राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : सावधानी में ही समझदारी
06-Dec-2024 3:09 PM
राजपथ-जनपथ : सावधानी में ही समझदारी

सावधानी में ही समझदारी

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी जहां-जहां पदस्थ रहे, उन्होंने  हर जगह अपने दफ्तर के भीतर कैमरा लगवाया था, और बाहर वेटिंग हॉल में स्क्रीन लगवा दिया था ताकि सबको दिखता रहे कि उनसे कौन कितनी देर मिल रहे हैं, ऑफिस के चेंबर में क्या हो रहा है। अब एक आईएएस ने अपने चेंबर में न सिर्फ कैमरा लगवा दिया है, बल्कि महीनेभर की रिकॉर्डिंग रखने वाला स्टोरेज भी लगवाया है। 

ऐसी सावधानी से कई किस्म की अप्रिय चर्चाएं शुरू होने का भी मौका नहीं आता। 

पहल कितनी अनुकरणीय..?

सरकार कहती है कि किसी विभाग या किसी जिला कलेक्टर के अच्छे काम दूसरे विभाग और अन्य जिलों के कलेक्टरों को अपने यहां अनुकरण-लागू करना चाहिए। प्रदेश के एक जिला कलेक्टर की ऐसी पहल दूसरे जिले के कलेक्टरों के लिए समस्या बनती जा रही है । हर जिले से इसे लागू करने की मांग होने लगी है। और अब यह मांग नवा रायपुर के महानदी और इंद्रावती भवन तक आ पहुंची है। दबाव बढऩे पर लागू करना पड़ सकता है। 


दरअसल, कलेक्टर साहब ने अपने सभी मातहत जिलाधिकारियों के लिए व्यवस्था बना दी है कि वे हर मंगलवार को शाम 4 बजे जनदर्शन करेंगे। इसमें केवल अधिकारी कर्मचारियों की शासकीय व्यक्तिगत समस्याओं की सुनवाई करेंगे। इसमें रिटायर्ड लोगों की समस्याएं सुनी जाएंगी। 

कलेक्टर साहब की इस व्यवस्था की पहली सुनवाई 3 से शुरू हुई। लेकिन पहला दिन था कम लोग आए होंगे। 10 तारीख को इसका रिस्पांस देखना होगा। हो सकता है उसके बाद निकाय चुनाव घोषित होने पर यह सुनवाई चुनाव बाद तक स्थगित हो जाए। जैसे ठाकरे परिसर में मंत्रियों की सहयोग केंद्र में बैठक स्थगित कर दी गई है।

लेकिन इन कलेक्टर साहब की इस व्यवस्था की मांग अब दूसरे जि़लों में होने लगी है। कर्मचारी अधिकारी अपने अपने जिला नेताओं से इस पर कलेक्टरों से मांग करने कह रहे हैं। और तो और मंत्रालय, संचालनालय को कर्मचारी भी अपने यहां मांग करने लगे हैं। फेडरेशन ने तो हर सप्ताह न सही माह में दो बार आयोजित करने की मांग की है।

दोनों ही भवनों में एक-एक आईएएस नोडल अधिकारी पहले से ही नियुक्त हैं ही वे सुनवाई कर सकते हैं। सरकार पहले ही व्यवस्था कर चुकी है कि जिला स्तर की समस्याएं सीएम जनदर्शन तक नहीं पहुंचनी चाहिए। अन्यथा यह माना जाएगा कि  कलेक्टर, जिलाधिकारी सुनवाई नहीं कर रहे। अब देखना होगा कि कितने जिले लागू करते हैं।

दोनों चुनाव साथ-साथ? 

खबर है कि सरकार नगरीय निकाय, और पंचायत चुनाव साथ-साथ कराने जा रही है। नगरीय निकाय चुनाव तो दलीय आधार पर होंगे, लेकिन पंचायत के चुनाव दलीय आधार पर नहीं होंगे। पंचायत चुनाव लंबा चलेगा, और फरवरी के आखिरी तक चरणबद्ध तरीके से चुनाव होंगे। 

पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने विधानसभा में दोनों चुनाव साथ कराने की मांग की थी। इस पर अशासकीय संकल्प भी पारित हुआ था। नगरीय निकाय चुनाव में वोटिंग ईवीएम से होगी। लेकिन पंचायत के चुनाव परम्परागत बैलेट पेपर से  ही कराए जाएंगे। विधानसभा सत्र निपटने के बाद सीएम विष्णुदेव साय प्रदेशभर के दौरे पर निकल रहे हैं। इसकी रूपरेखा तैयार हो रही है। रमन सरकार में दो बार ऐसा हुआ है जब नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। प्रदेश में सरकार के रहते ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए संगठन और सरकार व्यूह रचना बना रही है। देखना है आगे क्या होता है। 

अरबों का जमीन घोटाला, जांच कैसे हो? 

सरगुजा जिले में बीते एक साल के भीतर जमीन घोटाले के इतने मामले सामने आ गए हैं की जांच के नाम पर जिला प्रशासन को अपनी टीम छोटी लगने लगी है। न केवल दूरदराज के हिस्सों में बल्कि बीच शहर में भी दर्जनों एकड़ जमीन का फर्जी पट्टा तैयार कर नामांतरण करा लिया गया है। प्रशासन को जो जानकारी है उसके मुताबिक यह सारा फर्जीवाड़ा कुछ रसूखदार राजनीतिक व्यक्तियों और कारोबारी के संरक्षण में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुआ है। इन लोगों ने आदिवासी जमीन, लीज की जमीन, चारागाह, पुनर्वास और भूमि खाली पड़ी सरकारी जमीन किसी को भी नहीं छोड़ा। बीते 11 महीने के भीतर जमीन के फर्जीवाड़े के 1178 मामले दर्ज किए गए हैं। बीच शहर से 4 एकड़ से अधिक जमीन का कब्जा छुड़ाया गया है जिसकी अनुमानित कीमत एक अरब रुपए से अधिक है। मैनपाट में भी करीब 500 एकड़ जमीन पर 173 टुकड़ों में कब्जा कर लिया गया है। इनकम टैक्स और इडी की रेड के दौरान भी जमीनों की खरीदी बिक्री के कई दस्तावेज बरामद किए गए थे। केंद्रीय एजेंसियों ने इन सब की जांच का भी जिम्मा कलेक्टर को सौंप दिया गया है। जमीनों पर अवैध कब्जे का यह आलम हो गया है कि स्कूल, आंगनबाड़ी और दूसरी सरकारी योजनाओं के लिए खाली जमीन ढूंढने पर नहीं मिल रहे हैं।

हालत यह हो गई है कि कलेक्टर के पास इतनी बड़ी टीम नहीं है कि इन सारे घोटालों की जांच जिले में मौजूद राजस्व अमले से करवा सकें और जमीन वापस सरकार के नाम चढ़ा सकें। उन्होंने राज्य सरकार को चि_ी लिखकर वृहद स्तर पर जांच के लिए एक बड़ी टीम बनाकर भेजने की मांग की है। 

हो सकता है कि सरगुजा में हुआ घोटाला प्रदेश में सबसे बड़ा हो लेकिन बाकी जिले भी इससे अछूते नहीं है। बाकी जिलों में कलेक्टरों की दिलचस्पी कम ही दिखाई दे रही है।

जब इशारों में बात न बने..

कोरबा की सडक़ पर पुलिस की ओर से लगाया गया साइन बोर्ड सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें सीधे लिखा गया है कि सावधान रहें, खतरनाक मोड़ है, मृत्यु संभावित स्थल है। बहुत से लोगों को यह संदेश नकारात्मक लग सकता है। केवल दुर्घटनाजन्य क्षेत्र लिखा जा सकता है। पर, पुलिस को लगा होगा कि साधारण शब्दों में लिखा बोर्ड दुर्घटनाओं को कम करने में मदद कर नहीं रहा है तो बात सीधे-सीधे समझा दिया जाए।

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