राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : नई फास्टैग स्कीम के गड्ढे, डबरे..
21-Jun-2025 6:34 PM
राजपथ-जनपथ : नई फास्टैग स्कीम के गड्ढे, डबरे..

नई फास्टैग स्कीम के गड्ढे, डबरे..

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फिर एक नई योजना की घोषणा कर दी है-फास्टैग पास! सिर्फ 3000 रुपये में साल भर या 200 ट्रिप तक टोल टेंशन खत्म। सुनने में बढिय़ा लगता है लेकिन रुकिए, कुछ छिपी बातों को भी समझ लीजिए।

सरकार कहती है 200 ट्रिप मिलेंगे। आप रायगढ़ से जगदलपुर निकलेंगे और मान लो 10 टोल पार करेंगे, वो 10 ट्रिप के खाते में गिन लिए जाएंगे। यानी एक यात्रा, दस ट्रिप खा जाएगी! लौटने का मिला लें तो 20 ट्रिप। जो लोग ज्यादा सफर करते हैं, उनका पास महीने भर में ही दम तोड़ देगा। बड़ी चालाकी से अनलिमिटेड सुविधा नहीं दी गई है। टैक्सी वालों को इसीलिए बाहर रखा गया है, सिर्फ प्राइवेट कार, जीप इस योजना का लाभ ले सकेंगे। मालवाहक, यात्री बस आदि पहले की तरह भारी रकम चुकाते रहेंगे। यह फास्टैग सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए है। राज्य सरकार वाले टोल नाकों पर ये काम नहीं करेगा। आपको अपना फास्टैग राज्य वाले नाकों के लिए रिचार्ज करके रखना ही होगा।

इधर, एनएचएआई का अपना फास्टैग ऐप जो अभी है, वह भरोसेमंद नहीं है। मेसैज तुरंत नहीं आता, कई बार दो तीन दिन लग जाते हैं। इसीलिए लोग प्राइवेट या सरकारी बैंकों के फास्टैग रखना पसंद करते हैं। नया सरकारी फास्टैग भी उसी तरह काम करेगा तो मुश्किलें कम नहीं होने वाली। हो सकता है आपने रिचार्ज करा लिया लेकिन रकम अपलोड न दिखाए। छोड़ दीजिए, यह तो ऐप का इस्तेमाल करने से ही पता चलेगा। मगर, कुछ महीने पहले गडकरी जी ने एलान किया था कि जल्द ही जीपीएस आधारित टोल आएगा और टोल नाके इतिहास बन जाएंगे। अब वही सरकार कह रही है-पास लो, टोल भरो। फिर उस जीपीएस वाले ड्रीम का क्या हुआ?

सालाना फास्टैग स्कीम सुनने में क्रांतिकारी है, लेकिन जमीनी सच्चाई में अभी कई गड्ढे हैं। जीएसटी की तरह...।

जिस पत्थर को उठाओ, नीचे घोटाला !

रायपुर-विशाखापटनम सडक़ निर्माण के लिए जमीन के अधिग्रहण के एवज में मुआवजा घोटाले की पड़ताल जारी है। कुछ इसी तरह का मामला रायगढ़ जिले में भी आया है। यहां भी छत्तीसगढ़ पॉवर जनरेशन कंपनी को आवंटित कोल ब्लॉक  के लिए जमीन अधिग्रहण के प्रकरण में घोटाला हुआ है। दोनों ही घोटाला करीब चार सौ करोड़ के आसपास है। रायपुर और रायगढ़ के मुआवजा घोटाले में समानता यह है कि दोनों ही जगहों में जिला प्रशासन के बड़े अफसरों की घोटाले में संलिप्तता रही है, लेकिन अब तक उनका बाल बांका नहीं हो पाया है।

रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला परियोजना, और रायगढ़ का मुआवजा घोटाला पिछली सरकार में हुआ था। दोनों ही प्रकरणों में एसडीएम, और अन्य छोटे राजस्व अधिकारी-कर्मचारियों को निलंबित कर अपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है। भारतमाला में तो जमीन कारोबारी समेत कुल चार लोग जेल में हैं। मगर बड़े लोग अब भी बाहर हैं। बताते हैं कि रायगढ़ के मामले में कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी काफी सख्त दिख रहे हैं। वो इस प्रकरण की तह तक जाकर कानूनी सलाह भी ले रहे हैं, ताकि घोटालेबाजों के खिलाफ मजबूत प्रकरण तैयार हो सके। बावजूद इसके घोटाले से जुड़े बड़े अफसर घेरे में आएंगे, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।

 

गडकरी की नजरें इधर

चर्चा है कि भारतमाला परियोजना के मुआवजा घोटाले को लेकर केन्द्रीय सडक़-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी नाराज हैं। मुआवजे में गड़बड़ी के मामले न सिर्फ रायपुर-धमतरी बल्कि राजनांदगांव, और अन्य जिलों में भी आए हैं। कुछ सांसदों ने इस मसले पर सडक़-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तक बात रखी है, और घोटाले को लेकर कड़ी कार्रवाई पर जोर दे रहे हैं।

बताते हैं कि मुआवजा घोटाले को लेकर गडकरी काफी गंभीर हैं। छत्तीसगढ़ में केन्द्र सरकार सडक़ निर्माण पर करीब 19 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। ऐसे में जिस तरह मुआवजा घोटाले की गूंज छत्तीसगढ़ में सुनाई दे रही है वैसी स्थिति दूसरे राज्यों में नहीं है। केन्द्रीय सडक़-परिवहन मंत्री घोटाले की जांच केन्द्रीय जांच एजेंसियों से कराने के लिए दखल दे सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।

घोटाला कांग्रेस का, बदनामी भाजपा की

छत्तीसगढ़ में, जिला खनिज न्यास में कमीशनखोरी को लेकर एक प्रमुख अखबार में छपी रिपोर्ट प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही से संबंधित बहस का मुद्दा तो है पर, कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश की प्रतिक्रिया ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या पार्टी के विचारक व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी वालों की तरह, अब केवल हेडिंग पढक़र ट्वीट करने लगे हैं? इन दोनों नेताओं ने इस खबर को सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

जिस खबर को इन नेताओं ने भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर तीर की तरह चलाया, वह पूरा घटनाक्रम कांग्रेस शासनकाल का है। इसमें मुख्य आरोप भूपेश बघेल सरकार में तैनात रहे अफसरों पर हैं। तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू, जिन पर इस घोटाले को अंजाम देने के आरोप लगे हैं, पौने दो साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत पर हैं। वहीं सूर्यकांत तिवारी, जिनका नाम लाभार्थियों में लिया गया है, करीब तीन वर्षों से अंदर ही हैं।

क्या कांग्रेस के दोनों वरिष्ठ नेताओं ने पूरी रिपोर्ट पढऩे या तथ्यों को परखने की जहमत नहीं उठाई? क्या उन्होंने सिर्फ हेडिंग के आधार पर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश की? नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की ही किरकिरी हो गई। कांग्रेस के ये दोनों दो वरिष्ठ नेता चतुर और विद्वान माने जाते हैं। क्या उन्होंने जानबूझकर भूपेश बघेल के कार्यकाल पर चार्जशीट जारी की है? क्या उन्हें लग रहा है कि बघेल के साथ भाजपा सरकार नरमी बरत रही है, तो ऐसे हिसाब चुकता किया जाए ? इन दोनों नेताओं के ट्वीट को शेयर कर छत्तीसगढ़ भाजपा खूब मजे ले रही है।


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