ‘केक किसी बाहरी व्यक्ति को मिल गया।’
उनकी तीन बेटियां थीं, लेकिन कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने अपने भतीजे अमितेश शुक्ल को राजनीति में आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन चीजें वैसी नहीं हो सकीं जैसी वे चाहते थे।
वे अपनी निजता को लेकर बेहद सजग थे। रायपुर स्थित उनके घर के सामने बनने वाले एक पांच सितारा होटल को उन्होंने पांचवीं मंजिल की अनुमति नहीं मिलने दी, क्योंकि वहां से उनके स्विमिंग पूल का सीधा दृश्य दिखाई देता।
16 अगस्त 2002 की एक घटना मैं कभी नहीं भूल सकता।
मैं विवाह के लिए रायपुर आया हुआ था। विद्या चरण शुक्ल उस समय अमेरिका यात्रा पर थे। लेकिन उन्होंने अपनी यात्रा बीच में छोड़ दी और विवाह में शामिल होने के लिए लौट आए। यह उनके स्नेह का ऐसा प्रमाण था जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
-कुमार सिद्धार्थ
भारत ने पिछले चार दशक में स्कूली शिक्षा के विस्तार की एक लंबी यात्रा तय की है। गांव-गांव स्कूल पहुँचे, नामांकन बढ़ा, बालिका शिक्षा में सुधार हुआ, बिजली, शौचालय, कंप्यूटर और स्मार्ट कक्षाओं जैसी सुविधाएँ तेजी से बढ़ीं। मध्याह्न भोजन, नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें, छात्रवृत्तियाँ, स्कूल परिवहन, डिजिटल संसाधन और समग्र शिक्षा जैसी योजनाओं ने शिक्षा के विस्तार को नई गति दी है। ऐसे में शिक्षा की तस्वीर बदली हुई दिखाई देती है। इसलिए स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत प्रवेश-द्वार भी माना जाता है।
हाल ही में नीति आयोग की जारी रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट’ शिक्षा से जुड़े अहम प्रश्नों को फिर से हमारे सामने रखती है। रिपोर्ट का सार जितना सरल है, उतना ही असहज करने वाला भी है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने स्कूलों तक पहुंच की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की लड़ाई अब भी अधूरी है।
शिक्षा के परिदृश्य को देखें तो आज शिक्षा के महकमे में लगभग 14.7 लाख स्कूल, 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग एक करोड़ शिक्षक हैं। आकार के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन इतनी विशाल व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन भवनों, योजनाओं और नामांकन से नहीं, बल्कि इस सवाल से होना चाहिए कि क्या बच्चे वास्तव में सीख पा रहे हैं?
नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में आज भी एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ केवल एक शिक्षक है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक जीवंत विडंबना है। एक ही शिक्षक पहली से पाँचवीं तक की कक्षाएँ पढ़ाता है, जो उपस्थिति दर्ज करने के साथ मध्यान्ह भोजन की निगरानी, सरकारी पोर्टलों पर डेटा अपलोड करने और प्रशासनिक दायित्वों में भी व्यस्त रहता है।
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि शिक्षक सिर्फ पाठ्यपुस्तकें नहीं पढ़ाते, वे सीखने का वातावरण रचते हैं। वे जिज्ञासा को दिशा देते हैं, बच्चों में आत्मविश्वास जगाते हैं और कक्षा को संवाद का जीवंत मंच बनाते हैं। लेकिन जब वही शिक्षक व्यवस्था शिक्षा के इतर कार्यों में उलझ जाता है, तो कक्षा में ज्ञान का संवाद स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ता है। शिक्षा तब पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया बनकर रह जाती है, सीखने की प्रक्रिया नहीं।
रिपोर्ट का दूसरा संकेत छोटे स्कूलों की ओर भी है। देश के लगभग 35 फीसदी विद्यालयों में 50 से कम विद्यार्थी हैं। इनमें से हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहाँ दस से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। पहली नजर में यह दूरस्थ इलाकों तक शिक्षा पहुँचने का प्रमाण लगता है। लेकिन दूसरी नजर में यह सवाल उठाता है कि इतने छोटे और अलग-थलग स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कैसे संभव होगा? बहुस्तरीय कक्षाएँ, सीमित संसाधन, कभी शिक्षक की अनुपस्थिति, कभी विषय विशेषज्ञों का अभाव—ये सब मिलकर शिक्षा को उपस्थिति तक सीमित कर देते हैं।
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में यह चुनौती और गहरी हो जाती है। कई स्थानों पर स्कूल भवन मौजूद हैं, लेकिन प्रयोगशालाएँ नहीं हैं; कंप्यूटर हैं, लेकिन इंटरनेट नहीं; पुस्तकालय हैं, लेकिन नियमित पठन संस्कृति नहीं। शिक्षा का ढांचा खड़ा है, पर उसके भीतर सीखने की आत्मा अभी भी कमजोर दिखाई देती है।
पिछले वर्षों में असर, नेशनल अचीवमेंट सर्वे और हालिया राष्ट्रीय मूल्यांकनों ने बार-बार यही संकेत दिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढऩे और गणित की बुनियादी दक्षताएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं। तीसरी कक्षा का बच्चा दूसरी कक्षा का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पा रहा। पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थियों का एक बड़ा हिस्सा सरल भाग, प्रतिशत या अनुपात जैसी बुनियादी गणितीय अवधारणाओं में संघर्ष करता दिखाई देता है। नीति आयोग की रिपोर्ट भी स्पष्ट करती है कि केवल नामांकन पर्याप्त नहीं, सीखना शिक्षा का असली पैमाना है।
यह स्थिति केवल शैक्षिक कमजोरी नहीं है, यह उस बुनियादी सीखने के संकट की ओर संकेत है, जो आगे चलकर माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार क्षमता तीनों को प्रभावित करता है। जब नींव कमजोर होती है, तो आगे की पूरी शैक्षिक संरचना अस्थिर हो जाती है। यही कारण है कि आज उद्योग जगत भी बार-बार कौशल अंतराल की बात करता है।
नीति आयोग की रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाती है सरकारी स्कूलों में भरोसे का धीरे-धीरे क्षरण। दो दशक पहले तक देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। लेकिन आज स्थिति बदल रही है। वर्ष 2005 में जहाँ लगभग 71 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 फीसदी रह गया है। यानी पहली बार सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों का अनुपात आधे से नीचे चला गया है।
ग्रामीण परिवार, जो कभी सरकारी विद्यालय को स्वाभाविक विकल्प मानते थे, अब सीमित आय के बावजूद निजी स्कूलों की ओर देख रहे हैं। यह केवल विकल्प का बदलाव नहीं, बल्कि भरोसे का बदलाव है। अभिभावक अक्सर अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन, नियमित उपस्थिति और अपेक्षाकृत बेहतर जवाबदेही को निजी स्कूलों से जोडक़र देखते हैं, भले ही वास्तविक गुणवत्ता हर जगह समान न हो।
यह प्रवृत्ति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि सरकारी विद्यालय ही सामाजिक न्याय, अवसर की समानता और लोकतांत्रिक शिक्षा के सबसे बड़े माध्यम हैं। यही वे जगहें हैं जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक असमानताओं के बीच लोकतांत्रिक सहअस्तित्व की पहली सीख मिलती है। यदि इन संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तो शिक्षा के साथ लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है।
पश्चिम बंगाल में बीते महीने सत्ता संभालने वाली बीजेपी सरकार ने ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने के बाद अब राज्य के तमाम मदरसों के सर्वेक्षण का आदेश दिया है. सर्वेक्षण रिपोर्ट पांच जुलाई तक सौंपनी होगी.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट -
पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है। असम के मुख्यमंत्री पर लगातार विभिन्न फैसलों के जरिए अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले सरकार ने यहां तमाम मदरसों में 'वंदे मातरम' का गायन अनिवार्य कर दिया था। बीजेपी पंद्रह साल तक सत्ता में रही ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है।
राज्य में फिलहाल वेस्ट बंगाल बोर्ड आफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता और सहायता-प्राप्त मदरसे हैं। इसके अलावा गैर-मान्यताप्राप्त और निजी संगठनों की ओर से या जकात से चलाए जाने वाले मदरसों की संख्या दो हजार से ज्यादा है। लेकिन इन तमाम मदरसों में सर्वेक्षण का आदेश दिया गया है।
क्या होगा मदरसों के सर्वे में
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तमाम जिला शासकों को सर्वेक्षण के निर्देश भेज दिए गए हैं। उनको पांच जुलाई तक इसकी रिपोर्ट सौंपनी है। इसके तहत मदरसों में पढऩे वाले छात्र-छात्राओं की संख्या के अलावा उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आधारभूत ढांचा और आर्थिक स्रोत का ब्योरा हासिल किया जाएगा।
लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि सरकार ने अवैध मदरसों को बंद कर वहां पढऩे वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या अनुमोदित मदरसों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई है।
मंत्री ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद राज्य में चलने वाले तमाम गैर-अनुमोदित या अवैध मदरसों को बंद कर दिया जाएगा। शिक्षा के नाम पर अवैध गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। सरकार मदरसों में पढऩे वाले छात्रों को आधुनिक शिक्षा मुहैया कराना चाहती है ताकि आगे चल कर रोजगार की दौड़ में वो पिछड़े नहीं रहें।’
हाल के वर्षों में राज्य के विभिन्न इलाकों में तेजी से बढ़ते मदरसों पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। कई बार वहां आतंकवादियों को शरण देने के भी आरोप लगे हैं। इनमें से ज्यादातर मदरसे जकात से चलते हैं। अब अल्पसंख्यक संगठनों को डर है कि यह सर्वेक्षण उनको निशाना बनाने के मकसद से ही शुरू किया गया है।
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद हफीज (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘सरकार जकात से चलने वाले मदरसों में तमाम कमियां निकाल कर उनको किसी तरह बंद करने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन हम इसका विरोध करेंगे। इसके लिए कानून की मदद ली जाएगी।’
लेकिन मंत्री खुदीराम टुडू कहते हैं, ‘यह किसी धर्म पर हमला नहीं है। नियमों के मुताबिक चलने वाले मदरसों को सरकार आर्थिक सहायता देगी। वहां शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधारभूत सुविधाएं बेहतर बनाने की योजनाएं लागू की जाएंगी।’
बीजेपी सरकार ने बीते महीने एक आदेश जारी कर तमाम मदरसों और सरकारी स्कूलों में सुबह वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश को लागू करने के लिए तमाम मदरसा प्रमुखों को सुबह-सुबह वीडियो बनाकर अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। इस पर अल्पसंख्यक संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। एक संगठन ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है। तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे मनमाना फैसला बताते हुए कहा है कि किसी भी धर्म में हस्तक्षेप उचित नहीं है। इससे राज्य का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।
लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘जब सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य हो सकता है तो मदरसों को इससे अलग क्यों रखा जाएगा? सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप निराधार हैं।’
-शिवांगी जायसवाल
पाँच जून, 2024 को दिल्ली में इंडिया गठबंधन ने आखिरी बैठक की थी। इसके ठीक दो साल बाद छह जून को दिल्ली में ही इस प्रमुख विपक्षी गठबंधन की बैठक हुई है।
इन दो सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। तब 25 क्षेत्रीय पार्टियों ने बैठक में हिस्सा लिया था। इस बार ये संख्या घटकर 23 रह गई। तब पार्टी की बैठक में ग़ैर कांग्रेसी पाँच मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। इस बार महज़ एक ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे।
अब आम आदमी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके समेत अन्य कई पार्टियों के लिए राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। हालांकि गठबंधन को मजबूत करने के लिए इंडिया ब्लॉक ने अब हर दो महीने में बैठक करने का फैसला किया है।
इस बैठक में भी एसआईआर के मुद्दे को ज़ोरदार ढंग से आगे बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं। साथ ही, संसद सत्र के दौरान एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में विपक्षी दलों की बैठक किए जाने का भी फैसला हुआ है। जिन पाँच अहम मुद्दों पर इस विपक्षी गठबंधन में सहमति बनी है, उसमें एक प्रमुख मुद्दा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से जुड़ा है।
बीजेपी के उभार के बाद देश भर में क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हुई हैं। क्षेत्रीय पार्टियों से चुनौती न केवल बीजेपी को मिलती थी बल्कि कांग्रेस को भी मिलती थी। ऐसे में इंडिया गठबंधन में अभी कांग्रेस मज़बूत स्थिति में है। अभी के हालात में आरजेडी और टीएमसी जैसी पार्टियां कांग्रेस को बहुत झुकाने की स्थिति में नहीं हैं।
नियमित बैठक से इंडिया गठबंधन को क्या फायदा होगा
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इंडिया ब्लॉक की बैठक के बाद घोषित हुए पाँच मुद्दों में सबसे ज़्यादा अहम इस बात को माना कि वे हर दो महीने में एक बैठक करेंगे। उनका मानना है कि इसी से आगे का रास्ता निकलेगा।
वह कहती हैं, ‘इंडिया गठबंधन ने हर दो महीने में बैठक करने का फ़ैसला लिया है। बैठकर बात ही नहीं करेंगे, रणनीति ही नहीं बनाएंगे तो अलायंस का मतलब ही क्या है? फिर तो ये नारा ही है न।’
‘बीते दो साल में ये गठबंधन एक ऑप्टिक्स, एक नारा बनकर रह गया था। अब हर दो महीने में मिलेंगे, भले लड़ेंगे-भिड़ेंगे, जो भी बातें होंगी और जो भी मुद्दे सामने आएंगे, इससे कुछ तो निकलेगा। तो मैं मानती हूँ कि सबसे अहम है।’
वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का कहना है कि इस समय इंडिया ब्लॉक पर बहुत दबाव है। उनके दो कद्दावर नेता ममता बनर्जी और एमके स्टालिन चुनाव हार चुके हैं।
उन्होंने कहा, ‘टीएमसी, डीएमके और सीपीआईएम के सत्ता से बाहर हो जाने से गठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया था। कमजोर स्थितियों में दलों को अहसास हो रहा है कि अब जो भी उनके पास बचा है, उसे मिलकर बचाने की कोशिश करें।’
‘इन कमजोरियों ने इन दलों को एक साथ आने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इसमें डीएमके, कांग्रेस के चलते गठबंधन से दूर हो गया।’
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का जोर इस बात पर है कि इंडिया गठबंधन को गठबंधन के ढांचे पर फोकस करना चाहिए। उनका मानना है कि उससे ही विपक्षी ब्लॉक को आगे बढऩे और एकजुट रहने का आधार मिलेगा।
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘बैठक होना तब तक सिफऱ् फोटो-ऑप लगता है, जब तक यह गठबंधन अपने संरचनात्मक पहलुओं पर बैठकर बात नहीं करता। क्या गठबंधन का कोई दफ़्तर बनेगा?
इस गठबंधन के जो दूसरे अनुभवी नेता हैं, क्या उन्हें कुछ कमेटियों में रखा जाएगा ताकि वे इस गठबंधन को कोई रूप दे सकें। इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, पर जहाँ तक मेरी जानकारी है, ऐसी कोई बात बैठक में नहीं हुई है।’
ब्लॉक की अगली बैठक हैदराबाद में एक अगस्त यानी दो महीने बाद होना तय हुआ है। पत्रकार रशीद किदवई और स्मिता गुप्ता दोनों ने ही कहा कि हैदराबाद में बैठक इसलिए रखी गई है क्योंकि वहाँ कांग्रेस की सरकार है।
ऐसे में ज़रूरी इंतज़ाम और मीडिया का ध्यान दोनों के बेहतर होने की संभावना है।
ममता बनर्जी को कितनी मदद करेगा इंडिया ब्लॉक
वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता इंडिया ब्लॉक की बैठक के दौरान ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के गले मिलने की तस्वीर का हवाला देती हैं।
उन्होंने कहा, ‘एक समय उन्हें ब्लॉक का अध्यक्ष बनाने की मांग उठी थी। कई बार ऐसा भी हुआ कि नाराजग़ी में वह अलायंस की मीटिंग में नहीं आईं। मगर अब जब उनकी पार्टी बिखरने की कगार पर है तो उन्हें इंडिया गठबंधन की बैकिंग चाहिए।’
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने कहा, ‘इस समय ममता बनर्जी को एक राजनीतिक संरक्षण की ज़रूरत है, क्या उन्हें इंडिया गठबंधन में कोई भूमिका मिलेगी ताकि आगे की लड़ाई के लिए तैयारी कर पाएं?’
रशीद किदवई का कहना है, ‘मैं जानता हूँ कि कांग्रेस में एक तबका चाह रहा है कि ममता की पार्टी निपट जाए और उनकी राजनीतिक धरोहर हमें मिल जाए।’
नीरजा चौधरी का कहना है कि ‘बैठक के बाद जो घोषणा की गई है कि निष्पक्ष चुनाव की मांग और एसआईआर को लेकर यह गठबंधन सीजेआई (सुप्रीम कोर्ट से चीफ जस्टिस) को पत्र लिखेगा, तो मैं मानती हूँ कि यह ममता को बैक करने के लिए किया जा रहा है।’
क्या राहुल गांधी का कद बढ़ेगा?
इंडिया ब्लॉक की प्रेसवार्ता में कांग्रेस अध्यक्ष खडग़े ने बताया कि ‘इंडिया गठबंधन, मॉनसून सत्र में सदन में समन्वय बनाए रखेगा। हर सुबह लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ सभी विपक्षी दलों की बैठक होगी।’
इस घोषणा को वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी काफ़ी अहमियत देती हैं। उनका कहना है कि इससे इंडिया गठबंधन के अंदर कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़ा है।
दूसरी ओर रशीद किदवई कहते हैं कि इससे राहुल गांधी की लीडरशिप के प्रति संयुक्त विपक्ष के बीच स्वीकार्यता बढ़ेगी।
नीरजा चौधरी ने बीबीसी न्यूज हिन्दी से कहा, ‘यह अहम है कि संसद सत्र के दौरान विपक्षी दल हर दिन जो मीटिंग करेंगे, वह एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में होगी।
यानी राहुल गांधी संसद के फ्लोर कोऑर्डिनेशन में विपक्ष की रणनीति की अध्यतक्षा करेंगे। राहुल गांधी को अब तक इंडिया ब्लॉक ने अपना संयोजक तय नहीं किया है, लेकिन एक कदम उसकी ओर ले लिया है।’
नीरजा तर्क देती हैं कि ‘पहले रीजनल पार्टियां ही कांग्रेस की लीडरशिप को लेकर अडंगा लगाती थीं, जो अब कमजोर हो गई हैं। लेकिन कांग्रेस बड़े भाई की तरह संवेदनशीलता के साथ व्यवहार नहीं करेगी तो मामला गड़बड़ हो सकता है।’
-मनीष आजाद
‘Even the Rain’, क्या हो जब असल क्रांतिकारी और फिल्मी क्रांतिकारी एक हो जाये।
यही दिलचस्प कहानी है 2010 में आई एक महत्वपूर्ण फिल्म ‘Even the Rain‘ की। 2000 में स्पेन की एक फिल्म युनिट एक फि़ल्म की शूटिंग के लिए अमेरिका के सबसे गरीब देश बोलीविया में उतरती है। विषय है- कोलम्बस का लैटिन अमेरिकी देशों की विजय और इसके खिलाफ मूल नागरिकों का प्रतिरोध। ठीक वैसे ही जैसे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा मुंडा जैसे आदिवासियों का प्रतिरोध।
स्पेन की फिल्म युनिट ने बोलीविया को इसलिए चुना क्योकि यहां गरीबी बहुत है, इसलिए फिल्म निर्माण का खर्च कम आएगा। यह तथ्य बखूबी यह स्पष्ट कर देता है कि कोलम्बस के अत्याचार पर फिल्म बनाने के बावजूद फिल्म युनिट कोलम्बस की परंपरा को ही ढो रही है। फिल्म में कास्ट किये गए लोकल एक्स्ट्रा लोगों को महज 2 डॉलर प्रतिदिन की दर से पेमेंट किया जाता है और उनसे बहुत तरह के अन्य श्रम साध्य काम [जैसे सेट बनवाना आदि] लिए जाते है। और इस तरह फिल्म निर्माण का खर्च बचाया जाता है। इन्ही लोकल एक्स्ट्रा लोगो से वह सलीब बनवाया जाता है, जिस पर कोलम्बस की सेना के खिलाफ विद्रोह करने वालों को फाँसी दी जानी है, जिसके लीडर का रोल इन्ही में एक स्थानीय डैनियल ही कर रहा है। अपना सलीब खुद तैयार करने या करवाने का यह दृश्य काफी प्रतीकात्मक है और बिना मुखर हुए काफी कुछ कह जाता है।
लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स वहाँ से शुरू होता है जब फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को यह पता चलता है कि डैनियल अपनी असल जिंदगी में भी एक विद्रोही की भूमिका निभा रहा है। वर्ड बैंक के एक प्रोजेक्ट के तहत सन 2000 में बोलीविया में पानी का सम्पूर्ण निजीकरण कर दिया गया था। यहां तक कि आप बारिश का पानी भी इक_ा नहीं कर सकते। यहीं से इस फि़ल्म का नाम ‘Even the Rain ‘ निकला। यहां पर असल न्यूजरील के इस्तेमाल के कारण फिल्म और असरकारक हो जाती है।
डैनियल फिल्म में ‘हेतू’ (Hatuey) की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जो कोलम्बस की सेना के खिलाफ लड़ते हुए शहीद होने वाले पहले विद्रोहियों (2 फरवरी 1512 को शहीद) में से एक था। जहाँ फिल्मकार ने फिल्म युनिट द्वारा लोकल लोगों के शोषण को कोलम्बस की परंपरा से जोड़ा है, वही डैनियल व अन्य स्थानीय लोगो द्वारा पानी के निजीकरण के विरोध को ‘हेतू’ (Hatuey) की विद्रोही परंपरा से जोड़ा है।
बहरहाल डैनियल के पानी के निजीकरण के खिलाफ चल रहे आंदोलन में शामिल होने के कारण शूटिंग में काफी बाधा उत्पन्न हो रही है। डायरेक्टर और प्रोड्यूसर डैनियल को बदल भी नही सकते, क्योकि फि़ल्म का काफी हिस्सा शूट हो चुका है। हद तो तब हो गयी जब आंदोलन में भागीदारी के कारण डैनियल को गिरफ्तार कर लिया गया। फिल्म का प्रोड्यूसर कोस्टा पुलिस को घूस देकर डैनियल को कुछ समय के लिए छुड़ा लेता है और पुलिस को आश्वासन देता है कि फि़ल्म में डैनियल को सूली पर चढ़ाने के बाद पुलिस आकर उसे सेट से गिरफ्तार कर ले।
बुर्जुआ कला पर यह बहुत बड़ा व्यंग्य है। ‘यूज एंड थ्रो’ का पूंजीवादी सिद्धान्त कला में भी घुस जाता है।
खैर शूटिंग के बाद जब पुलिस डैनियल को गिरफ्तार करने आती है तो फिल्म के सभी लोकल स्थानीय कलाकार पुलिस से भिड़ जाते है और डैनियल को भगा देते है। यह दृश्य फिल्म की जान है। यहाँ कला यथार्थ बन जाता है और यथार्थ कला हो जाती है।
डिस्क्लेमर: इस ख़बर में गांव के नाम में जाति-सूचक शब्द का उल्लेख केवल सामाजिक भेदभाव की वास्तविकताओं को सामने लाने के लिए किए गए हैं. इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव या पूर्वाग्रह को बढ़ावा देना, उसका समर्थन करना या उसे सामान्य मानना या बनाना नहीं है.
"आप कहां रहती हैं?"
इस सवाल के जवाब में मेनका भारती कुछ क्षण के लिए रुकती हैं.
उनके पीछे खेतों की ओर जाता एक कच्चा रास्ता है. घर के पीछे खड़े आम के पेड़ की छांव में बैठी मेनका फिर जवाब देती हैं, "हम अपने गांव का नाम बदलना चाहते हैं."
मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के बगौता ग्राम पंचायत में बसे चमरुआपुरवा गांव की गलियों में रोजमर्रा की ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती है.
राजधानी भोपाल से लगभग 330 किलोमीटर दूर बसे इस गांव से बच्चे स्कूल जाते हैं, लोग काम पर निकलते हैं और गांव के मुहाने पर बना प्राथमिक स्कूल यहां आने वालों को इसका नाम बताता है.
लेकिन यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि यह "सिर्फ़ एक नाम" नहीं है.
उनके मुताबिक, गांव का नाम सुनते ही कई लोग उनकी जाति का अनुमान लगाते हैं. और इसका असर उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी के कई पहलू जैसे पढ़ाई, किराये के मकान की तलाश और हर दिन की बातचीत तक में दिखाई देता है.
मेनका सकुचाते हुए बताती हैं कि उन्हें पहली बार इसका एहसास स्कूल में हुआ था.
"स्कूल में जो भैया थे, गाड़ी वाले, वो स्कूल के बाहर खड़े होकर जब बच्चों को बुलाते थे कि फलाना गांव के बच्चे जल्दी आओ तो सुनने में ही बहुत बुरा लगता था. उस वक्त तो ऐसा लगता था जैसे कोई गाली दे रहा हो."
जब हमने उनसे पूछा कि क्या लोग उनके गांव का नाम सुनकर किसी तरह की राय बना लेते हैं या उन्हें जज करते हैं, तो वह कहती हैं, "हां, जज तो करते हैं. यह नाम एक पहचान जैसा है. गांव का नाम ही एक तरह की पहचान बन जाता है."
मेनका अकेली नहीं हैं.
गांव के रहने वाले संजय अहिरवार कहते हैं कि उन्होंने पहली बार इसका असर तब महसूस किया जब वह उच्च शिक्षा के लिए उज्जैन गए.
वो कहते हैं, "वहां मेरे साथियों ने मुझसे पूछा कि मैं कहां से हूं. मैंने बताया कि मैं छतरपुर से हूं. फिर उन्होंने पूछा कि छतरपुर में कहां से, तो मैंने कहा कि बगौता से हूं. उन्होंने पूछा भाई ये तुम्हारे गांव का नाम है ? मैं चुप रहा, लेकिन उसके बाद मैंने आगे नहीं बताया कि मैं किस गांव से हूं."
संजय कहते हैं कि यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी.
किसी नए व्यक्ति को अपनी क्या पहचान बताएं?
संजय के पड़ोस में रहने वाले प्रवेश अहिरवार कहते हैं, "चार लोगों के बीच कोई नया आए, पूछे कि कहां से हो. तो वो बात आ ही जाती है. मैं नहीं बोलूं तो सामने वाला बोल देता है कि फलाने गांव से हैं. तब अच्छा नहीं लगता."
उनके लिए रोज़मर्रा का यह आम सवाल सिर्फ़ एक गांव के नाम का सवाल नहीं है.
संजय कहते हैं, "ये सिर्फ़ नाम नहीं है, बल्कि एक सिंबल यानी कि एक तरह की पहचान है. जाति गाली के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाली पहचान. जैसे आप अगर इतिहास देखें, तो चमार शब्द को गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, आज भी उसी तरह इसे गाली के तौर पर यूज़ किया जाता है. तो हमारे अंदर एक फीलिंग आती है कि सामने वाला हमें गाली दे रहा है."
मेनका, प्रवेश और संजय जैसे इस गांव के कई लोगों को इसी समस्या का सामना करना पड़ता है.
संजय बताते हैं कि अब उन्होंने इससे बचने का अपना तरीका बना लिया है.
"इसका कोई परमानेंट उपाय तो नहीं है. मैं कोशिश करता हूं कि पहले अपने जिले का नाम बता दूं. अगर फिर भी लोग पूछें तो पंचायत का नाम बता देता हूं. जितना हो सके, कोशिश करता हूं कि मेरे गांव का नाम न आए."
प्रवेश अहिरवार भी कहते हैं कि गांव का नाम सामने आते ही लोगों का रवैया बदल जाना असामान्य नहीं है.
'गांव का नाम सुनकर फोन काट दिया'
कमरा तलाशने के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वह कहते हैं, "जैसे मैंने अपना नाम बताया, अपना परिचय दिया, अपने गांव का नाम बताया, तुरंत फोन काट दिया."
जब हमने पूछा कि क्या यह अनुभव उन्हें कई बार हुआ तो वो कहते हैं, "अभी आपके सामने करता हूं कुछ लोगों को फोन, आप खुद देख लीजिए".
इसके बाद प्रवेश ने हमारे सामने किराए के मकान के लिए एक व्यक्ति को फोन लगाया. बातचीत सामान्य तरीके से शुरू हुई.
दूसरी तरफ़ मौजूद व्यक्ति ने उनसे अगले दिन आकर कमरा देखने के लिए कहा.
लेकिन कुछ देर बाद जब प्रवेश ने अपना परिचय दिया और बताया कि वह किस गांव से हैं, तो फोन कट गया.
प्रवेश ने दोबारा फोन लगाया.
फिर एक बार और.
लेकिन इस बार कॉल का जवाब नहीं मिला.
प्रवेश का कहना है कि कई बार लोग सीधे कुछ नहीं कहते, लेकिन व्यवहार बदल जाता है.
उन्होंने कहा, "जब मैं अपना पूरा पता बताता हूं, तो सामने वाले व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है. गांव का नाम सुनते ही उनके बात करने का तरीका, देखने का नजरिया और समझने का ढंग सब अलग हो जाता है. कई बार तो लोग मुझसे बात करना ही कम कर देते हैं या बिल्कुल बंद कर देते हैं."
यह समस्या सिर्फ़ एक समुदाय तक ही सीमित नहीं है.
गांव में रहने वाली प्रियंका साहू और उनके पति ने करीब तीन साल पहले यहां मकान बनवाया था.
उनके मकान के एक हिस्से में मरम्मत का काम चल रहा है.
प्रियंका ने शहर के करीब रहने के लिए यहां घर बनाया. लेकिन वो कहती हैं कि गांव के नाम से जुड़ी धारणाएं उनके भी हर दिन के कामकाज को कठिन बनाती हैं.
प्रियंका ने पीछे चल रही मशीनों को बंद करवाते हुए कहा. "यहां के लिए रिक्शा नहीं मिलता है. या तो तालाब के पास छोड़ देंगे या फिर रोड पर. जो यहां के रिक्शावाले हैं, वो ही यहां आते हैं. मेरा यह मानना है कि किसी व्यक्ति को उसकी जाति से जोड़कर देखना या पुकारना अपमानजनक है. लेकिन हमें हर दिन यही अपमान झेलना पड़ता है".
इसी गांव से कुछ दूर रहने वाले रुद्र प्रताप सिंह का भी मानना है कि ऐसे नामों को बोलने या बताने में दिक्कत होती है.
उन्होंने कहा, "जातिसूचक नाम तो बहुत सारी जगहों के हैं, जैसे चौबेपुर कॉलोनी. ये यहीं छतरपुर शहर में है, शायद इस नाम को लेने से किसी को अपनमानजनक न महसूस हो. लेकिन बगौता ग्राम पंचायत में जो गांव है उसका नाम लेने में वहां के लोगों को भी बुरा लगता है और हम लोगों को भी. इसका नाम तुरंत बदला जाना चाहिए और ऐसे नाम जहां जहां हैं उन सबको बदल देना चाहिए. इस से भेदभाव कम होगा".
गांव का नाम लेने में असहजता अब गांव के बुजुर्गों को भी होती है जिन्होंने पहले कभी इस पर कुछ खास विचार नहीं किया.
गांव के बुजुर्गों की राय भी हमेशा ऐसी नहीं रही.
67 साल के भुल्ली अहिरवार बताते हैं कि पहले उन्हें गांव के नाम में कुछ गलत नहीं लगता था.
हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें पहले भी यह नाम असहज करता था. वह हंसते हुए कहते हैं, "नहीं, नहीं... उस वक्त नहीं लगता था."
फिर कुछ देर रुककर कहते हैं, "पहले तो ऐसा ही होता था. हमारे जात बिरादरी के आधार पर यह नाम रखा गया. लेकिन धीरे-धीरे आदमी को ज्ञान हुआ. बच्चे पढ़ने लिखने लगे तो उन्हें परेशानी होने लगी. तब हमें भी ज्ञान हुआ और यह लगा कि यह गलत है. गांव के नाम ऐसा नहीं होने चाहिए."
कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे नाम बहुत पुराने हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें किन परिस्थितियों में रखा गया था. लेकिन उनका मानना है कि अगर किसी नाम को बताने में लोगों को असहजता महसूस होती है तो उस पर विचार होना चाहिए.
एक स्थानीय निवासी कहते हैं, "ये नाम आज से तो हैं नहीं, कई सालों से चले आ रहे हैं. लेकिन अगर कहीं बताने में बुरा लगता है, तो ऐसे कई नाम हैं, उनको समय के हिसाब से बदलना चाहिए."
हालांकि ऐसे नाम सिर्फ़ इसी गांव तक सीमित नहीं हैं.
देश के कई हिस्सों में मौजूद हैं ऐसे गांव
देश के कई हिस्सों में ऐसे गांव, सड़कें और बस्तियां मौजूद हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं.
साल 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे गांवों, सड़कों और आवासीय बस्तियों के नाम बदलने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. नए दिशा-निर्देशों में ऐसे नामों की जगह लोकतांत्रिक मूल्यों या प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के नाम अपनाने की बात कही गई.
इसी तरह अक्तूबर 2025 में तमिलनाडु सरकार ने जातिसूचक या भेदभावपूर्ण माने जाने वाले नामों की पहचान और उन्हें बदलने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए.
तमिलनाडु सरकार ने कहा कि ऐसे नामों वाले सड़कों, गलियों, आवासीय इलाकों, बस स्टैंडों, बाजारों, जल निकायों और ग्राम पंचायतों में भी बदलाव किया जाएगा.
उत्तर प्रदेश में भी यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर उठ चुका है. मार्च 2026 में सत्तारूढ़ बीजेपी के विधान परिषद सदस्य लालजी प्रसाद निर्मल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात कर ऐसे गांवों और कस्बों की सूची सौंपी जिनके नाम दलित समुदायों से जुड़े हैं. उन्होंने राज्य भर में ऐसे गांवों और कस्बों की पहचान कर सूची तैयार करने और उनके नाम बदलने की मांग की थी.
गांव का नाम बदलने की मांग उठी
छतरपुर के इस गांव के लोगों ने भी कई बार नाम बदलने की मांग उठाई है.
ग्रामीणों के अनुसार, हाल के समय में उन्होंने साल 2022 में ज़िला कलेक्टर और तहसीलदार को नाम बदलने के लिए ज्ञापन सौंपा था. हालांकि अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है.
छतरपुर ज़िला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नमः शिवाय अरजरिया कहते हैं कि ज़िले में ऐसे कई गांव हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं और ऐसे गांवों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.
उनका कहना है, "जो भी इस प्रकार के नाम वाले गांव मौजूद होंगे, उनको सूचीबद्ध कराया जाएगा. फिर ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और तय प्रक्रिया के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी."
इलाके के ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने भी इस बात पर खेद प्रकट करते हुए कहा, "आज एक दौर में भी ऐसे नाम होना उचित नहीं है. हम अपनी तरफ़ से भी कोशिश करेंगे कि ऐसे गांवों को चिन्हित करके और तय प्रक्रिया के अनुसार ग्रामीणों की सहमति से नाम बदले जाएं".
लेकिन सवाल यही है कि क्या गांव का नाम बदलने से सचमुच कुछ बदलेगा?
संजय को ऐसा लगता है. वो कहते हैं, "नाम बदल जाएगा तो बहुत कुछ बदलेगा. लोगों का नज़रिया बदलेगा. आगे आने वाले बच्चे जब बाहर जाएंगे तो बिना झिझक के अपनी पहचान बता पाएंगे."
मेनका की भी यही उम्मीद है. वो कहती हैं, "शायद तब, आप कहां रहती हैं जैसे एक साधारण सवाल का जवाब देने में मुझे झिझक नहीं होगी. मैं खुलकर अपनी पहचान बता पाऊंगी".
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-तारन प्रकाश सिन्हा
जल संरक्षण की चर्चा अक्सर बांधों, नहरों और तालाबों से शुरू होती है, लेकिन किसी भी जल क्रांति की असली नींव न तो कंक्रीट की संरचनाएं होती हैं और न ही मशीनें। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वह समाज होता है, जो पानी को अपना साझा उत्तरदायित्व मानता है।
आज जब दुनिया “ग्रीन वाटर” अर्थात मिट्टी में संचित नमी और वर्षा जल के संरक्षण की बात कर रही है, तब यह समझना भी आवश्यक है कि पानी केवल तकनीक से नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए लोगों का जुड़ना, समुदाय का जागना और साझी जिम्मेदारी की भावना विकसित होना उतना ही जरूरी है। जब पानी गांव में रुकता है, तब समृद्धि भी गांव में ठहरती है।
कुछ दशक पहले तक भारत की सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा थी। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नदियों को जोड़ा गया, बांध बनाए गए, नहरों का विस्तार हुआ और भूजल का व्यापक उपयोग किया गया। उस दौर की अपनी आवश्यकताएं थीं और अपनी उपलब्धियां भी। देश ने भूख के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीती।
लेकिन समय के साथ एक नया संकट सामने आया। जिस पानी ने हमें समृद्ध बनाया, हम उसी पानी को अपनी पहुंच से दूर करते चले गए। हर वर्ष पर्याप्त वर्षा होती रही, नदियां बहती रहीं, लेकिन खेतों में नमी घटती गई। बोरवेल गहरे होते गए और भूजल स्तर लगातार नीचे जाता गया। हम पानी निकालने की तकनीकों में आगे बढ़े, लेकिन पानी रोकने की संस्कृति पीछे छूटती गई।
यहीं से एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस होती है। क्या पानी केवल नदियों, बांधों और भूजल तक सीमित है, या वह नमी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो वर्षा के बाद मिट्टी में ठहरती है, फसलों को जीवन देती है और धरती को हरा-भरा बनाए रखती है?
दुनिया आज इसी प्रश्न का उत्तर खोज रही है। जल प्रबंधन का केंद्र अब केवल “ब्लू वाटर” तक सीमित नहीं है, बल्कि “ग्रीन वाटर” की ओर भी बढ़ रहा है। ग्रीन वाटर वह जल है जो मिट्टी में संचित रहता है, फसलों का पोषण करता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक नींव बनता है।
लेकिन ग्रीन वाटर का विचार केवल पानी का विचार नहीं है; यह समाज और सहभागिता का विचार भी है।
आखिर कोई गांव अपनी हर बूंद बारिश को कैसे सहेजेगा? कोई खेत अपनी नमी कैसे बनाए रखेगा? कोई तालाब वर्षों तक जीवित कैसे रहेगा?
इसका उत्तर किसी मशीन, ऐप या सरकारी आदेश में नहीं छिपा है। इसका उत्तर लोगों में छिपा है।
-अशोक पांडे
तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत (15 जनवरी 1902 - 3 जून 1963) कुल इकसठ साल पांच महीने जिए। उनके देश की सरकार उनसे डरती थी सो इनमे से अठारह साल जेल में कटे और तेरह निर्वासन में। नाजिम हिकमत को इतने लम्बे समय तक जेल में बंद रखने के सरकारी फैसले का दुनिया भर में विरोध हुआ और 1949 में उनकी रिहाई की मांग करते हुए पाब्लो पिकासो, पॉल रोब्सन, ज्यां-पॉल सार्त्र और पाब्लो नेरुदा जैसी हस्तियों ने एक विश्वव्यापी अभियान शुरू किया। सरकार ने इस अभियान को जऱा भी तवज्जो नहीं दी। अगले साल जेल में कैद नाजिम को विश्व शान्ति पुरस्कार देने की घोषणा भी हुई।
तुर्की की बुर्सा जेल में रहते हुए उन्हें दस साल बीत चुके थे जब एक कविता की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखा-
जब से कैद किया गया है मुझे
दस फेरे लगा चुकी धरती सूरज के गिर्द
और अगर आप धरती से पूछेंगे तो वो कहेगी:
‘वक्त के इतने जऱा से टुकड़े का
क्या जिक्र। ’
और अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगा:
‘दस साल मेरी जिन्दगी के।’
जिस साल मैं कैदखाने में आया था
मेरे पास एक पेन्सिल थी।
वह घिस गयी हफ्ते भर में।
और अगर आप पेन्सिल से पूछेंगे तो वो कहेगी:
‘एक पूरी जिन्दगी।’
और मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा:
‘फक़़त एक हफ्ता बस।’
1940 की सर्दियों में जब उन्हें पहली बार इस जेल में लाया गया था, एक लेजेंड के तौर पर उनकी ख्याति वहां रह रहे कैदियों तक उनसे पहले पहुँच चुकी थी। इनमें से ज्यादातर कैदी नहीं जानते थे कि नाजिम बीसवीं सदी के सबसे बड़े तुर्की कवि थे अलबत्ता उन्हें इतना मालूम था कि उनके दुश्मन भी उन्हें मोहब्बत करते थे।
नाजिम को ओरहान कमाल नाम के एक अठाईस वर्षीय युवक के साथ कोठरी शेयर करनी थी। ओरहान भी सरकार-विरोधी काम करने के इल्जाम में पांच साल की सजा काट रहा था। एक छात्र के तौर पर ओरहान ने नाजिम हिकमत को न केवल पढ़ा था, एक प्रशंसक के रूप में उन्हें चिठ्ठियाँ भी लिखी थीं। यह अलग बात है कि ये चिठ्ठियाँ कभी भेजी ही नहीं जा सकीं क्योंकि नाजिम जेल में थे। पुलिस के छापे के दौरान ओरहान के घर से इन चिठ्ठियों के मिलने को भी उसके खिलाफ सुबूत के तौर पर पेश किया गया।
नाजिम हिकमत ओरहान के लिए रोल मॉडल और हीरो थे और किस्मत ने उसे उनके साथ एक ही कोठरी में बंद कर दिया था। नाजिम की संगत में ओरहान उनका शिष्य बन गया। कैद में भी नाजिम इतना सारा काम करते थे कि उनके श्रम और धैर्य को देख कर ही बहुत कुछ सीखा जा सकता था। नाजिम रोज लिखते थे। ‘ह्यूमन लैंडस्केप्स फ्रॉम माय कन्ट्री’ उन्होंने जेल में ही शुरू कर के पूरा किया। कविताओं और लेखों के अलावा वे लगातार अनुवाद भी किया करते थे। टॉलस्टॉय की ‘वार एंड पीस’ का अनुवाद उन्होंने बुर्सा जेल में ही किया। न जाने कितने कैदियों को उन्होंने लिखना, पढऩा और कपड़ा बुनना सिखाया।
ओरहान को उनके साथ तीन साल बिताने का मौक़ा मिला। ओरहान को कविता लिखने का शौक तो था लेकिन कवि की प्रतिभा नहीं थी। नाजिम ने उससे गद्य लिखने को कहा और लेखन की बारीकियां सिखाईं। इन तीन सालों में उनके बीच गुरु-शिष्य का एक अनूठा सम्बन्ध बना। इस सम्बन्ध का नतीजा यह निकला कि आगे चल कर ओरहान कमाल एक बड़ा उपन्यासकार बना। उसकी कहानियों पर फि़ल्में भी बनाई गईं। कमाल 1943 में जेल से रिहा हुआ। अपने उस्ताद को कृतज्ञता के साथ याद करते हुए कमाल ने ‘इन जेल विद नाजिम हिकमत’ शीर्षक संस्मरण भी लिखा जो एक महान मनुष्य, अध्यापक, क्रांतिकारी और सचेत साहित्यकार के तौर पर नाजिम की छवि को और भी पुख्ता बनाता है।
नाजिम न होते तो ओरहान कमाल लेखक नहीं बन सकता था।
इसी जेल में नाजिम को इब्राहीम बलबन नाम का अठारह साल का एक लडक़ा मिला। बलबन एक बेहद गरीब परिवार का का बेटा था और अवैध रूप से भांग की खेती करने के झूठे इल्जाम में उसे छ: महीने की जेल हुई थी। जुर्माना न भर सकने के कारण उसकी कैद में तीन साल और जुड़े और उसके बाद एक और झूठे मुकदमे में फंसा कर सजा को चार-छ: साल आगे खींच दिया गया। उन्हें अपने जीवन के सबसे खूबसूरत दौर के दस साल जेल में बिताने पड़े। भीषण गरीबी के कारण कुल तीसरी कक्षा से आगे न पढ़ सके बलबन को बचपन में चित्रों की नकल बनाने में आनंद आता था। जेल में उसने कहीं से एक पेन्सिल का जुगाड़ कर अपने इस पुराने शौक को पुनर्जीवित किया। नाजिम हिकमत खुद भी पेंटिंग किया करते थे। जब उन्हें बलबन के बारे में पता लगा उन्होंने अपने सारे रंग और ब्रश उसे तोहफे में दे दिए।
इब्राहीम बलबन तो ओरहान कमाल से भी सात साल छोटा था। नाजिम उसके भी उस्ताद बने। अपने से बीस साल छोटे इस छोकरे को नाजिम ने कला की बारीकियों के अलावा दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति के पाठ भी पढ़ाये। दोनों की दोस्ती 1947 में बलबन की रिहाई तक यानी सात साल चली। नाजिम के अनेक पोर्ट्रेट बनाने के अलावा अपनी इस दोस्ती पर इब्राहीम बलबन ने दो किताबें लिखीं।
पारिवारिक कलह के साथ ही वित्तीय और सामाजिक दबाव के कारण भारत में आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला पहलू सामने आया है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
एनसीआरबी की ओर से जारी ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)’ शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1।70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0।4 फीसदी कम जरूर है। हालांकि इस दौरान शादीशुदी पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिवारिक कलह बढ़ती आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह (33।5 फीसदी) के तौर पर सामने आई है। इसके अलावा नशाखोरी, शादी संबंधित विवाद, दहेज, वित्तीय बदहाली और बेरोजगारी का स्थान है। छात्र-छात्राओं आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षाओं में नाकाम रहना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67।5 फीसदी लोग विवाहित थे। पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है। बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं।
बढ़ते मामलों की वजह
हालांकि सवाल है कि क्या पारिवारिक कलह का मतलब सिर्फ पति-पत्नी विवाद है। महिला अधिकार कार्यकर्ता इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, ‘पारिवारिक कलह का दायरा व्यापक है। यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद नहीं हैं। भाई-बहन, माता-पिता और रिश्तेदारों से विवाद भी पारिवारिक कलह के दायरे में आता है। ऐसे में शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के लिए सिर्फ पत्नियों या महिलाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं है।’
उनका कहना है कि पुरुष शादी के बाद विभिन्न वजहों से मानसिक दबाव में रह सकते हैं। इसमें दफ्तर की राजनीति और नौकरी की दिक्कतों के अलावा आर्थिक मुश्किलों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
कोलकाता की महिला अधिकार कार्यकर्ता सुष्मिता बारुई भी यही बात कहती हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, ‘पारिवारिक कलह से होने वाली मौतों के लिए सीधे पत्नी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। एनसीआरबी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा है। पारिवारिक कलह शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। हमें तस्वीर के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए। देश में हर साल भारी तादाद में दहेज उत्पीडऩ के कारण महिलाओं की मौत की खबरें भी आती हैं।’
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सामाजिक स्थिति और कई अन्य वजहों से पुरुष ऐसी स्थिति में मन ही मन घुटते हुए मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है। महिलाओं के उलट ज्यादातर मामलों में किसी सहयोगी या परिजन से अपने मन की पीड़ा भी साझा नहीं कर पाता।
-डॉ. संजय शुक्ला
देश में इन दिनों परीक्षाओं पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लग रहा है जिसके चलते जहां छात्र और अभिभावक उद्वेलित हैं वहीं इस मुद्दे पर सियासी पारा भी सरगर्म है। बीते दिनों राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ‘एनटीए’ द्वारा ली गई ‘नीट- यूजी 2026’ परीक्षा रद्द होने का मामला शांत ही नहीं हुआ था कि देश के विभिन्न यूनिवर्सिटीज में प्रवेश के लिए 30 मई को आयोजित ‘सीयूईटी-यूजी’ परीक्षा तकनीकी खामियों की वजह से घंटों बाधित रही। इस तकनीकी अव्यवस्था से जहां ‘एनटीए’ की खूब फजीहत हुई वहीं छात्रों में बेचैनी रही। इधर एनटीए की परीक्षा पर पूरे देश में छात्रों और युवाओं के बीच आक्रोश और आशंका का ज्वार उफान पर था कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ‘सीएसईबी’ के 12वीं परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम ‘ओएमएस’ में भारी पैमाने पर गड़बडिय़ों का भांडा फूट गया। सीबीएसई शुरुआत में किसी भी तकनीकी गड़बड़ी से इंकार करते रहा लेकिन जैसे - जैसे सबूत सामने आने लगे तब सरकार ने भी स्वीकार किया कि मूल्यांकन में तकनीकी गड़बडिय़ां हुई है। अलबत्ता सरकार ने ‘ओएसएम’ प्रणाली में हुई चूक तथा इसके लिए कंपनियों ‘वेंडर्स’ चयन में टेंडर प्रक्रिया में हुई कथित विसंगतियों के चलते सरकार ने सीएसईबी के चेयरमैन और सचिव को हटाते हुए मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय समिति गठित कर दिया है।
गौरतलब है कि सीबीएसई की 12 वीं की परीक्षा में इस साल तकरीबन 17 लाख छात्र शामिल हुए थे। इस परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच हाहाकार मच गया क्योंकि उन्हें उम्मीद से काफी कम अंक मिले थे। इसी के चलते देश भर के चार लाख छात्रों ने कापियों को दोबारा जांचने के लिए आवेदन किया है। छात्रों के मुताबिक उन्हें जो स्कैनिंग कॉपी दी गई वह या तो दूसरे छात्र का था अथवा उसमें से कुछ पन्ने गायब थे। छात्रों का यह भी कहना था कि स्कैनिंग कॉपी साफ नहीं है अथवा यह कई पन्ने कटे हुए हैं लिहाजा ‘ओएमएस’ पर सवाल उठना लाजिमी था। इधर सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि री- इवैल्यूएशन ( कापियों की दोबारा जांच) के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की कापियां फिर से जांची जाएंगी। सरकार के इस फैसले के बाद बोर्ड द्वारा री- इवैल्यूएशन पोर्टल शुरू किया गया है जिसमें हजारों छात्रों ने आवेदन जमा किया है जिसके आंकड़े लाखों तक पहुंचने की उम्मीद है।
दूसरी ओर बात आगामी 21 जून को दोबारा ली जाने वाली नीट परीक्षा की करें तो सरकार इस दिशा में में बेहद चाक- चौबंद नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट में एनटीए को भंग करने संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान एनटीए को नसीहत दिया है कि उसे यूपीएससी से सीखने की जरूरत है वहां कभी भी पेपर लीक नहीं होता। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी पेपर लीक जैसी घटनाएं नहीं रूकेंगी। इधर केंद्र सरकार ने सुप्रीम अदालत को बताया है कि इस मामले की निगरानी स्वयं प्रधानमंत्री कर रहे हैं। इधर केंद्र सरकार की एक उच्च स्तरीय बैठक में दोबारा ली जाने वाली नीट के प्रश्नपत्रों के प्रिंटिंग प्रेस से परीक्षा केंद्रों तक अत्यंत सुरक्षित और त्वरित डिलीवरी का जिम्मा वायुसेना को सौंपने का प्रस्ताव किया गया है। यदि इस प्रस्ताव पर अमल होता है तब यह देश के इतिहास में पहला मौका होगा जब किसी परीक्षा को फूल प्रूफ कराने के लिए एयरफोर्स के लॉजिस्टिक हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया हो।
गौरतलब है कि बीते 3 मई को ली गई नीट में लगभग 23 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे जिन्होंने सालों से दिन-रात मेहनत किया था लेकिन एक झटके में उनके मेहनत पर पानी फिर गया। इधर नीट रद्द होने को लेकर देश भर में छात्रों और युवाओं का ग़ुस्सा उबाल पर है और राजस्थान सहित अन्य राज्यों में उग्र प्रदर्शन हुए हैं। आक्रोशित छात्रों का सरकार से सवाल है कि, कुछ लोगों की गलती का सजा लाखों बच्चों को क्यों दिया जा रहा है? छात्रों का यह सवाल पूरी तरह से जायज है। दूसरी ओर नीट रिटेस्ट के चलते अनेक छात्र मानसिक दबाव में हैं इन छात्रों का सिस्टम से भरोसा उठ चुका है। अनेक मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार उनके पास रोज लगभग दर्जन भर नीट के बच्चे आ रहे हैं जिनमें अवसाद के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। ऐसे बच्चों को तुरंत काउंसलिंग की जरूरत है इस दिशा में अभिभावकों को सचेत होना होगा।
बहरहाल मेडिकल दाखिला परीक्षा में पेपर लीक, नकल और फर्जीवाड़े की यह कोई पहली घटना नहीं है बल्कि कालांतर में भी इस प्रकार के अनेक घोटाले हुए हैं। साल 2024 के नीट परीक्षा परिणाम पर छात्रों और अभिभावकों की उंगलियां उठीं थी तब मामला सडक़ से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। देश आज भी मध्यप्रदेश में 2013 में हुआ व्यापम घोटाले को नहीं भूला है। छत्तीसगढ़ में साल 2011का पीएमटी पर्चा लीक कांड, उत्तरप्रदेश में 2021 का आयुष घोटाला इन परीक्षाओं की पवित्रता की पोल खोल रहे हैं। बहरहाल जिस तरह से साल दर साल नीट के पर्चे फूट रहे हैं और अनियमितता उजागर हो रही है उससे यह निश्चित है कि ‘नीट’ पूरी तरह से ‘क्लीन’ नहीं है। दूसरी ओर इस परीक्षा में अनियमितता और अनिश्चितता के चलते जहां केंद्र सरकार की किरकिरी हो रही है वहीं ‘एनटीए’ के साख पर भी पलीता लग रहा है। लिहाजा केंद्र सरकार और एनटीए को परीक्षा को ‘फूल प्रूफ’ बनाने की दिशा में गंभीरता और दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करने की दरकार है।
दरअसल नीट सहित अन्य महत्वपूर्ण परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधलियों के मूल में मुख्य रूप से राजनीतिक हस्तक्षेप, कोचिंग माफियाओं की रसूख , धनबल का बढ़ता प्रभाव और विलंबित जांच और न्याय प्रक्रिया ही जिम्मेदार है। देश में अभी तक हुए मेडिकल घोटालों पर गौर करें तो इस मामले में संलिप्त बड़ी मछलियां आजाद हैं जबकि छोटे-मोटे कर्मचारी और अभ्यर्थी ही पकड़ में हैं।अतीत में हुए परीक्षा घोटाले के मामले आज भी अदालतों और जांच एजेंसियों के दफ्तरों में धूल खाते पड़े हैं। सरकार और एजेंसी इन परीक्षाओं की शुचिता और गोपनीयता पर कितना संजीदा है? इसका अंदाजा फाइलों में दफन नीट- यूजी 2024 पेपर लीक मामले को लेकर गठित डॉ. राधाकृष्णन समिति की उस रिपोर्ट से लगाई जा सकती है जिसमें उन्होंने नीट को ‘पेन एंड पेपर टेस्टिंग’ की जगह ‘कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग’ ‘सीबीटी’ मोड पर लेने की सिफारिश किया था। अलबत्ता अब जाकर सरकार ने फैसला किया है कि अगले साल से नीट ऑनलाइन ली जाएगी जो मेहनती छात्रों के लिए राहत भरी खबर है।
3 जून विश्व साइकिल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर व्यक्ति समय की कमी और तनाव की शिकायत करता है, तब एक बेहद साधारण और किफायती समाधान हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। वह समाधान है - साइकिल। आज 3 जून को पूरी दुनिया ‘विश्व साइकिल दिवस’ मना रही है। यह दिन किसी आधुनिक आविष्कार का जश्न नहीं, बल्कि उस सादगी और उपयोगिता को याद करने का अवसर है, जिसे हमने विकास की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है। जब पूरी दुनिया महंगे ईंधन, ट्रैफिक जाम और जहरीले धुएं से हांफ रही है, तब साइकिल एक सुगम साधन की तरह नजर आती है। यह कोई साधारण सवारी नहीं, बल्कि बिना धुएं वाली वह मूक क्रांति है जो व्यक्ति की सेहत, जेब और धरती तीनों को एक साथ संवार सकती है।
आजकल की जीवनशैली को देखें तो हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। घर से महज दो कदम दूर सब्जी की दुकान या दूध की डेयरी तक जाने के लिए भी लोग तुरंत मोटरसाइकिल या कार की चाबी उठा लेते हैं। नतीजा यह हुआ है कि शहरों की हवा भारी हो चुकी है, सडक़ों पर पैदल चलने की जगह नहीं बची और इंसानी शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। लोग शारीरिक रूप से खुद को फिट रखने के लिए हर महीने जिम में हजारों रुपये खर्च करते हैं और एक ही जगह खड़े होकर ट्रेडमिल पर दौड़ते हैं। जबकि इसका सबसे आसान और प्राकृतिक विकल्प हमारी दिनचर्या में ही छुपा है। सुबह या शाम को सिर्फ आधा घंटा साइकिल चलाना दिल को मजबूत करता है, मानसिक तनाव को कम करता है और शरीर को ऊर्जा से भर देता है।साइकिल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह समाज में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करती। इसके लिए न तो महंगे पेट्रोल-डीजल की जरूरत होती है और न ही किसी भारी-भरकम मेंटेनेंस या सर्विसिंग के खर्च की। यह आत्मनिर्भरता और बचत का सबसे पहला और सच्चा पाठ पढ़ाती है।
-अशोक पांडे
हरियाणे की वही जिद्दी लडक़ी जो पेरिस ओलिम्पिक्स के फाइनल में पहुँचने वाली पहिला हिन्दुस्तानी पहलवान बनी थी। इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में अमूमन फिसड्डी रहने वाले हमारे देश के लिए यह गौरव का विषय था। सारा देश फाइनल के इंतज़ार में था जब मुकाबले से ठीक पहले उसका वजऩ सौ ग्राम ज़्यादा पाया गया और वह डिसक्वालीफाई हो गई थी।
मुझे उम्मीद है इस त्रासदी की सभी को याद होगी। यह भी याद होगा जब इस घटना को एक साजि़श बताते हुए रोती हुई विनेश ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी। वह भारत लौटी तो एयरपोर्ट से घर तक आम जन ने उसका जैसा स्वागत किया वह राष्ट्राध्यक्षों तक में डाह पैदा कर सकता था। हम सब ने उसे अपनी बहन-बेटी माना और उसके रोने में साथ दिया।
फिर एक बदसूरत कहानी के टुकड़े एक-एक कर सामने आने लगे- महिला पहलवानों के साथ होने वाला सेक्सुअल अपमान, प्रशासकों द्वारा किया जाने वाला घनघोर पक्षपात और शर्मनाक बयानबाजी। देश ने देखा कि भारतीय कुश्ती के प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर ऐसे लोग काबिज थे जिनके आपराधिक रेकॉर्ड्स थे और जो खिलाफत में उठने वाली हर आवाज़ को खामोश कर देना जानते थे।
विनेश ने आगे आकर सारे खुलासे किए, लू और बारिश के बीच भूख हड़ताल पर बैठी, और वह सब किया जो कोई भी गैरतमंद इंसान करता। समूचे तंत्र ने नंगे होकर उस छोटी-सी हिम्मती स्त्री को सबक सिखाने के लिए कमर कस ली और जहाँ-जहाँ संभव था उसे अपमानित और बदनाम करने में कोई कमी न छोड़ी।
संन्यास की घोषणा के बाद विनेश ने विधायक का चुनाव जीता और एक बच्चे की माँ बनी। पिछले साल के अंत में उन्हें अहसास हुआ कि कुश्ती से नाता जोडऩे का एक और जतन किया जाना चाहिए। उसने संन्यास वापस ले लिया और घोषणा की कि उनका अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजेलिस ओलिम्पिक्स में मैडल जीतना है।
पिछले महीने विनेश यूपी के उसी गोंडा में एशियन गेम्स के ट्रायल से पहले के मुकाबलों में भाग लेने पहुँची जो भारतीय कुश्ती के माफिया हिस्ट्रीशीटर मुखिया का ठिकाना है।
सारा सिस्टम एकजुट हो गया कि यह हिम्मती लडक़ी खेल ही न सके। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा जिसने विनेश के हक़ में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विनेश देश का गौरव हैं।
आप यकीन करेंगे इस मामले में जब भारतीय कुश्ती संघ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने अपनी अर्जी में विनेश के पेरिस में हुए डिसक्वालीफिकेशन को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया। कोर्ट ने इस बात पर भी संघ को लताड़ा और विनेश के पक्ष में फैसला दिया।
-राहुल सिंह
पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के पेज पर 30 अप्रैल 2026 को शुभम पांडे के अंग्रेजी समाचार का आशय है कि- 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई। यही समाचार ‘अमर उजाला‘ के पेज पर ललित कुमार सिंह ने 01 मई 2026 को लिखा कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा।
इसी दौरान मई पहले-दूसरे सप्ताह में संग्रहालय के पुरावशेषों के मूल दस्तावेज ‘अवाप्ति पंजियों‘ का दीमक के कारण नष्ट हो जाने की जानकारी भी आई। ऐसी स्थिति में संग्रहालय के पुरावशेषों के मिलान के लिए अवाप्ति पंजी की अन्य प्रति, पुराविदों द्वारा इस संग्रहालय के पुरावशेषों संबंधी शोधपत्र, संग्रहालय के पूर्व प्रकाशनों, लेख, समाचार तथा अन्य संबंधित कार्यालयीन अभिलेख सहायक हो सकते हैं। उक्त अवलोकितेश्वर प्रतिमा, जो रायपुर से चुराई गई बताई जा रही है, के संबंध में जानकारी कि वह कब चोरी हुई थी? चोरी की रिपोर्ट लिखाई गई थी? खोज-बीन के क्या प्रयास हुए थे आदि की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है। मगर एक स्रोत जिसका हवाला नीचे दिया जा रहा है, सिरपुर की ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ का उल्लेख तथा चित्र उपलब्ध हुआ है, यदि यह वही प्रतिमा है तो इसका अवाप्ति पंजी क्रमांक-17, दर्शाया गया है।
महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के पुरावशेषों संबंधी आधारभूत काम यहां सहायक संग्रहाध्यक्ष रहे बालचन्द्र जैन जी ने किया है। उन्होंने 1960 में संग्रहालय के पुरातत्व उपविभाग में संग्रहीत वस्तुओं का सूचीपत्र प्रकाशित कराया था, जिसका भाग 3, धातु-प्रतिमाएं हैं।
पुस्तिका में दस चित्र फलक भी प्रकाशित हैं।
- मृदुलिका झा
सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं।
ऐसा दावा किया जा रहा था कि इस सिस्टम को परीक्षा में जांच को सटीक और तेज़ बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन यही अब सवालों के घेरे में आ गया है।
12वीं कक्षा के बहुत से स्टूडेंट धुंधली आंसर शीट, पोर्टल क्रैश और यहां तक कि आंसर शीट्स बदलने की शिकायत कर रहे हैं।
मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है।
सीबीएसई के 26 मई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक परीक्षा में शामिल 17 लाख 68 हजार 968 छात्रों में से 4 लाख 4 हजार 319 छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया, जो कुल का करीब 23 फीसदी है।
बीबीसी ने यह समझने की कोशिश की कि स्टूडेंट्स किस-किस तरह की समस्याएं झेल रहे हैं।
विद्यार्थी, वकील और सीबीएसई से जुड़े एक टीचर से बातचीत में 5 सवाल सामने आए, जिनके जवाब लाखों स्टूडेंट्स समेत अभिभावक चाहते हैं।
क्या है पूरा मामला
13 मई को सीबीएसई के 12वीं कक्षा के नतीजे आए। पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 3 फीसदी कम स्टूडेंट पास हुए।
रिजल्ट जारी होते ही सीबीएसई के नए मूल्यांकन सिस्टम ओएसएम (ऑन स्क्रीन मार्किंग) पर सवाल उठने लगे, जिससे डिजि़टल तरीके से मूल्यांकनकर्ताओं ने आंसर कॉपी जांची थीं।
पहले का तरीक़ा यह था कि परीक्षा के बाद छात्रों की आंसर कॉपियां बंडल बनाकर टीचरों के पास भेजी जाती थीं। टीचर उन्हें हाथ में लेकर लाल पेन से जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे।
अब सीबीएसई ने नया तरीक़ा अपनाया है। पहले सभी कॉपियां स्कैन होती हैं यानी उनकी डिजि़टल फ़ोटो खींची जाती है। फिर यह फ़ोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड हो जाती है।
टीचर अब असली कॉपी की जगह कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर वही कॉपी देखकर नंबर देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे हम फ़ोन पर किसी डॉक्युमेंट की पीडीएफ़ पढ़ते हैं।
विवाद बढऩे पर 15 मई को सीबीएसई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस नए ओएसएम सिस्टम का बचाव किया था।
साथ ही बताया था कि उसने बड़े स्तर पर इस सिस्टम के लिए तैयारी की थी और जहां ज़रूरत लगी, कॉपियों की रीस्कैनिंग और मैनुअल चेकिंग भी कराई थी।
सीबीएसई का कहना था कि उसने 100 टीचरों से कॉपी चेक कराकर ड्राईरन भी कराया था।
बोर्ड के मुताबिक़, सभी ख़ामियां ठीक कराने के बाद ही उसने ओएसएम प्रणाली से कॉपी चेक कराई।
लेकिन इसके आगे के घटनाक्रम लगातार विवाद बढ़ाते चले गए। इसी बीच एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की ग़लत आंसर शीट भेजी है।
मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें दूसरे देश का बताकर ट्रोल किया गया। सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को हल कर दिया, लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम पर लगातार सवाल उठने लगे।
इस पर 24 मई को सीबीएसई ने तकनीकी ख़ामियों की बात स्वीकारी और किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही।
फि़लहाल स्थिति ये है कि परीक्षा में बैठे लगभग 18 लाख विद्यार्थियों में से 4 लाख से कुछ ज़्यादा ने आंसर शीट की स्कैन्ड कॉपी की मांग की है। ध्यान रहे कि पुराने बंदोबस्त में मैनुअल चेकिंग होती थी।
1. नए सिस्टम में कॉपी जांचने की ट्रेनिंग क्या पर्याप्त थी?
सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज़्यादा तेज़ और सटीक हो सकेगी। साथ ही मैनुअल ग़लतियां कम से कम रहेंगी, लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं।
नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध एक स्कूल की शिक्षिका कहती हैं, ‘पहले टीचर ऑफ़लाइन में भी गड़बडिय़ां करते थे। कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को ग़लत मार्क कर दिया जाता था। इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन का कांसेप्ट लाया गया।’
वे कहती हैं, ‘एग्जाम ऑफ़लाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है। इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन बोर्ड ने मान लिया कि टीचर तकनीक समझते ही होंगे। काफी सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया।’
वहीं एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षाविद डॉ। एसके दत्ता ने कहा कि कुछ शिक्षक ऑनलाइन तकनीक में माहिर हैं तो कुछ को अभी और प्रशिक्षण की जरूरत है और यह सच्चाई है।
सीबीएसई को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि फि़लहाल ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों विकल्प एक साथ कऱीब एक साल तक चलाए जाएं और छात्रों को चुनने की आज़ादी दी जाए।
उनके अनुसार, जब तक शिक्षकों में इस तकनीक को लेकर पूरी परिपक्वता न आ जाए, तब तक पूरी तरह ऑनलाइन सिस्टम पर न जाएं।
हालांकि इस मामले में सीबीएसई बता चुका है कि आंसर शीट जांचकर्ताओं को प्रक्रिया समझने में मदद करने के लिए मॉक इवेलुएशन करने का मौक़ा दिया गया था।
जैसे किसी बड़े मैच से पहले टीम प्रैक्टिस मैच खेलती है, वैसे ही मॉक इवेलुएशन में परीक्षकों को असली कॉपियां जांचने से पहले नकली या पुरानी आंसर शीट दी जाती हैं।
इसका मकसद यह होता है कि जांचकर्ता नए सिस्टम को समझ सकें और ग़लतियां असली रिजल्ट में न हों।
सीबीएसई का कहना है कि उसने फऱवरी में यही किया था, ताकि टीचर ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर हाथ आज़मा सकें।
2. क्या ओएसएम को लागू करने से पहले उसकी स्वतंत्र तकनीकी जांच हुई थी?
लेकिन इसके लिए हुए ऑडिट और टेस्टिंग जैसी बातों को लेकर पब्लिक डोमेन में सीमित जानकारी है। इसे लेकर नेता विपक्ष राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि कंपनी पहले अलग नाम से तेलंगाना में काम करती थी।
उनका आरोप है कि साल 2019 और 2023 में बोर्ड परीक्षा से जुड़े विवादों में इस कंपनी का नाम आ चुका है। एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया।
उन्होंने कहा, ‘राहुल गांधी कह रहे हैं, जिनकी कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों ने उसी कंपनी को काम पर लगाया। तो क्या राहुल गांधी दिल्ली के लिए अलग मानक रखेंगे और कर्नाटक-तेलंगाना के लिए अलग?’
‘इसके अलावा उसकी चयन प्रक्रिया पर भी कुछ सवाल उठे हैं। भारत सरकार के नीति-नियमों के तहत सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट पोर्टल के जरिए इसे लगाया गया था। कंपनी की क्षमता पर भी सवाल आ रहे हैं, इसलिए हमने एक समिति बनाई है जो उसकी तकनीक और प्रक्रिया का मूल्यांकन करेगी।’
उन्होंने कहा, ‘प्रक्रिया का उल्लंघन करने का किसी को भी अधिकार नहीं है और जो भी दोषी होगा उसे जवाबदेही लेनी होगी।’
मामला तूल पकडऩे पर सीबीएसई ने आधिकारिक बयान दिया कि एजेंसी को अनुबंध देने के दौरान सभी नियमों का पालन किया गया। बयान के साथ ही बोर्ड ने टेंडर प्रोसेस का डेटा भी सार्वजनिक किया।
3.क्या स्टूडेंट्स का भरोसा अब रिजल्ट की बजाए वेरिफिक़ेशन पर है?
नीट से लेकर कई परीक्षाओं में पेपर लीक और तरह-तरह की गड़बडिय़ों के आरोपों ने क्या अभिभावकों समेत विद्यार्थियों का भरोसा कमजोर किया है?
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस मुद्दे पर वेदांत श्रीवास्तव के बड़े भाई सिद्धांत श्रीवास्तव से संपर्क किया। वे आंसर शीट की गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर वायरल हो गए थे।
सिद्धांत कहते हैं, ‘नंबर कम होने पर हमने भाई की स्कैन कॉपी मंगाई, जो धुंधली दिख रही थी। गौर से देखने पर समझ आया कि हैंडराइटिंग वेदांत की है ही नहीं।’
‘तब हमने सोशल मीडिया का सहारा लिया था। तब से हमारे पास बहुत से बच्चों के मेल आ रहे हैं कि उन्हें भी ऐसा शक है कि उनके मार्क्स कम हुए हैं या पेपर की अदला-बदली हुई है।’
सिद्धांत कहते हैं, ‘ये समय बहुत क्रूशियल है। इस समय स्टूडेंट कॉलेज में एडमिशन की तैयारी या किसी दूसरी परीक्षा में लगे होते हैं। ऐसे में उन्हें यह डर है कि उनके मार्क्स सही मिले भी हैं या नहीं। वे लगातार स्कैन कॉपी और री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन कर रहे हैं।’
बोर्ड से चार लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स ने अपनी स्कैन आंसर कॉपी की मांग की है, जिसे नए सिस्टम से जोड़ा जा रहा है।
बीबीसी से बातचीत में दिल्ली में रहने वाली 12वीं की छात्रा धृति अग्रवाल कहती हैं, ‘11वीं में मैंने इकॉनॉमिक्स में पूरे स्कूल में टॉप किया था। प्री बोर्ड में भी बहुत हाई स्कोर किया था, लेकिन बोर्ड में कम नंबर मिले।’
उन्होंने कहा, ‘मैंने स्कैन कॉपी मांगी तो पता लगा कि मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन के अलावा हर सही सवाल पर आधा-आधा नंबर काटा गया है। इससे बड़ा फर्क आ रहा है। ये कट-ऑफ़ में काफ़ी मायने रखेगा।’
वे कहती हैं कि अगर अब मुझे ये नंबर चाहिए तो हर सवाल के लिए 25 रुपए सबमिट करने होंगे।
बता दें कि सीबीएसई ने हर सवाल के उत्तर के दोबारा मूल्यांकन के लिए चार्ज की जाने वाली फ़ीस को 100 रुपए से घटाकर 25 रुपये कर दिया है।
4. क्या और ज़्यादा कॉपियां मैनुअल चेक करानी चाहिए थीं?
सीबीएसई की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया था कि उसने रिजल्ट जारी करने से पहले करीब 13 हज़ार कॉपियों की मैनुअल चेकिंग करायी थी, क्योंकि स्कैनिंग और री-स्कैनिंग के दौरान ये धुंधली पाई गई थीं और इन्हें डिजि़टली जांचना पर्याप्त नहीं था।
चूंकि सीबीएसई की ओर से आवेदक विद्यार्थियों को जो स्कैन आंसर कॉपियां मिल रही हैं, उनमें भी बड़ी तादाद पर स्कैनिंग या ब्लर दिखने की समस्या देखने को मिल रही है।
ऐसे में क्या और अधिक कॉपियों की मैनुअल जांच नहीं की जानी चाहिए थी?
बीबीसी से बात करने वाले स्टूडेंट्स ने चिंता ज़ाहिर की है कि स्कैन की गई आंसर शीट के कई पन्ने ब्लर मिल रहे हैं। ऐसे में वे किस तरह इनपर लिखे जवाबों के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर पाएंगे?
साथ ही, कई विद्यार्थियों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दोबारा कॉपी की चेकिंग भी ओएसएम से ही होनी है, कहीं दोबारा वे उसी समस्या का सामना न करें जो पहले थी।
इन स्टूडेंट्स का कहना है कि नए सिस्टम के कारण 12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे छात्र एक या दो नंबर से कट-ऑफ़ से चूक सकते हैं।
यानी मामूली फर्क़ भी उनके भविष्य पर असर डाल सकता है। यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो नया असेसमेंट लागू ही क्यों हुआ?
5. विवाद पर बोलने में क्या शिक्षा मंत्रालय ने देर कर दी?
सीबीएसई की निगरानी करने वाले शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री ने 13 मई को रिजल्ट आने के बाद काफ़ी समय तक ओएसएम विवाद पर चुप्पी साधे रखी।
यह मंत्रालय इस विवाद के शुरू होने से पहले नीट परीक्षा में लीक के दावों से घिरा हुआ था। हालांकि 28 मई को सीबीएसई के साथ एक अहम बैठक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस पर बयान देकर ओएसएम गड़बडिय़ों पर जिम्मेदारी ली है।
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार था जब सीबीएसई ओएसएम का उपयोग कर रहा था। यह छात्र-केंद्रित और वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त प्रणाली है।’
उन्होंने यह भी कहा, ‘परिणामों में कुछ त्रुटियां सामने आई हैं, मैं इसकी जि़म्मेदारी लेता हूँ और आपको आश्वस्त करता हूँ कि इसका समाधान निकाला जाएगा। हम इस पर काम कर रहे हैं। हम किसी भी छात्र के सवाल को अनदेखा नहीं छोड़ेंगे।’
इससे पहले री-इवेलुएशन के लिए सीबीएसई के रिक्वेस्ट पोर्टल पर स्टूडेंट्स लॉगिन फ़ेल होने व पेमेंट गेटवे में गड़बड़ी की समस्याओं का सामना कर रहे थे।
तब शिक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके बताया था कि ख़ामियां सुधरवाने के लिए आईआईटी कानपुर व मद्रास के विशेषज्ञ टीम को सीबीएसई की मदद के लिए भेजा गया है।
हालांकि तब भी शिक्षा मंत्रालय ने अभिभावकों व विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कोई बयान नहीं दिया।
इसके बाद 27 मई को राहुल गांधी ने ओएसएम से जुड़ी अनियमितता का मामला उठाया तो 28 मई को शिक्षा मंत्री ने उनके दावे पर प्रतिक्रिया दी।
साथ ही उन्होंने कहा कि ओएसएम को लेकर सीबीएसई अपना पक्ष रख चुकी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल देश इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करें. अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने से पाकिस्तान को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसके कई बड़े परिणाम भी होंगे.
डॉयचे वैले पर शामिल शम्स की रिपोर्ट –
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर हस्ताक्षर करने चाहिए। ट्रंप ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों को भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना चाहिए। इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।
सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, ‘अमेरिका ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए जो मेहनत की है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा होना चाहिए।’ उन्होंने जिन देशों का नाम लिया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (जो पहले से सदस्य है) शामिल हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बाकी देशों को भी उनका अनुसरण करना है।
अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई समझौतों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इस्राएल और अरब देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना है। इसके तहत पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इस्राएल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ था।
फायदे और नुकसान पर विचार
कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन अब तक सरकार या सेना की ओर से इस पर कोई साफ और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस बीच, पाकिस्तान ईरान और अमेरिका-इस्राएल के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अप्रैल में उसने अमेरिका को 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर हमलों को रोकने के लिए राजी कर लिया था।
पाकिस्तान अब भी युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है। मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने देश के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपने 'पसंदीदा' लोगों में भी बताया। ट्रंप से बढ़ती नजदीकी की वजह से इस समय पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत बढ़ी है। लेकिन ईरान युद्ध में मध्यस्थता करने की तुलना में अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।
राजनीतिक विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के फायदे जरूर हैं। लेकिन राजनीतिक तौर पर इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को वॉशिंगटन और कुछ खाड़ी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिल जाएगा। साथ ही आर्थिक और तकनीकी अवसर भी खुल सकते हैं।’ हालांकि, रूमी ने चेतावनी दी कि इस कदम से पाकिस्तान को बड़े खतरे भी हो सकते हैं। वह कहते हैं, ‘इससे फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ सकती है, ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है और देश के अंदर अस्थिरता भी बढऩे की संभावना है।’
पाकिस्तान इस्राएल को आधिकारिक तौर पर नहीं मानता और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। हालांकि, पहले दोनों पक्षों के बीच कुछ अनौपचारिक संपर्कों की खबरें सामने आ चुकी हैं। रूमी बताते हैं, ‘जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा देने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करना रणनीतिक फैसला कम और दबाव में झुकने जैसा ज्यादा लगेगा। फिलहाल इसके नुकसान, फायदों से ज्यादा दिखाई देते हैं।’


