राजपथ - जनपथ
अब आईएएस भी ईडी की नजर में
ईडी ने स्वास्थ्य विभाग में दवा खरीद घोटाले की पड़ताल शुरू कर दी है। जांच एजेंसी ने रायपुर, बिलासपुर, और दुर्ग में 18 जगहों पर छापेमारी की है। वैसे तो ईओडब्ल्यू-एसीबी भी मामले की जांच कर रही है। दवा घोटाले के मुख्य सूत्रधार शशांक चोपड़ा, और दवा निगम अफसरों समेत कुल 7 लोग जेल में हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी प्रकरण पर चालान भी पेश कर चुकी है। मगर प्रकरण पर कुछ और खुलासा होना बाकी है।
बताते हैं कि ईओडब्ल्यू-एसीबी ने चार सौ करोड़ से अधिक के दवा घोटाले में कार्रवाई तो की है, लेकिन घोटाले के लिए जिम्मेदार विभाग के आला अफसरों तक नहीं पहुंच पाई। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने विधानसभा में संकेत दिए थे कि घोटाले में दो बड़े अफसरों की भी भूमिका रही है। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने तीन आईएएस अफसरों से पूछताछ तो की थी, लेकिन उन पर प्रकरण नहीं दर्ज किया गया। अब ईडी ने मामले को हाथ में लिया है, तो उन लोगों पर कार्रवाई होना तय है, जो अब तक बचे रहे हैं।
ईडी जेल में बंद दवा व्यापारी, और अफसरों से भी पूछताछ करने वाली है। यही नहीं, उन तीन आईएएस अफसरों को भी पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। चर्चा है कि ईडी जल्द ही कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
कलेक्टर, और नाखुश भाजपा नेता
बस्तर के नारायणपुर जिला प्रशासन, और स्थानीय भाजपा नेताओं में ठन गई है। सरकार ने यहां कलेक्टर पद पर प्रतिष्ठा ममगाई की पोस्टिंग की है, जिन्हें तीन माह ही हुए हैं। आईएएस की वर्ष-2018 बैच की अफसर प्रतिष्ठा नारायणपुर की पहली महिला कलेक्टर है।
हाल ही में प्रतिष्ठा ने सरकारी जमीनों में अतिक्रमण पर प्रभावी कार्रवाई की है। कुछ नेता भी इससे प्रभावित हुए हैं। इनमें एक भाजपा के पदाधिकारी भी हैं। इसके बाद से स्थानीय भाजपा नेता उनके खिलाफ चल रहे हैं। पिछले हफ्ते केन्द्रीय राज्य मंत्री डॉ. चद्रशेखर बस्तर दौरे पर थे, उस समय भी पदाधिकारियों की एक पुलिस अफसर से बहस हो गई। इसके बाद जिला पंचायत अध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष, और नगरीय निकाय के तमाम पदाधिकारियों ने हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन सीएम विष्णुदेव साय को भेजा है जिसमें उन्होंने जिला प्रशासन पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का आरोप लगाया है।
नारायणपुर सरकार के ताकतवर मंत्री केदार कश्यप का विधानसभा क्षेत्र भी है। चर्चा है कि वो अपने पदाधिकारियों के साथ हैं। इस पूरे प्रकरण को सीएम सचिवालय ने संज्ञान में लिया है। कलेक्टर, और जनप्रतिनिधियों से चर्चा हो रही है। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
आत्मसम्मान और संघर्ष की एक इमारत...

रायपुर के श्याम टॉकीज के पास खड़ा भव्य इनडोर और आउटडोर स्टेडियम किसी आम खेल परिसर जैसा नहीं है। ये उस संघर्ष, उम्मीद और आत्मसम्मान की कहानी है जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।
कई सालों तक यह स्टेडियम अधूरा और सूनसान पड़ा रहा। तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह रायपुर आए। उनके साथ रायपुर के महापौर बलबीर सिंह जुनेजा भी थे। जब दोनों स्टेडियम पहुंचे, तो जुनेजा जी ने अपनी पगड़ी उतारकर मुख्यमंत्री के पैरों में रख दी और भावुक होकर बोले- मुख्यमंत्री जी, यह हमारी आखिरी उम्मीद है। इस स्टेडियम के लिए मदद दीजिए...।
ये सिर्फ पगड़ी नहीं थी। रायपुर की अस्मिता, खिलाडिय़ों का सपना और एक नेता की झुक कर की गई विनती थी।
हालांकि उस वक्त सरकारी मदद नहीं मिली, लेकिन संघर्ष रुका नहीं।
बाद में जब स्टेडियम बनकर तैयार हुआ और रमन सिंह मुख्यमंत्री बने, तब बलबीर जी के छोटे भाई और कांग्रेस विधायक कुलदीप जुनेजा ने एक विनती की- इस स्टेडियम का नाम बलबीर सिंह जुनेजा जी के नाम पर रखा जाए।
यह मांग विपक्ष से थी, लेकिन रमन सिंह ने इसे राजनीति नहीं, खेल और सम्मान के नजरिए से देखा।
और स्टेडियम का नाम रखा गया- सरदार बलबीर सिंह जुनेजा स्टेडियम
एक और बात, तब कुछ लोगों ने स्व. पं. रविशंकर शुक्ल के नाम की भी चर्चा की थी।
लेकिन विद्या चरण शुक्ल ने कहा- कक्का जी के नाम पर पहले ही बहुत संस्थान हैं, हमें हर चीज उन्हीं के नाम पर नहीं करनी चाहिए। इसमें एक परिपक्व सोच और संतुलन था।
आज जब आप इस स्टेडियम की तस्वीर देखें, तो सिर्फ ईंट-पत्थर मत देखिए। उसके पीछे छिपे संघर्ष, सम्मान और समर्पण को महसूस कीजिए।
ये सिर्फ इमारत नहीं है, ये यादों का स्मारक है। (फोटो और विवरण- गोकुल सोनी)
समोसे का सवाल बड़ा गहरा है..
लोकसभा में सांसद रवि किशन ने एक दिलचस्प मुद्दा उठाया। वैसे हंसी आ सकती है कि समोसे के दाम व साइज पर सांसद क्या बात कर रहे हैं, लेकिन इसमें गंभीरता भी छिपी है। कुछ सरकारी संस्थानों, रेलवे पेंट्री कार, स्टेशन के स्टॉल- पार्लियामेंट कैंटीन, कुछ सरकारी केंद्रीय उपक्रमों के कैंटीन के अलावा किसी भी जगह खाद्य पदार्थों का वजन नहीं बताया जाता। होटलों में तो अलग समस्या है जो रवि किशन ने दर्शाया- कहीं पर एक प्लेट दाल या सब्जी बहुत हो जाती है, कई बार कम। किसी भी होटल,रेस्तरां में मेनू के साथ व्यंजन की मात्रा नहीं लिखी होती है। ऐसे में कई बार ऑर्डर करने के बाद खाना बर्बाद होता है। दुनिया भर में खाने की बर्बादी एक बड़ा संकट है, और दूसरी तरफ लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं।
कुछ अस्पतालों में जैसे अपोलो के मेस में जहां बुफे सिस्टम है लिखा होता है कि थाली में उतना ही लें जितना खा सकें, फेंकने के लिए नहीं लें। जबकि शादी ब्याह के समारोहों में दिखावे का चलन बढ़ रहा है। अधिक से अधिक मिष्ठान, अलग-अलग राज्यों के व्यंजन रखे जाते हैं। कहीं पर सरकार ने बाध्य नहीं किया, न समाज जागरूक है कि इस तरह खाने को बर्बाद मत किया जाए। जब ऐसे समारोह खत्म होते हैं तो बड़ी मात्रा में खाद्यान्न कूड़े में फेंके गए मिलते हैं। ग्राहकों को अधिकार तो मिलना ही चाहिए कि उसे किस तेल और आटे का डिश दिया जा रहा है और उसकी मात्रा कितनी होगी, कितने लोगों के लिए काफी होगा?
एक अगस्त : असहयोग आंदोलन की शुरूआत, अंग्रेजी शासन की नींव हिली
नयी दिल्ली, 1 अगस्त। अंग्रेज हुक्मरान की बढ़ती ज्यादतियों का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी ने 1920 में एक अगस्त को असहयोग आंदोलन की शुरूआत की। आंदोलन के दौरान विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया। कई कस्बों और नगरों में श्रमिक हड़ताल पर चले गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़ताल हुईं जिनमें छह लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख कार्य दिवसों का नुकसान हुआ।
शहरों से लेकर गांव देहात में इस आंदोलन का असर दिखाई देने लगा और वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद असहयोग आंदोलन से पहली बार अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।
फरवरी, 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा पुरवा में एक थाने पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। हिंसा की इस घटना के बाद गांधी जी ने यह आंदोलन तत्काल वापस ले लिया।
देश-दुनिया के इतिहास में एक अगस्त की तारीख में दर्ज अन्य प्रमुख घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-
- 1831 : नये लंदन ब्रिज को यातायात के लिए खोल दिया गया।
- 1883 : ग्रेट ब्रिटेन में अंतर्देशीय डाक सेवा शुरू।
- 1916 : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष एनी बेसेंट ने होम रूल लीग की शुरुआत की।
- 1920 : महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की।
- 1932 : जानी मानी हिंदी फ़िल्म अभिनेत्री मीना कुमारी का जन्म।
- 1953 : क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को गिरफ्तार किया गया।
- 1953 : देश में सभी एयरलाइंस का हवाई निगम अधिनियम के तहत राष्ट्रीयकरण किया गया।
- 1957 : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की स्थापना।
- 1960 : पाकिस्तान की राजधानी कराची से बदलकर इस्लामाबाद की गई।
- 1975 : दुर्बा बनर्जी वाणिज्यिक यात्री विमान का संचालन करने वाली विश्व की पहली पेशेवर महिला पायलट बनीं।
- 1995 : हब्बल दूरबीन ने शनि के एक और चन्द्रमा की खोज की।
- 2004 : श्रीलंका ने भारत को हराकर क्रिकेट का एशिया कप जीता।
- 2006 : जापान ने दुनिया की पहली भूकम्प पूर्व चेतावनी सेवा शुरू की।
- 2007 : वियतनाम के हनोई शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गणित ओलम्पियाड में भारतीय दल के छह सदस्यों ने तीन रजत पदक जीते।
- 2021: बैडमिंटन खिलाड़ी वीपी संधू ने चीन की जियाओ को हराकर तोक्यो ओलंपिक खेलों की महिला एकल स्पर्धा का कांस्य पदक जीता। ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं।
- 2021: भारत की पुरुष हॉकी टीम ने तोक्यो में ग्रेट ब्रिटेन को हरा कर 49 साल बाद ओलंपिक के सेमीफाइनल में जगह पाई।
- 2021: भारत ने अगस्त के महीने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।
- 2024: बांग्लादेश ने देशव्यापी अशांति के चलते जन सुरक्षा के लिए उत्पन्न खतरे का हवाला देते हुए आतंकवाद रोधी कानून के तहत जमात-ए-इस्लामी और इसकी छात्र शाखा इस्लामी छात्र शिबिर पर प्रतिबंध लगाया। (भाषा)
ये कब तक जान बचा पाएंगीं?
रायपुर की एक सडक़ की तस्वीर है। राजधानी के लिए नया नाम भी उन्होंने सुझाया है- गायपुर। वैसे तो छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर बारहों महीने ऐसी हालत दिख जाती है, मगर बारिश में गीली मिट्टी से बचने के लिए इन दिनों सडक़ पर अधिक संख्या में दिखाई दे रहे हैं। बिलासपुर में हाईकोर्ट है। इस मामले को लेकर अदालत ने कई बार चिंता जताई है। पंचायत से लेकर प्रमुख सचिव स्तर तक समिति बनाकर मॉनिटरिंग करने कहा है लेकिन सब उपाय फेल हैं। हाल ही में दो दर्जन से अधिक गायों की दो दुर्घटनाओं में मौत हो गई है। रात के वक्त अज्ञात भारी गाडिय़ां इन्हें कुचलकर भाग गईं। चूंकि अब बिलासपुर हाईकोर्ट में जिला प्रशासन को जवाब देना है इसलिये अब पशु मालिकों के खिलाफ भी कार्रवाई करने आदेश जारी कर दिया गया है। जो लोग खुले में गाय बैलों को छोड़ रहे हैं, उनके खिलाफ न केवल जुर्माना लगाने का बल्कि दोबारा ऐसा करते पाए जाने पर जेल भेजने का अधिकार सभी एसडीएम को दिए गए हैं। हालांकि इस एक्ट के लागू होने के बाद कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। मूक जानवरों की मौत तो हो ही रही है, सडक़ दुर्घटनाओं में लोग भी हताहत हो रहे हैं। राजधानी रायपुर हो या बिलासपुर एक ही हाल है। आश्चर्च यह है कि स्वच्छ शहरों की अपनी-अपनी श्रेणी में इन दोनों ही शहरों को अवार्ड हासिल हुए हैं।
जेल भी अखाड़ा

कोल स्कैम में फंसे पूर्व सीएम भूपेश बघेल के करीबी सूर्यकांत तिवारी की जमानत अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट में 4 अगस्त को सुनवाई होगी। सूर्यकांत करीब तीन साल से रायपुर सेंट्रल जेल में हैं। जमानत अर्जी पर सुनवाई से पहले एक अन्य आरोपी निखिल चंद्राकर के आरोपों से सूर्यकांत की मुश्किलें बढ़ गई है।
निखिल चंद्राकर ने आरोप लगाया है कि अप्रैल में सूर्यकांत उनके साथ दुर्व्यवहार किया था। इसके बाद निखिल को धमतरी जेल में शिफ्ट कर दिया गया। जेल प्रशासन ने पुरानी शिकायतों के आधार पर सूर्यकांत को अंबिकापुर जेल शिफ्ट करने की वकालत भी की है। जो खारिज हो गई।
जेल प्रशासन का आरोप है कि गत 20 जुलाई को जेल में निरीक्षण के दौरान बैरक में सूर्यकांत का बर्ताव खराब रहा है। सूर्यकांत के वकील जेल प्रशासन और निखिल के आरोपों को निराधार बता रहे हैं। यह तर्क दिया जा रहा है कि सूर्यकांत की जमानत को रोकने के लिए नए आरोप गढ़े जा रहे हैं। यह भी बताया गया कि नए आरोपों की वजह से सुप्रीम कोर्ट में दो बार सुनवाई की तिथि आगे बढ़ चुकी है। इस केस में ज्यादातर आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है। ईओडब्ल्यू-एसीबी सूर्यकांत की जमानत याचिका का विरोध किया है।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने अपने फेसबुक पर लिखा है कि आजकल प्रदेश में देखा जा रहा है कि जेलों को भी राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है। वहां भी दल देखकर प्रतिशोध का भाव देखा जा रहा है।
उन्होंने आगे लिखा कि कल जिस प्रकार से दुर्ग में चुने गए सांसदों को समय देने के बाद भी बंदियों से रोका गया, फिर भारी विरोध के बाद मिलने दिया गया। इसके अलावा रायपुर जेल से भी राजनीतिक प्रतिशोध की खबरें आ रही हैं। पूर्व सीएम के बेटे चैतन्य भी शराब घोटाला केस में रायपुर सेंट्रल जेल में हैं। स्वाभाविक है कि पूर्व सीएम की भी जेल की तमाम घटनाक्रमों की जानकारी के साथ बारीक नजर है। ऐसे में सूर्यकांत की जमानत अर्जी पर क्या होता है, यह तो चार तारीख को ही पता चलेगा।
तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना
महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद चंद्राकर को शहर जिला कांग्रेस कमेटी ने पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ बयानबाजी पर नोटिस जारी किया है। चंद्राकर को पार्टी ने विधानसभा टिकट नहीं दी थी। उनकी जगह श्रीमती रश्मि चंद्राकर को टिकट दी थी। मगर वो चुनाव हार गईं। इसके बाद से समय-समय पर विनोद चंद्राकर अपनी नाराजगी का इजहार करते रहते हैं। पिछले दिनों विनोद ने पार्टी नेताओं के खिलाफ बयान दिया, तो उनसे लिखित में जवाब मांगा गया है।
नोटिस मिलने के बाद शारीरिक तकलीफों की वजह से पूर्व विधायक रायपुर के एक अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें देखने के लिए पूर्व सीएम भूपेश बघेल, और प्रदेश के प्रभारी सचिव विजय जांगिड़ सहित अन्य नेता पहुंच चुके हैं। वो नेता भी विनोद चंद्राकर का कुशलक्षेम पूछने अस्पताल पहुंच रहे हैं, जिन्होंने चंद्राकर को नोटिस देने के लिए कहा था। यानी साफ है कि जिन्होंने दर्द दिया, वही अब दवा भी दे रहे हैं। इससे खुद विनोद चंद्राकर संतुष्ट नजर आ रहे हैं।
सवन्नी के खिलाफ मोर्चा
प्रदेश भाजपा संगठन के बड़े नेता, और क्रेडा के चेयरमैन भूपेंद्र सिंह सवन्नी पर कमीशनखोरी के आरोपों की पड़ताल चल रही है। सीएम विष्णुदेव साय ने शिकायतों पर ऊर्जा सचिव से रिपोर्ट तलब किया है। आम तौर पर किसी न किसी नेता या अफसर के खिलाफ शिकायतें होती रहती हैं। सालों बाद ऐसा हुआ है जब सीएम ने सीधे जांच करने के लिए कह दिया। डॉ. रमन सिंह के सीएम रहते बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ ऐसी ही एक शिकायत आई थी। तब बृजमोहन अग्रवाल पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर थे। एक कंपनी ने अग्रवाल पर डॉलर में रिश्वत मांगने की शिकायत की थी।
शिकायत को डॉ. रमन सिंह ने संज्ञान में लिया, और जांच एजेंसी से रिपोर्ट मांगी। बाद में शिकायत ही फर्जी पाई गई। मगर सवन्नी का मामला थोड़ा अलग है। क्रेडा सीएम के ऊर्जा विभाग के अधीन हैं। यहां पहले भी काफी शिकायतें होती रही हैं। मगर इस बार शिकायती पत्र को सीएम ने गंभीरता से लिया है।
सवन्नी पार्टी संगठन के पसंदीदा माने जाते हैं। उनके खिलाफ शिकायती पत्र सामने आते ही संगठन के प्रमुख नेता टूट पड़े। पार्टी ने हड़बड़ी में क्रेडा ठेकेदार-सप्लायरों का एक पत्र सार्वजनिक किया जिसमें सवन्नी के खिलाफ शिकायतों को फर्जी बताया। ठेकेदारों ने सीएम को पत्र लिखकर सवन्नी के खिलाफ को नस्तीबद्ध करने का आग्रह किया है। इस बात की संभावना है कि शिकायत नस्तीबद्ध हो जाएगी। इसकी वजह यह है कि कमीशनखोरी की शिकायत का कोई ठोस सुबूत सामने नहीं आया है। बावजूद इसके सवन्नी के खिलाफ मुद्दा, तो बन ही गया है।
हालांकि सवन्नी बंधु अपने मृदु व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। भूपेन्द्र सवन्नी को काफी मेहनती पदाधिकारी माना जाता है। वो नगरीय निकाय चुनाव के संगठन प्रभारी भी थे। पार्टी को निकाय चुनाव में अभूतपूर्व सफलता मिली है। इसका कुछ श्रेय सवन्नी को भी दिया जाता है।
बावजूद इसके सवन्नी की कार्यशैली के खिलाफ पार्टी के कई नेता मुखर रहे हैं। वो रायपुर संगठन के प्रभारी थे तब केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के सामने पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के साथ नोकझोंक हुई थी। उनके भाई महेन्द्र सिंह सवन्नी मंडी बोर्ड के एमडी हैं, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद दो बार एक्सटेंशन दिया जा चुका है। ऐसी चर्चा है कि विभागीय मंत्री रामविचार नेताम इससे सहमत नहीं रहे हैं। कुल मिलाकर भाजपा में ताकतवर सवन्नी बंधुओं के खिलाफ मोर्चा भी खुला है। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
सीधा राहुल-कनेक्शन
युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मंगलवार की देर रात घोषणा की गई। पहली बार छत्तीसगढ़ से पांच पदाधिकारी बनाए गए हैं। खास बात ये है कि नवनियुक्त पदाधिकारी में से चार तो किसी भी खेमे से नहीं जुड़े नहीं हैं, ये सीधे राहुल गांधी की टीम का हिस्सा रहे हैं।
नव नियुक्त पदाधिकारियों में से तीन तो पहले से ही युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं। इनमें दुर्ग के मोहम्मद शाहिद, राजनांदगांव के निखिल द्विवेदी, और सरगुजा की शशि सिंह हैं। शाहिद को युवक कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। वो पहले राष्ट्रीय सचिव थे। इसी तरह निखिल, और शशि सिंह भी राष्ट्रीय सचिव थे। दोनों को फिर सचिव बनाया गया है। खास बात ये है कि मोहम्मद शाहिद, और शशि सिंह युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में भी थे। दोनों का इंटरव्यू भी हुआ था।
दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री शशि सिंह को तो पार्टी ने सरगुजा लोकसभा सीट से प्रत्याशी भी बनाया था। प्रदेश से दो नए चेहरे अवंतिका तिवारी, और प्रीति मांझी को भी युवक कांग्रेस की नई टीम में जगह मिली है। अवंतिका तिवारी राष्ट्रीय सचिव, तो जीपीएम जिले की रहवासी प्रीति मांझी को संयुक्त सचिव का दायित्व सौंपा गया है। निखिल द्विवेदी को तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल कैंप का माना जाता है, लेकिन बाकी चारों किसी खेमे से नहीं हैं। कुछ लोग मानते हैं कि युवक कांग्रेस के नवनियुक्त पदाधिकारियों के मार्फत पार्टी हाईकमान की प्रदेश में पार्टी की गतिविधियों पर सीधी नजर रहेगी। देखना है कि नए पदाधिकारी क्या कुछ करते हैं।
चर्च संपत्ति पर मंडराते गिद्ध
राजधानी रायपुर के मसीही समाज की बाबर बंगले, और ग्रास मेमोरियल ग्राउंड के लीज की अवधि खत्म होने के बाद जिला प्रशासन ने अपने आधिपत्य में ले लिया है। इससे मसीही समाज में हडक़ंप मचा हुआ है, और लीज की अवधि नहीं बढ़ाए जाने पर हाईकोर्ट में याचिका दायर भी की गई है।
दोनों संपत्तियों की कीमत करीब 4 सौ करोड़ की बताई जा रही है। लीज निरस्त करने के लिए हिन्दू संगठन लगातार दबाव भी बना रहे थे। हालांकि इन संपत्तियों पर मसीही समाज के भीतर पहले भी काफी विवाद होता रहा है। दोनों संपत्ति मसीही समाज के प्रोटेस्टेंट चर्च के आधिपत्य में रही है।
बताते हैं कि बाबर बंगले, और ग्रास मेमोरियल ग्राउंड के सौदे की खबर पहले सुर्खियों में रही है। मसीही समाज के एक पदाधिकारी के मुताबिक 80 के दशक में जबलपुर डायसिस के पदाधिकारियों ने बाबर बंगले का सौदा भी कर दिया था। तब मसीही समाज के युवकों ने कानूनी लड़ाई लड़ी, और प्रदर्शन किया। इसके बाद सरकार के हस्तक्षेप के बाद बंगला बिकने से रह गया।
बाद में 1995-96 में ग्रास मेमोरियल ग्राऊंड को भी रायपुर के एक सीए परिवार को बेच दिया गया था। तब मसीही समाज की यूथ विंग के जॉन राजेश पॉल की अगुवाई में धरना हुआ, और उस समय खेल संगठन भी समाज के पक्ष में खुलकर सामने आ गए। इसके प्रतिफल यह रहा कि सौदा निरस्त हो गया। समाज से जुड़े कुछ लोग मानते हैं कि चर्च की एक कमेटी है जो कि संपत्तियों की देखरेख करती है। लीज की अवधि खत्म होने के बाद कमेटी ने लीज की अवधि बढ़ाने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की।
बड़े कारोबारियों-बिल्डरों की नजर पॉश इलाके की प्रापर्टी पर पहले से रही है। अब जब लीज निरस्त हो गया है, और प्रॉपर्टी को प्रशासन ने अधिग्रहित कर दिया है, तो इसको लेकर मसीही समाज के प्रोटेस्टेंट बिरादरी में हडक़ंप मचा हुआ है। समाज के लोग लगातार बैठकें कर रहे हैं, और प्रापर्टी पर हक छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं। विवाद आने वाले दिनों में बढ़ सकता है। मसीही समाज नन की गिरफ्तारी को लेकर भी आंदोलित है। देखना है आगे क्या होता है।
केंद्र में डीजी के लिए यहां से कोई नहीं

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 1993-94 बैच के देश भर से 35 आईपीएस अफसरों को डीजी पद के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अपनी सूची में शामिल किया है। इसे इंपैनलमेंट कहा जाता है। और भविष्य में पद रिक्त होने पर इन्हीं अफसरों में से नियुक्ति की जाती है।
ये नियुक्तियां केंद्रीय सुरक्षा बलों, सुरक्षा एजेंसियों और गृह विभाग के अन्य विभागों में होती हैं। नियुक्ति चाहे हो न हो कई अफसर अपने इंपैनलमेंट को ही तवज्जो देने से नहीं से चूकते। क्योंकि मोदी 1.0 से अब तक कोई आसानी से इंपैनल नहीं किया जा रहा। हर अफसर के पूरे सर्विस रिकार्ड की पुख्ता जांच मेरिट बेस पर ही किया जा रहा है।
वर्षों बाद इस बार छत्तीसगढ़ से एक भी अफसर को इंपैनल नहीं किया गया है। जबकि इन दोनों बैच से छत्तीसगढ़ में तीन आईपीएस अफसर उपलब्ध हैं। तीनों ही यहां डीजीपी के भी दावेदार हैं। सबसे उल्लेखनीय है कि तीनों अफसरों को इससे पहले एसपी, डीआईजी आईजी के रूप में भी प्रतिनियुक्ति पर जाने का अवसर नहीं मिला।
एक को बुलाया गया था लेकिन वे नहीं गए। एक नियम यह भी कहता है कि उपरोक्त जूनियर पद पर एक बार नियुक्त होने पर डीजी जैसे शीर्ष पद पर नियुक्ति आसान होती है। बहरहाल अब ये तीनों अफसर छत्तीसगढ़ में ही रहकर सेवानिवृत्त होंगे।
संवेदनशील मुद्दे पर टकराव
पहले उत्तर छत्तीसगढ़ के जशपुर, पत्थलगांव और सरगुजा से आदिवासी लड़कियों को रोजगार के नाम पर रांची के रास्ते देश के कोने-कोने में भेज दिया जाता था। मगर, पिछले कुछ वर्षों से बस्तर से युवाओं को, खासकर लड़कियों को ले जाया जा रहा है। दुर्ग में दो ननों को नारायणपुर की तीन आदिवासी लड़कियों को ले जाते पकड़े जाने की घटना ने राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सांसद प्रियंका गांधी, माकपा की वृंदा करात सहित कई नेताओं ने ननों को बिना सबूत गिरफ्तार करने पर आपत्ति जताई है। मोटे तौर पर इनका कहना है कि अपने वोट बैंक को ठोस करने के लिए जबरन धर्मांतरण, मतांतरण का आरोप लगाया गया और अल्पसंख्यकों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि ये लड़कियां अपने माता-पिता से मंजूरी लेकर नर्सिंग जैसे काम के लिए बाहर जा रही थीं।
मसला केवल कानूनी या धार्मिक बहस का नहीं है, बल्कि अपने सामने यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर क्यों आदिवासी इलाकों की लड़कियां परदेस में काम की तलाश में जाती हैं? क्या यह सच नहीं है कि इनके पास रोजगार, शिक्षा और बेहतर जिंदगी के अवसर बेहद सीमित हैं। इन्हें कौशल प्रशिक्षण देने का काम भी कम है। प्रशिक्षण मिल भी जाए तो प्लेसमेंट नहीं है। फिर ये बाहर जाकर कौन सा काम आखिर करेंगीं? नर्सिंग या घरेलू साफ-सफाई की नौकरी। मगर, लोभ यह है कि इसमें पैसे इतने तो मिलेंगे कि तंग हाल मां-बाप को कुछ रुपये भेज पाएंगे। बहुत पढ़े लिखे लोगों में ही नहीं, कम पढे युवाओं में भी रोजगार की स्थिति विस्फोटक होती जा रही है।
स्थिति से निपटने के लिए जरूरी है कि आदिवासी इलाकों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के मौके बढ़ाए जाएं। कुछ संगठन तब सामने आते हैं जब कथित रूप से तस्करी होने की बात सामने आती है। तब नहीं आते जब पीडि़त लडक़े-लड़कियों को रोजगार की जरूरत होती है। पुलिस पर दबाव बनाकर एफआईआर तो करा दी जाती है, जेल में डाल दिया जाता है, पर सरकार को इस बात के लिए बाध्य नहीं किया जाता कि उन्हें काम का मौका उनके अपने घर-गांव में मिल जाए।
रायपुर के दिल में बसा एक चौराहा

रायपुर की गलियों में घूमते हुए अगर आपने शास्त्री चौक पार किया हो, तो शायद ये सवाल कभी न कभी जरूर मन में उठा होगा कि ये जगह पहले कैसी रही होगी? क्या हमेशा से इसका यही नाम था? नहीं। शहर के बुज़ुर्गों से बात करने पर पता चलता है कि आज के शास्त्री चौक को कभी सिल्वर जुबली चौक कहा जाता था। ये बात 1940 के आस-पास की है, जब यहां पास ही सिल्वर जुबली अस्पताल हुआ करता था। इस अस्पताल के अंग्रेज डॉक्टर डॉ. कैली अपने सेवा-भाव के लिए जाने जाते थे। जैसे-जैसे समय बदला, अस्पताल की जगह डी.के. अस्पताल ने ली—जो दाऊ कल्याण सिंह जी द्वारा दान में दी गई जमीन पर बना। उसी के साथ चौक का नाम भी बदलकर डीके चौक पड़ गया।फिर 11 जनवरी 1966 को देश को एक गहरा झटका लगा। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का निधन हुआ। उनकी याद में चौक के बीचों-बीच एक आदमकद प्रतिमा लगाई गई और तब से इस जगह को मिला नाम शास्त्री चौक। इस प्रतिमा के पास एक सुंदर फव्वारा भी बनाया गया, जो शाम के समय रंग-बिरंगी रोशनी में चमकता था। मजे की बात ये कि गर्मियों में सिर्फ लोग ही नहीं, पास की भैंसें भी इस फव्वारे में डुबकी लगाने आ जाती थीं। फिर नगर निगम वालों की भैंस निकालने की मशक्कत देखने लायक होती थी।शास्त्री चौक सिर्फ इतिहास नहीं, संघर्षों का भी गवाह रहा है। यहां धरने हुए, आंदोलन हुए। कभी अंबेडकर अस्पताल को शुरू करवाने की मांग पर जूनियर डॉक्टर्स ने मोर्चा संभाला, तो कभी सिंधी महिला कॉलेज के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने 40 दिन की भूख हड़ताल की, दीवाली के दिन भी।समय के साथ शास्त्री जी की प्रतिमा तीन बार हटी और बदली जगहों पर लगाई गई। मगर, वजह आज तक किसी को नहीं मालूम। शास्त्री चौक, आज भी हर गुजरने वाले से एक बात कहता है- मैं सिर्फ चौराहा नहीं, रायपुर की यादों का मुकाम हूं। ( तस्वीर और विवरण-गोकुल सोनी)
जंगल महकमे में बदलाव
सीनियर आईएफएस अफसरों के प्रभार में छोटा सा बदलाव हो सकता है। पीसीसीएफ (वर्किंग प्लान) आलोक कटियार दो दिन बाद यानी 31 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। कटियार के रिटायरमेंट के साथ ही पीसीसीएफ स्तर के अफसरों के प्रभार में बदलाव होगा। यही नहीं, केन्द्र ने आईएफएस अफसरों के कैडर रिवीजन के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी है।
इस साल पीसीसीएफ स्तर के कई अफसर रिटायर हो रहे हैं। इनमें से आईएफएस के 93 बैच के अफसर रहे आलोक कटियार राज्य बनने के बाद से फारेस्ट के ताकतवर अफसरों में गिने जाते रहे हैं। ज्यादातर समय वो अलग-अलग विभागों में पोस्टेड रहे हैं।
आईएफएस का कैडर 153 से बढक़र 160 हो गया है। इससे राज्य वन सेवा के आईएफएस अवार्ड के लिए पदों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होगी। इस साल राज्य वन सेवा की अफसर निर्मला खेस्स को आईएफएस अवार्ड के लिए प्रस्ताव भेजा गया था। डीपीसी हो चुकी है लेकिन केन्द्र से आदेश जारी नहीं हो पाए हैं।
कभी इसे कहते थे सराय चौक...

यह तस्वीर रायपुर के हृदयस्थल जयस्तंभ चौक की है। एक ऐसा स्थान जो केवल एक चौक नहीं, बल्कि इतिहास, बलिदान और गौरव का प्रतीक है।
10 दिसंबर 1857 को इसी जगह पर छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह को अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाया था। देशभक्ति की इस पवित्र धरती को नमन करते हुए बाद में यहां एक जयस्तंभ का निर्माण किया गया, जिस पर आज भी गर्व से लिखा है-15 अगस्त 1947। तभी से इस चौक का नाम पड़ा जयस्तंभ चौक।
पिछली सरकार के कार्यकाल में शहीद वीर नारायण सिंह की स्मृति में उनकी प्रतिमा भी इसी चौक पर स्थापित की गई। साथ ही एक सुंदर चबूतरे का निर्माण हुआ, जो आज लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र है। वैसे रायपुर में ऐसे दो और जयस्तंभ हैं, जिनकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है... पर वो किस्से फिर कभी।
आज़ादी से पहले के समय में बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस चौक का मूल नाम सराय चौक था। बुजुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केयूर भूषण और कई अन्य पुराने रायपुरवासियों के अनुसार, उस समय जहां आज रविभवन है, वहां कभी एक सराय यानि मुसाफिरखाना (धर्मशाला) हुआ करता था। दूर-दूर से आने वाले व्यापारी, मुसाफिर और राहगीर वहीं ठहरते थे। फिर जब जयस्तंभ का निर्माण हुआ, तो यह स्थान जयस्तंभ चौक के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
यह 1960 से पहले की तस्वीर है। जहां आज गिरनार होटल है, वहां कभी रामजी बिल्डिंग हुआ करती थी। इसी बिल्डिंग के नीचे कलामंदिर और बॉम्बे डाइंग की कपड़ों की दुकान थी , जो उस समय स्टाइल और फैशन के प्रतीक माने जाते थे। ( तस्वीर और विवरण- गोकुल सोनी)
स्वच्छता सर्वेक्षण-ब्यूटी कांटेस्ट?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में छत्तीसगढ़ के बिल्हा की तारीफ की। अपनी श्रेणी में यह देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया! बिलासपुर और रायपुर भी अपनी-अपनी श्रेणियों में दूसरे और चौथे नंबर पर। दिल्ली जाकर जनप्रतिनिधि और अफसर अवार्ड ले आए लेकिन बारिश ने इन शहरों को ऐसा धोया कि सारी हकीकत सामने आ गई। जब जगह-जगह जल जमाव हुआ, नालियां सच उगलने लगीं और गलियों से होते घरों में बदबूदार पानी घुसा तो सब कीचड़-कीचड़ हो गया।
स्वच्छता सर्वेक्षण अब एक दिखावे का तमाशा बनकर रह गया है। सर्वे टीम आती है, चुनिंदा गलियों का टूर करती है, फोटो खींची जाती हैं, प्रेजेंटेशन बनते हैं, और फिर तमगे टांग दिए जाते हैं। कचरा प्रबंधन की हकीकत जाम नालियों के नीचे दबी रह जाती हैं।
बारिश के दौरान और उसके बाद आई तस्वीरों ने बता दिया कि स्वच्छता के गाड़े गए झंडे दरअसल खोखले हैं। अफसरों और नेताओं के अलावा कौन सीना ठोंक रहा है कि अपने छत्तीसगढ़ के तीन शहर सफाई में पहले, दूसरे और चौथे नंबर पर आए? सोचिए, जिन शहरों को इनसे नीचे रैंक दी गई, वहां क्या हाल होगा? उन कस्बों में शायद नालियां सालों से साफ ही नहीं हुई होंगी, कचरा डंपिंग और बारिश वहां हर साल आपदा बनकर आती होगी।
स्वच्छता सर्वेक्षण क्या कोई ब्यूटी कांटेस्ट था? जिस दिन सर्वे वाले आएं उस दिन चकाचक कर दो और अवार्ड हासिल कर लो?
दो पर कब्जा, एक पर सौदा बाकी
लगता था कि दिल्ली, नोएडा और मुंबई तक ही मीडिया का कॉरपोरेटाइजेशन सीमित है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में भी इसकी दस्तक हो चुकी है। चर्चा है कि छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय स्थानीय चैनल सीसीएन और बीसीसी को अब एक बड़े कारोबारी समूह जीटीपीएल ने खरीद लिया है। जीटीपीएल यानि गुजरात टेली लिंक प्राइवेट लिमिटेड। एक और बड़े प्रसार वाले ग्रैंड न्यूज चैनल के साथ इनका सौदा नहीं हो पाया है। जब एनडीटीवी की फंडिंग कंपनी को खरीदकर अडानी ने अपने कब्जे में लिया था तो मीडिया जगत में हाहाकार मचा था। मगर, स्थानीय चैनलों के साथ हुई यह सौदेबाजी चर्चा में ज्यादा नहीं है। जीटीपीएल ने हैथवे को भी एक सहायक कंपनी बताया है। हैथवे का नेटवर्क पूरे देश में फैला है। ग्रैंड के गुरुचरण सिंह होरा और सीसीएन के अशोक अग्रवाल दोनों ही हैथवे के जरिये ग्राहकों को चैनलों की सेवा पहुंचाते थे। दोनों के बीच लेन-देन को लेकर बड़ा विवाद भी हुआ, मामला थाना-कचहरी तक पहुंचा।
जीटीपीएल को रिलायंस इंडस्ट्रीज की सहायक कंपनी बताया गया है, जिसका स्वामित्व अंबानी के हाथ में है। ऐसी चर्चा कुछ हलकों में है कि इस नए नेटवर्क फैलाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रुचि रही।
ये स्थानीय केबल नेटवर्क चार पांच चैनल चलाते हैं, जिनमें कम से कम एक समाचारों का जरूर होता है। इन स्थानीय चैनलों के साथ कम से कम यह बात तो रही है कि वे यदि सीधे कलेक्टर या स्थानीय मंत्री पर हमला न करें तो उनके काम पर हस्तक्षेप नहीं होता है। सडक़ों, स्कूलों, अस्पतालों की दुर्दशा और नीचे के स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने में इन चैनलों की भूमिका रही है, जो सरकारों के खिलाफ जाती है। पर, अब जब गुजरात की कंपनी ने इसे खरीद लिया है तो ऐसी खबरों को कितनी जगह मिलेगी, यह देखना होगा।
अब जब जीटीपीएल ने सौदा कर लिया है तो इनमें काम करने वाले कर्मचारियों का क्या होगा? बात यह निकल रही है कि तकनीकी फील्ड में काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों को तो पुरानी सेवा शर्तों पर ले लिया गया है, लेकिन रिपोर्टर्स और एडिटर्स को खुद रेवन्यू जनरेट करने कहा गया है। इसके लिए विज्ञापनों का एक हिस्सा उनके हाथ आएगा। न केवल न्यूज चैनल के विज्ञापन बल्कि अन्य चैनल जो गाने और फिल्मों के हैं, उनमें भी मिलने वाले विज्ञापन। इसका अभी प्रबंधन बाकी है। रायपुर, बिलासपुर, भिलाई जैसे शहरों से मिलने वाले रेवन्यू का आकलन किया जा रहा है। इसे देखने के लिए एक प्रबंधक भी होगा। जीटीपीएल की असल दिलचस्पी न्यूज नेटवर्क पर बताई जा रही है, जिसका उसी तरह इस्तेमाल होगा, जैसा सेटेलाइट और केबल के जरिये चलने वाले न्यूज चैनलों का होता है।
संगठन में नए चेहरे
भाजपा में हफ्ते-दस दिन के भीतर संगठन, और सरकार में पद बंट सकते हैं। प्रदेश भाजपा संगठन के पदाधिकारियों की सूची लगभग तैयार हो गई है। इससे परे निगम-मंडलों में उपाध्यक्ष, और सदस्य मिलाकर 50 से अधिक नियुक्तियां होंगी।
चर्चा है कि पार्टी ने संगठन में नए चेहरों को अहम जिम्मेदारी देने का मन बनाया है। पार्टी पदाधिकारियों के चयन में सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखा है। कांग्रेस में तो जिला अध्यक्ष, और अन्य पदों पर अजा-अजजा, और पिछड़ा वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक तरह से आरक्षण लागू कर रही है। मगर भाजपा में ये काम नियम बनाए बिना चुपचाप हो रहा है।
चर्चा है कि भाजपा ने पदाधिकारियों की नियुक्ति में क्षेत्रीय संतुलन को भी ध्यान में रखा है। महामंत्री पद के लिए जिन नामों पर मुहर लगने की चर्चा है, उनमें पूर्व विधायक रजनेश ंिसंह, पूर्व विधायक नवीन मारकंडेय, भरतलाल वर्मा और अंबिकापुर के अखिलेश सोनी का नाम हैं।
कुछ सीनियर नेताओं को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है। ये वो नेता हैं जो कि पहले जिलाध्यक्ष या अहम पदों पर रहे हैं। स्पीकर डॉ. रमन सिंह के पुत्र पूर्व सांसद अभिषेक सिंह को भी अहम जिम्मेदारी मिलने के संकेत हैं। हालांकि इस पर फैसला होना बाकी है। कई मौजूदा पदाधिकारियों को निगम-मंडलों में एडजस्ट किया जा सकता है। कुल मिलाकर पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं को आगे लाने की मंशा है। ज्यादातर पदाधिकारी 55 वर्ष से कम आयु के होंगे। देखना है किसको क्या कुछ मिलता है।
रवि भगत की राजनीति
डीएमएफ के मसले पर अपनी ही पार्टी के नेता, और सरकार के मंत्री ओपी चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलना प्रदेश भाजयुमो अध्यक्ष रवि भगत को भारी पड़ गया। उन पर पार्टी से निष्कासन की तलवार लटकी है। पार्टी ने उन्हें सात दिन के भीतर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। चर्चा है कि रवि भगत पिछले कुछ समय से नाराज चल रहे हैं। नाराजगी की एक प्रमुख वजह ये बताई जा रही है कि वो अपनी पत्नी को जिला पंचायत उपाध्यक्ष बनवा चाह रहे थे। मगर पार्टी इसके लिए तैयार नहीं हुई। रायगढ़ जिला पंचायत उपाध्यक्ष पद पर पार्टी ने दीपक सिदार का नाम तय किया, जो कि भगत के ही इलाके लैलूंगा से ही आते हैं। कहा जा रहा है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों ही वित्त मंत्री ओपी चौधरी की पसंद पर तय किए गए थे। इसके बाद से भगत नाराज चल रहे थे। और जब डीएमएफ के खर्चों को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी की, तो पार्टी ने सख्ती दिखाई है।
इधर, रवि भगत की नाराजगी को कांग्रेस अवसर के रूप में देख रही है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने उनकी नाराजगी को वाजिब ठहराया है, और समर्थन किया है। कांग्रेस के कुछ पदाधिकारी, रवि भगत से मिलने उनके लैलूंगा स्थित घर भी गए थे। हल्ला है कि रवि भगत किसी तरह की कार्रवाई होने की दशा में कांग्रेस की तरफ रुख कर सकते हैं। मगर कुछ लोग उनकी पृष्ठभूमि को देखकर कांग्रेस में जाएंगे, इसकी संभावना कम देखते हैं।
रवि भगत संघ परिवार से जुड़े हैं। वो अखिल भारतीय परिषद के राष्ट्रीय पदाधिकारी रह चुके हैं। धर्मांतरण आदि के मसले पर काफी मुखर रहे हैं। उनकी सोच कांग्रेस से मेल खाती नहीं दिखती है। फिर भी कभी प्रदेश भाजपा के आधार स्तंभ में रहे नंदकुमार साय पार्टी छोड़ सकते हैं, तो रवि भगत भी ऐसा कर सकते हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
सेंट्रल आईएएस एसो. में 36गढ़

केंद्रीय विभागों में कार्यरत आईएएस अफसरों के संगठन सेंट्रल आईएएस एसोसिएशन के दो दिन पहले चुनाव हुए। गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के अफसरों के दबदबे वाले इस संगठन के अध्यक्ष तमिलनाडु कैडर के वरिष्ठतम अफसर एस कृष्णन अध्यक्ष चुने गए। दिग्गज अफसरों के बीच से एक नाम पर सहमति बड़ा कठिन था। और नए अध्यक्ष ने अपनी कार्यकारिणी के 18 सदस्यों का चयन भी किया। इस बार इसमें छत्तीसगढ़ को भी स्थान मिला है। नौ कार्यकारिणी सदस्यों में 04 बैच के आईएएस प्रसन्ना आर भी शामिल किए गए हैं। प्रसन्ना कुछ महीने पहले ही गृह मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर गए हैं ।
वे दिल्ली जाने से पहले छत्तीसगढ़ आईएएस एसोसिएशन के भी सचिव रहे हैं। इस चुनाव से जुड़े अफसरों का कहना है कि करीब एक दशक बाद सेंट्रल एसोसिएशन में छत्तीसगढ़ को यह अवसर मिला है। यह संगठन राज्यों के संगठनों की तरह प्रो गवर्नमेंट नहीं माना जाता। इसका अपना एक दबदबा रूतबा है। इसलिए इन वरिष्ठ अधिकारियों का चुनाव भारतीय नौकरशाही को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने का संकेत देता है।
एसोसिएशन की विभिन्न बैचों और राज्य संवर्गों के अधिकारियों की चिंताओं, कल्याण और व्यावसायिक विकास को संबोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। नवनिर्वाचित नेतृत्व संवर्ग से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाएगा, नीतिगत चर्चाओं में शामिल होगा और अपने सदस्यों के बीच सामुदायिक भावना को बढ़ावा देगा।
राजधानी रायपुर: बुलेट के हॉर्सपावर के साथ बददिमाग़ी भी आ जाती है। मोटरसाइकिल पर ब्लैकलिस्टेड लिखवाने की फ़ुरसत है, लाडो लिखवाने की फुरसत है, लेकिन नंबरप्लेट की जगह सिर्फ 46 लिखवाकर ताकत दिखाई जा रही है।

तस्वीर/ छत्तीसगढ़/ जय गोस्वामी
भूपेश सरकार ने खुदकुशी की थी?
पूर्व सीएम भूपेश बघेल का जोगी परिवार से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। और अंतागढ़ प्रकरण के बाद भूपेश की वजह से ही पूर्व सीएम अजीत जोगी, और उनके बेटे अमित को कांग्रेस से बाहर निकलना पड़ा। और अब जब अमित तो किसी तरह कांग्रेस में वापसी की कोशिश कर रहे हैं, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल रोड़ा बनते दिख रहे हैं। अमित ने तो चैतन्य की गिरफ्तारी के खिलाफ बयान जारी कर भूपेश के साथ एक तरह से पुराने विवाद को खत्म करने के लिए पहल की, लेकिन भूपेश का रुख सकारात्मक नहीं दिख रहा है। भूपेश बघेल की हाल की एक टिप्पणी पर तो अमित जोगी खासे नाराज हैं।
हुआ यूं कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने हरेली के मौके पर अपने निवास में कार्यकर्ताओं को संबोधित कर कहा था कि जिसने भी उनके परिवार को गिरफ्तार किया है, उसकी सरकार गिर गई। भूपेश ने जोगी सरकार का उदाहरण दिया, और कहा कि उनके पिता को तत्कालीन सीएम अजीत जोगी ने गिरफ्तार कराया था। जोगी सरकार चली गई। उन्होंने रमन सरकार का भी उदाहरण दिया। उस समय भी परिवार के लोगों को गिरफ्तार किया गया था, इसके बाद रमन सिंह की सरकार चली गई। पूर्व सीएम ने आगे कहा कि चैतन्य को गिरफ्तार करने वाली साय सरकार का भी यही हाल होगा।
भूपेश बघेल के बयान पर अमित जोगी बिफर पड़े हैं। उन्होंने पूर्व सीएम को नसीहत दी कि स्व. अजीत जोगी, और स्व. नंदकुमार बघेल, दोनों हमारे बीच में नहीं हैं। उनके नाम को राजनीतिक हथियार बनाना अनुचित है। उन्होंने याद दिलाया कि नंदकुमार बघेल जी, खुद भूपेश बघेल के सीएम रहते गिरफ्तार हुए थे। अमित ने पूछा कि पूर्व सीएम ने इस पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया।
उल्लेखनीय है कि नंदकुमार बघेल को ब्राम्हण समाज के खिलाफ विवादित बयान देने के आरोप में सितंबर-2021 को रायपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तीन दिन जेल में रहने के बाद तत्कालीन सीएम भूपेश बघेल के पिता जमानत पर रिहा हुए थे। यह भी संयोग है कि खुद भूपेश सरकार की भी वापसी नहीं हो पाई।
आ बैल मुझे मार
पूर्व राज्यपाल रमेश बैस को उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाने की मांग करना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को भारी पड़ गया। बैज ने इस सिलसिले में पीएम को बकायदा चि_ी भी लिखी थी। प्रदेश के कई नेताओं ने बैज की शिकायत पार्टी हाईकमान से की थी, और फिर प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने फोन पर बैज को फटकार लगाई। इसके बाद बैज को सफाई देनी पड़ी है।
बैज ने जिस अंदाज में अपनी मांग को लेकर सफाई दी है, उससे भाजपा के कुछ नेताओं का पारा चढ़ गया है। बैज ने कहा कि पूर्व राज्यपाल रमेश बैस, ननकीराम कंवर, और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को भाजपा ने मार्गदर्शक मंडल में ढकेल दिया गया है। इसलिए उन्हें दिल्ली भेजना उचित रहेगा। चंद्राकर पार्टी के मुख्य प्रवक्ता हैं, और सीनियर विधायक हैं। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने बस्तर लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उनकी पीठ थपथपाई थी। अब जब बैज ने चंद्राकर को दिल्ली भेजने की वकालत कर दी है, तो विवाद बढऩा स्वाभाविक है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बैज ने उड़ता तीर अपने पर ले लिया है।
इसे कहते हैं ग्राउंड रिपोर्टिंग

कुछ दिन पहले दिल्ली के एक न्यूज चैनल रिपोर्टर ने गले तक पानी में डूबकर न्यूज कवर किया था और बताया था कि बारिश के बाद सडक़ों का क्या हाल हो गया है। मगर, छत्तीसगढ़ में भी कम साहसी पत्रकार नहीं है। यह दृश्य धमतरी मुख्य मार्ग का है जिसके गड्ढे की गहराई और कीचड़ की परवाह नहीं करते हुए एक रिपोर्टर पालथी मारे बैठे हैं, अपनी जिम्मेदारी निभा रहे है। इंस्टाग्राम पर उनका वीडियो वायरल है। वैसे हाल ही में नगरीय प्रशासन मंत्री ने सडक़ों के गड्ढों को लेकर अफसरों को फटकार लगाई है। उन्हें चेतावनी दी है कि दो माह के बाद सडक़ में में कोई गड्ढा दिखा तो उनकी खैर नहीं। मगर, तब तक तो मॉनसून जा चुका होगा। यानि, इस बारिश में गड्ढे भरने से तो रहे। अफसरों के लिए यही चैन की बात है। वैसे भी बारिश में सडक़ का काम तो हो नहीं पाता। मटेरियल मिलता नहीं, मिलता है तो डालते ही बह जाता है। इसलिए बिना यह सवाल किए, कि बारिश से पहले इन सडक़ों की देखभाल क्यों नहीं की गई, मरम्मत क्यों नहीं हो पाई, पिछले साल का बजट कहां चला गया- अक्टूबर महीने का इंतजार करना चाहिए। शायद तब वह सडक़ सन् 2026 की बारिश तक टिकी रहे।
27 जुलाई : विश्व निशानेबाजी के नक्शे पर जसपाल राणा का पहला स्वर्णिम हस्ताक्षर
नयी दिल्ली, 27 जुलाई। देश के निशानेबाजी के इतिहास में 27 जुलाई का दिन एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब जसपाल राणा ने इटली के मिलान शहर में 1994 में 46वीं विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप के जूनियर वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया। उन्होंने रिकॉर्ड स्कोर (569/600) बनाकर तहलका मचा दिया।
विश्व निशानेबाजी के नक्शे पर जसपाल राणा का यह पहला स्वर्णिम हस्ताक्षर था। उन्होंने इसके बाद बहुत-सी सफलताएं हासिल कर देश का नाम रोशन किया, लेकिन उनका यह पहला सुनहरा कदम हमेशा यादगार रहेगा।
देश-दुनिया के इतिहास में 27 जुलाई की तारीख पर दर्ज अन्य महतवपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है।
- 1789 : पहली संघीय एजेंसी ‘द डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेन अफेयर्स’ की स्थापना।
- 1862 : अमेरिकी शहर कैंटन में तूफान का कहर, 40 हजार लोगों की मौत।
- 1888 : फिलिप प्राट ने पहले इलेक्ट्रिक ऑटोमोबाइल का प्रदर्शन किया।
- 1897 : बाल गंगाधर तिलक को पहली बार गिरफ्तार किया गया।
- 1935 : चीन की यांग जी और होआंग नदी में बाढ़ से दो लाख लोगों की मौत।
- 1982 : तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लगभग 11 साल में पहली अमेरिकी यात्रा।
- 1987 : खोजकर्ताओं ने टाइटैनिक का मलबा खोजा।
- 1994 : निशानेबाज जसपाल राणा ने विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।
- 1996 : अमेरिका के जॉर्जिया प्रांत के अटलांटा शहर में आयोजित ओलंपिक खेलों के रंगारंग कार्यक्रम के दौरान बम धमाका।
- 2003 : प्रसिद्ध हास्य कलाकार बॉब होप का निधन।
- 2006 : रूसी प्रक्षेपण यान नेपर धरती पर गिरा।
- 2024: इजराइल ने गाजा के स्कूल पर हवाई हमले किये, बच्चों समेत 30 लोगों की मौत।
- 2024: कमला हैरिस ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए आधिकारिक तौर पर उम्मीदवारी की घोषणा की। (भाषा)
खाली कुलपति-कुर्सियां, और बोली!!
छत्तीसगढ़ से कुल 11 सरकारी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर स्थानीय, और बाहरी का विवाद छिड़ रहा है। दो दिन पहले एक और विवि, पंडित सुंदरलाल शर्मा (मुक्त) विवि में प्रो. डॉ. विरेन्द्र कुमार सारस्वत को कुलपति बनाया गया, जो कि आगरा विवि के प्रोफेसर हैं। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ के सरकारी विवि में जितनी भी नियुक्तियां हो रही है, उनमें प्रदेश के बाहर के शिक्षकों को कुलपति बनाकर लाया गया है।
ज्यादातर विवि में छत्तीसगढ़ के बाहर के प्रोफेसर कुलपति के पद पर काबिज हैं। रायपुर के रविशंकर विवि में यूपी के शिक्षक डॉ. सच्चिदानंद शुक्ला, बिलासपुर विवि में भी यूपी के डॉ. एडीएन वाजपेयी, खैरागढ़ संगीत विवि की कुलपति प्रो. लवली शर्मा भी यूपी के आगरा विवि से आई हैं। बस्तर विवि में कुलपति प्रो. मनोज कुमार श्रीवास्तव, और रायगढ़ विवि के कुलपति डॉ. ललित प्रकाश पटेरिया भी छत्तीसगढ़ के बाहर के हैं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, विवेकानंद तकनीकी विवि, और गाहिरा गुरू विवि अंबिकापुर में कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है।
सरकारी विवि में स्थानीय शिक्षकों की दावेदारी को नजर अंदाज कर बाहर से नियुक्तियों पर सवाल उठ रहे हैं। पहले भी विशेषकर कुलपतियों की नियुक्ति में स्थानीय व बाहरी का विवाद सुर्खियों में रहा है। कांग्रेस सरकार के समय राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने तो सीएम भूपेश बघेल पर स्थानीय के नाम पर समाज विशेष से कुलपति की अनुशंसा करने का आरोप लगा दिया था।
सरकार बदलने के बाद भी स्थिति बदली नहीं है। खैरागढ़ में तो विवि के कर्मचारियों ने कुलपति के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। खैरागढ़ विवि की कुलपति प्रो. लवली शर्मा पर पहले ही कई आरोप लगे हैं। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने तो बस्तर विवि के कुलपति पर भर्ती में गड़बड़ी का आरोप विधानसभा में लगाया था।
खास बात यह है कि विवि के कुलपतियों की नियुक्तियों में लेनदेन का भी हल्ला है। ऐसी चर्चा है कि विवेकानंद तकनीकी विवि के कुलपति पद के लिए एक सीआर से अधिक की बोली लगाई गई है। इन चर्चाओं में कितना दम है यह तो पता नहीं, लेकिन बाहर के विवादित शिक्षकों को कुलपति बनाया जाएगा, तो सवाल तो उठेंगे ही। वैसे कुलाधिपति अब इस बात पर जोर देने लगे हैं कि प्रदेश के प्रोफेसर कुलपति बन सकें।
चेतावनी की जुबान में धोखा है

पूंजी बाजार से लोग अभी बहुत रफ्तार से रकम निकाल रहे थे, तो म्युचुअल फंड चलाने वालों ने खूब इश्तहार करके लोगों को इससे रोकने की कोशिश की। बीबीसी के अंग्रेजी वल्र्ड न्यूज पॉडकास्ट में भारत के म्युचुअलफंडसहीहैडॉटकॉम की तरफ से एक-एक इश्तहार को लगातार तीन-तीन, चार-चार बार सुनाया जाता था। अब दो दिन पहले एक अखबार में म्युचुअल फंड में पूंजीनिवेश जारी रखने का हौसला देने वाला एक इश्तहार छपवाया गया, तो उसमें जितनी चेतावनी थी, वह हिन्दी इश्तहार में भी अंग्रेजी में छपवाई गई। जब कभी किसी इश्तहार में चेतावनी को छुपाना रहता है, तो वह दूसरी भाषा में दे दिया जाता है, और देश-प्रदेश की जिन संवैधानिक संस्थाओं को ऐसी तिकड़म पर नजर रखनी चाहिए, वे मानो ऐसे इश्तहारबाजों के दिए हुए नर्म गद्दों पर सोती रहती हैं।
खेत सरीखा बैंक

लोगों को हथियारों का शौक इतना अधिक दिखता है कि अभी राजधानी रायपुर में हमारे अखबार के दफ्तर के सामने खड़ी एक नई चमचमाती गाड़ी पर मशीनगन, और रिवाल्वर दोनों के फोटो लगे हुए दिखे। सामने एक नोटिस भी लगा था कि यह गाड़ी अतिआवश्यक बैंक कार्य में लगी हुई है। गाड़ी इतनी नई थी कि सजावट की रिबन तक नहीं निकली थी, लेकिन ऐसे हथियारों की तस्वीरें सज गई थीं, जिनका इस्तेमाल बैंक सुरक्षा की ड्यूटी गार्ड नहीं करते। लेकिन इतनी बारीकी को न जानने वाले लुटेरे हो सकता है कि इन तस्वीरों से ही डर जाएं, फिर चाहे भीतर मामूली बंदूक लिया हुआ गार्ड भी न हो। जिस तरह खेतों में पंछियों को दूर रखने के लिए इंसानी कपड़े पहानकर पुतला लगा दिया जाता है, उसी तरह बैंक की गाड़ी पर भारी-भरकम ऑटोमेटिक हथियार की फोटो लगा दी गई है। न वहां खेत में खम्भे पर टंगा इंसान होता, और न यहां ऐसे हथियार हैं।
दिल्ली दौरा और फेरबदल
सीएम विष्णुदेव साय 30, और 31 तारीख को दिल्ली में रहेंगे। संसद सत्र के बीच सीएम की केन्द्रीय मंत्रियों के साथ बैठक भी है। सीएम के दिल्ली दौरे की खबर से पार्टी के अंदरखाने में हलचल है। कई लोग सीएम के दिल्ली दौरे को कैबिनेट विस्तार से भी जोडक़र देख रहे हैं। इससे पहले भी उनके दिल्ली प्रवास पर कैबिनेट फेरबदल की अटकलें लगाई जाती रही हैं। इन चर्चाओं से पार्टी के वो सीनियर विधायक परेशान हैं, जिनका नाम संभावित मंत्रियों के रूप में मीडिया में उछलते रहा है।
पार्टी के एक पूर्व मंत्री ने कुछ लोगों के बीच दर्द बयां करते हुए कहा कि आम तौर पर 20-30 लोग ही मिलने के लिए आते हैं। मगर जैसे ही मीडिया में कैबिनेट विस्तार की खबर उड़ती है, अगले दिन मुलाकातियों की संख्या बढक़र सौ-डेढ़ सौ तक पहुंच जाती है। यही हाल कमोबेश सभी सीनियर विधायकों का है।
वैसे भी भाजपा में इस बार सीनियर विधायक ज्यादा संख्या में जीतकर आए हैं, जो पहले भी मंत्री रहे हैं। इनमें अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, विक्रम उसेंडी, लता उसेंडी, और राजेश मूणत हैं। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष रह चुके धरमलाल कौशिक को मंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार माना जाता है। पद तो दो खाली हैं, लेकिन दावेदारों की संख्या अधिक होने के कारण पार्टी में काफी कुछ बातें होते रहती है। एक-दो पूर्व मंत्रियों ने तो संभावित मंत्री के रूप में बधाई देने वालों को झिडक़ भी दिया है। अब जब सीएम दिल्ली जा रहे हैं, तो भले ही कैबिनेट को लेकर हाईकमान से कोई चर्चा न हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पर बात होते रहेगी। और यह तब तक जारी रहेगा, जब तक कैबिनेट विस्तार नहीं हो जाता।
इन दो गांवों ने बदल दी विकास की परिभाषा
अपने बीच अक्सर यह सोच हावी रहती है कि अगर आदिवासी इलाकों में उद्योग लगा दिए जाएं, खनिज निकाल लिए जाएं या पर्यटन उद्योग को कंपनियों के हवाले कर दिया जाए, तो वहां के लोग विकास करेंगे। लेकिन तिरिया और इससे पहले धुड़मारास गांव ने इस सोच को पूरी तरह से गलत साबित किया है।
बस्तर के इन दोनों गांवों ने दिखाया है कि विकास का असली मतलब होता है-अपनी जमीन, जंगल, संस्कृति और जीवनशैली को बचाते हुए आगे बढऩा। तिरिया गांव की ग्रामसभा ने 3,057 हेक्टेयर वनभूमि पर सामुदायिक वन अधिकार लेकर उसे खुद संभालने का फैसला किया। उन्होंने जंगल की रक्षा की, अवैध कटाई पर रोक लगाई, पारंपरिक ज्ञान के सहारे वन प्रबंधन की एक मिसाल कायम की।
जंगल बचाने के साथ-साथ यह आजीविका और आत्मनिर्भरता की भी कहानी है। तिरिया ने लघु वनोपज को संगठित तरीके से जुटाना और बेचना शुरू किया, इको-टूरिज्म मॉडल खड़ा किया, जिससे गांव को रोजगार भी मिला और बाहरी दुनिया को बस्तर की संस्कृति से जुडऩे का मौका भी। यहां की बंबू राफ्टिंग का आनंद ही अलग है।
याद होगा, बीते साल धुड़मारास गांव को भी संयुक्त राष्ट्र ने इसी तरह के टिकाऊ पर्यटन मॉडल के लिए सम्मानित किया था। इन गांवों ने दुनिया को यह बताया है कि आदिवासी समाज का विकास मॉडल राजनेताओं, वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों की सोच से कहीं ऊंचा है।
जब सरकारें बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के साथ मिलकर आदिवासी इलाकों को विकास के नाम पर खाली कराना चाहती हैं, तब तिरिया और धुड़मारास जैसे गांव उम्मीद की किरण बनकर सामने आए हैं। क्या सरकारें इनसे सीख लेगी, और इन पर अपनी योजनाएं थोपना बंद करेंगी?
आबकारी घोटाले में रियायत?

आबकारी घोटाले की ईओडब्ल्यू-एसीबी, और ईडी पड़ताल कर रही है। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने 23 आबकारी अफसरों पर एफआईआर किया है। सरकार ने इन सभी को सस्पेंड कर दिया है। यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में एक साथ अफसरों को सस्पेंड किया गया है। मगर घोटाले के खिलाफ मुहिम चला रहे भाजपा के ही कुछ नेता इससे संतुष्ट नहीं हैं।
चर्चा है कि एक नेता ने तो बकायदा पीएमओ को चि_ी तक लिख दी है। चि_ी में यह बताया गया कि दो आबकारी अफसरों को छोड़ दिया गया है। जबकि घोटाले में उनकी भी संलिप्तता रही है। एक अफसर तो पिछली सरकार में आबकारी उडऩदस्ता के प्रभारी भी थे।
ईओडब्ल्यू-एसीबी से परे ईडी की जांच तेजी से चल रही है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र को तो ईडी गिरफ्तार कर चुकी है। कुछ, और लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी है। चर्चा है कि दुर्ग-भिलाई के तीन, और कारोबारियों को ईडी ने नोटिस जारी किया है। ये सभी घोटाले की राशि को इधर-उधर करने में भूमिका निभाते रहे हैं। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।
नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...

पचपेड़ी नाका के नामकरण का विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है। रायपुर नगर निगम ने पार्षद अमर गिदवानी की सिफारिश पर पचपेड़ी नाका का नाम संत गोदड़ी बाबा के नाम करने की अनुशंसा की थी। स्थानीय विरोध के बाद नामकरण प्रस्ताव को वापस भी ले लिया गया था। मगर कुछ संगठनों ने सिंधी समाज के खिलाफ अभियान चलाया, तो मामला पुलिस तक पहुंच गया।
सिंधी समाज के प्रमुख नेता पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी, चैम्बर अध्यक्ष सतीश थौरानी, पूर्व अध्यक्ष अमर पारवानी की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल ने दो दिन पहले एसएसपी लाल उम्मेद सिंह से मुलाकात की। सिंधी नेताओं ने आरोप लगाया कि सिंधी समाज के संतों, और महापुरुषों पर अशोभनीय टिप्पणी की जा रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के पदाधिकारी अमित बघेल के खिलाफ लिखित में शिकायत भी की। कुछ वीडियो भी दिए हैं। मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
अमित सोशल मीडिया में नाम बदलने के प्रस्ताव के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं। एसएसपी ने सिंधी नेताओं को आश्वासन तो दिया है कि जांच कर कार्रवाई की जाएगी। मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं होने से सिंधी समाज के नेता नाखुश हैं। सुंदरानी जैसे नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर ज्यादा है कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार होने के बावजूद कार्रवाई में देरी हो रही है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
25 जुलाई : पहले टेस्ट ट्यूब शिशु का जन्म
नयी दिल्ली, 25 जुलाई। दुनिया के इतिहास में 25 जुलाई की तारीख पर विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि दर्ज है। दरअसल इसी दिन पहले टेस्ट ट्यूब शिशु का जन्म हुआ था। इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में 1978 में दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुई ब्राउन का जन्म हुआ। लगभग ढाई किलोग्राम वजन के लुई ब्राउन मध्यरात्रि के बाद सरकारी अस्पताल में पैदा हुए।
यह प्रणाली दुनियाभर के नि:संतान दंपतियों के लिए एक वरदान साबित हुई और लुई के जन्म की खबर फैलते ही अकेले ब्रिटेन के ही लगभग 5000 दंपती ने इस नयी प्रणाली के जरिए संतान प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की। आज यह पद्धति भारत समेत दुनियाभर में प्रचलित है और हर दिन हजारों महिलाएं इसके जरिए गर्भ धारण कर रही हैं। यह जान लेना दिलचस्प होगा कि इसके बाद आईवीएफ तकनीक की सफलता की याद में हर साल आईवीएफ तकनीक से जन्मे लुई जॉय ब्राउन के जन्मदिन यानी 25 जुलाई को ‘वर्ल्ड एंब्रियोलॉजिस्ट डे’ के रूप में मनाया जाता है।
देश-दुनिया के इतिहास में 25 जुलाई की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:-
- 1689 : फ्रांस ने इंग्लैंड के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।
- 1813 : भारत में पहली बार नौका दौड़ प्रतियोगिता कलकत्ता में आयोजित।
- 1837 : इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ के इस्तेमाल का पहली बार सफलतापूर्वक प्रदर्शन।
- 1943 : इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ने सत्ता छोड़ी, जिसके बाद राजा विक्टर इमैनुएल ने मार्शल पायत्रो बादोग्लिओ को नया प्रधानमंत्री बनाया।
- 1948 : आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने भारतीय टीम के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल कर रिकॉर्ड बनाया।
- 1963 : अमेरिका, रूस और ब्रिटेन ने परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए।
- 1978 : दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुई ब्राउन का इंग्लैंड के ओल्डहैम शहर में जन्म।
- 1994 : जॉर्डन और इजराइल के बीच 46 वर्ष से चल रहा युद्ध समाप्त।
- 2000 : एयर फ्रांस का एक कॉनकार्ड विमान उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त होकर एक होटल पर गिरा। हादसे में 109 विमान यात्रियों के अलावा होटल में मौजूद चार लोग भी जान गंवा बैठे।
- 2007 : प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
- 2020 : भारत में कोविड-19 के मामले 13 लाख के पार, मृतकों की संख्या 31,358 हुई।
- 2021 : क्रोएशिया में सड़क दुर्घटना में 10 लोगों की मौत, 45 घायल।
- 2022 : द्रौपदी मुर्मू ने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वह जनजातीय समुदाय से आने वाली देश की पहली राष्ट्राध्यक्ष और इस शीर्ष संवैधानिक पद को ग्रहण करने वाली दूसरी महिला हैं
- 2023 : भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा की कक्षा में ऊपर उठाने की पांचवीं कवायद सफलतापूर्वक पूरी की। (भाषा)
कुर्सी है ही ऐसी, कहीं छूटती नहीं
अन्नदाता जब खेत में उतरता है, तो न धूप की परवाह करता है, ना बारिश की। न खाल झुलसने का डर, न कीचड़ में सन जाने की चिंता। उसके लिए खेत ही कर्मभूमि है, जहां वक्त पर बोनी, रोपाई, निंदाई करना आजीविका की शर्त है। तभी जाकर फसल पकती है और हम सबका पेट भरता है।
छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंत्री और विधायक खुद को किसान बताते हैं। यह बात कागज पर तो दर्ज है ही, चुनावी हलफनामों में भी है। पर जैसे ही कुर्सी मिलती है, लगता है खेतों से रिश्ता छूट जाता है।
महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की यह तस्वीर भी कुछ ऐसा ही किस्सा बयान कर रही है। खेत में कुर्सी लगाकर आरामदायक रोपाई करती दिख रहीं मंत्री जी ने शायद यह तय किया था कि कैमरे में खेत में काम करने का लुक आना चाहिए, मेहनत नहीं।
रोपाई कोई आरामकुर्सी पर बैठकर चाय पीने जैसा काम नहीं है। मगर मंत्री जी ने कुर्सी लगाई, हाथ में रोपा लिया, कैमरे की क्लिक हुई, और किसान दिखने की प्रक्रिया पूरी हो गई। विपक्ष-समर्थक और सत्ता के बड़े नेता खेत में उतरकर फोटो खिंचवा रहे हैं, तो उन्होंने भी सोचा होगा कि पीछे क्यों रहा जाए।
मगर, यह तस्वीर बता रही है कि वह जमीन से नहीं जुड़ी रह पाई। कुर्सी मंत्री को खूब भली लगने लगी है। जब कीचड़ भरे खेत में उतरने की मजबूरी हो तब भी।
नेताओं की खेती

प्रदेश में अच्छी बारिश के बाद गांवों में धान की रोपाई रफ्तार चल रही है। भाजपा, और कांग्रेस के कई नेताओं की खेत में रोपा लगाते तस्वीर वायरल हो रही है। इनमें महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े तो कुर्सी पर बैठकर रोपाई करते ट्रोल हो गईं।
दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, और गृहमंत्री रहते ननकीराम कंवर की खेती-किसानी करते तस्वीर सुर्खियों में रही हैं। ये नेता राजनीति में व्यस्तता के बाद भी समय निकालकर किसानी का काम करते रहे हैं। खुज्जी की पूर्व विधायक छन्नी साहू, तो मनरेगा मजदूर रहीं हैं, और विधायक बनने के बाद भी वो समय निकालकर खेतों में काम करने चली जाती थीं। पिछले दिनों सामरी की विधायक उद्देश्वरी पैकरा की अपने गृह ग्राम भगवतपुर में रोपा लगाते तस्वीर वायरल हुई, तो बाकी नेताओं मेें भी ऐसा करने की होड़ मच गई।
उद्देश्वरी के पति सिद्धनाथ पैकरा दो बार विधायक रहे हैं। उद्देश्वरी भी विधायक बनने से पहले भी अपने खेतों में मजदूरों के साथ काम करती रही हैं। और जब महिला मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की तस्वीर वायरल हुई, तो कई लोगों ने उनके बारे में जानकारी जुटाई। यह पता चला कि लक्ष्मी घरेलू महिला रही हैं, और विधायक बनने से पहले जिला पंचायत की सदस्य रही हंै। उन्हें खेतों में उतर कर काम करने का कोई अनुभव नहीं रहा है। उनके पति का ईंटभ_े का व्यवसाय है, और पंचायत सचिव भी थे। स्वाभाविक है कि लक्ष्मी को बैठकर रोपा लगाने में दिक्कत महसूस हुई, तो उन्होंने कुर्सी मंगवा ली। बस फिर क्या था। सोशल मीडिया में लोग चुटकियां लेते नजर आए।
कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने खेत में काम करते राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम, और लक्ष्मी राजवाड़े की तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट किया, और अंतर बताने की कोशिश की। फूलोदेवी बिना कुर्सी के रोपा लगाते नजर आ रही हैं। कांग्रेस तो सत्ता में नहीं है, ऐसे में फुलो देवी का बिना कुर्सी के रोपा लगाते फोटो खिंचवाना गलत भी नहीं है।
कलेक्टर कॉन्फ्रेंस और फेरबदल
विधानसभा का मानसून सत्र से पहले सरकार ने एक बड़ी खेप में मैदानी अमले को इधर उधर कर दिया था। और अब सत्र निपटते ही राज्य प्रशासन में फेरबदल की खबरें आ रही है। इस बार बारी आईएएस, आईपीएस आईएफएस की होगी। लेकिन यह फेरबदल अभी नहीं कलेक्टर कॉन्फ्रेंस के बाद ही होने के संकेत हैं।
सीएम ने कल ही एक बैठक में कॉन्फ्रेंस आयोजित करने अपने सचिवों को निर्देशित किया है। इसमें बजट के बाद से कलेक्टरों और फिर सत्र में मंत्रियों के जरिए उनके सचिवों के परफार्मेंस का भी आकलन हो जाएगा। कुछ सचिव दोहरे तिहरे प्रभार में भी है। इतना ही नहीं नए निगम मंडल अध्यक्षों की भी अपने एमडी से पटरी नहीं बैठ रही।
कुछ ने तो नए नाम भी सरकार तक पहुंचा दिए हैं। इसी दौरान जिले वार कानून व्यवस्था की भी समीक्षा होनी स्वाभाविक है और एसपी आईजी भी बदले जाएंगे। इसे देखते हुए हाल में पदोन्नत की हरी झंडी हासिल करने वाले रापुसे के तीस अफसर भी जोड़ तोड़ में लग गए हैं। बड़े न सही छोटे जिलों में एसपी तो बन ही सकते हैं।
हाथी की सूंड में, मासूम की चीख
रायगढ़ सहित छत्तीसगढ़ के जिन जिलों को वन संपदा का वरदान मिला था, वहां अब यह शाप बन रहा है।
धर्मजयगढ़ के एक गांव में घुसे हाथी, घरों को तोड़ते हुए तीन लोगों की जान ले गए। तीन साल का मासूम सत्यम, जिसे शायद यह भी नहीं पता होगा कि हाथी क्या होता है, अपने ही घर में जान गवां बैठा। हाथी ने उसे रोता देख सूंड से उठाकर पटक दिया। एक महिला, खेत में काम करती हुई, जंगल और वन्य जीवों के बीच बिगड़ते संतुलन की कीमत चुका गई। एक और व्यक्ति, अपने ही घर में मलबे के नीचे दब गया, जिसे हाथी ने ढहा दिया था। यह सब एक ही रात में हुआ।
सरकार और प्रशासन की कथनी और करनी के बीच की खाई में आज इंसान और हाथी दोनों फंस चुके हैं। वन विभाग मॉनिटरिंग और सतर्कता की दुहाई देता है, पर हाथियों के हमले ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। जंगल को उद्योगपतियों के हवाले किया जा रहा है और हाथियों से कहा गया है, रास्ता बदलो। चाहे उस रास्ते में पडऩे वाले आदिवासियों को जान गंवानी पड़े, खेत बाड़ी नष्ट हो जाए। जानकार बताते हैं कि हाथी पचासों साल की स्मृतियों को अपने साथ लेकर चलता है। उन रास्तों को उजड़ता पा रहे हैं और बेचैन हैं। आज हालात ये हैं कि छत्तीसगढ़ के प्रभावित गांवों में ग्रामीण रात को यह सोचकर सो रहे हैं कि अगली बारी उसकी तो नहीं?
सोशल मीडिया की ताकत के आगे सत्ता का सरेंडर
कभी-कभी सोशल मीडिया सिर्फ लाइक-शेयर की दुनिया नहीं होती, बल्कि यह सत्ता के कान खींचने का तरीका भी बन जाती है। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के खड्डी खुर्द गांव की 22 वर्षीय लीला साहू ने यह साबित कर दिया। नौ महीने की गर्भवती लीला ने अपने गांव बगैया टोला से गजरी तक की 10 किलोमीटर की टूटी-फूटी सडक़ को लेकर ऐसा तूफान खड़ा किया कि नेताओं को मजबूरन झुकना पड़ा।
लीला पिछले साल से सडक़ की दुर्दशा पर आवाज उठा रही थी। गर्भवती महिलाओं के लिए एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाती थी। प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय सांसद तक, सबको टैग कर-करके उन्होंने वीडियो डाले, पर सबने प्रक्रियाधीन वाले वादों में उलझा कर रखा। इस बार बारिश ने सडक़ को दलदल बना दिया और लीला का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सांसद राजेश मिश्रा पर तंज कसा- जब सडक़ बनवाने की ताकत नहीं थी, तो वोट के समय वादा क्यों किया?
वीडियो वायरल हुआ, लेकिन नेताओं के बयान आग में घी डालने जैसे थे। सांसद बोले-डिलीवरी की तारीख बताओ, एक हफ्ता पहले हेलीकॉप्टर से उठा लेंगे। मंत्री राकेश सिंह ने व्यंग्य कसा था- क्या हर सोशल मीडिया पोस्ट पर डंपर लेकर निकल जाएं?, लीला ने पलटवार किया- किस-किस को हेलीकॉप्टर से उठाएंगे? हमें सडक़ चाहिए!
सोशल मीडिया पर लोगों के समर्थन तूफान ला दिया और 21 जुलाई को चमत्कार हो गया। जेसीबी और रोलर सडक़ पर उतर आए। हालांकि यह काम बिना किसी टेंडर के शुरू हुआ। कांग्रेस विधायक अजय सिंह ने दावा किया कि उन्होंने अपनी निधि से काम शुरू करवाया। भाजपा की ओर से कहा गया कि यह सांसद की मेहनत का नतीजा है। जो भी ले श्रेय, सडक़ बन रही है। मगर, लीला अभी भी चुप नहीं है। उसने कहा है कि हम अब सडक़ की क्वालिटी पर भी नजर रखेंगे।
लीला ने बता दिया कि सोशल मीडिया की ताकत से जनता बदलाव ला सकती है। सत्ता सुख में डूबे अहंकार को झुकने पर मजबूर कर सकती है।
एक अनार सौ बीमार

विधानसभा के कई सीनियर अफसर इस साल रिटायर हो रहे हैं। इनमें विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा भी हैं, जो कि नवंबर में रिटायर हो जाएंगे। हालांकि अब तक के जितने भी सचिव हुए हैं, उन सभी को रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन मिला है। दिनेश शर्मा की साख भी अच्छी है, लेकिन उनका क्या होता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। मगर सीनियर अफसरों की कुर्सी को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है।
दिनेश शर्मा के ठीक नीचे पद पर आरके अग्रवाल हैं, जो कि अपर सचिव के पद पर हैं। आरके अग्रवाल भी सितंबर में रिटायर होने वाले हैं। चर्चा है कि अग्रवाल भी एक्सटेंशन चाहते हैं। इन सबके बीच लोकसभा सचिवालय के अफसर अभय श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ विधानसभा में उप सचिव के पद पर हैं। श्रीवास्तव को पूर्व स्पीकर डॉ. चरणदास महंत लेकर आए थे। श्रीवास्तव की प्रतिनियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद एक साल का एक्सटेंशन मिला हुआ है। हल्ला है कि वो यहां संविलियन चाहते हैं। हालांकि इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है। यदि संविलियन होता है, तो वो भी शीर्ष पद के दावेदारों में शामिल हो जाएंगे। ये अलग बात है कि इसमें स्थानीय-बाहरी का भी पेंच फंसा हुआ है।
श्रीवास्तव से ऊपर अतिरिक्त सचिव श्रीमती विनीता वाजपेयी भी हैं। विनीता वाजपेयी दिवंगत स्पीकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की पुत्री भी हैं। विनीता वाजपेयी अगले साल रिटायर होंगी। वो विधानसभा की पहली महिला सचिव भी हो सकती हैं। कुल मिलाकर राज्य सचिवालय की तरह विधानसभा सचिवालय के शीर्ष पदों पर पदस्थापना को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
पुराना नेता गच्चा खा गया !!

भाजपा की एक खबर ने पार्टी रणनीतिकारों को परेशान कर रखा है। हुआ यूं कि कोंडागांव भाजपा के एक बड़े नेता संतोष कटारिया को खनिज निगम का अध्यक्ष बनाने के लिए कुछ लोगों ने 41 लाख रुपए ठग लिए। कटारिया ने इसकी शिकायत पुलिस में भी की है, और पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर जांच कर रही है।
कांग्रेस में तो ऐसे प्रकरण आते रहे हैं। पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल ने टिकट के लिए तत्कालीन प्रभारी सचिव चंदन यादव पर 7 लाख रुपए लेने के आरोप लगा दिए थे। डॉ. जायसवाल को पार्टी से सस्पेंड भी किया गया था। बाद में उन्होंने माफी भी मांग ली थी। मगर भाजपा में पद के लिए लेनदेन की लिखित शिकायत पहली बार सामने आई है।
हालांकि भाजपा में विधानसभा चुनाव से पहले टिकट दिलवाने के लिए खुद को आरएसएस का पदाधिकारी बताकर मध्यप्रदेश के एक व्यक्ति द्वारा एक-दो दावेदारों से पैसे ऐंठने के मामले की काफी चर्चा रही। मगर यह मामला पुलिस तक नहीं पहुंचा। इस बार भी निगम-मंडल ने पद के लिए कई लोगों ने दिल्ली, नागपुर तक दौड़ लगाई थी। इनमें से कई को निराशा हाथ लगी है। मगर संतोष कटारिया के प्रकरण से पार्टी के रणनीतिकार चिंतित हैं। कुछ लोग इसे डिजिटल अरेस्ट के नाम पर उगाही करने सरीखा बता रहे हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
कांग्रेस का चक्का जाम, भाजपा का रिवर्स गियर
कांग्रेस आज जनता के बीच सडक़ों पर उतरी है, मगर भाजपा ने एक दिन पहले पूरे विमर्श को ही पलट देने की जबरदस्त कोशिश की। उसने हर जिले में अपने मंत्रियों, विधायकों और प्रवक्ताओं को प्रेस के सामने उतार दिया। कांग्रेस ने चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को इस बात से जोड़ा है कि भूपेश बघेल विधानसभा में तमनार में कोयला खनन के लिए पेड़ों की कटाई का मुद्दा उठाने वाले थे, इसलिए ऐसा किया गया। भाजपा ने अपनी पत्रकार वार्ता में ईडी की कार्रवाई से अधिक तूल इस बात को उजागर करने पर दिया कि अपने कार्यकाल में भूपेश सरकार ने अडाणी के प्रति कितना प्रेम प्रदर्शित किया था। हसदेव में पेड़ों की कटाई और कोल ब्लॉक की मंजूरी में भूपेश बघेल सरकार की भूमिका को भाजपा ने दस्तावेजों के साथ सामने रखा। उस बयान को खूब उछाला, जब सीएम रहते हुए उन्होंने कहा था कि बिजली चाहिए तो कोयले का खनन करना ही पड़ेगा, जो चाहते हैं कि कोयले के लिए पेड़ न कटे उन्हें अपने घरों की बिजली बंद कर देनी चाहिए।
कांग्रेस ने चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को केवल ईडी की मनमानी कहने के बजाय, तमनार में हो रही पेड़ों की कटाई और अडाणी के कोयला ब्लॉक से जोड़ा। ऐसा करके चैतन्य की गिरफ्तारी को जनसरोकार और पर्यावरण की लड़ाई में बदलने का उद्देश्य रहा होगा। पर भाजपा ने एक दिन पहले पलटवार कर दिया। भाजपा ने बघेल को उसके ही पुराने रुख से घेरने की कोशिश की। हसदेव आंदोलन के दौरान बघेल सरकार की चुप्पी, विरोध करने वालों को अनदेखा करना और खनन परियोजनाओं को मंजूरी देना, ये सब एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच और उस वक्त के आंदोलनकारियों के बीच भी। भाजपा यह बताने में कामयाब दिख रही है कि जब सरकार थी, तब उनका यह विरोध कहां था? क्या केवल ईडी के विरोध में चक्का जाम किया जाता तो भाजपा को ऐसा मौका मिलता?
भारतमाला जांच और केस
रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला प्रोजेक्ट की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी कर रही है। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने विधानसभा प्रकरण को पुरजोर तरीके से उठाया था। सरकार ने भी माना था कि अपात्र लोगों को मुआवजा मिल गया, और अधिक भुगतान भी हुआ। जांच का हाल यह है कि प्रकरण टांय-टांय फिस्स होता दिख
रहा है।
जांच एजेंसी ने जिस जमीन कारोबारी हरमीत खनुजा को मुख्य आरोपी बताया है, उसे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। यही नहीं, उमा, और केदार तिवारी, जिन पर धोखाधड़ी कर मुआवजा लेने का आरोप है, वो भी जमानत पर रिहा हो गए। बाकी बचे प्रशासनिक अफसर, वो फरार हैं।
यानी छह महीने की कसरत के बाद भी जांच एजेंसी के हाथ खाली हैं। जो सफलता एजेंसी को शराब, और कोयला घोटाले में मिली थी। वैसा कुछ एजेंसी के अब तक हाथ नहीं लग पाया है। हालांकि रायपुर कमिश्नर ने एक और जांच बिठाई है। यह जांच चल रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ईओडब्ल्यू-एसीबी एक और प्रकरण दर्ज कर सकती है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
पार्टी ने वाड्रा को मुद्दा नहीं बनाया था
शराब घोटाला केस में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य की गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है। मगर हाईकमान का रुख इस मामले में ठंडा दिख रहा है। अलबत्ता, पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीट कर भूपेश परिवार के प्रति समर्थन जरूर जताया है, लेकिन बाकी बड़े नेता खामोश हैं।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल सोमवार को दिल्ली में थे, और उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से मुलाकात हुई थी। खडग़े का कल जन्मदिन था, और पूर्व सीएम ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। कहा जा रहा है कि चैतन्य की गिरफ्तारी के मसले पर कोई बात नहीं हुई। प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट चुप हैं। राहुल गांधी ने गिरफ्तारी के बाद पूर्व सीएम से फोन पर बात की थी, लेकिन सार्वजनिक तौर पर वो भी कुछ नहीं कह रहे हैं। उम्मीद थी कि एआईसीसी में कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस होगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ।
पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि खुद राहुल गांधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा पिछले 10 साल से ईडी, और इनकम टैक्स के चक्कर लगा रहे हैं। मगर पार्टी इसको राजनीतिक मुद्दा बनाने से परहेज किया। पार्टी के कई लोगों का मानना है कि चैतन्य के मामले को ज्यादा तूल देने से भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी की लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में रोजमर्रा के धरना-प्रदर्शन के बजाए कानूनी लड़ाई लडऩा ही उचित होगा। देर सबेर पार्टी इससे दूरी बना सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
अमित का हाथ, चैतन्य के साथ !!
शराब घोटाला केस में चैतन्य की गिरफ्तारी का जनता कांग्रेस के मुखिया अमित जोगी ने भी विरोध किया है। उन्होंने चैतन्य की गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित करार दिया है। अमित, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के धुर विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में उनके चैतन्य के समर्थन में आने पर राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा हो रही है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है, कि जोगी कांग्रेस में आना चाहते हैं। उन्होंने तो पार्टी का कांग्रेस में विलय की भी घोषणा कर दी थी, लेकिन चर्चा है कि पूर्व सीएम के विरोध के चलते जोगी परिवार की कांग्रेस में वापसी नहीं हो पाई। अब जब अमित जोगी, बघेल परिवार के समर्थन में आगे आए हैं, तो पूर्व सीएम का जोगी परिवार के प्रति रुख बरकरार रहता है या फिर कोई परिवर्तन आएगा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
हमारी जमीन, तुम्हारा दफ्तर! अब बर्दाश्त नहीं..

1978 में जब कोल इंडिया ने एसईसीएल का गठन किया, तब यह तय हुआ था कि जिनकी जमीन जाएगी, उन्हें मुआवजा और नौकरी दोनों मिलेंगे। लेकिन यह व्यवस्था कागजों तक ही सीमित रही। कोरबा की कुसमुंडा और गेवरा जैसी खदानों के लिए जब जमीन का अधिग्रहण शुरू हुआ, तो सैकड़ों बाहरी लोग रहस्यमयी तरीके से जमीन के मालिक या मालिकों के रिश्तेदार बन बैठे और नौकरियों पर कब्जा कर लिया। असली जमीन मालिक,स्थानीय आदिवासी, किसान और गरीब परिवार- कागज, पटवारी और दलालों के खेल में पछाड़ खा गए।
उस वक्त भू-अर्जन अधिकारी कलेक्टर होते थे और पूरे खेल की चाभी तहसीलदार और पटवारी के हाथ में होती थी। नीति यह थी कि तीन एकड़ जमीन पर एक नौकरी, और जिनके पास इससे कम जमीन हो, उन्हें भी नौकरी के साथ मुआवजा मिलेगा। मगर वही हुआ था जो आज रायगढ़, बिलासपुर और अभनपुर की भारतमाला परियोजनाओं में हो रहा है। उस वक्त के एसईसीएल और कोल इंडिया के अफसरों ने फर्जी रिश्तेदार पैदा करने और नौकरियां दिलाने में खुद मदद की और अपने-अपने इलाके के लोगों को भर लिया।
सैकड़ों विस्थापितों ने अदालती लड़ाई लड़ी, कुछ को राहत मिली, पर एसईसीएल ने आनाकानी की। तीन दिन पहले कुसमुंडा खदान के बाहर विस्थापित महिलाओं का प्रदर्शन इसी लंबी लूट के विरोध में था। थकी-हारी महिलाएं कंपनी दफ्तर के मेन गेट पर पहुंचीं, अपनी पीड़ा को सामने लाने के लिए उन्होंने लाज के आखिरी छोर पर साडिय़ां तक उतार दीं। न तो प्रशासन शर्मिंदा हुआ, न एसईसीएल का प्रबंधन। जो सफाई बार-बार दी जाती थी, वही दी गई- जो फाइल राजस्व विभाग ने दी, हमने उसी के आधार पर नौकरी और मुआवजा दिया। लेकिन महिलाएं कह रही थीं, हमारी ज़मीन पर दूसरों को नौकरी मिल गई, और हमारा परिवार आज तक ठोकरें खा रहा है।
इस प्रदर्शन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी महिलाओं से कह रहे थे- यह कंपनी का दफ्तर है, तुम्हारा घर नहीं कि ऐसे घुसकर हंगामा करो!
महिलाएं आगबबूला हो गईं। ये जमीन हमारा है, तुम हटो यहाँ से! हमने जमीन दी, तुमने दफ्तर बना लिया और अब हमें ही हटने के लिए कह रहे हो?
जवाब किसी के पास नहीं था। अफसर चुप रहे, कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। महिलाएं लौट गईं। पर सवाल वहीं छोड़ गईं कि वे अपने हक के लिए कब तक लड़ पाएंगीं?
चर्चा में कम, पर बड़ा विस्फोटक है
शराब घोटाले के हो-हल्ले, और कार्रवाई के बीच राजीव भवन के कर्मचारी देवेन्द्र डड़सेना की गिरफ्तारी पर ज्यादा कोई चर्चा नहीं हो रही है। देवेन्द्र पांच दिन की ईओडब्ल्यू-एसीबी के रिमांड पर हैं। चर्चा है कि देवेन्द्र ने पूछताछ में कई ऐसे राज उगले हैं जिससे आने वाले दिनों में कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती है।
चर्चा है कि देवेन्द्र से पूछताछ के बाद कुछ और लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। देवेन्द्र को कांग्रेस के प्रदेश कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल का राजदार माना जाता है। वो रामगोपाल के सहयोगी के रूप में राजीव भवन में बतौर एकाऊंटेंट के तौर पर काम करते रहे हैं। जिस दिन रामगोपाल के यहां कार्रवाई हुई, तब देवेन्द्र भी गायब हो गए।
ईओडब्ल्यूृ-एसीबी ने उन्हें ढूंढ निकाला। बताते हैं कि देवेन्द्र के पास चुनावी चंदे से लेकर राजीव भवन के निर्माण के खर्चों की बारीक जानकारी है। देवेन्द्र न सिर्फ राजीव भवन बल्कि रामगोपाल के कारोबार का भी लेखा-जोखा रखते हैं। सुकमा में राजीव भवन के निर्माण में शराब घोटाले का पैसा लगने की बात पहले ही सामने आ चुकी है, और ईडी ने भवन को अटैच कर दिया है। न सिर्फ सुकमा बल्कि प्रदेश के ज्यादातर जिलों में रामगोपाल की निगरानी में राजीव भवन का निर्माण हुआ था। ईडी और ईओडब्ल्यू-एसीबी, दोनों जांच एजेंसी की नजर रामगोपाल के मार्फत हुए निर्माण कार्यों-खर्चों और जुटाए गए चंदों पर है। हल्ला तो यह भी है कि देवेन्द्र के रूप में जांच एजेंसी को एक ‘मास्टर की’ मिल गई है। देखना है घोटाले की जांच में जुटी एजेंसियों के लिए कितने मददगार साबित होते हैं।
प्रकृति की गोद में रोमांच और सुकून

अगर आप प्रकृति की शांति में कुछ पल बिताने और रोमांच से भरपूर यात्रा का अनुभव लेना चाहते हैं, तो रायपुर से लगभग 89 किलोमीटर दूर, महासमुंद जिले का धसकुड़ जलप्रपात एक बेहतरीन विकल्प है। सिरपुर से सिर्फ 7 किलोमीटर दूर ग्राम बोरिद में स्थित यह झरना, पहाड़ की ऊंचाई से गिरती सफेद जलधारा और चारों ओर फैली घनी हरियाली के साथ एक जीवंत चित्र की तरह प्रतीत होता है।
इन दिनों यह पर्यटकों को खूब लुभा रहा है। कैमरों में इसकी खूबसूरती को कैद करने लोग दूर-दूर से पहुंच रहे हैं। सिरपुर-कसडोल मार्ग से एक मोड़ पर दाईं ओर मुडऩे के बाद मुख्य सडक़ खत्म हो जाती है और रोमांच की असली शुरुआत होती है।
पथरीले पहाड़ी रास्ते किसी ट्रैकिंग ट्रेल जैसे लगते हैं। झरने के निचले हिस्से तक पहुंचने के लिए साहसिक चढ़ाई करनी होती है। यह जगह साहसिक यात्राओं के शौकीनों के लिए तो स्वर्ग है, लेकिन बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए यह ट्रैक थोड़ा कठिन और जोखिम भरा हो सकता है। (फोटो-विवरण/गोकुल सोनी)
13,000 को मिलने जा रहा बड़ा लाभ
केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देश पर गृह मंत्रालय ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। इसमें उसने कहा है कि वह ऐसी प्रतिनियुक्तियों में क्रमिक रूप से कमी करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकतम दो वर्ष के भीतर आईपीएस अफसरों की इन बलों में घुसपैठ कम करने कहा है। खासकर आईजी स्तर पर। इस कमी के बाद इस फैसले से केंद्रीय बलों के मूल 13,000 अधिकारियों को लाभ मिलने की संभावना है, जो अपने कैडर के भीतर एक संरचित पदोन्नति मार्ग की उनकी मांग को प्रभावी मान्यता देगा है।
बता दें कि गृह मंत्रालय आईपीएस और सीएपीएफ दोनों अधिकारियों के लिए कैडर-नियंत्रण प्राधिकरण है। वैसे यह केस बीते 10 वर्ष से चल रहा है। यह मामला 2015 का है, जब सीएपीएफ के ग्रुप ए अधिकारियों ने गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू), कैडर समीक्षा, पुनर्गठन और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने और एसएजी में आंतरिक पदोन्नति को सक्षम करने के लिए भर्ती नियमों में बदलाव की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
वर्तमान में, सीएपीएफ में डीआईजी के 20 प्रतिशत और आईजी के 50 प्रतिशत पद आईपीएस के लिए आरक्षित हैं। यदि लागू किया जाता है, तो 23 मई के फैसले से सीएपीएफ में आईपीएस का प्रभुत्व काफी कम हो जाएगा, जिसमें सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस शामिल हैं।
जवानों के सोशल मीडिया पेज डिलीट
बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों की सफलता के लिए रणनीतिक गोपनीयता आवश्यक है। यही कारण बताते हुए सुरक्षाबलों को सोशल मीडिया और इंटरनेट से पूरी तरह दूर रहने को कह दिया गया है। यदि कोई एकाउंट है तो उसे डिलीट कर दें। अफसरों के मुताबिक इससे संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने और जवानों की सुरक्षा पर खतरे की आशंका को टालने में मदद मिलेगी।
बस्तर के बीहड़ और दूरदराज जंगलों में तैनात जवान कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। इलाका भौगोलिक और जलवायु चुनौतियों से भरा है, वहीं दूसरी ओर अब मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाएं हाल के वर्षों में वहां पहुंचनी शुरू हुई हैं। इन तकनीकी माध्यमों के जरिए जवान अपनी ड्यूटी के दौरान थोड़े खाली समय में अपने परिवारों से जुड़ पाते थे, दोस्तों से संवाद कर पाते थे, और थोड़ी मानसिक राहत के लिए संगीत, समाचार या मनोरंजन के ज़रिए खुद को तनाव से दूर रख पाते थे। बस्तर में तनाव के कारण कई बार जवानों ने आत्मघाती कदम उठाए हैं। हालांकि ऐसा कोई रिसर्च नहीं है कि सोशल मीडिया संवाद से जुड़े रहने के बाद उनके तनाव में कोई कमी आई है, पर अपने परिवार-दोस्तों से सैकड़ों मील दूर रहने वाले जवानों के लिए यह मन बहलाव का जरिया तो है ही। जवान तो आदेश का पालन करेंगे, उनकी ट्रेनिंग भी ऐसी ही होती है। पर सभी तरह के सोशल मीडिया एकाउंट बंद करा देने का निर्देश क्या व्यावहारिक है? क्या तकनीकी जानकारों से मदद लेकर उनके लिए सेफ सर्फिंग की कोशिश नहीं हो सकती। अब तो लगभग सभी सोशल मीडिया एकाउंट्स एक्स (ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर ऐसे फीचर आ गए हैं कि आपकी एक्टिविटी को सिर्फ वे ही देख सकते हैं, जिन्हें आप चाहें। कुछ शर्तें भी तय की जा सकती हैं कि जवान क्या पोस्ट करें, क्या नहीं। कौन सी सूचना सोशल मीडिया पर साझा करें, कौन सी नहीं।
पप्पू बंसल कमजोर कड़ी?
आबकारी घोटाले की परतें खुलने लगी है। इस प्रकरण में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इन सबके बीच एक चर्चा यह भी है कि पूर्व सीएम के करीबी पप्पू बंसल सरकारी गवाह बन सकते हैं।
दरअसल, बंसल के बयान के बाद ही चैतन्य की गिरफ्तारी हुई है। इसके बाद से भूपेश बघेल अपने पुराने सहयोगी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद भी पप्पू बंसल को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है। पूर्व सीएम ने यह भी कहा कि पप्पू बंसल का ईडी दफ्तर आना-जाना है।
बताते हैं कि ईडी भूपेश के दो करीबी विजय भाटिया, और पप्पू बंसल पर काफी पहले से नजर रखे हुए थे। भाटिया तो ईडी की गिरफ्त में है, लेकिन उनसे ज्यादा कुछ उगलवा नहीं पाई है। मगर पप्पू बंसल से पूछताछ में काफी कुछ नई जानकारी सामने आई है।
पेेशे से बिल्डर पप्पू बंसल, भूपेश बघेल के राजनीतिक जीवन के शुरूआती दौर से जुड़े रहे हैं। उनका चुनाव मैनेजमेंट भी पप्पू बंसल ही देखते थे। जांच एजेंसी ने पप्पू बंसल के अलावा सरायपाली में रहने वाले उनके रिश्तेदारों के यहां भी दबिश दी थी। इसके बाद से पप्पू से काफी कुछ जानकारी जुटाने में ईडी सफल रही है। पप्पू बंसल की गिरफ्तारी न होना इस बात को इंगित कर रहा है कि वो सरकारी गवाह बन सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो चैतन्य के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है। वाकई ऐसा होगा यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
तारीफ़ में कोई तंगदिली नहीं
सीएम विष्णुदेव साय की एक विशेषता है कि वो अच्छे कामों पर अपने सहयोगियों का सार्वजनिक तौर पर तारीफ करने से नहीं चूकते हैं, और उनकी हौसला अफजाई करते हैं।
शनिवार को एक निजी कार्यक्रम में सीएम ने अपने साथ मंच पर मौजूद डिप्टी सीएम अरूण साव की खुले तौर पर तारीफ की। उन्होंने कहा कि साव के कार्यों का प्रतिफल है कि प्रदेश के सात नगरीय निकायों को स्वच्छता में ईनाम मिला है।
साय यही नहीं रूके, उन्होंने कहा कि नगरीय निकाय चुनाव के पहले सभी निकायों को विकास कार्यों के लिए धनराशि देकर विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाई। नगरीय निकाय चुनाव में जीत मिली। उन्होंने डिप्टी सीएम के लिए मंच से ताली बजवाई। डिप्टी सीएम अरूण साव ने खड़े होकर सबका अभिवादन भी किया। इसके बाद से सरकार और संगठन में सीएम के सबसे निकट कौन हैं, इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गईं हैं।
परिंदों का प्रेमालाप

इस तस्वीर में दिख रहे सुंदर पक्षी को स्पॉटेड मुनिया या नटमेग मुनिया कहा जाता है, जिसका वैज्ञानिक नाम लोंचुरा पंचुलता है। हिंदी में इसे चित्रित मुनिया या सुतरीया चिडिय़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत सहित दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में दिखाई देते हैं। इसके शरीर पर सुनहरे भूरे रंग के साथ सफेद और काले धब्बेदार पैटर्न होते हैं, जो इसे अन्य पक्षियों से अलग पहचान देते हैं। ये अक्सर झुंड में रहते हैं, और इन दिनों खेतों, झाडिय़ों में दिख रहे हैं। इस तस्वीर में दोनों मुनिया पक्षी एक कांटेदार तार पर पास-पास बैठे हैं। एक पक्षी दूसरे की ओर मुड़ा है, उसकी आँखों में उत्सुकता है, तो दूसरे ने मानो नजऱे चुरा ली हो... यह क्षण किसी प्रेमकाव्य की तरह लग रहा है। (तस्वीर प्राण चड्ढा)
दिव्यांगों की चिंता आखिर कब?
विधानसभा के हालिया सत्र में विधायक अजय चंद्राकर ने एक ऐसी गंभीर सच्चाई सामने रखी, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने बताया कि राज्य के 31 दिव्यांगजन महाविद्यालयों में से 30 में प्राचार्य के पद रिक्त हैं। इस पर मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े भी हैरान रह गईं। चंद्राकर ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि किसी आउटसोर्सिंग एजेंसी से तबलावादक, चित्रकला और गायन के लिए मैनपॉवर लिया जाता है। ऐसी सेवा देने वाले किसी संस्था का नाम तो आज तक उन्होंने नहीं सुना। मंत्री के पास इसका भी कोई साफ जवाब नहीं था। चंद्राकर ने यह भी सवाल उठाया कि दिव्यांगों के लिए बनी योजनाओं का बजट साल-दर-साल घट क्यों रहा है। मंत्री इस पर भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकीं।
कुछ आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 70 हजार दिव्यांग बच्चे हैं, लेकिन उनके लिए केवल 270 शिक्षक नियुक्त हैं, जबकि नियमानुसार यह संख्या 6,000 से अधिक होनी चाहिए। विशेष शिक्षक नहीं होने के कारण इन बच्चों को सामान्य विद्यार्थियों के बीच बैठाया जा रहा है, जिससे उनकी शिक्षा और विकास दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
समाज कल्याण विभाग ने बीते वर्ष केवल 100 विशेष शिक्षक पदों की भर्ती का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा था, लेकिन सदन में स्वयं स्वीकार किया गया कि अब तक उसकी स्वीकृति नहीं मिली है। यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में एक याचिका पर आदेश देते हुए ऐसे रिक्त पदों को शीघ्र भरने को कहा था।
सवाल यह है कि जब सामान्य विद्यार्थियों के लिए भी शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो रही, तब दिव्यांगों की परवाह कौन करेगा?
बिजली की रफ्तार से छेना?
मोबाइल ऐप के माध्यम से घर तक सामान पहुंचाने वाली कंपनियां अब गोबर से बने हुए छेने भी दस मिनट में पहुंचाने के इश्तहार कर रही हैं। छेना मंगवाने की ऐसी कौन सी हड़बड़ी किसी की जिंदगी में हो सकती है कि वे मोटरसाइकिल पर डिलिवरी करने वाले से सीलबंद पैकेट में छेने जैसा सामान मंगवाएं?

दिल्ली भूपेश के साथ
विधानसभा के आखिरी दिन शुक्रवार को जैसे ही पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की शराब घोटाला प्रकरण में गिरफ्तारी की खबर आई, तो इसकी प्रतिक्रिया रायपुर, दुर्ग, भिलाई से दिल्ली तक हुई। ईडी तो सुबह से ही पूर्व सीएम के भिलाई-3 निवास पर चैतन्य से पूछताछ कर रही थी। करीब साढ़े 10 बजे पूर्व सीएम विधानसभा के लिए निकल गए।
सदन की कार्यवाही चल रही थी, तभी उनके पास सूचना आई कि चैतन्य को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जा रहा है। चैतन्य से ईडी पहले भी पूछताछ कर चुकी थी। ऐसे में गिरफ्तारी का अंदेशा कम था। मगर जैसे ही उन्हें कोर्ट में पेश होने की सूचना आई, पूर्व सीएम ने नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत को इसकी जानकारी दी।
फिर सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर कोर्ट जाने का फैसला लिया गया। इसके बाद दिल्ली तक के नेताओं के फोन घनघनाने लगे।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी ने सीधे भूपेश बघेल से बात की। पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महासचिव के.सी.वेणुगोपाल ने भी भूपेश, और अन्य प्रमुख नेताओं से फोन पर चर्चा की। शीर्ष नेताओं ने कहा है कि पूरी पार्टी पूर्व सीएम के साथ खड़ी है।
इधर, चैतन्य बघेल कोर्ट पहुंचे तो कांग्रेस के तमाम विधायक वहां पहुंच चुके थे। बताते हैं कि चैतन्य ने अपने पिता पूर्व सीएम को कह दिया कि जमानत के लिए फिलहाल प्रयास न करें, वो ठीक हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। चैतन्य के हौसले की भूपेश समर्थक तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। फिलहाल हाईकमान के दखल के बाद पूरी कांग्रेस भूपेश परिवार के समर्थन में खड़ी दिख रही है। धरना-प्रदर्शन का दौर चल रहा है। विधिक जानकार बताते हैं कि चैतन्य के खिलाफ आरोप काफी गंभीर है। ऐसे में लड़ाई लंबी खिंचने के आसार दिख रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा एक निष्क्रिय दल
देशभर में निष्क्रिय राजनीतिक दलों की पहचान के लिए चुनाव आयोग की चल रही कार्रवाई के तहत, छत्तीसगढ़ में भी ऐसे दलों की भी जांच-पड़ताल हो रही है जिन्होंने सन् 2019 से कोई चुनाव नहीं लड़ा। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा ऐसे दलों को नोटिस जारी कर पूछताछ शुरू की गई है। पहले चरण में 9 दलों ने निर्वाचन कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। सभी ने अगला चुनाव लडऩे की मंशा जताई है।
चुनाव आयोग किसी दल का पंजीयन सीधे-सीधे रद्द नहीं कर सकता। पहले उन्हें नोटिस देकर सुनवाई का अवसर दिया जाता है। यदि कोई दल निर्धारित समय पर वार्षिक लेखा-जोखा जमा नहीं करता या उसके कार्यालय का पता अमान्य है, तो कारण बताओ नोटिस जारी होता है। यदि आयोग को लगे कि यह मामला धोखाधड़ी का है, तभी पंजीकरण रद्द किया जाता है।
सन् 2022 में देशव्यापी स्तर पर ऐसे दलों की पहचान के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया था, जिसमें 2,100 से अधिक दलों को नोटिस जारी किए गए थे। फिलहाल छत्तीसगढ़ में 56 पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, जिनमें से सक्रिय रूप से चुनाव लडऩे वाले दलों की संख्या महज आठ-दस ही है।
इन्हीं 9 दलों में एक नाम छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छमुमो) का भी है, जिसे अब निष्क्रिय की श्रेणी में गिना गया है। यह दल पहले राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की उपज था। इसकी स्थापना स्व. शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में हुई थी, जिनका संघर्ष औद्योगिक मजदूरों, किसानों और शराबबंदी जैसे मुद्दों के लिए था।
सन् 1993 में इस दल से, जनकलाल ठाकुर डौंडीलोहारा से विधायक बने थे। 2003 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 8 प्रत्याशी उतारे थे, जिन्हें कुल 35,000 से अधिक वोट मिले। छत्तीसगढ़ के पृथक राज्य बनने के बाद भी मोर्चा सक्रिय रहा, लेकिन बीते वर्षों में संसाधनों की कमी, संगठनात्मक कमजोरी और चुनावी अनुकूलताओं के अभाव में यह पार्टी चुनाव मैदान से दूर हो गई।
आज के संदर्भ में यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कई राजनीतिक दल पंजीकरण तो करा लेते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य चुनाव लडऩा नहीं, बल्कि पंजीकरण से मिलने वाले फायदे उठाना होता है। आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13्र के तहत ऐसे दलों को दान पर कर छूट मिलती है। चंदा देने वाले लोग दल को पैसा देते हैं और फिर 5-10 प्रतिशत कमीशन देकर वही पैसा वापस ले लेते हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ दलों को दल मान्यता की स्थिति के आधार पर सस्ती दरों पर कार्यालय के लिए भूमि भी मिलती है। सन् 2016 में जब आयोग ने ऐसी गतिविधियों की जांच शुरू की, तो 86 दलों का पंजीकरण रद्द किया गया और 253 दल निष्क्रिय घोषित हुए। अब तक 345 ऐसे दलों की पहचान की जा चुकी है जिनकी जांच जारी है।
एक ओर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसे दल हैं, जो वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों के साथ लोकतांत्रिक प्रणाली में योगदान देना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में चुनाव नहीं लड़ पा रहे। दूसरी ओर, सैकड़ों ऐसे पंजीकृत दल हैं जिनके लिए राजनीति एक बिना लागत का मुनाफे का कारोबार बन है। मगर चुनाव आयोग के पास ऐसी कोई प्रणाली नहीं है कि वास्तविक लोकतांत्रिक सोच को लेकर पंजीकरण कराने वाले और फर्जीवाड़ा करने के लिए पंजीकरण कराने वाले दल के बीच अंतर कर सके।
अगला सत्र, अगला भवन

तनाव भरे राजनीतिक माहौल में विधानसभा के मानसून सत्र का शुक्रवार को अवसान हुआ। इस भवन में विधानसभा का आखिरी सत्र था। सत्र के आखिरी दिन शराब घोटाला प्रकरण में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के निवास पर ईडी ने छापेमारी की, और उनके पुत्र चैतन्य बघेल को हिरासत में लिया है। इससे परे विधानसभा सचिवालय ने अगले सत्र की तैयारी भी शुरू कर दी है।
अगला सत्र नवा रायपुर के नए विधानसभा भवन में होगा। नए विधानसभा भवन का निर्माण तकरीबन पूरा हो चुका है, और आंतरिक साज-सज्जा का काम चल रहा है। चर्चा है कि पीएम नरेन्द्र मोदी एक से पांच नवम्बर के बीच नए विधानसभा भवन का उद्घाटन कर सकते हैं। पीएम सदन में विधायकों को संबोधित भी करेंगे।
विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 दिसंबर के आसपास होगा। इसकी तैयारी चल रही है। समय सीमा के भीतर सारा काम पूरा हो जाए, इसके लिए सीएम विष्णुदेव साय, डिप्टी सीएम अरुण साव, और स्पीकर डॉ. रमन सिंह के बीच बैठक हो चुकी है। मौजूदा विधानसभा भवन में करोड़ों के निर्माण हो चुके हैं, और नए भवन पर कई निगम-मंडलों की नजर है। हालांकि नए भवन में शिफ्ट होने के बावजूद करीब छह महीने पुराना भवन भी विधानसभा सचिवालय के पास ही रहेगा। इसके बाद सरकार किसी, और को आबंटित करने का फैसला ले सकती है।
पांच पेड़ों से बना पचपेड़ी नाका
रायपुर से जगदलपुर जाने वाले रास्ते पर सबसे बड़ा चौक है, पचपेड़ी नाका। राजधानी रायपुर का यह व्यस्तम चौक है। दूसरे शहर के लोग भी पचपेड़ी नाका को जरूर जानते हैं। नवीन नामकरण को लेकर पचपेड़ी नाका पर राजनीति गहराती जा रही है। इस चौक के नामकरण का इतिहास हमें पीएससी के एक अभ्यर्थी ने हमसे शेयर किया है......
अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में चुंगी कर लगाने के लिए शहर में चार नाकों - आमानाका, पुरानी बस्ती, लाखेनगर की स्थापना की। इनमें से एक पचपेड़ी नाका था। बताया जाता है कि अंग्रेज अफसरों ने अपने बैठने और छांव के उद्देश्य से पांच पेड़ लगवाए। कालांतर में पांच पेड़ों के कारण यह चौक पचपेड़ी (पच का मतलब पांच और पेड़ी का अर्थ होता है छोटा पौधा) और नाका होने के कारण पचपेड़ी नाका पड़ गया। ठीक इसी तरह आम की पेड़ों की बहुलता और नाके की उपस्थिति के कारण आमानाका नाम पड़ा। छत्तीसगढ़ी में आम को आमा से संबोधित किया जाता है। 1982 में पचपेड़ी नाका चौक से होते हुए रिंग रोड का निर्माण हुआ। इस चौक से उस समय माना एयरपोर्ट पर उतरने वाले एरोप्लेन आसानी से दिख जाते थे। जानकर आश्चर्य होगा कि इस चौक से भिलाई स्टील प्लांट की कई चिमनियों से उगलते धुआं को देखा जा सकता था।
पचपेड़ी नाका के उस पार राजधानी रायपुर की कई व्यापारिक गतिविधियों के अलावा निजी क्षेत्र के कई बड़े अस्पताल हैं, जिसके कारण यह चौक राजधानी रायपुर में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ में अपनी एक अलग पहचान रखता है। भाठागांव में नए बस स्टैंड के निर्माण के बाद इस चौक पर यात्रियों का भारी जमावड़ा लगा रहता है। रायपुर के अधिकांश घरों में सुसज्जित टाइल्स, फर्श, ग्रेनाइट कहीं न कहीं पचपेड़ी नाका क्षेत्र की याद दिलाते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र राजधानी का मार्बल हब भी है।
जब सडक़ नहीं होती, तब रास्ता अंधविश्वास

छत्तीसगढ़ के दो हालिया मामले- एक दक्षिणी छोर कांकेर से और दूसरा राज्य के उत्तर के बलरामपुर से। दोनों ही सरकार की बुनियादी विफलताओं की तस्वीर दिखाते हैं। दोनों जिले आदिवासी बहुल हैं, दोनों में संकट एक-सा है। जब राज्य अपने नागरिकों तक सडक़, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचाता, तब लोग अंधेरे रास्तों की ओर बढ़ जाते हैं, कोई मजबूरी में, कोई अंधविश्वास में।
कांकेर की सुनीता कोमरा की कहानी एक उम्मीद है। 9 महीने की गर्भवती महिला की हालत बिगड़ी, तो परिवार ने गांव में प्रसव कराने का जोखिम नहीं लिया। कीचड़, जंगल और बरसात के बीच चार किलोमीटर तक पैदल चलकर वह एंबुलेंस तक पहुंची। जान जोखिम में थी, लेकिन उसने सिस्टम पर भरोसा किया। यह सोचकर कि अस्पताल तक पहुंच पाई तो मां और गर्भस्थ का बचाव मुमकिन है।
दूसरी तरफ बलरामपुर की घटना है। पिता ने अपने बीमार बेटे को बचाने के लिए एक मासूम की बलि चढ़ा दी। 15 माह पहले की इस घटना का खुलासा कल हुआ। आखिर खुद एक छोटे बच्चे का बाप होते आरोपी को क्यों लगा कि किसी दूसरे बच्चे की बलि चढ़ा देना ही इलाज का आखिरी रास्ता है? क्यों वह डॉक्टर के पास नहीं गया? सीधा जवाब है- क्योंकि उसके पास कोई डॉक्टर था ही नहीं। अस्पताल की दूरी ने उसे तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक की तरफ मोड़ दिया।
इन दोनों घटनाओं में फर्क जरूर है, पर कारण एक है- आधारभूत ढांचे का अभाव। कांकेर में सडक़ नहीं थी, बलरामपुर में स्वास्थ्य सेवा। नतीजा, एक ओर जान जोखिम में डालकर बच्चा जन्मा, दूसरी ओर एक बच्चे की जान ले ली गई।
क्या जागरूकता केवल प्रचार से आएगी? जमीन पर स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और सडक़ें भी चाहिए। जब तक ये नहीं होंगे, तब तक सुनीता जैसी महिलाएं कीचड़ में घिसटती रहेंगी और बलरामपुर जैसी जगह में फिर कोई मासूम तंत्र-मंत्र का शिकार होगा।
ऐसा नाम, कैसे करेंगे बुरा काम?
छत्तीसगढ़ में सरकारी खरीदी अंतरिक्ष छूते दामों पर करने के कुछ आरोप हवा में तैर रहे हैं, और सरकार उनका खंडन करने की कोशिश भी कर रही है। सच तो जांच के बाद पता लगेगा, और हो सकता है कि बाकी 73 पहलुओं की तरह इसमें भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को दखल देनी पड़े। फिलहाल सप्लायर कंपनियों की जो लिस्ट अंधाधुंध दामों के टेंडर भरने के लिए सामने आई है, वह जरा भी भरोसेमंद नहीं लग रही है। भला श्रीराम, ओम, और मां बनभौरी नाम की कंपनियां कैसे कोई भ्रष्टाचार कर सकती हैं?
कोई पत्थर नहीं चला था !!

आरंग के भाजपा विधायक गुरु खुशवंत साहेब की गाड़ी पर पिछले दिनों कथित तौर पर पत्थरबाजी की घटना पर खूब हो हल्ला मचा। यह घटना बेमेतरा जिले के नवागढ़ के पास हुई थी। उस वक्त भाजपा विधायक एक कार्यक्रम से निकल रहे थे, तभी सडक़ पर एक पत्थर गाड़ी पर लगा, और गाड़ी का शीशा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना की सूचना मिलते ही सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने तुरंत गुरु खुशवंत साहेब से बात की, और पुलिस को जांच के लिए कहा।
बताते हैं कि पुलिस ने मामले की जांच की, और घटना स्थल पर टीम पहुंची। जांच पड़ताल के बाद यह बात सामने आई है कि गाड़ी पर किसी ने पत्थर नहीं फेंका। बल्कि उस वक्त तेज हवा चल रही थी। मुख्य सडक़ के किनारे बिजली का तार टूट गया, और बिजली के पोल पर लगा चीनी मिट्टी का फ्यूज प्लग टूटकर गाड़ी पर लगा। इससे शीशा टूट गया। सडक़ सुनसान थी, और आसपास कोई नहीं था। खुद गुरु खुशवंत साहेब ने कहा है कि घटनास्थल के आसपास कोई नहीं था। जांच रिपोर्ट डिप्टी सीएम को भेज दी गई है।

हालांकि गुरु के समर्थक, उन पर हमले की साजिश की आशंका जता रहे हैं। इससे परे गुरु खुशवंत साहेब सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर चुके हैं। उनके पिता सतनामी समाज के प्रमुख गुरु बालदास अगले दिन घटना स्थल पर गए भी थे। अब जांच रिपोर्ट आने के बाद क्या कुछ होता है यह देखना है।
दो और बनेंगे आईएएस
खबर है कि केन्द्र सरकार ने राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस अवार्ड के लिए दो पद मंजूर कर लिए हैं। इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। आईएएस अवार्ड के लिए वरिष्ठता क्रम में अफसरों का रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
दो पद के लिए छह नाम भेजे जाएंगे। इनमें लीना कोसाम, सौमिल रंजन चौबे, राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, देवनारायण कश्यप, छन्नूलाल मारकंडे, सुरेन्द्र प्रसाद वैद्य, और वीरेन्द्र बहादुर पंच भाई के नाम हैं। लीना कोसाम, और सौमिल रंजन चौबे के खिलाफ किसी तरह के कोई प्रकरण नहीं हैं। ऐसे में दोनों के आईएएस अवार्ड होने में कोई तकनीकी दिक्कत नहीं है।
चर्चा है कि दिल्ली में अगले महीने डीपीसी हो सकती है। इसमें चीफ सेक्रेटरी के अलावा डीओपीटी, और यूपीएससी के सदस्य रहेंगे। सब कुछ समय पर हुआ, तो दोनों अफसरों को अगस्त के आखिरी अथवा सितंबर में आईएएस अवार्ड हो जाएगा।
कुलपति से पहले छात्र नाखुश थे, अब कर्मचारी
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संगीतज्ञ और म्यूजिक थैरेपिस्ट डॉ. लवली शर्मा ने अप्रैल माह में खैरागढ़ स्थित इंदिरा गांधी कला एवं संगीत विश्वविद्यालय में कुलपति का पदभार संभाला था। लेकिन पदभार ग्रहण के महज तीन माह के भीतर ही वे दो विवादों में घिर चुकी हैं।
ताजा विवाद विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षकीय कर्मचारियों के साथ सामने आया है। कर्मचारियों की पदोन्नति और समयबद्ध वेतनमान की मांग को लेकर संगठन ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिया था। इस पर मीडिया से बातचीत के दौरान कुलपति डॉ. शर्मा ने कथित रूप से कर्मचारियों को गुणहीन और अभिशाप कह दिया। कर्मचारियों के अनुसार, उनके लिए अनावश्यक और अप्रशिक्षित जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया।
डॉ. शर्मा की टिप्पणी से कर्मचारी संगठन नाराज है। उन्होंने इसे स्थानीयता और जातिगत अपमान से जोड़ते हुए कुलपति से माफी मांगने और अपने बयान पर खेद प्रकट करने की मांग की है।
इससे पहले भी, डॉ. लवली शर्मा की नियुक्ति को लेकर विवाद हो चुका है। 12 अप्रैल को जैसे ही उनके नाम की अधिसूचना जारी हुई, सत्ताधारी दल से जुड़ी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उनकी नियुक्ति को रद्द करने की मांग उठाई थी। हालांकि नियुक्ति पर रोक नहीं लगी। पदभार ग्रहण करने के बाद भी एबीवीपी ने खैरागढ़ में रातभर प्रदर्शन किया।
एबीवीपी का आरोप है कि ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय में जब डॉ. शर्मा संगीत एवं कला संकाय की डीन थीं, तब उन पर भ्रष्टाचार और एक विवादित प्रोफेसर को बचाने के आरोप लगे थे। संगठन ने नियुक्ति रद्द न होने की स्थिति में चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी दी थी, हालांकि आगे बात नहीं बढ़ी।
प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों में लंबे समय तक कुलपतियों के पद रिक्त रहे हैं। खैरागढ़ विश्वविद्यालय में भी करीब एक साल तक कुलपति का कार्यभार रायपुर संभागायुक्त के पास था।
यह विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संस्थान माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यह अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों से अधिक लगातार विवादों के कारण चर्चा में आ रहा है।
देवेंद्र के बदले तेवर
विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है। पिछले सत्रों की भांति इस बार भी विशेषकर प्रश्नकाल में सत्ता, और विपक्ष के सदस्यों के बीच स्वाभाविक रूप से नोकझोंक देखने को मिल रही है। मंगलवार को जल जीवन मिशन योजना को लेकर सवाल-जवाब के बीच पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, और देवेन्द्र यादव के बीच जमकर तकरार हुई। इस मामले में स्पीकर डॉ. रमन सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा।
कांग्रेस सदस्य देवेंद्र यादव पिछले सत्रों में ज्यादातर मौकों पर खामोश रहते थे, लेकिन बलौदाबाजार आगजनी मामले पर जेल से छूटने के बाद देवेन्द्र के तेवर बदले दिख रहे हैं। वो सदन के भीतर अलग-अलग विषयों को लेकर आक्रामक नजर आ रहे हैं। अजय के साथ सदन के भीतर गरमा गर्मी तो हुई, लेकिन थोड़ी देर बाद दोनों की नजरें आपस में मिली, तो देवेन्द्र यादव ने अजय को देखकर तुरंत हाथ जोड़, और कान पकडक़र माफी भी मांग ली। अजय ने भी सिर हिलाकर एक तरह से उन्हें माफी दे दी। ये अलग बात है कि दोनों के बीच तकरार की रील्स काफी वायरल हो रही है।
चातुर्मास में ‘महाराज’ का बयान कैसे
रावतपुरा मेडिकल कॉलेज की मान्यता के लिए घूस देने के मामले में जांच के घेरे में आए रावतपुरा श्री रविशंकर महाराज के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर तो कर लिया है, लेकिन आगे पूछताछ रुकी है। वजह यह है कि चातुर्मास चल रहा है, और रावतपुरा महाराज सागर में चातुर्मास कर रहे हैं। यानी वो चार महीने एक ही स्थान पर रहेंगे।
पिछले दिनों रावतपुरा महाराज के कार्यक्रम में मध्य प्रदेश सरकार के कई मंत्री उपस्थित थे। रावतपुरा संस्थान प्रबंधन के तमाम लोगों ने चुप्पी साध ली है। कोई भी इस विषय पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। रेरा चेयरमैन संजय शुक्ला के खिलाफ भी सीबीआई ने एफआईआर किया है।
अभी तक रावतपुरा संस्थान के कुल पांच लोगों के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर दर्ज किया है, लेकिन गिरफ्तारी सिर्फ एक डायरेक्टर की हुई है। बाकियों का क्या होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
पानी के बीच खड़ा अनोखा मंदिर

राजधानी रायपुर से पाटन मार्ग पर स्थित परसदा गांव के पास एक बेहद खास स्थान है, जहाँ प्रकृति की शांत छांव और आस्था की गूंज एक साथ महसूस होती है। खारून नदी के बीचों बीच स्थित ‘ठकुराईनटोला’ मंदिर एक धार्मिक स्थल तो है, पर इस बारिश के मौसम में खूबसूरत प्राकृतिक आकर्षण भी है।
बरसात के दिनों में जब खारून नदी पूरे यौवन पर है, यह मंदिर चारों तरफ से पानी से घिर गया है। मंदिर का प्रतिबिंब नदी के शांत जल में झलकता है, पक्षियों की चहचहाहट गूंजती है और ठंडी हवा का स्पर्श मन को सुकून से भर देता है। इस नजारे को देखने वालों की आंखें कुछ पल के लिए ठहर जाती हैं। सरकार ने हाल ही में नदी पर एक भव्य लक्ष्मण झूला का निर्माण करवाया है, जो नदी के दोनों किनारों को जोड़ता है। बताया जा रहा है कि झूले का लोकार्पण इसी महीने होने वाला है।
छुट्टियों और वीकेंड पर यह स्थान सैलानियों से गुलजार होने लगा है। लोग नदी में स्नान का आनंद भी लेते हैं, क्योंकि इसकी गहराई यहां पर बहुत अधिक नहीं है। एक बार इस ठंडी और निर्मल जलधारा में डुबकी लगाने के बाद दिनभर की थकान जैसे छू-मंतर हो जाती है। (तस्वीर व विवरण- गोकुल सोनी)
लिख के मेरा पदनाम एक्स पे मिटा दिया !
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के एक ट्वीट से पार्टी में हलचल मची है। दरअसल, बैज को जन्मदिन पर भिलाई विधायक देवेंद्र यादव ने एक्स पर बधाई दी, तो उन्होंने ट्वीट कर देवेन्द्र को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष लिख आभार माना। हालांकि थोड़ी देर बाद बैज ने ट्वीट को डिलीट भी कर दिया, लेकिन तब तक सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास को कटाक्ष करने का मौका मिल गया, और उन्होंने ट्वीट को डिलीट करने पर देवेन्द्र यादव का अपमान कऱार दिया। मगर कांग्रेस के कई नेता बैज के ट्वीट को गंभीरता से ले रहे हैं, और पार्टी संगठन में संभावित बदलाव से जोडक़र भी देख रहे हैं।
वैसे भी कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्ति की परंपरा रही है। दिवंगत मोतीलाल वोरा छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने, तब डॉ चरणदास महंत को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। और जब धनेन्द्र साहू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो डॉ महंत को अध्यक्ष पद से हटा कर कार्यकारी बना दिया गया। बाद में जब भूपेश बघेल ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली, तो डॉ शिव कुमार डहरिया, और रामदयाल उईके को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था।
अब बैज ने भले ही गलती से देवेन्द्र यादव को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष लिख दिया, लेकिन पार्टी के कुछ लोग सही भी मान रहे हैं। बलौदा बाजार आगजनी प्रकरण के बाद से देवेन्द्र यादव का कद पार्टी के भीतर काफी बढ़ा है। जेल से छूटने के अगले दिन सीधे राहुल गांधी से मिलकर आ गए। उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी गई है। पिछले दिनों पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री केसी वेणुगोपाल यहां आए, उन्होंने देवेन्द्र से कुछ देर अलग से चर्चा की। यादव बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले देवेन्द्र सामाजिक समीकरण में फिट बैठते हैं। ऐसे में प्रदेश में उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा। मगर खुद बैज पद पर बने रहेंगे,इसको लेकर पार्टी के कुछ लोगों को शंका है। देखना है आगे प्रदेश कांग्रेस में क्या कुछ होता है।
शिक्षक भर्ती की चिंता घटकर आधी हुई

विधानसभा में पूछे गए सवाल और सरकार से मिले जवाब अक्सर उन दावों से बिल्कुल अलग होते हैं, जो राजनीतिक मंचों से, खासकर चुनाव अभियानों के दौरान किए जाते हैं।
मार्च 2025 के पिछले सत्र में विधायक राघवेंद्र सिंह ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों की जानकारी मांगी थी। तब सरकार ने बताया था कि 56,601 पद खाली हैं। अब 14 जुलाई से शुरू हुए सत्र में यही सवाल दोबारा पूछा गया, तो सरकार की ओर से जवाब मिला कि केवल 25,907 पद खाली हैं। यानी, सिर्फ चार महीने में 30,694 पदों की आवश्यकता कम रह गई है।
हाल ही में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण और कम दर्ज संख्या वाले स्कूलों के विलय की प्रक्रिया पूरी की गई है। इस पर शिक्षक संगठनों और विपक्ष, कांग्रेस ने विरोध जताते हुए दावा किया था कि इससे 30 हजार से अधिक शिक्षकों के पद समाप्त हो जाएंगे। अब विधानसभा में दिए गए जवाब ने इस दावे को पुख्ता कर दिया है। मान लें कि वर्तमान में 25,907 (करीब 26 हजार) पद ही रिक्त हैं- तो भी यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इन पदों पर भर्ती कब होगी? सरकार ने अब तक इस पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है।
दूसरी ओर, शिक्षा विभाग में हाल ही में बड़े पैमाने पर तबादले किए गए हैं, जिनमें कई जिला शिक्षा अधिकारी भी शामिल हैं। इनमें से कुछ अधिकारियों पर युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में पक्षपात और अनियमितता के आरोप हैं। कई प्रभावित शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की है।
युक्तियुक्तकरण का उद्देश्य संतुलित समायोजन बतलाया गया था, ताकि किसी भी स्कूल में शिक्षक की कमी न रहे। लेकिन सत्र की शुरुआत होते ही प्रदेश के कई स्कूलों में शिक्षक न होने के कारण छात्र और पालक सडक़ों पर उतर आए हैं।
युक्तियुक्तकरण के बाद बदली हुई तस्वीर यह है कि अब बेरोजगारों को 56 हजार रिक्त पदों पर भर्ती के लिए आंदोलन नहीं करना होगा, सिर्फ 26 हजार पदों के लिए करना है। सरकार के लिए भी मोदी की गारंटी पूरा करने का बोझ घटकर आधा रह गया है।
थाने की कुर्सी पर विधायक

जयपुर के हवामहल क्षेत्र के विधायक बालमुकुंद आचार्य की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है, जिसमें वे थानेदार की कुर्सी पर बैठकर सामने बैठे पुलिस स्टाफ को निर्देश देते नजर आ रहे हैं। बताया गया कि इलाके में कांवडिय़ों के साथ कुछ झड़प की स्थिति बन गई थी, जिसके बाद विधायक खुद थाने पहुंचे और पुलिस वालों को समझाने लगे कि कानून-व्यवस्था कैसे संभालनी है।
विधायक की इस भूमिका को लेकर बहस छिड़ गई है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इस घटना को "बेहद शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण" बताया है, जबकि स्थानीय प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की ओर से अब तक कोई आपत्ति नहीं जताई गई है। न ही थानेदार के खिलाफ किसी तरह की प्रशासनिक कार्रवाई की गई है।
कुछ राज्यों में जनप्रतिनिधियों का रौब-दाब अब भी सीमाओं से परे, पूरी तरह कायम है। अपने छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में में ऐसा नजारा कम ही देखने को मिला है। पिछली सरकार में तो कई मौकों पर खुद सत्तारूढ़ दल के विधायकों पर एफआईआर दर्ज हो जाती थी, और उन्हें बचाने कोई आगे भी नहीं आता था।
15 जुलाई : जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा
नयी दिल्ली, 15 जुलाई। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 15 जुलाई को ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान करने का ऐलान किया गया था। उन्हें यह सम्मान 1955 में प्रदान किया गया था।
वर्ष 1954 में शुरू किया गया यह सम्मान किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी दूसरी ऐसी शख्सियत रहीं, जिन्हें प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
15 जुलाई 2023 को चेक गणराज्य की 24 वर्षीय खिलाड़ी मार्केटा वोंद्रोसोवा महिला एकल के फाइनल में ओन्स जाबेउर को सीधे सेटों में पराजित करके विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट का खिताब जीतने वाली सबसे कम रैंकिंग की और पहली गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी बन गई। वोंद्रोसोवा ने दोनों सेट में पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए 2022 की उपविजेता और छठी वरीयता प्राप्त जाबेउर को 6-4, 6-4 से हराकर अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब हासिल किया।
टूर्नामेंट शुरू होने से पहले यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वोंद्रोसोवा चैंपियन बनेगी। असल में वह खिताब जीतने के लक्ष्य के साथ ऑल इंग्लैंड क्लब में नहीं आई थी। लेकिन उनका यह दौरा यादगार बन गया और वह ग्रैंड स्लैम चैंपियन बनकर घर लौटीं।
देश-दुनिया के इतिहास में 15 जुलाई की तारीख पर दर्ज महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है:-
- 1904 : अमेरिका के लॉस एंजिलिस में पहला बौद्ध मंदिर बना।
- 1910 : एमिल क्रेपलिन ने एलॉइस अल्जाइमर के नाम पर अल्जाइमर बीमारी का नाम दिया।
- 1916 : दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग की शुरूआत।
- 1926 : बॉम्बे (अब मुम्बई) में पहली मोटरबस सेवा की शुरुआत।
- 1955 : प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की।
- 1961 : स्पेन ने पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकारों को स्वीकार किया।
- 1968 : अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच वाणिज्यिक विमान सेवा की शुरुआत।
- 1979 : भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने पद से इस्तीफा दिया।
- 2000 : सिएरा लियोन में सैन्य कार्यवाही द्वारा सभी भारतीय सैनिक बंधक मुक्त।
- 2002 : अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारे उमर शेख को पाकिस्तानी अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई।
- 2004 : माओवादियों से वार्ता में नेपाल के प्रधानमंत्री ने विदेशी मध्यस्थता मंजूर की।
- 2018 : फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से हराकर दूसरी बार फुटबॉल विश्व कप का खिताब अपने नाम किया।
- 2020 : जायडस कैडिला ने कोविड-19 टीके का मनुष्यों पर परीक्षण शुरू किया।
- 2023 : उत्तर पूर्वी कांगो में संदिगध चरमपंथियों के हमले में 12 लोगों की मौत।
- 2024 : के पी शर्मा ओली ने चौथी बार नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। (भाषा)
कार्रवाई की रफ्तार भी तो देखिये
पहली बार विधायक बनीं, पहली बार मंत्री बनीं, और पहली ही बार में आरोप लग गया। मासूम बच्चों की थाली तक हल्की पड़ गई! बच्चों की थाली में छेद और अलमारी में दीमक लगने का राज तो गोदाम में ही दम तोड़ देता, यदि मीडिया में खबर नहीं चलती।
मामला बाल विकास विभाग में 40 करोड़ के सप्लाई टेंडर का है। जांच रिपोर्ट आई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि यह रकम सिर्फ 28 करोड़ है। लोग कह रहे हैं, जांच के नाम पर खानापूर्ति हो गई। जो सामान उनसे लिया गया था बदलकर नया ले लिया गया। यानि गड़बड़ी पकड़े जाने की सजा केवल इतनी है कि आप उसे ठीक कर लो। छह एजेंसियों को ब्लैक लिस्टेड करने की बात वजन के साथ कही गई है। पर जो सप्लाई के धंधे में लगे हैं वे बताते हैं कि इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। एक फर्म के पीछे, चार, छह, दस और फर्म होते हैं। बदलकर दूसरे नामों से टेंडर में भाग लिया जा सकता है। अब फर्म अपना नाम बदलकर फिर से आएगी, फिर वही थाली, वही आलमारी, वही तवा, बस नया पर्चा और नया बोर्ड लगाकर! विभाग फिर आंख मूंदकर क्वालिटी चेक करेगा, फिर जांच कमेटी बनेगी, फिर दूसरी थाली-अलमारी भेज दी जाएगी। जिन अधिकारियों की आंख के सामने घटिया थाली, खोखली अलमारी खपा दी गई उन पर तो कुछ कार्रवाई हुई थी। अफसरों से लेकर बाबुओं तक की कुर्सी सुरक्षित है। किसी के खिलाफ कोई एफआईआर भी नहीं।
पूरी कार्रवाई बड़ी मजबूरी में, सावधानी के साथ की गई प्रतीत हो रही है। ताकि जिन लोगों को हिस्सा मिला है और उन पर कोई आंच न आए, जिन लोगों ने हिस्सा-बंटवारे में भाग लिया उनका भी बाल बांका न हो। आंगनबाड़ी के बच्चे तो वही खाएंगे जो आप देंगे। कोई शिकायत करेगा तो वही रटी-रटाई लाइन फिर सुनने को मिलेगी- गुणवत्ता के कोई समझौता नहीं होगा।
इस दृश्य पर कांग्रेस को आपत्ति

इस तस्वीर में कुछ असहज करने वाली बात आपको दिखाई दे रही है? भाजपा के वरिष्ठतम आदिवासी नेताओं में से एक पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर, राज्यपाल रमेन डेका के सामने खड़े होकर कोई बात कर रहे हैं। यह कोरबा प्रवास के दौरान की तस्वीर है। हाल ही में राज्यपाल ने यहां का दौरा किया था। कांग्रेस ने और पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के सोशल मीडिया पेज पर इस तस्वीर को पोस्ट किया गया है। कंवर का अपमान हुआ, यह कहा जा रहा है। वजह राज्यपाल के बैठे होने पर नहीं। बगल में ध्यान से देखें तो कलेक्टर अजीत वसंत दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस को आपत्ति है कि वे क्यों बैठे हुए हैं? जब वरिष्ठ आदिवासी नेता कंवर खड़े हैं तो उन्हें आराम से इस तरह नहीं बैठना चाहिए। आप आकलन करें कि क्या कांग्रेस की यह आपत्ति सही है। कलेक्टर ने शायद यह मानकर खड़े होने की जरूरत महसूस की होगी कि कंवर वर्तमान में सरकार में किसी पद में नहीं। वे केवल जनप्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे सत्तारूढ़ दल से हैं या नहीं। यह भी देखना होगा कि क्या यह स्थिति राज्यपाल से कंवर की मुलाकात के दौरान पूरे समय थी, या फिर कुछ देर के लिए यह संयोग बना। उन्हें बैठने के लिए कहा गया या नहीं कहा गया?
सभी के कान ही कैसे खराब?
प्रदेश के कबीरधाम, मुंगेली सहित कई जिलों में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट के आधार पर नौकरी पाने वालों पर शिकंजा कसा है। करीब सवा सौ अफसर-कर्मी हैं, जिनकी दिव्यांगता सर्टिफिकेट को फर्जी बताया जा रहा है। मुंगेली जिले में दिव्यांग सर्टिफिकेट धारी 27 अफसर-कर्मियों को नोटिस जारी कर मेडिकल जांच की अद्यतन स्थिति की जानकारी मांगी गई है।
इन अफसर-कर्मियों को राज्य मेडिकल बोर्ड से दिव्यांगता की जांच कराने के लिए कहा गया था, लेकिन किसी ने भी जांच नहीं कराई। कुछ तो हाईकोर्ट चले गए। अब इन सभी को बर्खास्त करने की तैयारी चल रही है। खास बात ये है कि 27 में से 24 ने खुद को श्रवण बाधित (बहरा) बताकर दिव्यांगता सर्टिफिकेट हासिल की है। यह बात भी सामने आई है कि मुंगेली जिले के आधा दर्जन गांवों में करीब सात से आठ सौ युवाओं ने फर्जी सर्टिफिकेट बनाया है। इन सभी ने खुद को श्रवण बाधित बताया है।
कथित श्रवण बाधित युवा डिप्टी कलेक्टर से लेकर अन्य ऊंचे पदों पर हैं। इन्हें नौकरी से निकालने के लिए आंदोलन भी चल रहा है। फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट प्रकरण पर हाईकोर्ट भी गंभीर है, और इस पर इसी हफ्ते सुनवाई होनी है। देखना है कि प्रकरण पर आगे क्या कुछ होता है।
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक
भ्रष्टाचार के किसी मामले में जांच होती है, तो कई बार ऐसे प्रकरण भी सामने आ जाते हैं जो कि फाइलों में नस्तीबद्ध हो चुके होते हैं। कुछ इसी तरह का मामला रावतपुरा मेडिकल कॉलेज से जुड़ा है। पिछले दिनों सीबीआई ने मान्यता के लिए एनएमसी की टीम को घूस देने के मामले में कॉलेज प्रबंधन से जुड़े पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है। इनमें से एक कॉलेज के डायरेक्टर जेल में हैं। बाकी चार लोगों के खिलाफ फिलहाल गिरफ्तारी जैसी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
खुद रावतपुरा महाराज भी प्रकरण की जांच के घेरे में आ गए हैं। राज्य सरकार भी मामले पर काफी गंभीर है, और कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए कदम उठा रही है। रावतपुरा संस्थान से जुड़े रायपुर मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. अतिन कुंडू के खिलाफ भी सीबीआई ने प्रकरण दर्ज किया है।
राज्य सरकार ने कुंडू के मामले की जानकारी ली, तो उनके पुराने प्रकरण भी सामने आ गए। कुंडू का पांच साल पहले अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज तबादला हुआ था। काफी कोशिशों के बावजूद कुंडू अपना तबादला रूकवाने में सफल नहीं हो पाए, तो वे छुट्टी पर चले गए। इस दौरान वे रायपुर के ही एक अन्य निजी मेडिकल कॉलेज संस्थान रिम्स में सेवा देने लगे। यानी सरकार और रिम्स, दोनों जगह से वेतन प्राप्त करते रहे। इस मामले की शिकायत भी हुई थी। जांच में पुष्टि भी हुई, लेकिन वो मामला दबवाने में सफल रहे। अब डॉ. कुंडू सीबीआई के घेरे में आ गए हैं, तो राज्य सरकार ने पुरानी फाइल खोल दी है। अब उनके बच निकलने की संभावना खत्म होती दिख रही है। देखना है आगे क्या होता है।
बीजेपी जागेगी?
हर शहर में न सिर्फ त्यौहारों के पहले, बल्कि अब तो साल भर तरह-तरह की सेल चलती रहती है। बड़ी होटलों से लेकर सार्वजनिक सभा भवनों तक कई किस्म के नए-पुराने सामानों को तरह-तरह के झांसे वाले इश्तहार देकर बेचा जाता है। अखबारों में पूरे-पूरे पेज के इश्तहार छपते हैं, और इनमें दावे देखने लायक रहते हैं। अभी आज चल रही ऐसी एक बिक्री के बारे में लिखा गया है कि उसका मकसद सेल लगाकर माल बेचना नहीं है। कंपनी पर बैंक का अत्यंत दबाव होने के कारण कंपनी अपनी प्रीमियम स्टॉक की सस्ती बिक्री करने पर मजबूर है। इश्तहार में लिखा गया है- हमारी कंपनी के द्वारा न पहले कभी सेल लगाई गई है, न इसके बाद कभी लगाई जाएगी।
दिलचस्प बात यह है कि पूरे पेज के इश्तहार में कंपनी का कोई जिक्र ही नहीं है। ऐसे खुले झूठे दावों पर समाज या सरकार की तरफ से किसी कार्रवाई की जागरूकता भी नहीं है। ऐसा ही एक दूसरा इश्तहार एक दूसरे होटल में लगी सेल का है, जो कह रहा है कि उच्च मुद्रास्फीति की वजह से कंपनी के गोदाम में स्टॉक ओवरफ्लो हो गया है, इसलिए हम आपको इतना बड़ा डिस्काउंट दे रहे हैं।
अब यह वाला दावा कुछ अधिक दिलचस्प इसलिए है कि इसे देखकर जब हमने जानने की कोशिश की कि भारत में मुद्रास्फीति की क्या हालत है, तो पता लगा कि ग्राहक मूल्य सूचकांक एकदम गिरा हुआ है क्योंकि कई कारोबार में मुद्रास्फीति एकदम नीचे आ गई है, और थोक मुद्रास्फीति भी रिकॉर्ड नीचे है।
अब देश की ऐसी अर्थव्यवस्था के रहते हुए भी अगर कोई फर्जी कंपनी फर्जी कारोबार के लिए इश्तहार देकर देश को उच्च मुद्रास्फीति का शिकार बतला रही है, तो फिर देश-प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी की भी तो कोई जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी सेल में जाकर धंधेबाजों से पूछे कि देश की अर्थव्यवस्था पर ऐसा झूठा इल्जाम क्यों लगाया जा रहा है। लेकिन जब तक किसी पार्टी का ऐसा कोई कार्यक्रम टाईप होकर न आ जाए, तब तक भला किसको परवाह है कि देश की अर्थव्यवस्था का नाम हो रहा है, या वह बदनाम हो रही है।
परदेश का मोह

राज्य सरकार के अफसरों की विदेशों से आमदरफ्त जारी है। वहीं विधानसभा के मानसून सत्र के बाद सरकार के मंत्रियों के विदेश दौरे शुरू होने वाले हैं। एक-दो मंत्रियों के विभाग में विदेश यात्रा के लिए प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।
बड़े राजनीतिक ओहदेदारों के विदेश दौरों की अनुमति पीएमओ ही देता है। ऐसे में एक बड़े ओहदेदार को दूसरी बार अनुमति न दिए जाने को लेकर चर्चाएं हैं। हालांकि देश के किसी भी राज्य के ऐसे ओहदेदार को अब तक विदेश दौरे की अनुमति नहीं दी गई है। अपने साहब भी पूरी तैयारी से गए कूच किए थे लेकिन अनुमति न मिलने पर दिल्ली में ही भेंट मुलाकात कर लौट आए। बताया जा रहा है कि साहब एक प्रयास और करने वाले हैं। इससे परे स्पीकर अक्टूबर में कामनवेल्थ संसदीय सम्मेलन में भाग लेने अफ्रीकी देश जाने वाले हैं।
पहले जिला, फिर प्रदेश
प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी तैयार हो गई है, लेकिन सूची अभी जारी नहीं की जाएगी। पार्टी के रणनीतिकारों की पिछले दिनों मैनपाट में एक बैठक हुई है, जिसमें यह तय किया गया कि पहले जिलों की कार्यकारिणी घोषित की जाएगी।
मैनपाट में प्रशिक्षण शिविर के बाद से जिलों में हलचल शुरू हो गई है। कार्यकारिणी के लिए नाम लिए जा रहे हैं। महामंत्री, और उपाध्यक्ष पदों के लिए स्थानीय प्रमुख नेताओं से रायशुमारी की प्रक्रिया चल रही है। चर्चा है कि इस माह के अंत तक जिला, और फिर प्रदेश की कार्यकारिणी घोषित कर दी जाएगी।
तबादले, खुशी कम, गम अधिक
प्रदेश में तबादलों पर फिर रोक लग गई है। अब सिर्फ समन्वय के जरिए ही तबादले हो सकते हैं। वैसे इस बार स्कूल शिक्षा समेत आधा दर्जन विभागों में तबादलों पर पहले से रोक लगी थी। पार्टी ने कार्यकर्ताओं की सिफारिश को तवज्जो देने के लिए मंत्रियों को आदेश भी दिए थे। मगर ज्यादातर जिलों से आई सूची को महत्व ही नहीं दिया गया।
चर्चा है कि रायपुर में तो बकायदा कोर कमेटी ने तबादले का प्रस्ताव तैयार किया था, और संबंधित विभाग के मंत्रियों को भेजा था। कहा जा रहा है कि रायपुर की सूची में से इक्का-दुक्का नामों को ही तबादला सूची में जगह मिल पाई। इसको लेकर संगठन के पदाधिकारी नाराज बताए जाते हैं। इसकी शिकायत भी हुई है। अब तबादले पर रोक लग गई है, इसलिए अब अगले सीजन का इंतजार करना होगा।
समंस की चाय-पानी- खुराक बंद
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले ने ई-समंस और वारंट तामिली की जो नई डिजिटल शुरुआत की है । यह राज्य का पहला जिला बन गया है, जहां समंस, वारंट अब कागज-पत्तर की बजाय मोबाइल एप और पोर्टल से जारी और तामील किए जा रहे हैं। इससे पुलिस और कोर्ट के बीच सीधा डिजिटल ट्रैक बन गया है -किसे कब समंस दिया गया, किसने रिसीव किया, कहां दिया गया, सबकी फोटो और तारीख पोर्टल पर देखी जा रही है।
फायदा ये कि अब कोई यह बहाना नहीं बना पाएगा कि समंस मिला ही नहीं। पहले यह आम बात थी कि कई नेता, रसूखदार लोग या उनके गुर्गे समंस को हाथ में लेने से ही इंकार कर देते थे। अब सिस्टम डिजिटल हो गया है तो उम्मीद है कि वह पुरानी लापरवाही, जोड़-तोड़ और सेटिंगबाजी बंद होगी। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वाकई बड़े-बड़े नेताओं, अफसरों और रसूखदारों तक भी ई-समंस पहुंचेगा?
अभी शुरुआत है — देखना होगा कि जो लोग समंस को अब तक टालते रहे, या समंस देने वाले को चाय-पानी के बहाने लौटा देते थे, वे नई डिजिटल व्यवस्था में कहां तक टिक पाएंगे। पुलिस को यह दिखाना होगा कि यह ई-समंस सब पर बराबरी से चलेगा, सिर्फ कमजोरों पर नहीं।
सौदान सिंह से खलबली
लंबे समय तक प्रदेश भाजपा संगठन के कर्ता-धर्ता रहे सौदान सिंह एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने रायपुर आए तो उनसे मिलने के लिए पार्टी नेताओं का तांता लगा रहा। सौदान सिंह पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनकी कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में प्रदेश भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन से बंद कमरे में लंबी चर्चा हुई।
छत्तीसगढ़ भाजपा की कार्यकारिणी घोषित होनी है, ऐसे में सौदान सिंह की नितिन नबीन के साथ बैठक को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि नबीन ने पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर सौदान सिंह से राय भी ली है। अगले दिन सौदान सिंह और नितिन नबीन को अलग-अलग फ्लाईट से पटना जाना था। नबीन के लिए पटना से सरकारी विमान आने वाला था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया, और वे सौदान सिंह के साथ नियमित फ्लाईट से कोलकाता गए। और फिर वहां से पटना पहुंचे। दोनों नेता केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कार्यक्रम में शामिल हुए। कुछ लोगों का अंदाज है कि सौदान सिंह के करीबी कुछ नेताओं को संगठन में अहम दायित्व मिल सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
खंडन का मुंडन
आखिरकार रायपुर नगर निगम ने पचपेड़ी नाका का नामकरण संत गोदड़ी बाबा के नाम करने का प्रस्ताव वापिस ले लिया। इस प्रस्ताव को लेकर चौतरफा विरोध हो रहा था। खुद आरडीए के अध्यक्ष नंदकुमार साहू ने आपत्ति जताई थी। छत्तीसगढ़ क्रांति सेना, और छत्तीसगढ़ समाज पार्टी जैसे कई संगठनों ने खुलकर इसका विरोध किया था। सौ से अधिक आपत्तियां आई थी।
भाजपा में ही सबसे ज्यादा विरोध हो रहा था। शुक्रवार को विरोध को देखते हुए मेयर मीनल चौबे ने बयान दिया कि पचपेड़ी नाका का नाम बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यह महज अफवाह है।
मेयर का कथन सही नहीं है। बताते हैं कि एमआईसी सदस्य अमर गिदवानी बाबा गोदड़ी वाले धाम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने एमआईसी में पचपेड़ी नाका का नाम गोदड़ी बाबा के नाम करने का प्रस्ताव एमआईसी में रखा, तो सर्वसम्मति से नाम बदलने के लिए सहमति दे दी गई। इसके बाद जोन क्रमांक-10 ने एमआईसी में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित होने के बाद अखबारों में विज्ञापन जारी कर विधिवत आपत्ति-दावे मंगाए थे। 9 जुलाई को आपत्ति-दावा जमा करने के आखिरी दिन तक सौ से अधिक आपत्तियां आ चुकी थी। कुछ संगठनों ने नाम बदलने पर आंदोलन की धमकी दी थी। भारी विरोध और राजनीतिक नुकसान को देखते हुए प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया गया।


