राजपथ - जनपथ
कुछ भूपेश के खिलाफ, कुछ साथ
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम में डॉक्टरों की ड्यूटी लगाने पर सवाल खड़े किए हैं। भागवत पिछले तीन दिनों से रायपुर में हैं, और वे संघ के अनुषांगिक संगठनों की बैठक ले रहे हैं। भूपेश ने सरकार, और प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए डॉक्टरों की ड्यूटी ऑर्डर को निरस्त करने की मांग की है।
कई लोग भूपेश की मांग को राजनीति से प्रेरित करार दे रहे हैं। वजह यह है कि मोहन भागवत को पहले जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी, जिसे बढ़ाकर एडवांस सिक्योरिटी लाइजन (एएसएल) कर दिया है। खुफिया एजेंसी आईबी ने भागवत की सुरक्षा को लेकर अलर्ट किया हुआ है। ऐसे में प्रशासन ने डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई है, तो यह कहीं से कोई गलत नहीं है।
पूर्व सीएम के फेसबुक पेज पर कई लोगों ने उन्हें जमकर उलाहना दी है। द्वारिका निषाद नामक एक यूजर ने नवीन विधानसभा भवन के उद्घाटन कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र साझा करते हुए पूछा कि श्रीमती सोनिया गांधी जी कौन से संवैधानिक पद पर थीं जिसे आपने नवीन विधानसभा भवन छत्तीसगढ़ का उद्घाटन करने का अवसर प्रदान किया? एक अन्य ने लिखा इसमें गलत क्या है जी, सरकार जिसे चाहे उसे राज्य अतिथि का दर्जा दे सकती है। हालांकि कई लोगों ने भूपेश का समर्थन भी किया है। कुल मिलाकर भागवत के दौरे को लेकर काफी हलचल है।
छंटेलों में दो नयों की चर्चा
वन विभाग में शीर्ष अफसरों की भ्रष्टाचार में संलिप्तता जगजाहिर है। जांच एजेंसियों में दर्ज प्रकरण इसकी गवाही भी दे रहे हैं। इन सबके बीच कुछ जूनियर अफसर विपरीत परिस्थितियों में बेहतर काम करते दिख रहे हैं, जिसकी काफी चर्चा भी हो रही है। इन्हीं में से दो आईएफएस अफसर वरुण जैन, और अंबिकापुर डीएफओ तेजस शेखर भी हैं।
आईएफएस के 2017 बैच के अफसर वरुण जैन ने ओडिशा से सटे उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में वन भूमि पर अतिक्रमण और शिकार को रोकने के लिए अब तक की सबसे प्रभावी कार्रवाई की है। उन्होंने पूरे इलाके का माहौल ऐसा बना दिया है कि वनग्राम के लोग खुद ब खुद अतिक्रमण करने वालों, और शिकारियों के बारे में सूचना वन अमले को दे रहे हैं। पिछले डेढ़ साल में डेढ़ सौ शिकारियों को हिरासत में लिया गया है।
इसी तरह अंबिकापुर डीएफओ तेजस शेखर भी अपनी ईमानदार कार्यशैली की वजह से स्थानीय लोगों के बीच चर्चा में बने हुए हैं। उन्होंने भी अवैध कटाई को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई की है। चर्चा तो यह भी है कि लकड़ी के कारोबार से जुड़े कई लोग उन्हें उपकृत करना चाहते थे, वे पहले भी ऐसा करते आए हैं। मगर तेजस शेखर ने अपना सख्त रवैया दिखा दिया। ये अलग बात है कि स्थानीय कई जनप्रतिनिधि उनसे नाखुश हैं। इससे बेपरवाह तेजस जंगल के संरक्षण में जुटे हुए हैं। विभाग की बहुत सी अप्रिय चर्चाओं के बीच इन जूनियर अफसरों की कार्यशैली से उम्मीद की किरण भी नजर आ रही है।
शिक्षा में डिजिटल क्रांति आ पाएगी?
वन नेशन-वन इलेक्शन, वन नेशन- वन टैक्स की तर्ज पर नई शिक्षा नीति में अपार आईडी का प्रावधान किया गया है- जिसे वन स्टूडेंट-वन आईडी नाम दिया गया है। अपार का मतलब है- आटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक एकाउंट रजिस्ट्री। यह नंबर भविष्य की सभी अंक सूचियों में दर्ज होंगे और छात्र इन्हें डिजी लॉकर में रखेंगे। इसी डिजिटल दस्तावेज के जरिये उन्हें अगली कक्षा में प्रवेश मिलेगा। बताया यह गया है कि इससे किसी भी बच्चे का प्रोफाइल एक क्लिक से देखा जा सकेगा। वह देश के किस स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहा है- मालूम हो जाएगा। यह पता लग सकेगा कि वह किन विषयों में रुचि रखता है, उसे आगे किस तरह के करियर चुनना चाहिए। इसके अलावा ड्रॉप आउट बच्चों का पता लगाया जा सकता है। यदि उसने कहीं भी दाखिला नहीं लिया है तो उसे आगे पढऩे के लिए स्कूलों में लाया जा सकेगा।
लक्ष्य रखा गया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 तक पूरे देश में सभी निजी व सरकारी स्कूल के छात्र-छात्रा 12 अंकों वाले यूनिक नंबर से पहचाने जाएंगे। पर इस वर्ष जिन राज्यों में इसे प्रायोगिक रूप से शुरू किया गया है, उनमें दिल्ली के अलावा छत्तीसगढ़ को शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ में इसी शैक्षणिक सत्र यानि 2024-25 में सभी छात्रों की अपार आईडी बनाने का लक्ष्य रखा गया है। मगर, यह काम बहुत धीमी गति से चल रहा है। हालत यह है कि प्रदेश में अब तक 40 फीसदी भी अपार आईडी नहीं बन पाए हैं। कुछ जिलों में तो प्रदर्शन बहुत कमजोर है। उदाहरण के लिए जांजगीर जिले में तीन माह के भीतर करीब 50 प्रतिशत छात्रों की आईडी बन पाई है। इस काम में लापरवाही के चलते 18 प्राचार्यों को हटाने का निर्देश कलेक्टर ने दे दिया। प्राइवेट स्कूलों के संचालक अलग समस्या खड़ी कर रहे हैं। इस जिले में 170 से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं पर जब डीईओ ने अपार आईडी के लिए बैठक बुलाई तो उनमें से 20 भी नहीं पहुंचे। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में 107 प्राचार्यों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। उनका वेतन रोकने का भी आदेश दिया गया है। इस जिले में तीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी हैं-तीनों को नोटिस जारी किया गया है। सरगुजा जिले में 42 प्रतिशत आईडी ही बन पाए हैं। यहां भी प्राचार्यों और ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को नोटिस जारी की गई है। सारंगढ़ और सक्ती जिले में भी यही स्थिति है। बिलासपुर जिले में में कुछ अधिक ही ढिलाई बरती जा रही है। यहां के करीब 4 लाख बच्चों में से केवल 18 हजार के अपार आई डी बन पाए हैं, जो करीब 5 प्रतिशत भी नहीं पहुंचता। कलेक्टर के निर्देश पर सभी सरकारी व निजी स्कूलों- जिनकी संख्या 2500 से अधिक है- को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। निजी स्कूल संचालकों को उनकी मान्यता रद्द करने की चेतावनी भी दी गई है।
अपार आईडी बनने और हर छात्र का यूनिक नंबर तैयार होने के अपने फायदे हैं, पर दिख यह रहा है कि शिक्षकों, प्राचार्यों को इसे तैयार करने में कई व्यवहारिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। एक कारण यह है कि आधार कार्ड और स्कूल के रिकॉर्ड में जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज हैं। स्कूल में जन्मतिथि नहीं बदली जाएगी, आधार कार्ड में संशोधन करना है। आधार कार्ड में जो मोबाइल नंबर दर्ज हैं, बहुतों ने उस सिम को बंद कर दिया है, नए नंबर ले चुके हैं। इसलिए ओटीपी अपडेट नहीं हो रहे हैं। कई अभिभावक अपार को लेकर सशंकित हैं, वे अपनी सहमति नहीं दे रहे हैं, जिसके बिना आईडी बनने वाली नहीं है। फिर शिक्षकों पर इस समय कोर्स पूरा करने और एग्जाम की तैयारी करने का दबाव भी है। जिलों में कलेक्टर बैठकें ले रहे हैं, समीक्षा के दौरान खराब प्रदर्शन को देखकर शिक्षकों, प्राचार्यों पर कार्रवाई कर रहे हैं। मगर, इन दिक्कतों का समाधान कैसे निकले, इस पर विचार नहीं कर रहे हैं।
नया साल, दोस्ती की मिसाल

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें दिख रहा है कि एक झील से मछली बाहर आती है, पपी उसके साथ खेलता है। जब सांस टूटने लगती है तो मछली पानी में गोते लगाने चली जाती है। थोड़ी देर में निकलकर फिर पपी के साथ खेलने लगती है। लोगों ने प्रतिक्रिया दी है, कि नया साल ऐसी ही दोस्ती और प्रेम का पैगाम सबके लिए लेकर आए।
नाम की गफलत में छापा
करीब डेढ़ साल की चुप्पी के बाद ईडी ने शराब घोटाला केस में बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा, और उनके आधा दर्जन करीबियों के यहां छापेमारी की। जिन लोगों के यहां छापे डले हैं, उनमें प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि सुशील ओझा, और उनके पूर्व ओएसडी जयंत देवांगन भी हैं।
सुशील ओझा, पूर्व मंत्री के राजनीतिक प्रबंधन देखते रहे हैं। उनके यहां ईडी पहुंची, तो वो घर पर नहीं थे। उनसे जुड़े लोगों का दावा है कि सुशील का शराब कारोबार से सीधा कोई वास्ता नहीं रहा है। मगर कवासी जब भी प्रदेश से बाहर जाते थे, सुशील साथ होते थे।
सुशील को उनका राजदार माना जाता है। ऐसे में कवासी के साथ सुशील के यहां छापेमारी हुई, तो कई लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ। हालांकि सुशील ने छापेमारी पर कटाक्ष किया, और फेसबुक पर लिखा- गरीब ब्राह्मण के घर ईडी आई धन्यवाद मोदीजी।
इससे परे जयंत देवांगन के यहां छापेमारी से कई लोगों को आश्चर्य हुआ। वजह यह है कि जयंत, आबकारी मंत्री के ओएसडी रहते आबकारी की फाइलों से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था। कवासी के यहां आबकारी की फाइल देवांगन उपनाम के एक अफसर कराते थे। ये अलग बात है कि जो अफसर कवासी लखमा से आबकारी की फाइल कराते रहे हैं, वो फिलहाल बचे हुए हैं।
खैर, ईडी की टीम ने जयंत से सामान्य पूछताछ के बाद उनके मोबाइल वगैरह को भी वापस कर दिया। दूसरी तरफ, ईडी की टीम कवासी, और उनके परिवार के सदस्यों के मोबाइल भी डिकोड करने में सफल रही है। अब मोबाइल क्या कुछ राज उगलती है, यह देखना है।
तारीफ हो रही, लेकिन...

राजधानी पुलिस की कल से बहुत तारीफ हो रही है। कारण है शहर के हृदय स्थल शास्त्री चौक को नो आटो जोन करना। जो काम 24 वर्ष में नहीं हो पाया उसे पुलिस ने बीते 24 घंटे में कर दिखाया। शास्त्री चौक पर फर्क दिखाई दे रहा है। सबसे व्यस्ततम चौर पर ट्रैफिक अब स्मूद और सुविधाजनक हो गया है। चौक के रेड सिग्नल पर खड़ा हर नागरिक तारीफ करने से नहीं चूक रहा है।
एक सरदार जी ने तो यहां तक कह दिया कि 26 जनवरी को सम्मानित करना चाहिए पुलिस को। शहर से एक तरह से राह चलते सडक़ की गुंडई खत्म हो गई है, इन आटो वालों की। बेतरतीब पार्किंग और ड्राइविंग से महंगी गाडिय़ों पर स्क्रेच करना, अचानक टर्न लेने से होने वाले हादसे, विरोध करने पर गुंडई, खासकर चाकूबाजी जेबकटिंग और इतने विशाल चौक पर जाम से मुक्ति मिल गई है। हर कोई चौक पर खड़े सिपाहियों को शाबासी देते नहीं थक रहा। सिपाहियों का कहना था कि पब्लिक सपोर्ट के बिना संभव नहीं था। सबसे अधिक समस्या ई रिक्शा वाले पैदा कर रहे थे। जो भी हो ढाई दशक की बड़ी समस्या दूर हो गई। और इसे राजधानी के सीएसपी, एएसपी से रूप में झेल चुके एसएसपी लाल उम्मेद सिंह ने अपने अनुभव का पूरा इस्तेमाल कर दूर करने में सफलता पाई है। और अब सबकी निगाहें स्टेशन चौक की ओर है। इसके बाद यह शहर ईज ऑफ ट्रैफिक को हासिल कर लेगा।
एक सवाल यह भी उठ रहा है कि अब शास्त्री चौक से गुजरने वाले ऑटो-मुसाफिरों को आधा किलोमीटर या उससे अधिक पैदल चलकर दूसरी तरफ ऑटो पकडऩा होगा, खर्च भी बढ़ेगा, और दो-दो बड़े-बड़े अस्पताल, कलेक्ट्रेट, कोर्ट, तहसील, रजिस्ट्री जाने वाले बुजुर्गों का क्या होगा? वे सब पैदल चलने को मजबूर होंगे? इस चार-छह जगहों पर ही रोज लाख-पचास हजार लोग ऑटो पर पहुंचते हैं।
एक जानकर का कहना यह भी है कि पुलिस ने शास्त्री चौक पर ऑटो वालों की भीड़, गुंडागर्दी, और अराजकता पर काबू किया नहीं, और अब जरूरत से कड़ा कदम उठाया है, जिससे गरीब जनता का जीना हराम हो जाएगा। आज सुबह का नजारा है की शास्त्री चौक की गुंडागर्दी मेकाहारा चौक शिफ्ट हो गई है।
धरनास्थल की पुराने शहर वापसी

जन आंदोलन करने वालों की मांग बहुत जल्द पूरी होने जा रही है । वह यह कि धरना स्थल एक बार फिर पुराने शहर में शिफ्ट होने वाला है । शासन प्रशासन ने अपने खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शन को नया रायपुर के तूता से बाहर करने की तैयारी में है। इसके पीछे कई कारण है इनमें मंत्रालय, संचालनालय के बाद विधानसभा भवन शुरू होना। केंद्री से नवा रायपुर होकर मंदिर हसौद रेल लाइन, फिल्म सिटी का निर्माण, बिजनेस पार्क, फार्मास्यूटिकल पार्क।
ये सभी तूता धरना स्थल से दो ढाई किमी दूर ही है। और वहां धरना स्थल बनाए रखने से रेल रोको, विधानसभा घेराव, सीएम-मंत्री घेराव एक बड़ी समस्या खड़े कर सकता है। इससे निपटने का यही एक रास्ता है कि धरना स्थल रायपुर शिफ्ट कर दिया जाए। इसके लिए जल्द ही जिला, पुलिस निगम के अधिकारियों की बैठक कर स्थल चयन करने जा रहे हैं । अब बूढ़ापारा में वेंडिंग जोन बनाए दिए जाने से नई जगह ढूंढनी होगी। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि तूता के बजाए नए शहर में ही किसी दूर सेक्टर में जंगल सफारी के आसपास चिन्हित किया जा सकता है। या मंदिर हसौद, माना में भी। लेकिन राजनीतिक माइलेज से लिए कर्मचारी संगठनों के नेता पुराने शहर को बेहतर विकल्प बता रहे।
पार्षदों को अब अपनी फिक्र हुई..
नगर निगमों का कार्यकाल खत्म होने को है। पांच सालों का लेखा-जोखा करने का समय आ गया है। शहर के विकास में पार्षदों और महापौर का योगदान क्या रहा, इसका आकलन जनता जरूर करेगी। पर फिलहाल, नगर निगमों में जो हलचल है, वह कुछ और कहानी बयां करती है। सभी नगर निगमों में एक आखिरी सामान्य सभा की बैठक बुलाने की जल्दबाजी है। बैठक में ऐसे प्रस्ताव लाने की कोशिश हो रही है, जो यह दिखा सके कि जनप्रतिनिधि जनता के हितों के प्रति संवेदनशील हैं। इधर, कोरबा नगर निगम में तो मामला और भी दिलचस्प हो गया है। यहां सामान्य सभा की प्रस्तावित बैठक में दो अहम प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं—पहला, प्रत्येक पार्षद के लिए 2000 वर्गफीट जमीन का आवंटन और दूसरा, पार्षदों और उनके परिवार के लिए किसी पर्यटन या तीर्थ स्थल का भ्रमण।
इन प्रस्तावों को एमआईसी ने पहले ही हरी झंडी दे दी है। अंतिम मुहर के लिए सामान्य सभा में पेश किया जाएगा। इन प्रस्तावों पर किसी प्रकार की बहस या विरोध की संभावना कम है। पक्ष-विपक्ष, दोनों इसे सहर्ष स्वीकार करने को तैयार दिख रहे हैं।
बात यह भी है कि पार्षदों को अपने और अपने परिवार के बारे में सोचने का विचार काफी देर से आया। अब जब आचार संहिता लागू होने की तैयारी है, तो राज्य सरकार से मंजूरी लेने का समय भी कम बचा है। जमीन के आवंटन के लिए सरकार से स्वीकृति अनिवार्य होगी। भ्रमण का खर्च नगर निगम के फंड से किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भी सरकार की अनुमति जरूरी होगी।
जवाब ढूंढने की कोशिश...

गंदगी फैलाना ज्यादा अच्छी बात होती हैं, या सफाई करना? गंदगी फैलाने वालों को ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए, या सफाई करने वालों को? कूड़ा उठा रही यह श्रमिक शायद अंबेडकर की किताब हाथ में लेकर यह समझना चाहती है कि स्वच्छता के काम में लगे लोगों को इज्जत क्यों नहीं दी जाती। नागपुर के एक पुस्तक मेले की तस्वीर।
लास्ट ओवर की बैटिंग
साल के आखिरी दिन कई अफसर रिटायर भी हो रहे हैं। इन्हीं में से आदिवासी इलाके में पदस्थ एक अफसर रिटायरमेंट के आखिरी दिनों में ट्वेंटी-ट्वेंटी के अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं। अगले दो दिनों में अफसर से अपने रुके काम करवाने के लिए होड़ मची हुई है।
अफसर के बंगले के बाहर गाडिय़ों का काफिला देखा जा सकता है। अफसर पहले भी इस इलाके में पदस्थ रहे हैं। लिहाजा, उनके संपर्क का दायरा काफी बड़ा है। यही वजह है कि अफसर तेजी से फाइल निपटा रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सरकार के लोगों को अफसर के हरकत की जानकारी नहीं है। एक मंत्री तो को लेकर आपसी चर्चा में काफी कुछ कह चुके हैं। अब वो किस तरह, और कैसी फाइल निपटाते हैं, यह तो उनके जाने के बाद ही पता चलेगा।
न्यू ईयर सेलिब्रेशन ने फूंकी जान

ईयर एंडिंग और न्यू ईयर सेलिब्रेशन के इन दिनों ने दुर्ग विशाखापट्टनम वंदे भारत एक्सप्रेस में जान फूंक दी है। सितंबर मध्य में शुरू हुई ट्रेन अपने उद्घाटक सफर के दूसरे ही दिन से पैसेंजर रिस्पांस को लेकर साँसें गिन रही थी। इस ट्रेन की अब तक रिस्पांस के चलते स्लीपर वंदे भारत की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं।
यह चेयर कार ट्रेन बीते इन महीनों में 30 फीसदी बुकिंग पर दौड़ रही थी। 18 डिब्बों की इस ट्रेन में 1128 सीटें हैं। कभी यह ट्रेन 250 तो किसी दिन 300 से अधिक यात्रियों के साथ चलती रही है। क्वालिटी ब्रेक फास्ट,लंच और डिनर पैक के साथ अच्छे सर्विस से बाद भी महंगे टिकट भाड़े की वजह से यात्री विमुख रहे। इससे इसका ऑपरेशन कॉस्ट भी नहीं निकल रहा था। इस वजह से ट्रेन के 16 कोच में कटौती कर 8 से ही चलाने की भी बात सामने आती रहीं हैं। लेकिन रेलवे नो प्रॉफिट नो लॉस के बिजनेस रूल के तहत ट्रेन चलाई जा रही है। लेकिन 20 दिसंबर के बाद से मानों वंदे भारत में जान आ गई है। और अब हर रोज 500 से अधिक सीट बुकिंग के आंकड़े मिले हैं।
25 दिसंबर को तो दुर्ग रायपुर से 1060 सीटों की बुकिंग रही। यह समुद्री पर्यटन शहर विशाखापट्टनम के आकर्षण के चलते देखने को मिला है। यह सिलसिला अभी 20 जनवरी तक बने रहने के संकेत हैं। 10 जनवरी के बाद छत्तीसगढ़ में मूल आंध्रवासियों की पोंगल के लिए गृह क्षेत्र के लिए आवाजाही रहेगी। उसके बाद परीक्षाओं के सीजन में फरवरी से अप्रैल तक ट्रेन के फिर से वेंटिलेटर पर जाना तय है।
जिसकी सरकार- उसी की रेत
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दौरान अवैध रेत खनन जोरों पर था। एनजीटी द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद दिनदहाड़े पोकलैंड और चेन माउंटेन मशीनों से रेत निकाली जाती रही। रात में रेत की चोरी आम बात थी। इस दौरान विपक्ष में बैठी भाजपा ने कई बार विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया। नदियों के साथ हुई इस निर्दयता के परिणामस्वरूप अवैध खदानों की गहराई में जाने से बच्चों की जान तक चली गई।
हाईकोर्ट में अवैध रेत खनन से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई अभी भी जारी है। अब जबकि कांग्रेस विपक्ष में है, वह इस मुद्दे पर ज्यादा सवाल नहीं उठा रही। दूसरी ओर, रेत का वही पुराना खेल अब भी जारी है। रायपुर, दुर्ग और भिलाई जैसे शहरों के लिए रेत सप्लाई का मुख्य केंद्र कांकेर जिले का भिरौद इलाका बना हुआ है।
ताजा घटनाक्रम में, भिरौद इलाके में सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता रेत की रंगदारी को लेकर आपस में भिड़ गए। कहा जा रहा है कि यह विवाद इस बात को लेकर हुआ कि किस घाट की रेत पर किसका अधिकार होगा। भले ही क्षेत्र में केवल तीन अधिकृत खदानें हैं, लेकिन अवैध खुदाई 12 से अधिक स्थानों पर हो रही है।
खनिज विभाग, तहसीलदार और पुलिस इन अवैध खदानों से अनजान होने का दावा करती रही। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुए इस आधी रात के विवाद ने इन दावों की पोल खोल दी। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्ष शिकायत लेकर थाने पहुंच गए। पर वहां उनका समझौता हो गया। संभवत: उन्हें यह महसूस हुआ कि विवाद को तूल देने से उनके कारोबार को नुकसान हो सकता है।
झगड़े के बाद, खनिज विभाग ने अचानक कार्रवाई करते हुए सभी अवैध खदानों को बंद करा दिया। हालांकि, सवाल यह है कि यह पाबंदी कब तक टिकेगी?
दो राज्यों का स्टेशन

देश में कई रोचक स्थान हैं जिनके बारे में रेल के सफर के दौरान जानकारी मिलती है। बिलासपुर से हावड़ा की ओर जाते समय ईब स्टेशन पड़ता है, जिसे देश का सबसे छोटे नाम वाले स्टेशन के रूप में जाना जाता है। कई रेलवे स्टेशन ऐसे हैं जो दो राज्यों में बंटे हुए हैं। बिलासपुर-कटनी रूट पर पडऩे वाला वेंकटनगर स्टेशन भी ऐसा ही है। इसका आधा हिस्सा मध्यप्रदेश में तो आधा छत्तीसगढ़ में है। एक स्टेशन नवापुर है जो गुजरात और महाराष्ट्र में बंटा हुआ है। यह स्टेशन भुसावल रेलवे मंडल के अंतर्गत आता है। महोबा और हरपाल स्टेशन उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में बंटे हुए हैं। यहां भवानीमंडी रेलवे स्टेशन की तस्वीर है। दिल्ली-मुंबई रूट का यह स्टेशन राजस्थान और मध्यप्रदेश में विभाजित है। लोग टिकट लेने के लिए मध्यप्रदेश के टिकट काउंटर में पहुंचते हैं और ट्रेन पर चढऩे के लिए राजस्थान में बने प्लेटफॉर्म पर आते हैं। इस कस्बे में कई घर ऐसे हैं जिनका सामने का गेट एक राज्य में तो पीछे का गेट दूसरे राज्य में खुलता है।
पंचायत-म्युनिसिपल चुनावों की चुनौती
नगरीय निकायों, और पंचायतों के पदों के आरक्षण में देरी से कई दिक्कतें पैदा हो रही हैं। पहली यह कि निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराना पड़ रहा है। नई मतदाता सूची 15 जनवरी को आएगी। साफ है कि मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से पहले चुनाव तारीखों की घोषणा नहीं की जा सकती है।
नगरीय निकायों के निर्वाचित पदाधिकारियों का कार्यकाल 6 जनवरी को खत्म हो जाएगा। सभी नगर निगमों में प्रशासक बैठेंगे। इसी तरह पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 10 फरवरी को खत्म हो रहा है। यह भी तय है कि 10 फरवरी के पहले पंचायतों का चुनाव हो पाना मुश्किल है। वजह यह है कि अभी पंचायतों में अब तक पदों का आरक्षण तक नहीं हुआ है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने दोनों चुनाव जनवरी-फरवरी में निपटाने की तैयारी की थी, लेकिन अब विशेषकर पंचायत चुनाव में देरी हो सकती है। पंचायत चुनाव फरवरी के आखिरी, और मार्च के पहले पखवाड़े तक चल सकते हैं। पंचायत चुनाव की प्रक्रिया लंबी है। प्रदेश में करीब डेढ़ लाख पंच, और साढ़े 11 हजार सरपंच के चुनाव होने हैं। इसके अलावा जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, और फिर आखिरी में जनपद व जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव होंगे। डिप्टी सीएम अरुण साव ने संकेत दिए हैं कि बोर्ड परीक्षाओं के पहले निकाय और पंचायत करा लिए जाएंगे। वाकई ऐसा हो पाएगा, यह देखना है।
सत्तारूढ़ पार्टी के पदों की चुनौती
भाजपा में जिलाध्यक्षों को लेकर खींचतान चल रही है। पार्टी के 35 संगठन जिले के अध्यक्ष के लिए तीन-तीन नामों का पैनल तैयार किया गया है। रायपुर सहित कई जिलों में अध्यक्ष के मसले पर स्थानीय नेता एकमत नहीं हो पा रहे हैं।
सुनते हैं कि रायपुर शहर, ग्रामीण और बलौदाबाजार के अध्यक्ष के नामों पर चर्चा के लिए क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के घर भी गए थे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस ने अपने भतीजे ओंकार बैस का नाम शहर जिलाध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाया है।
ओंकार चार बार शहर जिला भाजपा के महामंत्री रह चुके हैं। बृजमोहन ने सूर्यकांत राठौर का नाम सुझाया है। ऐसे में किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश चल रही है।
दुर्ग में तो पूर्व सांसद सरोज पाण्डेय, और सांसद विजय बघेल खेमा आमने-सामने है। इससे परे बलरामपुर में तो जिस नाम पर सहमति बनी है, उसके लिए दिग्गज नेता रामविचार नेताम सहमत नहीं हो रहे हैं। एक-दो दिनों में सूची जारी होगी, इससे साफ होगा कि किस नेता की राय को कितना महत्व दिया गया है।
बोर्ड परीक्षा-चुनावी परीक्षा
नगरीय निकायों और त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों की तारीख घोषित करने में हो रही देरी का कारण प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही नजर आ रहा है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 28 दिसंबर से पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण प्रक्रिया शुरू होकर 29 दिसंबर तक राज्य निर्वाचन आयोग को सूची सौंपनी है। इस सूची में ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायतों का आरक्षण शामिल है। इसके विपरीत, नगरीय निकायों में-जिसका कार्यकाल पंचायतों से पहले खत्म हो रहा है, आरक्षण की प्रक्रिया जनवरी के दूसरे सप्ताह तक पूरी होने की संभावना है। पहले यह कार्य 27 दिसंबर तक पूरा करने की योजना थी। सरकार ने आचार संहिता को अधिक लंबा न खींचने के लिए दोनों चुनाव एक साथ या आसपास कराने का निर्णय लिया था। हालांकि, आरक्षण प्रक्रिया में देरी के चलते अब आचार संहिता की घोषणा जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद ही होने की संभावना है। मतगणना और परिणाम मार्च के पहले सप्ताह तक खिंच सकते हैं।
इसी बीच, राजनीतिक घटनाक्रम में भी तेजी आई है। पिछले कुछ दिनों से मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा जोरों पर रही, जिसे भाजपा प्रभारी नितिन नबीन के छत्तीसगढ़ दौरे ने और बल दिया। हालांकि, राष्ट्रीय शोक की घोषणा के बाद यह चर्चा ठंडी पड़ गई। भाजपा के संगठन चुनावों में भी देरी हुई है। जिला अध्यक्षों की घोषणा अगले एक सप्ताह में होने की संभावना है।
कांग्रेस ने चुनाव घोषणा में देरी को मुद्दा बनाया है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर सरकार और संगठन के स्तर पर भाजपा रोजाना सक्रिय दिखाई दे रही है। हाल ही में नगरीय निकायों के सीएमओ के खाली पद भरे गए हैं और कई वर्षों से जमे अधिकारियों का तबादला किया गया है।
दोनों चुनाव एक साथ कराने के निर्णय से बड़ी संख्या में संसाधन और मतदान कर्मियों की आवश्यकता होगी, जिसमें शिक्षा विभाग का सहयोग भी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में शिक्षा विभाग वार्षिक और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त है। नगरीय प्रशासन मंत्री, उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने दावा किया है कि बोर्ड परीक्षाओं से पहले चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए चुनाव और परीक्षाओं की तारीखों में टकराव की आशंका बनी हुई है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नगरीय निकाय और पंचायतों के कार्यकाल का विस्तार नहीं किया जाएगा। यदि बोर्ड परीक्षाओं में बाधा उत्पन्न होती है तो प्रशासक नियुक्त करना सरकार के पास एक विकल्प तो है ही। फिलहाल, सरकार ऐसी नौबत लाने से बचने की कोशिश में दिख रही है-क्योंकि ऐसा करने से उसे पर विपक्ष के हमलों का सामना करना पड़ेगा। स्थानीय चुनाव और बोर्ड परीक्षाओं के बीच संतुलन इस समय एक बड़ा सवाल है।
श्वानझुंड-अग्निकुंड

ठिठुरती सर्दी में मासूम जीवों को भी गर्माहट की तलाश है। आग के कुंड के पास जुटे इन कुत्तों की मासूमियत देखने लायक है। सोशल मीडिया पर वायरल एक तस्वीर।
मनमोहन और छत्तीसगढ़
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की कई यादें छत्तीसगढ़ से जुड़ी है। डॉ. सिंह अपने पहले कार्यकाल में रायपुर आए थे, और उन्होंने कवर्धा जिले के भोरमदेव में तालाबों-पुराने बांधों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय सरोवर-धरोहर योजना का भी शुभारंभ किया था। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रवास के दौरान कांग्रेस नेताओं के बीच काफी खींचतान हुई थी। रंग मंदिर के कार्यक्रम में तो जमकर नारेबाजी भी हुई थी, लेकिन वो शांत भाव से सारा नजारा देखते रहे।
डॉ. सिंह प्रधानमंत्री रहते वर्ष-2005-06 में रायपुर आगमन हुआ था। भोरमदेव में उनका सरकारी कार्यक्रम था। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को लेकर विशेषकर कांग्रेस कार्यकर्ता काफी उत्साहित थे। मगर उनके आते ही एयरपोर्ट में तमाशा शुरू हो गया। उस समय प्रदेश के इकलौते लोकसभा सांसद अजीत जोगी इस बात से नाराज थे कि भोरमदेव के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ हेलीकॉप्टर से जाने वालों में उनका नाम नहीं है। इस पर उन्होंने एयरपोर्ट पर ही अपना सारा गुस्सा पार्टी के सीनियर नेता मोतीलाल वोरा पर निकाला। वोरा सफाई देते दिखे, लेकिन जोगी इतने जोर-जोर से बोल रहे थे कि आवाज दूर तक सुनाई दे रही थी। वोराजी हेलीकॉप्टर से भोरमदेव के लिए निकल गए।
जोगी इस कार्यक्रम में शिरकत नहीं कर सके। इसके बाद रंग मंदिर में कांग्रेस के कार्यकर्ता सम्मेलन में उनके समर्थकों ने प्रधानमंत्री के सामने ही जोगी जिंदाबाद के नारे लगाए। मंच पर मौजूद मोहसिना किदवई, और कई नेता जोगी समर्थकों को शांत रहने की अपील करते नजर आए। इस दौरान प्रधानमंत्री डॉ. सिंह हल्की मुस्कान बिखेरते कांग्रेस कार्यकर्ताओं का तमाशा देखते रहे। बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित भी किया। कुल मिलाकर जोगी समर्थकों के हंगामे की वजह से डॉ. मनमोहन सिंह का पहला छत्तीसगढ़ प्रवास सुर्खियों में रहा।
कांग्रेस की शिकायत की राजनीति
कांग्रेस के दर्जनभर जिलाध्यक्षों को बदलने पर विचार चल रहा है। दो दिन दिल्ली में प्रदेश के प्रमुख नेताओं की बैठक भी हुई है। यह खबर सामने आ रही है कि रायपुर शहर जिलाध्यक्ष बदलने को लेकर काफी खींचतान भी हुई है।
शहर जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे को तीन साल से अधिक हो चुके हैं। लिहाजा, उनकी जगह लेने के लिए पार्टी के एक युवा नेता काफी मेहनत कर रहे हैं। वो हफ्तेभर से दिल्ली में डटे हैं। चर्चा है कि युवा नेता को प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का भी समर्थन है। युवा नेता अभी संगठन में महासचिव भी है। उनके दिल्ली में सक्रियता की खबर आई, तो उनके विरोधी एक प्रमुख पदाधिकारी भी वहां पहुंच गए।
उन्होंने युवा नेता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों को दिया है। युवा नेता पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ काम करने का आरोप भी है। अब पार्टी युवा नेता के खिलाफ शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेती है, यह तो जिलाध्यक्षों की सूची जारी होने के बाद ही पता चलेगा।
किस बात की जल्दी है
विदा होते दिसंबर और आते जनवरी में सरकारी विभागों में अधिकारी कर्मचारियों की पदोन्नति की होड़ ही नहीं आनन फानन भी रहती है।ऐसे ही जानवरों के एक विभाग में न जाने किस बात की जल्दबाजी है। मैडम ने कह दिया है कि उप संचालकों के 21 पदों पर अगले तीन दिनों में पदोन्नति दे देनी है। और हालत यह है कि दावेदारों के दस्तावेज अधूरे हैं। जो दावेदार नहीं है वो बताते हैं कि किसी का सीआर नहीं है तो किसी ने अचल संपत्ति विवरण नहीं दिया है तो कुछ की पुरानी जांच पूरी नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि यह कमी एक वर्ष की है,बल्कि कई वर्षों से अधूरी है। सुनने में आया है करीब 17-18 साल से। इस वजह से प्रमोशन की नोट शीट पहुंचते ही संचालक तक ने मार्गदर्शन मांगा है कि ऐसे में कैसे कर सकते हैं ।
फिर पता नहीं क्यों सचिव मैडम जल्दबाजी में है। वैसे मैडम नियम कानून सेक्रेटेरिएट बिजनेस रूल की पक्की हैं। इसके लिए उनकी कसमें खाई जाती हैं। इस जल्दबाजी के पीछे मैडम का मैलाफाइड इंटरेस्ट तो हो ही नहीं सकता। सोच भी नहीं सकते। बहुत खोजबीन के बाद पता चला कि कोई दावेदार मैडम के मातहत काम करता है। बस उसी ने ही सभी बैचमेट की ओर से यह जिम्मेदारी ली है। और लोग उसका इंटरेस्ट रेट तलाश रहे हैं। बस मैडम ने भी लंबित अवधि पर आश्चर्य जताते हुए 4 दिन का टाइम लिमिट तय कर दिया है। मैडम ने यहां तक कह दिया है कि वह विभाग के मुखिया से अनुमोदन ले लेंगी। अब प्रमोशन आर्डर का इंतजार है।
बाघों की देखभाल कर पाएगा छत्तीसगढ़?
मध्यप्रदेश ने छत्तीसगढ़ को बाघों का उपहार देने की घोषणा की है। छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या में वृद्धि अब तक निराशाजनक रही है। अभी कान्हा नेशनल पार्क से विचरण करने आए 6 बाघ पहुंचे हैं। इन्हें सरकार से किसी तरह की मंजूरी नहीं लेनी पड़ी, कॉरिडोर अनुकूल मिला और चले आए। प्रदेश के वन अधिकारी इस समय उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। यह स्पष्ट किया गया है कि उन्हें मध्यप्रदेश के वन क्षेत्र में खदेड़ा नहीं जाएगा, पर उनकी स्वतंत्र आवाजाही में कोई दिक्कत न हो इसका ध्यान दिया जाएगा। यह एक शानदार मौका है जब छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश से आए बाघ विचरण कर रहे हैं और वहां की सरकार और बाघों का उपहार देने जा रही है। थोड़ी गंभीरता और सावधानी छत्तीसगढ़ को भी बाघों का स्टेट बना सकता है। बाघों को छत्तीसगढ़ में पनपने का मौका नहीं मिला, इसके कई कारण बताये जाते हैं। सबसे बड़ी बात तो यही है कि यहां पर वन विभाग के लिए अधिकृत पशु विशेषज्ञों की भारी कमी है। पशु चिकित्सकों से ही अधिकांश अभयारण्यों से रेस्क्यू किए जाने वाले जानवरों का इलाज होता है। आए दिन करंट लगाने जंगलों में हाथियों और दूसरे वन्यप्राणियों की मौत बताती है कि गश्ती दलों की बड़ी कमी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में बाघों के प्राकृतिक आवास की स्थिति में और सुधार की आवश्यकता है। वन क्षेत्रों में जल स्रोत बढ़ाना, शिकार के लिए पर्याप्त वन्यजीव होना और मानव हस्तक्षेप को न्यूनतम करना जरूरी है। बाघों को शिकारियों और अवैध शिकार से बचाने के लिए आधुनिक सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे। कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी और वन रक्षकों की सतर्क उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। बाघ संरक्षण को लेकर स्थानीय समुदायों को जागरूक करना बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों को इस प्रक्रिया में भागीदार बनाना होगा। बाघों की संख्या बढऩे का मतलब बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को सुदृढ़ करने का प्रयास होता है। इसके लिए घास के मैदानों का रखरखाव, खाद्य शृंखला का संतुलन और वन्यजीवों की विविधता पर ध्यान भी देना होगा। मध्यप्रदेश ने बाघ संरक्षण में असाधारण सफलता हासिल की है। उनके विशेषज्ञों और संरक्षण मॉडलों का उपयोग छत्तीसगढ़ में भी किया जा सकता है।
अपनों ने ही घेरा
सरकार के एक मंत्री अपने ही दल के लोगों के आरोपों से खफा हैं। दल के नेता ही मंत्री जी पर सोशल मीडिया के जरिए भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। न सिर्फ सीनियर नेता बल्कि पार्टी के विधायक भी विधानसभा में उन्हें घेरने से पीछे नहीं रहे हैं।
मंत्री जी को अपने ही दल के लोगों के दबाव के चलते भ्रष्टाचार की शिकायतों पर एक्शन लेना पड़ा, और जांच की घोषणा भी की। बावजूद इसके पार्टी के लोग अलग-अलग स्तरों पर मंत्री जी के विभागों में भ्रष्टाचार पर उंगलियां उठा रहे हैं।
इन सबसे तंग आकर मंत्री जी ने अपने ही दल के कुछ लोगों को यह कहते सुने गए, कि घर से चावल मंगाकर खा रहा हूं, इसके बाद भी अपने लोग आरोप लगा रहे हैं। यह ठीक नहीं है। ये अलग बात है कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी मंत्री जी की कार्यशैली से संतुष्ट हैं। फिर भी ‘अपने’ आलोचना करेंगे, तो दिल दुखता ही है।
पुलिस ही नहीं, वन भर्ती में भी गडबडिय़ां
राजनांदगांव जिले में पुलिस आरक्षक भर्ती में गड़बड़ी उजागर होने पर भर्ती रोक दिए जाने के बाद वन विभाग में हुई वनरक्षकों की भर्ती भी संदेहों के घेरे में आ गई है। इस भर्ती को लेकर इस माह के शुरू में राजधानी समेत सभी पांच सीएफ रेंज में हुए फिजिकल टेस्ट के दौरान कई तरह की गड़बडिय़ां सामने आईं थी। इन्हें सबसे पहले छत्तीसगढ़ ने सिलसिले वार प्रकाशित किया था। कुछ रेंज में तो वन संरक्षक और डीएफओ ने अखबारनवीसों का परीक्षा स्थल पर प्रवेश पर ही रोक लगा दी थी। इसने शंका और बढ़ा दी। रायगढ़ में तो फिजिकल टेस्ट मशीनें खराब होने पर अभ्यर्थियों को दोबारा 9 दिसंबर को बुलाया गया। तो सैकड़ों अभ्यर्थी गृह जिले के टेस्ट में असफल होने के बाद दूसरे रेंज यहां तक की रायपुर में भी टेस्ट दिया।
वन रक्षक भर्ती के लिए वन विभाग ने हैदराबाद की टाइमिंग टेक्नोलॉजी कंपनी से अनुबंध किया था। इसी फर्म ने पहले वन और फिर पुलिस भर्ती के लिए डिजिटल उपकरण मुहैया कराए थे। हालांकि वन विभाग में भर्ती प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है, मगर जिस तरह की गड़बड़ी आरक्षक भर्ती में हुई है उसे देखते हुए वन विभाग में भी डाटा की जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। 1484 वनरक्षकों की भर्ती प्रक्रिया हुई और इसमें 4,32,841 उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया। इनमें सर्वाधिक उम्मीदवार बिलासपुर सर्किल में हुई भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए। इन उपकरणों में तकनीकी खराबी के चलते अभ्यर्थियों को जूझना पड़ा था। कोरबा जिले के कटघोरा में लॉन्ग जंप के इवेंट में पहले अटेम्प्ट में ही सफल होने के बाद भी कई अभ्यर्थियों को दोबारा कूदने को कहा गया। महिला अभ्यर्थी जमुना सारथी ने बताया कि इस गड़बड़ी के कारण वह 9वें अटेम्प्ट में अपना टेस्ट कंप्लीट कर पाई। मेरा स्टैमिना पूरी तरह से डाउन हो गया था। थक चुकी थी, इसलिए मेरे अंक कम हो गए।
एक अन्य अभ्यर्थी गोमती ने बताया कि जब मैने गोला फेंका तो इसकी दूरी के आधार पर मशीन से 20 अंक मिले। बाद में जब मुझे रिजल्ट दिया गया, तब पता चला कि 15 ही अंक मिले हैं। मुझे बताया गया कि तकनीकी खामी की वजह से ऐसा हो रहा है। दोबारा फेंकने को भी कहा गया। इससे प्रदर्शन पर असर पड़ा है। आपत्ति करने पर मौजूद अधिकारियों ने कहा कि जब रिजल्ट निकलेगा, तब आपत्ति लगा देना। इससे पहले एग्जाम सिस्टम ही बार बार बदलने की शिकायत अभ्यर्थी करते रहे हैं।
पहले कहा गया कि फिजिकल टेस्ट के बाद व्यापमं लिखित परीक्षा लेगा। फिर कहा गया कि परीक्षा नहीं होगी। बार बार सिस्टम बदल कर विभाग के अफसरों ने पूरी भर्ती को विवादास्पद बना दिया। अब इन सभी तथ्यों को लेकर कुछ अभ्यर्थी कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
अभी सिर्फ समर्थन मूल्य...
प्रदेशभर में इस समय धान खरीदी उत्सव जोर-शोर से चल रहा है। किसानों को उनके बेचे गए धान का भुगतान भी किया जा रहा है। सरकार ने सभी कलेक्टरों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसानों के खातों में जल्द से जल्द राशि पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। सहकारी बैंकों को भी इस दिशा में मुस्तैद रहने के लिए कहा गया है।
मगर, भुगतान प्रक्रिया में एक पेच अभी भी बरकरार है। किसानों को फिलहाल केवल समर्थन मूल्य, यानी 2300 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से भुगतान हो रहा है। सरकार का वादा किसानों को कुल 3100 रुपये प्रति क्विंटल का लाभ एक किश्त में देने का था। सहकारी बैंकों के अनुसार शेष राशि मार्च के अंत तक, यानी इसी वित्तीय सत्र में, वितरित की जाएगी। अब तक की जानकारी के अनुसार, लगभग 13 लाख से अधिक किसानों को 14 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। लगभग 65 लाख टन धान की खरीदी हो चुकी है, जबकि 160 लाख टन खरीदी का अनुमान है।
कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में धान बोनस का भुगतान चार किश्तों में किया जाता था। इसके चलते साल में चार बार समारोह आयोजित होते थे, जिससे सरकार को अपनी उपलब्धि प्रदर्शित करने का अवसर मिलता था। किसानों से चार बार वाहवाही मिलती थी। अब देखना यह है कि भाजपा सरकार बोनस का भुगतान खामोशी से निपटाएगी या इसके लिए प्रदेशभर में कांग्रेस सरकार की तरह ही समारोहों का आयोजन करेगी।
सांता क्लॉज की एआई तस्वीर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक के बढ़ते प्रसार ने इंटरनेट पर अनगिनत कल्पनात्मक तस्वीरों को जन्म दिया है। अब नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप और दुनिया की अन्य प्रसिद्ध हस्तियों की ऐसी तस्वीरें और वीडियो तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें असली और नकली छवि का फर्क करना मुश्किल हो गया है।
हाल ही में क्रिसमस के अवसर पर सोशल मीडिया पर एक वायरल तस्वीर ने इसी प्रवृत्ति को दिखाया। एक यूजर ने दावा किया कि एक बच्चे ने मूंगफली से सांता क्लॉज बनाया है। इस पर कई लोगों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी कि तस्वीर असली नहीं, बल्कि यह एआई की मदद से बनाई गई है।
शुक्र है, असली और एआई-निर्मित छवियों के बीच कुछ खास अंतर होते हैं, जिन्हें पहचानकर आप नकली तस्वीरों का पता लगा सकते हैं। एआई-निर्मित छवियों में अक्सर फिंगर, बालों की बनावट, या कपड़ों के पैटर्न जैसे छोटे विवरण गड़बड़ हो सकते हैं। वास्तविक तस्वीरों में प्रकाश और छाया का संतुलन प्राकृतिक होता है, जबकि एआई-निर्मित तस्वीरों में यह असामान्य लग सकता है। एआई छवियों में पृष्ठभूमि अक्सर असंगत या अधूरी दिखाई दे सकती है। रिवर्स इमेज सर्च और डीपफेक डिटेक्टर जैसे टूल्स वास्तविकता जांचने के लिए इंटरनेट पर मौजूद हैं। एआई की क्षमताएं अद्भुत हैं, लेकिन उनकी सीमाओं को समझना और वास्तविकता से कल्पना को अलग करना इंटरनेट यूजर्स के लिए एक जरूरी कौशल बन गया है।
राज्यपाल की सख्ती से सन्नाटा
राज्यपाल रामेन डेका उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर हैं। पिछले दिनों निजी विश्वविद्यालयों की बैठक में उन्होंने तेवर भी दिखाए, और उन्होंने गड़बड़ी पर सख्त हिदायत दी है।
हुआ यूं कि बैठक में उच्च शिक्षा के साथ-साथ निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के प्रमुख भी थे। बैठक में बारी-बारी से सभी निजी विश्वविद्यालयों को प्रजेन्टेशन देना था। मगर राज्यपाल ने एजेंडा ही बदल दिया, और आयोग से निजी विश्वविद्यालयों की गतिविधियों के बारे में जानकारी चाही।
आयोग की तरफ से हरेक विश्वविद्यालय की खामियां बताई गई। उच्च शिक्षा विभाग की भी कुछ इसी तरह की राय थी। फिर क्या था, राज्यपाल ने सभी विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों को जमकर फटकार लगाई, और समय सीमा के भीतर खामियों को दूर करने की नसीहत दी। राज्यपाल के तेवर से निजी विश्वविद्यालय प्रबंधन हड़बड़ाए हुए हैं, सन्नाटा छा गया है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
मंडल अध्यक्ष चुनाव नहीं लड़ सकेंगे
भाजपा में मंडल अध्यक्ष चुनावों की खींचतान पूरे प्रदेश में चल रही है । पार्टी कार्यालयों में तालेबंदी, कुर्सियां तोडऩे और विधायकों का विरोध चरम पर है। विधायक अपने खास समर्थकों को बिठाना चाहते हैं और वे संगठन से इन नामों पर सहमति ले चुके हैं। दूसरी ओर कार्यकर्ता अपने बीच से अध्यक्ष चाहते हैं । इसी टसल में तनातनी उंगली उठाने तक बढ़ चली है? तो कई वर्तमान अध्यक्ष संगठन नेतृत्व के कहने के बाद भी दोबारा नहीं बनना चाहते। उन्हें अब चुनाव जीतकर कुछ कमाना चाहते है, कब तक दरियां बिछाते रहेंगे। उन्हें खबर लग गई है कि पार्टी ने इस बार पार्षद, जनपद अध्यक्ष या अन्य पदों के लिए टिकट वितरण क्राइटीरिया तय कर लिया है। इसके मुताबिक संगठन के पदाधिकारियों, मंडल अध्यक्ष तक को पार्षद चुनाव नहीं लड़ाएगी। पार्टी इन्हें अब तक देती रही है । इसके बाद तो कई वर्तमान मंडल अध्यक्षों के कदम ठिठक गए हैं। अब यह देखना होगा कि कितने नए अध्यक्ष, क्राइटीरिया से इतर जाकर टिकट हासिल करने में सफल हो पाते हैं।
विधायकों की अपनी रणनीति
निकाय और पंचायत चुनाव को लेकर भाजपा के भीतर एक अलग ही धार बह रही है । संगठन एक एक वार्ड-ग्राम पंचायत जीतने बिसात बिछा रहा है। तो बहुसंख्य विधायकों की अलग ही रणनीति है। वे अपने अपने विधानसभा क्षेत्र में आने वाले वार्डों में एक दो अपने और बाकी वार्डों में विपक्षी पार्षद चाहते हैं। ऐसा ही ग्रामीण क्षेत्र के विधायकों की भी है । वे जनपदों में विपक्षी अध्यक्ष चाहते हैं । यह सुखद है कि उन्हें महापौर तो अपनी ही पार्टी का ही चाहिए। सीधे चुनाव होने से महापौर की जीत में उन्हे कोई शंका भी नहीं है। महापौर अपने, पर पार्षद विपक्षी अधिक क्यों? इस पर चर्चा की तो खुलासा हुआ। दरअसल सभी विधायक वर्ष 28 के लिए अपनी राह आसान कर लेना चाहते हैं । उनका कहना है कि विपक्षी पार्षद अधिक रहेंगे तो ही उन पर ठीकरा फोडक़र वोट मांग सकेंगे कि कांग्रेस के पार्षद ने काम नहीं किया। भाजपा का चुनते तो पार्षद विधायक, महापौर और सरकार भाजपा के होने से वार्ड में विकास होता। इसके लिए विधायक, पार्षद टिकट वितरण में भी ज्यादा रूचि न ले तो कोई आश्चर्य नहीं है, संगठन जिसे दे उसका भला,जिसे न दे तो अपना भला। अब देखना यह है कि कितने विधायकों के क्षेत्र में कितने भाजपा के पार्षद चुनकर आते हैं। वैसे वर्तमान की बात करें तो राजधानी शहर के दक्षिण में 20 में से 8, पश्चिम के 20 में से 10, उत्तर में 6, ग्रामीण में 5 पार्षद भाजपा हैं । अगले नतीजे आने पर विधायकों की इस रणनीति का खुलासा हो जाएगा।
उद्घाटन का इंतजार..

कोई निर्माण कार्य सरकारी हो तो उसका उद्घाटन किसी मंत्री नेता से कराये बिना जनता को समर्पित नहीं किया जा सकता। चित्रकोट जल प्रपात में स्थापित सोलर लाइट का यही हाल है। निर्माण करीब दो साल पहले पूरा हो चुका है। चार करोड़ की लागत से बने इस विशाल संरचना के जरिये शाम के समय लेजर शो दिखाने की योजना है। पर अब तक इसका उद्घाटन नहीं हुआ है। इसके चलते पर्यटकों को इसका फायदा नहीं मिल रहा है। क्रेडा का यह निर्माण कार्य है, उद्घाटन के लिए उसे अतिथि क्यों नहीं मिल रहे यह भी एक सवाल है। बस्तर में ही कई नेता हैं, मंत्री हैं, किसी से भी कराया जा सकता है।
क्रिसमस का बाजार फीका
प्रदेश का ईसाई समुदाय बड़े दिन को बड़े उत्साह के साथ मना रहा है। क्रिसमस की असली धूम और सांस्कृतिक उल्लास का अनुभव करना हो तो कुनकुरी जरूर जाना चाहिए। यह स्थान न केवल एशिया के दूसरे सबसे बड़े चर्च 'महागिरजाघर' के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि जशपुर जिले में ईसाई धर्म की सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र भी है। हर साल, क्रिसमस से 10 दिन पहले यहां एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें जशपुर, रायगढ़, रांची और अन्य जगहों से व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं।
इस साल व्यापारियों को बाजार से निराशा हाथ लगी। पहले जहां लाखों की बिक्री आम बात थी, इस बार स्थिति बेहद खराब रही। व्यापारियों के अनुसार, खरीदारी इतनी कम हुई कि 23 और 24 दिसंबर जैसे व्यस्त दिनों में भी दुकानों पर भीड़ नहीं दिखी।
दूसरी तरफ, कुनकुरी और आसपास के क्षेत्रों में बीते डेढ़ महीने से ईसाई समुदाय के भीतर एक अलग तरह का असंतोष है। भाजपा विधायक रायमुनि भगत के एक कथित विवादास्पद बयान ने समुदाय की भावनाओं को आहत किया है। इस बयान के विरोध में ईसाई समुदाय ने विशाल मानव श्रृंखला और रैली का आयोजन किया, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए। उनकी मांग है कि विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए।
कुछ धर्मावलंबियों ने इस बार क्रिसमस पर नया सामान खरीदने से इनकार कर दिया। उन्होंने सादगी से त्योहार मनाने का निर्णय लिया। नए कपड़ों और अन्य सजावटी सामानों की खरीदारी भी नहीं की। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इस फैसले का सीधा संबंध विधायक के बयान से है, लेकिन दोनों घटनाएं आपस में जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
अब सब चुनाव एक सरीखे
चिकित्सकों की एक प्रतिष्ठित संस्था के चुनाव को लेकर पिछले दिनों आम लोगों में भी काफी उत्सुकता देखी गई। वजह यह है कि संस्था के पदाधिकारी नामचीन चिकित्सक चुने जाते रहे हैं, और उनकी राय को सरकार भी अहमियत देती रही है। मगर इस बार चुनाव में ऐसा कुछ हुआ, जिसकी काफी चर्चा हो रही है।
संस्था में एक ऐसे चिकित्सक चुन लिए गए, जो कि कभी एक केस में तीन माह जेल की सलाखों के पीछे रहे हैं। उनके आदत-व्यवहार को लेकर भी शिकायतें होती रही हैं। खास बात यह है कि चुनाव में नवनिर्वाचित मुखिया ने जिसको हराया है, उसकी साख बहुत अच्छी है। और जब चुनाव नतीजे आए तो इस हार को लेकर जानकार लोग हैरान रह गए। एक बात तो साफ है कि अब प्रतिष्ठित संस्थाओं के चुनाव भी आम चुनावों की तरह हो गए हैं जहां दागियों को भी महत्व मिल जाता है।
विधायकों की राय
भाजपा के संगठन चुनाव में इस बार काफी कुछ बदलाव देखने को मिला है। पार्टी ने उन विधायकों की राय को नजरअंदाज किया है जिनके खिलाफ शिकायतें होती रही हैं। मसलन, सरगुजा जिले की तीन विधानसभा क्षेत्रों के मंडलों में दो विधायकों की राय को तवज्जो नहीं मिली।
अंबिकापुर के छह मंडल में स्थानीय विधायक एक ही मंडल में अपने समर्थक को अध्यक्ष बनाने में कामयाब हो पाए। बाकी मंडलों में स्थानीय अन्य प्रमुख नेताओं की राय को महत्व दिया गया। यही हाल, सीतापुर का भी रहा। वहां भी स्थानीय विधायक एक ही मंडल में अपनी पसंद का अध्यक्ष बनवा पाए। इससे परे लुण्ड्रा में स्थानीय विधायक प्रबोध मिंज की राय को भरपूर महत्व दिया गया। लुण्ड्रा इलाके के सभी मंडलों में प्रबोध मिंज के समर्थकों का दबदबा रहा। बाकी जगहों पर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। संकेत साफ है कि निकाय और पंचायत चुनाव के प्रत्याशी चयन में पार्टी उन्हीं विधायकों की राय को महत्व देगी जिनकी साख अच्छी है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
घर वापिसी होगी या नहीं?
कांग्रेस में निलंबित-निष्कासित नेताओं की वापिसी पर विचार चल रहा है। इन सबके बीच रामानुजगंज के पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह की कांग्रेस में वापिसी होगी या नहीं, इसको लेकर काफी उत्सुकता है। बृहस्पति सिंह ने सार्वजनिक तौर पर पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव से माफी मांग ली है।
बृहस्पति सिंह ने सिंहदेव और तत्कालीन कांग्रेस प्रभारी सैलजा के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। पार्टी के कई लोग मानते हैं कि माफी मांगने के बाद बृहस्पति सिंह की पार्टी में वापिसी हो सकती है, लेकिन जो लोग सिंहदेव को करीब से जानते हैं वो मानते हैं कि सिंहदेव किसी भी दशा में बृहस्पति सिंह की पार्टी में वापिसी के लिए सहमत नहींं होंगे। अब पार्टी उनकी राय को नजरअंदाज कर बृहस्पति सिंह को पार्टी में वापस लेती है तो बात अलग है। ऐसे में सिंहदेव की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह देखना है।
कुल मिलाकर आने वाले दिनों में कांग्रेस में काफी उठापटक देखने को मिल सकती है।
बुनियादी शिक्षा का हाल सुधरेगा?
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने हाल ही में नो डिटेंशन पॉलिसी को समाप्त करने का निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ के संबंध में यह बड़ा महत्वपूर्ण फैसला है, जहां प्राथमिक शिक्षा का स्तर ‘असर’ के मुताबिक बहुत नीचे- 27वें स्थान पर है। प्राय: देखा गया है कि प्रशासनिक अधिकारी स्कूलों में दौरा करते हैं। क्लास लगाते हैं, बच्चों- शिक्षकों को फटकार लगाकर लौट जाते हैं। अब इस नीति के तहत अब कक्षा 5 और 8 की वार्षिक परीक्षा में विफल होने वाले छात्रों को सीधे उत्तीर्ण नहीं किया जाएगा, दोबारा परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। यदि वे दूसरी बार भी असफल होते हैं, तो उन्हें अगली कक्षा में प्रमोट नहीं किया जाएगा। केंद्र संचालित शिक्षण संस्थान नवोदय, केंद्रीय विद्यालय में यह लागू कर दिया गया है, पर शिक्षा राज्य का विषय है, लाखों विद्यार्थियों वाले राज्य के स्कूलों पर फैसला राज्य सरकार को लेना होगा।
पुरानी नीति, जिसमें बच्चों को बिना परीक्षा उत्तीर्ण किए प्रमोट किया जाता था, शिक्षा में समानता लाने का प्रयास तो था, लेकिन इसके गंभीर और चिंताजनक परिणाम सामने आए। ‘असर’ को बच्चों में बुनियादी कौशल, जैसे गिनती, पहाड़े, पढऩे और लिखने की क्षमताओं की कमी देखने को मिली। यह पाया गया कि शिक्षक खुद भी इन बच्चों को पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि उन्हें पता है कि बच्चे तो उत्तीर्ण ही किए जाएंगे। शिक्षकों की यह मांग भी है कि उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाए, तब बच्चों पर ध्यान दे पाएंगे।
बुनियादी शिक्षा बच्चों के मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास का आधार है। यह उन्हें केवल अक्षर और अंक सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें तर्कशक्ति, संवाद और समस्या-समाधान जैसे महत्वपूर्ण जीवन कौशल भी प्रदान करती है। गणित, भाषा और विज्ञान का प्रारंभिक ज्ञान ही बच्चों को आगे की शिक्षा और चुनौतियों के लिए तैयार करता है। जब बच्चे इन विषयों में दक्ष होते हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, जो उनके भविष्य की नींव मजबूत करता है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार की पॉलिसी का अनुसरण करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार कोई फैसला लेती है या नहीं।
ब्रांडेड चिरपोटी पताल..

छत्तीसगढ़ की आम बाडिय़ों में वैसे हाइब्रिड टमाटर व्यवसाय के लिए वर्षों से उगाये जा रहे हैं। यह ज्यादा दिन टिकता है और इसकी ट्रांसपोर्टिंग भी हो जाती है। पर चिरपोटी पताल की महिमा अलग ही है। यह टमाटर आकार में छोटे होते हैं, मगर ज्यादा टिकाऊ नहीं होते। लोकल किसान शहरों में इसे बेचने आते हैं, पर ज्यादातर खुद के खाने के लिए लगाते हैं। मिर्च, लहसुन, अदरक के साथ इसकी जो चटनी बनती है, उसका कोई मुकाबला नहीं। अब यह चिरपोटी पताल महानगरों में चेरी टोमेटो के नाम से पैकिंग के साथ बिक रहा है। पता नहीं इसे कई दिनों तक सहेजकर रखने का उपाय क्या है, पर मुंबई में यह उपलब्ध है। 13 पीस के 50 रुपये।
महिला संसदीय सचिव?
चर्चा है कि भाजपा महिलाओं को हर स्तर पर उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए रणनीति बना रही है। निगम-मंडलों में तो पद दिए ही जा रहे हैं, और अब महिला विधायकों को संसदीय सचिव भी बनाया जाएगा। भाजपा के 54 विधायकों में से 8 महिला विधायक हैं। इनमें से एक लक्ष्मी राजवाड़े मंत्री बन चुकी हैं। लता उसेंडी, और गोमती साय को क्रमश: बस्तर और सरगुजा प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया गया है। दोनों को ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है।
कहा जा रहा है कि बाकी पांच में से 4 महिला विधायकों को संसदीय सचिव बनाया जा सकता है। एक विधायक पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह भी हैं, जो कि किसी निगम-मंडल में पद लेने की इच्छुक नहीं है। वो मंत्री पद ही चाहती हैं, जिसकी संभावना फिलहाल कम नजर आ रही है। चूंकि केन्द्रीय मंत्री के साथ-साथ रमन सरकार में मंत्री रह चुकी हैं, ऐसे में उन्हें संसदीय सचिव बनाया जाएगा या फिर वो खुद बनना चाहेंगी इसकी संभावना नहीं के बराबर है। सबकुछ ठीक रहा, तो निकाय चुनाव के बाद बाकी चारों महिला विधायकों को संसदीय सचिव बन सकती है।
फिलहाल की हसरत
बीते पांच आठ वर्ष में छत्तीसगढ़ की नौकरशाही की छवि को लेकर अफसर चिंतित हैं। यह चिंता वे लोग ही कर रहे हैं जो दाल में नमक बराबर हिस्सेदारी निभाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कार्यरत अभा संवर्ग के तीनों सर्विसेस के पांच सौ अफसरों में कुछ ऐसे भी है जो स्वयं को गवर्नमेंट बिजनेस रूल से बांधकर डटे हुए हैं। इनकी संख्या उंगलियों में ही गिनी जा सकती है।
इसके एवज में उन्हें बार-बार तबादले लूप लाइन पोस्टिंग में स्वीकारना पड़ रहा है?। वहीं बदनाम लोगों में पुरूषों के साथ महिला अफसर भी बराबर का कदमताल कर रही हैं। एक-दो तो सीधे जेल में है और कुछ और पर भी कई छींटें हैं, बस बची हुई हैं। ऐसे कुछ अफसर एक कार्यक्रम में कुछ नेताओं के बीच थे। गपशप के दौर में उनकी मनोकामना सुन कर नई सरकार के नेता हतप्रभ से ठिठक गए। कहने लगे भाई साहब बस अब छवि सुधारनी है। बहुत सुन रहे हैं ये चोर वो चोर आदि-आदि। बस जहां हूं वहां काम करना हैं।
पूर्व के वर्षों में कलेक्टर, फेडरेशन, निगम में रहे इन साहबों की डंडी के बड़े चर्चे रहे हैं। और अब जिस विभाग में हैं, पिछले कुछ महीनों से काम भी कर रहे हैं रूल के मुताबिक। सच बात यह है कि साहब अभी जिस विभाग में हैं वहां गुंजाइश ही नहीं है। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी यही सोचकर साहब ने मनोकामना जता दी। और जब साहब को कोई नया विभाग मिलेगा तब देखना होगा मनोकामना का क्या हाल है।
चुनाव है या मनोनयन?
भाजपा का सदस्यता अभियान 30 नवंबर तक पूरा होना था, लेकिन निर्धारित 60 लाख सदस्यों का लक्ष्य हासिल न होने के कारण इसे आगे बढ़ा दिया गया। इसके बाद बूथ अध्यक्षों का चुनाव हुआ और 15 दिसंबर तक मंडल अध्यक्षों का चुनाव भी तय कार्यक्रम के अनुसार होना था। हालांकि, अब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है, जिसके चलते जिला अध्यक्षों के चुनाव भी आगे बढ़ गए हैं।
संगठन में अहम पद पाने की उम्मीद में कई दावेदारों ने सदस्यता अभियान में जोर-शोर से भाग लिया, लेकिन अधिकांश जिलों में चुनाव के बजाय मनोनयन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। चुनाव के लिए बैठकों का आयोजन किया जा रहा है, लेकिन उनमें भी मनोनयन को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रदेश में अब तक 80 प्रतिशत से अधिक मंडल अध्यक्षों का चयन हो चुका है, और इसे सर्वसम्मति का नाम दिया जा रहा है।
चुनाव अधिकारियों का कहना है कि चुनाव की नौबत ही नहीं आई क्योंकि सभी नाम सर्वसम्मति से तय हो गए। दरअसल, बताया यह जा रहा है कि आगामी नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में कार्यकर्ताओं के बीच मनमुटाव और खींचतान से बचने के लिए यह रास्ता चुना गया। खुली प्रतिस्पर्धा से गुटबाजी और भितरघात की आशंका बढ़ सकती थी, जो पार्टी समर्थित प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें खड़ी करती। अब सवाल यह है कि क्या जिला अध्यक्षों का चयन भी इसी तरह शांति से निपट जाएगा, या कहीं से विरोध के स्वर उठेंगे?
कबाड़ के धंधे में नवाचार

विनोद ओल्ड पेपर मार्ट-इस गाड़ी के बोर्ड पर लिखा यह नाम अपने आप में एक नई सोच और आत्मसम्मान की मिसाल है। रद्दी अखबार और पुराने कागज खरीदने वालों को अक्सर हेय दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन यहां इसे एक ‘मार्ट’ की तरह पेश कर, इस व्यवसाय को सम्मान और व्यवस्थित रूप देने की कोशिश की गई है। जहां कई लोग इस काम को छोटा समझते हैं, वहीं यह व्यवसाय पर्यावरण संरक्षण और रिसाइक्लिंग में बड़ा योगदान देता है।
विनोद की झलकती सादगी संदेश देती है कि हर काम में सम्मान और नई सोच जोडऩे की गुंजाइश होती है। विनोद कहना चाहते हैं कि काम कोई भी हो, उसे गरिमा के साथ किया जा सकता है। भले ही इसके लिए हिंदी की जगह अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।
बिना विवाद आरक्षण
नगरीय निकायों के वार्डों का आरक्षण हो चुका है। अब महापौर, और अध्यक्षों के आरक्षण की तैयारी चल रही है। रायपुर नगर निगम के वार्डों के आरक्षण को लेकर सर्वाधिक उत्सुकता रही, क्योंकि विधानसभा टिकट से वंचित कई नेता वार्ड चुनाव लडऩे के इच्छुक रहे हैं। कुछ नेताओं को लॉटरी प्रक्रिया में गड़बड़ी का भी अंदेशा था। लिहाजा, वो इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रखे हुए थे।
पिछले दिनों रायपुर नगर निगम के वार्डों का आरक्षण सबसे पहले हुआ। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने लॉटरी प्रक्रिया में किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। जिस किसी ने भी शिकायत की, उसका निराकरण मौके पर ही कर दिया। एक घंटे में सभी 70 वार्डों का आरक्षण बिना किसी विवाद के निपट गया।
सारी प्रक्रिया होने के बाद मेयर एजाज ढेबर मंच पर चढ़े, और कलेक्टर को यह कहते हुए धन्यवाद दिया कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतने अच्छे से सबकुछ हो जाएगा। ये अलग बात है कि ढेबर का खुद का वार्ड महिला वर्ग के लिए आरक्षित हो गया है, और यदि वो चुनाव लडऩा चाहेंगे, तो उन्हें कोई दूसरा वार्ड तलाशना पड़ेगा। भाजपा नेता भी आरक्षण को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नजर आए। दिलचस्प बात यह है कि पिछले चुनाव में आरक्षण की प्रक्रिया हुई थी, तब डॉ. गौरव सिंह जिला पंचायत के सीईओ थे। लिहाजा, उनका पुराना अनुभव काम आया। और सब कुछ बेहतर ढंग से निपटाने में सफल रहे।
समुद्र (सिंह)की फैलाई गंदगी साफ हो रही'
पिछले दो तीन दिनों से सचिव स्तरीय तबादलों की हलचल के बीच इस बार सेंटर ऑफ अट्रैक्शन आबकारी होने जा रहा है। यहां सचिव बदलने और बनने कई बल्लम लगे हुए हैं। लेकिन मैडम हैं कि बिना डिगे बस अपना काम करती जा रही हैं। बस एक ही लक्ष्य इस धंधे में समुद्र सिंह के जमाने से एपी त्रिपाठी, निरंजन दास तक फैली सरकारी गंदगी पर स्वच्छता अभियान जारी रहे।
बीते दस महीने में गोदाम से लेकर दुकान तक एक-एक पौवा, अध्दी-बॉटल सब कुछ आनलाइन, सीसीटीवी कैमरे की नजर में ला चुकीं हैं। हर प्लेसमेंट कर्मचारी की जेब तक खंगाली जाती है। और तो और होलोग्राम की डुप्लीकेसी खत्म करने नासिक के करेंसी प्रिंटिंग प्रेस से छपवा रही हैं। यहां भी शक की गुंजाइश खत्म करने मैडम खुद नासिक पहुंच गई और सप्ताह भर रहकर छपाई का पूरी प्रक्रिया देख आईं।
आखिर सालभर में लगने वाले 95 करोड़ नग होलोग्राम का सवाल है। यह सब देखकर विभाग के दो चार अफसर बातें कर रहे थे कि इन दस महीनों में लग रहा है कि हम विभाग के लिए काम कर रहे हैं। भले हमें कुछ नहीं मिल रहा लेकिन विभाग की दबंगई फील्ड में नजर आ रही है। जो बीते 10 वर्षों में साथ खत्म हो गई थी। यह भी दावा किया कि यह सफाई अभियान जारी रहा तो सबसे गंदा कहे जाने वाले इस कारोबार की स्वच्छता के लिए छत्तीसगढ़ जाना जाएगा। अब देखना होगा आने वाले दिनों में बदलाव क्या संदेश लाता है?
और संपन्न हो गया पहला ध्यान दिवस

कल बिना किसी हो हल्ले को विश्वभर में प्रथम अंतरराष्ट्रीय ध्यान योग दिवस मन गया। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने घोषित किया था। लेकिन इसके आयोजन को लेकर वो प्रचार और हो हल्ला नहीं हो पाया जो अंतरराष्ट्रीय योग दिवस या छत्तीसगढ़ के परिपेक्ष्य में 1 मई को बोरे बासी दिवस का होता रहा है।
उन आयोजनों में खबरें और तस्वीरें प्रकाशित करने में स्थानाभाव का सामना करना पड़ता रहा है। छपवाने के लिए मंत्री अफसर और नेताओं की होड़ लगती रही है। इससे ठीक विपरीत कल का दिन रहा। यह ध्यान योग दिवस, आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर की पहल पर घोषित किया गया है। वे कल न्यूयॉर्क में पहले आयोजन में शरीक भी हुए। रविशंकर जी की जनसामान्य के साथ-साथ देश की सत्ता के गलियारों में भी खासी पकड़ है। इसके बाद भी दिल्ली से लेकर देश और रायपुर में आयोजन को लेकर कोई बड़ी पहल माहौल नजर नहीं आया। और इक्का-दुक्का कार्यक्रम ही हो पाए।
हमारे प्रथम पेज के सहयोगी ने कल हमसे रायपुर में हुए आयोजन की तस्वीर और विस्तृत खबर मांगी थी लेकिन शाम तक रायपुर में किसी भी तरह के आयोजन की कोई खबर नहीं मिली तो हम न दे सके। फिर रात खबर मिली कि इसका एक कार्यक्रम केंद्रीय जेल में हुआ था। जिसे एक मात्र सरकारी आयोजन कहा जा सकता है। चूंकि इस आयोजन ले प्रधानमंत्री और अन्य सत्ताधीशों ने दूरी बना रखी थी इसलिए शासन-प्रशासन ने भी रुचि नहीं ली। लेकिन आर्ट ऑफ लिविंग के सदस्य अनुयायियों के लिए दिवस की घोषणा ही सबसे अहम है।
जुर्माने और हादसों के बीच खाई
चौक-चौराहों और हाईवे पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने के बाद नागरिकों में जवाबदेही का भाव बढ़ा है। पुलिस इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मानती है। कोरबा पुलिस द्वारा हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के चलते अब तक 1 करोड़ 48 लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया है। इनमें सडक़ पर की गई जांच भी शामिल है। इसी तरह, पूरे प्रदेश का आंकड़ा भी जबरदस्त है। वर्ष 2023 में भारी-भरकम, कुल 23 करोड़ 5 लाख 59 हजार रुपये वसूले गए। रायपुर जिले में सबसे अधिक 1 लाख 532 लोगों से 8 करोड़ 27 लाख 80 हजार रुपये का जुर्माना वसूला गया।
हालांकि, यह सोचना गलत होगा कि जुर्माने की इस सख्ती से सडक़ दुर्घटनाओं में कमी आई है। वास्तविकता यह है कि प्रदेश में सडक़ हादसों की संख्या भयावह रूप में लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2022 में प्रदेश में कुल 14 हजार सडक़ दुर्घटनाएं हुई थीं, जो 2023 में नवंबर तक ही 14 हजार 500 तक पहुंच गई थीं। वर्ष 2024 के पूरे आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन दुर्ग जिले में अब तक 1596 दुर्घटनाओं में 989 लोगों की मौत हो चुकी है। रायपुर जिले में 1967 दुर्घटनाओं में 520 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। केंद्रीय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने पिछले दिसंबर तक के जारी आंकड़ों में बताया था कि देशभर में सडक़ दुर्घटनाओं में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
सीसीटीवी कैमरों की वजह से कई स्थानों पर ट्रैफिक पुलिस की उपस्थिति कम हो गई है। उनका उपयोग वीवीआईपी प्रोटोकॉल और अन्य गैर-जरूरी कार्यों में किया जाने लगा है। लेकिन, जुर्माना वसूली के रिकॉर्ड के साथ-साथ अफसरों को यह भी बताना होगा कि ट्रैफिक सिग्नल तोडऩे, रॉन्ग साइड चलने और ओवरस्पीडिंग पर भारी जुर्माने के बावजूद सडक़ हादसे क्यों बढ़ रहे हैं।
कबीरधाम जिले में 20 मई 2024 को तेंदूपत्ता मजदूरों से भरी एक पिकअप खाई में पलट गई थी, जिसमें 19 लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में मालवाहक वाहनों से यात्रियों को ले जाने पर कार्रवाई शुरू हुई, लेकिन यह अभियान महज एक महीने बाद ठंडा पड़ गया।
अब कल शनिवार की शाम को जगदलपुर के दरभा थाना क्षेत्र के कोलेंग में हादसा हो गया। एक पिकअप में 35 मजदूरों को भरकर साप्ताहिक बाजार ले जाया जा रहा था। तेज रफ्तार गाड़ी पहाड़ी मोड़ पर बेकाबू होकर 10 फीट नीचे जा गिरी। इस हादसे में 5 लोगों की मौत हो गई और 30 घायल हो गए। इस दुर्घटना ने एक बार फिर सुरक्षित यात्रा और सार्वजनिक परिवहन की खस्ताहाल स्थिति को उजागर किया है। थोक में हो रही मौतें स्पष्ट करती है कि प्रदेश में सस्ती सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का घोर अभाव है। गरीब मजदूरों को मालवाहक गाडिय़ों में जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ता है। ड्राइवर ज्यादा कमाने के लालच में उन्हें ठूंस-ठूंसकर भर लेते हैं। इस कमाई को वे शराब में उड़ाते हैं और इसी हाल में गाडिय़ां भी चलाते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं में हो रही सामूहिक मौतों की जिम्मेदारी परिवहन विभाग और यातायात पुलिस को लेनी चाहिए, वह जुर्माने का आंकड़ा देकर नहीं बच सकती।
थाने में गुरु-शिष्य मिलन..

रायपुर पुलिस ने अपराधियों को सुधारने के लिए गंज थाने में ‘मॉडर्न स्कूल’ खोल दी। अपराधियों को मुर्गा बनवाया, उठक-बैठक करवाई, लकड़ी के पट्टे से हथेली और पिछवाड़े को पीटा। ये सब वे ही तरीके हैं, जो किसी समय बच्चों को सबक सिखाने के लिए क्लास में मास्टरजी अपनाया करते थे। (अब ऐसा करने पर शिक्षकों को शिकायत हो जाने का डर सताता है।) सवाल ये है कि हत्या के प्रयास, चाकूबाजी, लूटपाट जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त शिष्यों ने गुरु की इस क्लास को मनोरंजन की तरह लिया या फिर सचमुच कोई सबक सीखा।
पुरानी कमाई का दम
सरकार के एक विभाग के चार सहायक आयुक्तों ने, अपने एक साहब को हटाने हटवाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया है । इनमें एक रायपुर, एक बिलासपुर एक राजनांगांव में पदस्थ रहे। और ये चारों तीन हजार करोड़ के एक घोटाले की चार्ज शीट में नामजद हैं। और इनके किंगपिन तो जेल में है। इन चारों ने इसमें, पिछली सरकार के समय हुए घोटाले से कमाई, पूरी जमा पूंजी भी झोंक दी हैं। और ऐसे लोग सालभर से इस गोरख धंधे में आई कसावट पर सेंध लगाने एड़ी चोटी लगा रहे हैं। क्योंकि 10-11 महीने से इन्हें घर केवल तनख्वाह से चलाना पड़ रहा है। लाखों की उपरी कमाई जो बंद है। क्या करें बेचारे उडऩदस्ते में भेज दिए गए थे। जिले की कमान से बाहर कर लूप लाइन में बिठा दिए गए हैं । पूरा कारोबार आनलाइन हो गया सो अलग। सरकारी इंकम के लीकेज के लिए कहीं भी लूप होल नहीं है। अब तो दबंग डिस्टलरीज पर भी जुर्माना होने लगा है। ऐसे में ये लोग अपने दिन बदलने, सरकार के दिन खराब करने जुट गए हैं।
कहा यह जा रहा कि चारों सफल हुए तो एक बार फिर नदियां बहेंगी। दुकानों में एक बार फिर से दो-दो सेल रजिस्टर रहेंगे। अंग्रेज़ी का अवैध कारोबार कराएंगे।
एक्सटेंशन या 92 को अवसर
राज्य सरकार ने डीजीपी के चयन के लिए तीन नामों का पैनल केन्द्र सरकार को भेजा है। इनमें 92 बैच के आईपीएस अफसर अरूण देव गौतम, पवन देव, और 94 बैच के अफसर हिमांशु गुप्ता के नाम हैं। यह भी संयोग है कि देश के पांच राज्य नागालैंड, मेघालय, पंजाब, तेलंगाना, और जम्मू-कश्मीर में भी 92 बैच के अफसर डीजीपी हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ में इस बैच के अफसर के डीजीपी बनने का अंदाजा लगाया जा रहा है।
हालांकि कुछ जानकार मौजूदा डीजीपी अशोक जुनेजा को एक्सटेंशन मिलने की संभावना भी जता रहे हैं। जुनेजा को रिटायरमेंट के बाद छह माह का एक्सटेंशन मिला हुआ है। नियमानुसार केन्द्र सरकार छह माह का एक्सटेंशन और दे सकती है। हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह दो दिन छत्तीसगढ़ दौरे पर थे। छत्तीसगढ़ पुलिस को राष्ट्रपति कलर अवार्ड से सम्मानित किया है।
अमित शाह ने छत्तीसगढ़ पुलिस की खूब तारीफ की, और विशेषकर कोरोना के दौर में छत्तीसगढ़ पुलिस के सहायता अभियान का भी उल्लेख किया। इससे परे शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इसको देखते हुए छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ अभियान भी चल रहा है। ऐसे में नए डीजीपी की चयन प्रक्रिया में विलंब हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस पूरे मामले में तस्वीर नए साल में ही साफ होने की उम्मीद है।
किसकी चली सूची बताएगी
भाजपा में संगठन चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। कई जिलों में मंडल अध्यक्षों के नाम घोषित भी हो गए हैं। मगर रायपुर शहर जिले के 20 मंडलों के नाम घोषित करने में प्रदेश उपाध्यक्ष शिवरतन शर्मा को पसीना छूट रहा है।
शहर की चारों सीट पर पार्टी के ही विधायक हैं। विधायकों की अपनी पसंद स्पष्ट हैं। कई नेता, जो विधानसभा टिकट से वंचित रह गए थे, वो मंडलों में अपना अध्यक्ष बिठाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। कई दौर की बैठक हो चुकी हैं। फिर भी चार-पांच मंडल ऐसे हैं जहां विवाद ज्यादा है। संकेत है कि यहां प्रदेश संगठन को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। किस नेता की कितनी चली है, यह तो सूची जारी होने के बाद ही पता चलेगा।
विभाग में वापसी
प्रदेश के आदिम जाति विभाग के स्कूली शिक्षकों को लेकर एक खबर सुनी जा रही है । और वह यह कि इन शिक्षकों का पूरा सेटअप एक बार फिर से वापस मूल विभाग को अंतरित किया जा रहा है। बता दें कि भाजपा सरकार के 2008-13 के कार्यकाल में तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने गहरी रूचि लेकर आदिम जाति विभाग का पूरा स्कूली सेटअप, स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन करवा लिया था। इसके पीछे आदिवासी विकास के लिए मिलने वाला बड़ा बजट नजर में था। और कामकाज में इन शिक्षकों को टीचर टी-ट्राइबल और टीचर ई-एजुकेशन का संवर्ग नाम दिया गया। तबादलों के लिए भी एरिया पूर्वानुसार ही रखा। यानी टीचर टी, आदिवासी क्षेत्रों में ही स्थानांतरित किए जाएंगे।
कांग्रेस सरकार ने बिना किसी अड़चन, दिक्कत के इस व्यवस्था को संचालित किया। लेकिन अब फिर से आदिम जाति कल्याण विभाग अपने शिक्षकों की वापसी के लिए जोर लगा रहा है। इस बदलाव के पीछे एक बार फिर बजट ही कारण बना है। अफसरों की इस चाह पर मंत्री जी ने भी सहमति दे दी है। इसके लिए विभाग ने कैबिनेट नोट भी तैयार कर लिया है। सब कुछ सामान्य रहा तो नए सत्र से एक बार फिर टीचर टी और ई अलग-अलग हो जाएंगे। वैसे हाल में विभाग ने एक और अप्रत्याशित फैसला किया है। अब विभाग के एकलव्य विद्यालय भवन, राज्य के निर्माण विभाग पीडब्लूडी के बजाए केंद्रीय उपक्रम एनबीसीसी से बनवाए जाएंगे। 450 करोड़ का वर्क आर्डर भी दे दिया गया है। वैसे पूर्व मंत्री ने इसी बजट में घोषणा की थी कि संयुक्त स्कूल शिक्षा विभाग (यानी टी-ई) के भवन बनाने विभाग में ही कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग विंग खोला जाएगा। जो मंत्री जी के सांसद बनने के बाद से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
सरकार से असंतुष्ट उनके विधायक
छत्तीसगढ़ विधानसभा का संक्षिप्त शीतकालीन सत्र समाप्त हो गया और कार्रवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई। इस सत्र को इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि मंत्रियों से सवाल करने के लिए विपक्ष से कहीं ज्यादा तैयारी सत्ता पक्ष के विधायकों ने की थी। सत्र के अंतिम दिन कानून व्यवस्था धान खरीदी, अस्पतालों की फायर ऑडिट और कुछ अन्य मुद्दों पर सदन में चर्चा कराने की मांग करते हुए कांग्रेस विधायक वेल में जरूर पहुंचे और निलंबित हो गए लेकिन पहली बार के विधायक, नये-नवेले मंत्रियों को ज्यादा परेशान तो उनके अपने ही वरिष्ठ विधायकों ने किया। दंतेवाड़ा के सडक़ निर्माण में हुए कथित भ्रष्टाचार को लेकर दिए गए उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के जवाब से अजय चंद्राकर संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने आरोप तक लगा दिया कि भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया जा रहा है। राजेश मूणत ने स्मार्ट सिटी के कार्यों में हुए भ्रष्टाचार, 6 करोड़ की लागत से रायपुर में तैयार फाउंटेन के बंद होने का मुद्दा उठाते हुए नगरीय प्रशासन मंत्री व उपमुख्यमंत्री अरुण साव को घेरा। विधायक सुशांत शुक्ला और धर्मजीत सिंह ठाकुर ने राजस्व मंत्री के जवाब को सीधे-सीधे गलत ठहरा दिया। उन्होंने पूछा था कि शासकीय जमीन पर कितना कब्जा हुआ, कब्जा करने वाले और इसमें साठगांठ करने वाले अधिकारियों के ऊपर क्या कार्रवाई हुई, जानना चाहा। मंत्री ने करीब 500 अतिक्रमण की जानकारी जवाब में दी तो शुक्ला ने पूरी सूची उनके सामने रखकर बता दिया कि 13000 ऐसी शिकायतें हैं।
बार-बार चंद्राकर का पूरक प्रश्न आने पर आखिरकार डिप्टी सीएम विजय शर्मा को ठेकेदार को ब्लैक लिस्टेड करने और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की घोषणा करनी पड़ी। वर्मा को कहना पड़ा कि इसके लिए समिति बनाकर जांच कराएंगे, मगर शिकायत तथ्यों के साथ मिलनी चाहिए। डिप्टी सीएम साव से भी कांग्रेस शासन काल के दौरान स्मार्ट सिटी के हुए सभी कार्यों की जांच कराने की मांग की गई, पर ऐसी कोई ठोस घोषणा उनकी ओर से नहीं की गई।
दिखाई ऐसा जरूर दे रहा है कि भाजपा के विधायक अपने ही मंत्रियों से सवाल पर सवाल दाग कर सरकार पर ऊंगली उठा रहे हैं, पर उन्होंने जिन विषयों को उठाया उनमें से अधिकांश पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन के दौरान हुई गड़बडिय़ों से जुड़ा हुआ है। मंत्रियों के जवाब से आभास हो रहा था कि वे तकनीकी उत्तर दे रहे हैं, जो अधिकारियों ने तैयार करके दिया है। यह बात धर्मजीत सिंह ने मंत्री वर्मा से कही भी। फिर भी इन भाजपा विधायकों ने धरसींवा से तीन बार विधायक रहे देवजी भाई पटेल की याद दिला दी, जो अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा के प्रत्येक सत्र में आक्रामक नजर आते थे।
गाय भारी पड़ी बाघिन पर..

रात के अंधेरे में वन विभाग के ट्रैप कैमरे से कैद की गई तस्वीर कुछ धुंधली सी है लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ अधिक स्पष्ट वीडियो फुटेज देखी जा सकती है। दिसंबर के पहले सप्ताह में अमरकंटक की ओर से मरवाही के जंगल में यह बाघिन भटकते हुए पहुंची और एक बछड़े का शिकार किया। फिर उसने कुछ दिनों के बाद एक गाय का शिकार करने की कोशिश की। घास चर रही गाय के पीछे-पीछे वह हौले-हौले चलकर नजदीक पहुंच जाती है। गाय उसे देखकर सिर झटकती है, मानो कह रही हो कि चारा खा रही हूं, व्यवधान पैदा मत करो। मगर भूखी बाघिन उछलकर उसे दबोचने की कोशिश करती है। गाय घबराती नहीं, वह अपना सिर घुमाती है और सींग से हमला करने के लिए उछल जाती है। बाघिन यह देखकर घबरा जाती है। दो कदम पीछे हटती है, फिर आगे बढक़र गाय पर चढ़ाई करने की कोशिश करती है। गाय बौखला गई, उसने भी अपनी लंबी टांगों को उठाकर बाघिन को दो-दो हाथ करने की चुनौती दी। बाघिन घबरा गई। वह दो कदम पीछे हटी। बाघिन को गाय ने फिर हडक़ाया, बाघिन और पीछे हटी। अब गाय भारी पड़ गई। बाघिन को अपनी ताकत का अंदाजा नहीं था, वह गाय से घबरा गई। गाय ने उसे दौड़ा दिया और आखिरकार वह उल्टे पांव भाग खड़ी हुई।
ऐसा क्यों हुआ होगा? वन विभाग के अफसरों का कहना है कि बाघिन गर्भवती है। उसे शिकार की जरूरत तो थी लेकिन शायद अपनी कोख की फिक्र थी। गाय सीधे-सीधे हाथ आ जाती तो मंजूर था, मगर गुत्थम-गुत्थी में गर्भस्थ शावकों को नुकसान पहुंच सकता था।
अफसरों के कनेक्शन
विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुक्रवार को समाप्त हुआ। सत्र समाप्ति के साथ ही एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी है। प्रमुख सचिव सुबोध सिंह, और सचिव अमित कटारिया मंत्रालय में जॉइनिंग दे चुके हैं। दोनों ही अफसर केन्द्र सरकार में अहम पदों पर रहे हैं।
आईएएस के 97 बैच के अफसर सुबोध सिंह तो डॉ. रमन सिंह के सीएम रहते उनके सचिव भी रहे हैं। वो रायगढ़ कलेक्टर थे तब सीएम विष्णुदेव साय वहां के सांसद थे। सीएम, सुबोध सिंह की कार्यशैली से पूर्व परिचित हैं। इसी तरह अमित कटारिया भी रायगढ़ कलेक्टर रहे हैं। लिहाजा, दोनों अफसरों को अहम दायित्व मिल सकता है।
इसी तरह बिलासपुर कलेक्टर अवनीश शरण और नारायणपुर कलेक्टर विपिन मांझी प्रमोट होकर सचिव बनने वाले हैं। ऐसे में दोनों अफसरों का बदला जाना तय माना जा रहा है। दोनों के अलावा नगरीय निकाय, और पंचायत चुनाव के चलते कुछ और जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं।
इसी तरह सचिव स्तर के अफसर नीलम नामदेव एक्का पिछले तीन महीने से खाली हैं। उन्हें अब तक कोई प्रभार नहीं दिया गया है। एक्का बिलासपुर कमिश्नर थे, और फिर उन्हें मंत्रालय में पदस्थ किया गया। इसके बाद से अब तक उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है। एक्का को कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है। कुछ विभागाध्यक्षों को भी इधर से उधर किया जा सकता है।
पुलिस में बदलाव क्या-क्या?
सरकार ने जबरिया रिटायर किए गए एडीजी जीपी सिंह बहाल कर दिया है। उन्होंने पीएचक्यू में जॉइनिंग दे दी है। जीपी सिंह की जॉइनिंग के साथ ही पीएचक्यू में बड़े बदलाव की चर्चा है। इसकी एक और वजह है कि वर्ष-2007 बैच के अफसर दीपक झा, रामगोपाल गर्ग, और अभिषेक शांडिल्य प्रमोट होकर आईजी बनने वाले हैं।
गर्ग, और दीपक झा तो क्रमश: दुर्ग, और राजनांदगांव रेंज आईजी के प्रभार पर हैं। जबकि अभिषेक शांडिल्य हाल ही में केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे हैं। उन्होंने पीएचक्यू में जॉइनिंग दे दी है। मगर उनकी पोस्टिंग नहीं हुई है। कहा जा रहा है कि आईजी, और एसपी स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं। इससे परे डीआईजी स्तर के अफसर अभिषेक मीणा सहित कुछ और अफसर अभी भी खाली हैं। उन्हें कोई प्रभार नहीं दिया गया है। माना जा रहा है कि पीएचक्यू में काफी कुछ बदलाव हो सकता है।
साढ़े सात साल पुराना बयान याद आया?
राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने बीते मंगलवार को विपक्ष पर निशाना साधते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर का जिक्र किया, जिससे राजनीतिक माहौल गर्मा गया। उन्होंने कहा, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर..। आजकल अंबेडकर का नाम लेना एक फैशन हो गया है। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। इस बयान ने विपक्ष को आक्रामक प्रतिक्रिया देने का मौका दे दिया।
शाह के विवादित बयानों की फेहरिस्त में ऐसा ही एक, छत्तीसगढ़ की जमीन पर भी दर्ज है। 2017 में जब वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब रायपुर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अगले विधानसभा चुनाव में 65 सीटें जीतने का लक्ष्य रखें। हालांकि, इस चुनावी रणनीति से ज्यादा चर्चा में उनका एक दूसरा बयान रहा।
मेडिकल कॉलेज में बुद्धिजीवियों के साथ बैठक के दौरान शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था, कांग्रेस किसी एक विचारधारा पर बनी पार्टी नहीं है। यह आजादी हासिल करने के लिए एक स्पेशल पर्पज व्हीकल थी। महात्मा गांधी ने भी इसे समझ लिया था। गांधीजी बहुत ‘चतुर बनिया’ थे। उन्हें पता था कि आजादी के बाद कांग्रेस का कोई औचित्य नहीं रहेगा, इसलिए उन्होंने आजादी के तुरंत बाद कांग्रेस को भंग करने की बात कही थी।
इस बयान पर तब विपक्ष ने शाह को आड़े हाथों लिया। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इसे महात्मा गांधी का अपमान बताते हुए माफी की मांग की, लेकिन शाह ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा था कि जिन्होंने मेरा बयान सुना है, वे जानते हैं कि मैंने ‘चतुर बनिया’ शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया था।
आज अंबेडकर वाले बयान को लेकर इस्तीफे और माफी की कांग्रेस की मांग पर भी भाजपा का वही रुख है। शाह और पार्टी अपने स्टैंड पर न केवल कायम हैं, बल्कि पलटवार कर रही है। बात इस बार ज्यादा बिगड़ गई है।
शिकारी के कब्जे में हीरामन का कुनबा

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2022) के तहत तोतों की खरीदी-बिक्री और पालने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश इस साल जुलाई में छत्तीसगढ़ के वन विभाग द्वारा जारी किया गया था। लोगों को स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि उनके घरों या कार्यालयों में तोते पिंजरों में कैद हैं, तो उन्हें खुले में छोड़ दें या वन विभाग के चिडिय़ाघरों में सौंप दें। इसके लिए एक महीने की मोहलत दी गई थी।
हालांकि, 26 अगस्त को प्रधान मुख्य वन संरक्षक की ओर से अचानक एक नई सूचना जारी की गई, जिसमें कहा गया कि केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन लिया जा रहा है, और इस कारण कार्रवाई फिलहाल स्थगित रखी जाए। यह समझ से परे है कि स्पष्ट कानून का पालन करवाने के लिए किस प्रकार के ‘तकनीकी मार्गदर्शन’ की आवश्यकता थी।
इस असमंजस और सुस्ती का नतीजा यह हुआ कि अब तक न कोई नई चेतावनी जारी हुई है, न ही कानून का सख्ती से पालन किया गया है। अधिनियम के तहत संरक्षित पक्षियों को पालने पर तीन साल तक के कारावास का प्रावधान है, लेकिन वन विभाग की लापरवाही के कारण शायद ही किसी को सजा मिली हो।
इधर, तोतों की खरीदी-बिक्री और उन्हें पालने का अवैध कारोबार खुलेआम जारी है। हाल ही में रायपुर रेलवे स्टेशन पर वन विभाग ने एक व्यक्ति से दो-चार नहीं, 105 तोते जब्त किए। इनमें से अधिकांश हीरामन प्रजाति के थे, जिन्हें पालने के लिए बहुत पसंद किया जाता है, क्योंकि ये मनुष्यों के आवाज की हूबहू नकल कर सकते हैं।
तोतों को जाल में फंसाने वाले शिकारी वन विभाग के लिए आसान लक्ष्य हैं, लेकिन असली चुनौती उन लोगों पर कार्रवाई करने की है, जो इन्हें खरीदकर पालते हैं। अफसरों में इन पर कार्रवाई की इच्छाशक्ति की कमी साफ दिखती है।
अंबेडकर की चिंता किसको ज्यादा?
डॉ. भीमराव अंबेडकर, जो संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे और जिन्हें हम संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं, के नाम पर छत्तीसगढ़ में कई उल्लेखनीय पहल और संस्थान स्थापित किए गए हैं। रायपुर में उनके नाम पर राज्य का सबसे बड़ा हेल्थ केयर संस्थान मौजूद है, जिसमें 1100 बिस्तरों के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज का संबद्ध है। इसमें कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अत्याधुनिक सुपर स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध हैं।
डोंगरगांव (राजनांदगांव), बलौदा और पामगढ़ (जांजगीर-चांपा) में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम वाले सरकारी कॉलेज संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा, विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंबेडकर पीठों की स्थापना की गई है, जहां वंचित समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास पर केंद्रित अध्ययन किए जाते हैं।
साल 2015 में, डॉ. अंबेडकर के नाम पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आदर्श ग्राम योजना शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य देश के 10 राज्यों के 1000 गांवों को आदर्श ग्राम बनाना था। इस योजना में छत्तीसगढ़ भी शामिल था, लेकिन वर्तमान में इस योजना की प्रगति अस्पष्ट है।
छत्तीसगढ़ के लगभग हर प्रमुख शहर और कस्बे में डॉ. अंबेडकर के नाम पर चौक-चौराहे और प्रतिमाएं स्थापित हैं। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकार के विभाग नियमित रूप से अंबेडकर जयंती और संविधान दिवस (जो 2016 से शुरू हुआ) पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
हालांकि, बाबा साहब की विरासत को लेकर राजनीतिक दलों में होड़ भी स्पष्ट है। वे एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि संविधान और अंबेडकर की विरासत खतरे में है। पिछले कुछ दिनों से इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। हर दल यह दिखाने की कोशिश में है कि उन्होंने अंबेडकर को अधिक सम्मान दिया है और उनके आदर्शों को जीवित रखा है। राजनीतिक फायदे से परे उन लोगों के बीच अंबेडकर की तलाश करनी होगी, जो आज संविधान के मुताबिक बराबरी का हक पाने का इंतजार अभी भी कर रहे हैं।
गैर हाजिर सांसदों की दिक्कत
देश में लोकसभा, और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले संशोधन विधेयक के लोकसभा में मतदान के दौरान गैरहाजिर रहने वाले 20 भाजपा सांसदों को पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें छत्तीसगढ़ के दो भाजपा सांसद विजय बघेल, और राधेश्याम राठिया भी हैं।
विजय बघेल ने सफाई दी है कि वो दवाई लेने गए थे, और आने में विलंब हुआ इसलिए वो मतदान में हिस्सा नहीं ले पाए। पहली बार के सांसद राधेश्याम राठिया को जवाब देते नहीं बन रहा है। खास बात यह है कि भाजपा संसदीय दल के मुख्य सचेतक संतोष पाण्डेय हैं।
सांसदों की गैर मौजूदगी के लिए संतोष को भी जवाब देना पड़ रहा है। पार्टी के सांसद सदन में उपस्थित रहे, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मुख्य सचेतक व सचेतक की रहती है। वैसे भी भाजपा को अकेले सदन में बहुमत नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान सभी सांसदों की उपस्थित रहने के लिए पार्टी की तरफ से समय-समय पर दिशा निर्देश दिए जाते हैं।
कुछ दिन पहले सत्र की अवधि में सांसद बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर आना था, तो उन्होंने इसके लिए बकायदा स्पीकर, और संसदीय कार्यमंत्री से अनुमति लेकर ही रायपुर आए थे। विजय बघेल, और राधेश्याम राठिया के प्रकरण के बाद प्रदेश के संगठन भी संसद के साथ-साथ विधानसभा की गतिविधियों पर भी नजर रखे हुए हैं।
जोगी परिवार-बृहस्पति की वापसी?
जोगी परिवार, और पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। डॉ. रेणु जोगी ने अपनी पार्टी जनता कांग्रेस में विलय का लिखित प्रस्ताव दिया है, और इस पर समिति में विचार होगा। इसी तरह बृहस्पति सिंह का आवेदन पहले से ही लंबित है। प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने निलंबित, और निष्कासित नेताओं की पार्टी में वापसी पर विचार के लिए समिति बनाई है। सात सदस्यीय समिति में प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, डॉ. चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू, मोहन मरकाम, प्रभारी सचिव द्वय संपत कुमार, जरिता लैतफलांग, और विजय जांगिड़ है।
चर्चा है कि जोगी परिवार की कांग्रेस में वापसी का पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमा विरोध कर सकता है। मगर पूर्व सीएम समिति में नहीं है। कहा जा रहा है कि डॉ. रेणु जोगी ने पार्टी हाईकमान से चर्चा के बाद विलय का प्रस्ताव दिया है। इसी तरह बृहस्पति सिंह की वापसी की राह में पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव रोड़ा बने रहे हैं, लेकिन वो भी इस समिति में नहीं है।
अंदर की खबर यह है कि डॉ. रेणु जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के कांग्रेस में विलय के प्रस्ताव पर समिति कोई फैसला लेने के बजाए सीधे हाईकमान को भेज सकती है। इसी तरह बृहस्पति सिंह का प्रकरण भी हाईकमान को भेजा जा सकता है। संकेत साफ है कि देर से ही सही इन सभी की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। देखना है कि भूपेश, और सिंहदेव का क्या रूख रहता है।
मीठा करौंदा

आम तौर पर बाड़ी, बगीचे और हाट बाजार में जो करौंदा मिलता है वे छोटे आकार के होते हैं और बेहद खट्टे। कच्चा खाने की कोशिश करें तो पूरा मुंह किनकिनाहट से भर जाएगा। इसकी चटनी और अचार बेहद पसंद की जाती है। पर यह जो करौदा दिख रहा है, वह जंगलों में मिलता है। जब कच्चे होते हैं तो स्वाद कसैला होता है, पर जब पकते हैं तो रंग जामुन की तरह काला हो जाता है और जामुन की तरह ही मीठा भी। भालुओं को यह करौंदा बहुत प्रिय है। कटीली डालियों के बीच घुसकर वे इसे बड़े चाव से खाते हैं। (फोटो-चंद्रकांत पारगीर)
सॉफ्ट विपक्ष और एग्रेसिव सत्तापक्ष
विधानसभा में आज की बैठक स्थगित है। चार दिनों के शीत सत्र के पहले दो दिन विधानसभा सदन काफी गर्माहट भरा रहा। इसमें विपक्ष से ज्यादा सत्ता पक्ष के विधायकों की भूमिका रही। इस दौरान जल जीवन मिशन, सरगुजा से बस्तर तक सड? निर्माण, शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर फिजूल खर्च और अफसरों के भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगा पाने पर विभागीय मंत्रियों को आड़े हाथों लिया।
दरअसल, भाजपा विधायक, बघेल शासन के भ्रष्टाचारी अफसर कर्मियों पर एक साल बाद भी कार्रवाई न करते हुए गोद में बिठाए जाने से अधिक नाराज हैं। मंत्रियों पर गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाने और झूठ बोलने तक के भी तोहमत भाजपा विधायकों ने लगाए। इस बार प्रश्नावधि का ट्रेंड भी कुछ नया रहा। वर्ष 2019 से नवंबर 24 की अवधि के कार्यों,गड़बडि?ों पर पूछे गए। यानी भाजपा सरकार का एक वर्ष भी निशाने पर रहा। दो दिनों में विधायकों के टारगेट में खाद्य, वन, राजस्व, लोनिवि, पीएचई, नगरीय प्रशासन जैसे बड़े बजट के विभाग रहे। इन विभागों में पिछले अप्रैल से क्या हो रहा, और हुआ किसी से छिपा नहीं। शायद इसीलिए मंत्री पर विपक्ष की नामजद नारेबाजी पर भी भाजपा विधायक चुप्पी साधे रहे। प्रबोध मिंज, सुशांत शुक्ला, अनुज शर्मा जैसे नए नवेलों के साथ अजय चंद्राकर, धरमलाल कौशिक, राजेश मूणत के तीखे आरोपों से मंत्री कुछ असहज से दिखे। मंत्री न बन पाने के इनके विधायकों के मनोभाव को समझ भूपेश बघेल ने इन्हें मार्गदर्शक मंडल का सदस्य घोषित करते हुए मंत्रियों को संबल अवश्य दिया। विपक्ष की भूमिका साफ्ट आपोजिशन की सी रही। शीत सत्र के अभी दो दिन और हैं। और अब विधेयक पर चर्चा के अलावा प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण सूचनाओं पर चर्चा के लिए पूरा समय रहेगा। और हमले और सुनने देखने को मिलेंगे।
संघ पदाधिकारी के दौरे से हलचल
भाजपा और संघ के बीच समन्वय का देख रहे अरूण कुमार के छत्तीसगढ़ दौरे की काफी चर्चा है। अरूण कुमार की पार्टी संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों के साथ बैठक हुई है। साथ ही उनकी सरकार के मंत्रियों से भी चर्चा हुई है। बताते हैं कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत संभवत: 26 तारीख रायपुर आएंगे। संघ परिवार विशेषकर धर्मांतरण आदि विषयों को लेकर काफी गंभीर है। इन विषयों को लेकर कार्ययोजना बनाई जा रही है। भागवत इन तमाम विषयों पर छत्तीसगढ़ के संघ और भाजपा नेताओं से चर्चा करेंगे । इससे पहले अरूण कुमार, संघ प्रमुख के बैठक से चर्चा के बिन्दुओं को अंतिम रूप देने में लगे हैं।
भ्रष्टाचार और वाट्सएप पर सुझाव
भ्रष्टाचार और उसमें लिप्त अफसरों कर्मचारियों पर की गई कार्रवाई की पूरी जानकारी विधानसभा में क्या आई,लोग अपनी अपनी तरह से विचार रख रहे हैं। गिरफ्तारों की लिस्ट में अखिल भारतीय सेवा संवर्ग के अफसर न होने से आईएएस, आईपीएस आईएफएस की बांछे खिली हुई हैं। हालांकि इनमें कुछ दर्जन जांच का सामना कर रहे हैं, तो भले गिरफ्तारी कम हो लेकिन इस सूची में राज्य संवर्ग के अफसरों की बड़ी हिस्सेदारी है। इसे देखते हुए छत्तीसगढ़ अधिकारी कर्मचारी फेडरेशन के वाट्सएप ग्रुप में व्यक्तिगत और विभागीय भ्रष्टाचार और उससे निपटने के विचार शेयर किए गए। एक ने लिखा जिस विभाग में करप्शन ज्यादा है, उन विभाग के अधिकारी कर्मचारियों के लिए गाईड लाइन जारी होना चाहिए। जिसमें लोगों को अपने काम के लिए पैसे देना ना पड़े। दूसरे ने कहा अधिकारी कर्मचारी लोगों का काम समय सीमा में पूर्ण करके दे। यह अनिवार्य हो, नहीं तो उनके खिलाफ शासन को कार्यवाही करना चाहिए। अब भला इन्हें कौन बताए समय सीमा में काम के लिए सिटीजन चार्टर दशक डेढ़ दशक से लागू है। उसका ही पालन कर लें तो दिक्कत न हो। और फिर अब तो ई आफिस की भी आनलाइन व्यवस्था है। साहब लोग, टेबल में रूकी फाइल मंगा कर क्लियर कर दे तो? रोकने के पीछे का मकसद ही खत्म हो जाएगा। और भ्रष्टाचार ही न हो। लेकिन अब तो फोन पे, यूपीआई, गूगल पे के इस्तेमाल पर ही फाइल आगे बढ़े तो क्या किया जा सकता है।'
विदाई भोज तो नहीं है?
प्रदेश भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन दो दिन पहले पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित किया, तो हास-परिहास के बीच कुछ ने पूछ लिया कि यह विदाई भोज तो नहीं है?
दरअसल, बिहार सरकार के मंत्री नबीन को लेकर यह चर्चा है कि वो अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव की वजह से छत्तीसगढ़ के संगठन के दायित्व से मुक्त हो सकते हैं। मगर नबीन ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि वो बरसों से संगठन का काम संभालते रहे हैं। कई मौके ऐसे भी आए हैं जब चुनाव, और संगठन का दायित्व साथ-साथ निभाते रहे हैं।
संकेत साफ है कि नबीन पद पर बने रहेंगे।
चुनाव क्यों रूका?
सरकार ने पंचायत चुनाव के लिए पदों के आरक्षण की प्रक्रिया अचानक स्थगित कर दी है। आरक्षण कब होगा, इसके लिए तिथि अभी तय नहीं है। पहले नगरीय निकाय के साथ ही पंचायत के चुनाव कराने की तैयारी चल रही थी। अब आरक्षण की कार्रवाई रोके जाने के बाद साथ-साथ चुनाव होने की संभावना नहीं है।
बताते हैं कि पंचायत चुनाव अब मार्च में हो सकते हैं। चुनाव टलने के पीछे जो वजह सामने आई है उसका प्रमुख कारण नियम नहीं बन पाना है। सरकार ने पंचायत चुनाव के नियमों में संशोधन के लिए अध्यादेश तो लाए हैं, लेकिन कुछ खामियां रह गई है। इससे परे पार्टी के रणनीतिकार अभी चुनाव कराने के पक्ष में नहीं है।
पार्टी के लोगों का सोचना है कि अभी प्रदेशभर में धान खरीदी चल रही है, और यह पूरे जनवरी भर चलेगी। इसी बीच में चुनाव कराने से कोई फायदा नहीं होगा। अलबत्ता, धान खरीदी में अव्यवस्था के चलते उल्टे नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं होता है। मगर पार्टी समर्थित प्रत्याशी उतारती है। इसलिए चुनाव काफी प्रतिष्ठापूर्ण रहता है। वैसे भी पंचायतों का कार्यकाल फरवरी तक है। ऐसे में जल्द चुनाव कराने का कोई फायदा नहीं दिख रहा था। यही वजह है कि चुनाव की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी गई है।
राईस मिल और अमित जोगी
आखिरकार सरकार के दबाव की वजह से राइस मिलर्स को झुकना पड़ा, और हड़ताल स्थगित करनी पड़ी। हालांकि एक गुट अभी भी हड़ताल पर है। जिसके नेता रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के भाई योगेश अग्रवाल हैं। योगेश ने अपनी सरकार पर आरोप लगाए हैं, और साफ कह दिया कि हड़ताल जारी रहेगी। मगर बाद में उन्होंने भी हड़ताल खत्म करने पर सहमति दे दी। खास बात यह है कि मिलर्स को कांग्रेस और अन्य दलों से कोई सपोर्ट नहीं मिल पा रहा था।
जनता कांग्रेस के मुखिया अमित जोगी ने तो फेसबुक पर अपने पोस्ट में राइस मिलर्स के रवैये की आलोचना की है। उन्होंने लिखा कि मुझसे अनेक राइस मिलर्स एसोसिएशन के लोगों ने मुलाकात की, और सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने का अनुरोध किया है।
अमित जोगी ने आगे लिखा कि आज अगर राइस मिलर जिंदा हैं, तो केवल और केवल मेरे पिता स्व. अजीत जोगी जी की बदौलत, जिन्होंने अपने दम पर भारत के इतिहास में पहली बार धान खरीदी शुरू की। और बरसों से बंद पड़ी राइस मिलों को नया जीवनदान दिया। किन्तु राइस मिलरों ने वर्ष-2003-04, 2008-09, 2013-14 में उनके उपकार को भुलाकर भाजपा को वोट किया।
ऐसे में कृतघ्न राइस मिलरों को भाजपा सरकार द्वारा दिए गए प्रस्ताव का समर्थन करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। कांग्रेस को भी इनसे दूरी बनानी पड़ेगी, तभी उनको विपक्ष के विकल्प का एहसास होगा।
परसेप्शन बदलें
सोमवार को विधानसभा में दी गई सरकारी जानकारी के मुताबिक एक ट्रेंड देखने में आया है। इससे अभा सेवा के अफसर खासकर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस ने आक्रोश मिश्रित संतुष्टि जताया है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार को लेकर दलीय नेता और जनसामान्य नाहक हमें बदनाम करते फिरते हैं। जबकि इसका बोलबाला राज्य कैडर में अधिक है। यह वह दौर था जब कांग्रेस सरकार में खुलेआम भ्रष्टाचार के मामले ईडी, सीबीआई से लेकर ईओडब्ल्यू-एसीबी मामले दर्ज करते रहे हैं। इनमें चाहे रंगे हाथों पकड़ाने के मामले हो या फिर पद का दुरुपयोग कर अनुपातहीन अर्जित करने के। भ्रष्टाचार को इन दोनों ही पैमाने में इनकी हिस्सेदारी अधिक है। इतना ही नहीं कम ही सही जेल भी गए हैं। इन साहब ने कहा परसेप्शन, सोच बदलें।
सदन में दी गई लिखित जानकारी में बताया गया कि बीते पांच वर्ष में रिश्वतखोरी के 87 दर्ज मामलों में दो अधिकारियों के ही सजा हुई। इस दौरान एक भी आईएएस,आईपीएस अफसर रिश्वत लेते रंगे हाथ नहीं पकड़ाया। वर्ष 2019 से 25 नवंबर 24 तक किसी भी अभा सेवा संवर्ग के किसी भी अफसर को रिश्वत लेते नहीं पकड़ा गया। वहीं राप्रसे के 2 और अन्य राज्य सेवाओं के 124 अधिकारियों को पकड़ा गया। इनमें से 87 प्रकरणों में चालान पेश किया गया है। इनमें से दो को सजा हुई। सीएम ने यह भी बताया कि इस दौरान अनुपातहीन संपत्ति के 35 और पद दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार करने के 42 मामले दर्ज किए गए हैं।
बेमौसम का टकराव
प्रदेश में राइस मिलर्स की हड़ताल की वजह से धान खरीदी प्रभावित हो रही है। कई जिलों की समितियों में तो धान का उठाव नहीं होने के कारण खरीदी बंद हो गई है। मिलर्स की हड़ताल तुड़वाने की कोशिश भी हुई। रविवार को मिलर्स पदाधिकारियों के मिलों में छापे भी डाले गए। कई मिलों को सील भी कर दिया गया। प्रशासनिक दबाव का नतीजा यह रहा कि कई जगहों पर मिलर्स ने धान का उठाव शुरू कर दिया है।
मिलर्स की हड़ताल तुड़वाने के लिए डिप्टी सीएम अरुण साव, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, और खाद्य मंत्री दयालदास बघेल प्रयासरत थे। वो लगातार पदाधिकारियों से चर्चा कर रहे थे। यही नहीं, संगठन ने प्रदेश महामंत्री सौरभ सिंह को भी मिलर्स से बातचीत की जिम्मेदारी दी थी। मगर मिलर्स अपनी मांग पर अड़े रहे, तो दोपहर बाद सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी। मिलर्स एसोसिएशन के दो प्रमुख पदाधिकारी प्रमोद जैन और गप्पू मेमन की राइस मिल को सील कर दिया। यही नहीं, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के भतीजे टीनू के राइस मिल में भी खाद्य अफसरों ने भी जांच-पड़ताल की।
प्रशासनिक कार्रवाई का नतीजा यह रहा कि आधे राइस मिलर्स ने काम शुरू करने का मन बना लिया है। उन्होंने जिलों के अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी है। कई लोग इस गतिरोध के लिए एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। योगेश, बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। उन्होंने सीएम और मंत्रियों से चर्चा का ब्यौरा देते हुए सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा दिया था। कुछ टिप्पणियां ऐसी थी कि सरकार के लोग उबल पड़े।
सरकार ने कार्रवाई के साथ-साथ बातचीत का भी रास्ता अपनाया। सभी प्रमुख जिलों में प्रभारी मंत्रियों को मिलर्स से सीधे बातचीत करने के लिए कहा गया था। एक-दो दिनों में सारी स्थिति सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर, तो नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में नुकसान होने की आशंका जता रहे हैं। उन्होंने मिलर्स के समर्थन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र भी लिखा है। चाहे कुछ भी हो, जिलों में धान खरीदी की व्यवस्था गड़बड़ा गई है। इससे सरकार की किरकिरी हो रही है।
किसी दिन सूरज न कह दे...
गांव कस्बों को रोशन करने वाले एक अधिकरण की वित्तीय हालात की चर्चा वीआईपी रोड से अटल नगर विधान नगर के गलियारे तक होने लगी है। केंद्र प्रवर्तित योजनाओं के अनुदान से चलने वाले अधिकरण का बैंक बैलेंस कभी 300 करोड़ से अधिक के एफडी का रहा है। और अब हालात यह हैं कि पांच सौ अधिकारी कर्मचारियों को वेतन देने 50 करोड़ रुपए नहीं है। नतीजतन नवंबर की तनख्वाह 13 दिसंबर को क्रेडिट हुई है। ऐसे बैंक बैलेंस वाला यह प्रदेश का पहला उपक्रम हो। ऐसा इस अधिकरण के 23 वर्ष पहले गठन के शुरूआती दिनों में भी कभी नहीं हुआ। उन दिनों बजट की भी कमी रहा करती थी। और अब भरपूर बजट और भरपूर सबसिडी को साथ वेंडर्स से भरपूर कमीशन देने वाले इस अधिकरण की हालत को विधानसभा चुनाव के पहले से ही ग्रहण सा लग गया है।
अफसर चुटकी लेने लगे हैं कि - किसी दिन ऐसा न हो सूर्य भी बोले अधिकरण को अपनी उर्जा नहीं दूंगा। वे यह भी कहने लगे हैं कि अधिकरण कहीं मप्र ऊर्जा विकास निगम की तरह बंद न हो जाए। वैसे भी यहां के अधिकारी कर्मचारी अधिकरण के विद्युत कंपनी में संविलयन की मांग करते रहें हैं।
मनोनयन का इंतजार

भाजपा संगठन के एक अलिखित फार्मूले से पार्टी के भीतर हलचल मची हुई है। यह कहा जा रहा है कि जिन नेताओं को सरकार के दो कार्यकाल में निगम-मंडलों में जगह मिली थी, उन्हें पद नहीं दिया जाएगा। उनकी जगह नई नियुक्ति की जाएगी। खास बात यह है कि निगम-मंडल के कई पूर्व पदाधिकारी विधानसभा, और लोकसभा टिकट के दावेदार रहे हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाया।
ये सभी नेता सरकार बनने पर निगम-मंडल में जगह पाने की उम्मीद से हैं, लेकिन नए फार्मूले की चर्चा से उनमें बेचैनी है। ये अलग बात है कि पार्टी ने निकाय चुनाव तक सारी नियुक्तियों को टाल दिया है। यह भी तय किया है कि कैबिनेट का विस्तार भी नए साल में होगा। इससे परे बड़ी संख्या में निगम-मंडल के दावेदार पार्टी दफ्तर में अपना बायोडाटा भेज रहे हैं। अगर वाकई फार्मूले पर अमल हुआ, तो कई नेताओं का गुस्सा खुलकर सामने आ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
डगर कठिन है घरवापिसी की
प्रदेश कांग्रेस प्रभारी सचिन पायलट ने पार्टी से निलंबित, और निष्कासित नेताओं की वापसी के लिए पहल की है। पायलट ने बकायदा एक सात सदस्यीय समिति बनाई है जो इन नेताओं के आवेदनों पर विचार करेगी। मगर ज्यादातर निष्कासितों के वापसी की राह आसान नहीं है।
जो निष्कासित नेता कांग्रेस में वापसी की कोशिश कर रहे हैं उनमें रामानुजगंज के पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह भी हैं। बृहस्पति सिंह ने विधानसभा चुनाव के पहले टीएस सिंहदेव के खिलाफ मोर्चा खोला था। इसके बाद उनकी टिकट कट गई, और जब पार्टी चुनाव में हार गई तो उन्होंने सिंहदेव के साथ-साथ तत्कालीन प्रभारी सैलजा पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी।
वो लोकसभा चुनाव के पहले खेद प्रकट कर पार्टी में आना चाहते थे। मगर सिंहदेव इसके लिए तैयार नहीं हुए। और अब भी सिंहदेव तैयार होंगे, इसकी संभावना कम दिख रही है। यद्यपि सिंहदेव कमेटी में नहीं है लेकिन उनके रूख से कमेटी के सदस्य भलीभांति परिचित हैं।
इसी तरह रायपुर की ही एक सीट से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लडऩे वाले एक नेता भी पार्टी में वापसी की कोशिश कर रहे हैं। रायपुर दक्षिण उपचुनाव में नेताजी ने एक जगह कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में सभा करवाई थी, और पंडाल व खाने का खर्चा भी वहन किया था।
ये अलग बात है कि जिस इलाके में निष्कासित नेता ने मेहनत की थी वहां पार्टी प्रत्याशी को कोई फायदा नहीं हुआ। इससे परे कुछ ऐसे नेता भी हैं जो भूपेश बघेल के खिलाफ बयानबाजी कर भाजपा में चले गए थे। भाजपा में उनकी पूछ परख नहीं हो रही है। ऐसे नेता पार्टी में ससम्मान वापस आना चाहते हैं। कमेटी इस पर क्या फैसला लेगी, इस पर नजरें हैं। देखना है आगे क्या होता है।
सरकार, मिल मालिक, और जांच
प्रदेश में राइस मिलर्स की हड़ताल से धान खरीदी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। मिलर्स की कुछ मांगों को तो सरकार ने मान लिया है, लेकिन एक मांग ऐसी है जिसे पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल है। मिलर्स मिलिंग की वर्ष 2021-22 की बकाया भुगतान देने की मांग कर रहे हैं। जिसके लिए सरकार तैयार नहीं है। वजह यह है कि ईडी कस्टम मिलिंग घोटाले की जांच कर रही है। प्रारंभिक जांच में ईडी ने पिछली सरकार और मिलर्स के गठजोड़ से एक बड़े भ्रष्टाचार की गड़बड़ी का खुलासा भी किया है।
बावजूद इसके मिलर्स अपनी मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। सरकार ने मिलर्स की हड़ताल को तुड़वाने की कोशिश भी की है, और चर्चा है कि इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिली है। शनिवार की रात एक बैठक भी होने वाली थी जिसमें करीब 50 मिलर्स के साथ डिप्टी सीएम अरूण साव व खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल चर्चा करने वाले थे। मगर बैठक ऐन वक्त में स्थगित हो गई। सरकार के लोग मिलर्स नेताओं को किनारे कर सीधे व्यक्तिगत तौर पर मिलरों से चर्चा कर रही है। देखना है सरकार मिलर्स को मनाने में किस हद तक कामयाब हो पाती है।
नाम का स्वागत

ऐसा कहा जा रहा है कि तकनीक लोगों की सुविधा बढ़ाने के लिए ऩ केवल ईजाद की जाती है बल्कि इस्तेमाल भी होती है । लेकिन सरकारी अमला पुराने ढर्रे पर ही चलना चाहे तो कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसा ही कुछ मंत्रालय में इन दिनों हो रहा है । सरकारी कामकाज के लिए साहबों से मिलने के लिए एंट्री पास की मैन्यूअल सुविधा खत्म हो गई है। पेन, पर्ची की जगह स्वागतम एप ने ले ली है। अब मंत्रालय रवाना होने से पहले क्लिक कर आनलाइन पास हासिल किया जा सकता है। लेकिन साहबों की उपलब्धता वैसी ही है जैसे बीते 23 वर्षों के दौरान रहती रही। वे मिलते ही नहीं । और जब आफिस में रहते हैं तो बैठकों में व्यस्त या दौरे पर होते हैं। घंटों इंतजार के बाद मुलाकाती के पास घर वापसी ही विकल्प रह जाता है। एक दिन में बनने वाले सैकड़ों स्वागतम पासधारी कुछेक दर्जन भर की ही साहबों से मुलाकात या काम हो पाता है।
काश इस एप में यह भी बता दिया जाता है कि आप जिन साहब से मिलने जा रहे हैं वो आफिस में हैं या नहीं। न होने की स्थिति में नागरिकों का समय, खर्च दोनों ही बच जाते। स्वागतम की तकनीक में इसकी भी व्यस्था कर दी जाए। और अफसर प्रवास, बैठक में होने की एंट्री कर आम लोगों से मुक्त, बिंदास हो जाएंगे।
चर्चा चुना की ही ?
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा शुक्रवार को यहां आए, तो एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में उन्होंने सीएम विष्णुदेव साय, प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन, और अजय जामवाल व पवन साय के साथ बैठक की, और फिर जाते-जाते कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में प्रमुख नेताओं के साथ मंत्रणा की।
बैठक का निचोड़ यह रहा कि नड्डा ने संगठन चुनाव पर ही बात की है। प्रदेश में संगठन के चुनाव चल रहे हैं। इसके बीच में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव की भी घोषणा होने वाली है। संगठन चुनाव की वजह से निकाय और पंचायत चुनाव में किसी तरह का असर न पड़े, यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा है।
दरअसल, मंडल से लेकर जिला अध्यक्षों के चुनाव को लेकर खींचतान चल रही है। चुनाव अधिकारी को किसी एक नाम पर सहमति बनाने में दिक्कत आ रही है। पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर किसी तरह का असंतोष न फैले, इसकी कोशिश हो रही है। जिलाध्यक्षों के चुनाव इस महीने के आखिरी तक होने के संकेत हैं। देखना है कि पार्टी अंदरूनी गुटबाजी पर किस हद तक लगाम लगाती है।
पहेली का हल क्या है?
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा 6 साल छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। वो यहां के छोटे-बड़े नेताओं से परिचित हैं। और जब वो यहां आए, तो कई छोटे-बड़े नेताओं ने उनसे मेल-मुलाकात की। एक नेता ने मौका पाकर उनसे कह दिया कि भाई साब, हमारा भी ध्यान रखिएगा।
नड्डा ने उन्हें आश्वस्त किया कि जो भी आएंगे, वो आप लोगों के ही हैं। यह कहकर नड्डा आगे बढ़ गए। लेकिन नेताजी, नड्डा के कथन को नहीं समझ पा रहे हैं। दरअसल, राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी चुनाव होना है, और नड्डा की जगह नए अध्यक्ष की नियुक्ति होगी। ऐसी चर्चा है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान उनके उत्तराधिकारी हो सकते हैं।
कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि नड्डा का इशारा धर्मेन्द्र प्रधान की तरफ था। मगर कई लोग नितिन नबीन की जगह होने वाली नियुक्ति से जोडक़र देख रहे हैं। सुनते हैं कि प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन पद मुक्त हो सकते हैं। वजह यह है कि अगले साल बिहार में विधानसभा के चुनाव हैं।
नितिन नबीन बिहार सरकार में मंत्री हैं। वो खुद भी चुनाव लड़ेंगे, ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा है कि नबीन की जगह में नई नियुक्ति हो सकती है, जो कि छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं के करीबी हो सकते हैं। कुल मिलाकर नड्डा की टिप्पणी एक पहेली बन गई है जिसे बूझने में पार्टी नेताओं को मशक्कत करनी पड़ रही है।
पदोन्नति के लिए लाभ के तरीके
राज्य सरकार की पदोन्नति व्यवस्था और प्रक्रिया पर दो दिन पहले हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला सुनाया था कि कोई कर्मचारी, जिस पद पर नियुक्त हुआ है उसी पद पर रिटायर हो यह अनुचित है। और दूसरी ओर अफसरों के लिए शासन प्रशासन सभी नियमों को शिथिल कर देता है।
आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अफसरों के लिए तो राज्य में काम न करें तो भी प्रोफार्मा प्रमोशन की सुविधा है। और राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के लिए तो पद सुरक्षित रख, निचले क्रम के अफसरों को पदोन्नति दी जाती रही है । यह ऐसे लोगों के लिए भी होती है जिनका सीआर दागी या कोर्ट में मामला लंबित हो। वहीं पदों को रोकने की भी परंपराएं अपनाई गईं हैं। वैसे यह पदोन्नति नियम में भी है, कि अजजा के अभ्यर्थी उपलब्ध न हों तो, उनकी उपलब्धता तक पद रिक्त रखे जाएं। बस ऐसा ही कुछ मंत्रालय संवर्ग के दो पदों के लिए भी किया जा सकता है।
कैबिनेट ने हाल में अपर सचिव के दो पद स्वीकृत किए हैं। इनमें दो संयुक्त सचिव पदोन्नत होने हैं। एक पद 8 साल से रिक्त है तो दूसरा पद इसी माह स्वीकृत किया गया है। लेकिन इनकी उपलब्धता में कुछ समय शेष है। सो अब मांग की जा रही है कि इनके उपलब्ध होने तक अपर सचिव के दोनों पदों को परिवर्तित कर संयुक्त सचिव किए जाएं ताकि बिना व्यय भार के दो संयुक्त सचिव मिल सके।
देखा परखा खरा
रायपुर के नए एसपी लाल उम्मेद सिंह ने काम संभाल लिया है। आईपीएस के 2011 बैच के अफसर लाल उम्मेद सिंह राज्य पुलिस सेवा से आए हैं। वो दो बार रायपुर के एडिशनल एसपी रह चुके हैं। लाल उम्मेद सिंह की रमन सरकार के विश्वास पात्र अफसरों में गिने जाते रहे हैं। कांग्रेस सरकार में भी उनकी हैसियत कम नहीं हुई। कवर्धा जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिले में बेहतर काम किए थे। लाल उम्मेद सिंह रायपुर में अपनी नई भूमिका में कैसा काम करते हैं यह देखना है।
सार्वजनिक जगहें, और राजनीतिक फैसले
राजधानी रायपुर में सत्तारूढ़ नेता और अफसर बड़े-बड़े फैसले लेते हैं, और मनमर्जी की वजह से अगली सरकार में वे किनारे धर दिए जाते हैं। रमन सिंह सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत ने अपनी निजी प्रतिष्ठा की तरह जो स्काईवॉक बनवाया था, उसे भूपेश सरकार पांच बरस तक न तोड़ पाई, न उसका कोई और इस्तेमाल हुआ, और उसे पूरा तो करना ही नहीं था। अब भाजपा की सरकार आई है, तो उसे पूरा करने का काम शुरू होने को है।
इसी तरह साइंस कॉलेज के मैदान पर भूपेश सरकार के समय मैदान के एक हिस्से पर बिना किसी जरूरत एक बड़ी चौपाटी बना दी गई, और सडक़ की चौड़ाई से लेकर मैदान की चौड़ाई तक सबको खराब किया गया। इस अखबार ने उस समय भी भूपेश बघेल, और उनके मार्गदर्शक, विवेक ढांड को याद दिलाया था कि दोनों इसी साइंस कॉलेज में पढ़े हैं जिसके मैदान को काटकर चौपाटी बनाई जा रही है, और इन्हें इसे रोकना चाहिए। लेकिन जब सरकार सांड पर सवार रहती है, तो उसे दाएं-बाएं कम दिखता है, सही-गलत का फर्क भी नहीं रह जाता।
अब भाजपा सरकार साइंस कॉलेज में बनी हुई चौपाटी को हटाकर कुछ दूरी के एक ओवरब्रिज के नीचे ले जाने की तैयारी कर रही है, और वहां धंधा करने वाले लोग फिक्रमंद हैं कि वहां ग्राहक कहां से आएंगे। फैसले राजनीतिक न होकर तकनीकि विशेषज्ञों और योजनाशास्त्रियों के लिए हुए रहते, तो वे राजनीतिक फेरबदल को झेल भी पाते। एक शहर में इस तरह सैकड़ों करोड़ की बर्बादी महज आर्थिक बर्बादी नहीं है, वह सार्वजनिक जगहों का गैर जिम्मेदार इस्तेमाल भी है।
अफसरों को तेवर दिखाना भारी
सरकार के एक निगम में पेस्टीसाइड्स की सप्लाई को लेकर काफी कुछ चर्चा हो रही है। हुआ यूं कि निगम के लोगों ने हमेशा की तरह तीन-चार फर्मों को ऑर्डर दे दिया। इन फर्मों के लिए सिफारिश आई थी, इसलिए नियम कायदों को भी अनदेखा कर दिया।
फर्मों ने पेस्टीसाइड्स की सप्लाई कर भुगतान के लिए बिल भी लगा दिया। और जब भुगतान में देरी हुई, तो सप्लायरों ने सिफारिश करने वाले का जिक्र कर जल्द से जल्द भुगतान करने पर जोर दिया। फिर क्या था अफसरों ने भुगतान से पहले गुणवत्ता परीक्षण के निर्देश दे दिए।
सुनते हैं कि गुणवत्ता परीक्षण में करीब 100 से अधिक सेम्पल अमानक पाए गए। कुछ किसानों ने भी शिकायत की है। अब सप्लायरों को भुगतान तो दूर, उन पर एफआईआर पर विचार चल रहा है।
सप्लायर हाथ-पांव मार रहे हैं। मगर अब तक मामला सुलझा नहीं है। भुगतान के लिए अफसरों को तेवर दिखाना भारी पड़ गया है। जिन्होंने सिफारिश की थी, वो भी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। कुल मिलाकर आने वाले दिनों में यह मामला बढ़ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
‘महादेव’ और शिव पुराण

महादेव ऑनलाइन सट्टा ऐप के दो डायरेक्टर सौरभ चंद्राकर, और रवि उप्पल दुबई में दो दिन पहले कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा का प्रवचन सुनते नजर आए। पंडित मिश्रा की कथा फेसबुक से लेकर आस्था चैनल पर देखी जा सकती है। दुबई में चल रही कथा का सीधा प्रसारण हो रहा था, तब कई लोगों की नजर सौरभ और रवि उप्पल पर पड़ी। कुछ दिन पहले तक पुलिस अफसर सट्टेबाज सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी का दावा कर रहे थे। वो भी सौरभ, और रवि उप्पल को देखकर हक्का-बक्का रह गए। दुबई में प्रदीप मिश्रा का कार्यक्रम ली-मेरिडियन होटल एंड कॉन्फ्रेंस सेंटर गरहौद में हुआ था। चर्चा है कि इस कथा का आयोजन सौरभ चंद्राकर, और उनके परिवार ने किया था।
बताते हैं कि दोनों कुख्यात सट्टेबाज सौरभ, और रवि उप्पल को लाने में कुछ दिन पहले तक छत्तीसगढ़ पुलिस की दिलचस्पी दिख रही थी। दुर्ग पुलिस की एक टीम दिल्ली भी गई थी, और केन्द्रीय गृह मंत्रालय में सौरभ चंद्राकर व रवि उप्पल का डोजियर जमा कर आई थी। ताकि दोनों का जल्द से जल्द प्रत्यर्पण हो सके। मगर अब जब उनके खुले तौर पर सार्वजनिक कार्यक्रम में शरीक होने की बात सामने आई है, तो कई नए खुलासे भी हो रहे हैं। अब यह कहा जा रहा है सौरभ को कभी गिरफ्तार ही नहीं किया गया था। रवि उप्पल जरूर एक हफ्ते दुबई पुलिस की कस्टडी में रहा, लेकिन उसे भी बाद में छोड़ दिया गया। कुछ जानकार बताते हैं कि उनका प्रत्यर्पण आसान नहीं है। दुबई में वो एक कारोबारी के रूप में जाने जाते हैं। कारोबार भी वहां के नियमों के मुताबिक कर रहे हैं।
चर्चा तो यह भी है कि सट्टेबाजों को लाने में किसी की भी कोई दिलचस्पी नहीं है। भूपेश बघेल सरकार में महादेव सट्टा खूब फला फूला, और बढ़ा था। इसके हितग्राहियों में नेता, अफसर, और कारोबारी भी हैं। जिसकी पकड़ सभी दलों में हैं। इसकी वजह से भी दोनों सट्टेबाजों पर कार्रवाई में हील हवाला बरता जा रहा है। ये बात अलग है कि इससे बड़े कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जरूर घिर सकते हैं। पंडित मिश्रा का रायपुर के सेजबहार में 25 तारीख से शिव महापुराण कथा वाचक करने वाले हैं। वो भले ही दोनों को न जानते हों, लेकिन उनके यहां कथा करने पर जवाब देना पड़ सकता है।
एक सवाल का जवाब न आ पाया

सरकार के एक साल पूरा होने के मौके पर सीएम विष्णुदेव साय अपने मंत्रियों के साथ मीडिया से रूबरू हुए। प्रेस कॉन्फ्रेंस काफी तामझाम से हुई। साय ने सरकार की उपलब्धियों को गिनाया भी, और मीडिया के सवालों के जवाब भी दिए।
तीन-चार सवाल ही हो पाए थे कि डिप्टी सीएम अरुण साव, और विजय शर्मा ने पत्रकारों से आग्रह किया कि सीएम साब को दौरे पर जाना है इसलिए बाकी सवाल बाद में भी कर सकते हैं। फिर भी एक सवाल जोरों से पूछा गया कि क्या इस माह मंत्रिमंडल के खाली पद भरे जाएंगे? तब तक सीएम साब उठ गए थे। अब जवाब नहीं आया, तो चर्चाओं का दौर जारी रहेगा। जब तक इसका स्पष्ट उत्तर नहीं आ जाता।
संगठन चुनाव और वजनदार लोग
भाजपा में संगठन चुनाव चल रहे हैं। मंडल अध्यक्षों के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश चल रही है। बावजूद इसके कई जगहों पर अपनी पसंद का अध्यक्ष बनाने के दिग्गजों में खींचतान चल रही है। इन्हीं में एक रायपुर के हाई प्रोफाइल शंकर नगर मंडल के अध्यक्ष के चुनाव में आम सहमति बनाने में चुनाव अधिकारी के पसीने छूट रहे हैं।
शंकर नगर मंडल में चार वार्ड आते हैं। यहां कई दिग्गज नेताओं के रहवास हैं, जो संगठन-सरकार में प्रभावशाली हैं। इनमें संजय श्रीवास्तव, छगनलाल मूंदड़ा, श्रीचंद सुंदरानी के अलावा स्थानीय विधायक पुरंदर मिश्रा भी हैं जिनकी अपनी पसंद है। इन सबके बीच समन्वय स्थापित कर किसी एक नाम पर सहमति बनाना आसान नहीं है। पार्टी नेतृत्व ने चुनाव अधिकारियों को मंडलों की बैठक में अध्यक्ष के नाम की घोषणा करने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर जिस तरह असहमति के सुर देखने को मिल रहा है, उससे अंतिम चयन जोखिम भरे हो सकते हैं।
पोस्टकार्ड की कीमत यहां 10.50 रूपए
फोन पर सोशल मीडिया के दर्जन भर प्लेटफॉर्म की उपलब्धता के बीच चि_ी लिखने की फुर्सत किसे है। इसके बाद भी डाक विभाग चिट्टी लिखने का आग्रह करता है। और लाखों रूपए खर्च कर पत्र लेखन स्पर्धा के इवेंट करवाता है। हालांकि इसमें केवल स्कूली बच्चों की हिस्सेदारी रहती है। यह भी महज सालाना औपचारिक आयोजन होकर रह गए हैं। विभाग यदि एआई के इस दौर में भी पोस्ट कार्ड, इनलैंड लेटर की वापसी चाहता है तो उसे इसकी सस्ती और आसान उपलब्धता सुनिश्चित करानी होगी। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि रायपुर मुख्य डाकघर से एक पोस्ट कार्ड करीब 11 रूपया पड़ता है। इसकी विभाग की कीमत 50 पैसा है और इसकी छपाई में विभाग 37 पैसे खर्च करता है।
लेकिन चि_ी लिखने के शौकीन को पहले इसे खरीदने 10 रूपया मुख्य डाकघर में अपनी बाइक के लिए 10 रूपया पार्किंग देना होगा । इनलैंड लेटर के लिए यह कीमत 12.50 रुपए और लिफाफे के लिए 15 रुपए पड़ जाती है। जो मोबाइल डेटा से भी महंगा पड़ता है। दो दिन पहले ही केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मे एक कार्यक्रम में बताया था कि देश में इस समय एक जीबी डेटा 8.21 रुपए में उपलब्ध है। वैसे डाक कर्मी ही बताते हैं कि केवल एक्नॉलेजमेंट की जरूरत वाले ही अब कार्ड खरीदने आते हैं। चि_ी लिखने के लिए इनलैंड लेटर खरीदने वाले नहीं के बराबर हैं। डाकघर में पोस्ट कार्ड बिके हफ्तों बीत जाते हैं।
यह साइकिल स्टैंड भी कई वर्षों से बिना किसी ठेके, टेंडर के अवैध रूप से चल रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि अंतिम बार हुए टेंडर का ठेकेदार ही चला रहा है। विभाग में रिनिवल के सिस्टम को ही खत्म कर दिया है। महज पीआरआई इंस्पेक्टर की एनओसी पर ही कथित ठेका चल रहा है।
60 से ही मार्गदर्शक मण्डल में !!
भाजपा में संगठन चुनाव चल रहे हैं। यह पहला मौका है जब संगठन में अलग-अलग पदों के लिए आयु सीमा निर्धारित कर दी गई है। मंडल अध्यक्ष के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष है, तो 60 से कम आयु वाले ही जिलाध्यक्ष बन सकते हैं। आयु सीमा में किसी तरह की छूट नहीं दी जा रही है, और पदाधिकारी की नियुक्ति से पहले आयु को लेकर प्रमाण पत्र भी दिखाना होगा।
यह भी तय किया गया है कि किसी भी मंडल अध्यक्ष को रिपीट नहीं किया जाएगा। सभी मंडल से तीन-तीन नाम का पैनल बनाए जा रहे हैं, और जिले की कोर कमेटी एक नाम पर मुहर लगाएगी। सारी प्रक्रिया 20 तारीख तक पूरी कर ली जाएगी। खास बात यह है कि पार्टी ने महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के लिए पहल की है। मगर दिक्कत यह है कि मंडल अध्यक्ष के लिए सक्रिय नेत्रियों की कमी नजर आ रही है। शहर के हरेक मंडल में 4 से 5 वार्ड आते हैं। ऐसे में अध्यक्ष का पद काफी अहम है। इस बार के चुनाव की खास बात यह है कि पार्टी में 60 पार हो चुके नेताओं की पूछपरख कम हो रही है, और एक तरह से वो हाशिए पर धकेल दिए जा रहे हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे नेताओं ने बेचैनी दिख रही है।
कांग्रेस में फेरबदल की फुरसत नहीं
नगरीय निकाय-पंचायत चुनाव के बीच प्रदेश कांग्रेस की कार्यकारिणी के पुनर्गठन को लेकर हलचल है। कई पदाधिकारियों ने विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी छोड़ दी थी। ऐसे उपाध्यक्ष, और महासचिव के रिक्त पदों पर नियुक्ति जल्द हो सकती है।
चुनाव की घोषणा जल्द होने वाली है। इसके लिए अलग-अलग समितियों का गठन होना है। चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट से चर्चा कर एक सूची तैयार की है। वो गुरुवार को दिल्ली में पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ बैठक कर अपनी बात रखेंगे। वो सूची को जल्द से जल्द मंजूरी देने का आग्रह करेंगे। बैज के दिल्ली प्रवास पर पार्टी नेताओं की निगाह लगी हुई है। देखना है चुनाव को लेकर पार्टी क्या कुछ करती है।
रकम ले गए चोर, भरें कर्मचारी
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हाल के वर्षों में कई हितग्राही मूलक योजनाओं के पेमेंट के लिए डाकघरों में एक मुश्त कम से कम एक लाख रुपए तो रहते ही हैं। और डाकघरों में सेंधमारी की घटनाएं बढ़ी हैं। पहले सरगुजा बलरामपुर की ओर हुई और अब महासमुन्द धमतरी में। जहां सेंधमारों को लाखों हाथ लगे। धमतरी में सर्वाधिक 6 लाख एक ही बार में मिले। यह डाकघर थाने के पीछे ही है। और डाकघर में सीसीटीवी कैमरे हैं ये अलग बात है कि ये महीनों से खराब बंद हैं। इन्हें सुधारने पोस्ट मास्टर कई बार अफसरों से गुहार लगा चुका था। वो तो नहीं हुआ लेकिन अब अफसर, लकीर पीट रहे हैं। पुलिस तफ्तीश करे तो भी कैसे। डाकघर समेत रास्ते के अन्य कैमरे भी खराब है। उसे बस मुखबिरों का सहारा है।
मगर डाक अमला चोर के पकड़े जाने और रकम रिकवरी कि वेट नहीं करता। इसे शासकीय धन मानकर तत्काल अकाउंट में क्रेडिट चाहता है। इसके लिए पोस्ट मास्टर और कैश क्लर्क पर पूरी रकम जमा करने दबाव बनाया जा रहा। इनका कहना है कि उस दिन काम खत्म होने पर हमने पूरी सुरक्षा तालाबंदी की थी। हम कहां दोषी। लेकिन मुख्यालय के अफसरों को किंतु परंतु से मतलब नहीं। पहले वे सुरक्षा खामियों को पूरा करने में अनदेखी करते हैं और फिर वारदात कम बाद छोटे कर्मचारी पर ठीकरा फोडऩा ही तो अफसरों का काम है। डाकघरों की सुरक्षा को लेकर यह अनदेखी दूर के डाकघर ही नहीं राजधानी के मुख्य डाकघर में भी है। कैमरे चालू या नहीं यह हमने टेस्ट नहीं किया। लेकिन देर रात तक परिसर में कई असामाजिक तत्वों की आवाजाही बनी रहती है। सभी का सायकल स्टैंड में जमावड़ा रहता है। और सभी यहां के एंट्री, एग्जिट के साथ पूरी टोपोग्राफी जानते हैं। यहां भी सचेत होने की जरूरत है,वर्ना अनहोनी कभी भी घट सकती है।
रामलाल के आने से हलचल
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल दो दिन रायपुर में थे। रामलाल करीब 13 साल भाजपा संगठन की धुरी रहे हैं। लिहाजा, उनके आगमन पर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर से लेकर संघ मुख्यालय जागृति मंडल तक हलचल रही। इस दौरान कई प्रमुख नेताओं से उनकी बैठक हुई।
रामलाल वर्तमान में आरएसएस के संपर्क प्रमुख का काम देख रहे हैं। वो कृषि मंत्री रामविचार नेताम से भी मिले। नेताम पिछले दिनों सडक़ दुर्घटना में घायल हो गए थे। उन्होंने नेताम का हालचाल जाना। उनकी क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल, और महामंत्री (संगठन) पवन साय के साथ लंबी बैठक हुई। कहा जा रहा है कि संघ परिवार धर्मांतरण के मामलों को लेकर काफी चिंतित है। इस पर अंकुश लगाने के लिए सामाजिक, राजनीतिक, और प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाने के लिए योजना बनाई गई है। रामलाल के दौरे को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
रामलाल से मिलने वालों में सतनामी समाज के गुरु पूर्व मंत्री विजय गुरु भी थे। मंगलवार को सुबह दिल्ली रवाना हुए तो उनकी मध्य प्रदेश के खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के साथ एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज पर काफी देर चर्चा हुई। इस दौरान संघ के कई पदाधिकारी मौजूद थे।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस नेताओं का क्या?
कर्नाटक के बेलगाम में कांग्रेस के सीडब्ल्यूसी की बैठक हुई। बैठक से परे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और अन्य नेताओं ने महाराष्ट्र, और हरियाणा से परे छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में हार और लोकसभा चुनाव में खराब परफार्मेंस की पड़ताल के लिए बनी वीरप्पा मोइली कमेटी की रिपोर्ट पर भी चर्चा की। चर्चा के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी में बड़े बदलाव के संकेत भी मिले हैं। बदलाव अभी होगा या फिर निकाय-पंचायत चुनाव के बाद, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने जिला और ब्लॉक अध्यक्षों को बदलने के लिए अनुमति मांगी थी जो कि नहीं मिल पाई है। संकेत यह भी है कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत व पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू को कोई अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।
कहा जा रहा है कि भूपेश को राष्ट्रीय महासचिव बनाया जा सकता है। इससे परे पार्टी ईवीएम के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की शुरुआत करने जा रही है। छत्तीसगढ़ में भी नगरीय निकाय के चुनाव हैं। नगरीय निकाय चुनाव ईवीएम से होंगे। जबकि कांग्रेस सरकार में बैलेट पेपर से चुनाव कराए गए थे। ईवीएम के खिलाफ आंदोलन के बीच पार्टी निकाय चुनाव को लेकर क्या कुछ फैसला करती है इस पर भी निगाहें टिकी हुई है।
नए प्रिंसिपल, नई साज-सज्जा

प्रदेश के सरकारी कॉलेजों की गुणवत्ता जांचने के लिए नैक की टीम रायपुर पहुंच गई है। नैक के मापदंडों में खरा उतरने के लिए सरकारी कॉलेजों के लोग जुट गए हैं। रायपुर में कई कॉलेजों नए प्राचार्य आ गए हैं। ये सभी अपनी कार्य क्षमता दिखाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। ऐसे ही रायपुर के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक छत्तीसगढ़ कॉलेज को खूब सजाया गया है। यहां कुछ दिन पहले डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता की प्राचार्य के पद पर पोस्टिंग हुई है। डॉ. गुप्ता ने अपने स्तर पर कॉलेज में किसी तरह कोई कमी न दिखे, इसके लिए कोशिश की है। अब नैक की टीम पर निगाहें हैं कि वो क्या कुछ खामियां निकालती है।
फोन-पे, पेटीएम वाले खेते गए
मंत्रालय कैडर में पिछले दिनों उप सचिव से लेकर कनिष्ठ सचिवालय सहायक यानी लिपिक ग्रेड 3 तक 150 से अधिक पदोन्नतियां हुईं। और फिर पखवाड़े भर बाद सबकी नई पोस्टिंग। इन 15 दिनों के दौरान इनकी पोस्टिंग को लेकर विभाग के आईएएस सचिव ने खूब मंथन किया। सबका गुणा भाग पता किया। यानी कौन कितने वर्ष से एक ही विभाग में जमा हुआ है। उसका आदत आचरण संनिष्ठा कैसी है। इस जांच में सचिव महोदय को बाबू से लेकर अवर सचिव की कई रोचक फीडबैक मिला।
कुछ तो राज्य बनने के 24 वर्षों में से 21 वर्ष से एक ही विभाग में पदस्थ रहे। जबकि इतने वर्षों में पांच सरकारें बदलीं। इस दौरान मिले 2-3 पदोन्नति के बाद भी टस से मस नहीं हुए थे। 10 वर्ष वाले तो ढेरों मिले। इसी तरह से वेतन के अलावा फाइल मूवमेंट पर नजर रख फोन-पे, यूपीआई, गूगल-पे, पेटीएम का इस्तेमाल करने वाले भी बड़ी संख्या में मिले। इनमें तो महिला कर्मचारी भी शामिल हैं।
इस तरह की बारीक छंटनी के बाद जीएडी ने पोस्टिंग आर्डर निकाला। तो फोन-पे, पेटीएम वाले थे। ये आदत इनमें से अधिकांश वल्लभ भवन से विरासत में लेकर आए हुए थे। यह आदत इतनी ठोस रही कि एक उप सचिव साहब ने अपने बेटे के लिए अस्पताल भवन तक बनवाकर दिया। हालांकि यह आदत कोरोना की तरह बाकी में भी वायरल है। लेकिन धीरे धीरे इसका इलाज जारी है।
इनमें से कई अब लूप लाइन कहे जाने वाले विभागों में खेत दिए गए। ऐसे तबादले इसलिए संभव हो सके कि स्वयं मंत्रालय कर्मचारी संघ ने ही मुख्य सचिव और जीएडी सचिव से लिखित में मांग कर रखी थी। अब तक ऐसा कभी नहीं हो पाया था।संघ के नेताओं ने गृह, लोनिवि,पीएचई,जल संसाधन, नगरीय प्रशासन जैसे बड़े बजट और लाइमलाइट वाले विभागों में कुछ लोगों की पोस्टिंग प्रमोशन की मोनोपोली खत्म करने का बीड़ा उठाया था, और सफल रहे।
हिसाब-किताब चुकता करने का मौका
हरियाणा विधानसभा चुनाव में हार के कारणों का पता लगाने के लिए कांग्रेस ने फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई है, जिसके मुखिया पूर्व सीएम भूपेश बघेल हैं। इस कमेटी में राजस्थान के पूर्व मंत्री हरीश चौधरी भी हैं, जो कि छत्तीसगढ़ में हार के कारणों का पता लगाने के लिए बनी वीरप्पा मोइली कमेटी के भी सदस्य थे।
हार के कारणों का पता लगाने भूपेश बघेल दिल्ली गए हैं, और वहां से हरियाणा जाएंगे। खास बात यह है कि हरियाणा में हार के कारणों के लिए कई कारण गिनाए जा रहे हैं। उनमें से एक कारण पूर्व केंद्रीय मंत्री सैलजा की नाराजगी भी रही है। उनकी नाराजगी के चलते दलित वोटर कांग्रेस से छिटक गए, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। सैलजा चुनाव प्रचार के दौरान अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी थी, और उनके पार्टी छोडऩे की चर्चा भी रही। मगर प्रचार खत्म होने के दो-तीन दिन पहले ही पार्टी नेतृत्व की समझाइश पर सक्रिय हुईं। दिलचस्प बात यह है कि सैलजा छत्तीसगढ़ कांग्रेस की प्रभारी रही हैं, और यहां प्रभारी रहते उनके भूपेश बघेल से संबंध अच्छे नहीं रहे हैं।
कुछ सूत्र बताते हैं कि सैलजा ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार के लिए पूर्व सीएम भूपेश बघेल को जिम्मेदार ठहराया था। सैलजा ने एक रिपोर्ट हाईकमान को दी थी। अब पार्टी ने भूपेश बघेल को हरियाणा में हार के कारणों को पता लगाकर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। ऐसे में भूपेश की रिपोर्ट में क्या कुछ आता है, इस पर पार्टी नेताओं की उत्सुकता है।
लॉ इंटर्न और विभागीय घाघ

नवंबर दिसंबर आते ही प्रोफेशनल कॉलेजों के छात्रों के इंटर्नशिप कोर्स का दौर शुरू हो जाता है। विधि के छात्र इन दिनों राज्य मंत्रालय के विभागों में इंटर्न के लिए संलग्न किए गए हैं। नए शहर के ही राष्ट्रीय विधि विवि के करीब 18 छात्र छात्राएं इंटर्नशिप कर रही हैं। एक पूर्व मुख्य सचिव की बनाई व्यवस्थानुसार इनके इंटर्नशिप का यह सिलसिला बीते 10 वर्ष से चल रहा है। वह भी केवल इसी विवि के विद्यार्थियों के लिए। रविवि, कुसुम ताई दाबके, छत्तीसगढ़ कॉलेज के विधि छात्रों के लिए ऐसे अवसर नहीं हैं। पहले इनकी संख्या 40-40 तक होती थी? जो कालांतर में कम होती गई।
साप्रवि की मदद से विधि विभाग इन छात्रों की अलग अलग विभागों में नियुक्त करता है। जो छह से आठ माह तक होती है। इनका काम है, कोर्ट में लंबित विभागीय केस में विभाग की जीत हो,ऐसी विधि-कानूनी सलाह देना। इसके बदले में प्रत्येक इंटर्न को इस बार 1-1 लाख रुपए स्टाइपेंड दिया जाएगा। शुरुआती वर्ष में यह 40 हजार तक दिया गया उसके बाद 75 हजार और अब सीधे एक लाख।
इस वर्ष 18 इंटर्न पर सीधे 18 लाख का पेमेंट होगा। इन दस वर्ष में इनकी बनाई केस डायरी से विभागों की कितनी याचिकाओं में जीत हुई, इनकी संख्या को लेकर दावे प्रतिदावे हो सकते हैं। यह भी है कि विधि विभाग, साप्रवि के घाघ लोगों के बीच इन इंटर्न के कानूनी किंतु, परंतुक कितनी चलती होगी। यही सच भी है, सुबह आकर अपने अपने विभाग में अटेंडेंस साइन कर ये महानदी भवन के गलियारे में घूमने मजबूर हैं। यदि ऐसा है तो सरकार हर वर्ष लाखों रूपए यूं ही स्टाईपेंड में गवां रहीं हैं।
संपन्नता और कुत्ते
रायपुर शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक महंगी कॉलोनी के रहवासी कुत्तों से परेशान हैं। उन्हें इवनिंग वॉक में दिक्कत आ रही है। खास बात यह है कि इस कॉलोनी में प्रभावशाली नेता, अफसर, और बड़े कारोबारी रहते हैं। सर्व सुविधायुक्त इस कॉलोनी की सुरक्षा व्यवस्था हाईटेक है। बावजूद इसके यहां आवारा कुत्ते लोगों की परेशानी का सबब बन गए हैं।
दरअसल, यह समस्या यहां के कुछ लोगों द्वारा पैदा की गई है। यहां के रहवासी कारोबारी परिवार के लोग कुत्तों को रोटी खिलाना पसंद करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि भोजन की आखिरी रोटी कुत्तों को देने से धन-धान्य बढ़ता है। इस मान्यता के चलते कुत्तों को रोटी देने के लिए रात में कई परिवार निकल जाते हैं। इसका नतीजा यह हो गया है कि कुत्तों की भरमार हो गई है, और इवनिंग वॉक करने वाले लोग परेशान हो गए हैं। फिलहाल तो इस समस्या का कोई निदान निकलता नहीं दिख रहा है।
पानी है, गिलास नहीं
रायपुर एयरपोर्ट को यात्री सुविधाओं के लिए पहले, कभी देश, कभी एशिया तो कभी राष्ट्रकुल देशों में टॉप थ्री, टॉप टेन जैसे तमगे मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं यह फुटफॉल यात्री आवाजाही के मामले में भी रिकॉर्ड बनाते रहा है। एयरपोर्ट प्रबंधन अभी भी यात्रियों की रिकार्ड आवाजाही को हर सप्ताह शेयर करता है। और एयरपोर्ट में यात्री सुविधाओं को रेखांकित करता है। लेकिन यहां तो यात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाएं भी नहीं है। यानी यात्री को घर से पानी पीकर निकलना होगा। क्योंकि एयरपोर्ट में नल तो है लेकिन पीने के लिए गिलास नहीं है। इस बेहतरीन एयरपोर्ट पर पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी का फेसबुक पोस्ट रिलेवेंट है।
उन्होंने लिखा कि यह रायपुर एयरपोर्ट है। हम मुसाफिर हैं। गाय बैल की तरह पानी पी रहे हैं। हजारों लाखों सरकार हमसे लेती है। बेइज्जती करने में देरी नहीं करती। ग्लास तक नहीं रखे हैं। कहां हैं नागरिक उड्डयन मंत्री? बहुत बड़े तीस मार खां तो बनते हैं केंद्रीय निजाम के सरगना। हो सकता है विदेश की नकल हो लेकिन इस तरह भारत में पानी पीना तो अनहाइजीनिक है।
पशुओं का भाईचारा...
शहरी कॉलोनियों में जहां-जहां लोग गाय या सांड को खाना देते हैं, वे वहीं पर बस जाते हैं, और बुढ़ापा आने के साथ-साथ उनका चलना-फिरना घट जाता है, और वे एक ही कॉलोनी के होकर रह जाते हैं। ऐसी ही एक कॉलोनी इतने सांडों से भर गई है कि वहां बच्चों को अकेले सडक़ पर निकलते डर लगता है, और अंधेरे में कई बार लोग टकराकर गिरते भी हैं। लेकिन गोवंश की आलोचना अब इस देश में जानलेवा हो सकती है, इसलिए उस बारे में अधिक बात नहीं करनी चाहिए।
राजधानी रायपुर की एक महंगी कॉलोनी के बाशिंदे हो चुके एक सांड और वहां की सडक़ों के कई कुत्तों के बीच संबंध इतने मधुर हो गए हैं कि सडक़ घेरकर खड़े सांड को घेरकर खड़े कुत्ते बारी-बारी से उसे चाटकर सुख दे रहे थे!
शिकायत का तो हक ही नहीं...
ईडी ने डीएमएफ घोटाले में कोरबा जिले में काम करने वाले एक एनजीओ के ‘मालिक’ मनोज कुमार द्विवेदी को गिरफ्तार किया है, जो कि कलेक्टर को 40-45 फीसदी रिश्वत देता था। यह भारत सरकार की जांच एजेंसी ईडी अखिल भारतीय सेवा का एक अफसर के खिलाफ अदालत में कह रही है, तो इसमें हम क्या कह सकते हैं? लेकिन अगर 45 फीसदी रिश्वत एक कलेक्टर को मिल रही थी, और बाकी अमला तो है ही, कई जगहों पर मंत्री, सांसद, विधायक भी अपना हिस्सा रखते हैं, तो फिर लोगों को डीएमएफ जैसे फंड से होने वाले काम में किसी भी क्वालिटी की उम्मीद क्यों करनी चाहिए? ऐसे कलेक्टरों की निजी सम्पत्ति में हिरण जैसी उछाल अगर न आए, तो लोगों को हैरानी जरूर होनी चाहिए।
आनंद और विजय-भाव देने वाला गांजा!

भारत में सबसे लोकप्रिय एक नशे, गांजे के बारे में हम कई बार लिखते हैं कि इस देश में विदेशी शराब बेचने में तो तमाम सरकारें लगी हैं, लेकिन हजारों बरस से चले आ रहे इस देसी नशे, गांजे के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बना दिया गया है, इसलिए कि इससे दारू कारखानों के पेट पर लात पड़ती है। आज अमरीका और जर्मनी जैसे बहुत से देश गांजे को कानूनी बनाते चल रहे हैं, और हिन्दुस्तान विदेशी शराब बेचकर खुश है।
अभी करण मधोक की लिखी हुई एक किताब आई है जो पूरी की पूरी भारत में गांजे पर ही है। इस किताब में हमारी कई बार की लिखी गई, और यूट्यूब पर कही गई बात को स्थापित किया है कि भारत में गांजा भारतीय सभ्यता जितना ही पुराना है, और इस देश में लिखी गई कुछ सबसे पुरानी बातों में भी गांजे का जिक्र मिलता है। किताब में गांजे के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, चिकित्सकीय, और मनोरंजन के पहलुओं की चर्चा की गई है, और गांजे को आनंद और विजय-भाव देने वाला बताया गया है। इस किताब में यह भी बताया गया है कि आन्ध्र-ओडिशा, इलाके में गांजे की शीलावंती किस्म मिलती है, जो कि आज देश में सबसे अधिक तस्करी वाली किस्म है। यह किताब अस्पतालों और दवाओं में गांजे के इस्तेमाल से लेकर शिवभक्तों के बीच चलने वाली चिलम तक हर पहलू कवर करती है। आनंद नाम की यह किताब गांजा न पीने वालों को भी आनंद दे सकती है।
पुराने किस्से जिंदा रहते हैं
एक आदिवासी जिले के एक कलेक्टर, और एडिशनल कलेक्टर की जुगलबंदी की खूब चर्चा हो रही है। दोनों ही पहले महासमुंद और बालोद जिले में साथ काम कर चुके हैं। उस वक्त दोनों अलग-अलग पदों पर थे। कलेक्टर सीधे साधे हैं, और ज्यादा लफड़े में नहीं पड़ते। एक तरह से प्रशासन की बागडोर एडिशनल कलेक्टर ही संभालते हैं।
एडिशनल कलेक्टर जमीन संबंधी प्रकरणों को निपटाने के मामले में चर्चा में रहे। उन्होंने तहसीलदार पर दबाव बनाकर एक प्रकरण को निपटाने की कोशिश की, लेकिन तहसीलदार के अड़ जाने की वजह से आगे की कार्रवाई नहीं हो पाई। एडिशनल कलेक्टर पहले जिस जिले में पदस्थ थे वहां भी एक बड़े बिल्डर को फायदा पहुंचाने के लिए फाइल चलाई थी। फाइल के मुताबिक आगे फैसला भी हो गया। नया प्रकरण पर तो कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन पुराना प्रकरण उन्हें भारी पड़ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
तबादलों का इंतजार
नगरीय निकाय, और पंचायत के चुनाव साथ-साथ होने जा रहे हैं। चुनाव तारीखों की घोषणा विधानसभा सत्र निपटने के बाद होगी। चर्चा है कि चुनाव से पहले पुलिस और प्रशासन में भी फेरबदल हो सकता है।
तीन-चार जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। कुछ इसी तरह का बदलाव पुलिस में भी हो सकता है। पुलिस में एसपी, और आईजी स्तर के अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है।
प्रशासनिक फेरबदल को लेकर यह कहा जा रहा है कि विशेषकर पंचायत के चुनाव थोड़ा लंबा चल सकता है। इन सबको देखते हुए कुछ जिलों में जहां शिकायतें ज्यादा आ रही हैं, वहां के कलेक्टरों को बदला जा सकता है। इसके लिए स्थानीय नेताओं का भी दबाव है। फिलहाल तो सूची का इंतजार चल रहा है।
10 वर्ष में ही छोटे, महानदी-इंद्रावती
दस वर्ष पहले जब नवा रायपुर में महानदी और इंद्रावती भवन का कांसेप्ट प्लान बनाया गया था तब राज्य के इन प्रशासनिक मुख्यालयों को अगले 30 वर्ष के स्टाफ स्ट्रेंथ और जरूरत के अनुसार निर्मित करने की बात कही गई थी। लेकिन मप्र से विभाजित पुराने ही सेटअप के अनुसार सेक्शन डिजाइन किए गए। और यह तीन से पांच मंजिले भवन दस वर्ष बाद ही स्थानाभाव से गुजर रहा है। इस दौरान सैकड़ों भर्तियां होने से एक कमरे और एक एक कुर्सी की मारामारी मची हुई है । हाल यह है कि वाणिज्य उद्योग का अनुभाग स्टाफ ग्रामोद्योग में,श्रम का धार्मिक न्यास,खेल का अमला सहकारिता में , पशुपालन मछलीपालन एक कक्ष,जनसंपर्क और खाद्य एक साथ, राजस्व-धर्मस्व को एक कमरे में व्यवस्थित किए गए हैं। खाली में केवल समाज कल्याण विभाग है।
तीसरी मंजिल पर 13 अनुभाग वाले जीएडी का, और दूसरी मंजिल में वित्त और गृह का कब्जा है?। जल संसाधन विभाग में तो स्टाफ के मुकाबले आलमारियां अधिक हैं। मानो आलमारी फैक्ट्री हो। स्वास्थ्य विभाग का अनुभाग आफिस कम, किसी अस्पताल का पूरा वार्ड लगता है। अफसरों की बैठक व्यवस्था अस्त व्यस्त है।इन सबके सचिव, उप-अवर सचिव और एसओ सभी अलग अलग फ्लोर में बैठते हैं। कई प्रमुख सचिव, संसदीय सचिवों के कक्ष में बिठाए गए हैं। ऐसा मंत्रालय में आवश्यकता से अधिक डिप्टी कलेक्टरों और अन्य विभागीय अफसरों के ओएसडी के रूप में नियुक्त किए जाने से हुआ है । जब कमरे खाली थे तो इन्होंने अलॉट करा लिए। अब आईएएस सचिवों के लिए कमरे नहीं है । आने वाले महीने में पदोन्नत होने वाले 40 सचिव, विशेष सचिव कहां बिठाए जाएंगे। यह बड़ी समस्या हो गई। शायद इसी समस्या का पूर्वाभास करते हुए ही अधीक्षण शाखा के अफसर ने अपना ही तबादला करवा लिया। कुछ ऐसा ही हाल इंद्रावती भवन में भी है। जबकि पर्यावास भवन, अरण्य भवन, पीएचक्यू,पीएचई का नीर भवन, पंचायत, जीएसटी संचालनालय ,एनआरडीए, विकास भवन,संवाद, शिवनाथ भवन, लोनिवि, योजना भवन सब अलग-अलग हैं।
आईएएस पदोन्नति के लिए नोट शीट चली
साप्रवि ने मुख्यमंत्री को नोट शीट भेजकर अतिरिक्त मुख्य सचिव,प्रमुख सचिव और सचिव,विशेष सचिवों की पदोन्नति के लिए अनुमति मांगी है। सीएम की अनुमति मिलने के बाद डीओपीटी के पत्र भेजकर पदोन्नति समिति गठित कर पदोन्नति की सिफारिश की जाएगी। यह प्रोसेस, के साथ ही अगला मुख्य सचिव कौन होगा? इसकी भी हलचल बढ़ा रहा है। हालांकि अमिताभ जैन 30 जून को रिटायर होने वाले हैं। इस पद के लिए सबसे वरिष्ठ एसीएस होने के नाते रेणु पिल्ले स्वाभाविक दावेदार है। साफ सुथरी, रिजल्ट ओरिएंटेड अफसर रेणु पिल्ले भाजपा की मातृशक्ति के नारे को भी पूरा करती हैं। उनकी नियुक्ति,24 वर्ष में पहली बार महिला मुख्य सचिव की कमी भी पूरी करेगी। वैसे इनसे पहले इंदिरा मिश्रा एसीएस के नाते सीएस के रैंक तक पहुंची थीं। लेकिन उनके पति एसके मिश्र बनाए गए। रेणु यदि राजनीतिक दृष्टि से पिछड़ती हैं तो मनोज पिंगुवा पर विचार हो सकता है ।। बहरहाल एसीएस के दो पदों के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए मनिंदर कौर द्विवेदी और गौरव द्विवेदी दो ही नाम हैं। दोनों को प्रोफार्मा प्रमोशन देना होगा। इनसे रिक्त होने वाले प्रमुख सचिव के पदों पर सुबोध सिंह, निहारिका, शहला निगार पदोन्नत होंगी। उनके बाद सचिव,विशेष और संयुक्त सचिव के लिए लंबी लिस्ट है। आईएएस लॉबी का जोर है कि यह डीपीसी इसी माह हो जाए। वैसे भी 1 जनवरी से देय पदोन्नति के लिए दिसंबर में ही आर्डर की परंपरा भी रही है।
केवी मिला पर नवोदय नजरअंदाज
जवाहर नवोदय विद्यालयों में प्रवेश प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा के माध्यम से होता है। यहां 6वीं से 12वीं तक की नि:शुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केंद्र सरकार की फंडिंग से दी जाती है। यही कारण है कि राज्यों में नवोदय विद्यालयों की स्वीकृति के लिए होड़ मची रहती है। वर्तमान में देशभर में 661 नवोदय विद्यालय हैं। हाल ही में मोदी कैबिनेट ने 28 नए नवोदय विद्यालयों को मंजूरी दी है, लेकिन इनमें से एक भी छत्तीसगढ़ के हिस्से में नहीं आया।
स्वीकृत नवोदय विद्यालयों में अरुणाचल प्रदेश को 8, तेलंगाना को 7, असम को 6, मणिपुर को 3, पश्चिम बंगाल को 2, और महाराष्ट्र व कर्नाटक को 1-1 विद्यालय मिले हैं। हालांकि, छत्तीसगढ़ को नए 85 केंद्रीय विद्यालयों में से 4 विद्यालय (मुंगेली, बेमेतरा, सूरजपुर और जांजगीर-चांपा) जरूर आवंटित हुए हैं।
अगर देशभर के नवोदय विद्यालयों की सूची देखें, तो अतीत में भी छत्तीसगढ़ को आवंटन कम ही रहा है। प्रदेश में केवल 16 नवोदय विद्यालय हैं, जबकि हरियाणा जैसे समान आकार वाले राज्य में 21, गुजरात में 28, कर्नाटक में 27 और झारखंड में 24 विद्यालय हैं। यह स्थिति तब है जब छत्तीसगढ़ के तत्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने फरवरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मुलाकात कर प्रदेश के सभी 33 जिलों में केंद्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय स्वीकृत करने की मांग की थी।
जवाहर नवोदय विद्यालयों में आवासीय सुविधा होती है, जहां गरीब परिवारों के मेधावी बच्चों को मुफ्त भोजन, आवास और शिक्षा मिलती है। अगर छत्तीसगढ़ को कुछ नए नवोदय विद्यालय मिलते, तो प्रदेश के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों को बेहतर अवसर मिलते। चार नए केंद्रीय विद्यालयों की स्वीकृति तो ठीक है, पर नवोदय विद्यालयों की मंजूरी में उदारता बरती जाती तो गरीब प्रतिभावान बच्चों को अधिक मौके मिलते।
बंदरों की पसंदीदा काली मिट्टी

भरतपुर-सोनहत के जंगलों में घूमते हुए मिट्टी की दिलचस्प संरचना दिख सकती है। यहां की काली मिट्टी में बड़े-बड़े गोल गड्ढे नजर आते हैं, जो जंगली जानवरों की खास रुचि का संकेत देते हैं। स्थानीय लोगों और जंगल से गुजरने वालों के अनुसार, इस मिट्टी को जानवर बड़े चाव से खाते हैं, खासकर बंदर। वे इसे कुरेद-कुरेदकर खाते हैं, जिससे ये गड्ढे बन जाते हैं। यह मिट्टी जंगल के कुछ ही हिस्सों में पाई जाती है और इसका स्वाद हल्का नमकीन होता है, जो जानवरों को आकर्षित करता है। मिट्टी का यह स्वाद उनकी आदत में शामिल हो चुका है। इससे उनके शरीर में नमक की जरूरत पूरी हो जाती है।


