राजपथ - जनपथ
एक संत की जगह दूसरा संत!
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक घोटाला शांत भी नहीं होता कि दूसरा सामने आ खड़ा होता है। पिछली कांग्रेस सरकार के दौर में तो पीएससी पर लगे आरोपों ने राजनीतिक तापमान लगातार ऊँचा रखा। भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर सवाल उठे और आयोग की साख पर गहरी चोट पड़ी।
मगर समस्या की जड़ केवल आरोप नहीं है, व्यवस्था भी है। आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें ऐसी हैं कि वे अपना पूरा कार्यकाल पूरा करते हैं। सरकार बदल जाती है, सत्ता हाथ बदल लेती है, लेकिन आयोग की कुर्सियों पर बैठे लोग अपने पद पर बने रहते हैं। यही कारण है कि हर नई सरकार को पुराने फैसलों और पुराने चेहरों के साथ काम करना पड़ता है।
अब भाजपा के मुखर नेता गौरीशंकर श्रीवास ने पीएससी के एक ताजा कथित घोटाले का मुद्दा उठाते हुए उसके कांग्रेस-मनोनीत तीन सदस्यों को हटाने की मांग कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि आयोग की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है।
लेकिन इस राजनीतिक हमले के बीच एक बड़ी चूक भी सामने आ गई। श्रीवास के बयान में पीएससी सदस्य संत कुमार नेताम की जगह गलती से संत कुमार पासवान का नाम लिख दिया गया। संत कुमार पासवान एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं और रायपुर में रहते हैं। उनका पीएससी से कोई लेना-देना नहीं रहा है। नाम की इस गलती ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक पूर्व अधिकारी का नाम आ गया। अब हालत यह हैं कि लोग संत कुमार पासवान को फोन कर पूछ रहे हैं कि आखिर मामला क्या है, जबकि वे कभी पीएससी के सदस्य रहे ही नहीं।
फिलहाल पीएससी पर फिर से सियासी घमासान तेज हो चुका है। विपक्ष हमलावर है, सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, और युवा अभ्यर्थी जवाब चाहते हैं कि आखिर आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का समाधान कब और कैसे होगा।
मजे की बात यह है कि गौरीशंकर श्रीवास पीएससी के खिलाफ भूपेश-सरकार के वक़्त भी लड़ते रहे, आज भी लड़ रहे हैं, उस वक़्त उनके ख़िलाफ़ स्नढ्ढक्र भी हुई, लेकिन भाजपा सरकार आने के बाद भी उन्हें कुछ नहीं दिया गया।
महिला उत्पीडऩ, और जांच
राजनांदगांव से सटे नवगठित जिले में भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी अब खुलकर सामने आ गई है। मामला इतना बढ़ गया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। चूंकि प्रकरण महिला उत्पीडऩ से जुड़ा है, इसलिए जांच के लिए महिला डीएसपी की अगुवाई में एक विशेष कमेटी गठित की गई है।
बताया जा रहा है कि जिले के एक प्रभावशाली भाजपा नेता और पूर्व विधायक के मोबाइल से कुछ व्हाट्सएप समूहों में एक महिला नेत्री के साथ उनकी फोटो वायरल हो गई। इससे नाराज महिला नेत्री ने पूर्व विधायक के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए थाने में शिकायत दर्ज करा दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने पूर्व विधायक के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।
मामला दर्ज होते ही पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई। दबाव बढऩे के बाद पूर्व विधायक और महिला नेत्री के बीच सुलह-सफाई हो गई और प्रकरण को निपटा लिया गया। हालांकि विवाद यहीं नहीं थमा। महिला नेत्री ने चार अन्य लोगों के खिलाफ भी थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए उत्पीडऩ का आरोप लगाया है। जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, वे पूर्व विधायक के राजनीतिक विरोधी माने जाते हैं।
इस घटनाक्रम से पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और गुटीय संघर्ष उजागर हो गया है। मामला पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच चुका है। महिला नेत्री जिले में चल रहे एक आंदोलन का नेतृत्व भी कर रही हैं, जिससे प्रकरण की संवेदनशीलता और बढ़ गई है।
पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला डीएसपी के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित की है। राजनांदगांव रेंज के आईजी भी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल सभी पक्ष जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह विवाद आगे और तूल पकड़ सकता है।
8वां वेतन, दिल्ली से यहां तक
8वाँ वेतन आयोग (जस्टिस रंजना देसाई) ने दिल्ली के जनपथ स्थित चंद्रलोक बिल्डिंग दफ्तर से काम शुरू कर दिया है। तो दबाव की राजनीति भी तेज हो गई है। बीते नवंबर में जारी आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस कर्मचारी संगठनों ने उनकी कई अहम मांगों को उसमें जगह नहीं देने की बात कही थी। वहीं राष्ट्रीय परामर्शदात्री संयुक्त समिति (स्टाफ साइड) की ड्राफ्टिंग कमेटी भी 25 फरवरी से सक्रिय हो गई है। इसमें करीब 1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़ी मांगों को एक संयुक्त चार्टर के रूप में अंतिम रूप भी दिया जा रहा है। रायपुर के केंद्रीय कर्मचारी नेता भी अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के हवाले से वेतन भत्तों के फिटमेंट पर नजर रखे हुए हैं।
वेतन आयोग के तहत फिटमेंट फैक्टर वह मुख्य गुणांक (मल्टीप्लायर) है जो कर्मचारियों का नया मूल वेतन (बेसिक पे) को निर्धारित करेगा। वर्तमान में फिटमेंट फैक्टर को लेकर कई अनुमान और माँगें सामने आ रही हैं। यदि फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 2.86 किया जाता है, तो कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन मौजूदा 18,000 से बढक़र 51,480 हो सकता है।
कर्मचारी यूनियन फिटमेंट फैक्टर को 3.25 करने और सालाना 7त्न वेतन वृद्धि की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार फिटमेंट फैक्टर 1.92 से 2.86 के बीच रह सकता है। इससे न्यूनतम वेतन 41,000 के करीब पहुँच सकता है। वेतन और पेंशन में 30 से 34 प्रतिशत तक की वृद्धि होने का अनुमान है।
नया मूल वेतन निकालने के लिए वर्तमान बेसिक पे को फिटमेंट फैक्टर से गुणा किया जाता है। इसका फार्मूला संशोधित मूल वेतन = वर्तमान मूल वेतन का फिटमेंट फैक्टर हो सकता है। नया वेतनमान लागू होने पर महंगाई भत्ता, शून्य कर दिया जाता है और इसे बेसिक- पे में मर्ज कर दिया जाता है। आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से ही प्रभावी मानी जाएंगी। चूंकि आयोग को अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है, इसलिए वास्तविक भुगतान में देरी हो सकती है।
साइबर धमकियों में एजेंसियां खाली हाथ
न्यायपालिका इन दिनों एक अदृश्य दुश्मन के निशाने पर है। बिलासपुर हाईकोर्ट समेत रायपुर, दुर्ग और कोरबा जैसी दर्जनों जिला अदालतों को लगातार मिल रही बम की धमकियों ने पूरे राज्य के सुरक्षा तंत्र को हिलाया है। देश के अन्य हिस्सों में भी संवैधानिक संस्थाओं पर इसी तरह की धमकियां दी गईं।
धमकी भरे ईमेल मिलने के एक महीने बाद भी हमारी जांच एजेंसियों के हाथ खाली हैं। पुलिस ने बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है और एनआईए से लेकर साइबर सेल तक सक्रिय हैं, लेकिन नतीजा सिफर है। हमलावर ने वीपीएन और टोर ब्राउजर के जरिए अपनी पहचान को छिपा रखा है। विदेशी कंपनियों से डेटा मिलने में महीनों की देरी होती है। इंटरपोल की लंबी कागजी प्रक्रिया भी है। शायद, इसलिये जांच प्रक्रिया रफ्तार नहीं पकड़ रही है। हमारे पास ऐसी कोई डिजिटल फॉरेंसिक लैब या स्पेशल रिस्पॉन्स टीम नहीं है, जो ऐसे अपराधियों को 24 घंटे के भीतर बेनकाब कर सके।
अदालतों के बाहर अतिरिक्त सुरक्षा घेरा, सघन चेकिंग और बैग स्कैनिंग के कारण आम नागरिक परेशान हुए हैं। मुवक्किलों और वकीलों के मन में भी असुरक्षा की भावना घर कर गई। शायद ई मेल भेजने वालों का मकसद ही अव्यवस्था फैलाना है। मगर हैरान करने वाली बात यह है कि विदेशी सर्वर के पीछे बैठकर हमारी न्यायिक व्यवस्था को कोई लगातार चुनौती दे रहा है और हमें उसका सुराग नहीं मिल रहा है। चूंकि घटना कुछ भी नहीं हुई है, सिर्फ धमकियां ही मिली हैं, इसलिये इसे सिर्फ डराने के लिए की गई शरारत के रूप में पेश करने की कोशिश जांच एजेंसियां कर रही हैं। पर, मामले की तह तक जाने की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गृह विभाग में साइबर एक्सपर्ट्स की नियुक्तियां नहीं होने को लेकर हाल ही में सुनवाई की थी। सरकार ने जवाब दिया था कि नियुक्तियां की जा रही हैं। धमकी की इन घटनाओं ने विशेषज्ञों की जरूरत की पुष्टि कर दी है।


