राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : अफसरों के कनेक्शन
20-Dec-2024 3:41 PM
राजपथ-जनपथ : अफसरों के कनेक्शन

अफसरों के कनेक्शन  

विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुक्रवार को समाप्त हुआ। सत्र समाप्ति के साथ ही एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी है। प्रमुख सचिव सुबोध सिंह, और सचिव अमित कटारिया मंत्रालय में जॉइनिंग दे चुके हैं। दोनों ही अफसर केन्द्र सरकार में अहम पदों पर रहे हैं। 

आईएएस के 97 बैच के अफसर सुबोध सिंह तो डॉ. रमन सिंह के सीएम रहते उनके सचिव भी रहे हैं। वो रायगढ़ कलेक्टर थे तब सीएम विष्णुदेव साय वहां के सांसद थे। सीएम, सुबोध सिंह की कार्यशैली से पूर्व परिचित हैं। इसी तरह अमित कटारिया भी रायगढ़ कलेक्टर रहे हैं। लिहाजा, दोनों अफसरों को अहम दायित्व मिल सकता है। 

इसी तरह बिलासपुर कलेक्टर अवनीश शरण और नारायणपुर कलेक्टर विपिन मांझी प्रमोट होकर सचिव बनने वाले हैं। ऐसे में दोनों अफसरों का बदला जाना तय माना जा रहा है। दोनों के अलावा नगरीय निकाय, और पंचायत चुनाव के चलते कुछ और जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। 

इसी तरह सचिव स्तर के अफसर नीलम नामदेव एक्का पिछले तीन महीने से खाली हैं। उन्हें अब तक कोई प्रभार नहीं दिया गया है। एक्का बिलासपुर कमिश्नर थे, और फिर उन्हें मंत्रालय में पदस्थ किया गया। इसके बाद से अब तक उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है। एक्का को कोई जिम्मेदारी दी जा सकती है। कुछ विभागाध्यक्षों को भी इधर से उधर किया जा सकता है। 

पुलिस में बदलाव क्या-क्या?

सरकार ने जबरिया रिटायर किए गए एडीजी जीपी सिंह बहाल कर दिया है। उन्होंने पीएचक्यू में जॉइनिंग दे दी है। जीपी सिंह की जॉइनिंग के साथ ही पीएचक्यू में बड़े बदलाव की चर्चा है। इसकी एक और वजह है कि वर्ष-2007 बैच के अफसर दीपक झा, रामगोपाल गर्ग, और अभिषेक शांडिल्य प्रमोट होकर आईजी बनने वाले हैं। 

गर्ग, और दीपक झा तो क्रमश: दुर्ग, और राजनांदगांव रेंज आईजी के प्रभार पर हैं। जबकि अभिषेक शांडिल्य हाल ही में केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे हैं। उन्होंने पीएचक्यू में जॉइनिंग दे दी है। मगर उनकी पोस्टिंग नहीं हुई है। कहा जा रहा है कि आईजी, और एसपी स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं। इससे परे डीआईजी स्तर के अफसर अभिषेक मीणा सहित कुछ और अफसर अभी भी खाली हैं। उन्हें कोई प्रभार नहीं दिया गया है। माना जा रहा है कि पीएचक्यू में काफी कुछ बदलाव हो सकता है। 

साढ़े सात साल पुराना बयान याद आया?

राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने बीते मंगलवार को विपक्ष पर निशाना साधते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर का जिक्र किया, जिससे राजनीतिक माहौल गर्मा गया। उन्होंने कहा, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर..। आजकल अंबेडकर का नाम लेना एक फैशन हो गया है। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।  इस बयान ने विपक्ष को आक्रामक प्रतिक्रिया देने का मौका दे दिया।

शाह के विवादित बयानों की फेहरिस्त में ऐसा ही एक, छत्तीसगढ़ की जमीन पर भी दर्ज है। 2017 में जब वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब रायपुर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अगले विधानसभा चुनाव में 65 सीटें जीतने का लक्ष्य रखें। हालांकि, इस चुनावी रणनीति से ज्यादा चर्चा में उनका एक दूसरा बयान रहा।

मेडिकल कॉलेज में बुद्धिजीवियों के साथ बैठक के दौरान शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था, कांग्रेस किसी एक विचारधारा पर बनी पार्टी नहीं है। यह आजादी हासिल करने के लिए एक स्पेशल पर्पज व्हीकल थी। महात्मा गांधी ने भी इसे समझ लिया था। गांधीजी बहुत ‘चतुर बनिया’ थे। उन्हें पता था कि आजादी के बाद कांग्रेस का कोई औचित्य नहीं रहेगा, इसलिए उन्होंने आजादी के तुरंत बाद कांग्रेस को भंग करने की बात कही थी।

इस बयान पर तब विपक्ष ने शाह को आड़े हाथों लिया। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इसे महात्मा गांधी का अपमान बताते हुए माफी की मांग की, लेकिन शाह ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा था कि जिन्होंने मेरा बयान सुना है, वे जानते हैं कि मैंने ‘चतुर बनिया’ शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया था।

आज अंबेडकर वाले बयान को लेकर इस्तीफे और माफी की कांग्रेस की मांग पर भी भाजपा का वही रुख है। शाह और पार्टी अपने स्टैंड पर न केवल कायम हैं, बल्कि पलटवार कर रही है। बात इस बार ज्यादा बिगड़ गई है।

शिकारी के कब्जे में हीरामन का कुनबा

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2022) के तहत तोतों की खरीदी-बिक्री और पालने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश इस साल जुलाई में छत्तीसगढ़ के वन विभाग द्वारा जारी किया गया था। लोगों को स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि उनके घरों या कार्यालयों में तोते पिंजरों में कैद हैं, तो उन्हें खुले में छोड़ दें या वन विभाग के चिडिय़ाघरों में सौंप दें। इसके लिए एक महीने की मोहलत दी गई थी।

हालांकि, 26 अगस्त को प्रधान मुख्य वन संरक्षक की ओर से अचानक एक नई सूचना जारी की गई, जिसमें कहा गया कि केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन लिया जा रहा है, और इस कारण कार्रवाई फिलहाल स्थगित रखी जाए। यह समझ से परे है कि स्पष्ट कानून का पालन करवाने के लिए किस प्रकार के ‘तकनीकी मार्गदर्शन’ की आवश्यकता थी।

इस असमंजस और सुस्ती का नतीजा यह हुआ कि अब तक न कोई नई चेतावनी जारी हुई है, न ही कानून का सख्ती से पालन किया गया है। अधिनियम के तहत संरक्षित पक्षियों को पालने पर तीन साल तक के कारावास का प्रावधान है, लेकिन वन विभाग की लापरवाही के कारण शायद ही किसी को सजा मिली हो।

इधर, तोतों की खरीदी-बिक्री और उन्हें पालने का अवैध कारोबार खुलेआम जारी है। हाल ही में रायपुर रेलवे स्टेशन पर वन विभाग ने एक व्यक्ति से दो-चार नहीं, 105 तोते जब्त किए। इनमें से अधिकांश हीरामन प्रजाति के थे, जिन्हें पालने के लिए बहुत पसंद किया जाता है, क्योंकि ये मनुष्यों के आवाज की हूबहू नकल कर सकते हैं।

तोतों को जाल में फंसाने वाले शिकारी वन विभाग के लिए आसान लक्ष्य हैं, लेकिन असली चुनौती उन लोगों पर कार्रवाई करने की है, जो इन्हें खरीदकर पालते हैं। अफसरों में इन पर कार्रवाई की इच्छाशक्ति की कमी साफ दिखती है।  

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