संपादकीय

Previous123Next
Date : 02-Apr-2020

पासपोर्ट और राशन कार्ड के 
बीच सरकारी तौर-तरीकों से 
खिंच गई है एक गहरी खाई 

सच की लड़ाई बड़ी मुश्किल होती है। उसे झूठ से लडऩा होता है, जो कि बड़ा आकर्षक होता है, सनसनीखेज भी होता है, और लोगों के दिमाग पर जोर भी नहीं डालता। आज हिंदुस्तान में जब लोग चारों तरफ देश भर में बुरी तरह फंस गए बेबस, बेघर मजदूरों को देख रहे हैं, जो कि मजदूरी पाए बिना भी कारखाने, कंस्ट्रक्शन की जगहें, कारोबारी की जगहें छोड़कर रातों-रात सैकड़ों या हजार से भी अधिक किलोमीटर से पैदल सफर पर रवाना होने को मजबूर हुए, तो जाहिर है कि इस नौबत के लिए सरकार की आलोचना तो होगी ही। फिर यह तो वही सरकार है न जिसने दुनिया भर में बिखरे हिन्दुस्तानियों को विशेष विमान भेज-भेजकर वापिस बुलवाया, उन्हें मुफ्त में लेकर आयी। और यह तब हुआ जब जाहिर तौर पर कोरोना दूसरे देशों से हिंदुस्तान आने वाले लोगों के साथ आने की पुख्ता मेडिकल खबर थी। हिन्दुस्तानियों को लौटने का हक़ सौ-फीसदी था, लेकिन जगह-जगह भूख या कमजोरी से मर चुके दर्जनों पैदल मजदूरों के तबके में यह रंज तो जायज है कि पासपोर्ट वाले लोग बीमारी लेकर आये और राशन कार्ड वालों पर लाद दी। प्रदेश से लौटकर आये, दावतों में हिस्सा लिया, सरकारी चेतावनी के खिलाफ घूमे-फिरे, और बीमारी है कि गरीबों को बेरोजगार, बेघर, बेबस कर देने वाला लोकडाउन लड़वाकर मानी है। उसके बाद फिर आज तो ये गरीब बेघर राशन कार्ड वाले भी नहीं रह गए हैं, कार्ड अगर है भी तो किसी प्रदेश का, काम किसी और प्रदेश में कर रहे थे, और आज बीच रस्ते किसी और प्रदेश में फंस गए हैं। ऐसे बिन राशन कार्ड वालों को पासपोर्ट वाले लोग खटक रहे हैं तो उसमें कोई बेइंसाफी तो है नहीं। पासपोर्ट वालों की इमारतों में एयर इंडिया के पायलटों, विमान कर्मचारियों, डॉक्टरों, नर्सों को निकलने का काम भी चल रहा है, इसलिए आज इस देश में सरकार के कामों से पासपोर्ट और राशन कार्ड के बीच एक खाई तो खिंच ही गई है। 

ऐसे में जब लोग संचितों के मुकाबले वंचितों के हक़ की बात कर रहे हैं, तो उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। जऱा सी एक चूक किसी को किसी धर्म का विरोधी साबित कर सकती है, जऱा सी चूक सरकार विरोधी साबित कर सकती है। मीडिया के पेशेवर लोगों को और भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे एक हड़बड़ी के मोर्चे पर हैं, खुद आँखों देखी कम हो गयी है, और दूसरों के मोहताज अधिक हो गए हैं, सूचना के लिए, खबरों के लिए। ऐसे में गरीब के हक की बात करते हुए कोई चूक हो जाये तो वह पहाड़ सी बढ़ाकर सरकार-विरोधी करार दी जा सकती है। 

देश में कोरोना मौतों का आंकड़ा पैदल-मजदूरों के आंकड़ों से बहुत अधिक नहीं बचा है, बस यही है कि सूनी रेल पटरियों पर चलते हुए मजदूर के मरकर गिर जाने की खबर, बड़े अस्पतालों में कोरोना-मौतों के मुकाबले बहुत देर से आती है। लेकिन इस देश को समझना चाहिए कि मुसीबत के इस दौर को लेकर लोगों की जो इंसानियत सामने आ रही है, और जो हैवानियत सामने आ रही है, वह अच्छी तरह दर्ज हो रही है। इस दौर में सच और झूठ के बीच की लड़ाई भी इतिहास में दर्ज हो रही है। सच को पूरी ईमानदारी के साथ सच पर टिके रहना चाहिए, क्योंकि झूठ के तो बहुत से यार होते हैं, सच तकऱीबन अकेला होता है। फिर यह भी है कि सच की इज्जत का जनाजा निकालने के लिए बहुत सी ताकतें लगी ही रहती हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Apr-2020

ऐसे मूढ़ मजहबी लोगों को 
रियायत किस बात की दें ? 

दो दिनों से दिल्ली में मुस्लिमों के एक संप्रदाय के केंद्र में दुनिया भर से जुटे हजारों लोगों की वजह से पूरे हिंदुस्तान में कोरोनाग्रस्त लोग जिस तरह बिखर गए हैं, उसे लेकर कई किस्म की बहसें छिड़ गई हैं। बहुत से लोग यह लिख रहे हैं कि कोरोना को मुस्लिम रंग दिया जा रहा है, और मुस्लिमों पर कोरोना फैलाने की तोहमत डाली जा रही है। ऐसा लिखने वाले बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कि रोजाना मोदी को राहुल गाँधी का 12 फरवरी का ट्वीट याद दिला रहे हैं जिसमें राहुल ने प्रधानमंत्री को कोरोना के खतरे से आगाह किया था और तैयारी करने कहा था। राहुल को जो खतरा 12 फरवरी को दिख रहा था, वह दिल्ली में और बहुतों को दिख रहा था, और उस खतरे के बीच 1 से 12 मार्च के बीच दिल्ली के इस मुस्लिम संस्थान में हजारों लोगों का जमावड़ा करना कहाँ की समझदारी थी? कौन सा मजहब कहता है कि अपने लोगों की, बाकी दुनिया की जिंदगी खतरे में डालकर ऐसी मजहबी बैठक करो, मजहब पर चर्चा करो? अगर धर्मगुरु बनने वाले लोग इतने ही मूढ़ दिमाग के हैं, तो वे अपने धर्म के लोगों को कैसा बना रहे होंगे ?

फिर यह कौन सी बात होती है कि जब हिन्दू या दूसरे धर्म के लोग धर्म के नाम पर गुंडागर्दी करें तो उस बारे में तो लिखो, लेकिन मुस्लिमों के बारे में ना लिखो! मुस्लिमों को इस किस्म की रियायत दिलाने वाले उन्हीं का सबसे बड़ा नुकसान कर रहे हैं। अगर उनके बीच कोरोना फैलता है, फैल चुका है, मौतें हो रही हैं, तो पहला नुकसान किसका हो रहा है ? मुस्लिमों का, उनके परिवारों का, उनकी बिरादरी का। बाद में अगल-बगल के दूसरे धर्मों के लोग भी मारे जायेंगे। आज कोरोना के दुनिया भर में फैले खतरे, चारों तरफ गिरती लाशों के बीच अगर किसी को हजारों लोगों की भीड़ जुटाकर धर्म-चर्चा जरूरी लग रही है, तो यह भीड़ गोबर-गोमूत्र खिलाने-पिलाने वाले लोगों से बेहतर कैसे हो गई? कोई अगर अल्पसंख्यक होने के नाते रियायत का हक़दार है, तो वह रियायत अक्ल की होनी चाहिए, पाखंड की नहीं। फरवरी महीने के आखिर तक 3 हजार कोरोना-मौतें हो चुकी थीं, दुनिया भर से खबरें आ रहीं थीं, और हिन्दुस्तान में भी खतरा सर पर था। फिर भी इतना बड़ा धार्मिक-बहस का जमघट एक पखवाड़े तक लगाना, और फिर उसके भी हफ्ते भर बाद के लॉकडाउन तक हजारों की भीड़ का टिके रहना कौन सी धार्मिक समझदारी थी? फिर तोहमत सरकार पर कि लोकडाउन की वजह से लोग लौट नहीं पाए?

नहीं दोस्तों, किसी भी धर्म या मजहब के जाहिलों को ऐसी कोई रियायत नहीं दी जा सकती कि वे पूरी दुनिया पर खतरा फैलाएं, और अपने को मानने वाले मूढ़ लोगों को भी मार डालें। कई बरस पहले अमरीका में एक स्वघोषित गुरू ने अपने बनाये संप्रदाय में लोगों की सामूहिक आत्महत्या करवाने की कोशिश की थी और शायद वहां फौज को जाकर वह खेल खत्म करना पड़ा था। हिंदुस्तान में भी हरियाणा, पंजाब में हमने ऐसे सम्प्रदायों का हाल देखा है। दिल्ली में इस जमात के डेरे में क्या फर्क है?

कुछ लोग यह भी लिख रहे हैं कि आज दिल्ली में ही दसियों लाख मजदूर बेघर हैं, और वे भी कोरोना के शिकार हो सकते हंै, देश भर में कोरोना लेकर जा सकते हैं, इन लोगों का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खड़ी की हुई इस मुसीबत को पहले देखें, जो कि ज्यादा बड़ा खतरा है। इससे बड़ा मूर्खता का कोई रिश्ता नहीं जोड़ा जा सकता। नरेंद्र मोदी ने एक भयंकर गलती कर दी, तो क्या अब उसके मुकाबले मुस्लिमों की इस जमात को भी उसके टक्कर का गलत काम करने देना सांप्रदायिक बराबरी होगी? अरे, आज तो हर तरफ से बचाव की जरूरत है। मोदी से तो इतिहास निपट लेगा, उसके जवाब में मुस्लिमों को मारने का सामान तो मत फैलाओ। बहुत से लोगों को बीते कल और आज का हमारा लिखा मुस्लिम-विरोधी लग सकता है। लेकिन ऐसे या कैसे भी मुस्लिम धर्मांधों को बचाने की हमारी कोई हसरत नहीं है, बल्कि उनके झांसे में जो कमअक्ल मुस्लिम मारे जा रहे हैं, उन्हें खबरदार करने की नीयत जरूर है कि ऐसी कोरोना मौत किसी भी किस्म से अल्लाह की खिदमत नहीं है, उसकी इबादत नहीं है। जब चारों तरफ आग लगी हो तो सामूहिक गटरमाला जपते उसके बीच बैठे रहना धर्म भी नहीं है। किसी लोकतंत्र में अल्पसंख्यक होने से किसी धर्म को ख़तरा फैलाने का हक नहीं दिया जा सकता। जिन्होंने कानून तोड़ा है, उन सबको जेल भेजना चाहिए, वे इबादत तो वहां से भी कर ही सकते हैं। एक बैरक में रखें तो वहां धर्म-चर्चा भी करते रहेंगे। बाकी सवाल देश के करोड़ों मजदूरों को मुसीबत में झोंक देने का है, तो उसके खिलाफ तो हम रोज लिख ही रहे हैं।
-सुनील कुमार


Date : 31-Mar-2020

मजहब के नाम पर देश पर 
थोप डाला सबसे बड़ा खतरा!

दिल्ली की बहुत घनी बस्ती निजामुद्दीन में मुस्लिमों की एक ऐसी बड़ी धार्मिक बैठक कोरोना के खतरे के बीच हुई कि जो मामूली समझबूझ के भी खिलाफ जाती है। इसमें करीब दो हजार लोग जुटे, और इसी भीड़ के बीच देश में लॉकडाउन हुआ। बाद में यहां से निकलकर लोग देश भर में पहुंचे, इनमें से सात की तेलंगाना में और एक की कश्मीर में मौत की खबर है। इस धार्मिक कार्यक्रम से लौटे लोगों में से दर्जनों के कोरोना-पॉजिटिव होने की रिपोर्ट भी आ गई है। दिल्ली में सरकार इस धार्मिक संस्थान से लोगों को निकालकर क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती करा रही है, लेकिन यहां से निकलकर देशभर में लौटे लोगों में से 9 लोग तो अंडमान में ही कोरोना-पॉजिटिव निकल गए हैं। आगे जाने क्या होगा। 

बात महज दिल्ली की नहीं है, जिस किसी धर्म में ऐसी कट्टरता हो कि जिंदगी और मौत को अनदेखा करके अपने धर्म को मानने से पूरी दुनिया पर खतरा खड़ा कर दिया जाए, तो फिर ऐसे धर्म के खिलाफ कानून का कड़ा इस्तेमाल करना चाहिए। आज जब हज यात्रा रद्द होने की खबरें हैं, तो दिल्ली में खतरा उठाकर, खतरा खड़ा करके, हजारों का धार्मिक जमावड़ा सरकार को पहले ही खत्म कर देना था। ऐसा तो है नहीं कि देश की राजधानी में मुस्लिमों की इतनी बड़ी भीड़ सरकार की खुफिया नजरों से बचकर हो गई हो, इसे पहले ही खत्म करवाना था। अभी यह खबरें भी आ रही हैं कि बिहार और झारखण्ड की कुछ मस्जिदों में विदेशों से आए हुए धर्मप्रचारक ठहरे हुए थे, बिना सरकार को खबर दिए। अगर ऐसा है, तो यह भी सरकारों की नाकामी है, और यह पूरे देश को भारी पड़ेगी। 

लोगों को याद होगा कि  कुछ बरस पहले उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में मुस्लिमों के बीच यह अफवाह फैलाई गई थी कि पोलियो ड्रॉप्स में ऐसी दवा अमरीका से मिलाकर भेजी जा रही है जिसके पिलाने से मुस्लिमों की नस्ल बढऩा ही रुक जायेगा। हिंदुस्तान में तो किसी तरह इस अफवाह पर काबू पाया गया, लेकिन कट्टरपंथी धर्मान्धता में डूबे पाकिस्तान में ऐसा नहीं हो पाया। वहां अभी कुछ महीनों पहले तक पोलियो ड्रॉप्स पिलाने वाले सरकारी कर्मचारियों को मजहबी आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान दुनिया की उन गिनी-चुनी जगहों में से है जहां पोलियो जिंदा है, और बाकी दुनिया के लिए खतरा भी है। 

लेकिन मुस्लिमों के बीच अशिक्षा के चलते, गरीबी की नासमझी के चलते, मदरसों की अवैज्ञानिक पढाई के चलते, मुस्लिमों को यह समझाना आसान हो गया है कि जब तक अल्लाह नहीं चाहेगा उन्हें कोई नहीं मार सकता। जिस धर्म में शिक्षा जितनी कम है, कट्टरता जितनी अधिक है, उस धर्म में धर्मगुरु, लोगों को उतनी ही आसानी से बेवकूफ बनाकर अपनी दूकान चलाते हैं। अल्लाह भी उन्हीं को बचाना चाहेगा जो  खुद को बचाना चाहेंगे, न कि ऐसे लोगों को जो कि दूसरे बेकसूर लोगों की जिंदगी पर खतरा खड़ा करें। इतिहासकार इरफान हबीब ने इसे बेवकूफी और जुर्म लिखा है कि ऐसे वक्त यह धार्मिक कार्यक्रम किया गया। उन्होंने लिखा-हैरानी की बात है कि यह जमाती खबर नहीं पा सके थे, या दुनिया भर पर मंडराते खतरे को उन्होंने जान-बूझकर अनदेखा किया ? 

अभी तक हिंदुस्तानी टीवी चैनल फिदा होकर कुछ मुस्लिम मुल्लाओं के वीडियो दिखाने में लगे हैं जिनमें नमाज के लिए मस्जिद जाने वालों को अल्लाह की मेहरबानी से हिफाज़त मिली होने के दावे किये जा रहे हैं। ऐसे लोग अपने ही मजहब के लोगों को मिटा देने पर आमादा है। जिनके ऐसे-ऐसे यार, उनको दुश्मन की क्या दरकार?

यह वक्त और दुनिया पर मंडराता खतरा बताता है कि अब किसी धर्म को दुनिया पर खतरा नहीं बनने दिया जा सकता। अब इंतजाम सरकारों की ताकत से परे के हो गए हैं, खतरे विज्ञान की ताकत से परे के हो गए हैं। ऐसे में किसी को बेवकूफ होने की छूट नहीं दी जा सकती और ना ही धर्मांध होने  की। कोई धर्म अल्पसंख्यक है, इस नाते उसे बाकी  देश  को खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस जमावड़े पर सख्त कानूनी करवाई करनी चाहिए ताकि बाकी धर्मों के धर्मांधों के लिए भी यह एक सबक रहे। आज दिल्ली के इस धर्मांध जमावड़े ने पूरे देश का सबसे बड़ा अकेला खतरा खड़ा कर दिया है, इतना बड़ा कि उसे सा रे ईश्वर मिलकर भी नहीं सुधार सकते। यह अलग बात है कि लोगों को यहाँ जुटाने वाले मुल्ला उन्हें हूरों का सपना दिखा रहे होंगे!
-सुनील कुमार


Date : 30-Mar-2020

बादल दिल्ली में फटा, 
और पूरा देश डूब गया 

लॉकडाउन के दौरान देश भर से पुलिस ज्यादती के बहुत सी खबरें आ रहीं हैं। तस्वीरें और वीडियो बताते हैं कि बेकसूरों को किस तरह लाठियां पड़  रही हैं। दरअसल पुलिस सरकार का सबसे पहले दिखने वाला चेहरा होता है। हर मुसीबत के वक्त पुलिस ही सबसे आगे, मुसीबत के सामने होती है। पुलिस के सामने सत्ता की ताकत से मदमस्त लोग होते हैं, कानून तोडऩे वाले होते हैं, आज की दिल्ली की तरह के दसियों लाख बहुत बेबस लोग होते हैं, और पुलिस का काम ऊपर के हुक्म को पूरा करना होता है, फिर चाहे वह दिल्ली का ऐतिहासिक बुरा सरकारी फैसला ही क्यों ना हो। पुलिस की वर्दी पर जिस तरह पट्टियाँ लगीं होती हैं, जिस तरह सितारे जड़े  होते हैं, उसी तरह यह भी जड़ा होता है कि उसे हुक्म मानना है। 

हम अपने आसपास की पुलिस को देख रहे हैं, तो वह सड़कों पर रात-दिन लोगों को रोकने में ही लगी हुई है। हर एक को रोककर, उसकी पहचान देखते हुए पुलिस अपने-आपको अधिक खतरे में डालती ही चलती है, कई जगहों पर बीमारों को पुलिस ही अस्पताल पहुंचा रही है, अनाज पहुंचा रही है, सब्जी पहुंचा रही है। पुलिस न सिर्फ सरकार का चेहरा हो गई है, बल्कि सरकार के हाथ-पैर सब कुछ हो गई दिखती है। क्या पुलिस सचमुच ही ऐसे तमाम कामों के लिए बनी है? और क्या ऐसी मुसीबत के वक्त बढ़े हुए तमाम काम करने की ताकत भी है पुलिस में?

आज सड़कों पर जो पुलिस दिख रही है, उसके पास अच्छे मास्क भी नहीं हैं, दिखावे के जो मास्क हैं, उन्हें देखकर कोरोना बस हँस ही सकता है। लेकिन पुलिस ऐसे लोगों की पहली मिसाल है, अकेली नहीं। सरकार के कई और दफ्तर हैं, अस्पताल हैं, एम्बुलेंस हैं, इन सबके कर्मचारियों के बचाव के इंतजाम नाकाफी हैं, और उनकी जान को जोखिम काफी है। फिर जिस तरह आज घरों में महफूज़ कैद बाकी आम लोगों के परिवार हैं, इन लोगों के भी परिवार हैं। आज भी मुहल्लों की नालियों में उतरकर सफाई कर्मचारी पानी का रास्ता बना रहे हैं, दवा छिड़क रहे हैं। और अभी तीन हफ़्तों के लॉकडाउन का पहला हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ है। अभी कम से कम दो हफ्ते, और अधिक हुआ तो कई और हफ्ते इसी किस्म की सख्त ड्यूटी के हो सकते हैं। 

मुल्क पर अगर महज कोरोना का हमला हुआ रहता तो भी तमाम सरकारी अमले थक जाते, लेकिन मुल्क पर हमला तो कोरोना के साथ-साथ सरकारी बददिमाग-फैसले का भी हुआ है जिसने देश के करोड़ों सबसे गरीब लोगों को देश की सरहद के भीतर मुजरिम, अवांछित, शरणार्थी बना दिया है। न शहरों में, न कारखानों की बस्तियों में उनके रहने का इंतजाम है, ना ही घर जाने की इजाजत, न साधन। फिर आज देश में किसी को यह भरोसा नहीं है कि सरकार सच ही बोल रही है। जिस तरह ईश्वर पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की सजा देता है, और नीचे के पूरे गांव डूब जाते हैं, उसी तरह इस देश में दिल्ली में बादल फटता है, और देश के तमाम गरीब डूब जाते हैं। इस बात को पुलिस भी समझती है, सफाई कर्मचारी भी समझते हैं, और राज्यों की सरहदों पर तैनात बाकी लोग भी समझते हैं। उनके मन इस रंज से भरे हुए हैं कि पूरे देश के सरकारी अमले की जिंदगी को इस तरह खतरे में क्यों डाला गया, क्यों देश के करोड़ों लोगों को इस तरह रातों-रात बेघर कर दिया गया, सड़कों पर ला दिया गया, शरणार्थी बना दिया गया। यह सब देखकर भी लोगों में जान पर खेलकर काम करने की हसरत कम होती है। लोगों के सामने मिसाल है कि नोटबंदी से देश को मौत और अंधाधुंध घाटे के सिवाय कुछ नहीं मिला था। अब उसी अंदाज में किए गए लॉकडाउन से भी लोगों को मौत और मौत के टक्कर की बेरोजगारी ही मिल रहे हैं, देश करे तो क्या करे? और मजबूर सरकारी अमला करे तो क्या करे? जान दे-दे दिल्ली के गलत फैसलों के लिए ? 
-सुनील कुमार


Date : 29-Mar-2020

..यह अँधेरी सुरंग अंदाज से 
कुछ अधिक ही लम्बी रहेगी  

दिल्ली से गावों की ओर लौटते मजदूरों की तो तस्वीरें पल-पल में आ रहीं हैं, वे दिल दहला रही हैं, लेकिन पिछले दो दिनों से उनके बारे में लिखने के बाद आज फिर उसी पर लिखना ठीक नहीं, अब से कुछ देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलने वाले हैं, तो आज उन्हीं को बोल लेने दिया जाये इस पर। हम अपनी बारी कल इस्तेमाल करेंगे। लेकिन आज एक और बात पर सोचने की जरूरत है। करने की तो कोई गुंजाईश अभी कई हफ्ते है नहीं, लेकिन  सोचने के लिए तो वक्त ही वक्त है।

जब कभी कोरोना-लॉकडाउन खत्म होता है, और उसके बाद जितने भी लोग बचे रहते हैं, उनके सामने आगे की पहाड़ सी जिंदगी खड़ी रहेगी। और बाजार पर कर्ज का पहाड़ भी खड़ा रहेगा। कारोबार ठप्प रहेगा, ग्राहक बचेंगे नहीं, और ऐसी हालत में निजी क्षेत्र  की नौकरियां भी नहीं बचेंगी। कारखाने क्या बनाएंगे जब बाजार में खरीददार ही नहीं होंगे? यह नौबत जल्द खत्म नहीं होगी। फिर हिन्दुतान तो वैसे भी बहुत बुरी आर्थिक मंदी से गुजर रहा था। मंदी  को लेकर अर्थशास्त्रियों  की परिभाषाएं जो भी कहती हों, रोज की जरूरतों के अलावा बाकी सभी सामानों के ग्राहक घर बैठ गए थे। जिनके पास भ्रष्टाचार की, दो नंबर की कमाई थी, महज वे ही लोग बाजार में महंगी खरीददारी कर रहे थे। हो सकता है कि भ्रष्टाचार जारी रहे और ऐसी कुछ खरीददारी जारी भी रहे, लेकिन उससे अर्थव्यस्था नहीं चलती। 

हकीकत यह दिख रही है कि कोरोना से जो लोग चल बसेंगे, वे तो सारी तकलीफों से आजाद हो चुके रहेंगे, लेकिन जो बचे रहेंगे, उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल होगी। आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसीलिए लग रही है कि  सीमित कमाई वाले तमाम लोगों को यह सोचना चाहिए कि कमाई घटी तो वे कैसे जियेंगे, नौकरी छूटी तो वे कैसे जियेंगे? कोरोना का खतरा और कोरोना की दहशत अपनी जगह है, लेकिन लॉकडाउन में खाली बैठे इस पर भी सोचना बहुत जरूरी है। लोगों को, खासकर मेहनत और ईमानदारी की कमाई पर जिंदा लोगों को अपने खर्च घाटे और कमाई बढऩे के बारे में तुरंत कुछ करना होगा। सकरी तनख्वाह पाने वाले लोग तो फिर भी अछूते रह सकते हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के कामगार, असंगठित मजदूर, और बेरोजगार तो कुचल जाने का खतरा रखते हैं। आज हिंदुस्तान में जिस किसी गरीब कामगार के पास थोड़ी-बहुत भी बचत होगी वह अगले हफ्तों में खत्म हो चुकी रहेगी। आसपास अगर मोठे ब्याज पर भी कर्ज मिलेगा, तो भी लोग कर्ज तले  दब  जायेंगे। फिर उसके बाद का वक्त बेरोजगारी का रहेगा, जिसमें कर्ज लौटने की भी कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। आज जो लोग गावों के लिए निकल पड़े हैं, वे जल्द काम पर न लौट पाएंगे, न उनके लिए काम बचा ही रहेगा। 

जहाँ तक कारोबार की बात है, तो हर क्षेत्र में सबसे नीचे के धंधे बंद होंगे। सबसे कामयाब के बचने की संभावना अधिक होगी, लेकिन कमजोर, नाकामयाब, कर्ज से लदे  धंधे बंद होंगे। कड़वी जुबान में कहें तो जिस तरह जंगल में सबसे ताकतवर के जि़ंदा रहने की संभावना सबसे अधिक होती है, कारोबार में भी वही होने का पूरा ख़तरा दिख रहा है। ऐसी हालत में जो कामगार सबसे अच्छे हैं, उनका रोजगार बना रह सकता है, लेकिन बाकी? उनको बेहतर होने के बारे में सोचना चाहिए, पहला मौका मिलते ही उनको अपना हुनर बेहतर करना चाहिए। मंदी वाले बाजार में औसत के खरीददार नहीं होते। 

देश में नोटबंदी से आई तबाही जीएसटी के बुरे अमल से और आगे बढ़ी, फिर मंदी, देश में बेवजह आंदोलन खड़े करने की नौबत न्योता देकर लाई गई, नागरिकता को मुद्दा बनाकर देश की सोच को जख्मी और हिंसक बनाया गया, और अब आखिर में कोरोना आ गया, जिस पर लॉकडाउन इस बदइंतजामी का किया गया कि देश के लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा उठ जाये तो भी हैरानी नहीं होगी। लेकिन उस पर फिर कभी, जल्द ही।
-सुनील कुमार


Date : 28-Mar-2020

यह सैलाब दिल्ली से यूपी की ओर...

सरकार गोरी-अंग्रेज
थी तब भी, और अब
काली-देसी है, तब भी !

हिंदुस्तान की बड़ी तकलीफदेह तस्वीरें सामने आ रही हैं, आती ही जा रही हैं। कोरोना से प्रभावित किसी और देश में सड़कों पर बेवजह-बेसहारा लोगों के सैकड़ों किलोमीटर सफ़र की ऐसी तस्वीरें देखने नहीं मिलीं क्योंकि वे हिंदुस्तान से अधिक सम्पन्न देश भी थे। हिंदुस्तान की सरकार विदेशों से तो हिंदुस्तानियों को मुफ्त के हवाई जहाज में बिठाकर लाई लेकिन देश के भीतर दसियों लाख, या करोड़ों, मजदूर, बेरोजगार, पैदल सफर करके अपने गांव जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के एक भूतपूर्व सांसद बलबीर पुंज ने उनका मखौल भी उड़ाया है ट्विटर पर, कि काम बंद होने से ये मजदूर अपने घर वालों से मिलने चले जा रहे हैं जिनसे मिलना नहीं हुआ था। बलबीर पुंज इस तरह कुछ सौ किलोमीटर पैदल जाकर देख लें, उनके बदन और दिमाग दोनों की चर्बी छंट जाएगी।

लोगों का बच्चों को, बीमारों को, जख्मी घरवालों को लेकर इस तरह सैकड़ों किलोमीटर चलना भारत-पाक विभाजन की भयानक तस्वीरों को याद दिला रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर ऐसी दो तस्वीरों को जोड़कर तुलना भी की है। वह तो अंग्रेज सरकार का वक्त था, आज तो सरकार हिंदुस्तान की है। लेकिन ऐसे में कुछ समझदार लोग भी ऐसे मजदूरों को पलायन करने वाले लिख रहे हैं कि ये लोग आदतन हर बरस पलायन करके जाते ही हैं। यह भी लिखा जा रहा है कि अब वे शहरों से वापिस पलायन करके गाँव आ रहे हैं। क्या मजदूर पलायन करते हैं? क्या वे काम और मेहनत से दूर भागते हैं पलायन करके? सच तो यह है कि बेबस मजदूर काम की तलाश में, या बेहतर मजदूरी की तलाश में सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर जाकर भी रात-दिन काम करते हैं। उनका यह जाना पलायन नहीं होता, यह तो देश-प्रदेश की सरकारों का अपनी जिम्मेदारी से पलायन होता है कि वे अपने काबिल मजदूरों को काम नहीं दे पातीं, जरूरत की मजदूरी नहीं दे पातीं। पलायन मजदूर नहीं करते, सरकारें करती हैं अपनी जिम्मेदारियों से ? लेकिन भाषा को हमेशा ताकतवर का हिमायती बनाया जाता है इसलिए पलायन का कुसूरवार मजदूरों को ठहराया जाता है। आज देश भर से, जगह-जगह से, मकान मालिक अपने किराएदार मजदूरों को भगा रहे हैं। इसमें मजदूर पलायन नहीं कर रहे, किराया लेने वाले मकान मालिक अपनी कानूनी और सामाजिक दोनों ही किस्म की जवाबदेही से पलायन कर रहे हैं।

आज कई वीडियो दिख रहे हैं कि लोग हाईवे के किनारे खड़े होकर गांव जाते लोगों को खाने के पैकेट दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के समाजवादी नेता प्रदीप चौबे ने किसानों के लिए लिखा है कि वे ट्रैक्टर (ट्रॉली) लेकर निकलें और गुजरते हुए मजदूरों को दूर तक पहुंचकर आएं। उन्होंने अपने साथियों से भी सड़कों पर मदद के लिए तैनात रहने कहा है। लेकिन सवाल यह है कि देश भर में करोड़ों लोगों को बेबसी में ऐसे क्यों जाना पड़ रहा है? जो जहां थे वहीं सरकारी और सार्वजनिक इमारतों में, सरकार के दिमाग में, लोगों के दिलों में इतनी जगह नहीं थी कि तीन हफ्ते इनको सिर पर छत और दो वक्त का खाना दिया जा सकता? समाज और सरकार के पास मिलकर भी छतें नहीं थीं? या गाडिय़ां नहीं थीं? पता नहीं खबर सच है या नहीं, एक हिंदुस्तानी एयरलाइंस स्पाईस जेट ने मुम्बई से मजदूरों को पटना तक पहुंचाने का प्रस्ताव दिया है, मुफ्त में। कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि महानगरों में खाली पड़ीं या आधी बनी इमारतों में भी लोगों को ठहराया जा सकता था, बजाय उनके पैदल सफर के। जो सरकार देश भर में पल भर में ट्रेनों को बंद करना जरूरी समझती है उसे यह खतरा नहीं दिखा कि लोग घने बसे महानगरों से देश के गांव-गांव तक जाएंगे जो अधिक बड़ा खतरा होगा, बजाय खाली शहरी इमारतों में ठहरने के? और गांवोंं में भी तो शहर से लौटते अपनों को घुसने नहीं दिया जा रहा है महामारी के इस दौर में। जिनके पसीने के ईंधन से देश की अर्थव्यवस्था का इंजन चलता है, वे आज यहां के नागरिक ही नहीं रह गए, न महानगरों के न गांवों के। वे बस अब सड़क नाम के एक देश के पैदल मुसाफिर हैं, नागरिक कहीं के नहीं ! विभाजन के वक्त तो गोरी अंग्रेज सरकार थी, लेकिन आज तो काली देसी सरकार है ! विभाजन जारी है !

-सुनील कुमार


Date : 27-Mar-2020

सडक़ों और फुटपाथों पर अनगिनत बेबस

अभूतपूर्व और असाधारण हालात असाधारण फैसलों की मांग करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में 21 दिन का कोरोना-लॉकडाऊन करके यही काम किया है। यह वक्त इस चूक को गिनाने का नहीं है कि मोदी ने राहुल गांधी की चेतावनी के करीब चालीस दिन बाद यह कार्रवाई की। यह वक्त यह गिनाने का भी नहीं है कि मोदी ने लॉकडाऊन के वक्त को देश पर एक धक्के की तरह क्यों लादा और संभलने का मौका क्यों नहीं दिया। लेकिन यह वक्त कुछ बुनियादी सवालों को उठाने का है जिनसे आज हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है। इन सवालों का अंदाज लगाने और उनके जवाब तैयार करने के लिए केन्द्र सरकार के पास कई हफ्ते थे, और आज भी वे सारे सवाल सूनी सडक़ों के किनारे फुटपाथों पर मानो किसी सवारी के इंतजार में खड़े हैं।

सबसे पहले सबसे कमजोर इंसानों की सबसे जरूरी बात। आज देश भर में लाखों बेबस और गरीब सडक़ों पर फंस गए हैं। अपने घर या गांव लौटने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं है। मीडिया की वजह से ऐसे लोगों की तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं कि वे किस तरह हजार किलोमीटर तक के पैदल सफर पर निकल पड़े हैं। कोई ऐसा भी है कि बच्चे को कंधे पर बिठाए चल ही रहा है। कुछ लोग गर्भवती महिला के साथ हैं, बिना खाने के हैं। जिस सरकार के हाथ में पल भर में लॉकआऊट का हक था, उसी के हाथ में यह चेतावनी भी थी कि ट्रेनें बंद होने से पहले लोग घर लौट जाएं। ऐसे किसी इतने कड़े फैसले की घोषणा इतनी रहस्यमय और इतनी एकाएक होगी क्यों जरूरी थी कि सबसे कमजोर करोड़ों लोगों के पैर प्रतिबंधों की सुनामी में ऐसे उखड़ जाएं ? ये सवाल आज मुसीबत के बीच में जरूरी इसलिए है कि आने वाला वक्त कई और प्रतिबंधों का हो सकता है, होगा, और उन्हें भाषण में एक लिस्ट की तरह जारी करने के बजाय, तय करते ही जल्द से जल्द जारी करना चाहिए। फैसलों का राष्ट्र के नाम संदेश होना जरूरी नहीं होता, राज्यों को विश्वास में लेकर हर चेतावनी, हर रोक ऐसे लागू करनी चाहिए कि गरीब बेबस संभल सकें। अब हर कोई मुकेश अंबानी तो है नहीं जिसके आसमान छूते घर में उसके सैकड़ों दास-दासी भी रह सकें। समाज के सबसे कमजोर को दरिद्रनारायण कह देने से ही उस नारायण को भोग नहीं लग जाता। आज देश में करोड़ों लोग इतने असंगठित और इतने बेसहारा हैं कि सरकारों की कोई तैयारी उनके लिए नहीं है। केन्द्र सरकार तो कोरोना चेतावनी पर चालीस दिन बैठी रही, लेकिन आज जनता फुटपाथ पर चालीस दिन कैसे रहे ? अस्सी बरस की बूढ़ी औरत सैकड़ों किलोमीटर का सफर कैसे पैदल तय करे ?

आज जब मुसीबत की इस घड़ी में पूरे देश को एक-दूसरे के दुख-दर्द से जुड़ा रहना चाहिए तब लोगों के बीच यह बात कचोट रही है कि विदेशों में बसे हुए या वहां गए हुए हिंदुस्तानियों को वापिस लाने के लिए तो भारत सरकार हवाई जहाज भेज रही है लेकिन देश के भीतर जो करोड़ों लोग जगह-जगह फंसे हुए हैं वे अब भी बेसहारा हैं।

आज अब राज्यों में तमाम इंतजाम राज्यों के जिम्मे आ गया है। ऐसी नौबत में जो भी करना है वह राज्यों को करना है, जिलों को करना है। केन्द्र सरकार ने राज्यों पर यह मुसीबत बाकी कई मुसीबतों की तरह एकाएक लाद दी है। यह नौबत भयानक है, और राज्य सरकारों के साथ हमारी हमदर्दी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक ने बिना किसी आलोचना के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हर कदम का साथ देने की खुली घोषणा की है। लेकिन अकेले सरकारों के बस का कुछ है नहीं। जनता में मामूली सक्षम लोगों को भी अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों का साथ देना होगा, तभी बेबस जिंदा रह पाएंगे।

-सुनील कुमार

 


Date : 26-Mar-2020

कुछ अपनी बात से शुरू 
होकर दूसरों की बात तक

बुरा वक्त कई अच्छी नसीहतें देकर आता है, कई नई बातें सिखा जाता है। हिन्दुस्तान में कोरोना जिस रफ्तार से लंबी-लंबी छलांगें लगाकर फैल रहा है, उसका अंदाज अब तक लोगों को लग नहीं रहा है, इसलिए कि लोगों को लगता है कि जितने लोगों की मेडिकल जांच में कोरोना पॉजिटिव निकला है वही हकीकत है। सच तो यह है कि उससे हजारों गुना लोगों को आज ही कोरोना पॉजिटिव होगा, और लाखों लोगों को तब तक हो चुका होगा, जब तक इन हजारों लोगों की शिनाख्त हो पाएगी। ऐसे में तीन दिन पहले हमें यह अखबार छापना बंद कर देना ठीक लगा था। बात महज सैकड़ों कर्मचारियों की नहीं थी, उसे लोगों तक पहुंचाने वाले हजारों लोगों की जान की हिफाजत की बात भी थी। जान है तो जहान है, आज के इस डिजिटल जमाने में लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए अखबार को बंटवाना कम से कम हमें समझदारी नहीं लगी, और बिना किसी और पर अपनी सलाह का दबाव डाले हमने उसे छापना तब तक स्थगित कर दिया जब तक कोरोना लोगों की जिंदगी पर मौत बनकर मंडराता रहे। रोज सुबह-शाम छत्तीसगढ़ में दसियों हजार हॉकर कुछ घंटे घर-घर जाएं, यह बात प्रधानमंत्री के देश के लॉकडाऊन के शब्दों और उनकी भावना, किसी के साथ भी मेल खाने वाले बात नहीं थी, चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से तो मेल खाने वाली बात बिल्कुल भी नहीं थी। 

अब आज यह लग रहा है कि इस अखबार को तैयार करने और इंटरनेट-मोबाइल फोन पर लोगों तक पहुंचाने के लिए जिस तरह कुछ दर्जन लोग एक हॉल में कम्प्यूटरों पर काम कर रहे हैं, वह भी हिफाजत के खिलाफ है, और इसका कोई रास्ता ढूंढना जरूरी है। इसलिए आज सुबह हमने तय किया कि अखबार का न्यूजरूम तुरंत बंद कर दिया जाए, और सारे लोग अपने घरों से काम करें। टेक्नालॉजी तो मौजूद है, लेकिन ऐसी आदत नहीं रही कि बिना आसपास बैठे, बिना एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाए, बिना झल्लाए, बिना संवाददाताओं को फोन पर डपटाए अखबार तैयार कर लिया जाए। ऐसी दिमागी हालत में भी आज इस वक्त जब एक कम्प्यूटर पर यह हाल टाईप हो रहा है, तब दूसरे कम्प्यूटर ले लेकर कुछ साथी घर रवाना हो रहे हैं, कुछ और लोग कुछ घंटों का काम यहीं निपटाकर रवाना हो जाएंगे। जिन मशीनों पर रोज दफ्तर में काम होता है, उन्हीं मशीनों पर घर से काम होने लगेगा, और इस तरह की नेटवर्किंग जो कि दुनिया में बहुत सी जगहों पर आम हैं, वह सीखने का हमारे लिए यह एक नया मौका है। यह इसलिए मुमकिन हो पा रहा है कि इंटरनेट और टेलीफोन की सहूलियतें बढ़ी हुई हैं, और इसके लिए हम इन कंपनियों के आज भी काम कर रहे कर्मचारियों को भी शुक्रिया के साथ सलाम कर रहे हैं। 

 लोग अभी भी अखबारी कागज को महफूज बताकर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना कागज के मार्फत कहीं नहीं जाता। लेकिन इस कागज को लेकर घर-घर भटकने वाले, बहुत ही मामूली मजदूरी पाने वाले लोगों की जिंदगी के खतरे का अहसास करना भी जरूरी है। सरकार के कानून अखबार छापने और पहुंचाने की छूट दे रहे हैं, लेकिन स्मार्टफोन और इंटरनेट के जमाने में कुछ दिनों के लिए हॉकरों की जिंदगी खतरे में डाले बिना भी काम चल सकता है। अखबार के दफ्तर में आए बिना भी एक अखबार निकल सकता है, और छपे बिना भी बंट सकता है। यह सब हमें सीखने मिल रहा है, और हकीकत यह है कि कुछ नया सीखने के लिए स्लेट पट्टी पर पहले का लिखा हुआ साफ करना पड़ता है, और हमें एक बड़ी मेहनत उसी पुरानी सोच को मिटाने में करनी पड़ रही है। 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर अब भी आम लोगों की आवाजाही, लोगों का बिना मास्क लगाए निकलना, किराना दुकानों या गैस दुकानों पर लोगों की धक्का-मुक्की जैसी भीड़ से ऐसा लगता है कि कोरोना के खतरे का पूरा अहसास लोगों को है नहीं। लोगों को यह अंदाज नहीं हैं कि आज कुछ असली, कुछ फर्जी वीडियो जिस तरह तैर रहे हैं, और लाशों को इधर-उधर पड़े हुए बता रहे हैं, वह एक हकीकत भी हो सकती है। ऐसे कल से बचने के लिए आज अपने आपको बंद कर लेना जरूरी है। यह वक्त उन तमाम लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए भी जरूरी है जो अस्पतालों में मरीजों और मौतों के मोर्चे पर डटे हुए हैं। जो लोग मरीजों को अस्पताल तक ले जा रहे हैं, और रात-दिन ड्रायवरी कर रहे हैं, स्ट्रेचर उठा रहे हैं। यह वक्त उन पुलिसवालों को भी सलाम करने का है जो लापरवाह लोगों से जूझते हुए शहरों के हर चौराहे पर खड़े हैं, और हर किसी को रोककर उससे बात करने को मजबूर हैं। आज जब लोग जायज वजहों से इस हद तक डरे हुए हैं कि अड़ोस-पड़ोस तक आना-जाना बंद है, और रहना भी चाहिए, तब भी पुलिस रात-दिन सड़कों पर है, धक्का-मुक्की और भीड़ के बीच है, अस्पताल में भी है, और थाने में भी लोगों से जूझ रही है। यह वक्त अपने परिवार से दूर काम कर रही ऐसी पुलिस को भी सलाम करने का है। 

बाजार में कुछ लोग अपनी खुद की बेबसी से सब्जी बेचने बैठे हैं, दूध पहुंचा रहे हैं, गैस सिलेंडर पहुंचा रहे हैं, बिजली घरों को चला रहे हैं, बिजली घरों के लिए कोयला निकाल रहे हैं, कोयले से लदी ट्रकें और मालगाडिय़ां चला रहे हैं। मेडिकल स्टोर खोलकर बैठे हैं जहां पर मरीजों और उनके घरवालों के अलावा कोई नहीं आते, और उनका सीधा खतरा झेल रहे हैं। ऐसे तमाम लोगों को हमारा सलाम। साथ ही बाकी लोगों से यह अपील भी कि इनमें से किसी से भी बहस न करें, उनके काम में दिक्कत न डालें। यह मौका बातों को बहुत व्यवस्थित तरीके से लिखने का नहीं है, और अपनी खुद की बात लिखते हुए यह अंदाज नहीं था कि दूसरों के लिए धन्यवाद की बात यहीं पर लिखना सूझेगा। कुल मिलाकर बिना किसी इमरजेंसी घर से न निकलें, और मानव-नस्ल को जिंदा रहने दें। 
-सुनील कुमार


Date : 25-Mar-2020

ऐसे कोरोना-काल में कैदी को
भीड़भरी जेल में क्यों रखा है?

सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले राज्यों से कहा है कि वे जेलों में बंद कैदियों को पैरोल पर छोडऩे के लिए उच्चस्तरीय पैनल बनाएं जो कि सात बरस से अधिक तक कैद रह चुके सभी को पैरोल पर छोडऩे पर विचार करे। अदालत ने भारतीय जेलों में क्षमता से बहुत अधिक भरे गए कैदियों को कोरना जैसे संक्रमण से बचाने के लिए यह आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि जो विचाराधीन कैदी ऐसे मामलों में जेलों में बंद हैं जिनमें अधिकतम सजा सात बरस तक ही हो सकती है उन्हें भी ऐसी ही पैरोल दी जानी चाहिए। अदालत ने इस कमेटी की बैठक हर हफ्ते एक बार करने को कहा है। अदालत ने संक्रमण से बचाने के लिए विचाराधीन कैदियों की कोर्ट-पेशी भी रोक दी है, और एक जेल से दूसरी जेल कैदियों को भेजना भी। इसके अलावा और भी बहुत से निर्देश अदालत ने दिए हैं जो कि कैदियों की जान बचाने के लिए जरूरी हैं। 

हिन्दुस्तान में आम सोच में कैदियों के साथ कोई रियायत एक गैरजरूरी या बहुत हद तक खराब बात मान ली जाती है। जब कभी कैदी के खानपान, या उसके इलाज की बात हो, या जेलों में न्यूनतम मानवीय सुविधाओं की बात हो, लोगों को लगता है कि यह तो सजा काट रहे लोग हैं, और इन्हें कोई सुविधा या रियायत क्यों मिले? यह समझने की जरूरत है कि जब ये सुविधाएं एक न्यूनतम मानवाधिकार जितनी हों, या किसी जानलेवा बीमारी से इलाज जैसी जरूरत हो, तो एक कैदी के अधिकार जेल के बाहर के एक सामान्य नागरिक के अधिकारों के अधिक ही होनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि बाहर के नागरिक तो अपने लिए सुविधाएं जुटा सकते हैं, जेल के कैदी अपनी मर्जी से कुछ नहीं पा सकते, और वे सरकार की ही जिम्मेदारी होते हैं। 

भारत में जेलों का हाल इतना खराब है कि कैदियों के रहने की जगह नहीं, उनके नहाने या शौच की पर्याप्त जगह नहीं, और जेलों के भीतर अपराधियों का माफियाराज चलता है जो कि आम कैदियों के हक छीनने का काम भी करता है ताकि उनसे वसूली की जा सके। ऐसे में कुछ लोगों को यह लग सकता है कि आज कोरोना जैसे वायरस के संक्रमण में जेल तो सबसे ही सुरक्षित जगह है क्योंकि वह आम लोगों से कटी हुई है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है, सच तो यह है कि हजारों कैदियों के पीछे सैकड़ों जेल कर्मचारी भी तैनात रहते हैं जो कि रोज घर आते-जाते हैं, और जेल के बाहर की आम जिंदगी जीते हैं। इसलिए ऐसे सैकड़ों कर्मचारी अगर संक्रमित होते हैं, तो वे जेल के भीतर भी संक्रमण लेकर आ सकते हैं, और लबालब भरी हुई जेलों में संक्रमण फैलना बाहर के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से होगा। कल की खबर है कि पश्चिम बंगाल की एक सबसे बड़ी जेल में कैदियों ने लगातार दूसरे दिन हिंसा की क्योंकि 31 मार्च तक अदालतें बंद होने से उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई ठप्प है, और घरवालों से साप्ताहिक मुलाकात भी रोक दी गई है। इस हिंसा में कुछ लोगों की मौत की खबर भी है, और आगजनी भी हुई है। अपराधियों की घनी आबादी वाली जेलों में हो सकता है कि यह हिंसा नाजायज भी हो, और यह भी हो सकता है कि यह कोरोना की दहशत में की गई हो। लेकिन यह नौबत कुछ सोचना भी सुझाती है। 

आज जेलों के बाहर कैदियों के परिवार हैं, और हो सकता है कि उन परिवारों के पास जिंदा रहने के लिए पूरे इंतजाम न हो। कुछ लोगों को लग सकता है कि आज अगर कैदियों को पैरोल पर छोड़ा भी जाएगा, तो वे घर कैसे पहुंचेंगे क्योंकि गाडिय़ां तो बंद हैं, इसके अलावा एक दिक्कत यह भी आ सकती है कि गांवों में लोग बाहर से या जेल से आए हुए कैदी को 14 दिन भीतर न आने दें, संक्रमण से बचने के लिए बहुत से गांवों में ऐसा किया भी जा रहा है, जहां बाहर से लौटे मजदूर गांवों के बाहर ही ठहरा दिए गए हैं। लेकिन बात महज तीन हफ्तों की नहीं है, ये तीन महीनों तक भी बढ़ सकती है, और जेल में बंद कैदी का परिवार बाहर जिंदा रहने, इलाज कराने में कमजोर भी साबित हो सकता है। हो सकता है कि इटली या स्पेन की तरह बूढ़े लोग अपने आखिरी दिन देख रहे हों, और ऐसे में उन्हें परिवार के लोगों की अपने बीच जरूरत हो। इन तमाम बातों को देखते हुए कैदियों को अगले तीन महीने के पैरोल पर तुरंत छोडऩा चाहिए, इससे जेलों के भीतर सिर्फ खूंखार कैदी बच जाएंगे, और भीड़ छंटने से जेल में संक्रमण का खतरा भी कम होगा। लोगों ने एक पखवाड़े पहले पढ़ा भी होगा कि इरान में कोरोना-संक्रमण में बुरा हाल हो जाने के बाद अपनी जेलों से 54 हजार कैदियों को एक साथ रिहा कर दिया था। इस असाधारण, अभूतपूर्व खतरे के बीच जेलों की हकीकत देखते हुए, कैदियों और उनके परिवारों के मानवाधिकार देखते हुए अधिक से अधिक कैदियों को तुरंत रिहा करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बंधनकारी न मानते हुए एक संभावना मानना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 24-Mar-2020

आगे फिर किसी दिन छपकर 
पहुंचेंगे, तब तक फोन 
और कम्प्यूटर पर ही सही...

खतरे कई किस्म के होते हैं। कुछ दिखते हैं, कुछ देर से दिखते हैं, और कुछ इतनी अधिक देर से दिखते हैं कि उनसे उबरना मुमकिन नहीं होता। आज दुनिया पर कोरोना का खतरा इस तीसरी किस्म का है। कोरोना वायरस से जब लोग संक्रमण पा चुके रहते हैं, तब भी अगला एक पखवाड़ा ऐसा हो सकता है जब उसका असर उन लोगों पर न दिखे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे लोग इस बीच दूसरों में इस वायरस को बांट नहीं सकते। आम तौर पर वे औरों में इस वायरस को बांटने का एक बहुत बड़ा खतरा लिए चलते हैं। जब तक वे खुद चलता-फिरता बम साबित न हो जाएं, तब तक किसी को यह पता नहीं लगता कि उनमें कोई खतरा भी है। फिर जिस हिंदुस्तान के लिए हम यह लिख रहे हैं, उस हिंदुस्तान में लोगोंं की समाज के प्रति जिम्मेदारी बहुत ही कम है, और यह बात कोरोना को बहुत पसंद भी आने वाली है। आज इस देश में महज कुछ सौ लोग कोरोना-पॉजिटिव कहे जा रहे हैं, जो कि हकीकत में दसियों हजार भी हो सकते हैं, और आने वाले दिन ऐसे भयानक हो सकते हैं जैसे कि हिंदुस्तान के इतिहास में सौ बरस पहले 1918 में देखने मिले थे, और उस वक्त एक बैक्टीरिया से फैले प्लेग ने एक करोड़ बीस लाख लोगों को तीन महीने में ही मार डाला था। अगले तीन महीने मौतों का आंकड़ा अगर इतना पहुंच जाए, तो क्या देश उसके लिए तैयार है? क्या इतनी जलाऊ लकड़ी भी देश में है? या क्या इतनी जमीन भी कब्रों के लिए है? और जिनको यह बात बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जा रही लग रही हो, उन्हें 1897 का यह इतिहास याद रखना चाहिए कि भारत के कुछ गांवों में संक्रामक बीमारी की आशंका को हिंदुस्तानी आबादी घटाने की ब्रिटिश साजिश मान लिया था। और 1918 में ऐसी खबरें छपी थीं कि किसी फौजी जहरीली गैस के खुल जाने की वजह से हजारों मौतें हो रही हैं। कुछ उसी किस्म की साजिश की खबरें आज सौ बरस बाद फिर दुनिया की हवा में हैं, लोग चीन या अमरीका को ऐसी साजिश के पीछे मान रहे हैं। 

हिंदुस्तान आज किसी भी बड़े संक्रामक-खतरे को झेलने की हालत में नहीं है। एक से अधिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि पचीस-पचास करोड़ लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं, और लोगों को इलाज नसीब होना पूरी तरह नामुमकिन बात है। कुछ कमअक्लों का यह भी मानना है कि थाली और ताली बजाकर, या तिरंगा झंडा लहराकर कोरोना को डराकर भगाना कुछ मुश्किल होगा, और कोरोना इसे अतिथि देवो भव: वाले भारत में अपना स्वागत समारोह भी मान सकता है। ऐसे में आज जब पूरा देश बारूद के ढेर पर लापरवाही से बैठा हुआ बीड़ी पी रहा है, तो उसकी चिंगारी से तबाही कब होगी, और कितनी होगी इसका अंदाज हमारे लिए नामुमकिन है। ऐसे में कोरोना की आग को इस हिंदुस्तानी जंगल में और अधिक फैलने से रोकने की हमारी अपनी कोशिश के तहत हम हालात सामान्य होने तक आपके इस अखबार 'छत्तीसगढ़' को छापना स्थगित कर रहे हैं। बहुत से लोग कोरोना की दहशत में हैं, और उनकी समझ वैज्ञानिक भी है, और अवैज्ञानिक भी। ऐसे लोगों में से बहुत से लोगों ने हमारे हॉकरों से अखबार डालने को मना भी किया है। अखबार अपने समाचारों से तो असीमित तनाव लेकर जाता ही है, हमारे अखबार में विचार भी तनाव ही पैदा करने वाले रहते हैं। ऐसे में अखबार का कागज एक और कोरोना-तनाव लेकर जाए, यह भी कुछ ठीक नहीं है। अखबार बांटने वाले लोग आमतौर पर बहुत सीमित कमाई वाले रहते हैं, और उनकी सेहत बिगडऩे पर आने वाले दिनों में कोई इलाज मिलना भी मुश्किल होगा, इसलिए भी छपा अखबार कुछ दिनों के लिए बंद करना ही हमें बेहतर लग रहा है। 

हिंदुस्तान में अब अधिकतर आबादी के पास फोन हैं, और आधी आबादी के पास स्मार्टफोन भी हैं। ऐसे में हम अपने नियमित पाठकों तक किसी न किसी तरह पहुंच ही जाएंगे, हर दिन पहुंचेंगे, हर कुछ घंटों में पहुंचेंगे, समाचार लेकर पहुंचेंगे, विचार लेकर पहुंचेंगे, और पूरे के पूरे पन्नों के ई-पेपर लेकर भी पहुंचेंगे। आने वाले दिन हमारे खुद के लिए सोचने के होंगे, लेकिन इतना तो हमने आज सोच लिया है कि धरती पर खतरे की इस आग को हम कम से कम बढ़ाने का काम तो नहीं करेंगे।  देश के एक बड़े संपन्न अखबार ने अपनी छपाई-मशीनों पर ही अखबार छपते हुए ही उस पर सेनिटाइजर का स्प्रे करना शुरू किया है, और हो सकता है कि वैसा अखबार पाठकों के हाथों में कुछ सुरक्षित भी हो। लेकिन हिफाजत की किसी अटकल के बजाय हम पीछे बैठ जाना बेहतर समझ रहे हैं, जब तक कि हिंदुस्तान पर से करोड़ों मौतों का खतरा टल नहीं जाता। सब जिंदा रहेंगे तो छपकर पहुंचने के लिए भी बहुत लंबी जिंदगी बाकी रहेगी। फिलहाल हम कोरोना-खतरे को सीमित रखने की अपनी अखबारी-जिम्मेदारी पूरी करेंगे, और अखबारनवीसी भी जिंदा रखेंगे। आगे फिर किसी दिन छपकर आपके हाथ में पहुंचेंगे, तब तक फोन और कम्प्यूटर पर ही सही।
-सुनील कुमार


Date : 23-Mar-2020

...बीती शाम हिन्दुस्तान के एक
तबके ने बाकी दुनिया के नेताओं
के लिए रश्क का सामान जुटाया

कल हिन्दुस्तान के अधिकतर इलाकों ने एक अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई। पहले किसी जंग के मौके पर ऐसा होता था कि शाम को सायरन बजते ही सरहदी इलाकों में लोग बस्तियों में रौशनियां बंद कर देते थे ताकि दुश्मन फौज के हवाई जहाज उन रौशनियों को देखकर हमला न कर सकें। कल दिन की चमचमाती रौशनी में भी पूरे देश ने एक किस्म से घर में रहकर वक्त गुजारा, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता-कर्फ्यू के आव्हान का साथ दिया। अब शाम पांच बजे जब मोदी के मुताबिक लोगों को थाली और ताली बजाकर, घंटी बजाकर घरों के दरवाजे से उन लोगों का एक प्रतीकात्मक धन्यवाद करना था जो कि कोरोना के इस खतरे के बीच भी जनता की जिंदगी बचाने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं, तो लोगों ने पांच-दस मिनट पहले से ही आवाजें शुरू कर दीं, और बहुत से लोगों ने पहले से यह संदेश फैलाना शुरू कर दिया था कि किस तरह थाली और घंटी की आवाज, शंखध्वनि, घंटे की आवाज से कोरोना वायरस मर जाएगा। लोगों ने इसके लिए नासा के वैज्ञानिकों के निष्कर्षों का हवाला भी देना शुरू कर दिया था जो कि हाल के बरसों में हिन्दुस्तानी अफवाहबाजों के पसंदीदा स्रोत हो गए हैं। बात यहां तक रहती तो भी ठीक था। लेकिन बात इससे बहुत आगे तक बढ़ी, और देश के बहुत से लोगों ने सड़कों पर जुलूस निकाले। उनके पास दीवाली के बचे हुए पटाखे भी थे, होली के बचे हुए रंग भी थे, हाथों में गणतंत्र दिवस के बचे हुए तिरंगे झंडे भी थे, और उनके दिलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपार विश्वास भी था कि मोदी कोरोना को दौड़ा-दौड़ाकर मारेगा। 

दुनिया के किसी भी नेता को नरेन्द्र मोदी जैसे नेता से रश्क ही हो सकता है कि उनके एक आव्हान पर 25-50 करोड़ लोग इस तरह से घंटा-घंटी, ताली-थाली बजाने लग गए, कहीं भारतमाता की जय के नारे लगे, तो कहीं मोदी की जय के। सभी नारों का विस्तार इसके बाद रात तक अनगिनत शहरों में निकले, अनगिनत जुलूसों में देखने मिला जिनमें लोग ठीक वही करते रहे जो न करने की मेडिकल सलाह देश की सरकारों ने, देश और दुनिया के डॉक्टरों ने, और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें दी थी। दिन भर घर में रहे और शाम को भीड़ बन गए। हासिल क्या हुआ? करोड़ों लोगों की रोजी खत्म हुई, लेकिन नारेबाजों को देश की जिंदाबाद करने का एक मौका मिला। लोगों ने पांच बजे के घंटा-घंटी के बाद उसी अंदाज में जश्न मनाया जैसे दशहरे के दिन रावण को जलाए जाने के तुरंत बाद मनाया जाता है, यह एक और बात है कि इस जश्न से एक सिर वाला कोरोना बढ़कर दस सिर वाला हो गया, और चूंकि वह दिखता नहीं है, इसलिए उसे जलाना भी मुमकिन नहीं है। कोरोना को जलाने का कोई दशहरा आने वाला नहीं है, कोई सोनपत्ती नहीं बांटी जा सकेगी, अगर आखिर में जाकर बांटने के लिए ऐसे लोग बचेंगे तो भी। 

प्रधानमंत्री ने देश भर के लोगों को घर में रहने को कहा, वह एक सही शासकीय फैसला था, जो कि हफ्तों पहले से दुनिया की कई सरकारें लेते आ रही थीं, और उसके सकारात्मक नतीजे डॉक्टरों ने दर्ज भी किए थे। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों और दूसरे जनसेवकों के प्रति आभार व्यक्त करने को भी कहा और वह भी एक बहुत सही कदम था, लोगों को शुक्रगुजार होना आना चाहिए। लेकिन इस देश के लोगों की वैज्ञानिक चेतना पिछले कुछ बरसों में नेहरू से दुश्मनी निभाने के चक्कर में इस कदर तबाह हो गई है कि विज्ञान शब्द का वि लोगों को विरोध का वि लगने लगता है, विपक्ष का वि लगने लगता है। लोगों ने तर्कों से सोचना बंद कर दिया है, तथ्यों से सोचना बंद कर दिया है, और सत्य-तथ्य की जगह इस देश की मानसिकता में एक काल्पनिक इतिहास में जीने वाले आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद ने ले ली है। और अपने आपको विश्वगुरू मानने वाले लोगों का कोरोना भी क्या बिगाड़ लेगा, यह बीती शाम पांच बजे से लेकर रात तक सामने आया। जब दुनिया की हर मेडिकल चुनौती, या हर वैज्ञानिक चुनौती के मुकाबले हिन्दुस्तानियों के पास जिंदाबाद के कुछ नारे हैं, कुछ झंडे-डंडे हैं, तो फिर यह देश कोरोना से बचने की ताकत कहां रखता है? यह पूरा देश एक ऐसे दंभ में जी रहा है कि दुनिया का तमाम ज्ञान उसके पास था, दुनिया की सारी चिकित्सा गोबर और गोमूत्र में है, बाकी दुनिया ने हिन्दुस्तान के ज्ञान को लूटकर ही तरक्की की है। ऐसी सोच का भला क्या जवाब हो सकता है, ऐसी सोच का भला क्या इलाज हो सकता है? यह देश आज एक समूह-सम्मोहन का शिकार है, यह देश एक आत्मदंभ का शिकार है, यह देश धर्मान्धता का शिकार है, और यह देश एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है जो कि कभी न हुए इतिहास को हकीकत मानकर उसके भरोसे अपना वर्तमान जी रहा है, और अपना भविष्य बन जाने का भरोसा लिए हुए हैं। मनोचिकित्सकों के पास ऐसे मामले आते हैं जिनमें लोग काल्पनिक दोस्त देख लेते हैं, काल्पनिक दुश्मन देख लेते हैं, अपने बीते हुए वक्त के लिए अपनी कल्पनाओं पर सौ फीसदी भरोसा कर लेते हैं। ऐसे देश से अगर महज थाली-घंटी बजाने कहा जाए, तो वह वैज्ञानिक सलाह के खिलाफ सड़कों पर जुलूस निकाल रहा है, और उत्तर भारत के कुछ शहरों में तो पुलिस और प्रशासन के अफसरों ऐसे जुलूस की अगुवाई करते दिख रहे हैं जो कि कोरोना पर जीत की खुशी में निकाले गए थे। जिस देश को आज एक दहशत और आशंका में जीते हुए, जिंदगी की सबसे बड़ी सतर्कता से रहना चाहिए, वह घरों में बंद रहने के बजाय गाजे-बाजे और नाच-गाने वाले जुलूस निकाल रहा है। फिर ऐसे में गरीबों की रोजी जनता कफ्र्यू के नाम पर क्यों खत्म की गई? फेरीवाले, ठेलेवाले कल भूखे रहने के बजाय मजदूरी ही कमा लिए रहते। 

जब किसी देश से वैज्ञानिक सोच को निचोड़कर निकाल लिया जाता है, तो उसकी जनता में बचे हुए कूचे की तरह बेकाम हिस्सा ही बच जाता है। कल शाम से रात तक सड़कों पर कोरोना से नफरत नहीं, नेहरू की वैज्ञानिक सोच से नफरत नंगा-नाच कर रही थी, और जिन डॉक्टरों की तारीफ के लिए थाली-ताली का आयोजन किया गया था, उन्हीं डॉक्टरों की मौत का सामान ऐसे जुलूसों और नाच-गानों में जुटाया गया है। इस देश की जनता में से जो ऐसी प्रतिक्रिया वाली मुखर भीड़ है, वह भीड़ आधे-अधूरे आव्हान को नहीं समझती, वह ऐसे नारों के आगे-पीछे अपने शब्द जोड़ लेती है, वह अपने उन्माद को कोरोना पर जीत मान लेती है, और वह अपने झूठे दंभ से यह मान लेती है कि उनके नेता ने कोरोना को पटक-पटककर मारा है। यह मौका हिन्दुस्तान में समझदार लोगों के मलाल का है, उनकी निराशा और हताशा का है। और यह मौका बाकी दुनिया के नेताओं की ईष्र्या का भी है।
-सुनील कुमार


Date : 21-Mar-2020

कोरोना, और सरकारें...
हिन्दुस्तान में कई बरस से वरिष्ठ नागरिकों, 58 बरस से अधिक की महिला और 60 बरस से अधिक के पुरूष को रेल टिकट में रियायत मिलते आई है। अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे स्थगित किया है क्योंकि इस उम्र और इससे अधिक के बुजुर्गों पर कोरोना का हमला अधिक हो रहा है। इस बात को लेकर मोदी का मजाक भी बनाया जा रहा है कि कोरोना के बहाने से उन्होंने सरकार की बचत कर ली, लेकिन क्या यह सचमुच अकेले सरकार की बचत है? 58-60 बरस या उससे अधिक के बुजुर्गों का तीर्थयात्रा, पारिवारिक समारोहों, या इलाज के लिए सफर से परे और कौन सा आना-जाना होता है? अब इसमें से इलाज के लिए जाने पर तो पूरा मामला ही खर्चीला रहता है इसलिए रेल टिकट की रियायत बहुत मायने नहीं रखती। लेकिन जो बुजुर्ग सैलानी घूमने के शौकीन हैं, या पारिवारिक समारोहों में जा रहे हैं, उन्हें अगर रियायत कुछ वक्त के लिए रोकी जा रही है, तो यह खुद उन्हीं की सेहत के लिए बेहतर है। आज जब इटली जैसे संपन्न और विकसित देश में बुजुर्गों का कोरोना का इलाज भी नहीं हो रहा है क्योंकि उनकी बाकी जिंदगी कम हैं, और अस्पतालों की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल अधिक बाकी उम्र वाले जवानों के लिए किया जा रहा है, तो बाकी दुनिया के लोगों को भी जिम्मेदारी से सोचना चाहिए। आज जब खेलों के टूर्नामेंट रद्द हो रहे हैं, जब जवानों की ट्रेनिंग रद्द हो रही है, सरकारी और निजी दफ्तर सबको जबरिया छुट्टी दे रहे हैं, तो बुजुर्ग क्यों इस बात पर अड़े रहें कि वे रियायती सफर करेंगे ही। मोदी की आलोचना की सौ दूसरी वजहें मिल सकती हैं, लेकिन यह रियायत खत्म करना तो उन बुजुर्गों को, उनके परिवारों को, और कुल मिलाकर देश को कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी से बचाना है, और इस बात का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए। 

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। इनमें से अधिकतर बातें तो लोग अपने पूर्वाग्रह के मुताबिक कर रहे हैं जो कि भाषण का प्रसारण होने के पहले भी विशेषण तैयार लेकर बैठे थे, कुछ लोग तारीफ के विशेषण, और कुछ लोग निंदा के विशेषण। इन दोनों तबकों के तर्कों को छोड़ दें, तो कुछ बुनियादी बातें बचती हैं जो कि प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश पर सवाल खड़े करती हैं। जब वे देश को भीड़ से बचने को कहते हैं, तब उन्हीं के चुनाव क्षेत्र वाले उत्तरप्रदेश में, उन्हीं के पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रामनवमीं पर अयोध्या में दस लाख लोगों का मेला करवाने पर उतारू हैं। उन्हीं की पार्टी के नेता भोपाल में कमलनाथ सरकार गिराने की खुशी में जलसे की भीड़ लगा रहे हैं। जब उन्हीं के लोग उनकी बातों को अनसुना करते हैं, तो लोगों को लगता है कि उनकी बंदिशें क्या महज दूसरे लोगों के लिए हैं, या फिर उनकी पार्टी की कथनी और करनी के बीच रिश्ता कभी होता है कभी नहीं होता है? यह भी बेहतर होता कि प्रधानमंत्री उनकी पार्टी के बहुत से नेताओं के इन दावों पर कुछ बोलते कि गोमूत्र से कोरोना-चिकित्सा के इलाज के दावों पर जनता भरोसा न करें। प्रधानमंत्री की हैसियत से उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अवैज्ञानिक बातों को रोकें, न कि उन्हें देखते हुए भी उन पर चुप रहें। 

छत्तीसगढ़ में आम लोग लगातार शराब दुकानों के वीडियो पोस्ट कर रहे हैं कि वहां किस तरह की भीड़ लगी हुई है। जाहिर तौर पर जो गरीब हैं वे इस भीड़ में अधिक हैं, अधिक धक्का-मुक्की, छीनाझपटी कर रहे हैं, और शराबी-गरीब होने की वजह से उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता जाहिर तौर पर खासी कम होती है। कोरोना के लिए इस राज्य की शराब दुकानें, और वहां की अराजक भीड़ एक चुनौती है, और कोरोना वायरस खासा जिद्दी कहा जा रहा है। अब सरकार इस प्रदेश में होटल-चायठेले, फेरीवाले और सिनेमाघर सब कुछ बंद करवा चुकी है, वहां पर शराब को जिंदगी के लिए इतना अनिवार्य मानकर उसके लिए भीड़ का खतरा उठाकर कमाई कितनी जायज है? छत्तीसगढ़ सरकार की बाकी तमाम सावधानी शराब दुकानों पर धरी रह जा रही है, और राज्य सरकार को इस पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, इन्हें बंद करना चाहिए। लेकिन इस राज्य में शराब दुकानें भी चल रही हैं, और शराबखाने भी चल रहे हैं। लोगों का रोजगार छूट गया है, रोजी-मजदूरी वालों के घर में खाने की दिक्कत है, और ऐसे में नशे के आदी लोगों के लिए शराब दुकान खोलना, कम से कम गरीब शराबियों के परिवारों पर तो बहुत बुरी मार है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता कर्फ्यू के आव्हान का खुला समर्थन किया है, और बयान दिया है कि कोरोना रोकने की उनकी तमाम कोशिशों का छत्तीसगढ़ साथ देगा। भूपेश बघेल को खुद होकर राज्य में कुछ वक्त के लिए शराबबंदी करनी चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 20-Mar-2020

अपने भीतर इंसानियत कितनी
बची है यह तौलने का वक्त..

छत्तीसगढ़ में कल एक युवती के कोरोना वायरस से ग्रस्त मिलने के बाद राज्य एकदम चौकन्ना हो गया है, इससे परिवार के इलाके में बाजार बंद करवाए गए हैं, और अतिरिक्त सफाई हो रही है। आसपास के इलाकों में लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई है, और पिछले कुछ दिनों में यह युवती बाजार और बैंक, जहां-जहां गई थी, उन सबकी पहचान और जांच की जा रही है। सरकार लोगों के जरूरत की सूचना और चेतावनी तो दे रही है, लेकिन जरूरत से परे की जानकारी नहीं दे रही जो कि दहशत भी फैला सकती है। अब लोग एक अभूतपूर्व तनाव और खतरे से गुजर रहे हैं, लोगों को एक अभूतपूर्व सावधानी बरतनी पड़ रही है, और इस आशंका की कोई सीमा भी नहीं है कि आने वाले दिन और कितने खराब होंगे। लेकिन ऐसे में आम जनता की क्या जिम्मेदारी होती है जिसे लेकर कोई सरकारी कानून सामने नहीं आ सकते, और न ही सरकार किसी को छोटी-छोटी बातों की सलाह ही दे सकती है। 

बुरा वक्त इंसानों के भीतर इंसान जितना बचा होता है, उसकी शिनाख्त का भी होता है। आज जो लोग पैसों की ताकत और पहचान के दम पर सौ-सौ मास्क खरीदकर रख ले रहे हैं, हैंड-सेनेटाइजर के पूरे बक्से कब्जा रहे हैं, उनको यह भी समझने की जरूरत है कि वे संक्रमित समुदायों के बीच किसी टापू की तरह अकेले नहीं बच पाएंगे, वे भी और लोगों के संक्रमित होने पर मारे जाएंगे। इसलिए बेहतर यही है कि जितनी सावधानी लोग अपने बारे में बरत रहे हैं, अपने परिवार के लिए बरत रहे हैं, उतनी ही सावधानी अपने घर-दफ्तर पर, अपने कारोबार में, अपने दायरे में काम करने वाले लोगों के लिए भी बरतनी चाहिए। अस्पताल का आइसोलेशन वार्ड ही एक किस्म का टापू हो सकता है, लेकिन बाहर की दुनिया में आसपास के सभी लोगों का ख्याल रखे बिना आप कोरोना जैसे वायरस-संक्रमण से नहीं बच सकते। 

यह वक्त लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि वे सार्वजनिक जगहों को कितना साफ-सुथरा रखते हैं, अपनी धार्मिक-सामाजिक और राजनीतिक भावनाओं किनारे रखकर भीड़ बनाने से कितना बचते हैं, ये तमाम बातें आखिर में साबित करेंगी कि कोई मुहल्ला, कोई शहर, या कोई देश-प्रदेश कितने जिम्मेदार थे। केरल ने देश के सबसे शिक्षित प्रदेश, और राजनीतिक रूप से जागरूक, कानूनी अधिकारों के प्रति सजग प्रदेश होने का सुबूत दिया है, वहां की सरकार बच्चों के दोपहर के स्कूली भोजन को घर पहुंचाने से लेकर रोजी कमाने वाले कामगारों तक के जिंदा रहने का इंतजाम कर रही है, और कल केरल सरकार ने 20 हजार करोड़ का एक पैकेज घोषित किया है जो लोगों के इलाज, उनके खाने-पीने, और उनके जिंदा रह पाने का पूरा इंतजाम करने की एक बड़ी कोशिश है। सरकारों के हिस्से का काम सरकारें करें, और जनता के हिस्से का काम जनता करे तभी कुछ हो सकेगा, वरना ऐसी महामारी के वक्त एक-दूसरे के जिम्मे का काम करना मुमकिन नहीं हैं। 

जिन लोगों में थोड़ी सी भी अतिरिक्त ताकत और क्षमता है, वे आसपास देखें, कहीं कोई बुजुर्ग हो, बीमार हो, या किसी परिवार में अकेले बच्चे हों, तो उनकी जरूरतों को पूरा करने में अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं। वे अनाज न ला पाएं, और आपके घर कुछ अधिक अनाज हो तो उनके साथ बांटें, या बाजार से लाने में उनकी मदद करें, या दवाई और दूसरे सामान की उनकी जरूरत का ख्याल रखें। यह मौका इस सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि लोग खरीदने की अपनी ताकत से महीने भर का सामान खरीदने की ऐसी दौड़ शुरू न कर दें कि गरीबों के लिए सारा सामान ही महंगा हो जाए, बाजार से गायब हो जाए। यह याद रखने की जरूरत है कि भूखों के बीच अनाज के भंडार वाले लोग कभी सुरक्षित नहीं रह सकते। छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह का इतिहास यही दर्ज है कि जब लोग भूखे थे, तो उन्होंने जमींदार के अनाज-भंडार लूटकर गरीबों में बांट दिए थे। आज कुछ लोगों को यह तुलना कुछ अधिक बड़ी लग सकती है, लेकिन किसी ने यह सोचा है कि कोरोना अगर कई हफ्ते बढ़ते चले गया, तो नौबत क्या आएगी? इसलिए समाज के भीतर एक गैरबराबरी को बढ़ाना किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। 

यह वक्त खतरों के बीच ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए शुक्रगुजार होने का भी है। पुलिस, एम्बुलेंस, अस्पताल, सफाई कर्मचारी, ऐसे कई विभागों के लोग रात-दिन खतरा झेलकर भी लोगों के इलाज में, उनके बचाव में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों के लिए हम अपने इस अखबार में पिछले कई दिनों से लगातार सलाम लिख भी रहे हैं, और बीती रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके प्रति सम्मान जाहिर करने के लिए कहा है। यह सम्मान ताली या थाली बजाकर काफी नहीं हो सकता, लोगों को अपने आसपास के इन लोगों से सामना होने पर उनसे प्रेम की दो बातें भी करनी चाहिए, और अगर मुमकिन हो तो उन्हें चाय-बिस्किट के लिए भी पूछना चाहिए। यह भी पूछ लेना चाहिए कि उनके पास पीने का साफ पानी है या नहीं, उन्होंने कुछ खाया है या नहीं। यह वक्त अपने आपके भीतर यह टटोलने और तौलने का भी है कि अपने भीतर इंसानियत कितनी बची है यह तौलने का वक्त।
-सुनील कुमार


Date : 19-Mar-2020

निजी-पारिवारिक हिंसा 
और सरकार का जिम्मा

पिछले कुछ दिनों में हमारे आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर के दायरे में ही इतनी आत्महत्याएं हुई हैं कि समझ नहीं पड़ रहा कि हो क्या रहा है। सबसे भयानक तो दो नाबालिग बहनों की आत्महत्या थी जिन्होंने एक साथ फांसी लगाई, और यह चिट्ठी छोड़कर गई हैं कि उनका मामा उन दोनों से लगातार बलात्कार करता था जिससे वे थक गई थीं। अब मामा गिरफ्तार है, और दो भांजियां जा चुकी हैं। ठीक ऐसा ही एक मामला कल फिर सामने आया है जिसमें एक मामा अपनी छह बरस की भांजी की हत्या करके उसकी लाश से बलात्कार करते रहा। यह मामला आत्महत्या का तो नहीं है, लेकिन परिवार के भीतर की ऐसी हिंसा की वजह से हम उसका यहां पर जिक्र कर रहे हैं। एक बालिग-नाबालिग प्रेमीजोड़े ने दो दिन पहले एक साथ खुदकुशी कर ली क्योंकि घरवाले उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। एक अपाहिज बुजुर्ग महिला की जलकर मौत की खबर है जिसे आत्महत्या बताया जा रहा है। इसके अलावा भी कई दूसरे मामले अखबारों में छपे हैं जिनमें आत्महत्या, और परिवार के भीतर ही नाबालिगों के देह शोषण की बातें सामने आई हैं। 

आत्महत्या या परिवार के भीतर हिंसा-रेप, ये सब निजी जिंदगी की हिंसा की घटनाएं हैं जो कि चाहे अपने खिलाफ हों, चाहे परिवार के दूसरे लोगों के खिलाफ हों। यह तकलीफदेह इसलिए ही है कि इसे सरकार तो दूर, समाज भी तभी जान पाता है जब ऐसी हिंसा हो चुकी रहती है। इसे या तो व्यक्ति खुद रोक सकते हैं, अपने भीतर की हिंसा पर काबू करके, अपने तनाव को किसी करीबी के साथ बांटकर, या फिर परिवार के दूसरे लोग ऐसी हिंसा घटा सकते हैं, अगर उनकी जानकारी में ये बातें आती हैं। परिवार के भीतर बलात्कार अगर लंबे समय तक चलता है, तो यह मुमकिन नहीं रहता कि वह परिवार में किसी की भी जानकारी में न आए। आमतौर पर लोग इसे घर के भीतर ही दबा देना चाहते हैं ताकि पुलिस और कोर्ट-कचहरी जाकर बदनामी न झेलनी पड़े, परिवार न टूटे। लेकिन इसका जाहिर तौर पर पहला नतीजा यह होता है कि बलात्कार के शिकार बच्चे मुंह खोलने का हौसला खो बैठते हैं, और बलात्कारी का हौसला बढ़ जाता है कि परिवार ने इस बात को मान लिया है। हौसलों का यह खाई सरीखा फासला इस हिंसा को और बढ़ाते चलता है, और बलात्कारी एक बच्चे तक सीमित नहीं रह जाता। 

हिन्दुस्तानी समाज अपने बच्चों के साथ घर के भीतर होने वाली हिंसा की रोकथाम में सबसे नाकाबिल समाजों में से एक है। बदनामी का डर, परिवार के कमाऊ सदस्य या मुखिया को जेल से बचाने का लालच अधिकतर परिवारों में बलात्कार को छुपाने की वजह बन जाता है। ये मामले हत्या या आत्महत्या, या बहुत कम मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट से सामने आते हैं, और सामाजिक क्षेत्र के जानकार यह मानते हैं कि ये बहुत ही कम संख्या और अनुपात में रिपोर्ट होते हैं। आज जो लोग किसी दूसरी वजह से भी आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें भी ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका अपना बचपन इस तरह के यौनशोषण का शिकार रहा हो, और वे एक आत्मविश्वासविहीन, दबी-कुचली मानसिकता के साथ बड़े होते हैं, और किसी किस्म की हिंसा को बर्दाश्त करने के लायक नहीं रहते। लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड आंकड़ों पर दर्ज होता है, इसलिए जिन्होंने रिपोर्ट नहीं लिखाई या आत्महत्या नहीं की, उनका समाज को पता ही नहीं चलता। 

आज जितनी बड़ी संख्या में निजी और पारिवारिक हिंसा हो रही है, उस पर तुरंत फिक्र करने की जरूरत है। लोगों को बड़ी संख्या में पारिवारिक-परामर्श चाहिए जिसके लिए इस बात में शिक्षित परामर्शदाताओं की जरूरत है। दिक्कत यह है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे में परामर्शदाताओं की बहुत ही छोटी सी संख्या है जो कि बुनियादी तौर पर मानसिक चिकित्सकों की है। सरकार को बिना देर किए अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों में मानसिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए ताकि लोगों को मानसिक चिकित्सा से पहले मानसिक परामर्श भी हासिल हो सके। सरकार को यह बात भी याद रखनी चाहिए कि आज निजी और पारिवारिक हिंसा के जो मामले दिख रहे हैं, हो सकता है कि उनकी वजहें एक पीढ़ी पहले पैदा हुई हों, और आज जो वजहें परिवारों में पैदा हो रही हैं, हो सकता है कि उनके विस्फोटक नतीजे एक पीढ़ी बाद जाकर सामने आएं। चूंकि व्यक्तित्व को निराशा से भरने या हिंसा से भरने का काम बहुत लंबे समय बाद असर दिखाता है, इसलिए पांचसाला सरकारें उसकी अधिक फिक्र नहीं करती हैं, लेकिन यह नौबत बदलना चाहिए जो कि पेशेवर परामर्शदाताओं से ही बदल सकती है। 
-सुनील कुमार


Date : 18-Mar-2020

मजदूरों को जिंदा रखने के
लिए सीएम योगी की पहल

किसने सोचा था कि एक ऐसा दिन आएगा जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी कोई ऐसा फैसला आएगा कि जिसकी तारीफ लिखनी पड़ेगी। उन्होंने ट्विटर पर घोषणा की है कि कोरोना वायरस के बुरे असर के चलते रोजी-मजदूरी करने वाले परिवारों के जीने में दिक्कत न हो इसलिए प्रदेश सरकार ने एक तय धनराशि मजदूरों के बैंक खातों में डालने का फैसला लिया है। इस बारे में वित्तमंत्री की कमेटी तीन दिन में रिपोर्ट देगी। 

आज जब ऐसे ट्वीट की कॉपी फेसबुक पर देखने मिली, तो लगा कि योगी के लिए दिक्कत खड़ी करने के लिए यह किसी की शरारत है। लेकिन फिर योगी के ट्विटर पेज पर देखा तो यह घोषणा वहां सचमुच है। लेकिन इसके साथ ही उनके इस फैसले को लिखे बिना काम नहीं चल सकता कि कोरोना के इस भयानक खतरे के बीच योगी सरकार रामनवमी पर अयोध्या में 25 मार्च से 2 अप्रैल तक मेला करवाने पर अड़ी हुई है जिसमें देश भर से दस लाख हिन्दुओं के आने का अंदाज है। अब लाखों लोगों की ऐसी भीड़ अगर एक-दूसरे से कोरोना लेकर लौटेगी, तो देश की सरकारें उनको कैसे और कहां ढूंढेंगी?योगी का एक फैसला अ'छा है, और दूसरा फैसला शायद आज के हिन्दुस्तान में सबसे खराब सरकारी फैसला भी है। 

आज हिन्दुस्तान में कोरोना वायरस के खतरे, और उसकी दहशत के चलते एक अभूतपूर्व नौबत आई है, और इससे निपटने के लिए असाधारण कदमों की जरूरत भी है। पिछले दिनों में हम इसी जगह पर लगातार लिखते आ रहे हैं कि कोरोना का असर इंसानी सेहत से परे देश की अर्थव्यवस्था पर, बाजार और गरीबों के चूल्हों पर भी बहुत बुरी तरह पडऩे वाला है। अभी जब केरल और बिहार जैसे राज्यों ने तय किया कि स्कूलें बंद होने की वजह से जिन बच्चों को दोपहर का भोजन नहीं मिल पाएगा, उनके लिए घरों पर राशन पहुंचाने का काम होगा, या पका हुआ खाना घर भेजा जाएगा, तो हमने अन्य राज्यों से भी उम्मीद की थी कि वे भी इस बारे में सोचें कि इतने गरीब बच्चे दोपहर के खाने से वंचित कर दिए जाने के बाद किस तरह रहेंगे, और सरकार उनके लिए क्या कर सकती है। 

अभी कुछ महीने पहले की ही बात है कि साल के पहले दिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजधानी के मजदूर-बाजार, चावड़ी, पहुंचकर सुबह-सुबह ही मजदूरों को कंबल का तोहफा दिया था। आज देश-प्रदेश की हालत यह है कि बाजार की मंदी की वजह से निर्माण-मजदूर लाखों की संख्या में बेरोजगार हो गए हैं। इनमें से लाखों लोग काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना की दहशत के चलते लोग कम गए होंगे, या लौट आए होंगे। ऐसे में बेरोजगार होने वाले मजदूरों के लिए सरकार को कुछ करना चाहिए। अब क्या करना चाहिए, कितना करना चाहिए, यह तो राज्य  सरकार के खर्च करने की ताकत पर भी निर्भर करता है, क्योंकि कर्ज ले-लेकर एक सीमा तक ही जनकल्याण किया जा सकता है। सरकार को कई किस्म की दूसरी फिजूलखर्ची रोककर बेरोजगार हो जाने वाले मजदूरों, ठेले-खोमचे वालों, और असंगठित कर्मचारियों के लिए जिंदा रहने का इंतजाम करना चाहिए। दुनिया के संपन्न देशों में से एक, फ्रांस ने कोरोना की वजह से आई बेरोजगारी और मंदी की वजह से लोगों से बिजली-पानी के बिल लेना रोक दिया है। आज तो हिन्दुस्तान में भी बाजार के संगठनों की मांग है कि बैंकों को कर्ज के भुगतान की किश्तें फिलहाल रोक देनी चाहिए क्योंकि छोटे व्यापारियों की हालत तो बिल्कुल भी कर्ज चुकाने की नहीं रह गई है। 

जनकल्याणकारी राज्यों को महज कोरोना-बचाव और उससे इलाज से परे भी जिंदगी के बाकी दायरों के बारे में सोचना और कुछ करना चाहिए। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, दोपहर का भोजन, लोगों की मजदूरी, ठप्प हो गए खानपान और पोल्ट्री जैसे कारोबार, ठप्प हो गया पर्यटन और लोगों का आना-जाना, इन सबको देखते हुए सरकार को अपनी बहुत बुरी तरह घटने जा रही कमाई के बावजूद सबसे गरीब लोगों के जिंदा रहने के लिए कुछ इंतजाम जरूर करना चाहिए। सभी राज्यों को बहुत बारीकी से बाकी राज्यों के जनकल्याणकारी फैसलों को देखना चाहिए, और अपने प्रदेशों में उनकी संभावनाएं तौलनी चाहिए। फिर आज की नौबत को भारत के प्रदेशों को एक चेतावनी भी मानना चाहिए, क्योंकि कई लोगों का यह मानना है कि नौबत इससे बहुत अधिक खराब हो सकती है। वैसी हालत में क्या तो लोगों का बचाव होगा, क्या इलाज होगा, और कैसे जिंदा रहने के लिए उनका पेट भर सकेगा, यह सब एक बड़ी चुनौती होने वाली है, और जिम्मेदार सरकारों को अभी से ऐसी नौबत के लिए आपात योजनाएं बना लेनी चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 17-Mar-2020

ठकुरसुहाती के लगते फैसलों
के बाद रंजन गोगोई के संसद
जाने पर पहला पत्थर कौन...

सुप्रीम कोर्ट के पिछले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक किस्म का रिकॉर्ड कायम किया है। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्होंने लगातार जिस अंदाज में ठकुरसुहाती के फैसले दिए उनसे देश वैसे भी हक्का-बक्का है। रही-सही कसर कल तब पूरी हो गई जब राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति के मनोनीत किए जाने वाले लोगों में उनका नाम आया। भारतीय लोकतंत्र में कुछ कामों में राष्ट्रपति की बस सील लगती है, वह फैसला होता केंद्र सरकार का है। इसलिए मोदी सरकार ने उन्हें राज्यसभा में भेजने की घोषणा की, तो तुरंत लोगों को वे सारे फैसले एक बार फिर याद आए जो कि अपने आखिरी कुछ महीनों में रंजन गोगोई ने दिए थे। हर फैसला सरकार को खुश कर गया था, सरकार की सोच का था, और कानून की समझ रखने वाले लोग इस सिलसिले से हैरान भी थे। लोग रंजन गोगोई के कार्यकाल में भी उनसे इस बात के लिए हैरान थे कि उन पर जब एक मातहत छोटी कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया, तो देश के कानून को लात मारते हुए रंजन गोगोई ने उस शिकायत की सुनवाई की बेंच में खुद बैठना तय किया, और बैठे। यह अदालत का एक गजब का नजारा था जिसमें रंजन गोगोई कटघरे में भी, जज की कुर्सी पर भी थे, और बचाव पक्ष के वकील बनकर सवाल भी खड़े कर रहे थे। आज देश के बहुत से लोग अपनी उम्मीदों के खिलाफ जाकर भी रंजन गोगोई से उम्मीद कर रहे हैं कि वे राज्यसभा के इस मनोनयन से इंकार कर दें।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम रिटायर्ड लोगों को उनके कार्यक्षेत्र के किसी भी दफ्तर में बिठाने के खिलाफ लंबे समय से लिखते आए हैं। राज्यों में कई ऐसी संवैधानिक कुर्सियां और कई ऐसे आयोग बना दिए गए हैं जिन पर रिटायर्ड जजों, और रिटायर्ड अफसरों को बिठाया जा रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि अदालती फैसले सामने खड़े मामले के गुण-दोष को देखते हुए नहीं आ रहे, राज्य में खाली होने वाली बड़ी कुर्सी को देखते हुए आ रहे हैं। ऐसा ही हाल सरकारी ओहदों से रिटायर होने वाले अफसरों का है जो कि आखिरी के बरसों और महीनों में सत्ता की पसंद से सही-गलत हर किस्म के काम करते हैं, और बाद में अपनी छांटी हुई कुर्सी पर पहुंचकर मौत के करीब पहुंचने तक ऐश करते हैं। किसी राज्य में अदालत और सरकार हांकने वाले जजों और अफसरों को अगर ईमानदार बने रहने देना है, तो बाकी कई बातों के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि उस राज्य में उनका रिटायरमेंट के बाद का कोई मनोनयन न हो। अगर ये इतने ही काबिल हैं, तो कोई दूसरा राज्य उन्हें डोली में बिठाकर ले जाए, और उनकी ताजपोशी करे। 

देश में रिटायर्ड जजों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। कुछेक ऐसी कुर्सियां पहले से तय और घोषित हैं जिन पर सिर्फ रिटायर्ड जजों को ही बिठाया जा सकता है। लेकिन उनसे परे की कुर्सियां, चाहे वे राज्यसभा की हों, या देश के किसी प्रदेश में राज्यपाल की हो, या किसी और गैर-जज से भरी जा सकने वाली दूसरी कुर्सी हो, इन पर जजों को लाने का मतलब बाकी जजों को यह संदेश भेजना भी रहता है कि सरकार उनके रिटायर होने के बाद उन पर मेहरबानी भी कर सकती है।
 
अब दूसरी तरफ देखें तो कांगे्रस पार्टी ने अपने कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों को राज्यसभा भेजा था। जस्टिस बहरूल इस्लाम इंदिरा के कार्यकाल में राज्यसभा सदस्य बने थे, फिर वे इस्तीफा देकर गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज बने, और फिर एक अभूतपूर्व फैसले के तहत उन्हें रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। उन्होंने बिहार सहकारी बैंक घोटाले केस में वहां के कांगे्रसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को बरी करने वाला फैसला दिया था, और फिर सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा देकर कांगे्रस टिकट पर राज्यसभा चले गए। यह पूरा सिलसिला लोगों को अब ठीक से याद नहीं है, लेकिन यह न्यायपालिका के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। एक दूसरा मामला कांगे्रस पार्टी के नाम लिखा हुआ है जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का। वे 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच करने वाले आयोग के अकेले सदस्य थे। उनकी जांच रिपोर्ट को हिंदुस्तानी थलसेना के जनरल जगजीत सिंह अरोरा ने दंगों के शिकारों के खिलाफ पूर्वाग्रह से भरी हुई कहा था। रिपोर्ट में कांगे्रस पार्टी को क्लीनचिट दी गई थी। बाद में उन्हें 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का पहला अध्यक्ष बनाया गया, और 1998 में कांगे्रस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। इसलिए आज जब रंजन गोगोई को राष्ट्रपति की सील से राज्यसभा में मनोनीत किया जा रहा है, तो वह इन पिछली दो मिसालों की वजह से कांगे्रस से कुछ भी कहने का नैतिक हक छीन रहा है। 

अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपने जजों को इस तरह प्रभावित करने की कोशिशों या ऐसे खतरों वाली संवैधानिक व्यवस्था पर खुद होकर जब कुछ नहीं सोच रहा, तो सरकार और संसद से तो किसी तरह की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। आज रंजन गोगोई पर पहला पत्थर कौन चलाए? कम से कम कांगे्रस के तो हाथ बंधे हुए हैं, और कांगे्रस के ऐसे पुराने फैसलों में जो दूसरी पार्टियां चुप रही होंगी, उनका भी आज बोलने का हक नहीं रह गया है। जगन्नाथ मिश्र के पक्ष में फैसला देकर राज्यसभा जाना अच्छा, और मोदी सरकार की पसंद के फैसले देकर राज्यसभा में जाना बुरा कैसे हो सकता है? केंद्र और राज्यों को ऐसे बुनियादी सुधार की जरूरत है, लेकिन सरकारें अपनी बदनीयत छोड़ेंगी, यह उम्मीद फिजूल की होगी। ऐसे में इन राजनीतिक दलों से परे आम लोगों को भी ऐसा जनमत खड़ा करना होगा जिससे ऐसे जजों के लिए शर्मिंदगी खड़ी हो सके और देश की संवैधानिक व्यवस्था में एक बुनियादी मरम्मत की जा सके। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Mar-2020

इस कोरोना-तिहार पर क्या-क्या
करना ही चाहिए, यह तो सोचें...

बुरा वक्त कई जरूरी बातों को सोचने का वक्त, मौका, और वजह देता है। अब जैसे आज चारों तरफ इंसानी जिंदगी कोरोना की दहशत और चौकन्नेपन से घिर गई है, तो बहुत से लोग यह भी सोच रहे हैं कि उन्हें कोरोना हुआ तो क्या होगा? कई लोग सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अगर कोरोना-वार्ड में चौदह दिनों तक कैद रहना पड़ा तो वे क्या करेंगे? कुछ लोगों ने यह दिलचस्प सवाल खड़ा किया है कि ऐसे चौदह दिनों में वे किसके साथ रहना चाहेंगे? अब ऐसा सवाल परिवारों और जोड़ों के बीच एक लड़ाई भी खड़ी कर सकता है, अगर लोग सच बोलना तय करें। वैसे जिंदगी का तजुर्बा इंसानों को इतना तो सिखा ही देता है कि इंसानी मिजाज अधिक सच के लिए बना हुआ नहीं है, और यह भी एक बड़ी वजह है कि भाषा सच के साथ मुच जोड़कर सचमुच लिखती है क्योंकि खालिस सच न पच पाता है, न बर्दाश्त हो पाता है। लेकिन इस मजाक से परे अगर सचमुच ही यह सोचें कि जिंदगी में ऐसा वक्त आ ही गया कि कोरोना ने संक्रामक रोग अस्पताल पहुंचा दिया, और वहां से लौटना न हो पाया, तो उसके लिए अभी से क्या-क्या तैयारी करनी चाहिए। 

वैसे तो इंसानी मिजाज इस खुशफहमी में जीने का आदी भी रहता है कि बुरा तो दूसरों के साथ ही होगा, और उन्होंने तो कुछ इतना बुरा किया हुआ नहीं है कि उन्हें कोरोना पकड़ ले। लेकिन ऐसी सोच के बीच भी कम से कम कुछ लोगों को तो यह आशंका सताती होगी कि उन्हें या परिवार के किसी और को अगर कोरोना या ऐसा कोई दूसरा वायरस जकड़ेगा तो क्या होगा, और वे क्या करेंगे? इस किस्म की आशंका जिंदगी में जरूरी भी रहती है ताकि लोग यह सोच सकें कि अगर यह नौबत आ ही गई, और वे अस्पताल से नहीं लौटे, तो कौन-कौन से काम बकाया हैं जिन्हें अभी कर लेना ठीक होगा, और कौन-कौन से ऐसे नेक काम हैं जिनको किए बिना लोग उनको किसी अच्छी बात के लिए याद नहीं कर पाएंगे? ये दोनों ही बातें सोचना जरूरी है क्योंकि लोग अपने बुरे की सोच नहीं पाते हैं, और अपने अच्छे दिनों में जिम्मेदारियों को पूरा कर नहीं पाते हैं, या करने की सोचते ही नहीं हैं। 

यह मौका जब लोगों का भीड़-भड़क्के में आना-जाना कम हो रहा है, जब कारोबार कम हो रहा है, जब मामूली सर्दी-खांसी भी लोगों को घर बिठा दे रही है, जब निहायत इमरजेंसी-सफर ही किया जा रहा है, तो हर किसी के पास आज खासा वक्त है। कोरोना ने लोगों की वक्त की फिजूलखर्ची घटा दी है, और जरूरी कामों के लिए कुछ वक्त मुहैया करा दिया है, और कुछ वजहें भी। ऐसे में लोगों को बाहर कम से कम लोगों से मिलने, कम से कम मटरगश्ती करने की एक ऐसी मजबूरी भी है जो उन्हें अपने घर या अपने कमरे में कैद करके रख रही है, और इस मौके का फायदा उठाकर लोग कम से कम अपने कागजात और अपने कबाड़ छांट सकते हैं, और जिंदगी के बकाया कामों को पटरी पर ला सकते हैं। लोग मर्जी की किताबें पढ़ सकते हैं, मर्जी की फिल्में देख सकते हैं, और मर्जी का संगीत सुन सकते हैं। लोग अपनी मर्जी के लोगों के साथ रह सकते हैं, क्योंकि फिजूल के लोगों के साथ उठना-बैठना डॉक्टरी सलाह से सीमित हो चुका है। 

अंग्रेजी में कहा जाता है कि हर काले बादल के किनारे पर चांदी सी चमकती एक लकीर भी होती है। लोग अपनी जिंदगी के इस कोरोना-दौर में ऐसी सिल्वर-लाईनिंग देख सकते हैं, और उसका फायदा उठा सकते हैं। बीमारी की दहशत में आए बिना भी अपनी वसीयत कर सकते हैं, जमीन-जायदाद के कागज निपटा सकते हैं, घर में बंटवारा करना हो तो कर सकते हैं, और जिनसे दुश्मनी हो उनसे माफी मांग सकते हैं, या उनको माफ कर सकते हैं। किसी ने लिखा भी है कि अपनी जिंदगी को इस तरह बेहतर बनाया जा सकता है कि कुछ को माफ कर दिया जाए, और कुछ से माफी मांग ली जाए। कोरोना ने आज सभी को ऐसी वजहें दी हैं कि जिनसे मोहब्बत है, और उन्हें पर्याप्त शब्दों में यह बात कही नहीं जा रही है, तो पिटने का डर छोड़कर ऐसी बात कर ही लेनी चाहिए, और किसी नापसंद से ऐसी बात सुननी पड़े, तो उसे पीटना छोड़कर उसे माफ कर देना चाहिए। 

अभी किसी ने वॉट्सऐप पर एक मजेदार बात लिखकर भेजी है कि छत्तीसगढ़ के एक स्कूली बच्चे से किसी ने पूछा कि स्कूल की छुट्टी क्यों हो गई है? तो उसका जवाब था- कोरोना तिहार चल रहा है। बात सही है कि अब गर्मी और दीवाली की सिमट गई छुट्टियों के मुकाबले जब अचानक बिन मांगे एक पूरे पखवाड़े की ऐसी छुट्टी मिल जाए, तो वह कोरोना-देवता के त्योहार से कम क्या गिना जाए? 

काम-धंधे, नाते-रिश्तेदारी, आवाजाही, और आवारागर्दी से लेकर गप्पबाजी तक, इन सबसे एक पखवाड़े की जो छुट्टी मिली है, उसमें लोगों को अपनी जिंदगी की हमेशा ही लेट चलने वाली ट्रेन को पटरी पर ले आना चाहिए, और लेट को रिकवर करके एक पखवाड़े बाद के प्लेटफॉर्म पर गाड़ी समय पर पहुंचाना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Mar-2020

अपने को ऐसी नौबत में सोचकर 
कोई फैसला तो लेकर देखें...!

कोरोना के शिकार योरप के सबसे बदहाल देश इटली की खबर है कि वहां अस्पतालों की इलाज की ताकत चुक गई है, और पूरे देश में लोगों से घर के भीतर रहने कहा गया है। इटली का यह हाल देखते हुए ही अमरीका ने तकरीबन पूरे ही योरप से लोगों का अपने यहां आना बंद कर दिया है, और सिर्फ ब्रिटेन के लोगों को कड़ी मेडिकल जांच के बाद आने की छूट दी है। इटली एक विकसित और संपन्न देश है, इसलिए ऐसी किसी महामारी के लिए उसकी कोई बड़ी तैयारी नहीं थी। आमतौर पर संक्रामक रोग गरीब देशों में अधिक होते हैं, और तेजी से फैलते हैं, लेकिन इस बार चीन के बाद इटली की बारी है, और वह देश इलाज के इतने ही दिनों में बुरी तरह से थक और टूट चुका है। 

अब खबर यह है कि वहां के अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने की जगह नहीं बची है, और डॉक्टरों को यह समझ नहीं आ रहा है कि किसे बचाएं किसे छोड़ें। ऐसे में इटली में सरकार की तरफ से ऐसे निर्देश जारी हुए हैं जिनमें डॉक्टरों और नर्सों से कहा गया है कि इमरजेंसी की हालत में वे यह तय करें कि किसे बचाया जा सकता है, और किसी नहीं बचाया जा सकता है। सीमित इलाज से कौन सी जिंदगी बच सकती है, और किसे महज लंबा खींचा जा सकता है। ऐसे में कहा गया है कि यह फैसला लेना होगा कि इलाज के लायक कौन हैं? डॉक्टरों पर यह दबाव है कि जिन बूढ़े लोगों को बचाना मुमकिन नहीं दिख रहा, और जिनकी जिंदगी वैसे ही कम ही बची है उन पर मेहनत न करें। 

हुआ यह है कि कोरोना का असर 50 साल से ऊपर के लोगों पर अधिक हो रहा है। बच्चे और जवान, अधेड़ तक इसकी मार से बेअसर सरीखे हैं, लेकिन उम्रदराज लोग अपनी दूसरी बीमारियों के चलते इसके जल्द शिकार हो रहे हैं। बड़ी उम्र में बाकी बीमारियों की वजह से वैसे भी जटिलताएं बहुत बढ़ जाती हैं, इलाज के दौरान दबाव बहुत बढ़ जाता है, और सीमित चिकित्सा सुविधा का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग मरीजों को बचाने में लगता है, उससे बहुत कम मेहनत से जवान मरीजों को बचाया जा सकता है। लोगों को यह बात हैवानियत की लग सकती है कि किसी मरते हुए मरीज को छोड़ा कैसे जाए, लेकिन यह बात कुछ उसी किस्म की है कि किसी विमान पर कुल एक पैराशूट हो, और मुसाफिर कई हों, तो गिरते विमान से किस एक को बचाया जाए? या लोग आपसी बातचीत में अपने बच्चों से ही प्यार भरी मजाक में यह जानना चाहते हैं कि वे सबसे अधिक प्यार किससे करते हैं? 

कुछ ऐसे ही बात डॉक्टरों के सामने उस वक्त आ जाती है जब एक बिस्तर हो, और दस मरीज हों। एक इंजेक्शन हो, और दस मरीज हों। ऐसे में डॉक्टर करे तो क्या करे? एक ही इंजेक्शन को बांटकर दस लोगों को लगाना तो बेअसर होगा, इसलिए लगाना किसी एक को ही है। ऐसे में सबसे बुजुर्ग को बचाया जाए जिसकी कि जिंदगी थोड़ी ही बाकी है, या सबसे जवान को बचाया जाए जिसकी जिंदगी सबसे लंबी बाकी है? यह फैसला बहुत ही मुश्किल है, और हमारा अंदाज है कि दुनिया के कोई भी डॉक्टर ऐसे फैसले की नौबत में घिरना चाहते नहीं होंगे। लेकिन आज इटली में ऐसी ही नौबत आ गई है। हम तो हिन्दुस्तान जैसे देश के बारे में इलाज की ताकत चुक जाने की बात सोचते थे जहां पर सरकारी भ्रष्टाचार अस्पतालों को बेहाल करके रखता है, जहां गरीबी की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बहुत अधिक रहता है। लेकिन इटली के बारे में ऐसा सोचा नहीं था। फिर भी जब ऐसी नौबत आ गई है तो वहां के डॉक्टर क्या करने जा रहे हैं? 

इसका जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है अगर हम आईने में अपनी बदशक्ल देखने का हौसला जुटा सकते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों कमाऊ और नौजवान लोग हैं जिन्होंने अपने बूढ़े मां-बाप को जीते-जी मरने सरीखी हालत में छोड़ रखा है। ये लोग अपने बच्चों, अपनी अगली पीढ़ी का तो ख्याल रखते हैं, लेकिन अपनी पिछली पीढ़ी, अपने मां-बाप के जिंदा या मुर्दा रहने की जिन्हें परवाह नहीं है। ऐसे ही लोगों की वजह से वृद्धाश्रम चलते हैं, और ऐसे ही लोगों की वजह से बूढ़े मां-बाप बंद घरों में मर जाते हैं, और उनकी लाशें महीनों बाद मिलती हैं। दुनिया का रिवाज ही कुछ ऐसा है। बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जो कि वहां के अकाल के दौर पर बनी थी। उस फिल्म में जब बूढ़े लोग उत्पादक नहीं रह जाते हैं, तो सीमित अनाज के बेहतर इस्तेमाल के लिए लोग अपने बुजुर्गों को ईश्वर दिखाने के नाम पर एक पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें नीचे फेंक देते हैं। गांव के बुजुर्गों को इस बात का अहसास रहता है कि ईश्वर को देखकर कोई भी वापिस नहीं आते हैं। फिल्म में एक बूढ़ी मां, या बूढ़े बाप को पहाड़ी से नीचे फेंकने का ऐसा भयानक नजारा है जिसमें नीचे धकेलकर जब गिराया जाता है, तो वे अपने जवान लड़के के पैर पकड़कर लटके रहते हैं, और बेटा उन्हें लात मार-मारकर नीचे गिराता है। जब जिंदगी के साधन सीमित रह जाते हैं, तो लोग अपनी उस खूबी को खो बैठते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में इंसानियत कहा जाता है। लोगों को एक दूसरी सच्ची घटना याद होगी कि एक मुसाफिर विमान एक बर्फीली पहाड़ी पर गिर जाता है, और उसके बहुत से मुसाफिर बच जाते हैं। बाद में कुछ खाने को नहीं रहता, तो वे अपने बीच के मरे हुए लोगों का गोश्त खाने लगते हैं। 

इटली में जो हो रहा है वह बहुत तकलीफदेह, और बहुत हैवानियत वाला जरूर लग रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि लोगों के पास एक रोटी हो, और आखिरी कौर के लिए मरते हुए अपने खुद के बच्चे हों, और खुद के मां-बाप हों, तो लोग बच्चों को ही बचाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी लंबी बाकी है। जिनको यह बात अटपटी लग रही हो, वे अपने को ऐसी नौबत में सोचकर कोई फैसला तो लेकर देखें...!
-सुनील कुमार


Date : 14-Mar-2020

बाकी भीड़ तो घट गई, लेकिन
शराबी-धक्का-मुक्की का क्या?

दुनिया भर में आज कोरोना को लेकर जिस तरह का खतरा खड़ा हुआ है, ऐसा इसके पहले किसी दूसरे मौके पर याद नहीं पड़ता। लेकिन इसके साथ-साथ इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए जिस दर्जे की सावधानी बरती जा रही है, वैसी सावधानी भी पहले कभी याद नहीं पड़ती। दूसरे कई देशों पर कोरोना की मार अधिक बुरी हुई है, चीन, दक्षिण कोरिया, ईरान, और इटली में मौतें सैकड़ों में हैं, चीन में तो हजारों में हैं, और हिन्दुस्तान में मौत का खाता अभी खुला ही है। अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पहली बार किसी खतरे को गंभीरता से लिया है, और पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी है। जिस न्यूयार्क में हर कदम पर कदम पड़ते दिखते थे, वहां सड़कें और सब-वे खाली पड़े हुए हैं। वहां के बड़े-बड़े स्टोर में लोग सामान अधिक से अधिक उठाते हुए एक-दूसरे से मारपीट भी कर रहे हैं। भारत चूंकि साफ-सफाई के मामले में लापरवाह देश है, इसलिए यहां पर न तो कोई तैयारी अधिक दिख रही है, न ही लोगों में उतनी दहशत दिख रही है। फिर भी भारत में सरकारों ने खतरे को गंभीरता से लिया है। 

अलग-अलग प्रदेशों में कोरोना के फैलने को रोकने के लिए अलग-अलग किस्म की तैयारी दिखाई है, और कई बरस बाद शायद यह अकेला ऐसा मुद्दा है जिस पर केन्द्र और राज्यों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ है, और राज्यों ने केन्द्र की सलाह को तुरंत ही मान लिया है। बहुत से राज्यों में इस पूरे महीने के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं, हॉस्टल खाली करवा लिए गए हैं, मेले-ठेले पर रोक लगा दी गई है, कांफ्रेंस-सेमीनार, टूर्नामेंट-भर्ती कैंप सब पर इस महीने के लिए तो रोक लग ही गई है। जैसा कि हिन्दुस्तान में हर खतरे और समस्या के मामले में होता है, कोरोना से बचाने के लिए भी कहीं दस रूपए में झाड़ा उतारा जा रहा है, तो कहीं ताबीज बनाकर दी जा रही है। अब चीन से आए कोरोना को अगर हिन्दी, और बाकी हिन्दुस्तानी भाषाएं पढऩा आता होता, तो फिर डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रहती, और कोरोना खुद ही ऐसे इश्तहारों को पढ़कर हॅंसते-हॅंंसते मर गया होता। आज ही एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो कि ऐसे अंधविश्वासों से ठीक उल्टी है, और छत्तीसगढ़ के एक मंदिर में पुजारी भगवान की आरती उतारते हुए भी मास्क लगाए हुए हैं। हालत यह है कि हिन्दी-हिन्दुस्तान में भी मास्क, वायरस, और सेनेटाइजर जैसे अंग्रेजी शब्द अंग्रेजी में ही अधिक समझे जा रहे हैं, इनका हिन्दी ढूंढने की कोशिश भी भाषा के कट्टर लोगों ने नहीं की है। 

केरल ने दूसरे राज्यों के मुकाबले कुछ अधिक तैयारी की है, और जाहिर है कि राज्य अधिक पढ़ा-लिखा होने से वहां पर ये बातें लागू भी करना आसान है। वहां की सरकार ने राज्य के जिन लोगों को मेडिकल जांच होने तक अपने घरों में रहने का आदेश दिया है, उन परिवारों को पका हुआ खाना पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा स्कूलें बंद की गई हैं, इसलिए स्कूली बच्चों को भी दोपहर का खाना घर पर पहुंचाया जा रहा है। हिन्दुस्तानी की जमीनी हकीकत यह है कि गरीब बच्चों में से अधिकतर ऐसे हैं जो स्कूल के दोपहर के भोजन की वजह से पेट भर खा पाते हैं, और अगर यह पूरा महीना स्कूल बंद रहती है, तो उनके खानपान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। बिहार ने स्कूली बच्चों के भोजन का पैसा उनके बैंक खातों में डालना तय किया है ताकि परिवार अपना इंतजाम खुद कर सके। देश के बाकी राज्यों को भी अपने स्कूली बच्चों की फिक्र करते हुए उनका इंतजाम करना चाहिए, और जरूरत हो तो ऐसे हर परिवार को राशन दुकानों से अतिरिक्त राशन देना चाहिए ताकि गरीब चूल्हों पर अधिक बोझ न पड़े। 

कुछ राज्यों में सिनेमाघरों को बंद करवा दिया गया है क्योंकि वहां सीमित और बंद जगह में अगर कोरोना वायरसग्रस्त लोग पहुंचें, तो वह एक बड़ी दिक्कत हो सकती है। कई राज्यों में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, और उन्हें इस खतरे, और इस बचाव के बारे में सोचना चाहिए। इससे अलग, छत्तीसगढ़ में एक अजीब सी मांग सामने आई है कि सरकार स्कूल-कॉलेज, लाइब्रेरी-जिम के साथ-साथ शराब दुकानों को भी बंद करे क्योंकि वहां पर लोगों की भारी भीड़ लगती है। यह बात सही है क्योंकि लोग सीमित संख्या में रह गई दुकानों पर असीमित संख्या में भीड़ लगाते हैं, और आज छत्तीसगढ़ में ऐसे किसी वायरस के संक्रमण का एक बड़ा खतरा ऐसी शराबी-भीड़ को हो सकता है। अब रोज शराब पीने के आदी लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं होगा कि वे पूरे महीने बिना शराब के रहें। वैसे भी राज्य में पड़ोसी राज्यों से आई हुई शराब गाडिय़ां भर-भरकर पकड़ा रही है, इसलिए दारू दुकानों को बंद करने का मतलब सरहद से तस्करी बढ़ाना भी होगा। इसलिए दिन में 11 घंटे खुलने वाली शराब दुकानों पर लगने वाली अंधाधुंध भीड़, धक्का-मुक्की, और मारपीट को घटाने के लिए सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या दुकानों के खुलने के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, ताकि ऐसी बड़ी भीड़ न लगे? यह बात एक अलोकप्रिय राय लग सकती है, लेकिन लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए कई किस्म के कड़वे, अवांछित तरीके भी इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। अगर दुकानें सुबह और जल्दी खुलें, और देर रात तक चलती रहें, तो इन पर भीड़ घटेगी, और अधिक घंटों में फैल जाएगी। 

फिलहाल न सिर्फ सरकार को, बल्कि समाज और परिवार को भी बहुत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना के इलाज का भी कोई बड़ा इंतजाम हिन्दुस्तान में नहीं है, न ही इसकी कोई अधिक दवाएं बनी हैं, और न ही साल-दो साल इससे बचाव के टीके आते दिख रहे हैं। ऐसे में सावधानी मेें ही समझदारी है, और वैसी समझदारी में ही जिंदगी है। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Mar-2020

कोरोना से मरें न मरें, मंदी से भी मारे जा सकते हैं...

बाकी दुनिया के साथ-साथ हिन्दुस्तान का शेयर बाजार जिस किस्म के तूफान का शिकार दिख रहा है, उससे इसमें पूंजीनिवेश करने वाले लोगों को समझ आनी चाहिए। जनता के बीच शेयर बेचकर उनके पैसों से खरबों की कंपनियां खड़ी करना, उनमें दसियों हजार करोड़ के बैंक-कर्ज भी ले लेना, और फिर जालसाजी-धोखाधड़ी करके भाग जाना, शेयर बाजार और भारतीय कारोबार का यह मिजाज पिछले बरसों में अच्छी तरह साबित हो चुका है। बहुत से लोग इसे पहले से सट्टा बाजार सरीखा मानते आए हैं, और शेयर बाजार में पूंजीनिवेश के खिलाफ बोलते आए हैं। लेकिन बीच-बीच में कुछ ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें शेयर बाजार की पूंजी एकाएक कई गुना बढ़ी हुई दिखती है, और ऐसी गिनी-चुनी मिसालों को देखकर देश भर के आम पूंजीनिवेशक इसमें कूद जाते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि मायानगरी कही जाने वाली मुंबई में फिल्म उद्योग में होता है जहां लोग चकाचौंध के शिकार होकर पहुंचते हैं, पूरी जिंदगी संघर्ष करते रहते हैं, और उनमें से कुछ गिने-चुने लोग कामयाबी और शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचते हैं, जिन्हें देखकर दूसरे लोग भी वहां संघर्ष के लिए जाते हैं, और जवानी से अधेड़ हो जाने तक लगे रहते हैं।

आज हिन्दुस्तान में आम लोगों के सामने एक बहुत बड़ी दिक्कत यह है कि वे अपनी जमा पूंजी कहां लगाएं? बैंकों में रखें तो बैंकों का कभी भी दीवाला निकल जाता है, सरकार कभी भी रकम निकालने पर रोक लगा देती है। घर में नगदी रखें तो भी दिक्कत है क्योंकि अगली नोटबंदी कौन से नोट बंद करवा देगी इसका ठिकाना नहीं है, और चोरी हो जाने, आग में खत्म हो जाने का भी खतरा है। सोना खरीदकर रखें, तो भी एक खतरा है कि सरकार किसी भी दिन सोने की सीमा पर एक कानून लाने जा रही है, और उसके बाद उसे कैसे जायज ठहराया जाएगा? उसे सुरक्षित कैसे रखा जाएगा क्योंकि चोरों की नजर सबसे पहले सोने पर होती है। खुले बाजार में रकम ब्याज पर चलाने से डूब जाने का खतरा रहता है, जमीनों में पूंजीनिवेश करने पर सरकार कभी भी जमीनों का इस्तेमाल बदल देती है, और जमीन मिट्टी के मोल की हो जाती है। इस तरह आज हिन्दुस्तान में लोगों के बीच अपनी जमा पूंजी को सम्हालकर रखने में बड़ा असमंजस चल रहा है।

दूसरी तरफ आज दुनिया के बाकी बाजारों की मंदी की असर से हिन्दुस्तान में भी हर किस्म के पूंजीनिवेश पर असर पड़ रहा है क्योंकि देश के कारोबार पर भी असर पड़ रहा है। बाजार में ग्राहकी घट रही है, कंपनियों का दीवाला निकल रहा है, दूसरे देशों से सामानों के आने पर सरकार की कब कैसी नीतियां हो जाएंगी उनका ठिकाना नहीं है, इसलिए हिन्दुस्तानी उद्योगपति और कारोबारी मंदी के अलावा असमंजस के शिकार भी हैं। देश की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट है, बेरोजगारी आसमान पर है, लोगों की खर्च करने की क्षमता चुक गई है। ऐसे में लोग किस धंधे में अपना पैसा लगाएं? और न लगाएं तो क्या करें क्योंकि घर में रखे-रखे तो कोई पैसा कमाई देता नहीं है। आज जिस तरह से कोरोना जैसी एक बीमारी ने चीन से शुरू होकर कुछ महीनों के भीतर ही पूरी दुनिया का कारोबार चौपट कर दिया है, और हिन्दुस्तान के स्कूल-कॉलेज बंद करवा दिए हैं, मैच-मेले बंद हो गए हैं, और करोड़ों लोगों का रोजगार, उनकी कमाई फिलहाल तो खत्म ही हो गई है। चारों तरफ एक ऐसी धुंध छाई हुई है कि आम लोगों को कुछ नहीं सूझ रहा है, और खास लोग दूसरे खास लोगों को डूबते देखकर कम से कम यह तसल्ली तो पा रहे हैं कि वे अकेले नहीं डूब रहे हैं, या अभी तक तो नहीं डूबे हैं।

यह वक्त ऐसा है कि आम लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि अपने आपको जिंदा रखने का इंतजाम भी भारी पडऩे वाला है। दिन इतने खराब हो सकते हैं कि जिसकी कभी कल्पना न की हो। ऐसे में आने वाले दिनों को लेकर हर किसी को एक बड़ी तैयारी करनी है, बहुत सावधानी से रहना है, अगर कोरोना जल्दी भी चला जाएगा, तो भी जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों और कारोबार की कमर तोड़ दी थी, यह कोरोना भी लोगों की कमर तोडऩे जा रहा है, पूरे देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था को खत्म करने जा रहा है। और सरकार पर लोग निर्भर करते हैं, लोगों पर सरकार निर्भर करती है, इसलिए हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि आने वाला वक्त बहुत ही खराब हो सकता है, और जो उसके लिए तैयार नहीं होंगे वे कोरोना से मरंे न मरें, वे मंदी से भी मारे जा सकते हैं।

-सुनील कुमार

 


Previous123Next