विचार/लेख
-सम्यक ललित
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एन.सी.आर. क्षेत्र से आवारा कुत्तों को पकड़ कर उन्हें शरणस्थलियों में बंद रखने का आदेश दिया है। कोर्ट के इस आदेश पर पशु-प्रेमियों और आवारा कुत्तों से त्रस्त लोगों के बीच एक तीखी बहस छिड़ गई है। एक ओर पशु-प्रेमी कह रहे हैं कि गलियों-सडक़ों पर रहने वाले ये कुत्ते हमारे सामान्य रहन-सहन का अभिन्न हिस्सा हैं, वहीं दूसरी ओर इन कुत्तों के काटने से त्रस्त लोग कुत्तों को इंसानी आबादी से दूर रखने के पक्षधर हैं। मैं यहाँ इस बहस का एक अन्य पक्ष सामने रखना चाहता हूँ। मैं यहाँ कुत्तों की समस्या को हल करने के किसी उपाय की बात नहीं कर रहा हूँ-मैं बस विकलांगजन के दृष्टिकोण से इस समस्या का एक पक्ष सामने रख रहा हूँ।
विकलांगजन के लिये आवारा कुत्ते एक बहुत बड़ी मुसीबत होते हैं। मेरी बैसाखियों को देखकर कुत्तों को लगता है कि मैं उन पर हमला कर सकता हूँ। इसके प्रतिक्रिया-स्वरूप कुत्तों ने मुझ पर अक्सर हमला किया है। अपना संतुलन खो देने के कारण मैं कई बार इनके बीच गिरा भी हूँ। बैसाखियों से (बेवजह) आतंकित कुत्तों ने कभी मुझे काटा तो नहीं क्योंकि बैसाखियों के कारण वे नज़दीक आने से डरते हैं-लेकिन स्कूल के दिनों में इन्होनें मेरे मन में दहशत भर दी। कई कुत्ते मिल कर जब आपको गिरा लें और आप भाग भी न पायें तो कैसी दहशत आपके मन में होगी इसका आप अनुमान लगा सकते हैं।
विकलांगजन अक्सर किसी सहायक उपकरण का प्रयोग करते हुए बाहर निकलते हैं। बैसाखी, व्हीलचेयर, सफेद छड़ी, लाठी जैसी चीजें कुत्तों को खतरनाक लगती हैं। किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिये कुत्तों का हमला कैसा हो सकता है इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। कोई व्यक्ति जो सुन नहीं सकता उस पर अचानक कुत्तों का हमला -जऱा सोचिये।
एक समय कुत्तों के कारण मैंने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था- लेकिन स्कूल जाना मेरे लिये बेहद जरूरी था इसलिये मैं अधिक समय तक रुक नहीं पाया और मैंने उसी दहशत के बीच स्कूल-कॉलेज आना-जाना जारी रखा-प्रश्न यह है कि क्या विकलांगजन का कुत्तों की दहशत में रहना स्वीकार्य हो सकता है? आवारा कुत्तों के हमले में अनेक बच्चों की जान गई है, अनेक लोगों की मौत रेबिज के कारण हो चुकी है। क्या यह इन घटनाओं को सामान्य जीवन का हिस्सा माना जा सकता है?
-रजनीश कुमार
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 13 अगस्त को कहा था कि राष्ट्रपति पुतिन और ट्रंप के बीच अलास्का में बातचीत नाकाम रही तो भारत पर 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ और बढ़ सकता है।
इस ख़बर को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए जियोपॉलिटिक्स और अर्थशास्त्र पर गहरी नजर रखने वाले फ्रांस के अरनॉड बरट्रैंड ने लिखा, ‘यह स्पष्ट रूप से भारत की मल्टी-अलाइनमेंट डिप्लोमैटिक रणनीति की नाकामी है। इस रणनीति से भारत को सबके लिए ज़रूरी बनना था लेकिन सबके लिए गैर-जरूरी बन गया।’
‘दूसरे शब्दों में कहें तो भारत ने ख़ुद को ऐसा बना लिया है कि जिसे लोग बिना किसी जोखिम के आसानी से चोट दे रहे हैं। चीन से पंगा लिए बिना जब ट्रंप को प्रतिबंधों के ज़रिए कड़ा संदेश देना होता है तो वह भारत को धमकाते हैं क्योंकि भारत इतना बड़ा है कि थोड़ी अहमियत रखता है लेकिन इतना ताकतवर नहीं है कि प्रभावी पलटवार कर सके।’
अरनॉड बरट्रैंड ने लिखा है, ‘जब आप हर किसी के दोस्त बनने की कोशिश करते हैं तो आप हर किसी के लिए प्रेशर वॉल्व बन जाते हैं। खास करके तब जब आप अपना।ख मनवाने की क्षमता नहीं रखते हैं।’
मल्टी-अलाइनमेंट का मतलब है कि भारत सभी गुटों के साथ रहेगा। इसे नेहरू के नॉन अलाइनमेंट यानी गुटनिरेपेक्ष से अलग माना जाता है लेकिन कई लोग मानते हैं कि बस शब्द का फर्क है क्योंकि जब आप सबके साथ होने का दावा करते हैं तो किसी के साथ नहीं होते हैं।
मल्टी-अलाइनमेंट की नीति क्या नाकाम हो रही है?
लेकिन अरनॉड की भाषा छह दिन बाद भारत को लेकर बदली दिखी। 19 अगस्त को पीएम मोदी ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की तस्वीर पोस्ट की थी। इसी पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए अरनॉड ने लिखा है, ‘भारत के बारे में आप चाहे जो कुछ भी कह सकते हैं लेकिन मोदी में वो राजनीतिक साहस है, जो यूरोप में नहीं है। आप कल्पना कीजिए कि अगर यूरोप ने यही काम रूस के साथ किया होता तो ट्रंप को इतना मौक़ा नहीं मिलता। यूरोप को ट्रंप की मध्यस्थता की ज़रूरत नहीं पड़ती।’
‘मैं तो इस बारे में बात भी नहीं कर रहा हूं कि कैसे ट्रंप ने यूरोप के नेताओं से स्कूली बच्चों की तरह व्यवहार किया और आर्थिक नुक़सान पहुँचाया। हालात ये हैं कि यूरोप को हर तरह से भुगतना पड़ रहा है। एक तो अमेरिका के पिछलग्गू के रूप में अपमान हो रहा है और ट्रंप इस स्थिति का आर्थिक दोहन भी कर रहे हैं। यूरोप को छद्म युद्ध की क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है और अपने पड़ोस से बैर भी मोल लेना पड़ रहा है। वहीं ट्रंप रूस से संबंध सुधार रहे हैं।’
अरनॉड ने लिखा है, ‘चीन को लेकर भारतीयों के मन में जिस तरह की शत्रुता का भाव है, वैसा यूरोप में रूस को लेकर नहीं है। यानी भारत के लिए ये सब करना यूरोप की तुलना में राजनीतिक रूप से ज़्यादा मुश्किल था। एशिया के नेता जिस तरह से रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर प्रतिबद्ध दिख रहे हैं, वैसी प्रतिबद्धता यूरोप में नहीं है।’
अरनॉड के इस बदले।ख़ पर अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ‘देश लंबी अवधि के लिए सोचते हैं और विश्लेषक छोटी अवधि के लिए।’
फ्रांस में भारत के राजदूत रहे जावेद अशरफ से पूछा कि वाकई मोदी सरकार की मल्टी-अलाइनमेंट की नीति नाकाम हो रही है?
जावेद अशरफ़ कहते हैं, ‘मैं ऐसा नहीं मानता हूँ। नरेंद्र मोदी एससीओ समिट में जा रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि अमेरिका के खिलाफ जा रहे हैं। ट्रंप के आने से पहले से ही चीन से संबंधों में सुधार की कोशिश शुरू हो गई थी। अमेरिका के साथ भी संबंध ट्रेड के स्तर पर खऱाब है, बाकी संबंध तो वैसे ही हैं।’
जावेद अशरफ कहते हैं, ‘भारत और अमेरिका में कोई समझौता न होने का कारण यह भी है कि भारत ने अपने हितों से समझौता नहीं किया। यानी भारत अमेरिका से बात रणनीतिक स्वायत्तता के साथ ही कर रहा है। चीन और रूस ज़्यादा शक्तिशाली हैं, इसलिए ये अमेरिका को जवाब उसी की भाषा में दे रहे हैं। अगर हमारे पास भी वो ताक़त होती तो हम भी जवाब देते। अंतर बस इतना ही है।’
थिंक टैंक ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान मानती हैं कि भले ट्रंप के ।ख से मोदी के चीन दौरे को जोड़ा जा सकता है लेकिन चीन से संबंध सुधाने की यह प्रक्रिया कोई अचानक नहीं शुरू हुई है।
तन्नी मदान ने ब्लूमबर्ग से कहा, ‘पिछले साल रूस के कजान में भी पीएम मोदी की मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई थी। भारत चीन के साथ रिश्ते सुधारने के लिए इसलिए कोशिश कर रहा है ताकि वह अपना रणनीतिक और आर्थिक दायरा बढ़ा सके और सीमा पर तनाव को ना बढऩे दे।’
‘लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन इन प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरेगा? हमने देखा है कि बातचीत की कई कोशिशें सीमा पर तनाव की वजह से अधूरी रह गईं। अगर चीन भारत को कमज़ोर देखता है तो सीमा पर तनाव की घटनाएं और देखने को मिल सकती हैं।’
पीएम मोदी का चीन दौरा
चीन के विदेश मंत्री वांग यी 18 और 19 अगस्त को भारत के दौरे पर थे। इसके बाद वह 21 अगस्त को पाकिस्तान पहुँचे हैं। भारत के बाद वांग यी के पाकिस्तान दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
शंघाई के फ़ुदान यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया से चीन के संबंधों के एक्सपर्ट लिन मिनवांग ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, ‘अगर भारत चीन से संबंधों को सुधारना चाहता है तो चीन इसका स्वागत करेगा लेकिन भारत को कोई छूट नहीं मिलेगी। चीन अपने हितों से समझौता नहीं करेगा और न ही पाकिस्तान को समर्थन देना बंद करेगा।’
अमेरिका ने भारत के खिलाफ 50 फीसदी टैरिफ लगाया है। अगर 27 अगस्त से भारत के खिलाफ ये 50 फीसदी टैरिफ लागू हो जाता है तो अमेरिका से व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा।
पिछले चार सालों से अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। 2024-25 में भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 131.84 अरब डॉलर का था।
अगर अमेरिका के साथ इतना बड़ा व्यापार बाधित होता है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पडऩा लाजिमी है। ऐसे में भारत के ऊपर दबाव है कि वह या तो अमेरिका के साथ संबंध सुधारे या फिर नए बाजार की तलाश करे।
ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ‘भारत अगर डिप्लोमैसी के बदले अमेरिका के सामने झुकने से इनकार करना चुनता है तो उसे अपना सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर और दुनिया का सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट खोना पड़ सकता है। चीन के साथ भाईचारा बढ़ाना या देश में आर्थिक सुधार जैसे क़दम अच्छे हैं लेकिन इससे अमेरिका की जगह की भरपाई नहीं हो पाएगी।’
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और चीन दूसरे पायदान पर है। भारत भी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, ऐसे में अमेरिका और चीन से खऱाब संबंध रखकर अपनी मुश्किलें और नहीं बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह सच्चाई है कि दोनों देशों से संबंधों में गर्मजोशी नहीं है। ऐसा तब है, जब अमेरिका और चीन दोनों ही भारत के शीर्ष के कारोबारी साझेदार हैं। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। 2024-25 में चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 127।7 अरब डॉलर का था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तियानजिन में 31 अगस्त से एक सितंबर तक आयोजित एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन) समिट में शामिल होने चीन जा रहे हैं। मोदी सात साल बाद चीन जा रहे हैं।
बिहार में एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया में कथित धांधली को लेकर विपक्ष चुनाव आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमलावर है. आखिर, चुनाव आयोग जैसी संस्था विवादों में कैसे फंस गई और क्या है चुनाव आयुक्तों को हटाए जाने का तरीका?
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र का लिखा-
बिहार में मतदाता सूची की गहन जांच यानी एसआईआर और वोट चोरी जैसे आरोपों के बीच विपक्ष अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. विपक्षी इंडिया गठबंधन की तरफ से ये बातें तब आईं जब रविवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और विपक्षी दलों पर एक बार फिर चुनाव आयोग के खिलाफ भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.
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रविवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के प्रवक्ता की तरह बात करने और व्यवहार करने के सीधे आरोप लगे. हालांकि ये आरोप विपक्ष पहले भी लगा रहा था लेकिन रविवार को हुई ज्ञानेश कुमार की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस ने विपक्ष का गुस्सा काफी भड़का दिया.
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के अगले ही दिन विपक्षी दलों की बैठक हुई जिसमें इस मुद्दे पर चर्चा की गई. बैठक के बाद इंडिया गठबंधन के कई सांसदों ने इस बात के संकेत दिए कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष संसद में महाभियोग का प्रस्ताव भी ला सकता है.
शिवसेना (यूबीटी) के राज्य सभा सदस्य संजय राउत ने मीडिया को बताया कि बैठक में न सिर्फ इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा की गई बल्कि सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है.
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चुनाव आयोग पर आरोप
दरअसल, चुनाव आयोग पर तमाम आरोप पहले से लग रहे हैं, विपक्षी दलों ने सैकड़ों की संख्या में लिखित शिकायतें की हैं लेकिन चुनाव आयोग ने अब तक किसी का संज्ञान नहीं लिया और हर बार विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा. एसआईआर का मामला तो अब सुप्रीम कोर्ट में है जहां शुक्रवार को एक बार फिर सुनवाई होनी है. लेकिन इस सुनवाई से पहले ही चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के ‘वोट चोरी' के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया.
विपक्षी सांसदों के साथ हुई बैठक के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मीडिया को बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख की तरह नहीं बल्कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं. उनका कहना था, "प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीईसी ज्ञानेश कुमार ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य दलों के उठाए गए एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया. बल्कि सवाल उठाने के लिए विपक्ष का ही मजाक उड़ा रहे थे. यह सीईसी का तरीका नहीं है. यदि उन्हें राजनीति करनी हो तो किसी पार्टी में शामिल हो जाएं.”
केसी वेणुगोपाल का भी कहना था कि सीईसी के खिलाफ महाभियोग की तैयारियां चल रही हैं और विपक्ष के पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल है.
‘वोट चोरी' बना मुद्दा
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गत सात अगस्त को मतदाता सूची में खामियों को लेकर एक लंबा प्रेजेंटेशन दिया था. इसमें उन्होंने कर्नाटक की बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा के बारे में मतदाता सूची में धांधली और फिर इस धांधली के जरिए बीजेपी उम्मीदवार की जीत का दावा किया था. उन्होंने बताया था कि बेंगलुरु सेंट्रल संसदीय सीट के तहत आने वाली महादेवपुरा विधानसभा सीट में एक लाख से ज्यादा फर्जी मतदाता जोड़े गए. राहुल गांधी ने यह भी दावा किया कि लोकसभा चुनावों के साथ-साथ महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भी मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर धांधली की गई है.
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उस वक्त चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को भ्रम फैलाने वाला बताते हुए कहा था कि यदि राहुल गांधी अपने दावे को सही मानते हैं तो उन्हें यह शिकायत एफिडेविट के साथ देनी चाहिए. रविवार को अचानक हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी सीईसी ज्ञानेश कुमार ने यही बातें दोहराईं. उनका कहना था, "इन आरोपों की जांच बिना हलफनामा दाखिल किए नहीं हो सकती है. या तो राहुल गांधी हलफनामा दें या फिर देश से माफी मांगें. उन्हें 7 दिनों के अंदर हलफनामा देना होगा या पूरे देश से माफी मांगनी होगी. अन्यथा यह समझा जाएगा कि ये आरोप बेबुनियाद हैं.”
राहुल गांधी अभी भी अपने आरोपों पर कायम हैं और संसद में भी विपक्ष इन आरोपों और बिहार में हो रहे एसआईआर पर चर्चा की लगातार मांग कर रहा है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की इस भाषा और शैली पर विपक्ष कई तरह के सवाल उठा रहा है. यही नहीं, राहुल गांधी ने आरोप सात अगस्त को लगाए लेकिन चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस दस दिन बात हुई और वो भी अचानक. प्रेस कॉन्फ्रेंस का दिन भी रविवार को रखा गया.
चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह लंबे समय से चुनाव आयोग को कवर कर रहे हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "मैं 1987 से चुनाव आयोग कवर कर रहा हूं. मुझे याद नहीं है कि चुनाव आयोग ने रविवार को कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई होगी, वो भी अचानक. वो भी बिना किसी अर्जेंट मैटर के. दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त की भाषा और तरीके के अलावा प्रेस कॉन्फ्रेंस की टाइमिंग की वजह से भी उन पर सत्तारूढ़ पार्टी के साथ सांठ-गांठ के आरोप लग रहे हैं. उसी दिन बिहार में इंडिया गठबंधन की वोटर अधिकार यात्रा शुरू हो रही है और चुनाव आयोग उसी दिन उन आरोपों का जवाब देने के लिए छुट्टी के दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला रहा है, जो आरोप दस दिन पहले लगाए जा चुके हैं.”
यही नहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त की तरफ से बार-बार हलफनामा देकर शिकायत करने की जो बातें की जा रही हैं, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. सवाल न सिर्फ राजनीतिक बल्कि कानूनी पहलू से भी उठ रहे हैं. समाजवादी पार्टी ने तो अठारह हजार शपथ पत्रों का हवाला देकर चुनाव आयोग से पूछा कि इनका जवाब कहां है.
हलफनामा क्यों
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर कहते हैं कि इस मामले में हलफनामे का तो कोई औचित्य ही नहीं है. उनके मुताबिक, यह सब तो सवालों से पीछा छुड़ाने और जवाब देने से बचने का तरीका है, और कुछ नहीं.
डीडब्ल्यू से बातचीत में दुष्यंत पाराशर कहते हैं, "हलफनामा या एफिडेविट तब दिया जाता है जब मुकदमे में या किसी बात में शपथ देकर कहना होता है. यहां तो वो उन आंकड़ों को दे रहे हैं जो आंकड़े खुद चुनाव आयोग के हैं. हलफनामा तो साक्ष्य को प्रमाणित करने के लिए एक सपोर्टिंग दस्तावेज होता है कि जो मैं कह रहा हूं वो सत्य है और ये सारी बातें मैं रिकॉर्ड पर कह रहा हूं और नोटरी के सामने उसे नोटिफाई किया जाता है. इस मामले में हलफनामे की कोई जरूरत नहीं दिखती. हलफनामा एक तकनीकी पक्ष है. उससे चीजें बदलती नहीं हैं. डेटा अपने आप में साक्ष्य है. चुनाव आयोग की साइट से लिए गए आंकड़े हैं. बहुत ही हास्यास्पद सा है चुनाव आयोग का इस मामले में हलफनामा मांगना.”
दुष्यंत पाराशर का कहना है कि देश की इतनी बड़ी और अहम संवैधानिक संस्था पर इतने गंभीर आरोप लगे हैं, ऐसे में आयोग को अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए सारे आरोपों का जवाब देना चाहिए, न कि हलफनामा मांगने जैसी बातें. उनके मुताबिक, राहुल गांधी जो बात कह रहे हैं कि देश में इतने बड़े पैमाने पर लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर किया जा रहा है, तो ये देश का मामला है. इसमें एफिडेविट की कई जरूरत नहीं है.
अरविंद कुमार सिंह भी कहते हैं कि हलफनामा चुनाव आयोग में तब लगता है जब पार्टियों के सिंबल इत्यादि का मामला होता है. हर जगह हलफनामा नहीं लगता.
हेपेटाइटिस का संक्रमण हर बार घातक नहीं होता लेकिन कुछ तो लिवर को इतना नुकसान करते हैं कि ट्रांसप्लांट की नौबत आ जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि खानपान को नियमित रखने के साथ साफ-सफाई से लिवर सुरक्षित रखा जा सकता है.
डॉयचे वैले पर रामांशी मिश्रा का लिखा-
यूपी के सीतापुर जिले के सोनसरी गांव में जुलाई के आखिरी हफ्ते में एक साथ 96 लोगों में हेपेटाइटिस B और C संक्रमण सामने आया. स्वास्थ्य विभाग के सघन स्क्रीनिंग अभियान में 56 और नए संक्रमित लोग सामने आए. कुल 152 संक्रमितों का मिलना एक छोटे से गांव के लिए न केवल डराने वाला बल्कि बेहद चिंताजनक भी है.
इस संक्रमण के फैलने के पीछे का कारण जानने के लिए नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) की टीम ने ग्रामीणों से बातचीत कर संक्रमण का स्रोत जानने की कोशिश की. इसमें संक्रमण के संभावित कारणों में सैलून में बिना सैनिटाइज किए उपकरणों का इस्तेमाल प्रमुख तौर पर सामने आया.
लिवर में इन्फ्लेशन या इन्फेक्शन
लिवर हमारे शरीर का बहुत जरूरी अंग है. यह खून को साफ करता है, खाना पचाने में मदद करता है और शरीर से टॉक्सिक पदार्थ बाहर निकालता है. हेपेटाइटिस एक प्रकार का यकृत (लिवर) संक्रमण है जो विभिन्न वायरसों के कारण होता है. लिवर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) और संक्रमण (इन्फेक्शन) तब होता है जब लिवर पर कोई बाहरी या अंदरूनी असर पड़ता है. जब लिवर को कोई नुकसान पहुंचता है, तो वह खुद को बचाने के लिए प्रतिक्रिया देता है और इसी प्रक्रिया में सूजन आ जाती है.
सूजन कई वजहों से हो सकती है- जैसे अगर किसी को हेपेटाइटिस वायरस लग जाए जैसे A, B, C, या कोई बहुत ज्यादा शराब पीता हो या लिवर में चर्बी जमा हो जाए तो इससे फैटी लिवर हो सकता है. कुछ दवाएं जैसे पेनिसिलिन, स्टेरॉयड्स या कोई अन्य केमिकल लिवर को नुकसान पहुंचाकर इन्फ्लेमेशन पैदा कर सकते हैं. संक्रमण तब होता है जब कोई वायरस, बैक्टीरिया या परजीवी लिवर में घुसकर उसे बीमार कर देता है. हेपेटाइटिस वायरस इसका सबसे आम कारण है.
क्या है हेपेटाइटिस का संक्रमण
लिवर संक्रमण के कई पहलुओं पर एम्स नई दिल्ली के डॉ. एन. आर. दास ने डीडब्ल्यू से बात की. डॉक्टर दास एम्स के गैस्ट्रोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर हैं. उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस को "साइलेंट किलर" यानी चुपचाप मारने वाली बीमारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह शुरुआती दौर में कोई खास लक्षण नहीं दिखाती, लेकिन अंदर ही अंदर लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाती रहती है.
डॉ. दास कहते हैं कि हेपेटाइटिस B और C वायरस बहुत छोटे घावों या कट्स से भी शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. सीतापुर के मामले में सैलून से संक्रमण फैलना संभव है. नाई एक ही रेज़र या कैंची का कई लोगों पर प्रयोग करते हैं, जिससे वायरस फैल सकता है. इसलिए लोगों को सलाह दी जाती है कि वे डिस्पोजेबल ब्लेड का इस्तेमाल करें और संभव हो तो अपनी शेविंग किट साथ लाएं.
हेपेटाइटिस B और C के अलावा भी इसके कई प्रकार होते हैं. इसमें हेपेटाइटिस A, B, C, D और E शामिल हैं. हेपेटाइटिस C को इन सबमें सबसे घातक माना जाता है क्योंकि यह अक्सर क्रॉनिक होता है. ये लंबे समय तक शरीर में रह सकता है, इसलिए इससे लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचता है.
क्यों होता है संक्रमण
हेपेटाइटिस का संक्रमण कई कारणों से हो सकता है और इसकी प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है कि कौन-सा प्रकार है. हर प्रकार का वायरस अलग तरीके से फैलता है और उसके जोखिम भी अलग होते हैं. हेपेटाइटिस A और E आमतौर पर दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलते हैं. गंदे हाथों से बने और खुले में बिकने वाले अस्वच्छ भोजन और बिना उबाले पानी का सेवन करने वाला व्यक्ति इससे संक्रमित हो सकता है अगर हेपेटाइटिस का वायरस इसमें मौजूद हो.
हेपेटाइटिस B, C और D मुख्य रूप से संक्रमित रक्त के संपर्क में आने से फैलते हैं. यदि किसी व्यक्ति को बिना जांचे हुए रक्त चढ़ाया जाए या दूषित सुई का उपयोग किया जाए, तो संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा, असुरक्षित टैटू या पियर्सिंग उपकरण, संक्रमित रेजर या ब्लेड का साझा उपयोग और ड्रग्स के लिए सुई साझा करने से भी संक्रमण हो सकता है. डॉ. दास बताते हैं, "हेपेटाइटिस C का संक्रमण अक्सर बिना किसी लक्षण के दिखे शरीर में कई वर्षों तक बना रहता है. ऐसे में व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि वह संक्रमित है. धीरे-धीरे यह संक्रमण लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस और सिरोसिस का कारण बनता है, जो आगे चलकर लिवर फेल होने या लिवर कैंसर में बदल सकता है.”
डॉ. दास कहते हैं कि कभी-कभी यौन संबंधों के माध्यम से भी हेपेटाइटिस B और C का संक्रमण हो सकता है. यदि किसी व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाए जाएं और वह व्यक्ति संक्रमित हो, तो वायरस स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकता है. इसके अलावा कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाना या सुरक्षा के उपाय न अपनाना इस संक्रमण को बढ़ावा देता है.
भारत में हेपेटाइटिस संक्रमण कितनी बड़ी समस्या
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ग्लोबल हेपेटाइटिस रिपोर्ट-2024 के अनुसार, भारत में लगभग 2.9 करोड़ लोग हेपेटाइटिस B और 55 लाख लोग हेपेटाइटिस C से संक्रमित हैं. इसका मतलब है कि कुल मिलाकर 3.4 करोड़ से अधिक भारतीय इन दो प्रकार के वायरल हेपेटाइटिस से ग्रस्त हैं. असल में ये संख्या वैश्विक मामलों का लगभग 11.6 फीसदी है, जो भारत को चीन के बाद दूसरा सबसे अधिक प्रभावित देश बनाती है.
हेपेटाइटिस सी वायरस की खोज करने वाले वैज्ञानिकों को इस साल का नोबेल पुरस्कार
साल 2022 में भारत में हेपेटाइटिस B और C के कारण 1.23 लाख लोगों की मौत हुई. यह आंकड़ा बताता है कि हेपेटाइटिस व्यापक होने के साथ जानलेवा भी है. यही कारण है कि इसे ‘साइलेंट किलर' कहा जाता है. हेपेटाइटिस के इलाज की स्थिति और भी चिंताजनक है. हेपेटाइटिस B के महज 2.4 फीसदी मामलों और हेपेटाइटिस C के 28 फीसदी मामलों का ही भारत में निदान हो पाता है.
अब तक कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं
इस संक्रमण की एक और गंभीर बात यह है कि हेपेटाइटिस C के लिए कोई वैक्सीन अब तक उपलब्ध नहीं है. जबकि हेपेटाइटिस A और B के लिए टीके मौजूद हैं. डॉ. दास बताते हैं कि हेपेटाइटिस C से बचाव के लिए केवल सावधानी ही एकमात्र उपाय है. हालांकि अब इसके इलाज के लिए कुछ प्रभावी दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन यदि संक्रमण का पता देर से चले तो नुकसान की भरपाई संभव नहीं है.
हेपेटाइटिस A और E आमतौर पर हल्के होते हैं और अपने आप ठीक हो जाते हैं. डॉ. एन. आर. दास बताते हैं कि हेपेटाइटिस D भी गंभीर हो सकता है, लेकिन यह केवल उन्हीं लोगों में गंभीर हो सकता है जो पहले से हेपेटाइटिस B से संक्रमित रहे हों. इसके अलावा गर्भवती महिलाओं में हेपेटाइटिस E जानलेवा साबित हो सकता है.
हेपेटाइटिस के संक्रमण में साफ-सफाई की भूमिका
लखनऊ के संजय गांधी स्नाकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) की सीनियर डायटीशियन रमा त्रिपाठी का कहना है कि गर्भवती महिलाओं के मामले में, पेटाइटिस B और C मां से बच्चे को प्रसव के दौरान या स्तनपान के समय संक्रमित कर सकते हैं. इसलिए यदि महिला संक्रमित हो, तो नवजात को जन्म के तुरंत बाद वैक्सीन देना आवश्यक होता है ताकि उसे संक्रमण से बचाया जा सके.
कई अन्य मामलों में व्यक्तिगत स्वच्छता की कमी भी संक्रमण का एक बड़ा कारण पाया गया है. रमा त्रिपाठी बताती हैं, "संक्रमित व्यक्ति के साथ तौलिया, ब्रश, रेजर आदि साझा करना, हाथ न धोना, या सार्वजनिक शौचालयों का अस्वच्छ उपयोग वायरस के फैलाव को बढ़ा सकता है. इसलिए साफ-सफाई और व्यक्तिगत हाइजीन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.”
हेपेटाइटिस के लक्षण
बदलती खानपान की आदतों के कारण ही लिवर का संक्रमण शरीर में घर करता है. रमा बताती हैं कि जब लिवर में वसा जमा हो जाता है तो वह कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर सूजन पैदा करता है. यह स्थिति मोटापे, डायबिटीज और अस्वस्थ जीवनशैली से जुड़ी होती है.
ऐसे संक्रमण में तेज बुखार, पेट में दर्द, कमजोरी और कभी-कभी पीलिया जैसे लक्षण दिखते हैं. अगर लिवर में सूजन या संक्रमण लंबे समय तक बना रहे, तो यह लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए अगर किसी को थकान, पेट दर्द, भूख न लगना, या आंखों में पीलापन दिखे, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. डॉ. दास कहते हैं कि कुछ लक्षण पहचान में मदद कर सकते हैं जैसे कि लगातार थकान और कमजोरी रहना, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द होना, त्वचा और आंखों का पीला पड़ना (पीलिया), भूख में कमी, उल्टी या मिचली आना या बुखार आना (खासकर इन्फेक्शन में).
-अभिनय गोयल
मुस्लिम लड़कियों की शादी की उम्र से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (19 अगस्त) को फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने 16 साल की मुस्लिम लडक़ी की शादी को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सही ठहराया है।
यह फैसला जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस महादेवन की खंडपीठ ने सुनाया। खंडपीठ ने शादी पर सवाल उठाने वाले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को फटकार भी लगाई है।
आयोग ने लडक़ी की उम्र का हवाला देते हुए शादी पर सवाल उठाया था और इसे पॉस्को अधिनियम (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) का उल्लंघन बताया था।
इस फैसले के बाद बाल विवाह कानून बनाम पर्सनल लॉ की बहस और तेज़ हो गई है। भारत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत लडक़ी की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल है।
समय-समय पर अदालतों, ख़ासकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई अहम फैसले दिए हैं, जिनका मुस्लिम महिलाओं के जीवन पर सीधा असर पड़ा है।
1. जावेद और आशियाना केस
साल 2022 में 26 साल के जावेद और 16 साल की मुस्लिम लडक़ी आशियाना के प्रेम विवाह को हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध माना था।
यह मामला पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में तब पहुंचा था जब दोनों ने अपनी सुरक्षा की मांग की थी। हाई कोर्ट ने शादी को वैध मानते हुए सुरक्षा भी प्रदान की थी।
लाइव लॉ के मुताबिक हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, ‘मुस्लिम लडक़ी का विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ से शासित होता है। सर दिनशॉ फरदुनजी मुल्ला की लिखी 'मोहम्मडन लॉ के सिद्धांत' किताब के अनुच्छेद 195 के अनुसार याचिकाकर्ता नंबर 2, सोलह साल से अधिक होने के कारण अपने पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह अनुबंध करने के लिए सक्षम है।’
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे जफ़रुल इस्लाम ख़ान का कहना है, ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी के लिए लडक़ी की कोई उम्र तय नहीं है। लड़कियों में जब प्यूबर्टी आती है, तब उसे शादी के लायक माना जाता है।’
कोर्ट का कहना था कि इससे बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) का उल्लंघन नहीं होता।
एनसीपीसीआर ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे कोर्ट ने खारिज़ कर दिया।
लाइव लॉ के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘एनसीपीसीआर के पास ऐसे आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं हैज्अगर दो नाबालिग बच्चों को हाई कोर्ट संरक्षण देता है तो एनसीपीसीआर ऐसे आदेश को कैसे चुनौती दे सकता है।’
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तारीफ करते हुए जफ़रुल इस्लाम कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला मुनासिब है। अंग्रेजों के बाद से ही हिंदुस्तान की हुकूमतों का स्टैंड इस्लामी पर्सनल लॉ में दखल नहीं देने का रहा है।’
वहीं दूसरी तरफ नेशनल काउंसिल ऑफ वूमन लीडर्स की नेशनल कन्वीनर और मानवाधिकार कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप का कहना है कि लड़कियों को सामाजिक रीति रिवाज से मुक्त करने की जरूरत है।
बीबीसी से बातचीत में वे कहती हैं, ‘प्यूबर्टी की उम्र में लडक़ी शारीरिक बदलावों से गुजरती है। ये मुश्किल समय होता है। ऐसे में वह खुद शादी जैसे फैसले नहीं ले पाती। उसके फैसले परिवार लेता है।’
‘लड़कियों को मौका मिलना चाहिए कि वे पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो पाएं और अपने फैसले ले पाएं।’
2. शायरा बानो केस
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत यानी 'तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
इस मामले की याचिकाकर्ता उत्तराखंड की रहने वालीं शायरा बानो थीं। उनकी शादी साल 2002 में हुई थी। करीब 15 साल बाद उनके पति ने उन्हें एक चि_ी भेजकर तीन तलाक दे दिया था।
पांच जजों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से फ़ैसला सुनाया था। कोर्ट का कहना था कि यह महिलाओं की समानता और गरिमा के खिलाफ है।
उस वक्त शायरा बानो के वकील बालाजी श्रीनिवासन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, ‘ये पहला मौका है जब एक मुस्लिम महिला ने अपने तलाक़ को इस आधार पर चुनौती दी कि इससे उनके मूल अधिकारों का हनन हुआ।’
इस फ़ैसले का कानूनी असर ये हुआ था कि साल 2019 में संसद ने मुस्लिम महिला अधिनियम पास किया। इसके तहत तीन तलाक को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध घोषित किया गया।
हालांकि कई धार्मिक संगठनों ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है।
जफरुल इस्लाम कहते हैं, ‘पर्सनल लॉ को मुस्लिम समाज पर छोड़ देना चाहिए। दीन के जो मसले हैं, उसमें किसी हुकूमत को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए।’
वहीं मंजुला प्रदीप का कहना है, ‘महिला होने के नाते मैं यह कभी स्वीकार नहीं कर सकती कि कोई तीन शब्द बोलकर किसी महिला को खुद से अलग कर दे। ये अन्याय है।’
वे कहती हैं, ‘तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद महिलाओं में हिम्मत बढ़ी है। वे क़ानून का सहारा ले सकती हैं।’
-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल
मैंने बिस्मिल्लाह खाँ के घर का पता पूछा तो मालूम पड़ा कि बगल से दाल मंडी को रास्ता जाता है, कुछ दूर पर उनका घर है॰ बनारस की गलियों में पूछते-ढूँढते पंद्रह मिनट में मैं सराय हरहा के एक पुराने से मकान के सामने जा पहुंचा जहाँ एक छोटी सी नामपट्टिका में अंग्रेजी में लिखा हुआ था- 'भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां'. घर के अन्दर से शहनाई वादन की मीठी आवाज़ आ रही थी॰ सिर झुकाकर मैंने घर के अंदर प्रवेश किया॰ एक वयोवृद्ध सज्जन क़ुरान पढ़ रहे थे, कुछ देर में उन्होंने पुस्तक बन्द की, मेरी ओर देखा और पूछा- 'फरमाइए जनाब॰'
'मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से आया हूँ.' मैंने अपना परिचय दिया.
'कैसे तकलीफ़ की आपने?'
'खां साहब तो रहे नहीं, उनके घर को सलाम करने आया हूँ.'
'वाह, क्या बात है, मैं उनका बेटा नय्यर हुसैन खां हूँ. आप आए, बहुत अच्छा लगा. मेरे अब्बाहुज़ूर गज़ब के फनकार थे और वादा निभाने वाले इंसान थे. एक क़िस्सा बताऊँ आपको?'
'जी, ज़रूर.'
'सायराबानो की माँ नसीमबानो को एक बार अब्बा ने वादा किया था कि सायरा की शादी में वे ज़रूर शहनाई बजाएँगे. बात आई-गई हो गई. कई साल बाद की बात है, एक दिन दिलीपकुमार अब्बा के पास आए और अपने घुटनों के बल उनके सामने बैठ गए. अब्बा ने पूछा- ''बोलो यूसुफ, कैसे आए?''
''सायरा के साथ मेरा निकाह होने वाला है, आपको शहनाई बजानी है॰'' दिलीपकुमार ने गुजारिश की॰
''वाह, कमाल है अल्लाह का, सायरा की माँ को किया गया वादा निभाने का मौका अपने-आप मेरे पास आ गया! मैं आऊँगा, ज़रूर आऊँगा.'' अब्बा ने कहा और दिलीप-सायरा की शादी के जश्न में उन्होंने खूब शहनाई बजाई'.
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के बेटे नय्यर हुसैन खां अब पचहत्तर साल के हैं॰ अकेले हो गए हैं, दिन भर उसी घर में अपना समय कुरान पढ़कर बिताते हैं॰ रोज़ाना शाम ५ बजे अब्बा की मज़ार पर जाते हैं, दो-ढाई घंटे चुपचाप वहीं बैठते हैं, उसी चुप्पी में शायद अब्बा से बातें करते हैं और 8 बजे रात को सीधे घर वापस आ जाते हैं. उनकी बहू जो देती है, चुपचाप खा लेते हैं और खुदा की याद करते हुए सुबह तीन बजे जागने के लिए सो जाते हैं. मैंने उनसे पूछा- 'शहनाई बजाने में जो महारत आपके अब्बा को हासिल थी, क्या आपने कोशिश की?'
'बहुत कोशिश की, उनकी सोहबत में बहुत रहा और देश-विदेश जाकर उनके साथ संगत भी की. शहनाई तो कोई भी बजा सकता है लेकिन अब्बा की शहनाई जैसा दर्द पैदा करना सबके बूते की बात नहीं. मैं उतना समय नहीं दे पाता था क्योंकि अब्बा बीस-पच्चीस साल बम्बई में रहे तो घर-गृहस्थी देखने की ज़िम्मेदारी मुझपर थी, हम लोग पाँच भाई थे. बम्बई से जब वे वापस आए तब भी घर में नहीं रहते थे, पास में बालाजी मंदिर है, वहीं रहते और संगीत साधना करते. सच्ची बात यह है कि वे बम्बई की फिल्मी दुनियाँ में शहनाई बजाया करते थे, उनकी वहाँ बहुत इज्ज़त थी लेकिन 'उस्ताद' वे तब बने जब उस दुनियाँ को छोड़कर बनारस वापस आए और सुरों की साधना की. बालाजी मंदिर में एक रात उनको लगा कि जैसे खुशबू का एक झोंका आया, कोई उनके सामने खड़ा हुआ दिखा और कहा- "जा, मज़ा कर." तुरन्त वह छाया गायब हो गई, अब्बा उसे खोजने कमरे के बाहर दौड़े, बहुत खोजे लेकिन रात के सन्नाटे के सिवाय वहाँ कुछ न था.' उन्होंने बताया.
'और किसी दूसरे भाई ने शहनाई में कोशिश नहीं की ?'
'की, तीसरे नंबर के भाई में वह कशिश थी, वो मक़बूल भी हुआ. उसका चेहरा बिलकुल अब्बा जैसा था लेकिन खुदा को कुछ और मंजूर था, सन 2009 में उसका इंतकाल हो गया.
'मैंने खाँ साहब को बिलासपुर में सन 1965 में सुना था, मुझे अच्छी तौर से याद है, उस दिन शहनाईवादन में वे बहुत देर बिना रुके लगातार बजाते रहे, बजाते ही रहे॰ अचानक उनकी नज़रें मुझसे मिली, हम दोनों की नज़रें एक दूसरे पर टिकी रह गई॰ मुझे ऐसा लगा जैसे उस 'हाल' में केवल हम दोनों रह गए हैं॰ उस घटना को मैं कभी नहीं भूल सकता॰ मुझे यह समझ नहीं आया कि बिना साँस तोड़े उतनी देर तक वे कैसे बजा लेते थे?' मैंने पूछा.
'अब्बा रोजाना साँस का अभ्यास करते थे, प्राणायाम॰ वे घड़ी देखकर ढाई मिनट के लिए अपनी साँस रोक लिया करते थे॰' उन्होंने बताया.
'एक बात मैंने गौर की, आपका घर खोजते समय मैंने जिससे भी घर का पता पूछा, सबने बड़ी मुहब्बत से मुझे रास्ता बताया॰'
-ध्रुव गुप्त
भारतीय संगीत के युगपुरूष, शहनाई के जादूगर , भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां देश के कुछ सबसे सम्मानित संगीत व्यक्तित्वों में एक हैं। पूरा देश उनका मुरीद है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वे ख़ुद अपने दौर की तीन गायिकाओं के मुरीद थे। उनमें पहली थी बनारस की रसूलन बाई। किशोरावस्था में वे काशी के बालाजी मंदिर में रियाज़ को जाया करते थे। रास्ते में रसूलन बाई का कोठा पड़ता था। जानते हुए भी कि कोठे के साथ एक बदनामी जुड़ी होती है, वे छिपकर वहां पहुंच जाते थे। एक कोने में खड़े होकर रसूलन को गाते हुए बड़े ध्यान से सुनते थे। रसूलन की खनकदार आवाज़ में ठुमरी, टप्पे, दादरा सुनकर भाव, खटका और मुर्की की बारीकियां उन्होंने सीखी थीं। यह चोरी पकड़ लेने के बाद एक दिन जब उनके बड़े भाई ने कहा कि ऐसी नापाक जगहों पर आने से अल्लाह नाराज़ होता है तो उनका जवाब था - दिल से निकली हुई आवाज़ में क्या नापाक होता होगा भला ?' उस्ताद जीवन भर रसूलन बाई को संम्मान के साथ याद करते रहे थे।
लता मंगेशकर उनकी दूसरी प्रिय गायिका थी। उन्हें तो वे देवी सरस्वती का साक्षात रूप ही कहते थे और मानते थे कि अगर देवी सरस्वती होंगी तो वे लता जैसी ही सुरीली होंगी। उन्होंने लता के गायन में त्रुटियां निकालने की कोशिशें की लेकिन कभी सफल नहीं हुए। वैसे तो लता जी के बहुत सारे गीत उन्हें पसंद थे लेकिन जो एक गीत वे अक्सर गुनगुनाया करते थे, वह था हमारे दिल से न जाना, धोखा न खाना, दुनिया बड़ी बेईमान।
भारत ने आधी बिजली स्वच्छ तरीके से बनाने की क्षमता विकसित कर ली है. लेकिन फिर भी देश कोयले से बनने वाली बिजली पर इतना भरोसा क्यों करता है.
डॉयचे वैले पर ओंकार सिंह जनौटी का लिखा-
भारत की कुल ऊर्जा क्षमता का अब आधा हिस्सा गैर जीवाश्म ईंधन से आ रहा है. भारत के नवीन ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसे "भारत की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा में एक मील का पत्थर" करार दिया है. जोशी के मुताबिक यह लक्ष्य "पांच साल पहले" हासिल किया गया है. भारत 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना चाहता है.
जलवायु विशेषज्ञ अवंतिका गोस्वामी के मुताबिक, 50 फीसदी का यह लक्ष्य हासिल करना एक बड़ी कामयाबी है, लेकिन इसे कुछ हद तक सीमित छलांग ही कहा जा सकता है. नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्न्मेंट (CSE) की गोस्वामी कहती हैं, "पूरी तस्वीर देंखे तो अक्षय ऊर्जा स्रोतों का वास्तविक उत्पादन अब भी काफी कम बना हुआ है."
इसका कारण बताते हुए वह कहती हैं कि अब भी करीब एक तिहाई बिजली, खूब प्रदूषण करने वाले कोयला बिजली संयंत्रों से आ रही है. यह चुनौती तब और गंभीर हो जाती है, जब हम कोयले पर भारत की निर्भरता को देखते हैं.
कोयला गंदा तो है लेकिन भरोसेमंद बना हुआ है
कोयले की खपत घटाने के बजाए, भारत ने पिछले साल कोयले से मिलने वाली बिजली का प्रोडक्शन पांच फीसदी बढ़ा दिया. भारत अब भी दुनिया में सबसे ज्यादा कोयला खपत करने वाले देशों में दूसरे नंबर पर है. कोयला मंत्रालय के मुताबिक, 2024 में भारत ने एक अरब टन कोयला खोदा. मंत्रालय के मुताबिक, "कोयला अब भी अहम बना हुआ है."अक्षय ऊर्जा का उत्पादन बढ़ने के साथ ही बिजली का स्टोरेज अब भी चुनौती है. देश के कोयला मंत्रालय का कहना है कि, "कोयला सेक्टर अब भी भारत की मिश्रित ऊर्जा में अहम भागीदार बना हुआ है, यह 74 फीसदी से ज्यादा देश को बिजली देता है और स्टील और सीमेंट जैसे अहम उद्योगों की नींव बना हुआ है."
इस निर्भरता की वजह से भारत, अमेरिका और चीन के बाद ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा बड़ा उत्सर्जक है.
हालांकि प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस उत्सर्जन देखें तो 1.4 अरब की आबादी वाला देश वैश्विक औसत का एक तिहाई उत्सर्जन ही करता है. सतत संपदा क्लामेट फाउंडेशन के प्रमुख और जलवायु कार्यकर्ता हरजीत सिंह कहते हैं, "भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन देखें तो भारत जो कोशिशें कर रहा है, वह बहुत अच्छी जा रही हैं."
देश ने 2030 तक इस उत्सर्जन को 45 फीसदी घटाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. हालांकि तब तक भारत की बिजली मांग भी दोगुनी होने का अनुमान है. अवंतिका गोवास्मी के मुताबिक, "उस मांग का कुछ हिस्सा अक्षय ऊर्जा से पूरा किया जा सकेगा."
स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन के बावजूद कहां फंसा है मामला
फिलहाल भारत 484.4 गीगावॉट बिजली, गैर जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर रहा है. इस उत्पादन में सबसे ज्यादा हिस्सा सौर ऊर्जा का है, (119 गीगावॉट). सौर ऊर्जा उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है. भारत फिलहाल, बड़े बड़े सौर और पवन ऊर्जा फार्म बनाने में जुटा है. रेगिस्तान में बन रहे ऐसे फार्मों का आकार सिंगापुर के क्षेत्रफल के बराबर है.
बांधों से मिलने वाली बिजली, पवनऊर्जा और परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम है. समाचार एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बिजली स्टोर करने की क्षमता 505 मेगावॉट ऑवर ही है. नवीन ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी के मुताबिक हर साल 25 से 30 गीगावॉट स्टोरेज सुविधा जोड़ी जा रही है. लेकिन वह यह भी कहते हैं कि, "स्टोरेज के बिना, या तो हम ऊर्जा बर्बाद करेंगे या फिर अक्षय ऊर्जा में गिरावट आते ही कोयले पर निर्भर हो जाएंगे."
बिजली स्टोरेज बढ़ाने के लिए बड़े बैटरी प्लांटों की जरूरत पड़ती है. ऐसी बैटरियां बनाने के लिए दुर्लभ खनिजों की जरूरत पड़ती है. फिलहाल भारत का पड़ोसी चीन रेयर अर्थ मेटल्स की 70 फीसदी सप्लाई नियंत्रित करता है. हरजीत सिंह के मुताबिक, इस मामले में भारत अब भी चीन पर निर्भर है.
डॉनल्ड ट्रंप, रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को और टाइट करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में अगर रूसी तेल के व्यापार पर कड़ा कदम उठाया जाता है, तो वैश्विक तेल बाजारों और चीन-भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर इसका कितना असर पड़ेगा?
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन का लिखा-
अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद भारत और चीन अब भी रूसी तेल कंपनियों के साथ कारोबार कर रहे हैं. इसे देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दोनों देशों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दे चुके हैं. सेकेंडरी प्रतिबंध का मतलब है, किसी ऐसे देश या कंपनी पर टैरिफ लगाना, जो प्रतिबंधित देश के साथ व्यापार में हो. भारत और चीन ने इस धमकी की कड़ी आलोचना की और साफ किया कि वे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे. चीन ने इसे अमेरिका की "जबरदस्ती और दबाव” करार दिया.
भारत ने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि भले ही यूरोपीय संघ ने युद्ध शुरू होने के बाद से रूस पर अपनी निर्भरता काफी कम की हो लेकिन अभी भी वह काफी हद तक रूसी ऊर्जा का आयात कर रहा है.
भारत ने इस ओर भी इशारा किया कि एक समय पर वॉशिंगटन ने खुद रूस से भारत के तेल आयात का समर्थन किया था ताकि वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखा जा सके. यह आयात, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद तेजी से बढ़ा. 2021 से 2024 के बीच भारत का रूसी तेल आयात लगभग 19 गुना बढ़कर 0.1 से 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया. वहीं, चीन का आयात भी 50 फीसदी बढ़कर 2.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया.
लिथुआनिया स्थित सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के ऊर्जा विश्लेषक, पेट्रस कटिनस ने डीडब्ल्यू को बताया कि रूस के दूसरे सबसे बड़े तेल खरीददार, भारत ने 2022 से 2024 के बीच अपने ऊर्जा खर्च में कम से कम 33 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत की. कटिनस के अनुसार, जब अमेरिका और यूरोप ने रूसी तेल और गैस पर अपनी निर्भरता घटाई, तो मॉस्को ने भारत को काफी सस्ती दरों पर तेल बेचा. सस्ते रेट पर रूसी कच्चे तेल की खरीद का फैसला भारत की पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप था, जिसके तहत वह अमेरिका, रूस और चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखता है और किसी एक को प्राथमिकता नहीं देता. इस पूरे दौर में भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्राथमिकता कोई देश नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और किफायती दरें हैं.
ट्रंप की नई पाबंदी धमकियों से तेल बाजार में हलचल
डॉनल्ड ट्रंप ने पहले ही भारतीय आयात पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाया हुआ है लेकिन इसके बाद भी नया आदेश जारी किया गया. जिसके तहत अब मौजूद 25 फीसदी के टैरिफ पर 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा. इस एलान के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई. भारतीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए शुल्क के कारण भारत की तेल बिलिंग लगभग 11 अरब डॉलर तक महंगी हो सकती है.
नई दिल्ली ने इस अतिरिक्त शुल्क को "अनुचित, अन्यायपूर्ण और अस्वीकार्य” करार दिया है. ट्रंप ने कहा कि ये टैरिफ 21 दिनों में लागू होंगे, ताकि भारत और रूस को अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत का पर्याप्त समय मिल सके.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका सेकेंडरी टैरिफ भी लगाता है, तो पहले से ही पश्चिमी पाबंदियों से जूझ रही रूसी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक और बड़ा झटका हो सकता है. रूस का बजट पहले से ही भारी दबाव में है. उसका रक्षा खर्च कुल जीडीपी के छह फीसदी से भी अधिक बढ़ चुका है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार रूस में महंगाई दर नौ फीसदी तक है लेकिन विश्लेषकों का अनुमान है कि वास्तविक महंगाई दर 15-20 फीसदी तक पहुंच चुकी है.
रूस के साथ तेल व्यापार घटा सकता है भारत
नई पाबंदियां वैश्विक ऊर्जा कीमतों और व्यापार के लिए घातक साबित हो सकती हैं. इसका हाल 2022 जैसा हो सकता है, जब तेल की कीमतें अचानक बढ़ गई थी और रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सस्ते दामों पर ऊर्जा सौदा करना शुरू कर दिया था.
नई दिल्ली स्थित ऊर्जा शोध संस्थान कप्लर की तेल विश्लेषक, सुमित रितोलिया ने डीडब्ल्यू से कहा, "अगर भारत ने 2022 में रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदा होता, तो तेल की कीमत कितनी बढ़ जाती, इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है-100 डॉलर, 120 डॉलर, या शायद 300 डॉलर प्रति बैरल तक भी कीमतें बढ़ सकती थी.” युद्ध से पहले के हफ्तों में कच्चे तेल की कीमत 85 से 92 डॉलर प्रति बैरल के बीच थी.
लेकिन अब ट्रंप के लगाए गए 25 फीसदी सेकेंडरी टैरिफ भारत को मजबूर कर सकते हैं कि वह रूस से अपने तेल व्यापार कम करे. ऐसे में अगर और प्रतिबंध लगाए गए, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है. पेट्रस कटिनस का कहना है कि सेकेंडरी प्रतिबंध माहौल को और बिगाड़ सकते हैं. इससे भारतीय कंपनियों की अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक पहुंच खतरे में पड़ सकती है और वैश्विक बाजारों से जुड़े बैंकों, रिफाइनरियों और शिपिंग कंपनियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.
तेजी से बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें
विश्लेषकों का मानना है कि अगर रूस का पांच मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल अचानक से वैश्विक बाजार से हटा दिया जाएगा, तो तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आ सकता है. जिससे प्रभावित देशों को तुरंत वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी. और हाल ही में ओपेक द्वारा की गई उत्पादन वृद्धि भी इतनी बड़ी मात्रा की भरपाई करने के लिए काफी नहीं हो पाएगी क्योंकि उत्पादन क्षमता सीमित है.
सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी एनालिसिस के सीनियर फेलो अलेक्जेंडर कोल्यान्दर ने ब्रिटिश अखबार, द इंडिपेंडेंट को बताया, "इस पांच मिलियन बैरल का विकल्प तुरंत ढूंढ पाना असंभव है, इसलिए तेल की कीमतों को बढ़ने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा.”
तेल विशेषज्ञ, सुमित रितोलिया ने डीडब्ल्यू से कहा कि अगर भारत को रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ती है, तो इसमें भारतीय कंपनियों को कम से कम एक साल का समय लग सकता है.
तेल की कीमते बढ़ने से बढ़ेगी महंगाई
अगर तेल महंगा होता है, तो इसका असर न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में महंगाई के रूप में पड़ेगा. अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेड) का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से अमेरिका में लगभग 0.2 प्रतिशत महंगाई बढ़ जाती है. भारतीय रिजर्व बैंक का भी यही अनुमान है. अगर मौजूदा कीमत 66 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110–120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो महंगाई में लगभग एक प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो सकती है. जिससे उपभोक्ताओं और कंपनियों की लागत तेजी से बढ़ेगी, खासकर ऊर्जा, परिवहन और खाद्य क्षेत्र में.
चीन बच निकलेगा, जबकि भारत भुगतेगा?
कटिनस का कहना है कि अमेरिका के साथ चीन का कुल व्यापार भारत की तुलना में चार गुना से भी अधिक है. ऐसे में संभव है कि नई अमेरिकी कार्रवाइयों से चीन को छूट मिल जाए. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच 580 अरब डॉलर से अधिक का व्यापारिक संबंध है, और अपनी विशाल आर्थिक ताकत के चलते चीन के पास वह मौका हो सकता है, लेकिन भारत के पास यह नहीं है.
इसके अलावा, चीन की "रेयर अर्थ मेटल्स” (दुर्लभ धातुओं) पर पकड़ है, जो लंबे समय से अमेरिका-चीन संबंधों में विवाद का विषय भी रहा है. बीजिंग इसे इस्तेमाल कर ट्रंप के दबाव को सीमित कर सकता है.
जबकि भारत के पास ऐसा कोई प्रभावशाली तरीका नहीं है. यही कारण है कि ट्रंप ने पिछले हफ्ते भारत पर दबाव और बढ़ा दिया और कहा कि रूस और भारत पर लगाई गई उनकी नई पाबंदियां दोनों देशों की "मरी हुई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ गिरा देंगी.”
-संजीव शुक्ला, आईपीएस
विगत दिनों एक मित्र का फोन आया। वे एक अर्धशासकीय प्रतिष्ठान में वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्होंने कहा- यार मेरा बेटा 17 साल का है, वो अपनी होंडा बाइक को मॉडिफाई करवाकर डबल साइलेंसर लगवा लिया है और शहर में हवाई जहाज़ की तरह बाइक उड़ाता है। ट्रैफिक पुलिस के अधिकारी को कहकर गाड़ी जब्त करवा दे और उसे थोड़ा डाँट दिलवा दें ताकि वो ठीक से बाइक चलाए । मैंने उनसे कहा कि एक तो उसके लाइसेंस बनाने की अभी उम्र नहीं हुई है तो उसे बाइक क्यों दी और दूसरी बात कि तुम क्यों नहीं डाँटते? उसने कहा यार उसके बहुत से दोस्तों के पास बाइक है इसलिए दिलवा दी और इकलौता बेटा है। हमारी सुनता नहीं, डाँट से नाराज होकर कहीं चला ना जाए। इस डर से मैं कुछ नहीं बोल रहा हूँ। तुम पुलिस वाले से ही मना करवा दो।
मैं सोच रहा हूँ कि समाज और परिवार की व्यवस्था एक ही पीढ़ी में कितनी बदल गई। माता-पिता अपने ही बच्चे को सही-ग़लत का भेद नहीं समझा पा रहे हैं, उनकी गलतियों पर उन्हें रोक-टोक नहीं पा रहे हैं। आज नाबालिग बच्चों के द्वारा किए जाने वाले अपराध अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहे हैं। इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है? मुझे लगता है कि इन सभी परिस्थितियों के लिए सिर्फ और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं। मुझे इसके कई कारण लगते हैं।
पहला कि बच्चे हमें देखकर ही सीखते हैं। हमारे संस्कार ही वो अपनाते हैं। हम सभी व्यक्तिगत जीवन में सफलता के लिए अपनाये जाने वाले रास्ते एवं साधन सही है या गलत इस पर ध्यान नहीं देते। अनेक अवसर पर हम वो कार्य करते हैं जो समाज में वर्जित हैं। बच्चे सब देखते हैं, ऑब्जर्व करते हैं, और फिर वे भी जीवन जीने का सरल और शॉर्टकट रास्ता अपनाते हैं और तब हम इन सबके लिए बच्चों को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि वास्तव में जिम्मेदार हम खुद होते हैं।
दूसरा मुझे लगता है हम अपने बच्चों को उतना समय और अटेन्शन नहीं देते जितना हमें हमारे माता-पिता ने दिया और समय नहीं देने के अपने गिल्ट को दूर करने के लिए उसे उम्र से पहले मोबाइल, आई पैड, बाइक इत्यादि वो सब कुछ दे देते हैं जिसके लिए वो इस समय तैयार नहीं होता। बच्चों को समय नहीं देने का एक बड़ा नुकसान यह भी होता है कि उसके बाल मन में जो जिज्ञासा होती है वे उसे भी हमसे साझा नहीं कर पाते और फिर उन सभी प्रश्नों के जवाब वे गूगल, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर ढूँढते हैं। सोशल मीडिया और सर्च इंजन से मिले जवाब को ही सही मानकर उनका अनुशरण करते हैं। हम जब बच्चों को समय देते हंै, उनकी जिज्ञासाओं का जवाब देते हैं तो हम उनमें संस्कार का निर्माण करते हैं जिसका विकल्प गूगल कभी नहीं हो सकता ।
तीसरा हमने ऐसी जीवन शैली अपना ली है जो हमें परिवार, रिश्तेदार, समाज से दूर कर देती है। सही अर्थों में हम सामाजिक नहीं रह जाते और इस जीवन शैली में पलने वाले हमारे बच्चों में भी एडजस्ट करने का गुण ही विकसित नहीं हो पाता है। याद करिए अपना बचपन, जब गर्मियों की छुट्टियों में मौसी, मामा, चाचा, बुआ आदि परिवार के साथ घर आते और हम सब एक कमरे में ही बिस्तर लगाकर साथ रह लेते थे। आज बच्चे को रूम शेयर करने को कहिए उसे दिक्कत होगी। सच तो यह है कि उस जीवन शैली में बिना किसी प्रयास के हम एडजस्ट करना अपने आप सीख जाते थे। हमने बच्चों को उससे दूर कर दिया। उनमें दूसरों के साथ एडजस्ट करने का गुण विकसित ही नहीं होने दिया और दोष बच्चे को देते है कि उन्हें एडजस्ट करना नहीं आता।
चौथा पिछली पीढ़ी में बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व और अधिकार माता-पिता, शिक्षक, अड़ोस-पड़ोस के वरिष्ठ लोगों आदि सभी के पास होता था। बच्चों की गलतियों पर सभी को रोकने-टोकने और छोटा-मोटा दंड देने का अधिकार होता था और सभी मिलकर उसे अनुशासन सिखाते थे किंतु अब हमने अन्यों के साथ-साथ स्वयं से भी वो अधिकार ले लिया। यही कारण है कि अपने बच्चे को भी अनुशासित करने के लिए हम तथाकथित पढ़े-लिखों को अब पुलिस की जरूरत पड़ रही है।
-शालिनी श्रीनेत
कहते हैं कुत्ते वफादार होते हैं। पर इधर जिस तरह की खबरें आ रही हैं, लोग अपने और अपनों के अनुभव शेयर कर रहे हैं, क्या किसी कारण इनकी वफादारी कम हुई है?
कोई कितना भी कहे कि काटता नहीं है या काटती नहीं, पर मैं सावधान ही रही।
मेरी जेठानी के घर में दो कुत्ते थे। उन्होंने कभी अपने को उसकी मम्मी और भइया को पापा नहीं कहलवाया, न मुझे चाची।
बस एक काम करती थीं- उन दोनों से अंग्रेजी में बोलती थीं, बाकी परिवार से हिंदी में।
मैं दोनों के लिए खाना बनाती थी, पूरे दिन ध्यान रखती थी क्योंकि जेठ-जेठानी ऑफिस चले जाते थे, पर डरती थी कहीं काट न लें। हालांकि बहुत प्यार करते थे। सुबह-सुबह मुझे जगाते थे, अपने अगले पैरों से बाल में खुजली करने लगते थे। मैं जल्दी से उठकर वहां से चली जाती थी। जरा सोचिए, जब टहलाने जाइए तो ये ऐसी-ऐसी चीजों पर मुंह मारते हैं कि घिन लगती है। और हम मनुष्य उन्हें भर दिन पुच्ची करते रहते हैं, अपने पेट पर सुला लेते हैं। कुछ समय न दिखें तो चिंता हो जाती है।
इतना समय हम अपने बच्चे को देंगे तो कुछ एक्स्ट्रा एक्टिविटी करा लेंगे।
बड़े-बुजुर्ग को देंगे तो उनकी बेहतर सेवा हो जाएगी और वो खुश रहेंगे, दुआएं देंगे।
मेरे पड़ोस में एक भाभी रहती हैं, उनकी शादीशुदा बेटी अपने कुत्ते को लेकर आती है। किसी-किसी बात पर कहती हैं कि जाओ, नानी से मांग लो या उनके पास चले जाओ।
भाभी एक मीटिंग में बताईं कि उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं कुत्ते की नानी कहलाना।
सच बताऊं तो मुझे भी किसी कुत्ते की आंटी, मौसी, नानी, बुआ या मम्मी नहीं बनना।
Dog lover की एक बहुत मजेदार बात होती है, कहते हैं काटेगा नहीं, बस दोस्ती कर रहा है। हे भगवान! पूरा शरीर चाटने लगते हैं। ये दोस्ती करना है तो नहीं करनी दोस्ती। मानव दोस्त बहुत हैं।
जब हम छोटे थे, तब कुत्ता किसी चीज में मुंह लगा दे या चाट ले तो वो चीज फेंक दी जाती थी। अब कुत्ता लोगों को चाटता है भाई।
कुत्ता प्रेम देखिए, अपने मांस नहीं खाते, पर उसके लिए तरह-तरह का मांस आता है, बनाया जाता है और खिलाया जाता है।
और मजेदार बात-कुत्ता भर दिन घर के सदस्यों को चाटता रहता है और बिना नहाए शाम को मंदिर में दिया जला दिया जाता है, भगवान का भोग लगा दिया जाता है।
गजब तो ये कि मामा के बेटी की शादी में नहीं जाएंगे, कुत्ते को कौन देखेगा?
मतलब, रिश्तों से बड़ा कुत्ते का रिश्ता है भाई।
पहले, अपने बड़े भइया के समय में, गोरखपुर में कई अफसरों के घर में कुत्ते थे, पर जाने पर जब हम गेट पर पहुंचते, तभी कुत्ता बांध दिया जाता था। किसी चाचा, चाची और मौसी-दीदी से परिचय नहीं कराया जाता था।
ये तो हुई पालतू कुत्तों की बात।
अरे हां, बताना तो भूल ही गई, किसी पालतू कुत्ते को ‘कुत्ता’ कह दीजिए तो उनके मालिक (मम्मी-पापा) नाराज हो जाते हैं।
-रजनीश कुमार
अमेरिका ने इसी महीने बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को ‘अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन’ के रूप में मान्यता दी तो इसका एक मतलब यह भी निकाला गया कि बलूचिस्तान में अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स के खनन के लिए सोच रहा है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ है। दोनों देशों में रेयर अर्थ मिनरल्स को निकालने पर भी बात हो रही है। रेयर अर्थ मिनरल्स 17 मैटेलिक तत्वों का समूह हैं, जो कई हाई-टेक उत्पादों के लिए अनिवार्य होते हैं।
रेयर अर्थ मिनरल्स के बिना स्मार्टफोन्स, इलेक्ट्रिक गाडिय़ां और विन्ड टर्बाइन्स बनाना संभव नहीं है।
रेयर अर्थ मिनरल्स पर अभी चीन का दबदबा है और चीन जब किसी देश से नाराज़ होता है तो इसकी आपूर्ति कम कर देता है या रोक देता है। भारत के मामले में भी चीन ऐसा कर चुका है।
सुहैल वड़ायच पाकिस्तान के उर्दू अख़बार जंग के सीनियर एडिटर हैं। इसी हफ़्ते ब्रसेल्स में वड़ायच की मुलाकात पाकिस्तान के सेना प्रमुख और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से हुई।
इस मुलाक़ात को लेकर वड़ायच ने जंग में 16 अगस्त को ‘फील्ड मार्शल के साथ पहली मुलाकात’ शीर्षक से एक कॉलम लिखा है। इस कॉलम में उन्होंने आसिम मुनीर से हुई बातों का भी जिक्र किया है।
वड़ायच के कॉलम के मुताबिक़, ‘आसिम मुनीर ने कहा कि पाकिस्तान के आर्थिक संकट को लेकर उनके पास एक मुकम्मल रोडमैप है। इस योजना के मुताबिक़ पाकिस्तान अगले पाँच से 10 वर्षों में दुनिया के विकसित देशों की लाइन में आ सकता है।’
वड़ायच लिखते हैं, ‘मुनीर ने कहा कि अगले साल से बलूचिस्तान के चगाई जिले के रेको डिक से हर साल दो अरब डॉलर का मुनाफा होगा और साल दर साल यह मुनाफ़ा बढ़ता जाएगा। आसिम मुनीर मानते हैं कि पाकिस्तान के पास रेयर अर्थ मिनरल्स का खज़़ाना है और इसके दम पर कर्जे को कम किया जा सकता है। पाकिस्तान जल्द ही सबसे संपन्न देशों की पंक्ति में शामिल हो जाएगा।’
आसिम मुनीर ने भारत पर क्या कहा?
सुहैल वड़ायच से बीबीसी हिंदी ने आसिम मुनीर से मुलाकात के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि यह उनकी पहली मुलाकात थी और बहुत अच्छी बातचीत हुई।
सुहैल वड़ायच ने बातचीत का अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘बहुत ही खुलकर बात हुई। आसिम मुनीर से मेरी कई बातों पर असहमति भी थी लेकिन उन्होंने उसे सुना। ऐसा मुशर्रफ़ के साथ भी था। उनके सामने भी असहमति जताने के लिए स्पेस होता था। आसिम मुनीर के साथ भी ऐसा ही रहा।’
क्या भारत को लेकर भी उनकी बात हुई?
इस पर सुहैल वड़ायच कहते हैं, ‘भारत को लेकर भी लंबी बात हुई। हर बात तो मैं नहीं कह सकता। आसिम मुनीर ने मुझसे कहा कि भारत पाकिस्तान की शांति भंग नहीं कर सकता है। मुझे लगता है कि अब पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में कोई टकराव नहीं होगा लेकिन सिंधु का पानी रोकने की कोशिश हुई तो बात बिगड़ सकती है। सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान के लिए लाइफ लाइन है और मुझे नहीं लगता है कि पाकिस्तान इस पर चुप रहेगा।’
सिंधु जल संधि को भारत ने पहलगाम में हुए हमले के बाद स्थगित करने की घोषणा की थी। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि ख़ून और पानी एक साथ नहीं बह सकता है। यानी भारत का कहना है कि ‘पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देते हुए सिंधु का पानी हासिल नहीं कर सकता है।’
पाकिस्तान के एक संपादक से बीबीसी हिंदी ने पूछा कि क्या वाकई वहाँ रेयर अर्थ मिनरल्स हैं?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, ‘रेको डिक में खनिज संपदा तो है। यहाँ खनन के लिए लंबे समय तक अदालती लड़ाई भी चली है। यह इलाक़ा खनिज संपदा के लिए ही जाना जाता है। यहाँ सोना और अन्य मेटल्स हैं। कनाडा के इंजीनियर्स यहाँ काम भी कर रहे हैं। यहाँ पिछले 10-12 सालों से काम चल रहा है। खनन को लेकर समझौते भी हो गए हैं। ये दो अरब डॉलर के अनुमान विदेशी एक्सपर्ट्स के ही हैं। धीरे-धीरे चीजें और पता चल जाएंगी।’ ब्रसेल्स में थिंक टैंक साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के सीनियर फेलो हृदय शर्मा ने पिछले महीने 28 जुलाई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में बलूचिस्तान में रेयर अर्थ को लेकर एक आर्टिकल लिखा था।
पाकिस्तान में वाक़ई रेयर अर्थ मिनरल्स हैं?
इसमें हृदय शर्मा ने बताया था, ‘एक अनुमान के मुताबिक बलूचिस्तान में छह से आठ ट्रिलियन डॉलर की खनिज संपदा है, जिनका इस्तेमाल अभी तक नहीं हुआ है। इनमें रेयर अर्थ एलिमेंट्स भी हैं। बलूचिस्तान के मुस्लिम बाग़ और ख़ुज़दार ओफियोलाइट से संपन्न इलाक़े हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इन इलाकों में रेयर अर्थ मिनरल्स भी हैं और इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन इलाक़ों को लेकर आकर्षण है। पाकिस्तान के पास खनन क्षमता नहीं है, ऐसे में बलूचिस्तान में वैश्विक शक्तियों के बीच होड़ शुरू हो गई है।’
अप्रैल 2025 में इस्लामाबाद में पाकिस्तान मिनरल्स इन्वेस्टमेंट फोरम आयोजित हुआ था और इसमें सऊदी अरब, चीन, अमेरिका के साथ यूरोपियन यूनियन के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए थे। उस समय सबने खनन में साझेदारी को लेकर दिलचस्पी दिखाई थी।
हृदय शर्मा ने लिखा है कि अमेरिका के लिए यह केवल निवेश नहीं है बल्कि रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स के मामले में चीन पर निर्भरता ख़त्म या कम करना चाहता है। रेयर अर्थ मिनरल्स के वैश्विक सप्लाई चेन में चीन का नियंत्रण करीब 90 प्रतिशत हिस्से पर है।’
हृदय शर्मा ने लिखा है, ‘रेको डिक में कनाडाई फर्म बैरिक गोल्ड के साथ समझौता हुआ है। यहाँ 37 सालों में 73 अरब डॉलर के आउटपुट का अनुमान है। इससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नया आकार ले सकती है।’
मार्च 2024 में बैरिक गोल्ड कोऑपरेशन के एक प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से रेको डिक प्रोजेक्ट पर बात की थी।
द डिप्लोमैट की जून 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, रेको डिक प्रोजेक्ट में बैरिक सात अरब डॉलर का निवेश कर रहा है और उसके पास 50 प्रतिशत शेयर होगा। बाक़ी 50 प्रतिशत पाकिस्तान और बलूचिस्तान सरकार के पास होंगे।
सुहैल वड़ायच ने कहा, ‘आसिम मुनीर का मानना है कि पाकिस्तान के पास चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखने का लंबा अनुभव है। हम एक के लिए दूसरे दोस्त को नहीं छोड़ सकते हैं। आसिम मुनीर ने कहा कि ट्रंप की शांति की कोशिश ईमानदार थी और इसीलिए उन्हें नोबेल सम्मान के लिए सिफ़ारिश की। हमारी सिफ़ारिश के बाद ही दुनिया के दूसरे देशों ने ट्रंप को नोबेल के लिए नामित करना शुरू किया।’
सुहैल वड़ायच से बीबीसी हिंदी ने पूछा कि जिस ट्रंप ने गाजा में इसराइल को कुछ भी करने की छूट दे रखी है और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान अमेरिकी राष्ट्रपति को नोबेल के लिए नामित कर रहा है। क्या पाकिस्तानी अवाम इससे सहमत है? सुहैल वड़ायच ने कहा, ‘मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।’
श्रीलंका के चेम्मानी इलाके में सामूहिक कब्रों की खुदाई ने एक बार फिर से देश के खूनी इतिहास को सामने खड़ा कर दिया है. ऐसे में तमिल समुदाय अंतरराष्ट्रीय समाज से अपील कर रहा है कि वह इस मामले में उनकी मदद करें
डॉयचे वैले पर जीवन रवीन्द्रन का लिखा-
श्रीलंका में जब भी किसी सामूहिक कब्र की खुदाई होती है, थम्बीरासा सेलवरानी पूरी रात सो नहीं पाती हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "हमें अब तक नहीं पता कि हमारे परिजनों के साथ क्या हुआ था. जब-जब खुदाई होती है, मुझे घबराहट होने लगती है.”
54 वर्षीय सेलवरानी अपने पति मुथुलिंगम ज्ञानसेल्वम की तलाश में बेचैन हैं, जो मई 2009 में लापता हो गए थे. उस समय श्रीलंकाई गृहयुद्ध के अंत में उन्होंने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. दशकों तक चले इस संघर्ष का अंत लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) की हार के साथ हुआ.
तब से अब तक कई जगहों सामूहिक कब्रें खोदी जा चुकी है. पिछले तीन महीनों से पुरातत्वविद चेम्मानी इलाके (श्रीलंका के उत्तरी प्रांत की राजधानी जाफना शहर के बाहरी हिस्से) में खुदाई कर रहे हैं. अब तक इस खुदाई में 140 कंकाल मिल चुके हैं, जिसमें बच्चों के कंकाल भी शामिल हैं.
उथली सी कब्र में मिला लाशों का 'ढेर'
सन 1998 से ही चेम्मानी में सामूहिक कब्र होने का अंदेशा था. उस समय कृष्णांथी कुमारस्वामी नामके एक पूर्व सेना कॉर्पोरल पर एक स्कूली छात्रा के बलात्कार और हत्या के मामले में मुकदमा चल रहा था. उसकी सुनवाई के दौरान आरोपी ने बताया था कि जिस इलाके में पीड़िता लड़की का शव मिला है, वहां उसके साथ-साथ सैकड़ों और लाशें भी दफन हैं.
डीडब्ल्यू से बातचीत में वकील वी. एस. निरंजन बताते हैं कि वे उन परिवारों के साथ काम कर रहे हैं, जिनके रिश्तेदार 1990 के दशक में चेम्मानी के आसपास के इलाकों से लापता हो गए थे. अब तक की खुदाई में सामने आया है कि शवों को "बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, अस्त-व्यस्त तरीके से, कब्रों में एक साथ डालकर” दफना दिया गया था. उन्होंने कहा, "हमें लगता है कि उनमें से कुछ को तो जिंदा ही दफना दिया गया था. क्योंकि अगर वे पहले से मृत होते तो उनके शव इस तरह मुड़े हुए नहीं होते.”
कई कंकालों के अंग टेढ़े-मेढ़े पाए गए हैं. कंकालों के साथ कई अन्य सामान भी मिले हैं. जैसे कि चप्पलें, बच्चे की दूध की बोतल और स्कूल बैग.
पुराने जख्म खुरच जाते हैं
जाफना स्थित अदायालम सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की कार्यकारी निदेशक, अनुशनी आलागराजाह ने बताया कि चेम्मानी का इतिहास "बहुत ही दर्दनाक और आघात भरा है, खासकर जाफना के लोगों के लिए.”
आलागराजाह ने डीडब्ल्यू को बताया, "उस समय हमारे कई दोस्तों के भाई, पिता और बहनें लापता हो गई थी. अब इस घटना को 25 साल से भी अधिक हो गया है. यह सिर्फ परिवारों के ही नहीं, बल्कि पूरी कम्युनिटी, पूरे जाफना के पुराने घावों को फिर से हरा कर रहा है. यह याद दिलाता है कि आप ऐसे घाव कभी भूल नहीं सकते.”
चेम्मानी की खुदाई अब तक श्रीलंका में हुई सामूहिक कब्रों की खुदाई की सबसे चर्चित जांच बन गई है. इसने अंतरराष्ट्रीय निगरानी की मांगों को भी जन्म दिया है, खासकर देश के तमिल समुदाय के बीच.
जून में इस जगह का दौरा करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त, फोल्कर ट्युर्क ने कहा कि "श्रीलंका ऐसे जवाबदेह तंत्रों के साथ संघर्ष करता रहा है, जिन पर पीड़ितों का भरोसा और विश्वास हो. यही कारण है कि श्रीलंकाई लोग न्याय के लिए बाहर की ओर देख रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहायता की मांग कर रहे हैं.”
विदेशी मदद लेने की मांगें
तमिल कार्यकर्ताओं ने फोल्कर ट्युर्क की यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन किया. थंबिरासा सेल्वारानी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुई थी और उन्होंने ट्युर्क से सीधे मुलाकात की थी. उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें श्रीलंकाई न्याय व्यवस्था पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है.
सेल्वारानी, अम्पारा जिले में स्थित एसोसिएशन ऑफ रिलेटिव्स ऑफ एनफोर्स्ड डिसअपीयरेंसेस की अध्यक्ष हैं. वह चाहती हैं कि उनके जिले में भी सामूहिक कब्रों की खुदाई की जाए.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "हमें डर लगता है. हमें नहीं पता कि अगली बार किसका शव मिलेगा, किसकी पहचान होगी. मैं दिन-रात इस बारे में ही सोचती रहती हूं. मुझे न नींद आती है, न खाना खाया जाता है. मैं बहुत परेशान महसूस करती हूं.”
सेल्वारानी ने बताया, "पिछले 17 सालों से, जब-जब राष्ट्रपति बदलते हैं. हम उनसे पूछते आ रहे हैं कि हमारे बच्चों और परिजनों के साथ क्या हुआ था.” लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी रही है. उनका कहना है कि जब भी वह विरोध प्रदर्शनों में जाती हैं, श्रीलंका की आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) के अधिकारी उन्हें डराते-धमकाते हैं. उन्होंने बताया, "वे कहते हैं – ‘तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए, तुम्हारे रिश्तेदार मर चुके हैं, फिर भी तुम यहां-वहां क्यों जाती रहती हो?'”
सरकार नई, मुद्दे वही पुराने
श्रीलंका की परंपरागत वंशवादी राजनीति से अलग हटकर, सितंबर 2024 में देश ने वामपंथी नेता, अनुरा कुमारा दिसानायके को राष्ट्रपति चुना. लेकिन वकील निरंजन अब भी संदेह में हैं. उनका कहना है कि "इतिहास से साफ है” कि सरकारों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वे हमेशा से अंतरराष्ट्रीय निगरानी का विरोध करती रही हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "यह सरकार जातीय समस्याओं को समझती ही नहीं है. वे सोचते हैं कि अगर हम भ्रष्टाचार खत्म कर दें तो देश में शांति आ जाएगी. लेकिन वे यह नहीं समझते कि जातीय समस्याएं भी इस देश के कर्ज में डूबने का एक बड़ा कारण हैं.”
मानवाधिकार वकील और श्रीलंका की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पूर्व आयुक्त, अम्बिका सत्कुनानाथन भी इस अविश्वास पर सहमति जताती हैं. उन्होंने कहा, "इतिहास में लगभग हर श्रीलंकाई सरकार अलग-अलग जवाबदेही प्रक्रियाओं में अंतरराष्ट्रीय मदद लेने से कतराती रही है.”
सत्ता में आने से पहले ही राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा था कि वे युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा नहीं चलाएंगे. डीडब्ल्यू से बात करते हुए सत्कुननाथन ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ितों को राज्य पर भरोसा नहीं है कि वह उन्हें न्याय दिलाने के लिए तत्पर हैं.
-श्रुति व्यास
वही हुआ जो होना था। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी क्लास या कि अपनी जात वापिस बताई! दुनिया ने फिर जाना कि ‘अमेरिका फस्र्ट’ और उसके ‘प्रथम नागिरक’ राष्ट्रपति ट्रंप को पुतिन जैसों की संगत पसंद है! ट्रंप ने पहले कार्यकाल में उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग-उनसे दोस्ती साधी थी और अब दूसरे कार्यकाल में पहले दिन से अब तक वे राष्ट्रपति पुतिन को सखा बताते हुए उन्हें वह सब दे रहे हैं जो उनके सहयोगी योरोपीय देशों के लिए सदमे से कम नहीं है। तभी आश्चर्य नहीं जो अलास्का में ट्रंप-पुतिन की बातचीत से निकला कुछ नहीं लेकिन पुतिन विजयी होकर घर लौटे। उन्होंने अगली मुलाकात के लिए ट्रंप को मास्को आने का न्यौता दिया तो यह भी कहा कि यदि ट्रंप राष्ट्रपति बने रहते तो वे यूक्रेन से लड़ते ही नहीं।
दुनिया ने लाईव देखा ही नहीं फील भी किया होगा कि ट्रंप और पुतिन में कितनी गहरी दोस्ती है। ट्रंप ने लाल कालीन पर पुतिन का सीधे स्वागत किया। सभी को समझ आ गया होगा कि विश्व राजनीति को रचने का उनका और उनकी रिपब्लिकन पार्टी का कैसा रोडमैप बना हुआ है।
तभी पुतिन अलास्का से लगभग सब कुछ लेकर गए—शक्ति, तस्वीरें और मंच। राष्ट्रपति ट्रंप की यात्रा का भी मकसद यही समझ आता है कि जैसे उन्हें अपने प्रिय ‘स्ट्रॉन्गमैन’ (पुतिन) से मान्यता प्राप्त करनी थी। शायद उन्हें यह चुभन है कि पश्चिमी देशों की बिरादरी में उन्हें पहले जैसा मान-सम्मान नहीं मिल रहा है इसलिए उन्हें भी एक फोटो-ऑप, पीठ पर थपकी चाहिए थी। प्रासंगिकता का भ्रम बनाना था।
सो अलास्का से दुनिया को कहीं गहरा नतीजा मिला है। एक तरह से नई विश्व-व्यवस्था की बेरहम सच्चाई। ट्रंप की दुनिया में रूस की औकात बढ़ रही है, निरंकुश शासकों की संगत हावी हो रही है। कह सकते हैं इससे खुद अमेरिका की दिशा, औकात, उसकी नैतिक आभा सब कुछ उसके राष्ट्रपति, एक आदमी के अहंकार में सिमटती जा रही है।
नज़ारा अजीब था-अलास्का के भारी आसमान तले, दो ‘स्ट्रॉन्गमैन’ आमने-सामने। पश्चिम का खुद को महान बताने वाला दबंग, पूरब के बहिष्कृत, युद्ध अपराधी के सामने झुकता दिखा। यह चौंकाने वाला हो सकता था, यदि यह इतना जाना-पहचाना न लगता। ट्रंप ने पहले खुद का मजाक उड़ाया और फिर उस ‘ग्रेट अमेरिका’ का, जिसे वे बार-बार ‘फिर महान’ बनाने का दावा करते हैं। यह राजनीतिक रंगमंच था-हताशा से सना, उस व्यक्ति का शो जिसे पता है कि वह अब मुख्य पात्र नहीं। फिर भी, वहीं थे-लाल कालीन बिछाते, कैमरों के लिए दाँत निपोरते, एक युद्ध-अपराधी को ‘द बीस्ट’ में साथ सवारी कराते हुए और इस बैठक को ‘टेन आउट ऑफ़ टेन’ बताते हुए।
परिणाम? न युद्धविराम, न कोई दिशा। बस तस्वीरें-एक ऐसी दुनिया के लिए फिटिंग, जहाँ इमेज अब इरादे पर हावी है। और ट्रंप-जिन्होंने अपनी पहचान अक्खड़पन से बनाई-पुतिन के आगे झुके हुए दिखे।
पुतिन इसके विपरीत-शांत, आत्मविश्वासी और पूरी तरह नियंत्रण में। तकनीकी रूप से दुश्मन की जमीन पर, पर किसी दबाव के बिना। 2007 के बाद पहली बार अमेरिकी धरती पर आए, और निकले मुस्कुराहटों, गर्मजोशी और वैश्विक छवि के ‘नरम पुर्नवास’ के साथ। राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें सब दे दिया—बिना शर्त वैधता, बिना सिद्धांत प्रशंसा, और परमाणु बराबरी की तस्वीर। और सबसे महत्वपूर्ण, अपने ही घोषित लक्ष्य-यूक्रेन युद्धविराम—को छोडक़र पुतिन की ‘शांति योजना’ के समर्थन की भाषा बोली, जिसमें यूक्रेन को अपनी जमीन छोडऩी पड़ सकती है। आगे ट्रंप की ‘आर्ट ऑफ द डील’ असल में नाटो देशों की ‘आर्ट ऑफ रिट्रीट’ साबित हो सकती है।
असल बात शौर, दिखावे और तस्वीरों में थी। मुस्कुराता पुतिन, झुकता ट्रंप। और अंतिम परत—रूसी राष्ट्रपति अमेरिकी धरती से बाहर निकलते हुए, जैसे यह वार्ता नहीं, बल्कि पाठ हो कि दुनिया का गुरुत्वाकर्षण अब कहाँ शिफ्ट हो चुका है। ‘अगली बार मॉस्को में’, पुतिन बोले। ट्रंप का जवाब-‘थोड़ी आलोचना होगी, लेकिन हो सकता है।’ संदेश साफ था-अमेरिका की नैतिक रेखाएँ धुंधली हो रही हैं।
यह सिर्फ रंगमंच नहीं था-यह पुतिन के लिए भू-राजनीतिक तोहफा था। वर्षों से उनकी नीति यही रही है-शीतयुद्ध के बाद की व्यवस्था को तोडऩा, नाटो को कमजोर करना। यूक्रेन पर हमले से उल्टा हुआ-नाटो बड़ा और मज़बूत हुआ, फिनलैंड और स्वीडन तक जुड़ गए। पर अलास्का में, ट्रंप ने वही किया जो पुतिन नहीं कर सके—नाटो के भीतर अविश्वास बोया। युद्धविराम की बात छोडक़र पुतिन के शब्द दोहराए-‘व्यापक शांति समझौता’, यानी यूक्रेन की जमीन छोडऩा और यूरोप-नाटो में शामिल होने का सपना ख़त्म करना। यह न सिफऱ् सहयोगियों को उलझाने वाला था, बल्कि उनके सबसे बुरे डर की पुष्टि भी-कि ट्रंप की वापसी, अमेरिका की प्रतिबद्धताओं को अंदर से तोड़ देगी।
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा—‘दो परमाणु शक्तियों का साथ आना अच्छा है। हम नंबर वन हैं, वे नंबर टू।’ एक झटके में चीन और यूरोपीय संघ नक़्शे से मिटा दिए गए। यह रणनीति नहीं, नाटक था-पुतिन के घाव पर मरहम। और मॉस्को में इसे ऐसे ही समझा गया-वहा राष्ट्रीय चैनलों पर ख़ुशी के फव्वारे फूट पड़ है, पटाखे छूट रहे हैं।
यही है ‘स्ट्रॉन्गमैन’ राजनीति की क़ीमत। चापलूसी को एक नीति में बदल देना। तानाशाहों को बिना सुधार वैधता देना। और दुनिया को यह संदेश देना कि अमेरिका अब ‘फ्री वल्र्ड’ का नेता नहीं, बस स्ट्रांगमैन फोटो-ऑप मंडली का हिस्सा है।
-कनक तिवारी
लाश को खुद के खेत में गडऩे की हैसियत नहीं है। वर्ष 2025 की जनवरी में ही छत्तीसगढ़ के बस्तर के गांव छिंदवड़ा तहसील डबरा से पेचीदा, मर्मांतक और इंसानियत को तार-तारकर देने वाला एक मामला सुप्रीम कोर्ट में भी जाकर औंधे मुंह गिर पड़ा। हमारे संविधान को भी अब न्यायपालिका से शत-प्रतिशत उम्मीद नहीं होनी चाहिए। सुभाष बघेल नामक एक व्यक्ति जन्म से महार या महरा दलित जाति में पैदा होकर ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया था। वर्ष 1986-1987 से उसने पास्टर या पादरी का काम भी किया। लंबी बीमारी के कारण बघेल की मृत्यु 7 जनवरी 2025 को हो गई। बेटे और परिवार ने अपने ही गांव छिंदवड़ा में ईसाई प्रथा के मुताबिक पिता के षव को दफनाना चाहा। लेकिन गांव के अन्य व्यक्तियों के समूह द्वारा उन्मादित विरोध के कारण दफनाना नहीं हो सका। बेटे ने उसी दिन डबरा के थानेदार और टोकापाल के अनुविभागीय अधिकारी को लिखित शिकायत कर उनसे संरक्षण मांगा। कोई मदद नहीं मिली। तो उसने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में तत्काल रिट याचिका दायर की कि अपने पिता को गांव में कब्रिस्तान के अब तक की नियत जगह पर दफनाना चाहता है। वहीं उसके कुछ पूर्वजों को दफनाया जा चुका है।
छिदवड़ा तथा अन्य निकट ग्राम पंचायतों ने जवाब में लिखा कि उनके गांव में ईसाइयों को दफनाने के लिए कोई जगह पंचायत द्वारा पंचायत अधिनियम के तहत अधिसूचित नहीं की गई है। याचिकाकार ने कहा कि ग्र्राम पंचायत द्वारा वर्षों से उसी जगह कब्रिस्तान में ईसाई शवों को दफनाने की मौखिक मंजूरी दी जाती रही है। उसने कई पिछले उदाहरण और फोटोग्राफ भी पेश किए। जवाब में राज्य ने फिर कहा कि कभी भी पंचायत ने लिखित में ऐसी अनुमति नहीं दी है। आसपास के चार गांवों छिंदवड़ा, मुंगा, तीरथगढ़ और दरभा को मिलाकर छिंदवड़ा से बीस पच्चीस किलोमीटर दूर ग्राम करकापार में ईसाइयों के लिए निर्धारित कब्रिस्तान में शव को दफनाया जा सकता है। ज्यादा दिमागपच्ची नहीं करते हुए हाईकोर्ट ने बस इतने से ही संतुष्ट होकर याचिका खारिज कर दी। यह भी कह दिया शव छिंदवड़ा में ही दफनाने की कोशिश भी की जाएगी तो आम जनता में असंतोष और लोक व्यवस्था के भडक़ने की संभावना होगी। बल्कि सुझाव दे दिया कि शव को ग्राम करकापाल में ही दफनाना बेहतर होगा।
सरकार की ओर से अतिरिक्त पुलिस सुपरिंटेंडेंट ने शपथ पत्र में बताया कि छिंदवड़ा की कुल आबादी 6450 है। उनमें 6000 आदिवासी तथा 450 महरा जाति के दलित हैं। उनमें 350 हिन्दू महरा दलित हैं। केवल 100 लोग महरा ईसाई हैं। रमेश बघेल के दादा लखेश्वर बघेल और अन्य रिश्तेदार शांति बघेल को वहीं शव दफनाने की इजाजत दी गई थी क्योंकि वे ईसाई नहीं हिन्दू थे। हालांकि सरकार ने इसका कोई सबूत नहीं दिया। शपथ में कहा जन्म, मृत्यु, विवाह आदि कर्मकांड परंपराओं से चलते हैं। जिसने भी ये परंपराएं छोड़ दीं। उन्हें इनसे वंचित होना पड़ेगा। इसलिए भी हिन्दू से ईसाई बने व्यक्ति के शव को वहीं दफनाने की इजाजत नहीं मिल सकती। मृतक परिवार ने विकल्प नहीं होने पर षव को जगदलपुर के मेडिकल कॉलेज के सरकारी अस्पताल के शव गृह में भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस नागरत्ना ने फैसले में लिखा कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 49 (12) के अनुसार शवों, पशु शवों, पशुओं और अन्य घृणोत्पादक पदार्थों के (डिस्पोजल) के लिए स्थानों का रेगुलेशन पंचायतों को करना है। अधिनियम के तहत नियम 3 के मुताबिक किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के 24 घंटे के अंदर उसके शव को गाडऩे, जलाने या अन्यथा डिस्पोजल करने के लिए संबंधित व्यक्तियों और ग्राम पंचायतों के अधिकारियों को कार्यवाही करनी होगी। नियम 5 के तहत ग्राम पंचायतों द्वारा सम्यक रूप से ग्राम में प्रशिक्षित, लिखित आदेश द्वारा अनुमोदित स्थान से भिन्न स्थान जो श्मशान घाट हो, या जो कब्रिस्तान हो, या सरकार द्वारा अवधारित हो, या शासकीय अभिलेखों में स्थान हो से भिन्न स्थान में शव को जलाकर, गाडक़र या उसे अन्यथा डिस्पोजल के लिए उपयोग में नहीं लाया जाएगा। पिछले वर्षों में जब भी कोई विवादित मृत्यु हुई है। बार-बार पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा है। सरकार ने कहा कि यदि पहले ईसाई मृतकों के शव को दफनाने के लिए कोई मौखिक अनुमति दी भी गई होगी, तो उससे किसी मृतक के पक्ष मेंं कोई अधिकार पैदा नहीं होता। सरकार ने मृतक के शव को करकापाल के कब्रिस्तान तक ले जाने के लिए एम्बुलेन्स और न्यायिक सुरक्षा का प्रबंध करने का आश्वासन दिया।
बेटे रमेश बघेल ने छिंदवड़ा के पटवारी द्वारा बनाया गया एक नजरी नक्शा भी पेश किया क्योंकि गांव मेंं भूमि का सेटलमेन्ट नहीं हुआ है। उस नक्शे में ईसाईयों को शवों को दफनाने की व्यवस्था दर्शाई गई है। याचिकाकार के वकील कॉलिन गोंजाल्वीज ने दो टूक कहा कि संविधान में है कि रमेश बघेल पिता का शव अपने ही खेत में दफना सकता है। चतुर सुजान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संवैधानिक बहस से बचते हुए केवल व्यावहारिक सुझाव दिया कि मृत्यु तिथि से 20 दिन हो चुके हैं।
इसलिए षव को करकापाल के शव गृह में ले जाकर दफनाने का आदेश दिया जाए। गोंसालवीज ने पटवारी द्वारा बनाए नक्शे का भी हवाला दिया कि उसी जगह पर ईसाईयों के शवों को दफनाया जाता रहा है। हिन्दुओं के लिए अलग अलग स्थान का निर्धारण किया जा चुका है। उन्हें कुछ कब्रों के फोटो तक पेश किए गए। 14 उन ईसाइयोंं के शपथ पत्र भी पेश किए गए जिनके रिश्तेदारों को भी उसी जगह दफनाया गया था। सरकार ने भी माना कि पहले 20 ईसाई व्यक्तियों को उसी जगह दफनाने की मौखिक इजाजत दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले को अनावश्यक रूप से भडक़ाया जा रहा है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा पिछले व्यवहार से साफ नजर आता है कि ईसाई महरा समुदाय के षवों को दफनाने की अनुमति मिलती रही है। कोर्ट ने आपत्ति की नियम 3 के अनुसार शव को दफनाने का निराकण 24 घंटे में हो जाना चाहिए। लेकिन ग्राम पंचायतों और अधिकारियों की उपेक्षा के कारण मामले को उलझाया गया। ग्राम पंचायत ने कब्रिस्तान और श्मशान के संबंध में अधिसूचना प्रकाशित करने में चूक तो की है। खमियाजा दूसरा क्यों भुगते? करकापाल गांव में ही ईसाईयों को दफनाने को लेकर कोई विश्वसनीय दस्तावेज सरकार द्वारा पेश नहीं किया जा सका। कुल मिलाकर कोर्ट ने माना कि सरकार के तर्कों में कोई दम नहीं है। कोर्ट ने कहा हाईकोर्ट को यह देखना चाहिए था कि यदि रमेश बघेल द्वारा अपनी ही कृषि भूमि में पिता के शव को दफनाने की अनुमति मांगी गई। तो उस पर आपत्ति के बावजूद विचार क्योंं नहीं किया गया।
जस्टिस नागरत्ना ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के षपथ पत्र पर कड़ी टिप्पणी की कि यदि कोई परंपरा से अलग हो जाता है। तो उसे षव को दफनाने का अधिकार नहीं मिलेगा। इससे तो सीधे सीधे अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन हुआ है। अचरज है एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी ने इस तरह की बेतुकी बात की। उन्होंने इस प्रकरण में संविधान के मकसद ‘धर्मनिरपेक्षता’ और बंधुत्व (स्नह्म्ड्डह्लद्गह्म्ठ्ठद्बह्ल4) का भी अपमान हुआ लगता है। मृतक को सम्मानजनक ढंग से दफना दिया जाता, तो संवैधानिक मर्यादा में अनुकूल गरिमामय स्थिति हो सकती थी।
जस्टिस नागरत्ना समझदार, तर्कशील, विवेकशील जज और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ई. एस. वेेंकटरमैया की सुपुत्री हैं। उन्होंने शत-प्रतिशत संवैधानिक लेकिन व्यावहारिक फैसला भी दिया, जिससे पीडि़त परिवार की प्रतिष्ठा और मृतक को अंतिम रूप से दफनाना सम्मानजनक हो तथा गांव में किसी तरह की दुश्मनी भी नहीं पनपे। हालांकि उन्होंने दोयम दर्जे का विकल्प चुना। उन्होंने माना भी कि मृतक के परिवार के साथ संवैधानिक अन्याय हुआ है।
बेहतर होता कनिष्ठ सहयोगी जज सतीश चंद्र शर्मा फैसले को जस का तस कबूल कर लेते। तो बतंगड़ नहीं बनता। अचरज है जस्टिस षर्मा जस्टिस नागरत्ना के समाधानकारक सुझाव से सहमत नहीं हो पाए। सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 में आदेश देने के असाधारण अधिकार हैं। जब लगे कि विषय में पूर्ण न्याय करना है। अन्यथा पूर्ण न्याय नहीं किया जा सकता। जस्टिस शर्मा का तर्क अचरज पैदा करता है और अटपटा भी लगता है।
उन्होंने माना कि किसी व्यक्ति को दफनाना मृतक व्यक्ति के भी मूल अधिकार में शामिल है। लेकिन दावा नहीं किया जा सकता कि उसे दफनाने का स्थान चुनने की भी आजादी है। तर्क किया कि हर मृतक क्यों न हो मूल अधिकार अनुच्छेद 21 में हैं। अनुच्छेद 21 कहता है किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। ग्राम पंचायत अंतिम क्रियाकर्म के लिए स्थान तय करने का अधिनियम में अधिकार रखती है।
जो उसने घोषित नहीं किया। ईसाई व्यक्ति के निधन के लिए ग्राम छिंदवड़ा में दफनाए जाने का स्थान ही नहीं, अन्य धर्मों के लिए भी तो घोषित नहीं किया।
एक हाइपोथीसिस जस्टिस शर्मा ने बना दी कि किसी भी व्यक्ति को अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता, अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता, लोक व्यवस्था संबंधी प्रावधानों के तहत ही होगी। ग्रामीणों के उत्तेजक विरोध के या शांति भंग होने तथा हिंसक गतिविधियों के भी हो जाने की संभावना को जज ने लोक व्यवस्था भंग होना क्यों समझा? लोक व्यवस्था को बनाए रखने की जवाबदेही जिस राज्य की है। उसने सुझा दिया है कि ग्राम करकापाल के ईसाई कब्रिस्तान में मृतक को दफनाया जा सकता है। शर्मा ने कहा कि इस तरह मृतक और उसके परिवार को अबाधित अधिकार नहीं मिलता कि उसे कहां दफनाया जाए। अचरज है जज ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य ने लोक व्यवस्था के भंग होने की आशंका का कोई बहाना बनाया है। छ: हजार लोगों के एक गांव में इसके पहले 30, 35 पुलिस वाले पहुंचकर लोक व्यवस्था सम्हाल लेते थे। तब क्या अजूबा हो जाता? लोक व्यवस्था की परिभाषा इतनी कामचलाऊ नहीं होती। जिस बस्तर में नक्सलियों के उन्मूलन के नाम पर हज़ारों लाखों पुलिसकर्मी मौजूद हैं, और कत्लेआम और हत्याएं सैकड़ों, हजारों में हो रही हैं, एक गांव के कुछ ग्रामीण संविधानिक प्रावधानों का विरोध करें तो लोकव्यवस्था भंग होने का खतरा मान लिया जाए।
दो जजों की बेंच में मतभेद हो गया। सुप्रीम कोर्ट की परंपरा है कि जो जज फैसला लिखे। साथी जज को अवलोकन के लिए भेजे। जस्टिस शर्मा की असहमति ने एक समाधानकारक फैसले में उलझन पैदा कर दी। 7 जनवरी से मृत व्यक्ति के शव को कब्रिस्तान के चयन के लिए बीस दिनों तक अस्पताल/मेडिकल कॉलेज की निगरानी में पड़ा रहना पड़ा। मृतक के साथ कैसा हादसा हुआ। अपमान हुआ। अन्याय हुआ।
मामला तीसरे जज के पास जाता। तो हफ्तों, महीनों भी लग सकते थे। शायद जस्टिस नागरत्ना को मन मसोसकर अपने साथी जज सतीषचंद्र षर्मा की बात को मानने में उदार होकर अपने फैसले के विरुद्ध व्यावहारिक दृष्टि अपनानी पड़ी। कानूनी पेचीदगियों से परे फैसला किया कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का उपयोग करेगा क्योंकि विषय के संबंध में पूर्ण न्याय करना चाहता है। केवल 100 क्रिश्चियन परिवार उस गांव में हैं। तो भी संविधान अंकगणित के आधार पर अन्याय नहीं कर सकता था। जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले के अंत में राष्ट्रपिता गांधी को भी याद किया कि हमारा जीवन तो क्षणिक है। सौ बरस भी जिएं तो अनंत काल में उसका क्या महत्व। लेकिन यदि हम इंसानियत के समुद्र में डूब जाते हैं। तो हम उसकी गरिमा के साथ जीते हैं।
द हिंदू में प्रकाशित CSDS Lokniti Survey के अनुसार, भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) का विशेष मतदाता सूची संशोधन अभियान (एसआईआर) गरीब तबके में जबरदस्त आलोचना का विषय बन गया है।
एसआईआर में जिन दस्तावेजों की जरूरत है, गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के पास वो दस्तावेज नहीं हैं। इसलिए उनके मताधिकार पर खतरा मंडरा रहा है। इस अभियान में मतदाता सूची को पूरी तरह ठीक करने के लिए जिन दस्तावेजों की मांग की जा रही है, जिसके अभाव में लाखों लोग मतदाता सूची से
बाहर हो सकते हैं। यह स्थिति न केवल गरीबों के लिए खतरा है, बल्कि निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठा रही है।
लोकनीति-सीएसडीएस के एक अध्ययन में यह सामने आया है कि ग्रामीण और शहरी गरीब समुदायों, खासकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के पास आवश्यक दस्तावेजों की कमी है।
इस अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि दस्तावेजों की अनिवार्यता से समाज के कमजोर वर्गों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है।
गांवों में 20% लोगों के पास आधार तक नहीं है ।
अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 20% आबादी के पास आधार कार्ड या अन्य वैध पहचान पत्र नहीं हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां लोग अक्सर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, उनके पास जन्म प्रमाण पत्र, पैन कार्ड या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज नहीं होते।
इसके अलावा, बेघर लोग, प्रवासी मजदूर और स्लमवासियों जैसे समूहों को इस प्रक्रिया में और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार जैसे राज्यों में हाल ही में हुए विशेष संशोधन अभियान में हजारों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए, जिसके बाद विपक्षी दलों ने "वोट चोरी" का आरोप लगाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे पर लोगों से आवाज उठाने की अपील की, जबकि बीजेपी ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, स्टालिन और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता सूची में अनियमितताओं का आरोप लगाया।
लेकिन चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से हलफनामा मांगा। जबकि बीजेपी नेताओं से अभी तक कोई हलफनामा नहीं मांगा गया। अब तो चुनाव आयोग ने राहुल को अल्टीमेटम भी दे दिया है।
निर्वाचन आयोग का यह कदम, जो मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए उठाया गया है, अब विवादों के घेरे में है। विशेषज्ञों का कहना है कि दस्तावेजों की अनिवार्यता से न केवल गरीबों का मताधिकार छिन सकता है, बल्कि यह आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईसीआई ने हाल ही में तेज राजनीतिक होड़ के बीच फंसे होने की बात स्वीकार की है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप लगाया है।
लोकनीति-सीएसडीएस ने सुझाव दिया है कि निर्वाचन आयोग को दस्तावेजों की अनिवार्यता को लचीला करना चाहिए और वैकल्पिक तरीकों, जैसे सामुदायिक सत्यापन या शपथ पत्र, को अपनाना चाहिए। इसके अलावा, मतदाता जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को दस्तावेज प्राप्त करने में मदद करने की भी आवश्यकता है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि अगर इस मुद्दे का समाधान नहीं किया गया, तो यह न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करेगा, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों के प्रति अन्याय को और बढ़ाएगा।
CSDS की रिपोर्ट यह बताने की कोशिश कर रही है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में किसे नुकसान होगा और चुनावों तथा चुनाव आयोग में नागरिकों के विश्वास पर इसके क्या प्रभाव होंगे।
जब भारत ने 1948 के लंदन ओलंपिक में भाग लिया तो पूरे दल में एक भी महिला खिलाड़ी नहीं थी। 78 सालों के बाद भी इस स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आया है। खेल के क्षेत्र में भारत की लड़कियां आज भी संघर्ष कर रही हैं।
डॉयचे वैले पर आयुष यादव का लिखा-
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की रहने वाली अमीषा रावत के लिए पहाड़ों के पथरीले रास्ते उतनी बड़ी बाधा नहीं थे जितना उनके आस पास मौजूद लोग। शारीरिक विकलांगता की वजह से साथ पढऩे वाले बच्चे न सिर्फ उन्हें लाचारी भरी निगाह से देखते थे बल्कि मजाक भी उड़ाते थे।
ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए अमीषा ने अपने काम और सफलता को जरिया बनाया। अमीषा ने आगे चलकर न सिर्फ देश में अपने खेल (शॉट पुट) से नाम कमाया बल्कि पेरिस पैरालंपिक के लिए भी क्वालिफाई किया।
भारत में आज भी अमीषा जैसी तमाम लड़कियां हैं, जो न सिर्फ खेलों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं बल्कि देश के लिए सोने, चांदी और कांसे के तमगे भी ला सकती हैं। लेकिन सामाजिक रूढि़वादिता, लैंगिक असमानता जैसे तमाम रोड़े उनके रास्ते की रुकावट बनते हैं।
खेलों में महिलाओं की भागीदारी
आजादी के बाद भारत में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्य रहा है। खेल का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है, जहां महिलाओं की भागीदारी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत विकास के लिए जरूरी है, बल्कि यह सामाजिक रूढि़वादिता को तोडऩे, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और इसमें सफल करियर बनाने का एक शक्तिशाली माध्यम भी है।
बावजूद इसके खेलों का महाकुंभ माने जाने वाले ओलंपिक में महिलाओं की भागीदारी बमुश्किल ही पुरुषों के बराबर पहुंच पाई है। 2024 में हुए पेरिस ओलंपिक में भारत की तरफ से कुल 117 खिलाडिय़ों ने भाग लिया, जिसमें 70 पुरुष और महज 47 महिलाएं थीं।
ओलंपिक की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत की तरफ से ओलंपिक में शामिल होने वाली पहली महिला नोरा पॉली हैं, जिन्होंने 1924 में पेरिस ओलंपिक में टेनिस में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
आजादी के बाद 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय दल में एक भी महिला खिलाड़ी नहीं थी लेकिन 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में नीलिमा घोष, मैरी डिसूजा, डॉली नाजिर और आरती साहा ने देश का झंडा उठाया।
भारत में खेल और शारीरिक गतिविधि (एसएपीए) में भागीदारी के स्तर में लैंगिक असमानता बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, मौजूदा समय में केवल43 फीसदीभारतीयमहिलाएं ही सुझाई गई शारीरिक गतिविधियों में शामिल होती हैं। हालांकि, अगर आजकल का रुझान ऐसे ही जारी रहा, तो 2030 तक यह संख्या घटकर 32 फीसदी रह जाने की संभावना है।
एक नहीं, दो नहीं हजार समस्याएं
महिलाओं के लिए खेलों से दूरी घर से ही शुरू हो जाती है। ये कहना है डॉ। दिलप्रीत कौर का, जो खुद लंबे समय तक ट्रैक एंड फील्ड एथलीट रही हैं और पुणे की श्री बालाजी यूनिवर्सिटी के स्पोर्ट्स साइंस विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।
उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से बात करते हुए बताया, हर खेल की अपनी डिमांड होती है और बेहतर नतीजे हासिल करने के लिए हमें उसके हिसाब से चलना पड़ता है। लेकिन कई बार लड़कियों को सिर्फ इसलिए रोका जाता है क्योंकि उन्हें छोटे कपड़े पहनने पड़ते हैं।
अल्मोड़ा की रहने वाली ज्योति तलवार बताती हैं कि उन्हें खेलने के लिए परिवार की तरफ से हमेशा सपोर्ट मिला लेकिन स्कूल में शिक्षकों का साथ नहीं मिलता था। उनकी टीचर अक्सर कहती थीं कि अगर दो नावों की सवारी की तो डूबना तय है।
ट्रैक एंड फील्ड में मास्टर डिग्री ले चुकी ज्योति ने न केवल दो नावों की सवारी की बल्कि उन्हें पार भी लगाया। ज्योति कहती हैं कि स्कूलों में ही अगर सही समय पर प्रतिभा की पहचान कर ली जाए तो भारत को बड़े स्तर पर अच्छे खिलाड़ी मिल सकते हैं।
डॉ. दिलप्रीत कौर खेल के दौरान चोट लगने, कोचिंग और स्पॉन्सरों के अभाव, फंडिंग, मीडिया कवरेज और ह्यूमन परफॉर्मेंस लैब की कमी, जेंडर गैप और असुरिक्षत माहौल को भी बड़ा कारण मानती हैं। उन्होंने बताया कि भारत में जितने स्पोर्ट्स सेंटर हैं, वो फिलहाल काफी नहीं हैं। मौजूदा सेंटरों में इतनी कम जगह है कि ज्यादातर लड़कियों को खेल का खर्च उठाने के लिए परिवार से मदद लेनी पड़ती है। वो कहती हैं, ‘हम खर्च तब करते हैं जब मेडल आ जाता है। जबकि खर्च मेडल लाने से पहले करना चाहिए।’
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एसएआई) की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार राष्ट्र्रय उत्कृष्टता केंद्र के 24 सेंटरों पर महज 1,514 लड़कियां और एसएआई प्रशिक्षण केंद्रों में महज 1,383 लड़कियां हैं।
पीरियड्स भी एक बड़ी वजह
भारत में आमतौर पर पीरियड्स को लेकर जागरूकता का अभाव है और बात खेलों की हो तो तमाम भ्रांतियां मौजूद हैं। पैरा एथलेटिक्स कोच अभिषेक चौधरी भी यही मानते हैं। डीडब्ल्यू हिंदी से बात करते हुए उन्होंने बताया, ट्रेनिंग के दौरान कई बार ऐसा होता है कि हमें शारीरिक क्षमता का ध्यान रखते हुए शेड्यूल बनाना होता है लेकिन कई बार लड़कियां कोच को खुलकर बता नहीं पाती हैं।
वो यह भी कहते हैं कि भारत में ऐसे डॉक्टरों की कमी है जिन्हें खेल से जुड़ी चोटों या अन्य मामलों की जानकारी हो। उन्होंने कहा, हमारे एथलीट्स को अगर यूरोपीय देशों जैसी आधी सुविधाएं भी मिल जाएं तो हमारी लड़कियां न सिर्फ लडक़ों से ज्यादा मेडल लाएंगी बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर स्थान दिलाएंगी।
महिला कोच बेहतर या पुरुष कोच
इस सवाल का जवाब देते हुए अमीषा रावत ने हमें बताया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोचिंग एक महिला दे रही है या पुरुष। वो कहती हैं, हमारे देश में वैसे ही कोच की कमी है इसलिए पहले तो कोच मिलना ही बड़ी बात होती है।
अभिषेक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। वो कहते हैं, ‘मैं कई महिला खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण देता हूं। फर्क सिर्फ इससे पड़ता है कि आप अपने खेल को लेकर कितने सीरियस हैं और क्या हासिल करना चाहते हैं।’
स्टेट ऑफ स्पोर्ट्स एंड फिजिकल एक्टिविटी रिपोर्ट (2024) के अनुसार, शारीरिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी कम है। 40 फीसदी महिलाएं घरेलू कामों को ही एक शारीरिक गतिविधि के रूप में देखती हैं और 12 फीसदी से कम महिलाएं ऐसी एक्सरसाइज करती हैं जिससे मांसपेशियों मजबूत होती हैं।
- समरेन्द्र शर्मा
हेडिंग अजीब लग सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी में हुई घटना ने इसे भयावह सच बना दिया है। तीन युवाओं की बेरहमी से हत्या, मोबाइल कैमरे में कैद चीखें, सडक़ों पर बिखरा खून और वार करते हाथ। यह सब न सिर्फ देखा गया, बल्कि जानबूझकर रिकॉर्ड किया गया। यह अब महज अपराध नहीं रहा, बल्कि हमारे समय का सबसे डरावना आईना बन गया है। यह वह दौर है जब अपराधी हिंसा को छुपाते नहीं, बल्कि गर्व से ‘प्रदर्शन’ में बदल देते हैं। मानो यह भी एक वीडियो कंटेंट हो, जिसे सोशल मीडिया पर ‘पसंद’ और ‘शेयर’ के लिए बेचा जा सके।
अपराधियों का यह दुस्साहस रातोंरात पैदा नहीं होता। यह तभी संभव है जब कानून का भय मिट जाए, नैतिकता की जड़ें सड़ जाएं और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी खोखली हो जाए।
आज का एक बड़ा युवा वर्ग आभासी दुनिया में इतना डूब चुका है कि असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। सोशल मीडिया, रील्स, हिंसक वेब सीरीज और वीडियो गेम मनोरंजन के नाम पर हिंसा को सामान्य, यहां तक कि ‘शौर्य’ के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। मीडिया अध्ययन की ‘कल्टीवेशन थ्योरी’ बताती है कि हिंसा के दृश्य बार-बार देखने से इंसान उसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानने लगता है। यह बदलाव अब हमारी नई पीढ़ी की सोच में गहराई तक पैठ चुका है।
इस मानसिक जहर में नशाखोरी घातक तडक़ा लगा रही है। शराब, ड्रग्स और अन्य मादक पदार्थ अब आसानी से मिलते हैं। नशे की गिरफ्त में विवेक और आत्म-नियंत्रण खो चुके युवक कब खतरनाक अपराध कर बैठें, कहना मुश्किल है। इसके ऊपर ऑनलाइन चाकू, तलवार और हथियार की आसान उपलब्धता हिंसा को और आसान बना देती है। लेकिन खतरा केवल नशा या हथियार नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था का बेबस होना भी है। अपराधियों के मन से भय खत्म हो गया है। किसी भी राज्य का आधार है कानून द्वारा नियंत्रित ‘विधिसम्मत हिंसा का एकाधिकार’। जब यह कमजोर पड़ता है, तो अराजकता का फैलना तय है।
इस स्थिति का हल निकालने कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। परिवारों को बच्चों में नैतिक मूल्यों, सहिष्णुता और अनुशासन की नींव मजबूत करनी होगी।
-दिनेश आकुला
आज हम अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनके कार्यों और उनके नेतृत्व ने न केवल भारतीय राजनीति को आकार दिया, बल्कि भारतीय समाज में एक स्थायी छाप भी छोड़ी। इस दिन, वाजपेयी जी को याद करते हुए मुझे अपनी पत्रकारिता के शुरुआती दिनों का एक अजीब और अविस्मरणीय पल याद आ रहा है।
यह घटना उनके पहले प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान हुई थी, जब वे भुवनेश्वर जाने के लिए विमान से यात्रा कर रहे थे। दुर्भाग्यवश, खराब मौसम के कारण उनका विमान रायपुर के माना एयरपोर्ट पर एक छोटे ब्रेक के लिए रुक गया था। उस समय मध्यप्रदेश था, और छत्तीसगढ़ राज्य अभी हाल ही में अस्तित्व में आया था।
मैं उस दिन प्रोटोकॉल अधिकारी के साथ बैठा था, तभी अचानक यह खबर आई कि प्रधानमंत्री का विमान रायपुर में रुकने वाला है। मैंने तुरंत प्रोटोकॉल अधिकारी के साथ कदमताल किया। मुझे कुछ मदद मिली, जिससे मैं एयरपोर्ट की सुरक्षा को पार कर पाते हुए कुछ सीनियर बीजेपी नेताओं और स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों से कुछ निवेदन कर पाया। इसके बाद, आखिरकार मैं बारीकेज के किनारे तक पहुंचने में सफल हो पाया।
जब वाजपेयी जी विमान से उतरे, तो उनका स्वागत करने के बाद, वे वीआईपी लाउंज में कुछ समय के लिए बैठे। लेकिन जैसे ही वे वहां से चलने लगे, मैंने हिम्मत जुटाकर जोर से कहा, ‘वाजपेयी जी, हम यहां इंटरव्यू के लिए हैं!’
-दिनेश आकुला
आज दिलीप सिंह जूदेव जी की 12वीं पुण्यतिथि है। 14 अगस्त 2013 को उनका निधन हुआ था। अपने बड़े बेटे सतॄंजय सिंह जूदेव के दिल के दौरे से अचानक निधन के बाद, उन्होंने मानो जीवन में रुचि ही खो दी थी। यह ऐसा आघात था, जिससे वे पूरी तरह उबर नहीं पाए।
मेरा जूदेव जी से जुड़ाव सन 2000 में हुआ, जब मैं हिंदुस्तान टाइम्स में काम कर रहा था। शुरुआत से ही उन्होंने यह तय कर रखा था कि किसी भी विवाद या बड़ी खबर पर पहला बयान मुझे ही देंगे। 2003 में, जब उन पर कुख्यात रिश्वत कांड का आरोप लगा, तो सुबह 6 बजे उन्होंने मुझे फोन कर कहा कि मामला साफ होते ही वे सबसे पहले मुझे ही इंटरव्यू देंगे।
मुझे याद है, स्टार न्यूज़ में असाइनमेंट डेस्क पर मेरे पूर्व सहयोगी रजनीश का फोन आया था। उन्होंने बताया कि इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर जूदेव जी के रिश्वत मामले की खबर छपी है। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। जो कोई भी जूदेव जी को जानता था, वह विश्वास नहीं कर पा रहा था। लेकिन वे अडिग थे और उनकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही बेबाक— ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं।’
जूदेव जी अक्सर मजाक में कहते, ‘दिनेश बाबू, दारू पिया करो।’ जशपुर हो या राजकुमार कॉलेज का रेस्ट हाउस, उनसे मिलने पर यह जुमला ज़रूर सुनने को मिलता।
एक इंटरव्यू में, जब वे छत्तीसगढ़ में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे पक्के शायर हैं और सडक़ किनारे दिख जाए तो शायरी की किताब ज़रूर खरीद लेते हैं। उनका पसंदीदा गीत था— मेरे देश की धरती सोना उगलेज्
जब मैंने पूछा कि क्या यह उनका पहला विवाद है, तो जशपुर के राजकुमार मुस्कुराए, मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोले‘मेरी मूंछें भी मशहूर हैं और कॉलेज के दिनों में जो दो रिवॉल्वर लेकर चलता था, वे भी।’
कॉलेज के दिनों में उनके पास काली बुलेट मोटरसाइकिल थी, जिसे वे बेहद धीमी गति से चलाते थे, जैसे सफर का आनंद ले रहे हों। एक बार जिला प्रशासन ने उन्हें लोहरदगा में बीजेपी की बैठक में जाने से रोकने की कोशिश की। उस समय वे जीप चला रहे थे। उन्होंने कहा— ‘हम ज़रूर जाएंगे; अगर रोक सकते हैं तो रोक लो।’ और फिर वे इतनी तेज़ी से निकले कि पुलिस की गाडिय़ां पीछा नहीं कर पाईं।
-अपूर्व झा
एक तंग कमरे में राजेश विश्वकर्मा चुपचाप बैठे हैं। तेरह महीने तक वह जेल में रहे। वह जेल में इसलिए नहीं रहे कि उन्होंने कोई अपराध किया था, बल्कि इसलिए कि उन्होंने किसी की मदद करने की कोशिश की थी। वह एक दिहाड़ी मजदूर हैं। उनके पास न जमीन है, न माता-पिता और न ही कोई कानूनी जागरूकता। वह व्यवस्था का शिकार बन गए।
एनडीटीवी के रिपोर्ट के अनुसार, 16 जून 2024 को राजेश अपने पड़ोस की एक बीमार महिला को डीआईजी बंगले के पास एक अस्पताल ले गए। वह दर्द से कराह रही थी। राजेश ने वही किया जो कोई भी सभ्य इंसान करता। उसे अस्पताल में भर्ती कराया और काम पर निकल गए। शाम तक महिला की मौत हो चुकी थी। अगली सुबह राजेश को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
राजेश ने बताया कि वह उस महिला को इसलिए अस्पताल ले गए क्योंकि उसने उनसे कहा था। शाम को पुलिस उसे उठा ले गई, पूछताछ की और अगले दिन गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने पुलिस को बताया कि वह उसे इलाज के लिए ले गए थे। पुलिस ने उन्हें परिवार से भी बात नहीं करने दी। उन्हें नौ दिनों तक थाने में रखा, फिर सीधे जेल भेज दिया गया। उनके पास वकील करने के पैसे नहीं थे।
राजेश ने कहा, ''पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के उनके किराए के कमरे पर ताला लगा दिया। अब मुझे 13 महीने का किराया देना है। कोई मुझे काम नहीं दे रहा है। सब कहते हैं कि मैं जेल से आया हूं। मैं निर्दोष था, फिर भी सलाखों के पीछे रहा। मेरे पास न जमीन है, न माता-पिता, कुछ भी नहीं। मुझे बदनाम भी किया गया है।" एक साल से ज्यादा समय तक राजेश बिना किसी सुनवाई के जेल में सड़ता रहा। उसे न तो कोई वकील मिला और न ही परिवार।
उसकी बहन कमलेश को उसकी गिरफ्तारी के नौ दिन बाद इसकी सूचना दी गई। राजेश की बहन ने बताया, "उन्होंने मुझे शाम 4 बजे फोन किया और कोर्ट आने को कहा। मैं अकेली थी इसलिए नहीं जा सकी। एक हफ्ते बाद जब मैं उनसे मिली तो उन्होंने मुझे सब कुछ बताया। जब मैं उनका आधार कार्ड और फोन लेने थाने गई तो उन्होंने मुझे इधर-उधर दौड़ाया और 500 रुपए वापस मांगे। अगर पुलिस ने ठीक से जांच की होती तो ऐसा कभी नहीं होता। हमारे परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं है। जब भी मौका मिलता, मैं उनसे मिलने जाती थी।"
कोर्ट द्वारा नियुक्त कानूनी सहायक वकील रीना वर्मा ने राजेश की रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया। कोर्ट ने आखिरकार राजेश को निर्दोष करार दिया। रीना वर्मा ने बताया कि उसके पास वकील रखने के लिए पैसे नहीं थे। कोर्ट ने मुझे नियुक्त किया। हम न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूरी ईमानदारी से काम करते हैं। यह पूरी तरह से मुफ्त सुविधा है।
बाल्टिक सागर किनारे रेत का किला बनाना हो या रविवार को खरीदारी करना, जर्मनी के अजीबोगरीब कानून आपको मुसीबत में डाल सकते हैं.
डॉयचे वैले पर स्टुअर्ट ब्राउन का लिखा-
दूसरे देशों के मुकाबले जर्मनी वैसे तो काफी खुले विचारों का देश नजर आता है. खुले में सिगरेट पीना हो या सार्वजनिक जगहों में बिना कपड़ों के खुले में बैठना या फिर 16 साल की उम्र में बियर पीना सब दूसरे देशों में गैर-कानूनी हो सकता है लेकिन जर्मनी में इसकी पूरी छूट है. हालांकि कई नियम ऐसे हैं जो बाकी देशों के लोगों को अटपटा लग सकता है. जर्मनी में इनके लिए भारी जुर्माना देना पड़ सकता है.
गुड फ्राइडे पर डांस और फिल्मों पर रोक
जर्मनी के 16 राज्यों में से ज्यादातर में गुड फ्राइडे को "साइलेंट पब्लिक हॉलीडे” माना जाता है. मध्ययुग से ही इस दिन डांस करना मना है. हालांकि, राजधानी बर्लिन में इस "तांस फरबोट” (डांस पर रोक) को लेकर रवैया थोड़ा उदार है. यहां गुड फ्राइडे को सुबह 4 बजे से रात 9 बजे तक ही यह रोक लागू रहती है. दक्षिणी, कैथोलिक राज्य बवेरिया में यह पाबंदी गुरुवार से शनिवार तक यानी पूरे 70 घंटे चलती है. इस कानून को तोड़ने वालों पर €10,000 (लगभग ₹10 लाख) तक का जुर्माना लग सकता है.
इस धार्मिक दिन पर शांति बनाए रखने के लिए शोरगुल वाली दूसरी गतिविधियां भी मना है, जैसे कार धोना या घर बदलना.
इस दौरान, जर्मनी के अलग-अलग राज्यों में करीब 700 फिल्मों पर भी रोक लगाई गई है. "पब्लिक हॉलीडे इंडेक्स” में "घोस्टबस्टर्स”, 1975 की कार्टून क्लासिक "हाइडी” और मोंटी पाइथन की 1979 में आई धार्मिक व्यंग्य फिल्म "लाइफ ऑफ ब्रायन” शामिल हैं.
हालांकि, जर्मन लोग ईस्टर के दौरान डांस करने की मांग लगातार करते आ रहे हैं और इस बैन के खिलाफ कई प्रदर्शन भी होते रहते हैं. 2013 में ये प्रदर्शन इस हद तक पहुंच गए थे कि पश्चिमी जर्मनी नॉर्थ राइन-वेस्टफालिया राज्य के बोखुम शहर में इस नियम के विरोध में "लाइफ ऑफ ब्रायन” की पब्लिक स्क्रीनिंग आयोजित की गई थी.
रात में मशरूम और दिन में जंगली लहसुन तोड़ने पर रोक
जर्मनी में रात के समय जंगल से मशरूम तोड़ना गैरकानूनी है. यह नियम इसलिए ताकि रात में जंगली जानवरों को परेशानी ना हो. ऐसे ही पेस्टो सॉस या सूप बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले जंगली लहसुन को भी जड़ों सहित निकालना मना है. इसकी वजह यह है कि नम, छायादार जंगलों और बाढ़ग्रस्त इलाकों में जहरीले पौधों, लिली ऑफ द वैली को जंगली लहसुन समझ कर तोड़ा जासकता है.
निजी उपयोग के लिए इस्तेमाल होने वाले जंगली लहसुन की पत्तियों को तो जर्मनी में आराम से कितनी भी मात्रा में तोडा जा सकता है. लेकिन पौधों को उखाड़ना या संरक्षित इलाकों में पत्तियों को तोड़ना कानूनी तौर पर वर्जित है.
बाल्टिक सागर के किनारे रेत के किले बनाने की मनाही
जर्मनी के नॉर्थ-सी और बाल्टिक सागर के किनारे छुट्टी मनाने वाले कई द्वीपों पर बच्चों का रेत के किले बनाना मना है. छुट्टियों में समुद्र किनारे बच्चे तैर तो सकते हैं, लेकिन रेत के किले बनाने या गहरे गड्ढे खोदने पर लगभग €1,000 (यानी एक लाख) का जुर्माना लग सकता है.
इन द्वीपों पर रेत के किले बनाने पर पाबंदी की एक ठोस वजह यह है कि रेत खोदकर इधर-उधर करने से समुद्र तट का कटाव (बीच इरोशन) हो सकता है.
हालांकि, बाल्टिक सागर के रयूगेन द्वीप के बिन्ज और सेलिन रिसॉर्ट्स में रेत के किले बनाने की अनुमति है, लेकिन शर्त यह है कि उनकी ऊंचाई 30 सेंटीमीटर (11.8 इंच) और परिधि 3.5 मीटर (11.5 फीट) से अधिक नहीं होनी चाहिए.
संडे को नहीं कर सकते शॉपिंग या गार्डन की कटाई
जर्मनी में रविवार को घास काटने की मशीन या कोई भी पावर टूल चलाने पर हो सकता है कि पड़ोसी नाराज हो जाएं और पुलिस को शिकायत कर दे.
यहां, रविवार के रूहेसाइट (यानी शांत समय) का पालन काफी सख्ती से किया जाता है. ऐसे में रविवार या किसी भी पब्लिक हॉलीडे पर लॉन काटने की मशीन समेत किसी भी मोटर वाले औजार का इस्तेमाल करना मना है. इसका पालन नहीं करने वालों पर भारी जुर्माना लग सकता है.
रविवार की यह शांति सड़कों तक फैली होती है. लाडेनश्लुसगेजेत्स (दुकान बंदी कानून) नाम का एक जर्मन कानून 1956 से लागू है, जिसके तहत रविवार या पब्लिक हॉलीडे पर दुकान खोलना मना है. हालांकि, 2006 से राज्यों को अपना नियम बनाने की छूट मिली है, लेकिन अब भी ज्यादातर जगहों पर रविवार को खरीदारी नहीं की जा सकती. साल में केवल कुछ गिने-चुने खास रविवारों और कुछ चुनिंदा दुकानों पर यह संभव हो सकता है.
ऑटोबान पर नहीं खत्म होना चाहिए गाड़ी में तेल
जर्मन ऑटोबान यानी एक्सप्रेस हाईवे पर गाड़ी में तेल खत्म होना भी एक तरह का अपराध है.गाड़ियों के शौकीन जर्मनी में अगर कोई ड्राइवर ऑटोबान पर निकलने से पहले अपनी टंकी ठीक से नहीं भरता है, तो उसे लापरवाह माना जाता है. ऐसा करने पर वह ना केवल खुद को बल्कि दूसरों को भी खतरे में डालता है, इसलिए उस पर जुर्माना लग सकता है क्योंकि जर्मन ऑटोबान पर गाड़ियां बिना किसी स्पीड लिमिट के बहुत तेजी से दौड़ती हैं.
ऑटोबान पर सिर्फ किसी इमरजेंसी में ही गाड़ी रोकी जा सकती है वो भी निर्धारित जगह पर.
-श्रुति व्यास
सन्नाटा और आसमान भारी और हवा नमी से लदी हुई। इन दिनों सुबह भी ठहरी सी होती है। न अखबार के हॉकर का इंतजार होता है और न दूधवाले की या ब्रेड-अंडा बेचने वाले की घंटी या टनटनाहट! अब तो ब्लिंकिट के ईवी साईकिल की घर्राहट होती है। डिलीवरी बॉय उतरता है, हाथ में झूलता कागज का थैला-दूध, ब्रेड, अंडे जैसे सुबह के जरूरी सामान। वह दो कदम भी नहीं चला होता कि रुस्तम आ टपकता है! कहाँ से? जैसे परछाईं से निकला हो। अचानक झपट, तेज, गूँजती भौंक जो कॉलोनी की दीवारों से टकराकर लौटती हैं। ब्लिंकिट का डिलीवरी बॉय घबरा जाता है, थैले की पकड़ ढीली पडऩे लगती है। वह पीछे हटता है, हाथ हिलाकर रुस्तम को भगाने की कोशिश करता है, पर इससे कुत्ते की गुर्राहट और सख्त हो जाती है-अब और तेज भौंकने लगता है। लडक़ा जोखिम नहीं लेता-ग्राहक को फ़ोन करता है, सीढिय़ों पर सामान छोडऩे की बात कहता है, और अपनी ईवी पर जितनी जल्दी हो सके वापस लौट जाता है।
दिल्ली ही नहीं, देश रुस्तमों से भरा हुआ है। सालों पहले मैंने भी एक आवारा कुत्ते से दोस्ती की थी-उसे बिस्कुट खिलाए, कान के पीछे खुजलाया, पार्क में उसका इंतज़ार किया। उस साथ में एक सीधी-सादी ख़ुशी होती है। पर मैं डर भी जानती हूँ-जब पार्क में कुत्तों का कोई अनजाना झुंड रास्ता रोक ले, जब जॉगिंग याकि दौड़ में पीछे आए कुत्ते से पीछा छुड़ाने की जद्दोजहद होती है। तब रास्ता बदलना होता है, दूर से ही खतरा बूझकर, लंबा चक्कर लगा कर, कुछ गेट्स से बचकर रास्ता बनाना पड़ता है।
मेरी गली का रुस्तम हमेशा ऐसा नहीं था। कुछ महीने पहले वह हमारी कॉलोनी में आया—पतला, धूल-धूसरित, बड़ी बादामी आँखों वाला एक आवारा, हल्की-सी पूँछ हिलाता, इतना विनम्र कि किसी के साथ चुपचाप चल पडता था। फिर ‘डॉग लवर्स’ ने उसे नोटिस किया-कभी बिस्कुट, कभी बचे-खुचे खाने के टुकड़े, सिर पर हाथ फेरना, उसकी आज्ञाकारी प्रकृति पर दुलार। पर थाली खाली होते ही, प्यार के पल बीतते ही, उस कुत्ते को वहीं सडक पर लावारिश छोड़ दिया जाता।
कुछ समय बाद उसका एक घर का दरवाज़ा ठिकाना बन गया। वह वहीं सोने लगा, वहीं से दुनिया देखने लगा। और इसी ‘इलाके’ में, कहीं न कहीं, वह नरमदिल आवारा चौकन्ना चौकीदार बन गया—पहचाने चेहरों के प्रति वफ़ादार, अजनबियों के लिए आक्रामक। पड़ोसियों के लिए मुफ़्त सुरक्षा; दूसरों के लिए-एक साया, तेज़ दाँतों के साथ।
इस एक आवारा कुत्ते की कहानी को लाखों में गुणा कीजिए-आपको दिल्ली की हर गली, हर कोने में रूस्तम मिल जाएगे। गली के शेर। जब चाहे तब शौर मचाते हुए। दिल्ली अब वह महानगर है जहां यहां तो राजनीति का शौर है या आवारा कुत्तों की भौं-भौं है। और वैसे ही राजधानी की सडक़ें और अदालतें अब आवारा कुत्तों के भविष्य पर भी बँटी हुई हैं। शहर के कई हिस्सों में, कुत्ते ढांचे का हिस्सा बन गए हैं-चाय की दुकानों के नीचे लेटे, फलों की रेहडिय़ों के बीच से निकलते हुए। कुछ जगहों पर वे इलाकाई बैरिकेड हैं-जहाँ पैर रखना मतलब पीछा कराए बिना नहीं लौटना।
पिछले साल, एक कश्मीरी दोस्त पहली बार दिल्ली आया-साथ में ले गया एक अनचाही याद: ग़लत शॉर्टकट लेने के बाद घिरकर काटे जाने का सदमा। और यह सिफऱ् कुत्तों की बात नहीं—बंदर, गाय, लफ़ंगे, जेबकतरे, सभी से दिल्ली भरी पड़ी है। हमारी सडक़ें केवल अव्यवस्थित नहीं, असुरक्षित भी हो गई हैं। तभी मैं अक्सर सोचती हूँ—कितना बोझ एक शहर के नागरिक को सिफऱ् अपने ही रास्तों पर सुरक्षित चलने के लिए उठाना पडता है या उठाना चाहिए?
सो सोमवार को कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तो राहत थी तो सवाल भी? आदेश के मुताबिक क्या आठ हफ़्तों में सार्वजनिक जगहों से सभी आवारा कुत्तों को हटाना, नसबंदी और टीकाकरण करना, सीसीटीवी निगरानी वाले शेल्टर बनाना संभव है? स्वभाविक है जो शहर बँट गया। कुत्तों ने जिनको काटा, दौड़ाया या डराया उनके लिए तो यह देर से मिला न्याय है। जबकि पशु-अधिकार समूहों के एक्टिविस्ट लोगों के लिए-यह नागरिक व्यवस्था के खोल में लिपटी एक क्रूरता है।
पीटा इंडिया जैसी संस्थाएँ कहती हैं कि कुत्तों का इस तरह विस्थापन अमानवीय ही नहीं, बेअसर भी है—कुत्ते लौट आएँगे या उनकी जगह दूसरे ले लेंगे, जब तक मूल कारणों पर काम नहीं होता: अनियंत्रित प्रजनन, फेंका हुआ खाद्य अपशिष्ट, अवैध ब्रीडर और अनियमित पालतू दुकानों पर लगाम। और सबसे बड़ी बात हाल के सालों में कुत्तों को राहु, केतु का पर्याय मान उनकों भक्तों द्वारा बिस्कुट, दूध, खाना खिलाने का धर्म-कर्म है।
मैं सोचती हूँ कि कुत्तों को हटाने का विरोध करने में कार्यकर्ताओं की आवाज तेज़ है लेकिन ज़्यादा शेल्टर बनाने की माँग पर लोग क्यों नहीं ज्यादा बोल रहे है? कुत्तों को गोद लेने, उन्हे घर में पालने के कार्यक्रमों के लिए, सुरक्षित स्थानों के लिए, जहाँ आवारा सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा बने बिना रह सकें-इसके लिए उतनी ही मुखर मुहिम क्यों नहीं है? क्या सडक़ पर कुत्तों का रहना सचमुच एक अच्छे शेल्टर से ज़्यादा मानवीय है? और सबसे अहम-जब बच्चों को आवारा कुत्तों ने मार डाला, तब नैतिक आक्रोश कहाँ था?
पश्चिम के कई देशों में आवारा कुत्ता दुर्लभ है-क्योंकि वहाँ व्यवस्था नाम की एक प्रणाली है। माइक्रोचिप से कुत्तों के मालिकों का पता लगाया जाता है। शेल्टर होते हैं। नसबंदी होती है। अनक्लेम्ड कुत्तों को नया घर मिलता है-कुछ को इच्छामृत्यु दी जाती है। मतलब सडक़ कोई विकल्प नहीं। मगर भारत में तो, सडक़ ही वह स्थान, वह व्यवस्था है-जिसे कार्यकर्ता, डॉग लवर्स, मेनका गांधी जैसे राजनीतिक संरक्षक और वे लोग इसलिए पसंद करते है क्योंकि सभी तो बिना जि़म्मेदारी के मुफ्त सुरक्षा चाहते हैं। यह वफ़ादारी भी पालती है और खतरा भी। आपके गेट के बाहर बैठा कुत्ता उसे चोरों से बचा सकता है, पर दूधवाले से या आपके ही मेहमानों, राहगीरों को डराने, काटने का आंतकी भी हो सकता है।
हाँ, कुत्तों को दोष देना गलत है-समस्या तंत्र में है। पर जब खतरा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए, तो कार्रवाई ज़रूरी हो जाती है। अदालत आगे भी जा सकती थी-क्यों सिर्फ कुत्ते? क्यों नहीं बंदरों और गायों पर भी, जिनकी सडक़ पर मौजूदगी उतनी ही ख़तरनाक है, पर जो धार्मिक-राजनीतिक रूप से अछूते हैं? गौमाता है, उनके लिए गौशालाओं का धर्मादा है बावजूद वे सडकों पर (बारिस में तो खासकर) घूमती या बैठी रहती है। ऐसे ही नील गाय हो या बंदर। बंदरों के कैले खिलाकर तीर्थस्थान से लेकर खेत-खलिहान तक इनकी आबादी इतनी बढ़वा दी गई है कि वह दिन दूर नही है जब भारत का किसान खेती से तौबा कर कह बैठे कि अमेरिका से ही अनाज मंगा कर खा लो।
-सनियारा खान
आजादी की लड़ाई में सब से कम उम्र में शहीद होने वाली लडक़ी के रूप में असम की कनक लता बरुआ का चेहरा ही सामने आ जाता है। उनका नाम भले ही असम के लोगों के लिए जाना पहचाना और स्मरणीय नाम हो, लेकिन बाकी देश के शायद मु_ी भर लोग ही उनके बारे में जानते होंगे। ये बड़े अफसोस की बात है कि आज़ादी की लड़ाई लडऩे वाले और लड़ कर जान देने वाले हमारे देश के अलग अलग प्रांतों के बहुत से नामों को हम जानते ही नहीं हैं या फिर जानने के बाद भी धीरे धीरे भूल जाते हैं।
कनक लता बरुआ, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले कर देश के लिए जान देने वाली असम की पहली महिला थी। सन 1924 में 22 दिसम्बर के दिन जन्म लेने वाली कनक लता एक सम्भ्रांत परिवार से थी। उनके मामा देवेंद्र नाथ बरा एक जाने-माने कांग्रेसी नेता थे। छोटी उम्र से ही मामा और बाकी लोगों से वे ये सब बातें सुनती रहती थी कि कैसे सात समंदर पार से आ कर अंग्रेजों ने हमारे मुल्क पर कब्जा कर लिया था और कैसे अपने मुल्क को उनसे आज़ाद करने के लिए हमारे भारतीय भाई बहन सभी अपनी जानों की परवाह न करते हुए लड़ रहे थे! गांधीजी की बातों से वे कम उम्र में ही प्रभावित हो गई थी। लेकिन एक समय वे दिलों जान से आजाद हिन्द फौज में शामिल होना चाहती थी। शायद वे तय कर नहीं पा रही थी कि किसके साथ मिल कर देश बचाने की राह में आगे बढ़े! तभी असम के प्रख्यात गीतकार और नाट्यशिल्पी ज्योति प्रसाद आगरवाला जी द्वारा गठित ‘मृत्यु बाहिनी’ नामक लड़ो या मरो मानसिकता रखने वाली एक संगठन के बारे में कनक लता बरुआ को पता चला। ये संगठन देशप्रेमी और जांबाज युवक युवतियों से भरा हुआ था।
-उमंग पोद्दार
साल 2023 में भारत सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पारित किया। यह कानून नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से लाया गया था।
कई मसौदों पर विचार के बाद अगस्त 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ और इसके बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
हालांकि, कानून के बनने के बाद से ही इसकी आलोचना हो रही है। आलोचकों में पत्रकार भी शामिल हैं, जिनका मानना है कि इस कानून से पत्रकारिता की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
बीते 28 जुलाई को कई पत्रकार संगठनों ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) के सचिव एस कृष्णन से मुलाकात की। इस बैठक में उन्होंने सरकार से कानून के कुछ प्रावधानों में संशोधन की मांग की।
फिलहाल डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट लागू नहीं हुआ है। इस कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिन पर केंद्र सरकार को नियम बनाने होंगे।
जनवरी 2025 में सरकार ने इस क़ानून से संबंधित ड्राफ्ट रूल्स जारी किए थे, जिन पर अभी विचार किया जा रहा है।
आइए समझते हैं कि यह क़ानून क्या है और इसके लागू होने से पत्रकारिता पर क्या और किस तरह का असर पड़ सकता है।
क्या है कानून?
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया था, जिसके बाद यह क़ानून लाया गया। इस क़ानून के तहत अगर कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी के व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करता है, तो उसे कुछ शर्तों का पालन करना होगा।
मिसाल के तौर पर किसी का भी निजी डेटा लेने से पहले उस व्यक्ति से सहमति लेनी होगी, डेटा का इस्तेमाल वैध मक़सद के लिए करना होगा और साथ ही डेटा की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा। इसके मुताबिक, कोई व्यक्ति अपना निजी डेटा देने के बाद उसे हटवाने की भी माँग कर सकता है।
इस कानून का उल्लंघन करने पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। सरकार इस जुर्माने को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये तक भी कर सकती है।
निजी डेटा में वह सारी जानकारी शामिल है जिससे किसी की पहचान सार्वजनिक हो सकती है। इसमें नाम, पता, फोन नंबर, तस्वीर, सेहत और वित्तीय मामलों से जुड़ी जानकारी और किसी व्यक्ति की इंटरनेट ब्राउजि़ंग हिस्ट्री जैसे विवरण शामिल हैं। साथ ही, इस क़ानून में डेटा को ‘प्रोसेस’ करने की भी परिभाषा दी गई है। इसमें डेटा इक_ा करना, उसे स्टोर करना और प्रकाशित करना शामिल है।
इस कानून को लागू करने की जि़म्मेदारी केंद्र सरकार की संस्था ‘डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया’ की होगी। यह बोर्ड जुर्माना लगाने, शिकायतों पर सुनवाई करने जैसे कई मामलों में काम करेगा।
पत्रकार क्यों कर रहे हैं विरोध ?
पत्रकार संगठनों का कहना है कि निजी डेटा का इस्तेमाल लगभग हर तरह की पत्रकारिता में होता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई पत्रकार किसी अफसर के भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट कर रहा है, तो उसमें उस अफसर के निजी डेटा का जि़क्र आ सकता है।
इसलिए पत्रकारों ने इस क़ानून के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। जैसे कि इस क़ानून के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का डेटा साझा करने का आदेश दे सकती है।
पत्रकारों को आशंका है कि अगर सरकार इस तरह का आदेश जारी करती है, तो उनके गुप्त सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है। कई बार रिपोर्टिंग में ऐसे स्रोत शामिल होते हैं जिनकी गोपनीयता बनाए रखना ज़रूरी होता है।
फरवरी 2024 में एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को चि_ी लिखकर इस कानून के कई प्रावधानों पर चिंता जताई थी। गिल्ड ने लिखा था कि यह क़ानून ‘पत्रकारिता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है।’
अश्विनी वैष्णव केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं।
पत्रकारों का कहना था कि इस क़ानून से इंटरव्यू और दूसरी चीजें प्रभावित न भी हों लेकिन खोजी पत्रकारिता और संवेदनशील रिपोर्टिंग पर इसका असर पड़ सकता है।
25 जून को 22 प्रेस संगठनों और एक हज़ार से ज़्यादा पत्रकारों ने भी सरकार को ज्ञापन भेजा, जिसमें क़ानून में बदलाव की माँग की गई।
इन पत्रकारों में अख़बार, टीवी, यूट्यूब और फ्रीलांसर पत्रकार शामिल हैं।
पत्रकारों की क्या माँग है?
पत्रकारों की माँग है कि पत्रकारिता के कार्यों के लिए इस कानून से छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान में कुछ उद्देश्यों, जैसे अपराध की जाँच के लिए डेटा प्रोटेक्शन कानून से छूट दी गई है।
जब इस कानून का पहला ड्राफ्ट साल 2018 में प्रकाशित हुआ था, तब उसमें पत्रकारिता से संबंधित कई प्रावधानों से छूट दी गई थी।
साल 2019 में जब यह विधेयक पहली बार संसद में पेश हुआ, तब भी ऐसी छूट दी गई थी। इसी तरह साल 2021 के ड्राफ्ट बिल में भी पत्रकारिता के लिए कुछ छूट थी।
हालांकि, साल 2023 में जब यह कानून पारित किया गया, तो पत्रकारिता से जुड़ी छूट हटा दी गई। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया।
पत्रकारों ने सरकार से इस पर जवाब माँगा है। इसके साथ ही पत्रकार संगठनों का कहना है कि 'पत्रकार की परिभाषा' को केवल मीडिया संस्थानों में काम करने वाले लोगों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
एडिटर्स गिल्ड ने अपनी चि_ी में यह भी उल्लेख किया है कि यूरोप और सिंगापुर जैसे देशों के डेटा प्रोटेक्शन कानूनों में पत्रकारिता को छूट दी गई है। इस विषय पर 2018 की जस्टिस बी। एन। श्रीकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर पत्रकारों को डेटा प्रोटेक्शन क़ानून का पूरी तरह पालन करना पड़ा, तो इसका अर्थ होगा कि कोई व्यक्ति अपने ख़िलाफ़ रिपोर्ट के लिए सहमति नहीं देगा।
30 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की उपाध्यक्ष, पत्रकार संगीता बरुआ पिशारोती ने बताया कि उन्होंने 28 जुलाई को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव से मुलाकात की थी।
उनके अनुसार, ‘सरकार की ओर से कहा गया है कि इस क़ानून से पत्रकारों को कोई मुश्किल नहीं होगी। मंत्रालय के सचिव ने हमें एफएक्यूज (फ्रीक्वेंटली आस्क्ड क्वेश्चन्स) तैयार करके देने को कहा है।’
उन्होंने कहा कि पत्रकार संगठन क़ानून में संशोधन की माँग कर रहे हैं और तब तक पत्रकारों को इससे अस्थाई तौर पर छूट दी जानी चाहिए।


