राजपथ - जनपथ
क्या शादी अपनी मर्जी से की?
10 फरवरी को छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री कन्या विवाह कार्यक्रम के तहत प्रदेशभर में छह हजार से अधिक जोड़े वैवाहिक जीवन में बंधे। महंगाई और परंपराओं के दबाव के बीच आम परिवारों के लिए विवाह का खर्च किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं। गरीब परिवारों की स्थिति और भी कठिन होती है। अक्सर उन्हें कर्ज लेना पड़ता है, जिसे चुकाने में वर्षों लग जाते हैं। सामूहिक विवाह में शामिल नवदंपतियों को गृह उपयोगी सामग्री के साथ 35 हजार रुपये की नगद सहायता भी दी गई, जो छोटे काम धंधा करने वालों और मजदूर वर्ग के लिए विशेष आकर्षण होता।
आयोजन की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग पर होती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अधिक से अधिक जोड़ों को जोडऩे की जिम्मेदारी दी जाती है। व्यावहारिक स्तर पर कई बार यह दायित्व दबाव में बदल जाता है। ऐसी शिकायतें सामने आ चुकी हैं कि पहले से विवाहित, यहां तक कि बच्चों वाले दंपतियों को भी सामूहिक विवाह में लाकर बिठा दिया गया। प्रोत्साहन राशि पाने के उद्देश्य से भी जोड़े भाग लेते देखे गए। अन्य योजनाओं की तरह इस योजना पर भी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। घटिया बर्तन, पंखे और अन्य सामग्री की खरीद के मामले समय-समय पर उजागर हुए।
मगर, इन सबके बीच एक जरूरी सवाल उठता है, जिसे बैकुंठपुर विधायक भैयालाल राजवाड़े ने अपने इलाके के पटना गांव में आयोजित समारोह में उठाया। उन्होंने युवाओं से पूछा- क्या यह विवाह आपकी आपसी सहमति से हो रहा है या केवल पारिवारिक निर्णय है? आप एक-दूसरे को कितना जानते हैं? क्या आंगनबाड़ी या दूसरे विभाग के किसी कर्मचारी ने कहा कि शादी कर लो? ये सवाल असहज अवश्य थे, परंतु जरूरी भी। युवा जोड़े उत्तर देने में असमर्थ दिखे और विवाह की तैयारियों में व्यस्त रहे।
विधायक ने सवाल पूछकर यह इशारा किया है कि योजना का उद्देश्य आर्थिक सहारा देना है, न कि विवाह जैसे जीवन भर फैसले में सरकार या किसी बाहरी व्यक्ति का हस्तक्षेप करना। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल जानकारी देने तक सीमित होती है। यदि प्रलोभन या दबाव में संबंध तय होते हैं, तो भविष्य में सामाजिक और पारिवारिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
कांग्रेस की घरेलू सुगबुगाहट
अप्रैल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव के ठीक बाद कांग्रेस में फेरबदल के संकेत हैं। अप्रैल-मई में बतौर प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का तीन साल का कार्यकाल पूरा होगा। उनका कार्यकाल बढ़ेगा या नहीं, इस पर फैसला होगा।
यही नहीं, बैज के साथ-साथ सचिन पायलट पर भी फैसला होगा। पायलट केरल के चुनाव प्रभारी हैं। वे पिछले दो साल से छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। चर्चा है कि वे छत्तीसगढ़ के प्रभार से मुक्त होना चाहते हैं और उन्होंने अपनी भावनाओं से पार्टी हाईकमान को अवगत करा दिया है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि पायलट की जगह नए प्रभारी की नियुक्ति होगी। पिछले दिनों जिलाध्यक्षों की बैठक में पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भविष्य को लेकर भी संकेत दिए हैं। उन्होंने कह दिया है कि भविष्य में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति जिलाध्यक्षों में से की जाएगी। यानी जिस जिलाध्यक्ष का परफॉर्मेंस सबसे बेहतर होगा, उन्हें प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी। छत्तीसगढ़ में भले ही तुरंत यह व्यवस्था लागू न हो, लेकिन कुछ बड़े बदलाव हो सकते हैं। बैज अध्यक्ष रहें या न रहें, प्रदेश संगठन में दो कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति तय मानी जा रही है। पहले भी प्रदेश कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति होती रही है। कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति जाति समीकरण को ध्यान में रखकर की जाएगी। इसको लेकर पार्टी के अंदरखाने में अभी से चर्चा शुरू हो गई है। देखना है आगे क्या होता है।
अनूठी जोड़ी

पिछले दिनों इस अनूठी जोड़ी से मिलने और इन्हें सुनने का मौका मिला। इनमें जो स्त्री हैं, वे विद्या राजपूत हैं। विद्या ट्रांस वूमेन हैं। बस्तर की रहने वाली हैं, इनका जन्म पुरुष शरीर में हुआ, मगर इन्हें बहुत जल्द समझ आ गया कि इनका मन स्त्री का है।
पुरुष से स्त्री बनने और दुनिया को बताने में इन्हें काफी वक़्त लगा और उतना ही संघर्ष भी था, क्योंकि समाज के लिये यह सब स्वीकार कर पाना सहज नहीं है। वे विनय से विद्या बनीं, फिर छत्तीसगढ़ में ट्रांसजेंडरों के अधिकार के लिये संघर्ष करने लगीं।
दूसरे पॉपी देवनाथ हैं, त्रिपुरा के। ये जन्म से स्त्री थे, मगर इनका मन पुरुषों वाला था। 2014 के नालसा जजमेंट के बाद इन्होंने तय किया कि अब वे स्त्री के शरीर में नहीं रहेंगे। सर्जरी और दवाओं के बाद इन्होंने अपना मनचाहा पुरुष का शरीर पाया।
फिर ये दोनों करीब आये, विवाह किया, साथ रहते हैं और शरीर और मन के बीच लैंगिक उथल पुथल से जूझ रहे लोगों की मदद करते हैं।
हम लोग जो परंपराओं से इंसानों को दो लिंगों में बांटते आये हैं और जिनके लिये शरीर ही लिंग है, उनके लिये यह सब देखना, समझना और स्वीकार करना आज भी मुश्किल है।
अपने आसपास रोज ऐसे लोगों को देखता हूं, जो अपने समाज के पूर्वाग्रह के बीच विकसित हुए हैं और तमाम पढ़ाई, लिखाई के बाद भी। अच्छे संस्थानों से जुडक़र भी अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते। खासकर धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और लिंग के पूर्वाग्रह। आज दुनिया की तीन चौथाई समस्या इन्हीं पूर्वाग्रहों की वजह से है।
इन्हीं पूर्वाग्रहों की वजह से विद्या और पॉपी जैसे लोगों को अपने पसंद का जीवन जीने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है। आज प्रेम का दिन है और प्रेम को सहज रूप से हम आज भी स्वीकार नहीं कर पाते। इसके पीछे भी हमारे दकियानूसी पूर्वाग्रह ही हैं।
इसलिए अगर आप सचमुच प्रेम में विश्वास रखते हैं तो सबसे जरूरी है, पूर्वाग्रहों से मुक्ति और अपने नजरिये को खुला रखना। थोड़ा संवेदनशील बनना और दूसरों की भावनाओं को समझना, उन्हें सम्मान देना।
वेलेंटाइन डे की शुभकामनाएं
— पुष्य मित्र


