राजपथ - जनपथ
अंबेडकर की चिंता किसको ज्यादा?
डॉ. भीमराव अंबेडकर, जो संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे और जिन्हें हम संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं, के नाम पर छत्तीसगढ़ में कई उल्लेखनीय पहल और संस्थान स्थापित किए गए हैं। रायपुर में उनके नाम पर राज्य का सबसे बड़ा हेल्थ केयर संस्थान मौजूद है, जिसमें 1100 बिस्तरों के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज का संबद्ध है। इसमें कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अत्याधुनिक सुपर स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध हैं।
डोंगरगांव (राजनांदगांव), बलौदा और पामगढ़ (जांजगीर-चांपा) में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम वाले सरकारी कॉलेज संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा, विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंबेडकर पीठों की स्थापना की गई है, जहां वंचित समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास पर केंद्रित अध्ययन किए जाते हैं।
साल 2015 में, डॉ. अंबेडकर के नाम पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आदर्श ग्राम योजना शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य देश के 10 राज्यों के 1000 गांवों को आदर्श ग्राम बनाना था। इस योजना में छत्तीसगढ़ भी शामिल था, लेकिन वर्तमान में इस योजना की प्रगति अस्पष्ट है।
छत्तीसगढ़ के लगभग हर प्रमुख शहर और कस्बे में डॉ. अंबेडकर के नाम पर चौक-चौराहे और प्रतिमाएं स्थापित हैं। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकार के विभाग नियमित रूप से अंबेडकर जयंती और संविधान दिवस (जो 2016 से शुरू हुआ) पर कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
हालांकि, बाबा साहब की विरासत को लेकर राजनीतिक दलों में होड़ भी स्पष्ट है। वे एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि संविधान और अंबेडकर की विरासत खतरे में है। पिछले कुछ दिनों से इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। हर दल यह दिखाने की कोशिश में है कि उन्होंने अंबेडकर को अधिक सम्मान दिया है और उनके आदर्शों को जीवित रखा है। राजनीतिक फायदे से परे उन लोगों के बीच अंबेडकर की तलाश करनी होगी, जो आज संविधान के मुताबिक बराबरी का हक पाने का इंतजार अभी भी कर रहे हैं।
गैर हाजिर सांसदों की दिक्कत
देश में लोकसभा, और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले संशोधन विधेयक के लोकसभा में मतदान के दौरान गैरहाजिर रहने वाले 20 भाजपा सांसदों को पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें छत्तीसगढ़ के दो भाजपा सांसद विजय बघेल, और राधेश्याम राठिया भी हैं।
विजय बघेल ने सफाई दी है कि वो दवाई लेने गए थे, और आने में विलंब हुआ इसलिए वो मतदान में हिस्सा नहीं ले पाए। पहली बार के सांसद राधेश्याम राठिया को जवाब देते नहीं बन रहा है। खास बात यह है कि भाजपा संसदीय दल के मुख्य सचेतक संतोष पाण्डेय हैं।
सांसदों की गैर मौजूदगी के लिए संतोष को भी जवाब देना पड़ रहा है। पार्टी के सांसद सदन में उपस्थित रहे, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मुख्य सचेतक व सचेतक की रहती है। वैसे भी भाजपा को अकेले सदन में बहुमत नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान सभी सांसदों की उपस्थित रहने के लिए पार्टी की तरफ से समय-समय पर दिशा निर्देश दिए जाते हैं।
कुछ दिन पहले सत्र की अवधि में सांसद बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर आना था, तो उन्होंने इसके लिए बकायदा स्पीकर, और संसदीय कार्यमंत्री से अनुमति लेकर ही रायपुर आए थे। विजय बघेल, और राधेश्याम राठिया के प्रकरण के बाद प्रदेश के संगठन भी संसद के साथ-साथ विधानसभा की गतिविधियों पर भी नजर रखे हुए हैं।
जोगी परिवार-बृहस्पति की वापसी?
जोगी परिवार, और पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। डॉ. रेणु जोगी ने अपनी पार्टी जनता कांग्रेस में विलय का लिखित प्रस्ताव दिया है, और इस पर समिति में विचार होगा। इसी तरह बृहस्पति सिंह का आवेदन पहले से ही लंबित है। प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने निलंबित, और निष्कासित नेताओं की पार्टी में वापसी पर विचार के लिए समिति बनाई है। सात सदस्यीय समिति में प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, डॉ. चरणदास महंत, धनेन्द्र साहू, मोहन मरकाम, प्रभारी सचिव द्वय संपत कुमार, जरिता लैतफलांग, और विजय जांगिड़ है।
चर्चा है कि जोगी परिवार की कांग्रेस में वापसी का पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमा विरोध कर सकता है। मगर पूर्व सीएम समिति में नहीं है। कहा जा रहा है कि डॉ. रेणु जोगी ने पार्टी हाईकमान से चर्चा के बाद विलय का प्रस्ताव दिया है। इसी तरह बृहस्पति सिंह की वापसी की राह में पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव रोड़ा बने रहे हैं, लेकिन वो भी इस समिति में नहीं है।
अंदर की खबर यह है कि डॉ. रेणु जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के कांग्रेस में विलय के प्रस्ताव पर समिति कोई फैसला लेने के बजाए सीधे हाईकमान को भेज सकती है। इसी तरह बृहस्पति सिंह का प्रकरण भी हाईकमान को भेजा जा सकता है। संकेत साफ है कि देर से ही सही इन सभी की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। देखना है कि भूपेश, और सिंहदेव का क्या रूख रहता है।
मीठा करौंदा

आम तौर पर बाड़ी, बगीचे और हाट बाजार में जो करौंदा मिलता है वे छोटे आकार के होते हैं और बेहद खट्टे। कच्चा खाने की कोशिश करें तो पूरा मुंह किनकिनाहट से भर जाएगा। इसकी चटनी और अचार बेहद पसंद की जाती है। पर यह जो करौदा दिख रहा है, वह जंगलों में मिलता है। जब कच्चे होते हैं तो स्वाद कसैला होता है, पर जब पकते हैं तो रंग जामुन की तरह काला हो जाता है और जामुन की तरह ही मीठा भी। भालुओं को यह करौंदा बहुत प्रिय है। कटीली डालियों के बीच घुसकर वे इसे बड़े चाव से खाते हैं। (फोटो-चंद्रकांत पारगीर)


