राजपथ - जनपथ
लास्ट ओवर की बैटिंग
साल के आखिरी दिन कई अफसर रिटायर भी हो रहे हैं। इन्हीं में से आदिवासी इलाके में पदस्थ एक अफसर रिटायरमेंट के आखिरी दिनों में ट्वेंटी-ट्वेंटी के अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं। अगले दो दिनों में अफसर से अपने रुके काम करवाने के लिए होड़ मची हुई है।
अफसर के बंगले के बाहर गाडिय़ों का काफिला देखा जा सकता है। अफसर पहले भी इस इलाके में पदस्थ रहे हैं। लिहाजा, उनके संपर्क का दायरा काफी बड़ा है। यही वजह है कि अफसर तेजी से फाइल निपटा रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सरकार के लोगों को अफसर के हरकत की जानकारी नहीं है। एक मंत्री तो को लेकर आपसी चर्चा में काफी कुछ कह चुके हैं। अब वो किस तरह, और कैसी फाइल निपटाते हैं, यह तो उनके जाने के बाद ही पता चलेगा।
न्यू ईयर सेलिब्रेशन ने फूंकी जान

ईयर एंडिंग और न्यू ईयर सेलिब्रेशन के इन दिनों ने दुर्ग विशाखापट्टनम वंदे भारत एक्सप्रेस में जान फूंक दी है। सितंबर मध्य में शुरू हुई ट्रेन अपने उद्घाटक सफर के दूसरे ही दिन से पैसेंजर रिस्पांस को लेकर साँसें गिन रही थी। इस ट्रेन की अब तक रिस्पांस के चलते स्लीपर वंदे भारत की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं।
यह चेयर कार ट्रेन बीते इन महीनों में 30 फीसदी बुकिंग पर दौड़ रही थी। 18 डिब्बों की इस ट्रेन में 1128 सीटें हैं। कभी यह ट्रेन 250 तो किसी दिन 300 से अधिक यात्रियों के साथ चलती रही है। क्वालिटी ब्रेक फास्ट,लंच और डिनर पैक के साथ अच्छे सर्विस से बाद भी महंगे टिकट भाड़े की वजह से यात्री विमुख रहे। इससे इसका ऑपरेशन कॉस्ट भी नहीं निकल रहा था। इस वजह से ट्रेन के 16 कोच में कटौती कर 8 से ही चलाने की भी बात सामने आती रहीं हैं। लेकिन रेलवे नो प्रॉफिट नो लॉस के बिजनेस रूल के तहत ट्रेन चलाई जा रही है। लेकिन 20 दिसंबर के बाद से मानों वंदे भारत में जान आ गई है। और अब हर रोज 500 से अधिक सीट बुकिंग के आंकड़े मिले हैं।
25 दिसंबर को तो दुर्ग रायपुर से 1060 सीटों की बुकिंग रही। यह समुद्री पर्यटन शहर विशाखापट्टनम के आकर्षण के चलते देखने को मिला है। यह सिलसिला अभी 20 जनवरी तक बने रहने के संकेत हैं। 10 जनवरी के बाद छत्तीसगढ़ में मूल आंध्रवासियों की पोंगल के लिए गृह क्षेत्र के लिए आवाजाही रहेगी। उसके बाद परीक्षाओं के सीजन में फरवरी से अप्रैल तक ट्रेन के फिर से वेंटिलेटर पर जाना तय है।
जिसकी सरकार- उसी की रेत
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दौरान अवैध रेत खनन जोरों पर था। एनजीटी द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद दिनदहाड़े पोकलैंड और चेन माउंटेन मशीनों से रेत निकाली जाती रही। रात में रेत की चोरी आम बात थी। इस दौरान विपक्ष में बैठी भाजपा ने कई बार विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया। नदियों के साथ हुई इस निर्दयता के परिणामस्वरूप अवैध खदानों की गहराई में जाने से बच्चों की जान तक चली गई।
हाईकोर्ट में अवैध रेत खनन से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई अभी भी जारी है। अब जबकि कांग्रेस विपक्ष में है, वह इस मुद्दे पर ज्यादा सवाल नहीं उठा रही। दूसरी ओर, रेत का वही पुराना खेल अब भी जारी है। रायपुर, दुर्ग और भिलाई जैसे शहरों के लिए रेत सप्लाई का मुख्य केंद्र कांकेर जिले का भिरौद इलाका बना हुआ है।
ताजा घटनाक्रम में, भिरौद इलाके में सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता रेत की रंगदारी को लेकर आपस में भिड़ गए। कहा जा रहा है कि यह विवाद इस बात को लेकर हुआ कि किस घाट की रेत पर किसका अधिकार होगा। भले ही क्षेत्र में केवल तीन अधिकृत खदानें हैं, लेकिन अवैध खुदाई 12 से अधिक स्थानों पर हो रही है।
खनिज विभाग, तहसीलदार और पुलिस इन अवैध खदानों से अनजान होने का दावा करती रही। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुए इस आधी रात के विवाद ने इन दावों की पोल खोल दी। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्ष शिकायत लेकर थाने पहुंच गए। पर वहां उनका समझौता हो गया। संभवत: उन्हें यह महसूस हुआ कि विवाद को तूल देने से उनके कारोबार को नुकसान हो सकता है।
झगड़े के बाद, खनिज विभाग ने अचानक कार्रवाई करते हुए सभी अवैध खदानों को बंद करा दिया। हालांकि, सवाल यह है कि यह पाबंदी कब तक टिकेगी?
दो राज्यों का स्टेशन

देश में कई रोचक स्थान हैं जिनके बारे में रेल के सफर के दौरान जानकारी मिलती है। बिलासपुर से हावड़ा की ओर जाते समय ईब स्टेशन पड़ता है, जिसे देश का सबसे छोटे नाम वाले स्टेशन के रूप में जाना जाता है। कई रेलवे स्टेशन ऐसे हैं जो दो राज्यों में बंटे हुए हैं। बिलासपुर-कटनी रूट पर पडऩे वाला वेंकटनगर स्टेशन भी ऐसा ही है। इसका आधा हिस्सा मध्यप्रदेश में तो आधा छत्तीसगढ़ में है। एक स्टेशन नवापुर है जो गुजरात और महाराष्ट्र में बंटा हुआ है। यह स्टेशन भुसावल रेलवे मंडल के अंतर्गत आता है। महोबा और हरपाल स्टेशन उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में बंटे हुए हैं। यहां भवानीमंडी रेलवे स्टेशन की तस्वीर है। दिल्ली-मुंबई रूट का यह स्टेशन राजस्थान और मध्यप्रदेश में विभाजित है। लोग टिकट लेने के लिए मध्यप्रदेश के टिकट काउंटर में पहुंचते हैं और ट्रेन पर चढऩे के लिए राजस्थान में बने प्लेटफॉर्म पर आते हैं। इस कस्बे में कई घर ऐसे हैं जिनका सामने का गेट एक राज्य में तो पीछे का गेट दूसरे राज्य में खुलता है।


