राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : तीन अनुपूरक अब नहीं
17-Feb-2026 6:10 PM
राजपथ-जनपथ : तीन अनुपूरक अब नहीं

तीन अनुपूरक अब नहीं

चर्चा है कि इस बार भी सरकार अनुपूरक बजट पेश नहीं करेगी। बताया तो यह गया है कि आजादी के बाद अविभाज्य मप्र काल से चली आ रही तीन अनुपूरक बजट की परंपरा को वित्त विभाग ने खत्म कर दिया है। प्रथम अनुपूरक मानसून सत्र में, द्वितीय शीत सत्र में और तृतीय अनुपूरक बजट सत्र में सालाना बजट से पहले पेश होते रहे हैं।

तीन अनुपूरक यह व्यवस्था वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने पिछले वित्तीय वर्ष से ही शुरू की। पिछले साल सरकार ने एक ही अनुपूरक बजट पेश किया था। जो 7329 करोड़ से अधिक का था। ऐसा करने के लिए सरकार ने अपने पहले वर्ष में एक संशोधन विधेयक पारित भी किया था। इसमें आकस्मिकता निधि को 100 से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया है। ताकि बड़ी जरूरत के खर्च, योजनाएं इस निधि का उपयोग कर शुरू की जा सके। और उसके बाद अनुपूरक बजट में लेकर कार्योत्तर स्वीकृति की औपचारिकता करा ली जाए। इसी वजह से बीते शीत सत्र में भी द्वितीय अनुपूरक पेश नहीं किया था। और अब साल के अंतिम महीनों के लिए तीसरा अनुपूरक भी नहीं लेगी।

 इसके पीछे एक पॉलिटिकल माइलेज लेने की भी मंशा बताई गई है। वह यह कि पूर्व के वर्षों की तरह 2000-3000 हजार करोड़ के तीन अलग-अलग अनुपूरक बजट लेने के बजाय एक साथ हजारों करोड़ का बड़ा बजट नजर आए। इससे विपक्ष की वह  मांग भी पूरी होती है जिसमें विपक्षी विधायक चर्चा में कहते रहे हैं कि छोटे छोटे अनुपूरक मांगों के बजट के बजाय कुछ और राशि लेकर फलां फलां योजना भी स्वीकृत कर लेती सरकार। ऐसा कर सरकार भी कह सकती है कि राज्य विकास के लिए पैसे की कमी नहीं की जाएगी और हमने हजारों करोड़ का अनुपूरक बजट दिया है। इसी अनुरूप ही सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए भी आठ माह पहले मानसून सत्र में 35 हजार करोड़ का अनुपूरक लिया था। इस बार भी तृतीय अनुपूरक बजट न लेकर सीधे सालाना बजट पेश किया जाएगा। शायद इसीलिए बजट को आंकड़ों की बाजीगिरी कहा जाता है।

पुलिस की नसीहत, अपनों को समझाओ

रायपुर पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद विशेषकर नशे के कारोबार, और जुआ-सट्टा पर तेज कार्रवाई हो रही है। देर रात तक चलने वाले होटलों-रेस्टोरेंट, और पब की नियमित जांच हो रही है।  इससे लोगों में सकारात्मक संदेश जा रहा है। इससे विशेषकर पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला को बधाई-शुभकामनाएं देने सामाजिक, और व्यापारिक संगठनों का तांता लगा है।

डॉ. संजीव शुक्ला रायपुर के हैं, और यहां एसपी रह चुके हैं। लिहाजा, हर संगठन के लोग उनसे व्यक्तिगत तौर पर परिचित भी हैं। वो लोगों से सुझाव लेने में भी परहेज नहीं करते हैं। पिछले दिनों एक सामाजिक संगठन के लोग पहुंचे, तो कानून व्यवस्था को लेकर बात हुई। पुलिस कमिश्नर ने उन्हें बता दिया कि उनके ही समाज के लोग जुआ-सट्टा से सबसे ज्यादा जुड़े हैं, और उन पर रोजाना प्रकरण दर्ज हो रहे हैं। उन्होंने समाज के लोगों को समझाइश दी कि वो युवा पीढ़ी को इससे दूर रहने के लिए प्रेरित करें। समाज के लोगों ने कमिश्नर की बात को गंभीरता से लिया, और उन्हें भरोसा दिया कि इस दिशा में समाज की तरफ से भी पहल की जाएगी।

दरअसल, पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि ऑनलाइन सट्टेबाजी में पकड़े गए एक-दो लोगों ने बकायदा दुबई में जाकर ट्रेनिंग भी ली थी। अब तक 10 करोड़ रूपए से अधिक ऑनलाइन सट्टेबाजी के प्रकरण दर्ज हुए हैं।

भ्रष्ट गठजोड़ का भयावह दौर

छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में अवैध कारोबार के साथ का गठजोड़ अब खतरनाक रूप ले चुका है। बस्तर में अपेक्षाकृत शांति के बाद खनन माफियाओं और उन्हें संरक्षण देने वाले तत्वों की सक्रियता बलरामपुर-रामानुगंज, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में बढ़ती दिख रही है।

मई 2025 में बलरामपुर जिले के सनावल थाना क्षेत्र में अवैध रेत खनन रोकने गई पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम पर हमला हुआ था। इस हमले में सिपाही शिवभजन सिंह की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या कर दी गई थी। आरोप लगे थे कि अवैध खनन करने वालों को परोक्ष संरक्षण प्राप्त था।

अब उसी जिले के कुसमी क्षेत्र में आदिवासी किसान रामनरेश राम की हत्या हो गई। पर दोनों मामलों में बड़ा फर्क है। सनावल की घटना में अवैध रेत निकालने वालों को प्रशासन का परोक्ष मदद मिल रहा था, इस बार अनुविभाग के सबसे बड़े अफसर एसडीएम ने उनका खुद नेतृत्व किया। लाठी रॉड से ग्रामीणों को इतना पीटा गया कि एक किसान की मौत हो गई। पुलिस वाले किसी के कहने पर दूसरे किसी बेकसूर को थाने में लगाकर जरूर पीट सकते हैं, पर एसडीएम जैसे अफसर की ऐसी निष्ठा नहीं देखी गई जिसमें उन पर हत्या का आरोप लग जाए। एसडीएम के साथ कथित तौर पर वे लोग थे, जिनकी अवैध बॉक्साइट से लदे ट्रक को हंसपुर के ग्रामीणों ने रोक लिया था।

बलरामपुर-रामानुगंज जिला मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड की सीमाओं से सटा है। कुछ जिलों से तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र जैसे राज्य भी जुड़े हैं। ऐसे क्षेत्रों में अक्सर रेत, बॉक्साइट, सोना, धान, शराब और मादक पदार्थों की तस्करी की खबरें सामने आती रही हैं। दिसंबर 2024 में मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में मावी नदी में अवैध खनन का विरोध करने पर ग्रामीणों के साथ मारपीट की घटना भी सामने आई थी।

सीमावर्ती जिलों में कमजोर निगरानी और राजनीतिक दबाव अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। कुछ अफसर ऐसे इलाकों को स्वर्ग मानते हैं क्योंकि ये राजधानी से काफी दूर हैं। ईमानदार अफसरों को माफिया बर्दाश्त नहीं करते। उनकी राजनीतिक पहुंच होती है- वे काम में खनन डालने वाले अफसरों को टिकने नहीं देते। किसने सोचा था कि 25 बरस में ही छत्तीसगढ़ उस दौर में पहुंच जाएगा जब अफसर अवैध कारोबारियों के शिकंजे में इस तरह जकड़ जाएंगे कि वे हत्या तक की वारदात को फ्रंट पर आकर अंजाम देने लगेंगे।

घरों के बाहर लकड़ी के ढेर

जशपुर के किसी गांव से ली गई यह तस्वीर एक पोस्ट से है, जिसमें बताया गया है कि जिस गांव में जाएं घरों के सामने लकडिय़ों के ऐसे ढेर दिख जाते हैं। लोग जंगल की ओर सुबह दैनिककर्म स्नान आदि के लिए जाते हैं और लौटते में यह सोचकर कि खाली हाथ क्यों जाएं, लकड़ी उठा लाते हैं। छोटी झाडिय़ों को काट कर भी ले आते हैं। यह एक वर्षों से चली आ रही परंपरा है कि जंगल की तरफ जाओ और लौटो तो बाड़ी घेरने या खाना पकाने के लिए लकड़ी ले आओ। अब गैस सिलेंडर की सेवा गांवों में पहुंच चुकी है, इसलिये ऐसी लकडिय़ों की खपत कम हो गई है, पर लकड़ी लेकर जंगल से लौटने की आदत नहीं बदली है। इसलिये लकड़ी के ढेर बन जाते हैं।


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