राजपथ - जनपथ
मंजिल से ज्यादा कीमती जिंदगी है...
धमतरी के पास 14 फरवरी को छुट्टी पर घर लौट रहे सीआरपीएफ के तीन जवानों समेत चार लोगों की सडक़ हादसे में जान चली गई। इससे कुछ दिन पहले 11 फरवरी को मध्यप्रदेश के सागर जिले में चार आरक्षकों की इसी तरह मौत हो गई थी। वहां की घटना के बाद डीजीपी ने निर्देश जारी किया कि जवान रात 12 बजे से सुबह 5 बजे के बीच लंबी दूरी की यात्रा से बचें। यह आदेश भले ही एक राज्य और एक विभाग तक सीमित हो, लेकिन सवाल बड़ा है, क्या इस तरह से समय तय करना व्यावहारिक है? हजारों ट्रक, बसें और टैक्सियां रातभर चलती हैं। समय की पाबंदी, डिलीवरी का दबाव और सुबह की ट्रेन, फ्लाइट जैसी मजबूरियां होती हैं।
अनुभवी चालक जानते हैं कि रात की ड्राइविंग अलग अनुशासन मांगती है। वे 2-3 घंटे बाद 20-30 मिनट का ब्रेक लेते हैं, दिन में 6-7 घंटे की नींद सुनिश्चित करते हैं, नशे और भारी फास्ट फूड से बचते हैं। ढाबों, पेट्रोल पंपों के पास आराम करने वाले कई ड्राइवर तो चूल्हा लेकर चलते हैं- अपना खाना खुद बनाते हैं ताकि सुस्ती न आए। समस्या अक्सर निजी वाहन चालकों के साथ होती है, जो कम अनुभव और बिना आराम के लंबा सफर तय कर लेते हैं।
2022 के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में सडक़ हादसों में मौत की दर राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी रही। जाहिर है, इनमें से कई दुर्घटनाएं झपकी आने की वजह से हुई होंगी। मोटर व्हीकल एक्ट 1988 में शराब पीकर गाड़ी चलाने पर सख्त सजा (धारा 185) है, लेकिन थकान को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान सीमित हैं। हालांकि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड के तहत वाहनों में ड्राइवर ड्राउजिनेस वार्निंग सिस्टम लागू करने की दिशा में काम चल रहा है, जो झपकी आने पर अलर्ट देता है। दुनिया के कई देश ऐसी दुर्घटनाओं से चिंतित हैं। यूरोपीय संघ में ड्राइवर अधिकतम 9 घंटे ड्राइव कर सकते हैं और हर 4-5 घंटे बाद 45 मिनट का ब्रेक जरूरी है। अमेरिका में 11 घंटे ड्राइविंग के बाद 10 घंटे आराम अनिवार्य है। ऑस्ट्रेलिया में थकान प्रबंधन के लिए अलग-अलग स्तर पर व्यवस्था है। इन देशों में थकान को दुर्घटना का बड़ा कारण माना गया है। भारत में भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 3 घंटे बाद 15-30 मिनट का ब्रेक लें।
तो हमें क्या करना चाहिए? हर लंबी यात्रा में 2-3 घंटे बाद रुकें। पर्याप्त नींद लें। वाहन की लाइट, ब्रेक और टायर की जांच करें, सीट बेल्ट पहनें, खान-पान को लेकर सतर्क रहें। हाई-बीम का सीमित उपयोग करें। और सबसे जरूरी अगर आंखें भारी लगें, तो गाड़ी रोक दें-ताकि देर से सही गंतव्य तक पहुंच सकें।
आबकारी नीति को लेकर हलचल
सरकार की नई आबकारी नीति एक अप्रैल से प्रभावशील हो रही है। अब कांच के बजाय प्लास्टिक की बोतलों में शराब मिलेगी। पिछले साल 67 नई शराब दुकानें खोलने का फैसला लिया गया था, लेकिन अलग-अलग इलाकों में भारी विरोध के चलते 35 शराब दुकानें नहीं खुल पाईं। अब इन दुकानों के लिए स्थल परिवर्तित कर उन्हें खोलने की योजना है।
पिछली सरकार में बड़ा आबकारी घोटाला हुआ था। इसकी गूंज देशभर में हुई। पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा सहित दर्जनभर से अधिक अधिकारी और कारोबारी जेल में रहे। कुछ अब भी जेल में हैं। घोटाले की जांच केंद्र और राज्य की एजेंसियां कर रही हैं।
सरकार ने पिछली गड़बडिय़ों से सबक लेते हुए आबकारी कारोबार में पारदर्शिता लाने की कोशिश की है, और इस वजह से आबकारी राजस्व भी तकरीबन दोगुना हो रहा है। बावजूद इसके, आबकारी नीति को लेकर सत्तारूढ़ दल में कुछ असहमति के सुर सुनाई दे रहे हैं।
बताते हैं कि चित्रकूट के भाजपा विधायक विनायक गोयल नई शराब दुकानें खोलने के खिलाफ हैं और उन्होंने इस मसले पर पार्टी और सरकार के भीतर अपना पक्ष रखा है। कुछ और विधायक भी नई आबकारी नीति के विरोध में बताए जाते हैं। विपक्ष तो खुला विरोध कर रहा है। विधानसभा के बजट सत्र में यह मुद्दा प्रमुखता से उठ सकता है।
सीनियर भाजपा विधायकों के तेवर
विधानसभा का बजट सत्र 23 तारीख से शुरू हो रहा है। 27 फरवरी को बजट पेश होगा। सत्र में इस बार 1200 से अधिक सवाल लगे हैं। पिछले सत्रों में सत्तापक्ष के विधायक अजय चंद्राकर, धरमलाल कौशिक, राजेश मूणत और सुशांत शुक्ला ने सरकार के मंत्रियों को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बजट सत्र में भी सत्तारूढ़ दल के विधायकों के तेवर देखने को मिल सकते हैं।
हालांकि, इस बार पार्टी ने सरकार की छवि पर कोई आंच न आए, इसे लेकर रणनीति बनाई है। सत्र के एक दिन पहले यानी 22 तारीख को भाजपा विधायक दल की बैठक हो सकती है। बैठक में क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल और महामंत्री (संगठन) पवन साय प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे। बैठक में सदन के भीतर पार्टी के विधायकों को तेवर नरम रखने के सुझाव दिए जा सकते हैं।
दूसरी तरफ, विपक्ष ने भी बजट सत्र के लिए जोरदार तैयारी की है। राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान भी टोका-टाकी हो सकती है। कुल मिलाकर, बजट सत्र के हंगामेदार रहने के आसार हैं।
समिति और चांदी
छत्तीसगढ़ में बजट सत्र शुरू होने वाला है। इस दौरान सरकारी विभाग विधायकों को सप्रेम भेंट की अघोषित परंपरा का निर्वाह करते हैं कुछ विभाग अपने विभागीय उत्पाद के गिफ्ट पैक देते हैं तो कुछ मार्केट परचेसिंग से बड़े गिफ्ट देते हैं। यह परंपरा केंद्रीय विभागों में भी चलायमान है। हाल में एक समिति का दल छत्तीसगढ़ के प्रवास पर आया था। दल को राज्य में कार्यरत 35 केंद्रीय विभागों आयकर, टेलीफोन, डाक, सेंट्रल जीएसटी रेलवे आदि आदि में राजभाषा की उपयोगिता और उपयोग की स्थिति, उसके स्तर आंकने के साथ सुधार के उपाय सुझाना था। समिति के सदस्यों में से 14 आए। इसके मुखिया छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य से कभी विपक्ष के निर्वाचित हुआ करते थे और अब भाजपा के हो गए हैं। समिति की आवभगत बारातियों की तरह करने की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य निगम को नोडल विभाग की तरह दी गई और इस खर्च की शेयरिंग सभी 35 विभागों को करना था। इसमें गिफ्ट का खर्च शामिल नहीं था। वह विभागों के अफसरों को अपने इंतजाम से करना था।
खाद्य विभाग ने गिफ्ट पैक तय कर सभी को बता दिया था- हर प्रतिनिधि को हर विभाग 100 ग्राम चांदी का एक एक सिक्का और उनकी की पत्नियों के नाम सूट पीस। उस दौरान चांदी की कीमत 25800 प्रति सौ ग्राम रही थी। इस तरह से हर सदस्य को 35 विभागों से कुल 9 लाख 3000 रुपए की 3.50 किलो चांदी उपहार स्वरूप मिली। और सूट की कीमत पता नहीं चल पाया। सस्ता तो दिए नहीं होंगे। सार यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के विभागों ने इतनी महंगा शिष्टाचार निभाया तो दिल्ली, उप्र, हरियाणा, तमिलनाडु कर्नाटक जैसे बड़े धन्यवाद राज्यों की सौजन्यता की कीमत तो और अधिक होती होगी। यही और ऐसी अन्य समितियां 5 साल के कार्यकाल में लगभग हर राज्य का दौरा कर लेती हैं। बस इशारा काफी है।
लेकिन कई लोगों का तजुर्बा है कि उपहार में देने वाले चांदी के सिक्के अलग बनते हैं, जिनमें आधी चाँदी भी नहीं होती। दान की बछिया के दाँत कौन गिनते हैं?
नाम की राजधानी, कबाड़ ऐसा!
सडक़ों के किनारे गाडिय़ों का कबाड़, या कबाड़-गाडिय़ां रास्ता रोकते पड़ी रहती हैं। अब शहरियों की कमाई का हाल यह हो गया है कि कोई इस कबाड़ को चुराकर बेचते भी नहीं है। राजधानी रायपुर में महाराष्ट्र मंडल के बगल में जाने कब से सडक़ और नाली के बीच पड़े ये स्कूटर जंग से सड़ चुके हैं, कोई चोरी भी नहीं कर रहा, और न कोई हटा रहा है।


