राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : अध्ययन यात्रा या सैर-सपाटा?
12-Feb-2026 6:10 PM
राजपथ-जनपथ : अध्ययन यात्रा या सैर-सपाटा?

अध्ययन यात्रा या सैर-सपाटा?

जशपुर जिले की जिला पंचायत सदस्य आशिका कुजूर ने सरकारी अध्ययन-प्रशिक्षण यात्राओं की वास्तविकता सामने रखी है। उनकी पहली फेसबुक टिप्पणी व्यंग्य से भरी है। कहती हैं कि हम जनप्रतिनिधि जनता के पैसों से घूम रहे हैं। गांवों में पेयजल की समस्या है, बिजली आपूर्ति अनियमित है, स्कूल और आंगनबाड़ी जर्जर हैं, मनरेगा की स्थिति कमजोर है, किसान धान बेचने के लिए संघर्ष कर रहा है। स्वयं जनप्रतिनिधियों को महीनों से मानदेय नहीं मिला है। साल भर हो चुके जिला पंचायतों में निर्वाचन को, 15वें वित्त आयोग की राशि न मिली है। तब हम करोड़ों रुपये की अध्ययन यात्रा पर है। इस यात्रा के लिए सैकड़ों करोड़ का बजट बताया जा रहा है। वास्तविक राशि चाहे कम या अधिक हो, परंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि एक ओर विकास निधि कागजों में अटकी है और दूसरी ओर सामूहिक भ्रमण पर उदार व्यय दिख रहा है।

दूसरी पोस्ट में आशिका कुजूर ने कार्यक्रम के शेड्यूल पर सवाल उठाए हैं। छत्तीसगढ़ के विभिन्न संभागों से जिला पंचायत सदस्यों को 5-6 दिन के प्रशिक्षण हेतु मुंबई भेजा गया। उद्देश्य था, एक महानगर की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को समझकर अपने क्षेत्र में लागू करने योग्य अनुभव प्राप्त करना। किंतु तीन दिनों में केवल एक दिन औपचारिक प्रशिक्षण हुआ। शेष समय भ्रमण, धार्मिक स्थलों की यात्रा तथा मॉल दर्शन में बीता। मॉल के सामान इतने महंगे कि एक माह के मानदेय से एक चश्मा तक नहीं खरीदा जा सकता।

सार्थक प्रशिक्षण राज्य के भीतर भी हो सकता था। बस में बैठ सडक़ों और इमारतों को देख लेने मात्र से विकास की कार्यप्रणाली नहीं सीखी जा सकती। नही महंगे मॉल में घूम आना स्थानीय अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण का पाठ पढ़ा सकता है। जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट एजेंडा, विषय-विशेषज्ञों के सत्र, स्थानीय निकायों के साथ संवाद और व्यावहारिक कार्यशालाओं की आवश्यकता होती है। अंशिका ने यह भी इंगित किया कि जनप्रतिनिधियों को पूर्व सूचना तक नहीं दी जाती कि अगले दिनों का कार्यक्रम क्या होगा। भीड़ को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना प्रशिक्षण नहीं कहलाता। यह समय और संसाधनों का अपव्यय प्रतीत होता है।

पोस्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षण और एक्सपोजर विजिट लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक अंग हैं। जनप्रतिनिधियों को नवीन मॉडल, प्रशासनिक दक्षता और शहरी नियोजन के उदाहरण देखने चाहिए। किंतु योजना की गुणवत्ता जनप्रतिनिधियों के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए। जब मूलभूत विकास कार्य लंबित हों और मानदेय बकाया हो, तब अध्ययन यात्राओं की पारदर्शिता और उपयोगिता पर सवाल और भी अधिक जरूरी है।

कुजूर ने लिखा है कि यदि जनता के धन से कार्यक्रम आयोजित हो रहा है, तो उसका प्रतिफल भी जनता को दिखना चाहिए। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे सीखकर लौटें और उसे अपने क्षेत्र में लागू करें; वहीं सरकार का दायित्व है कि वह ऐसी यात्राओं को सार्थक, सुविचारित और परिणामोन्मुख बनाए। अन्यथा यह धारणा मजबूत होती जाएगी कि प्रशिक्षण के नाम पर केवल सैर-सपाटा हो रहा है और यह लोकतांत्रिक विश्वास के लिए बड़ा खतरा है। 

बता दें, आशिका कुजूर प्रदेश युवक कांग्रेस की महासचिव हैं। वे राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में चलकर पहली बार चर्चा में आई थी।

 

मोहल्ले की सडक़ के लिए पीएम ऑफिस से फोन

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी यादों से भी भरपूर हैं। वे दिलचस्प तस्वीरों के साथ फेसबुक पर लिखते रहते है।

अभी उन्होंने लिखा- मैं रायपुर के महंत लक्ष्मीनारायण दास वार्ड में रहता हूँ। यह जगह अपने आप में अनोखी है—तीन वार्डों का संगम स्थल: महंत लक्ष्मीनारायण दास वार्ड, सुंदर नगर वार्ड और लाखे नगर वार्ड। जिस मोहल्ले में मेरा निवास है, उसका नाम देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के नाम पर है—चन्द्रशेखर नगर। लेकिन इस नाम के पीछे एक बेहद रोचक और प्रेरक कहानी छिपी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।

आज जहां पक्की सडक़ें और मकान दिखाई देते हैं, कभी वहाँ दूर-दूर तक खेत ही खेत थे। किसान धान की खेती करते थे। जमीन दलदली थी और पास में बारूद का एक गोदाम होने के कारण यह इलाका ‘बारूद कोठी’ के नाम से भी जाना जाता था। बरसात के दिनों में हालात और भी कठिन हो जाते थे—कीचड़, पानी और आवागमन की भारी परेशानी।

सत्तर के दशक में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के निवासी कुंवर विश्वनाथ सिंह जी ने यहां जमीन खरीदी और मकान बनाया। वे पहले राज्य परिवहन और बाद में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में कार्यरत रहे। उस समय यहां रहना किसी चुनौती से कम नहीं था। सडक़, नाली, रोशनी—किसी भी मूलभूत सुविधा का अभाव था। लोग कठिनाइयां सहते हुए भी यहां रहने को मजबूर थे। इसी बीच एक दिलचस्प मोड़ आया।

एक बार विश्वनाथ सिंह जी अपने पैतृक गांव दुधेला (जिला बलिया) गए हुए थे। संयोग से उन्हीं दिनों बलिया के गौरव, जननायक चन्द्रशेखर जी देश के प्रधानमंत्री बने थे और अपने गृह ग्राम के दौरे पर आए थे। चन्द्रशेखर जी, विश्वनाथ सिंह जी के पिता के मित्र थे। विश्वनाथ जी उनसे मिलने पहुंचे तो चन्द्रशेखर जी ने आत्मीयता से पूछा—‘का हो विश्वनाथ, सब ठीक बा?’  बस, यही वह क्षण था।

विश्वनाथ जी ने विनम्रता से कहा—‘चाचा, सब ठीक है, लेकिन रायपुर (तब मध्यप्रदेश) में मकान बनाया है। वहां कोई सुविधा नहीं है, बहुत परेशानी होती है।’

इतना सुनना था कि प्रधानमंत्री जी ने तुरंत अपने पीए से कहा—‘रायपुर कलेक्टर को फोन करिए। जाकर देखें और लोगों को परेशानी न हो, ऐसी व्यवस्था करें।’

उसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन पहुंच गया। नगर निगम और जिला प्रशासन का पूरा अमला हरकत में आ गया। अधिकारी स्वयं मौके पर पहुंचे। कलेक्टर भी सोच में थे—आखिर इस छोटे से, कीचड़ भरे मोहल्ले में ऐसा कौन है जिसकी सीधी पहुंच प्रधानमंत्री तक है! कुछ अधिकारी तो केवल विश्वनाथ सिंह जी को देखने के लिए उत्सुक थे।

परिणाम सामने था।

कुछ ही समय में सडक़ें बनने लगीं, नालियां बनाई गईं, बुनियादी सुविधाओं का काम शुरू हुआ। धीरे-धीरे लोग बसते गए और वीरान-सा इलाका एक सजीव बस्ती में बदलने लगा।

इसी कृतज्ञता और सम्मान के भाव से विश्वनाथ सिंह जी ने प्रस्ताव रखा कि मोहल्ले का नाम चन्द्रशेखर जी के नाम पर रखा जाए। सहमति मिली और यहां ‘चन्द्रशेखर नगर’  का बोर्ड लग गया। आज जब हम इस मोहल्ले की सडक़ों पर सहजता से चलते हैं, तो शायद ही किसी को पता हो कि इन सडक़ों के पीछे एक फोन कॉल की कहानी है—एक जननायक की संवेदनशीलता और अपनत्व की कहानी।

यह सिर्फ एक मोहल्ले के नामकरण की कथा नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति की भी झलक है, जब संवाद सीधे दिल से होता था और समस्या सुनते ही समाधान की पहल भी हो जाती थी। यही है चन्द्रशेखर नगर की असली कहानी—संघर्ष, संवेदनशीलता और स्मृतियों से जुड़ी हुई।

कांग्रेस में हलचल

कांग्रेस में दो दिन पहले दिल्ली में जिला अध्यक्षों का प्रशिक्षण हुआ। इसमें प्रदेश के सभी 41 जिलों के अध्यक्ष थे। प्रशिक्षण शिविर में पार्टी के शीर्ष नेताओं ने जिला अध्यक्षों की कार्यशैली को बेहतर करने के लिए टिप्स दिए।

जिला अध्यक्षों को विशेष तौर सोशल मीडिया में सक्रिय रहने की हिदायत दी गई है। उन्हें रोजमर्रा के कार्यक्रमों की जानकारी सोशल मीडिया में शेयर करने के लिए कहा गया। यह कहा गया कि पूरे 365 दिन उन्हें आम लोगों के बीच रहना होगा, और हर मतदाता तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश करनी होगी।

राहुल गांधी लोकसभा की कार्रवाई की वजह से कुछ देर प्रशिक्षण कार्यक्रम में शिरकत की। कार्यक्रम में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और महामंत्री केसी वेणुगोपाल ने जिलाध्यक्षों से चर्चा की। बाद में प्रियंका गांधी भी जिलाध्यक्षों से रूबरू हुईं। कुछ दिन पहले जेल से रिहा हुए पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा भी अपने पुत्र सुकमा जिला कांग्रेस अध्यक्ष हरीश लखमा के साथ कार्यक्रम में पहुंचे थे।

कवासी ने कार्यक्रम खत्म होने के बाद पूर्व सीएम भूपेश बघेल के साथ खरगे, और प्रियंका गांधी से मुलाकात की। इस दौरान भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य भी थे। खरगे ने कवासी, और चैतन्य का हाल चाल पूूछा। कुल मिलाकर कार्यक्रम से जिलाध्यक्ष काफी खुश नजर आए। संभवत: मार्च-अप्रैल में बस्तर में 10 दिन का फिर प्रशिक्षण कार्यक्रम होगा। इसमें पार्टी के तमाम प्रमुख नेता कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। इसके लिए प्रदेश के नेताओं को अभी से रूपरेखा बनाने के लिए कहा गया है।


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