राजपथ - जनपथ
नाम की गफलत में छापा
करीब डेढ़ साल की चुप्पी के बाद ईडी ने शराब घोटाला केस में बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा, और उनके आधा दर्जन करीबियों के यहां छापेमारी की। जिन लोगों के यहां छापे डले हैं, उनमें प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि सुशील ओझा, और उनके पूर्व ओएसडी जयंत देवांगन भी हैं।
सुशील ओझा, पूर्व मंत्री के राजनीतिक प्रबंधन देखते रहे हैं। उनके यहां ईडी पहुंची, तो वो घर पर नहीं थे। उनसे जुड़े लोगों का दावा है कि सुशील का शराब कारोबार से सीधा कोई वास्ता नहीं रहा है। मगर कवासी जब भी प्रदेश से बाहर जाते थे, सुशील साथ होते थे।
सुशील को उनका राजदार माना जाता है। ऐसे में कवासी के साथ सुशील के यहां छापेमारी हुई, तो कई लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ। हालांकि सुशील ने छापेमारी पर कटाक्ष किया, और फेसबुक पर लिखा- गरीब ब्राह्मण के घर ईडी आई धन्यवाद मोदीजी।
इससे परे जयंत देवांगन के यहां छापेमारी से कई लोगों को आश्चर्य हुआ। वजह यह है कि जयंत, आबकारी मंत्री के ओएसडी रहते आबकारी की फाइलों से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था। कवासी के यहां आबकारी की फाइल देवांगन उपनाम के एक अफसर कराते थे। ये अलग बात है कि जो अफसर कवासी लखमा से आबकारी की फाइल कराते रहे हैं, वो फिलहाल बचे हुए हैं।
खैर, ईडी की टीम ने जयंत से सामान्य पूछताछ के बाद उनके मोबाइल वगैरह को भी वापस कर दिया। दूसरी तरफ, ईडी की टीम कवासी, और उनके परिवार के सदस्यों के मोबाइल भी डिकोड करने में सफल रही है। अब मोबाइल क्या कुछ राज उगलती है, यह देखना है।
तारीफ हो रही, लेकिन...

राजधानी पुलिस की कल से बहुत तारीफ हो रही है। कारण है शहर के हृदय स्थल शास्त्री चौक को नो आटो जोन करना। जो काम 24 वर्ष में नहीं हो पाया उसे पुलिस ने बीते 24 घंटे में कर दिखाया। शास्त्री चौक पर फर्क दिखाई दे रहा है। सबसे व्यस्ततम चौर पर ट्रैफिक अब स्मूद और सुविधाजनक हो गया है। चौक के रेड सिग्नल पर खड़ा हर नागरिक तारीफ करने से नहीं चूक रहा है।
एक सरदार जी ने तो यहां तक कह दिया कि 26 जनवरी को सम्मानित करना चाहिए पुलिस को। शहर से एक तरह से राह चलते सडक़ की गुंडई खत्म हो गई है, इन आटो वालों की। बेतरतीब पार्किंग और ड्राइविंग से महंगी गाडिय़ों पर स्क्रेच करना, अचानक टर्न लेने से होने वाले हादसे, विरोध करने पर गुंडई, खासकर चाकूबाजी जेबकटिंग और इतने विशाल चौक पर जाम से मुक्ति मिल गई है। हर कोई चौक पर खड़े सिपाहियों को शाबासी देते नहीं थक रहा। सिपाहियों का कहना था कि पब्लिक सपोर्ट के बिना संभव नहीं था। सबसे अधिक समस्या ई रिक्शा वाले पैदा कर रहे थे। जो भी हो ढाई दशक की बड़ी समस्या दूर हो गई। और इसे राजधानी के सीएसपी, एएसपी से रूप में झेल चुके एसएसपी लाल उम्मेद सिंह ने अपने अनुभव का पूरा इस्तेमाल कर दूर करने में सफलता पाई है। और अब सबकी निगाहें स्टेशन चौक की ओर है। इसके बाद यह शहर ईज ऑफ ट्रैफिक को हासिल कर लेगा।
एक सवाल यह भी उठ रहा है कि अब शास्त्री चौक से गुजरने वाले ऑटो-मुसाफिरों को आधा किलोमीटर या उससे अधिक पैदल चलकर दूसरी तरफ ऑटो पकडऩा होगा, खर्च भी बढ़ेगा, और दो-दो बड़े-बड़े अस्पताल, कलेक्ट्रेट, कोर्ट, तहसील, रजिस्ट्री जाने वाले बुजुर्गों का क्या होगा? वे सब पैदल चलने को मजबूर होंगे? इस चार-छह जगहों पर ही रोज लाख-पचास हजार लोग ऑटो पर पहुंचते हैं।
एक जानकर का कहना यह भी है कि पुलिस ने शास्त्री चौक पर ऑटो वालों की भीड़, गुंडागर्दी, और अराजकता पर काबू किया नहीं, और अब जरूरत से कड़ा कदम उठाया है, जिससे गरीब जनता का जीना हराम हो जाएगा। आज सुबह का नजारा है की शास्त्री चौक की गुंडागर्दी मेकाहारा चौक शिफ्ट हो गई है।
धरनास्थल की पुराने शहर वापसी

जन आंदोलन करने वालों की मांग बहुत जल्द पूरी होने जा रही है । वह यह कि धरना स्थल एक बार फिर पुराने शहर में शिफ्ट होने वाला है । शासन प्रशासन ने अपने खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शन को नया रायपुर के तूता से बाहर करने की तैयारी में है। इसके पीछे कई कारण है इनमें मंत्रालय, संचालनालय के बाद विधानसभा भवन शुरू होना। केंद्री से नवा रायपुर होकर मंदिर हसौद रेल लाइन, फिल्म सिटी का निर्माण, बिजनेस पार्क, फार्मास्यूटिकल पार्क।
ये सभी तूता धरना स्थल से दो ढाई किमी दूर ही है। और वहां धरना स्थल बनाए रखने से रेल रोको, विधानसभा घेराव, सीएम-मंत्री घेराव एक बड़ी समस्या खड़े कर सकता है। इससे निपटने का यही एक रास्ता है कि धरना स्थल रायपुर शिफ्ट कर दिया जाए। इसके लिए जल्द ही जिला, पुलिस निगम के अधिकारियों की बैठक कर स्थल चयन करने जा रहे हैं । अब बूढ़ापारा में वेंडिंग जोन बनाए दिए जाने से नई जगह ढूंढनी होगी। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि तूता के बजाए नए शहर में ही किसी दूर सेक्टर में जंगल सफारी के आसपास चिन्हित किया जा सकता है। या मंदिर हसौद, माना में भी। लेकिन राजनीतिक माइलेज से लिए कर्मचारी संगठनों के नेता पुराने शहर को बेहतर विकल्प बता रहे।
पार्षदों को अब अपनी फिक्र हुई..
नगर निगमों का कार्यकाल खत्म होने को है। पांच सालों का लेखा-जोखा करने का समय आ गया है। शहर के विकास में पार्षदों और महापौर का योगदान क्या रहा, इसका आकलन जनता जरूर करेगी। पर फिलहाल, नगर निगमों में जो हलचल है, वह कुछ और कहानी बयां करती है। सभी नगर निगमों में एक आखिरी सामान्य सभा की बैठक बुलाने की जल्दबाजी है। बैठक में ऐसे प्रस्ताव लाने की कोशिश हो रही है, जो यह दिखा सके कि जनप्रतिनिधि जनता के हितों के प्रति संवेदनशील हैं। इधर, कोरबा नगर निगम में तो मामला और भी दिलचस्प हो गया है। यहां सामान्य सभा की प्रस्तावित बैठक में दो अहम प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं—पहला, प्रत्येक पार्षद के लिए 2000 वर्गफीट जमीन का आवंटन और दूसरा, पार्षदों और उनके परिवार के लिए किसी पर्यटन या तीर्थ स्थल का भ्रमण।
इन प्रस्तावों को एमआईसी ने पहले ही हरी झंडी दे दी है। अंतिम मुहर के लिए सामान्य सभा में पेश किया जाएगा। इन प्रस्तावों पर किसी प्रकार की बहस या विरोध की संभावना कम है। पक्ष-विपक्ष, दोनों इसे सहर्ष स्वीकार करने को तैयार दिख रहे हैं।
बात यह भी है कि पार्षदों को अपने और अपने परिवार के बारे में सोचने का विचार काफी देर से आया। अब जब आचार संहिता लागू होने की तैयारी है, तो राज्य सरकार से मंजूरी लेने का समय भी कम बचा है। जमीन के आवंटन के लिए सरकार से स्वीकृति अनिवार्य होगी। भ्रमण का खर्च नगर निगम के फंड से किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भी सरकार की अनुमति जरूरी होगी।
जवाब ढूंढने की कोशिश...

गंदगी फैलाना ज्यादा अच्छी बात होती हैं, या सफाई करना? गंदगी फैलाने वालों को ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए, या सफाई करने वालों को? कूड़ा उठा रही यह श्रमिक शायद अंबेडकर की किताब हाथ में लेकर यह समझना चाहती है कि स्वच्छता के काम में लगे लोगों को इज्जत क्यों नहीं दी जाती। नागपुर के एक पुस्तक मेले की तस्वीर।


