राजपथ - जनपथ

Date : 22-Jul-2019

सरकार में तबादले पर किचकिच चल रही है। एक-दो जगह तो पार्टी के पदाधिकारी, प्रभारी मंत्री के खिलाफ खुलकर आ गए हैं। वे इसकी शिकायत भी पार्टी संगठन में कर चुके हैं। सुनते हैं कि पूर्व केन्द्रीय राज्यमंत्री प्रदीप जैन पिछले दिनों प्रदेश दौरे पर आए थे। कांग्रेस के एक जिला अध्यक्ष, अपने कुछ सहयोगियों के साथ उनसे मिलने पहुंचे और  सीधे-सीधे अपने जिले के प्रभारी मंत्री की शिकायत कर दी। मंत्रीजी को लेकर जिला अध्यक्ष की शिकायत यह थी कि तबादले में मनमर्जी कर रहे हैं, संगठन के नेताओं को भाव नहीं दे रहे हैं। प्रदीप जैन ने प्रभारी सचिव चंदन यादव को सारी जानकारी देने की सलाह दी है। 

दरअसल, मंत्रीजी नियमों के जानकार माने जाते हैं और तबादले को लेकर भी एकदम पारदर्शी रहते हैं, जबकि जिले के नेता तबादले के लिए लंबा-चौड़ा हिसाब लेकर बैठे थे। जब उन्हें महत्व नहीं मिला, तो मंत्रीजी की ही शिकायत करते घूम रहे हैं। रायपुर जिले में तो अलग तरह की स्थिति पैदा हो गई है। यहां जिले के कांग्रेस विधायक एकमत होकर स्कूलों में लंबे समय तक तैनात शिक्षकों का तबादला चाह रहे थे, लेकिन एक विधायक ने अचानक रूख बदल दिया। उन्होंने कुछ पुराने लोगों की सिफारिश कर दी। विधायकों में एकमत न होने से प्रभारी मंत्री भी परेशान हैं।

लेकिन जैसा कि किसी भी पार्टी की सरकार में किसी भी प्रदेश में होता है, तबादला उद्योग बिना लेन-देन चल नहीं रहा है, और बदनामी हो रही है। लेकिन कांगे्रस पहले ही लंबे समय तक सरकार चलाने का तजुर्बा रखने वाली पार्टी है, इसलिए बदनामी को लेकर जरूरत से ज्यादा संवेदनशील भी नहीं है। एक कांगे्रस नेता ने कहा कि नक्सल हिंसा और भ्रष्टाचार इन दो को लेकर अधिक फिक्र नहीं करनी चाहिए, ये दोनों 22वीं सदी में भी जारी रहेंगे।

भविष्य भयानक है...
मोबाइल पर इन दिनों फेसऐप नाम का एक ऐसा रूसी ऐप आया है जो लोगों की तस्वीरों में उम्र जोड़ या घटाकर उनकी एक काल्पनिक तस्वीर बना देता है। लोग बीस-तीस बरस उम्र घटाकर अपनी आज की तस्वीर को देख सकते हैं, या बीस-पच्चीस बरस बढ़ाकर भी। कोई अगर इसके इस्तेमाल के आंकड़े देख सके, तो लोग अपनी किसी एक तस्वीर को ही बूढ़ा बनाकर देखते होंगे, और फिर दहशत में आकर बुढ़ापे में झांकना बंद कर देते होंगे। इसके बाद लोग अपनी जवानी, और उसके भी पहले की तस्वीरों में लग जाते होंगे। इस ऐप के बारे में एक अमरीकी सांसद ने फिक्र जाहिर की है कि इसके रास्ते रूसी खुफिया एजेंसियां लोगों के फोन तक घुसपैठ कर ले रही हैं, और अमरीका में इस पर रोक लगाने की मांग की है। हकीकत यह है कि न सिर्फ यह ऐप, बल्कि दुनिया भर में अरबों दूसरे ऐप भी फोन तक घुसपैठ का हक मांगते हैं, तभी काम शुरू करते हैं। और तो और हिन्दुस्तान में नमोऐप और छत्तीसगढ़ सरकार का भुइयांऐप भी फोन तक पूरी घुसपैठ मांगते हैं, तभी काम करते हैं। अब छत्तीसगढ़ सरकार के जमीन रिकॉर्ड दिखाने वाले भुइयांऐप को लोगों की फोनबुक, उनके फोटो फोल्डर, उनके माइक्रोफोन तक पहुंच मांगने की क्या जरूरत रहती है? लेकिन सरकार भी लोगों को मुफ्त में कुछ देना नहीं चाहती है, और उसके एवज में घुसपैठ मांगती है। अब यह लोगों को तय करना है कि वे किस-किस एप्लीकेशन के इस्तेमाल के लिए अनजानी कंपनियों के सामने अपना तौलिया उतारकर खड़े होना चाहते हैं। 

जिन्हें पानी जैसा रहना चाहिए, वे ठर्रा जैसे...
देश-प्रदेश में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता कई बार अपने दल की बात करने के बजाय अपनी बात करने और अपने आपको महिमामंडित करने के काम में ऐसे जुट जाते हैं कि लगता है कि वे पार्टी हैं, और पार्टी उनकी प्रवक्ता है। यह बात तय है कि जब प्रवक्ता अपनी पार्टी से बड़े होने लगते हैं, अपने आपको चबूतरे पर चढ़ी प्रतिमा की तरह स्थापित करने में लग जाते हैं, तो पार्टी पर बुरे दिनों का खतरा मंडराने लगता है। एक पार्टी के जिम्मेदार प्रवक्ता रहने के लिए लोगों को पानी की तरह रहना चाहिए जो कि चाय से लेकर शरबत तक, और दारू से लेकर दाल तक, काम तो आए, लेकिन न अलग से दिखे, न अलग से उसका कोई स्वाद हो। आज हालत यह है कि राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, या मंत्रियों और दूसरे नेताओं के मीडिया प्रभारी पार्टी और नेता से अधिक अपनी तस्वीरों को फैलाते हैं, और पार्टी के जिक्र को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी एक दिक्कत यह रहती है कि बड़े-बड़े धाकड़ वकीलों को बड़ी पार्टियां प्रवक्ता बनाती हैं, और वे पार्टी की सोच को सामने रखने के बजाय अपने तर्कों को पेश करते हुए मानो अपनी वकालत के प्रचार में लगे रहते हैं। समझदार राजनीतिक दल वे होते हैं जो महत्वाकांक्षी नेताओं को पार्टी प्रवक्ता नहीं बनाते। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 21-Jul-2019

रिंकू खनूजा आत्महत्या प्रकरण में सीएम रमन सिंह के ओएसडी रहे अरूण बिसेन की मुश्किलें बढ़ सकती है। बिसेन से पुलिस एक बार पूछताछ कर चुकी है। जल्द ही उन्हें दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। खास बात यह है कि अरूण बिसेन के बचाव के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। कोई यह नहीं कह रहा है कि बदलापुर की राजनीति हो रही है। अफसर और भाजपा के लोग भी उनसे काफी नाराज रहते थे। वजह यह है कि उनका सीएम सचिवालय में रहते मुलाकातियों-अफसरों से व्यवहार अच्छा नहीं रहा। जिन लोगों के रमन सिंह से अच्छे संबंध थे, वैसे भी बहुत से लोगों के फोन नंबर बिसेन ने अपने हैंडसेट पर ब्लॉक कर रखेे थे।

सरकार जाने के बाद जब उनके खिलाफ शिकायतों पर जांच बिठाई गई, तो लोगों को उनके कारनामों का पता चला। अरूण बिसेन ने एनआरडीए में काम कर रही एक एजेंसी में अपनी पत्नी को नौकरी पर लगवा लिया था। सरकार बदलने के बाद जब नियुक्ति का प्रकरण सुर्खियों में आया, तो खुद रमन सिंह हैरान रह गए। सुनते हैं कि उन्होंने पत्नी को नौकरी पर रखने की जानकारी रमन सिंह को नहीं दी थी। अरूण बिसेन, रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह के सहपाठी रहे हैं और इस वजह से उन्हें सीएम हाऊस में एंट्री मिल गई। देखते ही देखते उनकी हैसियत काफी बढ़ गई। चर्चा है कि रिंकू खनूजा-सीडी कांड की जांच में जुटी पुलिस ने उनसे सीडी देखने के लिए मुंबई जाने और वहां के महंगे पांच सितारा सहारा होटल में रूकने और मानस साहू से संबंधों को लेकर पूछताछ की। 

चर्चा तो यह है कि सीडी से जुड़े किसी भी सवाल का उन्होंने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अरूण बिसेन की संपत्ति की भी जानकारी जुटाई जा रही है। उन्होंने आईआईएम से एजूकेटिव एमबीए किया है, इस पर लाखों खर्च होते हैं। यह राशि कहां से आई, इसकी भी जानकारी जुटाई जा रही है। अभी स्वर्णभूमि में एक बड़े बंगले का पता चला है। कोई इस मामले में अभी कुछ कहने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, बिसेन की मुश्किलें बढ़ सकती है। दूसरी तरफ रमन सिंह के एक वक्त सबसे करीबी रहे ओएसडी विक्रम सिसोदिया आखिरी पांच बरसों में ऐसे किनारे कर दिए गए थे कि किसी गलत काम से उनका नाम जुड़ा हुआ मिला ही नहीं है क्योंकि सारे कामों से उन्हें अलग ही रखा गया था। उस वक्त की उपेक्षा आज फायदे की साबित हो रही है क्योंकि सेक्स-सीडी देखने अगर उन्हें भेजा गया होता तो आज वे गवाही देते खड़े रहते।

भाजपा के दिग्गज हावी
सदन में पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल और धर्मजीत सिंह न हों, तो सत्ता पक्ष के लिए मैदान एकदम खाली रहेगा। कम से कम अब तक के दो सत्रों में तो यही दिखा है। सदन में भाजपा के मात्र 14 सदस्य हैं और सत्ता पक्ष के 67। खासकर मानसून सत्र में सत्ता पक्ष के आगे विपक्ष असहाय दिखा। अंडा प्रकरण में जब सत्ता पक्ष सदस्य एक साथ पिल पड़े, तो गुस्साए भाजपा सदस्य विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है यह कहते सदन से बाहर निकलने मजबूर हो गए। 

नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की भूमिका बेहद सीमित रही है। एक-दो मौके पर तो बगल में बैठे रमन सिंह उनके कानों में फुसफुसाते देखे गए, तब कहीं जाकर वे बोलने के लिए खड़े हुए। जोगी सरकार में बृजमोहन अग्रवाल काफी मुखर रहते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिखा। इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि बैलाडीला के नंदीराज पर्वत पर खनन को लेकर उनका सवाल लगा था और वे सदन में लेट पहुंचे, जिसके कारण इस पर चर्चा नहीं हो पाई। जबकि इस मामले को लेकर पूरा बस्तर आंदोलित रहा है। विपक्ष के नाम पर चारों ही ज्यादा मुखर रहे हैं। सौरभ सिंह की भी आवाज सुनाई जरूर देती है। अजय ही ज्यादातर मौकों पर विपक्ष को लीड करते नजर आए। महाधिवक्ता प्रकरण पर विपक्ष ने भूपेश कैबिनेट के खिलाफ सदन में निंदा प्रस्ताव लाया। खास बात यह है कि  राज्य बनने के बाद पहली बार कैबिनेट के खिलाफ निंदा प्रस्ताव आया। ये अलग बात है कि प्रस्ताव अग्राह्य हो गया। मगर, अजय, नारायण और शिवरतन कम संख्याबल की कमी के बावजूद अपने संसदीय ज्ञान के बूते सत्ता पक्ष को परेशान करते नजर आए। 

शब्दों के बदलते मायने...
एक समय जब म्युनिसिपल के नलों में कोई पंप लगाकर गैरकानूनी तरीके से उसका पानी खींचते थे, तो उसके खिलाफ जारी नोटिस में टुल्लू पंप लिखा जाता था। अब टुल्लू तो एक ब्रांड था, लेकिन हर चोर पंप को टुल्लू मान लिया गया था। ठीक इसी तरह वनस्पति घी की जगह डालडा शब्द ऐसा चल निकला था कि वह ब्रांड न हो, हर किस्म के घी का नाम है। 

अब यह सेल्फी का युग चल रहा है। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कॉमेडी शो देखें, तो उसमें कपिल शर्मा अर्चना पूरन सिंह से सेल्फी लेने को कहते दिखते हैं जबकि वे दूर से महज फोटो लेती हैं जिसमें वे खुद नहीं रहतीं। यानी अपनी किसी भी तरह की तस्वीर हो, खुद लें, या कोई और, उसे सेल्फी कह दिया जाता है। 
बातचीत के कुछ और अटपटे शब्दों को देखें तो डेनिम के कपड़े को लोग जींस कहने लगे हैं। डेनिम के शर्ट को लोग जींस का शर्ट, और डेनिम की जैकेट को जींस का जैकेट कहते हैं। डेनिम का हाल किसी गैरटुल्लू पंप सरीखा हो गया है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया। वक्त के साथ-साथ कुछ शब्द मायने खो बैठते हैं, और कुछ दूसरे शब्द नए मायने पा लेते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 20-Jul-2019

भारतीय वन सेवा के अफसर एसएस बजाज के खिलाफ बिना अनुमति सिंगापुर यात्रा की पड़ताल चल रही है। बजाज सबसे ज्यादा समय तक नया रायपुर विकास प्राधिकरण के सीईओ पद पर रहे। एक तरह से नया रायपुर में जो भी कुछ डेवलपमेंट हुआ है, कुछ हद तक उन्हें ही श्रेय जाता है। उनकी साख भी अच्छी रही है। परंतु विधानसभा में उनके खिलाफ मामला उठने पर आईएफएस अफसरों में हलचल है। 

सुनते हैं कि बजाज ने अपने खर्चें से विदेश यात्रा पर जाने के लिए दो महीने पहले विधिवत विभाग से अनुमति मांगी थी। उनका पूरा परिवार सिंगापुर में एकत्र होने वाला था। इसी बीच विभाग के सचिव बदल गए। अनुमति की फाइल इधर-उधर घूमती रही। न तो आवेदन निरस्त किया गया और न ही स्वीकृति दी गई। यह भी कहा जा रहा है कि बजाज ने विदेश जाने से पहले अपर मुख्य सचिव (वन) को  फोन से सूचित भी किया था। विदेश यात्रा के लिए 21 दिन पहले अनुमति लेनी होती है। यदि आवेदन निरस्त नहीं किया जाता है तो अनुमति स्वयमेव मान लिया जाता है। ऐसे में बजाज विदेश यात्रा पर निकल पड़े। लौटकर आए तो उनके खिलाफ जांच खड़ी हो गई। हालांकि विभागीय मंत्री मो. अकबर को नियम-कायदे के मुताबिक काम करने वाला माना जाता है। ऐसे में बजाज से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि हकीकत जानने पर उन्हें राहत मिल जाएगी। वन विभाग में कम ही लोग इतनी अच्छी साख वाले हैं, और उनकी फजीहत होते देखकर कई ऐसे आईएफएस खुश हो रहे हैं, जिनकी जगह जंगल में नहीं जेल में होनी चाहिए थी।

रायपुर से अगरतला
रायपुर के 7 बार सांसद रहे रमेश बैस पूरे ही समय पान-मसाला और तंबाकू चबाते रहते हैं। लेकिन वे जिस त्रिपुरा में राज्यपाल बनकर जा रहे हैं, वहां उन्हें कोई सांस्कृतिक दिक्कत नहीं होगी क्योंकि उस राज्य में सुपारी पैदा होती है, और खूब चबाई जाती है। त्रिपुरा का राजभवन एक पुराना महल है, और जिस तरह लखनऊ वगैरह के पुराने महलों में पीकदान का चलन रहता था, वैसा ही चलन रमेश बैस के वहां पहुंचने पर फिर शुरू हो जाएगा। छत्तीसगढ़ के पहले राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय यहां से त्रिपुरा के गवर्नर बनाकर भेजे गए थे, और उनके परिचित लोगों को हर वर्ष दीवाली पर उनका जो कार्ड मिलता था उस पर राजभवन की तस्वीर ही छपी रहती थी। छत्तीसगढ़ी लोगों को ऐसे विशाल राजभवन में राज्यपाल का मेहमान बनकर ठहरने का अब खूब मौका मिलेगा, और लगे हाथों उत्तर-पूर्व के बाकी राज्यों को भी छत्तीसगढ़ी सैलानी मिलने लगेंगे। (rajpathjanpath@gmail.comh)


Date : 19-Jul-2019

पूरे छत्तीसगढ़ में चिटफंड को लेकर पुलिस की कार्रवाई बड़ी तेज चल रही है। सरगुजा के कुछ थानों में राजनांदगांव के भूतपूर्व सांसद अभिषेक सिंह के खिलाफ भी रिपोर्ट लिखाई गई है, और यह किसी शिकायतकर्ता के किए नहीं हुआ है, अदालत के आदेश से हुआ है। ऐसे में प्रदेश के एक जिले के एक थाने में राज्य सरकार में हड़कम्प मचा दिया है। वहां पर चिटफंड कंपनियों के खिलाफ जो रिपोर्ट लिखाई गई है, उसमें प्रदेश के आधा दर्जन आईएएस, और आईपीएस अफसरों का नाम भी लिखा गया है। राज्य सरकार के लोग यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि क्या इस राज्य के थाने की पुलिस को प्रदेश के इतने आईएएस-आईपीएस लोगों के नाम एफआईआर में दर्ज करते हुए यह समझ नहीं आया कि इसके बारे में किसी बड़े अफसर से भी पूछ लिया जाए? अब पता चल रहा है कि एक ही थाने की ऐसी कम से कम दो एफआईआर को वेबसाइट से भी हटा दिया गया है, और थाने से उसके बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी जा रही। खैर, कुछ लोगों ने दस्तावेजी सुबूत जुटा रखे हैं, और ये सुबूत पुलिस के बड़े अफसरों के लिए खासी दिक्कत खड़ी करेंगे। वेबसाइट पर एफआईआर डालना सुप्रीम कोर्ट ने शुरू करवाया है, और किसी बहुत ही संवेदनशील मामले में उसे बड़े अफसर की मर्जी से हटाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए मामले का संवेदनशील होना जरूरी है, महज बड़े अफसरों का नाम आ जाने से मामला संवेदनशील नहीं हो जाता। जिन अफसरों के नाम चिटफंड घोटाले में एफआईआर में दर्ज हैं, वे सचिव स्तर के आईएएस हैं, और डीआईजी स्तर के आईपीएस हैं। कुछ मंत्रालय में हैं, कुछ आईजी रेंज में हैं, और कोई दिल्ली में पोस्ट है। 

इन्हें मौत पर भरोसा है...
कल एक सड़क हादसे में छत्तीसगढ़ में एक ऐसा व्यक्ति मारा गया जो मोटरसाइकिल पर था, जिसके पास हेलमेट भी था, लेकिन उसे पहनने के बजाय उसे हैंडिल पर टांगकर रखा था। अब मौत ऐसे हेलमेट के रोके रूकती नहीं है। ऐसे ही अगर मौत पर असर होता, तो उन गाडिय़ों के हादसों में तो कोई मरते ही नहीं जिन्होंने सामने नींबू और मिर्च टांग रखे थे। उन घरों में कोई गम ही नहीं होता जो सामने काली हंडी टांगकर उस पर चेहरा बनाकर घर को नजर से बचाते हैं। हेलमेट कोई तिलस्मी ताबीज नहीं है, और वह जब सिर पर ठीक से बंधा हो, तो ही वह मौत को रोक सकता है। हेलमेट इस्तेमाल करने वाले गिने-चुने लोगों में से भी अधिकतर लोग हेलमेट को सिर पर रखकर बिना बेल्ट बांधे चलते हैं। इनका कोई हादसा हो तो सबसे पहले हेलमेट ही दूर जाकर गिरता है। कुछ ऐसा ही हाल सीट बेल्ट का भी है। कारों में सीट बेल्ट की वजह से उनके दाम कम से कम दस हजार रूपए बढ़ते हैं, लेकिन महंगी कार लेने वाले लोग भी उसे तेज रफ्तार तो चलाते हैं, लेकिन सीट बेल्ट नहीं लगाते। उन्हें खुद को हासिल हिफाजत के इस्तेमाल से, सीट बेल्ट से, अधिक भरोसा मौत की रहमदिली पर होता है कि मौत उन्हें छोड़कर चलेगी। जब लोग मरने पर इतने आमादा हैं, तो उन्हें क्या तो पुलिस बचा लेगी, और क्या बिना इस्तेमाल किए हुए हेलमेट-सीट बेल्ट ! (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Jul-2019

कॉलेज शिक्षक के रूप में काम कर चुकीं छत्तीसगढ़ की नई राज्यपाल अनसुईया उईके के कांग्रेस के पुराने नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। वे कांग्रेस दिग्गज बसंतराव उईके की पुत्री हैं, जो कि 70 के दशक में अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता थे। वे श्यामाचरण शुक्ल के करीबी थे। 

बहुत कम लोगों को मालूम है कि वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा ने अनसुईया को कॉलेज शिक्षक की नौकरी दिलाने में मदद की थी। बात वर्ष 82-83 की है, जब अविभाजित मध्यप्रदेश की अर्जुन सिंह सरकार में मोतीलाल वोरा उच्चशिक्षा मंत्री थे। उस समय नए कॉलेज खोले जा रहे थे। वोराजी ने उच्च शिक्षा मंत्री रहते सौ नए कॉलेज खोल दिए थे। शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने नया रास्ता निकाला और कॉलेज शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को पीएससी के दायरे से निकालकर मेरिट के आधार पर करने का फैसला लिया। इस तरह करीब 22 सौ शिक्षक एडहॉक भर्ती किए गए थे। 

बताते हैं कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान अनसुईया उईके वोराजी से मिली थीं। योग्यता तो थी ही, वोराजी की सिफारिश पर अनसुईया उईके को पसंदीदा जगह पर कॉलेज शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिल गई। बाद में यूजीसी ने कॉलेज शिक्षकों की भर्ती के लिए मापदंड बदल दिया। कई शिक्षक यूजीसी के मापदण्डों पर खरा नहीं उतर पा रहे थे उन्हें कॉलेज छोडऩा पड़ा। ऐसे शिक्षकों के लिए वोराजी ने फिर रास्ता बनाया और ये शिक्षक हाईस्कूल में नियुक्त कर दिए गए। बाकी योग्य शिक्षक जल्द स्थाई भी हो गए, जिनमें अनसुईया उईके भी रहीं, जो कि बाद में नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आईं और विधायक-मंत्री, राज्यसभा सदस्य  होते हुए अब छत्तीसगढ़ की राज्यपाल नियुक्त हुईं हैं।

मरणोपरांत भी सेवक चाहिए...
मिस्र के पुराने इतिहास को पढ़ें, तो उसमें राजा-रानियों के साथ उनके दास-दासियों को भी दफन करने की परंपरा पता लगती है, उसके अलावा रोज के उनके इस्तेमाल के सामान भी दफन कर दिए जाते थे, और यह माना जाता था कि मृत्यु के बाद भी उन्हें रोज के सामानों और सेवकों की जरूरत पड़ती रहेगी। 

कुछ इसी किस्म का हाल आज के अफसरों का होता है। जो जितने बड़े अफसर होते हैं, उनके साथ उतने ही निष्ठावान सेवक दफन कर दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में अब अभी-अभी एक मामला सामने आया जिसमें सरकार के एक सबसे ऊंचे ओहदे से रिटायर होकर एक लंबा पुनर्वास प्राप्त कर चुके अफसर ने अपने एक पुराने सेवक से सरकार को एक अर्जी भिजवाई। यह सेवक सरकारी अमले का था, और पिछले बीस बरस से मिस्र के इसी राजा की सेवा कर रहा था। अब जब राजा रिटायर हुआ तब भी सेवक की नौकरी जारी थी, और जैसा कि सरकार में आम इंतजाम चलता है, इस सेवक की तैनाती भूतपूर्व राजा के बंगले पर ही थी। अब जब सेवक रिटायर हो गया, तो उसकी तनख्वाह कौन दे? ऐसे में सेवक ने संविदा नियुक्ति के लिए अपने विभाग में अर्जी लगा दी है कि उसे संविदा पर आगे भी रखा जाए। मतलब यह कि बीस बरस के बाद भी वह बंधुआ मजदूर की तरह बंगला ड्यूटी करता रहे। 

लेकिन ऐसी चर्चा है कि विभाग ने संविदा की अर्जी खारिज कर दी है कि इस ओहदे पर पहले से विभाग में जरूरत से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं, और इस पर संविदा का कोई न्यायसंगत तर्क नहीं बनता। 

लोगों ने अभी-अभी दुर्ग जिला अदालत से निकली एक खबर पढ़ी है कि किस तरह वहां की एक महिला जज ने अदालत के एक कर्मचारी द्वारा जज-बंगले पर ड्यूटी करने से मना कर दिया तो जज ने उसे दिन भर अपनी अदालत के दरवाजे पर खड़ा रहने की सजा दी। इस पर जब खड़े-खड़े वह चतुर्थ वर्ग गरीब कर्मचारी चक्कर खाकर गिर गया तो अदालत के कर्मचारियों ने उसे अस्पताल पहुंचाया, और उस महिला जज के खिलाफ मोर्चा खोला। लेकिन सरकार में तकरीबन हर अफसर अपने बंगले पर ऐसी बेगारी लेने के आदी रहते हैं, और उसी वजह से दुर्ग अदालत का यह मामला सबकी सहूलियत के लिए दफन कर दिया गया। 

अब रायपुर में राज्य स्तर की बेगारी का यह मामला फाईलों पर तो एक छोटे कर्मचारी की संविदा अर्जी की शक्ल में आया है, लेकिन इसके पीछे के राजा का नाम भी सबको मालूम है। अब स्टिंग ऑपरेशन करने के शौकीन पत्रकार अगर बड़े नेताओं और अफसरों के बंगलों पर काम करने के लिए रोज जाने वाले कर्मचारियों के वीडियो बनाएं, और पता लगाएं कि वे किस-किस विभाग में क्या-क्या काम करते हुए बताए जाते हैं, तो अकेले राजधानी रायपुर में हजारों कर्मचारी अमानवीय बेगारी करने से बच जाएंगे। आज तो हालत यह है कि मौजूदा और भूतपूर्व नेता और अफसर अपने साथ-साथ अपने रिश्तेदारों के लिए भी सरकारी कर्मचारियों का बंधुआ मजदूर की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और किसी कर्मचारी संघ को भी यह मामला उठाना चाहिए। जब पुलिस-परिवार आंदोलन कर सकते हैं, तो खुद कर्मचारी तो बंगला ड्यूटी के खिलाफ खड़े हो ही सकते हैं। दुर्ग की अदालत में एक छोटे से कर्मचारी ने विरोध करने का हौसला दिखाया है, और रायपुर में ऐसे अरबपति भूतपूर्व राजाओं के खिलाफ भी कुछ लोगों को तो मेहनत करनी ही चाहिए। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 17-Jul-2019

आखिरकार नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने अपने करीबी धोखाधड़ी-छेड़छाड़ के आरोपी प्रकाश बजाज से खुद को अलग कर लिया है। सुनते हैं कि बजाज के परिजनों ने पिछले दिनों कौशिक से मुलाकात की थी और पुलिस की गिरफ्त से बचने के लिए इधर-उधर फिर रहे प्रकाश बजाज का सहयोग करने का आग्रह किया। कौशिक इस पर भड़क गए और कहा कि बजाज का सहयोग करने के कारण ही राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ा है। 

पहले कौशिक के कहने पर पूरी भाजपा प्रकाश बजाज के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही थी और पार्टी नेता, एसपी को ज्ञापन देने भी गए थे। पर कई नेताओं ने महिला के साथ धोखाधड़ी के प्रकरण की निजी स्तर पड़ताल की, तो पता चला कि प्रकाश बजाज ने वाकई महिला के साथ धोखाधड़ी की है। इसके बाद एक-एक कर पार्टी नेता बजाज से किनारा करते गए। यह बात कौशिक तक पहुंची, तब तक काफी किरकिरी हो चुकी थी। 

प्रकाश बजाज से धोखाधड़ी की शिकार महिला कौशिक पर भी छेड़छाड़ का आरोप लगा चुकी है। कौशिक ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी थी, लेकिन आगे इसका हौसला नहीं जुटा पाए। कौशिक के लिए होम करते हाथ जलने जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। इससे छुटकारा पाने के लिए कौशिक ने प्रकाश बजाज-परिजनों को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। 

नाजायज प्रतिबंधों का नतीजा
नया रायपुर के मरघटी सन्नाटे को देखकर लौट रहे शहरी योजना के कुछ विशेषज्ञों ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि शहर से 25 किलोमीटर दूर मंत्रालय बनाकर उसके बाद बीच की पूरी जगह को भरने की उम्मीद रमन सरकार का मुंगेरीलाल का हसीन सपना था। एक तो सरकार यह सोच रही थी कि नया रायपुर में योजना के तहत प्रतिबंधों से लाद दी गई हजारों एकड़ जमीन पर लोग बसेंगे, दूसरी तरफ उसने निजी जमीनों पर इस कदर प्रतिबंध लगाए थे कि कोई कुछ बना ही न सके। नतीजा यह हुआ कि न तो बीच का हिस्सा भर पाया, न नया रायपुर की खुद की सरकारी जमीन बिक पाई। निवाला इतना बड़ा ले लिया गया था कि न उसे खाते बना, और न निगलते। नया रायपुर का ढांचा इतना बड़ा बना दिया गया कि उसका रखरखाव हाथी पालने जैसा हो गया है। अब भूपेश सरकार, और उसके एक तेज-तर्रार मंत्री मोहम्मद अकबर यह नहीं समझ पा रहे हैं कि देश के सबसे बड़े कब्रिस्तान बनने का खतरा झेल रहे नया रायपुर का क्या किया जाए? जिस तरह केंद्र सरकार घाटे की एयर इंडिया को सब्सिडी से उड़ा रही है, क्या उस तरह की सब्सिडी से नया रायपुर में बसें चलाएं, झाड़ू लगवाएं, और रखरखाव करवाएं, या फिर इसके लिए भी रायपुर शहर के स्काईवॉक की तरह जनता और जानकारों की राय मंगवाएं। शहरी योजना के विशेषज्ञों का यह मानना है कि नया रायपुर में सरकार की अपनी योजना जितनी जगह छोड़कर बाकी निजी जमीनों पर लादी गई नाजायज शर्तों को खत्म करना चाहिए, ताकि बाजार सामान्य नियमों के तहत उस तरफ दिलचस्पी ले सके। नया रायपुर को तानाशाही का एक टापू बनाने के चक्कर में हजारों एकड़ निजी जमीनों पर प्रतिबंधों का इतना बड़ा टोकरा लाद दिया गया कि लोग शहर के दूसरे इलाकों में ही कमाने-खाने के लिए बने रहे, और इधर देखा भी नहीं। इसका हाल यह रहा कि किसी श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ चंदन की लकडिय़ां बेचने को रखी गईं, तो लोग दूसरी जगह मुर्दे जलाने लगे। 

आज हालत यह है कि अंधेरा होने के बाद नया रायपुर के इलाके में किसी की गाड़ी खराब हो जाए, तो हो सकता है कि कई घंटे कोई मदद करने वाले वहां से गुजरें ही नहीं। छत्तीसगढ़ी में ऐसे हालत के लिए कहते हैं-मरे रोवइया न मिले...

गांधीजी की चलती है...
विधानसभा में श्रम विभाग के सवालों पर चर्चा के दौरान हास-परिहास के बीच भाजपा सदस्य शिवरतन शर्मा ने भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए कह दिया कि डहरियाजी के विभाग में  'गांधीजीÓ की चलती है। इस पर श्रम मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने भी तपाक से जवाब दिया कि गांधीजी की देश-विदेश, हर जगह चलती है। उन्होंने भाजपा सदस्य को सलाह दी कि हर रोज गांधीजी को प्रणाम किया करें। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 14-Jul-2019

भाजपा में नए सदस्य बनाने का काम चल रहा है। बाकी राज्यों में तो यह अभियान जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में पार्टी नेता रूचि नहीं ले रहे हैं। राजनांदगांव के सांसद संतोष पाण्डेय प्रदेश में सदस्यता अभियान के प्रभारी हैं। अभियान से जुड़े लोग दावा कर रहे हैं कि नए सदस्यों की संख्या बढ़ रही है। मगर, पार्टी के अंदरूनी सूत्र  इसको नकार रहे हैं। पिछली बार मिस्डकॉल के जरिए 50 लाख सदस्य  बनाने का दावा किया गया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में कुल मिलाकर 47 लाख वोट ही मिले। 

सुनते हैं कि चुनाव नतीजे आने के बाद अमित शाह ने संगठन के प्रमुख नेताओं को जमकर फटकार लगाई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि सदस्यता अभियान के नाम पर फर्जीवाड़ा हुआ है। यदि वास्तव में 50 लाख सदस्य बनाए गए होते, तो पार्टी चौथी बार सरकार बनाने में कामयाब रहती। इस बार के सदस्यता अभियान पर पार्टी हाईकमान की निगाह टिकी हैं। 

बी.सतीश और सौदान
भाजपा के शीर्ष स्तर पर संगठन में बड़ा फेरबदल हुआ है। पार्टी के महामंत्री (संगठन) की जिम्मेदारी रामलाल की जगह फिलहाल बी सतीश को दी गई है। भाजपा में महामंत्री (संगठन) की हैसियत काफी ऊंची होती है और वे राज्यों में संगठन के गुटीय समीकरण को प्रभावित करते हैं। बी सतीश और सौदान सिंह, दोनों बराबरी के पद थे। पर अब सतीश का कद एक कदम बढ़ा है। 

बी सतीश, कभी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे के सचिव रह चुके हैं। उनकी संभावित नियुक्ति के बाद पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि सौदान सिंह का क्या होगा? सौदान सिंह के हिसाब से प्रदेश भाजपा संगठन की गतिविधियां चलती रही है। लखीराम अग्रवाल, बलीराम कश्यप, दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेताओं के गुजरने के बाद सौदान सिंह की ताकत काफी बढ़ी। इन नेताओं के रहते सौदान सिंह कभी भी मनमानी नहीं कर पाए। सौदान के खिलाफ पार्टी के कई नेताओं ने मोर्चा खोल रखा था।

 सुनते हैं कि इन नेताओं ने रामलाल से शिकायत भी की थी। रामलाल भी सौदान सिंह को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। मगर, बी सतीश के आने के बाद सौदान सिंह की हैसियत में कोई कमी आएगी, ऐसा लगता नहीं है। कई नेता बताते हैं कि बी सतीश से सौदान के बहुत अच्छे रिश्ते हैं। ऐसे में सौदान की ताकत और बढ़ सकती है। मगर, कुछ लोग याद दिलाते हैं कि बी सतीश के पास लंबे समय तक गुजरात का प्रभार रहा है। उस वक्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के सीएम थे। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि मोदी-शाह जो चाहेंगे, वही होगा। यानी कुछ लोग अभी भी सौदान का पॉवर घटने की उम्मीद से है।

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Date : 13-Jul-2019

भारत के विश्वकप क्रिकेट से बाहर हो जाने के बाद भी क्रिकेट के शौकीन लोगों की दिलचस्पी खत्म हुई नहीं है। किसे, कब बैटिंग के लिए क्यों बुलाया गया, अब लोग उस पर बहस कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ क्रिकेट के रिकॉर्ड को लेकर हमेशा से लोग हिसाब करते रहते हैं कि कौन सा रिकॉर्ड टूटा। ऐसे में अभी वॉट्सऐप पर एक विश्लेषण घूम रहा है जिसके मुताबिक- भारत अपनी लीग में टॉप पर था, लेकिन सेमीफाइनल में हार गया। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया भी अपनी लीग में टॉप पर था, और सेमीफाइनल हार गया। दोनों ही देशों के नाम के अंग्रेजी हिज्जे के आखिर में आईए आता है। और फाईनल में जो दो टीमें लैंड की हैं, उन दोनों के नाम में लैंड आता है, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड। भारत ने आखिरी मैच में तीन विकेट शुरू में ही जल्दी खो दिए थे, और ऑस्ट्रेलिया ने भी तीन विकेट उसी तरह जल्दी खोए। भारत 49वें ओवर में ऑलआऊट हो गया था, और ऑस्ट्रेलिया भी 49वें ओवर में ऑलआऊट हुआ। भारत के धोनी रनआऊट हुए, और अगले ही दिन ऑस्ट्रेलिया के स्मिथ उसी तरह आऊट हुए। धोनी जब रनआऊट हुए भारत 216/8 था, और स्मिथ जब रनआऊट हुए ऑस्ट्रेलिया 217/8 था। भारत के सात बल्लेबाजों ने ईकाई तक स्कोर सीमित रखा था, और चार बल्लेबाज दहाई स्कोर तक पहुंचे थे। ऑस्ट्रेलिया के भी सात बल्लेबाजों ने ईकाई स्कोर किया, और चार ने दहाई स्कोर बनाया था। 
अब इसकी सारी जानकारी सही है या नहीं यह तो क्रिकेट के स्कोर चार्ट बारीकी से देखने वाले बता सकेंगे, लेकिन क्रिकेट के रिकॉर्ड में दिलचस्पी लेने वाले कभी कम न होंगे। 

और पाकिस्तान का रिकॉर्ड...
पाकिस्तान का रिकॉर्ड भी लोग लेकर बैठे हैं कि 1992 और 2019 के विश्वकप में कैसे उसका हाल एकदम एक सरीखा हुआ। इन दोनों ही टूर्नामेंटों में वे पहले मैच हारे थे, दूसरे मैच जीते थे, तीसरे मैच बेनतीजा रहे, चौथे मैच हारे, पांचवें मैच हारे, छठवें मैच जीते, सातवें मैच जीते, लेकिन इसके बाद पाकिस्तान 2019 में 1992 की तरह जीत नहीं पाया। मेलबोर्न में 1992 में पाकिस्तान चैंपियन बना था, लेकिन इस बार वह लीग मैच में ही बाहर हो गया। 

बला से छूटकर जिले पहुंचीं
आखिरकार स्वास्थ्य बीमा योजना के झमेले में उलझी शिखा राजपूत तिवारी हेल्थ डायरेक्टर के पद से मुक्त हो गई। सरकार ने उनका मान रखा और बेमेतरा कलेक्टर बना दिया। शिखा ने स्वास्थ्य बीमा योजना के एडिशनल सीईओ डॉ. विजेन्द्र कटरे के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल की थी। उन्होंने अपनी जांच में डॉ. कटरे के खिलाफ शिकायतों को सही पाया था। खैर, डॉ. कटरे भी पहुंच वाले निकले और अपना कार्यकाल खत्म होने तक पद पर बने रहने की अनुमति हासिल कर ली। इससे जुड़े एक आदेश को लेकर विभागीय मंत्री टीएस सिंहदेव, शिखा राजपूत तिवारी से नाराज चल रहे थे। 
सिंहदेव की नाराजगी को देखकर शिखा को हेल्थ डायरेक्टर के प्रभार से मुक्त कर दिया गया। सुनते हंै कि शिखा के खिलाफ कई और शिकायतें भी हुई थी, लेकिन पहली नजर में सभी शिकायतें निराधार पाई गईं। चूंकि पिछली सरकार ने भी उन्हें लूप-लाइन में रखा था। इसलिए उन्हें अब जिले की जिम्मेदारी देकर बेहतर परफार्मेंस का मौका दिया है। 

गलियारों तक में रईसी...
छत्तीसगढ़ की राजधानी नया रायपुर के मंत्रालय की इमारत में जाएं, तो समझ आता है कि इस राज्य में बिजली की न तो कोई कमी है, और न ही कोई इज्जत। जब देश के बहुत बड़े हिस्से में बच्चों को पढऩे के लिए एक बल्ब की बिजली नसीब नहीं होती, मंत्रालय की दानवाकार इमारत के गलियारे भी एयरकंडीशंड हैं, और उनमें चारों तरफ खुली जगहें हैं जहां से बीच के अहाते में आना-जाना होता है, चारों तरफ खिड़कियां खुली हैं ताकि कर्मचारी और आवाजाही वाले लोग थूकने की स्वतंत्रता का उपभोग कर सकें। यह देखकर हैरानी होती है कि कई किलोमीटर लंबे गलियारों में एयरकंडीशनिंग इतनी बेदर्दी से बर्बाद की जाती है। इसके लिए मशीन लगाने में भी करोड़ों रूपए अतिरिक्त लगे होंगे, और अब दसियों लाख रूपए की बिजली तो हर महीने महज गलियारों में बर्बाद हो रही है। सरकार के पास जब तक तनख्वाह देने के पैसे रहते हैं, तब तक किसी तरह की किफायत किसी को नहीं सूझती। इस प्रदेश के अस्पतालों में गंभीर मरीजों के लिए भी जब एयरकंडीशनिंग नहीं है, तब मंत्रालय के गलियारे भी चारों तरफ खुली हवा में एयरकंडीशनिंग बर्बाद करते रहते हैं। 
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Date : 11-Jul-2019

आईएफएस अफसर एसएस बजाज को बिना अनुमति के विदेश यात्रा करने पर नोटिस थमा दिया गया। बजाज खुद के खर्चे पर सिंगापुर गए थे। उन्होंने लौटने के बाद विभाग को इसकी सूचना दी। बिना अनुमति के विदेश यात्रा को सर्विस रूल का उल्लंघन माना गया। वैसे बजाज अकेले अफसर नहीं हैं, जिन्हें इस तरह का नोटिस मिला है। पिछली सरकार में तो बड़ी संख्या में अफसर विदेश गए, लेकिन कई ने अनुमति तक नहीं ली। 

ऐसे अफसरों में आईएएस अफसर आर प्रसन्ना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रसन्ना भी अनुमति लिए बिना विदेश गए थे। लौटकर आने के बाद अनुमति के लिए आवेदन दिया। उन्हें तत्कालीन सीएस ने  जमकर फटकार लगाई थी। नोटिस भी जारी किया गया था। लेकिन अफसरों की विदेश यात्राओं को लेकर पिछली सरकार काफी उदार रही है और इस तरह के प्रकरणों पर चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता था। मगर, सरकार बदलने के बाद अफसरों की यात्राओं पर तिरछी निगाह है। संकेत साफ है कि इस तरह के प्रकरणों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। 

लोगों को आज के सूचना आयुक्त एम.के. राऊत का बरसों पहले का वह मामला याद है जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उन्हें लंदन में घूमते हुए अचानक ही आमने-सामने देखा, तब पता लगा कि राऊत विदेश में हैं। इस घटना को लेकर एक किस्सा फैला था, जो सच था या नहीं वह पता नहीं। रमन सिंह अपने साथ गए अफसरों के साथ लंदन में मैडम त्रुसां की प्रतिमाओं की गैलरी देखने गए थे, और वहां उनके ओएसडी विक्रम सिसोदिया ने चौंकते हुए उन्हें कहा- देखिए सर यहां तो राऊत साहब की भी प्रतिमा लगाई गई है। 

दरअसल राऊत किसी प्रतिमा को देखते हुए खड़े थे, और उसी वक्त छत्तीसगढ़ से पहुंची टीम भी वहीं थी। इसके बाद उन्हें यह जवाब देने में खासी मुश्किल हुई कि वे निजी प्रवास पर भी बिना इजाजत कैसे विदेश चले गए थे जिसके लिए इजाजत जरूरी है।

संपत्ति की तरह पासपोर्ट...
राज्य सरकार जिस तरह अपने सारे अफसरों-कर्मचारियों से हर बरस संपत्ति का ब्यौरा लेती है, उसी तरह हर बरस उनके परिवारों के इन्हीं लोगों के पासपोर्ट की कॉपी भी लेनी चाहिए कि घर का कौन-कौन आश्रित सदस्य या जीवनसाथी विदेश होकर आए हैं। अभी तो हालत यह है कि छोटे-छोटे से अफसर भी खरीदी के लिए चीन, और मस्ती के लिए बैंकाक इसी तरह जाते-आते हैं जैसे मुंबई-दिल्ली गए हों। पासपोर्ट की जांच हो जाए, तो सैकड़ों लोग सस्पेंड होंगे जिन्होंने विदेश यात्रा के बाद भी सरकार से कोई इजाजत नहीं ली है।

राज्य सरकार में यह चर्चा आम रहती है कि जिन अफसरों को विदेश यात्रा की इजाजत देनी होती है, वे इसी बात पर कुढ़ते रहते हैं कि वे यहीं बैठे हैं, और दूसरे लोग विदेश जा रहे हैं, इसलिए कई बार समय रहते इजाजत दी नहीं जाती है, हवाई टिकट आखिरी वक्त पर बहुत महंगी हो जाती है। जब विश्वरंजन डीजीपी थे, और अमरीका के बर्कले विश्वविद्यालय में उन्हें एक सेमिनार में नक्सल हालात पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था, तो सरकार पर कोई आर्थिक बोझ नहीं आ रहा था क्योंकि अमरीकी विश्वविद्यालय पूरा खर्च उठा रहा था। लेकिन इसके बावजूद उनकी फाईल आखिरी वक्त पर मुख्य सचिव से बड़ी मुश्किल से मंजूर हुई थी, और महंगी टिकट लेकर उन्हें जाना पड़ा था।

सरकार बदली तो पार्किंग छिनी...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बीच बसे हुए महंत घासीदास संग्रहालय का चेहरा वक्त के साथ बदलते रहता है। पन्द्रह बरस भाजपा की सरकार रही, तो एक सबसे ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई योगेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लेकर संग्रहालय के पूरे कैम्पस पर हावी रहे, और फिल्म से जुड़े लोगों की होली भी इस सरकारी संग्रहालय के कैम्पस में होती रही। फिर कुछ दूसरे लोगों की ताकत काम आई तो इस कैम्पस का बहुत बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ी रेस्त्रां, गढ़कलेवा, के नाम पर दे दिया गया, और किसी को समझ नहीं आया कि शहर का यह सबसे बड़ा खुला रेस्त्रां सरकारी पार्किंग सहित कैसे किसी के कब्जे में आ गया। अब सरकार बदली तो वहां कुछ दूसरे लोगों की मर्जी काम आ रही है, और गढ़कलेवा को मिली हुई बहुत बड़ी पार्किंग बैरियर लगाकर बंद कर दी गई, और वहां तक जाने के लिए अब हाईवे का ही रास्ता बचा है। सत्ता की मेहरबानी से चलने वाले काम-धंधे इसी तरह कभी ऊपर उठते हैं, कभी नीचे आते हैं। वैसे इसी संग्रहालय से सरकार का संस्कृति विभाग काम करते आया है जिसमें मर्जी के कलाकारों को छांट-छांटकर उपकृत करने के आरोप लगते रहे हैं, और कमीशनखोरी के भी। कुल मिलाकर बात यह दिखती है कि सरकार का दखल न तो कारोबार में रहना चाहिए, और न ही कला में। 

आखिरी वक्त निकल जाने के बाद
आखिरी वक्त पर मंजूरी की बात करें, तो राज्य सरकार के तबादले के मौसम का अटपटापन सामने आता है। अब जब जुलाई शुरू हो गई है, और पूरे प्रदेश में स्कूल-कॉलेज के दाखिले खत्म हो रहे हैं, स्कूलों में पढ़ाई शुरू हो चुकी है तब सरकारी अमले के तबादले शुरू हो रहे हैं, और ये तबादले अगस्त के महीने तक चलने वाले हैं। ऐसे में जाहिर है कि शहर बदलने की वजह से बच्चों के स्कूल-कॉलेज भी बदलेंगे, स्कूल यूनीफॉर्म भी बदलेगी, किताबें भी बदल जाएंगी, और बारिश के वक्त एक शहर से दूसरे शहर आते-जाते सामान भी भीगकर बर्बाद होने का खतरा रहेगा। लेकिन जो काम सरकार वित्त वर्ष समाप्त होने के बाद बिना किसी दिक्कत कर सकती थी, और गर्मियों में लोग शहर बदल सकते थे, उसे स्कूल-कॉलेज शुरू होने के बाद किया जा रहा है। सरकार को स्कूलों का वक्त तय करना हो, गर्मी या दीवाली की छुट्टी तय करनी हो, इन सबमें ऐसी ही बेरहमी दिखाई जाती है। पता नहीं क्यों कर्मचारियों और अधिकारियों के संगठन भी सरकार के सामने इस दिक्कत के खिलाफ क्यों नहीं बोलते हैं।
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Date : 10-Jul-2019

प्रदेश में सत्ता हाथ से जाने के बाद भाजपा के नेता-विधायक काम धंधे मेें लग गए हैं। पिछले दिनों बड़े पैमाने पर पेट्रोल पंप का आबंटन हुआ, इसमें सबसे ज्यादा भाजपा या भाजपा से जुड़े लोगों की लॉटरी निकली। ऐसा नहीं है कि आबंटन में कोई गड़बड़ी हुई है। अभी तक प्रदेश में डेढ़ सौ से अधिक पंपों के लिए आबंटन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रही और आबंटन लॉटरी के जरिए हुआ।  

सुनते हैं कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की किस्मत थोड़ी खराब रही। वे भी अपने परिजनों के नाम से पेट्रोल पंप लेने के लिए प्रयासरत थे, लेकिन लॉटरी में परिजनों का नाम नहीं निकला। पूर्व मंत्री लता उसेंडी को बस्तर के बेहतर लोकेशन में पेट्रोल पंप आबंटित होने की खबर है। कुछ पूर्व मंत्रियों और एक-दो विधायकों को भी पेट्रोल पंप  मिल गया है। चर्चा तो यह भी है कि कुछ नेताओं ने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के जरिए जुगाड़ लगाने की कोशिश भी की, लेकिन उन्हें फटकार मिली। 

वैसे पेट्रोल पंप में निवेश जोखिम बहुत कम रहता है और आय नियमित होती है। यही वजह है कि पेट्रोल पंप लेेने के लिए राजनेता ज्यादा उत्सुक रहते हैं। पूर्व सीएम अजीत जोगी, अमितेश शुक्ल, लाभचंद बाफना सहित कई नेताओं-परिजनों को पेट्रोल पंप आबंटित हुआ था। कई साल पहले दिग्गज राजनेता विद्याचरण शुक्ल ने अनौपचारिक चर्चा में माना था कि उन्होंने सौ से अधिक लोगों को पेट्रोल पंप दिलवाए हैं। खुद उनके परिवार के पास 5 पेट्रोल पंप रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले कांग्रेस के लोगों का पेट्रोल पंप व्यवसाय में दबदबा रहा है, लेकिन अब भाजपा के लोगों ने कांग्रेसियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। वैसे भी भाजपा के ज्यादातर बड़े नेता व्यवसाय से राजनीति में आए हैं और जोखिमों से बचने के लिए पेट्रोल पंप में निवेश को बेहतर मानते हैं। 

ऐसे में कांग्रेस नेता सुभाष धुप्पड़ शायद अकेले ऐसे नेता रहे जिन्होंने बहुत मेहनत करके अपने चलते हुए दो पंपों को कंपनी को वापिस किया, कंपनी लेना नहीं चाहती थी, और उनके पीछे लगी रही कि वे इसे चलाएं, लेकिन वे अड़े रहे, और आखिर में पंप से छुटकारा पाए। वैसे कांग्रेस के कुछ दूसरे नेताओं के नाम यह तोहमत भी दर्ज है कि उन्होंने अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को मिले हुए पेट्रोल पंपों को लेकर खुद चलाया। 

...और पेट्रोल पंपों से पहले...
पेट्रोल पंप से पहले कांग्रेस के नेता राशन दुकानें चलाया करते थे, और उन्हें उस वक्त के पैमाने से कमाई का धंधा माना जाता था। फिर जब अजीत जोगी रायपुर के कलेक्टर थे, उन्होंने अधिकतर छात्र नेताओं को गिट्टी क्रशर का काम खुलवा दिया, और जीप-टैक्सी का परमिट दे दिया। ये दोनों ही काम सरकार जब चाहे दबोच सकती थी, और इस तरह छात्र नेताओं पर कलेक्टर का कब्जा बने रहा, धीरे-धीरे छात्र राजनीति बड़ी कमाई का जरिया बन गया, और छात्र आंदोलन खत्म हो गए। 

कांग्रेस के नेताओं ने अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से एक और धंधे पर अपना एकाधिकार बना रखा था, सहकारी संस्थाओं का। मंडी से लेकर बैंक तक, और हाऊसिंग सोसाइटियों तक सत्यनारायण शर्मा, राधेश्याम शर्मा, गुरूमुख सिंह होरा, मोहम्मद अकबर जैसे कांग्रेस नेताओं का कब्जा रहा, और कांग्रेस की राजनीति इनके सहारे च


Date : 09-Jul-2019

पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में अक्सर देखा जा सकता है। वे पूर्व सांसदों और पार्टी नेताओं के साथ गपियाते नजर आते हैं। भाजपा की गुटीय राजनीति में वे लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज के करीबी रहे हैं। आडवाणी-सुषमा खेमे का एक तरह से सफाया हो गया है। ऐसे में बैस का भी किनारे लगना स्वाभाविक था। अब वे भले ही सांसद नहीं रह गए हैं, लेकिन वे कोई अहम जिम्मेदारी संभालने के उत्सुक हैं। सात बार के इस सांसद के करीबी लोगों को उम्मीद है कि उन्हें किसी प्रदेश का राज्यपाल बनाया जाएगा।  सेंट्रल हॉल में उनकी सक्रियता को इसी रूप में देखा जा रहा है। 
हालांकि पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में बर्खास्त सांसद प्रदीप गांधी भी अक्सर सेंट्रल हॉल में देखे जाते हैं। कुछ समय पहले प्रदीप गांधी, राहुल गांधी के साथ बतियाते दिखे थे। लोकसभा चुनाव के दौरान अटकलें लगाई जा रही थीं कि प्रदीप गांधी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। मगर कांग्रेस उन्हें लेने के इच्छुक नजर नहीं आई। भाजपा ने भी उनकी कोई परवाह नहीं की। ऐसे में राहुल गांधी के संग फोटो खिंचाकर प्रदीप गांधी चर्चा में जरूर आ गए। जब प्रदीप गांधी संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत मांगते वीडियो में कैद हुए थे, और उनकी सदस्यता बर्खास्त हुई थी, तो उन्होंने अपने गायत्री परिवार का साहित्य लेकर संसद के हर कार्यक्रम में जाना शुरू किया था और भूतपूर्व सदस्य होने के नाते कोई उन्हें मना भी नहीं कर सकते थे। इस तरह वे खबरों में बने रहे थे। ऐसे किसी विवाद में फंसे बिना भी रमेश बैस संसद भवन में बैठकर चर्चा में तो बने हुए हैं ही।

शत्रुओं पर विजय के लिए?

रायपुर उत्तर के पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी कामाख्या देवी के दर्शन के लिए असम गए हैं। कामाख्या पीठ तंत्र साधना के लिए मशहूर है। राजनेता शत्रुओं पर विजय के लिए यहां तंत्र साधना कराते हैं। सुंदरानी भी यहां परिवार के साथ पूजा-पाठ में लगे हैं। विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद पार्टी में उनकी स्थिति अच्छी नहीं रह गई है। उनकी पहचान सबसे बड़े व्यापारी नेता के रूप में रही है और एक तरह से चेम्बर ऑफ कॉमर्स की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। मगर, अध्यक्ष जितेन्द्र बरलोटा के आगे वे कमजोर दिखने लगे हैं। 

पार्टी के भीतर हाल यह है कि नगरीय निकाय चुनाव में उन्हें तगड़ी चुनौती मिलने वाली है। रायपुर उत्तर से टिकट के दावेदार रहे आरडीए के पूर्व अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव, छगन मुंदड़ा और राजीव अग्रवाल जैसे नेता रायपुर उत्तर के ज्यादा से ज्यादा वार्डों में अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए अभी से व्यूह रचना तैयार कर रहे हैं ताकि विधानसभा चुनाव के लिए उनकी जमीन तैयार हो सके। यहां सांसद सुनील सोनी का दखल तो रहेगा ही, ऐसे में श्रीचंद के लिए आगे की राजनीति आसान नहीं रह गई है। पिछले दिनों उन्होंने बलपूर्वक ओवरब्रिज का उद्घाटन कर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश भी की, लेकिन इसमें वे नाकाम रहे। इस प्रदर्शन में भाजपा कार्यकर्ताओं से ज्यादा मीडिया के लोग थे। ऐसे में पार्टी के भीतर और बाहर अपने विरोधियों पर जीत हासिल करने के लिए अदृश्य ताकतों की जरूरत होगी। ऐसे में कामाख्या देवी के दर्शन से उनकी इच्छापूर्ति होती है या नहीं, देखना है।

खाने की बर्बादी रोकने
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसा वीडियो तैर रहा है जिसमें किसी दावत के बीच जूठी प्लेट रखने की जगह पर एक आदमी खड़ा है और वह लोगों को खाना जूठा छोडऩे से रोक रहा है, और जिद कर रहा है कि वे खाना खत्म करें। ऐसे में जाहिर है कि लोग अगली बार अधिक खाना लेकर जूठा छोडऩा भूल ही जाएंगे। इस बीच एक बर्तन निर्माता ने एक ऐसी थाली सामने रखी है जिसमें हिज्जे की एक मामूली गलती से परे बाकी बात एक अच्छी नसीहत है। अब इस थाली की फोटो सोशल मीडिया पर तैर रही है और अगर यह चलन में आती है, तो देखना है कि इसका असर लोगों पर होता है, या नहीं। लेकिन थाली से परे चीनी मिट्टी या प्लास्टिक जैसी प्लेटों पर भी अगर ऐसा ही लिखा हो, तो खाने की बर्बादी खासी रूक सकती है। 
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Date : 07-Jul-2019

पिछले दिनों संसद भवन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के साथ मेल मुलाकात पर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर बुरी तरह ट्रोल हो गए। मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने दोनों को काफी सुनाया। 

ओवैसी कट्टरपंथी मुस्लिम नेता माने जाते हैं और वे पीएम मोदी के घोर आलोचक हैं। भाजपाई उन्हें गोवध समर्थक और पाक परस्त तक करार देते हैं। ऐसे में प्रेमप्रकाश और अजय का उनके साथ हँस-हँसकर बात करने को समर्थक पचा नहीं पा रहे हैं। वैसे सेंट्रल हॉल में पक्ष-विपक्ष के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और आपस में बातचीत करते हैं। ऐसे में प्रदेश के नेताओं की ओवैसी से चर्चा कोई गलत भी नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि मुलाकात के दौरान पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी थे, लेकिन जैसे ही किसी को मोबाइल से तस्वीर लेते देखा, वे चुपचाप किनारे हो गए। तस्वीर में ओवैसी के साथ प्रेमप्रकाश-अजय के अलावा शिवरतन शर्मा भी कैद हो गए। भाजपाईयों ने उन्हें भी जमकर कोसा।

मुकेश गुप्ता की लुकाछिपी
नान-फोन टैपिंग प्रकरण में जांच का सामना कर रहे निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता तीसरी बार भी ईओडब्ल्यू में पेश नहीं हुए। उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देकर गैरहाजिर रहने की सूचना भिजवा दी। ईओडब्ल्यू अब उन्हें और समय देने के लिए तैयार नहीं है। मुकेश गुप्ता पर विवेचना में सहयोग नहीं करने का आरोप लग रहा है और ईओडब्ल्यू इसको लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है।

सुनते हैं कि मुकेश गुप्ता का गैरहाजिर रहना बेवजह नहीं है। बेटी के एडमिशन के लिए भागदौड़ स्वाभाविक है। इसके चलते व्यस्तता भी समझ में आ रही है। लेकिन यहां आने के बाद मुकेश गुप्ता कुछ और समस्या में घिर सकते हैं। चर्चा है कि मिक्की मेहता प्रकरण की फाइल तैयार है। इस प्रकरण पर मुकेश गुप्ता के खिलाफ एक और एफआईआर हो सकती है। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है। इन सबसे बचने के लिए मुकेश गुप्ता ईओडब्ल्यू में पेश नहीं हो रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि वे जल्द ही एक बार फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और कोर्ट से राहत के लिए प्रयास करेंगे। खैर, अगले हफ्ते हाईकोर्ट में कई प्रभावशाली लोगों के प्रकरणों पर सुनवाई होगी। लोगों की निगाहें इन पर लगी हुई है। 

बड़ी महंगी शांति
छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज घटना हुई जिसमें सरकार की बड़ी फजीहत हो सकती थी। मामला चूंकि केंद्र सरकार से जुड़ा हुआ था, इसलिए दिल्ली में बैठे छत्तीसगढ़ के एक भूतपूर्व अफसर ने केंद्र में अपने संबंधों का इस्तेमाल करके इस मामले को शांत किया। लेकिन इस किस्म की शांति खासी महंगी पड़ती है, और पड़ी भी। इस मामले में सबसे अधिक हैरान यह बात करती है कि कैसे बुरे संबंधों के चलते हुए भी कैसी बड़ी मदद की गई। लेकिन पैसों में बड़ी ताकत होती है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Jul-2019

धनिक वर्ग से सरकारी सब्सिडी छोडऩे की अपेक्षा रहती है। पीएम की अपील पर लाखों लोगों ने रसोई गैस पर सब्सिडी छोड़ी भी है। लेकिन प्रदेश में कई नामी-गिरामी लोग सब्सिडी लेने में आगे रहे हैं। हार्टीकल्चर विभाग से तो बड़े पैमाने पर प्रभावशाली लोगों ने सब्सिडी हासिल की है।

विभाग से पॉली हाउस बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी दी जाती रही है। वर्ष-2015-16 में एक सीनियर आईएएस ने अपने फॉर्म में पॉली हाउस बनाने के लिए लाखों रूपए की सब्सिडी हासिल की। खुद कृषि विभाग के मुखिया रहे हैं। खास बात यह है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी अपनी पत्नी के नाम पर ली है। जबकि पत्नी भी सरकारी मुलाजिम हैं। विभाग के जानकार लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि लाखों रुपये महीने तनख्वाह पाने वाले लोग अपने फॉर्म पर काम करने के लिए दर्जनों सरकारी कर्मचारियों को जिस तरह झोंककर रखते आए हैं वह भी सरकार में फेरबदल होने के बाद ही बंद हो पाया है।
न सिर्फ अफसर बल्कि प्रदेश के तीन बड़े उद्योगपतियों ने भी खुद को किसान बताकर पॉली हाउस बनाने के लिए सब्सिडी ली है। कुछ लोगों ने सूचना के अधिकार के जरिए प्रभावशाली- किसानों को मिलने वाली सब्सिडी की सूची हासिल कर ली है। देर-सवेर यह मामला गरमा सकता है। वैसे भी, निर्माण विभाग की तरह कृषि विभाग भी पिछले 15 सालों में भ्रष्टाचार को लेकर कुख्यात रहा है। सरकार बदलने के बाद कृषि विभाग में भ्रष्टाचार के कई प्रकरणों पर ईओडब्ल्यू-एसीबी ने जांच शुरू की है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Jul-2019

कांग्रेस विधायक मोहितराम की पार्टी-सरकार में पूछ परख बढ़ गई है। वजह यह है कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपने विधानसभा क्षेत्र पाली तानाखार से कांग्रेस प्रत्याशी को करीब 61 हजार से अधिक मतों से बढ़त दिलाई, जिसके कारण पार्टी कोरबा सीट जीतने में कामयाब रही। वैसे प्रदेश में सबसे ज्यादा बढ़त वैशाली नगर सीट से भाजपा प्रत्याशी को मिली थी उन्हें करीब 63 हजार से अधिक वोटों की बढ़त मिली। ऐसे में जब मोदी फैक्टर के चलते जहां सीएम और ज्यादातर मंत्री अपने क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी को बढ़त नहीं दिला पाए, इन सबके बीच अकेले विधानसभा सीट पाली तानाखार से भारी बढ़त के सहारे कोरबा सीट जीतने पर मोहितराम को महत्व मिलना स्वाभाविक है। 

हाल यह है कि सीएम और बाकी मंत्री उनकी अनुशंसाओं-सिफारिशों का विशेष ध्यान रख रहे हैं। सुनते हैं कि पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव ने तो एक कदम आगे जाकर यह तक कह दिया है कि सबसे ज्यादा मोहितराम के प्रस्ताव स्वीकृत किए जाएंगे। विधायकों में अपने यहां के पंचायतों में काम कराने की होड़ मची है। सभी विधायक अपने क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा काम स्वीकृत कराना चाहते हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन पर मोहितराम को तवज्जो दिया जाना गलत नहीं है।

उस दौर में भी गांधी-नेहरू!
राजधानी रायपुर में भाजपा सरकार के कार्यकाल में कलेक्टरी करने वाले ठाकुर राम सिंह ने अपने दफ्तर में कुर्सी के ठीक पीछे गांधी-नेहरू की बड़ी सी तस्वीर लगा रखी थी जो कि वे अपने पिछले हर दफ्तर में भी लगाते थे, और साथ लिए चलते थे। जिस भाजपा की नजर में नेहरू आजादी के बाद से अब तक की सभी सरकारी गलतियों के अकेले गुनहगार रहे, उनकी तस्वीर को इस तरह खुलकर लगाकर रखना कम हौसले की बात नहीं थी। दफ्तर में उनकी जितनी तस्वीरें खिंचती थीं, सबमें उनके पीछे गांधी-नेहरू दिखते थे। आज तो प्रदेश में कांगे्रस की सरकार है, और देखना है कि गांधी-नेहरू की इज्जत किस-किस दफ्तर में है। राज्य सरकार को कम से कम अपने सारे अमले को गांधी-नेहरू की दो-चार किताबें इस उम्मीद के साथ तोहफे में देनी चाहिए कि वे इस सरकार की सोच को कुछ तो समझ सकें। 
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Date : 02-Jul-2019

पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा का रिजल्ट जल्द घोषित करने के लिए पुलिस महकमे पर दबाव है। करीब दो हजार से अधिक आरक्षकों की भर्ती के लिए पिछली सरकार में प्रक्रिया शुरू हुई थी और रिजल्ट बनने तक चुनाव आचार संहिता लागू हो गई थी। हाईकोर्ट ने भी सारी प्रक्रिया पूरी कर दो महीने के भीतर रिजल्ट घोषित करने के आदेश दिए हैं। मगर सरकार  से जुड़े लोग पूरी प्रक्रिया ही निरस्त कर नए सिरे से भर्ती चाहते हैं। 

सुनते हैं कि आरक्षकों की भर्ती के एवज में भारी लेन-देन हुआ था। चर्चा है कि इसमें एक बड़े बंगले के कई लोगों ने जमकर माल भी बनाया। अब सरकार बदल गई, तो पूरी प्रक्रिया निरस्त करने के लिए भी दबाव बना है। जो लोग नियुक्ति के लिए काफी कुछ दे चुके हैं, उन्हें मालूम है कि उनका चयन हो चुका है, ऐसे लोग रकम डूबने की आशंका के चलते रिजल्ट जल्द जारी करने के लिए भागदौड़ कर रहे थे। इन सबने हाईकोर्ट के आदेश के बाद राहत की सांस ली है। 

हम साथ-साथ नहीं हैं...
भाजपा विधायकों का एक खेमा पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की अगुवाई में दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। उनके साथ अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल, शिवरतन शर्मा और प्रेमप्रकाश पाण्डेय भी हैं। इन सबों ने अपने पुराने साथी केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल से मुलाकात की। वे पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा से भी मिलने वाले हैं। नड्डा यहां प्रदेश के प्रभारी रहे हैं और सभी से बेहतर संबंध भी हैं। खास बात यह है कि प्रदेश के सभी नेता अब साथ-साथ दिख रहे हैं। 

हालांकि ये सभी एक खेमे के हैं, लेकिन सरकार में थे, तो इनमें से अजय चंद्राकर और शिवरतन शर्मा, सीएम रमन सिंह के ज्यादा नजदीक दिखते थे, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान जब रमन खुलकर धरमलाल कौशिक के पक्ष में दिखे, तो ये दोनों उनसे छिटक गए। पिछले दिनों मप्र के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के यहां भोपाल जाने का कार्यक्रम बना, तो बृजमोहन खेमा एक साथ गया। इसके अगले दिन रमन सिंह, धरम कौशिक और एक-दो अन्य लोगों को लेकर गए। विधानसभा चुनाव में हार के बाद साफ नजर आने लगा है कि हम साथ-साथ नहीं हैं...।

मरीज मर रहे और प्रेम चल रहा
प्रदेश के एक बड़े सरकारी अस्पताल के कर्ता-धर्ता चिकित्सक को आनन-फानन में हटा दिया गया। सरकार अस्पताल की दशा सुधारने के लिए जोर दे रही थी, लेकिन चिकित्सक महोदय नर्स के साथ प्यार की पींगें बढ़ाने में व्यस्त थे। ड्यूटी के दौरान भी दोनों घंटों कमरे में बंद रहते थे। अस्पताल में चिकित्सकों की कमी के कारण मरीज तो परेशान थे ही, कर्मचारी भी हलाकान थे। घपले-घोटालों की वजह से अस्पताल पहले ही सुर्खियों में रहा है। अब चिकित्सक-नर्स के प्रेम के किस्से बाहर आने लगे। धीरे-धीरे मंत्री तक बात पहुंच गई, उन्होंने तुरंत चिकित्सक हटाने का फरमान जारी कर दिया। अब चिकित्सक की पोस्टिंग ऐसी जगह कर दी गई है जहां उन्हें खलल डालने वाला कोई नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Jul-2019

छत्तीसगढ़ राज्य के दवा निगम में भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं। सरकार ने निगम में भ्रष्टाचार की जांच का जिम्मा ईओडब्ल्यू को सौंप दिया है। चर्चा है कि निगम के पूर्व एमडी का करीबी दुर्ग का एक ट्रांसपोर्टर भी भ्रष्टाचार के लपेटे में आ सकता है। सुनते हैं कि एमडी ने ट्रांसपोर्टर को दवा सप्लायर बना दिया था। और ट्रांसपोर्टर ने करोड़ों की दवा सप्लाई भी की। अब प्रकरण की जांच शुरू हो रही है, तो जांच-पड़ताल को प्रभावित करने की हर स्तर पर कोशिश हो रही है। इसके लिए कांकेर जिले के एक कांग्रेस विधायक की मदद भी ली जा रही है। ट्रांसपोर्टर का कांकेर जिले में बड़ा काम है और कांग्रेस विधायक को अक्सर उनके साथ देखा जा सकता है। अब विधायक महोदय, जांच-पड़ताल की रफ्तार को धीमा करने में कितनी मदद कर पाते हैं, यह देखना है, वैसे एमडी रहे हुए इस आईएफएस को अब बाकी जिंदगी, और कई पीढिय़ों के लिए कोई काम करने की जरूरत रह नहीं गई है, बस इतना सब कुछ बाहर रह जाए, और खुद भीतर चला जाए, ऐसा न हो इसी की कोशिश चल रही है।

राहुल पूछते हैं कल्लूरी के बारे में
सरकार में सबसे ऊपर के लोगों के बीच यह चर्चा होती है कि पूरे छत्तीसगढ़ के पुलिस अफसरों में राहुल गांधी अकेले कल्लूरी के बारे में ही पूछताछ करते हैं क्योंकि देश के अलग-अलग बहुत से तबकों के लोगों ने राहुल गांधी से कई बार बस्तर में कल्लूरी के काम के बारे में बताया है। अब जब तीनों एडीजी हो गए हैं, तो दुर्ग में आईजी की कुर्सी पर एडीजी हिमांशु गुप्ता हैं, और चुनाव के पहले के प्रभारी आईजी, डीआईजी डांगी भी वहीं पर उन्हीं के दफ्तर में हैं जिन्हें राजनांदगांव जिले का प्रभार दिया गया है। एक ही आईजी रेंज में अधिक काम न होने से हो यह रहा है कि डांगी बच्चों की पे्ररणा के लिए लेख लिखकर चारों तरफ भेज रहे हैं। यह एक अलग बात है कि राजधानी रायपुर में पुलिस ने जो एक नया स्कूल शुरू करने की तैयारी की थी, और जिसके लिए डीएवी नाम के शैक्षणिक संस्थान से समझौता हो रहा था, वह स्कूल अधर में लटका हुआ है। डीएवी की अपनी स्कूलों का खराब नतीजा देखते हुए मुख्यमंत्री की बैठक में इसका नाम खारिज कर दिया गया, और अब पुलिस महकमा अपने भीतर से एसपी के दर्जे का प्राचार्य और बाकी नीचे के कर्मचारी ढूंढ रहा है ताकि स्कूल शुरू हो सके। रतनलाल डांगी को बच्चों की जितनी फिक्र है उसे देखते हुए स्कूल का प्रिंसिपल बनाना भी अच्छा काम हो सकता है।

मीडिया की जुबान...
मीडिया की जुबान बड़ी तेजी से जनता की असल जिंदगी में भी इस्तेमाल होने लगती है। अभी रायपुर के एक मॉल में कपड़ों के एक बड़े ब्रांड की सेल लगी हुई है और एक परिवार में लड़की ने पिता से कहा कि उसे वहां से कुछ कपड़े दिलवा दें। पिता खुशी-खुशी तैयार हुए, तो बेटा खड़ा हो गया कि एक ब्रांड के जूतों पर भी डिस्काउंट चल रहा है, और वह भी मॉल चलेगा, जूते लेने के लिए। अब घर में अकेले बच गई महिला कहां पीछे रहती, उसने भी अपनी कई जरूरतों पर उसी मॉल में डिस्काउंट बताया, और कहा कि वह भी साथ जाएगी।
यह सब देखकर हड़बड़ाए हुए आदमी ने कहा-इसी को मॉब-लिंचिंग कहते हैं...

दुर्ग पुलिस में अटपटी बातें

पुलिस विभाग में लोगों की तैनाती में कई दिक्कतें चल रही हैं। अब दुर्ग में लोकसभा चुनाव के पहले डीआईजी रतन लाल डांगी को आईजी का काम दिया गया था। लेकिन चुनाव के दौरान यह नहीं चलता, इसलिए हिमांशु गुप्ता को आईजी बनाकर भेजा गया जिन्हें कि उस वक्त तक प्रमोशन पाकर एडीजी हो जाना था। खैर, प्रमोशन लेट होता गया और डीपीसी हो जाने के बाद भी महीनों तक वह फाईल रूकी रही क्योंकि जिन तीन आईजी को एडीजी होना था, उसमें से एक, एसआरपी कल्लूरी की शोहरत देश भर में ऐसी थी कि सरकार लोकसभा चुनाव के पहले उन्हें प्रमोशन देना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि हिमांशु गुप्ता और जीपी सिंह भी महीनों तक आईजी ही बने रहे, और फाईल पर उनका प्रमोशन प्रस्तावित होकर पड़े रहा।

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Date : 30-Jun-2019

आखिरकार मोहन मरकाम की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो गई। यह सब कुछ आसान नहीं था। बस्तर से जब प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बात आई, तो सीएम भूपेश बघेल ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया को विश्वास में लेकर पार्टी हाईकमान को मरकाम का नाम सुझाया। मगर, हाईकमान इस मसले पर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव को लेकर निश्चिंत होना चाहती थी। सुनते हैं कि सिंहदेव से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के वेणुगोपाल ने चार बार फोन पर बात की। ऑर्डर निकलने से पहले उन्हें फिर फोन किया और पूछा कि क्या मरकाम के नाम पर आपत्ति तो नहीं है? सिंहदेव ने साफ शब्दों में कहा कि भूपेशजी की पसंद पर उनकी पूरी रजामंदी है। तब कहीं जाकर मरकाम का ऑर्डर निकल पाया। हाईकमान इस बात को लेकर ज्यादा खुश है कि विधानसभा चुनाव से पहले वाली भूपेश-सिंहदेव की जोड़ी अभी भी कायम है। दोनों के बीच अंडरस्टैडिंग बनी हुई है। जबकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता आपस में टकरा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि सिंहदेव कई मौकों पर मीडिया के साथ बातचीत में अपने दिल-दिमाग की बातों को इतने साफ-साफ खुलासे से कह देते हैं कि ऐसा लगता है कि उनके मन में भूपेश के खिलाफ कुछ है। अब जैसे लोकसभा नतीजों के पहले वे बार-बार यह बोलते रहे कि अगर 11 में से सात सीटें कांगे्रस को न मिलीं तो यह कांगे्रस की हार होगी। इसके अलावा उन्होंने सरगुजा में कांगे्रस की हार के बारे में भी यह साफ-साफ कहा कि वहां की जनता इस बात से निराश थी कि उन्हें (सिंहदेव को) मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था। ऐसी छोटी-छोटी बातें उनके मिजाज का हिस्सा है, और भूपेश बघेल से बुनियादी मुद्दों पर उनका मतभेद नहीं है ऐसा लगता है।

दारू बचाने काम आया धर्म
भूपेश सरकार प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू करने की दिशा में कदम उठा रही है। और इस पर सुझाव देने के लिए पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा की अध्यक्षता में प्रमुख राजनीतिक दलों के विधायकों की समिति का गठन किया गया है। मगर, दिक्कत यह है कि प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा समिति के सदस्य के लिए कोई नाम नहीं दे रही है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय नशा मुक्ति दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में सत्यनारायण शर्मा ने आरोप लगाया कि विपक्ष शराबबंदी के लिए गंभीर नहीं है। उनका मानना है कि सिर्फ सरकारी प्रयासों से शराबबंदी सफल नहीं हो सकती है। गुजरात और बिहार, जहां पूर्ण शराबबंदी है वहां पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है। 

सत्यनारायण शर्मा ने बताया कि इन राज्यों में शराब तस्करी के लिए नए-नए तरीके निकाले जा रहे हैं। उन्होंने किस्सा सुनाया कि राजस्थान में उनके कुछ परिचित युवा कार से गुजरात जाने के लिए निकले। रास्ते में उन्होंने एक कैरेट बीयर डिक्की में रखवा लिया। वे जब गुजरात सीमा पर पहुंचे, तो उन्हें एहसास हुआ कि वहां शराबबंदी है। दोनों राज्यों की सीमा पर जबदस्त चेकिंग हो रही थी। युवकों को अपनी बीयर बरामद होने का डर था। तभी उन्होंने एक रास्ता निकाला। उनमें से एक जो पतला-दुबला था उसके कपड़े निकलवा दिए और बिना कपड़ों के कार में बिठा दिया। बाकी लोग चेकिंग कर रहे पुलिस कर्मियों के पास पहुंचे और कहा कि एक धार्मिक व्यक्ति बैठे हैं, जल्दी चेकिंग कर ली जाए ताकि उन्हें दिक्कत न हो। पुलिस कर्मियों ने कार में समीप आए और बिना कपड़ों में बैठे युवक को देखा और नमस्कार कर बिना चेकिंग कर कार जाने दिया। इस तरह पुलिस की नजरों से अपनी बीयर बचा ली।

मुकेश गुप्ता के लोग तैनात
मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के जिले में मौजूद दुर्ग आईजी दफ्तर की एक दिलचस्प बात यह भी है कि यहां मौजूद एक डीएसपी, सरकार के निशाने पर चल रहे आईपीएस मुकेश गुप्ता का एकदम खास है, और मुकेश गुप्ता के खिलाफ चल रही जांच का एक बड़ा हिस्सा दुर्ग जिले में ही है। विभाग के एक पुराने लेकिन छोटे अफसर का कहना है कि मुकेश गुप्ता ने अपनी पूरी नौकरी में रायपुर के सिविल लाइन थाने, और दुर्ग के एक थाने में किसी भी समय अपनी मर्जी के खिलाफ तैनाती नहीं होने दी क्योंकि उनसे जुड़े मामले जब भी खुलते, इन्हीं दोनों थानों में खुलते। आज भी इन दोनों थानों में उन्हीं के भरोसे के लोग तैनात हैं, और आईजी ऑफिस में एक डीएसपी भी। उनके अलावा एसीबी के दफ्तर में भी मुकेश गुप्ता के बहुत भरोसे के कर्मचारी अभी भी हैं, और बातें लीक करते हुए पकड़ाने पर इसमें से एक की अभी वर्दी में ही उस दफ्तर में पिटाई हुई है, और वहां से हटा दिया गया है।

अब पुलिस विभाग में डीजी गिरिधारी नायक के रिटायर होने, और तीन एडीजी बनने के बाद नए सिरे से तैनाती का बड़ा काम खड़ा हुआ है, इसी वक्त शायद दीपांशु काबरा की बारी भी आए जो कि पुलिस मुख्यालय में फिलहाल बिना काम के बिठाए गए आईजी हैं।
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Date : 29-Jun-2019

बिलासपुर के आबकारी विभाग के एक बाबू पर पिछली सरकार के वक्त एसीबी का छापा पड़ा था। बाबू वैसे तो आबकारी विभाग के मालिकों का चहेता था, और उसका बड़ा दबदबा था, वह खुलेआम चखना की दुकानें चलाने का हक बेचता था, और सबसे बड़ी बात यह कि एसीबी ने अपने छापे में उसके पास करोड़ों की संपत्ति पकड़ी थी। मामले के सुबूत पुख्ता थे, और उसे अदालत तक ले जाने की तैयारी चल रही थी। इस बीच अभी अचानक एसीबी के मुखिया ने उसकी फाईल बुलवाई, और उसके खिलाफ मामले को खारिज कर दिया। खुद विभाग के लोग यह जानकर हक्का-बक्का रह गए कि यह क्या हो गया? मीडिया के लोगों ने एसीबी के एडीजी से इस बारे में पूछा, तो उन्हें इसका सिर-पैर कुछ नहीं मालूम था। और उनकी जानकारी से परे ऊपर-ऊपर यह फाईल सीधे डीजी तक पहुंची, और वहां इस प्रकरण के खात्मे का निर्णय लिया गया, आनन-फानन आदेश जारी कर दिया गया। इसी आदेश में फाईल की बाकी जानकारी भी है कि अचल संपत्ति के 172 पन्ने, बैंक/डाकघर के 118 पन्ने, एफडी के 23 पन्ने, एलआईसी के 4 पन्ने वगैरह-वगैरह। हालत यह है कि जिन लोगों ने भाजपा सरकार के दौरान बरसों तक ऐसे भ्रष्ट और कमाऊ विभाग पर राज किया, वे लोग अपने खिलाफ बने-बनाए भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति के मामले से इस तरह छुटकारा पा रहे हैं, और आनन-फानन पा रहे हैं। 

पिछले कुछ समय से एसीबी को लेकर प्रदेश के कमाऊ विभागों में खुली चर्चा है कि सरगुजा और बिलासपुर संभाग के लोगों को बचाने के लिए प्रदीप सिंह नाम का एक एजेंट नियुक्त किया गया है, और बस्तर के लोगों को बचाने के लिए नागेश नाम का। ऐसी चर्चा है कि जिस तरह वन-डे क्रिकेट के आखिरी पांच ओवर में सिर्फ चौके-छक्के मारे जाते हैं, इस दफ्तर में भी आखिरी के महीनों में उसी रफ्तार से रन बन रहे हैं। भाजपा सरकार के समय फंसे हुए सारे भ्रष्ट सरकारी लोग किसी मॉल की सेल की तरह के इस मौसम का फायदा उठा सकते हैं। वैसे जिस हड़बड़ी में डिस्काऊंट पर बेकसूरी के सर्टिफिकेट बेचे जा रहे हैं, वह हड़बड़ी अदालत में हो सकता है कि खड़ी न हो पाए, और कोई जज ऐसे खात्मे को मानने से इंकार कर दे। 

रहस्यमय वीआईपी लिस्टें 
राजधानी नया रायपुर में एक गोल्फ सिटी बनाने के लिए पिछली सरकार के मंत्रिमंडल ने एक ऐसा बड़ा जमीन आबंटन किया था जो चौंकाने वाला था, लेकिन उसकी फाईल पुख्ता बनाई गई थी, इसलिए नई सरकार भी उसमें कुछ कर नहीं पा रही है। लेकिन अगर सरकार इस गोल्फ सिटी में बनाए गए करोड़ों के बंगलों को पाने वाले लोगों की लिस्ट देखे, तो उसमें उस वक्त के अधिकतर ताकतवर अफसरों के नाम मिल जाएंगे, या ऐसे कोई दूसरे नाम मिल जाएंगे जिनके पीछे मालिकाना हक उन्हीं ताकतवर अफसरों का है। इनमें से एक बड़े ताकतवर अफसर को तो भूपेश सरकार ने किनारे कर दिया है, लेकिन लिस्ट खासी लंबी है। यह कुछ उसी किस्म की लिस्ट है जिस तरह चर्चित और विवादास्पद, अब गुजर चुके बिल्डर संजय बाजपेयी की कॉलोनी स्वागत विहार में प्लॉट पाने वाले अफसरों और उनके रिश्तेदारों के नाम थे। वही वजह थी कि वह लिस्ट हमेशा दबी रही, और कभी सामने नहीं आ पाई। सूचना का अधिकार भी इस अड़ंगे को पार करके लिस्ट तक नहीं पहुंच पाया। इसी तरह जहां-जहां सिर्फ अफसरों या जजों के लिए कॉलोनियां बनीं, मंत्रियों और विधायकों के लिए कॉलोनियां बनीं, वहां-वहां तमाम फाईलें, और तमाम लिस्टें जनता की पहुंच से बाहर ही रहीं। 

तीर-कमान, और चेतावनी
बस्तर में हुई अवैध कटाई के पीछे एनएमडीसी है, या कोई और, इसकी जांच का जिम्मा वन विभाग को दिया गया है। जब जांच अफसर ऐसे नक्सल इलाके में पहुंचे, तो उनके पहले दो दिन से वहां वन विभाग के स्थानीय छोटे कर्मचारी जा रहे थे। बस्तर में तैनात एक अफसर ने बताया कि जब बड़े अफसर कटाई देखने पहुंचे, तो कुछ ही देर में तीर-कमान लिए हुए आदिवासियों की टोलियां वहां पहुंचने लगीं, और जांच दल के साथ-साथ कुछ दूरी से चलने लगीं। इसके बाद उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों को बुलाकर कहा कि यहां आने से, और अफसरों को लाने से मना किया गया था, उसके बावजूद लेकर आना ठीक नहीं है। उनके तेवर देखते हुए स्थानीय कर्मचारियों ने आगे बढऩा खतरनाक बताया और कहा कि साहब लोग तो लौट जाएंगे, उन्हें तो इसी इलाके में जीना है। कटाई की जांच पूरी नहीं हो पाई, और पूरी टीम को लौटना पड़ा।

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Date : 28-Jun-2019

दंतेवाड़ा और बस्तर विधानसभा उपचुनाव संभवत: अक्टूबर में होंगे। विधायक भीमा मंडावी की हत्या के चलते दंतेवाड़ा सीट खाली हुई है, जबकि बस्तर सीट विधायक दीपक बैज के सांसद बनने की वजह से  रिक्त हुई है। बस्तर से प्रत्याशी कौन होगा, यह दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस में अभी तय नहीं है, लेकिन दंतेवाड़ा से दोनों ही दल महिला प्रत्याशी उतार सकती हैं। 

दंतेवाड़ा से भाजपा दिवंगत विधायक भीमा मंडावी की पत्नी ओजस्वी मंडावी को टिकट दे सकती है। पार्टी के बड़े नेताओं ने मंडावी के घर जाकर इस आशय के संकेत दे भी दिए हैं। जबकि कांग्रेस दिवंगत पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा की पत्नी पूर्व विधायक देवती कर्मा को फिर चुनाव मैदान में उतार सकती है। देवती कर्मा पिछली बार विधानसभा चुनाव में करीब साढ़े 7 सौ वोटों से चुनाव हार गई थी। इस हार के पीछे भी जिला प्रशासन की भूमिका अहम रही थी। 

कर्मा परिवार हार के लिए तत्कालीन कलेक्टर सौरभ कुमार को अभी भी कोसता है। चर्चा है कि सौरभ कुमार ने कर्मा परिवार में फूट डलवाने की कोशिश की थी। देवती के  बड़े बेटे छविन्द्र कर्मा बगावत कर चुनाव मैदान में उतर गए थे। बाद में उन्हें मैदान में हटने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को हस्तक्षेप करना पड़ा। तब तक काफी माहौल खराब हो चुका था। खैर, इस बार कर्मा परिवार एकजुट दिख रहा है और सीट पर कब्जा करने के लिए अभी से मेहनत करना शुरू कर दिया है। 

यह बदला तो नहीं...
अकसर रमन सिंह, भूपेश बघेल सरकार पर बदलापुर की राजनीति का आरोप लगाते हैं, पर ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो रमन सिंह की सेवा में तैनात कर्मचारी हरि बहादुर को सरकार वापस बुला लेती। बहादुर पूर्व सीएम-परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं, और आवासीय आयुक्त कार्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। वे पिछले 15 साल से रमन सिंह का ख्याल रख रहे हैं। रमन सिंह, सीएम पद से हट गए, लेकिन बहादुर उनके यहां अभी भी सेवाएं दे रहा है। सरकार ने भी उदारतापूर्वक उनकी सेवाएं जीएडी को सौंपने के आदेश दिए हैं, ताकि  प्रतिनियुक्ति पर रमन सिंह के साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं आए। 
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Date : 27-Jun-2019

नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की खोज चल रही है। चूंकि स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने बस्तर से अध्यक्ष बनाने की वकालत की थी। यह तकरीबन तय माना जा रहा है कि बस्तर के नेता को ही प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी जाएगी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी इस सिलसिले में पूर्व मंत्री मनोज मंडावी और कोंडागांव के दूसरी बार के विधायक मोहन मरकाम का इंटरव्यू ले चुके हैं। दोनों में से अध्यक्ष कौन बनेगा, इसको लेकर पार्टी हल्कों में कई तरह की चर्चा है। सुनते हैं कि स्वास्थ्य मंत्री श्री सिंहदेव, पूर्व मंत्री मनोज मंडावी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में बताए जाते हैं। जबकि सीएम भूपेश बघेल, मोहन मरकाम का नाम आगे किया है। देखना है कि हाईकमान, दोनों में से किसकी राय को महत्व देता है। लेकिन इनमें से किसी के भी प्रदेश अध्यक्ष बनने से यह होगा कि कांगे्रस और भाजपा दोनों के प्रदेश अध्यक्ष बस्तर के रहेंगे, और राज्य सरकार और केंद्र सरकार, दोनों में सरगुजा से मंत्री रहेंगे। प्रदेश के दो आदिवासी इलाके बिल्कुल अलग-अलग किस्म के हैं, और इनकी राजनीति भी इनको अलग-अलग मानकर ही तय की जाती है। इसके पहले बस्तर से प्रदेश भाजपा के कोई अध्यक्ष नहीं बने थे, और वहां से मंत्री ही मंत्री रहते थे। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ भाजपा के अध्यक्ष अमूमन सरगुजा से आते थे। 

ताकतवरों की जांच...
प्रदेश के एक डीजी, गिरधारी नायक ने मुकेश गुप्ता के खिलाफ एक लंबी जांच रिपोर्ट तो बना ली है, लेकिन ऐसी चर्चा है कि उसके आधार पर अगर मुकेश गुप्ता पर कोई कार्रवाई करनी हो, तो उस पर सरकार को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। जांच रिपोर्ट में बहुत सी बातें ऐसी भी जुड़ जाती हैं जिनको अदालत में साबित करना मुमकिन नहीं रहता है। इसीलिए जांच रिपोर्ट का वजन मुकदमे के मुकाबले बहुत कम रहता है। अब सरकार के सामने एक दिक्कत यह है कि मुकेश गुप्ता, अजीत-अमित जोगी, पुनीत गुप्ता के खिलाफ इतने सारे मामले खड़े हो गए हैं कि उन्हें पहले तो जांच में, और फिर अदालत में किसी तर्कसंगत-न्यायसंगत नतीजे तक कैसे पहुंचाया जाए? एक चर्चा यह भी सुनाई पड़ती है कि जांच में लगे हुए कई अफसर किसी और जगह जाने की फिराक में भी हैं। जिन लोगों के खिलाफ मामले हैं, उन्हें इतने बड़े-बड़े वकीलों की मदद हासिल है, या जोगी पिता-पुत्र हैं जो कि मुकदमेबाजी के बड़े लंबे तजुर्बेकार हैं, इसलिए वे बरसों तक किसी फैसले से दूर चल सकते हैं। जांच में लगे अफसरों को भी उम्मीद है कि इस बीच वे खिसक पाएंगे, और उनका खिसकना लोगों के बचने के लिए भी मददगार हो सकता है। कुल मिलाकर ये सारी जांच बहुत आसान नहीं रह गई हैं।
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