इंटरव्यू » लिखित

11-Jul-2020 6:07 PM

नई दिल्ली, 11 जुलाई। देश के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता शरद पवार ने ‘सामना’ को धमाकेदार ‘मैराथन’ साक्षात्कार दिया। शरद पवार राजनीति में कौन-सी नीति अपनाते हैं, क्या बोलते हैं, इसे हमेशा ही महत्व रहा है। इस बार शरद पवार ‘सामना’ के माध्यम से बोले। वे जितने मार्गदर्शक हैं, उतने ही खलबली मचानेवाले भी हैं। महाराष्ट्र की ‘ठाकरे सरकार’ को बिल्कुल भी खतरा नहीं! ऐसा उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा है। देवेंद्र फडणवीस द्वारा किए गए सभी आरोपों का पवार ने रोकठोक जवाब दिया। सरकार बनाने के संदर्भ में भाजपा से कभी भी चर्चा नहीं हुई। फडणवीस राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय प्रक्रिया में कभी भी नहीं थे। उन्हें कुछ पता नहीं, ऐसा ‘विस्फोट’ शरद पवार ने किया।

लॉकडाउन, कोरोना, चीन का संकट, डगमगाती अर्थव्यवस्था, ऐसे सभी सवालों पर शरद पवार ने दिल खोलकर बोला है।

शरद पवार ने एक भी सवाल को टाला नहीं। ढाई घंटे का यह साक्षात्कार राजनीतिक इतिहास का दस्तावेज साबित होगा!

‘लॉकडाउन’ की बेड़ियों से बाहर आए देश के वरिष्ठ नेता से पूछा, ‘फिलहाल निश्चित तौर पर क्या चल रहा है?’ 

इस पर उन्होंने कहा, खास कुछ नहीं चल रहा। क्या चलेगा? एक तो देश में और राज्य में क्या चल रहा है इस पर नजर रखना और अलग-अलग लोगों से संवाद करना, राजनीति के बाहर के लोगों से मैं बात करता हूं और कुछ अच्छा पढ़ने मिले तो पढ़ता हूं, इसके अलावा कुछ खास नहीं चल रहा है।

लॉकडाउन के ये फायदे भी हैं।

– संकट तो है ही लेकिन उसमें जो अच्छा किया जा सके, सकारात्मक दृष्टिकोण रखा जा सके वह करना जरूरी है। इसके महत्व की वजह यह कि अभी कोरोना का जो संकट विश्व पर आया है, उसके चलते लॉकडाउन हुआ है। सभी चीजें बंद हैं। दुर्भाग्यवश लॉकडाउन जैसा जो निर्णय सभी को लेना पड़ा उसका यह परिणाम है। समझो यह लॉकडाउन काल नहीं होता, यह संकट नहीं होता तो शायद मेरे बारे में कुछ अलग दृश्य देखने को मिला होता यह निश्चित!

लेकिन लॉकडाउन अभी समाप्त नहीं हुआ है। जीने पर बंदिशें लगी हैं। इंसान को एक तरह से बेड़ियां ही लग गई हैं। मनुष्य जकड़ गया है। राजनीति जकड़ गई है, उद्योग जकड़ गया है। आप कई वर्षों से समाजसेवा और राजनीति में हैं। आपने कई बार भविष्य का वेध लिया। आपको सपने में भी कभी ऐसा लगा था क्या कि इस तरह के संकटों का सामना इंसानों को करना पड़ेगा?

– कभी भी नहीं लगा। मेरे पठन में कुछ पुराने संदर्भ हैं। खासकर कांग्रेस पार्टी का इतिहास पढ़ने में। कांग्रेस पार्टी की स्थापना जो हुई, उसका एक इतिहास है। वर्ष १८८५ में कांग्रेस की स्थापना पुणे में होनी थी और वहां अधिवेशन भी तय हुआ था। लेकिन प्लेग की बीमारी उसी समय बड़े पैमाने पर फैली। इंसान मरने लगे इसलिए पुणे की जगह मुंबई में अधिवेशन हुआ। आज जिस जगह को अगस्त क्रांति मैदान या ग्वालिया टैंक कहा जाता है, वहां कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उस समय के प्लेग संक्रमण का पूरा इतिहास लिखा गया है। उस समय ऐसा दृश्य था कि राज्य के कई भागों में इंसान प्लेग के कारण मर रहे थे। सभी व्यवहार थम गए थे। लेकिन यह पढ़ी हुई बातें है क्योंकि उस समय मेरा जन्म नहीं हुआ था। और आज कभी अपेक्षा की नहीं, कभी विचार किया नहीं इस तरह का दृश्य है। यह दृश्य सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं बल्कि पूरे विश्व में है। कभी ऐसा अनुभव होगा, ऐसा नहीं सोचा था। लेकिन परिस्थिति का सामना करना ही पड़ेगा।

आज इंसान, इंसान से घबरा रहा है। ऐसा दृश्य है…

– हां, घर-घर में यही दृश्य है। डॉक्टरों का भी सुझाव है कि एक-दूसरे से जितना दूर रह सकें, उतना दूर रहें। तुम सावधानी बरतो नहीं तो उसका दुष्परिणाम सहन करना पड़ेगा। इसलिए पूरा विश्व चिंतित है। इस कालखंड में एक ही चीज बड़े पैमाने में देखने को मिल रही है कि समाज के सभी घटकों में एक तरह की घबराहट है। अब धीरे-धीरे वह कम होने लगी है, यह सही है। लेकिन इस घबराहट के चलते इंसान घर के बाहर नहीं निकलेगा ऐसा कभी लगा नहीं था, वह हमें देखने को मिला है।

अलग तरह का कर्फ्यू लगा है कई बार…

– मुझे याद है कि पहले चीन व पाकिस्तान का युध्द हुआ तब एक-दो दिन का कर्फ्यू रहता था। दुश्मन देश हवाई जहाज से हमला करेगा, ऐसी खबरें आती थीं। तब इस तरह का कर्फ्यू रहता था। लोग घरों में ही रहते थे लेकिन वह भी एक दिन के लिए, आधे दिन के लिए या फिर एक रात के लिए यह कर्फ्यू हुआ करता था। लेकिन अब कोरोना के चलते लोग महीना-महीना, दो-दो महीना, ढाई महीना घर के बाहर नहीं निकले। यह दृश्य कभी देखने को मिलेगा, ऐसा नहीं सोचा था। अब एक अलग ही स्थिति कोरोना के चलते हमें देखने को मिली।

लॉकडाउन का शुरुआती काल सभी ने बिल्कुल सख्ती से पालन किया। चाहे वह कलाकार हो, हमारी तरह राजनीतिज्ञ हो या उद्योजक हो।

– दूसरा क्या विकल्प था? घर पर रहना ही सबसे सुरक्षित उपाय था।

आप तो निरंतर घूमनेवाले नेता हैं। हमेशा लोगों के बीच रहनेवाले नेता हैं। इस लॉकडाउन का शुरुआती काल आपने कैसे व्यतीत किया?

– शुरुआती महीने-डेढ़ महीने मैं अपने घर की चौखट से बाहर तक नहीं गया। प्रांगण में भी नहीं गया। चौखट के अंदर ही रहा। उसकी कुछ वजहें थीं। एक तो घर से प्रेशर था। इसके अलावा सभी विशेषज्ञों ने कहा था कि ७० से ८० आयु वर्ग के लोगों को बिल्कुल सावधानी बरतने की जरूरत है या यह आयु वर्ग बिल्कुल व्हलनरेबल है। मैं भी इसी आयु वर्ग में आता हूं इसलिए अधिक ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा घर के लोगों का आग्रह था और न कहें तो मन में उत्पीड़न। इसलिए मैं उस चौखट के बाहर कहीं गया नहीं। ज्यादा समय टेलीविजन, पढ़ाई के अलावा कुछ दूसरा नहीं किया।

हमने आपका एक वीडियो देखा, जो सुप्रियाताई ने डाला था। उसमें आप बरामदे में घूम रहे हैं और गीत-रामायण सुन रहे हैं।

– हां, इस काल में खूब गीत सुने। भीमसेन जोशी के सभी अभंग सुने। ये सभी अभंग दो-तीन-चार बार नहीं बल्कि कई बार सुना। पुराने दौर में हिंदी में ‘बिनाका गीतमाला’ होती थी। अब वह नए कलेवर में उपलब्ध है। उसे भी बार-बार सुनने का मौका इस काल में मिला। संपूर्ण गीत-रामायण दोबारा सुना। ग. दि. माडगुलकर ने क्या जबरदस्त कलाकृति इस देश, विशेष रूप से महाराष्ट्र की और मराठी लोगों की सांस्कृतिक विश्व में निर्माण करके रखी इसका दोबारा अनुभव हुआ।

आपका राममंदिर के आंदोलन से कभी संबंध नहीं रहा लेकिन गीत-रामायण से आता है…

– नहीं, उस आंदोलन से कभी संबंध नहीं रहा।

पर रामायण से संबंध आया…

– वह गीत-रामायण के माध्यम से!

कोरोना का संकट तो रहेगा ही, ऐसा विश्व के विशेषज्ञों का मानना है। यह संकट इतनी जल्दी दूर नहीं होगा। ये ऐसे ही रहेगा, लेकिन लॉकडाउन का संकट कब तक रहेगा, आपको क्या लगता है?

– एक बात तो इस काल में स्पष्ट हो गई है कि यहां से आगे आपको, मुझे, हम सभी को कोरोना के साथ जीने की तैयारी रखनी होगी। कोरोना हमारी दैनिक जिंदगी का एक हिस्सा बन रहा है, इस प्रकार की बात विशेषज्ञों द्वारा कही गई है। इसलिए अब हमें भी इसे स्वीकारना ही होगा। इस परिस्थिति को ध्यान में रखकर ही आगे जाने की तैयारी करनी होगी। सवाल है लॉकडाउन का। चिंताजनक परिस्थिति निर्माण करती है लॉकडाउन।

मतलब लॉकडाउन के साथ भी जीना होगा क्या?

– नहीं। हर्गिज नहीं। लॉकडाउन के साथ हमेशा जीना होगा ऐसा मुझे नहीं लगता। हाल ही में मैंने कुछ विशेषज्ञों से बात की। उन्होंने कहा कि लगभग जुलाई महीने के तीसरे सप्ताह से यह ट्रेंड नीचे आएगा। अगस्त और सितंबर में पूरा खाली जाएगा और दोबारा नॉर्मलसी आएगी। लेकिन इसका मतलब कोरोना हमेशा के लिए समाप्त हो गया, ऐसा नहीं मान लेना है। कभी भी रिवर्स हो सकता है। इसलिए आगे से हमें कोरोना को लेकर ध्यान देना होगा और अपने सभी व्यवहारों में सावधानी लेने की जरूरत है। लेकिन ऐसी कोरोना जैसी परिस्थिति दोबारा आई तो लॉकडाउन करने की नौबत आती है और लॉकडाउन करने से जो परिणाम हुए, उदाहरणार्थ वित्तीय व्यवस्था पर हुआ, परिवार में हुआ, व्यापार पर हुआ, यात्रा पर हुआ। यह सब हमने अभी देखा है। इसके आगे ऐसी परिस्थिति दोबारा न आए ऐसी हमारी प्रार्थना है, लेकिन वित्तीय संकट आ ही गया तो उसके लिए हम सबकी तैयारी होनी चाहिए।

इसके लिए समाज में जागरूकता लाने की जरूरत है, ऐसा क्यों लगता है?

– हां, निश्चित ही। मेरा तो साफ मानना है कि, यहां से आगे अब अपने पाठ्यपुस्तक में यह दो-ढाई महीने के कालखंड का जो हमने अनुभव लिया है, इस संबंध में जो देखभाल और सावधानी लेने की जरूरत है, उस पर आधारित एक दूसरा पाठ पाठ्यपुस्तक में होना जरूरी है।

पिछले कुछ दिनों से जो खबरें आ रही हैं उसके आधार पर पूछ रहा हूं कि लॉकडाउन के संदर्भ में आपकी भूमिका और राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की भूमिका अलग है। मतभेद है।

– बिल्कुल नहीं। वैâसा मतभेद? मतभेद किस लिए? इस पूरे काल में मेरा मुख्यमंत्री के साथ उत्तम संवाद था। आज भी है।

पर लॉकडाउन शिथिल करें, आपका ऐसा मानना था और उस संदर्भ में मतभेद था, ऐसा मीडिया में आया।

– मीडिया में क्या आ रहा है, उसे आने दो। एक बात ध्यान देनी चाहिए। अखबारों की भी कुछ समस्या होती है। जैसे लॉकडाउन के चलते हमें घर से बाहर निकलते नहीं बन रहा। हमारे बहुत से काम करते नहीं बन रहे। बहुत सी एक्टिविटीज रुक गई। इसका परिणाम जैसे बहुत से घटकों पर हुआ है वैसे अखबारों पर भी हुआ है। मुख्य परिणाम यानी उन्हें जो खबर चाहिए, वह खबर देनेवाले जो उद्योग हैं, कार्यक्रम हैं, वो कम हुए और इसलिए जगह भरने संबंधित जिम्मेदारी उन्हें टालते नहीं बन रही। फिर इनमें और उनमें नाराजगी है, ऐसी खबरें दी जा रही हैं। दो-तीन दिन से मैं पढ़ रहा हूं कि हमारे यानी कांग्रेस, राष्ट्रवादी और शिवसेना में मतभेद है। उसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं, लेकिन ऐसी खबरें आ रही हैं। आने दो!

मेरा सवाल ऐसा था कि लॉकडाउन धीरे-धीरे हटाएं, ऐसी आपकी भूमिका है। लोगों को छूट देनी चाहिए, ऐसा आपका कहना है।

– देखिए, इसमें मेरा साफ कहना है कि शुरुआती काल में कड़ाई से लॉकडाउन करने की आवश्यकता थी। उसका पालन मुख्यमंत्री ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र में हुआ। यहां वैसी ही आवश्यकता थी। इतनी कठोरता नहीं की गई होती तो शायद न्यूयॉर्क जैसा हाल यहां हुआ होता। हम न्यूयॉर्क के बारे में खबरें पढ़ते हैं कि हजारों लोगों को इस संकट के चलते मौत के मुंह में जाना पड़ा। वही स्थिति यहां आ गई होती। यहां सख्ती से लॉकडाउन लागू हुआ और विशेष रूप से लोगों ने सहयोग भी किया। इसलिए यहां की परिस्थिति सुधारने में मदद मिली, नहीं तो अनर्थ हो गया होता। पहले दो-ढाई महीने इसकी आवश्यकता थी। इस बारे में मुख्यमंत्री ठाकरे और राज्य सरकार का दृष्टिकोण सौ प्रतिशत सही था। हम सबका इसे मन से समर्थन था।

लॉकडाउन का सबसे बड़ा फटका मजदूरों और उद्योगपतियों को लगा इसलिए शिथिलता लाएं ऐसा आपका मत था…

– इस काल में मैंने कइयों से चर्चा की, उसमें उद्योगपति भी थे। मजदूर संगठनों के लोग भी थे। उनसे चर्चा करने के बाद मेरी एक राय बनी, वो मैंने मुख्यमंत्री के कानों पर जरूर डाली। इसे मतभेद नहीं कहते। स्पष्ट कहें तो कुछ जगह, उदाहरणार्थ दिल्ली। दिल्ली में रिलेक्शेसन किया गया। क्या हुआ वहां? उसका नुकसान हुआ। लेकिन व्यवहार धीरे-धीरे शुरू हुआ। कर्नाटक के सरकार ने भी रिलेक्शेसन किया। वहां भी कुछ परिणाम हुआ, नहीं ऐसा नहीं, लेकिन कर्नाटक में भी व्यवहार शुरू हुआ। यह महत्वपूर्ण है। इस तरीके से कदम रखना होगा क्योंकि समाज की, राज्य की, देश की वित्त व्यवस्था पूरी तरह उध्वस्त हुई तो कोरोना से ज्यादा उसका दुष्परिणाम आगे की कुछ पीढ़ियों को सहना पड़ेगा। इसलिए ही वित्त व्यवस्था को दोबारा कैसे संवारा जा सकता है, इस दृष्टि से ध्यान देते हुए हम आगे कैसे जाएं, इसका विचार करना होगा। तब तक का निर्णय लेना होगा। इसका मतलब सब खोल दो, ऐसा नहीं है लेकिन थोड़ी-बहुत तो अब धीरे-धीरे ढील लेने की जरूरत है, वैसे वो दी गई है। उदाहरणार्थ परसों मुख्यमंत्री ठाकरे ने सलून शुरू करने के बारे में निर्णय लिया। उसकी आवश्यकता थी क्योंकि हमारे कई मित्र जब मिलते थे, उन्हें देखकर उनके सिर पर इतने बाल हैं, ये पहली बार पता लगा। कोरोना का परिणाम! दूसरी बात ऐसी कि इस व्यवसाय में आए लोगों की पारिवारिक समस्या काफी बढ़ने लगी थी, उस दृष्टि से सलून शुरू करने का निर्णय मुख्यमंत्री ने लिया और वो मेरी राय से योग्य निर्णय था।

मतलब मुख्यमंत्री ने अपने ढंग से लॉकडाउन शिथिल करने का निर्णय लिया…


– निश्चित ही मुख्यमंत्री ठाकरे द्वारा लिया गया निर्णय कुछ लोगों को थोड़ी देर से लिया गया लगता होगा, लेकिन उन्होंने यह निर्णय सही समय पर लिया है। मुख्यमंत्री का जो स्वभाव है, यह निर्णय उस स्वभाव के अनुकूल ही है। अर्थात निर्णय लेना ही है परंतु बेहद सतर्कता के साथ। निर्णय लेने के बाद कुछ दुष्परिणाम न हो, यह जितना ज्यादा सुनिश्चित किया जा सके, उतना करने के बाद लेना चाहिए और फिर कदम आगे बढ़ाना चाहिए। एक बार कदम बढ़ाने के बाद पीछे नहीं लेना है, यह उनकी कार्यशैली है।

बालासाहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे की कार्यशैली में यह अंतर है तो…

– सही है… यह अंतर है। वैसे यह रहेगा ही।

बालासाहेब ठाकरे फटाफट निर्णय लेकर फैसला सुना देते थे। लेकिन बालासाहेब कभी भी सत्ता में नहीं थे और उद्धव ठाकरे प्रत्यक्ष मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर हैं…

– यह अंतर भी है ही ना। बालासाहेब प्रत्यक्ष सत्ता में नहीं थे, फिर भी सत्ता के पीछे एक मुख्य घटक थे। उनके विचारों से महाराष्ट्र में सत्ता आई, महाराष्ट्र और देश ने देखा। आज विचारों से सत्ता नहीं आई लेकिन सत्ता प्रत्यक्ष कृति से लाने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी आज के मुख्यमंत्री ठाकरे की है। यह फर्क महत्वपूर्ण है।

इन तमाम परिस्थितियों में क्या कभी आपको बालासाहेब ठाकरे की याद आती है?

– आती है ना। कोरोना और लॉकडाउन के कारण पहले दो महीने इत्मीनान से घर में बैठा था। बालासाहेब के काम का तरीका मुझसे ज्यादा तुम जानते हो। वह क्या दिन भर घर के बाहर निकल कर कहीं जाते थे, ऐसा नहीं है। कई बार कई दिन वे घर में ही बिताते थे। परंतु घर में रहते हुए भी सहयोगियों को साथ लेकर उन्हें प्रोत्साहित करके सामने आई चुनौतियों का सामना करना बालासाहेब ने सिखाया था, ऐसा मुझे लगता है। मेरे जैसे को इन दो महीनों में बालासाहेब की याद इन्हीं वजहों से आती थी कि हमें घर से तो बाहर निकलना नहीं है लेकिन बाकी के काम, जिस दिशा में हमें जाना है, उस दिशा में जाने के लिए सफर की तैयारी हमें करनी चाहिए। ये जिस तरह से बालासाहेब करते थे उसकी याद मुझे इस दौरान आई।

कोरोना के कारण पूरी दुनिया बदल गई। इस बदली हुई दुनिया का परिणाम हिंदुस्थान पर भी हो रहा है, विदेश में जो नौकरीपेशा वर्ग पूरी दुनिया में फैला था, जो कि हमारा था, वह हमारे देश में लौट आया है। अभी आपने न्यूयॉर्क का उल्लेख किया। वहां से भी हजारों लोग यहां वापस आए। इस बदली हुई दुनिया को आप किस तरह से देखते हैं?

– मेरे अनुसार हमें इन हालातों को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। इस संकट के कारण पहली बार हमें ज्ञात हुआ कि दुनिया के कोने-कोने में हिंदुस्थानी कहां-कहां तक पहुंचे हैं। विशेषत: लॉकडाउन के पहले दो महीनों में मुंबई में रहकर यह काम बहुत ज्यादा करना पड़ा। वह काम यह था कि कई देशों से टेलीफोन आते थे कि हमारे देश में इतने-इतने हिंदुस्थानी हैं, उन्हें वापस लौटना है। उन्हें वापस लौटने के लिए विमान की व्यवस्था करने में सहयोग दें। मुझे आश्चर्यजनक झटका कब लगा? जब फिलीपींस में मेडिकल की पढ़ाई करने गए ४०० बच्चों के लौटने की व्यवस्था मुझे करनी पड़ी। ताशकंद से ३००-३५० विद्यार्थियों को लाने की व्यवस्था मुझे करनी पड़ी। इंग्लैंड-अमेरिका ठीक है लेकिन जो ये देश हैं, इन देशों में इतनी बड़ी संख्या में हमारे विद्यार्थी गए हैं, यह पता ही नहीं था। दुनिया के कोने-कोने में हिंदुस्थानी और मराठी, ये दोनों ही देखने को मिले। यह कोरोना के कारण हुआ।

इस पूरे प्रकरण से देश और राज्य की राजनीति ही बदल गई है। अब तक आप जैसे बड़े नेता सार्वजनिक सभा करते थे। हजारों लाखों लोगों की सभा को संबोधित करते थे। प्रधानमंत्री मोदी होंगे। आप होंगे, अन्य नेता होंगे। अब यह सब बंद हो जाएगा। क्या यह राजनीति का ही लॉकडाउन हो गया है?

– आप जो कहते हो, सही है। आज तो हालात ऐसे ही नजर आ रहे हैं। नए ढंग की राजनीति अब स्वीकार करनी होगी।

मूलत: भीड़ भारतीय राजनीति की आत्मा है। भीड़ नहीं होगी तो हमारी राजनीति इंच भर भी आगे नहीं बढ़ेगी। आपका संदेश आगे नहीं जाएगा। लाखों की भीड़ जो जमा करता है। वह बड़ा नेता है यह अब तक हमारे देश की अवस्था थी।

– यह स्थिति एकदम से बदल जाएगी ऐसा मुझे नहीं लगता। धीरे-धीरे हालात होते जाएंगे लेकिन हमारे लिए इस स्थिति को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव देखते हैं। उन चुनावों में दृश्य एकदम अलग होते हैं। हमारे यहां दृश्य अलग होते हैं। हम हिंदुस्थान को देखते हैं। बालासाहेब की लाखों की सभा होती थी। अटल जी की लाखों की सभा होती थी। इंदिरा गांधी की होती थी, यशवंतराव चव्हाण की होती थी। यह दृश्य अमेरिका एवं पश्चिमी देशों में देखने को नहीं मिलता है लेकिन टेलीविजन और रेडियो के माध्यम से पूरे देश का ध्यान उस दिन चर्चा की ओर होता था। मान लो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और प्रतिस्पर्धी उम्मीदवार इन दोनों के बीच डिस्कशन, चर्चा, सवाल-जवाब होते थे। उसको लगा होता था। पूरा देश देखता रहता है। लेकिन यह देखने के लिए और व्यक्त करने के लिए माध्यम अलग होता है। हमारा माध्यम अलग है।

हमारे यहां ये डिजिटल सभा का प्रकरण सफल होगा?

– हमारे यहां ऐसा है, यहां नेताओं वक्ताओं के सामने भीड़ नहीं होगी तो उनकी बातों में धार नहीं आती। मैं जो बोल रहा हूं, सामनेवाले को कितना जंच रहा है, कितना डायजेस्ट हो रहा है, ये उनके चेहरे से समझ आता है और मान लो वह स्तब्ध रह गया… भीड़ से बिलकुल भी प्रतिसाद नहीं मिल रहा होगा तो इसका भी प्रभाव वक्ता पर होता रहता है। इन सबसे हम गुजर चुके हैं। परंतु अब धीरे-धीरे ये तमाम पुराने तरीके हमें बदलने होंगे। मतलब ये सब शत-प्रतिशत समाप्त हो जाएंगे, मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं। परंतु ये धीरे-धीरे कम होगा ही। कम्युनिकेशन की आधुनिक तकनीक आत्मसात करने के बारे में सोचना होगा।

परंतु ग्रामीण भागों में ये कैसे सफल होगा? विधानसभा चुनाव में जैसा माहौल खुद आपने तैयार किया, जिसके कारण आगे परिवर्तन हो सका। खासकर भरी बरसात में आपकी सातारा जैसी सभा नए तंत्र में कैसे होगी? लोगों को दिल से लगता है कि मैं अपने नेता को देखूं, सामने से सुनूं। इसके आगे ये सब रुक जाएगा ऐसा लगता नहीं है?

– निश्चित ही ये रुक जाएगा। मेरे जैसे इंसान के लिए, मेरी पीढ़ी के इंसान के लिए यह रुक गया तो अच्छा नहीं है। लोगों के बीच जाना ही होगा। चुनावी सभाओं में न जाना, ऐसे भी हालात आएंगे क्या, इसकी चिंता है। लेकिन ये ज्यादा दिन चलेगा, ऐसा लगता नहीं है। चलना नहीं चाहिए, ऐसी प्रार्थना है।

एक साल पहले इस देश में लोकसभा चुनाव हुए थे। सामान्यत: देश की अवस्था और राजनीति ‘जैसे थे’ रही। अर्थात जो व्यवस्था थी व व्यवस्था बरकरार रही। प्रधानमंत्री मोदी हैं। उनकी सरकार बरकरार रही। केंद्र की राजनैतिक व्यवस्था बदलेगी, ऐसी संभावना नहीं थी। लोकसभा चुनाव का परिणाम जैसा अपेक्षित था वैसा ही आया, परंतु कुछ राज्यों में बदलाव हुआ। खासकर हम महाराष्ट्र के बारे में बात करें तो महाराष्ट्र की राजनीति ६ महीने पहले ही पूरी तरह से बदल गई। इस तरह से बदली कि पूरा देश इस महाराष्ट्र की घटनाओं के भविष्य की ओर एक अलग नजरिए से देखने लगा। कइयों के मन में एक सवाल है कि महाराष्ट्र में यह जो बदलाव है, ये एक हादसा था। उस समय हुआ? अथवा ये बदलाव सभी ने मिलकर किया।

– मुझे हादसा बिलकुल भी नहीं लगता। दो बातें हैं। महाराष्ट्र के लोकसभा के चुनाव। देश के लोकसभा के चुनाव में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की मराठी जनतों ने भी देश में जो दृश्य था, उससे सुसंगत महत्वपूर्ण भूमिका अपनाई। परंतु राज्य का सवाल आया, उस समय हमें महाराष्ट्र का नजारा और ही दिखने लगा। ये केवल महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में भी दिख रहा था। कहीं कांग्रेस आई… कहीं अन्य गठबंधन सत्तासीन हुए। अब मध्यप्रदेश का उदाहरण लें या राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़.. इन सभी राज्यों में तस्वीर बदली। लोकसभा के लिए वहां सीटें थीं। पीछे केंद्र सरकार थी। परंतु विधानसभा में भाजपा मुकरती दिखी। मेरे अनुसार महाराष्ट्र में तस्वीर बदलने का मूड जनता का था।

ऐसा आप कैसे कहते हैं?

– उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के पहले का दौर देखें। इन पांच वर्षों में शिवसेना और भाजपा की सरकार थी। लेकिन शिवसेना के विचारोंवाले जो मतदाता हैं और जो शिवसेना कार्यकर्ता हैं उन सभी में उस सरकार के प्रति एक तरह की व्याकुलता साफ दिखाई दे रही थी।

आपको ऐसा क्या महसूस हुआ?

– शिवसेना के काम करने की विशिष्ट शैली है। कोई काम हाथ में लेने के बाद उसे दृढ़तापूर्वक पूरा करना। उसके लिए कितना भी परिश्रम एवं पैसा देने की तैयारी रखनी चाहिए। भाजपा के साथ सहभाग के उस कालखंड में शिवसेना ने भारी कीमत चुकाई। साधारणत: शिवसेना को शांत वैâसे रखा जा सकता है, रोका वैâसे जा सकता है, उन्हें हाशिए पर कैसे रखा जा सकता है? यह नीति भाजपा ने हमेशा अपनाई। इसलिए शिवसेना को माननेवाला यह वर्ग उद्विग्न था। दूसरी बात, वो जो पांच साल महाराष्ट्र की जनता ने देखे वे वास्तविक अर्थों में भाजपा की ही सरकार होनी चाहिए, ऐसी ही थी। इसके पहले युति की सरकार थी। वर्ष १९९५ में मनोहर जोशी मुख्यमंत्री थे। उस दौरान ऐसा माहौल कभी नहीं था। इसकी वजह, उसका नेतृत्व शिवसेना के पास था और बालासाहेब के पास था। इस सरकार के पीछे उनकी सशक्त भूमिका थी। अभी जो इन दोनों की सरकार थी, उसमें भाजपा ने शिवसेना को करीब-करीब किनारे कर दिया और भाजपा ही असली शासक तथा इसके आगे के कालखंड में राज्य भाजपा के नेतृत्व के विचारों से ही चलेगा, यह भूमिका दृढ़ता से अपनाकर उन्होंने कदम बढ़ाए। महाराष्ट्र की जनता को यह जंचा नहीं।

मतलब इस महाराष्ट्र में हम ही राजनीति करेंगे, अन्य कोई नहीं करेगा…

– हां, कर ही नहीं सकता है। अन्य कोई यहां राजनीति कर ही नहीं सकता है। ऐसी सोच दिख रही थी।

फिर इसके विरोध में लोगों की बगावत उबलकर मतपेटी से निकली, ऐसा लगता है क्या?

– एकदम, सीधे-सीधे ऐसी ही अवस्था है और थोड़ा बहुत ये उपहास का विषय भी बन गया कि ‘मैं फिर आउंगा… मैं फिर आउंगा…’

मैं फिर आऊंंगा…

– हां, मैं फिर आऊंंगा… इस सबके कारण एक तो ऐसा है कि किसी भी शासक, राजनीतिज्ञ नेता को मैं ही आऊंंगा, इस सोच के साथ जनता को जागीर नहीं समझना चाहिए। इस तरह की सोच में थोड़ा दंभ झलकता है। ऐसी भावना लोगोें में हो गई और इन्हें सबक सिखाना चाहिए। यह विचार लोगों में फैल गया।

पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि मेरी सरकार चली गई अथवा मैं मुख्यमंत्री पद पर नहीं हूं, यह पचाने में बड़ी परेशानी हुई। इसे स्वीकार करने में ही दो दिन लगे। इसका अर्थ यह है कि हमारी सत्ता कभी नहीं जाएगी। इस सोच… अमरपट्टा ही बांधकर आए हैं।

– देखो, किसी भी लोकतंत्र में नेता हम अमरत्व लेकर आए हैं, ऐसा नहीं सोच सकता है। इस देश के मतदाताओं के प्रति गलतफहमी पाली तो वह कभी सहन नहीं करता। इंदिरा गांधी जैसी जनमानस में प्रचंड समर्थन प्राप्त महिला को भी पराजय देखने को मिली। इसका अर्थ यह है कि इस देश का सामान्य इंसान लोकतांत्रिक अधिकारों के संदर्भ में हम राजनीतिज्ञों से ज्यादा सयाना है और हमारे कदम चौखट के बाहर निकल रहे हैं, ऐसा दिखा तो वह हमें भी सबक सिखाता है। इसलिए कोई भी भूमिका लेकर बैठे कि हम ही! हम ही आएंगे…तो लोगों को यह पसंद नहीं आता है।

१०५ विधायकों का समर्थन होने के बावजूद प्रमुख पार्टी सत्ता स्थापित नहीं कर सकी। सत्ता में नहीं आ सकी। यह भी एक अजीब कला है अथवा महाराष्ट्र में चमत्कार हुआ। इसे आप क्या कहेंगे?

– ऐसा है कि तुम जिसे प्रमुख पार्टी कहते हो, वह प्रमुख पार्टी वैâसे बनी? इसकी भी गहराई में जाना चाहिए। मेरा स्पष्ट मत है कि विधानसभा में उनके विधायकों का जो १०५ फिगर हुआ, उसमें शिवसेना का योगदान बहुत बड़ा था। उसमें से तुमने शिवसेना को मायनस कर दिया होता, उसमें शामिल नहीं होती तो इस बार १०५ का आंकड़ा तुम्हें कहीं तो ४०-५० के करीब दिखा होता। भाजपा के लोग जो कहते हैं कि हमारे १०५ होने के बावजूद हमें हमारी सहयोगी यानी शिवसेना ने नजरअंदाज किया अथवा सत्ता से दूर रखा। उन्हें १०५ तक पहुंचाने का काम जिन्होंने किया, यदि उन्हीं के प्रति गलतफहमी भरी भूमिका अपनाई तो मुझे नहीं लगता कि औरों को कुछ अलग करने की आवश्यकता है।

परंतु उनके लिए जो संभव नहीं हुआ, वह शरद पवार ने संभव कर दिखाया। और शिवसेना को भाजपा के बगैर मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचा दिया।

– ऐसा कहना पूरी तरह सच नहीं है। मैं जिन बालासाहेब ठाकरे को जानता हूं। मेरी तुलना में आप लोगों को शायद अधिक जानकारी होगी। परंतु बालासाहेब की पूरी विचारधारा, काम करने की शैली भारतीय जनता पार्टी के अनुरूप थी, ऐसा मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ।

क्यों…? आपको ऐसा क्यों लगा?

– बताता हूं ना। सबकी वजह ये है कि बालासाहेब की भूमिका और भाजपा की विचारधारा में अंतर था। खासकर काम की शैली में जमीन आसमान का अंतर है। बालासाहेब ने कुछ व्यक्तियों का आदर किया। उन्होंने अटलबिहारी वाजपेयी का? आदर किया। उन्होंने आडवाणी का किया। उन्होंने प्रमोद महाजन का आदर किया। उन सभी को सम्मान देकर उन्होंने एक साथ आने का विचार किया और आगे सत्ता आने में सहयोग दिया। दूसरी बात ऐसी थी कि कांग्रेस से उनका संघर्ष था, ऐसा मुझे नहीं लगता। शिवसेना हमेशा कांग्रेस के विरोध में ही थी, ऐसा नहीं है।

बालासाहेब अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा मुंह पर ही कहनेवाले नेता थे। इसलिए ये अब हुआ होगा।

– हां, बालासाहेब वैसे ही थे। जितने बिंदास उतने ही दिलदार। राजनीति में वैसी दिलदारी मुश्किल है। शायद बालासाहेब ठाकरे और शिवसेना देश का पहला ऐसा दल है कि किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर सत्ताधारी दल के प्रमुख लोगों का खुद के दल के भविष्य की चिंता न करते हुए समर्थन करते थे। आपातकाल में भी पूरा देश इंदिरा गांधी के विरोध में था। उस समय अनुशासित नेतृत्व के लिए बालासाहेब इंदिरा गांधी के साथ खड़े थे। सिर्फ खड़े ही नहीं हुए बल्कि हम लोगों के लिए चैंकानेवाली बात तो ये भी थी कि उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के चुनाव में वे अपने उम्मीदवार भी नहीं उतारेंगे! किसी राजनीतिक दल द्वारा हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे बोलकर राजनीतिक दल को चलाना मामूली बात नहीं है। लेकिन ऐसा बालासाहेब ही कर सकते थे और उन्होंने करके भी दिखाया। उसका कारण ये है कि उनके मन में कांग्रेस को लेकर कोई द्वेष नहीं था। कुछ नीतियों को लेकर उनकी स्पष्ट सोच थी। इसलिए उस समय कुछ अलग देखने को मिला और आज लगभग उसी रास्ते पर उद्धव ठाकरे चल रहे हैं, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं है।

आपका शिवसेना से कभी वैचारिक नाता था, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता…लेकिन आज आप महाराष्ट्र में एक हैं..

– वैचारिक मतभेद थे। कुछ मामलों में रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं था कि सुसंवाद नहीं था। बालासाहेब से सुसंवाद था। शिवसेना के वर्तमान नेतृत्व से ज्यादा सुसंवाद था। मिलना-जुलना, चर्चा, एक-दूसरे के यहां आना-जाना, ये सारी बातें थीं। ऐसा मैं कई बार घोषित तौर पर बोल चुका हूं। बालासाहेब ने अगर किसी व्यक्ति, परिवार या दल से संबंधित व्यक्तिगत सुसंवाद रखा या व्यक्तिगत ऋणानुबंध रखा, तो उन्होंने कभी किसी की फिक्र नहीं की। वे ओपनली सबकी मदद करते थे। इसलिए मैं अपने घर का घोषित तौर पर उदाहरण देता हूं कि सुप्रिया के समय सिर्फ बालासाहेब ही उसे निर्विरोध चुनकर लाए। यह सिर्फ बालासाहेब ही कर सकते थे।

आपने राज्य में महाविकास आघाड़ी का प्रयोग किया, आपने उसका नेतृत्व किया। उसे ६ महीने पूरे हो चुके हैं। यह प्रयोग कामयाब हो रहा है, ऐसा आपको लगता है क्या?

– बिल्कुल हो रहा है। यह प्रयोग, और भी कामयाब होगा, इस प्रयोग का फल महाराष्ट्र की जनता और महाराष्ट्र के विभिन्न विभागों को मिलेगा, ऐसी स्थिति हमें अवश्य देखने को मिलेगी। लेकिन अचानक कोरोना संकट आ गया। यह महाराष्ट्र का दुर्भाग्य है। गत कुछ महीनों से राज्य प्रशासन, सत्ताधीश तथा राज्य की पूरी यंत्रणा सिर्फ एक काम में ही जुटी हुई है, वह है कोरोना से लड़ाई। इसलिए बाकी मुद्दे एक तरफ रह गए हैं। एक और बात बताता हूं अगर फिलहाल का सेटअप ना होता तो तो कोरोना संकट से इतने प्रभावीपूर्ण ढंग से नहीं निपटा जा सकता था। ध्यान रहे, कोरोना जितना बड़ा संकट और तीन विचारों की पार्टी, लेकिन सब लोग एक विचार से मुख्यमंत्री ठाकरे के साथ खड़े हैं। उनकी नीतियों के साथ खड़े हैं और परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। लोगों के साथ मजबूती से खड़े हैं। यह कामयाबी है, इसका मुझे पूरा विश्वास है। सब लोग एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं इसलिए यह संभव हुआ है। तीनों दलों में जरा-सी भी नाराजगी नहीं है।

और श्रेय लेने की जल्दबाजी भी नहीं।
– बिल्कुल नहीं।

आपने पुलोद का प्रयोग देश में पहली बार किया। कई पार्टियों को मिलाकर राज किया। पुलोद की सरकार और वर्तमान महा विकास आघाड़ी सरकार में क्या फर्क है?

– फर्क ऐसा है कि पुलोद सरकार का नेतृत्व मेरे पास था। उस सरकार में सभी लोग थे। आज की भाजपा उस समय जनसंघ के रूप में थी, वे भी हमारे साथ थे, वे भी उसमें थे। मंत्रिमंडल एक विचार से काम करने वाला था। उसमें किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं थी। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि केंद्र सरकार उसे पूरा साथ देती थी। पुलोद की सरकार आई, उस समय देश का नेतृत्व मोरारजी भाई देसाई के पास था। वह प्रधानमंत्री के रूप में महाराष्ट्र की पुलोद सरकार को पूरी ताकत से मदद करते थे। आज थोड़ा फर्क यह है कि यहां आइडियोलॉजी अलग होगी, फिर भी एक विचार से काम करनेवाले लोग साथ आए हैं। दिशा कौन सी है, यह स्पष्ट है और उस दिशा में जाने की यात्रा भी अच्छी रहेगी तथा लोगों के हित में रहेगी, इसका ध्यान रखा गया है। लेकिन पुलोद के समय जैसे केंद्र मजबूती से साथ देता था, वैसा इस समय नहीं दिखता।

इस सरकार के आप हेडमास्टर हैं या रिमोट कंट्रोल?

– दोनों में से कोई नहीं। हेडमास्टर तो स्कूल में होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार या प्रशासन कभी रिमोट से नहीं चलता। रिमोट कहां चलता है? जहां लोकतंत्र नहीं है वहां। हमने रशिया का उदाहरण देखा है। पुतिन वहां २०३६ तक अध्यक्ष रहेंगे। वो एकतरफा सत्ता है, लोकतंत्र आदि एक तरफ रख दिया है। इसलिए यह कहना कि हम जैसे कहेंगे वैसे सरकार चलेगी, यह एक प्रकार की जिद है। यहां लोकतंत्र की सरकार है और लोकतंत्र की सरकार रिमोट कंट्रोल से कभी नहीं चल सकती। मुझे यह स्वीकार नहीं। सरकार मुख्यमंत्री और उनके मंत्री चला रहे हैं।(hindisaamana)
 


05-Jul-2020 4:21 PM

नई दिल्ली, 5 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव पार्टी के हाईप्रोफाइल चेहरों में से एक हैं। 2003 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रवक्ता बनने के बाद से वह देश ही नहीं दुनिया की मीडिया में भी सुर्खियों में रहे। तब उन्हें आरएसएस का ‘ग्लोबल एम्बेसडर’ भी कहा जाने लगा था। 2014 में उनकी भाजपा में बतौर नेशनल जनरल सेक्रेटरी एंट्री हुई। तबसे वह पार्टी में जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर मामलों की गतिविधियां देख रहे हैं।

राम माधव ने पूर्वोत्तर में भाजपा की पहुंच बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह उनकी कोशिशों का नतीजा है कि जिस पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी की उपस्थिति नहीं थी, वहां के राज्यों में आज भाजपा की सरकारें हैं। आंध्र प्रदेश के मूलनिवासी 56 वर्षीय राम माधव आरएसएस में प्रचारक बनने से पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे।

बहुत जल्दी ही जम्मू-कश्मीर को वापस पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का प्रयास किया जाएगा
राम माधव ने जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के सवाल पर कहा कि उनकी पार्टी इसका समर्थन करती है। उन्होंने कहा, भाजपा की जम्मू-कश्मीर यूनिट का मत है कि सही समय हो तो राज्य का दर्जा वापस दिया जाए। हम चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल हो। गृहमंत्री अमित शाह ने खुद यूनियन टेरिटरी का दर्जा देते समय कहा था कि बहुत जल्दी ही वापस पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का प्रयास किया जाएगा। अभी यूनियन टेरिटरी के लिए असेंबली और डिलिमिटेशन कमीशन का गठन होना है।

सभी नेता राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेकर प्रशासन और जनता के बीच सेतु का काम करें
घाटी में राजनीतिक गतिविधियों को शुरू करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ज्यादातर नेता रिहा किए जा चुके हैं। राम माधव ने कहा, भाजपा चाहती है कि सभी नेता राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेकर प्रशासन और जनता के बीच सेतु का काम करें, लेकिन पीडीपीए नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस के सभी बड़े नेता घरों में बैठे हैं। कांग्रेस के नेता तो गिरफ्तार भी नहीं हुए थे। ऐसे में उन्हें जवाब देना चाहिए कि क्यों राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। असेंबली चुनाव होगा तभी राजनीतिक गतिविधि चलेंगी।

केवल कॉलोनियां बनाने से ही कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं हो सकती
हाल में अजय पंडित की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों में डर और उनकी घर वापसी से जुड़े सवाल पर राम माधव ने कहा कि गृहमंत्रालय इस पूरे मामले को देख रहा है। उन्होंने कहा, जब तक वहां सुरक्षा और सम्मान दोनों की हम गारंटी नहीं कर सकेंगे तब तक घाटी में पंडितों का जाना संभव नहीं होगा। केवल कालोनियां बनाने से ही पंडितों की घर वापसी नहीं हो सकती।

370 के रहते सिर्फ नेताओं की संपन्नता बढ़ी, लेकिन जनता को कोई फायदा नहीं हुआ
पीडीपी के साथ सरकार बनाने के सवाल पर भाजपा महासचिव ने कहा कि अगर भाजपा सरकार न बनाती तो फिर से विधानसभा चुनाव होता। हालांकि पीडीपी के साथ सरकार बनाने का कुछ फायदा भी हुआ और कुछ नुकसान भी हुआ। नुकसान के कारण ही तीन साल बाद भाजपा अलग हो गई। राम माधव ने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद जनता में बहुत कम विरोध हुआ है। जनता ने महसूस किया कि 370 के रहते सिर्फ नेताओं की संपन्नता बढ़ी, लेकिन जनता को कोई फायदा नहीं हुआ। अब जनता का रुख सकारात्मक दिख रहा है।

सैयद अली शाह गिलानी के इस्तीफे को राम माधव ने हुर्रियत की अंदरुनी राजनीति का परिणाम बताया। कहा कि गिलानी के इस्तीफे से पिछले 30 साल के उनके कारनामे माफ नहीं हो जाएंगे। गिलानी की वजह से हजारों युवाओं की घाटी में जान गई।

चीन की जमीन हड़पने की पुरानी आदत रही है, मगर सरकार ने पिछले 5 सालों में मुंहतोड़ जवाब दिया है
भाजपा के राष्ट्रीय महासिव ने चीन के मसले पर भी बात की। उन्होंने कहा कि चीन की जमीन हड़पने की पुरानी आदत रही है, मगर मोदी सरकार ने पिछले 5 सालों में मुंहतोड़ जवाब दिया है। आखिर चीन से सीमा विवाद का हल क्या है?  इस सवाल पर राम माधव ने कहा कि दो मोर्चों पर खास तौर से सरकार काम कर रही है। प्रो ऐक्टिव डिप्लोमेसी और स्ट्रांग ग्राउंड पोजीशनिंग पर बल दिया जा रहा है। सैन्य और कूटनीतिक स्तर से जहां बात चल रही है वहीं एक-एक इंच भूमि की रक्षा के लिए भी सरकार संकल्पित है।

दोबारा गलवान घाटी जैसा हादसा न हो, इसके लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। राम माधव ने कहा कि मोदी सरकार बनने के बाद से भारत ने सीमा-नीति को लेकर कठोरता बरती है। 2017 के डोकलाम और मौजूदा गलवान घाटी की घटना को लेकर उन्होंने कहा, डोकलाम में भारत जिस मजबूती के साथ सीना ताने खड़ा हुआ, उससे चीन भी हैरान था। तब चीन, चिकन नेक एरिया के नजदीक आने की कोशिश में था, मगर भारत ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए उसकी साजिश सफल नहीं होने दी थी।
राम माधव ने कहा कि चीन चाहता था कि हम सेना हटाएं, लेकिन मोदी सरकार ने साफ़ कर दिया था कि जब तक चीन सीमा के पास किए गए निर्माण नहीं हटाता सेना नहीं हटेगी। उन्होंने कहा कि इस बार भी चीन ने एलएसी में घुसने की कोशिश की, जिसे हमने रोका। लाठी-पत्थर भी बरसे, दुर्भाग्य से हमारे 20 जवान शहीद हुए। भारत ने चीन को संदेश दिया है कि हम सीमा पर चुपचाप कब्जा करने की चीन की चाल को सफल नहीं होने देंगे।

आज भले ही नेपाल भारत विरोधी बयानबाजी कर रहा हो, लेकिन इससे दोनों देशों के संबंध नहीं बिगड़ेंगे
मित्र देश नेपाल आखिर भारत के विरोध में क्यों खड़ा हो गया है? इस सवाल पर राम माधव ने कहा कि आज भले ही नेपाल भारत विरोधी बयानबाजी कर रहा हो, लेकिन इससे दोनों देशों के संबंध नहीं बिगड़ेंगे। वैसे यह पहली घटना नहीं है, राजवंश के समय से ऐसी घटनाएं कई बार हुईं है। उन्होंने कहा, जब नेपाल में राजा का शासन था तब नेहरू जी का विरोध करता था।

राम माधव ने कहा,ज्ज्अतीत और वर्तमान के अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि नेपाल के भारत का विरोध करने का ज्यादा कारण आंतरिक होता है। जब कोई अंदरुनी समस्या होती है, तब वहां की सरकार को लगता है कि पड़ोसी भारत पर कुछ हमले करो तो आंतरिक राजनीति में फायदा होगा।ज्ज् भाजपा महासचिव ने साफ किया कि भारत और नेपाल के संबंध हमेशा पहले की तरह मजबूत रहेंगे।


05-Jul-2020 9:59 AM

‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज़’ के निदेशक सेंगे सेरिंग से बातचीत

-आरिफ़ आज़ाकिया

ख़बर है कि पाकिस्तानी सेना कोरोना वायरस से संक्रमित वहां के पंजाबियों को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर व गिलगित-बाल्टिस्तान में भेज रही है. स्थानीय जनता इसका भारी विरोध कर रही है, तब भी मीरपुर सहित कई प्रमुख शहरों में इन संक्रमितों के लिए कई क्वारंटीन शिविर बनाये गये हैं. पाकिस्तानी सेना चाहती है कि पंजाब में जहां कहीं सैन्य प्रतिष्ठान या सेना वालों के घर-परिवार हैं, उनके आस-पास कोरोना वायरस का कोई संक्रमित या पीड़ित नहीं होना चाहिये. गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों का मानना है कि उनके मानवाधिकारों को धता बताने वाली यह कार्रवाई उन्हें कोविड-19 का निशाना बनाने के लिए भी की जा रही है.

गिलगित-बाल्टिस्तान भारत की आजादी से पहले जम्मू-कश्मीर रियासत का ही हिस्सा था. 1947 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया तब गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरे कश्मीर का भारत में विलय हो गया. लेकिन उस समय से ही यह पाकिस्तान के कब्जे में है जबकि भारत इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है.

फिलहाल गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर का भी हिस्सा नहीं है और सिर्फ नाम के लिए ही पाकिस्तान का एक स्वायत्त इलाका है. इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें तो दक्षिण में यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जुड़ा हुआ है, पश्चिम में पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा प्रांत से, उत्तर में अफगानिस्तान से, पूर्व में चीन से, उत्तर-पूर्व में जम्मू-कश्मीर से और दक्षिण-पूर्व में लद्दाख से.

आरिफ़ आजाकिया मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले एक पाकिस्तानी हैं. 1980 वाले दशक में उन्हें पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था. उनके पास फ्रांस की नागरिकता है, पर वे अब लंदन में रह कर अपना संघर्ष चलाते हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के इस वर्ष जेनेवा में हुए 43 वें सम्मेलन के दौरान उन्होंने वॉशिंगटन स्थित ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज़’ के निदेशक सेंगे सेरिंग से, जो स्वयं गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी और वहां होने वाले अत्याचारों के भुक्तभोगी रहे हैं, वहां की स्थिति के बारे में एक इंटरव्यू किया. इस इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण अंश.

गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तानी आधिपत्य को लेकर इस समय क्या ज़मीनी स्थिति है?

सेंगे सेरिंग– वहां की जनता संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं. उसके पास आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं है. ऐसा कोई सरकारी ढांचा भी नहीं है जो उसे किसी प्रकार की स्वायत्तता देता हो. संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में उसे आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया था. बल्कि, एक प्रकार से गारंटी दी गयी थी कि जब तक समस्या हल नहीं हो जाती, वहां एक स्थानीय प्राधिकरण होगा. उस समय वहां पाकिस्तान का कोई अमल-दखल नहीं था. संयुक्त राष्ट्र ने तो पाकिस्तान से कहा कि आप वहां से जायें. हम भी जानते थे कि हमारा विलय भारत के साथ हुआ है. हम भारत के नागरिक हैं. हम समझते हैं कि अगर इसका कोई विलंबित हल है तो वह गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों और भारत की केंद्र सरकार के बीच से ही निकल सकता है. यह तो हुआ संक्षेप में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का सार.

लेकिन, हमारा तो सफ़ाया हो रहा है. हमारे बिना तो पाकिस्तान और चीन के बीच कोई ज़मीनी रास्ता ही नहीं है. दोनों की कोई साझी सीमा तो है नहीं. इस वजह से पाकिस्तान हताशा का शिकार है कि यदि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अमल हो गया और पाकिस्तान को वहां से निकलना पड़ा, तो उसके और चीन के बीच की जो आपसी मिलीभगत है, वह ख़त्म हो जायेगी. पाकिस्तान की इस कारण यही कोशिश होती है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के मूल निवासियों का दमन करते हुए उन्हें फौलादी मुट्ठियों में जकड़ कर रखा जाये. उनके प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम शोषण किया जाये. लोगों की अपेक्षाओं-आकाक्षांओं को मान्यता दिये बिना लूट-मार की जाये.

पाकिस्तान और चीन मिल कर यही कर रहे हैं. स्थानीय लोग जब भी विरोध का स्वर उठाते हैं तो उन पर आतंकवाद के मुक़दमे थोप दिये जाते हैं. आतंकवाद-निरोधक क़ानून लगा दिया जाता है. एक तरह का आपातकाल है वहां पर. लोगों को लगता है कि वे जेल में बंद हैं. पाकिस्तान तो एक ऐसा देश है, जो तालिबान को अमनपसंद कहता है और जो आम लोग अपने संसाधनों के लिए आवाज़ उठाते हैं, उनको आतंकवादी बताता है. पाकिस्तान अपने बलूचों और पख्तूनों के साथ जो कर रहा है, वही गिलगित-बाल्टिस्तान में भी कर रहा है.

गिलगित-बाल्टिस्तान में कई जातियों-धर्मों के लोग रहा करते थे, उनका क्या हाल है?

सेंगे सेरिंग– हमारी जो इस्माइली बिरादरी है, उसे वहां रहने वाले पाकिस्तानियों द्वारा डराया-धमकाया गया कि गिलगित-बाल्टिस्तान के जो इस्माइली और शिया हैं, उन्हें मालूम है कि किस तरह से हमने उनके क़त्लेआम किये हैं. हम उन पर दुबारा हमला करेंगे. इस धमकी के पीछे इतिहास यह है कि गिलगित में ज़मीन पर अनधिकृत क़ब्ज़ा जमाए बैठे पाकिस्तानी नागरिकों का स्थानीय लोगों ने जब विरोध किया, तो उन्होंने हमारे कुछ स्थानीय लोगों का अपहरण कर लिया और उन्हें ख़ूजिस्तान में ले गये. गिलगित की स्थानीय पुलिस ने बाद में उन लोगों को गिरफ़्तार किया, जिन पर अपहरण करने का शक था.

इस गिरफ़्तारी के खिलाफ़ पूरा कोहिस्तान क़त्लेआम की धमकियां देने लगा. तो, हमारे लोग तो बेचारे एक तरह से जेल में रह रहे हैं. उनका ज़मीनी रास्ता पाकिस्तान से ही होकर गुज़रता है. वे खाने-पीने के सामान के लिए उसी रास्ते पर निर्भर हैं. रोज़मर्रा की ज़रूरतें पाकिस्तान से ही आती रही हैं. भारत के साथ वाले रास्ते जान-बूझ कर बंद रखे गये हैं, ताकि हमें पाकिस्तान का मुंह जोहने के सिवाय कोई दूसरा चारा न रहे. अफ़ग़ानिस्तान के साथ के हमारे रास्ते भी बंद हैं. सिर्फ चीन और पाकिस्तान के बीच के रास्ते खुले हैं, ताकि हमें ब्लैकमेल कर के और एक प्रकार से जेल में बंद रख कर हमारे ऊपर अपनी मनमर्ज़ी और धौंस चला सकें. हमारा शोषण कर सकें.

गिलगित-बाल्टिस्तान की जनसंख्या में इस्माइली बिरादरी का, शिया-सुन्नी का क्या अनुपात है और क्या ग़ैर-मुस्लिम भी वहां रहते हैं?

सेंगे सेरिंग– मुझे याद है कि अरगनोख़ हमारा एक गांव है, जहां पर स्थानीय आबादी ग़ैर-मुस्लिमों की होती थी. लेकिन 1971 के युद्ध के आस-पास वे भारत की तरफ पलायन कर गये. जहां तक मुझे पता है, इस समय वह शतप्रतिशत एक मुस्लिम इलाका है. अगर आप पाकिस्तान से आकर बस गयों को ना देखें, तो जो मूल निवासी हैं – और उनमें उन लोगों को भी जोड़ लें, जो रोज़मर्रा की अपनी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए या शिक्षा-व्यापार जैसे अवसरों के लिए अस्थायी तौर पर पाकिस्तान में रह रहे हैं – तो हमारी कुल क़रीब दो-ढाई लाख की जनसंख्या है. इस्लामाबाद-रावलपिंडी में भी एक लाख से ऊपर हमारे लोग हैं. ये सारे मिला कर कह सकते हैं कि जो स्थानीय शिया आबादी है – जिसमें बारेइमामी हैं, सूफ़ी नूरबख़्शी हैं, जाफ़ीशिया हैं, ईशशिमामी और इस्माइली हैं – इन सबको मिलाकर कह सकते हैं कि इनकी क़रीब 70-75 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या है. यह अनुपात क़रीब 80 प्रतिशत हो जायेगा, यदि मूल स्थानीय निवासियों को भी इसमें मिला लें.

लेकिन, अब पाकिस्तान से आये लोगों की बाढ़ के चलते मिली-जुली जनसंख्या काफ़ी बढ़ गयी है. अकेले गिलगित शहर में ही लगभग 115 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इसी प्रकार चित्राल, स्वात और कोहिस्तान में भी आबादी बढ़ी है. सभी लोगों को जोड़ कर देखें, तो कह सकते हैं कि अब सुन्नी कम से कम 35 प्रतिशत हो गये होंगे. ये पाकिस्तान की बदनीयती है, बेईमानी है कि वह स्थानीय शियों को निष्ठावान नहीं मानता. वह समझता है कि जब आप शियों को अल्पसंख्यक बना देंगे, जैसा कि पारेचेनार में किया गया है – पारेचेनार में किसी ज़माने में 80-85 प्रतिशत शिया होते थे – तो उनकी तरफ़ से विरोध भी कम हो जायेगा. तालिबान को भी ला कर वहां आबाद किया गया है. तो इस तरह शियों का अनुपात घटते-घटते अब क़रीब 40 प्रतिशत पर आ गया है. पाकिस्तान की यही कोशिश है कि शिया, इस्माइली, नूरबख़्शी जब 50 प्रतिशत से कम हो जायेंगे, यानी अल्पसंख्यक बन जायेंगे, तो वहां के स्थानीय लोगों को नियंत्रित करना आसान हो जायेगा. स्थानीय लोगों को पाकिस्तान अपने लिए ख़तरा समझता है. 

 

क़ाफ़िरिस्तान एक शब्द है, जिसे गिलगित-बल्टिस्तान से जोड़ा जाता है. इस काफ़िरिस्तान के बारे में कुछ बतायें, वहां ग़ैर-मुस्लिम तो अब हैं नहीं?

सेंगे सेरिंग– जो ड्यूरंड लाइन है अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच, उसके ऊपर जो इलाक़े और घाटियां हैं, उनको मिलाकर क़ाफ़िरिस्तान कहा जाता है. ये चित्राल का कुछ इलाका़ है, लेकिन अधिकतर अफ़ग़ानिस्तान में है. तो, ज्यों-ज्यों वहां के लोग मुसलमान होते गये, उनको काफ़िर कहना छोड़ दिया गया. इसी तरह जो नूरिस्तान है, वह पहले क़ाफ़िरिस्तान का हिस्सा था. वहां के लोग जब मुसलमान हो गये, तो उसे नूरिस्तान कहना शुरू कर दिया. वे दरअसल एक स्थानीय दार्दिक क़बीला हैं, जिनका भाषायी और जातीय (एथनिक) मेल गिलगित के लोगों के साथ है, चलास के लोगों के साथ है. लद्दाख में इस तरह के बहुत से लोग दाहनू में भी हैं. कश्मीर में भी हैं. हमारे दार्दिक समुदाय की जड़ें मध्यप्रदेश में हैं. वहीं से वे आये थे. वे अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान में भी बस गये.

दुर्भाग्य से इन लोगों पर बहुत अत्याचार होता है. उन्हें ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है. पाकिस्तान में ‘जमाते इस्लामी’ के जो जत्थे हैं, और हमारे केलाश में जो लोग हैं, वे उनको तंग करते हैं. उनकी लड़कियों को तंग करते हैं. ज़बर्दस्ती धर्मांतरित करते हैं. उन्हें अपनी संस्कृति के लिए शर्मिंदा किया जाता है. उन्हें एक सामजिक कलंक बना दिया गया है. यह घुट्टी पिला दी गयी है कि जो मुलमान नहीं है, वह कोई सच्चा एथनिक या धार्मिक समुदाय नहीं हो सकता. उन पर धर्मांतरण करने का भारी दबाव है. बताया जाता है कि इन लोगों की संख्या अब डेढ़-दो हज़ार से भी कम रह गयी है.

धारा 370 भारत में हटा दी गयी है. इसका आप से सीधा संबंध है. गिलगित-बल्टिस्तान महाराजा हरि सिंह के कश्मीर का हिस्सा हुआ करता था. इससे आपके लोगों को कोई लाभ-हानि हो सकती है?

सेंगे सेरिंग– हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत आभारी हैं कि उन्होंने इतना बड़ा क़दम उठाया. इसे तो 70 साल पहले ही हो जाना चाहिये था. प्रधानमंत्री नेहरू ने जब इसे शब्दबद्ध किया और भारत के संविधान का एक अनुच्छेद बनाया, तब उन्होंने कहा था कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है, समय के साथ ख़त्म हो जायेगी. लेकिन, राजनैतिक दबाव के कारण वे ऐसा नहीं कर पाये. प्रधानमंत्री मोदी का यह बहुत ही अच्छा क़दम है. इसमें गिलगित-बल्टिस्तान के लिए जो सबसे बड़ा आशीर्वाद है, वह यह कि हम हमेशा से कहते आये हैं कि जम्मू-कश्मीर के जो एथनिक ग्रुप हैं, उनके साथ हमारा संबंध नहीं है. हमारी लद्दाख़ से जुड़ी अपनी एक अलग पहचान है. अनुच्छेद 370 को हटा कर लद्दाख को एक अलग प्रदेश का, संघीय क्षेत्र का जो दर्जा दिया गया है, वह बहुत अच्छी बात है. अब हम क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर लद्दाख का हिस्सा बन गये हैं. भारत का हिस्सा तो हम पहले भी थे.

 

1949 में भारत का जो संविधान बना था, उसने हमें भारत का हिस्सा बना लिया था, लेकिन कश्मीर से जोड़ रखा था. अब हमें कश्मीर से निकाल कर लद्दाख का हिस्सा बनाया गया है. इस प्रकार हमारी पहचान को पुनर्स्थापित किया गया है. मनुष्य अपने इतिहास में जिस बात के लिए सबसे अधिक संघर्ष करता है, वह है उसकी अपनी पहचान. लद्दाख के साथ जोड़कर हमारी पहचान को बहाल करने के लिए हम मोदी जी को सैल्यूट करते हैं.

इस क़दम के बाद हम यह भी देख रहें हैं उनके ऊपर कितने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ रहे हैं. लेकिन हम उनको सैल्यूट करते हैं कि वे हिम्मत के साथ अडिग हैं. चुनाव-घोषणापत्र के अपने वादे को पूरा किया है. हम यहां संयुक्त राष्ट्र की बिल्डिंग में हैं. संयुक्त राष्ट्र से हमारी यही मांग और उससे यही अनुरोध है कि पाकिस्तान पर दबाव डाला जाये कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर अब अमल करे. हमारे इलाके से पीछे हटे, ताकि भारत के संविधान के अधीन हमें जो लाभ मिलने हैं, भारत का नागरिक होने के हमें जो अधिकार मिलने हैं, उन्हें हम पा सकें.

धारा 370 हटाने के साथ कश्मीर में जो पाबंदियां लगाई गयीं, जो सख़्तियां हुयीं, भारत के लिए क्या यह सब ज़रूरी था?

सेंगे सेरिंग– देखिये, 370 को हटाते समय पाकिस्तान की ओर से बहुत-सी धमकियां आयी थीं. इमरान ख़ान ने कहा था कि वहां खून की नदियां बहेंगी. जनसंहार होगा. पाकिस्तान के पाले हुए सारे आतंकवादी तैयार बैठे थे कि स्थानीय लोगों के साथ, जमाते इस्लामी के जो ग्रुप दक्षिणी कश्मीर में हैं, उनके साथ मिल कर वे मारकाट करेंगे, ताकि दुनिया में यह संदेश जाये कि जम्मू-कश्मीर में जो हो रहा है, वहां की पूरी जनता उसके खिंलाफ है. पाकिस्तान को इसका बहुत ज़्यादा रणनीतिक लाभ मिलना था.


लेकिन, अपने नागरिकों की जान बचाना हर सरकार का पहला कर्तव्य होता है. दिल्ली की सरकार हो या श्रीनगर की, दोनों की यही सबसे पहली ज़िम्मेदारी थी. संयुक्त राष्ट्र ने भारत से कहा कि गिलगित-बाल्टिस्तान में, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आपकी ज़िम्मदारी है कि वहां के लोगों के जीवन, सम्मान और माल-सामान की रक्षा हो. यह तो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भी लिखा है कि किसी भी सरकार की मूल जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों के जीवन, मान-सम्मान और माल-सामान की रक्षा करे. पाकिस्तान एक बहुत बड़ी साज़िश के तहत वहां नरसंहार करना चाहता था.

भारत सरकार ने बड़ी सावधानी व सफलता के साथ स्थिति को संभाला. लोगों की हरकतों को, टेलीफ़ोन द्वारा या सोशल मिडिया द्वारा दंगा-फ़साद फैलाने वालों को काबू में रखा. विरोध-प्रदर्शन हर देश में एक मौलिक अधिकार होता है. लेकिन पाकिस्तान का यह इतिहास रहा है कि वह अपने मनपसंद ग्रुपों द्वारा भारत में हमेशा घेराव-जलाव करवाता है, आगज़नी करवाता है. इन चीज़ों से बचाने के लिए और आम जनता को सुरक्षा देने के लिए भारत ने जो क़दम उठाये, वे बहुत ज़रूरी थे. भारत सरकार इसमें काफ़ी हद तक सफल भी रही.

‘सीएए’ वैसे तो भारत का आंतरिक मामला है, पर पाकिस्तान उसका सफलता के साथ जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाभ उठा रहा है, उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सेंगे सेरिंग– हाल ही में वाशिंगटन डीसी में एक सेमिनार हुआ था, जिसमें मुझे अपनी बात कहने का मौका दिया गया. उस सेमिनार में हमारे एक दोस्त खंडाराव जी ने इस मुद्दे को उठाया. उन्होने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका नाम ही ग़लत है. इसका नाम ‘रेफ्यूजी प्रोटेक्शन ऐक्ट’ होना चाहिये था. नाम में ‘नागरिक’ शब्द लगाकर कर यह आभास दिया गया कि भारतीय नागरिकों के साथ कोई समस्या है. जबकि ये क़ानून पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आये शरणार्थियों के बारे में है. इसका नाम ही भ्रामक है. इसका नाम यदि शुरू से ही ‘रेफ्यूजी प्रोटेक्शन ऐक्ट’ रहा होता, तो मैं नहीं समझता कि तब भारत के किसी नागरिक को यह बहाना मिलता कि वह उसका ग़लत इस्तेमाल करके पाकिस्तान को लाभ पहुंचा सके. मैं भी मुसलमान हूं और मैं समझता हूं कि इस क़ानून के नाम का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हमारी मुस्लिम बिरादरी ने ही किया है. उसके साथ भारत के वामपंथी भी जुड़ गये हैं. इससे पाकिस्तान में जो बहुत सारी शक्तियां हैं, उनके साथ मिलकर इन लोगों ने एक बहुत बाड़ा भारत-विरोधी बाज़ार बना लिया है. भारत सरकार को दबाव में डाल दिया है.


हमारे-जैसे पाकिस्तानी मुसलमान पाकिस्तान में रहते हुए सदा अल्पसंख्यकों के हितों की पैरवी करते रहे हैं. अपने स्कूल-कॉलेज के ज़माने से ही जब से हमें कुछ समझ आयी, हम कहने लगे कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण व पालन होना चाहिये. यह बड़े दुख की बात है कि बहुत से मुसलमान, जो पहले अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खड़े होते थे, इस समय उनके विरोध में खड़े होकर एक ग़लत सोच में फंस गये हैं; इस सोच में कि यह शायद भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों की नागरिकता से जुड़ा कोई मामला है.

हमें तो भारत सरकार को सैल्यूट करना चाहिये कि वे लोग, जो पिछले 70 साल से सिंध में, पंजाब में, बलोचिस्तान में अपने धर्म के कारण मर रहे थे, क़त्ल हो रहे थे, उनकी लड़कियां उठा ली जाती थीं, उनको भारत में अब एक नया शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा. बंग्लादेश में भी हिंदू अल्पसंख्यक कभी 25 प्रतिशत से भी अधिक होते थे. अब कम होते-होते 7-8 प्रतिशत ही रह गये हैं. ‘सीएए’ ज़बर्दस्ती धर्मांतरण और हत्याओं से अल्पसंख्यकों की जान बचायेगा. अफ़ग़ानिस्तान से भी 30 हज़ार सिक्ख भारत में बैठे हुए हैं. मैं बहुत खुश हूं कि पाकिस्तान में अत्याचार सह रहे बहुत से हिंदुओं को भारत में एक नया जीवन मिल सकता है. दुख इस बात का है कि पाकिस्तान के बहुत से मानवाधिकारवादी भी बिना ठीक से पढ़े-समझे, सिर्फ हिंदू- दुश्मनी में, भारत-दुश्मनी में आकर इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं. वे पाकिस्तान सरकार और इस्टैब्लिशमेंट (सैनिक तंत्र) के साथ खड़े हो गये हैं, जिनका काम ही अल्पसंख्यकों का दमन और शोषण करना है.

हम देखते हैं कि यूएन (संयुक्त राष्ट्र) में, यूरोपीय संसद में, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेन्ट (विदेशमंत्रालय) में या अन्य जगहों पर पाकिस्तान को कोई कुछ नहीं बोलता, जहां मानवाधिकार बिल्कुल हैं ही नहीं, जबकि भारत के बारे में दुनिया तुरंत बोलने लगती है. इसकी क्या वजह है?

सेंगे सेरिंग– जहा तक यूएन का संबंध है, तो यूएन तो एक फ़ोरम (मंच) है. यहां जेनेवा में हो, ऑस्ट्रिया में हो, न्यूयार्क में हो या कही भी हो, अलग-अलग देशों के एकसाथ मिल-बैठने की वह एक जगह है. यहां उन लगों की चलती है, जो लॉबीइंग करते हैं. यह नैतिक शक्ति को मनवाने की कोई संस्था नहीं है. पकिस्तान को सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि वह हमेशा अपना इस्लामी कार्ड इस्तेमाल करता है, और इस्लाम के नाम पर मुस्लिम देश उसके साथ हो जाते हैं. इसी तरह जो वामपंथी झुकाव वाले देश हैं, वे मुस्लिम देशों के पक्षकार बनते हैं. चीन उनका साथी बन कर उनके साथ बैठ जाता है.


पाकिस्तान अपने आप को एक अंडरडॉग (शोषित-उपेक्षित) दिखाता है. दुनिया भर में अपना फ़साद फैलाए हुआ है, फिर भी अपने आप को मजलूम (अत्याचार-पीड़ित) के तैर पर पेश करता है. भारत की कमी यह है कि वह एक अंतर्मुखी देश है. गुटनिरपेक्षता आन्दोलन में उसका जो रोल रहा है उसके कारण, 1940 और 50 वाले दशकों में (इस्लामी और पश्चिमी देशों से) उसके जो गठजोड़ बनने चाहिये थे, वे नहीं बन पाये.

भारत नें 1980-90 वाले दशकों में इस की शुरुआत की, तो ज़ाहिर है कि जब आप किसी चीज़ को देर से शुरू करते हैं, तो उसका नतीजा भी उसी तरह देर से ही मिलेगा. भारत अब धीरे-धीरे जाग रहा है. महसूस कर रहा है कि वह जब तक दूसरे देशों के साथ मिल कर लॉबीइंग नहीं करेगा, तब तक अपने बारे में पाकिस्तान द्वारा तुर्की जैसे मुस्लिम देशों में फैलायी गयी ग़लत धारणाओं की और चीन के साथ मिल कर बने उनके भारत-विरोधी गठजोड़ की काट नहीं कर पायेगा. भारत अब जिस रास्ते पर है, उससे आशा बंधती है कि दुनिया के देश भी धीरे-धीरे समझ जायेंगे कि भारत बाकी दुनिया के लिए कोई ख़तरा नहीं है. उसने कभी किसी दूसरे देश में जा कर वैसी कोई तबाही नहीं की है जैसी पाकिस्तान ने की है. पाकिस्तान ने जो भारत-विरोधी माहौल बनाया है, वह बहुत दिनों तक नहीं टिकेगा.

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