राजपथ - जनपथ
लाइसेंस रिन्यू के लिए लाइन में लगे डॉ. महंत
छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत सोमवार को बिलासपुर प्रवास के दौरान लगरा स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने आम नागरिकों की तरह अपनी ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी कराई। बिना किसी विशेष व्यवस्था के उन्होंने निर्धारित नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी कीं और पांच वर्षों के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया।
दोपहर करीब दो बजे शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान डॉ. महंत ने अपनी बारी आने का इंतजार किया। इसके बाद उन्होंने फोटो खिंचवाने से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर तक की सभी जरूरी प्रक्रियाएं सामान्य आवेदक की तरह पूरी कीं। कुछ ही समय में उनका ड्राइविंग लाइसेंस अगले पांच साल के लिए रिन्यू हो गया।
काम पूरा होने के बाद उन्होंने आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों का सहयोग के लिए आभार जताया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों के बीच भी उनकी सादगी और नियमों के पालन को लेकर चर्चा होती रही। डॉ. महंत ने अपने इस अनुभव को सोशल मीडिया पर भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि वे नियमों का पालन करें और अपने जरूरी दस्तावेज समय-समय पर अपडेट रखें। उन्होंने आरटीओ कार्यालय की व्यवस्था और कर्मचारियों के सहयोग की भी सराहना की।
कांग्रेस में बदलाव अगस्त से पहले या...
प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। इसी बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया है। वह बिलाईगढ़ गए थे और फिर रायगढ़ पहुंचकर कोयला खदान प्रभावितों से भी मिले। वह पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के घर जाकर मेल-मुलाकात भी कर रहे हैं। सिंहदेव की सक्रियता को लेकर पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा है। वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी रुचि प्रदेश अध्यक्ष बनने में है।
दीपक बैज का कार्यकाल अगस्त में खत्म हो रहा है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें बदला जा सकता है। सिंहदेव के दौरों को इससे जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा है कि सिंहदेव यूं ही सक्रिय नहीं हुए हैं। करीब दो माह पहले उनकी राहुल गांधी से डेढ़ घंटे तक अकेले में चर्चा हुई थी। इसके बाद ही वह ज्यादा सक्रिय नजर आने लगे।
हालांकि पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमे ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। पूर्व सीएम की दखल के बाद महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बालोद विधायक संगीता सिन्हा की नियुक्ति हुई। जबकि टीएस सिंहदेव ने पूर्व विधायक छन्नी साहू का नाम आगे बढ़ाया था। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व सीएम की ओर से अभी कोई नया नाम सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा है कि वह पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का नाम आगे बढ़ा सकते हैं। फिलहाल नई नियुक्ति तक कांग्रेस में खींचतान जारी रहने के आसार हैं।
घोटाले जब लोक अदालत जाने लगें...
सन् 2003 के सीजी पीएससी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुलह की पहल ने वंचित याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के पुराने जख्म फिर कुरेद दिए हैं। यह याद रखना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग दो दशक पहले लोक सेवा आयोग के खिलाफ जो फैसला दिया था, उसके पीछे साफ-साफ भर्ती घोटाला पाया जाना था। अदालत में यह साबित हुआ था कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई, अंकों में हेराफेरी हुई, अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया और पात्र उम्मीदवारों को या तो चयन से बाहर कर दिया गया या फिर छोटे पदों पर समायोजित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्केलिंग प्रक्रिया को दोबारा निर्धारित करते हुए पूरी चयन सूची नए सिरे से तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन इस फैसले पर अमल हो पाता, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से उन अभ्यर्थियों को स्थगन मिल गया, जिनकी स्थिति नई चयन सूची बनने के बाद प्रभावित हो रही थी। कई लोगों को निचले पदों पर जाना पड़ता या चयन सूची से बाहर होना पड़ता। सन् 2007 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक अंतिम फैसला नहीं आ सका है।
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर उस समय सवाल उठे थे, वे सवाल आज भी कायम हैं। कई अधिकारी डिप्टी कलेक्टर से प्रमोट होकर आईएएस बन चुके हैं। कुछ जिलों में कलेक्टर हैं तो कुछ मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। दूसरी ओर वे अभ्यर्थी, जो खुद को वंचित मानते हैं, छोटे पदों पर वर्षों से सेवा कर रहे हैं। उनकी सेवा अवधि अब इतनी हो चुकी है कि वे चाहें तो वीआरएस लेकर पेंशन के हकदार बन सकते हैं।
ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की ओर से लोक अदालत का सुझाव सामने आया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं की है, लोक सेवा आयोग ने की है या फिर किसी पक्षकार ने इसका सुझाव दिया है। लेकिन मूल याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उनका कहना है किहमें सुलह नहीं, न्याय चाहिए।
दिलचस्प बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में थी और यह लगभग तय माना जा रहा था कि फैसला सीजी पीएससी के खिलाफ जाएगा, तब भी आयोग की ओर से समझौते की पेशकश की गई थी। जिन याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे डिप्टी कलेक्टर पद के वास्तविक हकदार हैं, उन्हें याचिका वापस लेने की शर्त पर वही पद देने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उस समय भी याचिकाकर्ताओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के लिए न्याय चाहते हैं जिन्हें कथित भ्रष्ट चयन प्रक्रिया ने बाहर कर दिया।
वैसे, लोक अदालत में भी न्याय ही होता है। वहां दोनों पक्षों की सहमति से समाधान निकलता है और तभी आदेश पारित होता है जब सभी पक्ष संतुष्ट हों। लेकिन यदि इस मामले में लोक अदालत के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाता है, तो उसकी शक्ल क्या होगी?
एक संभावना यह हो सकती है कि याचिकाकर्ताओं को सेवा की बची हुई अवधि के लिए वही अवसर दिया जाए, जो हाईकोर्ट के फैसले से पहले प्रस्तावित था। इसके लिए राज्य शासन और लोक सेवा आयोग दोनों की सहमति जरूरी होगी।
दूसरा सवाल उन अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों को लेकर है, जिन्होंने कथित रूप से गलत आधार पर चयन किया। क्या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की बात भी समझौते का हिस्सा होगी? अब तक वे कानून के शिकंजे से लगभग बाहर ही रहे हैं।
सबसे जटिल प्रश्न उन अधिकारियों को लेकर है, जो वर्षों से कथित गलत चयन के आधार पर सेवा लाभ लेते रहे हैं। क्या उन्हें पद से हटाया जाएगा? क्या पदावनत किया जाएगा? व्यवहारिक रूप से यह बेहद कठिन और जोखिम भरा कदम होगा। संभव है कि लोक अदालत में वे पक्षकार ही न हों, और यदि कोई प्रतिकूल निर्णय हुआ तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
ऐसे में समझौते का स्वरूप शायद कुछ ऐसा हो सकता है, अतीत को पीछे छोडक़र भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश करो। जिन अभ्यर्थियों को पीडि़त माना जा रहा है, उनकी सेवा के अभी भी कुछ वर्ष शेष हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर ले लिया जाए। लेकिन क्या उन्हें एरियर सहित पिछला वेतन, वरिष्ठता और पेंशन गणना का लाभ भी मिलेगा? स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।
एक बड़ा सवाल और भी खड़ा होता है, क्या सरकारी भर्तियों में हुए घोटालों का समाधान लोक अदालत के जरिए किया जा सकता है? यदि सीजी पीएससी-2003 मामले में लोक अदालत कोई रास्ता निकालने में सफल होती है, तो फिर क्या सीजी पीएससी-2021 में हुए घोटाले के लिए भी ऐसे ही समाधान का रास्ता निकल जाएगा?
मछलियाँ तो ठीक हैं, मगरमच्छ?
ईडी ने अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की जांच तेज कर दी है। ताजा खबर यह है कि जांच एजेंसी ने बैंक के आधा दर्जन ऐसे खातों का पता लगाया है, जिनमें करोड़ों का लेनदेन हुआ है। इन खातों का ब्यौरा मांगा गया है। यह भी जानकारी सामने आई है कि बैंक से जुड़ी शाखाओं में वर्ष 2013-14 से गड़बड़ी शुरू हो गई थी और करीब 10 साल बाद इसका खुलासा हुआ।
बताते हैं कि बैंक में करोड़ों की गड़बड़ी की जानकारी विभाग के आला अफसरों को पहले से थी, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में पुलिस ने धोखाधड़ी के प्रकरण में बैंक अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, तब जाकर राज्य स्तरीय जांच टीम बनाई गई। यह टीम कई बार अंबिकापुर गई, लेकिन गड़बड़ी को लेकर कोई नई जानकारी नहीं जुटा पाई। अब ईडी ने जांच शुरू की है, तो राज्य स्तरीय जांच टीम से भी पूछताछ हो सकती है।
भारतमाला परियोजना में राज्य की एजेंसी ने पहले छोटी मछलियों पर ही कार्रवाई की थी, लेकिन ईडी ने कई बड़े लोगों को भी घेरे में लिया, जो अब तक जांच से बचे रहे थे। हालांकि बैंक घोटाले में अभी तक ईडी की ओर से कोई नई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन चर्चा है कि कई प्रभावशाली लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
छत्तीसगढ़ की गलती केरल में दोहराती कांग्रेस
पांच राज्यों के नतीजे आए एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। बाकी राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके, शपथ-ग्रहण भी हो चुका, लेकिन एक राज्य, केरल जहां कांग्रेस को सरकार बनानी है, अभी तक मुख्यमंत्री का नाम फाइनल नहीं हुआ है। वैसे तो वहां के विधायक दल ने कांग्रेस हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया है, पर विधायकों के तीन गुट हैं, जो अलग-अलग नामों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि समर्थक शक्ति प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अतीत से पता चलता है कि ऐसे मामले में भारतीय जनता पार्टी के उलट कांग्रेस हाईकमान मजबूती से और जल्दी फैसला नहीं ले पाता। सन् 2018 में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई तो पार्टी नेतृत्व के सामने यही संकट था। अंत में दोनों दावेदारों को ढाई-ढाई साल का टर्म देने की बात हुई। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं किया था और सिंहदेव अपने टर्म के लिए हाईकमान के फैसले की प्रतीक्षा करते रहे। बघेल खेमे को दिल्ली में विधायकों की परेड कर बताना पड़ा कि बहुमत उनके साथ है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डी. शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल का समझौता हुआ, प्रचारित था, पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुर्सी छोडऩे को राजी नहीं है और शिवकुमार के समर्थकों में असंतोष देखा जा रहा है। केरल में अजीब स्थिति है। यहां ढाई-ढाई साल की सांत्वना से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यहां तीन दावेदार हैं। पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे बीडी सतीसन, वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। केरल में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आईयूएमएल ने सतीसन के नाम का समर्थन किया है, लेकिन उन्हें वेणुगोपाल के नाम पर आपत्ति है। उसका कहना है कि उन्होंने तो विधानसभा चुनाव ही नहीं लड़ा। इस समय वे सांसद हैं। मगर, दिलचस्प यह है कि केरल में अधिकांश टिकट वेणुगोपाल ने ही फाइनल किए हैं, और 40 से अधिक विधायक उन्हें सीएम बनाना चाहते हैं। कांग्रेस यहां 63 सीटों पर विजयी रही, गठबंधन के साथ उसे 102 सीटें मिली हैं।
याद कीजिए सन् 2023 में भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल में नहीं लिया। सीएम बनने की कतार में जिन नामों की चर्चा थी, उनको भी निराश होना पड़ा। उसके पहले के लोकसभा चुनाव में सारे सीटिंग सांसदों की टिकट काट दिया था। पर, कांग्रेस के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। सरकार होने के दौरान छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े नेताओं की लड़ाई ने एक दूसरे को निपटा दिया। ऐसा ही कुछ ढुलमुल रवैया कांग्रेस हाईकमान का मध्यप्रदेश और राजस्थान के मामले में देखा गया। मध्यप्रदेश में कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे कर दिया, जबकि वे सीएम के दावेदार थे। उनके समर्थक विधायकों ने मिलकर सरकार ही गिरा दी। सन् 2023 के चुनाव परिणामों के बाद एक झटके में शिवराज सिंह चौहान के टर्म को समाप्त कर दिया, मगर सिंधिया को भी मौका नहीं दिया। राजस्थान में कांग्रेस सरकार बीच में तो नहीं गिरी, पर छत्तीसगढ़ की तरह 2023 के चुनाव में गिर गई। यहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जबरदस्त खींचतान है। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक के मामले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, अभी अगला विधानसभा चुनाव दूर है। दरअसल, कांग्रेस के पास यह समस्या तब से है, जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है। प्रदेश के असंतुष्ट नेताओं को वैकल्पिक किसी बड़े ओहदे में बिठा देने का विकल्प नहीं है।
जब रायपुर की बैलगाडिय़ों में भरती थी ‘हवा’

एक ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद कहानी समझे ( गोकुल सोनी )
आज मैं आपको रायपुर का एक ऐसा किस्सा सुनाना चाहता हूं, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है। ऐसा किस्सा, जिसे आज की पीढ़ी शायद सुनकर हंस भी दे और हैरान भी हो जाए।
जब महापौर जीप में बैठकर करते थे शहर का दौरा...........
सत्तर के दशक की बात है। उन दिनों तरुण दादा एक बार पहले भी रायपुर के महापौर रह चुके थे। शायद तब महापौर का कार्यकाल केवल एक वर्ष का हुआ करता था। उसी दौर में आर.एन. मूर्ति जी और स्वरूपचंद जैन जी भी महापौर बने थे। उस समय नगर निगम के पास एक पेट्रोल से चलने वाली सफेद रंग की जीप हुआ करती थी। तरुण दादा उसी जीप में सामने बैठकर पूरे शहर का दौरा किया करते थे।
आज की तरह न बड़ी-बड़ी गाडिय़ों का काफिला होता था और न चमक-दमक। शहर छोटा था, लोग सीधे थे और काम भी धीरे मगर टिकाऊ होता था।
जब सडक़ बनाना किसी तपस्या से कम नहीं था..........
आज तो रातों-रात मशीनें आकर सडक़ बना देती हैं। लेकिन उस समय एक किलोमीटर सडक़ बनने में तीन-चार दिन लग जाते थे।
सडक़ किनारे भ_ी बनाई जाती थी। उसमें लकडिय़ां जलती रहती थीं। ऊपर डामर के खाली ड्रम को काटकर बड़ी कढ़ाई जैसी बनाई जाती थी, जिसमें डामर पिघलाया जाता था।
फिर मजदूर रेत, गिट्टी और डामर का घोल तैयार करते और हाथों से सडक़ बिछाते थे। बाद में स्टीम इंजन वाली भारी-भरकम रोड रोलर उसे दबाकर समतल करती थी। उस दौर में सडक़ बनाना केवल काम नहीं, मेहनत और धैर्य का इम्तिहान था।
बैलगाडिय़ां बनीं नई समस्या............
चूंकि सडक़ें इतनी मेहनत से बनती थीं, इसलिए उनकी देखरेख भी बहुत जरूरी मानी जाती थी। उसी समय शहर में बड़ी संख्या में बैलगाडिय़ां चलती थीं। खासकर गुढियारी के थोक बाजार से सामान दुकानों तक पहुंचाने के लिए हमाल और व्यापारी बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करते थे।
उन बैलगाडिय़ों के पहियों पर मोटे लोहे का पट्टा चढ़ा होता था, जिसे छत्तीसगढ़ी में च्च्बाटज्ज् कहते हैं। यही लोहे की बाट नई डामर वाली सडक़ों को जल्दी खराब कर देती थी। अधिकारियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।
बैलगाड़ी बंद करें या लोगों की रोजी बचायें ?.............
कुछ अधिकारियों ने सुझाव दिया कि शहर में बैलगाडिय़ों के चलने पर रोक लगा दी जाए। लेकिन परेशानी यह थी कि सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी उन्हीं बैलगाडिय़ों पर टिकी थी। उन्हें बंद करना आसान नहीं था।
फिर किसी ने एक अनोखा सुझाव दिया — क्यों न बैलगाड़ी के पुराने लकड़ी और लोहे वाले पहियों की जगह ट्रक के टायर लगा दिए जाएं ? बस, यहीं से रायपुर में एक नया प्रयोग शुरू हुआ।
नगर निगम के सामने लग गई भीड़..........
नगर निगम से आदेश निकला कि जिसके पास भी बैलगाड़ी है, वह अपना पंजीयन कराए। फिर क्या था, नगर निगम कार्यालय के सामने बैलगाड़ी वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने गाड़ों का रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचे।
धीरे-धीरे पुरानी लोहे की बाट वाले पहिए हटाए गए और उनकी जगह ट्रक के टायर वाले पहिए लगाए जाने लगे। उस समय रायपुर की सडक़ों पर बैलगाड़ी और ट्रक के टायर का यह अनोखा मेल लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया था।
जब बैलगाड़ी में भी भरती थी हवा..........
अब जरा इस दृश्य की कल्पना कीजिए, एक तरफ बैलगाड़ी खड़ी है, सामने बैल बंधे हैं और दूसरी तरफ पंचर दुकान वाला मशीन से उसके टायर में हवा भर रहा है। आज यह सुनने में सामान्य लगेगा, लेकिन उस समय यह दृश्य इतना अनोखा था कि लोग रुक-रुककर देखते थे।
जब मैं नया-नया फोटो जर्नलिस्ट बना था, तब मैंने पहली बार ऐसा दृश्य देखा। देखा तो पहले भी था तब एक फोटोजर्नलिसट का नजरिया नहीं था। मुझे वह इतना अलग लगा कि मैंने तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली। बाद में वह फोटो नवभारत अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।
धीरे-धीरे खत्म हो गया वह दौर............
फिर समय बदला। शहर में तीन पहिया ऑटो आये, मेटाडोर आये और धीरे-धीरे ट्रक के टायर वाली बैलगाडिय़ां सडक़ों से गायब होने लगीं। बताते हैं कि कुछ साल पहले तक कन्हैया साहू नाम के एक गाड़ीवान ऐसी बैलगाड़ी चलाते दिखाई दे जाते थे। लेकिन उनके निधन के बाद रायपुर से यह दृश्य भी हमेशा के लिए खत्म हो गया।
अब केवल यादों में बची
हैं वे बैलगाडिय़ां..........
आज की पीढ़ी शायद यकीन भी न करे कि कभी रायपुर में ऐसी बैलगाडिय़ां चलती थीं जिनमें ट्रक के टायर लगे होते थे और पंचर दुकानों पर उनमें हवा भरी जाती थी। लेकिन यही तो पुराने रायपुर की खूबसूरती थी। यह शहर हर मोड़ पर कोई न कोई ऐसा किस्सा छुपाकर बैठा है, जिसे सुनते ही पुराना दौर आंखों के सामने चलती तस्वीर की तरह जीवंत हो उठता है।
पैर पकड़े, तो हड़बड़ा गए अफसर
गरियाबंद के माडागांव के समाधान शिविर में पीएम आवास के लिए एक कमार दंपत्ति ने जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैर पकडक़र गुहार लगाई, तो हडक़ंप मच गया। इसकी खबर सोशल मीडिया के जरिए सीएम हाउस तक पहुंची, तो मामले को संज्ञान में लिया गया। कमार जनजाति राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं। जब कमार दंपत्ति ने प्रखर चंद्राकर के पैर पकड़े, तो वो हड़बड़ा गए। प्रखर धमतरी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने तुरंत इसकी पड़ताल करवाई। यह पता चला कि परिवार का नाम पूर्व के आवास सर्वे में शामिल नहीं हो पाया था, क्योंकि वे लंबे समय तक उड़ीसा में निवासरत थे।
यह बात सामने आई, कि वर्ष 2011, 2018 और 2024 के सर्वेक्षण के दौरान भी परिवार गांव में मौजूद नहीं था। हाल ही में परिवार के छत्तीसगढ़ लौटने के बाद पीएम जनमन योजना के तहत उनका सर्वे पूरा कर लिया गया है और जल्द ही आवास स्वीकृत करने का भरोसा दिलाया गया।
चूंकि सीएम हाउस ने मामले को संज्ञान में लिया, तो प्रशासन ने समाधान शिविर में परिवार का राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी बना दिए। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अफसरों ने परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। परिवार को तुरंत राहत देने की कोशिश की गई।
व्यापारी कल्याण बोर्ड को लेकर हलचल
पांच राज्यों के चुनाव निपटने के बाद अब प्रदेश के निगम-मंडलों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की चर्चा तेज हो गई। इन्हीं में व्यापारी कल्याण बोर्ड के गठन की भी तैयारी है। भाजपा के संकल्प पत्र में व्यापारी वर्ग के लिए बोर्ड के गठन का वादा किया गया था। अब बोर्ड अध्यक्ष के लिए व्यापारी नेताओं में होड़ मची है।
भाजपा के कई व्यापारी नेता अध्यक्ष पद के लिए प्रयासरत बताए जाते हैं। चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में उन्हें भी बोर्ड अध्यक्ष के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, पार्टी के दो पूर्व विधायक लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी की भी दावेदारी है। दोनों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली थी।
यही नहीं, कई और व्यापारी नेताओं के नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। इनमें सुभाष अग्रवाल, और सराफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा का नाम भी लिया जा रहा है। बरलोटा चैम्बर के अलग-अलग पदों पर रहे हैं। इन सबके बीच निगम मंडलों में उपाध्यक्ष, और संचालक मंडल के सदस्यों के पदों पर भी नियुक्तियां हो सकती हैं। ऐसे करीब सौ से अधिक पद रिक्त हैं जिन पर नियुक्तियां होनी है। नामों को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। देखना है सूची कब तक जारी होती है।
स्टेशनों से मिटेंगे अंग्रेजों के निशां मगर...
एक तरफ सरकार घर घर से ऐतिहासिक पांडुलिपियां, और सनातनी प्रतीक चिन्हों के संग्रह का देशव्यापी अभियान छेड़े हुए है और दूसरी ओर
मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के रखे गए नाम बदलने, उनके बनाए गए भवनों को तोडऩे का सिलसिला जारी रखे हुए है। राजभवन को लोक भवन किया जा चुका है तो अब सिविल लाइन बदलने वाला है। इस श्रृंखला में रेलवे ने भी अपने कदम बढ़ाएं हैं। वह भी मोस्ट अर्जेंटलि।
रेलवे बोर्ड ने देशभर के सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल के बीएनआर (बंगाल नागपुर रेलवे)रेलवे के उन तमाम प्रतीकों, प्रथाओं और अवशेषों को हटा दिया जाए, जो गुलामी की याद दिलाते हैं। इसके बाद से रेलवे का हर छोटा- बड़ा कर्मचारी -अधिकारी निशां ढूंढने में जुट गया है। उनका कहना है कि बिलासपुर जोन के रेलवे स्टेशनों में वैसे तो ऐसे निशां नहीं के बराबर हैं। जो है उसे हटाने के लिए तोड़ा जाना होगा। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर स्टेशन भवन की। यह स्टेशन बिल्डिंग लगभग 135 से 137 साल पुरानी है, जिसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान 1889-1890 में हुआ था। कुछ इतना ही नागपुर स्टेशन भी इतिहास समेटे हुए है। यह स्टेशन भी बिलासपुर जोन में आता है। पूर्व के वर्षों में इन पुरानी इमारत को अभी भी एक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की भी योजना रेलवे ने बनाई थी। अब तोडऩे का तो नहीं अंग्रेजों की यादें मिटाने का आदेश आया है। निकट भविष्य में तोड़ा नहीं जाता है तो अमृत भारत स्टेशन योजना में स्वरूप बदला जाएगा। रायपुर स्टेशन में भी प्लेटफार्म नंबर एक के दाहिने सिरे में रेल डाक दफ्तर के पास अंग्रेज़ों का बनाया एक छोटा सा केबिन हुआ करता था।जो रेल मंडल बनने के बाद प्लेटफॉर्म विस्तार में तोड़ दिया गया था। इसके अलावा यहां कोई निशान बाकी नहीं रह गए हैं। अब यह सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं कि निशां मिटाने के बाद अफसरों से अंग्रेजियत मिट पाएगी। इससे सहमत, असहमत होकर रेलवे बोर्ड के इस आदेश की जानकारी शेयर करने वाले एक अफसर ने कहा कि रेलवे अब ब्रिटिश विरासत के बोझ से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।
सरकारी छात्रावास का ऐसा प्रचार
सरकारी मदद से चलने वाले संस्थानों का इस तरह का प्रचार कम ही देखने को मिलता है। बिलासपुर के आदिवासी विकास विभाग ने अपने छात्रावासों में दाखिले का रंग बिरंगा पर्चा कराया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि छात्रावासों में साफ-सुथरा भवन, लगातार बिजली, बिस्तर की पूरी व्यवस्था, पढ़ाई के लिए अलग कमरा, अच्छा खाना, खेलकूद, योग, संगीत और कला जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी मुफ्त मिलेगा।
इतना ही नहीं, पर्चों में अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं, ताकि छात्र-छात्राएं सीधे संपर्क कर प्रवेश ले सकें। अच्छी पहल लगती है। अगर सचमुच छात्रावासों में ऐसी सुविधाएं मिलें, तो बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह राहत की बात होगी। कौन पालक नहीं चाहेगा, यहां उनके बच्चों को मौका मिल जाए। फिर, अगर कोई कमी भी रही, तो छात्र सीधे शिकायत भी कर सकेंगे, क्योंकि विभाग ने खुद इन सुविधाओं का वादा किया है।
लेकिन इस पूरे प्रचार का दूसरा मतलब भी निकल जाता है। सवाल है कि क्या सरकारी छात्रावासों में अब पर्याप्त संख्या में छात्र-छात्राएं नहीं आ रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों की तरह आदिवासी छात्रावासों में भी बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। कल इनको भी बंद नहीं करना पड़ जाएगा?
याद कीजिए, पिछले दो साल में कई सरकारी स्कूल- जिनमें शहरी स्कूल, आदिवासी क्षेत्रों के कई स्कूल भी थे-यह कहकर बंद कर दिए गए कि वहां बच्चों की संख्या कम हो गई है। यदि सरकारी स्कूल भी इसी तरह लोगों को बुलाते नजर आते, हमारे यहां आइए, अच्छे शिक्षक हैं, बढिय़ा भवन है, खेल का मैदान है, अच्छी पढ़ाई होती है, तो शायद उनको बंद करने की नौबत नहीं आती।
पुराना वीडियो, नया हंगामा
एमसीबी जिले के कांग्रेस नेता और चिरमिरी के पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बना है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो। वीडियो में वे सडक़ पर कार की बोनट पर केक काटते नजर आ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे वीडियो सामने आते ही पुलिस तुरंत कार्रवाई करती दिखाई देती है, खासकर तब से जब हाईकोर्ट ने सडक़ पर केक काटने और सार्वजनिक जगहों पर हुड़दंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
लेकिन इस मामले में कहानी थोड़ी अलग है। डॉ. जायसवाल खुद थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि वायरल किया जा रहा वीडियो नया नहीं, बल्कि साल 2021 का है। इसे हाल का बताकर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तारीख का वीडियो बताया जा रहा है, उस दिन वे शिर्डी में थे, जिसके सबूत हैं उनके पास।
डॉ. जायसवाल का तर्क है कि सडक़ पर केक काटने जैसे मामलों पर सख्ती से कार्रवाई करने के निर्देश हाईकोर्ट ने साल 2025 में दिए। अदालत के निर्देश आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया।
हो सकता है उनका स्पष्टीकरण सही हो। उन्होंने भी खुद मान लिया है कि वीडियो 2021 का है। उस समय वे विधायक थे और संभव है कि समर्थकों के उत्साह में ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बने हों।
मगर, यह भी याद रखना चाहिए कि सडक़ पर इस तरह आयोजन करना 2025 से पहले भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन था। ट्रैफिक बाधित करना, सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति कार्यक्रम करना और शांति भंग करना, इन सबको लेकर कानून तब से मौजूद थे। फर्क सिर्फ इतना है कि बाद में जब पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के कई मामलों में कार्रवाई नहीं की, तब हाईकोर्ट को सख्त टिप्पणी कर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नसीहत दी गई।
तारीफ और महत्व
पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा खेमे में भी उत्साह का माहौल है। सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा शनिवार को कोलकाता पहुंचे और नए सीएम सुवेन्दु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए।
समारोह की एक तस्वीर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। मंच पर विजय शर्मा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ठीक पीछे खड़े नजर आए। इसे लेकर प्रदेश कांग्रेस ने तंज कसते हुए पोस्ट किया कि बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले गृहमंत्री को मंच पर कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, पीएसओ की जगह खड़े हैं।
इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया। भाजपा समर्थकों ने पलटवार करते हुए लिखा कि बड़े नेताओं के भरोसेमंद लोग अक्सर मंच के पीछे रहकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तस्वीरों से ज्यादा अहमियत भूमिका की होती है।
इसी बीच विजय शर्मा की ओर से जारी एक वीडियो ने चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में सीएम विष्णुदेव साय, अरुण साव और विजय शर्मा, सुवेन्दु अधिकारी को पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई देते नजर आ रहे हैं। इस दौरान सुवेन्दु अधिकारी, विजय शर्मा की तारीफ करते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं कि विजय ने नामांकन रैली में खूब मेहनत की है।
अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि जब मेहनत की खुलकर सराहना हो रही हो, तब मंच पर कौन बैठा और कौन खड़ा रहा, यह बहस ज्यादा मायने नहीं रखती।
ऑक्सीजन के जंगल पर विकास की कुल्हाड़ी
नवा रायपुर जाने के रास्ते के माना-तूता इलाके में फैला करीब चालीस-पैंतालीस बरस पुराना जंगल इन दिनों बेचैन है। जिन दरख्तों ने बरसों तक इस शहर को सांसें दीं, तपती हवाओं को थामा, मिट्टी को जिंदा रखा और परिंदों को आशियाना दिया, आज उन पर कुल्हाडिय़ां चल रही हैं। वजह है सरकार का महत्वाकांक्षी चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी और ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर प्रोजेक्ट। इसके लिए तकरीबन सौ एकड़ वन भूमि को विकास के नाम पर ध्वस्त किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक डेढ़ सौ से दो सौ पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में लगभग पांच हज़ार और पेड़ों को गिराने की तैयारी है। रायपुर और नवा रायपुर के बीच मौजूद यह जंगल केवल हरियाली का टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे शहर का ऑक्सीजन जोन माना जा सकता है। शहर जिस तेजी से सीमेंट और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहा है, उस दौर में यह वन इलाका एक नेमत की तरह बचा हुआ है।
सरकार का कहना है कि चित्रोत्पला इंटरनेशनल फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ को मूवी प्रोडक्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनाएगी। परियोजना में अत्याधुनिक स्टूडियो, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जैसे सेट, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, होटल, कन्वेंशन सेंटर, मल्टीप्लेक्स और व्यापारिक ढांचे को विकसित किए जाने की योजना है। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और युवाओं को रोजगार और नए मौके मिलेंगे।
अब यहीं पर जो दूसरी परियोजना लाई जा चुकी है , वह है- ट्राइबल एंड कल्चरल कन्वेंशन सेंटर। उसका भी हिसाब छोटा-मोटा नहीं है। इस परियोजना को फिल्म निर्माण वाली चित्रोत्पला परियोजना से ही जोड़ा गया है। पर्यटन, संस्कृति और इनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों का विकास किया जाएगा।
दोनों परियोजनाओं को मिलाकर करीब 95 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। छत्तीसगढ़ सरकार को स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट, डेवलपमेंट ऑफ ग्लोबल लेवल ऑइकॉनिक टूरिज्म सेंटर्स योजना के तहत वित्तीय सहायता मिली है। चित्रोत्पला के लिए करीब 96 करोड़ और कन्वेंशन सेंटर के लिए 52 करोड़ की मदद केंद्र ने की है। हमारे आपके टैक्स की इतनी रकम खर्च होने के बावजूद यह पीपीपी, यानि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप मॉडल में है। पीपीपी वाले लोग इसे तैयार कर रहे हैं और यही लोग उन ग्रामीणों को धमका रहे हैं, जो जंगल काटने के विरोध में उतरे हैं। कह रहे हैं, जंगल को बर्बाद करने की हमको सरकार से मंजूरी मिली हुई है। नवा रायपुर में कितनी ही खाली जमीन पड़ी हुई है, वहां क्यों नहीं एलॉट किया?
छागल से अनजान पीढ़ी
इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे ‘छागल’ कहते थे। 4-5 दशक पहले ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था, और न कोई कैम्पर थे न मिल्टन की बोतलें थीं। गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था। गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था, जिसका सिरा एक और बोतल के मुंह जैसा होता था और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन, बस,जीप के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे,बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के अंदर भरे पानी को ठंडा करती थी। वो प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी। यह हमारे पूर्वजों की पानी की व्यवस्था थी। सबसे बड़ी बात यह है अगर रास्ते में किसी राहगीर ने छागल देखकर ठंडा पानी पीने के लिए मांग लिया तो कोई उसे मना नहीं करता था क्योंकि भीषण गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना ईश्वर की आज्ञा होती है। पानी खरीदा जा सकता है या बेचा जा सकता है-यह कल्पना भी नहीं थी। अब 20 रूपए में एक लीटर पानी खरीदने वाली पीढ़ी छागल को नहीं जानती। मल्टिनैशनल वाटर कंपनियों ने अपने कारोबार के लिए छागल के पानी को सेहत के लिए नुकसानदायक जो बता रखा है।
आईबी में गए आंजनेय वार्ष्णेय
छत्तीसगढ़ कैडर के एक और आईपीएस अधिकारी आंजनेय वाष्र्णेय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। वर्ष-2018 बैच के आईपीएस वाष्र्णेयकी पोस्टिंग इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में हुई है। वे हाल तक सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी के रूप में पदस्थ थे और शुक्रवार को उन्हें रिलीव कर दिया गया।
आंजनेय वाष्र्णेय इससे पहले बीजापुर और धमतरी जिले के एसपी की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद राज्य पुलिस महकमे में सीमित स्तर पर फेरबदल की चर्चा तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि कोंडागांव जिले में भी एसपी का पद फिलहाल खाली चल रहा है। वहां एएसपी को एसपी का प्रभार दिया गया है, जबकि एसपी पंकज चंद्रा प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद गए हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कुछ जिलों के एसपी बदलने की संभावना जताई जा रही है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर जयदीप सिंह पहले ही आईबी में सेवाएं दे रहे हैं।
धत्त, सुशासन में शराब की बात करोगे?
छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन जैसे ही चालू हुआ, शराब की दुकानों का माल खत्म हो गया। लोग भटक रहे हैं। बंधु, वित्तीय वर्ष बदल चुका है। अब इस मौके पर अफसरों ने सोचा नहीं कि ये शादी का भी सीजन है। बड़ी संख्या में बाराती भटक रहे हैं, चेहरे उतरे हुए हैं-क्या खाक डांस करेंगे।
सुशासन में शराब न मिले, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। उन शराब प्रेमी रसूखदारों को छोड़ दें, जिनके पास अनाप-शनाप कमाई हैं, मगर आम जनता की हालत को महसूस करिये। परिवार में कलह का, हिंसा का, सडक़ों पर उत्पात का, सडक़ दुर्घटनाओं का कारण यही शराब बनती है।
इन दिनों अंग्रेजी के जान-पहचान वाले ब्रांड की केवल बोतल मिल रही है, लिटिल गायब है। लोग बार्टर करके खरीद रहे हैं, चार लोग मिलकर पौवा-पौवा बांट रहे हैं। देसी की तो बात ही छोड़ दीजिए, शटर गिरा हुआ है। अकेले रायपुर में रोजाना साढ़े 12 हजार पेटी का नुकसान। पूरे छत्तीसगढ़ की बात करें तो हर रोज 180 हजार पौवा। निर्माताओं और सरकार को मिलाकर रोजाना 50 करोड़ से ज्यादा की क्षत्ति।
सुशासन में कोई घोषित योजना नहीं थी कि शराब की किल्लत पैदा की जाएगी, मगर सुशासन दिख रहा है।
इस हालात को देखते हुए यह तो कह ही सकते हैं कि व्यक्ति परिस्थितिजीवी होता है। शराब नहीं मिलेगी तो कुछ लोग जरूर इधर-उधर देसी-महुआ तलाश करते हुए भटकेंगे, बाकी ज्यादातर लोग घर में पत्नी और बच्चों के साथ दाल रोटी खाएंगे। शराब से बचे पैसे का बढिय़ा सा सप्लीमेंट खाना- चिकन, अंडा, आमलेट, चॉकलेट, आइसक्रीम वगैरह घर लेकर जाएंगे।
अब, असल में शराब की किल्लत क्यों खड़ी हुई, उसे समझ लेते हैं। सुशासन वगैरह से इसका कोई संबंध नहीं है। यह नई आबकारी नीति 2026-27 का हिस्सा है। आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन ने इसे आर्थिक दक्षता और व्यवस्था में सुधार का कदम बताया है। प्लास्टिक बोतल अपनाने की वजह यह बताई गई है कि इससे कांच की बोतलों के टूटने से होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकेगा। परिवहन के दौरान लोड कम पड़ेगा, तो भी खर्च कम होगा- क्योंकि प्लास्टिक बोतल हल्की होंगीं। बाकी राज्यों से तस्करी के जरिये जो दारू आती है, वह कांच की बोतलों में आती है, इससे सच का तुरंत पता चल जाएगा। दावा किया गया है कि इससे मिलावट के मामले भी कम मिलेंगे।
सरकार का तर्क सुनकर लगता है, जैसे किसी योगी ने अचानक संन्यास ले लिया हो। मगर, यह फेयर डिसीजन नहीं है। प्लास्टिक को बढ़ावा देने के सरकार के फैसलों के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने एक याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लगाई है। सिंघवी की याचिका विशेषत: शराब की प्लास्टिक बोतलों को लेकर नहीं है, इस पर सुनवाई 13 मई को होने वाली है। मगर, प्लास्टिक वाली नई आबकारी नीति के खिलाफ ऋषि एंटरप्राइजेज ने सीधे-सीधे एक अलग याचिका दायर कर रखी है। पिछले एक अप्रैल को उसकी सुनवाई हुई थी, जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, पर सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसके आगे का डेवलपमेंट अभी मालूम नहीं है। मामला लंबित है।
इधर, डिस्टिलरीज अलग ना-नुकुर कर रहे हैं। जैसे ही सरकार ने प्लास्टिक बोतलों का फरमान निकाला, खाली बोतलों की कीमत उत्पादक कंपनियों ने 40 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी। आबकारी नीति में प्रावधान किया गया है कि केवल फूड ग्रेड और रियूजेबल प्लास्टिक बोतल हों। बोतलें मजबूत भी हों और हल्की भी हों, ब्रैकेज प्रूफ हों। मैटेलिक कैप की अनुमति नहीं है, कैप भी प्लास्टिक की ही होनी चाहिए। ऋषि कंपनी ने जो हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, उसमें उनकी ओर से दावा किया गया है कि इतने कड़े नियम को फॉलो करना तो किसी शराब निर्माता के लिए संभव ही नहीं है। पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे रहे लोगों का की ओर से दावा यह भी किया गया है कि सालाना करीब 16 हजार टन प्लास्टिक कचरा छत्तीसगढ़ में बढ़ जाएगा, बोतल सिर्फ डस्टबिन में डालें, इस नियम का पालन शराब पीने वाला कोई आदमी नहीं करने वाला।
तो सुशासन में इस सूखे का आनंद लीजिए।
...कौन बनेगा नया वन प्रमुख?
वन विभाग के शीर्ष पद हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए प्रस्तावित डीपीसी अपरिहार्य कारणों से टल गई है। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी. श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उनके उत्तराधिकारी के चयन को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह पद मुख्य सचिव और डीजीपी के समकक्ष वेतनमान वाला होता है और परंपरा रही है कि सबसे वरिष्ठ पीसीसीएफ को ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है।
हालांकि पिछली सरकार में यह परंपरा तब टूटी थी, जब वी. श्रीनिवास राव को पांच वरिष्ठ पीसीसीएफ को सुपरसीड कर इस पद पर पदोन्नत किया गया था। अब डीपीसी टलने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या उन्हें एक्सटेंशन मिल सकता है? मौजूदा सरकार में मुख्य सचिव अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा को पहले ही सेवा विस्तार मिल चुका है। हालांकि देश में अब तक किसी भी राज्य में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को एक्सटेंशन मिलने का उदाहरण नहीं है।
मंगलवार को वन विभाग की एसीएस ऋचा शर्मा का तबादला कर उन्हें पंचायत विभाग भेज दिया गया। उनकी जगह एसीएस मनोज पिंगुआ को वन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इसी प्रशासनिक बदलाव के कारण डीपीसी टली है।
दूसरी तरफ लघुवनोपज संघ के एमडी अनिल साहू वरिष्ठता सूची में सबसे ऊपर हैं, लेकिन वे जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) अरुण पाण्डेय और पीसीसीएफ कौशलेन्द्र कुमार के नाम पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। विभागीय गलियारों में अरुण पाण्डेय को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है, क्योंकि पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) का पद विभाग में दूसरे नंबर का अहम पद माना जाता है। अब सबकी नजर नई डीपीसी तारीख पर टिकी है।
...क्या ऐसा संभव है?
अब प्रशासनिक अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोडक़र सम्मान करना पड़ेगा। यह बात किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की ओर से राज्यों को भेजे गए निर्देशों में कही गई है। छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों को भेजे गए इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी मुख्य सचिवों को दी गई है।
दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग भी लगभग हर साल वित्तीय वर्ष की शुरुआत में इसी तरह का परिपत्र जारी करता रहा है, लेकिन इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ था। लिहाजा दिल्ली से ही आदेश आ गया।
निर्देशों में साफ कहा गया है कि सांसद-विधायक कार्यालय या बैठक में आएं तो अधिकारी उठकर उनका अभिवादन करें, हाथ जोड़े और पानी तक पूछें। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के फोन कॉल उठाना और जवाब देना भी अनिवार्य बताया गया है। यदि बैठक में होने के कारण कॉल रिसीव नहीं हो पाए तो बाद में कॉल बैक करना होगा। उनके पत्रों और प्रकरणों का गुणवत्तापूर्ण निराकरण कर जानकारी भी देनी होगी।
डीओपीटी ने यह भी माना है कि तमाम निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते और प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इसलिए अब इसे आचरण नियमावली से जोड़ दिया गया है। यानी उल्लंघन पर कार्रवाई भी संभव है।
हालांकि अफसरशाही इसे हर साल जारी होने वाला ‘रूटीन रिमाइंडर’ मान रही है। मगर हाल के दिनों में कुछ घटनाओं ने इस आदेश को और चर्चा में ला दिया है। खाद्य मंत्री ने एक अधिकारी, विधायक रोहित साहू ने एक पटवारी को जूते से मारने की घटना और प्रतापपुर विधायक शकुंतला पोर्ते द्वारा मंच से राजस्व अधिकारियों को ‘गुरूर छोडऩे’की चेतावनी अभी भी चर्चा में है। अब देखना यह है कि यह आदेश सिर्फ फाइलों तक सीमित रहता है या वास्तव में अफसरों के व्यवहार में भी बदलाव दिखता है।
प्रकृति हमें पुकार रही है, आइये इसे सुनें..
छत्तीसगढ़ शायद केवल 36 गढ़ों की भूमि नहीं है। इससे अधिक गढ़ों का साक्षात स्वरूप है, यदि जंगलों की ओर निकल जाएं। अनगिनत घने साल-बांस के जंगलों को, लहराती नदियों, झरनों, गुफाओं और पठारों को किन गढ़ों में गिना जाएगा? दूसरे राज्यों का भ्रमण करने के पहले अपने छत्तीसगढ़ को ही ठीक से घूम लेना चाहिए, सरगुजा से लेकर बस्तर के छिपे दूरस्थ इलाकों तक। अपने यहां लगभग 44 प्रतिशत इलाका वनाच्छादित है, जो देश के कुल वनों का लगभग 12 प्रतिशत है। अनेक जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों का आश्रय है। देशभर में राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की भरमार है, मगर सेंट्रल इंडिया को जोडऩे वाली कड़ी छत्तीसगढ़ ही है। अचानकमार, इंद्रावती, कांगेर, उदंती-सीतानदी, तमोर पिंगला में दूसरे राज्यों से पहुंचने वाले बाघ बताते हैं कि यह उनके लिए स्वर्ग है। बाघ ही नहीं, तेंदुआ, भालू, जंगली भैंस-बायसन, गौर और हिरणों का यह इलाका है। सैकड़ों पक्षी प्रजातियों, सरीसृपों और कीट-पतंगों का भी घर है। अब तो बारनवापारा काले हिरणों की बढ़ती आबादी के चलते राष्ट्रीय वन्यजीव-मानचित्र में अलग स्थान बना चुका है।

ऐसे मौके पर छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार और वन्यजीव प्रेमी प्राण चड्ढा, जो एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं, ने फेसबुक पर एक पोस्ट दर्ज की है। ऑरेंज ओक लीफ- हम आप शायद इसे नहीं समझ पाएंगे, यदि इस नाम से कोई पुकारेगा। यह तितली की एक दुर्लभ प्रजाति है। आंतरिक रूप से अनंत सौंदर्य और जीवन लिप्सा से भरपूर। सूखे पत्ते की तरह यह जीव दिखता है। मगर, जैसे ही पंख खोलती है- नीले, नारंगी और काले रंगों की चकाचौंध बिखेर देती है। शिकारियों से बचने के लिए वह प्राय: अपने पंखों को बंद रखती है। यह तस्वीर अचानकमार अभयारण्य से ली गई है। यह तितली छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यभारत के अन्य जंगलों में भी पाई जाती है। हम हाथी जैसे विशालकाय जानवरों की बात करते हैं लेकिन ऐसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं, कीट और तितलियों का भी अस्तित्व जलवायु परिवर्तन, वन कटाई और मानवीय अतिक्रमण के चलते संकट में है। कार्बन संग्रहण, जल संरक्षण और आदिवासी संस्कृति के भी संरक्षण में इन छोटे-छोटे कीट-पतंगों की बड़ी भूमिका होती है।
महिला अफसरों पर भरोसा, विकास कार्यों पर फोकस
सीएम विष्णु देव साय ने बुधवार को 43 आईएएस अफसरों के तबादले कर प्रशासन में बड़ा फेरबदल किया। इस बदलाव में सरकार ने एक तरफ लंबे समय से एक ही विभाग संभाल रहे अफसरों की जिम्मेदारियां बदलीं गईं। दूसरी तरफ, कुछ अहम विभागों में नए प्रयोग भी किए हैं।
सबसे चर्चित फैसला गृह विभाग को लेकर रहा। राज्य गठन के बाद पहली बार किसी महिला आईएएस अफसर को गृह विभाग की कमान सौंपी गई है। 1997 बैच की सीनियर आईएएस निहारिका बारिक सिंह को गृह विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया है। इससे पहले एके विजयवर्गीय, राबर्ट हरंगडोला, आरपी बगई, एनके असवाल और बीवीआर सुब्रमण्यम जैसे वरिष्ठ अफसर इस विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
फेरबदल में एसीएस ऋचा शर्मा, मनोज पिंगुआ, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, आर संगीता, बसवराजु, डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुकेश बंसल समेत कई अफसरों के प्रभार बदले गए हैं। इनमें अधिकांश अफसर दो साल से ज्यादा समय से एक ही विभाग में कार्यरत थे। सीएम सचिवालय में पदस्थ मुकेश बंसल से वित्त विभाग लेकर लोक निर्माण विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार निर्माण कार्यों, खासकर सडक़ों और अधोसंरचना परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है। सुशासन तिहार के दौरान सरगुजा क्षेत्र में खराब सडक़ों को लेकर मुख्यमंत्री की नाराजगी भी सामने आई थी। ऐसे में पीडब्ल्यूडी में यह बदलाव सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
यही नहीं, आबकारी विभाग की जिम्मेदारी दुबारा एक महिला अफसर को सौंपी गई है। पहले यह विभाग आर संगीता संभाल रही थीं, जबकि अब खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले को आबकारी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। एक और उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 33 में से 10 जिलों में महिला कलेक्टर बनाई गई हैं।
मनिंदर कौर ऐसी तीसरी अफसर...

केंद्र सरकार ने श्रीमती डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी की प्रतिनियुक्ति दो वर्ष बढ़ा दी है। वह कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। वह अगस्त 28 तक केंद्र में बनी रहेंगी। इस वृद्धि के साथ वह छत्तीसगढ़ कैडर की ऐसी तीसरी अफसर हो गई हैं जो एक दशक से अधिक समय से केंद्र में सेवाएं दे रहीं हैं।
केन्द्रीय अधिकारी-कर्मचारी ही सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष है। ऐसे में एक अधिकारी कर्मचारी की कुल सेवावधि 30-38 वर्ष रहती है। प्रदेश में सबसे ज्यादा पहले सबसे ज्यादा समय तक बीवीआर सुब्रमण्यम ने दो से तीन चरणों में 15-16 वर्ष तक पीएमओ, वर्ल्ड बैंक, जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के रूप में सेवाएं दी है। वे रिटायर भी दिल्ली से ही हुए। उनके बाद अमित अग्रवाल को भी 12 वर्ष से अधिक हो रहे हैं। इसी तरह से स्व. एम. गीता भी राज्य गठन के बाद मप्र, फिर केंद्र में सेवाओं के 15 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ आईं थीं। मनिंदर कौर को भी दो चरणों में 12 वर्ष हो गए हैं। तीन वर्ष के कूलिंग ऑफ पीरियड के बाद कोई भी अभा सेवा का अफसर फिर से प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। वैसे भी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस केंद्र के अफसर होते हैं वह जब चाहे बुला सकता है। एक तरह से वे राज्य में प्रतिनियुक्ति पर माने जा सकते हैं। और फिर केंद्र रिजल्ट ओरिएंटेड अफसरों को ही बुलाता है।
बहरहाल मनिंदर के अतिरिक्त उनके पति गौरव द्विवेदी को भी दो चरणों में 10 वर्ष बीत रहे हैं। गौरव द्विवेदी भी केंद्रीय प्रसार भारती में सीईओ हैं। इनके अलावा एसीएस ऋचा शर्मा भी 7 वर्ष केंद्र में सेवाएं दे चुकी थीं। सीएस विकासशील भी 7 वर्ष केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रहे। उनकी पत्नी निधि छिब्बर भी, अभी नीति आयोग में प्रतिनियुक्ति पर हैं। इनके अलावा पूर्व सीएस अमिताभ जैन, एसीएस मनोज पिंगुवा, सुबोध सिंह, सोनमणि बोरा, निहारिका बारिक, रोहित यादव,पी. संगीता, अमित कटारिया,रजत कुमार आदि भी 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लौटे हैं।
उधर, आईपीएस अधिकारियों में स्वागत दास, बिनय कुमार सिंह, रवि सिन्हा तो केंद्र में 20-25 वर्ष रहकर रिटायर हुए। दिवंगत पूर्व डीजीपी विश्वरंजन जरूर छत्तीसगढ़ लौटे। इन अफसरों के अलावा अमित कुमार ऐसे अकेले आईपीएस हैं जो 7 वर्ष से अधिक डेपुटेशन पर रहे। वहीं आईएफएस कैडर में छत्तीसगढ़ का ऐसा अफसर नहीं जो 5 वर्ष से अधिक प्रतिनियुक्ति पर रहा हो।
सहकारी बैंक घोटाले में ईडी की एंट्री
अंबिकापुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक घोटाला प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। करीब सात साल पुराने इस मामले में विभागीय जांच अब भी धीमी रफ्तार से चल रही है, जबकि पुलिस अपनी कार्रवाई कर चुकी है। इसी बीच ईडी की एंट्री से बैंक में हडक़ंप मच गया है। ईडी ने प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए हैं और माना जा रहा है कि जांच में ऐसे कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जो अब तक पुलिस जांच से बाहर रहे हैं।
घोटाले का खुलासा उस समय हुआ था, जब तत्कालीन कलेक्टर संदीपन विलास भोसकर को बैंक के प्राधिकृत अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। खातों में हेराफेरी की शिकायत मिलने पर उन्होंने जांच कराई और मामला पुलिस को सौंप दिया। इस मामले में बलरामपुर, सूरजपुर समेत विभिन्न शाखाओं के 12 अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ को सेवा से बर्खास्त भी किया जा चुका है।
घोटाले की वास्तविक राशि अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। थर्ड पार्टी ऑडिट में 142 करोड़ रुपए की अनियमितता सामने आई थी, जबकि बैंक से जुड़े लोगों का अनुमान है कि यह आंकड़ा करीब 300 करोड़ रुपए तक हो सकता है। कलेक्टर की अनुशंसा पर विभागीय जांच टीम तो गठित की गई, लेकिन जांच की गति अब तक सुस्त ही बनी हुई है। अब ईडी की सक्रियता से मामले में नई परतें खुलने की उम्मीद जताई जा रही है।
बताया जाता है कि घोटाले की शुरुआत पिछली सरकार के शुरुआती दौर में हुई थी। किसानों के नाम पर फर्जी कृषि ऋण लिए गए और बाद में कर्ज माफी योजना का लाभ उठाकर रकम हड़प ली गई। कई किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इसी तरह बैंक कर्मचारियों ने रैकेट बनाकर फसल बीमा की राशि भी हड़प ली। कर्मचारियों के खातों में करोड़ों रुपए ट्रांसफर होने की बात सामने आई है। चर्चा है कि इस पूरे खेल को कुछ प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। फिलहाल कर्मचारी जेल में हैं, लेकिन ईडी की जांच में उन सभी लोगों के नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है, जिन्हें इस घोटाले से फायदा हुआ।
भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर सरगर्मी
पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने के बाद भाजपा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। नितिन नबीन की नई टीम में छत्तीसगढ़ से किन नेताओं को जगह मिलेगी, इसको लेकर अटकलों का दौर जारी है।
चर्चा है कि कार्यकारिणी में उन नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है जिन्होंने पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान प्रभावी भूमिका निभाई थी। यह भी कहा जा रहा है कि नितिन नवीन स्वयं चुनाव प्रबंधन से सीधे जुड़े रहे हैं, जिससे उन्हें छत्तीसगढ़ के नेताओं के कामकाज की अच्छी जानकारी है।
चर्चा यह भी है कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाकर एक-दो राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। राज्य सरकार के मंत्री अरुण साव, विजय शर्मा, ओपी चौधरी और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने भी अपने-अपने प्रभार वाले क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसके चलते उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिल सकता है।
निवर्तमान उपाध्यक्ष लता उसेंडी का कद बढऩा लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह का नाम भी चर्चा में है। चुनाव के दौरान टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद चर्चा में रहे हैं। अब यह देखना है कि नितिन नवीन की टीम में छत्तीसगढ़ से किन-किन नेताओं को जगह मिलती है।
प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन पीछे नौकरीपेशा
अगले 10 साल में स्नातक और हम उम्र कम पढ़े-लिखे दो युवकों की आय पर नजऱ डालें तो ‘व्यंग्य’ में कहा जा सकता है कि भारत में 80 प्रतिशत कॉलेज और विश्वविद्यालय अगले 10 वर्षों में बंद हो जाएंगे..? यह अतिशयोक्ति भी लगती है..? अब आंकड़ों को देखें-
प्लंबर 1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन।
रु.30,000 - रु.50,000 प्रति माह
इलेक्ट्रीशियन
1,500रु. - 2,500रु. प्रति दिन
35,000रु. - रु.60,000रु. प्रति माह।
टाइल वर्कर / मिस्त्री
1,200रु. - 2,000रु. प्रति दिन
30,000रु. - 50,000रु. प्रति माह।
जोमैटो / स्विगी राइडर
25,000रु. - 35,000रु. प्रति माह।
अमेजन / फ्लिपकार्ट डिलीवरी पार्टनर
28,000रु. - 40,000रु. प्रति माह।
छोटा दुकानदार
नेट आय 30,000रु.-70,000रु. प्रति माह।
ये आय कौशल, गति और मांग के साथ बढ़ती हैं।
कोई दीक्षांत समारोह आवश्यक नहीं।
अब डिग्री धारकों की स्थिति देखें-
बी.कॉम फ्रेशर
12,000रु. - 18,000रु.
बीए फ्रेशर
10,000रु. - 15,000रु.
बीएससी फ्रेशर
12,000 - 18,000रु.
एमएससी फ्रेशर
15,000रु. - 22,000रु.
एमबीए फ्रेशर (टियर 2 / 3 कॉलेज)
18,000रु.-30,000रु.
नॉन टेक इंजीनियर
12,000रु. - 20,000रु.
टेक इंजीनियर
20,000रु.-35,000रु.
(शीर्ष 5 प्रतिशत को छोडक़र)
ये वेतन तब तक स्थिर रहते हैं जब तक कौशल नहीं जोड़े जाते।
कुशल कामगार तुरंत कमाते हैं। डिग्री धारक ‘अवसरों’ का इंतजार करते हैं।
कौशल मासिक रूप से बढ़ता है।
डिग्रियां वार्षिक रूप से घटती हैं।
एक प्लंबर अपस्किल करता है तो आय बढ़ती है। एक डिलीवरी पार्टनर मार्गों का अनुकूलन करता है आय बढ़ती है।
एक दुकानदार मांग को समझता है ,आय बढ़ती है।
एक डिग्री धारक, इंतजार करें...आवेदन करें...
इंटर्न करें...पुन: कौशल सीखे..दोहराएं...
आशावादी रहें। क्योंकि यह शिक्षा प्रणाली छात्रों के लिए नहीं बनी है। यह लाभ के लिए बनी है।
डिग्रियां अभी भी बांटी जा रही हैं।
जैसे कि उनका कोई मतलब हो। मध्यवर्गीय माता-पिता के पास कोई विकल्प नहीं है।छात्रों के पास कोई बचाव नहीं है। डिग्रियां अनुमोदनों से जुड़ी हैं।अनुमोदन नौकरियों से जुड़े हैं। तो चक्र चलता रहता है।जिस
एनईपी 2020 को आधुनिक शिक्षा प्रणाली बता कर लागू किया गया है वह 4 साल में ही पुराना लगने लगा है। दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है। आज, दुनिया चाहती है...
सिस्टम थिंकर...
डेटा तर्क।जब कौशल हर दो साल में समाप्त हो जाते हैं, तो एक स्थिर डिग्री क्या बनाएगी ? कुछ भी नहीं।आज स्कूल में प्रवेश करने वाला बच्चा, लगभग 2040 - 2045 में स्नातक होगा।
तब दुनिया कैसी दिखेगी..?हर जगह ऑटोमेशन।हर तीन साल में करियर का पुनर्लेखन। डोमेन पार करने वाली नौकरियां।
हर दो साल में कौशल की समाप्ति।मानव मशीनों के साथ काम कर रहे हैं। सिस्टम में सोच रहे हैं। अस्पष्ट समस्याओं को हल कर रहे हैं। लगातार सीख रहे हैं।
अब हमारे कक्षाओं को देखें-पुराने...
स्थिर पाठ्यक्रम...अनचाही प्रायोगिक व्यवस्थाएं।
सभी के लिए एक ही डिग्री। हमारी शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी कें मानवों को तैयार नहीं कर सकती। तो मूल कारण कहाँ है?
ब्यूरोक्रेट्स। हमारे बाबू सिस्टम चलाते हैं।वे नीति सलाह देते हैं। वे क्रियान्वयन डिजाइन करते हैं।और वे एक ही द्वार से आते हैं।
यूपीएससी।
यूपीएससी 1940 के दशक के लिए डिजाइन किया गया था। बाबू अपनी पदोन्नति को आपके बच्चे के भविष्य से ज्यादा महत्व देते हैं।
वैसे भी अब देश में शासकीय प्राथमिक शाला/ उच्चतर माध्यमिक शाला/ शासकीय कॉलेज/ बंद होने की स्थिति में है क्योंकि राज्य और केंद्र स्तर की सरकार ऐसी शिक्षा प्रणाली चल रही है जिसे सिर्फ प्राइवेट स्कूल, प्राइवेट कॉलेज फल फूल रहे हैं।
(हाल में रिटायर हुए एक प्राचार्य का आकलन)
सत्ता की रोटी पलटती रहनी चाहिए...
पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव और छत्तीसगढ़ के 2023 विधानसभा नतीजों में कई समानताएं नजर आती हैं। तब भाजपा ने अपन व्यापक संसाधनों और कैडर के जरिये कांग्रेस के खिलाफ लगभग उसी तरह का माहौल बनाया था, जैसा पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ। भ्रष्टाचार, एंटी-इनकंबेंसी, कानून-व्यवस्था और महिलाओं, युवाओं व संप्रदायों के बीच असंतोष जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। पश्चिम बंगाल में 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में महज पांच साल में ही माहौल बदलने में भाजपा को सफलता मिल गई। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा कभी सत्ता में नहीं रही और वहां अपना कैडर तैयार करने में उसे एक दशक से अधिक समय लगा। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ में सत्ता से बाहर रहने के बावजूद भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत बनी रही, जो विधानसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी दिखा।
कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के फॉर्म भरवाने के अभियान ने भाजपा के पक्ष में माहौल पलट दिया। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की ओर से इसी तरह के डायरेक्ट बेनिफिट से जुड़े फॉर्म भरवाने का अभियान चला, लेकिन वह छत्तीसगढ़ की तरह घर-घर तक नहीं पहुंचा। इसके बावजूद भाजपा को बड़ी सफलता मिली, जिसका मतलब है कि टीएमसी की पराजय के कारण और भी थे।
छत्तीसगढ़ में भाजपा ने सीजीपीएससी भर्ती, कोयला, शराब और डीएमएफ घोटाले के साथ महादेव सट्टा ऐप जैसे मुद्दों को इस तरह उछाला कि सरकार के कई सकारात्मक काम पीछे छूट गए। इन कामों में वादे के अनुरूप देश में सबसे ऊंची धान कीमत देना, तेंदूपत्ता सहित अन्य वनोपजों का बेहतर भुगतान, शिक्षाकर्मियों का नियमितीकरण और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देना शामिल थे। पश्चिम बंगाल में भी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने कल्याणकारी योजनाओं, खासकर महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को पीछे धकेल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाला, शारदा चिटफंड मामला, परिवारवाद, विशेषकर भतीजे अभिषेक बेनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने असर डाला। छत्तीसगढ़ में भी बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी चयन प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवालों ने इसी तरह की धारणा को जन्म दिया। बड़ी नियुक्तियों और सीजीपीएससी- 2021 के चयन में आप परिवारवाद का वर्चस्व देख सकते हैं।
जैसे छत्तीसगढ़ में कुछ मंत्रियों और विधायकों की छवि घोटालों से प्रभावित हुई, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भी हुआ। साख बचाने के लिए ममता बेनर्जी ने 33 प्रतिशत यानी 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल और चुनाव के ठीक पहले डिप्टी सीएम बने टीएस सिंहदेव ने मिलकर यहां भी लगभग 33 प्रतिशत ही, यानी 22 विधायकों के टिकट काट दिए।
भाजपा के कुछ प्रमुख राजनीतिक हथियार ऐसे हैं, जो भावनात्मक स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। आदिवासी क्षेत्रों, खासकर बस्तर में, धर्म परिवर्तन को लेकर माहौल गरमाया गया और हिंसक घटनाएं भी हुईं। हालात ऐसे बने कि कई जगह अंतिम संस्कार के लिए जमीन तक को लेकर विवाद खड़ा हुआ, और अब यह स्थायी समस्या बन चुकी है। बेमेतरा-साजा को लेकर सीबीआई रिपोर्ट अभी कुछ माह पहले आई है। केंद्र की ही एजेंसी ने इसे आपसी विवाद बताया, न कि सांप्रदायिक, पर भाजपा ने इस मुद्दे पर कई सीटों पर धाक जमा ली। कवर्धा में रोहिंग्या मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विमर्श होता रहा। सरकार बनते ही रोहिंग्या गायब हो गए। पर, इन मुद्दों पर कांग्रेस की चुप्पी और निष्क्रियता ने भाजपा को बढ़त दिलाई और कई सीटों पर नतीजे पलट गए।
पश्चिम बंगाल में भी घुसपैठियों का मुद्दा इसी तरह का है। तृणमूल बचाव में रही और भाजपा हमलावर। यह धारणा बनाई गई कि 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट एकतरफा हैं, जबकि इन वोटों के बंटवारे के लिए हुमायूं कबीर और औवेसुद्दीन कुरैशी के उम्मीदवार भी मैदान में थे।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अंतर्कलह उसी तरह दिखी, जैसी तृणमूल कांग्रेस में नजर आई। एक व्यक्ति केंद्रित नेतृत्व की छवि दोनों जगह उभरी। कांग्रेस शासन के दौरान किन विधायकों के काम प्राथमिकता से होते थे, कौन मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार की आलोचना करता रहा, और किन नेताओं को किनारे लगाने की कोशिश हुई, छत्तीसगढ़ में सबने देखा। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा के प्रमुख चेहरे बन गए, जबकि मुकुल रॉय जैसे नेताओं की वापसी के बावजूद प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। तापस रॉय और कुणाल घोष जैसे नेताओं की नाराजगी भी टिकट वितरण में सामने आई। कारण यह बताया गया कि अभिषेक बेनर्जी युवा कैडर पर अधिक भरोसा कर रहे थे और पुराने नेताओं को पीछे कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में भी सत्ता संभालने के बाद बघेल ने वरिष्ठों को किनारे लगाकर अपना अलग कैडर तैयार किया, जो चुनावी मैदान में खुद तो निपटे, पार्टी को भी निपटा गए। कई टिकट व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर बदले गए और जहां बदलाव नहीं हुआ, वहां हार का माहौल बनने दिया गया। सिंहदेव खेमे की अपनी संतुष्टि सरगुजा तक सीमित थी। भाजपा ने इस असंतोष का लाभ उठाया। जिस नेता की सिंहदेव ने टिकट काटने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, वह आज सांसद है। यह आंतरिक खींचतान कार्यकर्ताओं को रास नहीं आई, जैसा पश्चिम बंगाल में भी देखा गया। दोनों ही जगह संगठन की भूमिका कमजोर रही और निर्णय लेने की ताकत उन्हीं के हाथ में केंद्रित रही, जिनके पास सत्ता थी।
जनता की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। पश्चिम बंगाल की जनता को विकल्प चाहिए था, जबकि कमजोर संगठन वाले वाम मोर्चा और कांग्रेस उस विकल्प के रूप में उभर नहीं सके। भाजपा ने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर तैयारी कर अपनी पकड़ मजबूत की और उसका परिणाम सामने आया। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने कहा था कि सत्ता को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए, अन्यथा वह जड़ हो जाती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से परिवारवाद, निहित स्वार्थ और भ्रष्टाचार बढऩे का खतरा रहता है। इसलिए सत्ता का परिवर्तन लोकतंत्र को जीवंत, जवाबदेह बनाए रखने के लिए जरूरी है।
बंगाल सीएस का आदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र
पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो तिहाई जीत के बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग में नई सरकार और उसकी शासन व्यवस्था की कवायद तेज हो गई है। बंगाल के मुख्य सचिव ने सभी विभागों के सचिव और कल ही एक आदेश जारी कर दिया है। इसमें उन्होंने फाइलों और दस्तावेजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। बिना अनुमति कोई फाइल रायटर्स बिल्डिंग से बाहर ले जाने या उसकी कॉपी करने पर रोक लगाई गई है और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। बता दें कि चुनाव अभियान के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा था कि दीदी का खेला होने के बाद उनकी सरकार में हुए घोटालों की जांच कर कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश ने पहले छत्तीसगढ़ और फिर आंध्र प्रदेश में पूर्व के वर्षों में हुए ऐसे की घटनाओं की यादें ताजा कर दी। 2018 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते ही तत्कालीन गृहमंत्री के बंगले में कई गोपनीय नस्तियों को आग के हवाले किया गया था। इसके बाद यही उपक्रम 2023 में भी कांग्रेस के एक मंत्री के बंगले में भी हुआ। इतना ही नहीं एक मंत्री पर तो सरकारी आवास के महंगे सामान खोल कर ले जाने का भी खुलासा हो चुका था। आंध्र में भी जगन सरकार के मंत्री ने भी बकायदा मंत्रालय परिसर में ही कागजात जलवाए थे। इसे देखते हुए आने वाले हर चुनाव बाद राज्यों में बहुमत के रुझान आते ही आउट गोइंग सरकार के लिए मुख्य सचिवों को ऐसे अंतिम आदेश निकालने की नई परंपरा बन सकती है।
कांग्रेस-भाजपा में माहौल अलग-अलग
पश्चिम बंगाल और असम में जीत के बाद भाजपा खेमे में उत्साह चरम पर है। प्रदेशभर के पार्टी कार्यालयों में जश्न का माहौल रहा, और बंगाल की पहचान बन चुकी झालमुड़ी के साथ जीत का स्वाद लिया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में निराशा है। छत्तीसगढ़ के नेताओं ने दोनों राज्यों में जमकर मेहनत की थी, लेकिन परिणामों ने अब राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया गया था। उनके साथ विकास उपाध्याय और विनोद वर्मा भी क्रमश: प्रभारी सचिव और पर्यवेक्षक थे। असम में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया है और सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि जहां-जहां बघेल को जिम्मेदारी मिली, वहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
सिर्फ बघेल ही नहीं, पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव भी पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके। उन्हें तमिलनाडु और पुडुचेरी में टिकट वितरण की जिम्मेदारी दी गई थी, जहां कांग्रेस का खराब रहा। हालांकि सचिन पायलट के लिए यह दौर सकारात्मक रहा।केरल में प्रभारी के तौर पर उनकी भूमिका पार्टी की जीत के साथ जुड़ी, जिससे संगठन में उनका कद बढऩा तय माना जा रहा है।
दूसरी ओर, भाजपा खेमे में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भूमिका को लेकर संतोष का माहौल है। संगठन महामंत्री पवन साय को बंगाल में 56 सीटों की जिम्मेदारी मिली थी, और पार्टी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया। इसी तरह असम में डिप्टी सीएम अरुण साव, केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बूथ स्तर तक काम संभाला, जिसका असर नतीजों में दिखा। इन सफलताओं का असर रायपुर तक साफ नजर आया। पार्टी दफ्तरों से लेकर मंत्रियों के बंगलों तक जश्न का दौर चला। दिलचस्प यह रहा कि झालमुड़ी की मांग इतनी बढ़ गई कि बेचने वालों की कमी पड़ गई।
आग बुझाने वाले कहां हैं?
जशपुर जिले के जंगल में आग लगी, वहां से गुजरते हुए कुछ पर्यटकों ने अपनी कोशिश की और आग बुझाने का प्रयास किया। लेकिन यह नाकाफी साबित हुआ। आग फैलने से रोका नहीं जा सका। छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों हर रोज सैकड़ों की संख्या में आग लगने की छोटी-बड़ी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन बीट गार्ड और आग बुझाने वाली वन विभाग की टीम नजर नहीं आती।
विधायक की अनदेखी पर बवाल
कवर्धा जिले की भाजपा राजनीति इन दिनों अंदरूनी खींचतान को लेकर चर्चा में है। विवाद की वजह भोरमदेव जंगल सफारी के शुभारंभ कार्यक्रम को माना जा रहा है। यह सरकारी आयोजन रविवार को हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में डिप्टी सीएम विजय शर्मा शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता वन मंत्री केदार कश्यप ने की, जबकि सांसद संतोष पाण्डेय विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
हालांकि पूरे विवाद की जड़ पंडरिया विधायक भावना बोहरा का नाम आमंत्रण सूची से गायब होना है। जिले की विधायक होने के बावजूद उन्हें न तो निमंत्रण दिया गया और न ही कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति रही। इससे उनके समर्थकों में नाराजगी खुलकर सामने आई है।
कवर्धा जिले में दो विधानसभा सीटें हैं, कवर्धा से खुद विजय शर्मा प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि पंडरिया से भावना बोहरा विधायक हैं। ऐसे में स्थानीय जनप्रतिनिधि के रूप में उनका नाम आमंत्रण पत्र में होना स्वाभाविक माना जा रहा था। नाम छूटना महज त्रुटि थी या जानबूझकर किया गया, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन समर्थक इसे राजनीतिक उपेक्षा बता रहे हैं।
मामला अब सोशल मीडिया तक पहुंच गया है, जहां समर्थक खुलकर विरोध जता रहे हैं। 24 घंटे के भीतर कलेक्टर और डीएफओ से जवाब मांगने की चेतावनी दी गई है, और इस सिलसिले में पोस्टर भी जारी किए गए हैं।
खुद भावना बोहरा ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनका और विजय शर्मा का कुछ मुद्दों को लेकर पहले से मतभेद रहा है। हल्ला है कि सीएम विष्णुदेव साय से भी इस मामले की शिकायत की है और पार्टी संगठन में आपत्ति दर्ज कराई है। फिलहाल सरकार या संगठन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विवाद के और बढऩे के संकेत मिल रहे हैं।
केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का ट्रेंड
राज्य पुलिस सेवा में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। वर्ष-2021 बैच के आईपीएस अधिकारी चिराग जैन भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की तैयारी में हैं। वर्तमान में वे एडिशनल एसपी के पद पर हैं और हाल ही में पीएचक्यू में पदस्थ हुए हैं।
इससे पहले 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा चुके हैं। उनकी पोस्टिंग हो चुकी है और उन्हें रिलीव भी कर दिया गया है।
परंपरागत रूप से आईपीएस अधिकारियों के लिए कम से कम एक जिले में एसपी के रूप में कार्य करने के बाद ही केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का चलन रहा है। लेकिन अब यह ट्रेंड बदलता दिख रहा है और अधिकारी शुरुआती दौर में ही केंद्र का रुख कर रहे हैं।
विकास कुमार का मामला थोड़ा अलग रहा। उन्हें कवर्धा के लोहारडीह हिंसा प्रकरण में निलंबित किया गया था, आरोप था कि वे स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहे। हालांकि बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गई। इसके बाद उन्हें पीएचक्यू में एसपी बनाया गया और फिर रायपुर कमिश्नरी में डिप्टी कमिश्नर के रूप में पदस्थ किया गया।
उनके बैच के कई अधिकारी पहले ही जिले के एसपी बन चुके थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुना और अब वे केंद्र में सेवाएं देने रवाना हो चुके हैं।
यह नाम कहाँ से आया?

रायपुर -जबलपुर के बीच चलने वाली ट्रेन नंबर 11701/11702, जिसे अब तक लोग रायपुर-जबलपुर एक्सप्रेस के नाम से जानते थे, उसे जनवरी 2026 में एक नया नाम दिया गया, ‘मूक माटी एक्सप्रेस’। कई लोग इस नाम को लेकर हैरान होते हैं, कि यह कहाँ से आया है?
यह नामकरण जैन संत आचार्य विद्यासागर महाराज की स्मृति में किया गया है। ‘मूक माटी’ उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम है, जिसे उनके साहित्यिक और दार्शनिक योगदान के रूप में व्यापक पहचान मिली है। रेलवे मंत्रालय ने 7 जनवरी 2026 के आसपास इस नाम परिवर्तन का आदेश जारी किया। यह बदलाव मुख्य रूप से आचार्य विद्यासागर जी को श्रद्धांजलि देने और उनके विचारों को व्यापक स्तर पर स्मरण में रखने के उद्देश्य से किया गया है।
हालात को हराया, वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज

जीवन जब बार-बार ठोकर देता है, तब कुछ लोग टूट जाते हैं। मगर, कुछ लोग उसी दर्द को अपनी ताकत बना लेते हैं। अंबिकापुर, सरगुजा की शिवानी सोनी की कहानी दूसरे श्रेणी की है। बहुत छोटी उम्र में ही पिता ने परिवार का साथ छोड़ दिया। घर की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। वह आंगनबाड़ी में काम करती हैं। सीमित आय में पूरे परिवार को वह संभालती रहीं। इन परिस्थितियों में शिवानी का बचपन बीता, लेकिन मां ने उसके सपनों को टूटने नहीं दिया, बेटी को आगे बढऩे का हौसला दिया।
शिवानी का एक समय ऐसा भी था जब वह घोर निराशा के करीब पहुंच चुकी थी। उसी दौर में खेल ने उनके जीवन में चमत्कार की तरह प्रवेश किया। शुरुआत बास्केटबॉल से हुई। मां रोज उन्हें मैदान तक लेकर जाती थीं। लेकिन एक चोट ने रास्ता बदल दिया। कोच की सलाह पर उन्होंने मिनी गोल्फ और स्पीडबॉल को अपनाया।
धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदला और जुनून ने उपलब्धियों का रूप ले लिया। शिवानी ने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, 2017 से 2019 तक, फिर 2023 और 2024 में। इस निरंतरता के चलते उनका नाम इंडिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कर लिया गया। वह छत्तीसगढ़ की एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्होंने स्पीडबॉल और मिनी गोल्फ दोनों में देश का प्रतिनिधित्व किया है।
उनकी झोली में वर्ल्ड चैंपियनशिप और इंडो-इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं के कई ब्रॉन्ज मेडल हैं, जबकि एशियन और वर्ल्ड स्तर पर भी उन्होंने शीर्ष स्थान हासिल किए। दुर्भाग्यवश, आज भी आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। शिवानी चाहती हैं कि उन्हें खेल कोटे से सरकारी नौकरी मिले, ताकि वह अपनी मां का सहारा बन सकें।
जरा सी जगह तो दे दी

अब आदिवासी गौरव तो अच्छी बात है, लेकिन आदिवासी प्रतीक चिन्हों के बीच, नाम और जय जोहार से घिरे हुए मोटर सायकिल के नंबर को जरा सी जगह मिल गई है, वह बड़ी मेहरबानी हो गई है!
आज विश्व लेपर्ड डे...
यह छत्तीसगढ़ के आकार में छोटे अभयारण्य बारनवापारा ले ली गई तस्वीर है, जहां बढ़ते-बढ़ते लेपर्ड (तेंदुआ) की संख्या 60 पहुंच चुकी है। पर्यटक यदि दो पाली की सैर करें तो एक बार तो इनके दर्शन हो ही जाते हैं। टाइगर जैसा ही दिखता है। जिन्हें टाइगर रिजर्व में टाइगर नहीं दिखते, इनको ही देखकर तसल्ली कर लेते हैं।
वन्यजीव प्रेमी, वरिष्ठ पत्रकार प्राण चड्ढा का सुझाव है कि बारनवापारा में तेंदुओं की संख्या को देखते हुए इसे तेंदुआ या लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। अभयारण्य का वाटर मैनेजमेंट ठीक-ठाक है। अनुभवी गाइड्स हैं, रुकने-ठहरने की व्यवस्था भी अच्छी ही है। लेपर्ड सेंचुरी के रूप में विकसित करने से देश के अभयारण्यों के मानचित्र में इसका महत्व बढ़ जाएगा और देश-विदेश से सैलानी ज्यादा संख्या में यहां पहुंचेंगे।
लामबंद हो रहे कांग्रेस जिलाध्यक्ष
प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की कार्यशैली को लेकर जिला अध्यक्षों में असंतोष अब धीरे-धीरे सतह पर आने लगा है। मौका मिला प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के रायपुर प्रवास का, तो जिलाध्यक्षों ने बिना शोर-शराबे के अपनी नाराजगी दर्ज करा दी। सीधे विरोध से बचते हुए पहले आपस में रणनीति बनी, फिर 10 सूत्रीय प्रस्ताव के जरिए अपनी बात रख दी गई।
असल में आपत्ति नियुक्तियों को लेकर है। जिलाध्यक्षों को इस बात से खिन्न हैं कि ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति बिना उनकी राय के कर दी गई। अब मांग साफ है जिले में कोई भी नियुक्ति हो, तो जिलाध्यक्ष की सहमति जरूरी हो।
इतना ही नहीं, प्रभारी महामंत्री का पद खत्म करने के फैसले ने भी अंदरखाने हलचल बढ़ा दी है। जिलाध्यक्ष इसे वापस बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पायलट ने भले ही ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन कार्यकारिणी विस्तार के मुद्दे पर 90 फीसदी उपस्थिति की शर्त जरूर रख दी। यानी संदेश साफ है कि पहले संगठन में सक्रियता दिखाइए, फिर विस्तार की बात कीजिए।
जांच में नरमी से आईजी खफा
अंबिकापुर की आग अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही, बल्कि राजनीतिक गर्मी का कारण भी बन गई है। पटाखा गोदाम में लगी आग के बाद जो कुछ हुआ, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहा जा रहा है कि गोदाम किसी मंत्री के करीबी का था। मंत्री ने पलटकर साफ कर दिया कि कोई गोदाम था ही नहीं। इधर , पुलिस की शुरुआती नरमी ने आग में घी डालने का काम किया। मामला सोशल मीडिया से होता हुआ सीधे आईजी दीपक झा तक पहुंच गया। फिर क्या था, आईजी ने सख्त रुख दिखाया और एसएसपी राजेश अग्रवाल को नोटिस थमा दिया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिन धाराओं में मामला बनता था, बीएनएस की 324, 326 (छ) और विस्फोटक अधिनियम की धारा 9 (ख) उन्हें शुरुआत में जोड़ा ही नहीं गया। आईजी ने सात दिन में जवाब मांगा है। देखना है आगे क्या होता है।
अगले चुनाव और आठवां वेतन आयोग
छत्तीसगढ़ की अगली सातवीं विधानसभा के चुनाव से पहले राज्य सरकार पर बड़ा वित्तीय दबाव रहेगा। वहीं अधिकारी कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले होगी। अवसर होगा आठवां वेतनमान। रंजना देसाई आयोग ने इस समय इसी कवायद पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। उस पर फरवरी 27 तक सिफारिश सौंपने का दबाव है। समय कम है। रिपोर्ट समय पर मिलने पर पहला दबाव केंद्र सरकार पर होगा। क्योंकि उसे भी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले 2028 में होने 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में जाना होगा। ये सभी राज्य, देश की राजनीति के नजरिए से अहम हैं- छग- मप्र, राजस्थान, तेलंगाना, मिजोरम। उससे पहले ही अगले वर्ष 27 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं।
बहरहाल, कर्मचारी संघों के राष्ट्रीय नेतृत्व का अनुमान है कि वेतन आयोग साल 2027 की पहली छमाही में अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है। सरकार की ओर से वेतन आयोग को 18 महीने का समय मिला है। इस अवधि में वेतन आयोग केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी, भत्ते के अलावा अन्य फैसिलिटी और पेंशनर्स की सुविधाओं की सिफारिश कर देगा।
चूंकि राज्यों में पृथक वेतन आयोग गठन की व्यवस्था खत्म हो गई है इसलिए यानी केंद्रीय आयोग की सिफारिशें ही राज्य भी लागू करते हैं। इस रिपोर्ट पर राज्यों खासकर भाजपा शासित का कर्मचारी हितैषी रूख सामने आ जाएगा। सभी राज्य फ्री बीज (अकेले छत्तीसगढ़ में 35 हजार करोड़ का) के चलते बड़े बजटीय दबाव से जूझ रहे हैं। अब ऐसे में नए वेतनमान का कितना लाभ सरकारें देंगी यह समय बताएगा।
जहां तक छत्तीसगढ़ की बात है तो सरकार को 28 के बजट में ही प्रावधान कर अपना रुख स्पष्ट करना होगा। भले वह भुगतान किस्तों में करे। तभी वह चुनाव में जा सकेगी। वर्ना कर्मचारी आंदोलन का झंडा बुलंद करने तैयार रहेंगे। वैसे अभी से चर्चा है कि फिटमेंट फैक्टर को लेकर मामला नई सरकारों तक खिंच सकता है।
इससे पहले छत्तीसगढ़ में 2016 का 7 वां वेतनमान 1 अप्रैल 2017 से लागू हुआ था। जनवरी 2016 से 30 जून 2017 तक के 18 महीने के बकाए का एरियर्स कुल 6 समान वार्षिक किश्तों में दिया गया था। पहली किस्त का भुगतान अगस्त-सितंबर 2018 में शुरू किया गया था। इसके तहत 3,300 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करीब 3.50 लाख से अधिक कर्मचारियों को किया गया।
उस वक्त फिटमेंट फैक्टर मूल वेतन का (2.57/) गुना तय किया गया था। 7 वें आयोग के कई बेनिफिट्स अब तक अनसुलझे और अप्राप्त हैं। इस बार अमला भी पिछली बार से ठीक दो गुना बढ़ गया है। व्यय भार भी 7-8 हजार करोड़ से अधिक ही पड़ेगा। उस पर दैवेभो, संविदा, अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण का दबाव अलग। देखना है आगे यह बोझ कैसे हल होगा।
नक्सलवाद का सच्चा उन्मूलन कब?
कांकेर-नारायणपुर के बीच आईईडी ब्लास्ट में डीआरजी के एक इंस्पेक्टर सहित 4 जवान शहीद हो गए। खबर में बताया गया है कि यह पुराने छिपे विस्फोटकों की तलाशी के दौरान हुआ। सैकड़ों ऐसे आईईडी अब भी जमीन पर दबे हो सकते हैं। नक्सल उन्मूलन के लिए सरकार की कामयाबी को नकारा नहीं जा सकता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णे देव साय की इस मामले में जो दृढ़ इच्छाशक्ति रही और कोशिश ईमानदार रही, उसका नतीजा ही है कि बस्तर अब खुली हवा में सांस लेने लगा है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या लगभग शून्य हो चुकी है।
शायद विस्फोटक दबाए जाने की सटीक जगह का जवानों को पता होता तो यह हादसा नहीं होता। बस्तर में जब सैकड़ों नक्सलियों ने सरेंडर किया तो उनसे भी जानकारी ली गई होगी कि कहां-कहां जमीन के नीचे उन्होंने मौत का सामान छिपा रखा है, फिर भी यह घटना हो गई। यह ब्लास्ट आगाह करता है कि उग्रवादियों का केवल सरेंडर होना या मारा जाना काफी नहीं है। बीते चार दशकों में उन्होंने बस्तर में जो जड़ें जमाई है, उनका उन्मूलन भी जरूरी है। सरेंडर करने वाले नक्सलियों ने हथियार, भारी मात्रा में कैश और विस्फोटकों की जानकारी सुरक्षा बलों को दी है, सैकड़ों आईईडी उनकी ही सूचना पर रिकवर हुए हैं। बावजूद नारायणपुर-कांकेर की यह घटना बताती है कि पुराने प्लांटेड विस्फोटक अब भी खतरा बने हुए हैं। सवाल खड़ा होता है कि क्या सुरक्षा बलों को सरेंडर करने वाले नक्सली अधूरी जानकारी दे रहे हैं, कुछ छिपा रहे हैं? उनकी रणनीति का यह कोई हिस्सा तो नहीं?
इस घटना को अपवाद ही मानकर चलना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि यह दोहराया नहीं जाएगा। मगर, यह तय है कि उन्मूलन का मतलब केवल सरेंडर कराना, मार गिराना, बंदूक और विस्फोटक बरामद करना काफी नहीं है। आंध्रप्रदेश में ग्रेहाउंड फोर्स ने सशस्त्र प्रतिक्रिया के जरिये नक्सलियों की नोक नीचे की। मगर असल सफलता तब मिली जब भूमि सुधार हुआ, ग्रामीणों को पट्टे दिए गए, उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए। शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच बनी, इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त किए गए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी यही मॉडल अपनाया जा रहा है। दुनिया के देशों की बात करें तो कोलंबिया में फार्स (एफएआरसी) के खिलाफ उरिबे की रणनीति में सैन्य दबाव तो शामिल ही था, साथ में विकास कार्यक्रम और पुनर्वास योजनाएं लागू कीं। पेरू में शाइनिंग पाथ की सैन्य शक्ति का पराभव हुआ, मगर वहां ग्रामीण विकास ने स्थायी शांति दी। श्रीलंका में लिट्टे का सैन्य बल से उन्मूलन तो हुआ पर उस विद्रोह को उभरने से रोकने के लिए प्रभावित वर्ग की राजनीतिक भूमिका बढ़ाई गई और पुनर्वास कार्यक्रम चलाए गए। कहने का मतलब यह है कि बस्तर से नक्सलवाद उन्मूलन भी बहुआयामी होना चाहिए। सरेंडर, हथियारों की जब्ती, मारा जाना एक चरण है। अगला चरण थोड़ा कठिन है, जिसमें प्रभावितों के बीच व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करना होगा।
ईडी के छत्तीसगढ़ में 8 वर्ष
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अपनी स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में निदेशक राहुल नवीन ने एजेंसी का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, ईडी ने 94 फीसदी का उच्च कन्विक्शन रेट हासिल किया है और वित्त वर्ष 2025-26 में 81,422 करोड़ की रिकॉर्ड संपत्ति कुर्क की है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 171 फीसदी अधिक है। अब तक एजेंसी कुल 2.36 लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति अटैच कर चुकी है।
छत्तीसगढ़ पर नजर डालें तो रायपुर में ईडी का पूर्ण जोनल कार्यालय जनवरी 2025 में सक्रिय हुआ, जबकि इसकी शुरुआत 2017-18 में उप-जोनल कार्यालय के रूप में हुई थी, जो पहले मुंबई जोनल ऑफिस के अधीन कार्यरत था। पूर्ण कार्यालय बनने के बाद अब यह सीधे दिल्ली मुख्यालय को रिपोर्ट करता है। राज्य में मनी लॉन्ड्रिंग और सरकारी धन के दुरुपयोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसकी भूमिका लगातार मजबूत की गई है।
इन आठ वर्षों में ईडी ने छत्तीसगढ़ में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में कार्रवाई की है। शराब, कोयला, ऑनलाइन सट्टा, डीएमएफ, कस्टम मिलिंग और जमीन से जुड़े घोटालों में एजेंसी ने सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क और जब्त की है। कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ रहा है और हर नई रेड के साथ आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं।
अप्रैल 2026 तक के प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो, सबसे पहले ईडी ने करीब 32 सौ करोड़ के शराब घोटाले में ईडी ने 100 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है। इसमें तीन प्रमुख डिस्टिलर्स से जुड़ी लगभग 68 करोड़ की संपत्ति, दो आईएएस और एक राज्य सेवा अधिकारी से संबंधित संपत्तियां शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की 61.2 करोड़ की संपत्ति भी अटैच की गई है।
महादेव सट्टा ऐप मामले में ईडी ने 91.82 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की है, जिसमें 75 करोड़ का बैंक बैलेंस शामिल है। वहीं 26 सौ करोड़ से अधिक की संपत्तियां जांच के दायरे में हैं।
कोल लेवी घोटाले में 2.66 करोड़ से अधिक की संपत्ति कुर्क की गई है। हाल ही में भारतमाला मुआवजा घोटाले में 23.35 करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई, जिसमें 17 किलो सोना और हीरे के गहने भी जब्त किए गए हैं।
इन मामलों में ईडी ने कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजा है। इनमें आईएएस अधिकारी समीर विश्नोई, रानू साहू, अनिल टूटेजा, आईटीएस अधिकारी एपी त्रिपाठी, राज्य सेवा अधिकारी सौम्या चौरसिया, खनिज विभाग के एस एस नाग, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल, कारोबारी सूर्यकांत तिवारी, अनवर ढेबर और राइस मिलर रोशन चंद्राकर जैसे नाम शामिल हैं।
हालांकि एजेंसी की कार्रवाई के बीच कुछ सवाल भी उठते रहे हैं। भारतमाला मुआवजा घोटाले में पूर्व मंत्री के भाई भूपेंद्र चंद्राकर को जांच के घेरे में लिया गया है, लेकिन पिछले तीन वर्षों से कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी होने के बावजूद गिरफ्तारी न हो पाना एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में ईडी के आठ वर्षों का सफर कार्रवाई और उपलब्धियों के साथ-साथ चुनौतियों और सवालों से भी भरा रहा है।
ब्याज के बदले बकरी

सरगुजा जिले में महिलाओं की आय बढ़ाने के लिए एक अलग तरह की पहल की गई है। गांवों में छेरी बैंक खोले गए हैं, जहां उन्हें बकरियां खरीदने के लिए कर्ज दिया जा रहा है। इस कर्ज के किस्तों का भुगतान उन्हें रुपयों में नहीं करना है, बल्कि मेमनों से करना है। बकरियां बच्चे पैदा करेंगी और उनमें से ही एक को या कुछ को, वे चुकाकर कर्ज से मुक्त हो जाएंगी। बकरियों के लिए कर्ज देने का पुराना कार्यक्रम सरकारी है, बिहान योजना के अंतर्गत। पर कर्ज की रकम चुकाने के लिए नगद की जगह शावक या मेमना देने का प्रयोग नया है।
जगह-जगह याद किए जा रहे गोविंद सारंग

छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्तमान स्वरूप को गढऩे वाले पुराने संगठनकर्ता स्व. गोविंद सारंग को उनकी जयंती पर प्रदेशभर में याद किया जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष किरण देव सिंह ने बस्तर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने-अपने तरीके से उन्हें नमन किया।
एक वरिष्ठ नेता ने सोशल मीडिया पर स्व. सारंग के योगदान को याद करते हुए बताया कि अविभाजित मध्यप्रदेश में संगठनात्मक दृष्टि से पार्टी को तीन हिस्सों में बांटा गया था, इनमें मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ थे। मध्य भारत में कृष्ण मुरारी मोघे, महाकौशल में मेघराज जैन और छत्तीसगढ़ में संगठन की जिम्मेदारी गोविंद सारंग को सौंपी गई थी।
उस दौर में छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन कांग्रेस की तुलना में काफी कमजोर था। भोपाल से रायपुर आने के बाद गोविंद सारंग ने जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने का बीड़ा उठाया। वे स्कूटर से रायपुर के वार्डों का दौरा करते, तो राज्य परिवहन की बसों से बस्तर और सरगुजा तक पहुंचकर कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे।
बाद में विजयाराजे सिंधिया द्वारा भेजी गई एक जीप (एमपीजी 9673) से उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा कर संगठन को विस्तार दिया। इसके बाद उन्हें एक फिएट कार भी मिली, जिससे उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा को मजबूती से खड़ा करने की रणनीति को और धार दी।
उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज छत्तीसगढ़ में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित हो चुकी है और प्रदेश में पार्टी की चौथी सरकार है। 2003 से 2018 तक बनी भाजपा सरकारों में शामिल अधिकांश विधायक और सांसद कहीं न कहीं स्व. सारंग की संगठनात्मक तैयारी की देन माने जाते हैं।
उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ता आज मार्गदर्शक मंडल में हैं। इससे परे 2014 के बाद पार्टी में एक नई पीढ़ी उभरी, जिसने नेतृत्व को प्रभावित करते हुए संगठन में अपनी जगह बनाई।
स्व. गोविंद सारंग का योगदान सिर्फ संगठन निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में भाजपा की वैचारिक और राजनीतिक नींव को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई
कर्मचारियों को तटस्थ रहना जरूरी नहीं?
छत्तीसगढ़ सरकार ने 21 अप्रैल को एक साधारण सा परिपत्र जारी किया और उसे फिर अगले ही दिन वापस भी ले लिया। उस आदेश में सामान्य प्रशासन विभाग ने कहा था कि कोई भी कर्मचारी, कर्मचारियों के आचरण नियमावली 1965 के अनुसार किसी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं जुड़ सकता। उनके कार्यक्रमों में न तो वह भाग लेगा और न ही कोई पद संभालेगा। कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कर्तव्यों का पूरी निष्पक्षता के साथ निर्वहन करें, ईमानदारी और अखंडता के साथ करें। कर्मचारी तटस्थ रहकर ही जनसेवा कर सकता है, यही लोकतंत्र की आधारशिला है.., इत्यादि बातें लिखी गई थीं। यानि, जिस आदेश में ऊंचे आदर्शों की बात की गई थी, उसमें कोई खामी नजर आई और सरकार को वह परिपत्र वापस लेना पड़ गया।
संविधान की भावना है कि नौकरशाह हों या बाबू, वे किसी पार्टी के नहीं होते। वे जनता के होते हैं। इसीलिये राजनीति दलों या संगठनों में उनकी सदस्यता 1965 में बने नियमों के तहत निषिद्ध है। जीएडी के आदेश में उसी बात की याद दिलाई गई थी लेकिन अगले ही दिन उस पत्र को वापस लिया जाना कुछ सवाल खड़े करते हैं। क्या इस पत्र को भाजपा के कुछ तबकों में आरएसएस के खिलाफ मान लिया गया? सन् 2024 में केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी थी। इसका पालन छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। परिपत्र में, जिसे वापस लिया गया, राजनीतिक दलों के अलावा संगठनों का भी उल्लेख किया गया था। इससे यह संकेत मिल रहा था कि इसके बाद तो आरएसएस के कार्यक्रमों में कर्मचारियों के जाने पर प्रतिबंध लग जाएगा। आरएसएस इस समय छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के मुद्दे पर बहुत मुखर है। दूसरी बात यह है कि निचले स्तर पर कर्मचारी अक्सर जातिगत, धार्मिक, अर्ध धार्मिक मंचों और संगठनों से जुड़े रहते हैं। उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव होता है। यदि वह अफसर हो तो उनका अपने संगठन पर काफी प्रभाव भी होता है। इनका एक बड़ा वोट बैंक भी होता है, जिनकी राजनीतिक दलों को जरूरत बनी रहती है। यदि उन्हें सामाजिक धार्मिक संगठनों के कार्यक्रमों में भाग लेने से रोक दिया गया तो राजनीतिक दलों का नुकसान ही होना है।
आम लोगों के नजरिये से देखें तो अनेक संगठन ऐसे हैं, जिनकी स्थापना ही कर्मचारी, अधिकारी नेता करते हैं, या फिर उनमें वे संरक्षक की भूमिका में होते हैं। वे इतने सक्रिय होते हैं कि बस अपने दफ्तर की ड्यूटी नहीं करते, बाकी सब करते हैं, जो कुल मिलाकर प्रशासन की कार्यक्षमता पर असर डालती है। पहला परिपत्र कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने वाला था, वापस लिए जाने वाला दूसरा परिपत्र सरकार के भीतर के अंतर्विरोध को सामने लाता है।
जनगणना में आदिवासी पहचान की लड़ाई
जनगणना के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में दर्ज कराने के लिए मुहिम चल रही है। उसी तरह से आदिवासी संगठन आह्वान कर रहे हैं कि समाज के लोग जनगणना में अपना धर्म आदिवासी दर्ज कराएं।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी की कुल आबादी लगभग 30 प्रतिशत है। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर, सुकमा,कोंडागांव, दंतेवाड़ा जैसे जिलों के गोंड, हल्बा, बैगा, कमार, ओरांव आदि जनजातियों की धार्मिक परंपरा प्रकृति पूजा और पूर्वजों की आराधना पर आधारित है। गोंड समुदाय में गोंडी या कोईतुर परंपरा, जबकि कुछ क्षेत्रों में सरना जैसी पूजा पद्धतियां चलन में हैं।
अब जब जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है, बस्तर संभाग के कई आदिवासी संगठनों ने धर्म के कॉलम में आदिवासी भरा जाए, इसका अभियान शुरू किया है। सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग की ओर से कहा गया है कि धर्म के कॉलम में आदिवासी लिखा जाना केवल भिन्न धार्मिक पहचान के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि जल-जंगल-जमीन के अधिकार, पेसा कानून के अधिकार, सांस्कृतिक अस्तित्व और भविष्य में होने वाले विधानसभा, लोकसभा के परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
इतिहास टटोलने पर पता चलता है कि 1871 से 1941 तक ब्रिटिश सरकार ने जनगणना में आदिवासियों को हिंदुओं या किसी भी अन्य धार्मिक समुदाय से अलग गिना था। समुदाय के तौर पर इन्हें एबोरिजिनल्स, एनिमिस्ट्स, ट्राइबल एनिमिस्ट्स, हिल एंड फॉरेस्ट ट्राइब्स या प्रिमिटिव ट्राइब्स कहा गया। उनकी धार्मिक श्रेणी को एनिमिज्म या ट्राइबल रेलिजन के रूप में दर्ज किया गया। अंग्रेजों का मानना था कि आदिवासियों की पूजा पाठ की पद्धति हिंदू मंदिरों की मूर्ति पूजा या वैदिक रीतियों से काफी अलग है। वे प्रकृति पर विश्वास रखते हैं, जिसमें कोई केंद्रीय देवता या पुजारी का वर्ग नहीं होता।
आजादी के बाद जब पहली जनगणना हुई तो भी इस व्यवस्था को कायम रखा गया लेकिन 1961 में एनिमिज्म या अलग आदिवासी श्रेणी हटा दी गई। इसके बाद ज्यादातर आदिवासियों को हिंदू की श्रेणी में डाल दिया गया या फिर उन्हें अन्य के कॉलम में दर्ज किया जाने लगा। सन् 2011 की जनगणना में करीब 8 करोड़ आदिवासियों में से लाखों लोगों को हिंदू या अन्य की श्रेणी में रखा गया। छत्तीसगढ़ में उस दौरान करीब 4 लाख 90 हजार आदिवासी अन्य धर्म या अलग मान्यता वाली श्रेणी में रखा गया।
देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस सरकार ने कुछ समाजशास्त्रियों के निष्कर्षों को मानते हुए आदिवासियों को बैकवर्ड्स हिंदू की श्रेणी में शामिल किया। तर्क यह दिया गया कि वे भारतीय भूमि पर रहते हैं। हिंदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं और उनकी संस्कृति हिंदू संस्कृति का हिस्सा है। राष्ट्रवादी व हिंदुत्व विचारधारा के लिए भी यह धारणा अनुकूल थी। उसने इस विचार को आगे ही बढ़ाया ताकि हिंदू आबादी में विस्तार दिखे। परिणाम यह निकला कि आदिवासियों की प्रकृति आधारित धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए एक अलग संघर्ष शुरू हो गया। इस जनगणना में आदिवासी को अलग धर्म के रूप में दर्ज करने की अपील उसी संघर्ष का हिस्सा है।
स्मार्ट सिटी में मई दिवस

(तस्वीर- प्राण चड्ढा)
छत्तीसगढ़ के तीन स्मार्ट सिटीज़ में से एक- बिलासपुर का बृहस्पति बाजार। मई दिवस के दोपहर 12 बजे आग उगलते खुले आसमान के नीचे कुछ मजदूर इंतजार कर रहे हैं। ऐसे छोटे-छोटे कई और टुकड़े में बिखरे हुए। इंतजार कर रहे हैं कोई आए, बुलाए और आज की रोटी का जुगाड़ हो जाए। कुली, रेजा, मिस्त्री सब अपनी मेहनत और हुनर को लेकर बाजार में खड़े हैं, लेकिन इस मेहनत की कीमत तय करने वाला कोई नहीं। मांग और पूर्ति पर आधारित है। कंस्ट्रक्शन और त्यौहार के दिनों में जब मांग बढ़ती है तो ठीक-ठाक मजदूरी मिल जाती है, पर जब दोपहर तक काम नहीं मिलता तो मजदूर बेहद बेचैन हो जाता है। वह आधे दाम पर काम करने के लिए तैयार हो जाता है। हर रोज प्रशासन और पुलिस की नजर में ये आते हैं, क्योंकि संख्या सैकड़ों में होती है, रास्ता जाम हो जाता है- पर शायद ही किसी ने आकर पूछा हो कि तुम लोगों को न्यूनतम मजदूरी मिलती भी है या नहीं? कोई मजदूर संगठन भी इनकी सुध नहीं लेता।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की बैठक में अध्यक्ष दीपक बैज ही मुखिया रहते हैं। लेकिन विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत को अपने जितनी ऊँची, बराबर की कुर्सी देते तो खुद की इज़्ज़त बढ़ती।
हसदेव अरण्य जैसा ग्रेट निकोबार
ग्रेड निकोबार परियोजना केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसका उद्देश्य बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व वाले इस द्वीप का समग्र विकास करना घोषित किया गया है। करीब 80 हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना 900 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्रेट निकोबार इलाके के 160 वर्ग किलोमीटर में लागू होने वाली है। इसके तहत इसमें एक बड़ा बंदरगाह, ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक अत्याधुनिक टाउनशिप और पॉवर प्लांट स्थापित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ साल पहले जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लिए ऑप्टिकल फाइबर लाइन के जरिये हाई स्पीड इंटरनेट सेवा शुरू की थी, तब इसकी घोषणा की थी। अभी दो दिन पहले विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा किया। उन्होंने इसे विकास के नाम पर विनाश और प्रकृति के खिलाफ अपराध बताया। ठीक वैसा ही जैसा हसदेव अरण्य में कोयला खनन की अनुमति दिए जाने को लेकर चिंताएं हैं। जो बातें राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए कही हैं, करीब-करीब हसदेव पर भी वह लागू होती हैं। उन्होंने दावा किया कि परियोजना लागू होने से प्राचीन वर्षावन नष्ट हो जाएंगे और लाखों पेड़ों को काटा जाएगा। यह परियोजना शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों की विरासत और अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है।
यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि परियोजना के लिए वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन किया जा रहा है, जैसा कि हसदेव के मामले में है। ग्रेट निकोबार जनजातीय परिषद ने नवंबर 2022 में परियोजना के लिए एनओसी दी थी लेकिन बाद में यह सहमति यह कहकर वापस ले ली गई कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई, अंधेरे में रखा गया। यह बात हसदेव में ग्राम सभाओं से ली जाने वाली मंजूरी के तरीके की तरह लगती है। परिषद के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रशासन उन पर अपनी पैतृक भूमि सरेंडर करने के लिए दबाव डाल रहा है। उनका कहना है कि एफआरए के तहत निपटारा किए बिना उनकी भूमि का डायवर्सन किया जा रहा है। यह बात भी हसदेव के लिए किए गए अधिग्रहण से बहुत मिलती-जुलती है।
जनजातियों के अस्तित्व के संकट का सवाल शायद ग्रेट निकोबार में शायद हसदेव से भी ज्यादा गंभीर है। सर्वाइवल इंटरनेशनल नाम के एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने इस परियोजना को नरसंहार तक कह दिया है क्योंकि यह शोम्पेन जनजाति के लिए विनाशकारी है। शोम्पेन को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में रखा गया है। कई मानव वैज्ञानिकों का कहना है कि बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ेगा और उनकी विशिष्ट संस्कृति समाप्त हो सकती है। सुनामी के बाद विस्थापित कई निकोबारी परिवार अपने पैतृक भूमि पर वापस लौटना चाहते हैं लेकिन उन्हें जाने से रोका जा रहा है।
हसदेव और ग्रेट निकोबार में जो समानताएं हैं, उनमें बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, दोनों ही क्षेत्रों के आदिवासी समुदायों का पुरखों की भूमि से विस्थापन, उनकी आजीविका, संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व पर संकट है। हसदेव को ‘छत्तीसगढ़ का फेफड़ा’ कहा जाता है, वैसे ही निकोबार के वर्षावन कार्बन सोखने और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं। हसदेव में लंबे समय से चल रहे जन आंदोलन की तरह ही अब निकोबार में भी स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों का विरोध तेज हो रहा है, जिसे राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है।
बड़ों की बारी आएगी?
भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाला प्रकरण में ईडी की कार्रवाई तेज होती नजर आ रही है। एजेंसी ने उन स्थानों पर भी दबिश दी है, जो ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच के दायरे में नहीं आए थे।
कार्रवाई के दौरान पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के करीबी रिश्तेदार भूपेंद्र चंद्राकर को भी जांच के घेरे में लिया गया है। वहीं दुर्ग के भाजपा नेता चतुर्भुज राठी से जुड़े प्रतिष्ठानों पर भी छापेमारी की गई।
हालांकि अब तक किसी बड़ी बरामदगी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संकेत हैं कि आने वाले दिनों में कुछ बड़े नाम सामने आ सकते हैं। चर्चा यह भी है कि धमतरी जिले के एक कारोबारी को लगभग 100 करोड़ रुपये के आसपास मुआवजा मिला था, जिसके लिए कथित तौर पर किसानों के नाम पर जमीन खरीदी गई थी।
बताते हैं कि कुछ अन्य बड़े कारोबारी अभी भी जांच के दायरे से बाहर हैं, लेकिन उनकी भूमिका पर भी नजर रखी जा रही है। ईडी ने जिन लोगों के यहां छापेमारी की है, उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं। माना जा रहा है कि डिजिटल साक्ष्यों से इस पूरे मामले में अहम खुलासे हो सकते हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है ।
फैशन करते पिट न जाएं...
फैशन का मतलब अलग होना, अटपटा होना, कई किस्म का हो सकता है। दुनिया की एक बड़ी फैशन कंपनी ने इंसानी भू्रण के कान के बाले बनाकर दुनिया भर में हंगामा खड़ा कर दिया था। अब एक दूसरी फैशन कंपनी ने मक्खी जैसे कान के पिन बनाए हैं। मच्छर, तिलचट्टे, अधिक दूर नहीं हैं, उनकी भी बारी चेहरे पर सजने की आने ही वाली है। एक खतरा यह हो सकता है कि इन्हें कानों पर सजे देखकर कोई इन्हें मारने के नाम पर थप्पड़ न लगा दे!
वीडियो पर गरमाई राजनीति
पूर्व सीएम भूपेश बघेल और एक अधिकारी का एआई जनरेटेड वीडियो इन दिनों चर्चा में है। वीडियो सामने आते ही स्वाभाविक रूप से कांग्रेस में नाराजगी देखी गई, और अलग-अलग जिलों में एफआईआर दर्ज कराई गई है। भाजपा के नेताओं ने भी इसे आपत्तिजनक बताया है। कांग्रेस नेता वीडियो की पड़ताल में जुटे हैं और इसके निर्माण में दो लोगों की संलिप्तता का संदेह जता रहे हैं।
मामले की जांच दुर्ग पुलिस की साइबर सेल कर रही है। प्रदेश में ऑडियो-वीडियो की राजनीति पहले भी सुर्खियों में रही है। विधायक खरीद-फरोख्त प्रकरण के ऑडियो की गूंज दिल्ली तक पहुंची थी। बहुचर्चित सेक्स सीडी कांड की जांच सीबीआई कर रही है, जिसमें खुद पूर्व सीएम भूपेश बघेल भी जांच के दायरे में हैं। सीबीआई इस मामले में चालान पेश कर चुकी है और 6 मई को अगली सुनवाई निर्धारित है।
ताजा मामले में पूर्व सीएम का यह वीडियो जाहिर तौर पर एआई जनरेटेड है, जिसे भूपेश बघेल की छवि धूमिल करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। वीडियो किसने बनाया, इसकी जांच जारी है, हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दो संदिग्धों के नाम पुलिस को सौंपे हैं। साइबर सेल द्वारा जल्द ही ठोस कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।
दूसरी ओर, कुछ समय पहले भाजपा से जुड़े नेताओं का भी एक वीडियो वायरल हुआ था। इस मामले में रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा के नेतृत्व में सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी, और पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार भी किया था।
एआई तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ फर्जी वीडियो का खतरा लगातार बढ़ रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ इस तरह के एआई जनरेटेड कंटेंट के इस्तेमाल की आशंका भी जताई जा रही है। नवा रायपुर में नवंबर में आयोजित डीजीपी-आईजी सम्मेलन में भी इस खतरे को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी। अब आगे इस मामले में क्या कार्रवाई होती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
पाठक को विदाई देने की तैयारी में आप कार्यकर्ता...
सन् 2022 में संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी ने जब पंजाब के कोटे से राज्यसभा सदस्य बनाया था, तब वहां के लोगों से कहीं अधिक खुशी छत्तीसगढ़ के पार्टी कार्यकर्ताओं को हुई थी। उनका मुंगेली, बिलासपुर में भव्य स्वागत हुआ था। पाठक ने यहां आने पर कहा था कि उनकी पार्टी कांग्रेस और भाजपा दोनों का विकल्प बनेगी क्योंकि लोग दोनों से नाराज हैं। बहरहाल, उस प्रवास के बाद पाठक छत्तीसगढ़ बहुत कम आए। उन्हें छत्तीसगढ़ का संगठन प्रभारी बना दिया गया, तब भी यहां वे सक्रिय नहीं रहे। अब जब वे आम आदमी पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हो गए हैं तो यहां के कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष व प्रवक्ता प्रियंका शुक्ला ने अपनी पोस्ट में कई ऐसे खुलासे किए हैं, जिससे पता चलता है कि पाठक के तौर-तरीकों को लेकर कार्यकर्ताओं में पहले से ही नाराजगी थी। शुक्ला ने पोस्ट में लिखा है कि आपने हमारे जैसे कार्यकर्ताओं के साथ ही नहीं, छत्तीसगढ़ और पंजाब की जनता से धोखेबाजी की है। उन्होंने याद किया है कि संदीप पाठक की ओर से उन्हें पार्टी से बाहर निकालने की धमकी दी गई थी, क्योंकि इनकी टीम की बात उन्होंने दिल्ली में एक बड़े नेता तक पहुंचा दी थी। शुक्ला ने पूछा है कि क्या आप भी जाति, धर्म आधारित नफरत की राजनीति करने वाले कपिल मिश्रा जैसे नेता बन जाएंगे? कहा है कि, या तो आप बहुत भोले हैं, या फिर बहुत चालाक... दोनों ही स्थितियों में टिक नहीं पाएंगे। हसदेव, बस्तर और रायगढ़ के लोगों को क्या मुंह दिखाओगे जिनके लिए लडऩे की बात करते रहे। जो तुम लोग दिल्ली से दूल्हा बनकर आते थे छत्तीसगढ़, तुम्हारे नाम पर जिन कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए वे सब इंतजार में हैं। आओगे तो इस बार आखिरी विदाई लेकर जाना।
गुम हो चुकी पैडल रिक्शा
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी अपने दशकों के काम के बाद अब फ़ेसबुक पर भी लगातार लिखते हैं। उन्होंने अभी लिखा है-रायपुर की सडक़ों से लगभग गुम हो चुकी पैडल रिक्शा की दुनिया कभी शहर की धडक़न हुआ करती थी।
आज जैसे ई-रिक्शों से शहर की सडक़ें भरी दिखती हैं, वैसा ही 80-90 के दशक में पैडल रिक्शों का दौर था। उस समय रायपुर की पहचान में रिक्शों की आवाजाही भी शामिल थी। शहर के चौक-चौराहे, बाजार, स्टेशन, अस्पताल हर जगह रिक्शों की कतारें नजर आती थीं।
पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में रायपुर आते थे। काम नहीं मिलने पर कई लोग किराये पर रिक्शा लेकर चलाने लगते। शहर में जगह-जगह रिक्शा स्टैंड बने थे। कई रिक्शा चालकों का अपना घर भी नहीं होता था। दिन भर मेहनत, और रात को उसी रिक्शे पर नींद। संघर्ष का वह दृश्य आज भी स्मृतियों में जिंदा है।
तब शहर में रिक्शा किराये पर देने वालों के कई गैरेज हुआ करते थे। चौक-चौराहों पर उनकी मरम्मत की छोटी-छोटी दुकानें भी होती थीं। दिलचस्प बात यह कि इन रिक्शों में न घंटी होती थी, न हॉर्न। हैंडल पर बंधे बड़े घुंघरू या घांघरे ही उनकी पहचान थे। भीड़ में रास्ता बनाने के लिए रिक्शा चालक उन्हें बजाते हुए निकलते। वह ध्वनि भी शहर की धडक़न जैसी लगती थी।
रिक्शे का किराया तय नहीं होता था। यात्री और चालक के बीच मोल-भाव आम बात थी। नगर निगम इन रिक्शों को पहचान के लिए नंबर देता था। चूंकि यह पैडल से चलते थे, इन्हें चलाने के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं पड़ती थी।
फिर एक ऐतिहासिक मोड़ आया। मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने बड़ा फैसला लेते हुए रिक्शा चालकों को ही उनके रिक्शों का मालिकाना हक दे दिया। जो चालक जिस रिक्शे को चला रहा था, वही उसका मालिक बन गया। इस निर्णय ने हजारों मेहनतकश लोगों को सम्मान और स्वामित्व दिया, हालांकि रिक्शा गैरेज मालिकों को इससे आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
कुछ रिक्शा चालकों की छवि अपराध से जुड़ी खबरों के कारण संदिग्ध भी बनती थी, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे ईमानदार और स्वाभिमानी रिक्शा चालक भी थे, जिनकी मिसाल दी जाती थी। कई बार कोई सवारी अपना सामान रिक्शे में भूल जाता, तो रिक्शा चालक उसे संभालकर थाने में जमा कराने पहुंच जाता था। दूसरे दिन उनकी इस ईमानदारी की खबर अखबारों में बॉक्स आइटम के रूप में प्रमुखता से छपती थी। यह उस दौर के रिक्शा चालकों की मानवीय संवेदनशीलता और भरोसेमंद चरित्र का भी परिचायक था।
फिर समय बदला। ऑटो रिक्शा आए, फिर ई-रिक्शा। और धीरे-धीरे पैडल रिक्शा इतिहास बनने लगे। अब रायपुर की सडक़ों पर कभी-कभार कोई अकेला रिक्शा दिख जाता है, जैसे बीते दौर की कोई चलती-फिरती स्मृति।
रायपुर के इतिहास में पैडल रिक्शा सिर्फ एक सवारी नहीं थे, वे मेहनत, संघर्ष और शहर की जीवंत संस्कृति के प्रतीक थे।
क्या आपको भी पुराने रायपुर के रिक्शों की कोई याद है ?
एक जज और इतने काम
कहा जाता है कि व्यक्ति रिटायर्ड होता है टायर्ड नहीं। यह उक्ति सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना देसाई पर शत प्रतिशत सही साबित होती है। देसाई देश की अब तक की ऐसी एक मात्र रिटायर्ड जज होंगी जो एक साथ 4 अहम कार्य करेंगी। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष श्रीमती देसाई को पहले आठवें वेतन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया।
आयोग ने काम करना शुरू कर दिया है। कर्मचारियों का पक्ष, मांग जानने आयोग राज्यों का दौरा कर रहा है। नए वेतनमान की रिपोर्ट अगले साल तक सौंपना है। इसके बाद विधिवेत्ता देसाई को छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछली कैबिनेट की बैठक में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का फैसला किया। सरकार ने इसके लिए रंजना देसाई को यूसीसी एक्ट बनाने वाली कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है।
फिर केंद्र सरकार ने दो दिन पहले ही देसाई को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का अध्यक्ष का प्रभार दिया। अब तक वह काउंसिल में सदस्य रही हैं। इसके बाद मप्र सरकार ने भी यूसीसी लागू करने का निर्णय लिया और रंजना देसाई को कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इससे पहले उत्तराखंड के लिए भी देसाई कमेटी ने ही यूसीसी नियम बनाए थे जो पिछले एक साल से लागू है। हालिया वर्षों में उत्तराखंड इसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य भी है। इसके बाद गुजरात में भी इसी वर्ष से रंजना देसाई के बनाए यूसीसी नियम प्रभावशील हैं।
वैसे बता दें कि भारत में सबसे पहले गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से यूसीसी लागू हो चुका है, और वर्तमान में ये सभी भाजपा शासित राज्य हैं। देखना होगा आने वाले दिनों में हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक , तमिलनाडु जम्मू कश्मीर को छोड़ और कौन-कौन से राज्य यूसीसी की जिम्मेदारी रंजना देसाई को सौंपते हैं।
जब लकड़बग्घा फैमिली मेंबर होता था...
आज विश्व लकड़बग्घा दिवस है। धारीदार लकड़बग्घा जंगल का मुर्दाखोर सफाईकर्मी होता है। यह मौकापरस्त शिकारी भी है। इसका जबड़ा इतना मजबूत और ताकतवर होता है कि हड्डियों को भी चबा सकता है। यह मृत जानवरों के अवशेषों को साफ करके पर्यावरण को स्वच्छ रखता है और बीमारियों के फैलाव रोकता है। लेकिन दुर्भाग्य से, यह प्रजाति तेजी से लुप्त होने के संकट से जूझ रही है।
वरिष्ठ पत्रकार, वन्यजीव प्रेमी और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर प्राण चड्ढा ने सन् 1970 के पहले की, लकड़बग्घे से जुड़ी एक याद साझा की है। बिलासपुर के कंपनी गार्डन की लॉन में एक ग्रामीण दो नन्हे लकड़बग्घे के शावक बेचने लाया। वह उन्हें बाघ के बच्चे बताकर बेच रहा था। चड्ढा को लकड़बग्घे की पहचान थी। उन्होंने अपने एक मित्र श्रीप्रकाश त्रिपाठी के साथ मिलकर 600 रुपये में दोनों शावक खरीद लिए। एक शावक श्रीप्रकाश के पास रहा, जो शनिचरी बाजार के पास मटन मार्केट के करीब रहते थे, और दूसरा प्राण चड्ढा के पास। शावक सीपत क्षेत्र से लाए गए थे। दोनों तेजी से बड़े हुए। वे चमड़े, जूते या ब्लैड को चबाने के लिए मांगते। साफ-सुथरा रखने के लिए उन्हें साबुन से नहलाया जाता। उनकी पीठ पर लंबे फरदार बाल लहरों की तरह हिलते। रिक्शे में बैठाकर उन्हें घुमाने ले जाते। वे घूमने के बड़े शौकीन थे और कूदकर रिक्शे पर चढ़ जाते। रात में उनका स्वभाव थोड़ा उग्र हो जाता। प्राण चड्ढा का लकड़बग्घा करीब तीन साल जिया। श्रीप्रकाश का शावक कुछ समय बाद नहीं रहा, लेकिन एक और लकड़बग्घा शनिचरी बाजार के मछली व्यवसायी बशीर के दरवाजे पर कुछ साल और बंधा दिखता रहा। उस समय बिलासपुर के पास उसलापुर में, जहां आज नेचर सिटी और सागर परिसर कालोनी है, चड्ढा परिवार के खेत थे। एक रात ट्रैक्टर चलाते हुए उनके भाई सागर को हेडलाइट में लकड़बग्घा दिखा। पास आने पर वह ट्रैक्टर के चक्के के नीचे दब गया। सुबह जब परिवार उठा तो ट्रैक्टर के कल्टीवेटर पर मरा हुआ लकड़बग्घा पड़ा मिला।
ग्रामीण इलाकों के कम होने और बिगड़ते जंगलों में लकड़बग्घा का दिखना अब बहुत दुर्लभ हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी कभी-कभी भिलाई, दुर्ग या अन्य क्षेत्रों में साइटिंग की खबरें आती हैं, लेकिन ये दुर्लभ घटनाएं ही हैं।
वैश्विक स्तर पर धारीदार लकड़बग्घा को लुप्तप्राय के करीब श्रेणी में रखा गया है। दुनिया भर में परिपक्व लकड़बग्घों की संख्या 10 हजार से भी कम है और यह संख्या लगातार घट रही है।
भारत में यह प्रजाति देश के अधिकांश हिस्सों में पाई जाती है, लेकिन उत्तर-पूर्व और दक्षिण के नम क्षेत्रों को छोडक़र। अनुमान के अनुसार भारत में इसकी संख्या एक हजार से तीन हजार के बीच हो सकती है, हालांकि सटीक गिनती मुश्किल है क्योंकि यह जंगलों के बाहर भी खेतों और झाड़ीदार इलाकों में रहता है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची तीन में शामिल है। खाल, हड्डी या जीवित अवस्था में इसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी प्रतिबंधित है।
छत्तीसगढ़ में तो स्थिति और चिंताजनक है। विकास, खेती-बाड़ी के विस्तार, सडक़ों और बस्तियों के कारण प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष, प्रत्यक्ष या जहर फंदे से शिकार और उसके शिकार के काम आने वाले जानवरों की कमी से इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
लकड़बग्घा रात का जीव है, एकाकी और शर्मीला। इसकी वजह से लोग इसे कम समझते हैं और अक्सर गलतफहमी में इसे खतरनाक मान लेते हैं, जबकि प्राण चड्ढा जैसे अनुभवी वन्यजीव प्रेमियों की यह याद हमें बताती है कि उसे पाल कर भी रखा जा सकता है।
बांध से पानी छोडऩे में भी दिक्कत
महानदी पर गंगरेल बांध से रायपुर, धमतरी और आसपास के जिलों को पानी की आपूर्ति की जाती है। गर्मियों में तालाबों के निस्तारी के लिए भी नियमित रूप से पानी छोड़ा जाता है। इस बार भी पूर्व की तरह पानी छोड़ा गया, लेकिन अचानक प्रवाह कम कर दिया गया। बताते हैं कि नहर में डूबने की घटनाओं के कारण पानी का बहाव रोका या घटाया गया। पिछले दो महीनों में 4-5 बार ऐसी स्थिति सामने आ चुकी है। आमतौर पर इस तरह अचानक पानी कम किए जाने की घटनाएं कम ही होती हैं।
सिंचाई अफसरों का कहना है कि नहर में डूबने की स्थिति में शव की तलाश और बरामदगी के लिए पानी का प्रवाह कम करना जरूरी हो जाता है। यह कदम पुलिस के अनुरोध पर उठाया जाता है। हालांकि इससे कई व्यावहारिक दिक्कतें भी सामने आती हैं।
पानी की धार टूटने से शव की रिकवरी में मुश्किल होती है, वहीं तालाबों को भरने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। खासकर नहर के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने में परेशानी बढ़ जाती है। इससे किसान परेशान हो रहे हैं। एक बार प्रवाह कम करने के बाद उसे फिर से सामान्य स्तर पर लाने में करीब 8 से 10 घंटे का समय लगता है।
यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कोई बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं होता।
जनगणना में छत्तीसगढ़ी के अस्तित्व की परीक्षा?
छत्तीसगढ़ में डिजिटल स्व-जनगणना अभियान 16 अप्रैल से शुरू हुआ है जो 30 अप्रैल तक चलेगा। फरवरी 2027 में मुख्य गणना होगी। इधर, राज्य में इन दिनों एक दिलचस्प लेकिन गंभीर अभियान चल रहा है जिसमें लोगों से अपील की जा रही है कि वे जनगणना के दौरान मातृभाषा के रूप में छत्तीसगढ़ी को दर्ज कराएं। छत्तीसगढिय़ा क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, जोहार छत्तीसगढ़ आदि दल और संगठन इसे लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं। छत्तीसगढ़ी को महत्व नहीं देने पर जनगणना का बहिष्कार करने जैसी चेतावनी भी दी गई है।
डिजिटल स्व जनगणना पोर्टल में केलव 16 भाषाओं का विकल्प दिया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ी शामिल नहीं है। जनगणना विभाग ऐतिहासिक रूप से छत्तीसगढ़ी को हिंदी की एक उप भाषा या बोली के रूप में वर्गीकृत करता है। डेटा प्रोसेसिंग के दौरान भी इसे हिंदी में गिन लिया जाता है। छत्तीसगढ़ी को 28 नवंबर 2007 से राजभाषा का दर्जा मिला है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं है। यह क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में शामिल नहीं है। 1.6 करोड़ से अधिक लोग छत्तीसगढ़ी बोलते हैं, पर इससे कम बोली जाने वाली भाषा आठवीं अनुसूची में जगह रखती हैं। इस सूची में शामिल करने की मांग पर विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो चुका है, कई बार केंद्र को पत्र लिखे जा चुके हैं। इस तथ्य की ओर गौर करना चाहिए कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यूनेस्को के मुताबिक दुनिया की 6000 प्लस भाषाओं में से 43 प्रतिशत लुप्तप्राय की स्थिति में है। हर दो हफ्ते में दुनिया की एक भाषा दम तोड़ रही है। भारत को लेकर पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से जारी एक आंकड़े के अनुसार भारत ने बीते 50 वर्षों में 250 से अधिक भाषाएं खो दी हैं। 197 भाषाओं पर खतरा मंडरा रहा है। इनमें छत्तीसगढ़ की कुछ जनजाति बोलियां जैसे अबुझमाडिय़ा भी शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ी बोली को लेकर ऐसा तत्काल कोई संकट नहीं दिखता। मगर, नई पीढ़ी की आदत बदल रही है। पिछली जनगणना और इस जनगणना के बीच बड़े बदलाव आ चुके हैं। अब के युवा ही नहीं, बल्कि हर वर्ग के लोग इंटरनेट के आदी हैं, जिनमें मु_ी भर भाषाओं का कब्जा है। हालांकि इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ी सामग्री भी भरपूर है, पर वे मनोरंजन के लिए है, कामकाज के लिए नहीं। इस बीच रोजगार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन हुआ या फिर कस्बों का शहरीकरण हुआ, जहां भिन्न-भिन्न समुदायों, बोलियों के लोग हैं। उनके बीच संपर्क की भाषा हिंदी हो गई है। प्राथमिक शिक्षा में छत्तीसगढ़ी को शामिल किया गया है, नई शिक्षा नीति 2020 में भी क्षेत्रीय बोलियों को महत्व देने की बात कही गई है। यहां तक कि छत्तीसगढ़ सरकार ने पत्राचार के लिए छत्तीसगढ़ी को मान्यता दे रखी है, पर इनका व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा है। छत्तीसगढ़ी को जनगणना में दर्ज कराने की मांग उठाने की नौबत इसलिये भी आ रही है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपनी बोली बोलने में हीन भाव महसूस होता है। शायद, वे यह समझते हैं कि छत्तीसगढ़ी के अलावा दूसरी भाषाएं बोलने वालों ने ज्यादा तरक्की की है। ऐसे में जनगणना के बाद छत्तीसगढ़ी को लेकर भी एक तस्वीर साफ होने वाली है। छत्तीसगढ़ी कहां है, भविष्य में यह भाषा और फैलेगी या विलुप्त होगी- अनुमान लगाया जा सकेगा।
सुनवाई पूरी होने में वक्त
केन्द्र और राज्य की एजेंसियां घपले-घोटालों की पड़ताल कर रही हैं। इनमें शराब, कोयला, डीएमएफ, महादेव ऑनलाइन सट्टा और नान प्रकरण शामिल हैं। इन प्रकरणों में फंसे ज्यादातर आरोपी जेल से रिहा हो चुके हैं, जबकि कुछ अब भी जेल में हैं।
ये सभी मामले पिछली सरकार के हैं। सभी मामलों में चालान पेश हो चुका है, लेकिन पूरक चालान भी लगातार पेश किए जा रहे हैं। अदालत में सुनवाई लंबी चलेगी और विधिक जानकारों का मानना है कि सुनवाई पूरी होने में एक दशक तक लग सकता है।
नान घोटाला रमन सिंह सरकार के समय उजागर हुआ था। 12 साल बाद भी इसकी सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है। अब इस प्रकरण में ईडी भी सक्रिय हो गई है। दोनों प्रमुख आरोपी, पूर्व प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा, को कस्टडी में लिया गया था। यह मामला भी आगे और खिंचने की संभावना है।
इसी तरह शराब घोटाला केस में साढ़े 9 सौ गवाह हैं, लेकिन गवाही अभी शुरू नहीं हुई है। ऐसे में शराब घोटाला केस की सुनवाई भी लंबी चलेगी। बाकी मामलों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। कुल मिलाकर ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भी ये मुद्दे प्रमुख रूप से छाए रहने की संभावना है।
अवैध प्लाटिंग पर गरमाई राजनीति
अंबिकापुर में पिछले कुछ दिनों से शहर के जागरूक लोग पर्यावरण संरक्षण के लिए मुहिम चला रहे हैं। शहर और आसपास में कई तालाबों को पाटकर प्लाटिंग कर दी गई। ऐसे ही एक तालाब को पाटकर प्लाटिंग करने के मामले की जांच भी शुरू हो गई है। मगर जांच को लेकर भाजपा के अंदरखाने में हलचल मची है।
हुआ यूं कि अंबिकापुर शहर के पुराने रिंगबांध तालाब को पिछले कुछ सालों से पाटा जा रहा है। करीब 6 एकड़ का तालाब सिमटकर आधा एकड़ रह गया। जागरूक लोगों और जनप्रतिनिधियों ने हल्ला मचाया, तो जिला प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी। फिलहाल प्लाटिंग आदि पर रोक लग गई है। लेकिन इस मामले को लेकर भाजपा में खींचतान शुरू हो गई है।
अवैध प्लाटिंग की अगुवाई करने वाले भाजपा नेता बताए जा रहे हैं, जबकि अवैध प्लाटिंग को संरक्षण देने वालों में भी भाजपा के एक प्रमुख पदाधिकारी का नाम सामने आ रहा है। मामले की जानकारी प्रदेश संगठन तक पहुंची है। फिलहाल महामंत्री (संगठन) पवन साय पश्चिम बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं। लौटने के बाद मामले को संज्ञान में ले सकते हैं। वैसे भी पार्टी के एक प्रमुख पदाधिकारी के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
राजनीतिक समीकरण बदलेंगे
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित होने हैं और इसी के साथ राजनीतिक समीकरणों का नया दौर शुरू होने की उम्मीद है। कांग्रेस को केरल के बाद असम में भी सरकार बनने की आस है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि यदि नतीजे अनुकूल रहे तो राष्ट्रीय संगठन से लेकर प्रदेश स्तर तक बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
कांग्रेस की सबसे ज्यादा उम्मीद केरल से जुड़ी है। छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिन पायलट को वहां चुनाव प्रभारी बनाया गया है। साथ ही राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का केरल से सीधा राजनीतिक जुड़ाव होने के कारण पार्टी यहां 15 साल बाद सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है।
छत्तीसगढ़ में भी नतीजों के बाद संगठनात्मक बदलाव की अटकलें हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष की आवाजें भी सामने आई हैं। कुछ जिला अध्यक्ष खुलकर नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि बदलाव होगा या स्थिति यथावत रहेगी।
महिला कांग्रेस की स्थिति भी लंबे समय से अनिश्चित बनी हुई है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद पिछले छह महीनों से खाली है। जनवरी में संभावित उम्मीदवारों के इंटरव्यू होने के बावजूद अब तक नियुक्ति नहीं हो सकी है, जिससे संगठनात्मक गतिविधियां लगभग ठप पड़ी हैं।
छत्तीसगढ़ के नेता भी दांव पर
इन चुनावों के नतीजे केवल राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि छत्तीसगढ़ के कई नेताओं के राजनीतिक कद पर भी असर डाल सकते हैं।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल को असम में चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है, जबकि विकास उपाध्याय वहां प्रभारी सचिव की भूमिका निभा रहे हैं। यदि असम में कांग्रेस सरकार बनाती है, तो इन नेताओं की पार्टी में स्थिति और मजबूत हो सकती है।
वहीं भाजपा की ओर से अरुण साव, ओपी चौधरी और केंद्रीय मंत्री तोखन साहू असम में करीब 20 सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अगर भाजपा सत्ता बरकरार रखती है, तो इन नेताओं की अहमियत बढऩा तय है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में प्रदेश महामंत्री पवन साय की अगुवाई में डिप्टी सीएम विजय शर्मा और दयालदास बघेल समेत कई नेता सक्रिय हैं और लगभग 65 सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। बंगाल में भाजपा के प्रदर्शन पर इन नेताओं का राजनीतिक वजन भी निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर 4 मई के नतीजे सिर्फ सरकारें नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय होगा। देखना है क्या कुछ होता है।
केरल से बड़े बस्तर में खंडपीठ की मांग
जगदलपुर में हाईकोर्ट खंडपीठ की स्थापना की मांग को लेकर बीते 25 अप्रैल को एक बड़ी बैठक रखी गई थी। यह बैठक चैम्बर ऑफ कॉमर्स तथा जिला अधिवक्ता संघ की पहल पर रखी गई। स्थानीय सांसद व विधायक जाहिर तौर पर इस मांग के समर्थन में हैं। बैठक में तय किया गया कि खंडपीठ अब केवल वकीलों की मांग नहीं, बल्कि जनता की होगी। सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, व्यापार संघों, समुदायों को साथ लिया जाएगा। बैठक में कहा गया कि बस्तर छत्तीसगढ़ का एक तिहाई हिस्सा है और आकार में केरल जैसे राज्य से भी बड़ा है। मौजूदा हाईकोर्ट बिलासपुर की दूरी भी बस्तर से बहुत अधिक है। न्याय का विकेंद्रीकरण जरूरी है, इसलिये मांग जायज है। बस्तर सांसद महेश कश्यप, जो इस बैठक में मौजूद थे, उन्होंने कहा है कि मुद्दे को वे संसद में उठाएंगे। विधायक लखेश्वर बघेल ने सामूहिक संघर्ष की जरूरत बताई। मतलब, भाजपा-कांग्रेस सभी दलों के नेताओं की खंडपीठ को लेकर एक राय है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सन् 1945 तक जगदलपुर में रियासतों के लिए जगदलपुर में एक खंडपीठ संचालित होती थी। इसका नाम था- हाईकोर्ट फॉर ईस्टर्न प्रिंसली स्टेट्स। राज्य बनने के बाद सन् 2011 में बस्तर जिला अधिवक्ता संघ ने पहली बार औपचारिक रूप से खंडपीठ की मांग उठाई। उसके बाद समय-समय पर अधिवक्ता संघ, बस्तर चेम्बर ऑफ कॉमर्स और विभिन्न संगठन, प्रदर्शनों, ज्ञापनों के जरिये मांग उठाते रहे हैं। पर, इस बार 25 अप्रैल को हुई बैठक की खास बात यह है कि अब आंदोलन व्यापक स्तर पर होगा, केवल अधिवक्ताओं और व्यापारियों की मांग के रूप में पेश नहीं किया जाएगा।
जगदलपुर से बोदरी, बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट की दूरी लगभग 425 किलोमीटर है। सुकमा और बीजापुर जिलों से तो यह 600 किलोमीटर से अधिक हो जाती है। हवाई सेवाएं बिलासपुर के लिए कभी बंद हो जाती है, कभी शुरू। वैसे भी इसका खर्च हर कोई नहीं उठा सकता। ट्रेन सेवा तो राजधानी रायपुर के लिए ही सुलभ नहीं है, तो बिलासपुर का सवाल ही नहीं उठता। बस या निजी गाडिय़ों से लंबी यात्रा कर लोग यहां पहुंच पाते हैं। गरीब आदिवासी, जिनकी बहुलता बस्तर में है, उनके लिए आने-जाने का खर्च उठाना ही मुश्किल होता है, फिर मुकदमा लडऩे के लिए कहां से ताकत जुटाएंगे। खंडपीठ खुल जाने से बस्तर के लोगों को त्वरित, सुलभ और कहीं कम खर्च में न्याय हासिल करने का मौका मिलेगा। विधि व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे।
मगर, इसके दूसरे पहलू भी हैं। छत्तीसगढ़ जब नया राज्य बन गया तो हाईकोर्ट की स्थापना तो यहां होनी ही थी, पर मध्यप्रदेश के जमाने में रायपुर में खंडपीठ खोलने की मांग विरोध किया जाता था। जगदलपुर में भी खंडपीठ की स्थापना के विचार का विरोध भी होता रहा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन पूर्व में किसी भी खंडपीठ की मांग का विरोध कर चुका है। तर्क यह रहा है कि इससे हाईकोर्ट की गरिमा और प्रभाव पर असर होगा। वहीं रायपुर के अधिवक्ता चाहते हैं, खंडपीठ की स्थापना जगदलपुर के बजाय राजधानी में हो। बिलासपुर में वकीलों के विरोध का एक कारण यह भी है कि जजों का प्रभार दो स्थानों में बंट जाएगा और इसका असर उनकी प्रैक्टिस पर पड़ेगा। क्लाइंट बट जाएंगे, आमदनी घटेगी। कई वकीलों को जगदलपुर में डेरा डालना पड़ेगा, जैसा जबलपुर से कई वकील वर्षों तक बिलासपुर आते रहे। बहुत से लोग तो यहां स्थायी रूप से बस चुके हैं और महंगे वकीलों में शामिल हैं। एक बड़ा तर्क यह है कि बिलासपुर तो राजधानी का दावेदार था, उसे मुश्किल से हाईकोर्ट ही मिल पाया। खंडपीठ बन जाने से बिलासपुर का कद और कम हो जाएगा। कई बार न्यायिक अधिकारी भी नई खंडपीठ के पक्ष में नहीं होते। बिलासपुर, राजधानी से बहुत पास है, रायपुर से ही सही, हवाई सेवाएं हैं। अच्छे स्कूल, नामी अस्पताल हैं। जगदलपुर जैसी जगह में जाने का मन बनाना मुश्किल होगा। सरकारें भी प्राय: पक्ष में नहीं होती। एक खंडपीठ की स्थापना में भारी वित्तीय खर्च और बुनियादी ढांचे के निर्माण की जरूरत पड़ेगी। इमारत, जजों के आवास, कर्माचरियों की नियुक्ति..। सरकार का स्थापना व्यय भी बढ़ जाता है। इसके अलावा देशभर के मौजूदा हाईकोर्ट्स में ही जजों की भारी कमी है। छत्तीसगढ़ में ही कभी पूरे पद नहीं भरे गए। खंडपीठ के लिए नए जजों की भर्ती करनी होगी।
वैसे इस दिशा में बहुत कम विचार हो रहा है कि तकनीकी सुविधाओं का इस्तेमाल कर नई खंडपीठ की जरूरत को कम करें। कोविड महामारी के सामने ई कोर्ट की सुविधाएं शुरू की गईं, जो अब काफी कुछ चलन में आ चुका है। छत्तीसगढ़ के किसी भी कोने से बैठकर वकील जिरह करते हैं, जज मुकदमों की सुनवाई करते हैं। बस्तर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग को नियमित अभ्यास में शामिल कर लेना चाहिए। फिलहाल, देखना यह है कि दो दशक पुरानी खंडपीठ की मांग को नए सिरे से उठाया जा रहा है, उसमें कब सफलता मिलती है और मिल पाती है या नहीं।
गौठान ने उतारी भालू की गर्मी
छत्तीसगढ़ में इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है। शहर गांव ही नहीं, जंगलों तक अपना असर दिखा रही है। इसी दौरान पानी की तलाश में भटकती एक मादा भालू अपने शावकों के साथ कांकेर जिले के ग्राम डुमाली में बने गौठान पहुंची। पानी की टंकी में उतरकर वे राहत पाने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। यह दुर्लभ दृश्य वहां से गुजर रहे एक राहगीर ने कैमरे में कैद कर लिया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट से यह तो पता चल रहा है कि पिछली सरकार के दौरान बनाए गए सब गौठान खंडहर नहीं हुए हैं, कहीं-कहीं पानी भी उपलब्ध है।
डॉ. पाठक और सवाल
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य और छत्तीसगढ़ प्रभारी डॉ. संदीप पाठक ने शुक्रवार को अपने साथी राज्यसभा सदस्यों के साथ पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होने का फैसला किया, तो यहां पार्टी के पदाधिकारी चौंक गए। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में राघव चड्डा और अशोक मित्तल के पार्टी छोडऩे की चर्चा पहले से चल रही थी, लेकिन पाठक के भी साथ होने से छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक के आप नेता आश्चर्यचकित हैं। कहा जा रहा है कि डॉ. पाठक ने राघव चड्डा से दोस्ती के चलते पार्टी छोड़ी है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी में शुक्रवार को बड़ी टूट हुई। पार्टी के तीन राज्यसभा सदस्य राघव चड्डा, अशोक मित्तल और डॉ. संदीप पाठक ने आप से नाता तोडक़र भाजपा में शामिल हो गए। तीनों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की। चार और राज्यसभा सदस्यों के पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं।
फिलहाल जिन तीन राज्यसभा सदस्यों ने पार्टी छोड़ी है, उनमें डॉ. पाठक के जाने को लेकर सबसे ज्यादा हैरानी जताई जा रही है। राघव चड्डा का नाम दिल्ली के शराब घोटाले में चर्चा में रहा है और वे पिछले दो साल से पार्टी से अलग-थलग चल रहे थे। इसी तरह लवली यूनिवर्सिटी के मालिक अशोक मित्तल के यहां इसी माह ईडी की रेड पड़ी थी।
ऐसा माना जा रहा है कि चड्डा और अशोक मित्तल ने कानूनी उलझनों से बचने के लिए पार्टी छोड़ी है, जबकि डॉ. पाठक के साथ ऐसी कोई समस्या सामने नहीं थी।
छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के बटहा गांव के निवासी डॉ. संदीप पाठक आप के थिंक टैंक माने जाते रहे हैं। कैंब्रिज से पीएचडी करने के बाद वे दिल्ली आईआईटी में एसोसिएट प्रोफेसर रहे। अन्ना आंदोलन के दौरान उनका संपर्क अरविंद केजरीवाल से हुआ।
बताते हैं कि डॉ. पाठक को डेटा-तकनीक आधारित चुनाव प्रबंधन में महारत हासिल है, जिसे उन्होंने पंजाब में साबित भी किया। यही वजह रही कि पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। हालांकि अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ में वे कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए। उनके प्रभारी रहते यहां पार्टी के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी।
डॉ. पाठक पार्टी के लिए कितने अहम थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे नेता जेल में थे, तब पार्टी की गतिविधियां वे ही संभाल रहे थे। वे केजरीवाल से नियमित रूप से मिलते थे और दिल्ली व पंजाब सरकारों के बीच सेतु का काम कर रहे थे।
और अब पार्टी छोडऩे के पीछे जो बात सामने छनकर सामने आई, उसके मुताबिक राघव चड्डा ने डॉ पाठक को पार्टी छोडऩे के लिए तैयार किया। दोनों के बीच गहरी छनती है। यही वजह है कि डॉ. पाठक ने राघव चड्डा का अनुकरण किया। अब भाजपा उनका क्या उपयोग करती है, यह तय नहीं है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस या दूसरे दल से छोडक़र भाजपा में आए हैं उनमें अकेले सौरभ सिंह, और धर्मजीत सिंह ही भाजपा के मुख्य धारा में हैं बाकी सभी हाशिए पर चले गए हैं। डॉ. पाठक वैसे भी जमीनी नहीं है, ऐसे में पार्टी उनका क्या उपयोग करती है, इस पर चर्चा हो रही है। उनके राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने में दो साल बाकी है। ऐसे में भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि वो पंजाब में उपयोगी साबित हो सकते हैं, जहां अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। यहां वो माईक्रो लेवल तक बूथ प्रबंधन देखते रहे हैं। देखना है कि डॉ. पाठक का आगे क्या कुछ होता है।
रेत के धंधे में फिर खून-खराबा

रेत का कारोबार पर्यावरण को ही छलनी-छलनी नहीं कर रहा है, अब यह समाज के कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर संकट का मामला बनता जा रहा है। जांजगीर-चांपा जिले के करही में जिस तरह से घर के भीतर नकाबपोशों ने घर के भीतर घुसकर गोलियां बरसाई और एक रेत कारोबारी की हत्या कर दी, उसके भाई को घायल कर दिया, वह पिछले कुछ समय से हिंसक होते जा रहे इस व्यवसाय की ही अगली खतरनाक कड़ी है। इस घटना के दो दिन पहले ही इसी जिले के मरघट्टी गांव में ग्रामीणों ने अवैध रेत खनन के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने करीब दर्जन भर गाडिय़ों को रोक लिया था। कानून-व्यवस्था बिगडऩे के डर से हड़बड़ाए प्रशासन ने वहां जाकर जब्ती की कार्रवाई की। करीब एक साल पहले मई 2025 में बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के सनावल इलाके में पड़ोसी राज्य झारखंड के रेत माफियाओं ने एक पुलिस जवान शिवबचन सिंह को घसीट-घसीट कर मार डाला था। बीते सप्ताह मुंगेली जिले के लोरमी इलाके में चार वनरक्षक मारपीट से बुरी तरह घायल हो गए। उन्होंने अफसरों को रिपोर्ट दी कि वे रेत माफियाओं को पकडऩे गए थे, तब उन पर हमला किया गया। बाद में काउंटर शिकायत हुई तब पता चला कि वनकर्मियों की शह पर ही रेत का खनन हो रहा था, लेन-देन के विवाद में उनकी धुनाई हो गई। इसी तरह प्रदेश के अलग-अलग हिस्से में गरियाबंद, धमतरी, रायगढ़, जगदलपुर की घटनाएं गिनाईं जा सकती हैं। रेत कारोबारियों के आदमियों ने न केवल प्रतिद्वन्द्वियों पर बल्कि ग्रामीणों, अफसरों यहां तक कि पत्रकारों पर भी हमले किए हैं।
रेत से मुनाफा निकालने की यह होड़ नदियों का जो हाल कर रही है वह तो अपनी जगह है, मानवीय संवेदनाओं के लिए भी जगह नहीं बची है। तीन साल पहले तीन लड़कियों की अवैध रेत खदान जो पानी आ जाने के कारण दिखाई नहीं दे रही थी, अरपा नदी में डूब जाने से मौत हो गई थी। अभी कुछ दिन पहले रतनपुर इलाके में एक नाबालिग की मौत हुई थी। ट्रैक्टर चालक ने बताया कि वह वाहन की चपेट में आ गया। पर बाद में हुई जांच से पता चला कि उनकी मौत रेत की खुदाई के दौरान दब जाने से हुई थी।
छत्तीसगढ़ सरकार ने रेत खनन को नियंत्रित करने और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने के लिए हाल ही में एक नई नीति लागू की है। पुरानी नीति में कई बदलाव हैं। जैसे अब केंद्र और राज्य सरकार के उपक्रमों के लिए अलग से रेत खदानों को आरक्षित किया जाएगा। खदानों की नीलामी ई ऑक्शन और रिवर्स ऑक्शन पोर्टल के जरिये किया जाएगा। जुर्माना पहले 50 हजार रुपये तक था, जिसे बढ़ाकर अब 5 लाख रुपये कर दिया गया है। खदानों की जीपीएस ट्रैकिंग और अब कहीं-कहीं ड्रोन से निगरानी की बात भी कही गई है। पर ये सब तब हो जब राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण कारोबार से जुड़े लोगों को मिलना बंद हो। राजनीतिक दलों से जुड़े लोग खुद ही इस धंधे में लगा है। सत्ता के पास कुछ ज्यादा हिस्सा है, विपक्ष के पास कुछ कम। नई नीति में सरकार ने अपना राजस्व भी कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। गौण खनिज में पिछले सालों में उसकी आय 15-20 करोड़ ही रही है। खदानों की संख्या भी 200 से बढ़ाकर 300 कर दी गई है। पर नीतियों को लागू करने वाले वही खनिज, वन विभाग के अफसर हैं, जिनको प्रभावशाली कारोबारियों के साथ मिलजुल कर रहना है। रेत के धंधे में मुनाफे की मची होड़ जिस तरह से खून-खराबे तक पहुंच रही है, वह जरूर अपने प्रदेश के लिए चिंता की बात है।
चुनाव और कैरम क्लब का रिश्ता !
वैसे तो इस समय पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, मगर भाजपा की उत्सुकता असम और पश्चिम बंगाल को लेकर ज्यादा है। दोनों ही जगहों पर भाजपा की संभावनाएं दिख रही हैं, हालांकि पश्चिम बंगाल में कांटे की टक्कर मानी जा रही है। चुनाव प्रचार से जुड़े लोग मानते हैं कि यहां के चुनाव में कैरम क्लब अहम भूमिका निभा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में लगभग हर पंचायत और बड़े मोहल्लों में कैरम क्लब हैं, जहां बड़ी संख्या में युवा कैरम खेलते नजर आते हैं। इन क्लबों को टीएमसी सरकार से अनुदान भी मिलता है, और क्लब से जुड़े युवा एक तरह से टीएमसी के कार्यकर्ता बन चुके हैं। पिछले चुनाव में भी उन्होंने टीएमसी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। अब भाजपा के रणनीतिकार इन कैरम क्लबों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में भी भूपेश सरकार ने पंचायत स्तर पर राजीव मितान क्लब की स्थापना की थी। इन क्लबों को सालाना एक लाख रुपये का अनुदान मिलता था। सरकार को उम्मीद थी कि क्लब से जुड़े युवा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में काम करेंगे, लेकिन चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भाजपा सरकार ने आते ही राजीव मितान क्लब को भंग कर दिया।
सरकार से हटने के बाद भूपेश बघेल ने इन क्लबों से जुड़े युवाओं को अपने साथ जोडऩे की कोशिश की। इस सिलसिले में एक बैठक भी हुई, लेकिन उन पर पार्टी के समानांतर संगठन खड़ा करने के आरोप लगे। इसके बाद से राजीव मितान क्लब की गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई हैं।
अब पश्चिम बंगाल में कैरम क्लब क्या भूमिका निभाते हैं, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
मंत्रालय में चाय 25 रुपए कप ?
पिछले दिनों हमने इसी कालम में बताया था कि 1 मई से मंत्रालय महानदी भवन में इंडियन काफी हाउस के दोसे, सांबर बड़ा और काफी नहीं मिलेगी। मंत्रालय अधीक्षण शाखा ने देश में आईसीएच कैंटीन का अनुबंध बदलकर एक निजी होटल गु्रप को दे दिया है। देश में सहकारिता के सबसे सफल उदाहरणों में से एक, आईसीएच, नो प्राफिट नो लॉस के सिद्धांत पर रियायती दरों पर कारोबार करता है। अब निजी होटल गु्रप का ईप्सी कैटरिंग यह कैंटीन चलाएगा। रसोई संभालने से पहले ही रेट को लेकर मंत्रालय के गलियारों में जो हवा बह निकली है उसके मुताबिक तो एक आम व्यक्ति और कर्मचारी के लिए चाय पीने का आग्रह भी भारी पडऩे वाला है। अधिकारी कर्मचारियों के वाट्सएप गु्रप में इस महंगाई पर चुटकी और ठेका देने वाले अफसर पर गुस्सा पढ़ा जा सकता है। (वैसे बता दें कि जिन अफसर ने यह कांट्रेक्ट बदला उनका तबादला हो गया है)---
खबर है कि कॉफी हाउस इस महीने के अंत में बंद हो रहा है और जो नया आ रहा है, उसके रेट की चल रही चर्चा के मुताबिक, चाय 25 रुपए कप रह सकती है! इस हिसाब से साधारण कर्मचारी चाय पीने से पहले सोचेंगे। मंत्रालय के आसपास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है कि वहां जाकर खा-पी सकें। संघ को इस मुद्दे पर बीच में आना चाहिए। क्योंकि ये कर्मचारियों मूलभूत हित की बात है। यह रेट रेलवे स्टेशन से भी महंगा है।
कर्मचारियों का कहना है कि आईसीएच, अपने काम और नाम से जाना जाता है। इसका कांट्रेक्ट बदलने से सभी को बहुत सी समस्या होगी। क्योंकि यहां रियायती दर पर अच्छी चीज मिल जाती है। कर्मचारी संघ को हस्तक्षेप कर रोकना होगा। मंत्री, आला अधिकारियों की फ्री वाली पर्ची वाले स्टाफ को छोडक़र।
एक ने सुझाव दिया कि सिर्फ संसद भवन जैसी कैंटीन हर दस किलोमीटर पर खुलवा दीजिये, सारे लफड़े खत्म-29 रुपये में भरपेट खाना मिलेगा। 80 प्रतिशत कर्मचारियों को लोगों को घर चलाने का लफड़ा खत्म..ना सिलेंडर लाना, ना राशन,और घर वाली भी खुश, चारों तरफ खुशियाँ ही रहेगी। फिर हम कहेंगे सबका साथ सबका विकास।
इस पे गौर करें- कृपया कड़ी मेहनत से प्राप्त हुई ये जानकारी मंत्री और अधिकारियों तक पहुंचाने की कोशिश करें। यह भी लिखा कि शान है या छलावा..,पूरे भारत में एक ही जगह ऐसी है जहां खाने की चीजें सबसे सस्ती है।
चाय = 1.00, सूप = 5.50, दाल= 1.50, खाना =2.00, चपाती =1.00, चिकन= 24.50, डोसा = 4.00, बिरयानी=8.00, मच्छी= 13.00
ये सब चीजें सिर्फ माननीयों के लिए है और ये सब उपलब्ध हैं भारतीय संसद की कैंटीन में, और माननीयों की पगार है 1,50,000 रुपये महीना वो भी बिना इनकम टैक्स के।
ई-चालान सिर्फ खजाना भरने का औजार है?

ई-चालान के नाम पर दोपहिया और चार पहिया निजी वाहन चालकों को 500 से 5000 रुपये तक के चालान आसानी से पहुंच रहे हैं। कई कामकाजी लोग, जिनके लिए दोपहिया वाहन रोजी-रोटी का साधन है, मामूली चूक पर यातायात विभाग की तीसरी नजर का शिकार हो रहे हैं। चालान सीधे मोबाइल पर आ जाता है और दबाव बढ़ाने के लिए रजिस्टर्ड डाक से अलग से नोटिस भेज दी जाती है। लेकिन आम लोगों से भी ज्यादा परेशानी व्यावसायिक वाहन चालकों और परिवहन व्यवसायियों को हो रही है। उन पर निजी वाहनों की तुलना में कई गुना अधिक चालान काटे जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ यातायात महासंघ ने इस एकतरफा तरीके पर सख्त आपत्ति जताई है। जिलों में क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों और कलेक्टरों को ज्ञापन सौंपते हुए उन्होंने कहा है कि बिना किसी सुनवाई के ऑनलाइन चालान जारी करना और भुगतान न करने पर एकतरफा दंडित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। एक बार का चालान अब 5 से 7 हजार रुपये से कम नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि बीमा, फिटनेस, परमिट, वर्दी और ओवरसीटिंग जैसे पुराने जुर्मानों का बोझ पहले से ही भारी था। अब कैमरों के जरिए कट रहे ई-चालान ने व्यावसायिक वाहन चालकों पर आर्थिक दबाव को और बढ़ा दिया है। महासंघ ने चेतावनी दी है कि यदि इस व्यवस्था पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो वे चक्का जाम और धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
आंकड़े बोल रहे हैं कि ई चालान की स्थिति देश में क्या है। वर्ष 2019 से 2024 तक देशभर में ई-चालान के जरिए 64 हजार करोड़ रुपये से अधिक के चालान जारी किए गए। इनमें से मात्र 12 हजार 632 करोड़ रुपये ही वसूल हो पाए। केवल वर्ष 2025 में 5.16 हजार करोड़ रुपये के चालान जारी हुए, जिनमें से 64 प्रतिशत से अधिक राशि अब तक वसूल नहीं हो सकी है।
इसका सीधा मतलब है कि चालान काटने का काम तो कैमरों को सौंप दिया गया, लेकिन वसूली के लिए न स्टाफ है, न पर्याप्त संसाधन। नोटिस में लिखा जाता है कि समय पर भुगतान न करने पर मामला कोर्ट भेज दिया जाएगा, लेकिन वहां तो लाखों मुकदमे पहले से पड़े हैं। इस तरह अदालतों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं हो रहा है।
सच्चाई यह है कि ये कैमरे सिर्फ शहरों के प्रमुख चौक-चौराहों, टोल प्लाजा और हाईवे की कुछ टर्निंग्स पर ही लगे हैं। उसके बाद सैकड़ों किलोमीटर लंबी सडक़ों पर न कैमरे हैं, न पर्याप्त पेट्रोलिंग। रात के समय तो स्थिति और भी बदतर है। गलत पार्किंग, ओवरस्पीडिंग, रॉंग साइड ड्राइविंग और मालवाहक वाहनों में सवारियां ढोने जैसे गंभीर उल्लंघन इन पैट्रोलिंग-रहित इलाकों में हो रहे हैं, जिसके कारण छत्तीसगढ़ में ही बड़ी-बड़ी सडक़ दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।
चालान काटने के लिए कैमरे और फोर्स तो सिर्फ सुविधाजनक जगहों पर तैनात किए जा रहे हैं। अगर हर साल पचासों हजार करोड़ रुपये के चालान काटे जा रहे हैं, तो कम से कम इन पैसों का कुछ हिस्सा यातायात सुरक्षा पर खर्च करके सडक़ों पर सही तैनाती की जानी चाहिए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईवे के किनारे भारी वाहनों की अनियंत्रित पार्किंग पर सख्त टिप्पणी की है और राज्यों को निर्देश दिए हैं कि इस पर तुरंत कार्रवाई हो। अदालत ने पाया कि इसी वजह से भीषण दुर्घटनाएं हो रही हैं। दुर्भाग्य से ई-चालान की मौजूदा व्यवस्था सिर्फ सरकारी खजाना भरने का जरिया बनकर रह गई है। इससे जो राशि इक_ा हो रही है, वह सडक़ सुरक्षा, बेहतर यातायात प्रबंधन या दुर्घटना रोकथाम पर खर्च नहीं हो रही है। यातायात महासंघ ने आवाज उठाकर एक शुरुआत की है। लोगों को लगना चाहिए कि जब वे भारी भरकम चालान पटा रहे हैं तो उनकी बात सुनी जाए, चालान की राशि न्याय संगत होनी चाहिए, सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बनाया जाए।
टीएमसी के निशाने पर सौरभ सिंह

पश्चिम बंगाल में गुरुवार को पहले चरण के मतदान के बीच टीएमसी की तेज तर्रार नेत्री, और सांसद महुआ मोइत्रा के ट्वीट की राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा रही। महुआ ने छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त खनिज निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह की कुछ लोगों के साथ बतियाते तस्वीर साझा की। यह तस्वीर कोलकाता के एक होटल की बताई जा रही है, और महुआ का आरोप है कि सौरभ ‘वितरण’ कार्य कर रहे हैं। वो क्या वितरण कर रहे थे, यह तो टीएमसी सांसद ने स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन पैसों के वितरण का हल्ला उड़ रहा है।
महुआ ने सौरभ सिंह को लेकर लिखा कि यह बंगाल है, और नितिन नबीन भी आपको नहीं बचा पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा बंगाल में चुनाव के बाद धांधली करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तय है।
चर्चा है कि महुआ के ट्वीट के बाद छत्तीसगढ़ के कई भाजपा नेताओं ने सौरभ सिंह से बात भी की है। सौरभ सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के करीबी माने जाते हैं, और वो बंगाल में पार्टी का चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। यही वजह है कि वो विरोधी दल टीएमसी के आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। यद्यपि सौरभ सिंह के खिलाफ पैसों के वितरण की बात सामने नहीं आई है। मगर वो महुआ जैसे कई नेताओं के निशाने पर हैं। इससे सौरभ बेपरवाह है, और वो अपना काम बेहतर ढंग से करने में जुटे हुए हैं।
चर्चा है कि पश्चिम बंगाल के नतीजे चाहे जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि इस पूरे घटनाक्रम में सौरभ सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में जरूर ला दिया है। ऐसे में सौरभ को देर सबेर राष्ट्रीय स्तर का कोई दायित्व मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सचिन एक नई चुनौती छोडक़र गए...
क्रिकेट के शिखर पुरुष, भारत रत्न सचिन तेंदुलकर का बस्तर आना सेलिब्रिटी विजिट जैसा नहीं था। यह संयोग ही है कि जब नक्सलवाद का लगभग खात्मा हो चुका है, बंदूकों की गूंज थम रही है, यहां के मैदानों में बल्ले की धमक सुनाई देगी। जो 50 मैदान तैयार किए गए हैं उनमें केवल क्रिकेट ही नहीं, बल्कि वालीबॉल, फुटबॉल और तीरंदाजी, दौड़ जैसे एथलेटिक्स के लिए भी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। तेंदुलकर ने अपनी खेल अकादमी और सामाजिक पहल के लिए बस्तर का चयन सही मौके पर किया है। यहां की नैसर्गिक प्रतिभाओं ने माओवादी हिंसा के बीच भी काफी नाम कमाया है और अब उनके शारीरिक कौशल और ऊर्जा को सामने लाने का और बेहतर मौका मिलेगा।
इससे जुड़ी कुछ बातें दिलचस्प हैं। उन्होंने तीन साल पहले कहा था कि जो गांव अपने यहां के मैदान को सबसे अच्छे तरीके से संवारेगा, उससे मिलने वे स्वयं पहुंचेंगे। छिंदनार के युवाओं ने उनकी चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने श्रमदान करके एक समतल मैदान तैयार किया, बल्कि बड़ी मेहनत से रखरखाव करते हुए घास का मैदान तैयार किया। सचिन उनसे प्रभावित हुए। वे खुद छिंदनार तो नहीं जा सके लेकिन छिंदनार के युवाओं से उन्होंने आत्मीयता के साथ मुलाकात की।
अब सचिन ने अपना वह वादा पूरा कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बस्तर के खिलाड़ी युवाओं के लिए वे विश्व स्तर की बुनियादी ढांचा तैयार करेंगे लेकिन असल सवाल यहीं से शुरू होता है। स्ट्रक्चर अपने यहां सरकारी तौर पर खूब तैयार होते रहे हैं। बड़े-बड़े इनडोर, आउटडोर स्टेडियम बनते हैं, कैंपस, उद्यान तैयार किए जाते हैं पर रखरखाव और मेंटनेंस के अभाव में एक समय के बाद वे खंडहर में बदल जाते हैं। सचिन ने अपने वक्तव्य में कहा है कि खेल समितियों, जिला प्रशासन और उनके अपने फाउंडेशन की साझा निगरानी के जरिये उद्देश्यों को पूरा किया जाएगा। रखरखाव सही रहा तो बस्तर से हमें क्रिकेट ही नहीं दूसरे खेलों के भी बड़े-बड़े सितारे मिलेंगे, बस्तर स्पोर्ट्स हब के रूप में विकसित होगा, जो आखिरकार पर्यटन, अर्थव्यवस्था और रोजगार में भी मदद करेगा।
अब गेंद छत्तीसगढ़ सरकार, स्थानीय संगठनों और नागरिकों के पाले में है। इन सुविधाओं का लाभ निरंतर मिले इसके लिए रखरखाव, बिजली-पानी, सुरक्षा की निरंतरता जरूरी है। दूर-दराज से प्रतिभाओं को ढूंढकर लाना और उन्हें पर्याप्त साधन उपलब्ध कराते हुए इन केंद्रों में प्रशिक्षण देना होगा। खासकर, खेल व शिक्षा विभाग के अफसरों को समझना होगा कि यह सरकारी ढांचा नहीं है। इसके पीछे एक महान खिलाड़ी की खून पसीने से कमाई हुई राशि और भावनाएं जुड़ी हैं।
प्रताडऩा की एक और शिकायत
पुलिस महकमे में प्रताडऩा की शिकायतें आम होती जा रही हैं। हाल ही में आईजी रतनलाल डांगी को भी निलंबित किया गया है, जिन पर यौन उत्पीडऩ के आरोप लगे हैं। अब एक और पुलिस अफसर के खिलाफ शिकायत सामने आई है। हालांकि इस मामले में अब तक कोई औपचारिक कागजी कार्रवाई नहीं हुई है, और इसे आंतरिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश जारी है।
मामला मैदानी इलाके के एक जिले का बताया जा रहा है, जहां एसएसपी स्तर के एक अफसर पर प्रताडऩा के आरोप लगे हैं। खास बात यह है कि ये आरोप किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसी जिले में पदस्थ एक महिला डीएसपी ने लगाए हैं।
बताते हैं कि एसएसपी पर पहले भी खराब बर्ताव को लेकर शिकायतें रहीं हैं। मगर इस बार महिला डीएसपी के सामने आने से मामला गंभीर हो गया है। महिला डीएसपी ने आईजी से मुलाकात कर अपनी शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि एसएसपी बैठकों के दौरान उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं और उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
महिला डीएसपी ने यह भी बताया कि वह एसएसपी के व्यवहार से आहत हैं और इस कारण काम करने में असमर्थ महसूस कर रही हैं। चर्चा है कि आईजी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसएसपी को सख्त हिदायत दी है। फिलहाल आईजी के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत होता नजर आ रहा है, और महिला डीएसपी एक महीने के अवकाश पर चली गई हैं। देखना है आगे क्या होता है।
इस आदेश की जरूरत क्यों पड़ी?

नौकरी के साथ साथ नेतागिरी नहीं चलेगी, यानी दलीय राजनीति में सक्रिय कर्मचारियों पर कार्यवाही की जाएगी। सामान्य प्रशासन विभाग का यह आदेश मंत्रालय से जिलों तक अग्रेषित किया गया था। कल जारी इस आदेश से कर्मचारियों में हलचल बढ़ गई थी। सब इस पर नाराजगी जता रहे थे। वो यह भी टटोल रहे हैं कि ऐसी क्या स्थिति निर्मित हो गई कि सामान्य प्रशासन विभाग को ऐसा पत्र जारी करना पड़ा.? मगर देर रात विरोध के बाद आदेश को निरस्त भी कर दिया गया।
चर्चा है कि सरकार को ऐसा कोई संकेत और खुफिया रिपोर्ट मिली है कि नया रायपुर के मंत्रालय/ संचालनालय पुलिस मुख्यालय/ अरण्य भवन/ की सूचनाएं बाहर निकल रही हैं जो विपक्ष के हाथ लग रही हैं। जीएडी और इंटेलिजेंस विंग ने ऐसे लोगों को चिन्हित करते हुए ताकीद स्वरूप यह प्रारंभिक आदेश जारी किए थे। भविष्य में यह बदस्तूर जारी रहा तो उन पर कार्यवाही भी तय है।
बताया जा रहा है कि एक अकादमी में अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर ऐसे ही एक गोपनीय प्रस्ताव मंत्रालय से निकल कर पार्टी और समाज में वायरल होने पर जमकर बवाल हुआ था। प्रदेश और शीर्ष नेतृत्व तक शिकायत-सफाई के दौर चले। और अरसे बाद नियुक्ति हो सकी। वैसे किसी न किसी कर्मचारी अधिकारी की कोई ना कोई पार्टी, नेताओं के साथ आस्था, विचारधारा जुड़ी होती है तभी तो शासन के आदेशों की गोपनीय पत्र की जेरोक्स कॉपी बाहर निकल रही है। जबकि यह आदेश जीएडी के ऑफिशियल वेबसाइट में आज तक अपलोड नहीं है। यह पत्र भी बाहर ओपन सीक्रेट हो गया। और देर रात 11 बजे जीएडी ने आदेश को स्थगित कर दिया। चर्चा है कि रात सरकार की ओर से जीएडी अफसरों पर नाराजगी जताई गई। इस पर पहले तो अफसरों ने कहा कि यह सालाना जारी किया जाने वाला नियमित स्मरण पत्र है। जब बात बिना पूछे जारी करने की आई तो उसे भी वापस लेने पर सहमति दी गई। आज जब आदेश वापस लिया गया।
अधिकारी कर्मचारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा का कहना था कि इस आदेश का विरोध सचिव सामान्य प्रशासन एवं उप सचिव से व्हाट्सएप के माध्यम से किया था। भविष्य में इस आदेश का विरोध हर स्तर पर करने का लेख किया था। इसके बाद आदेश को वापस लेना पड़ा।
बंगाल में झालमुड़ी फैक्टर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। पहले चरण की 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। इन सीटों पर छत्तीसगढ़ के बड़ी संख्या में नेता प्रचार में जुटे रहे, जिन्हें चुनाव आयोग के नियमों के तहत मतदान से 48 घंटे पहले क्षेत्र छोडऩा होगा। ऐसे में कई नेता अब आसपास के उन जिलों में शिफ्ट हो रहे हैं, जहां दूसरे चरण में मतदान होना है। इस सियासी माहौल के बीच ‘झालमुड़ी’ भी चर्चा का केंद्र बन गई है।
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में पिछले दो महीनों से सक्रिय छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा का कहना है कि मतदाता खामोश है और माहौल कुछ वैसा ही नजर आ रहा है, जैसा कभी वाम मोर्चा सरकार को हराकर टीएमसी के पहली बार सत्ता में आने के दौरान था। नीलू शर्मा इस बार भाजपा के पक्ष में माहौल बनने का दावा कर रहे हैं।
इस बीच सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी कोलकाता के पास झाडग्राम में एक गुमटी पर रुककर झालमुड़ी खाते नजर आए। इस सहज अंदाज ने राजनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ चुनावी माहौल में एक अलग रंग भी जोड़ दिया है।
बंगाल में प्रचार कर रहे भाजपा नेताओं का दावा है कि पीएम के झालमुड़ी खाते दिखने से आम लोगों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक संदेश गया है। पार्टी कार्यकर्ता इस वीडियो को बड़े पैमाने पर शेयर कर रहे हैं और इसे व्यापक प्रतिक्रिया मिल रही है। हालांकि ‘झालमुड़ी फैक्टर’ का वास्तविक चुनावी असर क्या होगा, यह तो नतीजों के बाद ही साफ होगा, लेकिन फिलहाल भाजपा कार्यकर्ता उम्मीद से हैं।
फिलहाल झालमुड़ी बेचने वालों की चाँदी है, लोग हँसी-मजाक में भी झालमुड़ी खा-खिला रहे हैं।
दूसरे अवसर में रूचि नहीं...
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं बोर्ड परीक्षा में अपने प्राप्तांको से छात्र क्या संतुष्ट हैं? जबकि कुल 25 लाख में से 14 लाख विद्यार्थियों को कंपार्टमेंट (पूरक) आया है। खासकर उत्तीर्ण विद्यार्थियों ने दूसरे अवसर की परीक्षा पर ज्यादा रूचि नहीं दिखाई है। इसके लिए फार्म भरने की अवधि खत्म होने को है। इसे नया रुझान माना जा रहा है।
जो छात्र पहले मई में होने वाली दूसरी परीक्षा में बैठकर अपने अंक सुधारना चाहते थे, अब वे इससे पीछे हट रहे हैं। सीबीएसई में दूसरे अवसर की परीक्षा का पहला वर्ष है। छत्तीसगढ़ बोर्ड ने तो 24-25 में ही लागू कर दिया था।
कई स्कूलों ने विद्यार्थियों से दोबारा फीडबैक लेने के लिए नए आदेश जारी किए हैं। इसमें पूछा जा रहा है कि कितने विद्यार्थी अब भी दूसरी परीक्षा देना चाहते हैं। स्कूलों का कहना है कि बेहतर परिणाम के कारण इस बार दूसरी परीक्षा के लिए आवेदन करने वालों की संख्या कम रह सकती है।
नई व्यवस्था के तहत फरवरी-मार्च में पहली परीक्षा अनिवार्य थी, जबकि मई में दूसरी परीक्षा सुधार या कम्पार्टमेंट के लिए है। बेस्ट ऑफ टू (दो में से सर्वश्रेष्ठ) नियम के कारण विद्यार्थियों को जोखिम नहीं है, क्योंकि दोनों में से बेहतर अंक ही अंतिम परिणाम में जोड़े जाएंगे।
इसके बावजूद, जिन विद्यार्थियों के अंक पहले ही अच्छे आ चुके हैं, वे दो माह अतिरिक्त तैयारी के दबाव से बचना चाहते हैं। स्कूलों का मानना है कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों में कुछ विद्यार्थी अब भी दूसरा मौका ले सकते हैं, लेकिन कुल संख्या सीमित रहेगी। वहीं, अधिकतर विद्यार्थी परिणाम के बाद सीधे कक्षा 11वीं में प्रवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सड्डू स्थित एक निजी स्कूल के प्राचार्य ने कहा कि उनके स्कूल में परीक्षाएं शुरू होने से पहले कुल छह बच्चों ने दूसरी बोर्ड परीक्षा का फार्म भरा था, लेकिन इसमें से तीन बच्चों ने वापस ले लिया है। अन्य तीन की काउंसलिंग की गई है, उम्मीद है वो भी फार्म से अपना नाम वापस लेंगे। बच्चों ने जब इस विकल्प के संबंध में पूछताछ की तो शिक्षकों ने ही सेकंड अटेप्ट से मना किया। कहा पहली में ही मजबूत तैयारी कर लें।
सड्डू स्थित एक अन्य बड़े निजी स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि कुल चार बच्चों ने फार्म भरा था। इसमें दो टॉप स्कोरर थे। उनके 93 प्रतिशत से अधिक अंक थे, उनकी काउंसलिंग की गई, जिसके बाद उन्होंने अपना नाम दूसरी बोर्ड परीक्षा से वापस ले लिया ।
दूसरी बोर्ड परीक्षा मई में होगी लेकिन ये हर किसी के लिए जरूरी नहीं है। केवल वही विद्यार्थी बैठेंगे, जिन्हें वाकई अंक सुधारने की जरूरत है या किसी विषय में पास होना है। विद्यार्थी इसमें तीन विषयों तक अपने अंक सुधार सकते हैं। इसमें विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषा विषय शामिल है। दोनों परिणाम से सामने आए बेहतर अंक ही जोड़े जाएंगे, यानी जोखिम नहीं सिर्फ फायदा। और इसका परिणाम जून में आएगा। और तभी अंतिम मार्कशीट और पासिंग सर्टिफिकेट दूसरे चरण के बाद जारी होंगे। तब तक छात्र पहले चरण के अंकों के आधार पर भी 11वीं में दाखिला ले सकते हैं, दूसरे चरण का इंतजार जरूरी नहीं।
प्री-वेडिंग शूट, पर्यटन का नया प्रयोग
अपने यहां प्री-वेडिंग शूट शादी की रीति-रिवाजों का हिस्सा कभी नहीं रहा। मगर, पिछले दो दशकों में सिनेमा, टेलीविजन और सोशल मीडिया के असर ने इसे आधुनिक शादियों का एक जरूरी अंग बना दिया है। आज यह ट्रेंड महानगरों की चकाचौंध से निकलकर छत्तीसगढ़ के छोटे कस्बों और दूरदराज के गांवों तक पहुंच चुका है। दिलचस्प है कि जहां शादी की मुख्य रस्में आज भी पुरानी मान्यताओं के अनुसार होती हैं, वहीं परिवार के बुजुर्ग भी इस आधुनिक बदलाव के मामले में लचीला रुख रखते हैं। शादी से पहले संगीत और नाच-गाने के बीच इन वीडियो की स्क्रीनिंग अब एक अलग समारोह बन चुका है। वेडिंग इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, प्री-वेडिंग शूट देश भर में सालाना 3 से 4 लाख करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा है।
अपने यहां इस चलन का एक दूसरा पहलू भी है। राज्य के कुछ सामाजिक संगठनों ने इसे अनुचित बताते हुए इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए हैं। उनका तर्क है कि विवाह से पहले वर-वधू की ऐसी नजदीकी और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन सामाजिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। हालांकि, इन पाबंदियों का खास असर नहीं दिखा है और युवाओं के बीच प्री-वेडिंग शूट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
शायद, इस बढ़ते क्रेज को देखते हुए ही छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड ने कोरिया, बैकुंठपुर स्थित अपने रिसॉर्ट को प्री-वेडिंग शूट के लिए खोल दिया है, जिसके लिए निर्धारित शुल्क लिया जाएगा। गोवा, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों में ऐसा पहले से किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य राजस्व में वृद्धि करना और सरकारी संपत्तियों का बेहतर उपयोग करना बताया गया है।
प्री वेडिंग शूट स्थानीय फोटोग्राफरों, इवेंट प्लानर्स, टैक्सी ऑपरेटरों और होटल व्यवसायियों के लिए भी आमदनी के नए अवसर पैदा करता है। यदि इसी पहल को चित्रकोट, तीरथगढ़, सिरपुर, मल्हार और बारनवापारा जैसे पुरातात्विक, ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थलों तक और विस्तार दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ भी देश के नए वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में उभर सकता है। हालांकि, इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए केवल सजाया संवारा कॉटेज काफी नहीं है। राज्य में बुनियादी ढांचे की कमी एक बड़ी बाधा है। प्रमुख पर्यटन स्थलों तक पहुंचने वाली सडक़ें बदहाल हैं और ठहरने के लिए गुणवत्तापूर्ण व किफायती विश्राम गृहों का अभाव है। अन्य राज्यों के मुकाबले हमारे यहां होम-स्टे का चलन भी अभी शुरुआती दौर में है, जबकि बस्तर में इसके सफल प्रयोग ने इसकी क्षमता को सिद्ध किया है।
यदि सरकार और पर्यटन बोर्ड राजस्व बढ़ाने के लिए प्री-वेडिंग शूट जैसे आधुनिक रुझानों को बढ़ावा दे रहा है, तो उसे इसके लिए पीडब्ल्यूडी, एवियेशन, वन विभाग और सिंचाई विभाग के साथ समन्वय करना होगा ताकि बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाएं सुनिश्चित हो सकें। देखना होगा यह शुरूआत कोरिया में ही ठहर जाएगी, या राज्य में पर्यटन के विकास की नई संभावना के रूप में आकार लेगी।
वेदांता के चेयरमैन और रेलवे के...
.वेदांता पावर प्लांट, सिंघीतराई के हादसे में अब तक दो दर्जन मजदूरों की जान जा चुकी है। सरकार ने जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर कायम की है, उनमें कंपनी के चेयरमैन यानि मालिक अनिल अग्रवाल का नाम भी शामिल है। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, और भाजपा के ही दो जाने-माने नेताओं ने एफआईआर में उनका नाम होने पर सवाल खड़ा कर दिया है। पूर्व राज्यपाल किरण बेदी ने दावा किया कि हाल ही में उन्होंने कंपनी का दौरा किया और उनकी कार्यसंस्कृति को शानदार पाया। उन्होंने कहा कि वेदांता जैसी राष्ट्रीय संपत्ति को बदनाम न किया जाए। भाजपा सांसद नवीन जिंदल एक्स पर कहते हैं कि अनिल अग्रवाल का नाम एफआईआर में डालना गलत है, पहले जांच हो। वे सेल्फ मेड मैन हैं। एक दिलचस्प सवाल भी उन्होंने उठाया कि जब पीएसयू, यानि सार्वजनिक उपक्रम में या रेलवे में हादसे होते हैं तो चेयरमैन का नाम उसमें क्यों नहीं डाला जाता?
जिंदल का यह सवाल जायज लग सकता है, पर सही नहीं है। जवाब साफ है कि रेलवे केंद्र सरकार का एक उपक्रम है, जो रेलवे फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के दायरे में नहीं आता, जबकि वेदांता आता है। फैक्ट्रीज एक्ट की धारा 92 में स्पष्ट लिखा गया है- ऑक्यूपियर यानि मालिक और मैनेजर संयुक्त रूप से जिम्मेदार होंगे। दूसरी बात चाहे रेलवे के चेयरमैन हों, या रेल मंत्री ही क्यों न हों, वे रेलवे के मालिक नहीं हैं। वे सिर्फ अधिकारी या लोक सेवक होते हैं। मगर, किसी फैक्ट्री का चेयरमैन उसका मालिक होता है। रेलवे चेयरमैन तो एक सरकारी नौकर भी हो सकता है। कार्रवाई होती है, वहां भी बालासोर जैसी बड़ी दुर्घटना में कई शीर्ष अधिकारी निलंबित हुए। जबरन इस्तीफा ले लिया गया। रेल मंत्री से भी इस्तीफे की मांग हुई, पर यह नैतिकता का हवाला देते हुए मांगा गया, कानून का हवाला देते हुए नहीं।
अब एक दूसरे पहलू पर भी बात होनी चाहिए। वेदांता का बयान है कि हादसा सब-कांट्रेक्टर एनजीएसएल के मजदूरों के साथ हुआ। यानि वे वेदांता के मजदूर नहीं थे। वेदांता एक भारी जोखिम वाले कारखाने के संचालन का हिस्सा किसी ठेका कंपनी को दे दिया, और फिर उस कंपनी ने भी किसी को कोई हिस्सा ठेके पर दे दिया। एक तरफ फैक्ट्री मालिक कानून से सुरक्षा चाहते हैं, दूसरी तरफ अधिक मुनाफे के लिए ज्यादा प्रोडक्शन पर जोर देते हैं, दूसरी तरफ लागत कम रखने के लिए कंपनी में अपना स्थायी मजदूर नहीं रखते, काम ठेके पर किसी कंपनी को देते हैं। ठेका लेने वाली कंपनी भी इतनी बड़ी होती है कि वह और कई सब कांट्रेक्टर्स से काम कराती है। बॉयलर का नियमित इंस्पेक्शन, सेफ्टी वाल्व की चेकिंग, प्रेशर गेज की मरम्मत क्या वेदांता कंपनी के लोग खुद देख रहे थे, या फिर यह पेटी कांट्रेक्टर्स के हाथ में था? शायद जांच में यह सामने आए।
एक तरफ जिंदल और बेदी की सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश है, वहीं जांजगीर और कोरबा के सांसदों ने केंद्रीय मंत्रियों को पत्र लिखकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। अभी बिलासपुर के संभागायुक्त जांच कर रहे हैं।
वैसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 106 (लापरवाही से मौत) और 289 (मशीनरी से संबंधित लापरवाही) के तहत एफआईआर दर्ज हुई है, जिसमें अनिल अग्रवाल का नाम भी शामिल है। इनमें से पहली धारा में अधिकतम सजा पांच साल की है, दूसरी में 6 माह की। दोनों ही जमानती धाराएं हैं। इसलिए 24 मौतों के मामले में फिलहाल किसी को जेल नहीं होने वाली है।
सीडी प्रकरण में आगे क्या
चर्चित सेक्स सीडी प्रकरण में सीबीआई की विशेष अदालत में 6 मई को सुनवाई तय की गई है। इस मामले में पूर्व सीएम भूपेश बघेल को भी अदालत में पेश होना है।
प्रकरण से जुड़ा एक अहम पहलू यह है कि मुख्य आरोपी कैलाश मुरारका और विनोद वर्मा इन दिनों सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। विनोद वर्मा को कांग्रेस ने असम विधानसभा चुनाव में पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी दी थी, जहां वे कुछ समय तक सक्रिय भी रहे। जबकि कैलाश मुरारका पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं और भजन गायिका मैथिली ठाकुर के साथ मंच साझा करते नजर आए।
इस सेक्स सीडी प्रकरण को करीब 9 वर्ष बीत चुके हैं। आरोपियों की राजनीतिक सक्रियता जारी है, जबकि जिस पूर्व मंत्री राजेश मूणत का फर्जी वीडियो वायरल किया गया था, उन्हें अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। ऐसे में यह देखना होगा कि यह मामला आखिर कब तक अपने निष्कर्ष तक पहुंचता है।
पेट्रोल-डीजल को लेकर दावे

पश्चिम एशिया में जारी तनाव केबीच छत्तीसगढ़ में पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता को लेकर राहत भरे दावे किए जा रहे हैं। सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में न तो ईंधन की कमी है और न ही रसोई गैस की। रोजाना करीब 72 हजार एलपीजी सिलेंडर वितरित किए जा रहे हैं।
हालांकि जमीनी स्थिति इन दावों से अलग नजर आ रही है। आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी के संकेत मिल रहे हैं। होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर को कमर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति लगभग ठप हो गई है। कुल खपत का अधिकतम 20 प्रतिशत ही कमर्शियल सिलेंडर उपलब्ध कराने के निर्देश जारी किए गए हैं।
प्रदेश में पेट्रोल के दाम पहले ही एक रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद, मई महीने में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है।
ग्रामीण इलाकों में आपूर्ति पर अनौपचारिक पाबंदियां भी सामने आ रही हैं। पेट्रोल पंपों को एक व्यक्ति को अधिकतम 400 लीटर डीजल और 50 लीटर पेट्रोल ही देने के निर्देश दिए गए हैं। पहले किसान कृषि कार्यों के लिए ड्रम और जरीकेन में डीजल ले जाते थे, लेकिन अब इस पर रोक लग गई है। सरगुजा संभाग में पहले उपभोक्ता पंप उत्तर प्रदेश से डीजल मंगवाते थे, जहां वैट कम होने के कारण यह करीब 10 रुपये सस्ता पड़ता था। लेकिन अब वहां वैट बढऩे से यह विकल्प भी बंद हो गया है।
कुल मिलाकर संकेत यही हैं कि भले ही पश्चिम एशिया का संकट जल्द सुलझ जाए, सप्लाई चेन को पूरी तरह सामान्य होने में करीब छह महीने का समय लग सकता है। फिलहाल बाजार में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी। यह भी माना जा रहा है कि 4 मई को मतगणना से पहले ही कीमतों में इजाफा देखने को मिल सकता है।
अंग्रेजों का शिकारगाह..

इस समय छत्तीसगढ़ के अधिकांश शहरों में भीषण गर्मी का कहर जारी है। राजनांदगांव, बिलासपुर और रायपुर में लू चल रही है, तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका हो और सूरज की तपिश हर किसी को झुलसा रही हो, तब सूपखार बंगले की यह तस्वीर भी आंखों को ठंडक और मन को सुकून दे सकती है।
कान्हा टाइगर रिजर्व के सूपखार रेंज का यह बंगला भारत के सबसे अनोखे और विरासती फॉरेस्ट रेस्ट हाउसों में से एक है। 1910 में बना यह बंगला ब्रिटिश भारत के वायसराय का शिकारगाह हुआ करता था। इसकी सबसे बड़ी खासियत है उसका ऊंचा पिरामिड आकार का छप्पर। यह मोटी घास से बना है। पूरी छत हर तीन साल में बदल दी जाती है। आजादी के बाद भी यह अनोखा डिजाइन बरकरार रखा गया है। भारत में शायद ही कोई दूसरा फॉरेस्ट बंगला आज भी इस तरह के ऊंचे घास के छप्पर के साथ मौजूद हो।
बंगले की मोटी घास की छत और चूना-सुरखी की मोटी दीवारें गर्मियों में अंदर का तापमान बाहर की तुलना में काफी कम कर देती हैं। बाहर सूरज सब कुछ झुलसा रहा होता है, अंदर ठंडक बनी रहती है। वहीं सर्दियों में जब कान्हा में ठंड जोरों पर होती है, तब यह बंगला गर्म और आरामदायक आश्रय बन जाता है। बंगले में अभी भी ब्रिटिश काल के विशाल रस्सी से खींचे जाने वाले पुराने एंटीक पंखे काम की हालत में मौजूद हैं। एक कमरे में दो पंखे समानांतर भी लगे हैं।
सूपखार बंगला चीड़ और साल के घने जंगल के किनारे, विशाल सूपखार घास का मैदान के निकट है। इस मैदान पर जंगली हिरण, बारहसिंघा और अन्य वन्यजीव चरते दिख जाते हैं। बाघ और तेंदुए अक्सर इन जानवरों का पीछा करते हुए बंगले के आसपास घूमते रहते हैं।
केंद्रीय और पूर्व-मध्य भारत के अधिकांश पुराने फॉरेस्ट रेस्ट हाउसों के आसपास एक समय चीड़ के पेड़ लगाए जाते थे। हालांकि इन क्षेत्रों में पाइन के पेड़ अच्छी तरह फलते-फूलते नहीं हैं, वे बमुश्किल जीवित रहते हैं। कई पाइन सूख जाते हैं, लेकिन जो बच जाते हैं, वे बंगले को एक अनोखा और शांत वातावरण देते हैं।
नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...
ब्रिटिश राज के दौरान के भवनों, सडक़ों के नाम बदलने का क्रम जारी है। केंद्र सरकार ने पहले पीएम आवास और वहां जाने वाली सडक़ 9 रेस कोर्स का नाम बदला। अब यह लोक कल्याण मार्ग और निवास सेवा सदन कहलाता है। भले ही लोग बोलचाल में पीएम हाउस कहते हों। इसके बाद बारी आई केंद्रीय कार्यालय परिसरों नार्थ ब्लॉक, साऊथ ब्लॉक। जो अब एकीकृत रूप से कर्तव्य भवन के रूप में जाना जाता है। यह भवन जहां हैं उसे अंग्रेजियत भरा सेंट्रल विस्टा नाम दिया गया है! इसके बाद पिछले साल 25 दिसंबर को राज्यपाल निवास राजभवन को लोक भवन में बदला गया। अब तक देश के 28 राज्यों में यह नेम प्लेट बदला दिया गया है। राज्यों में तैनात गर्वनर्स के आवास को गर्वनर हाउस कहा जाता था। आजादी के बाद इन्हें राजभवन कहा जाने लगा।
बताया जाता है कि आजादी के बाद पहले गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने इनका नाम राजभवन रखा, लेकिन इसका कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता। किसने इन्हें राजभवन का नाम दिया था। फिर अब इन राजभवनों के नाम क्यों लोकभवन किए जा रहे हैं। इस बदलाव में क्या क्या बदलेगा।यह अब तक स्पष्ट नहीं किया जा सका है। नाम बदलने का अधिकार केंद्रीय गृह विभाग को होता है।
अब इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार अधिकारियों के निवास स्थल क्षेत्र सिविल लाइन्स और कैंटोनमेंट (छावनी )के नए नाम करण को लेकर भी कवायद कर रही है। आला अधिकारियों के ऐसे निवास क्षेत्र देश के हर बड़े मध्यम शहर में हैं। गूगल सर्च में पता चलता है कि ये नाम भी 19 वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे हैं। कंटोनमेंट या छावनी किस जमाने का नाम है यह स्पष्ट नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब ‘सिविल लाइंस’ का नाम बदलने का ज्यादा प्रभाव नहीं होगा, क्योंकि इन इलाकों की पहचान समय के साथ बदल चुकी है। हालांकि, सरकार का उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर भारतीय पहचान को मजबूत करना है।
जहां तक राजधानी रायपुर के सिविल लाइन में अब बड़े कलेक्टर एसपी जैसे बड़े अफसर रहते नहीं। इनके लिए आफिसर्स कालोनी देवेन्द्र नगर में नए बंगले हैं। अब सिविल लाइन में द्वितीय श्रेणी के दर्जन भर अफसर ही रहते हैं। यह इलाका अब सीएम हाउस का क्षेत्र कहलाने लगा है। छावनी सैन्य स्थल को कहा जाता रहा है। रायपुर में कंटोनमेंट तो नहीं है भिलाई में अवश्य छावनी क्षेत्र है।
दूसरी ओर कुछ इसी तरह की भावना लिए हमारे गृहमंत्री प्रदेश दौरे के समय किसी भी सर्किट हाउस में गार्ड ऑफ ऑनर परेड की सलामी न लेने की घोषणा कर चुके हैं।
बंगाल के लिए यहां भी मेहनत
छत्तीसगढ़ भाजपा का पूरा संगठन इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंकता दिख रहा है। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए जितनी सक्रियता दिख रही है, वैसी पहले किसी दूसरे राज्य के चुनाव में कम ही देखने को मिली थी।
प्रदेश के नेता करीब 55 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। निगम-मंडलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता बीते तीन महीने से बंगाल में डटे हुए हैं, जहां बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है।
खास बात यह है कि रायपुर दक्षिण के बंगाली मतदाताओं के जरिए भी चुनावी समीकरण साधे जा रहे हैं। डिप्टी सीएम विजय शर्मा यहां बंगाली परिवारों के साथ छोटी-छोटी बैठकें कर रहे हैं और उनसे बंगाल में अपने रिश्तेदारों को भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करने की अपील कर रहे हैं।
रायपुर दक्षिण में करीब 7 हजार बंगाली वोटर हैं, जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों में रहते हैं। ऐसे में यह नेटवर्क भी चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है, जहां छत्तीसगढ़ से बैठकर बंगाल के बूथ तक नजर रखी जा रही है।
खरीफ की तैयारी को होर्मुज का झटका
देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में जून-जुलाई से खरीफ फसलों की बोनी शुरू हो जाएगी। छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान धान का है, जिसके लिए जरूरत पड़ती है भारी मात्रा में रासायनिक खाद की। खाद की मारामारी, कालाबाजारी हर साल दिखाई देती है मगर होर्मुज जलमार्ग में तनाव खत्म होते नजर नहीं आ रहा है और जिसका असर धान के उत्पादन पर पडऩे की आशंका है।
राज्यों की तरफ से हर साल रकबा के आधार पर उर्वरक की जरूरत के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा जाता है। इसके आधार पर केंद्र उर्वरकों का आवंटन करता है। इस बार 15.55 लाख मीट्रिक टन की आपूर्ति छत्तीसगढ़ के लिए की गई है। सबसे अधिक आपूर्ति यूरिया की, करीब 7.25 लाख मीट्रिक टन, उसके बाद डीएपी की लगभग 3 लाख मीट्रिक टन होगी। बाकी अन्य उर्वरक है। 30 मार्च 2026 की स्थिति में राज्य के गोदामों और सहकारी समितियों में कुल 7.48 लाख मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध है। यानि अभी जरूरत से सिर्फ आधी मात्रा में, लगभग 48 प्रतिशत ही उर्वरक उपलब्ध हैं। सरकार ने दावा किया है कि मई महीने में आपूर्ति बढ़ाई जाएगी और जून-जुलाई में जब किसानों को इसकी जरूरत होगी, उनकी मांग पूरी कर दी जाएगी। हालांकि अन्य वर्षों में, अप्रैल माह से आपूर्ति और भंडारण की शृंखला बढ़ा दी जाती है, पर इसे अब इस माह में सिर्फ 10 दिन बाकी हैं। छत्तीसगढ़ सहित खरीफ फसलों के पर निर्भर दूसरे राज्यों को दो ही परिस्थितियों से राहत मिल सकती है। यदि केंद्र को दूसरे देशों से समय पर पर्याप्त आपूर्ति हो जाए, जैसे रूस और मोरक्को। या फिर होर्मुज को लेकर आया दुनियाभर के जहाजों के परिवहन में आया संकट जल्दी खत्म हो जाए। यह व्यवधान लंबा खिंचा तो यह केवल किसान परिवारों की आमदनी का सवाल नहीं रह जाएगा। यह अन्न के संकट और बाजार की रौनक से जुड़ी चिंता भी है।
साबित कर दिया, मांसाहार पसंद है..
छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में पश्चिम बंगाल में चल रहे विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी से देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने पश्चिम बंगाल की संस्कृति और खान-पान को भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार का मुद्दा बनाया है। वे मंचों से बार-बार कह रही हैं कि यदि यहां भाजपा की सरकार बनी तो मांस, मछली, अंडे पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। देश के दूसरे कई हिस्सों की तरह नार्थ ईस्ट में भी मांसाहार खान-पान का अहम हिस्सा है। जब बेनर्जी बात कर रही हैं तो भाजपा को भी साबित करना जरूरी है कि वह भ्रम फैला रही हैं, लोगों को डरा रही हैं। नगालैंड सरकार में पर्यटन, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री तेंजम इम्ना एलांग ने इसी बात पर जोर देने के लिए एक फोटो, बेनर्जी की ऑडियो क्लिप के साथ शेयर की है। इसमें वे उनके समीप बैठे दूसरे साथी नॉन वेज खा रहे हैं। लिखा है... दीदी, बुरा न मानिए....हम भाजपा में हैं और मांसाहार हमारी पसंदीदा है।
अदालतों में अहम सुनवाई
प्रदेश की राजनीति और प्रशासन से जुड़े कई चर्चित मामलों पर सोमवार को अहम सुनवाई तय है। बहुचर्चित सेक्स सीडी कांड में जिला अदालत में सुनवाई होगी। इस मामले में पूर्व मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी कथित फर्जी सीडी प्रकरण में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विनोद वर्मा, विजय भाटिया समेत अन्य आरोपी हैं।
सीबीआई की विशेष अदालत पहले भूपेश बघेल को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर चुकी है, लेकिन सेशन कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए दोबारा ट्रायल के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई जज खिलेश्वरी सिन्हा की अदालत में होगी, जहां पूर्व सीएम की पेशी भी प्रस्तावित है।
उधर, बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में भी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक अमित जोगी ने फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। अगर सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलती है, तो उन्हें सरेंडर करना पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने उन्हें तीन सप्ताह के भीतर समर्पण का निर्देश दिया है, जिसकी मियाद 23 अप्रैल को पूरी हो रही है।
इसके अलावा निजी स्कूलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी सुनवाई प्रस्तावित है। मुख्य न्यायाधीश की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है और आरटीई समेत कई मुद्दों पर राज्य सरकार को पहले भी फटकार लगा चुकी है।
चालान से चोर दिखा!

टेक्नॉलॉजी भी कई बार गजब का काम करती है। हैदराबाद में अभी एक आदमी का दुपहिया चोरी हो गया। पुलिस में दर्ज की गई रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन कुछ दिनों में उसे अपनी गाड़ी का एक ट्रैफिक चालान मिला जिसमें गाड़ी चलाने वाले की चेहरा सहित फोटो भी थी। अब ट्रैफिक कैमरे ने तो ट्रैफिक नियम तोडऩे वाली गाड़ी का फोटो खींचा था, उसे चलाने वाला असली मालिक है, या खालिस चोर है, यह तो कैमरे को पता नहीं था। खैर, इस चालान की फोटो से दुपहिया मालिक को भी चोर के दर्शन हो गए, और पुलिस को भी। तीन महीने पहले चोरी गई दुपहिया का पता अब चालान से लगा, तो उसे ढूंढने के लिए इसके मालिक ने हैदराबाद पुलिस को टैग करते हुए ट्रैफिक चालान की फोटो पोस्ट की, और शायद एआई से उसे सुधारकर चेहरा और साफ दिखाते हुए एक दूसरी फोटो भी।
साड़ी पर घिरी सरकार
प्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को घटिया यूनिफॉर्म (साड़ी) वितरण का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। करीब एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं में इसको लेकर नाराजगी देखी जा रही है।
मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग और छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के बीच जिम्मेदारी को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं। बताते हैं कि साड़ी की सप्लाई बोर्ड के माध्यम से की गई थी, जबकि सप्लायर सूरजपुर के हैं, जो महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र में आता है।
सीएम विष्णुदेव साय भी इस प्रकरण से नाराज बताए जा रहे हैं। मंत्री ने जिला परियोजना अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि खराब साडिय़ों को वापस लेकर एक सप्ताह के भीतर नई साड़ी उपलब्ध कराई जाए।
हालांकि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यूनिफॉर्म उनकी कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा है, इसलिए गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। कई कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यदि बेहतर साड़ी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो यूनिफॉर्म की राशि सीधे उनके खातों में ट्रांसफर कर दी जाए।
मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है, लेकिन अब तक सप्लायर के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है।
कोंटा का मोंटू दिखा रहा है छत्तीसगढ़ की चूक

रायपुर, बिलासपुर और नवा रायपुर। ये तीन बड़े शहर भले ही स्मार्ट सिटी बन गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ इतना भर नहीं है। यह सरगुजा के जनकपुर से लेकर बस्तर के कोंटा तक फैला हुआ है। आपके सामने सुकमा के कोंटा से कुछ किलोमीटर दूर, ओडिशा के मोंटू गांव की एक तस्वीर है, वहां के सरकारी बस स्टैंड की। साफ-सुथरा परिसर, आराम करने की जगह, शुद्ध पानी और रिफ्रेशमेंट की दुकानें। यह तस्वीर दो राज्यों की सोच में फर्क की भी है।
सन् 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना, तब तत्कालीन अजीत जोगी सरकार के शुरुआती फैसलों में राज्य परिवहन निगम पर ताला लगाना भी शामिल था। तर्क दिया गया, निगम भारी घाटे में है, सरकार पर बोझ है। लोगों ने तब भी समझ लिया था कि यह फैसला निजी ऑपरेटरों को फायदा पहुंचाने वाला है। सार्वजनिक परिवहन सरकार के हाथ से निकलने का मतलब था, उन इलाकों में बस सेवा का खत्म हो जाना, जहां पहुंच पहले से ही मुश्किल और मुनाफा न के बराबर है।
आज वही हो रहा है। बसें वहीं चलती हैं, जहां निजी ऑपरेटरों को कमाई दिखती है। आखिर वे भी किसी और व्यवसाय की तरह मुनाफे के लिए ही काम करते हैं, जनसेवा के लिए नहीं। भलाई करना सरकार का दायित्व है। इसी का नतीजा है कि बस्तर में निजी बस संचालकों ने हाथ खड़े कर दिए और सरकार को यहां के दूरस्थ क्षेत्रों में अनुदान देकर बसें चलवानी पड़ रही हैं।
बिलासपुर, रायपुर जैसे शहरों में नगर निगमों और स्थानीय निकायों के जिम्मे सार्वजनिक परिवहन को जिंदा रखना है, लेकिन हकीकत यह है कि वे इस जिम्मेदारी पर खरे नहीं उतर पाए। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा हुआ है। जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही है। बैटरी वाली गाड़ी आने की बात की जा रही है। मगर पिछले तीन साल से आई नहीं। हर बार सरकार समय मांग लेती है।
अब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, और आगे भी बढऩे की आशंका है। ऐसे में दुरुस्त सार्वजनिक परिवहन कोई विकल्प नहीं, जरूरत है। किसी ग्रामीण को 100-150 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक जाने में कितना खर्च करना पड़ता होगा, अंदाजा लगाएं? शहरों में भी एक कोने से दूसरे कोने तक जाने के लिए रिक्शों का किराया लोगों पर भारी पड़ रहा है।
तो परिवहन विभाग के मंत्री का काम क्या सिर्फ परमिट और लाइसेंस से मिलने वाले राजस्व पर नजर रखना भर रह गया है? या फिर आम आदमी की सस्ती और सुलभ आवाजाही भी उनकी जिम्मेदारी में शामिल है?


