राजपथ - जनपथ
पीएम, सीएम, और डीएम की तर्ज पर !
कांग्रेस के देशभर के जिलाध्यक्षों की राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और राहुल गांधी के साथ बैठक की खूब चर्चा हो रही है। छत्तीसगढ़ से रायपुर शहर के जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे को छोडक़र बाकी सभी बैठक में शामिल हुए। देश के 320 जिलाध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था। जिसमें से 315 उपस्थित हुए। पांच जिलाध्यक्ष नहीं आए, उनमें गिरीश दुबे भी थे।
छत्तीसगढ़ से रायगढ़, और बस्तर के जिलाध्यक्ष को बोलने का मौका मिला। बताते हैं कि बैठक व्यवस्था इतनी बढिय़ा थी कि पहले कांग्रेसजनों ने ऐसी नहीं देखी थी। एआईसीसी के नए भवन के हॉल में कुर्सी में जिलाध्यक्षों के नाम चिपके हुए थे। पहले किसे बोलने का मौका मिलेगा यह तय नहीं था। बैठक में खुद राहुल गांधी इशारा कर बुला रहे थे, और फिर जिलाध्यक्ष एक-एक कर अपनी बात रख रहे थे। करीब 3 घंटे चली बैठक में जिलाध्यक्षों ने ऐसी-ऐसी बात कही कि राहुल गांधी भी लोटपोट हो गए।
राजस्थान के एक जिला अध्यक्ष ने कह दिया कि उनके यहां प्रदेश में सिर्फ दो नेताओं की चलती है। बाकी किसी की पूछ परख नहीं है। राहुल गांधी ने पूछ लिया कि किन दो नेताओं की चलती है? मगर जिलाध्यक्ष कुछ बोलने से हिचकिचा रहे थे। वजह थी कि राजस्थान के बड़े नेता सचिन पायलट खुद मंच पर थे। जाहिर है जिलाध्यक्ष का इशारा अशोक गहलोत, और सचिन पायलट की तरफ था। मगर राहुल के बार-बार पूछने पर भी उन्होंने दोनों नेता का नाम नहीं लिया।
रायगढ़ के जिलाध्यक्ष अनिल शुक्ला की तरफ राहुल ने इशारा किया, और दो मिनट में ही पार्टी के भीतर गुटबाजी को अनिल शुक्ला ने जिस अंदाज में रखा, उसकी काफी तारीफ हुई।
मंच पर पूर्व सीएम भूपेश बघेल, और प्रभारी पायलट भी थे। भूपेश थोड़े असहज दिखे। इन सबके बीच राजधानी के जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे क्यों नहीं आए, इसकी चर्चा हुई। कहा जा रहा है कि पार्टी उनसे पूछताछ कर सकती है।
बैठक का लब्बोलुआब यह रहा कि पार्टी हाईकमान जिलाध्यक्षों को ताकत देने के मूड में हैं, और उनके कामकाज की हाईकमान सीधे मॉनिटरिंग करेगा, और प्रत्याशी चयन में भी उनकी भागीदारी होगी। राहुल गांधी ने संकेत दिए कि अहमदाबाद अधिवेशन में सारी बातों पर चर्चा होगी। चाहे जो कुछ भी हो, इस बैठक ने जिलाध्यक्षों को ताकत मिली है। छत्तीसगढ़ के वो जिलाध्यक्ष भी खुश नजर आए, जिनके हटने की चर्चा चल रही है। देश में भी ऐसी ही व्यवस्था है। तीन ही स्तर ताकतवर माने जाते हैं, पीएम, सीएम, और डीएम(जि़ला कलेक्टर) !

तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसे बोर्ड जि़ंदा हैं। यही हिंदुस्तानी संस्कृति है। तस्वीर सुपरिचित लेखकसतीश जायसवाल ने फ़ेसबुक पर पोस्ट की है।
फेसबुक-वाट्सएप पर क्रांति
निगम मंडलों में नियुक्तियों को लेकर सफल लोगों के समर्थक होर्डिंग, फ्लेक्स और विज्ञापन, बुके, गजमाला, हार, मिठाई से खुशी मना रहे हैं इनमें भी ठेकेदार, सप्लायर अधिक हैं। और जो असफल हुए हैं उनके समर्थक फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सएप पर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं-
सैक्स सीडी कांड में भूपेश बघेल से पंगा लेने वाले एक कार्यकर्ता ने लिखा ज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ, इन बड़े लोगों से मिलकर बड़ा नुकसान हुआ।
एक अन्य ने असफल कार्यकर्ताओं को सांत्वना में समझाइश दी -
मुद्दतों इंतजार के बाद सरकार बहादुर ने निगम मंडल नाम की सूची जारी कर दी। कार्यकर्ता नाम के कुछ बेचारे सूक्ष्मदर्शी से दिखाई देने वाले प्राणी अपनी याददाश्त पर खूब जोर देकर पता कर रहे हैं कि इस सूची में जो एक सुंदर सा नाम है उसको उन्होंने कब पार्टी दफ्तर में देखा था। कब पार्टी के जंगी प्रदर्शनों में देखा था या फिर कब पार्टी की अंदरूनी रणनीतिक टीम में काम करते देखा था। या फिर कांग्रेस शासनकाल में इस हस्ती ने कौन सा प्रचंड प्रतिरोध खड़ा कर दिया था।
ज्यादातर को ये भी पता नहीं कि ये महान हस्ती है कौन? पता नहीं किस महान नेता की दिव्य दृष्टि पडऩे की वजह से उसका ये राजयोग प्रबल हुआ है? और तुम जैसे दिन-रात पार्टी के लिए मरने खपने वाले तुच्छ कार्यकर्ताओं का उत्थान किस महान नेता के चरण पकडऩे से होगा?
अरे-अरे, लेकिन तुम तो कार्यकर्ता हो यार! तुम इस फैसले को लेकर सोच-विचार भी कर पा रहे हो इतने भर से अनुशासन नाम की इमारत हिलने लगी है। और ये तो किसी से छिपा नहीं है कि तुम कितने निष्ठावान कार्यकर्ता हो। हिंदू राष्ट्र के लिए, राष्ट्रवाद के लिए, स्वधर्म के लिए कोई भी कीमत दे सकते हो। है न? इसलिए दुखी मत हो, सवाल मत उठाओ, तुम सरकार के लिए हो, सरकार तुम्हारे लिए नहीं है। अब तुम्हारे पास ज्यादा ऑप्शन नहीं हैं।
पार्टी- सरकार की कुंडली के दशम भाव में बैठे राहु को खूब रिझाओ, मक्खन लगा लगा के बम बम कर दो। अगर कभी आपके लाभ के भाव पर इस राहु का गोचर होगा तो तुम्हारी भी निकल पड़ेगी। और हाँ, जिनको अपेक्षा से कम मिला है, वो इसे अपमान नहीं, इज़्ज़त-अफजाई समझें। जिनको कुछ नहीं मिला वो तो खाम-खयाली पालें ही नहीं। असल में वो किसी लायक है ही नहीं।
समझे कार्यकर्ता कहीं के।
पार्टीबाजी से इतर एक अन्य ने पोस्ट किया - मेरा अनुभव कहता है कि राजनीति में वक्त पल पल बदलते रहता है। कभी परिक्रमा करने वालों के पाले में गेंद रहती है। तो कभी पराक्रम करने वालों के। अगर परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है तो कुछ वक्त के लिए आप तटस्थ हे जाइए। पर अपनी राजनीति को जिंदा रखिए। आपका राजनीति में जिंदा रहना ही आपके साथियों के लिए हौसला बनेगा। और आपकी सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करेगा। शुभ रात्रि।
इन सबके बीच गौरीशंकर श्रीवास की सनसनीख़ेज़ फेसबुक पोस्ट ग़ायब हो गई है।
नए जुर्माने के लिए तैयार रहिये
हर साल 1 अप्रैल से सरकारी नियमों में बदलाव किए जाते हैं, जिनमें कुछ नए प्रावधान लागू होते हैं। इसी कड़ी में हाई-सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट लगाने की अनिवार्यता भी शामिल है। इस नियम की डेडलाइन 31 मार्च को समाप्त हो चुकी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में लागू किया गया है। एक अप्रैल 2019 से पहले खरीदी गई गाडिय़ों में हाई-सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगाना अनिवार्य किया गया है। इसके लिए परिवहन विभाग ने दो एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी है, जिन्होंने प्रदेशभर में 350 से अधिक सेंटर स्थापित किए हैं। नए नंबर प्लेट के लिए वाहन मालिकों को परिवहन विभाग की वेबसाइट पर जाकर मोबाइल नंबर और गाड़ी का चेसिस नंबर दर्ज करना होगा। इसके बाद 365 से 705 रुपये तक का शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा। जब नंबर प्लेट तैयार हो जाएगी, तो वाहन मालिक को एसएमएस के जरिए सूचना मिलेगी। इसके बाद निर्धारित सेंटर पर जाकर इसे लगवाया जा सकता है। यदि गाड़ी के घर पर बुलाकर नंबर प्लेट लगवानी हो, तो 100 अतिरिक्त शुल्क देना होगा।
प्रदेश में 1 अप्रैल 2019 से पहले खरीदी गई करीब 40 लाख गाडिय़ां अब भी सडक़ों पर दौड़ रही हैं। लेकिन डेडलाइन खत्म होने तक केवल 50,000 गाडिय़ों में ही नए नंबर प्लेट लगाए जा सके, जो कि सिर्फ 1.25 प्रतिशत है। बाकी सभी लोग जिन्होंने नए नंबर प्लेट के लिए आवेदन नहीं किया है, क्या यह माना जाए कि वे बेफिक्र हैं, नजरअंदाज कर रहे हैं? कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं पर जो एचएसआरपी लगाने के इच्छुक होने के बाद भी पीछे रह गए उनकी भी परेशानी है। कई वाहन मालिकों के पुराने मोबाइल नंबर बदल चुके हैं, जिससे उनका पंजीयन ही नहीं हो पा रहा है। इसे अपडेट कराने की प्रक्रिया थोड़ी मुश्किल है। दूसरा सभी लोगों को डिजिटल पेमेंट की प्रक्रिया समझ नहीं आती। कई के बैंक खाते ऑनलाइन भुगतान के लिए अपडेट नहीं हैं। परिवहन विभाग ने कोई ऑफलाइन विकल्प उपलब्ध नहीं कराया, जिससे लोगों को और कठिनाई हो रही है। परिवहन विभाग ने कहा है कि अगले 15 दिनों तक लोगों को जागरूक किया जाएगा। इसके बाद भी यदि नंबर प्लेट नहीं बदली गई, तो 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। यह वसूल करना आसान है, ज्यादातर शहरों में चौक चौराहों पर सिग्नल के साथ कैमरे लगे हुए हैं।
दूसरी ओर, महाराष्ट्र में वहां की सरकार ने नया नंबर प्लेट लगाने की डेडलाइन 30 जून तक बढ़ा दी है। वहां के परिवहन मंत्री ने कहा है कि लोगों को अनावश्यक जुर्माने से बचाने के लिए यह फैसला लिया गया। हालांकि, छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। क्या छत्तीसगढ़ सरकार को भी महाराष्ट्र की तरह डेडलाइन बढ़ाने पर विचार करना चाहिए? यह सवाल वाहन मालिकों के मन में बना हुआ है।
आवारा कुत्तों से कैसे निपटेंगे?

यदि इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबार में आवारा कुत्तों की समस्या पर सार्वजनिक अपील प्रकाशित हो रही है, तो यह संकेत है कि मामला अब केवल स्थानीय प्रशासन की चिंता का विषय नहीं रहा—बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक संकट का रूप ले चुका है।
दिल्ली में पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल हैरिटेज इंडिया फाउंडेशन के माध्यम से एक लोक अभियान चला रहे हैं, जिसमें आमजन से अपील की जा रही है कि वे आवारा कुत्तों से उत्पन्न हो रही समस्याओं के समाधान के लिए आगे आएं।
रायपुर की एक दर्दनाक घटना अभी भी ताजा है, जब इसी वर्ष फरवरी में दलदल सिवनी के आर्मी चौक पर एक छह वर्षीय मासूम बालक साइकिल से गिरने के बाद कुत्तों के झुंड का शिकार बन गया। उसके शरीर पर सौ से अधिक जख्म पाए गए। वर्ष 2024 के भीतर ही राजधानी के अस्पतालों में 2800 से अधिक डॉग बाइट के मामले दर्ज हो चुके हैं।
विधायक सुनील सोनी के सवाल पर कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में प्रदेशभर में 51,730 लोगों को कुत्तों ने काटा है। इस जानकारी में यह भी बताया गया कि कुत्तों द्वारा 2800 अन्य जानवरों को काटे जाने के मामले भी दर्ज हैं। यह आंकड़े स्वयं में एक चेतावनी हैं। यह न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है, बल्कि मानवीय सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच एक संतुलन की मांग भी करता है।
हालांकि नगर निगम द्वारा कुत्तों के लिए आश्रय गृह निर्माण और नियमित नसबंदी-टीकाकरण जैसे प्रयासों की बात कही गई है, लेकिन ये प्रयास अभी भी आधे-अधूरे और कई बार कागज़ों तक सीमित हैं। उदाहरण के लिए, बिलासपुर में 12,000 आवारा कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया, परंतु दो वर्षों में केवल 2,000 कुत्तों की ही नसबंदी हो सकी।
बिलासपुर की एक पॉश कॉलोनी रामा वैली में कुत्तों को लाठियों से पीटकर गाडिय़ों में लाद कर दूर छोड़ दिया गया। इस घटना से मर्माहत कॉलोनी निवासी एक आईपीएस अफसर के किशोरवय बेटे ने पुलिस में गवाही दी, मगर निर्मम बर्ताव करने वाले भी रसूखदार थे, उनका कुछ नहीं हुआ । सितंबर 2024 में भिलाई के आईआईटी परिसर में नसबंदी के बाद 4 कुत्तों की मृत्यु हुई, जिसकी शिकायत पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी तक पहुंची। इसके बाद वहां अभियान धीमा पड़ गया।
जटिलता यह है कि आवारा कुत्ते केवल पशु नहीं हैं। वे शहरी जीवन के एक हिस्से बन चुके हैं। कुछ के लिए बेहद हेय हैं पर कई लोग इन्हें भोजन कराते हैं, गर्मियों में पानी और सर्दियों में गर्म कपड़े या कंबल भी देते हैं। आवारा कुत्तों के जबरन विस्थापन के खिलाफ एनिमल लवर्स द्वारा अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया और सफलता भी मिली। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि कुत्तों को जबरन हटाया नहीं जा सकता, केवल नसबंदी की जा सकती है।
मानवीय व्यवहार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच एक संवेदनशील संतुलन बनाए रखना अब सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे छत्तीसगढ़ के कई शहर-गांव जूझ रहे हैं।
कहीं खुशी-कहीं गम
आखिरकार सरकार के निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की बहुप्रतीक्षित सूची बुधवार की रात जारी कर दी गई। सूची को लेकर भाजपा के अंदरखाने में कहीं खुशी, तो कहीं गम का माहौल है। इन सबके बीच कुछ नामों को लेकर काफी चर्चा हो रही है। ऐसे में राजनांदगांव के ब्राह्मणपारा इलाके के अगल-बगल में रहने वाले दो युवा नेताओं को ‘लाल बत्ती’ से नवाजा गया है।
युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे नीलू शर्मा को राज्य पर्यटन बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है। नीलू के पड़ोसी योगेशदत्त मिश्रा को श्रम कल्याण मंडल का अध्यक्ष बनाया गया है। नीलू का नाम पहले से ही तय माना जा रहा था। वो राजनांदगांव से मेयर टिकट के दावेदार थे। यही नहीं, विधानसभा, और लोकसभा चुनाव संचालन में अहम भूमिका निभाई थी।
गौर करने लायक बात यह है कि रमन सरकार में नीलू शर्मा राज्य भंडार गृह निगम के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके पिता पूर्व सांसद अशोक शर्मा नागरिक आपूर्ति निगम, और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष रहे हैं। इससे परे योगेशदत्त भारतीय मजदूर संघ का काम देखते रहे हैं। यही वजह है कि संघ पृष्ठभूमि के योगेशदत्त को भी ‘लाल बत्ती’ से नवाजा गया है। खास बात यह है कि इसी ब्राम्हणपारा के रहवासी निखिल द्विवेदी, भूपेश सरकार में राज्य पर्यटन बोर्ड के डायरेक्टर रहे हैं। उन्हें कांग्रेस ने मेयर प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वो हार गए।
सबसे चौड़े कमजोर कंधे !!
निगम-मंडल के पदाधिकारियों की सूची जारी होने के बाद से भाजपा में नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। प्रदेश भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास ने तो एक कदम आगे जाकर राज्य केश शिल्प विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष पद स्वीकारने से मना कर दिया। ऐसा करने का साहस जुटाने वाले संभवत: वो पहले नेता हैं।
श्रीवास ने फेसबुक पर लिखा कि पार्टी ने इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी है कि जिसे उठाने में मेरे कंधे असमर्थ हैं। इसलिए पद स्वीकार नहीं है। संगठन के कार्यकर्ता के रूप में मैं ठीक हूं। श्रीवास से जुड़े लोग मानकर चल रहे थे कि पिछले पांच साल में भूपेश सरकार के खिलाफ जिस तरह उन्होंने सडक़ से लेकर अदालत तक विभिन्न मुद्दों को लेकर लड़ाई लड़ी है उससे उनकी प्रतिष्ठा अनुरूप कोई अहम दायित्व मिलेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ।
सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति के गौरीशंकर श्रीवास से अधिक मज़बूत और चौड़े कंधे किसी के हैं नहीं, और सीना भी छप्पन इंच से कुछ अधिक ही है। वे कई बरस पहले एक मुक़ाबले में मिस्टर छत्तीसगढ़ भी बने थे।
दारू की जगह दूध !!
चर्चा है कि श्रीवास की तरह केदार गुप्ता भी अपने नए दायित्व से खुश नहीं हैं। केदार को दुग्ध महासंघ का चेयरमैन बनाया गया है, जो कि पहले ही काफी घाटे में चल रहा है। केदार को ब्रेवरेज निगम जैसा कोई अहम दायित्व मिलने की उम्मीद थी। खास बात यह है कि प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे, और गृह मंत्री रह चुके रामसेवक पैकरा को वन विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। पैकरा को विधानसभा टिकट नहीं मिली थी। इसलिए वो निगम-मंडल में जगह चाह रहे थे।
इसी तरह प्रदेश भाजपा के महामंत्री (संगठन) रामप्रताप सिंह को छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया है। पहले रामप्रताप सिंह को राज्यसभा में भेजे जाने की चर्चा चल रही थी। मगर उनकी जगह पार्टी ने देवेन्द्र प्रताप सिंह को राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया। ऐसे में रामप्रताप सिंह के पद के लिए खुद सीएम विष्णुदेव साय रुचि दिखा रहे थे। रामप्रताप सिंह, जशपुर जिले के रहने वाले हैं। लिहाजा, उन्हें पद देने में पार्टी को कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।
सौरभ सिंह को खास छूट
प्रदेश भाजपा के रणनीतिकारों ने विधायक अथवा पराजित प्रत्याशी को पद नहीं देने का सैद्धांतिक फैसला लिया था। विधायकों को तो निगम-मंडल में पदाधिकारी नहीं बनाया गया, लेकिन विधानसभा चुनाव हारे सौरभ सिंह के मामले में पार्टी ने छूट दे दी, और उन्हें राज्य खनिज विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया गया।
खनिज निगम ‘वजनदार’ माना जाता है। जबकि ज्यादातर निगम-मंडल तो आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं। कुछ में तो संपत्ति बेचकर कर्मचारियों का वेतन देने की नौबत आ गई है। सौरभ सिंह ने पंचायत चुनाव में काफी अहम भूमिका निभाई थी। प्रदेश में 33 में से 32 जिला पंचायतों में भाजपा का कब्जा हुआ है।
सौरभ सिंह एक प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं, और यही वजह है कि उन्हें महत्वपूर्ण निगम का दायित्व सौंपा गया है। पूर्व सांसद चंदूलाल साहू को राज्य भण्डार गृह निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह पूर्व सांसद सरोज पाण्डेय के भाई राकेश पाण्डेय को खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का अध्यक्ष पद दिया गया है।
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर चाहते थे कि निगम मंडल में नए लोगों को मौका दिया जाना चाहिए। उन्होंने इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चि_ी भी लिखी थी। मगर 36 निगम-मंडल अध्यक्षों में से 10 ऐसे हैं, जो रमन सरकार में अलग-अलग निगम-मंडलों में अध्यक्ष या अन्य पदों पर रहे हैं।
मीडिया वाले कोई नहीं
सरकार के निगम-मंडलों में एक पद कम से कम भाजपा के मीडिया विभाग के मुखिया को मिलता रहा है। रमन सरकार में मीडिया प्रभारी रहे सुभाष राव को राज्य गृह निर्माण मंडल का अध्यक्ष बनाया गया था। वो करीब 10 साल मंडल अध्यक्ष रहे। राव के बाद मीडिया प्रभारी रहे रसिक परमार को दुग्ध महासंघ का अध्यक्ष बनाया गया। मगर इस बार किसी को पद नहीं दिया गया।
मीडिया विभाग के अध्यक्ष अमित चिमनानी को अहम पद मिलने की उम्मीद थी। हालांकि उनके लिए संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। सिंधी अकादमी के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति होना बाकी है। इसके अलावा बेवरेज कॉर्पोरेशन के लिए चिमनानी, और अनुराग अग्रवाल सहित कई नाम चर्चा में है। चिमनानी की तरह अनुराग अग्रवाल को पद के लिए काफी सिफारिशें थी। मगर उन्हें भी कोई दायित्व नहीं मिला। चर्चा है कि देर सबेर दोनों को ही किसी निगम मंडल में एडजस्ट किया जा सकता है।
छवि कृत्रिम, मुद्दा वास्तविक

तेलंगाना में कांचा गचीबोवली के 400 एकड़ क्षेत्र में सरकार द्वारा आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरी विकास के लिए भूमि साफ करने की प्रक्रिया शुरू होते ही छात्रों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों का विरोध शुरू हो गया। यह क्षेत्र 455 से अधिक प्रजातियों के वन्यजीवों का निवास स्थान रहा है, जिनमें मोर, हिरण और विभिन्न पक्षी शामिल हैं। इस बीच सोशल मीडिया में आई एक तस्वीर ने लोगों की भावनाओं को झकझोर दिया और जनाक्रोश और बढ़ गया। इसमें जेसीबी मशीनों के चलते घबराए हुए वन्यजीवों को भागते हुए दिखाया गया। बाद में, एआई-डिटेक्शन टूल्स से यह पुष्टि हुई कि यह छवि कृत्रिम रूप से बनाई गई थी। लेकिन इसने वास्तविक मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया। छवि बनावटी है पर पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों का विस्थापन वास्तव में हो रहा है। लोगों को पता चल गया कि छवि काल्पनिक है, मगर लोगों ने इसे शेयर करना नहीं छोड़ा और सरकार के फैसले का विरोध इसके जरिये किया। पारंपरिक मीडिया पर सरकारों और कॉरपोरेट संस्थानों का नियंत्रण बढऩे के कारण विरोध के पारंपरिक माध्यमों का असर कम होता जा रहा है। ऐसे में एआई-निर्मित फोटो और वीडियो, जनता से जुड़े मुद्दों को उजागर करने का भविष्य में प्रभावी तरीका बन सकते हैं।
पुलिस भर्ती, गिरफ्तारियों के बाद सावधानी
राजनांदगांव में पुलिस भर्ती गड़बड़ी का मामला तूल नहीं पकड़ पाया। इसकी बड़ी वजह यह थी कि भर्ती में गड़बड़ी की भनक लगते ही आईजी ने आनन-फानन में जांच बिठा दी, और फिर पूरी प्रक्रिया स्थगित कर दी। गड़बड़ी की पुष्टि होने पर पुलिस कर्मियों समेत 16 लोग जेल में हैं। भर्ती प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई, तो स्थान बदलकर राजनांदगांव की जगह खैरागढ़ किया गया।
करीब चार सौ आरक्षकों की भर्ती होनी है, और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता दिख रही है। खुद एसपी त्रिलोक बंसल सुबह 6 बजे से शारीरिक नाप जोख स्थल पहुंच जा रहे हैं, और आधा दर्जन से अधिक राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर डटे हुए हैं। पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग चल रही है। शासन-प्रशासन ने भर्ती में गड़बड़ी के मामले में थोड़ी-बहुत भी लापरवाही बरती होती, तो पीएससी-2023 जैसा हाल हो जाता।
पीएससी-2023 भर्ती परीक्षा में रिजल्ट जारी होनेे के बाद गड़बड़ी सामने आने लगी। मगर भूपेश सरकार ने ध्यान नहीं दिया, और पीएससी के तत्कालीन चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी के पक्ष में खुलकर सामने आ गई। यही नहीं, एक परीक्षा होने के बाद जांच कराना तो दूर, दूसरी परीक्षा भी आयोजित करने दिया। बाद में सरकार बदली, और सीबीआई की एंट्री हुई। सोनवानी सहित कई जेल में हैं, और काफी हद तक गड़बडिय़ों का खुलासा हो चुका है।
समय से पहले विदा करने कई सक्रिय

राज्य विद्युत नियामक आयोग में जल्द ही सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। नियुक्ति के लिए आवेदन बुलाए जा रहे हैं। आयोग में चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति पिछली सरकार ने की थी। हालांकि आयोग के चेयरमैन हेमंत वर्मा का कार्यकाल साल भर बाकी है, लेकिन इस पद पर भी अभी से नौकरशाहों की नजर है।
राज्य गठन के बाद रिटायर्ड सीएस एस.के.मिश्रा आयोग के चेयरमैन बने। इसके बाद विद्युत क्षेत्र के विशेषज्ञ मनोज डे को आयोग का चेयरमैन बनाया गया। मनोज डे के बाद पूर्व एसीएस डी.एस. मिश्रा चेयरमैन बने। मिश्रा के बाद निजी कंपनी में कार्यरत हेमंत वर्मा को चेयरमैन नियुक्त किया गया। आयोग के सदस्य तो तकनीकी विशेषज्ञ होंगे, लेकिन चेयरमैन पद पर रिटायर्ड नौकरशाह को बिठाया जा सकता है। यह पद काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। बिजली की दरें तय करने का जिम्मा आयोग पर होता है। इस वजह से यहां के पदों के लिए तकनीकी विशेषज्ञ और नौकरशाह जुट गए हैं। पार्टी के लोग गणेश शंकर मिश्रा का नाम ले रहे हैं।
खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव 10 तारीख को हो सकता है। इसमें शिरकत करने प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेता दिल्ली जाएंगे। इससे परे पार्टी के अंदरखाने में अलग ही चर्चा चल रही है। पार्टी के कई नेता प्रदेश भाजपा के पूर्व प्रभारी संजय जोशी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की संभावना जता रहे हैं, और जोशी के 6 अप्रैल जन्मदिन की जोर-शोर से मनाने की तैयारी चल रही है।
संजय जोशी को जन्मदिन की बधाई वाले कई होर्डिंग, और पोस्टर राजधानी के कई इलाकों में लग रहे हैं। संजय जोशी करीब 3 साल छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। यहां प्रदेश के छोटे-बड़े नेताओं से सीधे संपर्क रहे हैं। यही वजह है कि उनके नाम को लेकर यहां पार्टी के कार्यकर्ता उत्साहित हैं।
संजय जोशी से परे केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का नाम भी संभावित राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए लिया जा रहा है। प्रधान सबसे ज्यादा समय तक छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। और उनका भी यहां के कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत संबंध है। पिछले दिनों धर्मेन्द्र प्रधान के पिता का निधन हुआ, तो सीएम और सरकार के मंत्रियों के साथ-साथ पार्टी के बड़ी संख्या में छोटे-बड़े नेता संवेदना प्रकट करने वहां गए थे। इससे पहले भी छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, जगत प्रकाश नड्डा, राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। देखना है कि जोशी अथवा प्रधान को मौका मिलता है या नहीं।
गलियारों की चर्चा
नया वित्त वर्ष शुरू होते ही प्रशासनिक गलियारों में केंद्र सरकार के डीओपीटी के हवाले एक खबर आई है कि सरकार अपने अधिकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट एज को 60 से बढ़ाकर 62 करने जा रही है। महानदी भवन के आईएएस अफसरों की माने तो 7-8 दिन में इसके आदेश भी जारी किए जा सकते हैं। कहा जा रहा है कि नॉर्थ ब्लॉक में हलचल तेज है।

यह पूछने पर कि सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर भी नहीं है कि रिटायरमेंट लाभ भुगतान के लिए खजाने में पैसे नहीं हों। और स्टाफ की कमी हो ऐसी भी स्थित नहीं हैं। हां रिटायर होने पर अनुभवी, भरोसे के अफसर छूट जाते हैं । उनके लिए तो एक्सटेंशन या संविदा नियुक्ति का विकल्प तो है ही। और कई केंद्रीय विभागों के सचिव एक्सटेंशन पर हैं ही। और फिर आठवें वेतन आयोग के गठन की भी घोषणा कर दी गई है। ऐसे में एज लिमिट में बढ़ोतरी समझ से परे हैं।
आईएएस अफसरों का कहना है कि आपके सारे किंतु-परंतुक सही है। सरकार एक्सटेंशन वाले अफसरों को अगले दो वर्ष के लिए नियमित कर बार-बार के एक्सटेंशन को आदेश से मुक्त होना चाहती है । और ऐसे अफसर मोदी,शाह, वैष्णव, निर्मला,गडकरी जैसे दिग्गजों के विभागों के हैं। इसके अलावा यूपी, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मप्र, राजस्थान जैसे राज्यों में मुख्य सचिव या अन्य अहम विभागों में भी है। इनके रिटायरमेंट से तालमेल गड़बड़ाने के आसार को देखते हुए यह हलचल सुनी जा रही है।
फेरबदल कब?
रमन राज में 15 साल तक ग्राम सुराज अभियान सफलतापूर्वक चलता रहा। इसमें सीएम, और सरकार के मंत्री गांवों में जाकर सरकार की योजनाओं का हाल जानने की कोशिश करते थे। सरकार बदलने के बाद ग्राम सुराज अभियान बंद हो गया था। अब इस अभियान को फिर शुरू करने की तैयारी चल रही है।
ग्राम सुराज अभियान की तिथि जल्द घोषित हो सकती है, और इसके महीनेभर तक चलने की उम्मीद है। चर्चा है कि ग्राम सुराज अभियान शुरू होने से पहले प्रशासनिक फेरबदल भी हो सकता है। हालांकि सरकार में इस बात पर मंथन हो रहा है कि सुराज के पहले फेरबदल किया जाए या फिर इसके बाद। कहा जा रहा है कि आईएएस के साथ आईपीएस अफसरों के तबादले की सूची भी निकल सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
पेट्रोल सस्ता, टोल महंगा-हिसाब बराबर!
छत्तीसगढ़ में आज से पेट्रोल का दाम एक रुपये कम हो गया, मगर यह अब भी 100 के पार है। शराब पर टैक्स घटाया गया है, मगर कुछ साल पहले से तुलना करें तो महंगी अब भी है। फिर भी रायपुर से नागपुर तक का सफर अब जेब पर थोड़ा कम भारी पड़ेगा। टैक्सी, बस वाले किराया घटाएं, तो आम लोगों को पता चलेगा। शराब की एमपी से तस्करी रुकेगी, तब मालूम होगा।
ईंधन का मामला ऐसा है कि हाईवे पर आज से टोल शुल्क बढ़ गया है। जेब में एक हाथ से रकम डालकर दूसरे हाथ से निकाल ली जाएगी। और भी कई चीजें महंगी हो रही हैं, और इनका असर हम पर सीधे पड़ेगा। जरूरी दवाओं जैसे पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और विटामिन्स की कीमतों में बढ़ोतरी का ऐलान हो चुका है। अगर आप दिल के मरीज हैं या स्टेंट जैसे उपकरणों पर निर्भर हैं, तो इलाज का खर्च भी बढ़ सकता है। बुने हुए कपड़ों पर कस्टम ड्यूटी बढऩे से आपकी नई शर्ट या साड़ी भी महंगी होने वाली है। आपके अकाउंट को चलाने के लिए भी बैंक कई सेवाओं पर शुल्क बढ़ा रहे हैं।
खाने-पीने की बात करें तो हालात मिले-जुले हैं। मछली उत्पाद सस्ते हो सकते हैं। लेकिन आयातित तेल की कीमतों में उछाल से पहले से ही महंगा खाद्य तेल और रोजमर्रा का खाद्यान्न फिर महंगा होने जा रहा है। तंबाकू और सिगरेट पर टैक्स बढ़ा है। यह वृद्धि मामूली है पर कुछ न कुछ असर तो इसकी कीमत पर पडऩा ही है।
कुछ अच्छी खबरें भी हैं। कैंसर और दुर्लभ बीमारियों की दवाएं सस्ती होने की बात कही गई है। मोबाइल फोन और मोटरसाइकिल भी थोड़े सस्ते हो सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो महंगाई का पैमाना ज्यादा भारी है। तो, पेट्रोल और शराब की छोटी खुशी को आनंद उठाएं, मगर कहां-कहां चोट पहुंच रही है, उसका भी हिसाब रखिए।
प्यासा मेहमान

अचानकमार अभयारण्य में एक सुंदर चीतल हैंडपंप के पास खड़ा है, शायद पानी की तलाश में। कच्ची सडक़, आसपास सूखी धरती, बिखरे हुए पत्ते, बच्चे खेलते हुए, फिर एक झोपड़ी। यकीनन इस बस्ती में रहने वाले लोग चीतल को नुकसान नहीं पहुंचाते होंगे, तभी वह निश्चिंत होकर यहां चहलकदमी करते आ गया है। शायद उसे इंतजार है कि कोई आए और उसे पानी पीने में मदद करे। (फोटो- शिरीष दामरे)
मोदी के बढिय़ा मूड से राहत और खुशी
पीएम नरेंद्र मोदी रविवार को प्रदेश दौरे पर आए, तो यहां वो काफी खुश दिखे। माना एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप के साथ दो दर्जन विधायक-पार्टी पदाधिकारी थे। मोदी ने अजय चंद्राकर, राजेश मूणत का नाम लेकर हाल चाल पूछा, तो कतारबद्ध नेताओं ने पीएम को अपना परिचय दिया, और फिर मोदी हाथ जोडक़र आगे बढ़ते गए।
पीएम, सांसद बृजमोहन अग्रवाल, और प्रेमप्रकाश पाण्डेय के पास रूके। प्रेमप्रकाश पाण्डेय की तरफ मुखातिब होते हुए पीएम ने कहा, प्रकाश हम पर कब प्रेम बरसाओगे...। इस पर वहां जमकर ठहाका लगा, और फिर पीएम आगे बढ़ गए। पीएम जिस अंदाज में स्वागतकर्ताओं से मिले, सब काफी खुश थे।
वापसी में भी मोदी का मूड काफी बढिय़ा था। इसकी वजह थी कि बिलासपुर के कार्यक्रम में भारी भीड़ उमड़ी थी, और लोकार्पण व अन्य कार्यक्रम व्यवस्थित तरीके से संपन्न हुआ।
अनूठा रैंप वॉक

अंबिकापुर में एक अनूठा फैशन शो आयोजित किया गया। इसमें रैंप चलने वाली युवतियों, महिलाओं में न केवल महिला डॉक्टर, वकील, शिक्षिका, खिलाड़ी, गृहणी, ब्यूटिशियन आदि थीं, बल्कि ग्रामीण महिलाएं भी शामिल हुईं। उद्देश्य था महिला सशक्तिकरण और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाना। संदेश यह दिया गया कि किसी भी क्षेत्र में महिलाएं पीछे नहीं है। महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े भी मंच पर उतरी थीं।
क्योंकि मौसम चुनावी नहीं है...
बिलासपुर की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ की परंपरा के अनुरूप लोगों का जय जोहार से अभिवादन करते हुए अपने भाषण की शुरुआत की। उन्होंने गुरु घासीदास, माता कर्मा और श्रीराम के ननिहाल के रूप में छत्तीसगढ़ के महत्व को व्यक्त किया, साथ ही रामनामी संप्रदाय का भी विशेष उल्लेख किया।
संबोधन में उन्होंने सबसे अधिक जोर प्रधानमंत्री आवास योजना पर दिया और याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल का पहला निर्णय रुके हुए 18 लाख आवासों को पूरा करने का था। इस संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी सरकार में खजाना खाली रहता है और विकास ठप पड़ जाता है। नक्सलवाद पर भी उन्होंने कांग्रेस की आलोचना की, लेकिन किसी भी नेता का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया। इन दिनों ईडी और सीबीआई के छापों को लेकर देशभर में चर्चा है, मगर मोदी ने इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की।
दूसरी ओर, उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को मंच और हेलिपैड पर सफल आयोजन के लिए दो बार बधाई दी। डॉ. रमन सिंह भी तब प्रसन्न दिखे जब प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उनका नाम दो बार लिया। मोदी के भाषणों में आमतौर पर विपक्ष पर तीखे कटाक्ष और व्यंग्यात्मक टिप्पणियां होती हैं, लेकिन इस बार उनका रुख अपेक्षाकृत संयमित रहा। फिलहाल कोई चुनाव नहीं है, इसलिए उनका तेवर कम आक्रामक नजर आया। बल्कि, वे भाजपा की लगातार हो रही जीत और सभा में उमड़े जनसैलाब को देखकर संतुष्ट दिखे।
राज्यसभा सदस्य लापता

संसद का सत्र चल रहा है। मगर छत्तीसगढ़ के कांग्रेस के दो राज्यसभा सदस्य केटीएस तुलसी, और राजीव शुक्ला की सक्रियता नहीं दिख रही है। अकेली रंजीत रंजन ही ऐसी है, जो छत्तीसगढ़ के जुड़े विषयों को उठा रही हैं। राजीव शुक्ला तो आईपीएल में व्यस्त हैं। सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील केटीएस तुलसी का हाल यह है कि राज्यसभा सदस्य बनने के बाद से वो छत्तीसगढ़ नहीं आए हैं।
राजीव शुक्ला लोकसभा चुनाव के समय आए थे, लेकिन इसके बाद से वो भी नदारद हैं। पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि राजीव शुक्ला के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद रायपुर को आईपीएल की मेजबानी मिलेगी, कुछ मैच यहां हो सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। और तो और केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला के सांसद निधि को लेकर भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि वो कहां खर्च कर रहे हैं। कुल मिलाकर दोनों ही सांसद जनता की अपेक्षाओं में अब तक खरा नहीं उतर पाए हैं। ([email protected])
वह सफर भी अनमोल था...
यह तस्वीर छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक रायपुर-धमतरी नैरो गेज रेलवे मार्ग की एक अनमोल स्मृति को संजोए हुए है। कभी इस मार्ग की जीवनरेखा रही नैरो गेज ट्रेन अब इतिहास बन चुकी है। आज, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रायपुर से नवा रायपुर होते हुए अभनपुर के लिए अत्याधुनिक ट्रेन का उद्घाटन कर रहे हैं, यह दृश्य बीते दौर की याद दिलाता है।
रायपुर-धमतरी रेलवे का सफर 1900 में शुरू हुआ था और इसने क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नैरो गेज रेलवे, जिसे छोटी लाइन भी कहा जाता था, अपनी संकरी पटरियों और विशिष्ट ट्रेनों के लिए जानी जाती थी। अब यह ऐतिहासिक मार्ग स्मृतियों में सिमट रहा है, लेकिन इसकी गूंज छत्तीसगढ़ के रेल इतिहास में हमेशा बनी रहेगी।
एक समय था जब रायपुर-धमतरी नैरो गेज रेलवे क्षेत्र की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थी। समय के साथ जब ब्रॉड गेज और आधुनिक रेलवे नेटवर्क का विस्तार हुआ, तो नैरो गेज ट्रेनों का संचालन धीरे-धीरे बंद कर दिया गया। आज इस ऐतिहासिक रेल मार्ग का अस्तित्व भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन यह ट्रेन और इससे जुड़ी यादें उन सभी यात्रियों और रेल प्रेमियों के मन में हमेशा जीवित रहेंगी।
दरुआ लोगों की ख़ुशखबरी

एक अप्रैल आने से पहले 25 मार्च से शराब से जुड़े नए साल के बिजनेस प्लान पर चर्चाएं छिड़ जाती हैं, कि कितनी नई दुकानें खुलेंगी, कितनी बंद होंगी। कौन -कौन से नए अंग्रेजी ब्रांड मिलेंगे। कीमत कम होंगी या बढ़ेंगी। दुकान के पास चखना मिलेगा या नहीं आदि आदि। इन तमाम मामलों में छत्तीसगढ़ के पियक्कड़ों के लिए नया साल खुश किस्मत लेकर आ रहा है। अब तक की खबरों के अनुसार 67 नई दुकानें खुल रही हैं, पुरानी 647 में से एक भी बंद नहीं हो रही। 16 नए ब्रांड आ रहे । कीमत भी 20-100-300 रुपए तक कम हो रही है। चखने के नए अहाते खुल रहे हैं। किसी समय माता-बहनों के हित में राज्य में शराबबंदी की मांग हो रही थी। और अब इसे उन्हीं को फायदे का कारोबार बताने से नहीं चूक रहे।
ऐसा सरकारी लोगों का कहना है कि इससे महतारी वंदन योजना के खर्च की भरपाई हो रही है। इसलिए शराबी भी कहते है कि वे राज्य देश के विकास के अहं हिस्सेदार हैं। हमने आबकारी अफसरों से जाना तो कहा गया आबकारी राजस्व 11 हजार करोड़ का। महिला बाल विकास विभाग महतारी वंदन योजना में साल भर में खर्च 8450 करोड़ दिया है। बीते 13 महीनों में 70 लाख महिलाओं को 650 करोड़ हर माह दिए गए हैं।
और अब एक अप्रैल से वंदन पोर्टल फिर खुलने वाला है तो कुछ और हजार महिलाएं जुड़ेंगी। तो इनकम एक्सपेंडिचर बराबर हो जाएगा। सही है आंकलन- इतने बड़े खर्च की भरपाई बजट के बजाए शराबी कर रहे हैं।
नवा रायपुर पूरा आध्यात्मिक

नवा रायपुर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें चल रही है। यहां सेक्टर-37 में आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर के संस्थान आर्ट ऑफ लिविंग को करीब 40 एकड़ जमीन आबंटित की गई है। यहां गुरुकुल, ट्रेनिंग, ध्यान आदि का केन्द्र स्थापित होगा। श्रीश्री रविशंकर ने पिछले दिनों इसका भूमिपूजन भी किया।
यही नहीं, इस्कॉन को भी यहां जमीन आबंटित करने की प्रक्रिया चल रही है। कई रिटायर्ड अफसर धार्मिक, और योग संस्थान से जुड़े हुए हैं। पूर्व हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स राकेश चतुर्वेदी तो ऑर्ट ऑफ लिविंग की नेशनल एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य हैं।
रिटायर्ड पीसीसीएफ जेके उपाध्याय, रेरा के चेयरमैन संजय शुक्ला, और एनआरडीए के पूर्व चेयरमैन एसएस बजाज भी आध्यात्मिक गुरु रावतपुरा महाराज की संस्थान से जुड़ गए हैं। यही नहीं, अविभाजित मध्यप्रदेश में बिलासपुर कमिश्नर रहे सत्यानंद मिश्रा आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी की संस्थान से जुड़े हुए हैं। यह संस्थान का फरीदाबाद में देश के सबसे बड़े अस्पतालों में एक का संचालन कर रही है, और सत्यानंद मिश्रा अस्पताल का प्रबंधन देख रहे हैं। पोस्ट रिटायरमेंट में इससे बेहतर काम हो ही नहीं सकता है।
क्या बिक जाएंगे शक्कर कारखाने?
छत्तीसगढ़ के बालोद और सरगुजा जिलों में स्थित सहकारी शक्कर कारखानों—दंतेश्वरी मैया और मां महामाया—के निजीकरण की चर्चा ने किसानों और कर्मचारियों के बीच आक्रोश पैदा कर दिया है। इन कारखानों पर न केवल हजारों परिवारों की आजीविका निर्भर है। निजीकरण का प्रस्ताव जहां सरकार के लिए आर्थिक बोझ कम करने का रास्ता हो सकता है, वहीं इसके संभावित नुकसान किसानों, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं।
बालोद जिले के दंतेश्वरी मैया सहकारी शक्कर कारखाने में 500 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि 1200 गन्ना किसान, उनके परिवार और गन्ना परिवहन से जुड़े मजदूर इसकी जीवनरेखा हैं। कर्मचारी संघ ने वहां आंदोलन शुरू कर दिया है। वे कह रहे हैं कि निजीकरण से उनकी रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी। बालोद के कारखाने को एक बार पहले भी नरसिंहपुर ( मध्यप्रदेश) के एक उद्योगपति को बेचने की कोशिश हो चुकी है, तब किसानों और कर्मचारियों के विरोध के बाद इसे रोक दिया गया।
इधर सरगुजा के केरता में मां महामाया सहकारी शक्कर कारखाने के निजीकरण के खिलाफ कांग्रेस ने पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया है। सिंहदेव का कहना है कि पीडीएस में बांटने के लिए करोड़ों रुपये का शक्कर सरकार उठा लेती है लेकिन कारखानों को भुगतान नहीं करती, इसलिए घाटे में हैं।
बताते चलें कि महाराष्ट्र के सांगली जिले का राजारामबापू सहकारी शक्कर कारखाना है। घाटे को वजह बताते हुए इसे निजी हाथों में दे दिया गया। अब गन्ने का भुगतान समय पर नहीं हो रहा और कारखाने का संचालन पूरी तरह लाभ-केंद्रित हो गया है। उत्पादन बढ़ाने के बजाय, निजी प्रबंधन ने लागत कटौती पर ध्यान दिया, जिससे कर्मचारियों और किसानों दोनों का नुकसान हो रहा है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा हो सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के कुछ ही समय बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भोरमदेव में पहला सहकारी शक्कर कारखाना शुरू कराया था। अभी भोरमदेव व पंडरिया के कारखानों को बेचने की बात नहीं हो रही है। यह ध्यान देने की बात है कि शक्कर कारखानों की सहकारी समितियों में उस प्रकार की राजनीति नहीं घुसी है, जितनी सहकारी बैंकों में है। यदि संचालन में कोई कमी है तो उसमें सुधार लाया जा सकता है। नियम से तो बिना शेयरधारकों की इच्छा के खिलाफ बेचना भी मुमकिन नहीं है।
कुबेर ने भूखा मार डाला
वन विभाग में शीर्ष स्तर पर बड़ा फेरबदल होने जा रहा है। पीसीसीएफ स्तर के अफसर संजय ओझा 31 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। सरकार ने 30 साल की सेवा पूरी कर चुके एपीसीसीएफ स्तर के अफसरों को पीसीसीएफ का स्केल देने का फैसला लिया है। इन सबके चलते पीसीसीएफ स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जा सकते हैं।
यही नहीं, डीएफओ और एपीसीसीएफ स्तर के अफसरों के प्रभार भी बदले जा सकते हैं। सुनते हैं कि आईएफएस अफसरों के फेरबदल की सूची तैयार होने की खबर उड़ी है, लेकिन अफसर बेपरवाह हैं। वजह यह है कि एसीएस (वन) रिचा शर्मा के दबाव की वजह से विभाग में निर्माण कार्यों और अन्य तरह के भुगतान के लिए ई कुबेर सिस्टम लागू किया गया है। जिसके चलते फर्जी मस्टर रोल बनाकर फील्ड में मजदूरी भुगतान को लेकर हो रही अनियमितताओं पर अंकुश लगा है। भुगतान सीधे मजदूरों के खाते में जमा हो रहे हैं। इन सबके चलते फील्ड पोस्टिंग को लेकर हमेशा से होने वाली मारा मारी भी नहीं है।
हालांकि विभाग के एक-दो शीर्ष अफसर इससे परेशान भी हैं। एक शीर्ष अफसर ने अपना दर्द कुछ इस अंदाज में बखान किया कि दिवाली-होली में मिलने के लिए कोई भी फील्ड के अफसर नहीं आए। इससे पहले तक तो दिवाली मिलने आते थे, तो स्वाभाविक तौर पर खाली हाथ नहीं आते थे। ई कुबेर की वजह से स्वागत सत्कार के लिए गुंजाइश सीमित रह गई है। ऐसे में अब अफसर भी बेपरवाह हो गए हैं।
इंटरव्यू देने से क्या फायदा?
मुख्य सूचना आयुक्त(सीआईसी) पद के लिए पिछले दिनों इंटरव्यू हुआ, तो कई अफसर इंटरव्यू देने नहीं आए। इसकी वजह भी थी कि सीएस खुद इंटरव्यू देने पहुंचे थे, तो रिटायर्ड अफसरों के लिए गुंजाइश नहीं के बराबर थी। इन्हीं सबको ध्यान में रखकर डॉ. संजय अलंग, नरेन्द्र शुक्ला, अमृत खलको सहित कई अफसर नहीं पहुंचे। सचिव स्तर के ये सभी अफसर सालभर के भीतर रिटायर हुए हैं।
बताते हैं कि डॉ. अलंग, अमृत खलको सहित कई अफसरों ने आईसी (सूचना आयुक्त ) के लिए भी आवेदन किया है। सूचना आयुक्त के दो पद खाली हैं, और ये सभी रिटायर्ड अफसर अपनी संभावना देख रहे हैं। वैसे भी सीआईसी के पद पर अब तक सीएस रैंक के अफसर रहे हैं, ऐसे में उनसे नीचे रैंक के अफसर के लिए संभावना नहीं के बराबर रही है। इससे जुड़ी एक खबर और है कि दो पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा, और डीएम अवस्थी ने भी सीआईसी के लिए आवेदन किया था, लेकिन जुनेजा का तो इंटरव्यू हुआ, लेकिन अवस्थी नहीं पहुंचे। सरकार बदलने के बाद अवस्थी को ईओडब्ल्यू-एसीबी से हटाया गया था। ऐसे में कुछ लोगों का अंदाजा है कि उन्हें खुद के लिए संभावना कम नजर आई इसलिए वो इंटरव्यू देने नहीं पहुंचे। वहीं एक दावेदार ने इंटरव्यू के लिए न बुलाए जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि मेरी पात्रता में क्या कमी है चयन होना न होना अलग बात है, लेकिन न बुलाया जाना अपमानजनक है। इसके बाद समिति ने उन्हें भी आमंत्रित किया।
एक और बार जोगी परिवार की कोशिश
दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के परिवार ने एक बार फिर कांग्रेस में प्रवेश के लिए जोर लगाया है। जोगी पार्टी की मुखिया श्रीमती डॉ. रेणु जोगी, और उनके बेटे अमित जोगी दिल्ली में हैं। वैसे तो वे एक विवाह समारोह में शामिल होने गए हैं, लेकिन कांग्रेस हाईकमान से संपर्क कर वापसी की कोशिश में लगे हैं। कहा जा रहा है कि डॉ. रेणु जोगी, और अमित जोगी की राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह, और कुछ अन्य प्रमुख नेताओं से चर्चा भी हुई है।
बताते हैं कि रेणु जोगी, और अमित, कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से मुलाकात के लिए प्रयासरत हैं। इससे परे जोगी पार्टी ने कांग्रेस में विलय का प्रस्ताव दे दिया था, लेकिन कांग्रेस ने इसे अब तक स्वीकार नहीं किया है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल, जोगी परिवार को कांग्रेस में शामिल करने के पक्ष में नहीं है। प्रदेश कांग्रेस के कुछ और प्रमुख नेताओं की राय भी भूपेश बघेल से मिलती जुलती है। ऐसे में जोगी परिवार का कांग्रेस प्रवेश का मामला अधर में लटका हुआ है।
नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव में जोगी पार्टी ने कांग्रेस का समर्थन किया था। फिर भी बात आगे नहीं बढ़ पाई है। कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं का मानना है कि जोगी पार्टी के ज्यादातर नेता कांग्रेस में पहले ही आ चुके हैं। अमित जोगी के आने से पार्टी में गुटबाजी बढ़ सकती है। ऐसे में उनके कांग्रेस प्रवेश का विरोध किया जा रहा है। फिर भी कुछ नेताओं का मानना है कि अहमदाबाद में कांग्रेस अधिवेशन के बाद दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को लेकर कोई फैसला हो सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
वन मैन लैटर बॉम्ब आर्मी
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर के ‘लेटर बम’ से सरकार में हलचल है। कंवर एक के बाद एक सरकार के अलग-अलग विभागों के भ्रष्टाचार के मामले को सामने ला रहे हैं, और केन्द्र सरकार को पत्र भी लिख रहे हैं। कंवर के पत्र पर कार्रवाई भी हुई है। एक-दो पत्रों पर तो राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने सरकार को जवाब तलब भी किया है।
कंवर के पत्रों को लेकर सरकार असहज है, लेकिन वो ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कंवर पार्टी के सबसे पुराने नेता हैं। वो अविभाजित मध्यप्रदेश की जनता पार्टी सरकार में उपमंत्री रहे हैं तब यहां प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं की राजनीति भी शुरू नहीं की थी। कंवर, पटवा सरकार के अलावा छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद रमन सरकार में करीब 8 साल मंत्री रहे हैं। 80 बरस पार कर चुके कंवर को पार्टी ने वर्ष-2023 के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वो चुनाव हार गए।
हारने के बाद भी कंवर खामोश नहीं हैं, और वो पत्र लिख कर अपनी सक्रियता दिखा रहे हैं। पूर्व गृहमंत्री के पत्रों का ‘न्यूज वैल्यू’ भी है। इसलिए अलग-अलग विभागों के पीडि़त-प्रभावित लोग उनसे मिलते जुलते रहते हैं, और उन्हें तमाम गतिविधियों से अवगत कराते रहते हैं। जिस पर कंवर पत्र भी लिख देते हैं। एक पुराने राजनीतिक विश्लेषक का मानना है कि कंवर राजनीति के वानप्रस्थ से संन्यास की ओर जा रहे हैं। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। और उम्र के इस पड़ाव में पाने की संभावना भी कुछ भी नहीं है।
लालबत्ती गई, लालसा नहीं गई

अप्रैल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट ने फैसला लिया कि 1 मई 2017 से आपात सेवाओं को छोडक़र सभी सरकारी वाहनों से लालबत्ती हटा दी जाएगी। इसका उद्देश्य वीवीआईपी कल्चर को समाप्त करना था। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अफसरों की गाडिय़ों से लालबत्ती हटा दी गई। इस फैसले का स्वागत हुआ, लेकिन तब भी सवाल उठा कि क्या केवल लालबत्ती हटाने से वीआईपी कल्चर खत्म हो जाएगा? यदि राजनीति को स्वच्छ बनाना है, तो सुरक्षा दस्ते, एस्कॉर्ट गाडिय़ां, सरकारी बंगलों में विशेष सुविधाएं क्यों नहीं समाप्त की जातीं?
लालबत्ती हटाने के कुछ ही दिन बाद, मई 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में 11 संसदीय सचिवों की नियुक्ति कर दी। यह पद उन विधायकों को दिया गया, जिन्हें मंत्रिपरिषद् में जगह नहीं मिली थी, लेकिन राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए मंत्री जैसी कुछ सुविधाएं देना जरूरी समझा गया। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को असंवैधानिक करार दिया और पश्चिम बंगाल में इस संबंध में पारित विधेयक को अवैध घोषित किया। इस आदेश के आधार पर तत्कालीन विधायक मो. अकबर ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन सरकार ने तर्क दिया कि ये मंत्री नहीं हैं, कैबिनेट बैठकों में शामिल नहीं होते और इन्हें राज्यपाल की शपथ नहीं दिलाई गई है। हाईकोर्ट ने यह तर्क स्वीकार कर याचिका खारिज कर दी।
विडंबना यह रही कि कांग्रेस ने विपक्ष में रहते संसदीय सचिवों की नियुक्ति का विरोध किया, लेकिन सत्ता में आते ही खुद 15 संसदीय सचिव नियुक्त कर दिए। संवैधानिक दर्जा न होते हुए भी इन्हें अन्य विधायकों से ऊंचा स्थान मिल गया।
लालबत्ती खत्म हुई, लेकिन नेताओं और अफसरों के लिए हूटर नया प्रतीक बन गया। मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार, हूटर की अनुमति केवल आपात सेवाओं, जैसे एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस को मिलती है। लेकिन मंत्रियों के काफिलों में यह धड़ल्ले से बजते हैं। पुलिस की पायलटिंग गाड़ी पर हूटर समझ में आता है, लेकिन काफिले की अधिकतर गाडिय़ां कानफोड़ू आवाज में सडक़ों पर रफ्तार से दौड़ती हैं, जिससे आम जनता सहमकर किनारे हो जाती है।
सिर्फ निर्वाचित प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि देखा-देखी उनके कार्यकर्ता, अफसर और उनके परिवार भी वीआईपी संस्कृति का लाभ उठाने में पीछे नहीं रहते। सभा-समारोहों में वीआईपी पास के लिए होड़ मचती है। आयोजक इतने पास बांट देते हैं कि व्यवस्था चरमरा जाती है।
कबीरधाम जिले के भोरमदेव महोत्सव में यही देखने को मिला। भाजपा के पूर्व सांसद और प्रख्यात गायक हंसराज हंस का कार्यक्रम था। डिप्टी सीएम और गृह मंत्री की मौजूदगी में वहां वीआईपी सीटें इतनी अधिक हो गईं कि आम दर्शकों के लिए जगह ही नहीं बची। खबरों के मुताबिक, नाराज भीड़ ने दो हजार से अधिक कुर्सियां तोड़ दीं और कार्यक्रम बाधित हो गया। वीआईपी कल्चर केवल लालबत्ती हटाने से खत्म नहीं होगा, जब तक कि नेता और अफसर खुद इसे जड़ से खत्म करने की इच्छाशक्ति न रखें। जब तक विशिष्टता दिखाने के नए-नए तरीके अपनाए जाते रहेंगे, जनता की नाराजगी फूटती रहेगी।
महादेव की अंतहीन कहानियाँ
महादेव सट्टेबाजी केस में सीबीआई की पहली बार एंट्री हुई है। सुबह से लेकर रात तक सीबीआई ने छत्तीसगढ़ समेत चार राज्यों के 60 ठिकानों पर छापेमारी की। छापे में क्या कुछ मिला यह स्पष्ट नहीं है। सीबीआई ने सिर्फ इतना ही कहा है कि तलाशी के दौरान डिजिटल, और दस्तावेजी साक्ष्य पाए गए, उन्हें जब्त किया गया है। चूंकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल, और कांग्रेस विधायक देवेन्द्र यादव के साथ ही चार आईपीएस अफसरों के यहां छापे डले, तो माहौल गरमा गया।
पूर्व सीएम, और ताकतवर पुलिस अफसरों के यहां छापेमारी हुई, तो राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा होती रही। वैसे तो ईडी इसी प्रकरण में पूर्व सीएम के करीबी विनोद वर्मा के यहां पहले भी छापा मार चुकी है। चर्चा है कि हाईकोर्ट में ऑनलाइन सट्टेबाजी पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। कोर्ट ने इस प्रकरण पर राज्य के गृह सचिव से हलफनामा मांगा है। प्रकरण पर अगली सुनवाई 4 अप्रैल को होगी। इससे पहले राज्य वित्त आयोग के पूर्व सदस्य नरेश चंद्र गुप्ता ने भी पिछले साल सीबीआई दफ्तर जाकर ज्ञापन भी दिया था, जिसमें पुलिस अफसरों की संलिप्तता का जिक्र था।
गुप्ता ने महादेव ऑनलाइन सट्टेबाजी प्रकरण के आरोपी एएसआई चंद्रभूषण वर्मा, दुबई निवासी महादेव ऐप के प्रोपराइटर शुभम सोनी, भिलाई निवासी सतीश चंद्राकर, और असीम दास के ईडी में पीएमएलए अधिनियम की धारा 50 के तहत दर्ज किए गए बयान का हवाला दिया था। छापेमारी को याचिका-शिकायत से जोडक़र देखा जा रहा है। जिनके यहां भी छापे डले हैं उनके नाम सट्टेबाजी केस में पहले ही पब्लिक डोमेन रहे हैं। ऐसे में छापे डले, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ।
सीबीआई की एक बड़ी टीम मंगलवार की रात रायपुर पहुंच गई थी। इसलिए यहां बड़ी कार्रवाई होने की भनक पहले ही लग गई थी। ऐसे में जिनके यहां छापे डले, उनमें से ज्यादातर लोग घर पर नहीं थे। कुछ भी हो, सीबीआई के लिए महादेव ऑनलाइन सट्टा प्रकरण सुलझाना आसान नहीं है। वजह यह है कि संचालक देश से बाहर हैं, और उन्हें यहां लाकर मुकदमा चलना कठिन है। ऐसे में जिनके यहां छापे डले हैं वो ज्यादा परेशान नहीं दिख रहे हैं। अफसरों को बुरा जरूर लग रहा है क्योंकि इससे साख पर असर पड़ा है। फिर भी पुलिस प्रशासन में सत्ता के साथ मिलकर अपराधीकरण चिंता का विषय है। इस मसले पर अब सीबीआई आगे क्या कुछ करती है यह देखना है।
अब रानू साहू ट्रेनिंग के लिए नामजद!
राज्य के साप्रवि का प्रकोष्ठ जीएडी-2 सीजी में पदस्थ आईएएस अफसरों के लिए डीओपीटी की तरह कैडर कंट्रोलिंग विभाग की तरह काम करता है। लेकिन यहां बरते जाने वाली अनदेखी से गंभीर मामलों में दोषी ,जेल याफ्ता अफसर भी सम्मानीय बने हुए हैं। और केंद्र के सभी प्रमुख कैरियर गाइडेंस ट्रेनिंग और अन्य कार्मिक योजनाओं के लिए नामजद भी हो रहे हैं। हाल में आईएएस अवार्ड न होने के बावजूद कोल घोटाले की आरोपी सौम्या चौरसिया, जमीन घोटाले में जांच का सामना कर रहे तीर्थराज अग्रवाल, आरती वासनिक को मसूरी अकादमी ने पहली ट्रेनिंग के लिए ऑफर लेटर भेज दिया । और अब डेढ़ वर्ष से जेल में बंद रानू साहू को भी अकादमी से फेज -3 ट्रेनिंग का कॉल आया है।
रानू डेढ़ वर्ष से कोल लेवी घोटाले के बाद अब डीएमएफ घोटाले में भी बंदी हो गई है। है न तालमेल का अभाव। डेढ़ वर्ष में जीएडी और डीओपीटी को एक दिन भी समय न मिला कि अकादमी को इसकी सूचना दे दे कि फलां अफसर जेल में है, निलंबित है। ताकि उन्हें ट्रेनिंग के लिए नामजद न किया जा सके।
क्या राज्य के साप्रवि और डीओपीटी के बीच तालमेल नहीं है या कोई चीज छुपाई जाती है। शायद ऐसे ही अन्याय कारणों से किसी मामले में आरोपित संदिग्ध और जांच का सामना करने वाले आईएएस अफसरों को चार्जशीट निर्धारित अवधि में नहीं मिल पाती और वे जांच ही नहीं पूरे मामले से बरी हो जाते हैं। यह केवल आईएएस नहीं ,आईपीएस आईएफएस के मामले में भी ऐसा ही होता हो।
तस्वीर पर सियासी घमासान

बिल्हा विधायक व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में 25 हजार वोटों के विशाल अंतर से जीते थे। उस समय कांग्रेस ने राजेंद्र शुक्ला को टिकट दी थी। शुक्ला को चुनाव लडऩे के पहले जिला कांग्रेस अध्यक्ष बिलासपुर का पद छोडऩा पड़ा था। हार-जीत में वोटों के फासले पर उस समय सवाल खड़े हुए थे। कहा गया कि भाजपा के पक्ष में ऐसा एकतरफा माहौल कैसे बना, जबकि कांग्रेस हर बार वहां टक्कर में रही है। करारी हार के बाद भी कांग्रेस में उनकी पकड़ ढीली नहीं हुई और जिला कृषि उपज मंडी बोर्ड के अध्यक्ष बना दिए गए। पीएससी की जिस चयन सूची पर सीबीआई जांच हो रही है, उनमें एक नाम उनके बेटे का भी है। अभी त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव में उनकी पत्नी अनीता शुक्ला जिला पंचायत सदस्य बन गई हैं। उन्होंने भाजपा की पुनीता डहरिया को हराया। जीत हार तो स्वाभाविक है लेकिन कांग्रेस नेताओं को हैरानी इस बात पर हुई कि उसी वोटिंग के दौरान इस जिला पंचायत क्षेत्र के सभी 6 जनपद के कांग्रेस प्रत्याशी हार गए। एक को भी जीत नहीं मिली। अब शुक्ला के खिलाफ जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केशरवानी और बिल्हा के पूर्व विधायक सियाराम कौशिक ने शुक्ला को पार्टी से निष्कासित करने की मांग कर दी है। उनका कहना है कि उनका भाजपा नेताओं से साठगांठ है। जनपद सदस्यों की सीट भाजपा को देने के एवज में उन्होंने अपनी जीत पक्की करा ली। सबूत के तौर पर यह तस्वीर भी पेश की गई है, जिसमें अनीता शुक्ला और राजेंद्र शुक्ला, विधायक धरमलाल कौशिक का झुक कर अभिवादन कर रहे हैं। पता चला है कि पर्यवेक्षक प्रमोद दुबे ने कौशिक और केशरवानी से अब मामले को तूल नहीं देने के लिए मना लिया है। वैसे करीब एक दर्जन नेताओं के खिलाफ जिला पंचायत और नगर निगम चुनाव के बाद कांग्रेस से भितरघात करने की शिकायत बिलासपुर जिले से हुई है। इनमें से प्रदेश प्रवक्ता अभय नारायण राय जैसे नाम भी शामिल हैं। ([email protected])
केन्द्रीय प्रतिनियुक्तियों में राज्यों की हिस्सेदारी
केंद्र सरकार हर वर्ष राज्यों में पदस्थ अखिल भारतीय कैडर के अफसरों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आने की अवसर देती है। इसके बकायदा राज्यों के सेटअप में सेंट्रल डेपुटेशन का कोटा भी निर्धारित कर रखा जाता है। लेकिन कुछ तो अफसर जाना नहीं चाहते तो कुछ राज्य की सरकारें अनुमति नहीं देती। इस वजह से यह कोटा पूरा नहीं होता। फिर कुछ राज्य अपने कोटे का पूरा इस्तेमाल कर लेते हैं।डीओपीटी की एक जानकारी के मुताबिक केंद्र में 27 एआईएस अधिकारियों के साथ, एजीएमयूटी कैडर टॉप पर बना हुआ है। यह कैडर अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेशों का संयुक्त कैडर है। जिसका केंद्र में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व है।
पिछले साल अक्टूबर तक एजीएमयूटी के बाद बिहार और एमपी में क्रमश: 19 और 18 अधिकारी इन पदों पर थे। अधिकृत कैडर की ताकत के मामले में, बिहार में 675 स्वीकृत पद हैं, जबकि एमपी 1,074 स्वीकृत पदों के साथ तीसरा सबसे बड़ा है। इसमें छत्तीसगढ़ भी बहुत ज्यादा पीछे नहीं है। यहां के 16 आईएएस,14 आईपीएस और 8 आईएफएस अफसर कई केंद्रीय कार्यालयों में पदस्थ है ।
इस ढोल की कीमत आपने चुकाई

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने बिलासपुर-नागपुर वंदे भारत एक्सप्रेस को आईएसओ 9001:2015 प्रमाण पत्र मिलने को उपलब्धि के रूप में पेश किया है। ये वही रेलवे है जो यात्री ट्रेनों के घाटे का रोना रोते हुए थकता नहीं, फिर भी वंदे भारत जैसी खाली दौड़ती ट्रेनों पर जनता का पैसा पानी की तरह बहा रहा है, वह भी सामान्य ट्रेनों से दो-तीन गुना अधिक खर्च उठाकर। छत्तीसगढ़ से चलने वाली नागपुर-बिलासपुर हो या रायपुर-विशाखापट्टनम, दोनों वंदे भारत के डिब्बे आधे कर दिए गए, क्योंकि यह महंगी सवारी लेने लोग तैयार ही नहीं। जब जनरल और स्लीपर कोच में जगह के लिए मारामारी हो रही हो, यात्रियों को गंदगी में सफर करने को मजबूर होना पड़ रहा हो तो, वंदे भारत को पहनाई गई माला किस काम की?
वैसे वंदे भारत का तामझाम शुरू से ही आंखों में धूल झोंकने वाला रहा है। सेमी-हाई-स्पीड, चमचमाते कोच और प्रीमियम सुविधाओं का लालच देकर इसे रेलवे का भविष्य बताया गया। लेकिन सच क्या है? नागपुर-बिलासपुर वंदे भारत का प्रति किलोमीटर खर्च 2000-2500 रुपये है, जबकि बिलासपुर-इतवारी पैसेंजर या समता एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें 800-1200 रुपये में ही चल जाती हैं। नतीजा? दो साल में 40 करोड़ खर्च, 25 करोड़ आय और 15 करोड़ का घाटा। रायपुर-विशाखापट्टनम का हाल तो और बुरा है। 30-35 फीसदी सीटें भरती हैं। दोनों से कुल मिलाकर सालाना चूना 50 करोड़ से ज्यादा लगने का अनुमान है। ये ट्रेनें आरामदेह हैं, इनकी टाइमिंग मेंटेन करने के लिए मालगाड़ी तक रोक दी जाती है लेकिन किराया इतना अधिक है कि आम आदमी मुंह फेर लेता है। वंदे भारत ट्रेन के लिए आईएसओ तमगा आम यात्रियों की सहूलियत काटकर हासिल किया गया है। अगर गुणवत्ता ही दिखानी थी, तो झारसुगुड़ा-गोंदिया या किसी दूसरी पैसेंजर ट्रेन को क्यों नहीं चुना गया, जो रोज सैकड़ों मजदूरों और छोटे कारोबारियों को ढोती है? ([email protected])
कंवर और श्रीनिवास राव
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर के पत्र के बाद केंद्र सरकार ने वन रक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी के शिकायतों की पड़ताल के आदेश दिए हैं। केन्द्र के पत्र के बाद वन विभाग में हडक़ंप मचा हुआ है। पूर्व गृहमंत्री ने जिन बिंदुओं को रेखांकित किया है, उसका विभागीय अफसर जवाब नहीं ढूंढ पा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस हैदराबाद की कंपनी की सेवाएं वनरक्षकों की भर्ती प्रक्रिया के लिए ली गई थी, उसी कंपनी को राजनांदगांव में भी आरक्षक भर्ती का काम दिया गया था। जिसमें बड़ी गड़बड़ी सामने आई, और कंपनी के कर्मचारियों समेत 16 लोग जेल में हैं।
कंवर ने 15 सौ वनरक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का खुलासा किया है। शिकायती पत्र में उन्होंने बताया कि भर्ती प्रक्रिया के बीच कई नियमों को बदल दिया गया। पूर्व गृहमंत्री ने डीएफओ रायगढ़ के पत्र का हवाला दिया, जिसमें रात में भी अभ्यार्थियों का फिजिकल टेस्ट कराया गया, जो कि नियमत: गलत था।
बताते हैं कि कुछ जगहों पर भर्ती प्रक्रिया में छूट के लिए विभागीय स्तर पर एक कमेटी बना दी गई, और कमेटी की अनुशंसा पर छूट दे दी गई। इस तरह भर्ती प्रक्रिया पूरी कराई गई। अंदर की खबर यह है कि विभागीय स्तर पर छूट का फैसला तो ले लिया गया, लेकिन अब तक विभागीय मंत्री से कार्योत्तर स्वीकृति नहीं मिल पाई है। एसीएस (वन) भी इससे सहमत नहीं है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया दूषित बताई जा रही है।
वैसे तो पूर्व गृहमंत्री कंवर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव को इस पूरी गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और उन पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाए हुए हैं। मगर यह सब आसान नहीं है। राव अपने अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। पिछली सरकार में पांच सीनियर आईएफएस अफसरों को सुपरसीड कर उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया था। सरकार बदलने के बाद भी उनकी हैसियत में कमी नहीं आई है।
कंवर रमन सरकार में वन मंत्री रह चुके हैं, और उन्होंने आरा मिल घोटाला प्रकरण में संलिप्तता पर राव के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की थी, लेकिन कार्रवाई तो दूर वो प्रमोट हो गए। ये अलग बात है कि विधानसभा की लोक लेखा समिति इस मामले में अब तक सरकार से सवाल-जवाब कर रही है। अब ताजा मामले को राव कैसे हैंडल करते हैं, यह देखना है।
मध्यम वर्ग और स्क्रैप पॉलिसी

प्रदूषण रोकने 15 वर्ष पुरानी कार बाइक, बस ट्रकों को ऑफ रोड करने केंद्र सरकार ने व्हीकल स्क्रैप पॉलिसी जारी कर दी है। इसे लेकर छोटे वाहन मालिक सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियान चलाए हुए हैं। इसमें वे, इन वाहनों को इस पॉलिसी से बाहर रखने केंद्र पर दबाव बनाने एकजुट कर रहे हैं। इसमें कहा गया कि-दुपहिया, चौपहिया वाहनों के लिए एन. जी. टी. ने जो 10 एवं 15 वर्ष के नियम लगाए जा रहे हैं वे आम जनता के खिलाफ हैं। अत: उनको वापस लेना जरूरी है। क्योंकि यह नियम केवल व्यावसायिक वाहनों के लिए तो ठीक है परन्तु निजी वाहनों के लिए बिल्कुल भी लागू नहीं होने चाहिये।
हम सभी जानते हैं कि निजी वाहन इतने समय में कुछ ज्यादा नहीं चल पाते हैं। अति आवश्यक होने पर ही ये सडक़ पर निकलते हैं। हम सभी परिवार की सुविधा के लिए ही वाहन खरीदते हैं ताकि बसों एवं ट्रेनों की भीड़ से बचा जा सके एवं इनके मैनटेन्स का भी हम सभी बहुत ज्यादा ध्यान रखते हैं। अपने शरीर से भी ज्यादा वाहन को मेंटेन रखते हैं। जिस तरह हमारे शरीर का यदि कोई अंग बीमार हो जाता है तो उसका इलाज कराकर उसको सही करा लिया जाता है लेकिन एक अंग के ऊपर पूरे शरीर को ही नहीं बदला जाता है, ठीक उसी प्रकार वाहन का भी वही पार्ट बदलकर उसे भी ठीक करा लिया जाता है। अत: वाहन को कन्डम घोषित करना अन्याय है।
बड़ी मुश्किल से एक-एक पैसा जोडक़र अपने परिवार के लिए यह सुविधा कर पाते हैं। लेकिन एन.जी.टी. के लोग कुछ घंटों की मीटिंग में ही फैमिली को इस सुविधा से वंचित कर रहे हैं यह सभी के लिए बहुत ही बड़ा अन्याय है एवं अन्याय के ऊपर लडऩा हमारा अधिकार है। लेकिन हम सब चुप रहकर इस अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते हैं। अब सभी को एकता के सूत्र में बंधकर इसके विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए ताकि सरकार की समझ में आ जाए कि हम लोग अब किसी भी ऐसे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एकता के सूत्र में बंधकर सरकार के अन्यायपूर्ण नियमों का विरोध करेंगे एवं सरकार को ऐसे नियम वापस लेने के लिए बाध्य कर देंगे। धन्यवाद।
सभी भाईयों से सविनय निवेदन है आम जनता की आवाज सरकार तक पहुंच जाए एवं सरकार को ऐसे नियम वापिस लेने के लिए बाध्य होना पड़े।
कुछ और तरीकों से बात बनी
हाल में हुए तीन चुनावों की चर्चा अब तक चल रही है। इसमें नगर निगम, पंचायत और चेंबर के जारी चुनाव हैं। इस दौरान दमदार प्रत्याशियों को बैठने-बिठाने यानी नामांकन वापसी का दौर जमकर चला। इसे न मानने वाले निकाय चुनाव में लड़े और जीते भी। जो नहीं माने उन्हें जीतने के बाद भी निलंबन, निष्कासन की तलवारें चलाई जा रहीं हैं। इसमें यह नहीं देखा जा रहा कि वो कितना बड़ा नेता रहा है। ऐसे ही एक दमदार वैश्य नेता जी जो जीत की हैट्रिक लगाने वाले थे, अचानक बैठ गए। सजातीय लोगों को समझ नहीं आया कि अचानक ऐसे कैसे हो गया। एक रात जब सब मिल बैठे तो हुआ खुलासा। नेताजी को पहले कहा गया विपक्ष के करीबी हैं अब विपक्ष के नेताओं का काम नहीं चलेगा। नेताजी नहीं माने। फिर कुछ और तरीके इस्तेमाल हुए।
शिक्षकों का फर्जीवाड़ा, बच्चों में खौफ
भर्ती परीक्षाओं में फर्जी परीक्षार्थियों की घटनाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं, लेकिन अगर ऐसा प्राइमरी स्कूल में होने लगे, तो शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। पहले आठवीं तक बच्चों को बिना किसी ठोस आकलन के पास कर दिया जाता था, और परीक्षा एक औपचारिकता होती थी। लेकिन जब यह नतीजा आने लगा कि शिक्षक बच्चों को बुनियादी अक्षर ज्ञान और गणितीय कौशल सिखाने में लापरवाही बरत रहे हैं, तो नई शिक्षा नीति की गाइडलाइन के तहत इस साल से पांचवीं और आठवीं की बोर्ड परीक्षाओं को अनिवार्य कर दिया गया।
हालांकि, प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता इससे कहीं अधिक चिंताजनक है। शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन करने वाली संस्था ‘असर’ की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा की हालत बदतर बताई गई है। सरकार ने शिक्षकों को जवाबदेह बनाने के लिए बोर्ड परीक्षा को अनिवार्य किया, लेकिन कुछ शिक्षक और अधिकारी अब भी इसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं। सरगुजा जिले के लखनपुर ब्लॉक के सुगाआमा गांव में इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया, जहां कुल दो बच्चों की परीक्षा होनी थी। एक बच्ची परीक्षा में उपस्थित थी, लेकिन दूसरे परीक्षार्थी की जगह स्कूल में काम करने वाले स्वीपर मनीष मिंज को बैठा दिया गया।
यह एक मामला, सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों में घटती अरूचि और इनमें ताला लगने के सिलसिले को उजागर करता है। क्या वास्तव में इस स्कूल में पांचवीं कक्षा के केवल दो ही छात्र हैं? अगर हां, तो दाखिले इतने कम क्यों हैं? क्या आसपास के बच्चे निजी स्कूलों में पढऩे जा रहे हैं? एक सवाल यह भी है कि दूसरा विद्यार्थी परीक्षा देने क्यों नहीं पहुंचा? क्या वह परीक्षा के नाम से डर गया और भरपाई स्वीपर से की जा रही थी? एक दूसरा मामला तखतपुर से आया है, जो इस आशंका को बल देता है। शुक्रवार को बोर्ड परीक्षा शुरू हुई तो देवतरी स्थित प्रायमरी स्कूल का छात्र अरमान कुर्रे परीक्षा नहीं पहुंचा। शिक्षक इंतजार करते रहे। जब वह काफी देर हो गई तो एक शिक्षक उसके घर पहुंचा। अरमान घर के एक कोने में दुबका बैठा था। उसने परीक्षा देने से मना कर दिया। माता-पिता पहले ही स्कूल तक छोडऩे की कोशिश कर चुके थे, शिक्षक के मनाने-समझाने पर भी अरमान परीक्षा देने के लिए राजी नहीं हुआ।
इधर लखनपुर के सुगाआमा स्कूल के क्लास रूम की हालत भी शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा को सामने लाती है। दीवारें सीलन से भरी हैं, और छोटा सा कमरा किसी हवालात जैसा नजर आता है। सवाल यह है कि मोटा वेतन पाने के बावजूद जिन शिक्षकों और अफसरों ने शिक्षा की नींव खोखली करने में कसर नहीं छोड़ी है, उन पर कोई कठोर कार्रवाई होगी या नहीं? या फिर केवल मामूली मानदेय पर काम करने वाले अंशकालिक स्वीपर को बलि का बकरा बनाकर इस मामला दबा दिया जाएगा?
प्रसंगवश, शिक्षा विभाग की मंशा, निजी पब्लिक स्कूलों की परीक्षा भी माध्यमिक शिक्षा मंडल से कराने की थी। हाईकोर्ट से निजी स्कूल प्रबंधकों को इस सत्र के लिए स्थगन मिल गया है। लखनपुर की घटना बताती है कि पहले सरकारी स्कूलों में ही परीक्षा लेने का इंतजाम सुधार लिया जाए फिर निजी स्कूलों को बाध्य किया जाए। तखतपुर की घटना बताती है कि शिक्षक और छात्र के बीच इतनी दूरी नहीं होनी चाहिए कि नादान सी उम्र में ही परीक्षा को लेकर डर बैठ जाए।
नौ वर्षों बाद दिखा दुर्लभ पक्षी

छत्तीसगढ़ में नौ वर्षों बाद एक दुर्लभ पक्षी को फिर देखा गया है। युवा फोटोग्राफर राहुल गुप्ता ने 23 मार्च को अचानकमार टाइगर रिजर्व के समीप शिवतराई क्षेत्र में इस पक्षी को कैमरे में कैद किया। यह पक्षी कबूतर जैसा दिखने वाला और दुर्लभ प्रजाति का है।इंडियन बर्ड्स समूह के मॉडरेटर एवं विशेषज्ञ रजुला करीम ने इस पक्षी की पहचान ऑरेंज-ब्रेस्टेड ग्रीन पिजन (मादा) के रूप में की है। इस पहचान की पुष्टि ई-बर्ड से जुड़े छत्तीसगढ़ के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु गुप्ता ने भी की।
यह पक्षी येलो-लेग्ड ग्रीन पिजन (हरियल) का नजदीकी रिश्तेदार है, लेकिन इसके पैरों और वक्ष स्थल के पंखों के रंग में विशेष अंतर होता है।
गौरतलब है कि इससे पहले 20 फरवरी 2016 को बस्तर से पक्षी प्रेमी सुशील दत्ता ने इस दुर्लभ पक्षी की फोटो ‘बर्ड एंड वाइल्डलाइफ ऑफ छत्तीसगढ़’ फेसबुक ग्रुप में साझा की थी। यह खोज छत्तीसगढ़ की जैव विविधता और पक्षी संरक्षण के क्षेत्र में एक उपलब्धि मानी जा रही है। ([email protected])
निजी विवि और नियुक्ति
छत्तीसगढ़ राज्य निजी विश्वविद्यालय आयोग के चेयरमैन, और सदस्य का पद खाली है। चेयरमैन का पद तो 6 महीने से खाली है। एक सदस्य का कार्यकाल भी खत्म हो चुका है। वर्तमान में आयोग के एक सदस्य बृजेशचंद मिश्रा ही चेयरमैन का अतिरिक्त दायित्व संभाल रहे हैं। मिश्रा का कार्यकाल भी अगले पखवाड़े खत्म होने वाला है। इससे परे निजी विश्वविद्यालयों में फर्जीवाड़े की शिकायत रही है। खुद राज्यपाल रामेन डेका विश्वविद्यालयों की कार्यप्र्रणाली पर भरी बैठक में नाराजगी जता चुके हैं।
चूंकि मिश्रा रविवि में कुलसचिव रह चुके हैं। रायपुर कमिश्नर के साथ-साथ कई अहम पदों पर रहे हैं। उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने के लिए काफी हद तक दबाव बनाया है। इन सबके बीच चेयरमैन, और सदस्यों के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए देश-प्रदेश के शिक्षाविदों की लाइन लगी है, और वे जोड़तोड़ भी कर रहे हैं। कुछ पूर्व कुलपति भी आयोग के अध्यक्ष बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।
हल्ला है कि कुछ निजी विश्वविद्यालय के प्रबंधक अपनी पसंद का अध्यक्ष और सदस्य बनवाने के लिए भी प्रयासरत हैं। कुछ विवादित शिक्षाविदों के नाम चर्चा में हैं। सरकार इस पर क्या कुछ फैसला लेती है यह अगले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।
आईएएस में फेरबदल का वक्त
तबादलों का सीजन शुरू हो रहा है। इसकी शुरूआत मंत्रालय से होने जा रही है। चर्चा है कि आईएएस अफसरों की एक लंबी सूची निकल सकती है। उच्च शिक्षा सचिव आर प्रसन्ना केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। वो इसी हफ्ते रिलीव हो जाएंगे।
इसी तरह बिलासपुर कलेक्टर अवनीशशरण की मंत्रालय में पोस्ंिटग हो सकती है। वो सचिव के पद पर प्रमोट हो चुके हैं। कुछ कलेक्टरों को बदले जाने की चर्चा है। कहा जा रहा है कि आधा दर्जन कलेक्टर प्रभावित हो सकते हैं। कुछ बेहतर काम करने वाले अफसरों को अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल सकती है। मसलन, रजत कुमार, सोनमणि बोरा, और एक-दो महिला अफसरों के नाम चर्चा में हैं।
राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस में आए अफसर सचिव के पद पर नहीं है। पिछली सरकारों में कम से कम चार-पांच आईएएस अवार्ड वाले अफसर सचिव होते थे। यह बात भी अलग-अलग फोरम के जरिए सीएस तक पहुंचाई गई है। माना जा रहा है कि फील्ड में पोस्टेड अफसरों में से एक-दो को मंत्रालय में लाया जा सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
सुलझेगा महानदी जल विवाद?
महानदी जल विवाद की जड़ें छत्तीसगढ़ के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में बनाए गए बैराज और चेक डैम से जुड़ी हैं, जिनका निर्माण मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ में जल संसाधन प्रबंधन के लिए किया गया था। ओडिशा का आरोप है कि इन परियोजनाओं ने महानदी के निचले हिस्से में जल प्रवाह को प्रभावित किया, जिससे वहां सिंचाई और पेयजल की समस्या पैदा हुई। यह विवाद तब और गहरा गया था जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी और ओडिशा में बीजू जनता दल की। ओडिशा के विधायकों की एक समिति उस समय छत्तीसगढ़ का दौरा किया था। उस समय छत्तीसगढ़ में बृजमोहन अग्रवाल जल संसाधन मंत्री थे। यह दौरा महानदी के जल उपयोग और बैराजों के प्रभाव को समझने के लिए किया गया था। ओडिशा का कहना था कि बिना एनजीटी की मंजूरी के ये बैराज बनाए रहे हैं। ओडिशा सरकार से भी सहमति नहीं ली गई।, लेकिन उस समय कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया। ओडिशा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय हरित अधिकरण और जल विवाद न्यायाधिकरण तक ले जाया, लेकिन वहां भी मामला अनसुलझा रहा। कांग्रेस सरकार के 5 साल के कार्यकाल में भी समझौते की दिशा में कोई प्रयास नहीं दिखा। अब, जब दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और केंद्र भी समन्वय के लिए तैयार है, तो इस विवाद के हल होने की संभावना बढ़ गई है। शनिवार को भुवनेश्वर के लोक सेवा भवन में हुई बैठक में दोनों मुख्यमंत्रियों ने जिस तरह से सहमति जताई, वह इस बात का संकेत है कि राजनीतिक एकता और आपसी समझ इस लंबित समस्या को हल कर सकती है।
गिरा दो झोपड़ी, मैं महल बना लूंगी


उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर से आई एक तस्वीर ने हमारे समाज को झकझोर कर रख दिया है। बुलडोजर जब अजईपुर गांव की झोपडिय़ों को ढहा रहा था, तब छोटी सी बच्ची अनन्या दौड़ती हुई आई और अपने बिखरते आशियाने से अपनी कॉपी-किताबों को समेट ले गई। मानो वह कह रही है कि तुम झोपड़ी तोड़ सकते हो, मेरे सपने नहीं। किताबें बच गईं तो मैं खुद अपना महल खड़ा कर लूंगी। कक्षा-1 में पढऩे वाली इस नन्ही बच्ची की तस्वीर ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों के खोखलेपन को भी उजागर किया है। ([email protected])
कांग्रेस में कौन कहाँ
आखिरकार कांग्रेस ने शनिवार को 11 जिला अध्यक्षों की सूची जारी कर दी। इन अध्यक्षों को बदला जाना था। खास बात ये है कि प्रदेश के बड़े नेताओं की पसंद पर जिला अध्यक्षों का चयन किया गया। साथ ही प्रभारी सचिवों की राय को भी तवज्जो दी गई।
मसलन, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की पसंद पर कोरबा शहर और ग्रामीण अध्यक्ष की नियुक्ति की गई। पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव की सिफारिश पर सरगुजा और बलरामपुर जिला अध्यक्ष की नियुक्ति की गई। पूर्व सीएम भूपेश बघेल की अनुशंसा पर राकेश ठाकुर को दुर्ग और चंद्रेश हिरवानी को बालोद जिला अध्यक्ष बनाया गया।
र्व विधायक आशीष छाबड़ा को बेमेतरा जिले की कमान सौंपी गई। छाबड़ा, पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू के करीबी माने जाते हैं। इन सबके बीच में एक-दो नाम ऐसे भी हैं जिनकी नियुक्ति को लेकर पार्टी के भीतर काफी चर्चा हो रही है। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की कमान महिला नेत्री सुमित्रा धृतलहरे को सौंपी गई है। सुमित्रा जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लडऩा चाहती थी लेकिन पार्टी ने उन्हें अधिकृत नहीं किया। सुमित्रा की जगह एक पूर्व मंत्री के नजदीकी रिश्तेदार को जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ाया गया। मगर अब पार्टी ने सुमित्रा को सीधे जिले की कमान सौंप दी है।
इसी तरह नारायणपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बीसेल नाग की नियुक्ति की गई है, जिसके नाम पर एक तरह से आम सहमति रही है। इसी तरह कोण्डागांव में बुधराम नेताम को जिला अध्यक्ष बनाया गया है, जो कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम के नजदीकी माने जाते हैं। यानी नियुक्तियों में हाईकमान ने सभी गुटों को साधने की कोशिश की है।
लालबत्तियां कब?
भाजपा संगठन में भी बड़े बदलाव की चर्चा है। प्रदेश अध्यक्ष किरणदेव की नई कार्यकारिणी अगले महीने के आखिरी तक जारी हो सकती है। पार्टी के रणनीतिकार नए चेहरे को आगे लाने की तैयारी कर रहे हैं। यह चर्चा है कि वर्तमान में प्रदेश के महामंत्री, और उपाध्यक्ष जैसे पदों पर बैठे कई नेताओं को 'लालबत्ती' मिल सकती है।
पीएम नरेन्द्र मोदी का 30 तारीख को बिलासपुर प्रवास है। कहा जा रहा है कि मोदी के दौरे के बाद निगम मंडलों के पदाधिकारियों की एक सूची जारी हो सकती है। निगम मंडलों की नियुक्ति में क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखा जाएगा। इससे परे संगठन में मोर्चा-प्रकोष्ठ के अध्यक्षों के लिए उपयुक्त नाम तलाशे जा रहे हैं। आरएसएस से भी चर्चा चल रही है। कुछ नेताओं का अंदाजा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद किरण देव की नई टीम घोषित की जा सकती है।
बिना प्रसाधन कन्या दान

एमसीबी (मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) जिले में कल सामूहिक कन्या विवाह सम्मेलन रखा गया। अफसरों ने नव दंपतियों को दिए जाने वाले चेक और उपहारों का वितरण मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से कराया। आगे-पीछे अफसर होते हैं तो मंत्रियों को पता ही नहीं चलता कि अफसर क्या-क्या गुल खिलाते हैं। चिरमिरी के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में भी कुछ ऐसा ही हुआ। सामूहिक विवाह के लिए जो युवा पहुंचे थे उनके लिए महिला बाल विकास विभाग ने चेंजिंग रूम की व्यवस्था ही नहीं की थी। वर, वधू और उनके अभिभावक इसे लेकर खासे परेशान हुए। कोई किसी झाड़ी के पीछे तो कोई किसी दीवार के कोने में जगह बनाकर कपड़े बदल रहा था। पता चला है कि इस आयोजन के लिए 11 लाख रुपये का बजट मिला था। अस्थायी प्रसाधन कक्ष कुछ टेंट, शीट, कनात खींचकर थोड़े से बजट से बनाए जा सकते थे, मगर अधिकारियों ने यह पैसा बचा लिया। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नये जोड़ों को उपहार देने की परंपरा शुरू हुई थी। तब बलरामपुर जिले में तत्कालीन मंत्री डॉ. प्रेम साय सिंह ऐसे ही एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वहां घटिया बर्तन वितरित करने की शिकायत वहां के जनप्रतिनिधियों ने उनसे की थी, मगर कोई कार्रवाई किसी पर नहीं हुई थी। करीब 3-4 साल पहले महासमुंद से खबर आई थी कि वहां के कलेक्टर ने घटिया गद्दे रजाई और बर्तन बांटने से ऐन वक्त पर रोक दिया था और विभाग के अधिकारियों को फटकारा था। मगर, वही घटिया दर्जे के उपहार कुछ बाद हुए दूसरे विवाह सम्मेलन में बांट दिया गया। तब तक कलेक्टर का तबादला हो चुका था। बाल विकास विभाग में बच्चों के पोषण आहार में कमीशनखोरी अक्सर चर्चा में रहती है। सामूहिक विवाह के लिए सामान खरीदने, समारोह की व्यवस्था करने पर निर्धारित बजट में भी इसी तरह की गड़बड़ी होती है।
विधानसभा भवन पर कइयों की नजर
बजट सत्र के अवसान संबोधन में स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने कह दिया है कि यह इस सदन (भवन) में अंतिम सत्र था। अगला सत्र जो मानसून सत्र होगा वह नवा रायपुर के नए विशाल भवन में होगा।
स्पीकर की इस घोषणा के बाद रिक्त होने वाले इस भवन पर कब्जे ,आबंटन को लेकर सरकारी विभागों की नजर गड़ गई है। वे कल से चर्चा, दावे भी करने लगे हैं। किसे मिलेगा यह सुसज्जित भवन । कोई कह रहा कि राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय भूजल अनुसंधान संस्थान वापस लेगा। जो 2000 में यह भवन हस्तांतरित करने के बाद 25 वर्षों से पचपेड़ी नाका में किराए के भवन मेें है। तो राज्य सरकार के किसी शैक्षणिक संस्थान को देने की भी चर्चा है। वन विभाग की भी नजर है। वह अपने राज्य वन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। जो अभी इसके सामने ही भवन में चल रहा है।
लेकिन सच्चाई यह है कि फिलहाल तो एक डेढ़ वर्ष तक भवन विधानसभा सचिवालय के आधिपत्य में ही रहेगा। क्योकिं नए भवन के निर्माण की प्र-गति देखने वाले सचिवालय के अफसरों को नहीं लग रहा कि अगला सत्र वहां हो जाएगा ? भवन का स्ट्रक्चरल वर्क तो हो गया है लेकिन असली बारीकियाँ, नक्काशी तो फिनिशिंग में होती है, कराई जाती हैं। और उसी में डेढ़ दिन का काम तीन दिन की तर्ज पर होता है। देखना होगा स्पीकर की घोषणा का सम्मान, निर्माण एजेंसी पीडब्लूडी के अफसर कैसे करते हैं । तब तक ऐसी कई चर्चाएं अटकलें चलती रहेंगी ।
बृजमोहन की अनदेखी भारी पड़ी

रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल की सिफारिशों को हल्के में लेना रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. अशोक जिंदल को भारी पड़ गया। बृजमोहन ने शुक्रवार को जिंदल के खिलाफ लोकसभा में मामला उठा दिया। बृजमोहन के तेवर से एम्स में हडक़ंप मचा है।
बताते हैं कि रायपुर लोकसभा क्षेत्र के मरीजों के दाखिले के लिए बृजमोहन की तरफ से रायपुर एम्स में सिफारिशें भेजी जाती रही है। खुद बृजमोहन रायपुर एम्स की सलाहकार समिति के चेयरमैन भी हैं, और चर्चा है कि खुद उन्होंने मरीजों से जुड़ी समस्याओं को लेकर एम्स डायरेक्टर को फोन लगवाया तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।
बृजमोहन के करीबियों का कहना है कि हमेशा एम्स प्रबंधन की तरफ से बेड नहीं होने की बात कहकर गंभीर मरीजों को वापिस भेज दिया जाता है। इससे बृजमोहन काफी खफा थे। उन्होंने सीधे-सीधे लोकसभा में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री प्रतापराव जाधव के संज्ञान में मामला लाया। जाधव ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने यह भी बताया कि एम्स में 150 बिस्तर वाले क्रिटिकल केयर अस्पताल ब्लॉक की स्थापना को मंजूरी दी गई है। ताकि गंभीर मरीजों का बेहतर इलाज हो सके।
खैर, बृजमोहन के सवाल के बाद एम्स की व्यवस्था बेहतर होगी, इसकी उम्मीद जताई जा रही है। कुछ लोग पूर्ववर्ती एम्स डायरेक्टर डॉ. नितिन नागरकर की कार्यशैली को याद कर रहे हैं। जिन्होंने उस समय सीमित संसाधन होने के बावजूद एम्स में इलाज की बेहतर व्यवस्था बनाई। कोरोना काल में एम्स में इलाज के बेहतर प्रबंधन की राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी।
अब तो बिहार में भी बदल दिए

कांग्रेस हाईकमान ने बिहार में भी प्रदेश अध्यक्ष को बदल दिया है। विधायक राजेश कुमार को अध्यक्ष बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ इसी तरह की अटकलें लगती रही है, और जब प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट यहां आए, तो कुछ लोगों ने उनसे प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के भविष्य को लेकर पूछ दिया।
पायलट ने सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन एक-दो प्रमुख नेताओं ने बैज के पक्ष में बात कही है। इन सबके बीच अंदाजा लगाया जा रहा है कि बैज कुछ समय तक और पद पर बने रह सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि एक दर्जन से अधिक जिला अध्यक्षों की सूची जारी हो सकती है। बदलाव को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है। आगे क्या होता है यह कुछ दिन बात पता चलेगा।
स्मारकों का भी हो रहा सफाया

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल प्रभावित इलाकों में हाल के महीनों में सुरक्षा बलों और पुलिस ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई तेज की है। बीजापुर जिले के उसूर इलाके में सीआरपीएफ की 81वीं और कोबरा 204वीं बटालियन की संयुक्त टीम ने कल 30 फीट ऊंचे नक्सली स्मारक को ध्वस्त किया। नक्सलियों ने बस्तर क्षेत्र में कई ऊंचे स्मारक बनाए हैं, जिनकी ऊंचाई आमतौर पर 20 से 40 फीट तक होती है। मगर बीजापुर के कोमटीपल्ली में करीब 64 फीट ऊंचा स्मारक बनाया गया था, जिसे दिसंबर में गिराया गया। इसकी तस्वीर को वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने अपनी सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी किया था। इन स्मारकों की सटीक संख्या मौजूद नहीं है, पर यह तय है कि जब भी सुरक्षा बलों के मुठभेड़ों में नक्सली बड़ी संख्या में मारे जाते हैं तो उस जगह वे स्मारक खड़ा करने की कोशिश करते हैं। बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर, दंतेवाड़ा के दुर्गम इलाकों में अब भी कई स्मारक मौजूद हैं। बीजापुर के तमिलभट्टी गांव में भी इसी महीने, 7 मार्च को एक नक्सली स्मारक नष्ट किया गया था। दरअसल, ये स्मारक नक्सली इसलिये बनाते हैं ताकि स्थानीय आदिवासी समुदाय पर उनका प्रभाव बढ़े और सुरक्षा बलों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बने। इन स्मारकों के जरिए वे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को मजबूत करने की कोशिश करते हैं। सरकार और सुरक्षा बलों को यह मालूम है, इसलिये वे जब भी किसी मुठभेड़ में सफलता हासिल करते हैं, वहां यदि कोई स्मारक मिला तो उसे भी ध्वस्त कर देते हैं।
जेल में रहते हुए भी...
नगरीय निकाय चुनाव की तरह पंचायत चुनाव में भी भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली है। पार्टी 33 में से 32 जिला पंचायतों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही। मगर पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा के जेल में होने के बाद भी सुकमा जिला पंचायत में भाजपा का परचम नहीं लहरा पाया। भाजपा के रणनीतिकारों ने यहां अपना अध्यक्ष बनवाने के लिए भरसक कोशिशें की थी, लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाए।
सुकमा में कांग्रेस समर्थित पांच, भाजपा के तीन, और सीपीआई समर्थित तीन जिला पंचायत सदस्य चुनकर आए थे। भाजपा के रणनीतिकारों ने पहले सीपीआई, और फिर कांग्रेस समर्थित सदस्यों को तोडऩे की कोशिश की, लेकिन निराशा हाथ लगी। दो बार चुनाव की तिथि आगे बढ़ाई गई, लेकिन कांग्रेस, और सीपीआई के सदस्य आखिरी तक एकजुट रहे। किसी तरह दबाव, और प्रलोभन का उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। आखिरकार कांग्रेस समर्थित मंगम्मा सोयम जिला पंचायत अध्यक्ष, और सीपीआई के महेश कुंजाम उपाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किए गए।
रायपुर जिला पंचायत में कांग्रेस, और भाजपा के बीच बराबरी का मुकाबला था। मगर जोगी पार्टी के जिला पंचायत सदस्य संदीप यदु, और एक अन्य सदस्य अन्नू तारक के भाजपा में शामिल होने से खेल बिगड़ गया। भाजपा समर्थित नवीन अग्रवाल जिला पंचायत अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष पद पर संदीप यदु निर्वाचित हुए। नवीन पहले जिला पंचायत उपाध्यक्ष रह चुके हैं। चाहे जैसे भी हो, राज्य बनने के पहले, और बाद में जिला पंचायतों में भाजपा को इतनी बड़ी सफलता कभी नहीं मिली।
महज तीन वर्ष में ईडी की सूची में छत्तीसगढ़

केंद्र सरकार ने संसद को सूचित किया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पिछले 10 वर्षों में सांसदों, विधायकों, एमएलसी और स्थानीय निकायों के नेताओं साथ-साथ उनके दलों के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए हैं। लेकिन इनमें ईडी का कनविक्शन रेट एक प्रतिशत से भी कम है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार इनमें से केवल दो ही मामलों में आरोपी नेताओं पर दोष सिद्ध कर पाई है हालांकि संघीय जांच एजेंसी के लिए सुखद खबर यह भी है कि किसी भी मामले में गुण-दोष के आधार पर दोषमुक्ति नहीं हुई है। ईडी की इस लिस्ट में छत्तीसगढ़ ने भी जगह बनाई है। और वह भी महज ढाई तीन वर्ष में ।
ईडी यहां कोयला घोटाला, शराब घोटाला, कस्टम मिलिंग, और महादेव सट्टा घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के मामले दर्ज किए हैं। और दो वर्तमान विधायक कवासी लखमा (पूर्व मंत्री) देवेंद्र यादव और पूर्व विधायक चंद्रदेव राय को आरोपी बनाया है। और इन्हीं मामलों में पूर्व सीएम के पुत्र से पूछताछ हो रही है। तो कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल की भी तलाश है ईडी को । ईडी के अतिरिक्त आयकर, सीबीआई के जाल में भी कई अफसर, नेता फंसे हुए हैं।
ईडी ने सिटिंग और पूर्व सांसदों, विधायकों, एमएलसी और राजनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों का साल दर साल विवरण दिया है। इसके मुताबिक-
01.04.2015 से 31.03.2016 तक-10
01.04.2016 से 31.03.2017 तक- 14
01.04.2017 से 31.03.2018 तक- 07
01.04.2018 से 31.03.2019 तक- 11
01.04.2019 से 31.03.2020 तक- 26
01.04.2020 से 31.03.2021 तक- 27
01.04.2021 से 31.03.2022 तक- 26
01.04.2022 से 31.03.2023 तक- 32
01.04.2023 से 31.03.2024 तक- 27
01.04.2024 से 28.02.205 तक-13
पर केस दर्ज किए हैं।
संवेदनशीलता और विफलता

कोंडागांव, बस्तर का वह कोना जहां माओवादी हिंसा और अधूरे विकास की हकीकत आज भी ग्रामीणों का पीछा नहीं छोड़ती। एक तस्वीर सामने आई है—युवा कलेक्टर कुणाल दुदावत, एसपी के साथ बाइक पर सवार, पथरीली पगडंडियों को पार करते हुए गांववालों की समस्याएं सुनने निकले हैं।
यह उनकी संवेदनशीलता है, तारीफ होनी चाहिए। भीषण गर्मी में अफसर एसी गाडिय़ों से उतरकर ग्रामीणों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन यही तस्वीर एक कड़वी सच्चाई भी बयान कर रही है। 77 साल बाद भी यहां सडक़ें और पुल नहीं बन पाए। बस्तर के कई गांव बारिश में राशन के लिए तो गर्मी में पानी के लिए। नाले उफान पर आए तो पुल बह जाते हैं, बच्चे बांस के सहारे नदी पार करने को मजबूर होते हैं। एंबुलेंस इन पगडंडियों तक नहीं पहुंचती, मरीजों को खाट-कांवड़ पर अस्पताल ले जाना पड़ता है।
इसलिए कलेक्टर का बाइक से गांव पहुंचना सराहनीय जरूर हो पर उतना ही शर्मनाक भी कहा जा सकता है। यह प्रशासन की इच्छाशक्ति और वर्षों से अधूरे पड़े विकास कार्यों की पोल खोलता है। यह तस्वीर कब बदलेगी?
एआई ने खींचा अपराधी का स्केच
भिलाई में तीन दिन पहले लूट की एक घटना हुई थी। स्कूटी सवार महिला के गले में चाकू अड़ाकर सोने की चेन और अंगूठी लूट ली गई। मामले में पुलिस को अपराधी का स्केच बनाने के लिए स्केच आर्टिस्ट की जरूरत नहीं पड़ी। पीडि़ता के इंजीनियर पति ने खुद एआई तकनीक से संदिग्ध की तस्वीर तैयार कर पुलिस को दी। उसी तस्वीर के आधार पर अब पुलिस अपराधी की तलाश कर रही है। यह दिखाता है कि हमारे आपके जैसे आम नागरिक भी तकनीक के जरिए अपराधों की जांच में मददगार बन सकते हैं। दिल्ली पुलिस अपराधियों के पकडऩे के लिए एआई तकनीक का इस्तेमाल कर रही है। सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध की तस्वीर को पहचानने में मदद ली जा रही है। दिल्ली पुलिस पुराने आपराधिक डेटा की जांच करने के लिए भी एआई का इस्तेमाल कर रही है। यदि कोई संदिग्ध बातचीत रिकॉर्ड की गई तो भी एआई से पहचानने में मदद मिल सकती है। प्रसंगवश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इन दिनों सुनवाई चल रही है कि पुलिस महकमे में साइबर एक्सपर्ट की भारी कमी है। छत्तीसगढ़ पुलिस को अब साइबर एक्सपर्ट ही नहीं, एआई एक्सपर्ट की भी जरूरत पडऩे वाली है। भिलाई के मामले में तो पीडि़ता का पति इंजीनियर था, एआई का जानकार था तो स्केच बनाकर दे दिया, पर बाकी मामलों में तो अपराध की जांच करने वाली पुलिस को ही जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। ([email protected])
निरक्षरता बचाव का हथियार?
पूर्व आबकारी मंत्री और विधायक कवासी लखमा इस समय 2100 करोड़ रुपये के कथित शराब घोटाले में जेल में हैं। रायपुर सेंट्रल जेल में ईओडब्ल्यू उनसे लगातार पूछताछ कर रही है। लखमा का बचाव यही है कि वे पढ़े-लिखे नहीं हैं और अफसरों ने जहां दस्तखत करने के लिए कहा, उन्होंने वहां कर दिया।
हालांकि, अभी इस मामले की जांच जारी है। केस डायरी कोर्ट में पेश नहीं हुई है और सुनवाई के बाद ही फैसला आएगा। कैसा भी फैसला हो, उस फैसले के खिलाफ ऊपर की अदालतों में अपील की संभावनाएं भी रहेंगी। लेकिन कानूनी नजरिये से बड़ा सवाल यह है कि लखमा का यह बचाव कानून के धरातल पर कितना टिकेगा?
विधि के कुछ जानकारों का मानना है कि भारतीय कानून का एक सामान्य सिद्धांत यह है कि कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं हो सकती। लेकिन यहां मामला सिर्फ कानूनी अज्ञानता का नहीं, बल्कि दस्तावेजों और तथ्यों की जानकारी न होने का है।
अदालत ऐसे मामले में जांच कर सकती है कि क्या वास्तव में आरोपी अशिक्षा के कारण घोटाले की जानकारी नहीं रखता था? क्या दस्तावेजों पर बिना समझे हस्ताक्षर किए गए, या फिर यह एक सोची-समझी भागीदारी थी? आरोपी को इस घोटाले से कोई आर्थिक या अन्य व्यक्तिगत लाभ हुआ या नहीं और क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्य आरोपी के खिलाफ जाते हैं?
यदि अदालत को यह विश्वास हो जाता है कि लखमा अनजाने में किसी षड्यंत्र का हिस्सा बने और उन्हें कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ, तो सजा कम हो सकती है या वे पूरी तरह बरी भी हो सकते हैं। लेकिन यदि उनकी संलिप्तता साबित होती है, तो खुद को अनपढ़ बताना बचाव के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
1988 के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत, यह साबित करना जरूरी होता है कि आरोपी ने जानबूझकर अपने पद का दुरुपयोग किया। अदालतें कई मामलों में मान चुकी हैं कि अशिक्षा अपने आप में बचाव नहीं हो सकती। खासकर जब कोई व्यक्ति मंत्री जैसे उच्च पद पर हो, तो उसे अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की बुनियादी समझ होती है।
न्यायिक फैसला साक्ष्यों, वकीलों की जिरह और अदालत के दृष्टिकोण पर निर्भर होगा। लेकिन यहां एक बात साफ हो रही है कि वैसे तो शिक्षा हमेशा ताकत होती है, मगर कुछ परिस्थितियों में निरक्षरता को भी बचाव के लिए हथियार बनाया जा सकता है।
लखमा ने पायलट से कहा
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट रायपुर आए, तो पार्टी में काफी हलचल रही। यहां आने के बाद वो नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत, और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के साथ सेंट्रल जेल में बंद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा से मिलने पहुंचे।
बताते हैं कि पायलट से चर्चा के दौरान पूर्व आबकारी मंत्री लखमा मायूस थे। इसकी वजह यह भी थी कि पायलट से मुलाकात खत्म होने के बाद ईओडब्ल्यू-एसीबी की टीम उनसे पूछताछ के लिए पहुंचने वाली थी। कवासी ने पायलट को दुखड़ा सुनाया कि उनका प्रकरण से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें फंसाया गया है। ईडी और ईओडब्ल्यू-एसीबी ने दोनों ने अलग-अलग प्रकरण दर्ज कर रखा है। एक प्रकरण में जमानत होती है, तो उसी प्रकरण में ईओडब्ल्यू-एसीबी गिरफ्तार कर लेती है।
लखमा ने कहा कि जमानत के लिए निचली अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जाना होता है। ऐसे में तुरंत राहत मिलना मुश्किल है। पायलट ने उन्हें दिलासा दिया, और भरोसा दिया कि पूरी पार्टी उनके साथ है।
चैम्बर चुनाव का भविष्य
छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन चैम्बर ऑफ कॉमर्स के चुनाव चल रहे हैं। दशकों बाद यह पहला मौका है जब अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष पद पर निर्विरोध निर्वाचन के आसार दिख रहे हैं।
शुरूआती दौर में दिवंगत महावीर अग्रवाल जैसे बड़े व्यापारी नेता थे, जो निर्विरोध अध्यक्ष बन जाते थे। बाद में व्यापारियों की सदस्य संख्या बढ़ती गई, और अब 27 हजार से अधिक व्यापारी चैम्बर के सदस्य बन चुके हैं। चैम्बर चुनाव में कांग्रेस और भाजपा की भी दिलचस्पी रही है।
राज्य बनने के बाद चैम्बर में तत्कालीन सीएम अजीत जोगी ने भी दखल देने की कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए। बिलासपुर में चैम्बर का एक नया संगठन खड़ा हो गया। मगर मौजूदा चैम्बर की ताकत में कमी नहीं आई। ये अलग बात है कि चैम्बर में अग्रवाल व्यापारियों की जगह सिंधी व्यापारी ताकतवर हो चुके हैं। हालांकि निवर्तमान अध्यक्ष अमर पारवानी ऐसे सिंधी व्यापारी नेता हैं जिन्होंने अग्रवाल समाज को भी साधकर रखा है।
पारवानी से पहले पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी का चैम्बर में दबदबा रहा है, लेकिन अब परिस्थिति काफी बदल गई है। और अब जब दोनों साथ आ गए हैं, तो निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बनती दिख रही है। बड़े व्यापारी सतीश थौरानी का अध्यक्ष, महासचिव पद पर अजय भसीन व कोषाध्यक्ष पद पर निकेश बरडिय़ा का निर्विरोध निर्वाचन तय दिख रहा है।
अध्यक्ष पद के लिए ललित जैसिंघ ने दावेदारी ठोकी थी, लेकिन वो बाद में समझाइश देने पर पीछे हट गए। रायगढ़ जैसे कुछ जगहों पर विवाद की स्थिति बनी है, लेकिन वहां भी निर्विरोध निर्वाचन के लिए प्रयास हो रहे हैं। कुल मिलाकर महावीर अग्रवाल वाला दौर आता दिख रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
दुर्लभ कैराकल की चर्चा

इस समय सोशल मीडिया पर भारत की सबसे दुर्लभ जंगली बिल्लियों में से एक ‘कैराकल’ की चर्चा हो रही है। यह पहली बार राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में कैमरा ट्रैप में देखी गई है। राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा ने इसकी एक तस्वीर सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट की है। कैराकल एक रहस्यमयी और नाइट विजन वाली छोटी जंगली बिल्ली है, जिसकी सबसे खास पहचान उसके काले गुच्छेदार लंबे कान होते हैं। ‘कैराकल’ नाम तुर्की के ‘करकुलक’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘काले कान’। यह इतनी तेज होती है कि उड़ते हुए पक्षियों को भी झपट कर पकड़ सकती है! इतिहास में इसे शाही शिकारी बिल्ली माना जाता था, जिसका जिक़्र ‘शाहनामा’ और ‘तूतीनामा’ जैसे ग्रंथों में भी है। भारत में अब 50 से भी कम कैराकल बचे हैं, और ये केवल राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों में पाए जाते हैं।
भाजपा एमएलए ने जगाया सरकार को
यह एक ऐसा मामला है जिसमें यौन उत्पीडऩ के दोषी प्राध्यापक को न सिर्फ पदोन्नति दी गई, और उन्हें प्रदेश के सबसे पुराने शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय का प्राचार्य बना दिया गया।
पीडि़त महिला प्राध्यापक सात साल तक लड़ाई लड़ती रही। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, और जब मंगलवार को भाजपा सदस्य भावना बोहरा ने विधानसभा में मामला उठाया, तो सदस्य हैरान रह गए।
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इस गलती को माना और तीन दिन के भीतर कार्रवाई का भरोसा दिलाया। विवादों से घिरे आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ.जी.आर.चतुर्वेदी को पिछली सरकार के ताकतवर मंत्री का वरदहस्त रहा। यही वजह है कि उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही नहीं, उन्हें तमाम नियमों को दरकिनार पदोन्नत कर दिया गया, और सबसे पुराने आयुर्वेदिक कॉलेज का प्राचार्य भी बना दिया गया।
डॉ.चतुर्वेदी के खिलाफ कार्रवाई के लिए पीडि़त महिला प्राध्यापक ने राज्यपाल से लेकर तत्कालीन सीएम और स्वास्थ्य मंत्री तक गुहार लगाई। अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी प्रकरण को संज्ञान में लिया था। मगर प्राचार्य का बाल बांका नहीं हुआ। सदन में भावना बोहरा के तीखे सवाल पर स्वास्थ्य मंत्री ने भरोसा दिलाया कि किसी भी तरह की प्रताडऩा के मामले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। अब स्वास्थ्य मंत्री के आश्वासन के बाद क्या कार्रवाई होती है, इस पर नजर है।
जांच समिति के सामने चुप्पी
नगर निगम सभापति चुनाव में भाजपा के बागी उम्मीदवार नूतन सिंह ठाकुर की जीत के बाद प्रदेश भाजपा ने जांच के लिए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति का काम यह पता लगाना है कि 44 पार्षदों के रहते अधिकृत उम्मीदवार हितानंद अग्रवाल को हार का सामना क्यों करना पड़ा और पार्षदों ने बगावत क्यों की। कोरबा पहुंची समिति ने बैठक की, तो पार्षदों का रुख तयशुदा लग रहा था। पार्षदों ने समिति के सामने चुप्पी साध ली और बंद कमरे में अलग-अलग बातचीत से भी मना कर दिया। इधर, संयोजक चाहते थे कि हर पार्षद से अलग-अलग बातचीत कर स्थिति की तह तक पहुंचा जाए।
चुनाव के बाद यह सुगबुगाहट जरूर थी कि अधिकांश पार्षद हितानंद अग्रवाल को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन जब समिति के सामने बात रखने की बारी आई, तो कोई खुलकर सामने नहीं आया। इस मामले में मंत्री लखनलाल देवांगन को भी नोटिस जारी हुआ है, लेकिन विधानसभा सत्र के कारण वे कोरबा नहीं पहुंच सके।
समिति की बैठक से पहले ही एक ऑडियो क्लिप वायरल हो गई, जिसमें कथित रूप से हितानंद अग्रवाल के समर्थन और मंत्री लखनलाल देवांगन के खिलाफ पार्षदों से बयान दिलवाने के लिए प्रलोभन दिए जाने की बात सामने आई। यह भी कहा जा रहा है कि इस ऑडियो में काट-छांट की गई है, और अभी तक समिति के हाथ ओरिजिनल रिकॉर्डिंग नहीं लगी है।
यह पूरा घटनाक्रम भाजपा संगठन के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। एक ओर अनुशासनहीनता का सवाल है, तो दूसरी ओर बागी पार्षदों की बड़ी संख्या जिन्हें कथित रूप से मंत्री का भी आशीर्वाद मिला है।
बैज, या जुनेजा?
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट रायपुर आए, तो पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा ने उनका स्वागत किया। खास बात यह है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के खिलाफ बयानबाजी पर जुनेजा को नोटिस जारी किया गया है, और उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है। मगर जुनेजा को जिस तरह पायलट ने महत्व दिया उससे जुनेजा पर कार्रवाई को लेकर संदेह है। पार्टी के कुछ लोगों का मानना है कि बैज पद पर रहेंगे या नहीं, यह तय नहीं है। ऐसे में जुनेजा पर कार्रवाई होगी, इसको लेकर संदेह है। देखना है आगे क्या होता है।
अनूठी ‘सुलूर’ बांसुरी, अब ऑनलाइन

बस्तर की समृद्ध लोक-संस्कृति में मोहरी, तुरही, बाजा जैसे कई पारंपरिक वाद्य यंत्र खास पहचान रखते हैं, लेकिन इनमें से ‘सुलूर’ यानी पवन बांसुरी बेहद खास है। यह वाद्य यंत्र काष्ठ कला का उत्कृष्ट नमूना है और इसे एक विशेष प्रकार के बांस से तैयार किया जाता है।
सामान्य बांसुरी के विपरीत, सुलूर से सुर निकालने के लिए मुंह से हवा फूंकने की जरूरत नहीं पड़ती। इसे हाथ में लेकर घुमाया जाता है और घुमाने की गति व समय का सही समन्वय होने पर मधुर धुन निकलती है। इसके निर्माण में बांस की नली पर सुराख किए जाते हैं, जो खुद एक अनूठा कौशल है। बांसुरी पर सुंदर और कलात्मक नक्काशी भी उकेरी जाती है, जिससे यह देखने में भी आकर्षक लगती है।पारंपरिक रूप से मवेशी चराते समय यह बांसुरी बजाई जाती है, लेकिन इसे त्योहारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य समारोहों में भी उपयोग किया जाता है।
लोकप्रियता बढऩे के साथ अब यह अनोखी बांसुरी ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी उपलब्ध है, जहां इसे 6,000 से 7,000 रुपये में बेचा जा रहा है। जी-20 सम्मेलन के पंडाल में भी इसका प्रदर्शन किया गया था, जहां इसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
इतना बड़ा अफ़सर !!
भारतमाला परियोजना में भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं। नेता, और अफसरों के गठजोड़ से करीब साढ़े 3 सौ करोड़ का मुआवजा घोटाला प्रकाश में आया है। इन सबके बीच कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिले के प्रशासनिक मुखिया रहे एक आईएएस अफसर के प्रॉपर्टी डिटेल्स निकाले हैं।
कहा जा रहा है कि अफसर ने एक साल में करीब 50 करोड़ से अधिक की प्रॉपर्टी खरीदी है। यह प्रॉपर्टी अफसर ने अपने नाम पर नहीं बल्कि एक फर्म बनाकर खरीदे हैं, और फर्म के मुखिया खुद एक बिल्डर के यहां सेवारत है। यह प्रॉपर्टी मोवा, अमलीडीह, धरमपुरा आदि इलाके में खरीदी गई है।
सुनते हैं कि अफसर ने अपने कार्यकाल में कई विवादित जमीन प्रकरणों का निपटारा किया, और इसके एवज में काफी कुछ पूंजी बनाई है। अफसर को जेल में बंद एक ताकतवर नेता-कारोबारी का बेहद करीबी माना जाता रहा है। चर्चा है कि पिछली सरकार में भी अफसर के खिलाफ शिकायत हुई थी, तब सरकार के मुखिया ने अफसर को फटकार भी लगाई थी।
मगर कारोबारी के वरदहस्त होने की वजह से अफसर का बाल बांका नहीं हुआ। अब जब भारतमाला परियोजना के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है, तो अफसर भी जांच के घेरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
मुख्य सूचना आयुक्त कब?
प्रदेश के एक और सूचना आयुक्त नरेन्द्र शुक्ला का कार्यकाल 31 मई को खत्म हो रहा है। वर्तमान में शुक्ला के अलावा आलोक चन्द्रवंशी ही सूचना आयुक्त के पद पर हैं। इससे परे 26 तारीख को मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए इंटरव्यू होगा। यह भी चर्चा है कि पीएम नरेन्द्र मोदी के प्रस्तावित बिलासपुर प्रवास के चलते इंटरव्यू की तिथि आगे बढ़ सकती है।
मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए मुख्य सचिव अमिताभ जैन, के अलावा तीन पूर्व डीजी डी.एम.अवस्थी, अशोक जुनेजा, और संजय पिल्ले ने भी आवेदन किए हैं। कुल मिलाकर 33 लोगों को एक ही दिन में इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है। हालांकि मुख्य सूचना आयुक्त पद पर किसी नौकरशाह को नियुक्त नहीं करने की मांग की गई है। इस सिलसिले में राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पांडेय ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को ज्ञापन भी सौंपा है। देखना है सीएम इस पर क्या निर्णय लेते हैं।
रेल मंत्री को यात्री नहीं भाते..
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे से रेलवे को सर्वाधिक आमदनी होती है। यह आय मालभाड़े से होती है। यात्री ट्रेनों को लेकर तो यह रेल मंत्री ने कल सदन में बता दिया कि ट्रेन यात्रा की लागत 1.38 रुपये प्रति किलोमीटर है, जबकि यात्रियों से केवल 73 पैसे लिए जाते हैं। यह बिलासपुर जोन के अंतर्गत आने वाली यात्री ट्रेनों पर भी लागू होता है। यह बात अलग है कि ऐसा बयान यात्रियों को यह महसूस कराता है कि वे सरकार पर बोझ हैं, जबकि वे नौकरी, व्यापार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रेलवे का इस्तेमाल करते हैं, जिससे देश का आर्थिक पहिया चलता है।
अगर नफे-नुकसान के आधार पर ही रेल मंत्री को प्राथमिकताएं तय करनी है तो भाजपा के वरिष्ठ नेता सांसद बृजमोहन अग्रवाल की मांग पर घोषणा करनी चाहिए, जिसमें उन्होंने रीवा बिलासपुर ट्रेन को दुर्ग तक विस्तारित करने की मांग रखी। कोरबा में एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कोयला खान है, लेकिन यहां के यात्री कोविड के समय से बंद यात्री ट्रेनों को शुरू करने की मांग करते थक गए। सांसद ज्योत्सना महंत इसके लिए कई बार आवाज उठा चुकी हैं। रेल उपभोक्ता सलाहकार समिति की जोन और मंडल लेवल की होने वाली बैठकें औपचारिकता बनकर रह गई हैं। हाई टी और लंच कराने के बाद रेलवे अधिकारी सदस्यों को विदा कर देता है, यह कहते हुए कि आपकी बातों को मुख्यालय भेज दिया जाएगा, वहां से अनुमति मिलने पर मांगें पूरी होंगी। रेल मंत्री लगे हाथ यह भी बता देते कि यात्री ट्रेनों को रद्द करने का सिलसिला कब थमेगा, ट्रेनों की लेटलतीफी कब खत्म होगी। गुड्स ट्रेनों का परिवहन बिलासपुर जोन से सर्वाधिक है और इन ट्रेनों को आगे बढ़ाने के लिए बीच रास्ते में यात्री ट्रेनों को रोका जाता है। रेल मंत्री यह भी बता सकते थे कि बिलासपुर रेलवे ने इस जोन से मालभाड़े में कितना कमाया और यात्री सुविधाओं पर कितना खर्च किया।
गुमान टूटा टेसू का...

बसंत के आते ही टेसू के फूल शाखों पर आग की लौ बनकर खिल उठते हैं। हल्की सर्दी की ठिठुरन के बाद जब हवाओं में गुनगुनाहट घुलने लगती है, तब ये नारंगी फूल पेड़ों पर इठलाने लगते हैं, मानो धरती पर रंगों की होली शुरू हो गई हो। इनके खिलने का समय ही होली के रंगों का संदेश लाता है, फागुन की मस्ती, चटख रंगों की बहार।
परंतु जैसे ही बसंत विदा होने लगता है और गर्मी की दस्तक सुनाई देती है, पतझड़ की हल्की थपकियों से ही ये कोमल फूल डालियों से टूटकर नीचे बिखरने लगते हैं। जो फूल कल तक आसमान को छूने का सपना देख रहे थे, वे आज जमीन पर बिछ रहे हैं। टेसू के फूलों की यह यात्रा बसंत से ग्रीष्म की ओर समय के बदलाव की कहानी कहती है। (तस्वीर- प्राण चड्ढा)
बाजू वाले की करनी, सामने वाला भुगत रहा
सोमवार को सत्ता पक्ष के विधायक ने सरकार ले आग्रह किया कि नेता प्रतिपक्ष पिछले 3-4 दिनों से पिछली सरकार के कार्यों की जांच की मांग कर रहे हैं, सरकार को मान लेनी चाहिए। इससे सदन की हाइप बढ़ेगी । दरअसल प्रश्नकाल में नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत ने जल जीवन मिशन के अधूरे लंबित कार्यों और ठेकेदार को भुगतान का प्रश्न उठाया था । उनका कहना था कि कुछ ठेकेदार ने काम अधूरा कर भुगतान ले लिया तो कुछ भुगतान न होने से काम नहीं कर रहे। और ऐसी ही प्रगति देखकर केंद्र पैसा नहीं दे रहा।
इस पर राजेश मूणत ने महंत से कहा कि नेताजी यह आपके पुराने कार्यकाल के करम हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ की जनता भुगतान रही है। इस पर स्पीकर डॉ सिंह ने कहा करम नहीं कार्य कहिए। अजय चंद्राकर ने महंत और भूपेश बघेल की आसंदी (दोनों साथ बैठते हैं) की ओर देखकर चुटकी ली कि बाजू वाले की करनी का फल सामने वाला भुगत रहा है। महंत ने कहा कि कब तक पिछले 5 साल को लेकर चलेंगे। हमारी ही गलती रही जांच क्यों नहीं करा लेते? आपको मौका मिला है अब। कब तक बचना चाहेंगे। जांच करा लें।
मूणत ने कहा कि आप जब उपर (आसंदी)बैठते थे तब जांच करा लेते तो ऐसी स्थिति नहीं होती। जैसे हमारे अध्यक्ष (रमन)बीच-बीच में करते रहते हैं। अजय ने कहा- जहां-जहां संभावना थीं, नेताजी वहां वंचित रहे हैं। महंत ने कहा कि अब हम कह रहे हैं न, जांच करा लें, क्या दिक्कत है, तो जांच नहीं करा रहे। अजय ने स्पीकर से कहा कि बीते 3-4 दिनों से नेताजी जांच करा लें की मांग कर रहे हैं सरकार को मांग मान लेनी चाहिए। इससे सदन की भी ऊंचाई बढ़ेगी। क्योंकि नेता प्रतिपक्ष की मांग पर सरकार की घोषणा बड़ी बात होती है ।
नगर विकास में समरसता

हाल ही में हुए नगरीय निकाय व पंचायत चुनावों में भले ही भारतीय जनता पार्टी को शानदार जीत मिली हो, लेकिन कुछ नतीजे चौंकाने वाले भी रहे। मुंगेली, जहां से केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और उपमुख्यमंत्री अरुण साव का ताल्लुक है, तथा जहां से दस बार के लोकसभा-विधानसभा विजेता पुन्नूलाल मोहले विधायक हैं, वहां नगरपालिका अध्यक्ष का पद कांग्रेस के हाथ में चला गया।
नगरपालिका अध्यक्ष को अपने विवेकाधिकार से प्रेसिडेंट ऑफ काउंसिल (पीआईसी) में विभिन्न विभागों के सभापति नियुक्त करने का अधिकार होता है। आमतौर पर यह उम्मीद की जा रही थी कि बहुमत में होने के नाते सभी सात सभापति कांग्रेस से होंगे, लेकिन अध्यक्ष रोहित शुक्ला ने एक अलग राह अपनाई। उन्होंने चार सभापति कांग्रेस से चुने और शेष तीन पर भाजपा के पार्षदों को नियुक्त कर दिया।
इस निर्णय से कांग्रेस के कुछ पार्षद नाराज भी हो गए हैं, लेकिन अध्यक्ष का मानना है कि उन्हें नगरवासियों ने विकास की उम्मीद के साथ चुना है और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ सामंजस्य बनाना आवश्यक है। उसके सहयोग के बिना विकास कार्यों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। भाजपा को तीन पद देने के बावजूद कांग्रेस का बहुमत बरकरार रहेगा, लेकिन कुछ भाजपा पार्षदों को साथ लेकर चलने से विकास योजनाओं की मंजूरी और क्रियान्वयन में आसानी होगी। अब चुनाव निपट चुका है, इसलिए सभी को मिलकर शहर के हित में काम करना चाहिए।
संयोग से उपमुख्यमंत्री अरुण साव के पास नगरीय प्रशासन विभाग भी है, ऐसे में भाजपा को प्रतिनिधित्व देने से यह सुनिश्चित हो गया है कि मुंगेली को आवश्यक बजट और संसाधनों की कोई कमी नहीं होगी। स्थानीय राजनीति में समन्वय की भूमिका अहम होती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो अन्य नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
सत्ता गई गुटबाजी नहीं

सरगुजा में कांग्रेस का मतलब सिर्फ टीएस सिंहदेव नहीं हैं। वहां पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समर्थक भी बड़ी संख्या में हैं। रविवार की शाम गांधी चौक पर बघेल का स्वागत करने के लिए युवाओं के दो गुटों में होड़ लग गई। इतने उत्साहित हो गए कि जोश में होश खो बैठे और आपस में ही भिड़ गए। स्वागत कम, धक्कामुक्की और लात-घूंसे ज्यादा चले। कांग्रेस की अंदरूनी हालत का लाइव प्रदर्शन हो गया। सत्ता हाथ से गई, लेकिन गुटबाजी नहीं गई।
सांप-बिच्छू और दस फीट की बाउंड्री
ये होली के बाद भांग में डूबा वाकया नहीं है। पूरी तरह से नान होली सीरियस है। जो बताता है कि मैडम साहब लोग तय कर लें तो सब संभव है। हम बात कर रहे हैं डाक विभाग की। करीब साल भर साहब मैडम विभाग की छत्तीसगढ़ मुखिया रही। उनके दिल्ली तबादले पर जाने से पहले बंगले में एक सांप निकला। घबराई मैडम साहब ने झट से सिविल विंग की बैठक ली और पांच हजार वर्ग फीट से अधिक के बंगले को सांप- बिच्छू से सुरक्षित करने की योजना बनाने कहा।
बस यही मौका था सिविल विंग के लिए । उसने भी तेजी दिखाई और बना दिया लाखों का प्राक्कलन(एस्टीमेट)। इसमें बंगले की चाहरदीवारी को 10 फीट ईंट- सीमेंट-रेती से ऊंचा कर और उसके उपर कांटेदार ग्रील से कर दी बंगले की किलेबंदी। अभी दीवार बन ही रही थी कि मैडम साहब का तबादला हो गया। लेकिन काम जारी है। इसमें कोई गलत भी नहीं है नए साहब आ रहे हैं तो उनकी सुरक्षा में काम आएगा। जमीन पर चलने बिल में रहने वाले सांप-बिच्छू के लिए उंची दीवार बनाने के हास्यास्पद, फिजूलखर्च पर विभाग में उंगली उठने लगी को सिविल विंग ने जस्टीफिकेशन निकाला। कहने लगे मैडम साहब के यहां एक दिन चोरों ने पांच फीट की पुरानी दीवार को फांदा था। भविष्य में ऐसा न हो इसलिए दीवार ऊंची और कांटेदार बनानी पड़ रही है। मगर क्या करें ये सिस्टम, तकलीफ में पड़े साहब को सुविधा देने कुछ भी कर सकता है।

वैसे इस बंगले के रेनोवेशन में पुराने साहब ने भी लाखों खर्च कराए थे ।और अब नए भी आ रहे। वो भी कुछ न कुछ करवाएंगे। और फंड तो है ही पोस्ट आफिस बिल्डिंग फंड। अब लोग कह रहे हैं इस दीवार की लागत इतनी है कि उससे कम से कम एक ग्रामीण शाखा डाकघर तो बन ही सकता था। सिविल विंग वाले साहब ही हमें बता रहे थे कि साल भर में पूरे छत्तीसगढ़ में दो ही डाकघर के भवन बना पाए हैं।
मंत्री को पहली नोटिस
सरकार के मंत्री लखनलाल देवांगन मुश्किलों से घिर गए हैं। भाजपा संगठन ने उन्हें कोरबा नगर निगम सभापति के चुनाव में बागी प्रत्याशी का समर्थन करने पर नोटिस थमा दिया। देवांगन ने पार्टी के बागी सभापति प्रत्याशी की जीत पर सार्वजनिक तौर पर उन्हें बधाई दे दी थी। देवांगन के बयान को अनुशासनहीनता करार दिया गया और फिर उनसे दो दिन के भीतर जवाब मांगा गया। जैसे ही नोटिस उद्योग मंत्री तक पहुंची, तो वो भागे-भागे प्रदेश अध्यक्ष किरणदेव के घर पहुंचे, और अपनी तरफ से सफाई पेश की। यह पहला मौका है जब राज्य बनने के बाद किसी मंत्री को पार्टी ने अनुशासनहीनता पर सीधे नोटिस जारी किया गया।
सुनते हैं कि देवांगन को नोटिस सीधे पार्टी हाईकमान की दखल के बाद दिया गया है। दरअसल, सभापति के लिए पार्टी ने हितानंद अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया था। पार्टी ने रायपुर ग्रामीण के विधायक पुरंदर मिश्रा पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। चर्चा है कि स्थानीय विधायक और सरकार के मंत्री लखनलाल देवांगन, पार्टी के बागी नूतन ंिसंह राजपूत के समर्थन में थे। राजपूत चुनाव जीते, तो देवांगन ने उन्हें यह कह दिया कि वो भी भाजपा के ही हंै। फिर क्या था, देवांगन के विरोधियों ने न सिर्फ प्रदेश नेतृत्व बल्कि हाईकमान को शिकायत भेज दी।
प्रदेश संगठन पहले तो विधानसभा सत्र को देखते हुए कार्रवाई को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं था लेकिन हाईकमान से मैसेज के बाद देवांगन को नोटिस थमानी पड़ी। पार्र्टी ने सभापति चुनाव में हार के कारणों का पता लगाने के लिए जांच समिति बनाई है। कहा जा रहा है कि जांच रिपोर्ट पर ही कुछ हद देवांगन के भविष्य का निर्भर है। देखना है आगे क्या होता है।
कागजों में सुनहरा बस्तर...

नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में हर साल हजारों करोड़ रुपये के फंड जारी होते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश स्थानीय आदिवासियों की बुनियादी जरूरतों की ओर सरकार का ध्यान नहीं जाता। आजादी के 76 साल बाद भी यहां मरीजों को एंबुलेंस जैसी आवश्यक सेवा उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
ताजा मामला, अरनपुर ब्लॉक के कुआकोंडा के समीप स्थित बंडीपारा गांव का है। गांव की एक महिला की तबीयत अचानक बिगड़ी, तो उसके परिजनों ने एंबुलेंस के अभाव में उसे कांवड़ में बैठाकर चार किलोमीटर दूर अरनपुर अस्पताल तक पहुंचाया। लेकिन विडंबना देखिए—इतनी तकलीफदेह यात्रा के बाद जब वे अस्पताल पहुंचे, तो वहां डॉक्टर ही नदारद थे।
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी। सीएमएचओ के निर्देश पर मरीज को दंतेवाड़ा जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया और लापता डॉक्टरों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर कब तक बस्तर के मरीजों को इस तरह की अमानवीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा? ब्लॉक मुख्यालय में एक भी एंबुलेंस न होना प्रशासन की बड़ी विफलता को सामने लाता है।
साथी के लिए असीम प्रेम और शोक

जानवरों में भी इंसानों की तरह गहरी भावनाएं होती हैं। हाथियों में तो यह भावना हम अपने छत्तीसगढ़ के जंगलों में कई बार देखते हैं। रूस में 25 वर्षों से साथ रहे सर्कस के भारतीय नस्ल दो हाथियों में से एक, जेनी की मूत्राशय की बीमारी से 54 साल की उम्र में मृत्यु हो गई। उसकी साथी मग्दा ने उसे छोडऩे से इनकार कर दिया। जेनी के आखिरी क्षणों में मग्दा ने उसे बार-बार सहलाया, हल्के धक्के देकर उठाने की कोशिश की और जब समझ गई कि वह नहीं उठेगी, तो उसे अपने स्नेह से गले लगा लिया। मग्दा की यह वेदना घंटों तक जारी रही। वह अपने साथी के पास बैठी रही और किसी को भी उसके करीब आने नहीं दिया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो ने दुनिया भर में लोगों को झकझोर दिया। मग्दा का अपने साथी के प्रति इस प्रेम और शोक ने कई लोगों को रुला डाला। लेकिन क्या अक्सर हम जानवरों के भीतर मौजूद संवेदना को समझ पाते हैं?
आखिर महंत के दबाव में
आखिरकार सरकार ने भारतमाला परियोजना के मुआवजे में भ्रष्टाचार मामले की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी के हवाले कर दिया है। बुधवार को विधानसभा में मुआवजे में भ्रष्टाचार के मसले पर काफी किचकिच हुई थी। सरकार ने तो मान लिया था कि मुआवजा वितरण में गड़बड़ी हुई है, और करीब 44 करोड़ रुपए अतिरिक्त मुआवजा बटा है। मगर वो इसकी सीबीआई जांच कराने के लिए तैयार नहीं थे। जबकि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत परियोजना की सीबीआई जांच की मांग पर जोर दे
रहे थे।
राजस्व मंत्री सदन में रायपुर कमिश्नर से मुआवजा घोटाले की जांच कराने पर अड़े थे। मगर देर रात कैबिनेट में प्रकरण की ईओडब्ल्यू-एसीबी से जांच कराने का फैसला लिया गया। बताते हैं कि मुआवजा घोटाले की ईओडब्ल्यू-एसीबी से जांच कराने के फैसले के पीछे नेता प्रतिपक्ष का ही दबाव रहा है। महंत ने तो सदन में सीधे-सीधे कह दिया था कि प्रकरण की सीबीआई जांच कराने के लिए वो हाईकोर्ट जाएंगे।
चूंकि परियोजना और मुआवजे में केंद्र का पैसा लगा है, इसलिए कोर्ट में प्रकरण की सीबीआई जांच के लिए तर्क मजबूत दिख रहा था। ऐसे में सरकार ने आनन-फानन में प्रकरण ईओडब्ल्यू-एसीबी के हवाले कर दिया। सरकार के फैसले पर महंत की प्रतिक्रिया नहीं आई है, और संभव है कि वो सीबीआई जांच के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाए। कुल मिलाकर ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच के बावजूद मामला ठंडा होते नहीं दिख रहा है।
जांच और प्रमोशन
वैसे तो रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला परियोजना के मुआवजे में भ्रष्टाचार का मामला पिछली सरकार के समय का है। मगर जिस तरह राजस्व विभाग घोटाले की जांच को लेकर हीला हवाला कर रही है, इसकी काफी चर्चा हो रही है। घोटाले के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार एसडीएम निर्भय कुमार साहू समेत 5 अफसरों को सस्पेंड किया गया। दिलचस्प बात यह है कि घोटालेबाजों पर कार्रवाई तब हुई जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का सवाल लगा।
एसडीएम, और अन्य अफसरों के खिलाफ शिकायतें पहले भी हो चुकी थी। मगर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। और तो और घोटालेबाज एसडीएम को जगदलपुर नगर निगम का कमिश्नर बना दिया गया था। चर्चा है कि इस पूरे मामले में कई नेता और कुछ आईएएस अफसरों की संलिप्तता रही है।
यही वजह है कि प्रकरण की जांच में देरी की गई है। अब ईओडब्ल्यू-एसीबी बड़े मछलियों तक पहुंच पाती है या नहीं, यह देखना है। हालांकि ईओडब्ल्यू-एसीबी सीजीएमएससी घोटाले की भी जांच कर रही है। दो आईएएस अफसरों की भूमिका स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई है। दोनों से पूछताछ भी हुई है, लेकिन जिस तरह दोनों अफसर के करीबी लोग निश्चित हैं, वो उसकी काफी चर्चा हो रही है। वैसे भी ईओडब्ल्यू-एसीबी में प्रकरण के दर्ज होने के बावजूद कई अफसर लगातार प्रमोट होते रहे, और रिटायर भी हो गए। प्रकरण अभी भी दर्ज है। देखना है ताजा मामलों का क्या होता है।
बच्चों से छिन गया मुखौटा

प्रदेश में कानून व्यवस्था को बनाए रखने को लेकर पुलिस अफसरों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन होली जैसे उल्लासपूर्ण त्योहार में अचानक लिए गए कठोर निर्णय आम लोगों को मायूस कर सकते हैं। प्रदेश में ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं है कि होली पर मुखौटे बेचने या पहनने पर प्रतिबंध लगाया जाए, लेकिन कोरबा पुलिस ने यह मानते हुए कि इनका इस्तेमाल आपराधिक तत्व कर सकते हैं, सडक़ किनारे होली का सामान बेचने वाले ठेले और रेहडिय़ों पर छापा मारते हुए करीब 3,000 मुखौटे जब्त कर लिए। यह कार्रवाई नए कानून बीएनएसएस की धारा 106 के तहत की गई, जो पुलिस को उस संपत्ति को जब्त करने का अधिकार देती है, जिसका अपराध में इस्तेमाल होने की आशंका हो। पुलिस का कहना है कि यह कदम लूट, छीना-झपटी और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया है। इतना ही नहीं, पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति मुखौटा पहनकर घूमता मिले, तो तुरंत सूचना दें।
होली के रंग-बिरंगे मुखौटे, जैसे जोकरों, पौराणिक पात्रों, जानवरों और फिल्मी किरदारों के मुखौटे-बच्चों और युवाओं के बीच सालों से लोकप्रिय रहे हैं। ये न सिर्फ रंग-गुलाल से बचाव का एक तरीका हैं, बल्कि मज़ाक और सरप्राइज़ का हिस्सा भी होते हैं। लेकिन इस बार कोरबा में होली बिना मुखौटों के होगी, जिससे बच्चों की खुशी जरूर फीकी पड़ सकती है। मुखौटे बेचने वाले छोटी पूंजी पर धंधा करने वाले लोग हैं, उनका भी नुकसान हो गया।
मुखौटों को जब्त करने का आधार यह है कि इनका इस्तेमाल अपराधी पहचान छिपाने के लिए कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क अधूरा लगता है। अगर केवल चेहरे छिपाने की वजह से मुखौटे जब्त किए जा रहे हैं, तो फिर हेलमेट भी इसी श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि उसे पहनने के बाद भी चेहरा ढका रहता है।
कोरबा पुलिस ने दो दिन पहले शराब के नशे में गाड़ी चलाने वालों पर 1.70 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना वसूला था। अगर होली के दिन सडक़ पर निकलने वाले शराबी चालकों और उनकी संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी रखी जाए, तो न सिर्फ कानून व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि अपराध की आशंका भी कम की जा सकती है। सही तरीके से चेकिंग की जाए, तो पुलिस इससे दस गुना ज्यादा राजस्व वसूल सकती है।
आयुष्मान पर सवाल-जवाब
राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन ने कल सदन में सवाल उठाया कि छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना के तहत 5 से 6 हजार करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है, जिससे निजी अस्पताल मरीजों का इलाज करने से इंकार कर रहे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या यह सही है कि सरकार प्रति व्यक्ति 5 लाख रुपये तक का बीमा देती है, लेकिन अस्पतालों में इलाज का खर्च 1.5 से 2.5 लाख रुपये तक ही मिलता है, शेष राशि मरीजों को अपनी जेब से चुकानी पड़ती है? इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने जवाब दिया कि केंद्र सरकार की ओर से कोई भुगतान नहीं रुका है। अगर कोई देरी हुई है, तो राज्य सरकार उसे हल करे। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के चलते कुछ मामलों में भुगतान अलर्ट मिलते हैं, जिन्हें जांच के बाद निपटाया जाता है।
छत्तीसगढ़ आईएमए ने हाल ही में सरकार को बताया था कि जून 2024 से करीब 1500 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है, सांसद को 5 से 6 हजार करोड़ का आंकड़ा कहां से मिला यह साफ नहीं है। मगर, केंद्रीय मंत्री नड्डा ने कहा कि केंद्र से भुगतान जारी कर दिया जाता है, अगर कहीं अड़चन है, तो राज्य सरकार को इसे सुलझाना होगा।
पांच लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की योजना है, मगर इसमें 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को वहन करनी पड़ती है। पूर्ववर्ती राज्य सरकार ने इसी हिस्सेदारी को लेकर असहमति जताते हुए इस योजना से बाहर निकलकर यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम लागू करने का प्रस्ताव दिया था। देश के कुछ अन्य राज्य, जैसे पश्चिम बंगाल और दिल्ली ने भी इस योजना को लागू नहीं किया और मुफ्त इलाज की योजनाएं शुरू कीं।
छत्तीसगढ़ के मामले में यदि केंद्र सरकार कह रही है कि उसने भुगतान नहीं रोका, तो क्या राज्य सरकार का 40 प्रतिशत अंश न मिलने के कारण यह संकट खड़ा हुआ है? इसके अलावा, प्रदेश के कई निजी अस्पतालों द्वारा फर्जी क्लेम किए जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं, जहां बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों और आवश्यक उपकरणों के इलाज दिखाया गया। पिछले महीने ऐसे करीब तीन दर्जन अस्पतालों को प्रतिबंधित किया गया था। ये गड़बडिय़ां और भुगतान का रुकना- दोनों मसले आपस में जुड़े दिखते हैं। यदि स्वास्थ्य विभाग को लगता है कि अन्य अस्पतालों में भी ऐसी अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी जांच में देरी क्यों हो रही है? क्या निगरानी के लिए कोई सख्त व्यवस्था खड़ी करने की जरूरत नहीं है?
राज्यसभा में यदि सांसद इस विषय को और विस्तृत जानकारी के साथ गहराई से उठाते, तो छत्तीसगढ़ में गरीबों को मिलने वाली मुफ्त इलाज की सुविधा की स्थिति अधिक स्पष्ट हो पाती।
किसी के अपने किसी के पराए
प्रदेश के कांग्रेस विधायकों ने बड़े उद्योग समूह जिंदल स्टील के खिलाफ विधानसभा में मामला उठाया, तो सत्ता पक्ष के सदस्य चौंक गए। यह संभवत: पहला मौका है जब कांग्रेस विधायकों ने रायगढ़ के जिंदल स्टील एण्ड इंडस्ट्रीज के खिलाफ सदन के अंदर, और बाहर कोई बात उठाई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जिंदल समूह के मुखिया नवीन जिंदल कांग्रेस के सांसद रहे हैं, और उनकी विशेषकर कांग्रेस के नेताओं से घनिष्ठता रही है। मगर अब परिस्थितियां बदल गई हैं। नवीन जिंदल भाजपा के सांसद हैं। ऐसे में जिंदल घराने की गड़बडिय़ों पर पूर्व सीएम भूपेश बघेल भी काफी मुखर दिखे।
पूर्व मंत्री उमेश पटेल ने केलो परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन जिंदल स्टील को देने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। और जब उमेश पटेल सवाल पूछ रहे थे, तो पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने कह दिया आप कब से जिंदल के खिलाफ हो गए हैं? चंद्राकर यही नहीं रूके, उन्होंने यह भी कह दिया जिंदल का प्लेन तो आपके लिए ही चलती थी। हालांकि इस पर उमेश पटेल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। चंद्राकर के कथन में सच्चाई भी है। रायगढ़ के कई नेता रायपुर आने-जाने के लिए जिंदल का प्लेन इस्तेमाल करते रहे हैं। ये अलग बात है अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हंै। चाहे कुछ भी हो, दशकों तक जिंदल उद्योग समूह की गड़बडिय़ों पर चुप्पी साधने के बाद मुखर होने पर सवाल तो उठेंगे ही।
रिकेश को स्पीकर की फटकार
नए नवेले विधायकों के साथ समस्या ये है कि वो कई बार संसदीय परम्परा को तोड़ देते हैं। ऐसे ही एक भारत माला सडक़ मुआवजा घोटाले में चर्चा के दौरान स्पीकर डॉ रमन सिंह ने वैशाली नगर विधायक रितेश सेन को फटकार लगाई। दरअसल, चर्चा के दौरान रितेश सेन, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत के साथ एक तरह से वाद विवाद करने लगे थे।
महंत इस घोटाले की सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे थे। इस पर रिकेश, महंत से बार बार पूछते रहे कि आप पहले बताएं कि आपको केंद्रीय जांच एजेंसी पर कब से भरोसा हो गया। भरोसा है कि नहीं? नेता प्रतिपक्ष के वक्तव्य के समय बार-बार की टोकाटाकी देख स्पीकर डॉ. सिंह ने रिकेश से कहा बैठ जाइए, यह ठीक नहीं है सदन आपको नहीं चलाना है। इसके बाद रिकेश सेन शांत हुए।
पंजाब से रिश्ता नहीं?
शराब घोटाला केस में ईडी ने सोमवार को पूर्व सीएम भूपेश बघेल के भिलाई-3 स्थित निवास पर दबिश दी, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। भूपेश का नाम तो शराब घोटाला केस में उछलता ही रहा है। मगर इस बार ईडी की राडार में भूपेश बघेल नहीं बल्कि उनके बेटे चैतन्य थे। ईडी अफसरों ने घर में प्रवेश करते ही पूर्व सीएम को बता दिया कि वो चैतन्य की जांच के लिए आए हैं।
करीब 11 घंटे तक जांच चली, और फिर बाहर निकलते ही कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ईडी अफसरों को घेर लिया। किसी तरह पुलिस सुरक्षा के बीच ईडी अफसर वहां से निकल पाए। और प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेता और विधायक-पूर्व विधायक बघेल निवास के बाहर थे, तो छापे को लेकर कई तरह की चर्चा भी हो रही थी।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने मीडिया से चर्चा में छापे की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि श्री बघेल पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हैं, और वहां राजनीतिक अस्थिरता है। पंजाब के आम आदमी पार्टी के 37 विधायक दुबई में हैं, और ऐसी चर्चा है कि पंजाब में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। सिंहदेव ने आशंका जताई कि कांग्रेस को रोकने के लिए भूपेश भाई के यहां छापे डाले गए हैं।
पार्टी की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, और सचिन पायलट के भी बयान आए, जिसमें उन्होंने मोदी सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाए। जांच पड़ताल पूरी होने के बाद पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बयान को लेकर काफी उत्सुकता थी। उन्होंने मीडिया से चर्चा में कहा कि तीन दिन पहले पीएम आवास में गड़बड़ी को लेकर डिप्टी सीएम विजय शर्मा के खिलाफ विधानसभा में सवाल उठाए थे। इसके चलते ईडी उनके घर जांच के लिए पहुंच गई।
भूपेश ने याद दिलाया कि पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने भी डिप्टी सीएम अरुण साव के विभागों में भ्रष्टाचार के मामले उठाए थे। इसके बाद उनके यहां भी ईडी जांच के लिए पहुंच गई। भूपेश के बयान से एक बात तो साफ है कि पंजाब की कथित राजनीतिक अस्थिरता से छापे का कोई लेना देना नहीं है।
दारू का पैसा आखिर कितना?
पूर्व सीएम भूपेश बघेल के घर पर छापेमारी के बीच बाहर कांग्रेसजनों में आपस में काफी कुछ चर्चा होती रही। ईडी की टीम ने दुर्ग जिले के 12 नेताओं, बिल्डर, और कारोबारियों के यहां भी छापे डाले हैं। इनमें से दो बड़े जमीन के कारोबारी भी हैं। हल्ला है कि दोनों जमीन कारोबारियों ने दो साल में करीब 4 सौ करोड़ की जमीन खरीदी है। इसमें शराब घोटाले का पैसा भी लगा है।
एक हल्ला यह भी रहा कि मार्च के महीने में शराब कारोबार से जुड़े करीब 13 करोड़ रूपए इन्हीं सबके बीच में बंटने के लिए आने वाले थे। इसी को रोकने के लिए छापे डले हैं। इसमें सच्चाई कितनी है यह तो पता नहीं, लेकिन एक बात जरूर है कि ईडी ने 2161 करोड़ का शराब घोटाला होना बताया है। मगर चार साल बाद भी इतने सारे छापों के बाद घोटाले की रकम इसके आसपास भी नहीं पहुंच पाई है। यही वजह है कि मामला अब राजनीतिक रंग ले रहा है।
पत्नियों का होली मिलन
होली का रंग चढऩे लगा है। 14 मार्च को होली है, लेकिन इससे पहले कई जगहों पर होली मिलन कार्यक्रम चल रहे हैं। इन्हीं में से एक आईपीएस अफसरों की पत्नियों के होली मिलन समारोह की काफी चर्चा है। यह होली मिलन कार्यक्रम राजनांदगांव के बाहरी इलाके के एक होटल में हुआ।
होली मिलन में करीब दो दर्जन आईपीएस अफसरों की पत्नियां थीं। उन्होंने खूब रंग-गुलाल खेले। अच्छे खाने-पीने का इंतजाम था। कुछ अफसरों को अच्छी पोस्टिंग मिली है। उनकी पत्नियां काफी खुश थीं। कुछ को आने वाले फेरबदल में उम्मीद की किरण दिख रही है। कुल मिलाकर यह होली मिलन समारोह सौहार्दपूर्ण माहौल में निपटा।
लागा लेहे..

हमारे छत्तीसगढ़ में ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी से उधार या ऋण लेता है और वह उसे नहीं चुकाता तो अगले जन्म में उधार देने वाला किसी भी तरह अपना दिया हुआ उधार वसूल लेता है। बचपन में हमें बताया जाता था कि एक पेड़ पर जो दूसरा पेड़ उग आता है, वह पिछले जन्म के अपने ऋण को इस तरह वसूल रहा है। छत्तीसगढ़ में इसे ‘लागा लेहे’ कहते हैं। ( लागा यानी उधार या ऋ ण लेहे यानी लिया है)
खैर, वनस्पति विज्ञान के जानकार कहते हैं कि इस तरह एक पेड़ के उपर दूसरा पेड़ का उग जाना बीज के प्रसार के कारण होता है। जो सही भी है। पक्षी फल खाते हैं और कहीं भी मल त्याग देते हैं। उनके मल में फलों का बीज होता है जो मल के साथ जहां गिरता है वहां मिट्टी पानी के संपर्क में आकर अंकुरित होकर पौधा और फिर पेड़ बन जाता है। हवा से भी बीजों का फैलाव होता है इसके अलावा फलों के चटखने से भी होता है। खैर, जो भी हो यदि हमारे बड़े बुजूर्ग उधान नहीं लेने और उसे समय पर चुकाने के लिये ऐसी कोई मन-गढंत बातें बताते भी हैं तो क्या बुराई है।
(तस्वीर- गोकुल सोनी)
मामला पारवानी, थौरानी के बीच
व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन चैम्बर ऑफ कामर्स के चुनाव को लेकर भाजपा के अंदरखाने में खींचतान मची हुई है। चर्चा है कि पार्टी में निवर्तमान अध्यक्ष अमर पारवानी, और एकता पैनल के अध्यक्ष प्रत्याशी सतीश थौरानी से परे सर्वमान्य प्रत्याशी उतारने पर भी विचार हो रहा है। इन सबके बीच पारवानी के महासचिव प्रत्याशी अजय भसीन को अध्यक्ष प्रत्याशी बनाने का भी फार्मूला सुझाया गया है।
पारवानी भाजपा संगठन के पसंदीदा हैं। कांग्रेस नेताओं को भी उनसे कोई परहेज नहीं रहा है। वो व्यापारियों के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं। इससे परे पारवानी के खिलाफ भाजपा के बड़े व्यापारी नेता श्रीचंद सुंदरानी के एकता पैनल ने सतीश थौरानी को अध्यक्ष का प्रत्याशी बना दिया है। वैसे तो थौरानी किसी दल से सीधे नहीं जुड़े हैं, लेकिन भाजपा नेताओं के वो काफी करीब हैं।
इन सबके बीच चैम्बर चुनाव में भाजपा संगठन के प्रमुख नेता दिलचस्पी दिखा रहे हैं, और इसको लेकर बैठकें हो रही हैं। पार्टी की तरफ से एक सुझाव आया है कि रायपुर शहर से बाहर के व्यापारी नेता को चैम्बर की कमान सौंपी जाए। बाहर के व्यापारी नेताओं की भी मांग कुछ इसी तरह की रही है। ऐसे में पारवानी के चुनाव मैदान से हटने, और उनके महासचिव प्रत्याशी अजय भसीन को अध्यक्ष का प्रत्याशी घोषित करने के लिए भी दबाव बनाया गया है। ऐसी स्थिति में सतीश थौरानी, अजय भसीन के समर्थन में मैदान से हटने का फार्मूला सुझाया गया है। चूंकि पारवानी व्यापारियों के मुद्दे को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं। ऐसे में वो इसके लिए तैयार होते हैं या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
दुर्लभ लिथियम का नया भंडार
छत्तीसगढ़ सहित बिहार, गुजरात, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर में स्थित 20 क्रिटिकल एंड स्ट्रेटेजिक मिनरल ब्लॉक्स की ई-नीलामी के लिए एमएसटीसी पोर्टल पर नोटिस जारी किया जा चुका है। इन ब्लॉक्स में कटघोरा क्षेत्र का 250 हेक्टेयर इलाका भी शामिल है, जहां दुनियाभर में भारी मांग वाले लिथियम का बड़ा भंडार मिला है। अभी भारत स्वयं इसका आयात करता है। दावा किया जा रहा है कि यह छत्तीसगढ़ की पहली लिथियम खदान होगी। यह प्रक्रिया अभी चल ही रही है कि कोरबा जिले के ही रामपुर क्षेत्र के तीन गांवों में फिर से लिथियम मिलने की संभावना को देखते हुए भारतीय भू गर्भ विज्ञान सर्वेक्षण विभाग सक्रिय हो गया है। विभाग को 126 हेक्टेयर में लिथियम तथा दूसरे क्रिटिकल मिनरल्स की मौजूदगी का पता चला है लेकिन यह भंडार कितनी गहराई में है, कितना बड़ा है इसके लिए बोर खनन की जरूरत पड़ेगी जिसके लिए वन विभाग से मंजूरी लेने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सर्वेक्षण में इस क्षेत्र में 10 पीपीएम से 2,000 पीपीएम तक लिथियम कंटेंट की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसके अलावा, ब्लॉक में रेयर अर्थ एलिमेंट की भी उपस्थिति पाई गई है। भारत वर्तमान में इन खनिजों की आपूर्ति के लिए आयात पर निर्भर है। यदि छत्तीसगढ़ में सफलता के साथ खनन की प्रक्रिया शुरू होगी तो यह देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के राजस्व में भारी उछाल आएगा। मगर, खनिज संसाधनों से धनी इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और खासकर जल स्त्रोतों और नदियों का क्या होगा? विस्थापन की क्या स्थिति रहेगी। रोजगार और व्यापार में कितना लाभ मिलेगा? जंगल को नष्ट कोयला खनन के विरोध में अभी लोग आंदोलन कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भलाई सुनिश्चित कैसे की जाएगी? आने वाले दिनों में यह सवाल फिर खड़ा हो सकता है।
लंबा सफर तय करके पहुंचे स्टर्लिंग

हर साल की तरह, इस बार भी छत्तीसगढ़ की धरती पर एक खास मेहमान पहुंचा है – रोजी स्टर्लिग! छत्तीसगढ़ में इसे गुलाबी मैना के नाम से जाना जाता है। यह खूबसूरत प्रवासी पक्षी सर्दियों के अंत में हजारों किलोमीटर की यात्रा करके हमारे यहां आता है। गुलमोहर व सेमल के खिले फूलों के बीच इसकी मौजूदगी प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी तोहफे से कम नहीं। इसकी हल्की गुलाबी छाया, चमकदार काले पंख और पीला चोंच इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि अद्भुत प्रवासी पक्षी का स्वागत तो करें ही, पर इनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित करें! (तस्वीर- प्राण चड्ढा) ([email protected])


