राजपथ - जनपथ
भूपेश किस तरफ़ जा रहे हैं?
शहर के बाहरी इलाके के एक विवाह भवन में राजीव युवा मितान क्लब के पूर्व सदस्य एकजुट हुए, तो राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। भूपेश सरकार ने सभी जिलों में राजीव मितान क्लब का गठन किया था। क्लब से जुड़े लोगों को एक हजार रुपए महीना मानदेय मिलता था। सरकार बदलते ही मितान क्लब भंग कर दिया गया। और अब जब क्लब से जुड़े युवाओं को एक मंच पर लाने की कोशिश हुई, तो इसकी काफी प्रतिक्रिया भी हुई।
सुनते हैं कि राजीव मितान क्लब से जुड़़े युवाओं को एक मंच पर लाकर फिर से क्लब की गतिविधियां शुरू करने की योजना बनाई गई है। यह काम पूर्व सीएम के करीबी गिरीश देवांगन, और प्रदीप शर्मा सम्हाल रहे हैं। देवांगन, भूपेश सरकार में क्लब के गठन से सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं। कोरबा, राजनांदगांव और अन्य जगहों से युवाओं को आमंत्रित किया गया था। इन्हें विवाह भवन में ठहराया गया। यह विवाह भवन कांग्रेस के ही एक बड़़े नेता के पुत्र का है। इसमें सिर्फ भूपेश बघेल के करीबी नेता ही थे।
युवा संवाद के नाम से दो दिन चली युवाओं की बैठक को पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने संबोधित किया। बघेल ने उन्हें अगले 4 साल तक संघर्ष के लिए तैयार रहने का आव्हान किया। हालांकि इस कार्यक्रम में कोई राजनीतिक बातें नहीं हुई लेकिन क्लब के पुनर्गठन को लेकर हलचल मच गई। और जब सीएम के मीडिया सलाहकार पंकज झा और राजनांदगांव के सांसद संतोष पांडे ने क्लब के बहाने नया राजनीतिक दल गठन करने की आशंका जताई, तो भूपेश बुरी तरह बिफर पड़े। पंकज झा को काफी भला-बुरा कहा।
भूपेश की सफाई देने के बाद भी विवाद थमता नहीं दिख रहा है। कई लोगों ने प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट तक को बैठक की जानकारी भेजी है। दूसरी तरफ, कुछ लोगों ने याद दिलाया कि राज्य बनने के पहले दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने छत्तीसगढ़ संघर्ष परिषद का गठन किया था तब भी भारी विवाद हुआ था। उस समय भी इसकी शिकायत हाईकमान को भेजी गई थी। कांग्रेस के भीतर एक समानान्तर संगठन खड़ा करने के मसले पर शुक्ल को कई बार सफाई देनी पड़ी। बाद में शुक्ल कांग्रेस में अप्रासंगिक होते चले गए, और पार्टी भी छोडऩी पड़ी। भूपेश ने नया राजनीतिक दल बनाने की संभावना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि कांग्रेस ने उन्हें सब कुछ दिया है। जो लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं वो भूपेश बघेल को जानते नहीं हैं। चाहे कुछ भी हो, राजीव युवा मितान क्लब आगे किस तरह काम करेगा, इस पर पार्टी के लोगों की नजरें रहेगी।
मीटिंग से पहले मंदिर
प्रदेश के एक जिले में अफसर साप्ताहिक समीक्षा बैठक से डरे सहमे रहते हैं। बैठक हर मंगलवार को होती है। इसमें महिला कलेक्टर जिले में चल रही योजनाओं-कार्यक्रमों की बारीक समीक्षा करती हैं।
पहले तो कई अफसर साप्ताहिक समीक्षा बैठक में ज्यादा कुछ तैयारी कर नहीं आते थे लेकिन कलेक्टर ने लापरवाही पर बुरी तरह हडक़ाया, तो अफसर सचेत हो गए। कलेक्टर मैडम कई विभागों में काम कर चुकी हैं लिहाजा वो योजनाओं की बारीकियों से अवगत रहती हैं। और जब अफसर बात बनाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें सबके सामने फटकार सहनी पड़ती है।
अब हाल कई अफसर मंगलवार बैठक से पहले हनुमान मंदिर में दर्शन कर पहुंचने लगे हैं। कलेक्टर की सख्ती का नतीजा यह है कि जिले में लोगों की प्रशासनिक कार्यों में अड़चनें कम हो गई है।
अदालती आदेशों की अनदेखी
राज्य में सरकारी भर्तियों को लेकर बार-बार अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है। चाहे वह सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा हो या प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति, हर मामले में सरकार आदेशों की अनदेखी करती आ रही है।
हाल ही में प्राथमिक शाला सहायक शिक्षकों की भर्ती में डीएलएड अभ्यर्थियों की याचिका पर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि बीएड अभ्यर्थियों को बाहर कर डीएलएड पात्रता वाले अभ्यर्थियों को मौका दिया जाए। हाई कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर इस प्रक्रिया को पूरा करने और सूची पेश करने का आदेश दिया है। सरकार के पास अब केवल तीन दिन शेष हैं।
इसी तरह, आरक्षकों के 2259 पदों पर भर्ती प्रक्रिया भी आधी-अधूरी है। 2018 में शुरू हुई इस प्रक्रिया में 464 अभ्यर्थी चयनित होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित हैं। इन अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी और फैसला भी अपने पक्ष में पाया। बावजूद इसके, सरकार ने आदेश का पालन नहीं किया, जिससे इन अभ्यर्थियों को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
न्याय पाने के लिए बेरोजगार युवाओं को बार-बार अदालतों का रुख करना पड़ रहा है। ऊंची अदालतों में मुकदमा लडऩे का खर्च उठाना बेरोजगारों के लिए आसान नहीं है। सवाल उठता है कि सरकार ऐसी नौबत क्यों लाती है कि युवाओं को अदालती चप्पल घिसनी पड़े। उसके बाद, आखिर क्यों सरकार समय पर अदालत के आदेशों का पालन नहीं करती? क्यों इन युवाओं को अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है?
तस्वीर नहीं दस्तावेज

यह तस्वीर भोपाल गैस त्रासदी (2-3 दिसंबर, 1984) की भयावहता का प्रतीक है। यह एक मासूम बच्चे का शव है, जिसे मिट्टी में दफन किया गया था। यह दृश्य उस औद्योगिक त्रासदी का प्रतीक बन गया, जिसने करीब 16 हजार लोगों की जान ली और हजारों को स्थायी शारीरिक व मानसिक विकलांगता दी। इस दिल दहला देने वाली तस्वीर को खींचा था पाब्लो बार्थोलोमेव ने। नाम से लगता है कि वे कोई बाहरी हैं, मगर वे पूरी तरह भारतीय हैं। दिल्ली में उनका जन्म हुआ। फोटोग्रॉफी के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी।
इस तस्वीर को भोपाल गैस त्रासदी के सबसे प्रतीकात्मक दस्तावेज़ों में से एक के रूप में देखा जाता है। यह तस्वीर त्रासदी की अमानवीयता और उसके बाद के प्रभाव को दुनिया के सामने लाने का एक शक्तिशाली माध्यम बनी। पाब्लो बार्थोलोमेव की यह तस्वीर 1984 में वर्ल्ड प्रेस फोटो पुरस्कार भी जीत चुकी है। यह तस्वीर मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद भी दिलाती है। इंटरनेट में भोपाल गैस त्रासदी पर रघु राय की भी इसी तरह की मार्मिक तस्वीरें आपको सर्च करने पर मिल जाएगी।


