राजपथ - जनपथ
कोई और तर्क बाकी नहीं रहा
सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रकरण में करीब तीन महीने पहले राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर के खिलाफ कार्रवाई कर दी। अफसर स्थानीय सांसद के मार्फत बहाली की कोशिश में हैं। सांसद भी अफसर के मुरीद रहे हैं। उन्होंने अफसर की बहाली की कोशिशें शुरू कर दीं।
बताते हैं कि सांसद, सीएम से काफी समय से अकेले में मुलाकात की कोशिश कर रहे थे, ताकि अफसर की बहाली का रास्ता साफ हो सके। सीएम पिछले दिनों सांसद के क्षेत्र में आए, तो उन्हें सीएम के सामने अपनी बात रखने का मौका मिल गया।
सांसद ने जैसे ही अफसर की बहाली के लिए भूमिका बांधनी शुरू की, वहां बैठे मंत्रीजी ने तुरंत टोक दिया और अफसर को भ्रष्ट बताते हुए कार्रवाई को उचित ठहरा दिया। फिर क्या था, सांसद के पास कोई और तर्क नहीं रह गया। बात वहीं खत्म होकर रह गई।
डीजल की बिक्री पर नया आदेश
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण डीजल-पेट्रोल संकट गहराता जा रहा है। सरकार का आधिकारिक बयान यह है कि ईंधन की आपूर्ति में कोई कमी नहीं है, लेकिन लोग जरूरत से अधिक घबराकर खरीदारी कर रहे हैं, जिसके चलते कई पेट्रोल पंप जल्दी खाली हो रहे हैं। इधर, 22 मई को राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग द्वारा जारी आदेश कुछ अलग संकेत देता है।
सामान्य उपभोक्ताओं के लिए कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल की बिक्री केवल वाहनों की टंकी में ही की जाए। नियम का उल्लंघन होने पर संबंधित लोगों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी। आदेश के दूसरे हिस्से में कुछ परिस्थितियों में इस प्रतिबंध में शिथिलता दी गई है। रबी फसल की कटाई और खरीफ सीजन की तैयारी में लगे किसानों को छूट दी जाएगी। इसके अलावा, रेलवे, कलेक्टर द्वारा चिन्हित सडक़ निर्माण, भवन निर्माण तथा अस्पताल, मोबाइल टॉवर जैसे समय-सीमा वाले निर्माण कार्यों के लिए भी राहत का प्रावधान किया गया है।
आदेश के तीसरे बिंदु में बताया गया है कि यह छूट कैसे मिलेगी। इसके लिए संबंधित व्यक्ति को अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) के पास आवेदन करना होगा। आवेदन की जांच और संतुष्टि के बाद एसडीएम संबंधित रिटेल आउटलेट संचालक को ईंधन वितरण का आदेश जारी करेंगे।
किसान और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोग इस व्यवस्था को अव्यावहारिक बता रहे हैं। कृषि कार्यों से जुड़े हजारों लोगों के पास ट्रैक्टर और डीजल पंप हैं। ट्रैक्टरों की पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं। कई जिलों में कलेक्टरों ने अपने स्तर पर राशनिंग भी शुरू कर दी है और डीजल-पेट्रोल देने की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है। सवाल यह है कि डीजल पंपों के लिए किसान बार-बार एसडीएम कार्यालय के चक्कर कैसे लगाएंगे? क्या एसडीएम स्तर पर हर आवेदन की जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव होगा?
रासायनिक खाद की आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए भी निर्देश जारी किए जा चुके हैं। निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाले डीजल की आपूर्ति के लिए पहचान का अधिकार कलेक्टर या उनके अधीनस्थ अधिकारियों को दिया गया है। लेकिन इसकी परिभाषा बहुत सीमित रखी गई है, जिसमें अस्पताल, मोबाइल टॉवर और सडक़ निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं। जबकि बारिश से पहले इन दिनों बड़े पैमाने पर निजी निर्माण कार्य भी चल रहे हैं। ऐसे निर्माण कार्यों को ईंधन कैसे मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है। इन निर्माण कार्यों से हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है।
इधर, कुछ जिलों में पेट्रोल पंप संचालकों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उन्होंने सामान्य दिनों की तुलना में अधिक मात्रा में डीजल किसे और क्यों बेचा। पता चला कि उद्योगों को अतिरिक्त आपूर्ति की गई थी। संभव है कि कई उद्योगों ने जरूरत से ज्यादा भंडारण भी कर लिया हो। लेकिन 22 मई के आदेश में उद्योगों की स्वाभाविक आवश्यकताओं को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
पिछले 10-11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम तीन बार बढ़ चुके हैं। लोगों को पहले से इसकी आशंका थी, इसलिए कहीं बड़ा असंतोष देखने को नहीं मिला। बल्कि आम धारणा यह बन रही है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से धान की खेती पर आधारित है। वहीं गांवों से शहरों में आने वाले हजारों भूमिहीन मजदूरों की आजीविका निर्माण कार्यों और उद्योगों पर निर्भर करती है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल की आपूर्ति वास्तविक जरूरतों के अनुरूप सुनिश्चित करने की व्यवस्था इस आदेश में दिखाई नहीं देती।
एक खास मुलाकात
छत्तीसगढ़ में साहू समाज एक बड़ा वोट बैंक है। इसीलिए सरकार कोई भी इस वर्ग को छत्तीसगढ़ में हमेशा प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। कांग्रेस ने ताम्रध्वज साहू को सीएम का संभावित चेहरा बनाया था, सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में। समाज के लोग समझ रहे थे कि वे ही मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। दिल्ली में जब कांग्रेस हाईकमान की ओर से नाम तय किया जा रहा था तब खबर भी उड़ गई थी कि वे फाइनल कर दिए गए हैं। पटाखे फूटे। पर 2023 के चुनाव में भाजपा ने साहू समाज को सर्वाधिक टिकट दिए, सर्वाधिक जीत कर भी आए। उसके बाद 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी यह सिलसिला बना रहा। परिणाम यह रहा कि ताम्रध्वज महासमुंद से चुनाव हार गए। इधर, लंबे समय तक भाजपा में हाशिये पर रहे तोखन साहू ने बिलासपुर लोकसभा सीट से बंपर जीत हासिल की। केवल जीत ही नहीं, अनेक दिग्गजों को किनारे लगाते हुए उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह बनाई। इस तस्वीर में ताम्रध्वज साहू, तोखन साहू के साथ नजर आ रहे हैं, जो उनसे उनके दिल्ली निवास पर मिलने गए थे।
बिना मोबाइल प्रशिक्षण

जिलों में भाजपा का प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। रायपुर जिले के पदाधिकारियों का प्रशिक्षण शिविर अग्रसेन धाम में सुबह 9 बजे से शुरू हुआ। इस शिविर में रायपुर जिले के सातों विधायक शामिल हुए। खास बात यह है कि विधायकों और पार्टी के सभी आमंत्रित नेताओं को मोबाइल बाहर रखने के लिए कह दिया गया। वो कार्यक्रम के दौरान किसी से चर्चा नहीं कर पाएंगे।
प्रशिक्षण शिविर में पार्टी के कोई राष्ट्रीय नेता तो नहींआए, लेकिन प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय प्रमुख रूप से मौजूद रहे। कुल मिलाकर ढाई सौ से अधिक पदाधिकारी व आमंत्रित नेता शिरकत कर रहे हैं। सभी को दो दिन प्रशिक्षण स्थल में ही रहना होगा। उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं है। पहले से ही जिला पदाधिकारियों की ऑनलाईन मीटिंग में तमाम बातों को लेकर विस्तार से जानकारी दे दी गई है। सरकार के ढाई साल बाकी हैं, और आने वाले दिनों में पार्टी कार्यकर्ताओं को किस तरह का काम करना चाहिए, इस पर मंथन हो रहा है। शिकवा-शिकायतें भी सुनी जाएगी। निराकरण के लिए भी यथासंभव प्रयास किए जाएंगे। कुल मिलाकर अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर प्रशिक्षण शिविर को काफी अहम माना जा रहा है। देखना है कि शिविर में क्या कुछ निकलकर बाहर आता है।
मंत्रालय में गढक़लेवा

मंत्रालय परिसर में संचालित निजी होटल के कैंटीन से अधिकारी कर्मचारियों का मन 20-22 दिन में ही भर गया है। वहां के व्यंजनों से नहीं उनकी कीमत से। जेब पर भारी कैंटीन की जगह कर्मचारी संघ की पहल पर गढक़लेवा का संचालन शुरू हो गया है। संघ के अध्यक्ष ने सभी सदस्य अधिकारी कर्मचारियों को सूचना वायरल कहा कि वे अधिक से अधिक संख्या में गढक़लेवा पहुंचकर इस पहल को सफल बनाएं। हमें अपनी माटी के स्वाद और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। सभी से आग्रह है कि भोजन और नाश्ते के लिए हमारे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के केंद्र गढक़लेवा का उपयोग करें। गढक़लेवा से भोज्य पदार्थ अपनाकर हम न सिर्फ शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन पाएंगे, बल्कि स्थानीय संस्कृति और रोजगार को भी संबल देंगे।
इस सामूहिक सहयोग से हम जल्द ही इस वर्तमान कैंटीन को बंद करवाकर, पुन: टेंडर की प्रक्रिया शुरू करवाएंगे, ताकि हमें बेहतर सुविधाएं मिल सकें। इस पर कर्मचारियों ने ठंड में तो ठीक है लेकिन गर्मी बारिश में गढक़लेवा की दूरी पर एतराज़ जताया है। इसे
पुराने स्थान पर डी गेट के सामने ही खोलना चाहिए। इसके अलावा मंत्रालय के बाहर एक ग्रामीण महिला ने भी भोजनालय शुरू किया है। जो बड़ी भीड़ खींच रही है। उसकी पूरी थाली दाल- भात, भाजी, बरी-बिजौरी आदि छत्तीसगढ़ डिशेज़ के साथ 70 रूपए में उपलब्ध है। देखना है कि पनीर मिक्सवेज के दौर में यह कितनी सफल होते हैं।
खर्च में कटौती की आंच
केन्द्र सरकार इन दिनों सरकारी खर्च में कटौती को लेकर गंभीर नजर आ रही है। चर्चा है कि कम बजट और अधिक प्रशासनिक खर्च वाले आधा दर्जन छोटे विभागों को बंद करने या बड़े विभागों में समाहित करने पर विचार चल रहा है। इनमें आयुष, मछली पालन, पुरातत्व, लघु सिंचाई, हाथकरघा-हस्तशिल्प जैसे विभागों के नाम लिए जा रहे हैं। यदि ऐसा फैसला होता है, तो इसका असर राज्यों पर भी पड़ सकता है।

राज्य के अफसर-कर्मचारी इस संभावित फैसले पर नजर टिकाए हुए हैं। उनका मानना है कि केंद्र की तर्ज पर राज्यों में भी संबंधित विभागों के पुनर्गठन या समापन की नौबत आ सकती है। खास बात यह है कि आयुष विभाग का विस्तार मोदी सरकार के आने के बाद ही हुआ था, जिसमें आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी को एक साथ लाया गया। छत्तीसगढ़ में इसका अलग संचालनालय है और यहां गतिविधियां भी बेहतर मानी जाती हैं।
इसी तरह मछली पालन और पुरातत्व जैसे विभाग लंबे समय से अस्तित्व में हैं। हाथकरघा और हस्तशिल्प विभागों की गतिविधियां भले सीमित हों, लेकिन इसमें रोजगार की पर्याप्त संभावनाएं हैं। दिक्कत यह है कि पर्याप्त बजट नहीं मिलने से योजनाएं अटकी रहती हैं। अब देखना है कि खर्च घटाने की मुहिम में केन्द्र सरकार इन विभागों को लेकर क्या रुख अपनाती है।
रजिस्टरों पर दीमक या साजिश?
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महंत घासीदास संग्रहालय में दुर्लभ दस्तावेजों और एक्सेशन रजिस्टरों के नष्ट होने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। यह मामला तब सामने आया, जब अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क से जुड़ी अवलोकितेश्वर की बेशकीमती कांस्य प्रतिमा को वापस लाने के लिए संग्रहालय के रिकॉर्ड खंगाले गए। जांच में पता चला कि छह में से पांच एक्सेशन रजिस्टर नष्ट हो चुके हैं, जिनमें पुरातत्व अवशेषों का पूरा रिकॉर्ड दर्ज था। बताया गया कि रजिस्टरों को दीमक चट कर गई।
मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि एक्सेशन रजिस्टरों में संग्रहालय में सुरक्षित पुरावशेषों, कलाकृतियों और चोरी हुई वस्तुओं की पूरी जानकारी रहती है। अब जब रिकॉर्ड ही नष्ट हो गए, तो तीन दशक पहले चोरी हुई अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा को वापस लाने की प्रक्रिया जटिल हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस प्रतिमा की कीमत करीब दो मिलियन डॉलर बताई जा रही है। फिलहाल अतिरिक्त संचालक को नोटिस जारी कर प्रारंभिक जांच शुरू कर दी गई है।
मगर यह भी चर्चा है कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश में पुराने एक्सेशन रजिस्टर मौजूद हैं, जिन्हें राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ नहीं लाया गया। अब पुरातत्व संचालनालय ने मध्यप्रदेश सरकार को पत्र लिखकर रिकॉर्ड मांगा है। हालांकि राज्य गठन के बाद मिले पुरावशेषों और चोरी की घटनाओं का विवरण वहां मिलना मुश्किल माना जा रहा है। कुछ लोगों का दावा है कि रजिस्टर महज दीमक से नहीं, बल्कि जानबूझकर नष्ट किए गए हैं। यही वजह है कि मामले को लेकर हाईकोर्ट जाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।

यह तस्वीर 14 फरवरी 2010 की है। उस समय पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर देशभर में राजनीतिक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। उसी क्रम में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी बाकी मंत्रियों के साथ सांकेतिक रूप से सायकल चलाकर विरोध जताया था और पेट्रोल पंप पहुंचकर अलग अंदाज में प्रदर्शन किया था। (फोटो और जानकारी गोकुल सोनी) उस वक्त छत्तीसगढ़ में पेट्रोल के दाम 48-49 रुपये के बीच थे।
सुशासन तिहार के बाद तबादले?
प्रदेश में जनगणना का काम चल रहा है। इसी बीच तबादलों को लेकर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि सरकार के कुछ मंत्री और भाजपा के कई नेता चाहते हैं कि तबादलों से रोक हटाई जाए। सरकार के पास यह विकल्प है कि जनगणना कार्य से जुड़े स्कूल शिक्षा और राजस्व विभाग के अमले को छोडक़र बाकी विभागों में तबादलों की छूट दी जाए। इस पर विचार-मंथन भी शुरू हो गया है।
मध्यप्रदेश में भी तबादलों पर लगा बैन हटाया गया है और वहां 1 जून से 15 जून तक तबादले होंगे। मध्यप्रदेश की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी कर्मचारी संगठनों ने तबादले शुरू करने की मांग रखी है।
हालांकि प्रदेश में अभी सुशासन तिहार चल रहा है, जिसके तहत जनसमस्याओं के निराकरण के लिए कैंप लगाए जा रहे हैं। पूरा मैदानी अमला फिलहाल इसी अभियान में व्यस्त है। ऐसे में माना जा रहा है कि सुशासन तिहार खत्म होने के बाद सरकार तबादलों पर लगी रोक हटाने पर फैसला ले सकती है।
पहले से बनी तबादला नीति में जिले के भीतर तबादले का अधिकार प्रभारी मंत्रियों को दिया गया था। अब चर्चा है कि कुछ संशोधनों के साथ नई तबादला नीति जारी हो सकती है। इस पर अंतिम फैसला कैबिनेट बैठक में लिया जा सकता है। अब देखना है कि सरकार क्या निर्णय लेती है।
बस्तर मॉनिटरिंग करेंगे विजय शर्मा
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के जगदलपुर दौरे के दौरान कई बड़ी घोषणाएं की गईं। इनमें वर्ष 2031 तक बस्तर को विकसित संभाग बनाने का लक्ष्य भी शामिल है। सहकारिता विभाग भी संभाल रहे अमित शाह के नेतृत्व में बस्तर विकास का रोडमैप तैयार किया जा रहा है।
इस दौरान उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे के लिए राज्य सरकार की भूमिका की सराहना करते हुए सीएम विष्णुदेव साय को सफल सीएम बताया। अमित शाह ने डिप्टी सीएम विजय शर्मा की भी खुलकर तारीफ की।
बताया जा रहा है कि बस्तर विकास योजना की मॉनिटरिंग में विजय शर्मा की सीधी भूमिका रहेगी। हाल ही में विजय शर्मा गुजरात दौरे पर गए थे, जहां उन्होंने सहकारी क्षेत्र में दुग्ध उत्पादन और वितरण व्यवस्था का अध्ययन किया। अब गुजरात के सहकारी दुग्ध मॉडल को बस्तर में लागू करने पर विचार चल रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर के आदिवासी परिवारों को मुफ्त गाय-भैंस देने की योजना पर भी काम कर रही है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के सहयोग से इस दिशा में शुरुआती काम शुरू हो चुका है।
हालांकि सहकारिता विभाग मंत्री केदार कश्यप के पास है, लेकिन बस्तर में सहकारिता आधारित योजनाओं की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी विजय शर्मा को मिलने की चर्चा है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में बस्तर में क्या बदलाव होता है।
जंगल की खामोश चौकी पर मैकू की याद

अचानकमार टाइगर रिजर्व के घने जंगलों के बीच, वीरान सडक़ किनारे एक छोटा-सा मठ है। यह उस वन प्रहरी की स्मृति है, जिसने जंगल की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवा दी, लेकिन डर के आगे पीछे नहीं हटा।
मठ है बिंदावल गांव के मैकू गोंड की याद में। उस फायर वॉचर की, जिसे 10 अप्रैल 1949 को एक बाघिन ने अपना शिकार बना लिया था। उस दिन वह अपने एक साथी के साथ जंगल की निगरानी पर निकला था। अचानक बाघिन ने हमला किया। साथी किसी तरह बच निकला, लेकिन मैकू जंगल की मिट्टी में हमेशा के लिए समा गया।
उस समय न वन्यजीव संरक्षण कानून थे, न शिकार पर सख्त पाबंदी। तीन दिन तक मचान में बैठकर रेंज अधिकारी एम.डब्ल्यू.के. खोखर उस आदमखोर बाघिन का शिकार करने में कामयाब हुए।
विडंबना देखिए, जिस दौर में मैकू मारा गया, तब वन्यजीवों की हत्या रोकने के लिए कानून तक नहीं थे। लेकिन आज, सख्त कानून होने के बावजूद शिकारी अब भी जंगलों में घूम रहे हैं। कहीं करंट बिछाकर, कहीं जहर मिलाकर, तो कहीं फंदे लगाकर बाघ, तेंदुए और दूसरे वन्यजीवों को मारा जा रहा है। ऐसे समय में मैकू गोंड की यह स्मृति और भी प्रासंगिक हो जाती है। जंगलों को केवल कानून नहीं बचाते, उन्हें बचाते हैं मैकू जैसे लोग जो जान जोखिम में डालकर भी जंगल की चौकीदारी करते हैं।
( प्राण चड्ढा के फेसबुक वाल से)
एसपीजी को चाहिए आईपीएस
स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) में ऑफिसर्स की कमी हो गई है। वैसे यह कमी, हर केंद्रीय गोपनीय सुरक्षा एजेंसी में बनी हुई है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को अपने अपने यहां के इच्छुक आईपीएस अफसरों को एसपीजी में डेपुटेशन पर भेजने आधिकारिक पत्र लिखा है। इस सर्वोच्च हाई प्रोफाइल सुरक्षा बल ने जूनियर खासकर एसपी, डीआईजी स्तर के अफसरों की मांग की गई है। एसपीजी में इनके तय पद पूरी तरह नहीं भर पा रहे हैं।
मुख्य सचिवों से कहा गया है कि इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा आईपीएस अफसरों तक पहुंचाया जाए। प्रतिनियुक्ति के लिए योग्य एवं इच्छुक आईपीएस डीआईजी की फाइल तुरंत प्रभाव से गृह मंत्रालय को प्रेषित करें। दो सप्ताह पहले यह मैसेज भेजा गया था। इसमें कहा गया है कि बतौर डीआईजी के पद पर आने वाले अधिकारियों के लिए 14 साल की सेवा अनिवार्य है। ऐसे इच्छुक आईपीएस अधिकारियों का प्रतिनियुक्ति आवेदन, तीस दिन के अंदर गृह मंत्रालय को भेजा जाए। इसके साथ उनके विजिलेंस स्टेटस के बारे में भी सूचित किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व इस एजेंसी में प्रतिनियुक्ति से लौटे एक आईपीएस अफसर ने कहा कि जूनियर पोस्ट पर बड़ी किल्लत है। इस वजह से प्रधानमंत्री के एक साथ दो से तीन देशों या देश के भीतर भी 3-4 अलग अलग राज्यों के दौरे होने पर एडवांस पार्टी की तैनाती में कमी से जूझना पड़ता है। इस विशेष सुरक्षा दस्ते को अभी और लोगों की जरूरत है। देश में एसपीजी की सुरक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत को ही दी गई है।
बहरहाल गृह मंत्रालय के इस पत्र के बाद राज्य के युवा आईपीएस अफसरों के लिए इस हाई प्रोफाइल डेपुटेशन पर जाने के रास्ते खुल गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ से, केंद्र में डेपुटेशन कोटे से कम ही आईपीएस अफसर गए हैं या अनुमति दी गई है। राज्य के 142 आईपीएस अधिकारियों के कैडर में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए कोटा 31 अफसरों का है। जनवरी 26 की डेट में 8 ही डेपुटेशन पर गए हैं। उसके बाद के इन 4 महीने में तीन और अफसर गए हैं। अभी 19 और जा सकते हैं। यहां बता दें कि इस प्रतिष्ठित फोर्स में पूर्व में छत्तीसगढ़ से एडीजी विवेकानंद, एसपी अमित कांबले पदस्थ रहे चुके हैं।
सोता रहा सिस्टम, शिक्षकों पर रिकवरी का संकट
छत्तीसगढ़ के पंचायत संवर्ग से शिक्षा विभाग में संविलियित सहायक शिक्षकों के सामने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 मई के आदेश के बाद गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वे मानसिक पीड़ा से गुजर ही रहे हैं, साथ ही उनकी भविष्य की आर्थिक योजनाएं भी खतरे में पड़ गई हैं।
दरअसल, हाईकोर्ट ने पंचायत नियमों के तहत नियुक्त सहायक शिक्षकों (जिन्हें पहले शिक्षा कर्मी कहा जाता था) को स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षकों की श्रेणी में मानने से इंकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें नियमित शिक्षकों की तरह 10 वर्ष की सेवा पर क्रमोन्नत वेतनमान या समान वेतन पाने का अधिकार नहीं है।
इस आदेश के तुरंत बाद शिक्षा विभाग और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिलों के कलेक्टरों, जिला शिक्षा अधिकारियों तथा जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को पत्र भेजकर तुरंत समीक्षा करने और अधिक वेतन प्राप्त कर चुके शिक्षकों के चिह्नांकन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक (पंचायत) संवर्ग के 82,066 स्वीकृत पदों में से 77,628 पद भरे हुए हैं। वर्ष 1998-2008 के आसपास नियुक्त और 2011-2015 के दौरान 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले कई शिक्षकों को शासन के आदेश क्रमांक 411 (22/2011) के तहत अस्थायी रूप से क्रमोन्नत वेतनमान स्वीकृत किया गया था। यह लाभ केवल 1 नवंबर 2011 से 30 अप्रैल 2013 तक प्रभावी था, लेकिन इसके बाद भी क्रमोन्नत वेतनमान का भुगतान जारी रहा। 2015 से 2021 तक इन शिक्षकों को अतिरिक्त वेतन और एरियर मिला।
हाईकोर्ट ने 1,188 शिक्षकों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने मांग की थी कि उनकी पंचायत संवर्ग में दी गई सेवा को भी वरिष्ठता और क्रमोन्नति के लिए गिना जाए। अदालत ने राज्य सरकार की दलील मानी कि 1 जुलाई 2018 को संविलियन के बाद से ही उनकी सेवा अवधि की गणना होगी।
दरअसल, अस्थायी आदेश के आधार पर पहले से क्रमोन्नत वेतनमान दिया जाता रहा और 30 अप्रैल 2013 के बाद भी इसे जारी रखा गया। अब यह पूरा लाभ वसूली के दायरे में आ गया है। राज्य स्तर पर हजारों शिक्षक इस प्रक्रिया में फंस सकते हैं और प्रत्येक से 8 लाख से 20 लाख रुपये तक की वसूली की जा सकती है। विभिन्न जिलों में शिक्षा अधिकारी दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं और जल्द ही संबंधित शिक्षकों को नोटिस जारी कर वसूली प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए सरकारी खजाने से गलत तरीके से हुई निकासी को वापस लेना जरूरी है, लेकिन इन शिक्षकों का क्या होगा? वे 15-20 लाख रुपये तक की बड़ी रकम एक साथ कैसे लौटा पाएंगे? क्या उनके वेतन से कटौती शुरू कर दी जाएगी? इन्होंने उसी वेतन के आधार पर बच्चों की पढ़ाई, परिवार का पालन-पोषण, इलाज और अन्य जिम्मेदारियों की योजना बनाई थी। अब रिकवरी के भय से कई शिक्षक मानसिक दबाव में हैं। कई सेवानिवृत्ति के करीब हैं और कुछ पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
फिर भी एक उम्मीद बाकी है-रिकवरी के खिलाफ हाईकोर्ट जाना। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि यदि कर्मचारी से कोई छल-कपट नहीं हुआ है और विभाग की गलती से अधिक भुगतान हुआ है, तो उससे रिकवरी नहीं की जा सकती। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी हाल के कई मामलों में इसी आलोक में फैसले दिए हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की गई वसूली को वापस खाते में डालने के भी आदेश दिए हैं।
जिन शिक्षकों को अधिक वेतन दिया गया, उन्हें नोटिस जारी करना आसान है, लेकिन क्या उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जिन्होंने वर्षों तक करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान होने दिया और इसे वे रोकने में विफल रहे? उनसे ही वसूली क्यों नहीं की जानी चाहिए?
भाजपा की ‘बस पॉलिटिक्स’..
देशभर में ईंधन बचाने को लेकर चल रहे अभियान का असर अब भाजपा के तौर-तरीकों में भी दिखने लगा है। वीवीआईपी कारकेड में कटौती के बाद राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्री भी सीमित वाहनों के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। भाजपा संगठन ने भी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पेट्रोल-डीजल बचत के लिए व्यावहारिक संदेश देने की हिदायत दी है।
इसी कड़ी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रायपुर दौरे के दौरान भाजपा नेताओं ने अलग-अलग गाडिय़ों के बजाय सामूहिक रूप से बस से एयरपोर्ट पहुंचकर एक संदेश देने की कोशिश की। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, सांसद बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, महापौर मीनल चौबे और राज्यसभा सदस्य लक्ष्मी वर्मा समेत कई नेता एक साथ बस से एयरपोर्ट पहुंचे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी को भी बस से जाना था, लेकिन रायगढ़ से लौटने में देरी होने के कारण वे सीधे एयरपोर्ट पहुंचे। भाजपा कार्यसमिति की बैठक में भी कई नेताओं को ई-रिक्शा से कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पहुंचते देखा गया।
बताते हैं कि भाजपा में अब प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेताओं के स्वागत में अलग-अलग वाहनों की बजाय सामूहिक परिवहन को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया है। कांग्रेस भले ही इसे 'नौटंकी' बता रही हो, लेकिन बढ़ती ईंधन खपत और पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच इसे सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
एक ही जाति, फिर भी सादगी
सामान्यत: कोर्ट मैरिज को अंतरजातीय होने या किसी पारिवारिक विरोध से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के रायकोना गांव के इस विवाह ने यह धारणा तोड़ दी। यह विवाह इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह यह है कि यह शादी किसी मजबूरी या सामाजिक विरोध के कारण नहीं, बल्कि पूरी सहमति, समझदारी और सादगी के संकल्प के साथ हुई। रघुनाथ साहू और योगेश्वरी साहू, जो एक ही समाज और आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों से आते हैं, उन्होंने पारंपरिक धूमधाम, बारात, डीजे और लाखों रुपये के खर्च से दूरी बनाते हुए कलेक्ट्रेट में विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया।
शादियां सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनती जा रही हैं। कई परिवार कर्ज तक लेने को मजबूर हो जाते हैं, ऐसे समय में इस विवाह को समाज को नई दिशा देने वाला उदाहरण माना जा सकता है। कोर्ट मैरिज के फैसले को दोनों परिवारों ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि खुशी के साथ विवाह समारोह में शामिल होकर नवदंपती को आशीर्वाद दिया।
सख्ती के संकेत...
सरगुजा संभाग के एक जिले में कुछ समय पहले हुए कलेक्टर के तबादले से कारोबारी वर्ग और कुछ स्थानीय नेताओं ने राहत की सांस ली थी। वजह यह थी कि पूर्व कलेक्टर जमीन कब्जे और अफरा-तफरी के मामलों में लगातार कार्रवाई कर रहे थे। मगर नए कलेक्टर ने आते ही इससे भी ज्यादा सख्त रुख अपना लिया है।
जमीन कब्जे और गड़बडिय़ों से जुड़े मामलों में तेजी से कार्रवाई शुरू होने के बाद कई प्रभावशाली लोग भी इसकी जद में आ गए हैं। इनमें सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ चेहरे भी बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि प्रभावित लोगों ने स्थानीय विधायक के जरिए पार्टी के शीर्ष नेताओं तक शिकायत पहुंचाई। संगठन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने पूरी बात शांतिपूर्वक सुनी, लेकिन उसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई और तेज हो गई।
संकेत साफ माने जा रहे हैं कि अनियमितताओं को लेकर सरकार अब किसी तरह की ढिलाई के पक्ष में नहीं है। जिला प्रशासन के साथ-साथ पुलिस प्रशासन को भी कड़ाई बरतने के निर्देश बताए जा रहे हैं। एक एसएसपी को तो केवल इस वजह से नोटिस जारी होने की चर्चा है कि उन्होंने सत्ताधारी दल से जुड़े एक कारोबारी के खिलाफ कार्रवाई में नरमी दिखाई थी। आने वाले दिनों में ऐसे और कदम देखने को मिल सकते हैं।
पुलिस महकमे में बड़ी हलचल
आईपीएस के 92 बैच के अफसर अरुण देव गौतम अब पूर्णकालिक डीजीपी बन चुके हैं और अगले साल फरवरी में सेवानिवृत्त होंगे। इसके साथ ही पुलिस विभाग में बड़े स्तर पर फेरबदल की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कहा जा रहा है कि तबादला सूची लगभग तैयार है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक में शामिल होने के लिए जगदलपुर पहुंचे हैं। उनके साथ सीएम विष्णु देव साय समेत उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के सीएम भी मौजूद हैं। माना जा रहा है कि परिषद की बैठक के बाद पुलिस विभाग की सूची जारी हो सकती है।
कुछ दिन पहले ही 43 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए थे, जिनमें आधा दर्जन कलेक्टर भी शामिल थे। अब पीएचक्यू से लेकर जिलों के एसपी स्तर तक बदलाव की तैयारी बताई जा रही है। कुछ एसएसपी एक ही जिले में ढाई साल से पदस्थ हैं, इसलिए उन्हें नई जिम्मेदारी मिल सकती है। यही नहीं,करीब आधा दर्जन एसपी अलग-अलग कारणों से बदले जा सकते हैं। कुछ अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें भी बताई जा रही हैं।
विधानसभा चुनाव में अभी ढाई साल का समय है, लेकिन सरकार अभी से जिलों में प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है। अब सबकी नजर आने वाली सूची पर टिकी है।
इधर इंतजार,उधर अगली किस्त...
प्रदेश के अभा सेवा अफसर और विद्युत कंपनी के कार्मिकों ने 2 प्रतिशत का पिछला महंगाई भत्ते एरियर्स समेत खर्च कर लिया है और राज्य प्रशासन के लोग अभी घोषणा का इंतजार ही कर रहे हैं। वैसे भी वे 26 वर्षों में 88 महीने के डीए का डेफिसिट झेल रहे हैं। और अब पांच लाख अधिकारी कर्मचारियों के जले में नमक गिरने वाला है।
बहरहाल केंद्र सरकार ने जुलाई की दूसरी किस्त घोषित करने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (एआईसीपीआई इंडेक्स) का अध्ययन शुरू कर दिया है। यह आकलन अप्रैल से होता है। दूध, सब्जी, अनाज ,पेट्रोल और रोजमर्रा की अन्य चीजों की बढ़ती कीमतों एआईसीपीआई इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर कर्मचारियों को अगले डीए रिवीजन में फायदा मिल सकता है।
यानी केंद्रीय अमले को यह किस्त भी 3-4 महीने की एरियर्स के साथ सितंबर अक्टूबर में मिलेगी।
वैसे तो केंद्रीय कर्मचारियों को आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का बेसब्री से इंतजार है लेकिन अगले कुछ महीनों में लक्ष्मी बरसने वाली है। सरकार साल 2026 की दूसरी छमाही के डीए देगी। इस बार केंद्रीय कर्मचारियों के डीए में 3 परसेंट बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो डीए बढक़र 63 परसेंट हो जाएगा। वैसे अक्टूबर में केंद्रीय कर्मियों, रेल अमले को डीए के साथ दीपावली बोनस की भी बंपर लाटरी खुलने वाली है। ऐसे में अगली छमाही बल्ले बल्ले वाली होगी।
आसमानी डायनासोर...
अचानकमार टाइगर रिजर्व केवल बाघों और पेड़ों की सघनता ही नहीं, बल्कि दुर्लभ और खूबसूरत पक्षियों की दुनिया भी है। तस्वीर में दिखाई दे रहा यह आकर्षक पक्षी रेड-नेप्ड आइबिस है। आमतौर पर इसे लाल सिर वाला काला आइबिस या काली सुंडी कहा जाता है। लंबे मुड़े हुए चोंच, चमकदार काले पंख और सिर पर लाल रंग की त्वचा इसे बेहद अलग पहचान देते हैं।
वैसे, अचानकमार के जंगल, घासभूमि और जलस्रोत इस तरह के पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय बनते जा रहे हैं। यहां हर साल बर्ड वाचिंग कैंप भी लग रहे हैं। मोर, हॉर्नबिल, ईगल, उल्लू, वुडपेकर और कई प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी पक्षी प्रेमियों को रोमांचित करती है। हाल के वर्षों में दुर्लभ इंडियन वल्चर यानी गिद्धों की संख्या में भी यहां उम्मीद जगाने वाली बढ़ोतरी देखी गई है। आसमानी डायनासोर कहे जाने वाले ये गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी माने जाते हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में ये बड़ी भूमिका निभाते हैं।
ये मौसम यानि, बरसात से पहले और गर्मियों के अंतिम दिनों में अचानकमार पक्षियों की गतिविधियों को करीब से देखने का सबसे खूबसूरत समय होता है। जंगल की नमी, पेड़ों की हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट यहां आने वालों को प्रकृति के बेहद करीब ले जाती है। (तस्वीर अनुभव शर्मा द्वारा खींची गई और सोशल मीडिया पर साझा की गई है।)
मोहब्बत छोडक़र सामान ले गया चोर..
अंबिकापुर के कांग्रेस दफ्तर में छत के रास्ते से चोर घुसा और उसने दो-चार नहीं, लोहे के कुल 73 सामान उखाड़े और अपने साथ ले गया। इनमें नल, फ्लश सिस्टम, वॉश बेसिन आदि शामिल थे। कांग्रेस दफ्तर में कुछ जरूरी दस्तावेज रहे होंगे, जिनमें चोर की दिलचस्पी नहीं रही होगी। रुपये-गहने ढूंढने की कोशिश भी शायद उसने नहीं की होगी, क्योंकि वह यहां तीसरी बार घुसा था। जी हां, यह तीसरी चोरी थी। और तीसरी बार सफलतापूर्वक चोरी संपन्न हो जाने की खुशी में वह एक पर्चा भी वहां छोडक़र गया, जिसमें लिखा था- आई लव अंबिकापुर। यानी, अंबिकापुर से मोहब्बत है।
शायद पुलिस उसे अब तक पकड़ नहीं पाई है, इसलिए वह खुश होगा। दो बार चोरियां हो जाने के बावजूद कांग्रेस भवन में सुरक्षा व्यवस्था कुछ नहीं थी, इस बात ने भी उसे प्रभावित किया होगा। सबसे बड़ी बात, उसे पता था कि भवन में 73 की संख्या में ऐसे सामान बाथरूम और टॉयलेट में लगे हैं, जिन्हें वह कबाड़ में बेच सकता है। चोरी गए सामान की कीमत पार्टी के लोगों ने करीब 80 हजार रुपये बताई है।
वैसे, नशे के चंगुल में फंसे लोग प्राय: लोहे का सामान ही चुराते हैं। इसे कबाडिय़ों के पास आसानी से खपाया जा सकता है। चोर, मोहब्बत का इजहार करते हुए पर्चा छोड़ गया और सामान कबाड़ी की दुकान ले गया। सिस्टम पर उसका भरोसा बना हुआ है।
हकीकत के इतर रेलवे का नया लोगो
स्टेशन, गंदगी भरे ट्रेनों की लेटलतीफी, उनमें चोरियां, टीटीई द्वारा बेटिकिट यात्रियों को बोगी से धकेलने और दोयम दर्जे की यात्री सुविधाओं की हकीकत से इतर रेलवे ने अपनी पहचान बदल रहा है। बोर्ड ने हालांकि इस बदलाव पर दावा किया है कि उसने हमेशा से अपने लोगो और पहचान को समय के साथ अपडेट किया है, ताकि वह आधुनिकता के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। नए लोगो के माध्यम से, रेलवे ने यह संदेश दिया है कि वह अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं को समझता है और उन्हें बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस नए लोगो के साथ, भारतीय रेल ने अपने ब्रांड को और अधिक आकर्षक और पहचानने योग्य बनाने का प्रयास किया है। नए लोगो के माध्यम से, यात्रियों को एक नई पहचान और अनुभव मिलेगा, जो उन्हें भारतीय रेल के साथ जुडऩे में मदद करेगा। चेंज आफ लोगो को लेकर जारी सूचना के अनुसार अब पुराने और नीले रंग के 17 स्टार वाले लोगो की जगह लाल रंग का 18 स्टार वाला लोगो इस्तेमाल होगा। अब एक स्टार अधिक वाले लोगो के साथ नई पहचान बनाने जा रहा है। आगामी एक जून से इसे पूरे देश में जारी कर दिया जाएगा।
भारतीय रेल ने दक्षिण तट रेलवे विशाखापट्टनम के गठन के बाद अपने आधिकारिक लोगो में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। रेलवे बोर्ड ने रेल इंजन के फ्रंट फोटो को घेरे हुए 18 लाल सितारों वाले संशोधित लोगो को मंजूरी दे दी है। रेलवे बोर्ड द्वारा जारी आदेश के अनुसार, दक्षिण तट रेलवे को भारतीय रेल का 18वां दक्षिण तट रेलवे जोन एक जून से औपचारिक रूप से परिचालन शुरू करेगा। बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे, उत्पादन इकाइयों, पीएसयू और प्रशिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे एक जून से नए लोगो का उपयोग करें।
आस्था से अधिक समरसता की तस्वीर

ऐसे समय में जब देश में धर्म और पहचान को लेकर बहसें अक्सर तनाव का रूप ले लेती हैं, यह तस्वीर एक अलग और सकारात्मक संदेश देती दिखाई देती है। सूरजपुर कलेक्टर रेना जमील सुशासन तिहार के मौके पर मुख्यमंत्री के प्रवास की तैयारी को देखने के लिए कुदरगढ़ गई थीं। वहां के मंदिर में उन्होंने श्रद्धा के फूल चढ़ाए और लोगों ने यह तस्वीर कैद कर ली। मुस्लिम समुदाय से आने वाली महिला अधिकारी का परंपरा और संस्कृति के प्रति सम्मान के नजरिये से भी इसे देखा गया। समाज की खूबसूरती उसकी विविधता में निहित है, इस भाव को उन्होंने मजबूत किया।
2019 बैच की, रेना जमील की आईएएस के मुकाम तक पहुंचने की कहानी भी संघर्ष और धैर्य की मिसाल है। धनबाद, झारखंड में पिता मैकेनिक थे। आठवीं तक ही मां की भी पढ़ाई थी और खुद उनकी शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई। यूपीएससी की ओर रुझान बढ़ा तो पहले प्रयास में सन् 2016 में इंडियन इंफॉर्मेशन सर्विस मिली। दूसरे प्रयास में प्रारंभिक भी पास नहीं कर पाईं। लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा और अंतत: तीसरी बार में आईएएस बनने का सपना पूरा किया।
इतना किया, सोनवानी के बच्चों पर भी रहम कर देते !
सीजी पीएससी 2021 भर्ती घोटाले में क्या सिर्फ नाममात्र की गड़बडिय़ां थीं? क्या केवल तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों का चयन ही गलत था और बाकी सभी नियुक्तियां पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता पर थीं? अगर ऐसा ही था, तो फिर पूरे प्रदेश में इतना बड़ा राजनीतिक तूफान क्यों खड़ा किया गया? चुनावी मंचों से लेकर सीबीआई जांच तक जिस मामले को युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी लूट बताया गया, वह दो चार रिश्तेदारों तक सिमटकर कैसे खत्म हो गया?
सीजी पीएससी में दो सौ के आसपास पदों के लिए लाखों युवा अपनी जवानी झोंक देते हैं। गांवों के गरीब घरों से लेकर शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों तक, अभ्यर्थी वर्षों तक किताबों में सिर खपाते हैं। लेकिन 2021 की चयन सूची सामने आते ही ऐसा लगा जैसे प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि सत्ता, पहुंच और रिश्तेदारी का बंद कमरा खुल गया हो। लोगों ने देखा कि कई मलाईदार पद प्रभावशाली अफसरों, नेताओं और रसूखदार परिवारों के बच्चों से भर गए हैं।
पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर ने सबसे पहले दो दर्जन से ज्यादा संदिग्ध नाम सार्वजनिक किए। वे मामले को हाईकोर्ट ले गए। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और विधानसभा चुनाव सिर पर था। मामला धीरे-धीरे इतना विस्फोटक बन गया कि भाजपा ने इसे चुनावी हथियार बना लिया।
तत्कालीन सीजी पीएससी चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी, जो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सचिव भी रह चुके थे, आरोपों की गोलाई में आए। सीबीआई की जांच और चार्जशीट में दावा किया गया कि ऐसे सवाल तैयार कराए गए जिनके जवाब केवल चुनिंदा लोगों को ही पता हो सकते थे। पेपर लीक की गई, नियमों में बदलाव किया गया, रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने और चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने जो जतन करना था किया गया।
इसके बाद परिणाम में जो नाम सामने आए, उसने पूरे सिस्टम की साख हिला दी, जो 2003 से ही दरक रही थी। चेयरमैन साहब का बेटा नितेश सोनवानी डिप्टी कलेक्टर, भतीजा साहिल सोनवानी डीएसपी, बहू मीशा कोसले डिप्टी कलेक्टर और रिश्तेदार दीपा आदिल जिला आबकारी अधिकारी बन गए। तत्कालीन पीएससी सचिव जीवन किशोर ध्रुव आईएएस के बेटे सुमित ध्रुव को भी डिप्टी कलेक्टर बना दिया गया। बजरंग पॉवर वाले उद्योगपति श्रवण कुमार गोयल पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने बेटे शशांक गोयल और बहू भूमिका कटियार को डिप्टी कलेक्टर बनवाने के लिए 45 लाख रुपये रिश्वत दी। उनको भी बुक किया गया।
सीबीआई की लगभग 400 पन्नों की चार्जशीट में 29 आरोपी नामजद किए गए। इनमें पीएससी अधिकारी, कारोबारी, कोचिंग संचालक और चयनित अभ्यर्थी शामिल थे। टॉप-20 चयनितों में से 13 प्रभावशाली परिवारों से जुड़े पाए गए। बारनवापारा के जंगल में विशेष तैयारी कराई गई। और बताएं तो गवर्नर के सचिव अमृत खलखो के एक ही पते पर रहने वाले दो बच्चे एक ही बार में, एक ही परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर बन गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी आईपीएस अधिकारियों के बच्चे, कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदार और कई ताकतवर परिवारों के नाम सूची में मिले। यही वे नाम थे, जिन पर चुनाव अभियान के दौरान पूरे प्रदेश में सवाल उठे। मगर आज स्थिति यह है कि सोनवानी के कुछ रिश्तेदारों को छोडक़र लगभग सभी को नियुक्ति और पोस्टिंग मिल चुकी है।
यहीं पर एक जरूरी सवाल खड़ा होता है। अगर बाकी सब पाक-साफ थे, तो फिर पूरे प्रदेश को यह क्यों बताया गया कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हुआ है? अगर चयन निष्पक्ष थे, तो चुनावी मंचों से लेकर टीवी डिबेट तक इसे बिग स्कैम क्यों कहा गया? बीजेपी के तमाम प्रवक्ताओं के चुनाव से पहले दिए गए बयानों को निकालें और आज सवाल करें, कि भाई सब फुस्स क्यों हो गया है। अगर केवल दो-चार लोग दोषी थे, तो फिर सीबीआई जांच, गिरफ्तारियां, छापेमारी और राजनीतिक भाषणों का इतना बड़ा तमाशा क्यों खड़ा किया था?
विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा ने युवाओं के गुस्से को राजनीतिक मुद्दा बनाया। सत्ता में आते ही मामला सीबीआई को सौंपा गया। शुरुआत में लगा कि अब पूरी परतें खुलेंगी। गिरफ्तारियां हुईं। सरकार ने जीरो टॉलरेंस का नारा दिया। लेकिन धीरे-धीरे जांच की धार कुंद पड़ती गई। मामला सिमटता गया। बड़े नाम गायब होते गए। और आखिर में कहानी वहीं आकर खत्म हुई, जहां अक्सर खत्म होती है। कुछ लोगों पर कार्रवाई, बाकी सब क्लीन।
सीबीआई कई संदिग्ध चयनितों के खिलाफ ठोस चार्जशीट तक पेश नहीं कर सकी। अदालत में पर्याप्त सबूत नहीं रखे जा सके। इसके बाद चयनित उम्मीदवार हाईकोर्ट पहुंचे। सरकार ने टालमटोल की, लेकिन हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जॉइनिंग देने का आदेश दे दिया। अब दो दिन पहले ज्यादातर चयनित अभ्यर्थी डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर बैठ चुके हैं। उसी तरह जैसे 2003 के पीएससी में गलत तरीके से चुने गए स्टे वाले अयोग्य लोग, काबिल पदों पर बैठे हैं। ईमानदार प्रतिभाशालियों का हक एक बार फिर लुट गया है।
वादा किया गया था कि यूपीएससी जैसी कड़ी और पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी। कहा गया था कि सीजी पीएससी का पूरा ढांचा बदला जाएगा। लेकिन आज तक न ठोस गाइडलाइन दिखी, न संरचनात्मक सुधार। पीएससी की विश्वसनीयता पहले से दांव पर थी, जो अब लगभग ध्वस्त हो चुकी है।
सीबीआई पर शक नहीं है। उसे कुछ मिला ही नहीं होगा। इतनी चालाकी से काम किया होगा कि गलत चयन के खिलाफ सबूत ही जुटाने में संस्था नाकाम रह गई हो। और यह पहली बार नहीं है। बिरनपुर हत्याकांड को भी चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव का बड़ा मुद्दा बनाया गया। कई सीटों पर राजनीतिक फायदा लिया गया। लेकिन बाद में सीबीआई जांच में मामला सांप्रदायिक नहीं, बल्कि आपसी विवाद का निकला।
नए वनबल प्रमुख को लेकर अटकलें तेज
प्रदेश में नए वनबल प्रमुख की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। मौजूदा वनबल प्रमुख वी. श्रीनिवास राव 31 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन अब तक नए प्रमुख की नियुक्ति के लिए डीपीसी की तारीख तय नहीं हो पाई है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सरकार फिलहाल चार पीसीसीएफ में से किसी एक वरिष्ठ अधिकारी को वन बल प्रमुख का अतिरिक्त प्रभार सौंप सकती है।
वनबल प्रमुख की नियुक्ति में अब केवल वरिष्ठता ही निर्णायक नहीं रह गई है। इसका उदाहरण मौजूदा प्रमुख वी. श्रीनिवास राव हैं, जिन्हें पांच पीसीसीएफ में सबसे जूनियर होने के बावजूद यह जिम्मेदारी दी गई थी। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बार जल्दबाजी में फैसला लेने के मूड में नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि श्रीनिवास राव के साथ 1989 बैच के पीसीसीएफ तपेश झा भी 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में नए वनबल प्रमुख की दौड़ में लघु वनोपज संघ के एमडी अनिल साहू, कौशलेन्द्र कुमार और पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं। हालांकि 31 मई के बाद ओपी यादव भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं।
ओपी यादव फिलहाल एपीसीसीएफ हैं, लेकिन उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नति देने के लिए डीपीसी पहले ही हो चुकी है। संभावना जताई जा रही है कि 31 मई को ही उनके पीसीसीएफ पदोन्नति आदेश जारी हो सकते हैं।
दूसरी ओर, अनिल साहू सबसे वरिष्ठ दावेदार माने जा रहे हैं, लेकिन वे 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसी वजह से प्रशासनिक स्तर पर यह सुझाव भी सामने आया है कि फिलहाल किसी अधिकारी को अस्थायी तौर पर वनबल प्रमुख का प्रभार दिया जाए और जुलाई के बाद नियमित नियुक्ति की जाए। इससे पहले डीजीपी के मामले में भी ऐसा प्रयोग किया जा चुका है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार वन विभाग की इस अहम नियुक्ति को लेकर क्या फैसला करती है।
चीप रेंज की शराब चाहिए...
सुशासन तिहार चल रहा है। सीएम और सरकार के मंत्री, जिलों का दौरा कर जनसमस्याओं के निराकरण के लिए पहल कर रहे हैं। सभी 33 जिलों का प्रशासन तिहार में जुटा हुआ है। इसी बीच सुशासन तिहार में कुछ मांगे ऐसी भी आई है कि जो चर्चा का विषय बन गया है। मसलन, पिथौरा में ग्रामीणों ने आबकारी अफसरों को बकायदा ज्ञापन सौंपकर चीप रेंज की गोवा ब्रांड की शराब उपलब्ध कराने की मांग की है।
यह कहा गया कि शराब दुकानों में महंगी विदेशी शराब ही उपलब्ध है। जबकि ग्रामीण इलाकों में सस्ती शराब पसंद की जाती है। दरअसल, सरकार ने कांच की बोतल में शराब बेचने का नियम बनाया है। इसके चलते देशी शराब की आपूर्ति कम हो रही है। देशी शराब निर्माताओं ने प्लास्टिक की बोतल में शराब के लिए 31 मई तक का समय मांगा है। सरकार ने सहमति दे दी है। प्लास्टिक की बोतल के लिए बाटलिंग प्लांट लगाए जा रहे हैं। एक जून से देशी शराब प्लास्टिक की बोतल में उपलब्ध हो सकेगी। तब ग्रामीणों की शिकायतों का निराकरण भी हो जाएगा।
साव की टिप्पणी से हलचल
प्रदेश भाजपा कार्यसमिति में डिप्टी सीएम अरूण साव की एक टिप्पणी ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। साव ने कहा था कि भाजपा अब बनिया-जैन पार्टी नहीं रही, बल्कि उसकी स्वीकार्यता व्यापक हो चुकी है और देश के 73 फीसदी हिस्सों में पार्टी का विस्तार हो चुका है। उनकी इस टिप्पणी को लेकर संगठन के भीतर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। खासकर बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेता इसे गैरजरूरी टिप्पणी मान रहे हैं।
दरअसल, अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा को अक्सर बनिया-जैन पार्टी कहकर निशाना बनाते थे। उस समय सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे और लखीराम अग्रवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। सरकार जाने के बाद भी पार्टी की यह छवि लंबे समय तक बनी रही। हालांकि भाजपा को केवल बनिया-जैन पार्टी ही नहीं, बल्कि सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी के तौर पर भी देखा जाता रहा, जहां ओबीसी और दूसरे वर्गों को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा होती थी।
महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार को कभी सेठजी-भट्टजी की सरकार कहा जाता था। शरद पवार ने उस दौर में मुख्यमंत्री मनोहर जोशी पर लगातार जातीय समीकरणों को लेकर निशाना साधा था। इसके बावजूद मौजूदा समय में देवेन्द्र फडणवीस जैसे ब्राह्मण नेता मराठा बहुल महाराष्ट्र में लंबे समय तक प्रभावशाली बने रहे। इससे परे पिछड़े तेली समाज से आने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने ओबीसी और अन्य वर्गों में भी मजबूत पकड़ बनाई।
छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन की कमान समय-समय पर ताराचंद साहू, लखीराम अग्रवाल, डॉ. रमन सिंह, शिवप्रताप सिंह, विष्णुदेव साय, धरमलाल कौशिक और अरूण साव जैसे नेताओं के हाथों में रही है। रमन सरकार के दौरान बनिया-जैन समाज से आने वाले बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और गौरीशंकर अग्रवाल जैसे नेता कैबिनेट मंत्री और स्पीकर रहे। आबादी के अनुपात में इस समाज को मिले बड़े प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सवाल भी उठते रहे, लेकिन इन नेताओं की संगठन और सरकार में मजबूत पकड़ तथा स्वीकार्यता के कारण यह मुद्दा ज्यादा नहीं उभरा।
अब हालात बदल चुके हैं। मौजूदा सरकार में बनिया समाज से अकेले राजेश अग्रवाल मंत्री हैं, जबकि संगठन में दूसरे वर्गों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। ऐसे माहौल में अरूण साव की टिप्पणी ने पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेताओं की नाराजगी भी सामने आ रही है। उनका कहना है कि पार्टी को खड़ा करने और विस्तार देने में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में कांग्रेस की पुरानी टिप्पणियां एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
देखें छत्तीसगढ़ के कितने अनुकरणीय
अब राज्यों में गुड गवर्नेंस या नवाचार के नाम पर सचिव के विभाग में रहते या कलेक्टर के जि़ले में पोस्टिंग रहते तक नहीं चलेंगे। उनकी कंटीन्यूटी के लिए भी केंद्र सरकार मेकेनिज्म बनाने जा रही है। इसके लिए पहले राज्यों में चल रही ऐसी योजनाओं या कार्यक्रमों को केंद्र ने मंगाया है।
केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी डॉ. टी वी सोमनाथन ने सभी केंद्रीय सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिव को एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सीलेंस को इंस्टीट्यूशनल बनाने और क्रॉस-स्टेट लर्निंग को बढ़ावा देने 'इनोवेटिव गवर्नेंस प्रैक्टिस' को डॉक्यूमेंट करने का निर्देश दिया है। नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी ) की अगुवाई में, इस स्टडी का मकसद देश भर में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की अलग-अलग सफलता की कहानियों को मॉडल के रूप में बदलना है।
भारत सरकार के सेक्रेटरी और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी को लिखे एक लेटर में, सोमनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑल इंडिया, सेंट्रल और स्टेट सर्विसेज़ में अधिकारियों का बहुत ज़्यादा अनुभव देश के लिए बहुत कीमती है। सभी अधिकारियों को आगामी 31 मई, तक अपनी एंट्री जमा करने के लिए कहा गया है। अधिकारी इंग्लिश, हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में नोट्स जमा कर सकते हैं। हालांकि फ़ॉर्मेट फ्लेक्सिबल है, लेकिन नोट्स टाइप किए हुए होने चाहिए (हाथ से लिखे नहीं) और ज़्यादा से ज़्यादा सात पेज के होने चाहिए। एंट्री पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के किसी भी एरिया को कवर कर सकती हैं, जिसमें आसान वर्कफ़्लो में बदलाव से लेकर बड़े डिजिटल बदलाव तक शामिल हैं। सरकार ने एक सख्त मल्टी-टियर वेटिंग प्रोसेस बताया है ताकि यह पक्का हो सके कि सिफऱ् सबसे असरदार प्रैक्टिस ही आर्काइव की जाएं।
एनसीजीजी पहले नोट्स की रेलिवेंस और इंपॉर्टेंस की जांच करेगा।सबमिशन में किए गए क्लेम का इंडिपेंडेंट वेरिफिकेशन किया जाएगा। कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में सीनियर अधिकारियों का एक हाई-लेवल पैनल फाइनल रिव्यू करेगा। चुनी हुई प्रैक्टिस को कैबिनेट सेक्रेटेरिएट और एनसीजीजी के ऑफिशियल पोर्टल पर साथियों के लिए रेफरेंस गाइड के तौर पर अपलोड किया जाएगा। यह पत्र महानदी भवन को भी मिला है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ से कितनी एंट्रियां जाती हैं और कितने एनसीजीजी की फेहरिस्त में शामिल होती हैं। क्योंकि यहां भी हर जिले में कई नवाचार चल रहे हैं और उन्हें अनुकरणीय बताया जा रहा है।
राजधानी के लिए कब तक होगी ईंधन की बर्बादी
छत्तीसगढ़ की राजधानी अटल नगर-नया रायपुर को विकसित हुए लगभग 20 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे न तो मंत्री और न ही अफसर राजधानी मानते हैं। पुरानी राजधानी रायपुर से नया रायपुर की 17 से 28 किलोमीटर है, जो एक्सप्रेसवे पर 30-45 मिनट का सफर है। रोजाना हजारों कर्मचारी, अधिकारी और मंत्रालयीन स्टाफ निजी वाहनों, सरकारी गाडिय़ों तथा काफिलों के साथ आना-जाना करते हैं। ईंधन संकट के इस दौर में भी इस बर्बादी को रोकन के का उपाय नहीं सोचा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और लोग पैनिक हो रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मितव्ययिता आह्वान पर अपने काफिले को कम किया है और सरकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने की घोषणा की है। मंत्रियों ने भी प्रतीकात्मक कदम उठाए, लेकिन निचले स्तर पर अफसरों से अभी काफी कुछ अमल कराना बाकी है। कुछ अफसरों ने साइकिल पर दफ्तर जाते हुए फोटो खिंचवाई है लेकिन जिनका घर दफ्तर से 25 किलोमीटर दूर हो, वह कैसे कर पाएगा।
इधर भाजपा के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल ने कहा है कि अधिकारियों को कार पूलिंग का निर्देश दिया जाए। हर रोज सैकड़ों गाडिय़ां 40-50 किमी राउंड ट्रिप करती हैं। यदि औसतन 10-12 किमी प्रति लीटर माइलेज मानें तो एक गाड़ी प्रतिदिन 5 लीटर ईंधन खपत करती है। हजारों वाहनों को जोडक़र देखें तो लाखों रुपये का ईंधन रोजाना बर्बाद हो रहा है।
वैसे समस्या की जड़ गहरी है। नया रायपुर में मंत्रालय, सचिवालय और अन्य सरकारी इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी पुराने रायपुर में ही रहते हैं। मंत्रियों का शिफ्ट होना हुआ, पर उनका स्टाफ और अफसर नहीं। आवासीय कॉलोनियों का विकास हुआ है, लेकिन आवंटन और रहना जरूरी नहीं किया। शाम होते ही नया रायपुर जगमगाती रोशनी के बीच घोस्ट सिटी बन जाती है। असल में पेट्रोल डीजल की खपत तब घटेगी जब आवंटित बंगलों, आवासों में अधिकारियों, कर्मचारियों को रहना अनिवार्य किया जाएगा। जिनको आवास नहीं मिले हैं, उन्हें जल्दी आवंटित किया जाना चाहिए। तब तक कार पूलिंग जरूरी करना चाहिए। जिन अफसरों को फिर भी अपनी गाड़ी से ही 50 किलोमीटर आना जाना हो, उनके इंधन और गाड़ी का खर्च सरकार मत उठाए। अधिकारियों, कर्मचारियों के फेडरेशन ने वर्क फ्रॉम होम का सुझाव दिया है, या कहें मांग रखी है। मगर, बहुत सी फाइलें अब भी डिजिटल नहीं हैं, सरकारी दफ्तरों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है जो कर्मचारी- अधिकारी से मिलकर ही संतुष्ट हो पाते हैं। पर, सप्ताह के कुछ दिनों के लिए लागू हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आजमाया जा सकता है कि किन कामों को घर से किया जा सकता है। इन सबके बीच, छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से नवा रायपुर, काम के लिए आने वालों की परेशानी कम नहीं हुई है। वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर इनकी संख्या और स्टापेज कम हैं। इनके लिए नि:शुल्क और रियायती बसें अधिक संख्या में होनी चाहिए। बैटरी चलित बसों का छत्तीसगढ़ के कई शहर इंतजार कर रहे हैं। घोषणा पूरी ही नहीं हुई है।
अगली पीढ़ी की बारी?
प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर चुनावी गतिविधियां शुरू हो रही हैं। चुनाव सीनियर कांग्रेस का नहीं, बल्कि युवक कांग्रेस के पदाधिकारियों का होना है। इसमें पार्टी के सीनियर नेता भी खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं। चर्चा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपनी पसंद के युवा चेहरे को बैठाने के लिए मंथन कर रहे हैं।
युवक कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष आकाश शर्मा और उनकी टीम का कार्यकाल खत्म हो रहा है। जल्द ही चुनाव प्रक्रिया शुरू होने वाली है। आकाश शर्मा भी निर्वाचन के जरिए ही अध्यक्ष बने थे। चर्चा है कि युवक कांग्रेस चुनाव को लेकर देवेन्द्र यादव खास दिलचस्पी ले रहे हैं। आकाश शर्मा को भी उनका करीबी माना जाता है।
सुनत हैं कि देवेंद्र यादव, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वर शरण सिंहदेव (आदी बाबा) को युवक कांग्रेस का चुनाव लड़ाने के लिए प्रयासरत हैं। चर्चा है कि इस सिलसिले में उन्होंने टीएस सिंहदेव से बातचीत भी की है। बताया जाता है कि सिंहदेव ने कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सहमति होने पर ही आदित्येश्वर शरण सिंहदेव को चुनाव लडऩे की अनुमति दी जाएगी। हालांकि भूपेश बघेल ने अब तक अपने इरादे साफ नहीं किए हैं। युवक कांग्रेस का चुनाव लडऩे के इच्छुक कई नेता उनसे मुलाकात कर रहे हैं।
इसी तरह नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत के पुत्र सूरज महंत को भी आगे लाने की कोशिशें चल रही हैं। पूरे घटनाक्रम पर महंत भी फिलहाल खामोश बताए जा रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य नेता पुत्र भी चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।
कमी नहीं फिर भी दिक्कत!
प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कमी का हल्ला है। सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ कर दिया है कि पेट्रोल-डीजल के स्टॉक में कोई कमी नहीं है। बावजूद इसके अफवाह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पेट्रोल-डीजल के लिए पंपों में गाडिय़ों की कतार देखी जा सकती है।
पेट्रोलियम कंपनियों का दावा है कि स्टॉक में कोई कमी नहीं है, तो सवाल उठ रहा है कि किल्लत क्यों है? पेट्रोल पंप डीलर्स कंपनियों पर तोहमत लगा रहे हैं। इन सबके बीच रायपुर कलेक्टर डॉ गौरव कुमार सिंह ने गुरुवार को बैठक रखी। बैठक में पेट्रोलियम कंपनियों और डीलर्स को आमने-सामने बिठाकर कमी पर चर्चा की गई। पेट्रोलियम कंपनियों के प्रतिनिधियों ने साफ किया कि स्टॉक में कमी नहीं है, जबकि डीलर्स ने कहा कि उन्हें मांग के अनुरूप पेट्रोल-डीजल उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
कंपनी प्रतिनिधियों की तरफ से यह भी कहा गया कि शहर में दोपहर के समय टैंकर नहीं पहुंच पाते हैं। इस पर कलेक्टर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अब टैंकर 24 घंटे पहुंचेंगे। इसके लिए उन्होंने यातायात पुलिस को भी निर्देश दिए।
चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि अफवाह के चलते लोग अधिक मात्रा में पेट्रोल-डीजल खरीद रहे हैं और इस वजह से स्टॉक जल्दी खत्म हो रहा है। कलेक्टर ने कंपनियों और डीलर्स को सख्त हिदायत दी कि किसी तरह की किल्लत नहीं होनी चाहिए।
दीपावली भेंट में मानहानि की नोटिस

अब तक अमुमन मानहानि के दावे, केस और वकील की नोटिस दलीय नेताओं, बड़े बिजनेस मैन के बीच होते सुनते और पढ़ते रहे हैं। आज हम सरकारी कर्मचारियों के बीच मानहानि नोटिस और उसके असर की जानकारी दे रहे हैं। राज्य मंत्रालय में खानपान से जुड़े एक विभाग से ऐसी ही खबर गलियारों में सुनी जा रही है। बड़े स्टाफ वाले इस विभाग के कर्मचारी अलग अलग विभागों में तबादले कराने लगे हैं। दरअसल बात कुछ छमाह से चल रही है। दीपावली के समय सौजन्य भेंट का विवाद, इस स्तर तक पहुंच गया है।
विभाग के निगम, और उसके काम में हिस्सेदार ठेकेदारों ने दीपावली पर भेंट दिया था। कर्मचारी कहते हैं कि यह भेंट अकेले एक ही अधिकारी ने रख लिया। इस संदेह के पीछे छिपा संदेश साहब तक पहुंचा। वे परेशान कि उधो का लेना न माधव का देना। बेवजह बदनामी का तनाव अलग। काफी पड़ताल के बाद साहब ने उन कर्मचारियों की फेहरिस्त बनाई जो यह प्रचार कर रहे थे। फिर वकील से संपर्क, सलाह ली। फिर क्या था एक दिन सूचीबद्ध कर्मचारी के हाथ मानहानि की नोटिस पहुंची। ऐसी नोटिस अभी प्रचार में शामिल अन्य के लिए भी स्पीड पोस्ट हो चुकी है। बस इसी से घबराए दुष्प्रचारक विभाग से तबादला कराने में सक्रिय हो गए हैं। इनके तबादले से प्रभावित दूसरे कर्मचारियों ने तहकीकात की तो पूरा खुलासा हुआ। अब वे ही कहने लगे हैं कि प्रचार करो जब पूरे तथ्य हों। वर्ना एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना ही बेहतर होगा।
एआई से बनी अखबार की कतरन

सोशल मीडिया पर इन दिनों पुराने अखबारों की ऐसी तस्वीरें खूब साझा की जा रही है, जिनको पहली असली लगती है। तस्वीर में अंग्रेजी अखबार द हिंदू की हेडिंग और 1967 की तारीख दिखाई गई है। इसमें एक बच्चे को मगरमच्छ पकडऩे वाला बहादुर बच्चा बताया गया है, जबकि बाद में उसे छिपकली निकाला जाना दर्शाया गया है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन और उनके पुराने दावों से जोडक़र व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
यह तस्वीर एआई से तैयार की गई फर्जी सामग्री है। तस्वीर में कई ऐसी कमियां हैं, जिनसे इसकी वास्तविकता आप तुरंत पकड़ सकते हैं। सबसे पहले, अखबार के डिजाइन और फॉन्ट का संतुलन पुराने द हिंदू के वास्तविक संस्करणों से मेल नहीं खाता। हिंदी और अंग्रेजी टेक्स्ट की शैली अलग-अलग और अस्वाभाविक है। कई जगह अक्षरों का आकार असमान है तथा शब्दों के बीच की दूरी भी अनियमित है,
इसके अलावा खबर के भीतर प्रयुक्त भाषा भी कृत्रिम और हास्य-प्रधान है, जबकि उस दौर में समाचार लिखने की शैली अधिक औपचारिक होती थी। तस्वीर में छपी कुछ छोटी हेडिंग और टेक्स्ट धुंधले तथा अर्थहीन नजर आते हैं। फोटो और लेआउट में भी अस्वाभाविक चमक है।
सांसद-विधायक कार्यकर्ताओं संग बिताएंगे रात
भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की पहली बैठक गुरुवार को प्रदेश कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में आयोजित हुई। बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश विशेष रूप से मौजूद रहे। पूर्व राज्यपाल रमेश बैस भी मंच के बजाय आम सदस्यों के बीच बैठे नजर आए, जिसकी कार्यकर्ताओं के बीच काफी चर्चा रही।
कार्यसमिति में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में पार्टी की जीत पर चर्चा हुई तथा वहां प्रचार के लिए गए नेताओं को बधाई दी गई। इस दौरान शिव प्रकाश ने संगठन पदों को लेकर कार्यकर्ताओं को नसीहत देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को पद देना संभव नहीं है, लेकिन पार्टी के लिए निरंतर काम करते रहना चाहिए।
बैठक में जिला स्तर पर चिंतन शिविर आयोजित करने का फैसला भी लिया गया। इन शिविरों में सांसद, विधायक और संबंधित जिले के मंत्री शामिल होंगे। दो दिन तक जिला पदाधिकारी एक साथ रहकर संगठन, आगामी कार्यक्रमों, स्थानीय समस्याओं और आपसी विवादों पर मंथन करेंगे।
रायपुर जिले का चिंतन शिविर 23 और 24 मई को अग्रसेन धाम में प्रस्तावित है। इसमें सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष भी शामिल होंगे। खास बात यह रहेगी कि सांसद-विधायकों को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ रात्रि विश्राम करना होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन शिविरों से संगठन को लेकर क्या नए संकेत और फैसले सामने आते हैं।
टॉपर मॉडल का भय तोडऩे वाला रिजल्ट
बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।बुधवार को घोषित सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन यानि सीबीएसई के रिजल्ट के प्रतिशत में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी गिरावट देखी गई। यहां 80.88 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछली बार से 1.29 प्रतिशत कम है। इस नतीजे से जुड़ी कई बातें ध्यान खींचती हैं। कॉपियों की ऑनलाइन जांच की गई और मॉडरेशन के कड़े मानक रखे गए। इसके चलते टॉपर्स की संख्या घट गई। 99 प्रतिशत अंक हासिल करने की होड़ पर थोड़ा अंकुश लग गया और किसी को, अभी तक तो शिकायत ही नहीं कि कॉपी गलत जांची गई। डिजिटल इंडिया के दौर में कॉपियों की जांच के लिए यह तकनीक अपने स्कूल-कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में भी अपनाई जा सकती है, पर ऐसा नहीं किया जाता। प्राय: कॉपियों को गलत जांचने को लेकर विवाद होता है। विश्वविद्यालयों में तो इसके लिए प्रदर्शन और हंगामे भी होते रहते हैं।
इधर, नेशनल लेवल पर दिलचस्प तथ्य यह रहा कि ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों का परिणाम शत-प्रतिशत था। जागरूक होता यह वर्ग समाज में बराबरी की जगह हासिल करने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे परिणाम देने के बावजूद, वह जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। सौ फीसदी पास ट्रांसजेंडर छात्र कह सकते हैं कि आप अवसर दें या न दें, हम किसी पहचान के मोहताज नहीं।
दूसरा तथ्य यह है कि कला के विषयों में या अतिरिक्त गतिविधियों में परीक्षा दिलाने वाले विद्यार्थियों का परिणाम भी लगभग 100 फीसदी ही रहा। पेंटिंग, संगीत, नृत्य, योग, फाइन आर्ट्स और होम साइंस जैसे विषयों में औसत से बेहतर नतीजे आए हैं। यह आम धारणा है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्य ही सफलता का रास्ता है। इसी से आप मेडिकल, इंजीनियरिंग, बिजनेस या आईटी जैसे मुकाम हासिल पाएंगे। मगर, जिन छात्र-छात्राओं ने अलग हटकर विषयों को लिया, उनके बारे में नहीं कह सकते कि वे अपने करियर को लेकर लापरवाह होंगे। उन्होंने होड़ से अलग रास्ता चुना। दावा नहीं किया जा सकता लेकिन अनुमान लगा सकते हैं कि जिन बच्चों ने अलग विषय चुने वे जानते हैं कि अवसर उनके लिए भी है और उसमें प्रतिस्पर्धा शायद कम ही हो।
नई शिक्षा नीति में बहु विषयक पढ़ाई और कौशल आधारित पाठ्यक्रम पर जोर तो दिया गया है पर अभिभावकों और छात्रों के बीच रूझान की दिक्कत बनी हुई है। अपने छत्तीसगढ़ की बात करें तो अधिकांश स्कूलों में इन विषयों के शिक्षक भी नहीं मिलेंगे। शिक्षा विभाग के पास तनाव यही होता है कि वे कैसे भौतिक, रसायन, गणित के टीचर्स की व्यवस्था करें। स्कूलों में डिमांड भी इसी की होती है। शायद ही कहीं सुनने को मिले कि संगीत, होम साइंस, पेंटिंग, योगा के टीचर्स दो। यह सोचना सही नहीं होगा कि ऐसे अलग विषयों को चुनने वाले विद्यार्थी वैज्ञानिक सोच नहीं रखते। पर, उन्हें अभिभावक और शिक्षक प्रोत्साहित नहीं करते।
दो बातें अब नई नहीं रह गई है। स्टेट एजुकेशन बोर्ड में भी और सेंट्रल में भी। एक, लगातार बीते कुछ वर्षों से बड़े शहरों के मुकाबले गांव देहात के बच्चे ज्यादा अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। शायद इसका कारण यह हो कि हमारी इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर-दराज तक पहुंच चुकी है और शहरों में, ये कनेक्टिविटी पहले से तो थी, पर अब बच्चों के मन भटकाने के लिए बहुत से क्लब, कैफे, खुल चुके हैं। दूसरा, लड़कियां, छोरों से कम नहीं हैं। उनका रिजल्ट एसबीएसई में भी वैसा ही है जैसा अपने यहां माशिमं के रिजल्ट में था। बिहार के शिक्षा मंत्री के कान में यह बात पहुंची होगी तो शायद वे मानसिकता बदलेंगे, जो कहते हैं कि लड़कियों को पढऩे की क्या जरूरत, घर संभालने का प्रशिक्षण लें। उनको छोडिय़े, रिजल्ट की समीक्षा केंद्र और राज्यों के मंत्रालयों के अफसरों को करनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि किन विषयों में बच्चे बेहतर कर रहे हैं, किन क्षेत्रों में उनकी रुचि बढ़ रही है और कैसी शिक्षा उनमें अधिक आत्मविश्वास भर सकती है।
श्रीनगर स्टेशन पर रुकी एक उम्र की यात्रा
पिछली बार आया था तो श्रीनगर तक रेल नहीं आई थी। इस बार श्रीनगर रेलवे स्टेशन को अपने कैमरे में सहेज कर साथ लेता आयाज् साथ में उसकी अनुभूति भी।
तस्वीर में बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार, 80 वर्षीय सतीश जायसवाल श्रीनगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं। सामने हिमालय की पहाडिय़ां हैं, ऊपर खुला आसमान और बीच में चमचमाती रेल पटरियां। सतीश के शब्द उस पीढ़ी की स्मृति है जिसने कश्मीर को कभी दूर, कठिन और लगभग दुरूह यात्रा की तरह देखा था। अभी इसी महीने कश्मीर रेल के जरिए देश के कोने-कोने से जुड़ रहा है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग या छत्तीसगढ़ के किसी छोटे शहर में बैठा एक साधारण यात्री अब यह सोच सकता है कि वह भी कुछ ही घंटों में श्रीनगर की वादियों तक पहुंच सकता है।
लगे हाथ इस नई सुविधा के बारे में आपको बताते चलें। जम्मू-श्रीनगर वंदे भारत एक्सप्रेस शुरू हो चुकी है, दो ट्रेनें हैं। एक सुबह छूटती है दूसरी दोपहर में। शुरुआती दस दिनों में लगभग 45 हजार यात्रियों ने सफर किया। भीड़ इतनी है कि 20 कोच वाली दोनों ट्रेनें भी लगभग पूरी क्षमता से चल रही हैं।
इस ट्रेन से सफर करके लौटे एक पर्यटक का कहना है कि लंबी जोखिम सडक़ यात्रा भी नहीं करनी है, महंगी हवाई उड़ानों पर निर्भरता भी नहीं रही। जम्मूतवी से वंदे भारत ट्रेन लगभग पांच घंटे में यात्रियों को घाटी तक पहुंचा रही है। रास्ते में चेनाब और अंजी जैसे अद्भुत पुल मिलेंगे। लंबी सुरंगें और पहाड़ों के बीच रेल गुजरती है। मान लो कि यह यात्रा ही रोमांचक पर्यटन है।
कश्मीर हमेशा सुंदर था, लेकिन अब वहां तक पहुंचना भी सुंदर हो गया है।
लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत
छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सोमवार को बिलासपुर प्रवास के दौरान लगरा स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने आम नागरिकों की तरह अपनी ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी कराई। बिना किसी विशेष व्यवस्था के उन्होंने निर्धारित नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं और पांच वर्षों के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया।
दोपहर करीब दो बजे शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान डॉ. महंत ने अपनी बारी आने का इंतजार किया। इसके बाद उन्होंने फोटो खिंचवाने से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर तक की सभी जरूरी प्रक्रियाएं सामान्य आवेदक की तरह पूरी कीं। कुछ ही समय में उनका ड्राइविंग लाइसेंस अगले पांच साल के लिए रिन्यू हो गया।
काम पूरा होने के बाद उन्होंने आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों का सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सादगी और नियमों के पालन को लेकर चर्चा होती रही। डॉ. महंत ने अपने इस अनुभव को सोशल मीडिया पर भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि वे नियमों का पालन करें और अपने जरूरी दस्तावेज समय-समय पर अपडेट रखें। उन्होंने आरटीओ कार्यालय की व्यवस्था और कर्मचारियों के सहयोग की भी सराहना की।
कांग्रेस में बदलाव अगस्त से पहले या...
प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। इसी बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया है। वह बिलाईगढ़ गए थे और फिर रायगढ़ पहुंचकर कोयला खदान प्रभावितों से भी मिले। वह पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के घर जाकर मेल-मुलाकात भी कर रहे हैं। सिंहदेव की सक्रियता को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है। वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी रुचि प्रदेश अध्यक्ष बनने में है।
दीपक बैज का कार्यकाल अगस्त में खत्म हो रहा है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें बदला जा सकता है। सिंहदेव के दौरों को इससे जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा है कि सिंहदेव यूं ही सक्रिय नहीं हुए हैं। करीब दो माह पहले उनकी राहुल गांधी से डेढ़ घंटे तक अकेले में चर्चा हुई थी। इसके बाद ही वह ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे।
हालांकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पूर्व सीएम की दखल के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बालोद विधायक संगीता सिन्हा की नियुक्ति हुई। जबकि टीएस सिंहदेव ने पूर्व विधायक छन्नी साहू का नाम आगे बढ़ाया था। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व सीएम की ओर से अभी कोई नया नाम सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि वह पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। फिलहाल नई नियुक्ति तक कांग्रेस में खींचतान जारी रहने के आसार हैं।
घोटाले जब लोक अदालत जाने लगें...
सन् 2003 के सीजी पीएससी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुलह की पहल ने वंचित याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पुराने जख्म फिर कुरेद दिए हैं। यह याद रखना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पहले लोक सेवा आयोग के खिलाफ जो फैसला दिया था, उसके पीछे साफ-साफ भर्ती घोटाला पाया जाना था। अदालत में यह साबित हुआ था कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई, अंकों में हेराफेरी हुई, अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और पात्र उम्मीदवारों को या तो चयन से बाहर कर दिया गया या फिर छोटे पदों पर समायोजित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्केलिंग प्रक्रिया को दोबारा निर्धारित करते हुए पूरी चयन सूची नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन इस फैसले पर अमल हो पाता, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से उन अभ्यर्थियों को स्थगन मिल गया, जिनकी स्थिति नई चयन सूची बनने के बाद प्रभावित हो रही थी। कई लोगों को निचले पदों पर जाना पड़ता या चयन सूची से बाहर होना पड़ता। सन् 2007 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक अंतिम फैसला नहीं आ सका है।
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर उस समय सवाल उठे थे, वे सवाल आज भी कायम हैं। कई अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बन चुके हैं। कुछ जिलों में कलेक्टर हैं तो कुछ मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी, जो खुद को वंचित मानते हैं, छोटे पदों पर वर्षों से सेवा कर रहे हैं। उनकी सेवा अवधि अब इतनी हो चुकी है कि वे चाहें तो वीआरएस लेकर पेंशन के हकदार बन सकते हैं।
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से लोक अदालत का सुझाव सामने आया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है, लोक सेवा आयोग ने की है या फिर किसी पक्षकार ने इसका सुझाव दिया है। लेकिन मूल याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उनका कहना है किहमें सुलह नहीं, न्याय चाहिए।
दिलचस्प बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में थी और यह लगभग तय माना जा रहा था कि फैसला सीजी पीएससी के खिलाफ जाएगा, तब भी आयोग की ओर से समझौते की पेशकश की गई थी। जिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे डिप्टी कलेक्टर पद के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें याचिका वापस लेने की शर्त पर वही पद देने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उस समय भी याचिकाकर्ताओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्हें कथित भ्रष्ट चयन प्रक्रिया ने बाहर कर दिया।
वैसे, लोक अदालत में भी न्याय ही होता है। वहां दोनों पक्षों की सहमति से समाधान निकलता है और तभी आदेश पारित होता है जब सभी पक्ष संतुष्ट हों। लेकिन यदि इस मामले में लोक अदालत के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाता है, तो उसकी शक्ल क्या होगी?
एक संभावना यह हो सकती है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा की बची हुई अवधि के लिए वही अवसर दिया जाए, जो हाईकोर्ट के फैसले से पहले प्रस्तावित था। इसके लिए राज्य शासन और लोक सेवा आयोग दोनों की सहमति जरूरी होगी।
दूसरा सवाल उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों को लेकर है, जिन्होंने कथित रूप से गलत आधार पर चयन किया। क्या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की बात भी समझौते का हिस्सा होगी? अब तक वे कानून के शिकंजे से लगभग बाहर ही रहे हैं।
सबसे जटिल प्रश्न उन अधिकारियों को लेकर है, जो वर्षों से कथित गलत चयन के आधार पर सेवा लाभ लेते रहे हैं। क्या उन्हें पद से हटाया जाएगा? क्या पदावनत किया जाएगा? व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन और जोखिम भरा कदम होगा। संभव है कि लोक अदालत में वे पक्षकार ही न हों, और यदि कोई प्रतिकूल निर्णय हुआ तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
ऐसे में समझौते का स्वरूप शायद कुछ ऐसा हो सकता है, अतीत को पीछे छोडक़र भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करो। जिन अभ्यर्थियों को पीडि़त माना जा रहा है, उनकी सेवा के अभी भी कुछ वर्ष शेष हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर ले लिया जाए। लेकिन क्या उन्हें एरियर सहित पिछला वेतन, वरिष्ठता और पेंशन गणना का लाभ भी मिलेगा? स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।
एक बड़ा सवाल और भी खड़ा होता है, क्या सरकारी भर्तियों में हुए घोटालों का समाधान लोक अदालत के जरिए किया जा सकता है? यदि सीजी पीएससी-2003 मामले में लोक अदालत कोई रास्ता निकालने में सफल होती है, तो फिर क्या सीजी पीएससी-2021 में हुए घोटाले के लिए भी ऐसे ही समाधान का रास्ता निकल जाएगा?
मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?
ईडी ने अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की जांच तेज कर दी है। ताजा खबर यह है कि जांच एजेंसी ने बैंक के आधा दर्जन ऐसे खातों का पता लगाया है, जिनमें करोड़ों का लेनदेन हुआ है। इन खातों का ब्यौरा मांगा गया है। यह भी जानकारी सामने आई है कि बैंक से जुड़ी शाखाओं में वर्ष 2013-14 से गड़बड़ी शुरू हो गई थी और करीब 10 साल बाद इसका खुलासा हुआ।
बताते हैं कि बैंक में करोड़ों की गड़बड़ी की जानकारी विभाग के आला अफसरों को पहले से थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस ने धोखाधड़ी के प्रकरण में बैंक अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, तब जाकर राज्य स्तरीय जांच टीम बनाई गई। यह टीम कई बार अंबिकापुर गई, लेकिन गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी नहीं जुटा पाई। अब ईडी ने जांच शुरू की है, तो राज्य स्तरीय जांच टीम से भी पूछताछ हो सकती है।
भारतमाला परियोजना में राज्य की एजेंसी ने पहले छोटी मछलियों पर ही कार्रवाई की थी, लेकिन ईडी ने कई बड़े लोगों को भी घेरे में लिया, जो अब तक जांच से बचे रहे थे। हालांकि बैंक घोटाले में अभी तक ईडी की ओर से कोई नई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन चर्चा है कि कई प्रभावशाली लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
छत्तीसगढ़ की गलती केरल में दोहराती कांग्रेस
पांच राज्यों के नतीजे आए एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके, शपथ-ग्रहण भी हो चुका, लेकिन एक राज्य, केरल जहां कांग्रेस को सरकार बनानी है, अभी तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल नहीं हुआ है। वैसे तो वहां के विधायक दल ने कांग्रेस हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया है, पर विधायकों के तीन गुट हैं, जो अलग-अलग नामों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि समर्थक शक्ति प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अतीत से पता चलता है कि ऐसे मामले में भारतीय जनता पार्टी के उलट कांग्रेस हाईकमान मजबूती से और जल्दी फैसला नहीं ले पाता। सन् 2018 में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई तो पार्टी नेतृत्व के सामने यही संकट था। अंत में दोनों दावेदारों को ढाई-ढाई साल का टर्म देने की बात हुई। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया था और सिंहदेव अपने टर्म के लिए हाईकमान के फैसले की प्रतीक्षा करते रहे। बघेल खेमे को दिल्ली में विधायकों की परेड कर बताना पड़ा कि बहुमत उनके साथ है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डी. शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल का समझौता हुआ, प्रचारित था, पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं है और शिवकुमार के समर्थकों में असंतोष देखा जा रहा है। केरल में अजीब स्थिति है। यहां ढाई-ढाई साल की सांत्वना से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यहां तीन दावेदार हैं। पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे बीडी सतीसन, वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आईयूएमएल ने सतीसन के नाम का समर्थन किया है, लेकिन उन्हें वेणुगोपाल के नाम पर आपत्ति है। उसका कहना है कि उन्होंने तो विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस समय वे सांसद हैं। मगर, दिलचस्प यह है कि केरल में अधिकांश टिकट वेणुगोपाल ने ही फाइनल किए हैं, और 40 से अधिक विधायक उन्हें सीएम बनाना चाहते हैं। कांग्रेस यहां 63 सीटों पर विजयी रही, गठबंधन के साथ उसे 102 सीटें मिली हैं।
याद कीजिए सन् 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया। सीएम बनने की कतार में जिन नामों की चर्चा थी, उनको भी निराश होना पड़ा। उसके पहले के लोकसभा चुनाव में सारे सीटिंग सांसदों की टिकट काट दिया था। पर, कांग्रेस के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार होने के दौरान छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई ने एक दूसरे को निपटा दिया। ऐसा ही कुछ ढुलमुल रवैया कांग्रेस हाईकमान का मध्यप्रदेश और राजस्थान के मामले में देखा गया। मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे कर दिया, जबकि वे सीएम के दावेदार थे। उनके समर्थक विधायकों ने मिलकर सरकार ही गिरा दी। सन् 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक झटके में शिवराज सिंह चौहान के टर्म को समाप्त कर दिया, मगर सिंधिया को भी मौका नहीं दिया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बीच में तो नहीं गिरी, पर छत्तीसगढ़ की तरह 2023 के चुनाव में गिर गई। यहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जबरदस्त खींचतान है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मामले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, अभी अगला विधानसभा चुनाव दूर है। दरअसल, कांग्रेस के पास यह समस्या तब से है, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है। प्रदेश के असंतुष्ट नेताओं को वैकल्पिक किसी बड़े ओहदे में बिठा देने का विकल्प नहीं है।
जब रायपुर की बैलगाडिय़ों में भरती थी ‘हवा’

एक ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद कहानी समझे ( गोकुल सोनी )
आज मैं आपको रायपुर का एक ऐसा किस्सा सुनाना चाहता हूं, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद सुनकर हंस भी दे और हैरान भी हो जाए।
जब महापौर जीप में बैठकर करते थे शहर का दौरा...........
सत्तर के दशक की बात है। उन दिनों तरुण दादा एक बार पहले भी रायपुर के महापौर रह चुके थे। शायद तब महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का हुआ करता था। उसी दौर में आर.एन. मूर्ति जी और स्वरूपचंद जैन जी भी महापौर बने थे। उस समय नगर निगम के पास एक पेट्रोल से चलने वाली सफेद रंग की जीप हुआ करती थी। तरुण दादा उसी जीप में सामने बैठकर पूरे शहर का दौरा किया करते थे।
आज की तरह न बड़ी-बड़ी गाडिय़ों का काफिला होता था और न चमक-दमक। शहर छोटा था, लोग सीधे थे और काम भी धीरे मगर टिकाऊ होता था।
जब सडक़ बनाना किसी तपस्या से कम नहीं था..........
आज तो रातों-रात मशीनें आकर सडक़ बना देती हैं। लेकिन उस समय एक किलोमीटर सडक़ बनने में तीन-चार दिन लग जाते थे।
सडक़ किनारे भ_ी बनाई जाती थी। उसमें लकडिय़ां जलती रहती थीं। ऊपर डामर के खाली ड्रम को काटकर बड़ी कढ़ाई जैसी बनाई जाती थी, जिसमें डामर पिघलाया जाता था।
फिर मजदूर रेत, गिट्टी और डामर का घोल तैयार करते और हाथों से सडक़ बिछाते थे। बाद में स्टीम इंजन वाली भारी-भरकम रोड रोलर उसे दबाकर समतल करती थी। उस दौर में सडक़ बनाना केवल काम नहीं, मेहनत और धैर्य का इम्तिहान था।
बैलगाडिय़ां बनीं नई समस्या............
चूंकि सडक़ें इतनी मेहनत से बनती थीं, इसलिए उनकी देखरेख भी बहुत जरूरी मानी जाती थी। उसी समय शहर में बड़ी संख्या में बैलगाडिय़ां चलती थीं। खासकर गुढियारी के थोक बाजार से सामान दुकानों तक पहुंचाने के लिए हमाल और व्यापारी बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करते थे।
उन बैलगाडिय़ों के पहियों पर मोटे लोहे का पट्टा चढ़ा होता था, जिसे छत्तीसगढ़ी में च्च्बाटज्ज् कहते हैं। यही लोहे की बाट नई डामर वाली सडक़ों को जल्दी खराब कर देती थी। अधिकारियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।
बैलगाड़ी बंद करें या लोगों की रोजी बचायें ?.............
कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि शहर में बैलगाडिय़ों के चलने पर रोक लगा दी जाए। लेकिन परेशानी यह थी कि सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी उन्हीं बैलगाडिय़ों पर टिकी थी। उन्हें बंद करना आसान नहीं था।
फिर किसी ने एक अनोखा सुझाव दिया — क्यों न बैलगाड़ी के पुराने लकड़ी और लोहे वाले पहियों की जगह ट्रक के टायर लगा दिए जाएं ? बस, यहीं से रायपुर में एक नया प्रयोग शुरू हुआ।
नगर निगम के सामने लग गई भीड़..........
नगर निगम से आदेश निकला कि जिसके पास भी बैलगाड़ी है, वह अपना पंजीयन कराए। फिर क्या था, नगर निगम कार्यालय के सामने बैलगाड़ी वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने गाड़ों का रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचे।
धीरे-धीरे पुरानी लोहे की बाट वाले पहिए हटाए गए और उनकी जगह ट्रक के टायर वाले पहिए लगाए जाने लगे। उस समय रायपुर की सडक़ों पर बैलगाड़ी और ट्रक के टायर का यह अनोखा मेल लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया था।
जब बैलगाड़ी में भी भरती थी हवा..........
अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए, एक तरफ बैलगाड़ी खड़ी है, सामने बैल बंधे हैं और दूसरी तरफ पंचर दुकान वाला मशीन से उसके टायर में हवा भर रहा है। आज यह सुनने में सामान्य लगेगा, लेकिन उस समय यह दृश्य इतना अनोखा था कि लोग रुक-रुककर देखते थे।
जब मैं नया-नया फोटो जर्नलिस्ट बना था, तब मैंने पहली बार ऐसा दृश्य देखा। देखा तो पहले भी था तब एक फोटोजर्नलिसट का नजरिया नहीं था। मुझे वह इतना अलग लगा कि मैंने तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली। बाद में वह फोटो नवभारत अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।
धीरे-धीरे खत्म हो गया वह दौर............
फिर समय बदला। शहर में तीन पहिया ऑटो आये, मेटाडोर आये और धीरे-धीरे ट्रक के टायर वाली बैलगाडिय़ां सडक़ों से गायब होने लगीं। बताते हैं कि कुछ साल पहले तक कन्हैया साहू नाम के एक गाड़ीवान ऐसी बैलगाड़ी चलाते दिखाई दे जाते थे। लेकिन उनके निधन के बाद रायपुर से यह दृश्य भी हमेशा के लिए खत्म हो गया।
अब केवल यादों में बची
हैं वे बैलगाडिय़ां..........
आज की पीढ़ी शायद यकीन भी न करे कि कभी रायपुर में ऐसी बैलगाडिय़ां चलती थीं जिनमें ट्रक के टायर लगे होते थे और पंचर दुकानों पर उनमें हवा भरी जाती थी। लेकिन यही तो पुराने रायपुर की खूबसूरती थी। यह शहर हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा किस्सा छुपाकर बैठा है, जिसे सुनते ही पुराना दौर आंखों के सामने चलती तस्वीर की तरह जीवंत हो उठता है।
पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर
गरियाबंद के माडागांव के समाधान शिविर में पीएम आवास के लिए एक कमार दंपत्ति ने जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैर पकडक़र गुहार लगाई, तो हडक़ंप मच गया। इसकी खबर सोशल मीडिया के जरिए सीएम हाउस तक पहुंची, तो मामले को संज्ञान में लिया गया। कमार जनजाति राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं। जब कमार दंपत्ति ने प्रखर चंद्राकर के पैर पकड़े, तो वो हड़बड़ा गए। प्रखर धमतरी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने तुरंत इसकी पड़ताल करवाई। यह पता चला कि परिवार का नाम पूर्व के आवास सर्वे में शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि वे लंबे समय तक उड़ीसा में निवासरत थे।
यह बात सामने आई, कि वर्ष 2011, 2018 और 2024 के सर्वेक्षण के दौरान भी परिवार गांव में मौजूद नहीं था। हाल ही में परिवार के छत्तीसगढ़ लौटने के बाद पीएम जनमन योजना के तहत उनका सर्वे पूरा कर लिया गया है और जल्द ही आवास स्वीकृत करने का भरोसा दिलाया गया।
चूंकि सीएम हाउस ने मामले को संज्ञान में लिया, तो प्रशासन ने समाधान शिविर में परिवार का राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी बना दिए। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अफसरों ने परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। परिवार को तुरंत राहत देने की कोशिश की गई।
व्यापारी कल्याण बोर्ड को लेकर हलचल
पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब प्रदेश के निगम-मंडलों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की चर्चा तेज हो गई। इन्हीं में व्यापारी कल्याण बोर्ड के गठन की भी तैयारी है। भाजपा के संकल्प पत्र में व्यापारी वर्ग के लिए बोर्ड के गठन का वादा किया गया था। अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए व्यापारी नेताओं में होड़ मची है।
भाजपा के कई व्यापारी नेता अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में उन्हें भी बोर्ड अध्यक्ष के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, पार्टी के दो पूर्व विधायक लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी की भी दावेदारी है। दोनों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली थी।
यही नहीं, कई और व्यापारी नेताओं के नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें सुभाष अग्रवाल, और सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा का नाम भी लिया जा रहा है। बरलोटा चैम्बर के अलग-अलग पदों पर रहे हैं। इन सबके बीच निगम मंडलों में उपाध्यक्ष, और संचालक मंडल के सदस्यों के पदों पर भी नियुक्तियां हो सकती हैं। ऐसे करीब सौ से अधिक पद रिक्त हैं जिन पर नियुक्तियां होनी है। नामों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। देखना है सूची कब तक जारी होती है।
स्टेशनों से मिटेंगे अंग्रेजों के निशां मगर...
एक तरफ सरकार घर घर से ऐतिहासिक पांडुलिपियां, और सनातनी प्रतीक चिन्हों के संग्रह का देशव्यापी अभियान छेड़े हुए है और दूसरी ओर
मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के रखे गए नाम बदलने, उनके बनाए गए भवनों को तोडऩे का सिलसिला जारी रखे हुए है। राजभवन को लोक भवन किया जा चुका है तो अब सिविल लाइन बदलने वाला है। इस श्रृंखला में रेलवे ने भी अपने कदम बढ़ाएं हैं। वह भी मोस्ट अर्जेंटलि।
रेलवे बोर्ड ने देशभर के सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल के बीएनआर (बंगाल नागपुर रेलवे)रेलवे के उन तमाम प्रतीकों, प्रथाओं और अवशेषों को हटा दिया जाए, जो गुलामी की याद दिलाते हैं। इसके बाद से रेलवे का हर छोटा- बड़ा कर्मचारी -अधिकारी निशां ढूंढने में जुट गया है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन के रेलवे स्टेशनों में वैसे तो ऐसे निशां नहीं के बराबर हैं। जो है उसे हटाने के लिए तोड़ा जाना होगा। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर स्टेशन भवन की। यह स्टेशन बिल्डिंग लगभग 135 से 137 साल पुरानी है, जिसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान 1889-1890 में हुआ था। कुछ इतना ही नागपुर स्टेशन भी इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन भी बिलासपुर जोन में आता है। पूर्व के वर्षों में इन पुरानी इमारत को अभी भी एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की भी योजना रेलवे ने बनाई थी। अब तोडऩे का तो नहीं अंग्रेजों की यादें मिटाने का आदेश आया है। निकट भविष्य में तोड़ा नहीं जाता है तो अमृत भारत स्टेशन योजना में स्वरूप बदला जाएगा। रायपुर स्टेशन में भी प्लेटफार्म नंबर एक के दाहिने सिरे में रेल डाक दफ्तर के पास अंग्रेज़ों का बनाया एक छोटा सा केबिन हुआ करता था।जो रेल मंडल बनने के बाद प्लेटफॉर्म विस्तार में तोड़ दिया गया था। इसके अलावा यहां कोई निशान बाकी नहीं रह गए हैं। अब यह सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि निशां मिटाने के बाद अफसरों से अंग्रेजियत मिट पाएगी। इससे सहमत, असहमत होकर रेलवे बोर्ड के इस आदेश की जानकारी शेयर करने वाले एक अफसर ने कहा कि रेलवे अब ब्रिटिश विरासत के बोझ से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।
सरकारी छात्रावास का ऐसा प्रचार
सरकारी मदद से चलने वाले संस्थानों का इस तरह का प्रचार कम ही देखने को मिलता है। बिलासपुर के आदिवासी विकास विभाग ने अपने छात्रावासों में दाखिले का रंग बिरंगा पर्चा कराया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि छात्रावासों में साफ-सुथरा भवन, लगातार बिजली, बिस्तर की पूरी व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अलग कमरा, अच्छा खाना, खेलकूद, योग, संगीत और कला जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी मुफ्त मिलेगा।
इतना ही नहीं, पर्चों में अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं, ताकि छात्र-छात्राएं सीधे संपर्क कर प्रवेश ले सकें। अच्छी पहल लगती है। अगर सचमुच छात्रावासों में ऐसी सुविधाएं मिलें, तो बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह राहत की बात होगी। कौन पालक नहीं चाहेगा, यहां उनके बच्चों को मौका मिल जाए। फिर, अगर कोई कमी भी रही, तो छात्र सीधे शिकायत भी कर सकेंगे, क्योंकि विभाग ने खुद इन सुविधाओं का वादा किया है।
लेकिन इस पूरे प्रचार का दूसरा मतलब भी निकल जाता है। सवाल है कि क्या सरकारी छात्रावासों में अब पर्याप्त संख्या में छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों की तरह आदिवासी छात्रावासों में भी बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। कल इनको भी बंद नहीं करना पड़ जाएगा?
याद कीजिए, पिछले दो साल में कई सरकारी स्कूल- जिनमें शहरी स्कूल, आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूल भी थे-यह कहकर बंद कर दिए गए कि वहां बच्चों की संख्या कम हो गई है। यदि सरकारी स्कूल भी इसी तरह लोगों को बुलाते नजर आते, हमारे यहां आइए, अच्छे शिक्षक हैं, बढिय़ा भवन है, खेल का मैदान है, अच्छी पढ़ाई होती है, तो शायद उनको बंद करने की नौबत नहीं आती।
पुराना वीडियो, नया हंगामा
एमसीबी जिले के कांग्रेस नेता और चिरमिरी के पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बना है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो। वीडियो में वे सडक़ पर कार की बोनट पर केक काटते नजर आ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे वीडियो सामने आते ही पुलिस तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है, खासकर तब से जब हाईकोर्ट ने सडक़ पर केक काटने और सार्वजनिक जगहों पर हुड़दंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
लेकिन इस मामले में कहानी थोड़ी अलग है। डॉ. जायसवाल खुद थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि वायरल किया जा रहा वीडियो नया नहीं, बल्कि साल 2021 का है। इसे हाल का बताकर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तारीख का वीडियो बताया जा रहा है, उस दिन वे शिर्डी में थे, जिसके सबूत हैं उनके पास।
डॉ. जायसवाल का तर्क है कि सडक़ पर केक काटने जैसे मामलों पर सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश हाईकोर्ट ने साल 2025 में दिए। अदालत के निर्देश आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया।
हो सकता है उनका स्पष्टीकरण सही हो। उन्होंने भी खुद मान लिया है कि वीडियो 2021 का है। उस समय वे विधायक थे और संभव है कि समर्थकों के उत्साह में ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बने हों।
मगर, यह भी याद रखना चाहिए कि सडक़ पर इस तरह आयोजन करना 2025 से पहले भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन था। ट्रैफिक बाधित करना, सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति कार्यक्रम करना और शांति भंग करना, इन सबको लेकर कानून तब से मौजूद थे। फर्क सिर्फ इतना है कि बाद में जब पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के कई मामलों में कार्रवाई नहीं की, तब हाईकोर्ट को सख्त टिप्पणी कर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नसीहत दी गई।
तारीफ और महत्व
पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा खेमे में भी उत्साह का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा शनिवार को कोलकाता पहुंचे और नए सीएम सुवेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए।
समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। मंच पर विजय शर्मा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ठीक पीछे खड़े नजर आए। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने तंज कसते हुए पोस्ट किया कि बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले गृहमंत्री को मंच पर कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, पीएसओ की जगह खड़े हैं।
इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया। भाजपा समर्थकों ने पलटवार करते हुए लिखा कि बड़े नेताओं के भरोसेमंद लोग अक्सर मंच के पीछे रहकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तस्वीरों से ज्यादा अहमियत भूमिका की होती है।
इसी बीच विजय शर्मा की ओर से जारी एक वीडियो ने चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में सीएम विष्णुदेव साय, अरुण साव और विजय शर्मा, सुवेन्दु अधिकारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई देते नजर आ रहे हैं। इस दौरान सुवेन्दु अधिकारी, विजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं कि विजय ने नामांकन रैली में खूब मेहनत की है।
अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि जब मेहनत की खुलकर सराहना हो रही हो, तब मंच पर कौन बैठा और कौन खड़ा रहा, यह बहस ज्यादा मायने नहीं रखती।
ऑक्सीजन के जंगल पर विकास की कुल्हाड़ी
नवा रायपुर जाने के रास्ते के माना-तूता इलाके में फैला करीब चालीस-पैंतालीस बरस पुराना जंगल इन दिनों बेचैन है। जिन दरख्तों ने बरसों तक इस शहर को सांसें दीं, तपती हवाओं को थामा, मिट्टी को जिंदा रखा और परिंदों को आशियाना दिया, आज उन पर कुल्हाडिय़ां चल रही हैं। वजह है सरकार का महत्वाकांक्षी चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी और ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर प्रोजेक्ट। इसके लिए तकरीबन सौ एकड़ वन भूमि को विकास के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक डेढ़ सौ से दो सौ पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में लगभग पांच हज़ार और पेड़ों को गिराने की तैयारी है। रायपुर और नवा रायपुर के बीच मौजूद यह जंगल केवल हरियाली का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे शहर का ऑक्सीजन जोन माना जा सकता है। शहर जिस तेजी से सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा है, उस दौर में यह वन इलाका एक नेमत की तरह बचा हुआ है।
सरकार का कहना है कि चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ को मूवी प्रोडक्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनाएगी। परियोजना में अत्याधुनिक स्टूडियो, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जैसे सेट, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, होटल, कन्वेंशन सेंटर, मल्टीप्लेक्स और व्यापारिक ढांचे को विकसित किए जाने की योजना है। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को रोजगार और नए मौके मिलेंगे।
अब यहीं पर जो दूसरी परियोजना लाई जा चुकी है , वह है- ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर। उसका भी हिसाब छोटा-मोटा नहीं है। इस परियोजना को फिल्म निर्माण वाली चित्रोत्पला परियोजना से ही जोड़ा गया है। पर्यटन, संस्कृति और इनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों का विकास किया जाएगा।
दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 95 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। छत्तीसगढ़ सरकार को स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट, डेवलपमेंट ऑफ ग्लोबल लेवल ऑइकॉनिक टूरिज्म सेंटर्स योजना के तहत वित्तीय सहायता मिली है। चित्रोत्पला के लिए करीब 96 करोड़ और कन्वेंशन सेंटर के लिए 52 करोड़ की मदद केंद्र ने की है। हमारे आपके टैक्स की इतनी रकम खर्च होने के बावजूद यह पीपीपी, यानि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप मॉडल में है। पीपीपी वाले लोग इसे तैयार कर रहे हैं और यही लोग उन ग्रामीणों को धमका रहे हैं, जो जंगल काटने के विरोध में उतरे हैं। कह रहे हैं, जंगल को बर्बाद करने की हमको सरकार से मंजूरी मिली हुई है। नवा रायपुर में कितनी ही खाली जमीन पड़ी हुई है, वहां क्यों नहीं एलॉट किया?
छागल से अनजान पीढ़ी
इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे ‘छागल’ कहते थे। 4-5 दशक पहले ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था, और न कोई कैम्पर थे न मिल्टन की बोतलें थीं। गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था। गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था, जिसका सिरा एक और बोतल के मुंह जैसा होता था और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन, बस,जीप के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे,बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के अंदर भरे पानी को ठंडा करती थी। वो प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी। यह हमारे पूर्वजों की पानी की व्यवस्था थी। सबसे बड़ी बात यह है अगर रास्ते में किसी राहगीर ने छागल देखकर ठंडा पानी पीने के लिए मांग लिया तो कोई उसे मना नहीं करता था क्योंकि भीषण गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना ईश्वर की आज्ञा होती है। पानी खरीदा जा सकता है या बेचा जा सकता है-यह कल्पना भी नहीं थी। अब 20 रूपए में एक लीटर पानी खरीदने वाली पीढ़ी छागल को नहीं जानती। मल्टिनैशनल वाटर कंपनियों ने अपने कारोबार के लिए छागल के पानी को सेहत के लिए नुकसानदायक जो बता रखा है।
आईबी में गए आंजनेय वार्ष्णेय
छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अधिकारी आंजनेय वाष्र्णेय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। वर्ष-2018 बैच के आईपीएस वाष्र्णेयकी पोस्टिंग इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में हुई है। वे हाल तक सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी के रूप में पदस्थ थे और शुक्रवार को उन्हें रिलीव कर दिया गया।
आंजनेय वाष्र्णेय इससे पहले बीजापुर और धमतरी जिले के एसपी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद राज्य पुलिस महकमे में सीमित स्तर पर फेरबदल की चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि कोंडागांव जिले में भी एसपी का पद फिलहाल खाली चल रहा है। वहां एएसपी को एसपी का प्रभार दिया गया है, जबकि एसपी पंकज चंद्रा प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद गए हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कुछ जिलों के एसपी बदलने की संभावना जताई जा रही है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर जयदीप सिंह पहले ही आईबी में सेवाएं दे रहे हैं।
धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?
छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन जैसे ही चालू हुआ, शराब की दुकानों का माल खत्म हो गया। लोग भटक रहे हैं। बंधु, वित्तीय वर्ष बदल चुका है। अब इस मौके पर अफसरों ने सोचा नहीं कि ये शादी का भी सीजन है। बड़ी संख्या में बाराती भटक रहे हैं, चेहरे उतरे हुए हैं-क्या खाक डांस करेंगे।
सुशासन में शराब न मिले, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उन शराब प्रेमी रसूखदारों को छोड़ दें, जिनके पास अनाप-शनाप कमाई हैं, मगर आम जनता की हालत को महसूस करिये। परिवार में कलह का, हिंसा का, सडक़ों पर उत्पात का, सडक़ दुर्घटनाओं का कारण यही शराब बनती है।
इन दिनों अंग्रेजी के जान-पहचान वाले ब्रांड की केवल बोतल मिल रही है, लिटिल गायब है। लोग बार्टर करके खरीद रहे हैं, चार लोग मिलकर पौवा-पौवा बांट रहे हैं। देसी की तो बात ही छोड़ दीजिए, शटर गिरा हुआ है। अकेले रायपुर में रोजाना साढ़े 12 हजार पेटी का नुकसान। पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हर रोज 180 हजार पौवा। निर्माताओं और सरकार को मिलाकर रोजाना 50 करोड़ से ज्यादा की क्षत्ति।
सुशासन में कोई घोषित योजना नहीं थी कि शराब की किल्लत पैदा की जाएगी, मगर सुशासन दिख रहा है।
इस हालात को देखते हुए यह तो कह ही सकते हैं कि व्यक्ति परिस्थितिजीवी होता है। शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग जरूर इधर-उधर देसी-महुआ तलाश करते हुए भटकेंगे, बाकी ज्यादातर लोग घर में पत्नी और बच्चों के साथ दाल रोटी खाएंगे। शराब से बचे पैसे का बढिय़ा सा सप्लीमेंट खाना- चिकन, अंडा, आमलेट, चॉकलेट, आइसक्रीम वगैरह घर लेकर जाएंगे।
अब, असल में शराब की किल्लत क्यों खड़ी हुई, उसे समझ लेते हैं। सुशासन वगैरह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह नई आबकारी नीति 2026-27 का हिस्सा है। आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन ने इसे आर्थिक दक्षता और व्यवस्था में सुधार का कदम बताया है। प्लास्टिक बोतल अपनाने की वजह यह बताई गई है कि इससे कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकेगा। परिवहन के दौरान लोड कम पड़ेगा, तो भी खर्च कम होगा- क्योंकि प्लास्टिक बोतल हल्की होंगीं। बाकी राज्यों से तस्करी के जरिये जो दारू आती है, वह कांच की बोतलों में आती है, इससे सच का तुरंत पता चल जाएगा। दावा किया गया है कि इससे मिलावट के मामले भी कम मिलेंगे।
सरकार का तर्क सुनकर लगता है, जैसे किसी योगी ने अचानक संन्यास ले लिया हो। मगर, यह फेयर डिसीजन नहीं है। प्लास्टिक को बढ़ावा देने के सरकार के फैसलों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने एक याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लगाई है। सिंघवी की याचिका विशेषत: शराब की प्लास्टिक बोतलों को लेकर नहीं है, इस पर सुनवाई 13 मई को होने वाली है। मगर, प्लास्टिक वाली नई आबकारी नीति के खिलाफ ऋषि एंटरप्राइजेज ने सीधे-सीधे एक अलग याचिका दायर कर रखी है। पिछले एक अप्रैल को उसकी सुनवाई हुई थी, जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, पर सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके आगे का डेवलपमेंट अभी मालूम नहीं है। मामला लंबित है।
इधर, डिस्टिलरीज अलग ना-नुकुर कर रहे हैं। जैसे ही सरकार ने प्लास्टिक बोतलों का फरमान निकाला, खाली बोतलों की कीमत उत्पादक कंपनियों ने 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी। आबकारी नीति में प्रावधान किया गया है कि केवल फूड ग्रेड और रियूजेबल प्लास्टिक बोतल हों। बोतलें मजबूत भी हों और हल्की भी हों, ब्रैकेज प्रूफ हों। मैटेलिक कैप की अनुमति नहीं है, कैप भी प्लास्टिक की ही होनी चाहिए। ऋषि कंपनी ने जो हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, उसमें उनकी ओर से दावा किया गया है कि इतने कड़े नियम को फॉलो करना तो किसी शराब निर्माता के लिए संभव ही नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे रहे लोगों का की ओर से दावा यह भी किया गया है कि सालाना करीब 16 हजार टन प्लास्टिक कचरा छत्तीसगढ़ में बढ़ जाएगा, बोतल सिर्फ डस्टबिन में डालें, इस नियम का पालन शराब पीने वाला कोई आदमी नहीं करने वाला।
तो सुशासन में इस सूखे का आनंद लीजिए।
...कौन बनेगा नया वन प्रमुख?
वन विभाग के शीर्ष पद हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए प्रस्तावित डीपीसी अपरिहार्य कारणों से टल गई है। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी. श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उनके उत्तराधिकारी के चयन को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह पद मुख्य सचिव और डीजीपी के समकक्ष वेतनमान वाला होता है और परंपरा रही है कि सबसे वरिष्ठ पीसीसीएफ को ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है।
हालांकि पिछली सरकार में यह परंपरा तब टूटी थी, जब वी. श्रीनिवास राव को पांच वरिष्ठ पीसीसीएफ को सुपरसीड कर इस पद पर पदोन्नत किया गया था। अब डीपीसी टलने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है? मौजूदा सरकार में मुख्य सचिव अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा को पहले ही सेवा विस्तार मिल चुका है। हालांकि देश में अब तक किसी भी राज्य में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को एक्सटेंशन मिलने का उदाहरण नहीं है।
मंगलवार को वन विभाग की एसीएस ऋचा शर्मा का तबादला कर उन्हें पंचायत विभाग भेज दिया गया। उनकी जगह एसीएस मनोज पिंगुआ को वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इसी प्रशासनिक बदलाव के कारण डीपीसी टली है।
दूसरी तरफ लघुवनोपज संघ के एमडी अनिल साहू वरिष्ठता सूची में सबसे ऊपर हैं, लेकिन वे जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय और पीसीसीएफ कौशलेन्द्र कुमार के नाम पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। विभागीय गलियारों में अरुण पाण्डेय को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) का पद विभाग में दूसरे नंबर का अहम पद माना जाता है। अब सबकी नजर नई डीपीसी तारीख पर टिकी है।
...क्या ऐसा संभव है?
अब प्रशासनिक अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोडक़र सम्मान करना पड़ेगा। यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से राज्यों को भेजे गए निर्देशों में कही गई है। छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों को भेजे गए इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिवों को दी गई है।
दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग भी लगभग हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में इसी तरह का परिपत्र जारी करता रहा है, लेकिन इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ था। लिहाजा दिल्ली से ही आदेश आ गया।
निर्देशों में साफ कहा गया है कि सांसद-विधायक कार्यालय या बैठक में आएं तो अधिकारी उठकर उनका अभिवादन करें, हाथ जोड़े और पानी तक पूछें। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल उठाना और जवाब देना भी अनिवार्य बताया गया है। यदि बैठक में होने के कारण कॉल रिसीव नहीं हो पाए तो बाद में कॉल बैक करना होगा। उनके पत्रों और प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण कर जानकारी भी देनी होगी।
डीओपीटी ने यह भी माना है कि तमाम निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इसलिए अब इसे आचरण नियमावली से जोड़ दिया गया है। यानी उल्लंघन पर कार्रवाई भी संभव है।
हालांकि अफसरशाही इसे हर साल जारी होने वाला ‘रूटीन रिमाइंडर’ मान रही है। मगर हाल के दिनों में कुछ घटनाओं ने इस आदेश को और चर्चा में ला दिया है। खाद्य मंत्री ने एक अधिकारी, विधायक रोहित साहू ने एक पटवारी को जूते से मारने की घटना और प्रतापपुर विधायक शकुंतला पोर्ते द्वारा मंच से राजस्व अधिकारियों को ‘गुरूर छोडऩे’की चेतावनी अभी भी चर्चा में है। अब देखना यह है कि यह आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित रहता है या वास्तव में अफसरों के व्यवहार में भी बदलाव दिखता है।
प्रकृति हमें पुकार रही है, आइये इसे सुनें..
छत्तीसगढ़ शायद केवल 36 गढ़ों की भूमि नहीं है। इससे अधिक गढ़ों का साक्षात स्वरूप है, यदि जंगलों की ओर निकल जाएं। अनगिनत घने साल-बांस के जंगलों को, लहराती नदियों, झरनों, गुफाओं और पठारों को किन गढ़ों में गिना जाएगा? दूसरे राज्यों का भ्रमण करने के पहले अपने छत्तीसगढ़ को ही ठीक से घूम लेना चाहिए, सरगुजा से लेकर बस्तर के छिपे दूरस्थ इलाकों तक। अपने यहां लगभग 44 प्रतिशत इलाका वनाच्छादित है, जो देश के कुल वनों का लगभग 12 प्रतिशत है। अनेक जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों का आश्रय है। देशभर में राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की भरमार है, मगर सेंट्रल इंडिया को जोडऩे वाली कड़ी छत्तीसगढ़ ही है। अचानकमार, इंद्रावती, कांगेर, उदंती-सीतानदी, तमोर पिंगला में दूसरे राज्यों से पहुंचने वाले बाघ बताते हैं कि यह उनके लिए स्वर्ग है। बाघ ही नहीं, तेंदुआ, भालू, जंगली भैंस-बायसन, गौर और हिरणों का यह इलाका है। सैकड़ों पक्षी प्रजातियों, सरीसृपों और कीट-पतंगों का भी घर है। अब तो बारनवापारा काले हिरणों की बढ़ती आबादी के चलते राष्ट्रीय वन्यजीव-मानचित्र में अलग स्थान बना चुका है।

ऐसे मौके पर छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार और वन्यजीव प्रेमी प्राण चड्ढा, जो एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं, ने फेसबुक पर एक पोस्ट दर्ज की है। ऑरेंज ओक लीफ- हम आप शायद इसे नहीं समझ पाएंगे, यदि इस नाम से कोई पुकारेगा। यह तितली की एक दुर्लभ प्रजाति है। आंतरिक रूप से अनंत सौंदर्य और जीवन लिप्सा से भरपूर। सूखे पत्ते की तरह यह जीव दिखता है। मगर, जैसे ही पंख खोलती है- नीले, नारंगी और काले रंगों की चकाचौंध बिखेर देती है। शिकारियों से बचने के लिए वह प्राय: अपने पंखों को बंद रखती है। यह तस्वीर अचानकमार अभयारण्य से ली गई है। यह तितली छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यभारत के अन्य जंगलों में भी पाई जाती है। हम हाथी जैसे विशालकाय जानवरों की बात करते हैं लेकिन ऐसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, कीट और तितलियों का भी अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, वन कटाई और मानवीय अतिक्रमण के चलते संकट में है। कार्बन संग्रहण, जल संरक्षण और आदिवासी संस्कृति के भी संरक्षण में इन छोटे-छोटे कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है।
महिला अफसरों पर भरोसा, विकास कार्यों पर फोकस
सीएम विष्णु देव साय ने बुधवार को 43 आईएएस अफसरों के तबादले कर प्रशासन में बड़ा फेरबदल किया। इस बदलाव में सरकार ने एक तरफ लंबे समय से एक ही विभाग संभाल रहे अफसरों की जिम्मेदारियां बदलीं गईं। दूसरी तरफ, कुछ अहम विभागों में नए प्रयोग भी किए हैं।
सबसे चर्चित फैसला गृह विभाग को लेकर रहा। राज्य गठन के बाद पहली बार किसी महिला आईएएस अफसर को गृह विभाग की कमान सौंपी गई है। 1997 बैच की सीनियर आईएएस निहारिका बारिक सिंह को गृह विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया है। इससे पहले एके विजयवर्गीय, राबर्ट हरंगडोला, आरपी बगई, एनके असवाल और बीवीआर सुब्रमण्यम जैसे वरिष्ठ अफसर इस विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
फेरबदल में एसीएस ऋचा शर्मा, मनोज पिंगुआ, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आर संगीता, बसवराजु, डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुकेश बंसल समेत कई अफसरों के प्रभार बदले गए हैं। इनमें अधिकांश अफसर दो साल से ज्यादा समय से एक ही विभाग में कार्यरत थे। सीएम सचिवालय में पदस्थ मुकेश बंसल से वित्त विभाग लेकर लोक निर्माण विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार निर्माण कार्यों, खासकर सडक़ों और अधोसंरचना परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। सुशासन तिहार के दौरान सरगुजा क्षेत्र में खराब सडक़ों को लेकर मुख्यमंत्री की नाराजगी भी सामने आई थी। ऐसे में पीडब्ल्यूडी में यह बदलाव सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
यही नहीं, आबकारी विभाग की जिम्मेदारी दुबारा एक महिला अफसर को सौंपी गई है। पहले यह विभाग आर संगीता संभाल रही थीं, जबकि अब खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले को आबकारी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। एक और उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 33 में से 10 जिलों में महिला कलेक्टर बनाई गई हैं।
मनिंदर कौर ऐसी तीसरी अफसर...

केंद्र सरकार ने श्रीमती डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी की प्रतिनियुक्ति दो वर्ष बढ़ा दी है। वह कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। वह अगस्त 28 तक केंद्र में बनी रहेंगी। इस वृद्धि के साथ वह छत्तीसगढ़ कैडर की ऐसी तीसरी अफसर हो गई हैं जो एक दशक से अधिक समय से केंद्र में सेवाएं दे रहीं हैं।
केन्द्रीय अधिकारी-कर्मचारी ही सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष है। ऐसे में एक अधिकारी कर्मचारी की कुल सेवावधि 30-38 वर्ष रहती है। प्रदेश में सबसे ज्यादा पहले सबसे ज्यादा समय तक बीवीआर सुब्रमण्यम ने दो से तीन चरणों में 15-16 वर्ष तक पीएमओ, वर्ल्ड बैंक, जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के रूप में सेवाएं दी है। वे रिटायर भी दिल्ली से ही हुए। उनके बाद अमित अग्रवाल को भी 12 वर्ष से अधिक हो रहे हैं। इसी तरह से स्व. एम. गीता भी राज्य गठन के बाद मप्र, फिर केंद्र में सेवाओं के 15 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ आईं थीं। मनिंदर कौर को भी दो चरणों में 12 वर्ष हो गए हैं। तीन वर्ष के कूलिंग ऑफ पीरियड के बाद कोई भी अभा सेवा का अफसर फिर से प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। वैसे भी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस केंद्र के अफसर होते हैं वह जब चाहे बुला सकता है। एक तरह से वे राज्य में प्रतिनियुक्ति पर माने जा सकते हैं। और फिर केंद्र रिजल्ट ओरिएंटेड अफसरों को ही बुलाता है।
बहरहाल मनिंदर के अतिरिक्त उनके पति गौरव द्विवेदी को भी दो चरणों में 10 वर्ष बीत रहे हैं। गौरव द्विवेदी भी केंद्रीय प्रसार भारती में सीईओ हैं। इनके अलावा एसीएस ऋचा शर्मा भी 7 वर्ष केंद्र में सेवाएं दे चुकी थीं। सीएस विकासशील भी 7 वर्ष केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रहे। उनकी पत्नी निधि छिब्बर भी, अभी नीति आयोग में प्रतिनियुक्ति पर हैं। इनके अलावा पूर्व सीएस अमिताभ जैन, एसीएस मनोज पिंगुवा, सुबोध सिंह, सोनमणि बोरा, निहारिका बारिक, रोहित यादव,पी. संगीता, अमित कटारिया,रजत कुमार आदि भी 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लौटे हैं।
उधर, आईपीएस अधिकारियों में स्वागत दास, बिनय कुमार सिंह, रवि सिन्हा तो केंद्र में 20-25 वर्ष रहकर रिटायर हुए। दिवंगत पूर्व डीजीपी विश्वरंजन जरूर छत्तीसगढ़ लौटे। इन अफसरों के अलावा अमित कुमार ऐसे अकेले आईपीएस हैं जो 7 वर्ष से अधिक डेपुटेशन पर रहे। वहीं आईएफएस कैडर में छत्तीसगढ़ का ऐसा अफसर नहीं जो 5 वर्ष से अधिक प्रतिनियुक्ति पर रहा हो।
सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री
अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक घोटाला प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। करीब सात साल पुराने इस मामले में विभागीय जांच अब भी धीमी रफ्तार से चल रही है, जबकि पुलिस अपनी कार्रवाई कर चुकी है। इसी बीच ईडी की एंट्री से बैंक में हडक़ंप मच गया है। ईडी ने प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए हैं और माना जा रहा है कि जांच में ऐसे कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जो अब तक पुलिस जांच से बाहर रहे हैं।
घोटाले का खुलासा उस समय हुआ था, जब तत्कालीन कलेक्टर संदीपन विलास भोसकर को बैंक के प्राधिकृत अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। खातों में हेराफेरी की शिकायत मिलने पर उन्होंने जांच कराई और मामला पुलिस को सौंप दिया। इस मामले में बलरामपुर, सूरजपुर समेत विभिन्न शाखाओं के 12 अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ को सेवा से बर्खास्त भी किया जा चुका है।
घोटाले की वास्तविक राशि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। थर्ड पार्टी ऑडिट में 142 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई थी, जबकि बैंक से जुड़े लोगों का अनुमान है कि यह आंकड़ा करीब 300 करोड़ रुपए तक हो सकता है। कलेक्टर की अनुशंसा पर विभागीय जांच टीम तो गठित की गई, लेकिन जांच की गति अब तक सुस्त ही बनी हुई है। अब ईडी की सक्रियता से मामले में नई परतें खुलने की उम्मीद जताई जा रही है।
बताया जाता है कि घोटाले की शुरुआत पिछली सरकार के शुरुआती दौर में हुई थी। किसानों के नाम पर फर्जी कृषि ऋण लिए गए और बाद में कर्ज माफी योजना का लाभ उठाकर रकम हड़प ली गई। कई किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इसी तरह बैंक कर्मचारियों ने रैकेट बनाकर फसल बीमा की राशि भी हड़प ली। कर्मचारियों के खातों में करोड़ों रुपए ट्रांसफर होने की बात सामने आई है। चर्चा है कि इस पूरे खेल को कुछ प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। फिलहाल कर्मचारी जेल में हैं, लेकिन ईडी की जांच में उन सभी लोगों के नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जिन्हें इस घोटाले से फायदा हुआ।
भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर सरगर्मी
पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने के बाद भाजपा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। नितिन नबीन की नई टीम में छत्तीसगढ़ से किन नेताओं को जगह मिलेगी, इसको लेकर अटकलों का दौर जारी है।
चर्चा है कि कार्यकारिणी में उन नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है जिन्होंने पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान प्रभावी भूमिका निभाई थी। यह भी कहा जा रहा है कि नितिन नवीन स्वयं चुनाव प्रबंधन से सीधे जुड़े रहे हैं, जिससे उन्हें छत्तीसगढ़ के नेताओं के कामकाज की अच्छी जानकारी है।
चर्चा यह भी है कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर एक-दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। राज्य सरकार के मंत्री अरुण साव, विजय शर्मा, ओपी चौधरी और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने भी अपने-अपने प्रभार वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसके चलते उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिल सकता है।
निवर्तमान उपाध्यक्ष लता उसेंडी का कद बढऩा लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह का नाम भी चर्चा में है। चुनाव के दौरान टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद चर्चा में रहे हैं। अब यह देखना है कि नितिन नवीन की टीम में छत्तीसगढ़ से किन-किन नेताओं को जगह मिलती है।
प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन पीछे नौकरीपेशा
अगले 10 साल में स्नातक और हम उम्र कम पढ़े-लिखे दो युवकों की आय पर नजऱ डालें तो ‘व्यंग्य’ में कहा जा सकता है कि भारत में 80 प्रतिशत कॉलेज और विश्वविद्यालय अगले 10 वर्षों में बंद हो जाएंगे..? यह अतिशयोक्ति भी लगती है..? अब आंकड़ों को देखें-
प्लंबर 1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन।
रु.30,000 - रु.50,000 प्रति माह
इलेक्ट्रीशियन
1,500रु. - 2,500रु. प्रति दिन
35,000रु. - रु.60,000रु. प्रति माह।
टाइल वर्कर / मिस्त्री
1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन
30,000रु. - 50,000रु. प्रति माह।
जोमैटो / स्विगी राइडर
25,000रु. - 35,000रु. प्रति माह।
अमेजन / फ्लिपकार्ट डिलीवरी पार्टनर
28,000रु. - 40,000रु. प्रति माह।
छोटा दुकानदार
नेट आय 30,000रु.-70,000रु. प्रति माह।
ये आय कौशल, गति और मांग के साथ बढ़ती हैं।
कोई दीक्षांत समारोह आवश्यक नहीं।
अब डिग्री धारकों की स्थिति देखें-
बी.कॉम फ्रेशर
12,000रु. - 18,000रु.
बीए फ्रेशर
10,000रु. - 15,000रु.
बीएससी फ्रेशर
12,000 - 18,000रु.
एमएससी फ्रेशर
15,000रु. - 22,000रु.
एमबीए फ्रेशर (टियर 2 / 3 कॉलेज)
18,000रु.-30,000रु.
नॉन टेक इंजीनियर
12,000रु. - 20,000रु.
टेक इंजीनियर
20,000रु.-35,000रु.
(शीर्ष 5 प्रतिशत को छोडक़र)
ये वेतन तब तक स्थिर रहते हैं जब तक कौशल नहीं जोड़े जाते।
कुशल कामगार तुरंत कमाते हैं। डिग्री धारक ‘अवसरों’ का इंतजार करते हैं।
कौशल मासिक रूप से बढ़ता है।
डिग्रियां वार्षिक रूप से घटती हैं।
एक प्लंबर अपस्किल करता है तो आय बढ़ती है। एक डिलीवरी पार्टनर मार्गों का अनुकूलन करता है आय बढ़ती है।
एक दुकानदार मांग को समझता है ,आय बढ़ती है।
एक डिग्री धारक, इंतजार करें...आवेदन करें...
इंटर्न करें...पुन: कौशल सीखे..दोहराएं...
आशावादी रहें। क्योंकि यह शिक्षा प्रणाली छात्रों के लिए नहीं बनी है। यह लाभ के लिए बनी है।
डिग्रियां अभी भी बांटी जा रही हैं।
जैसे कि उनका कोई मतलब हो। मध्यवर्गीय माता-पिता के पास कोई विकल्प नहीं है।छात्रों के पास कोई बचाव नहीं है। डिग्रियां अनुमोदनों से जुड़ी हैं।अनुमोदन नौकरियों से जुड़े हैं। तो चक्र चलता रहता है।जिस
एनईपी 2020 को आधुनिक शिक्षा प्रणाली बता कर लागू किया गया है वह 4 साल में ही पुराना लगने लगा है। दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है। आज, दुनिया चाहती है...
सिस्टम थिंकर...
डेटा तर्क।जब कौशल हर दो साल में समाप्त हो जाते हैं, तो एक स्थिर डिग्री क्या बनाएगी ? कुछ भी नहीं।आज स्कूल में प्रवेश करने वाला बच्चा, लगभग 2040 - 2045 में स्नातक होगा।
तब दुनिया कैसी दिखेगी..?हर जगह ऑटोमेशन।हर तीन साल में करियर का पुनर्लेखन। डोमेन पार करने वाली नौकरियां।
हर दो साल में कौशल की समाप्ति।मानव मशीनों के साथ काम कर रहे हैं। सिस्टम में सोच रहे हैं। अस्पष्ट समस्याओं को हल कर रहे हैं। लगातार सीख रहे हैं।
अब हमारे कक्षाओं को देखें-पुराने...
स्थिर पाठ्यक्रम...अनचाही प्रायोगिक व्यवस्थाएं।
सभी के लिए एक ही डिग्री। हमारी शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी कें मानवों को तैयार नहीं कर सकती। तो मूल कारण कहाँ है?
ब्यूरोक्रेट्स। हमारे बाबू सिस्टम चलाते हैं।वे नीति सलाह देते हैं। वे क्रियान्वयन डिजाइन करते हैं।और वे एक ही द्वार से आते हैं।
यूपीएससी।
यूपीएससी 1940 के दशक के लिए डिजाइन किया गया था। बाबू अपनी पदोन्नति को आपके बच्चे के भविष्य से ज्यादा महत्व देते हैं।
वैसे भी अब देश में शासकीय प्राथमिक शाला/ उच्चतर माध्यमिक शाला/ शासकीय कॉलेज/ बंद होने की स्थिति में है क्योंकि राज्य और केंद्र स्तर की सरकार ऐसी शिक्षा प्रणाली चल रही है जिसे सिर्फ प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज फल फूल रहे हैं।
(हाल में रिटायर हुए एक प्राचार्य का आकलन)
सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...
पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव और छत्तीसगढ़ के 2023 विधानसभा नतीजों में कई समानताएं नजर आती हैं। तब भाजपा ने अपन व्यापक संसाधनों और कैडर के जरिये कांग्रेस के खिलाफ लगभग उसी तरह का माहौल बनाया था, जैसा पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ। भ्रष्टाचार, एंटी-इनकंबेंसी, कानून-व्यवस्था और महिलाओं, युवाओं व संप्रदायों के बीच असंतोष जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। पश्चिम बंगाल में 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में महज पांच साल में ही माहौल बदलने में भाजपा को सफलता मिल गई। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा कभी सत्ता में नहीं रही और वहां अपना कैडर तैयार करने में उसे एक दशक से अधिक समय लगा। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत बनी रही, जो विधानसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी दिखा।
कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के फॉर्म भरवाने के अभियान ने भाजपा के पक्ष में माहौल पलट दिया। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की ओर से इसी तरह के डायरेक्ट बेनिफिट से जुड़े फॉर्म भरवाने का अभियान चला, लेकिन वह छत्तीसगढ़ की तरह घर-घर तक नहीं पहुंचा। इसके बावजूद भाजपा को बड़ी सफलता मिली, जिसका मतलब है कि टीएमसी की पराजय के कारण और भी थे।
छत्तीसगढ़ में भाजपा ने सीजीपीएससी भर्ती, कोयला, शराब और डीएमएफ घोटाले के साथ महादेव सट्टा ऐप जैसे मुद्दों को इस तरह उछाला कि सरकार के कई सकारात्मक काम पीछे छूट गए। इन कामों में वादे के अनुरूप देश में सबसे ऊंची धान कीमत देना, तेंदूपत्ता सहित अन्य वनोपजों का बेहतर भुगतान, शिक्षाकर्मियों का नियमितीकरण और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देना शामिल थे। पश्चिम बंगाल में भी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने कल्याणकारी योजनाओं, खासकर महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को पीछे धकेल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाला, शारदा चिटफंड मामला, परिवारवाद, विशेषकर भतीजे अभिषेक बेनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने असर डाला। छत्तीसगढ़ में भी बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी चयन प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवालों ने इसी तरह की धारणा को जन्म दिया। बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी- 2021 के चयन में आप परिवारवाद का वर्चस्व देख सकते हैं।
जैसे छत्तीसगढ़ में कुछ मंत्रियों और विधायकों की छवि घोटालों से प्रभावित हुई, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भी हुआ। साख बचाने के लिए ममता बेनर्जी ने 33 प्रतिशत यानी 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल और चुनाव के ठीक पहले डिप्टी सीएम बने टीएस सिंहदेव ने मिलकर यहां भी लगभग 33 प्रतिशत ही, यानी 22 विधायकों के टिकट काट दिए।
भाजपा के कुछ प्रमुख राजनीतिक हथियार ऐसे हैं, जो भावनात्मक स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। आदिवासी क्षेत्रों, खासकर बस्तर में, धर्म परिवर्तन को लेकर माहौल गरमाया गया और हिंसक घटनाएं भी हुईं। हालात ऐसे बने कि कई जगह अंतिम संस्कार के लिए जमीन तक को लेकर विवाद खड़ा हुआ, और अब यह स्थायी समस्या बन चुकी है। बेमेतरा-साजा को लेकर सीबीआई रिपोर्ट अभी कुछ माह पहले आई है। केंद्र की ही एजेंसी ने इसे आपसी विवाद बताया, न कि सांप्रदायिक, पर भाजपा ने इस मुद्दे पर कई सीटों पर धाक जमा ली। कवर्धा में रोहिंग्या मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विमर्श होता रहा। सरकार बनते ही रोहिंग्या गायब हो गए। पर, इन मुद्दों पर कांग्रेस की चुप्पी और निष्क्रियता ने भाजपा को बढ़त दिलाई और कई सीटों पर नतीजे पलट गए।
पश्चिम बंगाल में भी घुसपैठियों का मुद्दा इसी तरह का है। तृणमूल बचाव में रही और भाजपा हमलावर। यह धारणा बनाई गई कि 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट एकतरफा हैं, जबकि इन वोटों के बंटवारे के लिए हुमायूं कबीर और औवेसुद्दीन कुरैशी के उम्मीदवार भी मैदान में थे।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अंतर्कलह उसी तरह दिखी, जैसी तृणमूल कांग्रेस में नजर आई। एक व्यक्ति केंद्रित नेतृत्व की छवि दोनों जगह उभरी। कांग्रेस शासन के दौरान किन विधायकों के काम प्राथमिकता से होते थे, कौन मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार की आलोचना करता रहा, और किन नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश हुई, छत्तीसगढ़ में सबने देखा। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा के प्रमुख चेहरे बन गए, जबकि मुकुल रॉय जैसे नेताओं की वापसी के बावजूद प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। तापस रॉय और कुणाल घोष जैसे नेताओं की नाराजगी भी टिकट वितरण में सामने आई। कारण यह बताया गया कि अभिषेक बेनर्जी युवा कैडर पर अधिक भरोसा कर रहे थे और पुराने नेताओं को पीछे कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में भी सत्ता संभालने के बाद बघेल ने वरिष्ठों को किनारे लगाकर अपना अलग कैडर तैयार किया, जो चुनावी मैदान में खुद तो निपटे, पार्टी को भी निपटा गए। कई टिकट व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर बदले गए और जहां बदलाव नहीं हुआ, वहां हार का माहौल बनने दिया गया। सिंहदेव खेमे की अपनी संतुष्टि सरगुजा तक सीमित थी। भाजपा ने इस असंतोष का लाभ उठाया। जिस नेता की सिंहदेव ने टिकट काटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, वह आज सांसद है। यह आंतरिक खींचतान कार्यकर्ताओं को रास नहीं आई, जैसा पश्चिम बंगाल में भी देखा गया। दोनों ही जगह संगठन की भूमिका कमजोर रही और निर्णय लेने की ताकत उन्हीं के हाथ में केंद्रित रही, जिनके पास सत्ता थी।
जनता की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। पश्चिम बंगाल की जनता को विकल्प चाहिए था, जबकि कमजोर संगठन वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस उस विकल्प के रूप में उभर नहीं सके। भाजपा ने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर तैयारी कर अपनी पकड़ मजबूत की और उसका परिणाम सामने आया। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने कहा था कि सत्ता को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए, अन्यथा वह जड़ हो जाती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से परिवारवाद, निहित स्वार्थ और भ्रष्टाचार बढऩे का खतरा रहता है। इसलिए सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र को जीवंत, जवाबदेह बनाए रखने के लिए जरूरी है।
बंगाल सीएस का आदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र
पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो तिहाई जीत के बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग में नई सरकार और उसकी शासन व्यवस्था की कवायद तेज हो गई है। बंगाल के मुख्य सचिव ने सभी विभागों के सचिव और कल ही एक आदेश जारी कर दिया है। इसमें उन्होंने फाइलों और दस्तावेजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिना अनुमति कोई फाइल रायटर्स बिल्डिंग से बाहर ले जाने या उसकी कॉपी करने पर रोक लगाई गई है और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बता दें कि चुनाव अभियान के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा था कि दीदी का खेला होने के बाद उनकी सरकार में हुए घोटालों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश ने पहले छत्तीसगढ़ और फिर आंध्र प्रदेश में पूर्व के वर्षों में हुए ऐसे की घटनाओं की यादें ताजा कर दी। 2018 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते ही तत्कालीन गृहमंत्री के बंगले में कई गोपनीय नस्तियों को आग के हवाले किया गया था। इसके बाद यही उपक्रम 2023 में भी कांग्रेस के एक मंत्री के बंगले में भी हुआ। इतना ही नहीं एक मंत्री पर तो सरकारी आवास के महंगे सामान खोल कर ले जाने का भी खुलासा हो चुका था। आंध्र में भी जगन सरकार के मंत्री ने भी बकायदा मंत्रालय परिसर में ही कागजात जलवाए थे। इसे देखते हुए आने वाले हर चुनाव बाद राज्यों में बहुमत के रुझान आते ही आउट गोइंग सरकार के लिए मुख्य सचिवों को ऐसे अंतिम आदेश निकालने की नई परंपरा बन सकती है।
कांग्रेस-भाजपा में माहौल अलग-अलग
पश्चिम बंगाल और असम में जीत के बाद भाजपा खेमे में उत्साह चरम पर है। प्रदेशभर के पार्टी कार्यालयों में जश्न का माहौल रहा, और बंगाल की पहचान बन चुकी झालमुड़ी के साथ जीत का स्वाद लिया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में निराशा है। छत्तीसगढ़ के नेताओं ने दोनों राज्यों में जमकर मेहनत की थी, लेकिन परिणामों ने अब राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया गया था। उनके साथ विकास उपाध्याय और विनोद वर्मा भी क्रमश: प्रभारी सचिव और पर्यवेक्षक थे। असम में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया है और सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि जहां-जहां बघेल को जिम्मेदारी मिली, वहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
सिर्फ बघेल ही नहीं, पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव भी पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके। उन्हें तमिलनाडु और पुडुचेरी में टिकट वितरण की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां कांग्रेस का खराब रहा। हालांकि सचिन पायलट के लिए यह दौर सकारात्मक रहा।केरल में प्रभारी के तौर पर उनकी भूमिका पार्टी की जीत के साथ जुड़ी, जिससे संगठन में उनका कद बढऩा तय माना जा रहा है।
दूसरी ओर, भाजपा खेमे में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भूमिका को लेकर संतोष का माहौल है। संगठन महामंत्री पवन साय को बंगाल में 56 सीटों की जिम्मेदारी मिली थी, और पार्टी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया। इसी तरह असम में डिप्टी सीएम अरुण साव, केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बूथ स्तर तक काम संभाला, जिसका असर नतीजों में दिखा। इन सफलताओं का असर रायपुर तक साफ नजर आया। पार्टी दफ्तरों से लेकर मंत्रियों के बंगलों तक जश्न का दौर चला। दिलचस्प यह रहा कि झालमुड़ी की मांग इतनी बढ़ गई कि बेचने वालों की कमी पड़ गई।
आग बुझाने वाले कहां हैं?
जशपुर जिले के जंगल में आग लगी, वहां से गुजरते हुए कुछ पर्यटकों ने अपनी कोशिश की और आग बुझाने का प्रयास किया। लेकिन यह नाकाफी साबित हुआ। आग फैलने से रोका नहीं जा सका। छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों हर रोज सैकड़ों की संख्या में आग लगने की छोटी-बड़ी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन बीट गार्ड और आग बुझाने वाली वन विभाग की टीम नजर नहीं आती।
विधायक की अनदेखी पर बवाल
कवर्धा जिले की भाजपा राजनीति इन दिनों अंदरूनी खींचतान को लेकर चर्चा में है। विवाद की वजह भोरमदेव जंगल सफारी के शुभारंभ कार्यक्रम को माना जा रहा है। यह सरकारी आयोजन रविवार को हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में डिप्टी सीएम विजय शर्मा शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता वन मंत्री केदार कश्यप ने की, जबकि सांसद संतोष पाण्डेय विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
हालांकि पूरे विवाद की जड़ पंडरिया विधायक भावना बोहरा का नाम आमंत्रण सूची से गायब होना है। जिले की विधायक होने के बावजूद उन्हें न तो निमंत्रण दिया गया और न ही कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति रही। इससे उनके समर्थकों में नाराजगी खुलकर सामने आई है।
कवर्धा जिले में दो विधानसभा सीटें हैं, कवर्धा से खुद विजय शर्मा प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि पंडरिया से भावना बोहरा विधायक हैं। ऐसे में स्थानीय जनप्रतिनिधि के रूप में उनका नाम आमंत्रण पत्र में होना स्वाभाविक माना जा रहा था। नाम छूटना महज त्रुटि थी या जानबूझकर किया गया, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन समर्थक इसे राजनीतिक उपेक्षा बता रहे हैं।
मामला अब सोशल मीडिया तक पहुंच गया है, जहां समर्थक खुलकर विरोध जता रहे हैं। 24 घंटे के भीतर कलेक्टर और डीएफओ से जवाब मांगने की चेतावनी दी गई है, और इस सिलसिले में पोस्टर भी जारी किए गए हैं।
खुद भावना बोहरा ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनका और विजय शर्मा का कुछ मुद्दों को लेकर पहले से मतभेद रहा है। हल्ला है कि सीएम विष्णुदेव साय से भी इस मामले की शिकायत की है और पार्टी संगठन में आपत्ति दर्ज कराई है। फिलहाल सरकार या संगठन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विवाद के और बढऩे के संकेत मिल रहे हैं।
केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का ट्रेंड
राज्य पुलिस सेवा में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। वर्ष-2021 बैच के आईपीएस अधिकारी चिराग जैन भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की तैयारी में हैं। वर्तमान में वे एडिशनल एसपी के पद पर हैं और हाल ही में पीएचक्यू में पदस्थ हुए हैं।
इससे पहले 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा चुके हैं। उनकी पोस्टिंग हो चुकी है और उन्हें रिलीव भी कर दिया गया है।
परंपरागत रूप से आईपीएस अधिकारियों के लिए कम से कम एक जिले में एसपी के रूप में कार्य करने के बाद ही केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का चलन रहा है। लेकिन अब यह ट्रेंड बदलता दिख रहा है और अधिकारी शुरुआती दौर में ही केंद्र का रुख कर रहे हैं।
विकास कुमार का मामला थोड़ा अलग रहा। उन्हें कवर्धा के लोहारडीह हिंसा प्रकरण में निलंबित किया गया था, आरोप था कि वे स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहे। हालांकि बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गई। इसके बाद उन्हें पीएचक्यू में एसपी बनाया गया और फिर रायपुर कमिश्नरी में डिप्टी कमिश्नर के रूप में पदस्थ किया गया।
उनके बैच के कई अधिकारी पहले ही जिले के एसपी बन चुके थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुना और अब वे केंद्र में सेवाएं देने रवाना हो चुके हैं।
यह नाम कहाँ से आया?

रायपुर -जबलपुर के बीच चलने वाली ट्रेन नंबर 11701/11702, जिसे अब तक लोग रायपुर-जबलपुर एक्सप्रेस के नाम से जानते थे, उसे जनवरी 2026 में एक नया नाम दिया गया, ‘मूक माटी एक्सप्रेस’। कई लोग इस नाम को लेकर हैरान होते हैं, कि यह कहाँ से आया है?
यह नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर महाराज की स्मृति में किया गया है। ‘मूक माटी’ उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम है, जिसे उनके साहित्यिक और दार्शनिक योगदान के रूप में व्यापक पहचान मिली है। रेलवे मंत्रालय ने 7 जनवरी 2026 के आसपास इस नाम परिवर्तन का आदेश जारी किया। यह बदलाव मुख्य रूप से आचार्य विद्यासागर जी को श्रद्धांजलि देने और उनके विचारों को व्यापक स्तर पर स्मरण में रखने के उद्देश्य से किया गया है।
हालात को हराया, वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज

जीवन जब बार-बार ठोकर देता है, तब कुछ लोग टूट जाते हैं। मगर, कुछ लोग उसी दर्द को अपनी ताकत बना लेते हैं। अंबिकापुर, सरगुजा की शिवानी सोनी की कहानी दूसरे श्रेणी की है। बहुत छोटी उम्र में ही पिता ने परिवार का साथ छोड़ दिया। घर की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। वह आंगनबाड़ी में काम करती हैं। सीमित आय में पूरे परिवार को वह संभालती रहीं। इन परिस्थितियों में शिवानी का बचपन बीता, लेकिन मां ने उसके सपनों को टूटने नहीं दिया, बेटी को आगे बढऩे का हौसला दिया।
शिवानी का एक समय ऐसा भी था जब वह घोर निराशा के करीब पहुंच चुकी थी। उसी दौर में खेल ने उनके जीवन में चमत्कार की तरह प्रवेश किया। शुरुआत बास्केटबॉल से हुई। मां रोज उन्हें मैदान तक लेकर जाती थीं। लेकिन एक चोट ने रास्ता बदल दिया। कोच की सलाह पर उन्होंने मिनी गोल्फ और स्पीडबॉल को अपनाया।
धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदला और जुनून ने उपलब्धियों का रूप ले लिया। शिवानी ने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, 2017 से 2019 तक, फिर 2023 और 2024 में। इस निरंतरता के चलते उनका नाम इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कर लिया गया। वह छत्तीसगढ़ की एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्होंने स्पीडबॉल और मिनी गोल्फ दोनों में देश का प्रतिनिधित्व किया है।
उनकी झोली में वर्ल्ड चैंपियनशिप और इंडो-इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं के कई ब्रॉन्ज मेडल हैं, जबकि एशियन और वर्ल्ड स्तर पर भी उन्होंने शीर्ष स्थान हासिल किए। दुर्भाग्यवश, आज भी आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। शिवानी चाहती हैं कि उन्हें खेल कोटे से सरकारी नौकरी मिले, ताकि वह अपनी मां का सहारा बन सकें।
जरा सी जगह तो दे दी

अब आदिवासी गौरव तो अच्छी बात है, लेकिन आदिवासी प्रतीक चिन्हों के बीच, नाम और जय जोहार से घिरे हुए मोटर सायकिल के नंबर को जरा सी जगह मिल गई है, वह बड़ी मेहरबानी हो गई है!
आज विश्व लेपर्ड डे...
यह छत्तीसगढ़ के आकार में छोटे अभयारण्य बारनवापारा ले ली गई तस्वीर है, जहां बढ़ते-बढ़ते लेपर्ड (तेंदुआ) की संख्या 60 पहुंच चुकी है। पर्यटक यदि दो पाली की सैर करें तो एक बार तो इनके दर्शन हो ही जाते हैं। टाइगर जैसा ही दिखता है। जिन्हें टाइगर रिजर्व में टाइगर नहीं दिखते, इनको ही देखकर तसल्ली कर लेते हैं।
वन्यजीव प्रेमी, वरिष्ठ पत्रकार प्राण चड्ढा का सुझाव है कि बारनवापारा में तेंदुओं की संख्या को देखते हुए इसे तेंदुआ या लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। अभयारण्य का वाटर मैनेजमेंट ठीक-ठाक है। अनुभवी गाइड्स हैं, रुकने-ठहरने की व्यवस्था भी अच्छी ही है। लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित करने से देश के अभयारण्यों के मानचित्र में इसका महत्व बढ़ जाएगा और देश-विदेश से सैलानी ज्यादा संख्या में यहां पहुंचेंगे।
लामबंद हो रहे कांग्रेस जिलाध्यक्ष
प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की कार्यशैली को लेकर जिला अध्यक्षों में असंतोष अब धीरे-धीरे सतह पर आने लगा है। मौका मिला प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के रायपुर प्रवास का, तो जिलाध्यक्षों ने बिना शोर-शराबे के अपनी नाराजगी दर्ज करा दी। सीधे विरोध से बचते हुए पहले आपस में रणनीति बनी, फिर 10 सूत्रीय प्रस्ताव के जरिए अपनी बात रख दी गई।
असल में आपत्ति नियुक्तियों को लेकर है। जिलाध्यक्षों को इस बात से खिन्न हैं कि ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति बिना उनकी राय के कर दी गई। अब मांग साफ है जिले में कोई भी नियुक्ति हो, तो जिलाध्यक्ष की सहमति जरूरी हो।
इतना ही नहीं, प्रभारी महामंत्री का पद खत्म करने के फैसले ने भी अंदरखाने हलचल बढ़ा दी है। जिलाध्यक्ष इसे वापस बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पायलट ने भले ही ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन कार्यकारिणी विस्तार के मुद्दे पर 90 फीसदी उपस्थिति की शर्त जरूर रख दी। यानी संदेश साफ है कि पहले संगठन में सक्रियता दिखाइए, फिर विस्तार की बात कीजिए।
जांच में नरमी से आईजी खफा
अंबिकापुर की आग अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही, बल्कि राजनीतिक गर्मी का कारण भी बन गई है। पटाखा गोदाम में लगी आग के बाद जो कुछ हुआ, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहा जा रहा है कि गोदाम किसी मंत्री के करीबी का था। मंत्री ने पलटकर साफ कर दिया कि कोई गोदाम था ही नहीं। इधर , पुलिस की शुरुआती नरमी ने आग में घी डालने का काम किया। मामला सोशल मीडिया से होता हुआ सीधे आईजी दीपक झा तक पहुंच गया। फिर क्या था, आईजी ने सख्त रुख दिखाया और एसएसपी राजेश अग्रवाल को नोटिस थमा दिया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिन धाराओं में मामला बनता था, बीएनएस की 324, 326 (छ) और विस्फोटक अधिनियम की धारा 9 (ख) उन्हें शुरुआत में जोड़ा ही नहीं गया। आईजी ने सात दिन में जवाब मांगा है। देखना है आगे क्या होता है।
अगले चुनाव और आठवां वेतन आयोग
छत्तीसगढ़ की अगली सातवीं विधानसभा के चुनाव से पहले राज्य सरकार पर बड़ा वित्तीय दबाव रहेगा। वहीं अधिकारी कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले होगी। अवसर होगा आठवां वेतनमान। रंजना देसाई आयोग ने इस समय इसी कवायद पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। उस पर फरवरी 27 तक सिफारिश सौंपने का दबाव है। समय कम है। रिपोर्ट समय पर मिलने पर पहला दबाव केंद्र सरकार पर होगा। क्योंकि उसे भी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले 2028 में होने 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में जाना होगा। ये सभी राज्य, देश की राजनीति के नजरिए से अहम हैं- छग- मप्र, राजस्थान, तेलंगाना, मिजोरम। उससे पहले ही अगले वर्ष 27 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं।
बहरहाल, कर्मचारी संघों के राष्ट्रीय नेतृत्व का अनुमान है कि वेतन आयोग साल 2027 की पहली छमाही में अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है। सरकार की ओर से वेतन आयोग को 18 महीने का समय मिला है। इस अवधि में वेतन आयोग केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी, भत्ते के अलावा अन्य फैसिलिटी और पेंशनर्स की सुविधाओं की सिफारिश कर देगा।
चूंकि राज्यों में पृथक वेतन आयोग गठन की व्यवस्था खत्म हो गई है इसलिए यानी केंद्रीय आयोग की सिफारिशें ही राज्य भी लागू करते हैं। इस रिपोर्ट पर राज्यों खासकर भाजपा शासित का कर्मचारी हितैषी रूख सामने आ जाएगा। सभी राज्य फ्री बीज (अकेले छत्तीसगढ़ में 35 हजार करोड़ का) के चलते बड़े बजटीय दबाव से जूझ रहे हैं। अब ऐसे में नए वेतनमान का कितना लाभ सरकारें देंगी यह समय बताएगा।
जहां तक छत्तीसगढ़ की बात है तो सरकार को 28 के बजट में ही प्रावधान कर अपना रुख स्पष्ट करना होगा। भले वह भुगतान किस्तों में करे। तभी वह चुनाव में जा सकेगी। वर्ना कर्मचारी आंदोलन का झंडा बुलंद करने तैयार रहेंगे। वैसे अभी से चर्चा है कि फिटमेंट फैक्टर को लेकर मामला नई सरकारों तक खिंच सकता है।
इससे पहले छत्तीसगढ़ में 2016 का 7 वां वेतनमान 1 अप्रैल 2017 से लागू हुआ था। जनवरी 2016 से 30 जून 2017 तक के 18 महीने के बकाए का एरियर्स कुल 6 समान वार्षिक किश्तों में दिया गया था। पहली किस्त का भुगतान अगस्त-सितंबर 2018 में शुरू किया गया था। इसके तहत 3,300 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करीब 3.50 लाख से अधिक कर्मचारियों को किया गया।
उस वक्त फिटमेंट फैक्टर मूल वेतन का (2.57/) गुना तय किया गया था। 7 वें आयोग के कई बेनिफिट्स अब तक अनसुलझे और अप्राप्त हैं। इस बार अमला भी पिछली बार से ठीक दो गुना बढ़ गया है। व्यय भार भी 7-8 हजार करोड़ से अधिक ही पड़ेगा। उस पर दैवेभो, संविदा, अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण का दबाव अलग। देखना है आगे यह बोझ कैसे हल होगा।
नक्सलवाद का सच्चा उन्मूलन कब?
कांकेर-नारायणपुर के बीच आईईडी ब्लास्ट में डीआरजी के एक इंस्पेक्टर सहित 4 जवान शहीद हो गए। खबर में बताया गया है कि यह पुराने छिपे विस्फोटकों की तलाशी के दौरान हुआ। सैकड़ों ऐसे आईईडी अब भी जमीन पर दबे हो सकते हैं। नक्सल उन्मूलन के लिए सरकार की कामयाबी को नकारा नहीं जा सकता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णे देव साय की इस मामले में जो दृढ़ इच्छाशक्ति रही और कोशिश ईमानदार रही, उसका नतीजा ही है कि बस्तर अब खुली हवा में सांस लेने लगा है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या लगभग शून्य हो चुकी है।
शायद विस्फोटक दबाए जाने की सटीक जगह का जवानों को पता होता तो यह हादसा नहीं होता। बस्तर में जब सैकड़ों नक्सलियों ने सरेंडर किया तो उनसे भी जानकारी ली गई होगी कि कहां-कहां जमीन के नीचे उन्होंने मौत का सामान छिपा रखा है, फिर भी यह घटना हो गई। यह ब्लास्ट आगाह करता है कि उग्रवादियों का केवल सरेंडर होना या मारा जाना काफी नहीं है। बीते चार दशकों में उन्होंने बस्तर में जो जड़ें जमाई है, उनका उन्मूलन भी जरूरी है। सरेंडर करने वाले नक्सलियों ने हथियार, भारी मात्रा में कैश और विस्फोटकों की जानकारी सुरक्षा बलों को दी है, सैकड़ों आईईडी उनकी ही सूचना पर रिकवर हुए हैं। बावजूद नारायणपुर-कांकेर की यह घटना बताती है कि पुराने प्लांटेड विस्फोटक अब भी खतरा बने हुए हैं। सवाल खड़ा होता है कि क्या सुरक्षा बलों को सरेंडर करने वाले नक्सली अधूरी जानकारी दे रहे हैं, कुछ छिपा रहे हैं? उनकी रणनीति का यह कोई हिस्सा तो नहीं?
इस घटना को अपवाद ही मानकर चलना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि यह दोहराया नहीं जाएगा। मगर, यह तय है कि उन्मूलन का मतलब केवल सरेंडर कराना, मार गिराना, बंदूक और विस्फोटक बरामद करना काफी नहीं है। आंध्रप्रदेश में ग्रेहाउंड फोर्स ने सशस्त्र प्रतिक्रिया के जरिये नक्सलियों की नोक नीचे की। मगर असल सफलता तब मिली जब भूमि सुधार हुआ, ग्रामीणों को पट्टे दिए गए, उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए। शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच बनी, इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त किए गए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी यही मॉडल अपनाया जा रहा है। दुनिया के देशों की बात करें तो कोलंबिया में फार्स (एफएआरसी) के खिलाफ उरिबे की रणनीति में सैन्य दबाव तो शामिल ही था, साथ में विकास कार्यक्रम और पुनर्वास योजनाएं लागू कीं। पेरू में शाइनिंग पाथ की सैन्य शक्ति का पराभव हुआ, मगर वहां ग्रामीण विकास ने स्थायी शांति दी। श्रीलंका में लिट्टे का सैन्य बल से उन्मूलन तो हुआ पर उस विद्रोह को उभरने से रोकने के लिए प्रभावित वर्ग की राजनीतिक भूमिका बढ़ाई गई और पुनर्वास कार्यक्रम चलाए गए। कहने का मतलब यह है कि बस्तर से नक्सलवाद उन्मूलन भी बहुआयामी होना चाहिए। सरेंडर, हथियारों की जब्ती, मारा जाना एक चरण है। अगला चरण थोड़ा कठिन है, जिसमें प्रभावितों के बीच व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करना होगा।
ईडी के छत्तीसगढ़ में 8 वर्ष
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अपनी स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में निदेशक राहुल नवीन ने एजेंसी का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, ईडी ने 94 फीसदी का उच्च कन्विक्शन रेट हासिल किया है और वित्त वर्ष 2025-26 में 81,422 करोड़ की रिकॉर्ड संपत्ति कुर्क की है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 171 फीसदी अधिक है। अब तक एजेंसी कुल 2.36 लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति अटैच कर चुकी है।
छत्तीसगढ़ पर नजर डालें तो रायपुर में ईडी का पूर्ण जोनल कार्यालय जनवरी 2025 में सक्रिय हुआ, जबकि इसकी शुरुआत 2017-18 में उप-जोनल कार्यालय के रूप में हुई थी, जो पहले मुंबई जोनल ऑफिस के अधीन कार्यरत था। पूर्ण कार्यालय बनने के बाद अब यह सीधे दिल्ली मुख्यालय को रिपोर्ट करता है। राज्य में मनी लॉन्ड्रिंग और सरकारी धन के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसकी भूमिका लगातार मजबूत की गई है।
इन आठ वर्षों में ईडी ने छत्तीसगढ़ में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में कार्रवाई की है। शराब, कोयला, ऑनलाइन सट्टा, डीएमएफ, कस्टम मिलिंग और जमीन से जुड़े घोटालों में एजेंसी ने सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क और जब्त की है। कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ रहा है और हर नई रेड के साथ आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं।
अप्रैल 2026 तक के प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो, सबसे पहले ईडी ने करीब 32 सौ करोड़ के शराब घोटाले में ईडी ने 100 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है। इसमें तीन प्रमुख डिस्टिलर्स से जुड़ी लगभग 68 करोड़ की संपत्ति, दो आईएएस और एक राज्य सेवा अधिकारी से संबंधित संपत्तियां शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की 61.2 करोड़ की संपत्ति भी अटैच की गई है।
महादेव सट्टा ऐप मामले में ईडी ने 91.82 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है, जिसमें 75 करोड़ का बैंक बैलेंस शामिल है। वहीं 26 सौ करोड़ से अधिक की संपत्तियां जांच के दायरे में हैं।
कोल लेवी घोटाले में 2.66 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की गई है। हाल ही में भारतमाला मुआवजा घोटाले में 23.35 करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई, जिसमें 17 किलो सोना और हीरे के गहने भी जब्त किए गए हैं।
इन मामलों में ईडी ने कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजा है। इनमें आईएएस अधिकारी समीर विश्नोई, रानू साहू, अनिल टूटेजा, आईटीएस अधिकारी एपी त्रिपाठी, राज्य सेवा अधिकारी सौम्या चौरसिया, खनिज विभाग के एस एस नाग, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल, कारोबारी सूर्यकांत तिवारी, अनवर ढेबर और राइस मिलर रोशन चंद्राकर जैसे नाम शामिल हैं।
हालांकि एजेंसी की कार्रवाई के बीच कुछ सवाल भी उठते रहे हैं। भारतमाला मुआवजा घोटाले में पूर्व मंत्री के भाई भूपेंद्र चंद्राकर को जांच के घेरे में लिया गया है, लेकिन पिछले तीन वर्षों से कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद गिरफ्तारी न हो पाना एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में ईडी के आठ वर्षों का सफर कार्रवाई और उपलब्धियों के साथ-साथ चुनौतियों और सवालों से भी भरा रहा है।
ब्याज के बदले बकरी

सरगुजा जिले में महिलाओं की आय बढ़ाने के लिए एक अलग तरह की पहल की गई है। गांवों में छेरी बैंक खोले गए हैं, जहां उन्हें बकरियां खरीदने के लिए कर्ज दिया जा रहा है। इस कर्ज के किस्तों का भुगतान उन्हें रुपयों में नहीं करना है, बल्कि मेमनों से करना है। बकरियां बच्चे पैदा करेंगी और उनमें से ही एक को या कुछ को, वे चुकाकर कर्ज से मुक्त हो जाएंगी। बकरियों के लिए कर्ज देने का पुराना कार्यक्रम सरकारी है, बिहान योजना के अंतर्गत। पर कर्ज की रकम चुकाने के लिए नगद की जगह शावक या मेमना देने का प्रयोग नया है।
जगह-जगह याद किए जा रहे गोविंद सारंग

छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्तमान स्वरूप को गढऩे वाले पुराने संगठनकर्ता स्व. गोविंद सारंग को उनकी जयंती पर प्रदेशभर में याद किया जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष किरण देव सिंह ने बस्तर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने-अपने तरीके से उन्हें नमन किया।
एक वरिष्ठ नेता ने सोशल मीडिया पर स्व. सारंग के योगदान को याद करते हुए बताया कि अविभाजित मध्यप्रदेश में संगठनात्मक दृष्टि से पार्टी को तीन हिस्सों में बांटा गया था, इनमें मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ थे। मध्य भारत में कृष्ण मुरारी मोघे, महाकौशल में मेघराज जैन और छत्तीसगढ़ में संगठन की जिम्मेदारी गोविंद सारंग को सौंपी गई थी।
उस दौर में छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन कांग्रेस की तुलना में काफी कमजोर था। भोपाल से रायपुर आने के बाद गोविंद सारंग ने जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने का बीड़ा उठाया। वे स्कूटर से रायपुर के वार्डों का दौरा करते, तो राज्य परिवहन की बसों से बस्तर और सरगुजा तक पहुंचकर कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे।
बाद में विजयाराजे सिंधिया द्वारा भेजी गई एक जीप (एमपीजी 9673) से उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा कर संगठन को विस्तार दिया। इसके बाद उन्हें एक फिएट कार भी मिली, जिससे उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा को मजबूती से खड़ा करने की रणनीति को और धार दी।
उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज छत्तीसगढ़ में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित हो चुकी है और प्रदेश में पार्टी की चौथी सरकार है। 2003 से 2018 तक बनी भाजपा सरकारों में शामिल अधिकांश विधायक और सांसद कहीं न कहीं स्व. सारंग की संगठनात्मक तैयारी की देन माने जाते हैं।
उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ता आज मार्गदर्शक मंडल में हैं। इससे परे 2014 के बाद पार्टी में एक नई पीढ़ी उभरी, जिसने नेतृत्व को प्रभावित करते हुए संगठन में अपनी जगह बनाई।
स्व. गोविंद सारंग का योगदान सिर्फ संगठन निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा की वैचारिक और राजनीतिक नींव को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई
कर्मचारियों को तटस्थ रहना जरूरी नहीं?
छत्तीसगढ़ सरकार ने 21 अप्रैल को एक साधारण सा परिपत्र जारी किया और उसे फिर अगले ही दिन वापस भी ले लिया। उस आदेश में सामान्य प्रशासन विभाग ने कहा था कि कोई भी कर्मचारी, कर्मचारियों के आचरण नियमावली 1965 के अनुसार किसी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं जुड़ सकता। उनके कार्यक्रमों में न तो वह भाग लेगा और न ही कोई पद संभालेगा। कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कर्तव्यों का पूरी निष्पक्षता के साथ निर्वहन करें, ईमानदारी और अखंडता के साथ करें। कर्मचारी तटस्थ रहकर ही जनसेवा कर सकता है, यही लोकतंत्र की आधारशिला है.., इत्यादि बातें लिखी गई थीं। यानि, जिस आदेश में ऊंचे आदर्शों की बात की गई थी, उसमें कोई खामी नजर आई और सरकार को वह परिपत्र वापस लेना पड़ गया।
संविधान की भावना है कि नौकरशाह हों या बाबू, वे किसी पार्टी के नहीं होते। वे जनता के होते हैं। इसीलिये राजनीति दलों या संगठनों में उनकी सदस्यता 1965 में बने नियमों के तहत निषिद्ध है। जीएडी के आदेश में उसी बात की याद दिलाई गई थी लेकिन अगले ही दिन उस पत्र को वापस लिया जाना कुछ सवाल खड़े करते हैं। क्या इस पत्र को भाजपा के कुछ तबकों में आरएसएस के खिलाफ मान लिया गया? सन् 2024 में केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी थी। इसका पालन छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। परिपत्र में, जिसे वापस लिया गया, राजनीतिक दलों के अलावा संगठनों का भी उल्लेख किया गया था। इससे यह संकेत मिल रहा था कि इसके बाद तो आरएसएस के कार्यक्रमों में कर्मचारियों के जाने पर प्रतिबंध लग जाएगा। आरएसएस इस समय छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मुद्दे पर बहुत मुखर है। दूसरी बात यह है कि निचले स्तर पर कर्मचारी अक्सर जातिगत, धार्मिक, अर्ध धार्मिक मंचों और संगठनों से जुड़े रहते हैं। उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव होता है। यदि वह अफसर हो तो उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव भी होता है। इनका एक बड़ा वोट बैंक भी होता है, जिनकी राजनीतिक दलों को जरूरत बनी रहती है। यदि उन्हें सामाजिक धार्मिक संगठनों के कार्यक्रमों में भाग लेने से रोक दिया गया तो राजनीतिक दलों का नुकसान ही होना है।
आम लोगों के नजरिये से देखें तो अनेक संगठन ऐसे हैं, जिनकी स्थापना ही कर्मचारी, अधिकारी नेता करते हैं, या फिर उनमें वे संरक्षक की भूमिका में होते हैं। वे इतने सक्रिय होते हैं कि बस अपने दफ्तर की ड्यूटी नहीं करते, बाकी सब करते हैं, जो कुल मिलाकर प्रशासन की कार्यक्षमता पर असर डालती है। पहला परिपत्र कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने वाला था, वापस लिए जाने वाला दूसरा परिपत्र सरकार के भीतर के अंतर्विरोध को सामने लाता है।
जनगणना में आदिवासी पहचान की लड़ाई
जनगणना के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में दर्ज कराने के लिए मुहिम चल रही है। उसी तरह से आदिवासी संगठन आह्वान कर रहे हैं कि समाज के लोग जनगणना में अपना धर्म आदिवासी दर्ज कराएं।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी की कुल आबादी लगभग 30 प्रतिशत है। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर, सुकमा,कोंडागांव, दंतेवाड़ा जैसे जिलों के गोंड, हल्बा, बैगा, कमार, ओरांव आदि जनजातियों की धार्मिक परंपरा प्रकृति पूजा और पूर्वजों की आराधना पर आधारित है। गोंड समुदाय में गोंडी या कोईतुर परंपरा, जबकि कुछ क्षेत्रों में सरना जैसी पूजा पद्धतियां चलन में हैं।
अब जब जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है, बस्तर संभाग के कई आदिवासी संगठनों ने धर्म के कॉलम में आदिवासी भरा जाए, इसका अभियान शुरू किया है। सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग की ओर से कहा गया है कि धर्म के कॉलम में आदिवासी लिखा जाना केवल भिन्न धार्मिक पहचान के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि जल-जंगल-जमीन के अधिकार, पेसा कानून के अधिकार, सांस्कृतिक अस्तित्व और भविष्य में होने वाले विधानसभा, लोकसभा के परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
इतिहास टटोलने पर पता चलता है कि 1871 से 1941 तक ब्रिटिश सरकार ने जनगणना में आदिवासियों को हिंदुओं या किसी भी अन्य धार्मिक समुदाय से अलग गिना था। समुदाय के तौर पर इन्हें एबोरिजिनल्स, एनिमिस्ट्स, ट्राइबल एनिमिस्ट्स, हिल एंड फॉरेस्ट ट्राइब्स या प्रिमिटिव ट्राइब्स कहा गया। उनकी धार्मिक श्रेणी को एनिमिज्म या ट्राइबल रेलिजन के रूप में दर्ज किया गया। अंग्रेजों का मानना था कि आदिवासियों की पूजा पाठ की पद्धति हिंदू मंदिरों की मूर्ति पूजा या वैदिक रीतियों से काफी अलग है। वे प्रकृति पर विश्वास रखते हैं, जिसमें कोई केंद्रीय देवता या पुजारी का वर्ग नहीं होता।
आजादी के बाद जब पहली जनगणना हुई तो भी इस व्यवस्था को कायम रखा गया लेकिन 1961 में एनिमिज्म या अलग आदिवासी श्रेणी हटा दी गई। इसके बाद ज्यादातर आदिवासियों को हिंदू की श्रेणी में डाल दिया गया या फिर उन्हें अन्य के कॉलम में दर्ज किया जाने लगा। सन् 2011 की जनगणना में करीब 8 करोड़ आदिवासियों में से लाखों लोगों को हिंदू या अन्य की श्रेणी में रखा गया। छत्तीसगढ़ में उस दौरान करीब 4 लाख 90 हजार आदिवासी अन्य धर्म या अलग मान्यता वाली श्रेणी में रखा गया।
देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस सरकार ने कुछ समाजशास्त्रियों के निष्कर्षों को मानते हुए आदिवासियों को बैकवर्ड्स हिंदू की श्रेणी में शामिल किया। तर्क यह दिया गया कि वे भारतीय भूमि पर रहते हैं। हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं और उनकी संस्कृति हिंदू संस्कृति का हिस्सा है। राष्ट्रवादी व हिंदुत्व विचारधारा के लिए भी यह धारणा अनुकूल थी। उसने इस विचार को आगे ही बढ़ाया ताकि हिंदू आबादी में विस्तार दिखे। परिणाम यह निकला कि आदिवासियों की प्रकृति आधारित धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए एक अलग संघर्ष शुरू हो गया। इस जनगणना में आदिवासी को अलग धर्म के रूप में दर्ज करने की अपील उसी संघर्ष का हिस्सा है।
स्मार्ट सिटी में मई दिवस

(तस्वीर- प्राण चड्ढा)
छत्तीसगढ़ के तीन स्मार्ट सिटीज़ में से एक- बिलासपुर का बृहस्पति बाजार। मई दिवस के दोपहर 12 बजे आग उगलते खुले आसमान के नीचे कुछ मजदूर इंतजार कर रहे हैं। ऐसे छोटे-छोटे कई और टुकड़े में बिखरे हुए। इंतजार कर रहे हैं कोई आए, बुलाए और आज की रोटी का जुगाड़ हो जाए। कुली, रेजा, मिस्त्री सब अपनी मेहनत और हुनर को लेकर बाजार में खड़े हैं, लेकिन इस मेहनत की कीमत तय करने वाला कोई नहीं। मांग और पूर्ति पर आधारित है। कंस्ट्रक्शन और त्यौहार के दिनों में जब मांग बढ़ती है तो ठीक-ठाक मजदूरी मिल जाती है, पर जब दोपहर तक काम नहीं मिलता तो मजदूर बेहद बेचैन हो जाता है। वह आधे दाम पर काम करने के लिए तैयार हो जाता है। हर रोज प्रशासन और पुलिस की नजर में ये आते हैं, क्योंकि संख्या सैकड़ों में होती है, रास्ता जाम हो जाता है- पर शायद ही किसी ने आकर पूछा हो कि तुम लोगों को न्यूनतम मजदूरी मिलती भी है या नहीं? कोई मजदूर संगठन भी इनकी सुध नहीं लेता।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की बैठक में अध्यक्ष दीपक बैज ही मुखिया रहते हैं। लेकिन विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत को अपने जितनी ऊँची, बराबर की कुर्सी देते तो खुद की इज़्ज़त बढ़ती।
हसदेव अरण्य जैसा ग्रेट निकोबार
ग्रेड निकोबार परियोजना केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व वाले इस द्वीप का समग्र विकास करना घोषित किया गया है। करीब 80 हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना 900 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्रेट निकोबार इलाके के 160 वर्ग किलोमीटर में लागू होने वाली है। इसके तहत इसमें एक बड़ा बंदरगाह, ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक अत्याधुनिक टाउनशिप और पॉवर प्लांट स्थापित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ साल पहले जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लिए ऑप्टिकल फाइबर लाइन के जरिये हाई स्पीड इंटरनेट सेवा शुरू की थी, तब इसकी घोषणा की थी। अभी दो दिन पहले विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा किया। उन्होंने इसे विकास के नाम पर विनाश और प्रकृति के खिलाफ अपराध बताया। ठीक वैसा ही जैसा हसदेव अरण्य में कोयला खनन की अनुमति दिए जाने को लेकर चिंताएं हैं। जो बातें राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए कही हैं, करीब-करीब हसदेव पर भी वह लागू होती हैं। उन्होंने दावा किया कि परियोजना लागू होने से प्राचीन वर्षावन नष्ट हो जाएंगे और लाखों पेड़ों को काटा जाएगा। यह परियोजना शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों की विरासत और अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है।
यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि परियोजना के लिए वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन किया जा रहा है, जैसा कि हसदेव के मामले में है। ग्रेट निकोबार जनजातीय परिषद ने नवंबर 2022 में परियोजना के लिए एनओसी दी थी लेकिन बाद में यह सहमति यह कहकर वापस ले ली गई कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई, अंधेरे में रखा गया। यह बात हसदेव में ग्राम सभाओं से ली जाने वाली मंजूरी के तरीके की तरह लगती है। परिषद के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रशासन उन पर अपनी पैतृक भूमि सरेंडर करने के लिए दबाव डाल रहा है। उनका कहना है कि एफआरए के तहत निपटारा किए बिना उनकी भूमि का डायवर्सन किया जा रहा है। यह बात भी हसदेव के लिए किए गए अधिग्रहण से बहुत मिलती-जुलती है।
जनजातियों के अस्तित्व के संकट का सवाल शायद ग्रेट निकोबार में शायद हसदेव से भी ज्यादा गंभीर है। सर्वाइवल इंटरनेशनल नाम के एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने इस परियोजना को नरसंहार तक कह दिया है क्योंकि यह शोम्पेन जनजाति के लिए विनाशकारी है। शोम्पेन को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में रखा गया है। कई मानव वैज्ञानिकों का कहना है कि बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ेगा और उनकी विशिष्ट संस्कृति समाप्त हो सकती है। सुनामी के बाद विस्थापित कई निकोबारी परिवार अपने पैतृक भूमि पर वापस लौटना चाहते हैं लेकिन उन्हें जाने से रोका जा रहा है।
हसदेव और ग्रेट निकोबार में जो समानताएं हैं, उनमें बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, दोनों ही क्षेत्रों के आदिवासी समुदायों का पुरखों की भूमि से विस्थापन, उनकी आजीविका, संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व पर संकट है। हसदेव को ‘छत्तीसगढ़ का फेफड़ा’ कहा जाता है, वैसे ही निकोबार के वर्षावन कार्बन सोखने और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं। हसदेव में लंबे समय से चल रहे जन आंदोलन की तरह ही अब निकोबार में भी स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों का विरोध तेज हो रहा है, जिसे राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है।
बड़ों की बारी आएगी?
भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाला प्रकरण में ईडी की कार्रवाई तेज होती नजर आ रही है। एजेंसी ने उन स्थानों पर भी दबिश दी है, जो ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच के दायरे में नहीं आए थे।
कार्रवाई के दौरान पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के करीबी रिश्तेदार भूपेंद्र चंद्राकर को भी जांच के घेरे में लिया गया है। वहीं दुर्ग के भाजपा नेता चतुर्भुज राठी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर भी छापेमारी की गई।
हालांकि अब तक किसी बड़ी बरामदगी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संकेत हैं कि आने वाले दिनों में कुछ बड़े नाम सामने आ सकते हैं। चर्चा यह भी है कि धमतरी जिले के एक कारोबारी को लगभग 100 करोड़ रुपये के आसपास मुआवजा मिला था, जिसके लिए कथित तौर पर किसानों के नाम पर जमीन खरीदी गई थी।
बताते हैं कि कुछ अन्य बड़े कारोबारी अभी भी जांच के दायरे से बाहर हैं, लेकिन उनकी भूमिका पर भी नजर रखी जा रही है। ईडी ने जिन लोगों के यहां छापेमारी की है, उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं। माना जा रहा है कि डिजिटल साक्ष्यों से इस पूरे मामले में अहम खुलासे हो सकते हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है ।
फैशन करते पिट न जाएं...
फैशन का मतलब अलग होना, अटपटा होना, कई किस्म का हो सकता है। दुनिया की एक बड़ी फैशन कंपनी ने इंसानी भू्रण के कान के बाले बनाकर दुनिया भर में हंगामा खड़ा कर दिया था। अब एक दूसरी फैशन कंपनी ने मक्खी जैसे कान के पिन बनाए हैं। मच्छर, तिलचट्टे, अधिक दूर नहीं हैं, उनकी भी बारी चेहरे पर सजने की आने ही वाली है। एक खतरा यह हो सकता है कि इन्हें कानों पर सजे देखकर कोई इन्हें मारने के नाम पर थप्पड़ न लगा दे!


