राजपथ - जनपथ
जमकर हुआ प्रचार
रायपुर दक्षिण में चुनाव प्रचार शांतिपूर्वक हुआ। दोनों ही दल कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता प्रचार में उतरे थे। प्रचार के आखिरी क्षणों में भाजपा नेताओं ने पूरी ताकत झोंकी है। अलग-अलग इलाकों में छोटी-छोटी सभाएं हुई, और इसमें दिग्गज भाजपा नेताओं के तेवर देखने लायक थे। शहर की एक पॉश कॉलोनी में सोमवार की रात एक छोटा सा कार्यक्रम रखा गया था। इसमें भाजपा के चुनाव के रणनीतिकारों ने शिरकत की।
कार्यक्रम शुरू होने से पहले भाजपा नेता, कॉलोनी वासियों से कहते सुने गए कि जाली टोपी वालों से बचना जरूरी है। इसलिए भाजपा को जिताना चाहिए। सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने खुले तौर पर कहा कि शहर में शांति बनाए रखना जरूरी है, नहीं तो गुंडे मवालियों का राज आ जाएगा। एक उत्साही भाजपा नेता ने तो एक कदम आगे जाकर कार्यक्रम में मौजूद भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी को जीत की अग्रिम बधाई दे दी। उन्होंने कहा कि लड़ाई अब लीड की है।
दूसरी तरफ, प्रदेशभर के युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के पदाधिकारी आकाश शर्मा के लिए प्रचार में जुटे थे लेकिन कहीं भी उन्होंने अपनी आक्रामकता नहीं दिखाई। हाथ जोडक़र वोट मांगते नजर आए। जबकि सूरजपुर की घटना के बाद कांग्रेस के युवा नेता निशाने पर रहे हैं। यही वजह है कि युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने किसी भी तरह के विवाद से बचने की कोशिश की। अब देखना है कि चुनाव में क्या कुछ होता है।
छत्तीसगढ़ के आईएएस दिल्ली में अहम बने

मोदी सरकार में छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसरों को अहम दायित्व मिला है। आईएएस के 95 बैच की अफसर श्रीमती मनिंदर कौर द्विवेदी केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव बन गई हैं। मनिन्दर छत्तीसगढ़ में भी कृषि विभाग की प्रमुख सचिव रही हैं। इसी तरह आईएएस के 97 बैच के अफसर सुबोध सिंह भी केन्द्रीय इस्पात मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव हो चुके हैं।
सुबोध सिंह के छत्तीसगढ़ आने की चर्चा रही है। सुबोध रायगढ़ में कलेक्टर रहे हैं, और तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह के सचिव रहते स्थानीय प्रमुख नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। मौजूदा सीएम विष्णुदेव साय से भी उनके अच्छे संबंध है। अब केन्द्र सरकार में अच्छी पोस्टिंग के बाद वे यहां आएंगे, इसको लेकर संशय है। इसी तरह केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव रहे अमित कटारिया ने प्रतिनियुक्ति खत्म होने के बाद यहां जॉइनिंग दे दी है। मगर छुट्टी पर जाने की वजह से उनकी पोस्टिंग नहीं हुई है। चर्चा है कि कटारिया छुट्टी बढ़ा भी सकते हैं। देखना है आगे प्रशासन में क्या कुछ बदलाव होता है।
राजधानी में डिजिटल अरेस्टिंग
राजधानी रायपुर में एक महिला को डिजिटल अरेस्ट का शिकार होना पड़ा है। उसे कॉल कर इतना भयभीत किया गया कि वह खुद ही पांच दिनों तक बैंक जाकर ठगों के बताये गए खाते में रकम जमा करती रही। इस तरह से उसने करीब 58 लाख रुपये गवां दिए। रायपुर में इस तरह का पहला मामला है। भिलाई और बिलासपुर में एक-एक मामला पहले सामने आ चुका है। इसके अलावा राजिम में भी एक बच्चे के पिस्तौल के साथ पकड़े जाने की बात कहकर पिता से करीब डेढ़ लाख रुपये ठगों ने अपने एकाउंट में जमा कराये थे। डिजिटल अरेस्टिंग और साइबर ठगी ज्यादातर ऐसे बुजुर्गों के साथ हो रही है, जो अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आड़े वक्त पर काम आ सके, इसलिए रकम बैंकों में जमा करके रखते हैं। साइबर ठगों का रिसर्च बड़ा तगड़ा होता है। वे अपना शिकार ढूंढ लेते हैं।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में देशभर में हो रही ऐसी ठगी को लेकर चिंता जाहिर की थी। मन की बात को पुलिस और प्रशासन के अफसरों और नेताओं ने शायद मन लगाकर नहीं सुना। हाल ही में पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर प्रत्येक जिले में साइबर ठगी के खिलाफ जन जागरूकता अभियान चलाया गया था। लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह जलसा की तरह निपट गया। लगातार हो रही ठगी बताती है कि पुलिस-प्रशासन का संदेश पीडि़तों तक नहीं पहुंच पाया। अब शायद घर-घर दस्तक देकर लोगों को ऐसी ठगी से बचाने के लिए मुहिम छेडऩे की जरूरत है।
खजाने वाली गुफा

यह जगह दो राज्यों को जोड़ती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। इसे कबीर चबूतरा कहा जाता है। सडक़ से नीचे उतरते ही झरने से घिरी वह जगह मिलती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कबीर ने कुछ समय यहां बिताया था। मगर, जो तस्वीर दिख रही है वह सिद्ध बाबा का आश्रय रहा है। घुमावदार पहाडिय़ों के खत्म होने के बाद और शुरू होने पर अक्सर इस तरह के आस्था के केंद्र दिखाई देते हैं। इस गुफा नुमा आस्था स्थल पर एक सुराख है। दशकों से यहां से गुजरने वाले लोग उस सुराख में सिक्के डालते हैं और आगे बढ़ते हैं। अब तक हजारों सिक्के इस गुफा के भीतर समा चुके हैं। किसी काल में खुदाई होगी तब पता चलेगा कि ये सिक्के काम के भी हैं या नहीं।
वोटिंग और डिस्काउंट
रायपुर दक्षिण में चुनाव आयोग ने मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए यथासंभव कोशिश की है। आम तौर पर रायपुर की चारों सीटों पर आम चुनाव में 60 फीसदी के आसपास मतदान हुआ था। जबकि इससे सटे अभनपुर, और धरसींवा में भारी मतदान हुआ था। आयोग की पहल पर मतदाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए कई होटल-रेस्टॉरेंट ने विशेष छूट का ऐलान किया है। इसमें मतदाताओं को बिल में पांच से 30 फीसदी तक डिस्काउंट देने का ऐलान किया है। इस डिस्काउंट ऑफर का लाभ लेने के लिए मतदाताओं को अपनी उंगली पर लगी स्याही दिखानी होगी। यह ऑफर 19 नवंबर तक रहेगा।
दिलचस्प बात यह है कि इस तरह का ऑफर विधानसभा आम चुनाव में भी दिया गया था, तब रायपुर दक्षिण में 61 फीसदी के आसपास ही मतदान हो पाया। इस बार दोनों ही प्रमुख पार्टी कांग्रेस, और भाजपा हर मतदाता तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश में जुटी हुई है। अकेले उपचुनाव की वजह से दोनों ही पार्टी की पूरी ताकत यहां लगी हुई है। ऐसी स्थिति में मतदान का प्रतिशत बढ़ता है या नहीं, यह तो 13 तारीख को पता चलेगा।
साहू वोट, बड़ा मुद्दा

रायपुर दक्षिण में साहू समाज के वोटरों को कांग्रेस के पक्ष में करने के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू, और कसडोल विधायक संदीप साहू लगे हुए हैं। इन सबके बीच भाजपा ने साजा विधायक ईश्वर साहू को प्रचार में उतारा है।
भुवनेश्वर साहू हत्याकांड के बाद विधानसभा आम चुनाव में साहू वोटर भाजपा की तरफ शिफ्ट हुए थे। भाजपा ने भुवनेश्वर के पिता ईश्वर को प्रत्याशी बनाया था, जिन्होंने दिग्गज नेता रविन्द्र चौबे को हराया। ईश्वर लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए स्टार प्रचारक साबित हुए।
इस बार उपचुनाव में भी पार्टी ने उन्हें चुनाव मैदान में उतारा है। मगर कांग्रेस ने कवर्धा के लोहारीडीह में सरपंच कचरू साहू की हत्या, और साहू समाज के लोगों को प्रताडि़त करने का मुद्दा बनाया है। ऐसे में ईश्वर उपचुनाव में कितना कारगर साबित होते हैं, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
निजी प्रैक्टिस पर बढ़ती रार
प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक के विरोध में डॉक्टरों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। स्वास्थ्य मंत्री ने इस दिशा में कुछ राहत देने के लिए सीमित छूट की घोषणा की है, लेकिन मामला अभी भी गरमाया हुआ है। इसका प्रभाव अब उन निजी अस्पतालों तक भी पहुंच गया है, जहां आयुष्मान कार्ड और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत मरीजों का इलाज होता है। स्वास्थ्य विभाग ने इन अस्पतालों से शपथ-पत्र लेने का आदेश दिया है, जिसमें यह प्रमाणित करना होगा कि उनके यहाँ कोई भी सरकारी डॉक्टर, चाहे अंशकालिक हो या ऑन-काल, सेवाएं नहीं देता है।
इस कदम ने अस्पताल संचालकों और सरकारी डॉक्टरों दोनों को नाराज कर दिया है। सवाल यह उठता है कि सरकारी डॉक्टरों से लिखित घोषणा करवाने के बावजूद निजी अस्पतालों से भी शपथ-पत्र क्यों लिया जा रहा है? संचालकों में तो असंतोष है ही, साथ ही डॉक्टर भी नाखुश हैं। खासतौर से विशेषज्ञ डॉक्टरों की नाराजगी अधिक है। उन्हें भी सिर्फ घर से ही प्रैक्टिस करने को कहा जा रहा है। उनका सवाल है कि अगर कोई गंभीर मरीज आता है तो घर में अस्पताल जैसी सुविधाओं के अभाव में उसका इलाज कैसे हो सकेगा?
इसके अलावा, डॉक्टरों को मिलने वाला 'नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस' भी 25 से 30 हजार रुपये के बीच है। चिकित्सकों का एक वर्ग चाहता है कि उन्हें यह भत्ता तो मिलता रहे, पर सरकार उनकी प्राइवेट प्रैक्टिस में हस्तक्षेप न करे। इस मुद्दे पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी सरकार के खिलाफ खड़ा है।
प्राइवेट प्रैक्टिस और अस्पतालों में सेवाएं देने पर रोक का मुद्दा अब राजनीतिक रंग भी लेता जा रहा है। चर्चा है कि भाजपा के भीतर ही कुछ लोग, जो वर्तमान सरकार और मंत्रियों से नाखुश हैं, डॉक्टरों को इस मामले में भडक़ाने का प्रयास कर रहे हैं। कुल मिलाकर, इस पेचीदा मसले का हल ढूंढना स्वास्थ्य मंत्री और सरकार के लिए आसान नहीं दिख रहा है।
स्मार्ट सिटी का कबाड़ होता सिग्नल

चौक-चौराहों पर लगे सीसीटीवी कैमरे सिग्नल तोडऩे, रॉन्ग साइड चलने और ओवरस्पीड वाहनों का रिकॉर्ड दर्ज करते हैं। नियम उल्लंघन करने पर आपके मोबाइल पर चालान आ जाता है। बीते कुछ वर्षों में जुर्माने की रकम भी बढ़ा दी गई है। पहली बार सिग्नल तोडऩे या ओवरस्पीड गाड़ी चलाने पर 1000 रुपये, रॉन्ग साइड जाने पर 2000 रुपये का जुर्माना। हर बार यह जुर्माना बढ़ता जाएगा। इसके बाद वाहन का रजिस्ट्रेशन और ड्राइविंग लाइसेंस भी रद्द हो सकता है। इस ऑटोमैटिक प्रणाली को तैयार करने में 100 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आया है।
लेकिन यह सब क्यों? अगर इसका उद्देश्य लोगों को यातायात नियमों का पालन करवाकर सडक़ दुर्घटनाएं रोकना है तो राजधानी रायपुर के कई चौक-चौराहों पर सिग्नल बंद क्यों हैं? यहां नियम तोडऩे पर भले ही चालान न हो, लेकिन अगर दुर्घटनाएं होती हैं तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? यह तस्वीर सरोना के एक चौक की है। ([email protected])
दीपावली के बाद अब मिलन
साय सरकार के मंत्रियों ने भले ही मीडिया से दूरी बना रखी है, लेकिन डिप्टी सीएम अरुण साव का मिजाज थोड़ा अलग है। उन्होंने रोड कांग्रेस का कार्यक्रम निपटने के बाद अपने निवास पर मीडिया कर्मियों को हाई-टी पर आमंत्रित किया, और उनसे विभागीय कामकाज से परे अनौपचारिक चर्चा की।
दस महीने में पहली बार किसी मंत्री के बुलावे पर मीडिया कर्मी काफी खुश थे। मीडिया, और बाकी लोगों को बुलाने का सिलसिला चल रहा है।
अभी बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री आए, तो उनका सीएम के घर जाना कई दिन पहले से तय था। लेकिन उनके रायपुर पहुँचते ही उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने उन्हें अपने घर न्यौता दिया, और रात दस बजे से सुबह दो-तीन बजे तक मुलाकाती उनसे मिलते हुए बने रहे। दो दिन बाद धीरेंद्र शास्त्री का मुख्यमंत्री के घर जाना, हफ्ते भर पहले से तय था, लेकिन भाजपा के अधिकतर नेता, कुछ ख़ास पत्रकार, चुनिंदा अफसर विजय शर्मा के बंगले पर दो तारीख की रात ही अचानक हुए कार्यक्रम में उनसे मिल लिए थे।
उम्मीदवारों की उम्मीदें
रायपुर दक्षिण में कांग्रेस संसाधनों की कमी से जूझ रही है। बावजूद इसके पहली बार चुनाव लड़ रहे युवक कांग्रेस अध्यक्ष आकाश शर्मा अपने युवा साथियों के बूते पर कड़ी टक्कर दिख रहे हैं। इन सबके बीच पार्टी नेता संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए कारोबारियों से मेल मुलाकात कर रहे हैं, जिसकी खूब चर्चा भी हो रही है।
प्रदेश में पार्टी की सरकार नहीं है, स्वाभाविक है कांग्रेस को फंड की कमी तो होगी ही। सुनते हैं कि दो प्रमुख नेता, फंड जुटाने के लिए कुछ कारोबारियों से मिले। इनमें एक निगम के पदाधिकारी भी थे। बातचीत शुरू हुई, और चुनाव खर्च के लिए सहयोग की बात आई।
कारोबारी ने उदारता दिखाते हुए प्रत्याशी तक मदद पहुंचाने का वादा किया। मगर पदाधिकारी ने उन्हें प्रत्याशी के बजाए सीधे पार्टी दफ्तर में ‘मदद’ पहुंचाने के लिए कहा। मदद पार्टी दफ्तर तक पहुंच गई, लेकिन बाद में उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि मदद उम्मीद से काफी कम है। अब कारोबारी ने आगे मदद की है या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन इसकी कारोबारियों के बीच काफी चर्चा हो
रही है।
दूसरी तरफ, भाजपा का भी हाल इससे अलग नहीं है। दिग्गजों के फोन कारोबारी संस्था के प्रमुखों तक पहुंच रहे हैं। यहां तक कहा गया कि चुनाव जीतने के बाद प्रत्याशी मंत्री बन सकते हैं। ऐसे में संस्था के हितों का ध्यान रखा जाएगा। अब इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो पता नहीं लेकिन कई कारोबारी चुनाव के चलते काफी परेशान हैं। और कुछ ने तो सीधे तौर पर हाथ खड़े कर दिए हैं।
नक्सली पीछे हटे पर खौफ नहीं गया
बस्तर में आमतौर पर नए कैंप खोलने पर सुरक्षाबलों का ग्रामीण विरोध करते हैं, लेकिन इस बार उलटा हो रहा है। कांकेर जिले के लोहत्तर थाना क्षेत्र के जाड़ेकूड़से गांव में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल का कैंप पिछले एक दशक से है। नक्सल गतिविधियों के सिमट जाने के कारण अब पुलिस इस कैंप को किसी दूसरी जगह ले जाना चाहती है। मगर, ग्रामीणों का कहना है कि कैंप की वजह से आसपास के 10-12 गांवों में सुरक्षा का माहौल बना है। स्कूलों में शिक्षक, अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति दिख रही है, विकास कार्यों को बल मिला है। कैंप हटने से नक्सली फिर से सक्रिय होंगे और युवाओं पर जबरन भर्ती का दबाव बनाएंगे, फिर शांति भंग हो सकती है। कैंप के बने रहने की ग्रामीणों की मांग नक्सली खतरे के प्रति उनकी गहरी चिंता को दर्शा रही है। कैंप खुलने से सडक़, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना आसान होता है। आदिवासी भी इसकी जरूरत महसूस करते हैं।
भाजपा सरकार के हालिया कार्यकाल में बस्तर में नक्सलियों पर दबाव बढ़ा है। मुठभेड़ों के दौरान बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौत हुई है। लोहत्तर के ग्रामीणों की मांग बताती है कि नक्सलियों के खदेड़े जाने के बावजूद उनका खौफ अब भी बरकरार है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सुरक्षा कैंप हटाना एक सही कदम होगा या फिर ग्रामीणों का डर दूर होते तक इसे बनाकर रखा जाना।
बैगा चलेंगे, बच्चा होगा...

इस मान्यता पर कितने लोग भरोसा करते हैं? यहां तो दर्जनों महिलाएं लेटी हुई हैं और हजारों की भीड़ है। बच्चा नहीं हुआ तो महिलाओं को ज़मीन में पीठ के बल दण्डवत होना है फिर बैगा आएंगे महिलाओं के पीठ के ऊपर चलते हुए जाएंगे। फिर बच्चा हो जाएगा ! इसके लिए बस एक नारियल और अगरबत्ती चाहिए। अंधश्रद्धा का यह खेल धमतरी के पास गंगरेल में अंगारमोती माता मंदिर में देखा जा सकता है।
ब्राह्मण अचानक केंद्र में
रायपुर दक्षिण में भाजपा को ब्राम्हण वोटरों की नाराजगी का खतरा है। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल खुद चुनाव लड़ते थे, तो ब्राह्मण समाज के 80 फीसदी वोट उन्हें मिल जाते थे। बृजमोहन के विरोधी ब्राह्मण प्रत्याशियों को अपने समाज का समर्थन नहीं मिल पाता था। मगर इस बार का माहौल बदला-बदला सा है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि बृजमोहन अग्रवाल खुद चुनाव मैदान में नहीं है। और आम चुनाव में भारी वोटों से चुनाव जीतने के मंत्री बने, तो बृजमोहन कोई ठोस काम नहीं कर पाए। उनके तीन हजार शिक्षकों के तबादला प्रस्ताव पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसके बाद प्रदीप उपाध्याय आत्महत्या प्रकरण पर उनकी चुप्पी से न सिर्फ ब्राम्हण बल्कि अन्य कर्मचारियों में नाराजगी देखी जा रही है।
बताते हैं कि पार्टी संगठन को इसका अंदाजा भी है और इसके बाद डैमेज कंट्रोल के लिए व्यूह रचना तैयार की गई है। महामंत्री (संगठन) पवन साय ने रायपुर दक्षिण, और अन्य इलाकों के ब्राह्मण नेताओं के साथ बैठक की।
बैठक का प्रतिफल यह रहा है कि सरकार ने प्रदीप उपाध्याय आत्महत्या प्रकरण की कमिश्नर से जांच की घोषणा हो गई। यही नहीं, परिवार के एक सदस्य को तुरंत अनुकंपा नियुक्ति सहित कई और कदम उठाए जा रहे हैं।
रायपुर के ब्राह्मण युवाओं के बीच अच्छी पकड़ रखने वाले योगेश तिवारी, नीलू शर्मा, अंजय शुक्ला, मृत्युजंय दुबे सहित अन्य नेताओं को प्रचार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। देखना है कि आगे क्या नतीजा निकलता है।
एक समाज की अहमियत
दक्षिण के दंगल में एक कारोबारी समुदाय की इन दिनों खूब पूछ परख हो रही है। वैसे यह समाज हमेशा से भाजपा का वोट बैंक रहा है। फिर भी इस बार भाजपा को बहुत मेहनत करनी पड़ रही है। क्षेत्र में दूसरा बड़ा वोट बैंक कहे जाने वाले समाज के लिए हर रोज किसी न किसी होटल में दीपावली मिलन का आयोजन हो रहा है। और इसमें यह कहा जा रहा है कि वोट देने जरूर जाए। क्योकिं भाजपा का पुराना अनुभव है कि इनके वोटर पहले दुकान जाते हैं और फिर दोपहर तक बूथ। और वहां लिस्ट में नाम न होने या बूथ बदलने से नाराज होकर लौट जाते हैं।
इस बार ऐसे वोटर की जिम्मेदारी पार्टी के ही सामाजिक नेताओं को दी गई है। इस समाज का कांग्रेस में अनुभव खट्टा ही रहा है । पार्टी ने कभी भी समाज के किसी नेता को बी फार्म नहीं दिया। खेमे में एक पूर्व मुख्यमंत्री कहते रहे हैं कि जितने लोग मुझसे मिलने आए हैं, उतने भी कांग्रेस को वोट नहीं देते । कांग्रेस ने मनभेद-मतभेद भुलाकर एक वर्ष पहले बागी होकर लड़े प्रत्याशी को भी प्रचार में उतार दिया है ।हालांकि बागी बेटे की वजह से पिता पार्टी में लौट नहीं पाए हैं। अब देखना है कि इस बार समाज का वोट स्विंग कैसे रहता है। वैसे समाज दरबार की बात बहुत मानता है।
अब हादसे हुए तो मंत्रीजी को पकड़ें?
इंडियन रोड कांग्रेस के 87वें अधिवेशन में शामिल होने राजधानी रायपुर पहुंचे केंद्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ऐसी बड़ी घोषणाएं की है, जो पूरी हुईं तो छत्तीसगढ़ की सूरत सचमुच बदली हुई नजर आएगी। उन्होंने 20 हजार करोड़ रुपये की घोषणाएं की हैं और कहा है कि दो साल के भीतर छत्तीसगढ़ की सडक़ें अमेरिका की तरह हो जाएंगी। अपने भाषण में गडकरी ने माना है कि दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं। हर साल 1.50 लाख से ज्यादा सडक़ दुर्घटनाएं होती हैं। वह पिछले साल बढक़र 1.68 लाख पहुंच गई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में रोड इंजीनियरिंग के कारण कोई दुर्घटना होती है तो उसे लिए वे खुद को दोषी मानेंगे। मगर, दोषी मान लेने भर से क्या होगा? किसी को सजा मिले तब तो बात बने। गडकरी के बयान से यह बात ध्यान में आती है कि बिलासपुर से पथर्रापाली जाने वाली नेशनल हाईवे पर, सडक़ बन जाने के बाद रतनपुर से पहले सेंदरी गांव के पास तुरकाडीह बाइपास पर रोजाना दुर्घटनाएं होने लगी थी। एक बार तो एक माह के भीतर रिकार्ड 7 मौतें अलग-अलग दुर्घटनाओं में दर्ज की गई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेशभर की सडक़ों की जर्जर हालत पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान इस सडक़ पर भी संज्ञान लिया। न्याय मित्रों ने सडक़ का निरीक्षण तकनीकी जानकारों के साथ किया। यह पाया कि सडक़ के निर्माण में तकनीकी खामी है। डिजाइनिंग में गड़बड़ी होने के कारण बाइक व हल्के वाहन वाले तेज रफ्तार भारी वाहनों की चपेट में आ रहे हैं। बाद में नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने भी इंजीनियरिंग की गड़बड़ी को मान लिया। अब इस रास्ते पर कई बेरिकेट्स और डिवाइडर लगाकर गति को संतुलित किया जा रहा है। अंडरब्रिज बनाने की तैयारी भी है। जब यह हाईवे तैयार हुआ तब भी गडकरी मंत्री थे और ये ही इंजीनियर काम कर रहे थे। इस ब्लैक स्पॉट पर हुई मौतों के लिए कौन जिम्मेदार था। गडकरी की ओर से जिम्मेदारी उठाने के पहले किसकी जिम्मेदारी थी? यह पता नहीं क्योंकि अब तक किसी पर कोई कार्रवाई हुई नहीं है। गडकरी के बयान का सडक़ दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की गंभीरता से शायद ही मतलब निकले।
अशोक स्तंभ के साथ सात फेरे

समय के साथ-साथ सामाजिक परंपराओं में बदलाव आ रहे हैं। पिछले दो तीन वर्षों में छत्तीसगढ़ में हमने देखा कि वैवाहिक समारोह के कार्ड के साथ कई लोगों ने हसदेव अरण्य को बचाने का संदेश दिया था। कुछ ने संविधान की शपथ लेकर शादी की। ऐसा ही पिछले दिनों सूरत में हुआ। एक व्यवसायी परिवार में धूमधाम से एक शादी हुई। मौर्य कुशवाहा समाज के लक्ष्मी और परमानंद मौर्य ने अशोक स्तंभ के फेरे लगाकर विवाह की रस्म पूरी की। वहां मौजूद लोग सम्राट अशोक, भगवान बुद्ध व संविधान का जय-जयकार कर रहे थे। अतिथियों को संविधान की प्रतियां भेंट की गई।
पहले हो चुका है उपचुनाव
रायपुर दक्षिण विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, और भाजपा ने अपनी ताकत झोंक दी है। यहां 13 तारीख को मतदान होगा। बहुत कम लोगों को मालूम है कि रायपुर की सीट पर पहले भी एक बार उपचुनाव हो चुका है। तब रायपुर शहर और ग्रामीण मिलाकर एक सीट ही हुआ करती थी।
आजादी के बाद 1952 में सीपी एंड बरार विधानसभा के पहले चुनाव हुए थे। रायपुर विधानसभा क्षेत्र से प्रजा समाजवादी पार्टी की तरफ से ठाकुर प्यारेलाल विजयी हुए थे। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी हरि सिंह दरबार को पराजित किया था। बाद में भूदान पदयात्रा के दौरान वर्ष-1954 में जबलपुर के निकट ठाकुर प्यारेलाल सिंह का निधन हो गया। परिणाम स्वरूप यह सीट खाली हो गई।
प्रजा समाजवादी पार्टी ने दिवंगत ठाकुर प्यारेलाल सिंह के पुत्र ठाकुर रामकृष्ण सिंह को प्रत्याशी बनाया। जनवरी 1955 में चुनाव हुए। कांग्रेस की तरफ से पंडित शारदा चरण तिवारी उम्मीदवार बनाए गए। ठाकुर रामकृष्ण सिंह को करीब ढाई हजार से अधिक वोटों से जीत हासिल हुई थी। उस वक्त सवा 28 हजार वोट पड़े थे।
तब गुढिय़ारी, राजातालाब, रामसागरपारा, ब्राम्हण पारा, बैजनाथ पारा, छोटा पारा, बैरन बाजार, सदर बाजार, तात्यापारा, अमिन पारा, पुरानी बस्ती, गोल बाजार, रेलवे कॉलोनी, टिकरापारा, मौदहापारा रायपुर विधानसभा क्षेत्र का आता था। अब रायपुर चार विधानसभा, उत्तर, दक्षिण, पश्चिम, और ग्रामीण में तब्दील हो चुका है। वर्तमान में अकेले रायपुर दक्षिण में मतदाताओं की संख्या दो लाख 70 हजार पहुंच चुकी है। अब इस उपचुनाव का क्या नतीजा निकलता है, यह तो 20 तारीख को पता चलेगा।
9.15 के बाद पहुंचे तो हाफ-डे

देश भर के अधिकारी कर्मचारियों के लिए ऑफिस पहुंचने की टाइमिंग को लेकर एक नया फरमान जारी हुआ है। अब इन्हें 15 मिनट लेट आने की ही परमिशन होगी। अब असल बात यह है कि यह आदेश मानता कौन है। जो आधे से पौन घंटे देर से आने वालों के लिए तो एडवांटेज मिल जाएगा। सरकार के दिए ये 15 मिनट उस पर अपना टाइम। यानी राष्ट्रपति सचिवालय से लेकर दूर गांव के डाकघरों के केंद्रीय कर्मचारियों को हर हाल में दफ्तर में सुबह 9.15 बजे तक पहुंचकर अपनी उपस्थिति बायोमेट्रिक सिस्टम में पंच करना अनिवार्य होगी।
कोरोना काल के बाद से अधिकांश सरकारी कर्मचारी बायोमेट्रिक पंच नहीं कर रहे थे, जिससे उपस्थिति की समस्या उत्पन्न हुई? इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने आदेश जारी किया है कि सभी कर्मचारी अब नियमित रूप से बायोमेट्रिक उपस्थिति सुनिश्चित करें। डीओपीटी के आदेश में यह भी कहा गया है कि अगर कर्मचारी सुबह 9.15 बजे तक दफ्तर नहीं आए, तो उनका हाफ-डे लगा दिया जाएगा। सभी विभाग प्रमुख अपने स्टाफ के दफ्तर में मौजूदगी और समय पर आने-जाने की निगरानी भी करेंगे।
समय की इसी पाबंदी को लेकर छत्तीसगढ़ कैडर की एक अफसर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटना चाहती थीं। प्रतिष्ठित रक्षा मंत्रालय में पदस्थ थीं। फिर तोड़ निकालकर साउथ ब्लॉक से बाहर के विभाग में पोस्टिंग करा लिया। अब बात महानदी और इंद्रावती भवन से तहसील तक के लेट कमर्स की करें। वो तो नवा रायपुर के लिए मुफ्त की स्टाफ बस की सुविधा न मिली होती तो कोई भी 11 बजे के पहले नहीं पहुंचते। वैसे जीएडी चाहे तो पुराना मंत्रालय से 11 बजे निकलने वाली बीआरटीएस बस को चेक कर लें तो 72 सीटर बस ओवरलोड में 150 लेट कमर्स हर रोज मिलेंगे। ऐसे ही लोग बायोमेट्रिक का विरोध करते हैं ।
वहां हंगामा, यहां सब चंगा जी

अस्पताल में फर्श पर तड़पते मरीज की जिस तस्वीर से हमारी सरकार, डॉक्टर और नर्स ने नजर चुरा ली, कोई भी विचलित नहीं हुआ, उसी को गुजरात ने नाक का सवाल बना लिया। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने बिलासपुर के जिला अस्पताल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था। इसमें अस्पताल के बरामदे पर एक घायल मरीज तड़प रहा था, जिसे डॉक्टर, नर्स और दूसरे स्टाफ नजरअंदाज कर आगे बढ़ जा रहे थे। इसी वीडियो पर गुजरात साइबर सेल ने बैज के खिलाफ भ्रामक खबर फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया है ऐसी खबर उड़ गई। यह कहते हुए कि इस वीडियो को गुजरात के अस्पतालों की स्थिति बताकर जनता को भ्रमित किया गया। हालांकि, यह बाद में साफ हुआ कि इस वीडियो क्लिप का गुजरात की तस्वीर बताते हुए किसी अन्य महिला ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर पोस्ट कर दी है। पुलिस ने उस महिला के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
छत्तीसगढ़ में साइबर सेल या सरकार के किसी दूसरे महकमे को इस वीडियो ने विचलित नहीं किया। शायद यह मानकर कि, छत्तीसगढ़ है- यहां तो सब ऐसा ही है। मगर, गुजरात में इसी वीडियो क्लिप ने इतनी सनसनी फैला दी कि वहां एक जांच एजेंसी को सक्रिय होना पड़ गया। इसका मतलब क्या है? मतलब यह है कि गुजरात के अस्पतालों की दशा, छत्तीसगढ़ जैसी नहीं है। ऐसी तुलना भी की गई तो यह प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया जाएगा। भले ही दोनों जगह मोदी की गारंटी वाली सरकार क्यों न हो।
इस बार सचमुच उम्मीद से?
रायपुर दक्षिण चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हो, लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज मेहनत में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। खुद प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने बुधवार को अनौपचारिक बैठक में बैज की सराहना भी की।
चर्चा के बीच एक-दो नेताओं ने संसाधनों की कमी का रोना रोया, और कहा कि आगामी दिनों में कार्यकर्ताओं को संसाधन उपलब्ध कराने की जरूरत है। इस पर पायलट ने साफ शब्दों में कहा बताते हैं कि संसाधनों से चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा के पास असीमित संसाधन हैं, और संसाधनों में उनसे कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता है। पायलट ने आगे कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले पर चुनाव लड़ रही है, और भरोसा जताया कि अंतत: जीत कांग्रेस को ही मिलेगी। कुल मिलाकर पायलट इस बार उम्मीद से हैं। देखना है आगे क्या होता है।
जंगल में मंगल !!

सरकार के विभागों की तरफ से अलग-अलग प्रकरणों पर हाईकोर्ट में जवाब समय पर दाखिल नहीं हो पाता है। इसकी वजह से कई प्रकरणों पर सुनवाई लंबी खिंच जा रही है। एजी ऑफिस ने सिंचाई विभाग के एक प्रकरण पर तो ईई के खिलाफ कार्रवाई की भी सिफारिश कर दी थी।
ताजा मामला वन विभाग से जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स पद पर पदोन्नति से जुड़े विवाद पर सुनवाई चल रही है। इस पूरे मामले में एसीएस की हिदायत के बावजूद जवाब दाखिल नहीं हुआ था। इसके बाद अब एसीएस (वन) ने कड़ा रुख दिखाते हुए सीधे तौर पर ओआईसी को दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दे दी है। इसके बाद से विभाग में हडक़ंप मचा हुआ है। प्रकरण पर अगले हफ्ते सुनवाई है। देखना है आगे क्या होता है।
समिति बनेगी या आमसभा होगी?

सामान्य प्रशासन विभाग ने एक लंबे अर्से बाद संयुक्त परामर्शदात्री समितियों (जेसीसी) की सुध ली है। अवर सचिव ने सभी विभागों और कलेक्टरों को निर्देश जारी किया है। इसमें कहा है कि अपने अपने जिलों, विभागों में मान्यता प्राप्त कर्मचारी संघों के एक एक सदस्य को शामिल कर संयुक्त परामर्शदात्री समितियों का गठन किया जाए। यह तो हुई व्यवस्थागत आदेश की बात। और यहां से शुरू होगा कर्मचारी संगठनों में राजनीतिक द्वंद्व।
प्रदेश में तीन सौ से अधिक मान्यता प्राप्त अधिकारी कर्मचारी संगठन। इनमें 110 से अधिक फेडरेशन से सम्बद्ध है। इनके अलावा महासंघ, बीएमएस संबंद्ध, पेंशनर्स ये संघ भी हैं। जीएडी ने कहा है इनमें से हर जिले की जेसीसी में एक एक संघ के एक एक प्रतिनिधि को शामिल किया जाए। ऐसा होने पर हर जिले की जेसीसी भी तीन सौ सदस्यीय हो जाएगी। लेकिन जीएडी और कलेक्टर विभाग प्रमुख ऐसा नहीं करते। वे मात्र दर्जन डेढ़ दर्जन सदस्य ही लेते हैं।
ऐसे में कर्मचारी नेताओं में सदस्य बनने होड़ मचेगी। और जो नहीं बन पाएगा उसकी भूमिका 'फूफा’ जैसी होनी निश्चित है। इतना ही नहीं ऐसे नाराज लोगों का पाला बदलना या विभीषण बनना भी तय है। निहारिका बारिक सिंह कमेटी की बैठक में जेसीसी गठन की मांग उठाकर कर्मचारी राजनीति के शांत समुद्र में कंकड़ मारकर, नेताओं में अपने ही लिए समस्या खड़ी कर ली है। जीएडी ने भी मांग और मौके का फायदा उठाकर गठन के आदेश जारी कर दिए। अब कर्मचारी राजनीति की धार देखना है।
क्या चल रहा है स्वास्थ्य विभाग में ?
राज्य के प्रमुख मंत्रालय जैसे स्वास्थ्य, और गृह न केवल आकार में बड़े हैं बल्कि राज्य में सुशासन सुनिश्चित करने के लिए इनका चुस्त-दुरुस्त रहना बेहद आवश्यक है। प्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति बिगड़ रही है। हत्या, चाकूबाजी के अलावा सीधे पुलिस और प्रशासन के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन इस पूरी स्थिति को गृह मंत्री और डिप्टी सीएम विजय शर्मा की चूक कहना सही नहीं होगा; हालात काबू में करने में जरूर कुछ कमियां दिखाई दे रही हैं।
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल का मामला अलग है। कुछ दिन पहले उन्होंने सिम्स मेडिकल कॉलेज, बिलासपुर में समीक्षा बैठक बुलाई, जिसमें डीन अनुपस्थित थे। इस पर बिना देरी किए, मंत्री ने निलंबन का आदेश जारी कर दिया। परंतु, यह आदेश जल्द ही हाईकोर्ट में ध्वस्त हो गया, क्योंकि डीन डॉ. सहारे परिवारिक शोक के चलते विधिवत अवकाश पर थे। इसके बाद स्थिति विकट हो गई। अब कॉलेज में हाईकोर्ट के आदेश से लौटे डॉ. सहारे और स्वास्थ्य विभाग द्वारा नियुक्त डॉ. रणमेश मूर्ति के बीच पदभार को लेकर लड़ाई चल रही है। स्टाफ में भ्रम फैला हुआ है और व्यवस्थाएं डगमगा रही हैं।
इधर, स्वास्थ्य विभाग में निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने के निर्णय ने डॉक्टरों में असंतोष भडक़ा दिया है। राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज के 22 डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हैं, और पूरे प्रदेश में यह संख्या 30 तक पहुँच गई है। सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक हमेशा एक पेचीदा मुद्दा रहा है। ऐसी स्थिति में, जब राज्य के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सकों की भारी कमी है, हर इस्तीफा एक नई चुनौती खड़ी कर रहा है।
मंत्री जायसवाल द्वारा झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश भी शुरुआती दिखावे तक सीमित रह गया। बलौदाबाजार में जब पत्रकारों ने झोलाछाप डॉक्टरों को कुछ स्वास्थ्य अधिकारियों का संरक्षण मिलने का आरोप लगाया, तो मंत्री भडक़ उठे और सबूत की मांग करने लगे। मंत्री का यह रवैया, मानो वे आलोचना सुनना ही नहीं चाहते, उनके कामकाज के तरीकों पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। पहली बार विधायक बनने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय जैसा बड़ा दायित्व संभालने वाले जायसवाल के स्वास्थ्य क्षेत्र में कई चुनौतियाँ हैं। उनके सामने मोतियाबिंद ऑपरेशन के दौरान आंख गंवाने वाले मरीजों को न्याय दिलाने जैसे संवेदनशील मुद्दों का समाधान करने की चुनौती भी तो है। ([email protected])
वोट के बदले मिठाई-लिफाफा
रायपुर दक्षिण में कांग्रेस, और भाजपा के दिग्गज नेताओं ने डेरा डाल दिया है। दोनों ही दलों के विधायक, पूर्व विधायक गलियों की खाक छान रहे हैं। चुनाव प्रेक्षक भी खर्च पर नजर गड़ाए हुए हैं। इन सबसे नजरें चुराकर एक प्रत्याशी की तरफ से 25 हजार पैकेट पूजन-मिठाई, और उपहार स्वरूप एक-एक हजार के लिफाफे धनतेरस के दिन मतदाताओं तक पहुंचाए भी गए। मतदान के पहले भी इसी तरह मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए लिफाफे और अन्य उपहार भेजने की तैयारी चल रही है। मतदान पर इसका कितना असर होता है, यह कहना अभी कठिन है।
सांसद-पुत्री अब कलेक्टर
आईएएस की वर्ष-2021 बैच की अफसर तुलिका प्रजापति को पहली बार कलेक्टरी का मौका मिला है। तुलिका राज्य प्रशासनिक सेवा की अफसर थीं, और फिर उन्हें आईएएस अवार्ड हुआ है। तुलिका को आदिवासी बाहुल्य मानपुर मोहला जिले में काम करने का अवसर मिला है।
अंबिकापुर की रहवासी तुलिका राजनीतिक परिवार से आती हैं। उनके पिता स्व. प्रवीण प्रजापति कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य रहे हैं। उनकी माता हेमंती प्रजापति परियोजना अधिकारी रही हैं, और वो रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस में सक्रिय हंै। वो लूंड्रा से टिकट की दावेदार भी थीं। इससे परे तुलिका का अब तक प्रशासनिक कैरियर बेहतर रहा है। कलेक्टर के रूप में क्या कुछ करती हैं, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
चूक या राजनीति

इसे चूक कहें या राजनीति, संस्कृति विभाग ने एक अलंकरण की घोषणा ही नहीं की। और वह भी चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी बकायदा विज्ञापन जारी कर आवेदन मंगाए गए। आवेदन भी दर्जनभर से अधिक आए। चयन समिति भी बनी, उसकी बैठक हुई, सबके कृतित्व का आंकलन भी किया। लेकिन उपराष्ट्रपति के हाथों आज कोई सम्मानित नहीं हो पाएगा। यह सम्मान, छत्तीसगढ़ के रंगमंच को विश्व थिएटर तक पहुंचाने वाले पद्मश्री स्व हबीब तनवीर की स्मृति में दिया जाना था। हबीब भाई राजधानी के बैजनाथ पारा में रहा करते थे। यह सम्मान पिछली सरकार ने दो अन्य अलंकरणों लक्ष्मण मस्तुरिया स्मृति और खुमान साव स्मृति के साथ शुरू करने की घोषणा की थी। संस्कृति विभाग ने इन दो के नाम तो घोषित किए लेकिन तनवीर की स्मृति को भूल गया। सूची में इस अलंकरण के शामिल न होने से रंगमंच के नामचीन कलाकारों ने ही यह जानकारी देते हुए अफसोस जाहिर किया है।
हाथियों की सह-अस्तित्व परेड
शांतिपूर्ण, कतारबद्ध सडक़ पार करता हाथियों का यह दल दिखाता है कि ये विशालकाय प्राणी केवल सम्मान और दूरी चाहते हैं। हसदेव अरण्य इलाके के इस वीडियो में कोरबा-अंबिकापुर हाईवे पर ग्राम मड़ई के पास गजराज परिवार का नजारा सुकून देने वाला है। हाल में छत्तीसगढ़ में करंट से चार हाथियों की दर्दनाक मौतों के बीच इस तरह का दृश्य अनमोल है, खासकर जब इस गज दल में नन्हे शावक भी शामिल हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को देखने से यह धारणा मजबूत होती है कि गजराज किसी पर बेवजह हमला नहीं करते। वे स्वभाव में मूल रूप से संकोची हैं। वे भी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की जरूरत महसूस करते हैं पर उन्हें पानी और भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए भटकना पड़ता है। जैसे ही वे सडक़ पार कर रहे थे, लोगों में उत्सुकता दिखी। दोनों ओर गाडिय़ों की कतार लग गई, जिनमें एंबुलेंस भी थीं। लोग हाथी से सुरक्षित दूरी बनाकर बिना शोरगुल किए खड़े थे। पर अफसोस कुछ लोगों ने जोर से हॉर्न बजाकर उन्हें डराने की कोशिश की। बाकी लोगों ने उन्हें फटकार लगाते हुए मना किया।
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग भागों में हाथियों के कई दल विचरण कर रहे हैं। हाथियों की असामयिक मृत्यु और मानव के साथ उनका संघर्ष भी इसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है। वन्यजीव प्रेमी कहते हैं कि जागरूकता और सहिष्णुता हो तो हाथी भी हमारे जंगलों में सुरक्षित और निश्चिंत रह रहेंगे। आम लोगों की जिम्मेदारी तो बनती है कि वे इसका ध्यान रखें, लेकिन हाल की घटनाएं बताती है कि वन विभाग और प्रशासन में संवेदना का अभाव है।
पढ़े-लिखे बेरोजगारों की संख्या ऐसे होगी कम
प्रदेश के कॉलेजों में इस बार स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री के लिए आवेदन की संख्या में चौंकाने वाली गिरावट आई है। पूरे प्रदेश के आंकड़े अभी नहीं मिले हैं। एक जानकारी सामने आ रही है, उसके मुताबिक इस साल बस्तर विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले 53 कॉलेजों में स्नातक स्तर पर पिछले साल की तुलना में आधे से भी कम आवेदन हुए हैं। जहां पिछले वर्ष 15,000 से अधिक प्राइवेट परीक्षार्थियों ने आवेदन किया था, वहीं इस बार अंतिम तारीख तक केवल 6,000 आवेदन ही आए हैं। स्नातकोत्तर में भी यह गिरावट दिखाई दे सकती है, जैसे ही उसकी आवेदन तिथि समाप्त होगी।
इस बदलाव का बड़ा कारण नई शिक्षा नीति 2020 है, जिसके तहत स्नातक और स्नातकोत्तर में निजी छात्रों की परीक्षा प्रक्रिया में बदलाव किए गए हैं। अब स्नातक और स्नातकोत्तर के प्रथम वर्ष में छात्रों को साल में दो सेमेस्टर की दो परीक्षाएं देनी होंगी। साथ ही असाइनमेंट के लिए 10-12 दिनों का अतिरिक्त समय भी देना होगा। पहले द्वितीय और अंतिम वर्ष में प्राइवेट परीक्षार्थियों को एक बार आवेदन और एक बार परीक्षा देने की सुविधा थी, परंतु अब केवल प्रथम वर्ष के छात्रों को नई परीक्षा प्रणाली का पालन करना होगा।
नई नीति से प्राइवेट परीक्षार्थियों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। जो छात्र समय या व्यावसायिक जिम्मेदारियों के चलते नियमित कक्षाओं में शामिल नहीं हो सकते थे, उन्हें अब बार-बार कॉलेज जाना होगा। इससे वे महिलाएं भी प्रभावित होंगी, जिन्हें पहले केवल एक बार परीक्षा देने आना पड़ता था।
प्राइवेट इनरोलमेंट घटने से कॉलेजों की आमदनी पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि कॉलेज प्राइवेट परीक्षार्थियों से कई तरह की अतिरिक्त फीस वसूलते थे, जो अब कम हो जाएगी। दूसरी ओर, अधिकतर शिक्षाविद इस बदलाव को सकारात्मक मानते हैं। उनका कहना है कि अब प्राइवेट परीक्षा से मिली डिग्री का वास्तविक मूल्यांकन हो सकेगा, और इसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। मगर, इसी के परिणामस्वरूप भविष्य में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक बेरोजगारों की संख्या में भी कमी देखने को मिल सकती है।
धान खरीदी में देरी के नुकसान
छत्तीसगढ़ में धान की खरीदी हर साल एक नवंबर से शुरू हो जाती थी, लेकिन इस बार 16 नवंबर से शुरू होगी। सरकार का कहना है कि इस समय तक फसल पूरी तरह तैयार नहीं होती, पर अनेक किसानों के लिए यह देरी उनके लिए एक समस्या बन गई है। जल्दी पकने वाली धान की फसल तैयार हो चुकी है, और किसानों के पास उसे रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
छोटे किसानों के पास खलिहान नहीं होते और वे धान काटते ही उसे बेचने के लिए सोसाइटी में पहुंचाना पसंद करते हैं। बड़े किसानों के ही खलिहान का साझा उपयोग करते हैं, ताकि समय पर अपनी फसल को सुरक्षित कर सकें। इस बार धान खरीदी में देरी होने के कारण इन किसानों को अपनी फसल 10-12 दिन तक अपने पास डंप करके रखने की मजबूरी आ पड़ी है।
हाथी प्रभावित इलाकों के किसानों के लिए यह स्थिति और भी जोखिम भरी है। यदि वे धान को खलिहान में रखेंगे, तो हाथियों के हमले का खतरा बना रहता है, जो उनकी मेहनत को बर्बाद कर सकते हैं। इससे बचने के लिए कई किसान अब अपनी फसल खुले बाजार में बेचने पर मजबूर हैं, जिससे उन्हें समर्थन मूल्य से कम कीमत मिल रही है।
दूसरी ओर, उपार्जन केंद्रों के ऑपरेटरों की हाल ही में समाप्त हुई हड़ताल के कारण किसानों का पंजीयन कार्य पिछड़ गया है। इसके अलावा, अब समितियों के प्रबंधक हड़ताल पर चले गए हैं और राजधानी रायपुर में डेरा जमाए हुए हैं।
कन्फर्म बर्थ का जुगाड़

छठ पूजा आते ही दिल्ली से यूपी-बिहार जाने वाली ट्रेनों का हाल देखिए। रेलवे दावा कर रहा है कि इस बार पिछली बार से दोगुनी स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, पर भीड़ ऐसी है कि प्लेटफॉर्म और ट्रेन में पैर रखने की जगह भी नहीं। लोग 12-15 घंटे खड़े-खड़े यात्रा कर रहे हैं, मानो रेलवे ने यात्रियों के धैर्य की परीक्षा लेने की ठान ली हो।
मगर कुछ यात्री ऐसे विपरीत हालात में भी धीरज नहीं खोते। इस तस्वीर में दिखाई दे रहा है कि ऊपरी बर्थ के बीच रस्सी बांधकर जुगाड़ से एक और बर्थ बना ली गई है। सीट कन्फर्म नहीं मिली तो क्या, खुद अपनी व्यवस्था कर ली! वैसे भी हमारे देश के लोग किसी भी स्थिति में खुद को एडजस्ट करने की कला में निपुण हैं।
कुछ लोग कह रहे हैं कि रेलवे को इस पर जुर्माना लगाना चाहिए, आखिर बिना अनुमति बर्थ तैयार कर ली गई है। लेकिन जो घर से रस्सी लेकर आए, मेहनत से सीट तैयार की, उनसे उगाही के बारे में सोचना अन्याय होगा। बल्कि, यह क्रिएटिविटी भविष्य की ट्रेनों में काम आ सकती है। हो सकता है, अगली बार शायद रेलवे जुगाड़ बर्थ खुद बनाए और उसके लिए टिकट भी बेचना शुरू कर दे।
आरक्षण और अटकलें

सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव के लिए पिछड़ा वर्ग आरक्षण की नई नीति को मंजूर कर लिया है, और इस सिलसिले में जल्द अधिसूचना जारी होने के संकेत हैं। चुनाव में आरक्षण के मसले पर एक बार फिर प्रदेश की राजनीति गरमा सकती है।
विधानसभा उपचुनाव निपटने के बाद नगरीय निकाय, और पंचायत के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। राज्य निर्वाचन आयोग ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। ताजा विवाद आरक्षण के मसले पर छिड़ सकता है। विश्वकर्मा आयोग ने एससी-एसटी, और ओबीसी मिलाकर कुल आरक्षण 50 फीसदी तक रखने की सिफारिश की है। पिछड़ा वर्ग का स्थानीय निकायों में पिछले चुनाव में 25 फीसदी आरक्षण रहा है लेकिन नई नीति से नगर-निगमों में पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ सकता है। ऐसे में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है।
यह भी साफ है कि पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित वार्डों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। यही नहीं, अनारक्षित वार्डों की संख्या में कमी आ सकती है। सिर्फ अंबिकापुर ही अकेला ऐसा निगम है जहां वार्डों का आरक्षण यथावत रहेगा।
इधर, निगम चुनाव लडऩे के कई इच्छुक नेता पहले परिसीमन को लेकर नाखुश थे और हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। करीब 50 याचिकाएं दायर की गई थी। ये अलग बात है कि कोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर दी। अब आरक्षण से प्रभावित कई नेता कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल अधिसूचना का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।
बंदे में आखिर क्या बात है?
चुनाव आयोग ने झारखंड, और महाराष्ट्र के डीजीपी को हटा दिया है। इन दोनों राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। राजनीतिक दलों की शिकायत पर दोनों राज्यों के डीजीपी को हटाया गया है। इस मामले में छत्तीसगढ़ के डीजीपी अशोक जुनेजा भाग्यशाली रहे हैं। गौर करने लायक बात यह है कि विधानसभा चुनाव के बीच डीजीपी अशोक जुनेजा को हटाने की मांग की गई थी।
भाजपा के एक प्रतिनिधि मंडल ने जुनेजा के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा चुनाव आयोग को सौंपा था। आयोग ने इस पूरे मामले में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। और जब भाजपा सरकार में आई, तो जुनेजा के हटने की अटकलें भी लगाई जा रही थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
यही नहीं, रिटायरमेंट के बाद छह महीने का एक्सटेंशन भी दे दिया गया। जिन दिग्गजों ने जुनेजा के खिलाफ शिकायत की थी वो अब भी समझ पा रहे हैं कि उन्हें एक्सटेंशन क्यों दिया गया। दबे स्वर में प्रदेश में खराब पुलिसिंग के लिए जुनेजा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। चाहे कुछ भी हो, जुनेजा को दाद देनी ही पड़ेगी।
भाजपा के जिन नेताओं ने विधानसभा चुनाव के पहले जुनेजा को हटाने की माँग की थी, वे अब सामने पडऩे पर नजऱें छुड़ाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही भूपेश सरकार के आने के वक्त हुआ था। चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी अनिल टुटेजा के खून की प्यासी थी। और चुनाव हो गया फिर? फिर कांग्रेसी नए राजा से मुँह चुरा रहे थे।
छत्तीसगढ़ में रहने वाले...
भाजपा में संगठन चुनाव चल रहे हैं। दिसंबर के पहले पखवाड़े में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होगा, और दिसंबर के आखिरी हफ्ते में ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए जो नाम अभी से चर्चा में है, उनमें केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान प्रमुख है। प्रधान छत्तीसगढ़ भाजपा के लंबे समय तक प्रभारी रहे हैं। वे उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी रहे हैं, और हाल में ही हरियाणा चुनाव में जीत के लिए रणनीति उन्होंने ही तैयार की थी।
धर्मेन्द्र प्रधान, पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। इन सबको देखते हुए छत्तीसगढ़ के कई भाजपा नेता अभी से धर्मेन्द्र प्रधान के अध्यक्ष बनने की संभावना जता रहे हैं। कई नेता उनके संपर्क में भी हैं।
खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। मोदी के बाद वेंकैया नायडू प्रभारी थे, जो बाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। इसके बाद राजनाथ सिंह प्रभारी बने वो भी राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए। मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं।
ऐसे में धर्मेन्द्र प्रधान के प्रोफाइल, और छत्तीसगढ़ से जुड़े संयोग को देखकर उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की अटकलें लगाई जा रही है, तो वह बेवजह नहीं है।
टारगेट रेलवे का, या साहब का

रायपुर रेल ‘मंडल’ के रायपुर- दुर्ग के ट्रेन में चलने वाले टीटीई और प्लेटफॉर्म ड्यूटी करने वाले टीसी, इन दिनों अपने साहब से परेशान हैं। परेशानी की बात यह है कि बेटिकिट, बिना बुकिंग लगेज, बिना रिजर्वेशन के स्लीपर में सफर करने पर कार्रवाई का ‘मंडल’ का टारगेट पूरा करें या साहब का टारगेट पूरा करें। साहब ने इन सभी को अपने लिए मासिक टारगेट बांध दिया है कि मुझे इतना तो चाहिए ही। नहीं तो ट्रेन से उतार कर आफिस में बाबू गिरी या प्लेटफॉर्म में लूप लाइन में डाल दिए जाओगे।
रायपुर के टीटीई, नागपुर तक और दुर्ग के कटनी और विशाखापट्टनम तक ड्यूटी पर जाते हैं। इन सबकी कमाई साहब जानते जो हैं। क्योंकि वो स्वयं भी नीचे से ही ऊपर आए हैं। नागपुर से तीन माह पहले यहां आने के बाद अब साहब सक्रिय हुए हैं। वैसे साहब के यहां आने की वजह भी ऐसी ही कुछ प्रताडऩाएं रहीं है। इसे लेकर वहां की दो महिला टीसियों की शिकायत पर साहब महिला आयोग में पेशियों का सामना कर रहे हैं। अब देखना यह है कि टारगेट पूरा होता है या साहब पीछे हटते हैं।
झारखंड चुनाव में हसदेव
झारखंड में एक ओर विधानसभा में वापसी के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए जूझ रहे हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ का पड़ोसी राज्य होने के साथ-साथ दोनों आदिवासी बाहुल्य प्रदेश हैं। दोनों राज्य खनिज संसाधनों से संपन्न हैं। इन संसाधनों के दोहन के लिए जल-जंगल-जमीन को उजाडऩा और आदिवासियों को बेदखल करना, हर राजनीतिक दल के लिए मुद्दा रहा है। मगर, तब जब वह सत्ता में नहीं हो।
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते थे कि भाजपा को वोट देना मतलब अडानी को हसदेव का जंगल सौंप देना। विधानसभा में जब हसदेव के जंगल को बचाने की संकल्प पारित किया गया तो सभी राजनीतिक दल साथ थे। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने तब कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया था कि वह जंगल काटने के लिए आदिवासियों पर बल प्रयोग कर रही है। हालांकि, अब भाजपा की सरकार बनने के बाद उतना ही बल या उससे अधिक लगाकर प्रस्तावित खदान के लिए कटाई का सिलसिला शुरू हो गया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया, पर यहां कोई चुनाव सामने नहीं है, इसलिए विरोध औपचारिक ही रहा। इस ताजा पेड़ कटाई के दौरान लोग राहुल गांधी की प्रतिक्रिया भी ढूंढ रहे थे, नहीं मिली।
मगर, झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगभग हर चुनावी सभा में यह कह रहे हैं कि भाजपा झारखंड की सत्ता में इसलिये आना चाहती है ताकि यहां के जंगल और जमीन को वह अपने उद्योगपति मित्रों के हवाले कर सके। और इस बयान के दौरान वे छत्तीसगढ़ में हसदेव के जंगलों की हो रही कटाई का उदाहरण दे रहे हैं। भाजपा का यह रुख है कि वह इस मुद्दे पर कोई जवाब ही न दे। उसने यूसीसी, एनआरसी और बांगलादेशी घुसपैठ व सोरेन सरकार के भ्रष्टाचार पर चुनाव पर प्रचार अभियान फोकस किया है।
हम भी लटककर चलते हैं...

चीन जैसे देशों में ट्रेनें लटककर चलती है, जो तकनीकी और इंजीनियरिंग का एक उदाहरण है। वहीं, हमारे भारत में लोग अक्सर भीड़-भाड़ वाली ट्रेनों में लटककर यात्रा करते हैं। यह स्थिति हमारे देश के यात्रियों की सहनशीलता और विवशता का उदाहरण है।
चुनाव और जाति की राजनीति
रायपुर दक्षिण में सामाजिक समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस, और भाजपा के रणनीतिकार प्रयासरत हैं। इन सबके बीच एक दीवाली मिलन कार्यक्रम भी हो गया। यह कार्यक्रम ब्राह्मणों के लिए रखा गया था।
कार्यक्रम में सरकार के एक मंत्री भी पहुंचे थे। कार्यक्रम के लिए दिल खोलकर खर्च भी किया गया। इस आयोजन के बाद दूसरे समाज के लोग भी इस तरह उम्मीद पाले हुए हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो गैर ब्राह्मणों में नाराजगी फैलने का अंदाजा भी लगाया जा रहा है। इसको भांपते हुए दूसरे दल ने सभी मोहल्ले में दिवाली मिलन कार्यक्रम के आयोजन की तैयारी शुरू कर दी है। यह जाति विशेष के लिए न होकर सर्व समाज के लिए होगा। दीवाली मिलन से किसको फायदा होता है, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
सरकार और हैरानी!
लोकतंत्र में किसी सरकार के भीतर निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता, और पेशेवर अफसरों के बीच लगातार संपर्क और संवाद से ही काम हो पाते हैं। ऐसे में अगर किसी अफसर को महीनों अपने विभागीय मंत्री से मिलने न मिले, तो उसे क्या कहा जाए? यह सवाल प्रदेश की राजधानी से देश की राजधानी तक लोगों को कुछ हैरान कर रहा है!
पसंदीदा मुजरिम, और बेचैनी...
जब किसी ताकतवर या बड़े पर पुलिस हाथ डाले, तो ऊपर के बड़े-बड़े अफसरों के या तो हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते हैं, या फिर उनका खून खौलने लगता है। ये दो अलग-अलग बातें इस तरह लागू होती हैं कि मुजरिमों से ऊपर के अफसरों के संबंध कैसे हैं। ऐसे में धर्म, जाति, गुरूभाई होना, या किसी एक प्रदेश या भाषा का होना बड़ा काम आता है। इनमें से किसी भी एक बात की वजह से बड़े-बड़े अफसर छोटे-छोटे अफसरों से खफा हो जाते हैं कि उनके तबके के, या उनके पसंदीदा मुजरिम को क्यों छुआ गया? अब सवाल यह उठता है कि अगर ऐसे बड़े मुजरिमों को किसी भी जुर्म के लिए पौराणिक कहानियों की जुबान में, अभयदान देना था, तो उसे पहले से बता देना था। कुछ तेज अफसर अपने पसंदीदा मुजरिमों के इलाकों के छोटे मातहत अफसरों को गब्बर की असली पसंद पहले से उजागर कर देते हैं, और फिर पुलिस महकमे के हर दर्जे में इतनी समझदारी तो रहती ही है कि जिन कंधों पर अधिक पीतल लगा हो, उन पर खड़े सिर और मुंह से निकले इशारों को तुरंत समझ लें। फिलहाल कुछ बड़े लोगों के घिरने से पुलिस के कुछ बड़े लोगों में बेचैनी भर गई है।
गांजा गांव में सस्ता !!
नशेड़ी और नशे की वस्तुओं की धरपकड़ को लेकर एसएसपी एक अभियान चलाए हुए है। कार्रवाई हो भी रही है। इसमें गांजा ही बड़ी मात्रा में पकड़ा रहा है। मगर दिक्कत इस बात की है कि हर थाने का रेट अलग अलग है। यानी प्रति किलो गांजे की कीमत शहर के थाने अलग लगा रहे और ग्रामीण के थाने अलग। हमने अक्टूबर में अलग अलग थाना पुलिस की जब्ती (बड़ी खेप) और आंकी गई कीमत की जांच की। यह जानकारी पुलिस ने ही दी है। जैसे 4 अक्टूबर को टिकरापारा पुलिस ने 14.362 किग्रा गांजा जब्त कर कीमत 2.80. लाख आंका। पांच दिन बाद 9 अक्टूबर को गुढिय़ारी पुलिस ने 12.383 किग्रा गांजे की कीमत 2.45 लाख बताई। यानी रेट कऱीब साढ़े उन्नीस हज़ार रूपिये किलो।
लेकिन गोबरा नवापारा पुलिस ने इनसे कहीं अधिक गांजा जब्त किया और औसत रेट कम लगाया। वहाँ 30 अक्टूबर को पुलिस ने 20 किलो गांजा जब्त किया और कीमत मात्र 60 हजार रुपए लगाया। ऐसे कैसे संभव है- क्वांटिटी अधिक और प्राइज कम।
हो भी सकता है शहर से बाहर जाते ही कीमत कम हो जाएगा। यह वैसे ही है जैसे चोरी होने पर पुलिस रिपोर्ट में कम कीमत लिखती है और चोरों से जब्ती या बरामद सामान की कीमत अधिक बताती है। पुलिस का बैलेंस शीट वही जानती है।
आदिवासी संस्कृति की झलक दीवारों पर

स्टील सिटी जमशेदपुर के सुंदरनगर पोस्टऑफिस के अंतर्गत आने वाले तालसा गांव में आदिवासी कला की अनूठी छटा देखने को मिलती है। संथाल क्षेत्र के इस गांव में घरों की दीवारों पर मनमोहक चित्रकला उकेरी गई है।
एक घर में तो रेलवे की बोगी का सुंदर चित्र उकेरा गया है, जबकि अन्य घरों में पेड़, फूल, पक्षी,और जानवरों के चित्र बखूबी सजाए गए हैं। गांव के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट अक्षरों में गांव का परिचय और संविधान के अनुच्छेद 13(3) व 244(1) के तहत गांव के विशेषाधिकार का उल्लेख है। इस कलात्मक पहल को सोशल मीडिया पर झारखंड चुनाव कवर कर रहे रिपोर्टर्स ने सराहा है। इन भित्ति चित्रों को ‘सोहराई कला’ के नाम से जाना जाता है, जो आदिवासी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण
हिस्सा है।
शिक्षकों का ‘साइड बिजनेस’
कुछ शिक्षकों का ध्यान शिक्षा से हटकर अन्य कामों में अधिक लगने लगा है। शालाओं से गायब रहना, बच्चों से मजदूरी कराना और नशे में हंगामा करना, बच्चियों से शर्मनाक बर्ताव करना जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। अब इनमें एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है- नेटवर्क मार्केटिंग। कोरबा जिले में कुछ शिक्षक पढ़ाई के समय मोबाइल पर ग्राहकों की तलाश में रहते हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल बच्चों के अभिभावकों पर सामान खरीदने के लिए दबाव डालते हैं। इस पर जिला शिक्षा अधिकारी ने सख्त कदम उठाते हुए चेतावनी दी है। हालांकि, चालाकी से शिक्षकों ने नेटवर्क मार्केटिंग खातों में अपनी जगह परिवार के सदस्यों का नाम जोड़ रखा है, जिससे सबूत जुटाना कठिन हो रहा है। प्रारंभिक शिक्षा बर्बाद करने में शायद कुछ शिक्षक कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते।
कौन परदेसिया, कौन इम्पोर्टेड?
महाराष्ट्र के चुनाव में शिवसेना के शिंदे गुट की उम्मीदवार शाइना चुडासमा की एक शिकायत पर मुम्बई पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। उनकी शिकायत शिवसेना के उद्धव गुट के उम्मीदवार अरविंद सावंत के खिलाफ है जिन्होंने अपने एक बयान में शाइना का नाम लिए बिना कहा था- उनकी हालत देखिए आप, जिंदगी भर वो भाजपा में रही, फिर वो दूसरी पार्टी में गईं। हमारे यहां इम्पोर्टेड माल नहीं चलता, हमारे यहां ओरिजनल माल चलता है। इस बयान को शाइना ने अपना अपमान माना है।
इस ताजा एफआईआर से यह याद पड़ता है कि कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की दक्षिण विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार आकाश शर्मा को भाजपा के लोगों ने बाहरी बताया था क्योंकि वे पड़ोस के जिले में रहे थे, और अब बरसों से रायपुर में ही रह रहे हैं। चुनाव में ऐसे नारे उछालने वाले कुछ भी याद नहीं रखते। भाजपा के ही दिलीप सिंह जूदेव खरसिया जाकर अर्जुन सिंह के खिलाफ लड़े थे जो कि मध्यप्रदेश से आकर खरसिया में लड़ रहे थे। बाद में दिलीप सिंह जूदेव बिलासपुर आकर रेणु जोगी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव भी लड़े थे।
राजधानी रायपुर से गौरीशंकर अग्रवाल अपने पैतृक इलाके कसडोल जाकर चुनाव लड़ते थे, जबकि वे पूरी जिंदगी से रहे रायपुर में थे। और दूसरी तरफ उनके मुकाबले कांग्रेस से रायपुर से जाकर कसडोल से चुनाव लडऩे वाले राजकमल सिंघानिया आज के विवाद के पैमाने पर तो पूरी तरह परदेसिया थे। कसडोल से ही द्वारिका प्रसाद मिश्र आकर 1963 में चुनाव लड़े थे, और बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी कमल नारायण शर्मा ने चुनाव याचिका दाखिल की थी। यहां पर विद्याचरण पूरी जिंदगी महासमुंद से लड़ते रहे, जबकि वे वहां रहे कभी नहीं। जोगी महासमुंद से लड़ते रहे, जिनका वहां से कोई रिश्ता नहीं था। भूपेश बघेल तो कभी रायपुर संसदीय से लड़े, तो कभी राजनांदगांव संसदीय सीट से।
राष्ट्रीय स्तर पर परदेसिया बहू की सोच भी बड़ा फ्लॉप तर्क रही। सोनिया गांधी को विदेशी मूल का बताते हुए जो एनसीपी बनी थी, वह तो आज कांग्रेस की सबसे करीबी मददगार पार्टी बन चुकी है। यह तर्क फ्लॉप इसलिए रहा कि भाजपा की एक सबसे पूजनीय नेता विजयाराजे सिंधिया नेपाल से शादी होकर भारत आई थीं, इसलिए विदेशी बहू का पूरा तर्क बोगस रहा। अब देश के भीतर किसी को भी बाहरी, परदेसिया या इम्पोर्टेड माल कहना बेकार बात है।
रायपुर के विवाद में कांग्रेसी नेताओं ने बृजमोहन अग्रवाल और सुनील सोनी के छत्तीसगढ़ के बाहर के मूल की बात उठाई है। जिस दिन वे ऐसा बयान दे रहे थे, उस दिन प्रियंका गांधी केरल जाकर मलयाली लोगों के बीच मंच से अंग्रेजी में भाषण दे रही थीं, जिसका मलयाली अनुवाद बगल के दूसरे माईक पर सुनाया जा रहा था। देश के भीतर अब कुछ आहरी-बाहरी नहीं है। जो लोग सोनिया का नाम लेकर राजनीति चलाते रहे, संसद में सिर मुंडाने को तैयार रहे, वे लोग आज उस कमला हैरिस को लेकर खुशी में नाच रहे हैं जो कि भारत से गई हुई एक तमिल महिला से अमरीका में ही पैदा हुई थी। जो बाहर जाकर कामयाब हो जाए वे अमरीकी, और ब्रिटिश भी भारतवंशी, और जो भारत में नहीं सुहाए, वे शादी की आधी सदी बाद भी परदेसी! हालांकि लोगों को इस सिलसिले में जर्सी नस्ल की गाय जैसी भाषा को भी याद रखना चाहिए, उसे भूलना नहीं चाहिए।
अलंकरण और विवाद
छत्तीसगढ़ में इस बार एक वर्ष बाद राज्य अलंकरण दिए जाएंगे। पिछले वर्ष चुनाव होने की वजह से नहीं दिए जा सके थे। वैसे हर पांचवे वर्ष नहीं दिए जा रहे। और जब भी दिए जाते रहे तब तब विवादों में रहे। जिन्हें अलंकरण मिलता वो उनके आसपास के लोग प्रसन्न रहते हैं और सरकार को साधुवाद देते हैं। जिन्हें नहीं मिलता वो पूरी चयन प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े करते हैं। उनका पहला और सीधा लक्ष्य चयन समिति के सदस्य और उनकी सिफारिश होता है। फिर प्रशासकीय विभाग के मंत्री। यह कहते हुए कि मंत्री का समर्थक, करीबी आदि आदि।
बीते 20 वर्षों में सम्मानित लोगों में ऐसे हो भी सकते हैं। खैर, इस वर्ष भी दो पुरस्कार को लेकर ऐसे ही विवाद सुनने में आ रहे हैं। चयन समिति के गठन से लेकर चयनित ग्रहिता को लेकर तरह-तरह की बात सुनने को मिल रही है। पिछले दिनों देर से शुरू हुई चयन समिति की बैठक पहले से लेकर आए नाम पर पल भर में मुहर लगाकर खत्म हो गई। अब नाम को लेकर इतना विवाद हो रहा है कि तरह-तरह के लांछन लग रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि इन पुरस्कारों को इस बार न देने का फैसला लिया गया है। यह सोच कर कि एक साधे सब सधे। न कि एक सधे सब नाराज।
संविदा बंद हो या रिटायरमेंट एज 70 हो
राज्य प्रशासन में संविदा नियुक्तियों को लेकर अधिकारी कर्मचारी विरोध पर उतर रहे हैं। फिलहाल यह विरोध उनके वाट्सएप ग्रुप में चर्चाएं तेज हो रही हैं। इसके मुताबिक राज्य के कुछ अधिकारी कर्मचारी जो अपने संरक्षकों को खुश रखते हैं, वे लगातार 70 सालों तक संविदा नियुक्ति पाने में कामयाब रहते हैं। पदोन्नति के पदों में संविदा नियुक्ति का नियम नहीं है,लेकिन ऐसे लोग बहुतायत में पदोन्नति के पदों पर नियुक्त हो रहे हैं। ऐसा माहौल बनाया जाता है, मानो ये लोग न रहे तो विभाग में ताला लग जाएगा।
चर्चा में लिखा जा रहा है-बाद में यही लोग नियमित पदोन्नति में बाधा खड़ा करने लग जाते हैं, ताकि येन केन प्रकरण इनकी संविदा नियुक्ति बढ़ती रहे।यह उन लोगों के साथ घोर अन्याय है,जो ईमानदारी और स्वाभिमान से सेवा करते हुए 62 साल में सेवा से मुक्त हो जाते हैं। अब समय आ गया है, कि इस घोर असमानता के खिलाफ आवाज उठाया जाना चाहिए। या तो सभी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति 70 साल करना चाहिए। या फिर सभी सेवानिवृत्त लोगों को नियुक्ति के समान अवसर देने संविदा नियुक्ति खुले विज्ञापन के द्वारा की जानी चाहिए।
इसके समर्थन में फेडरेशन के संयोजक भी सहमत हैं कि संविदा नियुक्ति हर स्तर पर बंद होना चाहिए। लिखा जा रहा है- हम इस व्यवस्था का विरोध करते है। लेकिन मैनेजमेंट वाले लोग संविदा नियुक्ति पाने में अभी भी कामयाब हो रहे है। जोरदार विरोध प्रदर्शन करने की आवश्यकता है।
संविदा नियुक्ति की प्रथा जो अभी भी अलग अलग विभागों में चल रही है उसे बंद करने हम सभी को मिलकर रोक लगवाना होगा यदि इसे रोका नहीं गया तो विभागों मे पदोन्नति और सीधी भर्ती की कार्यवाही संपूर्ण रूप से बाधित हो रही है। प्रमोशन के विभागीय पदों पर संविदा/प्रतिनियुक्ति रूप से नियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से हटाने की मांग की जानी चाहिए।
ऐसे जुगाड़ू लोग विभाग में संविदा में आ कर पूरा विभाग को उलझाए रखते है। साथ ही ये वही लोग है जिससे शासन निर्भर होती है और हमारे डीए जैसे प्रमुख अधिकारो से वंचित कराने में उत्तरदायी होते है।इसलिए सेवानिवृत्त अधिकारियों का पदोन्नति के पद पर संविदा नियुक्ति की परंपरा का विरोध होना चाहिए।
भीतरघात से बचने
रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव कांग्रेस गंभीरता से लड़ती दिख रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत रोजाना दक्षिण के नेताओं से रूबरू हो रहे हैं। लगातार बैठकें कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज तो दीवाली के एक दिन पहले दक्षिण के प्रमुख नेता कन्हैया अग्रवाल, प्रमोद दुबे, ज्ञानेश शर्मा सहित कई अन्य प्रमुख नेताओं के घर भी गए।
चर्चा के बीच एक जगह दीपक बैज ने कहा भी बताते हैं कि इस बार पार्टी के खिलाफ काम करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस पर एक नेता ने कह भी दिया,हर बार ऐसा होता है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती है। देखना है कि पार्टी भीतरघात की शिकायत आने पर क्या करती है। फिलहाल तो सभी पार्टी के लिए काम करते दिख रहे हैं।
क्या होली और क्या दिवाली...!
दीपावली भले ही रोशनी और धन-धान्य की पूजा का पर्व हो, लेकिन इस बार जो हुड़दंग और आपराधिक घटनाएं प्रदेश में हुईं, उसने इसे होली की तरह बेकाबू बना दिया। 24 घंटों में हत्या की चार घटनाओं ने रायपुर शहर को दहशत में डाल दिया। इसके अलावा अन्य जिलों में भी हत्या, हत्या की कोशिश, आगजनी जैसी घटनाओं की भरमार रही। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ और कोरबा के पुलिस थानों का रोजनामचा देख लें—कई थानों में तो एक दिन में तीन-चार मामले दर्ज हुए हैं।
इस बार दिवाली की रातें होली से कम नहीं थीं—चाकू, तलवार, नशीले टेबलेट और इंजेक्शन के साथ गिरफ्तारियां होली की याद दिलाती रही। होली में जिस तरह बाइकों पर तीन-चार लोग नशे में रेस लगाते हैं, वही नजारा दिवाली पर भी देखने को मिला। फर्क सिर्फ इतना था कि होली का हुड़दंग दिन में होता है, जबकि इस बार दिवाली की धमाचौकड़ी पूरी रात चलती रही। मोहल्ले-मोहल्ले में देर रात तक पटाखों का शोर जारी रहा, जिससे विवाद भी हुए। पुलिस का रात्रि 10:30 बजे के बाद पटाखे न फोडऩे का नियम हवा में उड़ गया।
जुआ खेलने वालों पर पुलिस ने तो खूब हाथ डाला, पर बरामद रकम का हिसाब कुछ कम ही दिखाई दिया। ऐसा लग रहा है, पुलिस ने अपने अफसरों से तो शाबाशी पा ली होगी, लेकिन जनता का भरोसा जीतने में असफल रही। कानून व्यवस्था को लेकर जनता होली के दिनों जितनी ही चिंतित दिखी। दीपावली की रौनक के बीच कहीं न कहीं डर और अनिश्चितता भी दिखती रही।
दीपावली के दिन हेलोवीन

31 अक्टूबर को दीपावली का पर्व देश भर में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में मनाया गया। पर इस बार दीपावली के ही दिन एक दूसरा पर्व भी आया जिसे हेलोवीन कहा जाता है। हेलोवीन हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसमें लोग एक जगह उत्सव मनाने के लिए इक_े होते हैं। अजीबोगरीब वेशभूषा कुछ उसी तरह से पहना जाता है जैसा भारत में होली के दिन लोग पहनते हैं। ऐसी ही अमेरिका की एक मीडिया सेलिब्रिटी मेगी केलिन ने कचरा उठाने वाले बैग के साथ फोटो खिंचवाई है। भारत, विशेषकर दक्षिण भारत के बड़े शहरों में भी इस नए त्यौहार को मनाने का चलन शुरू हो चुका है।
श्रद्धा धरी रही
कुछ लोगों को इस बात का बड़ा मलाल है कि चुनाव की घोषणा दीवाली के पहले हो गई। अब जिस सीट पर चुनाव है, वहां के दो बड़े उम्मीदवारों पर ही दीवाली का सालाना शिष्टाचार निभाने की जिम्मेदारी आकर टिक गई है। अगर उम्मीदवारों के नाम दीवाली के बाद घोषित होते, तो इन दो के मुकाबले दर्जन भर उम्मीद लगाए संभावित उम्मीदवारों को शिष्टाचार निभाना पड़ता। लेकिन अब दीवाली में असरदार लोगों तक पहुंचने वाले तोहफों की गिनती गिर गई है।
एक बड़े अखबारनवीस इस मलाल में जी रहे हैं कि एक पार्टी के उम्मीद लगाए एक नेता उनसे अपने बड़े नेताओं तक यह सिफारिश करवाना चाहते थे कि वे सबसे काबिल उम्मीदवार रहेंगे। लेकिन जब उम्मीदवार किसी और को बना दिया गया, तो उन्होंने मिठाई का एक छोटा सा डिब्बा पहुंचाने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया। वक्त निकल जाए तो कौन किसे गिनते हैं? और समय रहे तो लोग किसी का हाथ अपने सिर पर रखकर श्रद्धा जताते हैं।
इस बार तस्वीर अलग
रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव पिछले कई चुनावों से अलग है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल यहां का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, और अब पहली बार उनकी गैरमौजूदगी में चुनाव हो रहा है। वैसे तो बृजमोहन अग्रवाल, भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस से अब तक वैसा सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जो उन्हें खुद के चुनाव में मिलता रहा है।
बृजमोहन के चुनाव में कई कांग्रेस पार्षद औपचारिकता निभाते रहे हैं, लेकिन इस बार वो वार्ड में ही मेहनत करते दिख रहे हैं। इसकी वजह यह है कि एक महीने के भीतर उन्हें खुद चुनाव लडऩा है। यदि उनके अपने वार्ड में प्रदर्शन खराब रहता है, तो कांग्रेस उन्हें प्रत्याशी बनाने पर पुनर्विचार कर सकती है। ऐसे में पार्षदों के लिए खुद की परीक्षा की घड़ी भी है। खास बात यह है कि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज लगातार बूथ कमेटियों की बैठक में खुद जा रहे हैं। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है। यह पहला मौका है जब पहली बार बृजमोहन की गैर मौजूदगी में भाजपा को कड़ी टक्कर देते दिख रही है।
मगर मुश्किलें बरकरार

एस आई भर्ती के 975 अभ्यर्थी बाल-बाल बचे। 28 की सुबह दो घंटे की देरी होती तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका लग चुकी होती कि यह कहकर आगामी आदेश तक प्रक्रिया रोकी जाए। रायपुर से चार अभ्यर्थी अपनी याचिका लेकर दिल्ली जा/भेजे जा चुके थे। इस बात कि सरकार को पिछले शुक्रवार को भनक लग चुकी थी। सो मंत्रालय से पीएचक्यू तक आसमान-जमीन एक कर आदेश की नस्तियां लाल- पीली बत्तियां इतनी तेजी से दौड़ाई गई। और सुबह 10.30 बजे चयन सूची जारी करने की खबर वायरल कर दी गई। सारी चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो काम छह वर्ष से रुका पड़ा था।
हाईकोर्ट ने आदेश जारी करने दिए अल्टीमेटम के बाद भी सरकार ने दीपावली बाद का समय देने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट की याचिका में चयनित नामों पर उंगली उठाते हुए याचिका तैयार कर ली गई थी। यह सूची भी बघेल सरकार की पीएससी सूची की ही तरह होने के आरोपों और तथ्य लिए हुए है। कोई किसी, कार्यरत और रिटायर्ड पुलिस अफसर का बेटा बेटी, भांजा भतीजा आदि आदि बताए गए हैं। इन्हें चुनौती देने के लिए पांच लाख की एडवांस फीस देकर कुछ अभ्यार्थी भेजे गए। वकालतनामा भी तैयार था। इससे पहले कि याचिका लिस्ट होती यहां सूची जारी कर दी गई। इस तरह से मोदी की एक और चुनावी गारंटी पूरी हो गई। खतरा अभी टला नहीं है।
अभी इनमें से कई के कैरेक्टर पुलिस वेरिफिकेशन शेष हैं। इसमें यह आवश्यक है कि किसी पर व्यक्तिगत या सामूहिक अपराध, आंदोलन करने, लॉ एंड आर्डर के मामले दर्ज न हो। और ये सभी तो अपने चयन के लिए सीएम हाउस वाले वीआईपी सुरक्षा वाले क्षेत्र में धारा 144 लागू होने के बाद भी धरना प्रदर्शन, गिरफ्तार भी हो चुके हैं। ऐसे में क्लीन कैरेक्टर देने पर भी प्रश्न चिन्ह उठाए जाएंगे। इनमें से जिसके कैरेक्टर पर दाग होगा वो मुश्किल में पड़ जाएंगे।
सत्ता बदली और बोर्ड जख्मी

सत्ता बदलते ही नेताओं की तस्वीरों का गायब होना कोई नई बात नहीं, पर छत्तीसगढ़ के धनवंतरी मेडिकल स्टोर्स पर लगे कुछ होर्डिंग्स में यह परिवर्तन अनूठे ढंग से देखा जा सकता है। ये मेडिकल स्टोर्स पूर्व सरकार द्वारा आम जनता को सस्ते दामों पर दवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से खोले गए थे, जिन पर तत्कालीन मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री की तस्वीरें लगी थीं। लेकिन अब, सरकार बदलने के बाद भी इन होर्डिंग्स को हटाया नहीं गया, बल्कि तस्वीरों को खुरच कर मिटाने की अधूरी कोशिश जरूर हुई है।
बिलासपुर के एक धनवंतरी मेडिकल स्टोर के बाहर लगे इस बोर्ड पर नाम और उद्देश्य का हिस्सा जस का तस बना हुआ है, जबकि तस्वीरों को मिटाने के प्रयास में उसे खुरच दिया गया है। सरकारों के बदलने के साथ ही कई बार योजनाओं और चेहरे भी बदल जाते हैं, पर यहां तस्वीरों के साथ जो सलूक किया गया है उस पर विवाद हो सकता है।
लक्ष्य की होड़ में अनदेखी
मोतियाबिंद का पता चलने पर जल्द ऑपरेशन आवश्यक है, मगर सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर दबाव बनाकर लक्ष्य थोपना एक गंभीर जोखिम है। दंतेवाड़ा जिला अस्पताल में 10 अक्टूबर के बाद ऑपरेशन कराने वाले 39 मरीजों में से 17 में संक्रमण फैल गया, जिसमें से दो मरीजों की आंखों की रोशनी जा चुकी है। अब पता चल रहा है कि यहां के स्टाफ को हर सप्ताह 20 ऑपरेशन करने का लक्ष्य दिया गया था।
कुछ साल पहले तखतपुर में भी इसी तरह के लक्ष्य-निर्धारण ने नसबंदी कांड का रूप लिया था, जिसमें 16 महिलाओं की जान चली गई थी। उस समय शिविर में 200 से अधिक महिलाओं को लाकर जल्दी-जल्दी ऑपरेशन कर घर भेज दिया गया। जांच में पाया गया कि एक ऑपरेशन में मुश्किल से तीन मिनट ही लगे थे। नसबंदी कांड के बाद सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों ऐसे लक्ष्यों को जोडऩे पर रोक लगाई गई थी, मगर अब मोतियाबिंद ऑपरेशनों में वही गलती दोहराई गई।
दंतेवाड़ा अस्पताल में चार ऑपरेशन थिएटर तो हैं, मगर आई वार्ड एक भी नहीं है। अगर ऑपरेशन के बाद मरीजों को डॉक्टरों की निगरानी में कुछ दिन रुकने की सुविधा दी जाती, तो शायद संक्रमण को टाला जा सकता था। जैसे-जैसे इस मामले की जांच आगे बढ़ेगी, इसके पीछे की कई परतें खुलेंगी। फिलहाल दोषी ठहराकर सिर्फ ऑपरेशन करने वाली डॉक्टर और उनकी टीम को निलंबित कर दिया गया है। यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि आखिर बिना पर्याप्त सुविधाओं के दबाव में इतनी जल्दी-जल्दी ऑपरेशन कराने का आदेश किसके द्वारा और क्यों दिया जा रहा था।
यह जीत मामूली नहीं
सब इंस्पेक्टर पद पर 959 चयनित उम्मीदवारों की सूची आखिरकार जारी कर दी गई है। मगर यह अब तक रहस्य बना हुआ है कि सफल अभ्यर्थियों को इंतजार क्यों कराया जा रहा था। रिजल्ट जारी नहीं करने पर मई महीने में हाईकोर्ट ने 90 दिन के भीतर चयन प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। मगर, इस आदेश को सरकार टाल रही थी। 90 दिन बीतने के बाद अभ्यर्थियों ने दबाव बनाना शुरू किया। दो बार उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने आश्वासन दिया कि सूची जल्दी निकाल दी जाएगी। पहली बार उन्होंने 15 दिन की मोहलत मांगी, दूसरी बार उन्होंने समय बताने से मना कर दिया। सरकार के सामने एक विकल्प यह भी था कि वह हाईकोर्ट के आदेश पर रिव्यू पिटिशन ले आती या फिर सुप्रीम कोर्ट चली जाती। मगर, इन दोनों ही स्थितियों में युवाओं के बीच सरकार के खिलाफ संदेश जाता। चयन 959 का हुआ है लेकिन इन चयनित लोगों को उन सैकड़ों दूसरे अभ्यर्थियों का भी कृतज्ञ होना चाहिए, जो आंदोलन में इसलिये शामिल थे कि उन्हें भी अवसर मिल सकता है। अब चयनित युवाओं की मांग मान लेने के बाद सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि फैसला लेने में इतनी देर क्यों हुई?
उल्लू का दिवाली पर दिख जाना

उल्लू को रहस्यमयी और बुद्धिमान पक्षी भी माना गया है, जो अंधकार में देखने की अद्वितीय क्षमता रखता है। यही विशेषता उसे अन्य पक्षियों से अलग बनाती है, और इसके चलते उसे ज्ञान और विवेक का प्रतीक भी माना जाता है। दीपावली की रात, जब सभी लोग रोशनी से अपने घरों को सजाते हैं और लक्ष्मी पूजा करते हैं, यदि उल्लू दिख जाए तो उनका यह विश्वास मजबूत करता है कि मां लक्ष्मी की कृपा बरसने वाली है। कुछ वाइल्डलाइफ फोटोग्रॉफरों पर यह कृपा बरसी है। हाल ही में यह तस्वीर बिलासपुर में नरेंद्र वर्मा ने खीचीं है।
कौन आईपीएस कहां?
छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अफसर अभिषेक शांडिल्य केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट रहे हैं। आईपीएस के वर्ष-07 बैच के अफसर अभिषेक शांडिल्य सीबीआई में रहे हैं, और प्रतिनियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद उन्हें रिलीव भी कर दिया गया है।
शांडिल्य संभवत: नवम्बर में जाइनिंग दे देंगे। इस बैच के अफसर अभी डीआईजी हैं, जो कि जनवरी में आईजी के पद पर प्रमोट हो जाएंगे। इसी बैच के अफसर रामगोपाल गर्ग भी सीबीआई में रहे हैं। वे करीब 7 साल सीबीआई में थे। वर्ष-2007 बैच के अफसरों में दीपक झा, और बालाजी राव भी हैं। गर्ग, और दीपक झा अभी आईजी के प्रभार में हैं। दूसरी तरफ, बस्तर आईजी सुंदरराज पी का केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना टलता दिख रहा है। सुंदरराज एनआईए में जाने वाले थे। मगर केन्द्र सरकार उन्हें बस्तर से फिलहाल हटाने के इच्छुक नहीं दिख रहा है। केन्द्र सरकार ने वर्ष-2027 तक नक्सलियों के खात्मे के लिए टारगेट फिक्स किया हुआ है। इसमें बस्तर आईजी के रूप में सुंदरराज प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
सुंदरराज की बस्तर में पोस्टिंग के बाद से राज्य पुलिस का केन्द्रीय बलों से तालमेल बेहतर हुआ है। केंद्र और राज्य के बेहतर तालमेल से नक्सल मोर्चे पर बड़ी सफलता मिली है। इन सबको देखते हुए सुंदरराज को फिलहाल बस्तर में ही रखने पर सहमति बन रही है। फिर भी आईजी स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं।
बकाया लेन-देन

जैसे जैसे निकाय पंचायत चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, एक नेताजी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। कारण और कुछ नहीं पार्टी फंड की एक बड़ी रकम जो लौटाना है। बड़े ओहदेदार नेताजी से पार्टी नेतृत्व तगादा भी करने लगा है। एक नहीं कई बार-नेताजी जब, जहां मिल जाए। हर बार नेताजी यह कहते बच निकलते हैं, दे दूंगा भाई साहब। फंड सुरक्षित रखा हूं। कुछ हजार, लाख दो लाख होते तो पार्टी नेतृत्व भूल जाता माफ कर देता। लेकिन रकम इससे कहीं अधिक है। एक बड़े निगम से अनुबंधित कंपनियों से मिली इतनी बड़ी रकम से संगठन ने निकाय पंचायत चुनाव की नैया पार लगाने की तैयारी कर रखी है। अब देखना है कि नेताजी से पार्टी फंड वापस लेने में संगठन सफल होता है या नहीं। वैसे नेताजी पर नाइन फिगर में ही एक और लेनदारी की चर्चा आम है। हालांकि वो पुराने बिल पास कराने के लिए व्यक्तिगत रूप से दिए गए थे।
मिठास के इंतजार में गन्ना किसान
छत्तीसगढ़ के शक्कर कारखानों में गन्ना बेचने वाले किसानों का भुगतान कारखाना प्रबंधन द्वारा किया जाता है, जबकि बोनस का भुगतान सरकार की ओर से होता है। हाल ही में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में किसानों को 62 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने का निर्णय लिया गया, जिसके लिए 60 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है।
इधर, कुछ शक्कर कारखानों से खबरें हैं कि कई किसानों के खातों में अभी तक यह राशि नहीं पहुंच पाई है। बैठक में यह भी कहा गया था कि गन्ना किसानों को उनके उत्पाद का 100 प्रतिशत भुगतान पहले ही किया जा चुका है। किसानों को आशा थी कि दीपावली से पहले बोनस भी मिल जाएगा, जिससे वे दोहरी खुशी के साथ त्योहार मना सकें। लेकिन मंत्रिमंडल का बोनस देने का फैसला भी देरी से आया है। अगस्त में हुई बैठक में कृषि पर चर्चा के दौरान निर्णय हुआ था कि गन्ना उत्पादक किसानों को 50-50 किलो शक्कर रियायती दर पर उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन बोनस पर उस समय कोई चर्चा नहीं की गई थी।
यह बोनस वितरण कृषि विभाग के माध्यम से किया जाना है, और हो सकता है कि प्रक्रियाओं में समय लग रहा हो। सरकार की मंशा है कि किसान धान की खेती का रकबा घटाकर अन्य फसलों की ओर बढ़ें। परंतु जिस तरह गन्ना बोनस में देरी हो रही है, उससे लगता है कि कृषि विभाग इस समय 14 नवंबर से शुरू हो रही धान खरीदी की तैयारियों में अधिक रुचि ले रहा है।
कितना लूटोगे सरकार को?

एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देशभर में सक्षम लोगों ने घरेलू गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी का त्याग कर दिया था। इस मुहिम में कई राजनेताओं और समाज के प्रतिष्ठित लोगों ने भागीदारी की, जिससे उनकी समाज में इज्जत और बढ़ी। उस समय आम जनता के लिए त्याग करना मुश्किल था, क्योंकि उस वक्त सब्सिडी का लाभ लगभग 200 रुपये तक होता था।
इधर, वक्त के साथ गैस सिलेंडर की कीमतें लगभग तीन गुना बढ़ गईं और सब्सिडी का लाभ घटते हुए केवल दहाई तक आ पहुंचा। सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी से यह सामने आया कि कुछ लोगों को सब्सिडी में अब मात्र 4-5 रुपये ही मिल रहे हैं। अगर आप आशावादी हैं, तो मान सकते हैं कि एक दिन सब्सिडी की राशि पुराने स्तर पर वापस आ सकती है। अन्यथा, आप चाहें तो गैस कंपनी के पोर्टल या कस्टमर केयर पर एक फोन करके अपनी भी सब्सिडी का त्याग भी कर सकते हैं। ([email protected])
पुनर्वास के रास्ते
विधानसभा चुनाव के बाद से भाजपा में अलग-थलग हो चुके कई नेता अब रायपुर दक्षिण में काम कर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं। ये नेता पार्टी प्रत्याशी का प्रचार करने के इच्छुक हैं। इन्हीं में से एक जगदलपुर के पूर्व विधायक संतोष बाफना को शैलेन्द्र नगर बूथ का प्रभारी बनाया गया है।
बाफना ने विधानसभा आम चुनाव में जगदलपुर से किरणदेव को टिकट देने की खिलाफत की थी, और क्षेत्र छोडक़र चले गए थे। किरण देव अब प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन चुके हैं। इससे परे बाफना को किरणदेव के विरोध की कीमत चुकानी पड़ रही है। उनकी पार्टी में पूछ परख नहीं रह गई है, मगर बृजमोहन अग्रवाल से उनके अच्छे संबंध हैं।
बृजमोहन ने बाफना को बूथ का काम दे दिया है। इसी तरह बड़े व्यापारी नेता, और पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी विधानसभा टिकट नहीं मिलने से काफी खफा रहे हैं। उन्होंने भी आम चुनाव के बीच सुनील सोनी, और बृजमोहन अग्रवाल से मिलकर अपने गुस्से का इजहार भी कर दिया था। सुंदरानी की नाराजगी के बाद भी सभी सीटें रायपुर की चारों विधानसभा सीटेें भाजपा की झोली में चली गई।
सुंदरानी को भी सिविल लाइन इलाके में प्रचार का जिम्मा दिया गया है। इसी तरह महासमुंद के पूर्व विधायक डॉ. विमल चोपड़ा भी रायपुर दक्षिण में सक्रिय हो चुके हैं। रायपुर दक्षिण में इन नेताओं का काम बेहतर रहा, तो संभव है कि कुछ को निगम-मंडल में जगह मिल जाए। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नेताजी की अगली तैयारी
कहा जाता है कि भाजपा, पिछला चुनाव जीतने या हारने के एक वर्ष बाद अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। अपनी इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए संगठन ने काम शुरू कर दिया है। संगठन, हर विधायक, मंत्री सांसद के इलाके में टोह ले रही है कि अगला प्रत्याशी कौन होगा। इसी दौरान संगठन प्रमुखों को पता चला एक अजेय पूर्व मंत्री भी तैयारी में जुट गए है।
भाजपा की यह परंपरागत,पारिवारिक सीट रही है। कहा जा है 2028 के लिए नेताजी, अपनी बेटी को तैयार कर रहे हैं। कर्नाटक के प्रोफेशनल कॉलेज से पढक़र आई बेटी इन दिनों ट्रेनिंग ले रही हैं। इसमें भाषण कला, मांग लेकर आई भीड़ से चर्चा, पहनावे, एप्टीट्यूड आदि-आदि सीख रही हैं। इसकी सूचना पर संगठन प्रमुखों का कहना था कि नेताजी को आभास हो गया है कि अगली बार उनकी संभावना कम ही रहेगी। कहा जा रहा है कि नेताजी अपनी बेटी को लता उसेंडी, अंबिका सिंहदेव, भावना बोहरा, ओजस्वी मंडावी, संयोगिता जूदेव की कतार में लाना चाहते हैं । अब इसके लिए पूरे चार वर्ष इंतजार करना होगा। वैसे नेताजी के दो बेटे हैं लेकिन दोनों ही राजनीति से दूर सफल कारोबारी हैं, उनकी इच्छा भी नहीं हैं।
एक माकूल अवसर और खेमेबाजी
कांग्रेस के लिए इससे माकूल अवसर नहीं हो सकता था। पता नहीं क्यों इसका लाभ उठा नहीं पाई। वह यह कि देश की राष्ट्रपति दो दिनों तीस घंटे तक राजधानी में रहीं। लेकिन छोटे-छोटे मुद्दे पर राजभवन कूच करने वाले कांग्रेस नेतृत्व ने महामहिम से मिलकर प्रदेश की स्थिति पर ध्यानाकृष्ट क्यों नहीं कराया? जबकि पहले दिन तो महामहिम जनसंगठनों से मिली भी। महामहिम से मुलाकात को लेकर संगठन के नेता खेमे के अनुसार जवाब दे रहे। बैज समर्थक कह रहे हैं कि मिलने का समय मांगा था, नहीं मिला।
राजीव भवन में सक्रिय रहने वाले विरोधी इसे खारिज कर रहे। सच्चाई और मन की बात बैज ही जानते हैं। लेकिन एक अवसर चूक गए। प्रदेश की राजनीतिक, प्रशासनिक कानून व्यवस्था पर एक असरदार ज्ञापन देकर माइलेज तो लिया ही जा सकता था। खैर कांग्रेस की ओर से कल नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने प्रोटोकॉल पूरा किया। राष्ट्रपति के सम्मान में आयोजित दोपहर भोज में आमंत्रण पर वे गए। वहां प्रोटोकॉल की व्यवस्था न देख डॉ. महंत, सबसे पीछे भाजपा संगठन के नेताओं के साथ जा खड़े हुए। उन पर नजर पड़ते ही महामंत्री संगठन पवन साय ने पास गए। और महंत से पीछे के बजाए प्रथम पंक्ति में खड़े होने का आग्रह किया। महंत जी मान नहीं रहे थे। इस पर महामंत्री ने प्रोटोकॉल के तहत व्यवस्था कराई और महंत प्रथम पंक्ति में शामिल हुए।
हाथियों की मौत के लिए कौन जिम्मेदार?
छत्तीसगढ़ में खासकर रायगढ़ और सरगुजा जिले में हाथी हाईटेंशन तार की चपेट में आकर अकाल मौत के मुंह में समा रहे हैं। पराकाष्ठा तब हुई जब तमनार क्षेत्र में 25 अक्टूबर की रात एक शावक सहित तीन हाथियों को एक साथ जान गंवानी पड़ी। बीते 10 सालों में 70 हाथी इसी तरह बेमौत मारे जा चुके हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार के ही दो विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। बिजली विभाग चाहता है कि तार ऊंचा और सुरक्षित करने का खर्च उठाए। वन विभाग का कहना है कि बिजली तार को विद्युत विभाग ने बिछाया है, खर्च उसे ही करना चाहिए। इस आनाकानी को लेकर हाईकोर्ट में कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने जनहित याचिका दायर की थी। जिसका निराकरण इसी अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह में हाईकोर्ट ने किया। इसमें वन विभाग और बिजली विभाग दोनों ने ही शपथ-पत्र दिया है। बिजली विभाग तारों को कम से कम 20 फीट ऊंचा उठाएगा। तीन हाथियों की मौत जिस जगह पर हुई है, ग्रामीणों के मुताबिक वहां तार की ऊंचाई बहुत कम थी। 20 फीट ऊंचा होने से हाथी सूंड उठाकर भी तार को नहीं छू सकेंगे। बिजली पोल पर भी 3 से 4 फीट तक चौड़ी कांटेदार तार खींची जाएगी। तारों को कवर्ड कंडक्टर में बदला जाएगा या फिर अंडरग्राउंड केबल बिछाया जाएगा। यही सब करने की मांग वन्यजीव प्रेमी लगातार कर रहे थे। मगर, सरकारी विभागों ने हामी भरने में 7 साल लगा दिए। याचिका पर सात साल से सुनवाई हो रही थी। अभी भी इन तीन मौतों के बाद दोनों ही विभागों ने चुप्पी साधी हुई है कि हाईकोर्ट में उन्होंने जो शपथ दिया है उसके लिए क्या करेंगे। क्या कोई टाइम लाइन तैयार किया है? या फिर हाईकोर्ट में भरी गई हामी केवल रस्मी है? इस रवैये से तो लगता है कि अभी और हाथियों के जान गंवाने की प्रतीक्षा की जा रही है।
ऐसा होता है डिजिटल अरेस्ट

वीडियो कॉल कर रहा व्यक्ति कितना साफ-सुथरी वर्दी में सौम्य चेहरे वाला पुलिस ऑफिसर जैसा दिखाई दे रहा है। पीछे थाने का पूरा सेटअप भी है। टेबल पर ध्वज लगा है। जो व्यक्ति इस कॉल को अटेंड कर रहा है उसे 12 घंटे के भीतर थाना पहुंचने या फिर वीडियो कॉल पर ही बयान दर्ज कराने कहा जा रहा है। जुर्म यह बताया गया है कि उसके फोन का इस्तेमाल महिला उत्पीडऩ और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया गया है। आप भयभीत हो जाएंगे और मामला रफा-दफा करने के लिए 5-10 लाख कॉलर के बताए गए अकाउंट में ट्रांसफर कर देंगे। यही डिजिटल अरेस्ट है। एक शख्स ने कॉल आते ही पहचान लिया था कि यह स्कैम चल रहा है। फिर भी भयभीत होने का नाटक करते हुए कॉलर से लंबी बातचीत की है। सोशल मीडिया पर उसने पूरा वृतांत लिख डाला है और बताया है कि किस तरह से डरा-धमकाकर ये जालसाज वसूली करते हैं।
खराब दौर में 2010 बैच के डीआईजी
राज्य के आईपीएस बिरादरी में डीआईजी स्तर के अफसरों के लिए हाल ही के महीने काफी बुरे साबित हो रहे हैं। पिछले तीन महीनों के भीतर राज्य में हुई घटनाओं के लिए सीधे डीआईजी स्तर के अफसरों को निलंबित अथवा जिले से हटाया गया।
एक बड़ी घटना में बलौदाबाजार हिंसा के मामले में 2010 बैच के आईपीएस डीआईजी सदानंद कुमार पर निलंबन की गाज गिरी। उनके खिलाफ अभी भी विभागीय जांच चल रही है। पिछले दिनों आईजी-एसपी व कलेक्टर कान्फ्रेंस के फौरन बाद मुंगेली एसपी गिरजाशंकर जायसवाल को भी हटा दिया गया। उनकी भी कार्यशैली पर सवाल उठ रहे थे।
इसी बैच के अफसर अभिषेक मीणा पीएचक्यू में डीआईजी हैं। उनके पास भी कोई प्रभार नहीं है। जबकि पिछली सरकार में मीणा राजनांदगांव और रायगढ़ व कोरबा जैसे जिले के एसपी रहे हैं। सरकार बदलने के बाद से वो लूपलाईन में हैं। अब एक ताजा मामले में डीआईजी स्तर के अफसर सूरजपुर एसपी एमआर अहिरे को भी पुलिसकर्मी की पत्नी और बेटी की जघन्य हत्या के मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए पीएचक्यू पदस्थ किया गया है। यह संयोग है कि अहिरे भी 2010 बैच के आईपीएस हैं। वह प्रमोटी आईपीएस हैं।
बताते हैं कि आईपीएस बिरादरी में डीआईजी स्तर के अफसरों पर हो रही सिलसिलेवार कार्रवाई से कई करीबी अफसर हँसी-मजाक में उन्हें पूजा-अर्चना और मंदिरों में माथा टेकने की नसीहत भी दे रहे हैं।
दक्षिण और मुस्लिम
रायपुर दक्षिण में मुस्लिम समाज से कुल 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। मुस्लिम समाज को कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। यही वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस में हडक़म्प मचा हुआ है।
वर्ष-2023 के विधानसभा आम चुनाव में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे लेकिन ढेबर बंधु आखिरी दिन तीन-चार को छोडक़र बाकी सभी के नामांकन वापस करवाने में सफल रहे। कुछ इसी तरह की कोशिश इस बार भी हो रही है लेकिन ऐसा कर पाना कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए आसान नहीं है। कांग्रेस सत्ता में नहीं है, और चर्चा है कि ज्यादातर प्रत्याशी भाजपा के लोगों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में वो आसानी से मान जाएंगे इसकी संभावना कम दिख रही है।
रायपुर दक्षिण में मुस्लिम वोटरों की संख्या सर्वाधिक है, और तकरीबन 25 हजार के आसपास मुस्लिम वोटर हैं। हालांकि पहले भी बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरते रहे हैं, लेकिन सारे मुस्लिम प्रत्याशी मिलाकर पांच हजार के आसपास ही वोट हासिल कर पाते रहे हैं। इस बार क्या तस्वीर बनती है यह तो नाम वापिसी के बाद पता चलेगा।
बड़े-बड़ों को छोटा-छोटा जिम्मा
रायपुर दक्षिण में कांग्रेस, और भाजपा के दिग्गज नेता वार्डों में प्रचार के लिए जा रहे हैं। भाजपा ने तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और मोतीलाल साहू को एक-एक मंडल की जिम्मेदारी सौंप दी है। हरेक मंडल में पांच-पांच वार्ड आते हैं। इन सबके अलावा जिन विधायकों को झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के लिए नहीं भेजा गया है वो सभी रायपुर दक्षिण में प्रचार के लिए जुट रहे हैं।
दूसरी तरफ, कांग्रेस में पूर्व सीएम भूपेश बघेल और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज रोज चुनाव प्रचार की मानिटरिंग कर रहे हैं। इसके अलावा पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू भी प्रचार में जुटेंगे। धनेन्द्र साहू का निवास रायपुर दक्षिण में है, वो सक्रिय भी हैं। इन सबके बीच प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट भी जल्द प्रचार में यहां आएंगे और हरेक मोहल्ले में जनसंपर्क करेंगे। ये सब कार्यक्रम दीवाली के बाद होगा। कुल मिलाकर दीवाली के बाद दक्षिण का चुनावी माहौल गरमाने के आसार हैं।
स्टेशन चकाचक हो जाए तो भी क्या?
295 किलोमीटर लंबी कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल लाइन के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम उठा है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में खनिज विकास निधि सलाहकार समिति की बैठक में भू अर्जन और प्रारंभिक कार्य के लिए 300 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। इस लाइन के लिए आजादी से पहले से मांग उठ रही है। अंग्रेजों ने इसका नक्शा बनाकर काम भी शुरू कर दिया था। यह रेल लाइन कवर्धा, मुंगेली, लोरमी, तखतपुर जैसे इलाकों से गुजरने वाली है, जहां से अभी भाजपा के कई कद्दावर मंत्री और विधायक प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि पूरी परियोजना करीब 5950 करोड़ रुपये की है पर एक शुरूआत हुई है, जिसका श्रेय जनप्रतिनिधि ले सकते हैं।
मगर, एक दूसरी परियोजना और है, जिसके लिए इंतजार लंबा होता जा रहा है। वह है बस्तरवासियों को रेल के जरिये राजधानी पहुंचना सुगम बनाना। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की समिति में कुछ रेल परियोजना के लिए राशि मंजूर की गई, लेकिन उसमें बहुप्रतीक्षित रावघाट-जगदलपुर शामिल नहीं है। मोदी की मौजूदगी में करीब 10 साल पहले 9 मई 2015 को दंतेवाड़ा में इस रेल लाइन के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके लिए बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी गठित की गई थी, जिसमें सेल, एनएमडीसी, इरकॉन और सीएसडीसी शामिल हैं। लंबे समय तक तो इसी बात पर विवाद होता रहा कि किस उपक्रम की कितनी हिस्सेदारी रहेगी। संभवत: यह अब तक हल भी नहीं हुआ है। अभी स्थिति यह है कि इस परियोजना पर सिर्फ दुर्ग से ताड़ोकी तक काम हुआ है। उसके बाद सब ठंडे बस्ते में है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस साल केंद्रीय बजट के बाद एक वृहद प्रेस कांग्रेस वीडियो कांफ्रेंस के जरिये ली थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि छत्तीसगढ़ के लिए 6000 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी गई है, जो अब तक कभी नहीं मिली थी। जब उनसे रावघाट परियोजना पर पूछा गया तो उनकी ओर से अधिकारियों ने यही बताया कि यह अकेले रेलवे का प्रोजेक्ट नहीं है, बाकी निगम, उपक्रमों से बात करनी पड़ेगी। तो स्थिति यह है कि बस्तर को राजधानी से रेल लाइन के जरिये जुडऩे में अभी भी शायद एक दशक या उससे ज्यादा लग जाए। मजे की बात यह है कि अमृत भारत योजना में जगदलपुर रेलवे स्टेशन को शामिल कर यहां 17 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब रेल लाइन की सुविधा ही नहीं देनी है तो इस खर्च का क्या मतलब?
असली घी, नकली घी

गुजरात के गांधीनगर में एक फैक्ट्री में छापा मारकर नकली अमूल घी पकड़ा गया है। इसके बाद लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालकर बता रहे हैं कि बाजार में अमूल ही नहीं कई ब्रांड्स के नकली घी भरे पड़े हैं। इस तस्वीर में एक पैकेट असली है, एक नकली।
बन पाएंगे सक्रिय सदस्य ?
भाजपा का संगठन महापर्व सदस्यता अभियान का पहला और अहम चरण पूरा हो गया है। इसमें 50 लाख से अधिक पुराने सदस्यों का नवीनीकरण और नए सदस्य बनाने का दावा है। दूसरा चरण भी शुरू हो गया है, इसमें एक लाख सक्रिय सदस्य बनाए जाने हैं। संगठन के 404 मंडलों में से हरेक में 200 सक्रिय सदस्य बनेंगे। उसके बाद बूथ समितियों, मंडल, जिला समिति और फिर प्रदेश समिति सदस्य और अंत में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होगा। सक्रिय सदस्य बड़े कांट-छांट के बनाए जाते हैं।
सबसे अहम यह कि सदस्य कितने वर्षों से भाजपा का प्राथमिक सदस्य है। उसकी सक्रियता कितनी रही है। चुनाव के दौरान का आया- राम, गया-राम तो नहीं। यदि है तो वह वेटिंग में रहेगा। विधानसभा चुनाव के पहले से अब तक प्रवेश करने वाले कांग्रेस से आए नेताओं को अभी इंतजार करना होगा। क्योंकि इनकी रेफरल आईडी से कितने नए सदस्य बने होंगे यह भी संदिग्ध हैं।
इनमें राज्यसभा,लोकसभा के पूर्व सांसद, नेता प्रतिपक्ष, एमपी- सीजी में प्रदेश अध्यक्ष, कोर ग्रुप के सदस्य के रूप में जनसंघ, और बाद में स्थापना काल से भाजपा में रहे नंदकुमार साय भी शामिल हैं। वर्ष 22 में भाजपा छोड़ भूपेश बघेल का हाथ थामने वाले साय ने विधानसभा बाद कांग्रेस छोड़ा और पिछले दिनो भाजपा की प्राथमिक सदस्यता का फार्म भरा। उसके बाद उन्हें सक्रिय सदस्य बनाने को लेकर जशपुर जिला संगठन सहमत नहीं है। इसमें सबसे बड़ा रोड़ा, उनके संगठन और सरकार विरोधी बयान बाजी को बताया जा रहा है। चाहे वह रमन सिंह हो या कांग्रेस छोडऩे से पहले बघेल सरकार, वे बयान देते रहे। और अब सक्रिय सदस्य बनने के बाद कुछ दिन महीने शांत रहने के बाद मुंह खोलने लग जाएंगे। जशपुर से लेकर राजधानी तक के संगठन नेता उन्हें नहीं चाहते। सीएम और महामंत्री संगठन दोनों ही जशपुर से ही आते हैं। वे दोनों नंदकुमार साय से ज्यादा जानते हैं। अब देखना है कि नंदकुमार साय सक्रिय सदस्य बनते हैं, या नहीं।
देवतुल्य कार्यकर्ता और बेरुखी

भाजपा ने देश भर में अपने कार्यकर्ताओं को देवतुल्य उपनाम दिया है। संगठन की बैठकों में उनके सुख दुख में सहभागी बनने विधायक, मंत्रियों को विशेष निर्देश दिए जाते हैं। इसके लिए सहयोग (सहायता) केंद्र की भी व्यवस्था की गई है। जहां सरकार के मंत्रियों को बैठकर कार्यकर्ताओं की मांग-समस्या सुनकर दूर करने की जिम्मेदारी दी गई। इसके गवाह के रूप में संगठन ने उपाध्यक्ष,मंत्री आदि भी बिठाए जाते हैं। इस केंद्र में कार्यकर्ता के दो ही मुद्दे बहुतायत में आते हैं। एक, मोहल्ले-वार्ड में सडक़ कांक्रीटीकरण और एक-दो तबादले के आवेदन। मगर कार्यकर्ताओं के ये दोनों काम नहीं हो रहे। कांक्रीटीकरण के प्रस्ताव संबंधित निगम आयुक्तों, सीएमओ महापौरों को भेज दिए जाते हैं।और ट्रांसफर एप्लीकेशन पर मंत्रियों का सीधा जवाब रहता है कि अभी रोक लगी हुई, हटने पर कर देंगे। यह कहकर पीए को आवेदन थमा देते हैं। और अगले ही दो-तीन दिनों में मंत्री के विभाग से तबादला आदेश निकलते हैं लेकिन देवतुल्य कार्यकर्ता का दिया नाम नहीं होता।
यही देवता जब बंगले या फिर साप्ताहिक केंद्र में मंत्री के सामने प्रकट होता है तो समन्वय समिति में होने के जवाब दे कन्नी काट लिया जाता है। यह पुराने ही नहीं नए नवेले मंत्रियों का भी हाल है। ऐसी बेरुखी से कार्यकर्ता भरे पड़े हैं, न जाने किस दिन फट पड़े। आने वाले दिनों में बड़े चुनाव भी है। जो इन मंत्रियों की जमीनी पकड़ का आईना होंगे। कार्यकर्ता आइना लेकर खड़े हैं।
इस बार बदली हुई तस्वीर
दीवाली के बीच रायपुर दक्षिण के चुनाव से भाजपा और कांग्रेस में कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है। हालांकि भाजपा नेता थोड़े ज्यादा उत्साहित थे क्योंकि उन्हें बृजमोहन अग्रवाल के चुनाव प्रबंधन के तौर तरीके मालूम है। बृजमोहन अपने कार्यकर्ताओं की हर जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। वो अपने विरोधी दल के नेताओं का भी ख्याल रखते आए हैं। लेकिन इस बार संशय की स्थिति बन गई है। वजह यह है कि पार्टी संगठन के एक प्रमुख नेता ने भरी बैठक में हिदायत दे रखी है कि इधर-उधर से पैसे नहीं आएंगे। जितना जरूरी होगा, उतना ही खर्च करें। दूसरी तरफ, कांग्रेस में प्रत्याशी ने बैठक में कह दिया कि कार्यकर्ताओं की किसी चीज की कमी नहीं रहेगी। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है। त्यौहार नजदीक है, ऐसे में देखना है कि दोनों दलों के नेता अपने कार्यकर्ताओं की इच्छाओं को पूरा कर पाते हैं या नहीं।
उप चुनाव क्यों हो, कब हो?
यदि रायपुर दक्षिण सीट से भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी चुनाव जीतते हैं तो वे एक विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि बन जाएंगे। पिछले चुनाव में इस सीट पर बृजमोहन अग्रवाल ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी और केबिनेट मंत्री भी बने। लेकिन, उन्हें विधानसभा से हटाकर लोकसभा चुनाव में भेजा गया, जहां नियमों के अनुसार 15 दिन में इस्तीफा देना पड़ा, जिससे उपचुनाव की स्थिति बनी। यह निर्णय भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया गया। क्या विधायक और मंत्री के रूप में बृजमोहन अग्रवाल का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था? मगर लोकसभा भेजकर उनकी काबिलियत पर तो पार्टी ने मुहर लगाई है? क्या उन्हें विधानसभा से हटाकर लोकसभा भेजना दक्षिण रायपुर के जनादेश का अनादर नहीं है? सुनील सोनी को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाना यह दर्शाता है कि भाजपा ने उनकी जनप्रतिनिधि के रूप में क्षमता को स्वीकार किया है। फिर टिकट काटने की नौबत क्यों आई?
विधानसभा चुनाव 2023 में भाजपा ने अरुण साव, गोमती साय और रेणुका सिंह को सांसद रहते हुए विधानसभा टिकट दी, पर वहां उपचुनाव की जरूरत नहीं पड़ी। इसके विपरीत, 2019 में कांग्रेस ने दीपक बैज को विधानसभा टिकट दी, तो उनकी विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा था। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जा रही है। उत्तर प्रदेश की 9 सीटों पर उपचुनावों का कारण भी यही है, जहां कई विधायकों को सांसद की टिकट दी गई। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव भी विधायकी छोडक़र संसद पहुंचे हैं। राहुल गांधी ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ा। उन्होंने वाराणसी सीट बरकरार रखी, वायनाड में उप चुनाव हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी और वडोदरा से चुनाव लड़ा और बाद में वडोदरा से इस्तीफा दिया, जिससे उपचुनाव कराना पड़ा।
दो सीटों पर चुनाव लडक़र एक सीट छोड़ देना या एक सदन से दूसरे सदन में जाने के लिए इस्तीफा देना, यह प्रवृत्ति राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन आम जनता के लिए यह समझ पाना कठिन है कि इसमें उनका क्या लाभ है। 1996 से पहले एक व्यक्ति कई सीटों से चुनाव लड़ सकता था, लेकिन अब अधिकतम दो सीटों पर ही चुनाव की अनुमति है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33(7) को सुप्रीम कोर्ट में भाजपा से ही जुड़े अश्विनी उपाध्याय ने चुनौती दी थी, जिसमें दो जगहों से चुनाव लडऩे का प्रावधान है। चुनाव आयोग ने भी ‘एक व्यक्ति, एक सीट’ की नीति का समर्थन किया, पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून में बदलाव संसद द्वारा होना चाहिए।
दूसरे सदन में जाने के लिए एक सदन से इस्तीफा देना और उपचुनाव की आवश्यकता उत्पन्न करना एक ऐसी स्थिति है जिस पर अभी तक कोई चुनौती नहीं आई है। क्या खर्च उन्हें उठाना चाहिए, जिनकी वजह से उपचुनाव की नौबत आ जाती है? चुनाव खर्च को नियंत्रित करने और वन नेशन वन इलेक्शन की बात करने वाले लोग इस तरह के उपचुनाव से होने वाले संसाधनों और सरकारी धन के अनावश्यक खर्च पर क्या कहेंगे? यह सवाल अभी नहीं तो कभी न कभी उठेगा ही।
हो कहीं भी आग, जलनी चाहिए..

रायपुर के एक शॉपिंग मॉल का यह रेस्टॉरेंट है। गौर से देखें यहां काम करने वाली यह युवती किताब पढ़ रही है। जब ग्राहकों को सर्विस देने के बीच समय मिलता है तो वह बुक पढ़ती रहती है। यह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी कर रही हो, या फिर उसकी दिलचस्पी की कोई किताब हो सकती है। मगर यह उन्हें जरूर सीख दे रही हैं जो पढऩे के नाम कहते हैं, क्या करें समय नहीं मिलता।
नाम भी सही नहीं
छत्तीसगढ़ राज्य गठन को 25 साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन अभी भी कुछ संस्थानों में राज्य के नाम को लेकर मात्रात्मक त्रुटियां सामने आ जा रही है। इन्हीं में से एक रायपुर के सबसे पुराने कॉलेज शासकीय जे योगानन्दम् छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में आंतरिक/प्रायोगिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में छत्तीसगढ़ का नाम गलत छपा है।
छत्तीसगढ़ महाविद्यालय की जगह छत्तसीगढ़ महाविद्यालय छप गया है। हाल यह है कि हजारों उत्तर पुस्तिकाओं में नाम गलत छपे हैं, लेकिन इसको सुधारने के लिए कॉलेज प्रबंधन ने कोई कदम नहीं उठाया है। ऐसा नहीं है कि कॉलेज के प्राचार्य, और अन्य प्रोफेसरों को इस बड़ी चूक की जानकारी नहीं है। कुछ विद्यार्थियों ने भी कॉलेज प्रबंधन का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया है, लेकिन किसी ने इसको गंभीरता से नहीं लिया।
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमिताभ बनर्जी भी रायपुर में पले-बढ़े हैं, और रायपुर विज्ञान महाविद्यालय से स्नातक हैं। वो पूर्व सीएम भूपेश बघेल के कॉलेज के सहपाठी रहे हैं। अब जब उत्तरपुस्तिकाओं में त्रुटि सामने आई है, तो कई ने अलग-अलग स्तरों पर इसकी शिकायत भी की है। देखना है कि त्रुटि सुधारने के लिए कोई पहल होती है, अथवा नहीं।
निगम मंडल की बैलेंस शीट

भाजपा के गलियारों में फिर चर्चा चल पड़ी है कि निगम मंडलों में नियुक्तियां फरवरी के बाद। निकाय-पंचायत चुनावों में नेताओं के परफार्मेंस देखकर सरकारी कुर्सियां भरी जाएंगी। यह तो हुई कार्यकर्ताओं और मीडिया सबको बताने वाली बात। जो न बताने वाली बात है वो यह है कि भार साधक मंत्री ही नहीं चाहते कि अपने विभाग के बड़े बजट के उपक्रमों पर दूसरा सक्षम प्राधिकार बैठे। सही है, उपक्रमों की गाडिय़ां, निजी घरेलू, काम के लिए स्टाफ खर्च के लिए बजट आदि-आदि। जो हाथ से निकल जाएगा। ऐसे बड़े उपक्रम हैं-भवन सन्निर्माण कर्मकार मंडल, श्रम कल्याण मंडल, आबकारी निगम, ब्रेवरेज निगम, पर्यटन मंडल, बीज निगम नान, मार्कफेड, सडक़ विकास निगम, क्रेडा, वन विकास निगम आदि। इसलिए जब जब प्रभारी जी के साथ नियुक्ति पर रायशुमारी होती मंत्री तपाक से औचित्य के प्रश्न उठा देते हैं। और भार साधक मंत्री होने के नाते काम करने से हो रहे स्थापना व्यय की बचत का लाभ हानि का बैलेंस शीट, पटल पर रख देते। वह भी कांग्रेस शासन काल का। ऐसी तीन बैठकें हो चुकी हैं और हर बार मंत्रियों की जीत होती रही।
तबादले और इमोशनल जस्टिफिकेशन

पिछले दशक में एक फिल्म आई थी देव-डी। इस फिल्म को हीरो अभय देयोल (सुपुत्र धर्मेन्द्र ) एक गाना गाते हैं तौबा तेरा जलवा तौबा तेरा प्यार, तेरा इमोशनल अत्याचार। यह पंक्ति इसलिए याद कर रहे कि आज सरकार के मंत्रियों की हालत, गिटार लेकर गाने वाले अभय देयोल जैसी ही है। बस वे गा नहीं पा रहे। सभी मंत्री, एक सचिव मैडम से कुछ ऐसे ही परेशान हैं। मंत्री तबादले की बात या हुए तबादले रद्द करने कॉल करते हैं तो मैडम के इमोशनल स्पीच, तर्क सुनकर स्विच आफ करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। पड़ोस के जिले के पहली बार बने एक मंत्री के साथ ऐसा ही हुआ। मंत्रीजी ने डीईओ साहब का तबादला रद्द करने मैडम को कॉल किया। शुरूआती शिष्टाचार के बाद मंत्री ने कॉल करने का मुख्य सबब बताया। इस पर मैडम ने जो कहा, उसे यहां पढ़ें और महसूस करें--
सर मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूं। आप कांग्रेस की लहर जैसे माहौल में जीतकर आए। जनता आप में विकास पुरुष देखती है। आपने चुनावों में वादे (निर्माण कार्य गिनाते हुए) भी किए हैं। इनमें से एक महिलाओं को सुरक्षा और राहत देने शराब की अवैध बिक्री, कोचियों को समाप्त करना भी है। सीएम साहब इसी पर प्लानिंग के साथ काम कर रहे हैं। ये तबादले पूरी जांच के बाद किए गए हैं। डीईओ पर बहुत सी शिकायतें रहीं, मैने स्वयं छापेमारी में पकड़ा है। ऐसे ही अवैध धंधे को खत्म कर खजाने में राजस्व लाना है। अप्रैल से सितंबर तक खजाने को 200-200 करोड़ की चपत लग चुकी है। ये पैसे आते तो आपके क्षेत्र में सडक़, पुल पुलिया, सीसी रोड़, व्यपवर्तन योजना,आगजनी के शिकार भवन बन जाते। आपके किए कुछ वादे अभी 6-8 महीने में ही पूरे हो जाते। लेकिन डीईओ की वजह से राजस्व हानि हुई, और वित्त विभाग ने आपके प्रस्ताव अगले बजट के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब आप ही बताइए ऐसे विकास रोधी अफसर का तबादला रद्द करना ठीक रहेगा क्या?
इसके बाद तो मंत्री जी के पास कोई किंतु-परंतु का भी अवसर नहीं रह गया था। मैडम को अब तक अलग-अलग डीईओ के तबादले रुकवाने सरकार के आधे मंत्री ऐसे कॉल कर चुके हैं।
तकनीक से पीछे हटने का सवाल
डिजिटल क्रांति आने के बाद अनेक नए काम धंधे लोगों को मिले हैं तो कई का कामकाज चौपट भी हो गया है। ऐसा ही खतरा जमीन का पंजीयन कराने वाले दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प वेंडर्स के सामने मंडरा रहा है। छत्तीसगढ़ देश का दूसरा राज्य होगा जहां जमीन, मकान, दुकान की रजिस्ट्री घर बैठे करने की सुविधा दी जा रही है। सारे दस्तावेज, शुल्क ऑनलाइन जमा हो जाएंगे, यहां तक कि गवाहों को भी रजिस्ट्री दफ्तर जाने की जरूरत नहीं। इसी महीने 10 अक्टूबर को मध्यप्रदेश में यह सुविधा वहां के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक समारोह में किया था। वहां इसे संपदा 2.0 नाम दिया गया है। छत्तीसगढ़ में सुगम ऐप लॉंच किया गया है। दस्तावेज लेखकों, स्टांप वेंडरों की चिंता जायज है लेकिन जब इंटरनेट और स्मार्ट फोन आने के बाद पेपरलेस काम सभी क्षेत्रों में बढ़ रहा है। बहुत सी सरकारी सेवाएं अब ऑनलाइन हो चुकी है। पटवारी रिकार्ड डिजिटली उपल्ध हैं। लोगों के खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर हो रहे हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मितानिन अपनी रिपोर्ट ऑनलाइन जमा कर रहे हैं। कुछ जगहों पर शिक्षकों की उपस्थिति भी ऑनलाइन दर्ज की जा रही है। उनके विभागीय आवेदनों को तो पूरी तरह ऑनलाइन कर ही दिया गया है। पिछली सरकार के समय बताया गया था कि करीब 100 तरह की सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं। एक समय एसटीडी-पीसीओ बूथ में कतारें लगती थीं लेकिन सस्ती मोबाइल कॉलिंग सुविधा मिलने के बाद यह कारोबार बैठ गया। अब जब लोग टीवी चैनल सेटअप बॉक्स में देखने के आदी हो रहे हैं तो केबल तार का जाल सिमट रहा है। प्रदेश में करीब 25 हजार वेंडर और दस्तावेज लेखक हैं। कुछ लोग तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही काम करते आ रहे हैं। कुछ इतने बुजुर्ग हो चुके हैं कि नया काम शुरू नहीं कर सकते। हड़ताल के बावजूद इस बात के आसार कम दिख रहे हैं कि सरकार अपने कदम वापस लेगी। वेंडरों की एक मांग जरूर है कि ऑनलाइन रजिस्ट्री के लिए भी लाइसेंस सिस्टम हो और आईडी देकर उनके माध्यम से काम कराया जाए।
असली वजह सीएम को पता
जशपुर कलेक्टर रवि मित्तल को साय सरकार की छवि बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। मित्तल को आईजी रैंक के अफसर मयंक श्रीवास्तव की जगह जनसंपर्क आयुक्त बनाया गया है। मयंक को 9 महीने में ही बदल दिया गया। इससे परे रवि मित्तल ने जशपुर में कई बेहतर काम किए हैं। उनके प्रयासों से जशपुर का मयाली डैम एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो चुका है।
सीएम विष्णुदेव साय ने सरगुजा प्राधिकरण की पहली बैठक कल मंगलवार को मयाली में ली थी। सीएम, और प्राधिकरण के सदस्य मयाली पहुंचे, और वहां बोटिंग भी की। थोड़े समय में प्रदेश के सबसे बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में मयाली की पहचान बन गई है। इसमें रवि मित्तल की भूमिका अहम रही है। सीएम, और प्राधिकरण के सदस्यों ने मयाली के विकास कार्यों की काफी तारीफ भी की। और फिर रायपुर पहुंचते ही सीएम ने रवि मित्तल को जनसंपर्क आयुक्त का दायित्व सौंपकर सरकार की साख बनाने का अहम जिम्मा सौंप दिया।
मयंक श्रीवास्तव को कुल 9 महीने में हटाने की असली वजह सीएम को ही पता होगी, लेकिन लोगों का क्या है, लोगों का काम है कहना, समझदार का काम है किसी बात पे भरोसा न करना।
बाकी का हिसाब-किताब

प्रशासनिक फेरबदल के कुछ और अफसर प्रभावित हुए हैं। इनमें से वर्ष-2013 बैच के अफसर जगदीश सोनकर, और कुमार विश्वरंजन भी हैं। जगदीश सोनकर स्वास्थ्य मिशन में एमडी थे। जबकि कुमार विश्वरंजन जिला पंचायत सीईओ दंतेवाड़ा के पद पर रहे हैं। दोनों को हटाकर मंत्रालय में पोस्टिंग तो कर दी गई है, लेकिन कोई विभाग नहीं दिया गया है।
दूसरी तरफ, सचिव स्तर के अफसर नीलम नामदेव एक्का पिछले दो महीने से बिना विभाग के मंत्रालय में हैं। एक्का बिलासपुर कमिश्नर के पद पर थे, और फिर उन्हें हटाकर मंत्रालय में पदस्थ किया गया। इसके बाद से खाली बैठे हैं। हालांकि इससे पहले भी कई अफसरों को पोस्टिंग के लिए महीने भर इंतजार करना पड़ा है। मगर नीलम नामदेव एक्का का इंतजार थोड़ा लंबा हो गया है। देखना है कि एक्का, और बाकी दोनों अफसरों को कब तक पोस्टिंग मिलती है।
दक्षिण और कांग्रेस

आखिरकार प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष आकाश शर्मा को रायपुर दक्षिण से कांग्रेस प्रत्याशी बना दिया गया है। पार्टी के भीतर एक सहमति बन गई थी कि किसी ब्राह्मण चेहरा को ही प्रत्याशी बनाया जाएगा। कई नामों पर चर्चा के बाद नगर निगम के सभापति प्रमोद दुबे और आकाश शर्मा ही रेस में बाकी रह गए थे।
प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने साफ तौर पर किसी नए चेहरे को टिकट देने की वकालत की थी, और उन्होंने आकाश शर्मा का नाम सुझाया था। प्रमोद दुबे के खिलाफ एक गई कि लोकसभा चुनाव में सुनील सोनी के मुकाबले हार का अंतर काफी बड़ा था। सुनील सोनी को 60.01 फीसदी वोट मिले थे, जबकि प्रमोद दुबे को 35.07 फीसदी वोट मिले।
लोकसभा चुनाव में मोदी लहर की तर्कों से हाईकमान सहमत नहीं दिखा। प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने भी आकाश के नाम की वकालत की, और फिर पार्टी ने इस पर मुहर लगा दी। आकाश कांग्रेस के उत्तरप्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव राजेश तिवारी के दामाद हैं। गौर करने लायक बात यह है कि आकाश एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं, और इसी एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष और महासचिव सूरजपुर में दोहरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी हैं। खास बात यह है कि कन्हैया अग्रवाल पिछले चुनावों में सबसे कम वोटों से हारने वाले प्रत्याशी थे, लेकिन पार्टी ने उनकी भी दावेदारी को नजरअंदाज कर दिया। अब टिकट से वंचित प्रत्याशियों का फेसबुक पर दर्द झलका है। कन्हैया ने लिखा कि द्वंद कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए, तू भी है राणा का वंशज, फेंक जहाँ तक भाला जाए..। प्रमोद दुबे ने लिखा कि न पाने की चिंता न खोने का डर है, जिंदगी का सफर, अब सुहाना सफर है। दोनों का क्या रुख रहता है यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
आसान होगा सट्टा किंग को भारत लाना ?
महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप के जरिये 6000 करोड़ रुपये के मनी लॉंड्रिंग और फ्रॉड के आरोपी सौरभ चंद्राकर को दुबई में गिरफ्तार तो कर लिया गया है लेकिन भारत लाने का काम कम पेचीदा नहीं है। यह कहा जा रहा है कि उसे बहुत जल्द भारत लाया जाएगा लेकिन इसकी प्रक्रिया ढेर सारी है। चंद्राकर को प्रवर्तन निदेशालय की ओर से किए गए अनुरोध के बाद इंटरपोल की तरफ से जारी वारंट के तहत गिरफ्तारी की गई है पर इसे सीधे ईडी को सौंपा नहीं जाएगा। भारत सरकार को अपने राजनयिक के माध्यम से यूएई से प्रत्यर्पण का अनुरोध किया जाना है। ईडी सीधे यह अनुरोध नहीं कर सकती। फिर यह मामला वहां की अदालत को देखना है कि उसे प्रत्यर्पण की मांग उचित लगता है या नहीं। अदालत के संतुष्ट होने के बाद भी अंतिम फैसला सरकार लेगी। भारत और यूएई के बीच प्रत्यर्पण संधि है, जिसके तहत वे अपराधियों को उस देश में सौंप सकते हैं, जहां अपराध किया गया है। यहां तक कि 2011 में किए गए समझौते के तहत दोनों देश सजायाफ्ता कैदियों को सौंप सकते हैं, बशर्ते उसके खिलाफ अन्य कोई मामला लंबित न हो। अब तक जो खबर है कि उसके मुताबिक यूएई सरकार के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए सौरभ चंद्राकर व पूरे केस का अंग्रेजी और अरबी में अनुवाद किया जा रहा है। ये दस्तावेज भी गृह मंत्रालय के माध्यम से जमा किए जाएंगे। अभी तक यह खबर नहीं है कि क्या ये दस्तावेज गृह मंत्रालय को मिल गए और यूएई को सौंप दिए गए? लोग तो यह भी दावा कर रहे हैं कि यदि प्रक्रिया में देर हुई तो सौरभ चंद्राकर जमानत के लिए भी अर्जी लगा सकता है। भारत के दुनिया के 47 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि है। इनमें से एक ब्रिटेन भी हैं। प्रत्यर्पण संधि होने के बावजूद नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकसी को वहां शरण मिली हुई है। कुछ के बारे में कहा जा चुका है कि वे ब्रिटेन भी छोड़ चुके हैं। भारत में भगौड़ा घोषित होने के बावजूद ब्रिटेन ने उन्हें जाने दिया। सौरभ चंद्राकर जितना बड़ा सट्टे का साम्राज्य खड़ा कर चुका है, कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि वह भी भारत आने से बचने के लिए ऐसे पैतरें आजमाए।
एसी का कंबल कितना साफ?

रेलवे के वातानुकूलित डिब्बों में यात्रियों को ऊनी कंबल दिए जाते हैं। एक आरटीआई के जवाब में रेलवे ने बताया है कि ये कंबल महीने में केवल एक बार धुलवाये जाते हैं। हालांकि इस जवाब में यह भी दावा किया गया है कि चादर और तकिये का कव्हर हर बार इस्तेमाल के बाद धोया जाता है। जो एसी बर्थ साफ-सुथरा दिखाई देते हैं उनमें रेलवे ऐसे कंबल यात्रियों को दे रही है जो 15-20 या उसके अधिक बार किसी दूसरे यात्री के काम आ चुका है। यदि आपको अपनी सेहत और स्वच्छता की चिंता है तो या तो अपने साथ कंबल लेकर जाएं या फिर सिर्फ चादर ओढक़र ठंड बर्दाश्त करने की हिम्मत रखें।
बिना भूतपूर्व काफी हैं
रायपुर पश्चिम के विधायक, और पूर्व मंत्री राजेश मूणत अब पूर्व मंत्री कहे जाने पर खिसियाने लगे। सोमवार को रायपुर दक्षिण विधानसभा चुनाव प्रचार की तैयारी बैठक में मूणत ने कह दिया, कि उन्हें पूर्व मंत्री नहीं बल्कि सिर्फ विधायक ही कहा जाए।
मूणत ने आगे साफ कर दिया कि उन्हें कोई समस्या नहीं है, बल्कि उनका सारा काम सांय-सांय हो रहा है। मूणत के भाषण पर कार्यकर्ताओं ने तालियां भी बजाई। भाजपा विधायक दल में मंत्री पद के दावेदार काफी हैं। ऐसे में ज्यादा उम्मीद पालना भी ठीक नहीं है। वैसे भी सीनियर विधायकों का अपना महत्व रहता ही हैै। मूणत की प्रतिष्ठा का मुद्दा, स्कायवॉक तो सरकार ने आगे बढ़ाने का टेंडर निकाल ही दिया है।
कांग्रेस की प्रयोगशाला
सांसद बृजमोहन अग्रवाल अब तक 8 बार विधानसभा चुनाव जीते हैं। बृजमोहन संभवत: अकेले ऐसे प्रत्याशी रहे हैं जिनके खिलाफ हर बार कांग्रेस ने नया प्रत्याशी दिया है। इस बार भी सुनील सोनी के मुकाबले कांग्रेस नया प्रत्याशी उतार रही है।
बृजमोहन ने सबसे पहला चुनाव स्वरूपचंद जैन के खिलाफ लड़ा था, और 3 हजार से भी कम वोटों से जीते थे। इसके बाद स्वरूपचंद जैन ने चुनाव लडऩे से मना कर दिया, और फिर राजकमल सिंघानिया उतरे। सिंघानिया के बाद पारस चोपड़ा को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया। दिलचस्प बात यह है कि ये सभी पराजित प्रत्याशी दोबारा टिकट की मांग नहीं की, और क्षेत्र से कट गए।
राज्य बनने के बाद पूर्व उप महापौर गजराज पगारिया चुनाव मैदान में उतरे। पगारिया के बाद योगेश तिवारी, और फिर डॉ. किरणमयी नायक को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया। इसके बाद वर्ष-2018 में कन्हैया अग्रवाल को पार्टी ने टिकट दी। कांग्रेस के पक्ष में हवा थी फिर भी कन्हैया चुनाव हार गए। कन्हैया तकरीबन 15 हजार वोटों से चुनाव हारे। इसके बाद 2023 में महंत रामसुंदर दास को टिकट मिली। उन्हें सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा।
दिलचस्प बात यह है कि कन्हैया को छोडक़र बृजमोहन को हराने वाला कोई भी उम्मीदवार क्षेत्र में सक्रिय नहीं रहा। यही वजह है कि बृजमोहन अग्रवाल के लिए एक तरह से खुला मैदान ही रहा। अब कन्हैया सक्रिय थे, लेकिन पार्टी ने उनका नाम आगे नहीं बढ़ाया। ये अलग बात है कि बृजमोहन अग्रवाल चुनाव मैदान में नहीं है। देखना है आगे क्या होता है।
ओहदा पहले पदोन्नति बाद में

राज्य पुलिस सेवा के वरिष्ठतम अफसरों को आईपीएस अवार्ड होने में अभी कुछ लंबा इंतजार करना होगा। कम से कम दो, तीन वर्ष । क्योंकि पूर्व में प्रमोटियों के रिटायरमेंट में इतना समय शेष है। ऐसे में इन वरिष्ठतम अफसरों ने यह युक्ति निकाली, और सरकार ने भी मंजूरी दे दी। कोयला घोटाले की वजह से वैसे बीते तीन चार वर्ष में आईएस अवार्ड के दावेदार राज्य प्रशासनिक सेवा वाले भी ऐसे ही पिछड़ गए हैं। अब राज्य सेवाओं के दोनों कैडर बराबर खड़े हो गए हैं।
रापुसे अफसरों की बात करें तो 1998-99 बैच के प्रफुल्ल ठाकुर और विजय पांडे 2022,23 के सलेक्शन लिस्ट में अब आए हैं। और इनके बाद देवव्रत सिरमौर,श्री हरीश, राजश्री मिश्रा,श्वेता सिन्हा की बारी है। उनके बाद विनय बैस से सुजीत कुमार के बैच की। इनके आईपीएस अवार्ड के लिए कम से कम तीन वर्ष लगेंगे। हालांकि ये सभी आईपीएस के समकक्ष कि वेतनमान पा ही रहे हैं। केवल एसपी के अंडर से निकलना चाह रहे थे। सो पूरी योजना बनाकर सरकार से चर्चा की गई और मिल गई हरी झंडी। ये सभी अब एसपी स्तर का पद सम्हालेंगे, और अवार्ड का इंतजार करेंगे। वैसे ऐसी अघोषित पदोन्नति की शुरुआत रमन सरकार ने की थी और फिर बघेल सरकार ने आगे बढ़ाया। इस आदेश के बहाने इनमें से कुछ राजधानी लौटने में सफल रहे। यह कहते हुए कि पिछली सरकार में प्रताडि़त रहे हैं।
बिना खर्च प्रमोशन

जब पदोन्नति की बात आई है तो अन्य विभागों पर भी बात कर लें। जहां सबसे बड़ा पेंच आरक्षण को बताया जाता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट ने 2019 में ही कह दिया था कि हमारे अगले अंतिम आदेश तक अंतरिम पदोन्नति दी जा सकती है। इसके बाद सभी विभागों में भृत्य से लेकर डिप्टी कलेक्टर स्तर के ग्रेड-1 के पदों पर पदोन्नति दी गई, और दी जा रही है। केवल दोनों शिक्षा विभागों को छोडक़र। स्कूल शिक्षा में 2011 के बाद से लेक्चरर से प्रिंसिपल, उप संचालक से संयुक्त संचालक की पदोन्नति लटकी पड़ी है। तो उच्च शिक्षा में सहायक प्राध्यापक से प्राध्यापक,और प्राध्यापक से प्राचार्य। स्कूलों में 3734 तो 300 से अधिक कॉलेज प्राचार्य विहीन।
फील्ड में इस संवर्ग के लोगों का कहना है कि पहले से इस ग्रेड में पदोन्नत और मंत्रालय, संचालनालय में कार्यरत उनके अपने ही लोग, निचले क्रम के लोगों की पदोन्नत होने देना नहीं चाहते। जबकि दोनों ही विभागों पर एक रूपए का व्यय भार नहीं आना है। सभी समकक्ष वेतन पा ही रहे हैं। इसलिए वे पहले आरक्षण का पेंच लाते रहे और अब क्वांटिफायबल डाटा आयोग की रिपोर्ट की फांस। बस, वरिष्ठता को प्राप्त ये शिक्षक, प्रोफेसर केवल प्राचार्य के रूप में आत्म संतुष्टि के लिए पदोन्नति चाहते हैं। सरकार चाहे तो तदर्थ पदोन्नति दे दे या वरिष्ठता के आधार पर उनके नाम के आगे प्राचार्य का पदांकन कर दे। इस विकल्प के साथ स्कूलों के व्याख्याता, जल्द सरकार से मिलने जाएंगे।
सुनील सोनी से कहीं ख़ुशी कहीं गम
सुनील सोनी के प्रत्याशी घोषित होने के बाद से भाजपा के अंदरखाने में काफी हलचल है। टिकट के बाकी दावेदार नाखुश हैं। हालांकि सोनी, और अन्य पदाधिकारी उन्हें मनाने की कोशिश में लगे हैं। कुछ ने तो संगठन नेतृत्व से मिलकर खुद के लिए झारखंड, और महाराष्ट्र में चुनाव ड्यूटी मांग ली है।
दरअसल, टिकट से वंचित इन नेताओं को निगम-मंडलों में पद की आस है। इस वजह से ये नेता सार्वजनिक तौर पर प्रतिक्रिया से बच रहे हैं। सांसद बृजमोहन अग्रवाल को टिकट के दावेदारों की नाराजगी का अहसास भी है। यही वजह है कि बृजमोहन खुद नाराज नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। इनमें से एक-दो को तो वो मनाने में कामयाब भी हो चुके हैं। कुछ तो सोनी के साथ फोटो खिंचवा चुके हैं।
टिकट के दावेदारों में एक रमेश ठाकुर ने सुनील सोनी को विजयी बनाने के लिए वाल राइटिंग भी कराना शुरू कर दिया। टिकट के लिए जो मजबूत दावेदार माने जा रहे थे उनमें मनोज शुक्ला हैं। मनोज ने भी फेसबुक पर लिखा है कि कार्यकर्ताओं के मसीहा सुनील सोनी रायपुर दक्षिण के उम्मीदवार, अब की बार एक लाख पार। सुनील सोनी के करीबियों का मानना है कि जल्द ही सभी नेता प्रचार में जुटेंगे। वाकई ऐसा होगा, यह देखना है।
रिकार्ड बनेगा या बदला

दक्षिण के दंगल में रिकॉर्ड बनेगा या बदला यानी (एवज)मिलेगा, यह ठीक एक माह बाद पता चलेगा। यह दोनों तभी संभव है जब कांग्रेस से प्रमोद दुबे को टिकट मिल जाएगी। डिटेल यह है कि 2019 के लोस चुनाव में सुनील सोनी ने प्रमोद दुबे को सवा तीन लाख वोटों से हराया था। और अब दोनों फिर से आमने-सामने होने वाले हैं। सोनी जीते तो एक ही प्रतिद्वंद्वी को दो बार हराने का रिकार्ड बनेगा। यदि प्रमोद जीते तो लोस में हार का विधानसभा में बदला लेंगे।
जैसा पूर्व विधायक, सांसद बृजमोहन अग्रवाल कह रहे हैं कि दक्षिण को दो विधायक मिलेंगे। नतीजे प्रमोद के फेवर में रहे तो वे दो पर जीत दर्ज करेंगे। क्योंकि प्रमोद, बृजमोहन से भी हार चुके हैं। वैसे सोनी एक रिकार्ड और बना सकते हैं, वो यह कि दक्षिण में जीत कर महापौर, सांसद और विधायक तीनों बनेंगे। लेकिन प्रदेश उपाध्यक्ष सोनी, पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाएंगे। सरोज एक ही कार्यकाल में तीनों पद पर रहीं हैं।
श्रीनिवास की राह आसान नहीं

राष्ट्रीय वन खेल उत्सव का समापन हो गया। यह उत्सव अपने खर्चों के लिए ज्यादा चर्चा में रहा। विभाग के एक बड़े अफसर ने अपने बैचमेट के रुकने-ठहरने की व्यवस्था सबसे महंगे मेफेयर होटल में की थी। जबकि उनसे सीनियर कई अफसर अपेक्षाकृत छोटे होटल में रुकवाया गया था। खेल उत्सव के समापन के बीच हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव ने केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन किया है।
चर्चा है कि राज्य सरकार ने इसकी अनुशंसा भी की है। उनका नाम डीजी फॉरेस्ट के लिए चर्चा में है। हालांकि इस पद के लिए देशभर के कुल 25 आईएफएस अफसर दौड़ में हैं। राव के लिए थोड़ी दिक्कत यह हो सकती है कि आरा मशीन घोटाला प्रकरण में विधानसभा की लोक लेखा समिति उन्हें (राव) बरी करने के खिलाफ राज्य सरकार से कारण पूछ रही है।
यही नहीं, हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले राव की हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान इस बात पर नाराजगी जताई थी कि सरकार कोई जवाब नहीं दे रही है। अगले महीने इस पर फैसला आ सकता है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
ग्रह नक्षत्र का चक्कर

प्रदेश में कानून व्यवस्था और प्रशासनिक अराजकता की चर्चाओं के बीच खबर है कि एक वरिष्ठ नेता ने ज्योतिषी और तांत्रिक की राय ली थी। यह खबर थोड़ी पुरानी है। दरअसल, लगातार ऐसी घटनाएं हो रही थीं कि पूरी पार्टी और सरकार पर उंगलियां उठ रही थी। विपक्ष ने भी बड़े जोर शोर से मुद्दा उठाया। ऐसा लग रहा था कि सरकार में बड़ा बदलाव होने वाला ही है। ऐसे में एक नेताजी की पत्नी ने सिद्ध तांत्रिक से बात की। तांत्रिक ने जो भी विधि बताई, उसका असर अब दिख रहा है। विपक्ष के विरोध के केंद्र में अब कोई और है। तंत्र क्रिया के बाद नेताजी सेफ हो गये हैं। अब जो नेता निशाने पर हैं, उन्हें भी अपना ग्रह नक्षत्र एक बार शांत करा लेना चाहिए। क्या पता चुनाव के बाद क्या बदलाव हो जाए।
उड़ान इतनी तेज भी नहीं..
उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) योजना की सातवीं वर्षगांठ पर कल अंबिकापुर के मां महामाया एयरपोर्ट से हवाई सेवा का उद्घाटन कर दिया गया। उद्घाटन पहले हो गया लेकिन नियमित उड़ानों का कोई शेड्यूल जारी नहीं किया गया है। ऐसे उद्घाटन का औचित्य ही लोगों को समझ नहीं आया। हरी झंडी तो तभी दिखाई देनी चाहिए, कोई सुविधा शुरू हो रही हो। मगर शायद वर्षगांठ को यादगार बनाने के लिए ऐसा कर दिया गया। इस मौके पर केंद्र के उड्डयन मंत्रालय ने सात वर्षों की उपलब्धियों का खाका जारी किया है। इसमें बहुत सी उपलब्धियों के साथ बताया गया है कि घरेलू उड़ानों को प्रोत्साहन देने के लिए कितनी तरह की रियायतें दी जा रही हैं। यह भी कहा गया है कि देश में एयरपोर्ट की संख्या दस वर्षों में 74 से बढक़र 157 हो गई है। इनमें बिलासपुर और अंबिकापुर जैसे एयरपोर्ट भी शामिल हैं। अंबिकापुर जहां से यात्री सेवाएं शुरू ही नहीं हुई हैं और उद्घाटन कर दिया गया है। कौन सी उड़ानें, कहां की उड़ानें कब शुरू होंगी पता नहीं है। बिलासपुर से यात्री विमान सेवा चालू है लेकिन यहां से उड़ानों की संख्या इतनी अनियमित है कि बिलासपुर व सरगुजा संभाग के लोग रायपुर से ही फ्लाइट लेना पसंद करते हैं। यहां पर एयरपोर्ट की जमीन का एक बड़ा हिस्सा रक्षा मंत्रालय के कब्जे में है। इसके लिए अदालत से लेकर सडक़ तक लड़ाई लड़ी जा रही है ताकि 3सी और 4सी विमानों को उतारा जा सके। नाइट लैंडिंग की सुविधा पर भी हाईकोर्ट के निर्देश पर काम हुआ है पर इसके उपकरण अब तक नहीं लगे हैं। न बड़े हवाई जहाज यहां से उड़ान भर सकते और न ही रात में ऑपरेशन किया जा सकता। उड्डयन मंत्रालय द्वारा उड़ान योजना का सातवीं वर्षगांठ पर जारी वक्तव्य बताता है कि हवाईअड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई, यात्रियों की संख्या भी दोगुनी हो गई लेकिन कहां-कहां अधूरे काम हैं, जिनके चलते उड़ान की रफ्तार धीमी है, इसका पता नहीं चलता। वैसे, एक सरकारी आंकड़ा यह भी कहता है कि इन 157 हवाई अड्डों में से 131 में ही नियमित उड़ान सेवा इस समय एएआई संचालित कर रहा है। ([email protected])
बैस की संभावनाएं
पूर्व राज्यपाल रमेश बैस ने फिर से भाजपा की सदस्यता ले ली है। वो सक्रिय सदस्य बन गए हैं। बैस सक्रिय राजनीति में लौटना भी चाहते हैं। पार्टी के कुछ नेताओं ने उन्हें सलाह भी दी है कि वो कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में नियमित रूप से बैठें, और कार्यकर्ताओं की समस्याओं का निराकरण भी करें।
चर्चा थी कि बैस को कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में कमरा अलाट होने वाला है। मगर यह अभी तक नहीं हुआ है। उनके पुराने जान पहचान के लोग ही मिल रहे हैं। पदाधिकारी, और जन प्रतिनिधि तो उनसे दूरी बनाए हुए हैं। सुनते हैं कि बैस रायपुर के एक विधायक को तीन बार फोन कर चुके हैं, और मिलने के लिए बुला चुके हैं। मगर विधायक अभी तक बैसजी से मिलने के लिए टाइम नहीं निकाल पाए हैं। ऐसी स्थिति में बैस जी पहले जैसे सक्रिय रहेंगे, इसकी संभावना कम दिखती है।
चार सीटों का मेयर या विधायक
भाजपा से रायपुर दक्षिण के लिए दावेदारी करते रहे मृत्युंजय दुबे, केदार गुप्ता, मीनल चौबे, सुभाष तिवारी, अंजय शुक्ला, रमेश ठाकुर और अन्यान्य से यही कहा जा सकता है- हार्ड लक, बेटर ट्राय नेक्स्ट टाइम। वैसे यह सभी त्रिकोण में फंसकर, असमंजस में ही दावेदारी कर रहे थे, कि दक्षिण या मेयर, या फिर निगम-मण्डल। और अब पार्टी को भी आसान हो जाएगा, नाम छांटने में कि कौन मेयर, सभापति और कौन निगम मंडल।
अब दरअसल, बृजमोहन अग्रवाल के इस्तीफे के बाद से ये सभी प्रबल दावेदार रहे हैं, लेकिन तय नहीं कर पा रहे थे किसकी दावेदारी करें। इसमें एक पेंच और है। महापौर का पद आरक्षण से तय होगा। वर्तमान में महापौर का पद अनारक्षित है। ऐसे में संभव है कि यह पद पिछड़ा वर्ग या फिर महिला के लिए आरक्षित हो सकता है। इन सबके चलते भी कई की दावेदारी स्वाभाविक तौर पर खत्म हो जाएगी।
दूसरी तरफ, महापौर या विधायक के पद, कार्यक्षेत्र ये नजरिए से देखें तो महापौर ही बड़ा पद। फिर इस बार पार्षदों से नहीं सीधे जनता से चुना जाना है। बहुमत का टेंशन नहीं। 70 वार्डों में कहीं का गड्ढा कहीं पट जाएगा। उसके बाद तो व्हाइट हाउस की छत से शहर देखकर कहा जा सकता है -अगले पांच साल ये शहर मेरा है। और बजट देखे तो दो करोड़ की विधायक निधि, सांसद-सरकार और निगम पर निर्भर रहना होगा । महापौर मतलब चारों विधानसभा क्षेत्र, 70 वार्ड, 2 हजार करोड़ का बजट, बड़े-बड़े बिल्डर डेवलपर से वास्ता। इन दोनों चुनाव में जेब खर्च होने के बाद भी जीत की गारंटी 50-50। हींग लगे न फिटकरी वालों के लिए निगम मंडल ही बेहतर।
वंदेभारत का भविष्य वहां है...

यह तस्वीर आज सफर करने वाले यात्री ने भेजी है...
रायपुर वाइजैग वंदेभारत को आज एक माह पूरे हो गए। रेलवे के पैसेंजर बिजनेस के हिसाब से यह ट्रेन अब तक नुकसान में ही चल रही है। 16 कोच की ट्रेन में कुल 1128 सीटें हैं और यह ट्रेन इनमें से 37-40 प्रतिशत बुकिंग पर ही चल रही है। यानी आपरेशन कॉस्ट भी नहीं निकल रही। इसे देखते हुए इस ट्रेन के ओनर रायपुर रेल मंडल ने एक माह और आब्जरवेशन आपरेशन करने का फैसला किया है। उसके बाद ट्रेन को बंद तो नहीं करेगा, लेकिन इसके 16 कोच कम किए जा सकते हैं। यानी 8-10 कोच से चलाई जा सकती है। बाकी कोच से रायपुर जबलपुर व्हाया गोंदिया चलाने की चर्चा टीटियों के बीच जमकर है। ऐसा होने से अमरकंटक एक्सप्रेस के सारे यात्री डायवर्ट होंगे और रायपुर रेल मंडल को नया बिजनेस रूट मिलेगा या फिर बिलासपुर- नागपुर वंदेभारत को ही 8 से बढ़ाकर 16 कोच किया जा सकता है। मेन लाइन पर डिमांड बहुत है। इन टीटीई की माने तो दुर्ग वाइजैग तक रेल खंड पर वंदेभारत बिजनेस का अलग अलग है। दुर्ग, रायपुर महासमुंद से वाइजैग तक औसत सीट बुकिंग 180-200 के साथ किसी दिन 300 भी रही। उसके बाद कांटाभांजी टिटलागढ़ केसिंगा, रायगढ़ से वाइजैग अप डाउन दोनों में 250-300। इसके पीछे कारण ओडिशा के इन शहरों-कस्बों के लिए सुबह जाकर शाम 8 बजे वापसी के लिए बेहतर कनेक्टिविटी मिल रही है। इसलिए कहा जा रहा है कि वाइजैग वंदेभारत का भविष्य पश्चिम ओडिशा पर निर्भर रहेगा।
राइट टाइम आवाजाही से ट्रेन पसंद तो की जा रही है। रायपुर से छूटते ही महासमुंद में ब्रेकफास्ट, पार्वतीपुरम के आसपास लंच में रोटी, दो सब्जी, दाल, चावल,दही आचार के साथ क्वालिटी लंच पैक परोसा जाता है। विजयनगरम में आइसमक्रीम की ठंडक का मजा लीजिए। सब कुछ ठीक है मगर भाड़ा महंगा है।
एंटोफगास्ता में लुटने वाले..
एंटोफगास्ता नाम कुछ अजीब है। ऑनलाइन फ्रॉड करने वाले ऐसे ही अजीबो-गरीब नाम का इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बलरामपुर और रायगढ़ जिले से खबर आई है कि दर्जनों गांवों के 2-3 हजार लोग इसमें निवेश करके करोड़ों रुपये गंवा बैठे हैं। जिनके रुपये डूबे उनमें से कई लोगों पर लाखों रुपये का कर्ज डूब गया है कई की अचल संपत्ति बिक गई है। कुछ ने महंगे ब्याज पर पैसे लिए, अब चुकाने की सोचकर सिर चकरा रहा है। यह ऐप छोटा-छोटा निवेश करने और जल्दी रिटर्न का झांसा देता था। जैसे 500 रुपये लगाएं, 7 दिन में 50 प्रतिशत रिटर्न पाएं, 14 दिन मं 100 प्रतिशत और एक माह में 200 प्रतिशत रिटर्न। सन् 2021 से चल रहे ऐप में लोगों को पैसे लौटाए भी जा रहे थे। यह धोखाधड़ी का एक तरीका था, जिससे लोगों का विश्वास जम जाए। पर अचानक यह ऐप बंद हो गया। छत्तीसगढ़ ही नहीं, नेट को खंगालने पर पता चलता है कि तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में ऐसे निवेश के चक्कर में लोग करोड़ों रुपये डुबा बैठे हैं।
एंटोफगास्ता चिली गणराज्य का एक हिस्सा है। इस नाम से कॉपर की एक माइनिंग कंपनी भी है। कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर लिख रहा है कि हमारे नाम पर कोई निवेश करने के लिए ऑफर देता है तो कानूनी रूप से वे इसके लिए बाध्य नहीं होंगे। यानि यह फ्रॉड अंतरराष्ट्रीय स्तर का भी हो सकता है। यह ऐप पहले कभी गूगल प्ले पर उपलब्ध रहा या नहीं, पर आज मौजूद नहीं है। कुछ साल पहले बिडक्वाइन के नाम से मिलते जुलते वर्चुअल मनी निवेश करने का ऑफर देने वाले दर्जनों ऐप गूगल पर दिखने लगे थे। गूगल ने सबको अपने प्ले स्टोर से हटाया। इसके बावजूद लोग वाट्सएप या टेलीग्राम से मिले लिंक पर जाकर ऐप डाउनलोड करते हैं। दिक्कत यह है कि इस निवेश में फंसने वाले लोग मजदूर, छोटे दुकानदार व सीमित वेतन की प्राइवेट जॉब करने वाले लोग हैं। ज्यादातर लोगों की शिकायत पुलिस तक पहुंची भी नहीं है। इन दिनों पूरे प्रदेश में पुलिस साइबर फ्रॉड से बचने के लिए लोगों के बीच जागरूकता अभियान चला रही है, मगर शातिर ठग अपना काम जारी रखे हुए हैं। लोगों को यह समझना नहीं है कि यदि कोई आपको आपकी शारीरिक दक्षता और तकनीकी दक्षता का उपयोग किये बिना बड़ा और अविश्वसनीय रिटर्न देने की बात करता है तो वह धोखाधड़ी के अलावा कुछ नहीं हो सकता।
करवा चौथ पर मंगल कामना
प्रेम की अभिव्यक्ति के भिन्न भिन्न तरीके हो सकते हैं। बॉलीवुड में हजारों गाने प्रेम दर्शाने पर तैयार हो चुके हैं। पर हर बार कहने का अंदाज नया होता है, इसलिए चल रहे हैं। ऐसे ही अलग अंदाज में मेंहदी रचाकर एक विवाहिता ने अपने पति के लिए जाहिर की है। वैसे ऐसा लगता है कि पति घर जमाई है।
भाई की शिकायत नड्डा से
रायपुर की पूर्व विधायक श्रीमती रजनी ताई उपासने के परिवार का झगड़ा पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं तक पहुंच गया है। रजनी ताई के पुत्र वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने ने टिकरापारा स्थित अपने पैतृक निवास की तस्वीर एक्स पर साझा की है, और वहां लूटपाट का आरोप लगाया है। यह आरोप किसी और पर नहीं, बल्कि अपने छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने पर लगाया है।
उपासने ने लिखा कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार आने के बाद स्थानीय नेताओं की बढ़ती गुंडागर्दी पार्टी को डुबो देगी। प्रदेश भाजपा के स्थानीय दलाल नेताओं की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वे बूढ़ी, बीमार माताओं के घरों में दिन दहाड़े डकैती डालने लगे! कोई बेटा अपनी के घर का ताला तोडक़र उसके घर में दिन दहाड़े डकैती डाल सकता है? हां, जरूर अगर बेटा भाजपा का नेता हो, और उस राज्य में भाजपा की सरकार हो! छत्तीसगढ़ भाजपा के ऐसे ही जमीनों के दलाल और दुर्भाग्य से मेरे छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने और उनके साथी आलोक श्रीवास्तव ने अपने साथियों संग हमारी माता, रायपुर की पूर्व विधायक 92 वर्षीय श्रीमती रजनी ताई उपासने के घर-ऑफिस के ताले तोडक़र उसमें रखा सामान लूट लिया।
भाजपा का इस नेता को तीन साल से अपनी बीमार मां से मिलने उसके घर आने की फुर्सत नहीं मिली। लेकिन मां के घर का ताला तोडऩे की फुर्सत मिल गई। नरेन्द्र मोदी की उपलब्धियों पर भाजपा के लोकल नेता किस तरह पानी फेरते हैं यह उसकी एक मिशाल है। छत्तीसगढ़ में अपराधों का ग्राफ ऐसे ही ऊपर नहीं जा रहा! उन्होंने जेपी नड्डा और सीएम विष्णुदेव साय को टैग करते हुए लिखा कि मुझे उम्मीद नहीं कि रायपुर पुलिस इसकी रिपोर्ट दर्ज करेगी। ([email protected])
संघ वाले, और बिना संघ वाले
रायपुर दक्षिण के दावेदारों में आरएसएस के सबसे निकट कौन है, इस पर भाजपा के अंदरखाने में चर्चा चल रही है। कुछ लोग प्रदेश कोषाध्यक्ष नंदन जैन को आरएसएस के सबसे ज्यादा करीब बता रहे हैं। नंदन के पिता दिवंगत कुंदन जैन आरएसएस के रायपुर महानगर के प्रमुख रहे हैं। नंदन के लिए रायपुर के राममंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने भी सिफारिश की है। मगर सुनील सोनी का बैकग्राउंड भी आरएसएस का रहा है।
पूर्व सांसद सुनील सोनी के पिता आजादी के पहले आरएसएस से जुड़ गए थे। सुनील सोनी को दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके पिता की वजह से ही जानते थे। सुनील सोनी ने एबीवीपी से जुडक़र राजनीति की शुरूआत की। फिर दुर्गा कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष बने। बाद में पार्षद, दो बार मेयर, आरडीए चेयरमैन और फिर सांसद बने।
विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें प्रदेश चुनाव प्रबंध समिति का मुखिया बनाया था। सोनी विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया के साथ मिलकर काम किया। लोकसभा टिकट कटने के बाद भी वे डटे रहे। और यही वजह है कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल और कई प्रमुख नेता उन्हें विधानसभा प्रत्याशी बनाने के पक्ष में हैं।
बाकी दावेदारों में संजय श्रीवास्तव, केदार गुप्ता, मीनल चौबे और मृत्युंजय दुबे का आरएसएस से सीधा वास्ता नहीं रहा लेकिन भाजपा संगठन में काफी सक्रिय रहे हैं। संजय ने विधानसभा चुनाव में सरगुजा संभाग के प्रभारी के तौर पर काम किया था। केदार चुनाव के दौरान मीडिया में पार्टी का चेहरा बने रहे। मीनल और मृत्युंजय की सक्रियता भी कम नहीं रही है। ऐसे में पार्टी किस पर मुहर लगाती है, यह एक दो दिनों में साफ हो जाएगा।
थैले में मोबाइल और छापे

मैडम ने पिछले दिनों आबकारी विभाग के सारे जयचंदों को बदल डाला। हालांकि इसके पीछे उन्हें कड़ी मेहनत मशक्कत करनी पड़ी। कुल 637 दुकानों में से मैडम ने कम से कम 400 दुकानों का औचक निरीक्षण और आनलाइन वेब कास्टिंग भी किया। इसके लिए वो बस्तर कह कर सरगुजा जाती। इसके पीछे भी इन 10 महीनों में ही मैडम का दिलचस्प अनुभव रहा है। होता यह था कि जब भी मैडम जिलों के औचक निरीक्षण पर जाती,वहां सब कुछ नीट एंड क्लीन बिजनेस मिलता। और लौटना पड़ता था। मगर मैडम का मन संतुष्ट नहीं रहता, लगता कुछ गड़बड़ी चल रही है। मालूम चला कि दौरे पर मैडम के साथ तीन अन्य गाडिय़ों में जाने वाले विभाग के ही लोग उस जिले के जिला आबकारी अधिकारियों (डीईओ) और अमले को अलर्ट कर देते। यह बहुत दिनों तक चलता रहा।
फिर मैडम ने तरीका बदला। सरगुजा जाना बताकर बस्तर की ओर निकल पड़ती। कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाने की तर्ज पर। मैडम एक थैली लेकर दौरे पर रवाना होने लगी। बीच रास्ते वह अपने पीछे की तीन गाडिय़ों के एक-एक व्यक्ति का मोबाइल फोन थैली में जमा करवा लेतीं। इससे उस जिले के डीईओ और अमले को मैडम की दबिश का पता नहीं चलता। और मैडम, ओवर रेटिंग, शराब में पानी मिलावट, कोचिया कारोबार, पड़ोसी राज्यों की शराब ढुलाई जैसी गड़बड़ी आन द स्पॉट और वेबकास्टिंग से पकड़तीं रही। ऐसी गड़बडिय़ों को राजधानी जिले से लेकर चांपा जांजगीर,कोरबा,रायगढ़ बिलासपुर, मुंगेली के डीईओ के साथ उडऩदस्ते के अमले ने भी खूब प्रश्रय दिया।
जब मैडम हिसाब करने बैठीं तो अप्रैल से सितंबर तक दो सौ करोड़ की राजस्व हानि निकली। फिर मैडम ने इन सारे जयचंदों को बदल डाला। हालांकि इनमें से रायपुर,बिलासपुर के डीईओ को बचाने कई दिग्गजों ने जोर लगाया। मगर इसमें सीएम साहब ने मैडम को पूरा फ्री हैंड दिया था। और फिर सीएम साहब ने भी किसी की एक न सुनी।
तूफान के पहले की शांति

राष्ट्रीय वन खेल उत्सव के चलते विभाग में सब कुछ फिलहाल ठीक ठाक चल रहा है। हर अफसर एक दूसरे की और हर कर्मचारी अफसर की बात सुन और काम कर रहा है। क्योंकि इतने बड़े आयोजन से अपनी और प्रदेश की छवि मानकर सक्रिय हैं। लेकिन यह तूफान के पहले की शांति जैसा है। कल रविवार को खेलों का समापन समारोह हो जाएगा। उसके बाद नौ हजार कर्मचारियों का विभागीय संगठन हड़ताल जैसा कदम उठाने की रणनीति बना रहा है। इस संगठन के हाल में चुनाव भी हुए हैं। सभी जोश से भरे हैं जल्द ही बैठकर डेट तय करेंगे। हड़ताल का असर हाल में विभाग देख चुका है। जब 5000 वह भी दैवेभो तूता में 48 दिनों तक डटे रहे तो विभाग पटरी से उतर गया था। फिर ये तो नियमित 9 हजार लोग हैं।
इनका कहना है कि विभाग के पास 10 वर्ष से हमें इंक्रीमेंट देने 5 करोड़ नहीं है। और खेलों के लिए राज्य के बजट से 7.5 करोड़ खर्च किए गए । और यह आयोजन पहली बार नहीं तीसरी बार हो रहे। और हमारी मांग तब से चली आ रही है। वृक्षारोपण के लिए फंड नहीं।
वन विभाग के गार्डन बंद होने कगार पर हैं।
चौकीदारों के वेतन भुगतान में मुश्किल हो रही। खर्च के चलते कृष्ण कुंज, औषधीय उद्यान, आक्सीजोन की देख रेख से विभाग ने हाथ खींच लिया है। और खेल कूद के नाम पर किटी पार्टी की तरह वार्षिक आयोजन के लिए करोड़ों रूपये को पानी की तरह बहाए जा रहे। खेलों से पहले खेल कोटे से विभाग में भर्ती भी कर ली गई। केवल इसलिए कि पदक तालिका में छत्तीसगढ़ सबसे आगे दिखे। सच्चाई यह है कि पिछले वर्षों में हुई भर्तियों के एक भी खिलाड़ी का व्यक्तिगत या टीम स्तर पर भी भारतीय टीम में चयन नहीं हुआ। जो एशियाड, ओलंपिक या अन्य राष्ट्रीय खेलों में गया हो। यही अफसर कहते भी हैं कि खेल कूद तो ठीक है इसके बहाने आईएफएस बैचमेट्स का एन्यूअल गेट टू गेदर हो जाता है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि छत्तीसगढ़ में कुल 54 विभाग हैं उन्हें खेलों की जरूरत नहीं है केवल वन विभाग के। इसके पीछे कारण तलाशने होंगे।
बस्तर से एक और संभावना

बस्तर की विषम सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थितियों के बीच प्रतिभाओं का सामने उभर कर आना और राष्ट्रीय स्तर पर लोहा मनवाने का सिलसिला रुद्र प्रताप देहारी ने आगे बढ़ाया है। अत्यंत पिछड़े और धुर नक्सल प्रभावित कटे कल्याण से रुद्र ने अपनी मेहनत से क्रिकेट में जगह बनाई। वीनू मांकड़ ट्रॉफी के मैच में उन्हें मैन ऑफ द मैच का खिताब मिला, साथ ही नगद पुरस्कार भी।
धान खरीदी में हड़ताल की बाधा
धान उपार्जन केंद्रों के डाटा एंट्री ऑपरेटरों ने अपने को शासकीय सेवा में लेने की मांग पर 18 सितंबर से हड़ताल शुरू की थी, जो आज दो माह पूरे हो गए। इधर सरकार ने धान खरीदी की तिथि तय कर दी है। 31 अक्टूबर तक किसानों का पंजीयन होना चाहिए। पंजीयन का कार्य डाटा एंट्री ऑपरेटरों क जरिये ही होना है। इसके अलावा खाद-बीज के लिए ऋण वितरण की ऑनलाइन एंट्री भी इन ऑपरेटरों के जरिये ही होती है। यह एंट्री भी बंद ही है।
प्रदेश में 2700 से अधिक ऑपरेटर हैं और किसानों की संख्या 25 लाख से अधिक। यदि पंजीयन की तारीख नहीं बढ़ाई गई तो आपाधापी मचना तय है। डाटा एंट्री ऑपरेटर करीब 15-17 साल से काम कर रहे हैं। शायद यदि इनकी मांग न मानकर नई भर्ती पर विचार करेगी तब भी उसमें काफी समय लग सकता है। एक विकल्प यह भी है कि शासकीयकरण की मांग पर बाद में विचार करने का आश्वासन दिया जाए और वर्तमान में मिल रहे मानदेय में वृद्धि कर दी जाए। वैसे इन्हें सोमवार तक काम में लौटने का अल्टीमेटम दिया गया है। उसके बाद ही सरकार का रुख सामने आएगा। ([email protected])
विधायक या छाया विधायक
उपचुनाव की घोषणा के दिन सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मीडिया से कहा इस बार दक्षिण के लोगों को दो विधायक मिलेंगे। पत्रकार चौंक गए, कि एक सीट पर दो विधायक कैसे। उन्होंने कहा एक जो नया निर्वाचित होगा और दूसरी मैं। मैं आठ बार से विधायक रहा हूं मैं भी विधायक की ही तरह क्षेत्र के विकास के लिए काम करूंगा। अब इस बयान में राजनीति देखने वाले विपक्ष, और भाजपा के ही लोग कई तरह की बातें कर रहे। वो कह रहे नए विधायक और निगम, आरडीए, जिला या पुलिस प्रशासन को उनके कहे अनुसार ही काम करना होगा। नए विधायक को हर काम से पहले उनसे पूछना पड़ेगा।
नई योजनाओं के प्रस्ताव उनसे बनवाने और अनुमति लेनी होगी। यानी वो छाया विधायक (निर्वाचित) की तरह होगा। बस विधायक कहलाएगा। भाजपा में अब इस मनस्थिति के नामों पर चर्चा हुई तो सबसे ऊपर नाम सुनील सोनी, मनोज शुक्ला ही निर्विवादित नाम रहे। ये दोनों उनसे अलग जा ही नहीं सकते। बाकी संजय श्रीवास्तव, मृत्युंजय दुबे, मीनल चौबे, सुभाष तिवारी, केदार गुप्ता, नंदन जैन इनके अपने-अपने इश्यू, और खेमे हैं। जब कांग्रेस के नाम गिने गए तो सभी दावेदार एजाज ढेबर, प्रमोद दुबे, कन्हैया अग्रवाल, बृजमोहन के अनुकूल नाम रहे। अब देखना होगा कि लॉटरी किसकी लगती है।
पुलिस, परिवहन को नहीं दिख रहे ?

राजधानी में 14 अक्टूबर से बिना रेजिस्ट्रेशन के 65 से अधिक यह गाडिय़ां दौड़ रहीं हैं। बिना नंबर की स्कूटी पर चालान काटने में न चूकने वाली ट्रैफिक पुलिस के एक हजार जवान और अधिकारी को चिढ़ाते हुए फर्राटे भर रही हैैं। ये सभी गाडिय़ां वन विभाग ने पिछले सप्ताह ही खरीदे और राष्ट्रीय खेल में आए खिलाडिय़ों-कोच मैनेजर को अलॉट किया है। इन गाडिय़ों को बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के शो रूम से बाहर कैसे निकलने दिया परिवहन विभाग ने?
विभाग ने तो परचेस होते ही नंबर प्लेट लगाकर डिलीवरी की अधिसूचित किया हुआ है। इस नियम पर किसी निजी गाड़ी को शो रूम के बाहर ही पकडऩे को मुस्तैद पुलिस के हाथ क्यों बंधे हैं? हम भी कहां आदर्श परिस्थिति की बात कर रहे। नियम होते ही हैं तोडऩे के लिए। फिर इन्हें बनाने वालों का काम ही है तोडऩा। बहरहाल इन खेलों में कुल 25 सौ फोर व्हीलर का उपयोग हो रहा है। इनमें पांच सौ से अधिक टैक्सियां हैं। इन्हें एक दिन में 40-40 लीटर डीजल दिया जा रहा है। और विभागीय नई गाडिय़ों को सीसीएफ ऑफिस से 50-50 लीटर पर्ची जारी हो रही। वह भी मोवा के एक ही पंप से भरवाना होगा। इसका ड्रायवर कोई हिसाब नहीं दे रहे हैं। हालांकि उन्हें कोटा से लेकर डूंडा, नवा रायपुर तक के 23 खेल परिसरों का चक्कर लगाना है। जलता ही होगा इतना डीजल।
कुलपति की दौड़ में
प्रदेश के चार राजकीय विश्वविद्यालयों में नए कुलपतियों की नियुक्ति होनी है। इच्छुक दावेदार शिक्षाविदों से आवेदन लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। कुलाधिपति कार्यालय ने अपनी वेबसाइट को क्लोज कर दिया है। चारों विश्वविद्यालयों के लिए 127 से अधिक आवेदन प्राप्त होने की खबर हैं। कुलाधिपति के गुवाहाटी से लौटने के बाद राजभवन जल्द ही चयन समिति का गठन करने जा रहा है। यह समिति इन सभी का इंटरव्यू कर अंतिम तीन तीन नामों का पैनल कुलाधिपति को देगा। वैसे यह प्रक्रिया दीपावली बाद ही गति पकड़ेगी।
आवेदकों में रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस अफसर भी शामिल हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ में प्रभारी कुलपति को छोड़ किसी भी एक्स ऑफिशियो की नियुक्ति नहीं हुई है। वैसे इन विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर डाले तो एक बार यह प्रयोग किया जा सकता है। वैसे पिछली सरकार में उशिवि ने कुलसचिव पद पर आईएएस अफसरों की नियुक्ति का प्रस्ताव सरकार को भेजा था। जो अब तक अनिर्णीत है।
बहरहाल कुलपति के आवेदकों में एक विधायक की पत्नी के साथ साथ एक कॉलेज की महिला प्राचार्या भी दौड़ धूप कर रहीं हैं। जो पूर्व में उशिवि में संयुक्त संचालक रहीं हैं। और रिटायरमेंट के करीब यह मैडम अगले पांच वर्ष काम करना चाहती है। मैडम की दौड़ धूप की चर्चा कॉलेज में आम हैं। और मातहत प्रोफेसर ही मैडम की शैक्षणिक, प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्न चिन्ह उठा रहे है? ये दिन के छह से आठ घंटे कॉलेज में गुजारते हैं। ओबीसी वर्ग से आने वाली मैडम की नजर दुर्ग विश्वविद्यालय पर है। जहां पहले भी एक महिला प्रोफेसर कुलपति रह चुकीं हैं। अब देखना यह है कि विधायक पत्नी सफल होती है या मैडम।
दक्षिणामुखी ब्राह्मण
राजधानी के ब्राह्मण इन दिनों दक्षिणामुखी हो गए हैं। पहली बार भाजपा-कांग्रेस के ब्राह्मण नेता एकजुट हो गए हैं। इन्होंने पहले सर्व ब्राह्मण समाज की बैठक की और फिर राजीव भवन, ठाकरे परिसर जाकर अपनी बात रख आए। अबकी बार टिकट नहीं तो समर्थन नहीं। उनकी बात कांग्रेस में पूरी होती दिख रही है। क्योंकि वहां कोई दूसरे नेता लडऩे आगे नहीं आए हैं। भाजपा में तो तय है या तो भैया की पसंद या संघ-संगठन की। और इसमें समाज करती दिख नहीं रहा। फिर भी राजीव भवन के खुले सत्र के बाद सैकड़ों ब्राह्मण नेता ठाकरे परिसर पहुंचे। इनमें दावेदार कहला रहे मृत्युंजय दुबे, मीनल चौबे,, सुभाष तिवारी, अंजय शुक्ला, विजय शंकर मिश्रा समेत बंगाली तेलुगू, मैथिल, राजस्थानी ब्राह्मण समाज के 500 लोग शामिल रहे। लेकिन कांग्रेस के एक भी दावेदार नहीं थे।
जय-जय परशुराम के जयघोष के साथ गए थे। और लौटती बारात की तरह बिना जय-जयकार के निकले। संगठन महामंत्री ने सारे ब्राह्मणो को प्रणाम किया और आने का सबब तो वो जानते ही थे। फिर भी कुछ नेताओं ने आने की भूमिका बांधी। उन्होंने कहा कि दक्षिण में 34 हजार ब्राह्मण वोटर हैं। टिकिट तो देना होगा। भीड़ में किसी ने कह दिया पहली बार ठाकरे परिसर आए हैं क्योंकि हम अधिकांश कांग्रेसी हैं। उनकी मन स्थिति को जान महामंत्री ने पूरी बात सुनी। मौका भी था दस्तूर भी। चाय बिस्किट का दौर भी।
महामंत्री ने भगवान परशुराम और ब्राह्मणों की महत्ता बताते हुए कहा पद-गद्दी सब कुछ ब्राह्मणों के लिए बेमानी है। इस पर उन्होंने एक कहानी सुनाई- भगवान विष्णु ने जब श्री परशुराम को इंद्र की गद्दी दे दी थी तो ब्राह्मण देवता ने हमें नहीं चाहिए कहकर ठुकरा दिया। उनमें कुर्सी की लालसा कभी नहीं रही। और आप लोग तो उनके वंशज हैं। हमारे जैसे लोग तो आपके चरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद लेते हैं। आप पूजनीय हैं, प्रणाम करता हूं। आपका मार्गदर्शन ही काफी है। आप लोग कहां गद्दी के चक्कर में पड़ गए। उन्होंने यह भी बताया कि फरसा उठाने के कारण परशुराम जी से तत्समय के ब्राह्मण उनसे दूर रहने लगे थे। इसके बाद तो सभी समझ गए कि महामंत्री क्या कहना चाह रहे हैं। और विदाई ले ली। लौटते समय नारे लगाना भी जरूरी नहीं समझा।
विधायक पुत्र की काउंटर रिपोर्ट
साजा विधायक ईश्वर साहू के बेटे कृष्णा साहू के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट के तहत पुलिस ने अपराध दर्ज कर लिया था। इसके बाद अब शिकायतकर्ता मनीष मंडावी के खिलाफ भी कृष्णा साहू की शिकायत पर एक एफआईआर दर्ज कर ली गई है। मनीष मंडावी ने जो एफआईआर लिखाई है उसमें विधायक पुत्र पर जातिसूचक गालियां देने का आरोप है, वहीं कृष्णा साहू की एफआईआर में कहा गया है कि मंडावी और उसके साथियों ने मारपीट की और उसके 10 हजार रुपये लूट लिए। दोनों की शिकायतों की जांच अभी बाकी है, पर आम लोगों के मामले में पुलिस इस तरह की काउंटर रिपोर्ट दर्ज नहीं करती। मगर, मामला सत्तारूढ़ दल के विधायक का है। सुनने में यह भी आया है कि मंडावी की एफआईआर के बाद सुलह-समझौते की कोशिश की गई थी लेकिन बात नहीं बनी। उसके बाद दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई है। यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लूट जैसी वारदात होने के बावजूद पुलिस तक पहुंचने में विधायक पुत्र को 48 घंटे लग गए? आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने पुलिस पर दबाव बनाया था तब मंडावी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, अब कार्रवाई नहीं होने पर वे आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। फिलहाल मुद्दा जल्द शांत होते नहीं दिख रहा है।
प्रतिमा की पड़ताल

एक बिल्डिंग के मंडप पर कुछ लंगूरों की प्रतिमाएं बना दी गई हैं। कुछ असली लंगूर उछलते कूदते हुए वहां पहुंचे। शांत और स्थिर अवस्था में लंगूरों को देखकर वे काफी देर तक निहारते हैं। चारों तरफ चक्कर लगाते हैं। छूकर देखते हैं फिर गले लगाते हैं। फिर भी जब वे नहीं हिलते तो उठाकर अपने साथ ले जाने की कोशिश करते हैं। प्रतिमा को हिला तो देते हैं, मगर उखाड़ नहीं पाते। बंदर हमेशा झुंड में रहते हैं और वे अपनी बिरादरी में एक दूसरे का खूब ख्याल भी रखते हैं। कोई दुर्घटनाग्रस्त हो जाए या बीमार पड़ जाए तो उसकी देखभाल भी करते हैं। शायद असली लंगूर को प्रतिमा के नहीं हिलने-डुलने की चिंता हो रही है। सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल हो रहा है।
हत्यारे सिंहदेव-विरोधी
सूरजपुर में दोहरे हत्याकांड में एनएसयूआई पदाधिकारियों की संलिप्तता के खुलासे के बाद कांग्रेस के अंदरखाने में हलचल मची है। यह बात सामने आई है कि सरगुजा संभाग में अपराधियों का एनएसयूआई में बोलबाला रहा है। अपराधी प्रवृत्ति के युवाओं को एनएसयूआई ने पद दिए गए। खास बात यह है कि स्थानीय कांग्रेस संगठन के पदाधिकारी पिछले वर्षों में इस पर आपत्ति कर प्रदेश नेतृत्व को अवगत कराते रहे हैं। मगर प्रदेश संगठन ने कुछ नहीं किया।
एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष नीरज पाण्डेय, सरगुजा के ही रहने वाले हैं, और वे पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के विरोधी खेमे के माने जाते हैं। सूरजपुर में प्रधान आरक्षक की पत्नी और पुत्री की हत्या के मामले में जिन पांच युवकों को गिरफ्तार किया है, उनमें दो एनएसयूआई के पदाधिकारी जिलाध्यक्ष चंद्रकांत चौधरी, और कुलदीप साहू हैं। कुलदीप दोहरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी हैं।

कुलदीप के हत्याकांड में शामिल होने की बात सामने आई, तो एनएसयूआई के पदाधिकारियों ने उनसे पल्ला झाड़ लिया था। और तो और जिलाध्यक्ष चंद्रकांत चौधरी ने बकायदा वीडियो जारी कर कुलदीप साहू का एनएसयूआई से कोई संबंध होने से इंकार किया। पुलिस जांच में यह बात साफ हुई कि हत्याकांड में कुलदीप के साथ-साथ चंद्रकांत चौधरी भी था। इसके बाद आरोपियों के कांग्रेस नेताओं के साथ तस्वीरें भी वायरल हुई।
भिलाई विधायक देवेंद्र यादव, एनएसयूआई के अध्यक्ष नीरज पाण्डेय के साथ कई तस्वीर वायरल हुई है, जो यह बताने के लिए काफी है कि आरोपियों के रिश्ते कांग्रेस के नेताओं से कैसे हैं। सूरजपुर जिला कांग्रेस की अध्यक्ष भगवती राजवाड़े ने दो साल पहले पत्र लिखकर चंद्रकांत चौधरी के आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की जानकारी दी थी। उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। यह पत्र सोनिया गांधी, और राहुल गांधी व प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन प्रभारी पीएल पुनिया को भेजा था। उन्होंने बताया था कि चंद्रकांत चौधरी कोयला चोरी से लेकर मारपीट, और नशाखोरी जैसी गतिविधियों में लिप्त है, और उसकी नियुक्ति से कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता अपमानित महसूस कर रहे हैं। मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब पार्टी के नेताओं को जवाब देते नहीं बन रहा है।
उद्घाटन का पहला दिन फीका रहा

राष्ट्रीय वन खेल उत्सव का बुधवार शाम श्रीगणेश हो गया। कल केवल उद्घाटन , मार्च पास्ट सलामी, मशाल प्रज्जवलन, कबूतर उड़ाए गए। आज से मैदान में उतरने से पहले खिलाडिय़ों की मेल-मुलाकात देर रात डिनर तक चलती रहीं। जहां डिनर प्लेट के स्वाद को लेकर नाक भौं सिकुड़ते भी रहे। डिनर जमीन पर बिठाकर कराया गया।
केंद्रीय मंत्री देवेंद्र यादव आए ही नहीं। उद्घाटन समारोह के दौरान कुछ अतिथियों में नाराजगी सुनने को मिली। तीनों ही विधायक राजेश मूणत को उद्घाटन से कुछ देर पहले निमंत्रण, सांसद बृजमोहन अग्रवाल को देर रात अचानक निमंत्रित किए जाने की जानकारी मिली है। बताया तो यह भी गया है कि प्रिंटेड कार्ड में कोटा इलाके के विधायक का नाम ही नहीं था। आनन फानन में छपवा कर दिया गया। हालांकि इन सभी के नाम ई-कार्ड में प्रकाशित थे। ठाकरे परिसर में तो थोक के भाव में पांच सौ कार्ड बिना नाम लिखे छोड़ आए। यह कार्ड बांटने के लिए अधिकृत किए गए अधिकारियों ने ही बताया । और पीसीसीएफ स्वयं संबंधितों को आड़े हाथ ले चुके हैं। रायपुर वन मंडल को मैनेजमेंट से दूर रखा गया। डीएफओ, एसडीओ रेंजर फूफा बनकर तालियां बजाते रहे। ऐसे ही नाराज लोगों ने बताया कि छत्तीसगढ़ वन बल के 9000 वर्दीधारी कर्मी भी उपेक्षित ही। स्वाभाविक भी है कि ये कार्यक्रम को फीका ही बताएंगे। और इसे खारिज भी नहीं किया जा सकता है। भीड़ के हिसाब के 50 फीसदी ही थी। सूर्यकुमार यादव का भी आकर्षण भीड़ जुटा नहीं पाई। क्योंकि वह पुलिस सुरक्षा और बड़े बड़े वन अफसरों से घिरे रहे। देश के 50 आईएफएस को वीआईपी का दर्जा देकर वन कर्मियों को वालंटियर की भूमिका में इन अधिकारी की सेवा में कॉल बॉय की तरह रखा गया। इतना ही नहीं देश के कई दिग्गज आईएफएस नहीं आए। जो आए हैं उन्हें नॉर्मल ट्रैक-सूट के बजाए रेमेंड के सूट दिए गए। जो अगले चार दिन तीन हजार लोगों की भीड़ में उन्हें नौकरशाह साबित करता ड्रेस कोड होगा।
नई जनरेशन के अपराध
छत्तीसगढ़ में दो बड़े अपराध, रंगदारी वसूली और महादेव सट्टा ऐप, चर्चा व चिंता का विषय बने हुए हैं। शूटर गैंग के अमन साहू को हाल ही में रायपुर पुलिस द्वारा भारी सुरक्षा इंतजामों के साथ झारखंड से गिरफ्तार कर लाया गया है। उनके गुर्गों ने बीते दिनों एक बड़े बिल्डर पर गोलीबारी की और दूसरे बिल्डर को धमकी दी थी। करीब एक दर्जन अन्य कारोबारी उनकी हिट लिस्ट में बताये जा रहे हैं। यह गैंग सिर्फ छत्तीसगढ़ या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका नेटवर्क मलेशिया, कनाडा, और पुर्तगाल जैसे देशों में भी फैला हुआ है। यहां तक कि जेल में बंद अपराधी भी उनके लिए काम कर रहे हैं।
दूसरी ओर, महादेव सट्टा ऐप का मामला है। दुर्ग से निकले सरगना सौरभ चंद्राकर ने दुबई में बैठकर दुनिया भर में साम्राज्य फैला लिया। गिरफ्तारी के बाद भारत प्रत्यर्पण की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन उसका नेटवर्क एक तरफ कई देशों में है तो छत्तीसगढ़ के दूरदराज के गांवों तक भी फैला हुआ है। जहां तक सडक़ भी ठीक से नहीं पहुंची, वहां से ऑनलाइन सट्टेबाजी ऑपरेट की जा रही है। इसमें स्थानीय मजदूरों, बेरोजगारों के बैंक खातों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे आसानी से पैसों का लेन-देन हो रहा है। रंगदारी की रकम भी कुछ ही सेकंड में प्लास्टिक-वर्चुअल मनी या हवाला के ज़रिए देश से बाहर भेजी जा रही है।
40-50 साल पहले सट्टेबाजी के तरीके अलग थे, जैसे रतन खत्री और कल्याण जी भाई के समय में नगद पैसे और पर्चियों का लेन-देन होता था। रंगदारी की रकम किसी अटैची में भरकर बताए गए ठिकाने पर छोडऩा होता था। आज तकनीक ने अपराधियों के काम को और आसान बना दिया है। 4जी और 5जी डेटा और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन ने न सिर्फ आम जनता की जिंदगी को सरल बनाया है, बल्कि अपराधियों को भी अपने अवैध धंधे को बढ़ाने का भरपूर मौका दिया है।
हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन ठगी का वार्षिक कारोबार 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह सवाल उठता है कि अगर इंटरनेट की इतनी आसान पहुंच नहीं होती, तो क्या ये सब मुमकिन होता? अपराधी अब पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और संगठित हो गए हैं, पर क्या जांच एजेंसियां, खासकर अपनी पुलिस उतनी ही तेजी से अपडेट हो रही है?
ऐसा बिहार में ही होता है..

बिहार के भागलपुर में एक शख्स को सांप ने काटा तो उसने बिना वक्त गंवाए उसके गर्दन को दबोच लिया और उसे लेकर अस्पताल पहुंच गया। एक तरफ वह दर्द से कराह रहा था, दूसरी तरफ उसने सांप को जकड़ रखा था। अस्पताल के स्टाफ और डॉक्टर मरीज का इलाज कैसे करें, इस चिंता में डूब गए। वह सांप से बदला लेना चाहता था। बाद में लोगों ने समझाया कि पहले अपना इलाज कराओ। फिर उस सांप को ग्रामीण की चंगुल से छुड़ाकर जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया गया। लोगों ने कहा कि इसमें सांप का क्या कसूर जो उससे बदला लोगे, उसने तो अपने स्वभाव के अनुसार ही काम किया है। तुम ही थोड़ी इंसानियत दिखाओ। अच्छी बात यह रही की सांप काटने के बाद यह व्यक्ति किसी झाड़ फूंक के चक्कर में नहीं पड़ा।
न स्कूल भवन बना न शिक्षक मिले

हाईकोर्ट में इन दिनों स्कूली बच्चों के आंदोलन पर सुनवाई चल रही है। रायपुर के प्रयास विद्यालय के छात्रों ने सडक़ पर उतरकर प्रदर्शन किया, राजनांदगांव के डीईओ ने टीचर्स की मांग करने वाली छात्राओं को फटकारा तो न्यायालय ने इसे स्वत: संज्ञान याचिका के रूप में दर्ज किया। हाईकोर्ट ने तल्ख लहजे में सरकार से पूछा कि बच्चों से पढ़ाई कराना चाहते हैं या नेतागिरी। अपने जवाब में शिक्षा विभाग ने स्वीकार किया कि शिक्षक के हजारों पद खाली है। अब अगली सुनवाई में हाईकोर्ट ने जवाब दाखिल करने के लिए कहा है कि सरकार किस तरह से इस कमी को दूर करने जा रही है, बताए। हाईकोर्ट में सरकार क्या जवाब देगी यह तो नहीं मालूम लेकिन शैक्षणिक सत्र के तीन माह से अधिक बीत चुके हैं, जगह-जगह सडक़ों पर छात्र-छात्राओं का उतरना जारी है। बालोद जिले के पीपरछेड़ी हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्र-छात्राओं ने गेट पर ताला जड़ दिया। कलेक्टर को बुलाने की मांग कर रहे थे। एसडीएम पहुंची और उन्होंने किसी तरह से दो शिक्षकों की व्यवस्था करने की बात कही, लेकिन यहां 13 शिक्षकों की जरूरत है। मार्च 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बालोद जिले के दौरे पर थे तो पीपरछेड़ी के छात्र-छात्राओं ने उनके काफिले को रोका था। मुख्यमंत्री के साथ उन्होंने सेल्फी खिंचवाई थी। उसे सोशल मीडिया पर खुद बघेल ने शेयर किया था और बताया था कि बच्चों की मांग पर उन्होंने नए हायर सेकेंडरी भवन के लिए 1.21 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। पर कांग्रेस सरकार के रहते उसका टेंडर जारी ही नहीं हुआ। नई सरकार बनने के बाद भी उसका कुछ पता नहीं है।


