राजपथ - जनपथ
असम से खास रिश्ता
पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। भाजपा, असम और पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी की इन्हीं दो राज्यों में सबसे ज्यादा उम्मीद है। असम में तो सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है।
असम में भाजपा ने स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर अन्य राज्यों से नेताओं को प्रचार में भेज रही है। छत्तीसगढ़ से डिप्टी सीएम अरुण साव को असम की 9 विधानसभा सीटों का प्रभारी बनाया गया है। क्षेत्रीय महामंत्री ( संगठन) अजय जम्वाल भी वहां संगठन का काम देख चुके हैं।
छत्तीसगढ़ का असम से खास रिश्ता रहा है। अंग्रेजों के जमाने में बड़े पैमाने पर छत्तीसगढ़ी लोग वहां चाय बागानों में काम के लिए ले जाए गए थे, और वो वहां रच बस गए। अभी कई विधानसभा सीटों पर छत्तीसगढ़ के मूल के लोग निर्णायक भूमिका में हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद मिनीमाता भी असम की रहने वालीं थीं। उनका जन्म असम के नागांव जिले के साइनाबागन में हुआ था। उनका विवाह सतनामी समाज के गुरू अगमदास से हुआ, और विवाह के बाद वे छत्तीसगढ़ आईं और सामाजिक व राजनीति में सक्रिय रहीं।
इसी पूर्व केंद्रीय मंत्री और असम से भाजपा के राज्यसभा सदस्य रामेश्वर तेली की जड़ें भी छत्तीसगढ़ से जुड़ी रहीं हैं। उनकी भी पहचान चाय बागान के मजदूर नेता के तौर पर है। असम और छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच पुराने संबंधों को देखते हुए भाजपा और कांग्रेस, छत्तीसगढ़ के नेताओं को अहम जिम्मेदारी दे रही है। कांग्रेस से पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय असम कांग्रेस का प्रभारी सचिव हैं , तो पार्टी ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल सीनियर ऑब्जर्वर बनाया है। कई और नेता प्रचार के लिए भेजा जा रहा है। कुल मिलाकर असम में छत्तीसगढ़ी नेता चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे।
महानदी पर सुनवाई निरंतर हो पाएगी?
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे महानदी जल विवाद को लेकर गुरुवार को लोकसभा में एक बार फिर सवाल उठा। ओडिशा के सांसद प्रदीप पुरोहित द्वारा पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय जलशक्ति राज्य मंत्री राजभूषण चौधरी ने बताया कि दोनों राज्य विवाद के समाधान के लिए विभिन्न स्तरों पर आपसी बातचीत कर रहे हैं।
इसी बीच, 7 फरवरी को महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को सुनवाई के लिए तलब किया है। यह सुनवाई ऐसे समय में हो रही है, जब ट्रिब्यूनल का वर्तमान कार्यकाल 13 अप्रैल 2026 को समाप्त होने वाला है। मालूम हो कि ट्रिब्यूनल का गठन 12 मार्च 2018 को हुआ था, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण और बाद में लंबे समय तक अध्यक्ष पद रिक्त रहने से सुनवाई की प्रक्रिया बाधित रही। इन्हीं कारणों से ट्रिब्यूनल का कार्यकाल अब तक दो बार बढ़ाया जा चुका है।
अब तक दोनों राज्यों के साथ ट्रिब्यूनल की कुल 49 बैठकें हो चुकी हैं। 7 फरवरी को 50वीं बैठक होगी, लेकिन इस बैठक से किसी ठोस समाधान की उम्मीद बेहद कम मानी जा रही है। संभावना है कि दोनों राज्य इस सुनवाई में केवल यह जानकारी साझा करेंगे कि सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए उनके बीच अब तक किस स्तर तक बातचीत हुई है। किसी निष्कर्ष या सहमति पर दोनों राज्य अभी तक नहीं पहुंच सके हैं। इस बात का अनुमान स्वयं ट्रिब्यूनल के रजिस्ट्रार ने हाल ही में ओडिशा सरकार को लिखे गए एक पत्र में लगाया है।
गौरतलब है कि ओडिशा ने 7 फरवरी की सुनवाई को टालने के लिए पिछले महीने ट्रिब्यूनल से अनुरोध किया था। ओडिशा का तर्क था कि उस दिन महाधिवक्ता ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित नहीं हो पाएंगे। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए कहा कि सुनवाई की कार्यवाही पहले से निर्धारित है और आवश्यकता होने पर महाधिवक्ता को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जा सकती है।
पिछली सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को यह सुझाव दिया था कि वे संयुक्त रूप से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कार्यकाल विस्तार का अनुरोध करें। लेकिन अब तक ऐसा कोई साझा पत्र केंद्र को नहीं भेजा गया है। ओडिशा ने अलग से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर ट्रिब्यूनल का कार्यकाल नौ महीने बढ़ाने की मांग जरूर की है, जिस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
यदि ट्रिब्यूनल का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया गया, तो 7 फरवरी की बैठक अंतिम बैठक साबित हो सकती है, क्योंकि ट्रिब्यूनल को अब तक हुई सुनवाई और प्रगति पर अपनी रिपोर्ट भी तैयार करनी होगी। कुल मिलाकर मौजूदा हालात यही संकेत देते हैं कि यदि ट्रिब्यूनल का कार्यकाल तीसरी बार नहीं बढ़ाया गया, तो महानदी जल विवाद के समाधान की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है। संभावना तभी बनेगी, जब ट्रिब्यूनल को आगे कुछ और समय मिले।
चलते-फिरते मिल रही नसीहत
सडक़ों पर दौड़ते ट्रकों के पीछे लिखी पंक्तियां अक्सर हमें गुदगुदा देती हैं। मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं। लेकिन इन पंक्तियों में छिपी सच्चाई कई बार समाज की हकीकत पर सीधे चोट करती है।
इस ट्रक के पीछे लिखा है कि वह तुम्हें डीपी दिखाकर गुमराह करेगी, मगर तुम आधार कार्ड पर अड़े रहना। यह आज के डिजिटल दौर की बड़ी सच्चाई है। सोशल मीडिया पर लोग खुद को जैसा हैं, उससे कहीं ज़्यादा बेहतर, सुंदर और आकर्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। कई बार ये तस्वीरें असली होती ही नहीं। फिल्टर, एडिटिंग होती है या किसी और की फोटो तक इस्तेमाल कर ली जाती है। इसके चलते फरेब और जालसाजी के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं।
ट्रक वाले की सलाह है कि अगर किसी से नज़दीकी बढ़ानी है, भरोसा करना है, तो सिर्फ सोशल मीडिया की डीपी पर नहीं, आधार कार्ड जैसे असली पहचान पर भरोसा कीजिए। आधार कार्ड में लगी तस्वीर प्राय: उतनी अच्छी होती नहीं, पर हकीकत के सबसे करीब होती है।
अफसरों की चुनाव ड्यूटी
देश के पांच राज्यों में चुनाव के चलते केन्द्रीय चुनाव आयोग ने छत्तीसगढ़ के 30 आईएएस, और आईपीएस अफसरों को पर्यवेक्षक बनाया है। इन अफसरों की दिल्ली में ट्रेनिंग चल रही है। इस बार पर्यवेक्षकों की ड्यूटी में कुछ बदलाव किया गया है। मसलन, अधिसूचना जारी होने के बाद से सभी पर्यवेक्षकों को अपने क्षेत्र में रहना होगा।
पहले चुनाव में नामांकन दाखिले के आखिरी दिन केन्द्रीय पर्यवेक्षक संबंधित चुनाव क्षेत्र में पहुंचते थे। मगर इस बार पहले दिन से चुनाव क्षेत्र में रहना होगा। यानी सात दिन की अतिरिक्त ड्यूटी होगी। इस बार सचिव स्तर के अफसरों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। इनमें ऋतु सैन, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, नीलम एक्का, एस प्रकाश, भुवनेश यादव, आर भारतीदासन, अंकित आनंद, अब्दुल कैसर हक, शम्मी आबिदी, हिमशिखर गुप्ता, शिखा राजपूत तिवारी, राजेश सिंह राणा, अवनीश शरण, धर्मेश साहू, पीएस एल्मा, रमेश शर्मा, और सारांश मित्तर हैं। पांच आईपीएस अफसरों को भी पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। इनमें डॉ. आनंद छाबड़ा, रतनलाल डांगी, अजय कुमार यादव, अंकित गर्ग, और बद्रीनारायण मीणा हैं।


