राजपथ - जनपथ
पंचायत-म्युनिसिपल चुनावों की चुनौती
नगरीय निकायों, और पंचायतों के पदों के आरक्षण में देरी से कई दिक्कतें पैदा हो रही हैं। पहली यह कि निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराना पड़ रहा है। नई मतदाता सूची 15 जनवरी को आएगी। साफ है कि मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से पहले चुनाव तारीखों की घोषणा नहीं की जा सकती है।
नगरीय निकायों के निर्वाचित पदाधिकारियों का कार्यकाल 6 जनवरी को खत्म हो जाएगा। सभी नगर निगमों में प्रशासक बैठेंगे। इसी तरह पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 10 फरवरी को खत्म हो रहा है। यह भी तय है कि 10 फरवरी के पहले पंचायतों का चुनाव हो पाना मुश्किल है। वजह यह है कि अभी पंचायतों में अब तक पदों का आरक्षण तक नहीं हुआ है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने दोनों चुनाव जनवरी-फरवरी में निपटाने की तैयारी की थी, लेकिन अब विशेषकर पंचायत चुनाव में देरी हो सकती है। पंचायत चुनाव फरवरी के आखिरी, और मार्च के पहले पखवाड़े तक चल सकते हैं। पंचायत चुनाव की प्रक्रिया लंबी है। प्रदेश में करीब डेढ़ लाख पंच, और साढ़े 11 हजार सरपंच के चुनाव होने हैं। इसके अलावा जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, और फिर आखिरी में जनपद व जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव होंगे। डिप्टी सीएम अरुण साव ने संकेत दिए हैं कि बोर्ड परीक्षाओं के पहले निकाय और पंचायत करा लिए जाएंगे। वाकई ऐसा हो पाएगा, यह देखना है।
सत्तारूढ़ पार्टी के पदों की चुनौती
भाजपा में जिलाध्यक्षों को लेकर खींचतान चल रही है। पार्टी के 35 संगठन जिले के अध्यक्ष के लिए तीन-तीन नामों का पैनल तैयार किया गया है। रायपुर सहित कई जिलों में अध्यक्ष के मसले पर स्थानीय नेता एकमत नहीं हो पा रहे हैं।
सुनते हैं कि रायपुर शहर, ग्रामीण और बलौदाबाजार के अध्यक्ष के नामों पर चर्चा के लिए क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल, सांसद बृजमोहन अग्रवाल के घर भी गए थे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस ने अपने भतीजे ओंकार बैस का नाम शहर जिलाध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाया है।
ओंकार चार बार शहर जिला भाजपा के महामंत्री रह चुके हैं। बृजमोहन ने सूर्यकांत राठौर का नाम सुझाया है। ऐसे में किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश चल रही है।
दुर्ग में तो पूर्व सांसद सरोज पाण्डेय, और सांसद विजय बघेल खेमा आमने-सामने है। इससे परे बलरामपुर में तो जिस नाम पर सहमति बनी है, उसके लिए दिग्गज नेता रामविचार नेताम सहमत नहीं हो रहे हैं। एक-दो दिनों में सूची जारी होगी, इससे साफ होगा कि किस नेता की राय को कितना महत्व दिया गया है।
बोर्ड परीक्षा-चुनावी परीक्षा
नगरीय निकायों और त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों की तारीख घोषित करने में हो रही देरी का कारण प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही नजर आ रहा है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 28 दिसंबर से पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण प्रक्रिया शुरू होकर 29 दिसंबर तक राज्य निर्वाचन आयोग को सूची सौंपनी है। इस सूची में ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायतों का आरक्षण शामिल है। इसके विपरीत, नगरीय निकायों में-जिसका कार्यकाल पंचायतों से पहले खत्म हो रहा है, आरक्षण की प्रक्रिया जनवरी के दूसरे सप्ताह तक पूरी होने की संभावना है। पहले यह कार्य 27 दिसंबर तक पूरा करने की योजना थी। सरकार ने आचार संहिता को अधिक लंबा न खींचने के लिए दोनों चुनाव एक साथ या आसपास कराने का निर्णय लिया था। हालांकि, आरक्षण प्रक्रिया में देरी के चलते अब आचार संहिता की घोषणा जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद ही होने की संभावना है। मतगणना और परिणाम मार्च के पहले सप्ताह तक खिंच सकते हैं।
इसी बीच, राजनीतिक घटनाक्रम में भी तेजी आई है। पिछले कुछ दिनों से मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा जोरों पर रही, जिसे भाजपा प्रभारी नितिन नबीन के छत्तीसगढ़ दौरे ने और बल दिया। हालांकि, राष्ट्रीय शोक की घोषणा के बाद यह चर्चा ठंडी पड़ गई। भाजपा के संगठन चुनावों में भी देरी हुई है। जिला अध्यक्षों की घोषणा अगले एक सप्ताह में होने की संभावना है।
कांग्रेस ने चुनाव घोषणा में देरी को मुद्दा बनाया है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर सरकार और संगठन के स्तर पर भाजपा रोजाना सक्रिय दिखाई दे रही है। हाल ही में नगरीय निकायों के सीएमओ के खाली पद भरे गए हैं और कई वर्षों से जमे अधिकारियों का तबादला किया गया है।
दोनों चुनाव एक साथ कराने के निर्णय से बड़ी संख्या में संसाधन और मतदान कर्मियों की आवश्यकता होगी, जिसमें शिक्षा विभाग का सहयोग भी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में शिक्षा विभाग वार्षिक और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त है। नगरीय प्रशासन मंत्री, उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने दावा किया है कि बोर्ड परीक्षाओं से पहले चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए चुनाव और परीक्षाओं की तारीखों में टकराव की आशंका बनी हुई है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नगरीय निकाय और पंचायतों के कार्यकाल का विस्तार नहीं किया जाएगा। यदि बोर्ड परीक्षाओं में बाधा उत्पन्न होती है तो प्रशासक नियुक्त करना सरकार के पास एक विकल्प तो है ही। फिलहाल, सरकार ऐसी नौबत लाने से बचने की कोशिश में दिख रही है-क्योंकि ऐसा करने से उसे पर विपक्ष के हमलों का सामना करना पड़ेगा। स्थानीय चुनाव और बोर्ड परीक्षाओं के बीच संतुलन इस समय एक बड़ा सवाल है।
श्वानझुंड-अग्निकुंड

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