राजपथ - जनपथ
साइकिल की अंतिम यात्रा
कभी करोड़ों रुपये खर्च कर जिन साइकिलों को नवा रायपुर स्मार्ट सिटी का सपना बताया गया था, आज वही एक ट्रक में लदी हुई ऐसे जा रही थी जैसे किसी योजना की अंतिम यात्रा निकल रही हो। शुरुआत बड़े शोर-शराबे, उद्घाटन और दावों के साथ हुई थी, लेकिन अंजाम खामोश है।
शहर को सच में बेहतर बनाने की जरूरत थी। सडक़, पानी, स्वास्थ्य, रोजग़ार जैसी बुनियादी चीज़ों की। मगर ध्यान दिखावे पर ज्यादा रहा। नतीजा यह कि योजनाएं कागजों और फोटो तक ही सीमित रह गई। यह तस्वीर स्मार्ट सिटी को लेकर अधूरी सोच और गलत प्राथमिकताओं की भी कहानी है। तस्वीर उचित शर्मा ने फेसबुक पर पोस्ट की है।
रेल कर्मियों को पेंशन बंद होने का झांसा
कल ही हमने इसी कालम में बताया था कि केंद्र ने अपने पेंशनर्स को एपीके फ़ाइल के जरिए साइबर ठगों से अलर्ट किया है। ठग, न?ए वेतन आयोग में नफे नुकसान का कैलकुलेशन पर एपीके फ़ाइल भेजकर बुजुर्गों की राशि उड़ा रहे हैं। और आज रेलवे बोर्ड और
मंत्रालय ने भी देश भर के लिए एक आधिकारिक एडवाइजरी जारी की है। रेल कर्मियों ने यहां बताया कि पेंशनभोगियों को साइबर धोखाधड़ी से सतर्क रहने को कहा गया है। ये जालसाज स्वयं को रेलवे डिवीजनल पर्सनल मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर बनकर पेंशनभोगियों को काल कर, एसएमएस या वॉट्सएप मैसेज कर रहे हैं। इसमें पेंशन पेमेंट ऑर्डर अपडेट करने के ,पेंशन खाते का केवाईसी दोबारा कराने, कोई अतिरिक्त पेंशन लाभ या बकाये का भुगतान देने का झांसा दे रहे। और जानकारी देने या मैसेज क्लिक करते ही राशि उड़ा ले रहे।
रेल मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि रेलवे कभी भी क्कक्कह्र या सर्विस रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए किसी भी तरह का लिंक नहीं भेजता है। रेलवे का कोई भी अधिकारी फोन कॉल, एसएमएस, वॉट्सएप या सोशल मीडिया के जरिए आपसे आपका बैंक अकाउंट नंबर, पासवर्ड, ओटीपी या कोई भी गोपनीय वित्तीय जानकारी नहीं मांगता है।किसी भी ऐसे लिंक पर क्लिक न करें जो आपको पेंशन अपडेट के नाम पर भेजा गया हो।
इसलिए किसी भी अनजान नंबर से आए कॉल पर अपनी बैंक डिटेल्स या पर्सनल जानकारी बिल्कुल शेयर न करें। कोई संदिग्ध कॉल या मैसेज आता है, तो तुरंत अपने स्थानीय पुलिस साइबर सेल 1930) पर कॉल करें और अपने संबंधित रेलवे प्रशासनिक कार्यालय को सूचित करें.
पेंशन या पे-कमीशन से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल रेलवे की आधिकारिक वेबसाइट पर ही जाएं।
कमजोर नस पकड़ में आई
छत्तीसगढ़ की सियासत में अगर सवालों की धार की बात हो, तो अजय चंद्राकर का नाम सबसे पहले आता है। विधानसभा में उनके तीखे और तथ्यपरक सवाल अक्सर मंत्रियों को असहज कर देते हैं। जवाब देते कई मंत्री मुश्किलों में घिर जाते हैं।
मगर इस बार मंजर थोड़ा अलग दिखा। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने उसी तेवर में पलटवार किया, जिसके लिए अजय पहचाने जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक सवाल पर जवाब देते हुए जायसवाल ने मुस्कराते हुए याद दिलाया कि आप भी कभी इसी विभाग के मंत्री रह चुके हैं।
बस, फिर क्या था। सदन में हल्की खनक के साथ ठहाके भी सुनाई दिए। अजय ने जवाबी तेवर तो दिखाए, लेकिन एक पल के लिए असहजता साफ झलक गई। दर असल यह पूरा मामला पूर्व के वर्षों में मेकाहारा के लिए खरीदे गए पैट मशीन और गामा विकिरण मशीन के उपयोग से जुड़ा हुआ है। ये मशीनें अब तक शुरू नहीं हुई हैं। कांग्रेस सरकार ने भी इनकी पैकिंग नहीं खोला था। और अब दो साल में भी यह बंद है। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि बिना वित्तीय स्वीकृति के 20 करोड़ से अधिक की खरीदी हुई और इसकी जांच चल रही है। इस पर अजय खामोश हो गए, और विपक्षी सदस्य ने यह पूछ किया कि किसके कार्यकाल में खरीदी हुई थी। इसके उत्तर से पहले प्रश्न काल समाप्त हो गया। लेकिन उसके बाद चर्चा यह हो रही है कि जायसवाल ने पूर्व मंत्री की कमजोर नस पकड़ लिया है। यही वजह है कि वो अजय पर भारी पड़ते दिखाई देते हैं।
सलाखों के पीछे भी तो इंसान ही हैं...
छत्तीसगढ़ विधानसभा में उठे हिरासत में मौतों के मुद्दे ने जेल व्यवस्था की हकीकत को सामने ला दिया है। बताया गया कि जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच 13 महीनों में 66 कैदियों की मौत हुई। इससे स्वाभाविक सवाल उठते हैं कि क्या जेलें सुरक्षित हैं? क्या बीमार कैदियों को समय पर इलाज मिल रहा है? और क्या हर मौत की निष्पक्ष जांच हो रही है?
गृह मंत्री ने यह भी बताया कि 66 में से 18 मामलों की मजिस्ट्रेट जांच पूरी हो चुकी है, जबकि 48 अब भी लंबित हैं। इतने अधिक मामलों की जांच लंबित रहना भी सवाल खड़े करता है। बड़े पैमाने पर लंबित प्रकरण पारदर्शिता पर भी संदेह पैदा करता है।
कल हुई बहस के केंद्र में आदिवासी नेता जीवन ठाकुर की मौत रही। उन्हें 12 अक्टूबर 2025 को कथित फर्जी प्रमाणपत्र रैकेट में गिरफ्तार किया गया था। वे मधुमेह से पीडि़त थे। कांकेर जेल में तबीयत बिगडऩे पर अदालत के आदेश से रायपुर भेजा गया। सरकार का कहना है कि वे चिकित्सकीय सलाह का पालन नहीं कर रहे थे, इसलिए अदालत को सूचित कर इलाज कराया गया। लेकिन विपक्ष, खासकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ने इसे राज्य प्रायोजित हत्या बताया और विधानसभा की समिति से जांच की मांग की। विरोध में विपक्ष ने वॉकआउट भी किया। पक्ष विपक्ष में टकराव अपनी जगह है पर असल मुद्दा तो जेलों में होने वाली मौतों की समस्या है, जो नई नहीं है। 2021-22 में भी राज्य में 93 हिरासत मौतें दर्ज हुई थीं। यानी यह एक लगातार चलता पैटर्न है।
दरअसल जेलों की हालत ही चिंताजनक है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जेल प्रशासन की ओर से जब जवाब दाखिल होता है तो कई तथ्य निकलते हैं। राज्य की 33 जेलों की क्षमता करीब 14,883 कैदियों की है, लेकिन 2025 में यहां 20,500 से ज्यादा बंदी हैं। 150 प्रतिशत से अधिक भीड़ का स्वास्थ्य, स्वच्छता और मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। प्रत्यक्ष रूप से कोई कैदी प्रताडि़त नहीं भी किया जाए, तो माहौल ही उनके लिए जानलेवा साबित होता है।
संविधान हर व्यक्ति को जीवन और गरिमा का अधिकार देता है, चाहे वह कैदी ही क्यों न हो। जेलों में डॉक्टरों और नर्सों की संख्या पर्याप्त नहीं है। ओवरक्राउड घटाने के लिए जमानत और वैकल्पिक सजा के उपायों पर काम नहीं हो रहा है। सिर्फ एक खुली जेल बेमेतरा में खोलने की घोषणा की गई है।


