राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : एक अकेले गधे का आकर्षण
21-Feb-2026 6:34 PM
राजपथ-जनपथ : एक अकेले गधे का आकर्षण

एक अकेले गधे का आकर्षण

यह गधा आम नहीं है,यह विरला है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि यह पूरे अंडमान द्वीप के लांग आईलैंड में एक मात्र रह गया है। हाल में रायपुर और चेन्नई के पत्रकारों का संयुक्त दल वहां अध्ययन भ्रमण पर गया था। इस लांग आईलैंड पर समुद्र के भीतर टेलीफोन केबल परियोजना को देखा। वहीं पर इस गधे के बारे में जानकारी मिली। बस फिर क्या था दोनों ही शहर के पत्रकार उसे ढूंढने में लग गए। सभी पीपली लाइव फिल्म के टीवी चैनल के पत्रकारों की तरह 35 किमी लंबे आइलैंड के 9 किमी के दायरे में तलाशते रहे। आखिरकार वह आइलैंड के बीएसएनएल एक्सचेंज के पास मिला।

 इसके बारे में आयलैंड के प्रधान (सरपंच)  बी कामराज ने बताया कि कुछ वर्षों पहले यहां स्थापित प्लाईवुड फैक्ट्री (अब बंद) में लकड़ी आदि सामान ढोने पश्चिम बंगाल से दो नर- मादा गधे लाए गए थे। इनके दांपत्य जीवन से परिवार बढक़र 7 तक जा पहुंचा। प्रधान बताया  कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र होने के कारण यह प्रजाति अधिक आक्रोशित होती है, नतीजतन आपसी झगड़े में इन गधों में से 6 मार दिए गए। यह एक ही बच गया  है। यह सुनकर पत्रकारों ने गूगल सर्च किया और  इस द्वीप को एक मात्र गधे वाला देश का एकमात्र प्रदेश का दर्जा दे दिया । हालांकि गूगल पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे कम गधे बताता है।

गूगल सर्च में पता चला कि 2019 की 20वीं पशुधन गणना के अनुसार, भारत में गधों की सबसे अधिक आबादी राजस्थान (लगभग 23,000+) में है, जबकि पूर्वोत्तर के  अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम में इनकी संख्या सबसे कम है, जहां कुछ राज्यों में इनकी संख्या 100 से भी नीचे है। देश में गधों की आबादी 2012 से 2019 के बीच 61 प्रतिशत से अधिक घटकर 1.2 लाख के करीब रह गई है।

धान खरीदी में फिर नई धांधली

इस बार छत्तीसगढ़ सरकार धान खरीदी के बढ़ते वित्तीय बोझ को कम करने के लिए कई प्रतिबंध लगा चुकी है। सख्त निगरानी की गई, यहां तक कि घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन किया गया ताकि अवैध भंडारण और बिक्री रोकी जा सके। लेकिन इसके बावजूद, खरीदी व्यवस्था में लगे कर्मचारी और अधिकारी सरकार को ठगने से बाज नहीं आ रहे हैं। करोड़ों रुपये के धान संग्रहण केंद्रों से रहस्यमय ढंग से गायब हो रहे हैं और जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई है। कलेक्टर के आदेश पर भी एफआईआर नहीं हो रही है। सक्ती और सूरजपुर जिलों से आई ताजा खबरें बता रही है कि इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए कोशिश ऊपर के स्तर से नहीं हो रही है।

सक्ती जिले में 2024-25 के दौरान धान भंडारण केंद्रों से बड़े पैमाने पर कमी की रिपोर्ट आई है। मार्केटिंग फेडरेशन की रिपोर्ट के मुताबिक जिले के तीन केंद्रों से कुल 66,680 क्विंटल धान गायब पाया गया है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 21 करोड़ रुपये है। परिवहन, गन्नी बैग, सूतली, कुली और सुरक्षा पर हुए खर्च को मिलाकर सरकार को लगभग 25 करोड़ का नुकसान हुआ है। मामला सामने आए चार महीने बीत चुके हैं और अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ औपचारिक जांच चल रही है, जो कब पूरी होगी पता नहीं। जिला विपणन अधिकारी ने अभी से कहना शुरू कर दिया है कि धान के गायब होने का कारण स्पष्ट नहीं है।

सूरजपुर जिले के एक धान खरीदी केंद्र सावरवन में भौतिक सत्यापन से 32,838 क्विंटल धान की कमी पाई गई, जिसकी कीमत 10 करोड़ से ज्यादा है। कलेक्टर के आदेश के बावजूद इस मामले में एफआईआर नहीं दर्ज हुई। प्रशासनिक छापों में आधा दर्जन से ज्यादा केंद्रों में करीब 20 करोड़ की कमी मिली है। एक फरवरी को भैयाथान के एसडीएम के निर्देश पर जांच टीम ने सावरवन केंद्र का आकस्मिक निरीक्षण किया। तो रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में बड़ा अंतर मिला। 82,095 बोरे धान गायब। 7,961 ज्यादा खाली बोरे मिले । जांच के दौरान रजिस्टर और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे मिलान ही अधूरा रहा रहा। जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि दस्तावेज जब्त कर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज की जाए, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है।

ये घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार की सख्ती के बावजूद सिस्टम में भ्रष्टाचार जारी है। किसानों से धान खरीदकर भंडारण तक की प्रक्रिया में लाखों का खेल हो रहा है। जांच के नाम पर महीनों बीत जाते हैं, और बहाने जैसे चूहे खा गए या दीमक ने नष्ट कर दिया, दिए जाते हैं। फिर नया घोटाला हो जाता है और लोग पुरानी गड़बड़ी भुला देते हैं।

स्मृति स्तंभ में जीवन की कहानी

जंगल की नीरवता के बीच खड़ा यह मृतक स्मृति स्तंभ बस्तर की आत्मा का सजीव प्रतीक है। दूर से देखने पर यह रंगों से सजा एक साधारण ढांचा लगता है, लेकिन पास जाने पर इसमें एक पूरे जीवन की कहानी उकेरी दिखाई देती है। आदिवासी समाज में ही ऐसे स्मृति स्तंभ देखने को मिलेंगे।

इन पर बनी चित्रकारी मानो दिवंगत के जीवन का दस्तावेज है। कहीं खेती-बाड़ी के दृश्य हैं, कहीं पशु, कहीं नृत्य और उत्सव, तो कहीं रोजमर्रा के कामकाज। इससे मालूम होता है कि वह व्यक्ति कैसा जीवन जीता था, उसे क्या प्रिय था और समाज में उसकी क्या पहचान थी।

आदिवासी परंपरा में मृत्यु को यहां अंत नहीं माना जाता। स्मृति के रूप में व्यक्ति समाज के बीच जीवित रहता है। यह स्तंभ उन्हीं यादों का प्रहरी बनकर खड़ा है जो आने वाली पीढिय़ों को अपनी जड़ों, संस्कृति और सामुदायिक रिश्तों से जोडक़र रखेगा।


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