राजपथ - जनपथ
सावधानी में ही समझदारी
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी जहां-जहां पदस्थ रहे, उन्होंने हर जगह अपने दफ्तर के भीतर कैमरा लगवाया था, और बाहर वेटिंग हॉल में स्क्रीन लगवा दिया था ताकि सबको दिखता रहे कि उनसे कौन कितनी देर मिल रहे हैं, ऑफिस के चेंबर में क्या हो रहा है। अब एक आईएएस ने अपने चेंबर में न सिर्फ कैमरा लगवा दिया है, बल्कि महीनेभर की रिकॉर्डिंग रखने वाला स्टोरेज भी लगवाया है।
ऐसी सावधानी से कई किस्म की अप्रिय चर्चाएं शुरू होने का भी मौका नहीं आता।
पहल कितनी अनुकरणीय..?
सरकार कहती है कि किसी विभाग या किसी जिला कलेक्टर के अच्छे काम दूसरे विभाग और अन्य जिलों के कलेक्टरों को अपने यहां अनुकरण-लागू करना चाहिए। प्रदेश के एक जिला कलेक्टर की ऐसी पहल दूसरे जिले के कलेक्टरों के लिए समस्या बनती जा रही है । हर जिले से इसे लागू करने की मांग होने लगी है। और अब यह मांग नवा रायपुर के महानदी और इंद्रावती भवन तक आ पहुंची है। दबाव बढऩे पर लागू करना पड़ सकता है।
दरअसल, कलेक्टर साहब ने अपने सभी मातहत जिलाधिकारियों के लिए व्यवस्था बना दी है कि वे हर मंगलवार को शाम 4 बजे जनदर्शन करेंगे। इसमें केवल अधिकारी कर्मचारियों की शासकीय व्यक्तिगत समस्याओं की सुनवाई करेंगे। इसमें रिटायर्ड लोगों की समस्याएं सुनी जाएंगी।
कलेक्टर साहब की इस व्यवस्था की पहली सुनवाई 3 से शुरू हुई। लेकिन पहला दिन था कम लोग आए होंगे। 10 तारीख को इसका रिस्पांस देखना होगा। हो सकता है उसके बाद निकाय चुनाव घोषित होने पर यह सुनवाई चुनाव बाद तक स्थगित हो जाए। जैसे ठाकरे परिसर में मंत्रियों की सहयोग केंद्र में बैठक स्थगित कर दी गई है।
लेकिन इन कलेक्टर साहब की इस व्यवस्था की मांग अब दूसरे जि़लों में होने लगी है। कर्मचारी अधिकारी अपने अपने जिला नेताओं से इस पर कलेक्टरों से मांग करने कह रहे हैं। और तो और मंत्रालय, संचालनालय को कर्मचारी भी अपने यहां मांग करने लगे हैं। फेडरेशन ने तो हर सप्ताह न सही माह में दो बार आयोजित करने की मांग की है।
दोनों ही भवनों में एक-एक आईएएस नोडल अधिकारी पहले से ही नियुक्त हैं ही वे सुनवाई कर सकते हैं। सरकार पहले ही व्यवस्था कर चुकी है कि जिला स्तर की समस्याएं सीएम जनदर्शन तक नहीं पहुंचनी चाहिए। अन्यथा यह माना जाएगा कि कलेक्टर, जिलाधिकारी सुनवाई नहीं कर रहे। अब देखना होगा कि कितने जिले लागू करते हैं।
दोनों चुनाव साथ-साथ?
खबर है कि सरकार नगरीय निकाय, और पंचायत चुनाव साथ-साथ कराने जा रही है। नगरीय निकाय चुनाव तो दलीय आधार पर होंगे, लेकिन पंचायत के चुनाव दलीय आधार पर नहीं होंगे। पंचायत चुनाव लंबा चलेगा, और फरवरी के आखिरी तक चरणबद्ध तरीके से चुनाव होंगे।
पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने विधानसभा में दोनों चुनाव साथ कराने की मांग की थी। इस पर अशासकीय संकल्प भी पारित हुआ था। नगरीय निकाय चुनाव में वोटिंग ईवीएम से होगी। लेकिन पंचायत के चुनाव परम्परागत बैलेट पेपर से ही कराए जाएंगे। विधानसभा सत्र निपटने के बाद सीएम विष्णुदेव साय प्रदेशभर के दौरे पर निकल रहे हैं। इसकी रूपरेखा तैयार हो रही है। रमन सरकार में दो बार ऐसा हुआ है जब नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। प्रदेश में सरकार के रहते ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए संगठन और सरकार व्यूह रचना बना रही है। देखना है आगे क्या होता है।
अरबों का जमीन घोटाला, जांच कैसे हो?
सरगुजा जिले में बीते एक साल के भीतर जमीन घोटाले के इतने मामले सामने आ गए हैं की जांच के नाम पर जिला प्रशासन को अपनी टीम छोटी लगने लगी है। न केवल दूरदराज के हिस्सों में बल्कि बीच शहर में भी दर्जनों एकड़ जमीन का फर्जी पट्टा तैयार कर नामांतरण करा लिया गया है। प्रशासन को जो जानकारी है उसके मुताबिक यह सारा फर्जीवाड़ा कुछ रसूखदार राजनीतिक व्यक्तियों और कारोबारी के संरक्षण में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुआ है। इन लोगों ने आदिवासी जमीन, लीज की जमीन, चारागाह, पुनर्वास और भूमि खाली पड़ी सरकारी जमीन किसी को भी नहीं छोड़ा। बीते 11 महीने के भीतर जमीन के फर्जीवाड़े के 1178 मामले दर्ज किए गए हैं। बीच शहर से 4 एकड़ से अधिक जमीन का कब्जा छुड़ाया गया है जिसकी अनुमानित कीमत एक अरब रुपए से अधिक है। मैनपाट में भी करीब 500 एकड़ जमीन पर 173 टुकड़ों में कब्जा कर लिया गया है। इनकम टैक्स और इडी की रेड के दौरान भी जमीनों की खरीदी बिक्री के कई दस्तावेज बरामद किए गए थे। केंद्रीय एजेंसियों ने इन सब की जांच का भी जिम्मा कलेक्टर को सौंप दिया गया है। जमीनों पर अवैध कब्जे का यह आलम हो गया है कि स्कूल, आंगनबाड़ी और दूसरी सरकारी योजनाओं के लिए खाली जमीन ढूंढने पर नहीं मिल रहे हैं।
हालत यह हो गई है कि कलेक्टर के पास इतनी बड़ी टीम नहीं है कि इन सारे घोटालों की जांच जिले में मौजूद राजस्व अमले से करवा सकें और जमीन वापस सरकार के नाम चढ़ा सकें। उन्होंने राज्य सरकार को चि_ी लिखकर वृहद स्तर पर जांच के लिए एक बड़ी टीम बनाकर भेजने की मांग की है।
हो सकता है कि सरगुजा में हुआ घोटाला प्रदेश में सबसे बड़ा हो लेकिन बाकी जिले भी इससे अछूते नहीं है। बाकी जिलों में कलेक्टरों की दिलचस्पी कम ही दिखाई दे रही है।
जब इशारों में बात न बने..

कोरबा की सडक़ पर पुलिस की ओर से लगाया गया साइन बोर्ड सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें सीधे लिखा गया है कि सावधान रहें, खतरनाक मोड़ है, मृत्यु संभावित स्थल है। बहुत से लोगों को यह संदेश नकारात्मक लग सकता है। केवल दुर्घटनाजन्य क्षेत्र लिखा जा सकता है। पर, पुलिस को लगा होगा कि साधारण शब्दों में लिखा बोर्ड दुर्घटनाओं को कम करने में मदद कर नहीं रहा है तो बात सीधे-सीधे समझा दिया जाए।
मुख्य सूचना आयुक्त के लिए दौड़ शुरू
राज्य सरकार ने सूचना आयोग में रिक्त मुख्य आयुक्त की नियुक्ति के लिए राज्य प्रशासन में हलचल शुरू हो गई है। जीएडी ने आवेदन बुलाए हैं।
दूसरी तरफ, यह भी साफ दिख रहा है कि सरकार वर्तमान दोनों आयुक्त में से किसी को भी पदोन्नत नहीं करना चाह रही हालांकि इसके खूब प्रयास जोड़ तोड़ किए जाते रहे हैं। योग्य अर्हताधारी 16 दिसंबर तक जीएडी में आवेदन, आफलाइन रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट से ही जमा कर सकेंगे। आश्चर्य है कि ऑनलाइन के इस युग में लेटलतीफी के पर्याय कहे जाने वाले डाक विभाग पर इतना भरोसा। जब नौकरियों के लिए आवेदन लेने वाले जीएडी यह निर्णय समझ नहीं आ रहा।
बहरहाल मुख्य सूचना आयुक्त के लिए किसी भी राज्य की विस, विधान परिषद, लोकसभा, राज्यसभा के साथ किसी भी दल का सदस्य नहीं होना चाहिए। न कोई कारोबार, वृत्ति न करता हो। लाभ के पद पर न हो, और हो तो छोडऩा होगा। लॉ, आईटी, समाजसेवा, पत्रकारिता, प्रबंधन, जनसंपर्क या प्रशासन में व्यापक ज्ञान, अनुभव रखता हो। साप्रवि ने यह सब शर्ते रखी हैं लेकिन शैक्षणिक योग्यता नहीं। खैर, यह अनुभव, इन क्षेत्रों की शैक्षणिक योग्यता रखने के बाद ही आता है।
इन आवेदनों की छंटनी और सीएम, नेता प्रतिपक्ष वाली समिति के चयन के बाद नियुक्ति तीन वर्ष के लिए और वेतन 2.25 लाख होगा। बीती फरवरी में दो आयुक्त नियुक्त किए जा चुके हैं। उस वक्त आवेदन 160 से अधिक आए थे। अब देखना होगा कितने आएंगे। या आउट ऑफ द एप्लिकेंट कोई नाम आ जाए।
कुछ माह पहले राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय ने सीएम विष्णुदेव साय से मिलकर जल्द से जल्द मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति की मांग की थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि मुख्य सूचना आयुक्त, किसी रिटायर्ड अफसर के बजाए न्यायिक सेवा अथवा सीनियर वकील को बनाया जाना चाहिए। सूचना आयोग के गठन के बाद से जितने भी मुख्य सूचना आयुक्त बने हैं, वो सभी रिटायर्ड आईएएस ही थे।
पैकरा को कुछ मिलने की चर्चा
पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा को मुख्यधारा में लाया जा सकता है। पैकरा को विधानसभा टिकट नहीं दी गई थी। वो सरगुजा से लोकसभा चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह चिंतामणि महाराज को प्रत्याशी बना दिया। बावजूद इसके पैकरा शांत रहे, और पार्टी के लिए काम करते रहे।
पैकरा, प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। हल्ला है कि उन्हें पाठ्य पुस्तक निगम का अध्यक्ष बनाया जाएगा। बुधवार को पार्टी दफ्तर में इसकी काफी चर्चा रही। कुछ लोग वस्तु स्थिति की जानकारी लेने के लिए मंत्रालय भी फोन लगाते रहे, लेकिन सूचना गलत निकली। अलबत्ता, कुछ प्रमुख नेताओं ने उन्हें अहम जिम्मेदारी देने के लिए अलग-अलग स्तरों पर बात की है। देखना है कि पैकरा को क्या कुछ मिलता है।
मंत्रियों के तेवर
नारायणपुर के एकलव्य आदर्श विद्यालय छोटेडोंगर का एक वीडियो आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया पर साझा किया। वीडियो में दिखाया गया कि टॉयलेट कक्ष को तोप-ढांक क्लासरूम में बदल दिया गया है। इसे लेकर मंत्री केदार कश्यप ने संबंधित अफसरों पर कार्रवाई की बात तो कही, लेकिन उनका मुख्य जोर इस बात पर रहा कि बालिका विद्यालय में प्रशासन की अनुमति के बिना प्रवेश करने और वीडियो बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह बात सही है कि बालिका छात्रावास एक संवेदनशील स्थान है, जहां बाहरी व्यक्तियों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन इस घटना ने वास्तव में बालिका आवासीय विद्यालयों में मौजूद खामियों को भी उजागर कर दिया। सवाल उठता है कि ऐसी ढीली सुरक्षा व्यवस्था क्यों है, जहां कोई भी बिना रोक-टोक के पहुंचकर वीडियो बना लेता है? बालिकाओं की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं हैं?
पिछले महीने स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल बलौदाबाजार के दौरे पर थे। मीडियाकर्मियों ने झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई न होने को लेकर मंत्री से पूछा कि क्या अधिकारी इन डॉक्टरों को बचा रहे हैं? मंत्री का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है तो सबूत लाएं, अन्यथा आप पर मानहानि का केस होगा। सबूत मिलने पर संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाएगी।
क्या सरकार की आलोचना को दबाने का यह तरीका सही है? मंत्रियों के इस तरह के तेवर अफसरों को तो राहत देते हैं, लेकिन प्रशासन की कमियों को उजागर करने वालों में डर पैदा होता है।
भावी अग्निवीरों से ऐसा व्यवहार?

कल से रायगढ़ में सेना भर्ती रैली शुरू हुई है। फिजिकल टेस्ट के लिए पहुंचे युवाओं को रेलवे स्टेशन से स्टेडियम तक ले जाने के लिए प्रशासन ने फ्री बस सेवा देने का वादा किया था। लेकिन युवाओं की भारी संख्या के मुकाबले बसों की व्यवस्था नहीं की गई। ऐसी स्थिति में नगर निगम की कचरा गाड़ी को युवाओं को ढोने के लिए लगा दिया गया। कई युवाओं ने इस गाड़ी में चढऩे से इनकार कर दिया और निजी साधनों से स्टेडियम पहुंचे। हालांकि, मजबूरी में बाकी युवा कचरा गाड़ी में बैठने को तैयार हो गए। कैमरे के सामने बोलने से बचते हुए उन्होंने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि पैसे बचाने के लिए ऐसा करना पड़ा। यह भर्ती रैली 12 दिसंबर तक चलेगी। लेकिन पहले ही दिन कचरा गाड़ी में युवाओं को ढोने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिससे प्रशासन की बड़ी फजीहत हो रही है। देखना होगा कि प्रशासन आने वाले दिनों में अग्निवीरों के लिए बेहतर परिवहन व्यवस्था करता है या नहीं।
अब वो रूतबा नहीं आयकर में ?
एक दौर था कि आयकर विभाग की नौकरी दबदबे और रुतबे वाली होती थी। लेकिन अब तो यहां के भी अफसर कर्मी भी नौकरी छोडऩे लगे हैं।
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने जारी संसद सत्र में पिछले सप्ताह एक लिखित उत्तर में जानकारी दी कि बीते 10 वर्षो में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) देश भर के 850 अधिकारियों ने नौकरी न करने के इरादे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले ली है। इनमें 383 आयकर, 470 कस्टम और अन्य राजस्व विभाग के अफसर हैं। यह तो हुई आधिकारिक जानकारी। अब गैर आधिकारिक और इनके पीछे छिपे कारणों की। जो रायपुर में पदस्थ और वीआरएस लेने वाले कुछ अधिकारियों से चर्चा के आधार पर- इनमें से बहुसंख्य दिल्ली मुंबई और अन्य मेट्रो शहरों के हैं।
आप और हम सभी जानते हैं कि यह दौर मोदी 1.0 और 2.0 का रहा है। इस दौरान टारगेट ओरिएंटेड वर्क प्रेशर बहुत बढ़ा। इसके अलावा रेड, सर्वे और कर आकलन (असेसमेंट) के नियमों निर्देशों में हुए बदलाव भी कारण कहे जा रहे हैं। फेसलेस असेसमेंट, और रेड में दिगर सर्किल के अफसरों को दी गई छूट भी आ
वीआरएस लेने वाले अफसरों का कहना है कि हमसे अधिक मेनेजेरियल (लिपिक वर्गीय)स्टाफ ने या तो नौकरी छोड़ी है या केंद्र, राज्य के अन्य किसी विभागों को ज्वाइन किया है। ताकि गृह राज्य या शहर में नौकरी की जा सके। स्टाफ की कमी की ही वजह से आयकर विभाग आईटीआर जमा करने से लेकर कर वसूली तक सब कुछ ऑनलाइन कर चुका है। कहीं भविष्य में डिजिटल अरेस्ट की तरह रेड भी ऑनलाइन न हो जाए।
कुछ नामों पर अभी भी पेंच
राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति के लिए मंगलवार को दिल्ली में बैठक हुई। बैठक में 14 रिक्त पदों के लिए डीपीसी हुई। यह पहला मौका है जब एक साथ इतनी संख्या में पद रिक्त हुए हैं, और इसके लिए डीपीसी हुई है। सोशल मीडिया पर अफसरों की एक सूची भी जारी हुई, जिनको लेकर यह दावा किया गया कि ये सभी पदोन्नत हुए हैं। डीपीसी के बाद डीपीसी की अनुशंसा के लिए फाइल सीएम तक आती है। सीएम के हस्ताक्षर के बाद फिर फाइल डीओपीटी को भेजी जाती है, और सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद विधिवत अधिसूचना जारी होती है।
इन प्रक्रियाओं में पखवाड़े भर का समय लग सकता है। डीपीसी तो 14 पदों के लिए हुई थी। इसके लिए 57 नाम विचरण जोन में थे। वरिष्ठताक्रम में सबसे ऊपर संतोष देवांगन का नाम था, जो पहले जांच के घेरे में थे। उन्हें क्लीनचिट मिलने के बाद भी पदोन्नति नहीं मिल पाई। अलबत्ता, उनसे जूनियर कई अफसरों को आईएएस अवार्ड हो चुका है। संतोष देवांगन ने कैट का दरवाजा खटखटाया था। चर्चा है कि इस बार उनके नाम पर मुहर लग गई है।
कुछ इसी तरह का मामला हिना अनिमेश नेताम का भी रहा है। सबसे उत्सुकता सौम्या चौरसिया की पदोन्नति को लेकर थी। स्वाभाविक है कि वो जेल में बंद हैं, और उनके खिलाफ कई तरह की जांच चल रही है। ऐसे में उनकी पदोन्नति असंभव थी। मगर चर्चा यह भी रही कि उन्हें अपात्र घोषित किया गया है। अपात्रता की स्थिति में उनके लिए पद नहीं रोका जाता, और जूनियर को पदोन्नति का मौका मिल जाता है। मगर सिर्फ जांच लंबित बताए जाने पर संबंधित के लिए पद रोका जाता है, और जांच खत्म होने पर पदोन्नति मिल जाती है। कुछ और अफसरों के खिलाफ गंभीर जांच चल रही है।
चर्चा तो यह भी है कि एक-दो ने अपने खिलाफ जांच को खत्म करवाने में सफलता प्राप्त कर ली है। वरिष्ठता क्रम में जिन नामों पर विचार हुआ है उनमें संतोष देवांगन, हिना नेताम, अश्वनी देवांगन, डॉ. रेणुका श्रीवास्तव, आशुतोष पाण्डेय, रीता यादव, लोकेश कुमार, आरती वासनिक, प्रकाश कुमार सर्वे, गजेन्द्र सिंह ठाकुर, तनूजा सलाम, लीना कोर्राम, तीर्थराज अग्रवाल, अजय कुमार अग्रवाल, सौमिल रंजन चौबे आदि के नाम की चर्चा है। अब किनके नाम पर मुहर लगी है यह तो अधिसूचना जारी होने के बाद ही पता चलेगा। फिलहाल तो कयास ही लग रहे हैं।
ऐसा होगा स्वागत द्वार

छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में सांस्कृतिक गतिविधियों और फिल्म उद्योग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से चित्रोत्पला फिल्म सिटी की स्थापना की घोषणा की है। इस परियोजना के तहत केंद्र सरकार ने भी 95 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने प्रस्तावित फिल्म सिटी के स्वागत द्वार का एक डिजाइन भी जारी कर दिया है।
चित्रोत्पला’ नाम ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह महानदी का ही प्राचीन नाम है, जिसे महानंदा और नीलोत्पला नाम से भी जाना जाता था। महानदी का उद्गम स्थल छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा क्षेत्र के श्रृंगी पर्वत में है। राज्य बनने के दो दशक बाद फिल्मसिटी के लिए एक गंभीर कोशिश हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए इससे पर्यटन और रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे।
2897 शिक्षकों का भविष्य अधर में
राज्य में बीएड डिग्रीधारी 2897 शिक्षकों का भविष्य हाईकोर्ट के आदेश से प्रभावित हो सकता है। यदि सरकार कोर्ट के निर्णय पर अमल करती है, तो इन शिक्षकों को हटाकर डीएलएड डिग्रीधारकों को मेरिट के आधार पर नियुक्त किया जाएगा। यह स्थिति उन शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है, जो 14 माह से सेवा में हैं।
याद होगा, 2003 की पीएससी परीक्षा में भी गड़बड़ी हुई थी, जिसे हाईकोर्ट ने प्रमाणित करते हुए नई सूची बनाने का निर्देश दिया था। मगर, प्रभावित अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट से स्थगन आदेश ले लिया, जिससे मामला लटका हुआ है। इस बीच, कई प्रभावित अफसर प्रमोशन पाकर आईएएस बन चुके हैं और कुछ कलेक्टर पद पर कार्यरत हैं।
बीएड शिक्षक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उनका चयन भी मेरिट के आधार पर कड़ी प्रतियोगिता के बाद हुआ था। पिछली सरकार की तकनीकी त्रुटि के कारण अब उनकी नौकरी पर संकट आ खड़ा हुआ है।
गौरतलब है कि प्रदेश में 33,000 शिक्षकों की भर्ती के लिए जून में एक परिपत्र जारी हुआ था, लेकिन संभवत: वित्त विभाग की मंजूरी न मिलने से प्रक्रिया रुकी हुई है। बीएड शिक्षक इन रिक्त पदों पर नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे हैं। फिलहाल, वे आंदोलन कर रहे हैं। कांकेर में प्रदर्शन कर उन्होंने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगाई।
भूपेश किस तरफ़ जा रहे हैं?
शहर के बाहरी इलाके के एक विवाह भवन में राजीव युवा मितान क्लब के पूर्व सदस्य एकजुट हुए, तो राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। भूपेश सरकार ने सभी जिलों में राजीव मितान क्लब का गठन किया था। क्लब से जुड़े लोगों को एक हजार रुपए महीना मानदेय मिलता था। सरकार बदलते ही मितान क्लब भंग कर दिया गया। और अब जब क्लब से जुड़े युवाओं को एक मंच पर लाने की कोशिश हुई, तो इसकी काफी प्रतिक्रिया भी हुई।
सुनते हैं कि राजीव मितान क्लब से जुड़़े युवाओं को एक मंच पर लाकर फिर से क्लब की गतिविधियां शुरू करने की योजना बनाई गई है। यह काम पूर्व सीएम के करीबी गिरीश देवांगन, और प्रदीप शर्मा सम्हाल रहे हैं। देवांगन, भूपेश सरकार में क्लब के गठन से सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं। कोरबा, राजनांदगांव और अन्य जगहों से युवाओं को आमंत्रित किया गया था। इन्हें विवाह भवन में ठहराया गया। यह विवाह भवन कांग्रेस के ही एक बड़़े नेता के पुत्र का है। इसमें सिर्फ भूपेश बघेल के करीबी नेता ही थे।
युवा संवाद के नाम से दो दिन चली युवाओं की बैठक को पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने संबोधित किया। बघेल ने उन्हें अगले 4 साल तक संघर्ष के लिए तैयार रहने का आव्हान किया। हालांकि इस कार्यक्रम में कोई राजनीतिक बातें नहीं हुई लेकिन क्लब के पुनर्गठन को लेकर हलचल मच गई। और जब सीएम के मीडिया सलाहकार पंकज झा और राजनांदगांव के सांसद संतोष पांडे ने क्लब के बहाने नया राजनीतिक दल गठन करने की आशंका जताई, तो भूपेश बुरी तरह बिफर पड़े। पंकज झा को काफी भला-बुरा कहा।
भूपेश की सफाई देने के बाद भी विवाद थमता नहीं दिख रहा है। कई लोगों ने प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट तक को बैठक की जानकारी भेजी है। दूसरी तरफ, कुछ लोगों ने याद दिलाया कि राज्य बनने के पहले दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने छत्तीसगढ़ संघर्ष परिषद का गठन किया था तब भी भारी विवाद हुआ था। उस समय भी इसकी शिकायत हाईकमान को भेजी गई थी। कांग्रेस के भीतर एक समानान्तर संगठन खड़ा करने के मसले पर शुक्ल को कई बार सफाई देनी पड़ी। बाद में शुक्ल कांग्रेस में अप्रासंगिक होते चले गए, और पार्टी भी छोडऩी पड़ी। भूपेश ने नया राजनीतिक दल बनाने की संभावना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि कांग्रेस ने उन्हें सब कुछ दिया है। जो लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं वो भूपेश बघेल को जानते नहीं हैं। चाहे कुछ भी हो, राजीव युवा मितान क्लब आगे किस तरह काम करेगा, इस पर पार्टी के लोगों की नजरें रहेगी।
मीटिंग से पहले मंदिर
प्रदेश के एक जिले में अफसर साप्ताहिक समीक्षा बैठक से डरे सहमे रहते हैं। बैठक हर मंगलवार को होती है। इसमें महिला कलेक्टर जिले में चल रही योजनाओं-कार्यक्रमों की बारीक समीक्षा करती हैं।
पहले तो कई अफसर साप्ताहिक समीक्षा बैठक में ज्यादा कुछ तैयारी कर नहीं आते थे लेकिन कलेक्टर ने लापरवाही पर बुरी तरह हडक़ाया, तो अफसर सचेत हो गए। कलेक्टर मैडम कई विभागों में काम कर चुकी हैं लिहाजा वो योजनाओं की बारीकियों से अवगत रहती हैं। और जब अफसर बात बनाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें सबके सामने फटकार सहनी पड़ती है।
अब हाल कई अफसर मंगलवार बैठक से पहले हनुमान मंदिर में दर्शन कर पहुंचने लगे हैं। कलेक्टर की सख्ती का नतीजा यह है कि जिले में लोगों की प्रशासनिक कार्यों में अड़चनें कम हो गई है।
अदालती आदेशों की अनदेखी
राज्य में सरकारी भर्तियों को लेकर बार-बार अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है। चाहे वह सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा हो या प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति, हर मामले में सरकार आदेशों की अनदेखी करती आ रही है।
हाल ही में प्राथमिक शाला सहायक शिक्षकों की भर्ती में डीएलएड अभ्यर्थियों की याचिका पर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि बीएड अभ्यर्थियों को बाहर कर डीएलएड पात्रता वाले अभ्यर्थियों को मौका दिया जाए। हाई कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर इस प्रक्रिया को पूरा करने और सूची पेश करने का आदेश दिया है। सरकार के पास अब केवल तीन दिन शेष हैं।
इसी तरह, आरक्षकों के 2259 पदों पर भर्ती प्रक्रिया भी आधी-अधूरी है। 2018 में शुरू हुई इस प्रक्रिया में 464 अभ्यर्थी चयनित होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित हैं। इन अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी और फैसला भी अपने पक्ष में पाया। बावजूद इसके, सरकार ने आदेश का पालन नहीं किया, जिससे इन अभ्यर्थियों को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
न्याय पाने के लिए बेरोजगार युवाओं को बार-बार अदालतों का रुख करना पड़ रहा है। ऊंची अदालतों में मुकदमा लडऩे का खर्च उठाना बेरोजगारों के लिए आसान नहीं है। सवाल उठता है कि सरकार ऐसी नौबत क्यों लाती है कि युवाओं को अदालती चप्पल घिसनी पड़े। उसके बाद, आखिर क्यों सरकार समय पर अदालत के आदेशों का पालन नहीं करती? क्यों इन युवाओं को अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है?
तस्वीर नहीं दस्तावेज

यह तस्वीर भोपाल गैस त्रासदी (2-3 दिसंबर, 1984) की भयावहता का प्रतीक है। यह एक मासूम बच्चे का शव है, जिसे मिट्टी में दफन किया गया था। यह दृश्य उस औद्योगिक त्रासदी का प्रतीक बन गया, जिसने करीब 16 हजार लोगों की जान ली और हजारों को स्थायी शारीरिक व मानसिक विकलांगता दी। इस दिल दहला देने वाली तस्वीर को खींचा था पाब्लो बार्थोलोमेव ने। नाम से लगता है कि वे कोई बाहरी हैं, मगर वे पूरी तरह भारतीय हैं। दिल्ली में उनका जन्म हुआ। फोटोग्रॉफी के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी।
इस तस्वीर को भोपाल गैस त्रासदी के सबसे प्रतीकात्मक दस्तावेज़ों में से एक के रूप में देखा जाता है। यह तस्वीर त्रासदी की अमानवीयता और उसके बाद के प्रभाव को दुनिया के सामने लाने का एक शक्तिशाली माध्यम बनी। पाब्लो बार्थोलोमेव की यह तस्वीर 1984 में वर्ल्ड प्रेस फोटो पुरस्कार भी जीत चुकी है। यह तस्वीर मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद भी दिलाती है। इंटरनेट में भोपाल गैस त्रासदी पर रघु राय की भी इसी तरह की मार्मिक तस्वीरें आपको सर्च करने पर मिल जाएगी।
नाम बड़े दर्शन छोटे
राजधानी रायपुर की एक बड़ी पुरानी रिहायशी कॉलोनी में रिलायंस कंपनी का घरेलू कामकाज की चीजों का बड़ा सा स्टोर खुला। एकदम सुबह से काम शुरू करने वाले इस स्टोर से सुबह जल्दी सामान चाहने वाले लोगों को सहूलियत होने लगी थी। इसके फ्लॉप होकर बंद होने की कोई वजह नहीं दिखती थी। लेकिन कुछ हफ्ते पहले इसे बंद कर दिया गया।
यह पत्रकार वहां कई बार सामान लेने गया। और ऐसे दर्जन भर मौकों में से एक भी ऐसा नहीं था जब काउंटर पर खड़े लोगों ने बदतमीजी से बात न की हो। ब्रांड और कंपनी चाहे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हो जाएं, उन दुकानों पर काम करने वाले लोग अगर बदसलूकी पर उतारू हों, और काउंटर पर लगे कैमरे भी कर्मचारियों का बर्ताव न सुधारें, तो धंधे का मंदा, और फिर बंद होना बहुत लंबा काम नहीं होता। हर किसी को यह याद रखना चाहिए कि जब तक वे किसी एकाधिकार वाले धंधे में न हों, तब तक उनकी बदतमीजी नहीं चल सकती। अब आज रेलगाड़ी में कोई कर्मचारी तमीज से बात करे, या बदतमीजी से, जनता के पास उसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन रसोई और घर के बाकी छोटे-छोटे सामानों के धंधे में कोई मोनोपोली तो है नहीं, शहरों में हर चौथाई किलोमीटर पर दुकानें रहती हैं, इसलिए बड़े ब्रांड को अपनी साख का भी ख्याल रखना चाहिए, वरना स्टोर में लगे कैमरे किस काम के?
बड़े आसामी का नाम नहीं
रायपुर के वीआईपी रोड स्थित शगुन फॉर्म में रविवार को आबकारी अमले ने छापेमारी कर विदेशी शराब बरामद की। फॉर्म में कॉकटेल पार्टी चल रही थी, जिसके लिए मेजबान ने आबकारी लाइसेंस नहीं लिया था, और जब आबकारी अमला पहुंचा, तो वहां अफरा-तफरी मच गई।
बताते हैं कि पार्टी के लिए हरियाणा से शराब आई थी। आबकारी अमले ने कार्रवाई शुरू की, तो प्रभावशाली मेजबान ने एक पूर्व मंत्री से संपर्क कर प्रकरण को रफा-दफा करने की भरसक कोशिश भी की। पूर्व मंत्री ने विभाग के आला अफसरों को फोन भी लगाया, लेकिन आबकारी अमला हड़बड़ी में था। तुरंत प्रकरण दर्ज कर लिया, और सरकारी प्रेस नोट जारी कर दिया।
आबकारी अमले ने मेजबान के भाग दौड़ पर इतनी उदारता दिखाई कि उनका नाम प्रेस नोट में जारी नहीं किया। मगर बरामद किए गए शराब के ब्रांड के नाम सार्वजनिक कर दिए जिससे यह अंदाज जरूर लग गया कि मेजबान बड़ा आसामी है।
शासकीय कार्य बाधा का जुर्म

शासकीय कार्यालय में कार्यावधि यानी सुबह 10 से शाम 5.30 के दौरान अधिकारी कर्मचारियों से मारपीट या विवाद करना अपराध होता है। ऐसा करने पर गिरफ्तारी से लेकर सजा तक का प्रावधान है।
हालांकि व्यक्तिगत रूप से ऐसे मामले कम ही होते हैं और दलीय झुंड ऐसे मामले अधिक करते हैं। लेकिन सजा होने के कम ही मामले हुए हैं। और फिर इन मामलों को सरकार राजनीतिक मामले कहकर रद्द भी करती रही हैं। आजकल हर कोई व्यक्ति जैसे ठेकेदार, तथाकथित नेता, एवं आरटीई कार्यकर्ता सूचना के नाम पर दबाव बनाते हैं। इनमें भी अधिकारी कर्मचारियों की व्यक्तिगत एवं उनके परिवार की जानकारी ले निहितार्थ में ब्लैकमेलिंग करना होता है।
इन मामलों के प्रकाश में एक जागरूक कर्मचारी नेता ने ऐसे मामलों पर दर्ज होने वाले अपराधों पर धाराओं के प्रावधानों की एग्जाई जानकारी शेयर की है। बस कर्मचारियों को अपने-अपने दफ्तर से बाहर इन्हें सूचना बोर्ड या फ्लैक्स लगाकर सार्वजनिक करना होगा। इन्हीं नेता ने कुछ वर्ष पहले अभनपुर तहसील के एक बर्खास्त कर्मचारी को ऐसी ही जानकारी देकर बहाल करने में अहम भूमिका निभाई थी। बताया गया है कि इस कर्मचारी ने एक आरटीई कार्यकर्ता के दबाव में अपने साहब की जानकारी दी थी।
राजधानी का फासला कम नहीं हुआ
सरगुजा और बस्तर दो ऐसे इलाके हैं, जिनके लिए राजधानी का फासला लगातार हवाई सेवाओं के विस्तार के बाद भी कम नहीं हो पाया है। अंबिकापुर से रातभर ट्रेन का सफर कर राजधानी रायपुर पहुंचा जा सकता है लेकिन बस्तर के लोगों को केवल बस पर निर्भर रहना होता है। रायपुर और जगदलपुर के बीच हवाई सेवा शुरू होने के बाद बंद की जा चुकी है। इसी तरह यहां के लोगों की मांग विशाखापट्टनम और भुवनेश्वर के लिए भी हवाई सेवाओं की है। अभी हैदराबाद, दिल्ली, कोलकाता के लिए बिलासपुर के रास्ते से हवाई सेवा चल रही है। पर स्थानीय मांग के अनुरूप सेवाओं में विस्तार नहीं हो रहा है।
टॉपर खुलकर इंटरव्यू दे रहे
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के परीक्षा परिणामों पर इस बार कोई सवाल नहीं उठा रहा है। सरकार ने इस प्रतिष्ठित परीक्षा में धांधली को रोकने को चुनावी वादे में मोदी की गारंटी के रूप में शामिल किया था। जब 2021 के नतीजे आए तो तुरंत बाद उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे। सवाल तो अपनी जगह थे, जो टॉपर थे वे भी कहीं छिप गए। वे मीडिया के सामने आ नहीं रहे थे। किस तरह उन्होंने तैयारी की, सफलता कैसे मिली यह बाकी प्रतियोगियों के लिए उदाहरण बन सकता था, पर वे अपने संघर्ष के बारे में बताने के लिए आगे आए ही नहीं। इस बार जिन्होंने अपनी मेहनत से कामयाबी हासिल की है वे खुलकर मीडिया से बात कर रहे हैं। जो रैंकिंग में पिछड़ गए, उनको भी शिकायत नहीं है। वे अगली बार ज्यादा मेहनत करने की बात कर रहे हैं।
सोनकंठी गौरेया

गौरेया तो छत्तीसगढ़ में बहुतायत से मिलते हैं। पर इस गौरेये में एक खास बात है। इसके कंठ का एक हिस्सा पीला है। यह गौरैया है तो भारत की ही, लेकिन इस ठंड के मौसम में छत्तीसगढ़ में बहुतायत में दिखाई देते हैं। प्रख्यात पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने अपनी किताब फाल ऑफ ए स्पेरो में जिक्र किया है कि वे शिकारी बनना चाहते थे लेकिन इस पक्षी को देखने के बाद उन्होंने पक्षियों पर ही शोध करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
पीएससी में किस जात के कितने?
छत्तीसगढ़ पीएससी के इस बरस के नतीजों में जिन 703 लोगों का चयन किया गया है उनमें जातियों का एक विश्लेषण छत्तीसगढ़ के जानकार ने किया है। उन्होंने यह बताया है कि इस मेरिट लिस्ट में 43 साहू समाज के हैं, इनमें से नियुक्ति पाने वाले 17 लोगों के नाम भी उन्होंने लिखे हैं। उन्होंने कहा है कि पिछले 5 वर्ष से हर बार 20-22 साहू नियुक्ति पाते हैं, इस बार यह संख्या 17 ही है। कुल पदों के 7 फीसदी पर साहू उपनाम लिखने वाले लोगों का चयन हुआ है जबकि कुल ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी है।
इसके अलावा उन्होंने कुर्मी समाज के लोगों का आंकड़ा भी निकाला है इनमें नियुक्ति पाने वाले 18 लोग हैं। उनका कहना है कि 17 साहू और 18 कुर्मी नियुक्ति पा रहे हैं जो कि ओबीसी आरक्षण का 90 फीसदी है। ओबीसी आरक्षण का 90 फीसदी हिस्सा यही दो जातियां ले ले रही हैं। जबकि ओबीसी आबादी के भीतर इन दोनों की आबादी का जोड़ 15-16 फीसदी ही है। इसी तरह अनुसूचित जाति और जनजाति में भी शासक जातियों के लोगों को ही अधिक लाभ मिल रहा है, ऐसा उनका विश्लेषण है। इन तीनों आरक्षित वर्गों में गिनी-चुनी जातियों का ही कब्जा है।
लेकिन जो सबसे दिलचस्प और सनसनीखेज बात है, वह यह कि कुल 252 नियुक्तियों में से 45 ऐसे ओबीसी हैं, जो कि अनारक्षित वर्ग में चुने गए हैं। इनमें 4 यादव, 5 देवांगन, 1 कोलता, 1 कुम्हार, और 1 नाई हैं। बाकी सारे के सारे साहू और कुर्मी हैं!
घोटाले का रेट कैसे जारी रखें?
प्रदेश में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी चल रही है, लेकिन राइस मिलर्स मुंह फुलाए बैठे हैं। वे मिलिंग के लिए एग्रीमेंट नहीं कर रहे हैं। मिलर्स मिलिंग की राशि 120 रूपए से घटाकर 60 रुपए प्रति क्विंटल करने से खफा हैं। वो चाहते हैं कि मिलिंग की राशि यथावत रखी जाए। सरकार मिलर्स के दबाव में तो है, लेकिन राशि यथावत रखने के पक्ष में नहीं है।
दरअसल, पिछली सरकार में कस्टम मिलिंग घोटाले का पर्दाफाश हुआ था। इसमें सरकार ने मिलिंग की राशि प्रति क्विंटल 40 रुपए से बढ़ाकर सीधे 120 रूपए कर दी थी। इसके एवज में मिलर्स से प्रति क्विंटल 40 रुपए की उगाही हुई थी। ये सारी बातें ईडी की जांच में आई है, और इसमें अहम भूमिका निभाने वाले एक बड़े फूड अफसर मनोज सोनी, और राइस मिलर रोशन चंद्राकर जेल में हैं। इन सबको देखते हुए सरकार फूंक फूंककर कदम रख रही है।
कस्टम मिलिंग घोटाला उजागर होने के बाद साय सरकार ने पहले तो कस्टम पॉलिसी बदल दी, और जब नई पॉलिसी के विरोध में मिलर्स ने काम बंद कर दिया, तो बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है। सीएम विष्णुदेव साय, और सरकार के मंत्रियों से चर्चा के बाद मिलिंग पॉलिसी में संशोधन पर सहमति बनी है।
सरकार मिलिंग की राशि 60 से बढ़ाकर 80 रूपए करने के लिए तैयार हो गई है। फिर भी, सरकार को 40 रुपए प्रति क्विंटल की बचत होगी। राइस मिलर्स भी संतुष्ट है कि उनकी बात कुछ हद तक मान लिया गया है। ये अलग बात है कि पिछली सरकार में जितनी कमाई की थी उतना इस बार नहीं होगा। इस बात का डर भी है कि ज्यादा दबाव बनाने से ईडी अपनी जांच तेज कर सकती है। संकेत हैं कि सोमवार से मिलर्स एग्रीमेंट करना शुरू कर देंगे। देखना है आगे क्या होता है।
आयकर बीट में सन्नाटा

कल एक आयकर अन्वेषण विंग के अफसर से चर्चा के दौरान किसी ने यूं ही पूछ लिया क्या सर लंबा अर्सा हो गया है। कोई सर्वे, रेड नहीं हो रही। आयकर बीट में सन्नाटा क्यों है? उन्होंने कहा हां करीब मई के बाद से कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। इसकी वजह लोकसभा चुनाव, उसके बाद विभाग में महानिदेशालय से लेकर सर्कल स्तर पर बड़े अफसर से लेकर कर्मचारियों के तबादले।
हर सर्किल में नया अमला पदस्थ है जो स्थानीय बाजार को समझ रहा है। इसके अलावा सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले वर्षों में इतने रेड सर्वे हो चुके थे कि सबके डाक्यूमेंटेशन और अपील प्रकरणों के जवाब दावे के पेपर वर्क में सभी व्यस्त हैं। 20-22 विभागों को कोआर्डिनेट कर फाइल तैयार करनी पड़ रही है।
इस पर पूछा कि इससे तो कर राजस्व में असर पड़ रहा होगा? उन्होंने कहा कि रेड का रेवेन्यू लॉस या टारगेट से सीधा संबंध नहीं है। टैक्स रेवेन्यू की आवक तो बनी रहती है। और टारगेट भी पूरा हो जाता है। इस पर जब हमने कारोबारियों से चर्चा की तो उनका कहना था कि डबल इंजन की सरकार होने से भी रेड केस छंटनी करने में दिक्कत होती है।
हवाई सेवा के नाम पर खानापूर्ति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंबिकापुर के मां महामाया एयरपोर्ट से हवाई सेवाओं का 20 अक्टूबर को उद्घाटन कर दिया था। इसके ठीक दो माह बाद 19 दिसंबर से अंबिकापुर से बिलासपुर के बीच उड़ान शुरू करने की घोषणा की गई है। फ्लाई बिग की ओर से यह सुविधा दी जा रही है। यह जरूर है कि बिलासपुर से अंबिकापुर के लिए दिन भर बसें चलती हैं लेकिन वे हवाई मुसाफिऱों के दर्जे की नहीं हैं। अंबिकापुर-बिलासपुर के बीच की दूरी निजी वाहन में चार से पांच घंटे में तय की जा सकती है। जिन्हें फ्लाइट से बिलासपुर या अंबिकापुर जाना है उन्हें एक डेढ़ घंटे चेक इन करने में लगेगा और इतना ही समय दरिमा या चकरभाठा से शहर आने-जाने में। इसके लिए उन्हें टैक्सी या निजी वाहन का सहारा लेना होगा। यह जरूर है कि हाईकोर्ट में जिन यात्रियों को काम है उन्हें चकरभाठा हवाई अड्डा नजदीक पड़ेगा। देखना होगा कि इस हवाई सेवा को कितना प्रतिसाद मिलता है। अंबिकापुर से रांची और वाराणसी के लिए हवाई सेवाओं की मांग जनप्रतिनिधियों और कारोबारियों की थी, जो अभी अधूरी है। अभी तो अंबिकापुर से आने वाली फ्लाइट को दिल्ली, कोलकाता, रायपुर या जगदलपुर से कनेक्ट करने की भी योजना नहीं है। हवाई सेवा वाले शहर के रूप में अंबिकापुर का नाम जरूर दर्ज हो जाएगा लेकिन यह लोगों की मांग और जरूरतों के हिसाब से शुरू की गई उड़ान तो फिलहाल नहीं लगती।
सभी यात्रियों का स्वागत...

सरकारी प्रतिवेदन कुछ इसी तरह से बनते हैं और उसे पढक़र भड़ास भी पलटकर निकाली जाती है। दरभंगा एयरपोर्ट ने ट्विटर (एक्स) पर लिखा- विमानों की कुल आवागमन संख्या- जीरो, यात्री आवागमन की संख्या-जीरो..। आगे लिखा हम दरभंगा हवाई अड्डे पर सभी यात्रियों का स्वागत करते हैं। आपकी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। जब यात्रियों की संख्या जीरो है तो उनका स्वागत और सुरक्षा किस तरह की गई? यही सवाल एक व्यक्ति ने अपने अंदाज में पूछ लिया है।
...और रिटायर हो गए दास
वर्ष 2000 में गठित राज्य के लिए आबंटित आईपीएस कैडर के एक अफसर बिना छत्तीसगढ़ आए आज रिटायर्ड हो गए। 1987 बैच के आईपीएस स्वागत दास विभाजन के समय से ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में ही कार्यरत रहे और वो आईबी में स्पेशल डायरेक्टर के पद पर रहे। इन 24 वर्षों में निर्धारित हर पदोन्नति प्रोफार्मा आधार पर मिलती रही। और डीजीपी अशोक जुनेजा के रिटायरमेंट के बाद उन्हें डीजीपी बनाने का हल्ला उड़ा। उस दौरान स्वागत दास रायपुर भी आए थे, लेकिन जुनेजा को एक्सटेंशन मिल गया। और अब स्वागत दास भी रिटायर हो गए। चर्चा यह भी है कि केन्द्र सरकार उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंप सकती है।
स्वागत दास से एक साल जूनियर रवि सिन्हा खुफिया एजेंसी रॉ के चीफ हैं। रवि सिन्हा छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कुछ दिन पीएचक्यू में पदस्थ रहे। बाद में वो केन्द्र सरकार में चले गए। फिर उनकी पोस्टिंग रॉ में हो गर्ई। अभी वो रॉ के चीफ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। रवि सिन्हा का नाम भी डीजीपी पद के लिए चर्चा में रहा है। दोनों अफसरों का नाम भी हर दो तीन वर्ष बाद वापसी के लिए, लिया जाता रहा।
दूसरी ओर 1 नवंबर 2000 की डेट में अलॉटेड कैडर का हर आईएएस अफसर देर सबेर यहां आकर ही रिटायर हुआ। बीवीआर सुब्रमण्यम, स्व.श्रीमती एम गीता प्रमुख हैं। सुब्रमण्यम तो करीब 15 साल बाद आए। और फिर यहां उनकी वर्किंग को देख पीएम नरेन्द्र मोदी- अमित शाह साथ बुला ले गए। धारा 370 हटाए जाने और केंद्र शासित राज्य गठन की पूरी प्रक्रिया के दौरान जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव भी रहे।
ब्रह्म समस्या का हल निकल गया

प्रदेश के मठ मंदिर भी अपने खेतों में पैदा हुए धान को बेच सकेंगे। इन सभी के महंत,ट्रस्ट प्रमुख और मुख्य पुजारी 14 नवंबर से नाराज चल रहे थे। ये मठ मंदिरों के आधिपत्य में सैकड़ों एकड़ खेतों में हजारों क्विंटल धान पैदा करते हैं। खरीफ रबी दोनों सीजन में। रमन सिंह सरकार ने पहली बार इनसे खरीदी की व्यवस्था की। जो अब तक जारी रही। इस वर्ष पहले दिन से वे खरीदी केंद्र जाकर बिना टोकन लिए लौटते रहे। यह बात धीरे धीरे पूरे प्रदेश के मठ मंदिर में गूंज ने लगी। और यह भ्रम फैलने लगा कि सरकार इनसे धान खरीदना नहीं चाह रही।
मठ प्रमुख ब्राह्मणों की नाराजगी ठाकरे परिसर तक पहुंची। और फिर शुक्रवार को खाद्य, सहकारिता, कृषि अफसरों को तलब कर समस्या का हल निकाला गया। समस्या खरीदी सॉफ्टवेयर में आ रही थी। वह मठ प्रमुख पुजारियों को कृषक के रूप में एंट्री नहीं ले रहा था। क्योंकि सॉफ्टवेयर में मठ मंदिरों का नाम दर्ज है न कि वर्तमान प्रमुख या पुजारी का। इस ब्रह्म समस्या को साफ्टवेयर में सुधार लिया गया। और अब 800 मठ मंदिरों का भी धान खरीदा जा सकेगा।
Teacher

यह बिहार में हो रही एक शादी का स्वागत द्वार है। लोगों को पता होना चाहिए कि जिसकी हो रही है वह सरकारी टीचर है। इसीलिए गेट पर अपनी योग्यता लिखकर टांग दिया गया है- बीपीएससी टीचर। लोगों को पता होना चाहिए कि किस हैसियत वाले का कार्यक्रम नहीं हो रहा है।
चेकिंग अभियान चलेगा सडक़ों पर?
कल बसना में बाइक सवार तीन युवकों की मौत हो गई। उनको एक पिकअप वाहन ने रॉंग साइड से आकर टक्कर मार दी । दो बाइक के बीच टक्कर में जांजगीर-चांपा में भी तीन युवकों की मौत दो दिन पहले ही हो गई। बिलासपुर के सडक़ पर अंधेरे में खड़े ट्रक से टकराकर दो युवक जान गंवा बैठे। यह रोज हो रहे सडक़ हादसों के कुछ उदाहरण है। इन सभी मामलों में सभी की, या कुछ लोगों की मौत रोकी जा सकती थी यदि वे हेलमेट पहने होते या तीन सवारी सफर कर बेकाबू न होते। राज्य सडक़ सुरक्षा परिषद् की कल राजधानी रायपुर में सीएम निवास पर बैठक हुई। इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट को प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि यदि चारपहिया वाहन चालक सीट बेल्ट बांधें और दुपहिया सवार हेलमेट पहनें तो सडक़ दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों को 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। प्रदेश में हाईवे का जाल बिछ रहा है। तेज रफ्तार के शौकीन बढ़ रहे हैं। सडक़ पर चलना दिनों-दिन जोखिम भरा होता जा रहा है। ऐसे में पूरे प्रदेश में हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर यातायात पुलिस का अभियान ठंडा पड़ा है। हाईवे पर कहीं-कहीं सीट बेल्ट नहीं लगाने वालों का चालान शुरू किया गया है लेकिन हेलमेट बिना सफर करने वाले, तीन सवारी चलने वालों पर कार्रवाई तो पुलिस लगभग भूल ही चुकी है। कुछ जिलों में पुलिस खुद से ऐसा अभियान चला रही है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में एक हेलमेट जोन बनाया गया है। इस रास्ते पर बिना हेलमेट पहने कोई गुजरा तो उस पर कार्रवाई होगी। कल की बैठक में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इन दोनों मामलों, सीट बेल्ट और हेलमेट पर कोई रियायत नहीं बरतने का निर्देश अफसरों को दिया है। देखना है कि क्या अब यातायात पुलिस कोई सक्रियता दिखाएगी?
डेट देखकर ईश्वर अपने श्री चरणों में स्थान दें
पहले कोरोना काल और फिर उसके बाद से ट्रेनें वह भी यात्री ट्रेनें लगातार रद्द कर रहा है। कभी ट्रैक फिटनेस, मेंटेनेंस नान इंटरलॉकिंग, पुल पर गर्डर बिठाने, दूसरी तीसरी और चौथी लाइन को बिछाने जोडऩे आदि आदि कारण बताते रहा है। लेकिन अब बढ़ते कोहरे के मौसम को देखते हुए कुछ ट्रेनों को अस्थायी रूप से रद्द करने का फैसला लिया है। इनमें छत्तीसगढ़ को बनारस वाराणसी से जोडऩे वाली सारनाथ एक्सप्रेस भी शामिल हैं। ऐसे में दिसंबर से मार्च अंत तक अस्थि विसर्जन,श्राद्ध कर्म के लिए वाराणसी जाने वालों को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी लंबी न सही अप्रैल तक की आयु से परिपूर्ण करें। दुर्ग-छपरा-दुर्ग एक्सप्रेस (नंबर 15160/15159) को दिसंबर से मार्च तक ऐसे कैंसिल किया गया है मानो यमराज, इस ट्रेन की जर्नी डेट देखकर लोगों की आत्मा ले जाएंगे। यह ट्रेन एक दिन चलेगी तो दूसरे दिन रद्द रहेगी। ऐसे में किसी परिजन को खोने से अधिक दुखदायी, पीड़ा से अधिक उनका अस्थि विसर्जन करना होगा। एक महराज नेे ही इस ओर हमारा ध्यानाकृष्ट कराया है।
उनका कहना था कि ऐसे अंतराल के बजाए रेल प्रशासन मार्च तक पूरा ही रद्द कर दे। हम यहां वो डेट दे रहे हैं जिन दिनों ट्रेन रद्द रहेगी इस पीड़ा की शुरुआत 3 दिसंबर से होगी। ट्रेन 3, 5, 8, 10, 12, 15, 17, 19, 22, 24, 26, 29, 31 तारीख , फिर जनवरी में 2, 5, 7, 9, 12, 14, 16, 19, 21, 23, 25, 28, 30 और 02, 04, 06, 11, 13, 16, 18, 20, 23, 25 फरवरी एवं 27 मार्च 25 को रद्द रहेगी। इसी तरह से छपरा से वापसी में 15159 छपरा-दुर्ग एक्सप्रेस 2, 4, 7, 9, 11, 14, 16, 18, 21, 23, 25, 28, 30 दिसंबर, 2024, 01, 04, 6, 8, 11, 13, 15, 18, 20, 22, 25, 27, 29 जनवरी, 1, 3, 5, 8, 10, 12, 15, 17, 19, 22, 24 एवं 26 मार्च- 25 को निरस्त रहेगी। शेष तिथियों में पूर्ववत चलाई जाएगी।
जीत से बड़ी शपथ

प्रदेश में पहले भी उपचुनावों में विधायक चुनकर आए हैं, लेकिन जो तामझाम सुनील सोनी के शपथ ग्रहण में दिखा, वो पहले किसी नवनिर्वाचित विधायकों के शपथ में नहीं था। राज्य बनने के बाद सबसे पहले मरवाही विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए। उस समय भाजपा विधायक रामदयाल उइके ने तत्कालीन सीएम अजीत जोगी के लिए नाटकीय अंदाज में विधानसभा से इस्तीफा दिया था, और वो कांग्रेस में शामिल हुए। मरवाही सीट पर पहले उपचुनाव में अजीत जोगी रिकॉर्ड वोटों से चुनाव जीते। जीत के बाद सीएम रहते उन्होंने तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के कक्ष में विधिवत विधानसभा की सदस्यता ग्रहण की।
अजीत जोगी से लेकर सुनील सोनी तक उपचुनावों में दर्जनभर से अधिक विधायक चुने गए। ज्यादातर नवनिर्वाचित विधायकों ने अध्यक्ष के कक्ष में ही शपथ ली। मगर सुनील सोनी के शपथ के सैकड़ों पार्टी नेता साक्षी बने। एक हॉल में सुनील सोनी को गुरुवार को शपथ दिलाई गई। डायस में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, सीएम विष्णुदेव साय, संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप, विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा के साथ ही सुनील सोनी व सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी विजयी मुस्कान बिखेरते विराजमान थे।
डायस के नीचे कुर्सियों में प्रथम पंक्ति में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, गौरीशंकर अग्रवाल, स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल, और टंकराम वर्मा बैठे थे। इसके अलावा कई विधायक भी थे। सुनील सोनी के शपथ के लिए सांसद बृजमोहन अग्रवाल, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से अनुमति लेकर एक दिन पहले ही आ गए थे।
शपथ के बाद सुनील सोनी ने कार्यकर्ताओं के बीच बैठकर लॉबी में फोटो भी खिंचवाई। स्वागत सत्कार के बीच थोड़ी चूक भी हो गई। कार्यकर्ताओं के लिए नाश्ते का इंतजाम किया गया था, लेकिन नाश्ता विलंब से पहुंचा। तब तक ज्यादातर कार्यकर्ता निकल चुके थे। बाद में वहां कर्मचारियों को वितरित किया गया। कुल मिलाकर सुनील सोनी की जितनी बड़ी जीत थी उतना ही बड़ा शपथ ग्रहण समारोह रहा।
नगरीय चुनाव टलेंगे तो नहीं?
प्रदेश में नगरीय निकायों का कार्यकाल दिसंबर में समाप्त होने जा रहा है। राज्य निर्वाचन आयुक्त की ओर से पंचायतों और नगरीय चुनावों के लिए बैठक तो ली जा रही है लेकिन सरकार की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि कार्यकाल खत्म होने के साथ चुनाव हो जाएंगे। पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए आयोग की रिपोर्ट सरकार को सौंपी जा चुकी है, मगर इसकी भी कोई सुगबुगाहट दिखाई नहीं दे रही है। पिछले दिनों हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस विषय पर चर्चा के कयास लगाए जा रहे थे, पर कोई निर्णय नहीं हुआ। एक बात जरूर हुई है कि नगर-निगम, नगर पालिका व नगर पंचायतों के अध्यक्षों और जनप्रतिनिधियों को जारी किया जाने वाला फंड अधिकांश नगरीय निकायों में रोक दिया गया है। सरकार के पास अधिकार है कि वह अध्यादेश लाकर चुनाव को 4-6 माह आगे सरका सकती है। सभी राजनीतिक दलों को फैसले, खासकर आरक्षण प्रक्रिया शुरू होने की प्रतीक्षा है।
एक रेट में नारियल पानी

भारत के तकरीबन सभी राज्यों को घूम चुके इस सैलानी ने सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प पोस्ट डाली है। उनका कहना है कि नारियल पानी का रेट पूरे देश में एक जैसा है। चाहे दिल्ली, लखनऊ में पी लो या नारियल उत्पादक गोवा, आंध्रप्रदेश, केरल में। हर जगह यह करीब 60 रुपये में ही मिलेगा। यदि दक्षिण भारत से उत्तर भारत नारियल लाया जा रहा हो तो उसका भाड़ा भी तो लगता होगा। सवाल तार्किक है। आप भी इसका जवाब ढूंढ पाएं तो पता करिये..।
जलता मुद्दा और चुप्पी
भरतपुर-सोनहत इलाके में नाबालिग छात्रा से रेप का मामला सुर्खियों में हैं। इस पूरे मामले के आरोपी तीन शिक्षकों, और वन कर्मियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। बावजूद इसके लोगों में पुलिस-प्रशासन के खिलाफ काफी गुस्सा है। पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने इस मामले में चुप्पी पर स्थानीय विधायक रेणुका सिंह को निशाने पर लिया है। कमरो ने फेसबुक पर अपने पोस्ट में लिखा कि बेटियों की लूट रही अस्मत। लापता विधायक मंत्री बनने कर रही कसरत।
उन्होंने आगे लिखा कि न सदन में न सडक़ में। आखिर कहां है लापता विधायक रेणुका सिंह। गुलाब कमरो ने रेणुका सिंह की विधानसभा में कम उपस्थिति को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि रेणुका सिंह अब तक केवल 9 दिन विधानसभा पहुंची है। यानी प्रदेश के 90 विधायकों में सबसे कम। गुलाब कमरो ने लिखा कि काल्पनिक सीएम दीदीजी (रेणुका सिंह) मिले, तो भरतपुर-सोनहत विधानसभा के हवाले कर देवें। अब ऐसे गंभीर विषयों पर जनप्रतिनिधि खामोश रहेंगे, तो विरोधी उनकी सक्रियता पर सवाल उठाएंगे ही।
मुख्य सचिवों से मोदी की वन टू वन
पीएम नरेंद्र मोदी ने 13 दिसंबर को देशभर के मुख्य सचिवों को चर्चा के लिए बुलाया है। आमंत्रण सामूहिक बैठक जैसा होगा या अलग-अलग वन टू वन यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। हालांकि यह तय है कि यह सालाना होने वाला सीएस कानक्लेव नहीं है । और सीएस दफ्तर के सूत्र बता रहे कि वन टू वन मीटिंग है। ऐसे समय जब देश के 29 राज्यों में से अधिकांश में भाजपा और गठबंधन की डबल इंजन सरकारें हैं। करीब 10 राज्यों में विपक्षी दल सत्तारूढ़ हैं। पीएमओ के पास इनपुट है कि विपक्षी राज्यों में सरकारें केंद्रीय फंड का दुरुपयोग कर रही हैं तो भाजपा गठबंधन सरकारों में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है?।
ऐसी ही कवायद कैबिनेट सक्रेटरी शुरू कर चुके हैं। वे हर सप्ताह एक ओपन हाउस कर रहे हैं। जिसमें राज्यों से दिल्ली आने वाले मुख्य सचिव, एसीएस, पीएस और सचिवों और अन्य अभा संवर्ग के अफसरों के व्यक्तिगत और राज्यों के मुद्दों पर चर्चा कर रहे। इन बैठकों का निचोड़ नीति आयोग की बैठक और आम बजट में देखने को मिल सकता है।
बाघों की टहलकदमी

अचानकमार अभयारण्य में मध्यप्रदेश के करंजिया से चहलकदमी करते हुए एक बाघ पहुंच गया है। वन विभाग इसकी निगरानी कर रहा है लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से उसका लोकेशन नहीं बताया गया है। दावा किया जाता है कि अचानकमार में 10 बाघ हैं। यदि इस बाघ ने अपना बसेरा बना लिया तो संख्या बढक़र 11 हो जाएगी। कान्हा नेशनल पार्क से एक घायल बाघिन पहले ही यहां आ चुकी है। वहीं, कसडोल में एक बाघ कस्बे के आसपास मंडराता दिखा। वन विभाग ने उसे रेस्क्यू कर लिया है। सीएम विष्णुदेव साय ने वन कर्मचारियों की उनकी कामयाबी के लिए तारीफ की है। सवाल बना हुआ है कि ये मांसाहारी जीव क्या दाना-पानी के लिए भटक रहे हैं?
जनता को फायदा, श्रेय पर तकरार
चिरमिरी से साजा पहाड़ होते हुए मनेंद्रगढ़ तक की सडक़ परियोजना को राज्य सरकार ने मंजूरी दी है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इस फैसले का ऐलान किया। यह सडक़ परियोजना चिरमिरी और मनेंद्रगढ़ के बीच दूरी कम करेगी, जिससे अस्पताल और रेलवे स्टेशन जाने वालों को खासा फायदा होगा।
लेकिन सवाल यह है कि इस परियोजना का श्रेय किसे दिया जाए—भाजपा सरकार को या कांग्रेस को? इस पर सियासत शुरू हो गई है। पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल का कहना है कि मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल नाहक ही श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इस सडक़ की स्वीकृति कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही मिल गई थी। अब जब निर्माण कार्य शुरू होने वाला है, तो इसे नया काम बताया जा रहा है। ऐसे हालात अक्सर देखने को मिलते हैं। एक सरकार कोई काम स्वीकृत करती है, तो दूसरी सरकार उसका उद्घाटन करती है। यही सिलसिला कांग्रेस और भाजपा के बीच भी चला आ रहा है। जब कांग्रेस सत्ता में आई, तो उसने भाजपा कार्यकाल में स्वीकृत कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया।
मगर, रायपुर के बहुचर्चित स्काई वॉक का उदाहरण लें। भाजपा सरकार ने इसे शुरू किया, फिर कांग्रेस ने सत्ता में आकर इसे अधूरा छोड़ा। अब भाजपा सरकार के लौटने के बावजूद यह परियोजना खंडहर बनी हुई है।
तो हैरान मत होना...
आईपीएस के 89 बैच के अफसर, और डीजीपी अशोक जुनेजा फरवरी के पहले हफ्ते में रिटायर हो रहे हैं। उन्हें छह माह का एक्सटेंशन दिया गया था। जुनेजा के रिटायरमेंट के पहले ही उनके उत्तराधिकारी के नामों पर चर्चा चल रही है। सीएम विष्णुदेव साय ने दो दिन पहले मीडिया से चर्चा में कहा कि समय आने पर डीजीपी की नियुक्ति कर दी जाएगी।
चर्चा यह भी है कि अशोक जुनेजा को छह माह का एक्सटेंशन और दिया जा सकता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने बस्तर को नक्सल मुक्त बनाने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है, और इसके लिए मार्च-2027 तक नक्सलियों के खात्मे के लिए समय-सीमा निर्धारित की है। इसकी वजह से पहले केन्द्र सरकार में बस्तर आईजी सुंदरराज पी के एनआईए में पोस्टिंग को निरस्त कर दिया गया। उन्हें बस्तर में यथावत रखने के लिए कहा गया है। जबकि सुंदरराज को राज्य सरकार ने पहले प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए हरी झंडी दी थी। इन सबकी वजह से जुनेजा को एक्सटेंशन मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देखना है आगे क्या होता है।
बिल्डर की ताकत
रायपुर नगर निगम सीमा क्षेत्र के गांव अमलीडीह में कॉलेज के लिए आरक्षित 9 एकड़ सरकारी जमीन को नामी बिल्डर रामा बिल्डकॉन को आबंटित करने का मामला गरमा गया है। पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा ने विधायक रहते ग्रामवासियों की सहमति से कॉलेज के लिए उक्त जमीन को आरक्षित करने के लिए पहल की थी। मगर गुपचुप तरीके से जमीन रामा बिल्डकॉन को आबंटित कर दी गई।
बताते हैं कि कांग्रेस सरकार की सरकारी जमीन के आबंटन की नीति रही है। बाजार दर पर सरकारी जमीन को आबंटित किया जा सकता था। रामा बिल्डकॉन के डायरेक्टर राजेश अग्रवाल ने विधानसभा आम चुनाव की मतगणना के तीन दिन पहले उक्त जमीन को आबंटित करने के लिए आवेदन लगाया था, और तत्कालीन कलेक्टर ने आनन-फानन में आबंटन से जुड़ी सारी प्रक्रिया पूरी कर मंत्रालय भिजवा दिया।
सरकार बदल गई, लेकिन रामा बिल्डकॉन के आवेदन पर कार्रवाई गुपचुप चलती रही। इसी बीच साय सरकार ने कांग्रेस सरकार की जमीन आबंटन की नीति को ही निरस्त कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि निरस्तीकरण के आदेश से पहले ही रामा बिल्डकॉन को जमीन आबंटित करने का फैसला हो गया। यह फैसला जून में ही हो गया था, और अब जब बात छनकर बाहर निकली, तो ग्रामीण गुस्से में हैं।
रायपुर ग्रामीण के विधायक मोतीलाल साहू ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सीएम के संज्ञान में मामला लाया है। साहू ने तत्कालीन कलेक्टर को घेरे में लिया है। वे सीएम से इस मामले पर हस्तक्षेप करने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। चाहे कुछ भी हो, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली जग जाहिर हुई है।
आवास के लिए हडक़ंप
प्रदेश में भाजपा की सरकार लौटी तो उसमें प्रधानमंत्री आवास योजना पर किया गया वादा भी एक कारण था। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में कैबिनेट की पहली ही बैठक में 18 लाख अधूरे आवासों को पूरा करने की मंजूरी दे दी गई थी। इनमें नगरीय क्षेत्रों के भी आवास शामिल थे। शहरी क्षेत्रों में हितग्राहियों को सीधे राशि न देकर इन निकायों के माध्यम से काम कराया जाता है। हाल ही में जो रिपोर्ट्स मंगाई गई है, उसके अनुसार शहरों में 40 फीसदी से भी कम आवास तैयार हो पाए हैं। अब अल्टीमेटम दिया गया है कि 31 दिसंबर से पहले सभी आवासों का निर्माण पूरा कर लिया जाए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनको अधूरे आवासों के लिए कोई अनुदान नहीं मिलेगा। निकायों को अपने मद से खर्च कर आवासों को पूरा कराना होगा। इस आदेश के बाद निकायों के अफसरों में हडक़ंप मचा हुआ है। इंजीनियर्स मजदूरों और मिस्त्रियों की तलाश में जुटे हैं। अधिकांश नगरीय निकायों में बिजली बिल पटाने और वेतन देने के लिए पैसेनहीं होते, पर प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए फंड पड़ा होने के बावजूद समय पर काम नहीं कराया जा रहा है। कुछ अभियंता बता रहे हैं कि 31 दिसंबर तक बचा काम पूरा होने की उम्मीद नहीं है, पर वे सर्टिफिकेट बना लेंगे। दूसरी उम्मीद यह भी है कि यह डेटलाइन आगे बढ़ जाएगी।
इतनी साफ-सफाई?

रेलवे जोन बिलासपुर की ओर से सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया गया है। रेल यात्रियों से की गई बातचीत भी इसमें दर्ज है। इसमें बताया गया है कि स्लीपर और जनरल क्लास की बोगियों में अब कितनी स्वच्छता बरती जा रही है। तस्वीर में दिखाई गई साफ-सुथरी बास-बेसिन आपको कभी दिखे तो आप भी रेलवे को टैग करके बताएं।
सबसे बड़ा सौदा?
चर्चा है कि रायपुर के बाहरी इलाके की जमीन का एक बड़ा सौदा फाइनल हुआ है। जमीन के खरीददार भी एक बड़े बिल्डर हैं। जिनके प्रोजेक्ट न सिर्फ रायपुर, बल्कि बिलासपुर में भी चल रहे हैं। डेढ़ सौ एकड़ जमीन का सौदा करीब 12 सौ सीआर में फाइनल हुआ है जिसे अब तक का सबसे बड़ा सौदा करार दिया जा रहा है।
सौदे से जुड़े सभी पक्षकार रायपुर के ही हैं। जिनमें एक उद्योगपति भी हैं। कई दौर की बैठक के बाद जमीन के सौदे पर मुहर लगी है। खरीददार बिल्डर अब यहां हाऊसिंग प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू भी कर दिया है। माना एयरपोर्ट के नजदीक होने की वजह से इसे सबसे महंगा प्रोजेक्ट बताया जा रहा है। फिलहाल तो इस जमीन के सौदे की कारोबारी जगत में जमकर चर्चा है।
पीएससी दागदार, तो निजी एजेंसी कितनी निष्पक्ष?
वन विभाग में 15 सौ से अधिक बीट फारेस्ट आफिसर जो वन रक्षक कहलाते हैं कि भर्ती मंगलवार तडक़े शारीरिक मापदंड परीक्षा (फिजिकल टेस्ट)के साथ से पूरे प्रदेश में शुरू हो गई है। जो 7 दिसंबर तक चलेगी। रायपुर के कोटा स्टेडियम में भी हो रही है। यह भी जानकारी दी गई है कि
यह थर्ड पार्टी भर्ती हो रही है। यानी पीसीसीएफ कार्यालय ने हैदराबाद और दिल्ली की एक निजी एजेंसी से सेलेक्शन के लिए कांट्रेक्ट किया है जो अंतिम सलेक्टेड लिस्ट देगी। जब एनटीए, पीएससी के चयन में भरोसा उठ गया है तो निजी एजेंसी का चयन कितना भरोसेमंद, निष्पक्ष होगा समझा जा सकता है। ये तो उन्हीं नामों पर ब्लू टिक लगाएगा जो नाम वन मंत्रालय, पीसीसीएफ दफ्तर आदि से आएंगे।
अब बात आती है कि जब इस प्रदेश में भृत्य तक की नियुक्त पीएससी, इंजीनियरों, शिक्षकों, लिपिकों की भर्ती व्यापमं करता रहा है तब उसी के समकक्ष पदों पर भर्ती निजी एजेंसी से क्यों की जा रही है? और फिर बीट गार्ड को बीएफओ पद नाम दिया ही जा चुका है। तो अफसर के नाते पीएससी तो कर ही सकता है। खैर, पीएससी भी बदनाम हो चुका है तो निजी एजेंसी पर भरोसे वाले वन विभाग की क्या बिसात,भर्ती संदेह से परे नहीं होगी। और फिर अभ्यर्थियों की वजह से भर्ती प्रक्रिया रात के अंधेरे में भी चल रही है। अंधेरे का काम कब साफ सुथरा होता है।
इसका मतलब समझा जा सकता है। वैसे इस भर्ती को लेकर पिछले पखवाड़े भर से पूरे प्रदेश के वन मंडलों से शंका संदेह उभरे हुए हैं। इसकी शिकायतें जब मीडिया तक पहुंची पड़ताल करने लगे तो डीएफओ, भर्ती स्थलों में प्रवेश के लिए पीसीसीएफ से अनुमति अनिवार्य कर चुके हैं। भर्ती इतनी निष्पक्ष है तो विभाग को क्या उजागर होने का खतरा नजर आ रहा। खैर जो भी हो चयन सूची जारी होने के बाद आरटीआई है, कोर्ट है। सच्चाई तो बाहर आ ही जाएगी।
भर्ती वन विभाग की, ड्यूटी शिक्षकों की

वन रक्षक भर्ती के लिए वन विभाग ने अपने एपीसीसीएफ से लेकर निचले से निचले क्रम के हजारों कर्मचारी तैनात किए हैं। बताया जा रहा है कि ये भी कम पड़ गए हैं। तो स्कूलों के व्यायाम शिक्षकों की भी ड्यूटी लगा दी गई है। ऐसा राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है। रायपुर की भर्ती के लिए शहर के नहीं अभनपुर, आरंग, तिल्दा और अन्य दूरदराज के विकासखंड, संकुल के शिक्षकों की। इनकी ड्यूटी मैदानी तैयारियों और व्यवस्था में सहयोग के लिए लगाई गई है ।
इस भर्ती से इनका क्या लेना-देना, जबरिया ड्यूटी लगाई गई है। रायपुर डीईओ ने इन शिक्षकों की ड्यूटी लगाते हुए भर्ती स्थल में उपस्थिति न होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी जारी कर दी है। 10 दिसंबर तक ये शिक्षक अपने स्कूल से बाहर रहेंगे। तब तक स्कूलों में पीटी-खेल नहीं होंगे। इसे ही कहते हैं शिक्षकों से गैरशिक्षकीय कार्य लेना। और शिक्षक संगठनों के नेता चुनाव, वोटर लिस्ट पुनरीक्षण जैसे राष्ट्रीय कार्यों की ड्यूटी को गैरशिक्षकीय बताकर विरोध बुलंद करते हैं लेकिन राजधानी के ही इनके नेताओं के मुंह से सप्ताह भर बाद भी एक शब्द नहीं निकला है। बढ़ती कडक़ड़ती ठंड में दूरदराज के शिक्षकों के साथ अनहोनी होने पर ये दिखावा करने डीईओ के विरोध में वह भी केवल एक दो दिन के लिए झंडा बुलंद कर अपने नेता होने के कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे । ये व्यथा हमारी नहीं है,ड्यूटी लगे शिक्षकों की है।
अफसरशाही का तमाशा
बिलासपुर में नायब तहसीलदार और थानेदार, दोनों ने अपनी-अपनी ताकत और रुतबे का प्रदर्शन किया। नायब तहसीलदार ने अपने पद का रौब झाड़ा तो थानेदार ने वर्दी की गर्मी दिखाई। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों पक्षों के समर्थकों ने एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें खींच लीं।
राजस्व विभाग के जूनियर अफसरों ने एक दिन की हड़ताल कर दी, वहीं थानेदार के समर्थन में कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन हुआ। दो लोगों के विवाद में दोनों तरफ के ताकतवर संगठन सामने आ गए। एक के पक्ष में कार्रवाई करते तो दूसरा नाराज हो जाता। दोनों विभागों के मंत्रियों के सामने भी संकट था। उन तक बात चली गई थी। वे अपने-अपने अमले को नाराज नहीं करना चाहते थे। उन्होंने इस तमाशे पर नाराजगी जताते हुए आदेश दिया- तुरंत मामला सुलझाओ।
कलेक्टर और एसपी ने दोनों को बुलाया और समझाया। बंद कमरे में दोनों ने अपने-अपने बर्ताव को लेकर एक-दूसरे से माफी मांगी, मामला सुलझ गया। प्रदर्शन और ज्ञापन का दौर थम गया। अब इससे पहले थानेदार ने गुस्से में जो नायब तहसीलदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, उसके खत्म होने में देर नहीं लगेगी। लाइन अटैच थानेदार को भी नई पोस्टिंग मिल ही जाएगी।
मगर, पूरे घटनाक्रम ने दोनों विभागों की पोल खोलकर रख दी है। जब नायब तहसीलदार थानेदार को उसकी औकात दिखाने की कोशिश करता हो और थानेदार गुस्से में धक्का- मुक्की कर एफआईआर दर्ज कर लेता हो, तो अंदाजा लगाइए कि ऐसे अफसर आम जनता के साथ कैसा सलूक करते होंगे।
सोचिए, आप किसी थानेदार या तहसीलदार से त्रस्त हैं और आपका मामला सुलझाने कलेक्टर या एसपी आपको बंद कमरे में बुलाएं। तहसीलदार या थानेदार आपसे अपने बर्ताव के लिए माफी मांगे। इस घटना को देख-सुनकर, आप उस सुशासन का इंतजार तो नहीं कर रहे हैं?
अद्भुत रंगोली

इंदौर की हुनरमंद शिखा ने नीमच में देश की 100 महान विभूतियों को 84 हजार वर्गफीट की रंगोली में उकेरा। तस्वीर के मध्य में शिखा अपने हाथ फैलाए खड़ी हैं। कृति में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भी जगह दी गई है। यह कलाकारी एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज की गई है।
आठवां वेतन आयोग फरवरी में
केंद्र के साथ साथ देश भर के राज्य कर्मियों के लिए फिलहाल अच्छी खबर कही जा सकती है। केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी ने नया आठवां वेतन आयोग गठित करने के संकेत दिए हैं। यह भी संभावना है कि एक फरवरी को बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी घोषणा कर सकती हैं। फरवरी 2014 को गठित सातवें वेतन आयोग का दस वर्ष का दायरा खत्म होने में अभी एक वर्ष (जनवरी-26) शेष है। केंद्रीय कर्मचारी संगठन नए आयोग के समय पर गठन और समय पर लागू करवाने को लेकर दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
इसी सिलसिले में इनके नेता पिछले दिनों केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी टीवीएस (टीवी सोमनाथन) से मुलाकात की थी। इस चर्चा के दौरान कार्मिक नेताओं की मांग पर कैबिनेट सेक्रेटरी के संकेत से सबकी बाँछें खिल गई हैं। उन्होंने कहा कि 2026 बहुत दूर (टू-फार) है,उससे पहले अगले वर्ष क्यों नहीं? इसके बाद से केंद्रीय संगठनों में हलचल बढ़ गई है कि आठवां वेतन आयोग आम बजट के आसपास गठित कर दिया जाएगा। राज्यों में पृथक से वेतन आयोग गठन की व्यवस्था दशकों पहले ही खत्म हो गई थी। इसलिए राज्य सरकारें भी थोड़ी कमी बेसी के साथ केंद्रीय आयोग की सिफारिशों को लागू करती है । सो राज्य के कर्मचारी अधिकारी भी इसके इंतजार में रहते हैं। उन्हें भी उम्मीद है कि पिछले दो वेतन आयोग की वेतन विसंगतियां, अब आठवें आयोग में दूर की जाएंगी।
कहा जाता है कि जब महंगाई भत्ता 50 फीसदी से पार हो जाए तो नए वेतन आयोग के गठन कर दिया जाना चाहिए। लेकिन सरकार को बिना मांग, आंदोलन के कोई काम नहीं करती। वैसे मोदी 2.0 के अपने अंतिम बजट में नए वेतन आयोग से तौबा करने के संकेत दिए थे। अब कैबिनेट सेक्रेटरी का यह कहना, उम्मीद की जानी चाहिए कि फरवरी में नया वेतन आयोग गठित कर दिया जाएगा।
डिनर और वोट का रिश्ता नहीं
रायपुर दक्षिण के चुनाव परिणाम की कांग्रेस, और भाजपा के नेता समीक्षा कर रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी आकाश शर्मा की बुरी हार चौंका भी रही है। कांग्रेस से जुड़े लोग मानते हैं कि जहां अच्छी लीड मिलने का भरोसा था वहां बुरी तरह पिछड़ गए। मसलन, कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने लाखे नगर इलाके में समाज विशेष के लोगों के लिए मतदान से दो दिन पहले रात्रि भोज रखा था।
बताते हैं कि रात्रि भोज में करीब 5 सौ लोग थे। सभी कारोबार जगत के लोग थे। सबने कांग्रेस को समर्थन देने का वादा किया था, मगर नतीजे आए, तो ठीक इसका उल्टा हुआ। वहां कांग्रेस प्रत्याशी को 122 वोट ही मिले। यानी साफ था कि जितने लोग रात्रि भोज में थे उसका आधा वोट भी कांग्रेस प्रत्याशी को नहीं मिला। मतदान के बाद भाजपा के रणनीतिकारों ने करीब 15 हजार वोटों से जीत का आकलन किया था। लेकिन सुनील सोनी की जीत रायपुर शहर की बाकी तीनों सीटों के भाजपा विधायकों की जीत से बड़ी हो गई। ऐसे में उनके मंत्री बनने को लेकर अटकलें लगाई जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
इन दुर्घटनाओं से कोई सबक?
छत्तीसगढ़ में सडक़ सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में कृषि मंत्री रामविचार नेताम और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े सडक़ दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल हो गए। यह राहत की बात है कि दोनों की जान बच गई, परंतु इन घटनाओं ने प्रदेश में यातायात सुरक्षा की बदतर हालत को फिर उजागर कर दिया।
मंत्रियों के काफिले में पायलट गाडिय़ां रहती हैं और वे अपेक्षाकृत सुरक्षित यात्रा करते हैं। इसके बावजूद वे हादसे का शिकार हुए। ऐसे में सामान्य नागरिकों की सुरक्षा कैसी है, सोचा जा सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष सितंबर तक प्रदेश में 11,000 से अधिक सडक़ दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 4,900 से अधिक लोगों की मौत हुई। रायपुर जैसे प्रमुख जिले में प्रतिदिन औसतन 40 दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 17 लोग अपनी जान गंवाते हैं।
इन हादसों में 70 फीसदी से अधिक मौतें दोपहिया वाहन चालकों की हुई हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि हर बार गलती दोपहिया चालकों की ही होती है। तेज रफ्तार, भारी वाहनों की ओवरलोडिंग और लापरवाही भी इन मौतों के प्रमुख कारण हैं। हाईवे पर हेलमेट पहनने को सख्ती से लागू करने के लिए पुलिस अभियान चला सकती है, परंतु यह अभियान अक्सर सरकारी निर्देशों पर चलता है, जो कुछ दिन के उत्सव की तरह चलकर बंद हो जाता है।
तीन दिनों में दो मंत्रियों के हादसों के बावजूद सडक़ सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह उदासीनता बताती है कि आम नागरिकों की सुरक्षा की सुध लेना संबंधित अफसरों की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।
सैर-सपाटे का एक नया ठिकाना

प्रदेश में एक नया पर्यटन स्थल विकसित हुआ है। यह है जांजगीर-चांपा जिले का कुदरी बैराज। इसी महीने यहां नौका विहार और बोटिंग की सुविधा शुरू की गई है। यहां कैफेटेरिया और स्पोर्ट्स जोन भी तैयार किया गया है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी करीब 10 किलोमीटर है। हॉली डे के अलावा बाकी दिनों में लोग क्वालिटी टाइम बिताने के लिए यहां पहुंच रहे हैं। गांव के ही युवकों ने इसकी व्यवस्था संभाल रखी है। ([email protected])
जीत और हार का सेहरा
छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं ने झारखंड चुनाव में दम लगाया था, लेकिन पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। झारखंड की एक दर्जन विधानसभा सीटें, छत्तीसगढ़ की सीमा से सटी है। इसलिए छत्तीसगढ़ के नेताओं को विशेष रूप से प्रचार में लगाया गया था।
प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन, केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू, डिप्टी सीएम अरुण साव, और विजय शर्मा व ओपी चौधरी, लोकसभावार विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इसमें से ओपी चौधरी को हजारीबाग की जिम्मेदारी दी गई थी। भाजपा भले ही बहुमत के आसपास नहीं पहुंच पाई, लेकिन हजारीबाग की सात में से छह सीट जीतने में कामयाब रही। ऐसे में हार के बावजूद चौधरी की वाहवाही हो रही है।
झारखंड में भाजपा को बड़ा नुकसान यह हुआ कि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 27 में से सिर्फ एक ही सीट जीत पाई। सरगुजा इलाके के तमाम प्रमुख आदिवासी नेताओं को वहां प्रचार के लिए भेजा गया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अलबत्ता, महाराष्ट्र में जरूर छत्तीसगढ़ के नेताओं ने बेहतर काम किया है। महाराष्ट्र में चुनाव से पहले ही छत्तीसगढ़ भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल ने पुणे के आसपास के 18 सीटों के संगठन को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी संभाली थी, और उसमें वो कामयाब भी रहे।
त्रिपुरा के सीएम माणिक साहा निजी चर्चा में जामवाल की तारीफ करते नहीं थकते हैं। जामवाल लंबे समय तक पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी के संगठन का काम संभालते रहे हैं, और त्रिपुरा जैसे कठिन राज्य में भाजपा की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में महाराष्ट्र में बड़ी जीत में जामवाल के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है।
बस्तर और महिला कलेक्टर
बस्तर के सुकमा, बीजापुर, और नारायणपुर जिले ऐसे हैं जहां अब तक कोई महिला कलेक्टर नहीं रही हैं। जबकि यहां आश्रम-छात्रावासों में छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े विषयों, और महिला स्व सहायता समूहों के कार्यों को देखते हुए जिले में महिला अफसरों की जरूरत महसूस की जाती रही हैं। इससे परे बस्तर के बाकी जिले दंतेवाड़ा, बस्तर, कांकेर, और कोंडागांव में महिला कलेक्टर रही हैं, और उन्होंने अपनी अलग ही छाप छोड़ी है।
दंतेवाड़ा में रीना बाबा साहेब कंगाले का काम बड़ा उम्दा रहा है। इसी तरह बस्तर में भी रिचा शर्मा, रितु सेन ने भी थोड़े समय में अपने काम से अलग ही पहचान बनाई है। कांकेर में पहले अलरमेल मंगाई डी और फिर डॉ. प्रियंका शुक्ला ने स्वास्थ्य और शिक्षा व महिला सुरक्षा की क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है।
डॉ. प्रियंका शुक्ला के कामकाज की सार्वजनिक तौर पर तारीफ होती रही है। कोंडागांव में शिखा राजपूत तिवारी कलेक्टर रह चुकी हैं। मगर नक्सल प्रभावित तीनों जिले सुकमा, बीजापुर, और नारायणपुर में अब तक महिला कलेक्टरों की पोस्टिंग नहीं होना कई मायनों में चौंकाता भी है।
साहू के हिस्से में फिफ्टी-फिफ्टी
केंद्रीय राज्य मंत्री और बिलासपुर के सांसद तोखन साहू को झारखंड विधानसभा चुनाव में चार सीटों का प्रभारी बनाया गया था। इनमें से दो पर भाजपा को कामयाबी हासिल हुई है। लातेहार सीट पर बीजेपी के प्रकाश राम जीते। उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैद्यनाथ राम को 98000 से अधिक वोटों से हराया। सिमरिया सीट पर भाजपा के उज्ज्वल दास ने एक लाख 11 हजार वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। इस सीट पर पिछली बार बीजेपी चौथे स्थान पर थी। चतरा और मनिका सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। मनिका सीट पर कांग्रेस से बीजेपी का मुकाबला था। बाकी सीटों पर जेएमएम से टक्कर थी। दोनों सीटों पर हार का मार्जिन कम रहा।
प्रभार मिलने के बाद तोखन साहू ने धुंआधार प्रचार अभियान चलाया था। अंतिम दिन तक उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। भाजपा झारखंड में बहुमत जरूर नहीं ला पाई पर साहू का अपना प्रदर्शन बुरा भी नहीं रहा।
किसान हर जगह सडक़ पर

विकासशील और कृषि प्रधान भारत में ही किसान समस्याओं का सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्नत देशों में भी यह देखने को मिल जाता है। लंदन के व्हाइट हॉल के सामने हजारों किसानों ने प्रदर्शन किया। वे वहां की संसद द्वारा पारित उस कानून का विरोध कर रहे थे, जिसमें प्रावधान किया गया है कि एक मिलियन पाउंड से अधिक की उत्तराधिकार से प्राप्त संपत्ति पर 20 प्रतिशत विरासत टैक्स लगाया जाएगा। किसानों का कहना था कि ऐसा होगा तो वे खेती से दूर होते जाएंगे, जिससे खाद्यान्न संकट पैदा होगा।
याद होगा, बीते लोकसभा चुनाव में विरासत टैक्स का मुद्दा हमारे यहां भी उछला था। चुनाव अभियान के बीच में ही कांग्रेस को अपने ओवरसीज अध्यक्ष सैम पित्रोदा से इस्तीफा लेना पड़ा था।
लंदन में किसानों के प्रदर्शन पर वहां के प्रधानमंत्री चुप नहीं रहे। पहले दिन ही प्रतिक्रिया आ गई। उन्होंने कहा कि वे किसानों की चिंताओं को समझते हैं और उनका समर्थन करना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अधिकांश किसानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा..। हर एक देश में सत्ता के पास आंदोलनकारियों के लिए ऐसा ही घुमावदार जवाब होता है। मगर यह चुप्पी से बेहतर होता है।
हर कुर्सी पर बैठना नसीब
भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडेय के बाद सुनील सोनी प्रदेश के दूसरे ऐसे नेता बन गए हैं जिन्होंने महापौर, सांसद और विधायक तीनों पदों को सुशोभित किया है। सरोज की तरह सुनील सोनी भी दो बार महापौर रहे।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद निगम की राजनीति करने वाले कई नेता विधायक बने हैं। इनमें लखनलाल देवांगन, प्रबोध मिंज, किरण देव, और देवेन्द्र यादव व स्व. विद्यारतन भसीन हैं। लखनलाल देवांगन कोरबा के महापौर रहे। बाद में वो पहली बार कटघोरा से विधायक बने और संसदीय सचिव भी रहे। अभी वो कोरबा से चुनाव जीतने के बाद सरकार में उद्योग मंत्री हैं। इसी तरह प्रबोध मिंज अंबिकापुर के दो बार महापौर रहे। वर्तमान में वो लुंड्रा विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
इसी तरह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किरण देव भी जगदलपुर के महापौर रहे। वर्तमान में जगदलपुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसके अलावा भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव भी महापौर रह चुके हैं। इसके अलावा भिलाई के महापौर रहे स्व. विद्यारतन भसीन वैशाली नगर से विधायक रहे हैं। सरोज पांडेय पहली बार वैशाली नगर से विधायक बनी थीं। इसके बाद दुर्ग से सांसद निर्वाचित हुई। इससे परे राजनांदगांव के महापौर रहे मधुसुदन यादव सांसद तो बने लेकिन वर्ष 2018 में विधानसभा का चुनाव हार गए।
दूसरी तरफ, सुनील सोनी नगर निगम के पार्षद बने, फिर सभापति चुने गए। दो बार महापौर रहे, फिर सांसद बने, और अब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं। यानी सुनील सोनी के नाम एक अलग ही रिकार्ड बना है। उनसे जुड़े लोग जीत के बाद अभी से उनके मंत्री बनने की अटकलें लगा रहे हैं। देखना है आगे उन्हें आगे क्या कुछ मिलता है।
चर्चा दो राजनीतिक फिल्मों की
मार्च 2024 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘द नक्सली स्टोरी’ को लेकर समीक्षकों और दर्शकों में खासा विवाद रहा। अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में हुए माओवादी हमले की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म को -द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 5 में से 3 स्टार दिए तो इंडियन एक्सप्रेस ने 0.5 और नेशनल हेराल्ड ने सीधे शून्य रेटिंग दी थी। हाल ही में यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म जी-5 पर रिलीज होने के बाद फिर चर्चा में है।
बड़े पर्दे पर जब आई तो फिल्म में सामाजिक कार्यकर्ताओं और अदालतों को नक्सल समर्थक के रूप में दिखाने पर तब कड़ी आलोचना हुई थी। लंबे समय तक बस्तर में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अब ओटीटी पर आने के बाद प्रतिक्रिया दी है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि फिल्म में उनके जैसे पात्र को एक मुस्लिम व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, जिसका नाम 'इरशाद' रखा गया है। उसे चरखा चलाने वाला, कई एनजीओ के संचालक और नक्सलियों के लिए हथियारों की व्यवस्था करने वाला बताया गया है। हिमांशु के अनुसार, यह फिल्म पूरी तरह से झूठे तथ्यों पर आधारित है।
इसके बावजूद कई भाजपा शासित राज्यों में इस फिल्म की एक वर्ग में बड़ी प्रशंसा हुई। इनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। सरकार ने इसे टैक्स फ्री कर दिया था। फिर भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रही।
अब हाल ही में ‘द साबरमती एक्सप्रेस’ रिलीज़ हुई है, जिसे भी गोधरा कांड की सच्चाई के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इस फिल्म को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सराहा है। इसके बाद मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ सहित कई भाजपा शासित राज्यों में इसे टैक्स फ्री किया गया है। हालांकि, रिलीज के शुरुआती सप्ताह में इसका कलेक्शन कमजोर है।
छत्तीसगढ़ के दर्शकों के लिए यह मौका है कि वे टैक्स फ्री टिकट पर सिनेमाघरों में इस फिल्म का आनंद लें। अगर इतना भी महंगा लगे, तो ओटीटी पर इसके आने का इंतजार करें, लेकिन यह इंतजार लंबा हो सकता है।
ऐसी फिल्में टैक्स फ्री होने के बाद भी बॉक्स ऑफिस पर तहलका क्यों नहीं मचा पातीं? इन फिल्मों के एक प्रशंसक का कहना है कि दरअसल, लोगों को व्हाट्सएप पर दिन रात ऐसी जानकारी फ्री में मिलती रहती है। वे सिनेमा हॉल जाकर अपना समय और पैसा खर्च नहीं करना चाहते।
भोजन की बर्बादी का सीजन

शादियों का सीजन शुरू हो गया है। खाने के स्टाल पर भांति-भांति का व्यंजन देखकर कई मेहमान बेकाबू हो जाते हैं, जितना खा नहीं पाते- उससे ज्यादा टेबल पर छोडक़र चले जाते हैं। भोजन तो उतना ही लेना चाहिए जितना हजम हो सके। यह राजधानी रायपुर के एक समारोह के रिसेप्शन की तस्वीर है।
पांच सौ किलो मिठाई बंटी
राज्य मंत्रालय में गुरुवार को कम से कम पांच सौ किलो मिठाई बटीं। हर मंजिल के हर कमरे से अधिकारी कर्मचारी मुंह मीठा कर निकल रहे थे। आप इसे अति,अतिश्योक्ति कह रहे होंगे। मगर बॉटम से टॉप फ्लोर तक 155 लोग बुधवार को पदोन्नत हुए थे। आकलन कर लीजिए। अब मिठाई का हिसाब हम हिसाब बताते हैं। इन 155 में से अब हरेक ने एक किलो भी लिया होगा तो 155 किलो का हिसाब सीधा बैठता है। लेकिन 900 से अधिक अमले वाले मंत्रालय में इन 155 ने बधाई के बदले शेष 745 का मुंह मीठा कराने कम से कम तीन-तीन किलो के डिब्बों का इंतजाम किया था। इस तरह से 465 किलो का सीधा हिसाब मिल गया।
पुराने शहर के हर कोने की मिष्ठान भंडार से मिठाई पहुंची थी। कम पड़ी तो कुछ ने पास के अभनपुर से मंगवाया। वहां से भी 25-30 किलो पेड़े आए ही होंगे। एक कर्मचारी ने तो अपनी वर्किंग टेबल पर कल फाइलें हटाकर मिठाई के डिब्बे रख दिए थे। बधाई देने वालों ने सामान्य से पेड़े से लेकर रसमलाई, मिल्क केक, रसगुल्ले, गुलाब जामुन जैसे हर वैरायटी की मिठाई खाई। हां बहुतायत में काजू कतली ही रही।
मिठाई इतनी अधिक रही कि मधुमेह के इस दौर में कई लोग, मना नहीं कर पाए और पीले रंग के सरकारी बड़े लिफाफे में घर के लिए रखने लगे। एक-एक पीस के हिसाब से इनके पास भी एक-एक किलो तक मिठाई इक_ा हो गई। हंसी ठ_ों के दौर में एक ने कहां इतना हो गया है कि मैं घर लौटने पर शाम को मोहल्ले की दुकान में तीन सौ रुपए किलो में बेच दूंगा। बताया गया है कि 24 वर्षों में पहली बार इतनी अधिक संख्या में पदोन्नतियां हुईं हैं। वर्ना सालाना 10-20 ही होते रहे हैं। खास बात यह है कि पदोन्नत सौ से अधिक तो राज्य गठन के बाद हुई भर्ती परीक्षाओं में चयनित अधिकारी कर्मचारी हैं। यानी यह पूरा मूल छत्तीसगढिय़ा बैच है। सो इतनी खुशी तो बनती ही है।
केवल इनकम टैक्स ही नहीं...

अब केवल जीएसटी, इनकम टैक्स या ईडी की दबिश से छापों की इतिश्री नहीं होगी। किसी भी पहली एजेंसी की रेड के बाद 22 विभाग एक के बाद उस अधिकारी-कर्मचारी, कारोबारी उद्योग समूह पर सिलसिले वार लगातार अपने समयानुकूल छापे जांच करेंगे। इसे कंसिक्वल रेड इंक्वायरी कहा जाता है। दरअसल केंद्रीय वित्त विभाग ने रेवेन्यू चोरी के हर लीकेज को बंद करने एक ग्रुप ऑफ डिपार्टमेंट बनाया है। यह राज्य से लेकर दिल्ली तक बनाया गया है। इसके प्रमुखों को हर माह दो माह कंप्लायंस रिपोर्ट मुख्यालय देनी होती है। कि फलां विभाग के पहली रेड के बाद अन्य विभागों ने अपने-अपने दायरे में क्या-क्या किया? इनकम टैक्स के एक अधिकारी ने बताया कि केंद्र व राज्य के करीब 22 विभागों को मिलाकर यह काम होता है । जैसे इनकम टैक्स ने रेड मारा तो वह अपनी रेड की रिपोर्ट सीबीआई, ईडी, डीआरआई, नारकोटिक्स ब्यूरो, फेमा जैसी एजेंसियों के साथ साथ सी-जीएसटी, से लेकर राज्य के एस-जीएसटी, एसीबी- ईओडब्ल्यू, लैंड रेवेन्यू डिपार्टमेंट से शेयर कर इन मामलों के उल्लंघन पर टैक्स चोरी की जांच करवाएगा। यानी पहली रेड चाहे किसी भी विभाग की हो उसके बाद आरोपित वर्ष-दो वर्ष के लिए डिजिटल न सही डिपार्टमेंटल अरेस्ट तो हो ही गया समझो। इधर इससे रेड करने वाला हर विभाग भी परेशान है। क्या इसे न खाउंगा न खाने दूंगा की गारंटी का हिस्सा माना जाए।
सब कुछ दक्षिण के बाद

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का पुनर्गठन तो हो चुका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में अब तक बदलाव की अनुमति नहीं मिली है। जबकि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने लोकसभा चुनाव के पहले ही हाईकमान से कम से कम जिला, और ब्लॉक अध्यक्षों को बदलने की अनुमति मांगी थी। चर्चा है कि बदलाव पर फैसला कुछ हद तक रायपुर दक्षिण के चुनाव नतीजे पर निर्भर करेगा।
कहा जा रहा है कि रायपुर दक्षिण उपचुनाव के नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आते हैं, तो इसका काफी हद तक क्रेडिट प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को जाएगा। बैज ने ही युवा कांग्रेस अध्यक्ष आकाश शर्मा को प्रत्याशी बनाने की पुरजोर वकालत की थी। और बैज ताकतवर होकर उभरेंगे। उन्हें कांग्रेस संगठन में बदलाव की अनुमति मिल सकती है, लेकिन यदि नतीजे अनुकूल नहीं आते हैं, तो वो खुद मुश्किल में घिर सकते हैं। उन्हें हटाने की भी मांग हो सकती है। देखना है कि 23 तारीख को क्या कुछ होता है।
धान खरीद के लिए बस्तर में आंदोलन
भाजपा सरकार की नई सरकार की धान खरीदी का यह पहला साल है। प्रति क्विंटल 3100 रुपये भुगतान के आकर्षण ने किसानों में इसकी अधिक से अधिक पैदावार लेने की होड़ मची हुई है। पर उनकी जरूरत के मुताबिक खरीदी केंद्र नहीं खोले गए हैं। बस्तर में एक साथ कई स्थानों पर नए खरीदी केंद्र खोलने के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं। भानुप्रतापपुर में संबलपुर इलाके से जुड़े कई गांवों में किसान नजदीक में खरीदी केंद्र नहीं खुलने से नाराज हैं। यहां की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति ने बांसला में धान खरीदी केंद्र खोलने का प्रस्ताव सहकारी संस्था के पंजीयक के माध्यम से राज्य सरकार को भेजा था लेकिन नहीं खुला। इसका नतीजा यह है कि संबलपुर खरीदी केंद्र में ऐसे कई गांव शामिल किए गए हैं जिनकी दूरी 12 से 15 किलोमीटर है। इन्होंने प्रदर्शन किया है और चेतावनी दी है कि एक सप्ताह के भीतर नया केंद्र नहीं खोला गया तो मेन रोड पर चक्काजाम किया जाएगा।
सुकमा में कलेक्ट्रेट के सामने कल सैकड़ों किसानों ने प्रदर्शन किया। वे सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यहां पहुंचे किसान कह रहे थे कि पिछले कई सालों से वे नए खरीदी केंद्रों की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। हालत यह है कि उनको 30-35 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। उन्हें हर साल आश्वासन दिया जाता है, पर नहीं खोला जाता। पिछली सरकार तो छल कर रही थी, अभी भी सुनवाई नहीं हो रही है।
बस्तर संभाग के कई दूसरे स्थानों से भी इसी तरह की खबरें हैं। दूर-दूर गांवों की बसाहट होने के कारण हो सकता है पर्याप्त संख्या में नहीं खोले जा रहे हों पर यह 20 से 35 किलोमीटर दूरी तय करने की परिस्थिति तो गंभीर ही है। छोटे किसानों के लिए परिवहन की लागत बर्दाश्त करना भी मुश्किल है। ऐसे में फायदा बिचौलियों को मिलेगा और सरकार की 3100 रुपये की खरीदी की महती योजना से वंचित रह जाएंगे।
रेलवे ट्रैक का सी-फा

ट्रेनों में सफर के दौरान ट्रैक, स्टेशन और फाटक पर कई संक्षेप शब्द दिखते हैं लेकिन उनका मतलब पता नहीं होता। उनमें से ही एक है सी फा और उसी के नीचे लिखा डब्ल्यू एल। यह संकेत फाटक या लेवल क्रासिंग आने से पहले पायलट को सतर्क करने के लिए होता है। सी का मतलब सीटी, फा का फाटक। अंग्रेजी में भी यही- व्हिसिल और लेवल क्रासिंग है। इस जगह को क्रॉस करने पर लोको पायलट को ट्रेन की सीटी बजाने का निर्देश दिया गया है। ([email protected])
सुबह के नजारे
बाग-बगीचों में कई बड़ी दिलचस्प चीजें दिखती हैं। एक बगीचे के बाहर एक बहुत मोटा सा नौजवान आकर स्कूटर को स्टैंड पर चढ़ाकर उस पर बैठकर आधा-एक घंटा वीडियो गेम खेलता है, और फिर चले जाता है। हो सकता है उसे डॉक्टर ने सुबह घूमने जाने के लिए कहा हो। जाहिर है कि उसका मोटापा कम हो नहीं रहा है। अब दो दिन पहले वही नौजवान सुबह-सुबह स्कूटर बाहर खड़ा करके छोटे से बगीचे की बेंच पर आकर बैठा, और कोई एनर्जी ड्रिंक पीने लगा, साथ-साथ मोबाइल फोन तो था ही।
हिन्दुस्तान के छत्तीसगढ़ जैसे हिस्से में लोगों में सार्वजनिक जीवन की सभ्यता छू भी नहीं गई है। सुबह घूमने वालों के जत्थे देखें, तो दो-तीन लोग भी पूरी सडक़ घेरकर चल सकते हैं, और हॉर्न या साइकिल की घंटी बजाने वाले को घूर भी सकते हैं। गांवों की सडक़ों पर गोधूलि बेला में लौटने वाले जानवरों के रेवड़ जिस तरह सडक़ों को घेरकर चलते हैं, शहरों में सुबह घूमने वाले इंसानों का हाल इसी तरह रहता है। किसी रिहाइशी इलाके से निकलते हुए लोगों के जत्थे सुबह-सुबह से इतनी चीख-पुकार की हँसी-मजाक करते चलते हैं कि आसपास रहने वाले लोगों के मन में उनके लिए नफरत ही पैदा हो जाए।
नए विधायक की चर्चा
एक नए नवेले विधायक के क्रियाकलापों की खूब चर्चा हो रही है। चुनाव जीतने से पहले उन्हें सिद्धांतवादी सैनिक माना जाता था, लेकिन थोड़े ही दिनों में वास्तविकता सामने आ गई। चर्चा है कि पंचायतों से लेकर अलग-अलग योजनाओं में काम दिलाने के नाम पर उनसे जुड़े लोगों ने काफी उगाही की है। विधायक महोदय ने अलग-अलग मॉडल लेकिन एक रंग की तीन लग्जरी थार खरीदे हैं। उत्तर प्रदेश, और बिहार के बाहुबली विधायकों की तर्ज पर उनकी खूब चर्चा है।
विधायक महोदय ने अपने क्षेत्र के लोगों के लिए एक अलग से ऐप बनवा रहे हैं जिसमें लोग अपनी समस्याओं की जानकारी घर बैठे दे सकते हैं। विधायक का दावा है कि ऐप में आई समस्याओं की शिकायत का निराकरण तुरंत किया जाएगा। मगर पार्टी के लोग उनके तौर तरीकों से नाखुश हैं। एक-दो नेता ने तो उनके ऐप की खिल्ली उड़ाते हुए कह दिया है कि लोग शिकायत लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, वहां तो उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं हो पा रहा है। ऐप से कौन सी समस्या का निराकरण हो जाएगा। विधायक के खिलाफ अब क्षेत्र में नाराजगी बढ़ रही है। कुछ लोगों का मानना है कि निकाय-पंचायत चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
अब दोनों भवन बराबर
रिश्वत-घूस, भ्रष्टाचार के फोन-पे, योनो, यूपीआई,आरटीजीएस गूगल पे, व्हाट्सअप पे जैसे कई विकल्पों के बीच कैश लेना कहां की अकलमंदी है, वह भी ऑफिस परिसर में? लेकिन देव बाबू (देवनारायण सिन्हा) ने सोचा इंद्रावती भवन के टॉप फ्लोर पर देनदार को बुलाकर ले लिया जाए तो नीचे वालों को नजर नहीं आएगा। और ऊपरवाला (ईश्वर) देखे तो भी कोई दिक्कत नहीं है। मत्स्य पालन विभाग के संयुक्त संचालक ने देवनारायण ने कल यही किया। अगर पहली बार रिश्वत ले रहे थे, तो देव बाबू इंद्रावती के ही अपने दूसरे समकक्षों से तरीके पूछ लेते, जिनके हाथ वर्षों से उजले हैं। नहीं तो पड़ोस के भवन के महानदी में हाथ धो रहे लोगों से आइडिया ले लेते। जहां के लोग इन डिजिटल पेमेंट एप का मजे से इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन ऊपरवाला सब देख रहा था चौथे माले की छत से। उसके तार एसीबी से जुड़े रहते हैं। बस लेनदेन करने वाले माध्यम हर बार अलग-अलग लोग होते हैं। सीधे नीली छतरी वाले को हाजिर नाजिर बनाने के बजाए किसी कॉफी शॉप, अमृत तुल्य टी आउटलेट, या रेस्टोरेंट होटल के कमरे में देनदार को बुला लेते ।
बहरहाल कहा जा रहा है कि 24 वर्षों में पहली बार एसीबी ने राज्य के दूसरे प्रशासनिक मुख्यालय इंद्रावती भवन से संयुक्त संचालक जैसे वरिष्ठ अफसर को रंगे हाथों पकड़ा है। हालांकि इससे पहले पुराने मंत्रालय (डीकेएस) में भी एक अरेस्टिंग हो चुकी है। राज्य परिवहन प्राधिकार के निज सचिव को परमिट दिलाने के बदले पकड़ा गया था । यह अलग बात है कि वो साहब के लिए ले रहा था, या अपने, या दोनों के लिए। साहब आज एक आयोग में आयुक्त हैं। इस तरह से इंद्रावती, महानदी दोनों के ही रंगने का खुलासा हो गया है।
चांदी, और डिनर जीतने का मौका
सामान्य ज्ञान में रुचि रखने वाले जो लोग केबीसी में सलेक्ट नहीं हो पाए हैं और अमिताभ बच्चन के सामने हॉट सीट पर जाने से वंचित हैं। उनके लिए मुंबई के न सही रायपुर के अमिताभ दुबे चांदी का सिक्का जीतने का अवसर दे रहे हैं। अमिताभ, जेसीसी के पूर्व अध्यक्ष, मास्टर ट्रेनर और कई अहम पदों पर रहे हैं।
यह अवसर एग्जिट पोल के जरिए हारने और जीतने वाले का नाम तय करने वालों के लिए है। यह स्पर्धा, केबीसी टाइप तकनीकी रूप से पेचीदा भी नहीं। बस वाट्सएप पर जवाब भेज देना है। स्पर्धा का पहला ही चरण आसान कर दिया गया है। वह यह कि रायपुर दक्षिण से भाजपा प्रत्याशी की जीत तय बता दी गई है। बस जीत की लीड बताना है। नतीजे उतने ही अंतर से आए तो तीन विजेताओं को चांदी का सिक्का और दस बीस के अंतर के आसपास रहे तो इन तीन निकटवर्तियों को डिनर। इसके लिए रिजल्ट प्रिडिक्शन का समय कल 22 की रात 12 बजे तक रखा गया है। अब देखना है कौन भाजपा की और कौन कांग्रेस की लीड बताता है।
सैटेलाइट कॉलर वाला हाथी

छत्तीसगढ़ में बढ़ते हाथी-मानव द्वंद्व और दुर्घटनाओं में होने वाली के बीच यह खबर महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश ने बाघ और चीतों की तर्ज पर अब हाथियों में भी सैटेलाइट कॉलर लगाने की योजना शुरू की है। इसका पहला प्रयोग बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में किया गया।
मार्च 2024 में शहडोल जिले के जयसिंहनगर से एक घायल हाथी को रेस्क्यू कर उसका इलाज किया गया। स्वस्थ होने के बाद उसे सैटेलाइट कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ दिया गया। यह हाथी 10 सदस्यीय झुंड का हिस्सा था, जिससे वह वापस मिल गया।
इस योजना में झुंड की पहचान कर उनमें से एक हाथी को कॉलर पहनाना है। इसके बाद वह हाथी अपने झुंड में लौट जाएगा। सैटेलाइट कॉलर से उस हाथी के मूवमेंट के आधार पर पूरे झुंड की स्थिति का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा।
अब भी सैटेलाइट से हाथियों के झुंड की निगरानी होती है, लेकिन उनकी सही लोकेशन का पता नहीं चल पाता। इस नए प्रयोग का फायदा यह होगा कि हाथियों का झुंड यदि गांव के करीब पहुंच रहा हो, तो समय रहते ग्रामीणों को सतर्क किया जा सकेगा। हाथियों को खदेडऩे या ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का कार्य अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा। इसके अलावा बिजली तारों के संपर्क में आने के कारण हाथियों की मौत हो रही है। यह भी समय पर पता लग सकेगा कि वे किसी ऐसे रास्ते में तो नहीं बढ़ रहे हैं, जहां उन्हें खतरा हो सकता है। यह प्रयोग अपने राज्य के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है, जहां हाथियों और इंसानों के बीच टकराव एक गंभीर समस्या है।
तब और अब, कुछ दिनों के भीतर

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ न्यूज-फोटोग्राफर गोकुल सोनी ने राजधानी रायपुर के एक बड़े तालाब की यह दुर्गति दिखाई है। उन्होंने फेसबुक पर लिखा-यह तस्वीर हमारे रायपुर के पुरानी बस्ती स्थित प्राचीन बंधवा तालाब की है। इनसेट में जो तस्वीर देख रहे हैं वह कुछ दिन पहले की है जब यहां कमल फूल खिला हुआ था। पूरा तालाब इन कमल फूलों की पत्तियों से आच्छादित था। तब यहां की सुन्दरता देखते ही बनती थी। पता नहीं इसे किसकी नजर लगी पूरे तालाब में कमल फूल की पत्तियां मर गयी है। कमल फूल जो जीवन और सौंदर्य का प्रतीक है अब मर चुका है। यहां जीवन और सौंदर्य की जगह गंदगी और मृत्यु ने ले ली है। ऐसा मैं यहां इसलिये कह रहा हूं क्योंकि तब यहां बड़ी संख्या में पानी में रहने वाले पक्षियों ने भी अपना डेरा बनाया हुआ था। नगर निगम द्वारा इस तालाब की सफाई, वाटर टिटमेंट जैसे अनेक बातें कही गयी। अखबारों में भी अधिकारियों के इन झूठे वादों को बड़ा-चढ़ा कर छापा गया लेकिन स्थति आपके सामने है। ([email protected])
टेंडर और पसंद
आम लोगों की सेहत से जुड़े एक विभाग में सैकड़ों करोड़ के टेंडर को लेकर हलचल मची है। सुनते हैं कि ठेके के लिए कई नामी-गिरामी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है। इनमें से विभाग के मुखिया ने भी अपनी 'पसंद' छांट ली। लेकिन इसमें एक पेंच फंस गया है।
चर्चा है कि एक फोन मुखिया तक पहुंच गया। उन्हें कंपनी का नाम भी बता दिया गया, और उसे ही सपोर्ट करने कह दिया गया। मुखियाजी इससे निराश हैं, और वो मना भी नहीं कर सकते।
मुखिया ने टेंडर होने के पहले ही उस कंपनी का नाम प्रतिस्पर्धी कंपनियों को बता दिया, जिन्हें काम दिया जाना है। बाकी कंपनियां भी अलग-अलग रास्ते से पार्टी और सरकार के नेतृत्व तक पहुंच रही हैं। पार्टी के लोग मुखिया की नादानी से नाराज बताए जा रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
ब्यूरोक्रेसी और छत्तीसगढ़
24 वर्ष में दो बार कांग्रेस और भाजपा की चौथी सरकार बनी है। राजनीतिक रूप से स्थिर छत्तीसगढ़ को बीते 24 वर्षों में ब्यूरोक्रेसी ने एक नई पहचान दी है। यह कि ब्यूरोक्रेसी के तीनों ही अंग आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के अफसर दलीय समर्थन के आधार पर पहचाने और नामजद गिनाए जा सकते हैं। तीनों ही कैडर के अफसरों ने स्वयं ही साथी अफसरों को बांटा। सरकारों की निकटता हासिल करने हर नई सरकार के कर्ताधर्ताओं के समक्ष एक दूसरे की विचारधारा, पारिवारिक पृष्ठभूमि को पेश किया। फलस्वरूप पिछली सरकार के फ्रंट रनर अफसर नई सरकार के बैक-बेंचर बने और बनाए गए।
राज्य सेवा के तो खुलकर ही भाजपा कांग्रेस के बताए और गिने ही जाते हैं। इन्हीं कारणों से कई अफसर सैंया भए कोतवाल की बेफ्रिकी में गड़बडिय़ां करते रहे । हर अफसर यह भूला कि हर पांच वर्ष बाद चुनाव होते हैं, नई सरकारें आती है। और हर सरकार की करप्शन पर नो टॉलरेंस की कथित गारंटी होती है। नतीजे सबके सामने है। भ्रष्टाचार के सैकड़ों मामले एसीबी-ईओडब्ल्यू, लोकायोग से लेकर आयकर, सीबीआई-ईडी में दर्ज हैं। इनमें अखिल भारतीय सेवा से लेकर राज्य सेवा के 180 से अधिक अफसर या तो गिरफ्तार हैं या जांच के चक्कर काट रहे हैं। इनमें सेवारत और सेवानिवृत्त दोनों ही हैं।
विधानसभा के प्रश्नोत्तरी में दी जाती रही इस जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ के साथ बने दो अन्य राज्यों के मुकाबले ऐसा अनुपात अपने यहां अधिक नजर आता है। राज्य के सेवारत में समीर विश्नोई, रानू साहू, सौम्या चौरसिया, एसएस नाग, एपी त्रिपाठी आईटीएस (निलंबित) सेवानिवृत्तों में अनिल टूटेजा, टीएस सोनवानी जेल में हैं, तो डॉ आलोक शुक्ला, निरंजन दास गवाही-पूछताछ-पेशियां झेल रहे हैं।
आईपीएस में जीपी सिंह देशद्रोह के मामले में जेल से वापसी कर निलंबन काट रहे हैं। राज्य पुलिस सेवा के अफसर तो प्रदेश के पहले राजनीतिक हत्याकांड में लिप्त रहे हैं। लेकिन आईएफएस के लिए सौभाग्य कहा जा सकता है कि अब तक किसी पर कानून के हाथ नहीं पहुंचे हैं लेकिन जंगल में मंगल कर रहे कई अफसर सफाई के दस्तावेज लेकर लोकायोग, एसीबी-ईओडब्ल्यू के चक्कर काटते देखे जा सकते हैं।
मालवाहक पर ‘विधायक प्रतिनिधि’ की सवारी!

निजी वाहनों में विधायकों, मंत्रियों, सांसदों के प्रतिनिधि लिखकर खुद को व्हीआईपी बताने का चलन तो देखा गया है, पर किसी मालवाहक में भी अब दिखें तो चौकें नहीं। इसकी भी शुरूआत हो चुकी है। एमसीबी जिले के पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने एक भाजपा नेता की गाड़ी की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली तो हलचल मच गई। यह एक मालवाहक गाड़ी है, जिसमें नंबर प्लेट के साथ विधायक प्रतिनिधि लिख रखा गया था। कमरो ने जैसे डिजिटल ट्रैफिक पुलिस का काम किया। उन्होंने साथ ही कमेंट भी लिखा कि क्या इस गाड़ी का काम अवैध ट्रांसपोर्टिंग के लिए किया जाता है? काल्पनिक सीएम दीदी ( विधायक रेणुका सिंह) के क्षेत्र में कुशासन दिख रहा है।
बहरहाल, फजीहत होने पर गाड़ी के मालिक ने पट्टी हटा दी। साथ ही सफाई दी कि पिता भाजपा व्यवसायी प्रकोष्ठ के सह-संयोजक हैं, इसलिए ऐसा किया। मगर, कमरो ने एक दूसरा खुलासा भी किया है। उनके मुताबिक मालवाहक के नंबर का कोई रिकॉर्ड कोरिया जिले के परिवहन विभाग में दर्ज नहीं है। हालांकि यह गाड़ी कहां से खरीदी गई, इसका पता चल गया है। ये सवाल उठता है कि बिना पंजीयन के कोई गाड़ी बाहर कैसे निकली? और पंजीयन नहीं है तो गाड़ी को कोई नंबर कैसे लिखा है?
नई गाइडलाइन से क्या बदलने वाला है?
सरकार की नई गाइडलाइन संपत्ति की खरीदी-बिक्री प्रक्रिया में कई बदलाव लाने वाली है। अब संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए स्टाम्प ड्यूटी बाजार मूल्य के बजाय सरकारी मूल्य के आधार पर ही देना होगा। इससे खरीदार अब संपत्ति की वास्तविक कीमत लिखवा सकेंगे, क्योंकि ड्यूटी सरकारी मूल्य पर ही निर्भर करेगा।
सरकार ने कुछ समय पहले स्टाम्प ड्यूटी में 30 प्रतिशत की छूट समाप्त कर दी थी। अब उन लोगों को कुछ तो राहत मिल सकती है जो अधिक बाजार मूल्य वाली संपत्ति खरीदते हैं। साथ ही बैंक संपत्ति की वास्तविक कीमत के आधार पर अधिक लोन दे सकते हैं। सरकार को भी इस गाइडलाइन से लाभ होगा। पहला, संपत्ति की बिक्री से विक्रेता को प्राप्त रकम का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा, जिस पर इनकम टैक्स विभाग नजर रख पाएगा।
हालांकि, इस बदलाव के बावजूद कई लोग अपनी संपत्ति की वास्तविक कीमत लिखने में झिझक सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि संपत्ति की बिक्री और खरीदी के बीच की अवधि में हुई मूल्य वृद्धि के आधार पर 12.5 प्रतिशत तक आयकर देना पड़ता है। आने वाले समय में पता चलेगा कि संपत्ति के सौदों में कितनी पारदर्शिता आई।
सीबीआई के लंबे हाथ दिखने लगे
छत्तीसगढ़ में केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई की हालिया गतिविधियां सुर्खियों में हैं। राज्य लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी की गिरफ्तारी ने न केवल राजनीतिक बल्कि प्रशासनिक हलकों में भी हडक़ंप पैदा कर दिया है।
अप्रैल में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सीबीआई पर लगी पाबंदी हटाने के साथ-साथ पीएससी 2021 के घोटाले की जांच का जिम्मा उसको सौंपा गया। हालांकि, शुरुआती महीनों में जांच धीमी रही। जून में सीबीआई द्वारा दफ्तर में छापा मारने की आई खबरों को आयोग ने खारिज कर दिया था।
अब सीबीआई ने सोनवानी के साथ बजरंग इस्पात के डायरेक्टर श्रवण गोयल को गिरफ्तार किया है। सीबीआई का आरोप है कि गोयल के बेटे और बहू को डिप्टी कलेक्टर बनाने के लिए सोनवानी के खाते में एनजीओ के माध्यम से 45 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। हालांकि, दो डिप्टी कलेक्टर पदों के लिए यह रकम मामूली लग सकती है, लेकिन माना जा रहा है कि आगे की जांच में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
सीबीआई ने इस मामले में तत्कालीन सचिव जीवन किशोर ध्रुव, आईएएस अमृत खलको और अन्य लोग पर एफआईआर दर्ज की है। शुरूआती जांच में कम से कम 18 मामलों का खुलासा हुआ है, जिनमें पीएससी के चेयरमैन, आईएएस, उनके रिश्तेदारों और राजनेताओं के करीबियों को बड़े पदों पर नियुक्ति दिए जाने की शिकायतें हैं। यह माना जा सकता है कि सीबीआई ने सबूत जुटाने में वक्त लिया, जिसके बाद गिरफ्तारी शुरू हुई।
सोनवानी और गोयल की गिरफ्तारी के साथ ही सोमवार को सीबीआई ने कोरबा में दो कारोबारियों और एक श्रमिक नेता के ठिकानों पर छापा मारा। एसईसीएल खदान के भूमि अधिग्रहण मुआवजे में हेराफेरी की जांच के तहत यह कार्रवाई हुई।
वहीं, छत्तीसगढ़ के शराब घोटाले में भारतीय दूरसंचार सेवा के अधिकारी रहे एपी त्रिपाठी के खिलाफ सीबीआई जांच का आदेश भी राज्य सरकार ने जारी किया है। वहीं, दिल्ली से आए एक बड़े घटनाक्रम में सीबीआई ने सेक्स सीडी कांड की अदालती कार्रवाई दिल्ली में कराने के आवेदन को सुप्रीम कोर्ट से वापस ले लिया। अब इस मामले की सुनवाई रायपुर में ही होगी। यह आवेदन सीबीआई ने तब लगाया था जब प्रदेश में उसे तत्कालीन सरकार ने बैन कर दिया था।
छत्तीसगढ़ में जांच एजेंसियों की सक्रियता को केंद्र सरकार की सख्ती के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। सीजीपीएससी घोटाले में कार्रवाई का इंतजार था, जो अब शुरू होती दिख रही है। हालांकि, छत्तीसगढ़ ने झीरम घाटी कांड और चावल घोटाले जैसे मामलों में धीमी न्याय प्रक्रिया देखी है। यह देखना बाकी है कि सीजीपीएससी, शराब, कोयला घोटाले के मामले कब अंजाम तक पहुंचेंगे। ([email protected])
अब खुल रही हैं प्याज की परतें
पीएससी के पूर्व चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी की गिरफ्तारी के बाद पीएससी भर्ती परीक्षा में भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं। सोनवानी का प्रशासनिक अफसर के रूप में कैरियर दागदार रहा है। बावजूद इसके उन्हें राजनीतिक, और प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा। उनकी पीएससी चेयरमैन जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति कर दी गई, जो कि सही नहीं था। इसको लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष-2015 के एक फैसले का उदाहरण दिया जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने यूपी के तत्कालीन पीएससी चेयरमैन अनिल यादव को बर्खास्त किया था।
अनिल यादव के खिलाफ भी अपराधिक प्रकरण था, जिसे छिपाकर यूपी की अखिलेश सरकार ने पीएससी चेयरमैन बना दिया। कोर्ट ने यादव की नियुक्ति को गलत ठहराया था। कुछ इसी तरह का प्रकरण टामन सिंह सोनवानी का भी है। टामन सिंह सोनवानी पर जांजगीर-चांपा जिला पंचायत के सीईओ रहते भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। कुल मिलाकर एक दर्जन आरोपों में से पांच आरोप सही पाए गए। उनकी दो वेतन वृद्धि भी रोकी गई थी। भ्रष्टाचार के इस गंभीर मामले को ईओडब्ल्यू-एसीबी में देने के बजाए विभागीय कार्रवाई कर एक तरह से उन्हें प्रशासनिक संरक्षण दिया गया। बाद में प्रमोट हो गए, और फिर नारायणपुर व कांकेर कलेक्टर भी बना दिए गए।
भूपेश सरकार में तो सोनवानी का सिक्का चल पड़ा। वे भूपेश बघेल के मंत्री रहते विशेष सहायक थे। और जब भूपेश बघेल सीएम बने, तो सोनवानी उनके सचिवालय में सचिव हो गए। बाद में उन्हें पीएससी का चेयरमैन नियुक्त कर दिया गया। जानकारों का कहना है कि सरकार ने सोनवानी के कैरियर रिकॉर्ड से जुड़े सारे तथ्य राज्यपाल के सामने नहीं रखे गए, अन्यथा चेयरमैन पद पर नियुक्ति नहीं हो पाती। अब सोनवानी सीबीआई की हिरासत में हैं, तो सारे तथ्य सामने आ रहे हैं।
ओपी चौधरी के चार्ज में भी थे ये...
सीबीआई की गिरफ्त में आए पीएससी के तत्कालीन चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी के भ्रष्टाचार के कई किस्से छनकर निकल रहे हैं। यह भी संयोग है कि वित्त मंत्री ओपी चौधरी, जब जांजगीर-चांपा कलेक्टर थे, तब सोनवानी वहां जिला पंचायत के सीईओ थे। यह वह दौर था जब जांजगीर-चांपा जिले में मनरेगा के मजदूरी भुगतान में करोड़ों के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था।
बताते हैं कि जब मनरेगा में गड़बड़ी के मामले सामने आए, तो कलेक्टर ओपी चौधरी का विवाह था, और वो छुट्टी में थे। ऐसे में सीनियर अफसर होने के नाते टामन सिंह सोनवानी कलेक्टर के प्रभार पर भी थे। सुनते हंै कि कलेक्टर की गैर मौजूदगी में उन्होंने भ्रष्टाचार को अंजाम दिया। बाद में शिकायत होने पर जांच बिठाई गई, लेकिन उस समय भी कुछ प्रशासनिक अफसर सोनवानी को बचाने में जुटे रहे, और पुलिसिया कार्रवाई से बच गए, लेकिन अब सीबीआई के हत्थे चढ़ गए।
सवर्णा परिवार की होटल

केरल को पढ़े-लिखों का प्रदेश कहा जाता है, और यहां लिखने-पढऩे का अंदाज भी खासा अलग होता है। ऐसा ही एक रोचक किस्सा अलेप्पी के एक होटल में हुआ।
उत्तर भारत से आए कुछ पर्यटक होटल में खाना खाने पहुंचे। होटल साफ-सुथरा था, खाना भी लाजवाब था और सेहत का ध्यान रखते हुए गर्म पानी भी परोसा गया। लेकिन होटल के नाम ने उनके मन में सवाल खड़ा कर दिया। होटल के साइन बोर्ड पर लिखा था- सर्वनाश।
ग्राहकों ने हैरानी से स्टाफ से पूछा, आप लोगों ने होटल का नाम ‘सर्वनाश’ क्यों रखा है? सवाल सुनकर होटल के मालिक मुस्कुराए और समझाया, आप इसे गलत पढ़ रहे हैं। दरअसल, यह होटल ‘सवर्णा’ फैमिली द्वारा संचालित है, और इसलिए इसका नाम ‘सवर्णाज’ रखा गया है।
अचानक चमक गया धुड़मारास

बस्तर जिले का छोटा सा गांव धुड़मारास सैनालियों के लिए आकर्षण का नया स्थान हो गया है। अब पूरी दुनिया में गूगल सर्च करें तो इस गांव का नाम दिखाई देगा और इसका विवरण मिलेगा।
संयुक्त राष्ट्र के ग्रामीण पर्यटन कार्यक्रम के लिए 60 देशों से जिन 20 गांवों का चयन हुआ है, उनमें यह शामिल किया गया है। कल तक इस गांव की अधिक चर्चा नहीं थी, पर अब इसे प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और स्थानीय आदिवासी परंपराओं के लिए जाना जाएगा।
गाडिय़ों के पीछे दर्शनशास्त्र
इन दिनों देश भर में सडक़ों पर जितने हादसे थोक में मौत लाते दिख रहे हैं, उससे लगता है कि चारों तरफ जागरूकता की जरूरत है। अब रायपुर का यह ट्रैक्टर कुल पांच शब्दों में मौत के खतरे को गिना रहा है, और साथ-साथ सडक़ों पर रिश्वत लेने वाले लोगों पर तंज भी कस रहा है। अब गाडिय़ों के पीछे लिखे जिंदगी के फलसफे पता नहीं लोगों पर कितना असर डालते हैं, लेकिन इनमें से बहुत से मजेदार और असरदार रहते तो हैं, यह अलग बात है कि लोग असर से परे हो गए हैं।
एक गाड़ी के पीछे लिखा हुआ पढऩे मिला- धीरे चलोगे तो बार-बार मिलेंगे, तेज चलोगे तो हरिद्वार मिलेंगे। एक और ने गाड़ी के पीछे लिखा हुआ है- वाहन चलाते समय सौंदर्य दर्शन न करें, वरना देव दर्शन हो सकते हैं।
एक गाड़ी शब्दों के मामले में बड़ी किफायती थी- सावधानी हटी, सब्जी-पूड़ी बंटी।
सावधानी से परे कुछ मजे की बातें भी गाडिय़ों पर लिखी रहती हैं। एक ने लिखा है- अगर मेहनत से लोग पैसेवाले बनते हैं, तो कोई धनवान गधा दिखाओ।
हनुमान के मुखौटे में विभीषण

आम आदमी पार्टी के बड़े नेता एक के बाद एक पार्टी छोड़ रहे हैं। इन्हीं में से एक दिल्ली सरकार के मंत्री कैलाश गहलोत ने अपना पद छोड़ा, तो दिल्ली से लेकर रायपुर तक पार्टी के अंदरखाने में प्रतिक्रिया हो रही है।
आप के बड़े नेता गहलोत ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को भेजे अपने इस्तीफे में यमुना की सफाई के मसले पर पार्टी की आलोचना की है। इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ आम आदमी पार्टी के मीडिया प्रभारी अन्यतम शुक्ला ने कैलाश गहलोत का मंत्री पद की शपथ लेने के बाद का पुराना पोस्ट फेसबुक पर साझा किया है। जिसमें गहलोत ने लिखा था जिस तरह भगवान राम के सेवक बनकर हनुमान काम कर रहे थे। उसी तरह मैं भी अरविंद केजरीवाल का हनुमान बनकर परिवहन एवं अन्य विभाग में उनके विजन और कामों को आगे बढ़ाऊंगा।
अब कैलाश गहलोत के पार्टी छोडऩे के बाद मीडिया प्रभारी ने फेसबुक पर कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया दी है कि हम तुम में हनुमानजी के गुण ढूंढते रह गए, तुम राम भक्तों की सेना में विभीषण निकले!
आरटीआई ने बदला घर का पता
अब बात इससे थोड़ा हटकर-आरटीआई को हथियार बना अपना आशियाना बनवाने की। राजधानी की एक रिटायर्ड महिला ने अपना आशियाना बनाने हर काम के लिए आरटीआई का इस्तेमाल किया । जो काम ससुर जी के जमाने से वर्षों से तहसील, भू-रजिस्ट्री, नगर निवेश, निगम के जोन और व्हाइट हाउस में अटके, अटकाए जाते रहे। वह कहीं पर पहले ही आवेदन में तो कही दूसरी अपील में ही निपटते गए। महिला को बकायदा सील लगी एनओसी मिलती गई।
वीआईपी रोड स्थित माइनिंग कॉलोनी में कई वर्षों पहले महिला के ससुर ने जमीन ली थी। जब ससुर एनएमडीसी बैलाडीला में पदस्थ थे। ससुर का निधन हुआ तो पुत्र अपने नाम नहीं चढ़वा पाए। पुत्र (पति) भी नहीं रहे। अनुकंपा नियुक्त खत्म हो रही थी तो महिला ने मकान बनाने का बीड़ा उठाया। मैदान में उतरीं तो हर दफ्तर में अफसरशाही,लालफीताशाही के अड़ंगे थे। जमीन इतने प्राइम लोकेशन पर है कि सोसाइटी वालों की भी नजरें लगीं थी। वे भी रोड़ा बनकर सरकारी अमले को मदद करते रहे,इस कोशिश में कि जमीन हस्तांतरित न हो। चूंकि महिला, स्वयं भी लिपिक वर्गीय कर्मचारी रही हैं तो आरटीआई को हथियार बनाया। पहले तो दिवंगत ससुर की जमीन पर हक हासिल किया और फिर नक्शा, निर्माण अनुज्ञा जैसी कागजी अनुमति के लिए आवेदन लगाती रही। वह भी आरटीआई के ऑनलाइन पोर्टल पर। और ठीक एक माह बाद दूसरी अपील। इस पर निगम, तहसील और जिला प्रशासन का अमला अपील की नोटिस मिलते ही एनओसी देता रहा। महिला को बस एक ही जगह वह भी जोन दफ्तर में 25 हजार रुपए घूस के लिए खर्च करने पड़े। खैर,बहुत जल्द महिला व बच्चे पॉश कॉलोनी के निवासी होने जा रहे हैं।
आरटीआई नेगोशिएशन फंड
हाल के महीनों में आरटीआई आवेदनों में कमी आई है। कुछ गंभीर एक्टिविस्ट भी अपने में से कुछ ऐसे ही नेगोशिएशन एक्टिविस्ट की वजह से आवेदन लगाने से पीछे हट गए हैं। इस पर कुछ एक्टिविस्ट से चर्चा की तो एक नई जानकारी मिली।
इनका कहना था कि एक आम धारणा बन गई है कि सूचना का अधिकार केवल किसी निर्माण में गड़बड़ घोटाले को पकडऩा या उजागर करने का माध्यम हो गया है । इसके आवेदन लगाने वाले स्वयं को इसकी आड़ में ईमानदार राष्ट्र और राज्य हितैषी बताने से नहीं चूकते। जबकि ऐसे एक्टिविस्ट 40-40 लाख की महंगी कार, एसयूवी मेंटेन कर रहे हैं। ऐसे में उनके रहन सहन का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे ही ईमानदार देशहित की सोच रखने कथित एक्टिविस्टों को जानकर ही अफसर भी अपने हाथ में चल रही योजनाओं में से आरटीआई फंड का इंतजाम रखने लगे हैं। मतलब आरटीआई का आवेदन लगते ही एक्टिविस्ट से नेगोशिएशन शुरू हो जाता है। यह फंड ठीक वैसा ही है जैसे योजना के भूमि पूजन, लोकार्पण समारोह के आयोजन का व्यय।
आरटीआई का सौदा पट गया तो अफसर के पहले जवाब से ही प्रदेश और देश हित गड्ढे में गया। नहीं पटा तो दूसरी-तीसरी अपील तक तो पट ही जाएगा। वहां नहीं पटा तो अफसर का कोई बड़ा नुकसान नहीं होना। मुख्य सूचना आयोग केवल 25 हजार का अर्थदंड ही लगाएगा। वैसे तो कई अपील में आयोग ही बचाव मुद्रा में आ जाता है। क्योकिं वहां भी तो रिटायर्ड ही बैठे हैं। अपील अर्थदंड तक पहुंचने पर यह पेमेंट भी अफसर को थोड़ी करना है, सैलरी पेमेंट से कटेगा। और रि-पेमेंट ठेकेदार कर देगा। बस एक ही भय से अफसर नेगोशिएशन को सेफ साइड मानते हैं कि साबित होने पर आयोग मामले को सार्वजनिक कर घोटाले में संलिप्तता बता नाम जारी कर देता है । इससे घर परिवार कॉलोनी में नजरें घूरने लगती हैं। इससे बचने ही अफसर अब आरटीआई एक्टिविस्ट नेगोशिएशन फंड रखने लगे हैं।
अब कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि कारख़ाने और खदान की जनसुनवाई में मीडिया-मैनेजमेंट के लिए भी फण्ड रखा जाता है, अकेले आरटीआई एक्टिविस्ट को क्यों कोसें।
बद्दुआ की चर्चा
रायपुर दक्षिण विधानसभा का चुनाव निपट गया। अब नतीजे की प्रतीक्षा हो रही है। इन सबके बीच कांग्रेस टिकट के एक मजबूत दावेदार नगर निगम के सभापति प्रमोद दुबे के फेसबुक पोस्ट की खूब चर्चा हो रही है।
प्रमोद दुबे ने लिखा कि बद्दुआ ऐसी गोली है जो जीवन को छिन्न-भिन्न कर देती है। थोड़ा संभलकर जिएँ...।
उन्होंने यह पोस्ट किसके लिए लिखा है, यह साफ नहीं है। मगर पार्टी के कई लोग रायपुर दक्षिण से उनकी दावेदारी को नजरअंदाज करने से जोडक़र देख रहे हैं। प्रमोद दुबे रायपुर दक्षिण से टिकट के मजबूत दावेदार थे। कई प्रमुख नेताओं ने उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने की सिफारिश की थी, लेकिन अंतत: युवक कांग्रेस अध्यक्ष आकाश शर्मा को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। इससे प्रमोद दुबे, और उनके समर्थक नाराज रहे। ये अलग बात है कि चुनाव के दौरान उन्होंने अपनी नाराजगी का इजहार नहीं किया, और यथासंभव आकाश शर्मा के लिए मेहनत करते नजर आए। चर्चा है कि प्रमोद एक-दो प्रमुख नेता से नाराज बताए जा रहे हैं, और फेसबुक के जरिए अपनी नाराजगी का इजहार किया है। चाहे कुछ भी हो, प्रमोद दुबे के पोस्ट की राजनीतिक हलकों में जमकर चर्चा है।
आदिवासी विकास बैठक या पिकनिक?
बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण की बैठक आज चित्रकोट जलप्रपात के पास हो रही है। इसके लिए दो विशाल वाटरप्रूफ डोम तैयार किए गए हैं। एक डोम मंत्रियों और सदस्यों के चिंतन-मनन के लिए, दूसरे में भोजन-पानी। करीब 20 एसी की अस्थायी व्यवस्था और सैकड़ों जवानों की तैनाती ने इस कार्यक्रम को अलग भव्यता प्रदान कर दी है। जलप्रपात को आम जनता के लिए बंद कर दिया गया है ताकि माननीय निर्विघ्न इसका आनंद उठा सकें।
लेकिन अगर हम आदिवासियों और बस्तर के दूसरे पहलू पर बात करें, तो तस्वीर कुछ और ही है। वामपंथी उग्रवाद और पुलिस कार्रवाई के कारण हजारों आदिवासी ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र पलायन कर चुके हैं। फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए निर्दोष आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए कई आंदोलन जारी हैं।
आदिवासी बाहुल्य गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा और सडक़ जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। कई रिपोर्टें बताती हैं कि आदिवासियों की गिरफ्तारी और जेल उनकी जनसंख्या के अनुपात में अधिक है। दंतेवाड़ा जेल इसका गवाह है, जहां प्रदेश के सबसे ज्यादा कैदी निरुद्ध हैं। बेरोजगारी और आर्थिक तंगी आदिवासी समाज की प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं।
विडंबना के बीच भी कुछ अच्छा सोच लेने में हर्ज क्या है? मान लें कि इस भव्य आयोजन में भी आदिवासियों की वास्तविक समस्याओं पर गहरी चर्चा होगी।
मोबाइल ले डूबा
बिलासपुर संभाग में पदस्थ राज्य पुलिस सेवा के एक अफसर जांच के घेरे में हैं। पुलिस अफसर की एक प्रभावशाली भाजपा नेता से रिश्तेदारी भी है। बावजूद इसके पुलिस अफसर की गलती इतनी बड़ी है कि नेताजी भी उन्हें संरक्षण नहीं दे पा रहे हैं।
हुआ यूं कि पुलिस अफसर ने अपने करीबी को किसी दूसरे शख्स का कॉल डिटेल्स निकाल कर उपलब्ध करा दिया। इसकी शिकायत हुई, तो सीनियर पुलिस अफसर ने इसकी पड़ताल की। जांच रिपोर्ट में शिकायत सही पाई गई। अब अफसर के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, और विभागीय जांच के संकेत हैं।
पिछली सरकार में भी मोबाइल टैपिंग को लेकर काफी हल्ला मचा था। एक अफसर को निजी तौर पर टैपिंग से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध करा दिए गए थे। इसको लेकर भी काफी किरकिरी हुई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इन सबको देखते हुए निजी तौर पर किसी को कॉल डिटेल्स उपलब्ध कराने का मामला गंभीर है ही।
बस्तर से एयर टैक्सी...!
बस्तर इलाके के नेता, खासकर विधायक और उनके निकटवर्ती जमीन पर नहीं चल रहे, वे उड़ रहे हैं। मतलब राजधानी आना है, तो बहुत मजबूरी में कार की सवारी कर रहे। जबकि केशकाल घाटी को छोड़ दें तो फोरलेन एक्सप्रेस-वे जैसी एनएच की सुविधा है। मगर बस्तर के नेता हवा में सफर करने को प्रेफर कर रहे हैं। और करें क्यों न, सरकारी सुविधा आपकी अपनी ही तो होती है। बस दुरुपयोग नहीं करना होता। रायपुर जगदलपुर नियमित विमान सेवा के साथ नक्सल ऑपरेशन के किराए में लिए चॉपर भी तो हैं अपने। एक दो चॉपर वीआईपी उड़ान के लिए भी हायर्ड हैं। सभी प्लेन- चॉपर सुकमा से रायपुर तक हर एक दिन की आड़ में रसद,एमुनेशन और अन्य आधिकारिक काम से उड़ान भरते ही हैं। बस विधायक नेताओं को अफसरों से सेटिंग और उनकी टेक आफ टाइमिंग के मुताबिक टाइम मैनेजमेंट करना रहता है।
रायपुर के लिए टेक आफ में कोंडागांव, केशकाल, कांकेर के विधायक नेताओं को पिकप लैंडिंग की भी सुविधा मिल जाती है। बस कागजी कारण थ्रेट की एंट्री कराना होता हैं। वैसे इस परंपरा की नींव पिछली सरकार के नेताओं ने रखा था और अब आगे बढ़ रही है। सो कहा जा सकता है बस्तर से रायपुर तक एयर टैक्सी उपलब्ध हो गई है।
एआई की इतनी चर्चा क्यों है?
एआई की इन दिनों बड़ी चर्चा है। चलो आपको बता देते हैं कि ये काम क्या-क्या करता है। निश्चित रूप से इनमें से कोई न कोई काम धंधा आपसे जुड़ा होगा:
एआई तकनीक के केंद्र में डेटा होता है। डेटा साइंटिस्ट, डेटा इंजीनियर, और बिजनेस एनालिस्ट जैसे प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि एआई को सटीक, समृद्ध और विविध डेटा पर निर्भर रहने की आवश्यकता होती है।
एआई और मशीन लर्निंग का विकास करने और उसे प्रशिक्षित करने के लिए विशेषज्ञों की मांग बढ़ रही है। मशीन लर्निंग इंजीनियर एआई सिस्टम के मॉडल तैयार करते हैं, उन्हें सुधारते हैं और उनके व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए काम करते हैं।
एआई का उपयोग रोबोटिक्स के क्षेत्र में तेजी से हो रहा है। रोबोटिक्स इंजीनियरों की आवश्यकता उत्पादन, चिकित्सा, एग्रीकल्चर, लॉजिस्टिक्स और अन्य क्षेत्रों में रोबोट्स को डिजाइन और संचालन के लिए होती है।
जैसे-जैसे एआई का प्रसार बढ़ रहा है, यह जरूरी है कि इसकी नैतिकता और जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जाए। इसलिए एआई नैतिकता विशेषज्ञों की मांग बढ़ रही है, जो एआई के विकास और उसके प्रभाव की निगरानी और मार्गदर्शन करते हैं।
एआई का इस्तेमाल साइबर सुरक्षा में भी तेजी से हो रहा है, जिससे साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की मांग बढ़ रही है। एआई द्वारा
एआई का शिक्षा में व्यापक रूप से उपयोग हो रहा है। शिक्षा में कंटेंट डेवलपमेंट, पर्सनलाइज्ड लर्निंग सिस्टम और एडुकेशनल ऐप्स का विकास करने वाले प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ रही है।
एआई का इस्तेमाल कला, डिज़ाइन, कंटेंट क्रिएशन, फिल्म और मीडिया में भी तेजी से हो रहा है। एआई का सहयोगी उपयोग करने वाले क्रिएटिव प्रोफेशनल्स जैसे कंटेंट क्रिएटर, ग्राफिक डिज़ाइनर, और एनिमेटर की मांग बनी रहेगी।
एआई का उपयोग हेल्थकेयर में बीमारी के निदान, उपचार, मेडिकल डेटा विश्लेषण और प्रेडिक्टिव हेल्थकेयर में बढ़ता जा रहा है। इसके लिए एआई आधारित समाधानों का विकास करने वाले विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी।
वर्चुअल असिस्टेंट्स और चैटबॉट्स का उपयोग विभिन्न सेवाओं में बढ़ता जा रहा है। इन सिस्टम को बनाने, प्रशिक्षित करने और बेहतर करने के लिए डेवलपर्स और भाषा विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी।
मैन्युफैक्चरिंग और अन्य उद्योगों में ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहा है। ऑटोमेशन विशेषज्ञ उत्पादन प्रक्रिया को एआई और रोबोटिक्स के साथ ऑटोमेट करते हैं।
एआई की नई तकनीकों और तरीकों को खोजने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए शोधकर्ता और डेवलपर्स की आवश्यकता होगी। इसमें एआई आर्किटेक्चर, कंप्यूटर विजऩ, नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता की मांग है। ([email protected])
मैट्रिकुलेट बाबू और आईएएस
मंत्रालय संवर्ग के 150 अधिकारी कर्मचारी पदोन्नत होने हैं। पिछले माह के अंतिम दिनों में पदोन्नति समिति की बैठक भी हो गई। लेकिन इस बीच आदेश से पहले एक पेंच आ गया है। वह यह कि कुछ कर्मचारी जो अधिकारी बनने वाले हैं उनकी शैक्षणिक योग्यता साबित करने का पेंच है। पिछली सरकार ने तय किया था कि अब कर्मचारी को तभी पदोन्नति मिलेगी जब वह स्नातक हो। वह इसलिए कि मप्र से विभाजन में आए अधिकांश कर्मचारी उस समय मैट्रिकुलेट ही रहे हैं। हर तीन पांच वर्ष बाद पदोन्नत होकर उप सचिव तक बनते गए। कुछ तो बीते 20-23 वर्ष में रिटायर भी हो गए। यह भी प्रचारित होता रहा कि एमबीबीएस जैसे उपाधिधारी आईएएस अफसरों को 11 वीं पास बाबू चला रहे हैं ।
इसे देखते हुए बघेल सरकार ने पदोन्नति के लिए कम से कम स्नातक उपाधि की योग्यता फिक्स की। और पुराने 11 वीं पास को डिग्री करने की अनुमति दी। जीएडी ने डिग्री करने समय भी दिया था पढ़ाई का। लेकिन कुछ लोगों ने शार्ट कट अपनाया और नगद देकर प्रदेश के कुछ निजी विवि से एक वर्ष में तीन वर्षीय डिग्री लेकर जीएडी में जमा कर दिया। अब ऐसे ही लोगों की पदोन्नति अटक गई है। जीएडी ने जांच का फैसला किया है। जीएडी में पहले की तरह पुराने आईएएस तो हैं नहीं, अब तो एमफिल, एमबीए (इन इंटरनेशनल बिजनेस)उत्तीर्ण सचिव हैं।
जीएडी को राजधानी और न्यायधानी के दो विवि की डिग्री पर संदेह है। अब देखना है कि कितने रूकते हैं। वैसे बता दें कि पृथक छत्तीसगढ़ में वर्ष 2007 बैच की पहली भर्ती के साथ ही अब तक की चार भर्तियों में स्नातक, स्नातकोत्तर बाबू मिले हैं।
एक का इंतज़ार लंबा हो गया

विधानसभा चुनाव के बीच चुनाव आयोग ने जिन कलेक्टर्स, और एसपी को हटाया था उनमें से तत्कालीन राजनांदगांव एसपी अभिषेक मीणा को छोडक़र बाकी सभी मुख्यधारा में आ गए हैं। यानी सभी की कहीं न कहीं पोस्टिंग हो चुकी है। अकेले मीणा ही रह गए हैं जिन्हें पीएचक्यू में अटैच तो कर दिया गया लेकिन उन्हें अब तक कोई प्रभार नहीं मिला है।
मीणा को कांग्रेस सरकार में अच्छी पोस्टिंग मिलती रही है। वो रायगढ़, कोरबा, बिलासपुर, और राजनांदगांव एसपी रहे हैं। मगर सरकार बदलने के बाद से खाली हैं। मीणा के साथ ही दुर्ग के तत्कालीन एसपी शलभ सिन्हा और कोरबा एसपी उदय किरण को भी हटाया गया था, लेकिन शलभ जल्द ही जगदलपुर एसपी बना दिए गए। उदय किरण की भी बटालियन में पोस्टिंग हो चुकी है।
यही नहीं, भूपेश सरकार में ताकतवर रहे एडीजी दीपांशु काबरा, आनंद छाबड़ा को भी दस महीने बाद पीएचक्यू में प्रभार मिल गया है लेकिन मीणा का इंतजार थोड़ा लम्बा हो गया है।
कर्मचारियों के वोट कम?
रायपुर की चारों विधानसभा में सबसे ज्यादा कर्मचारी दक्षिण में रहते हैं लेकिन उपचुनाव में पोलिंग कम हुई है। आम चुनाव की तुलना में 11 फीसदी कम यानी 50.50 फीसदी ही वोटिंग हुई है। राजनीतिक दल, कम मतदान के पीछे कर्मचारियों द्वारा वोटिंग नहीं करने को एक कारण मान रहे हैं।
रायपुर दक्षिण में सबसे ज्यादा कर्मचारी पेंशनबाड़ा, विजेता कॉम्पलेक्स, कांशीराम नगर, पुरानी बस्ती आदि इलाकों में रहते हैं। मगर इन इलाकों में कई बूथों पर 30 फीसदी के आसपास ही मतदान हो पाया। यद्यपि राज्य सरकार ने रायपुर दक्षिण के मतदाता कर्मचारियों के लिए संवैतनिक अवकाश घोषित किया था, बावजूद इसके ज्यादातर कर्मचारी-परिवार वोट डालने नहीं गए।
कई लोग मान रहे थे कि कर्मचारी नेता प्रदीप उपाध्याय आत्महत्या प्रकरण को लेकर जिस तरह कर्मचारी आंदोलित थे उससे ज्यादा वोटिंग होने की उम्मीद लगा रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भाजपा के लोग कर्मचारियों की कम वोटिंग को अपने फायदे के रूप में देख रहे हैं। अब किसको कितना फायदा होता है यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
सच का सामना करें

छत्तीसगढ़ में शराब की खपत को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में मनपसंद शराब उपलब्ध कराने के लिए लाई गई ऐप ने सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के बीच जंग छेड़ दी है। राजनीतिक खींचतान आम लोगों को भरमाने के लिए है। शराब से राजस्व आय पिछले 20 सालों में दो गुनी से अधिक हो चुकी है। इसे कोई सरकार नहीं छोडऩा चाहती। शराब को बुरा भी मानेगी और इसकी खपत बढ़े इसकी कोशिश भी करेगी।
जून में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में देश में सबसे ज्यादा शराब पी जाती है। यहां कुल आबादी का 35.6 प्रतिशत हिस्सा शराब का सेवन करता है। यह आंकड़ा देश के किसी भी अन्य राज्य से ज्यादा है। खास बात यह है कि इस संख्या में महिलाओं को भी शामिल किया गया है, हालांकि पीने वालों में अधिकांश पुरुष ही हैं। महिलाओं को अलग करके गिनें और पीने वालों का असली प्रतिशत निकाल लें।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जून तक छत्तीसगढ़ की सरकारी दुकानों में अच्छे ब्रांड की शराब की कमी थी। इसके बावजूद, यहां की जनता घटिया शराब पीकर भी पहले स्थान का दर्जा नहीं छीनने दिया। इसके मुकाबले त्रिपुरा 34.7 प्रतिशत के साथ दूसरे और आंध्र प्रदेश 34.5 प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर हैं।
पंजाब, जिसे अक्सर नशे के लिए बदनाम किया जाता है, इस सूची में चौथे स्थान पर है। वहां कुल आबादी का सिर्फ 28.5 प्रतिशत शराब पीता है। वहीं, मौज-मस्ती और पार्टीबाजी के लिए मशहूर गोवा छठवें नंबर पर है, जहां केवल 26.4 प्रतिशत लोग शराब का सेवन करते हैं।
अरुणाचल प्रदेश 28 प्रतिशत के साथ पांचवें स्थान पर है, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत से भी कम है।
इस पर विचार मत करें कि अधिकांश अपराध नशे की वजह से होते हैं। हत्या, लूट, बलात्कार, चाकूबाजी सब। हमारी पुलिस इन नशेडिय़ों के क्राइम को ही निपटाने में ज्यादा वक्त गुजारती है। कभी-कभी हिसाब किया जाना चाहिए कि शराब के कारण होने वाले अपराध के एवज में बांटी जाने वाली तनख्वाह ज्यादा है या शराब बेचने से होने वाली आमदनी।
गुरु पूर्णिमा के मौके पर

अचानकमार अभयारण्य में दिल्ली वाले प्रोफेसर साहब प्रभुदत्त खेड़ा ने अपना जीवन आदिवासियों की बेहतरी के लिए गुजार दिया। वे अपने पीछे अनेक शुभचिंतक छोड़ गए। उनका खोला गया एक स्कूल अचानकमार में स्थापित है। गुरु पूर्णिमा के दिन उनके शिष्य ये सारा सामान बच्चों के लिए छोड़ आए।
कांग्रेस का घरेलू हिसाब-किताब
रायपुर दक्षिण के चुनाव नतीजे को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने चुनाव संचालन से जुड़े नेताओं के साथ गुरुवार को बैठक की, और संभावनाओं पर चर्चा की। बताते हैं कि निगम के एक प्रमुख पदाधिकारी ने कह दिया कि उनके वार्ड से कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिलने की संभावना कम है। उन्होंने तर्क दिया कि उनके वार्ड में लोग वोट डालने नहीं निकले, इससे नुकसान हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि ये निगम पदाधिकारी प्रदेश में सबसे ज्यादा मतों से वार्ड मेंबर का चुनाव जीते थे। अब जब वो खुद ही बढ़त दिला पाने में असमर्थता जता रहे हैं, तो चुनाव नतीजे का अंदाज लगा पाना मुश्किल नहीं है। निजी चर्चा में पार्टी के कई लोग कह रहे हैं कि आकाश शर्मा के प्रत्याशी बनने से युवाओं का कांग्रेस के प्रति रूझान दिखा है।
युवा कांग्रेस, और एनएसयूआई के कार्यकर्ता पूरी ताकत से मैदान में डटे रहे। इसके कारण मुकाबला बराबरी का दिख रहा था, लेकिन आखिरी क्षणों में यह बात उभरकर सामने आई है कि कुछ प्रमुख नेताओं ने अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाई, इस वजह से उनके अपने इलाकों में वोटिंग कम हुई है। इससे कांग्रेस प्रत्याशी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। एक बात साफ है कि चुनाव नतीजे अनुकूल नहीं आए, तो पार्टी में गदर मचना तय है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
36गढ़ और महाराष्ट्र दोनों जगह

रायपुर दक्षिण का चुनाव निपटने के बाद प्रदेश भाजपा, और कांग्रेस के नेता महाराष्ट्र में सक्रिय हो गए हैं। पूर्व सीएम भूपेश बघेल नागपुर में प्रचार कर रहे हैं, तो पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव को मराठवाड़ा इलाके की जिम्मेदारी दी गई है। सिंहदेव ने महाराष्ट्र के चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने में भी भूमिका निभाई है।
दूसरी तरफ, भाजपा के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल पुणे के 18 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों को बढ़त दिलाने के लिए रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। जामवाल पखवाड़े भर से महाराष्ट्र में हैं। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता नलिनेश ठोकने को भी तुलजापुर विधानसभा में प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी विदर्भ में चुनाव प्रचार के लिए जाने वाले हैं। यही नहीं, उल्हासनगर के भाजपा नेताओं ने छत्तीसगढ़ के सिंधी नेताओं को प्रचार के लिए बुलाया भी है। उल्हासनगर सिंधी बाहुल्य विधानसभा है। छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन ने जिला उपाध्यक्ष ललित जैसिंघ को वहां प्रचार के लिए भेजा है। इससे परे सरकार के आधा दर्जन मंत्री झारखंड चुनाव में पहले से ही सक्रिय हैं। कुल मिलाकर झारखंड, और महाराष्ट्र चुनाव में दोनों ही प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा छत्तीसगढ़ के नेताओं का पूरा उपयोग कर रही है।
रेलवे का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
रेलवे की ओर से यात्रियों को 120 दिन पहले टिकट बुकिंग की सुविधा दी जाती है, जिससे लोग अपने यात्रा कार्यक्रम को अच्छी तरह से व्यवस्थित कर सकें। विशेषकर दूर की यात्राओं और त्योहारों के दौरान, पहले से टिकट बुक करना यात्रियों के लिए एक जरूरी बात है। मगर, विडंबना यह है कि रेलवे प्रशासन ट्रेनों को को अचानक रद्द कर यात्रियों के सपनों और ज़रूरतों पर अनदेखी की मुहर लगा देता है।
नौरोजाबाद स्टेशन में तैयार की गई तीसरी लाइन को जोडऩे के लिए एक साथ 24 ट्रेनों को रद्द करने की सूचना 14 नवंबर को दी गई। रेलवे ने इस कार्यक्रम को दो चार दिन में तो बनाया नहीं होगा? काफी पहले से तय होगा कि कब कौन सा काम करना है। मगर यात्रियों को महज एक हफ्ते या कभी-कभी दो चार दिनों की नोटिस पर सूचित किया जाता है कि उनकी ट्रेन रद्द कर दी गई है। टिकट बुक करा चुके यात्रियों का पैसा तो रेलवे 60 रुपये (एसी में ज्यादा) प्रोसेसिंग फीस काटकर लौटा देती है पर बूढ़े, बुजुर्ग, महिलाओं को मानसिक रूप से भयंकर कठिनाई का सामना करना पड़ता है। कई बार यात्रियों को किसी आवश्यक कार्य, जैसे कि स्वास्थ्य संबंधित आवश्यकताएं, नौकरी के साक्षात्कार, या पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए यात्रा करनी होती है। ऐसे में, अचानक ट्रेन रद्द होने से उनके सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है।
रेलवे की इस मनमानी से यात्रियों में नाराजगी बढ़ रही है। हर बार इसे अधोसंरचना विकास का नाम दिया जाता है। रेलवे को चाहिए कि वह अपने निर्णयों में पारदर्शिता लाए और अचानक रद्द करने की बजाय यात्रियों को टिकट बुक कराने के दौरान ही आगाह कर दे। कोई सांसद इस बात को संसद में उठाएगा?
दक्षिण किस दिशा जाएगा?
रायपुर दक्षिण विधानसभा में आम चुनाव की तुलना में 10 फीसदी कम मतदान से भाजपा, और कांग्रेस के रणनीतिकार भी हैरान हैं। यद्यपि दोनों ही दलों के नेता, अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। इससे परे खुफिया सूत्रों का अंदाजा है कि दक्षिण के चुनाव नतीजे चौंकाने वाले आ सकते हैं।
रायपुर दक्षिण में वर्ष-2023 के विधानसभा आम चुनाव में 61.78 फीसदी मतदान हुआ था। जबकि लोकसभा चुनाव में रायपुर दक्षिण में 61.42 फीसदी मत पड़े थे। मगर उपचुनाव में 50.50 फीसदी मतदान हुआ। वह भी तब, जब दोनों ही दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। भाजपा सरकार के तमाम मंत्री, गली-मोहल्लों में प्रचार के लिए उतरे थे। कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता और विधायक भी अंतिम दिनों तक प्रचार में डटे रहे। बावजूद इसके मतदान में 10 फीसदी की कमी आई है।
भाजपा प्रत्याशी, पूर्व सांसद सुनील सोनी के निवास स्थान शैलेन्द्र नगर के मतदान केन्द्र में 40 फीसदी के आसपास मतदान हुआ। यही हाल, कांग्रेस प्रत्याशी आकाश शर्मा के मतदान केन्द्र में भी रहा। आकाश के निवास सुंदरनगर के मतदान केन्द्र में करीब 52 फीसदी मतदान हुआ है। यानी दोनों ही प्रत्याशी अपने क्षेत्र से अच्छा मतदान करा पाने में विफल रहे हैं। आम चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल ने करीब 67 हजार वोटों से जीत हासिल की थी। मगर इस बार हार-जीत का अंतर कम रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।
जमीनी अफसरों का हाल-बेहाल

खबर है कि बलौदाबाजार, कवर्धा और सूरजपुर की घटना के बाद शीर्ष स्तर पर मैदानी इलाकों में पुलिस अफसरों की कार्यप्रणाली पर नजर रखी जा रही है। कुछ आईजी को उनके अपने क्षेत्र के जिलों में पदस्थ अफसरों का नाम भेजकर उनके खिलाफ शिकायतों की जानकारी ली जा रही है।
बलौदाबाजार में तत्कालीन एसपी के खिलाफ काफी शिकायतें थी। मगर उनके खिलाफ शिकायतों पर गौर नहीं किया गया। इसके फलस्वरूप वहां बड़ी घटना हो गई। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एसपी-कलेक्टर दफ्तर को उपद्रवियों ने फूंक दिया। यह घटना विशुद्ध रूप से पुलिस और प्रशासन की विफलता मानी गई है। कलेक्टर और एसपी को सस्पेंड भी किया गया।
सूरजपुर में भी पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर काफी शिकायतें थी। वहां प्रधान आरक्षक की पत्नी, और पुत्री की नृशंस हत्या के बाद एसपी को हटाया गया। इस मामले में भी एसपी को हटाया गया है। कवर्धा के लोहारीडीह, और अन्य घटनाओं में भी पुलिस की चूक सामने आई है। कुछ अफसरों के खिलाफ लेनदेन की शिकायतें रही हैं। इन सबके चलते शीर्ष स्तर पर पुलिस अफसरों की कार्यप्रणाली पर निगाहें हैं। चर्चा है कि कुछ अफसरों को बदला भी जा सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
आईएएस के लिए जनदर्शन
अब तक हम सबने कुछ प्रधानमंत्री और लगभग हर मुख्यमंत्री के जनदर्शन और मुख्य सचिव, सचिवों से एक फिक्स टाइम में मुलाकात की व्यवस्था देखी और सुनते भी रहे हैं, लेकिन देश में पहली बार केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी टीवी सोमनाथन (टीवीएस) ने ओपन हाउस तय किया है। यह विशुद्ध रूप से अभा सेवा अफसरों के लिए होगा। यह ओपन हाउस हर सप्ताह मंगल, गुरु और शुक्रवार को (छुट्टी न होने पर)सुबह रहेगा। इस दौरान केंद्रीय विभागों के साथ दिल्ली दौरे पर आने वाले राज्यों के आईएएस भी देश के अपने सबसे बड़े बॉस से मिल सकेंगे। और अपनी बात रख सकेंगे । इसमें गवर्नमेंट बिजनेस रूल, आईएएस अफसरों के सर्विस कंडीशन्स के साथ साथ कैडर में चल रही खुसुर-फुसुर और हलचल की भी चर्चा कर सकेंगे। बस एक दिक्कत है? समय की। मुलाकात के लिए मात्र 20 मिनट रखे गए हैं, और उसमें भी फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व के आधार पर। अब इसमें कितने जगह पाते हैं, पता नहीं लेकिन नॉर्थ ब्लॉक दिल्ली में लंबी लाइन लगना तय है। यह देश के किसी पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने की है। इसे लेकर उन्होंने बाकायदा पत्र भेजकर सूचित भी किया है। देखना यह है कि कितने लाभ उठाएंगे।
स्टारलिंक का इंतजार और चिंता

भारत में इस समय सबसे सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की जबरदस्त चर्चा हो रही है। यह एलन मस्क की कंपनी है, विशेष रूप से ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां टावरों और तारों के बिना इंटरनेट सेवा मिल सकेगी। लोग जहां जियो, एयरटेल और आइडिया-वोडाफोन की सेवाओं से अलग-अलग वजहों से नाखुश हैं वहीं पहाड़, नदी, घाटी, जंगल तक में इंटरनेट सेवा देने वाले स्टारलिंक की प्रतीक्षा हो रही है।
मगर दूसरा पहलू भी है। एक संस्था कूटनीति फाउंडेशन की रिपोर्ट में सुरक्षा पहलुओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। उनके अनुसार, बिना तार-टॉवर के सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं विदेशी नियंत्रण में होने के कारण सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत के लिए संभावित खतरा बन सकती हैं। यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि स्टारलिंक जैसे विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क को भारत में स्वतंत्र रूप से संचालित करने की अनुमति दी जाती है, तो यह देश की डिजिटल संरचना और संप्रभुता पर प्रभाव डाल सकता है। फाउंडेशन ने तो इसे ‘भेड़ की खाल में भेडिय़ा’ करार दिया है। कहा है कि विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय डेटा को नियंत्रण में लेना सुरक्षा जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
यकीन करना चाहिए कि हमारी सरकार सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर गौर कर कर रही होगी। ग्राहकों को तो इंतजार है कि कब ये सेवा शुरू होगी। हो सकता है जियो, वोडाफोन और एयरटेल भी प्रतिस्पर्धा में अपनी टैरिफ कम करें।
इतनी सद्भावना कि क्या कहें, शब्द नहीं हैं...
आज के माहौल में इतनी सद्भावना देखकर दिल भर आया। रायपुर की चौबे कॉलोनी में कृष्ण भक्तों की तरफ से हुए भंडारे में ‘अब्बा हुज़ूर’ ब्रांड के चावल की बोरियों रखी हैं। मिलकर चलेंगे, तो आगे बढ़ेंगे।
रायपुर दक्षिण का हाल

रायपुर दक्षिण में मतदान के पहले तक कांग्रेस, और भाजपा के दिग्गज नेता अपने-अपने दलों के नेताओं से चर्चा कर बूथ प्रबंधन पर जोर देते रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज कांग्रेस भवन में डटे रहे, तो प्रभारी सचिन पायलट फोन पर कुछ पार्षदों के सीधे संपर्क में रहे। भाजपा के चुनाव प्रचार की कमान सांसद बृजमोहन अग्रवाल संभाल रहे थे।
बृजमोहन ने प्रभारी शिवरतन शर्मा के साथ मिलकर बूथ स्तर तक प्रचार से लेकर वोटिंग तक की रणनीति बनाई। उनके साथ चुनाव प्रभारी स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल डटे रहे। जायसवाल चुनाव प्रचार को लेकर फीडबैक से पार्टी संगठन को अवगत कराते रहे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी को छोडक़र सरकार के बाकी सभी मंत्रियों ने प्रचार किया है। चौधरी को लेकर यह बताया गया कि वो दीवाली के बाद से झारखंड में डटे हुए हैं। ओपी चौधरी झारखंड के हजारीबाग लोकसभा की विधानसभा सीटों में चुनाव की कमान संभाल रहे हैं। यही वजह है कि वो यहां प्रचार करने नहीं आए। वैसे तो 28 और प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। मगर इनमें से कोई भी प्रचार करते नहीं दिखे।
न आने की चर्चा

रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव में प्रदेश भाजपा प्रभारी नितिन नबीन की गैरमौजूदगी की काफी चर्चा रही। नितिन नबीन प्रदेश भाजपा की चुनाव समिति की बैठक लेने आए थे, लेकिन प्रत्याशी घोषित होने के बाद से रायपुर नहीं आए। जबकि कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने दो सभाएं ली थी।
हल्ला तो यह भी है कि नितिन नबीन, प्रत्याशी चयन से नाखुश रहे हैं। उन्होंने नए चेहरे को प्रत्याशी बनाने का सुझाव दिया था। मगर पार्टी ने उनकी बात नहीं मानी। हालांकि पार्टी नेताओं का कहना है कि नितिन नबीन को हाईकमान ने झारखंड चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी है। वो वहां सक्रिय हैं। और झारखंड चुनाव में व्यस्तता की वजह से सुनील सोनी के प्रचार के लिए नहीं आ सके। चाहे कुछ भी हो, नितिन नबीन की गैरमौजूदगी की चुनावी परिदृश्य से गायब रहने की काफी चर्चा हो रही है।
बटालियन और कंस्ट्रक्शन
राज्य पुलिस के एक बटालियन में दो पुलिस अफसरों के बीच विवाद की खूब चर्चा हो रही है। सुनते हैं कि बटालियन में कंस्ट्रक्शन का काम होना है। इसके टेंडर आदि में कमांडेंट विशेष रुचि ले रहे हैं। बड़ा काम है, इसलिए कमांडेंट का रूचि लेना गलत नहीं है। मगर इस प्रक्रिया से राज्य पुलिस सेवा की महिला अफसर जुड़ी हुई हैं, जिन्होंने बारीक नुक्स निकाल दिया है। इसके बाद से कमांडेंट नाराज चल रहे हैं।
चर्चा तो यह भी है कि कमांडेंट और महिला अफसर के बीच एक सीनियर अफसर के कमरे में विवाद भी हुआ। सीनियर अफसर को हस्तक्षेप कर मामला शांत करना पड़ा। हल्ला है कि कमांडेट ने महिला अफसर का सीआर भी खराब कर दिया है। जिसको लेकर महिला अफसर, कानूनी कार्रवाई करने जा रही हैं। यानी पुलिस महकमे का यह विवाद आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
जमकर हुआ प्रचार
रायपुर दक्षिण में चुनाव प्रचार शांतिपूर्वक हुआ। दोनों ही दल कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता प्रचार में उतरे थे। प्रचार के आखिरी क्षणों में भाजपा नेताओं ने पूरी ताकत झोंकी है। अलग-अलग इलाकों में छोटी-छोटी सभाएं हुई, और इसमें दिग्गज भाजपा नेताओं के तेवर देखने लायक थे। शहर की एक पॉश कॉलोनी में सोमवार की रात एक छोटा सा कार्यक्रम रखा गया था। इसमें भाजपा के चुनाव के रणनीतिकारों ने शिरकत की।
कार्यक्रम शुरू होने से पहले भाजपा नेता, कॉलोनी वासियों से कहते सुने गए कि जाली टोपी वालों से बचना जरूरी है। इसलिए भाजपा को जिताना चाहिए। सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने खुले तौर पर कहा कि शहर में शांति बनाए रखना जरूरी है, नहीं तो गुंडे मवालियों का राज आ जाएगा। एक उत्साही भाजपा नेता ने तो एक कदम आगे जाकर कार्यक्रम में मौजूद भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी को जीत की अग्रिम बधाई दे दी। उन्होंने कहा कि लड़ाई अब लीड की है।
दूसरी तरफ, प्रदेशभर के युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के पदाधिकारी आकाश शर्मा के लिए प्रचार में जुटे थे लेकिन कहीं भी उन्होंने अपनी आक्रामकता नहीं दिखाई। हाथ जोडक़र वोट मांगते नजर आए। जबकि सूरजपुर की घटना के बाद कांग्रेस के युवा नेता निशाने पर रहे हैं। यही वजह है कि युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने किसी भी तरह के विवाद से बचने की कोशिश की। अब देखना है कि चुनाव में क्या कुछ होता है।
छत्तीसगढ़ के आईएएस दिल्ली में अहम बने

मोदी सरकार में छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसरों को अहम दायित्व मिला है। आईएएस के 95 बैच की अफसर श्रीमती मनिंदर कौर द्विवेदी केंद्रीय कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव बन गई हैं। मनिन्दर छत्तीसगढ़ में भी कृषि विभाग की प्रमुख सचिव रही हैं। इसी तरह आईएएस के 97 बैच के अफसर सुबोध सिंह भी केन्द्रीय इस्पात मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव हो चुके हैं।
सुबोध सिंह के छत्तीसगढ़ आने की चर्चा रही है। सुबोध रायगढ़ में कलेक्टर रहे हैं, और तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह के सचिव रहते स्थानीय प्रमुख नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। मौजूदा सीएम विष्णुदेव साय से भी उनके अच्छे संबंध है। अब केन्द्र सरकार में अच्छी पोस्टिंग के बाद वे यहां आएंगे, इसको लेकर संशय है। इसी तरह केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव रहे अमित कटारिया ने प्रतिनियुक्ति खत्म होने के बाद यहां जॉइनिंग दे दी है। मगर छुट्टी पर जाने की वजह से उनकी पोस्टिंग नहीं हुई है। चर्चा है कि कटारिया छुट्टी बढ़ा भी सकते हैं। देखना है आगे प्रशासन में क्या कुछ बदलाव होता है।
राजधानी में डिजिटल अरेस्टिंग
राजधानी रायपुर में एक महिला को डिजिटल अरेस्ट का शिकार होना पड़ा है। उसे कॉल कर इतना भयभीत किया गया कि वह खुद ही पांच दिनों तक बैंक जाकर ठगों के बताये गए खाते में रकम जमा करती रही। इस तरह से उसने करीब 58 लाख रुपये गवां दिए। रायपुर में इस तरह का पहला मामला है। भिलाई और बिलासपुर में एक-एक मामला पहले सामने आ चुका है। इसके अलावा राजिम में भी एक बच्चे के पिस्तौल के साथ पकड़े जाने की बात कहकर पिता से करीब डेढ़ लाख रुपये ठगों ने अपने एकाउंट में जमा कराये थे। डिजिटल अरेस्टिंग और साइबर ठगी ज्यादातर ऐसे बुजुर्गों के साथ हो रही है, जो अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आड़े वक्त पर काम आ सके, इसलिए रकम बैंकों में जमा करके रखते हैं। साइबर ठगों का रिसर्च बड़ा तगड़ा होता है। वे अपना शिकार ढूंढ लेते हैं।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में देशभर में हो रही ऐसी ठगी को लेकर चिंता जाहिर की थी। मन की बात को पुलिस और प्रशासन के अफसरों और नेताओं ने शायद मन लगाकर नहीं सुना। हाल ही में पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर प्रत्येक जिले में साइबर ठगी के खिलाफ जन जागरूकता अभियान चलाया गया था। लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह जलसा की तरह निपट गया। लगातार हो रही ठगी बताती है कि पुलिस-प्रशासन का संदेश पीडि़तों तक नहीं पहुंच पाया। अब शायद घर-घर दस्तक देकर लोगों को ऐसी ठगी से बचाने के लिए मुहिम छेडऩे की जरूरत है।
खजाने वाली गुफा

यह जगह दो राज्यों को जोड़ती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। इसे कबीर चबूतरा कहा जाता है। सडक़ से नीचे उतरते ही झरने से घिरी वह जगह मिलती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि कबीर ने कुछ समय यहां बिताया था। मगर, जो तस्वीर दिख रही है वह सिद्ध बाबा का आश्रय रहा है। घुमावदार पहाडिय़ों के खत्म होने के बाद और शुरू होने पर अक्सर इस तरह के आस्था के केंद्र दिखाई देते हैं। इस गुफा नुमा आस्था स्थल पर एक सुराख है। दशकों से यहां से गुजरने वाले लोग उस सुराख में सिक्के डालते हैं और आगे बढ़ते हैं। अब तक हजारों सिक्के इस गुफा के भीतर समा चुके हैं। किसी काल में खुदाई होगी तब पता चलेगा कि ये सिक्के काम के भी हैं या नहीं।


