राजपथ - जनपथ
बेमौसम का टकराव
प्रदेश में राइस मिलर्स की हड़ताल की वजह से धान खरीदी प्रभावित हो रही है। कई जिलों की समितियों में तो धान का उठाव नहीं होने के कारण खरीदी बंद हो गई है। मिलर्स की हड़ताल तुड़वाने की कोशिश भी हुई। रविवार को मिलर्स पदाधिकारियों के मिलों में छापे भी डाले गए। कई मिलों को सील भी कर दिया गया। प्रशासनिक दबाव का नतीजा यह रहा कि कई जगहों पर मिलर्स ने धान का उठाव शुरू कर दिया है।
मिलर्स की हड़ताल तुड़वाने के लिए डिप्टी सीएम अरुण साव, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, और खाद्य मंत्री दयालदास बघेल प्रयासरत थे। वो लगातार पदाधिकारियों से चर्चा कर रहे थे। यही नहीं, संगठन ने प्रदेश महामंत्री सौरभ सिंह को भी मिलर्स से बातचीत की जिम्मेदारी दी थी। मगर मिलर्स अपनी मांग पर अड़े रहे, तो दोपहर बाद सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी। मिलर्स एसोसिएशन के दो प्रमुख पदाधिकारी प्रमोद जैन और गप्पू मेमन की राइस मिल को सील कर दिया। यही नहीं, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के भतीजे टीनू के राइस मिल में भी खाद्य अफसरों ने भी जांच-पड़ताल की।
प्रशासनिक कार्रवाई का नतीजा यह रहा कि आधे राइस मिलर्स ने काम शुरू करने का मन बना लिया है। उन्होंने जिलों के अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी है। कई लोग इस गतिरोध के लिए एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। योगेश, बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। उन्होंने सीएम और मंत्रियों से चर्चा का ब्यौरा देते हुए सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा दिया था। कुछ टिप्पणियां ऐसी थी कि सरकार के लोग उबल पड़े।
सरकार ने कार्रवाई के साथ-साथ बातचीत का भी रास्ता अपनाया। सभी प्रमुख जिलों में प्रभारी मंत्रियों को मिलर्स से सीधे बातचीत करने के लिए कहा गया था। एक-दो दिनों में सारी स्थिति सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर, तो नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में नुकसान होने की आशंका जता रहे हैं। उन्होंने मिलर्स के समर्थन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र भी लिखा है। चाहे कुछ भी हो, जिलों में धान खरीदी की व्यवस्था गड़बड़ा गई है। इससे सरकार की किरकिरी हो रही है।
किसी दिन सूरज न कह दे...
गांव कस्बों को रोशन करने वाले एक अधिकरण की वित्तीय हालात की चर्चा वीआईपी रोड से अटल नगर विधान नगर के गलियारे तक होने लगी है। केंद्र प्रवर्तित योजनाओं के अनुदान से चलने वाले अधिकरण का बैंक बैलेंस कभी 300 करोड़ से अधिक के एफडी का रहा है। और अब हालात यह हैं कि पांच सौ अधिकारी कर्मचारियों को वेतन देने 50 करोड़ रुपए नहीं है। नतीजतन नवंबर की तनख्वाह 13 दिसंबर को क्रेडिट हुई है। ऐसे बैंक बैलेंस वाला यह प्रदेश का पहला उपक्रम हो। ऐसा इस अधिकरण के 23 वर्ष पहले गठन के शुरूआती दिनों में भी कभी नहीं हुआ। उन दिनों बजट की भी कमी रहा करती थी। और अब भरपूर बजट और भरपूर सबसिडी को साथ वेंडर्स से भरपूर कमीशन देने वाले इस अधिकरण की हालत को विधानसभा चुनाव के पहले से ही ग्रहण सा लग गया है।
अफसर चुटकी लेने लगे हैं कि - किसी दिन ऐसा न हो सूर्य भी बोले अधिकरण को अपनी उर्जा नहीं दूंगा। वे यह भी कहने लगे हैं कि अधिकरण कहीं मप्र ऊर्जा विकास निगम की तरह बंद न हो जाए। वैसे भी यहां के अधिकारी कर्मचारी अधिकरण के विद्युत कंपनी में संविलयन की मांग करते रहें हैं।
मनोनयन का इंतजार

भाजपा संगठन के एक अलिखित फार्मूले से पार्टी के भीतर हलचल मची हुई है। यह कहा जा रहा है कि जिन नेताओं को सरकार के दो कार्यकाल में निगम-मंडलों में जगह मिली थी, उन्हें पद नहीं दिया जाएगा। उनकी जगह नई नियुक्ति की जाएगी। खास बात यह है कि निगम-मंडल के कई पूर्व पदाधिकारी विधानसभा, और लोकसभा टिकट के दावेदार रहे हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाया।
ये सभी नेता सरकार बनने पर निगम-मंडल में जगह पाने की उम्मीद से हैं, लेकिन नए फार्मूले की चर्चा से उनमें बेचैनी है। ये अलग बात है कि पार्टी ने निकाय चुनाव तक सारी नियुक्तियों को टाल दिया है। यह भी तय किया है कि कैबिनेट का विस्तार भी नए साल में होगा। इससे परे बड़ी संख्या में निगम-मंडल के दावेदार पार्टी दफ्तर में अपना बायोडाटा भेज रहे हैं। अगर वाकई फार्मूले पर अमल हुआ, तो कई नेताओं का गुस्सा खुलकर सामने आ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।


