संपादकीय
छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल में आने वाली खरीफ फसल से एक नई नीति मंजूर की है जिसके तहत सरकार धान पर किसानों की निर्भरता कम करने के लिए एक नगद प्रोत्साहन देने वाली है। सरकार ने कल कहा है कि इस मानसूनी फसल से ही यह शुरू होगा कि धान की जगह पर दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी, या कपास जैसी फसल लेने वाले किसानों को सरकार 15 हजार रूपए प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि देगी। सरकार का यह मानना है कि इस फैसले से राज्य में धान से परे की दूसरी फसलों को भी मौका मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी, साथ ही फसल विविधीकरण होगा। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार बीते दो विधानसभा चुनावों में धान के दाम देश के समर्थन मूल्य से खासे अधिक बढ़ाकर अपने ऊपर बहुत बड़ा बोझ डाल चुकी है। 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी ने भी धान के खासे अधिक दाम देना तय किया था, और कांग्रेस की सरकार बनी तो कृषि कर्जमाफी के साथ-साथ यह अधिक दाम किसानों को दिया गया। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से भी दस कदम आगे बढक़र धान के दाम 31 सौ रूपए क्विंटल करने की घोषणा की थी, साथ ही प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदने की भी। अभी बीते मानसूनी मौसम के बाद दीवाली के समय आई फसल सरकार पर एक बहुत बड़ा बोझ बनकर आई थी, और सरकार को यह निगरानी भी रखनी पड़ी थी कि पड़ोसी राज्यों से धान लाकर इस प्रदेश में बेचकर यहां की सरकारी अनुदान राशि का बेजा इस्तेमाल न हो। इन सबके बावजूद, और जगह-जगह सरकार ने धान खरीदी की प्रक्रिया में छेद बंद करने के लिए कई तरह की कार्रवाई भी की थी, फिर भी दूसरे प्रदेशों से आया हुआ धान जगह-जगह गाडिय़ों सहित पकड़ाते भी रहा। इसलिए राज्य मंत्रिमंडल का यह फैसला सरकार को आर्थिक मुसीबत से बचाने के लिए भी कोई घाटे का सौदा नहीं है। 15 हजार रूपए प्रति एकड़ देने की सरकार की घोषणा से 60-65 हजार रूपए प्रति एकड़ की धान खरीदी से सरकार बचेगी।
फसल का समर्थन मूल्य देश में एक बड़ा राजनीतिक और चुनावी मुद्दा बन चुका है। इसका देश की कृषि अर्थव्यवस्था से रिश्ता पूरी तरह टूट गया है। किसानों को अनुदान कई किस्म से मिलते हैं। उन्हें कृषि कर्ज बहुत मामूली ब्याज पर मिलता है, अधिकतर राज्यों में खेतों को बिजली रियायती या मुफ्त मिलती है। इसके साथ-साथ अब यह चुनावी चलन बढ़ते चल रहा है कि राष्ट्रीय समर्थन मूल्य से आगे जाकर राज्य फसल खरीदी करें। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद ओडिशा के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को 31 सौ रूपए के ही धान खरीदी मूल्य की घोषणा करनी पड़ी थी, और इसके साथ वह वहां सत्ता पर आ पाई थी। लेकिन धान की फसल के साथ एक दूसरी दिक्कत और है। यह फसल ढेरों पानी मांगती है, और हर जगह न तो नहर का पानी रहता है, न हर वक्त मानसून का पानी जरूरत के वक्त मिलता है, इसलिए किसान पंप लगाकर खेतों को भूगर्भीय जल से लबालब भर देते हैं। बीती कुछ सरकारों के समय से यह भी चल रहा है कि खेती के पंपों को सोलर पैनलों से जोड़ दिया गया है, खेतों के पंप की बिजली मुफ्त कर दी गई है। इन सबके साथ-साथ जब फसल बाजार भाव से बहुत ऊंचे दाम पर खरीदी जाती है, तो यह सब कुछ किसान को एक अनुदान के रूप में ही दिया जाता है। दुनिया के तमाम देशों में किसानों को ऐसे अनुदान मिलते हैं, और आज ट्रम्प जिस अंदाज में दुनिया के देशों के साथ बंदूक की नोंक पर व्यापारिक समझौते कर रहा है, उनमें से बहुत सारी शर्तें अमरीकी किसानों की उपज दूसरे देशों पर थोपने की भी हैं। दुनिया के कुछ देश अपने किसानों को कोई उपज न लेने के लिए भी प्रति एकड़ नगद अनुदान देते हैं। छत्तीसगढ़ में भी अगर देखें, तो हर एकड़ पर सरकार जो करीब 65 हजार का धान खरीदने का वायदा कर चुकी है, उसकी आधे से अधिक उत्पादकता सरकार को शायद नहीं मिलती है। धान की खरीदी की प्रक्रिया, मिलिंग की प्रक्रिया, खुले में पड़े हुए धान की बर्बादी, और फिर उस धान की औने-पौने रेट पर बिक्री, इन सबको अगर देखें, तो सरकार की बहुत बड़ी सब्सिडी धान किसान को मिलती है।
देश में गाडिय़ों के कारोबारियों के संघ ने जानकारी दी है कि पहली बार बिकी हुई तमाम गाडिय़ों में इलेक्ट्रिक गाडिय़ां 11 फीसदी से अधिक हैं। इसके साथ-साथ इस महीने जमकर बैटरी गाडिय़ां बिकी हैं। ये कहने के लिए बैटरी गाडिय़ां होती हैं, इनकी बैटरी तो बिजली से ही चार्ज होती है। सडक़ों पर ये भूत की तरह पीछे से बेआवाज पहुंचकर आगे निकल जाती हैं, या लालबत्ती पर खड़ी हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। इनके बढऩे से सडक़ों पर प्रदूषण घट रहा है, और शोरगुल भी कम हो रहा है। अभी देश में इन गाडिय़ों की बिक्री एकदम से बढऩे की वजह समझ में आती है कि डीजल-पेट्रोल न सिर्फ लगातार महंगा होते चल रहा है, बल्कि उसकी कमी भी चल रही है, जगह-जगह पेट्रोल पम्प सूखे पड़े हैं, और कमी का फायदा उठाते हुए पंप कारोबारी अब महंगा प्रीमियम पेट्रोल टिकाने लगे हैं। लेकिन इन सबके बीच यह बात अपनी जगह कायम है कि यह देश बैटरी गाडिय़ों के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पा रहा है। ग्राहक तो तैयार हैं, सरकार ही तैयार नहीं है, कारोबार तैयार नहीं है।
बीते कुछ दशकों के भारत को देखें, तो जिस तरह बैंकों के एटीएम चारों तरफ खुले, और आम लोग अब रोजमर्रा की नगदी निकालने के लिए बैंक जाना तकरीबन बंद कर चुके हैं। एक वक्त टेलीफोन के एसटीडी-पीसीओ हुआ करते थे जहां जाकर लोग दूसरे शहरों में, या अपने शहर के किसी नंबर पर भी फोन लगाते थे, अब मोबाइल टेक्नॉलॉजी ने इन सारे पीसीओ को बंद करवा दिया है, और नई पीढ़ी को यह याद भी नहीं है कि एक वक्त ऐसी कोई मजबूरी हुआ करती थी। इसी तरह आज लोगों को घर-घर अपनी गाडिय़ों की चार्जिंग का इंतजाम करना पड़ता है, इसके लिए घरेलू बिजली कनेक्शन की क्षमता बढ़वानी पड़ती है, और जिन लोगों के पास घर के भीतर, या अहाते में चार्जिंग प्वाइंट लगाने की सहूलियत नहीं है, उन्हें घर के बाहर खतरा उठाकर चार्जिंग करनी पड़ती है। नतीजा यह है कि लोग नई टेक्नॉलॉजी पर जाना चाहते हैं, लेकिन सरकार की, और कारोबार की भी तैयारी नहीं है।
आज दुनिया के अलग-अलग बहुत से देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी चार्जिंग के कई तरह के मॉडल काम कर रहे हैं। सबसे सफल मॉडल वे हैं जो बैटरी को एक मिनट में बदल देते हैं। ऐसे चार्जिंग स्टेशन लगे हुए हैं जहां बैटरियां चार्ज होती ही रहती हैं, और लोग जाकर गाड़ी रोकते हैं, वहां उनकी बैटरी बदल दी जाती है, और घरों में चार्जिंग की मजबूरी नहीं रहती है। लेकिन इसके लिए देश की सरकार को कारोबार के साथ मिलकर पहले तो बैटरियों के आकार-प्रकार को एक सरीखा करना पड़ेगा। कुछ चुनिंदा आकार और क्षमता की बैटरियों की शर्त बैटरी और वाहन निर्माताओं पर लगानी होगी, तभी बैटरी बदलना संभव और आसान हो पाएगा। अभी लगातार हम अपने शहर में ये खबरें पढ़ते हैं कि स्थानीय सरकार के पास ऐसे चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए बजट आकर रखा हुआ है, लेकिन वे जगह नहीं तय कर पा रहे हैं, चार्जिंग शुरू नहीं कर पा रहे हैं। बैटरी बदलना एक आदर्श व्यवस्था होगी, लेकिन जब तक वह नहीं होती है, तब तक चुनिंदा जगहों पर चार्जिंग की व्यवस्था करने के लिए बहुत मामूली सी कल्पनाशीलता की जरूरत है।
लोग मॉल जाते हैं, रेस्त्रां जाते हैं, या किसी और जगह पर जाते हैं जहां घंटा-दो घंटा उनकी गाड़ी खड़ी रहती है। ऐसी जगहों पर अगर चार्जिंग का विकल्प मुहैया कराया जाए, तो लोग शौक से वहां गाड़ी छोडक़र जा सकते हैं। अब तो तमाम गाडिय़ों में यह दिख जाता है कि बैटरी में कितने फीसदी चार्जिंग है। चार्जिंग स्टेशन इसका रिकॉर्ड रखकर आगे की चार्जिंग का भुगतान ले सकते हैं, और दुनिया के विकसित देशों में तो चार्जिंग स्टेशन किसी मोबाइल ऐप से भी जुड़े होंगे कि लोग अपने फोन पर अपनी गाड़ी की चार्जिंग देख सकें। आज भी बहुत से निजी गाडिय़ों की बैटरी चार्जिंग मोबाइल फोन पर देखी जा सकती है। इसके अलावा जिन बड़े दफ्तरों में काम करने वाले लोगों की गाडिय़ां वहां घंटों खड़े रहना तय रहता है, वहां भी कंपनी या सरकार चार्जिंग स्टेशन लगा सकती है, और हो सकता है कि कोई निजी कंपनी भी गाडिय़ों की नियमित पार्किंग वाली ऐसी जगहों पर चार्जिंग प्वाइंट लगाने का कारोबार शुरू कर सके। यह तो एक लगातार बढऩे वाला कारोबार है, और लोगों को चार्जिंग का विकल्प जगह-जगह हासिल रहना चाहिए, उसी से इलेक्ट्रिक गाडिय़ों का इस्तेमाल बढ़ेगा, और डीजल-पेट्रोल की गाडिय़ां बढऩा थमेगा।
यूपी के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस के खड़े किए हुए एक केस की धज्जियां उड़ाते हुए, उसे पूरी तरह फर्जी, झूठा, गढ़ा हुआ बताते हुए आला अफसरों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की हैं। गाजियाबाद के एक परिवार के खिलाफ पुलिस ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। जमीन-जायदाद और रूपए-पैसे के लेनदेन से जुड़ा हुआ यह मामला आपस का एक सिविल केस था, इसमें किसी संगठित अपराधी गिरोह का हाथ होने का कोई सुबूत या संकेत नहीं था, फिर भी अफसरों ने गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला बनाया, और 35 बरस की एक गृहिणी को भी करीब 80 दिन जेल में रखा। यह मामला हम जज की नजरों से ही देखते हैं, और हमें अपनी संपादकीय टिप्पणियों की अधिक जरूरत नहीं रहेगी।
जस्टिस विनोद दिवाकर ने 31 पन्नों के फैसले में यह लिखा है कि कई अफसर संविधान और कानून के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय राजनीतिक आकाओं को खुश करने को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरी फिक्र जताई। फैसले में लिखा- फील्ड में तैनात अफसर ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था को अच्छी तरह समझते हैं, और उसी के अनुसार अपना व्यवहार तय करते हैं। इस मामले में गाजियाबंद के पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जज ने लिखा कि इस अफसर ने अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए इस केस में गैंगस्टर एक्ट की मंजूरी दी। उन्होंने कहा कि यूपी में नेताओं और अफसरों की सामंती मानसिकता अभी भी जारी और असरदार है, जहां संवैधानिक शासन को व्यक्तिगत राज का औजार बना दिया जाता है। जज ने लिखा कि कानून के शासन को ‘कामकाज में असुविधा’, माना जाता है, और कई अफसर संवैधानिक दायित्व के बजाय कानून के शासन की सुविधा देखते हैं। जज ने लिखा- कानून का शासन लोकतंत्र की नींव है, जब पुलिस और प्रशासनिक तंत्र राजनीतिक दबाव में काम करने लगते हैं, तो नागरिकों के संवैधानिक अधिकार कमजोर होते हैं। उन्होंने कहा कि गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल ‘असुविधाजनक व्यक्तियों’ के खिलाफ निशाना लगाकर इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि असली अपराधी और संगठित गिरोह इससे कोई अधिक प्रभावित नहीं हो रहे हैं। कुल मिलाकर जस्टिस विनोद दिवाकर ने यह कहा है कि यूपी पुलिस और अफसर संविधान से अधिक राजनीतिक आकाओं के प्रति वफादार हैं। जज ने इस कड़े फैसले में पुलिस कार्रवाई को खारिज कर दिया।
इस मामले में अदालत ने कहा कि किसी तरह की हिंसा, धमकी, दबाव, जनजीवन में अशांति, या संगठित अपराध जैसी किसी भी बात का कोई सुबूत पुलिस ने नहीं रखा है। हो सकता है कि आरोपियों ने किसी से वित्तीय धोखाधड़ी की हो, लेकिन उसे संगठित गैंग चलाना नहीं कहा जा सकता। जज ने कहा कि पुलिस ने सिर्फ खोखले दावे सामने रखे हैं। जज ने लिखा कि एक घरेलू महिला को बिना किसी सुबूत और संकेत के गैंगस्टर एक्ट में गिरफ्तार करके 80 दिन जेल में रखा गया। इस पूरी कार्रवाई को जज ने पूरी तरह से गैरकानूनी, मनमानी, और कानून के बेजा इस्तेमाल का मामला बताया, और यह भी लिखा कि पुलिस कमिश्नर ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी जरा भी नहीं निभाई। जज ने लिखा कि कड़े कानूनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, और पुलिस के अधिकारों का बेजा इस्तेमाल इस मामले में दिखता है। जज ने कहा कि छोटे-छोटे मामलों में गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है, और बड़े गैंगस्टर बचे रहते हैं।
पिछले कुछ दिनों में भारत में कई बार डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ गए, और कई बार रसोई गैस या कमर्शियल गैस के। इसके पहले कि राज्य सरकारें बसों का भाड़ा तय कर सकें, ऑटोरिक्शा का भाड़ा तय कर सकें, ईंधन के दाम एक बार फिर बढ़ जाते हैं। ऐसे में बस चलाने वाले कारोबारी सरकार का इंतजार किए बिना अपनी मर्जी से ही जितना चाहे उतना किराया बढ़ा दे रहे हैं। और माल परिवहन करने वाले ट्रकों सरीखे कारोबार पर तो पहले से ही कोई सरकारी काबू था नहीं। अब हालत यह होती है कि ट्रांसपोर्ट के कारोबार में ईंधन खर्च एक हिस्सा रहता है, पूरा का पूरा कारोबार सिर्फ ईंधन के खर्च पर टिका नहीं रहता। लेकिन जब दो फीसदी या चार फीसदी रेट पेट्रोल-डीजल का बढ़ जाता है, तो कारोबारी भाड़े को भी कम से कम उतना फीसदी तो बढ़ा ही देते हैं, और कई बार तो उससे कई गुना अधिक भी बढ़ा देते हैं। इसका कोई तर्क नहीं होता क्योंकि बस-ट्रक कारोबार में ईंधन के अलावा भी कई और चीजों का खर्च रहता है, और उन सबका भाव तो ईंधन जितना बढ़ा नहीं है। जहां पर सरकार की मर्जी रहती है, वहां पेट्रोलियम जैसी चीजों का दाम रातों-रात कितना भी बढ़ा दिया जाता है। इस देश में पेट्रोलियम के दाम तय करने का एकाधिकार सरकार, या पेट्रोलियम कंपनियों का है। ऐसे में जब हर कुछ दिनों में दाम बढ़ते हैं, तो बाजार अपने को उस रफ्तार से बदल नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि दो सौ रूपए की बस टिकट 210 की हो जानी थी, लेकिन वह 240 कर दी जाती है।
इस देश में केन्द्र सरकार में पिछले एक दशक से अधिक से अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ते में तेल पाया है। अर्थशास्त्रियों का अंदाज है कि जब तेल सरकार को पानी के भाव मिल रहा था, तब भी सरकार ने जनता को पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं दिया, गैस-सिलेंडर महंगा ही बनाए रखा। इसलिए उस पूरे दौर में जो लाखों करोड़, या दसियों लाख करोड़ की कमाई सरकार को हुई है, उससे सरकार के पास बचत का एक खजाना तो बना ही है। आज पहले रूस-यूक्रेन की जंग, और फिर ईरान पर अमरीकी-इजराइली हमलों को देखें, तो कुछ चीजें भारत सरकार की पहुंच से परे की हो सकती हैं, लेकिन यह बात कहीं से भी गले नहीं उतरतीं कि सरकार हर कुछ दिनों में अपनी मर्जी से रेट बढ़ाती चले। बाजार व्यवस्था को कच्चे माल के दाम का एक भरोसा लगता है। भारत में डीजल-पेट्रोल, और गैस के भाव तीन-तीन महीने में न सही, कम से कम एक महीने तक तो नहीं ही बढऩे चाहिए। अब मान लें कि सरकार यह तय कर ले कि हर महीने की एक तारीख को उस पूरे महीने के लिए पेट्रोलियम के दाम घोषित कर दिए जाएंगे, तो जो लोग बाजार में इसे कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हैं, कारोबारी इस्तेमाल करते हैं, वे कम से कम एक महीने के लिए तो निश्ंिचत हो सकेंगे, और यह तय कर सकेंगे कि जून में समोसा कितने का बेचना है, बसों की टिकट इस महीने कितनी होगी, और जहां कहीं ऑटोरिक्शा मीटर से चलते हैं, वहां तय हो जाए कि प्रति किलोमीटर का भाड़ा इस महीने कितना होगा।
हम जो सुझा रहे हैं, उसमें सरकार को न किसी तरह की दिक्कत होगी, न ही सरकारी खजाने को किसी तरह का नुकसान होगा। पेट्रोलियम से होने वाली कमाई की तिजोरी खासी बड़ी रहती है, किसी महीने अगर सरकार को खरीदी में तेल कुछ महंगा मिला, तो उसकी भरपाई सरकार अगले महीने भाव बढ़ाकर भी कर सकती है। आज सडक़ किनारे कहीं पर कुछ खाएं-पिएं, तो उसके दाम कब कितने बढ़ जाते हैं, उसका ठिकाना नहीं रहता। ठेले-खोमचे वालों का तर्क रहता है कि गैस कब कितनी महंगी हो गई, उन्हें पता ही नहीं रहता, और उन्हें लागत निकालने के लिए रेट बढ़ाना पड़ता है। यही पेट्रोलियम रेट अगर तीन-तीन महीने में एक बार तय हो, तो सरकार पिछले तीन महीनों के अपने नफा-नुकसान को देखकर अगले तीन महीनों का रेट तय कर सकती है, क्योंकि यह कोई मौसमी सामान तो है नहीं, घर और बाजार दोनों की इसकी बारहमासी जरूरत रहती है, और सरकार बड़ी आसानी से पिछले तीन महीनों का अपना खाता देखकर एक बार अगले तीन महीनों के रेट तय कर सकती है।
अपने ही देश की जनता, और उस जनता से जुड़े हुए कारोबार को लेकर सरकार का एकाधिकारी रूख जब सनकी या मनमानी होने लगता है, तो जनता में एक अनिश्चितता छा जाती है। मानो यह कोई सरकारी कारोबार नहीं है, बल्कि सरकारी मिजाज है जो कि ट्रम्प के मिजाज की तरह कभी भी ऊपर-नीचे आता-जाता है। आम जनता तो अपने घर का, काम या पढ़ाई पर आवाजाही का, बजट बनाने की जरूरत रहती है। बाजार पेट्रोलियम या ऐसे दूसरे सामानों का रेट देखकर अपने सामानों की लागत निकालता है, और बिक्री का रेट तय करता है। यह सिलसिला हर दो-चार दिन में बदलने वाले रेट की वजह से ठीक से चल ही नहीं पाता। जिस तरह देश या प्रदेशों में टैक्स साल में एक बार, बजट में घोषित किया जाता है, और फिर वह अगले वित्तीय वर्ष में बारह महीने लागू होता है, तो उससे लोग अपना आगे का हिसाब-किताब लगा पाते हैं।
हाईकोर्ट के कुछ जजों के निजी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, आदेशों, या फैसलों से उन जजों की असहमति का तो इतिहास रहा है, किसी-किसी जज ने कोई जवाबी टिप्पणी भी की हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तीखी आलोचना कोई हाईकोर्ट करे, ऐसा याद नहीं पड़ता है। और खासकर मद्रास हाईकोर्ट के जज ने अभी जो ताजा आलोचना की है वह तो कुछ ज्यादा ही गंभीर है। यह मामला एक विधानसभा चुनाव के बाद की चुनाव याचिका का था जिसमें कुल 49 वोटों से जीत हुई थी। हारने वाले ने जब चुनाव याचिका दायर की, तो 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने पुनर्गणना का आदेश दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नतीजा घोषित करने पर रोक लगा दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 6 साल से ज्यादा वक्त तक पड़े रहा। अभी 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील का निपटारा करते हुए कहा कि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इसलिए अब इस याचिका पर कोई फैसला करना निरर्थक होगा। सुप्रीम कोर्ट के दिए गए मतगणना पर स्थगन का फैसला खत्म हो जाने के बाद अब 3 जून 2026 को मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी.जयचंद्रन ने अंतिम फैसला सुनाया, और 2016 के चुनाव में जिस उम्मीदवार को मतगणना में 49 वोट से हारा घोषित किया गया था, उसे 103 वोटों से जीता हुआ घोषित किया। 2016 के चुनाव का नतीजा अब 10 बरस बाद 2026 में जाकर पलटा है, और 2016 से 2021 तक का कार्यकाल जिसने विधायक के रूप में पूरा कर लिया, अब उसकी हार की घोषणा से किसकी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है?
यह मामला बताता है कि देश में चुनाव याचिकाओं पर फैसले की जो रफ्तार है, उनके चलते हुए सबसे बड़ी हार तो उन मतदाताओं की होती है जिनके चुनाव क्षेत्र में गलत व्यक्ति की जीत घोषित हो जाती है, और कार्यकाल पूरा करने के बाद उसे अपात्र या हारा हुआ घोषित किया जाता है। यह कुछ उसी किस्म का मामला है कि किसी की मौत की 5वीं बरसी पर सरकारी अस्पताल से उसके इलाज के लिए दवाइयां जारी की जाएं। जस्टिस जी.जयचंद्रन ने इस मामले में लिखा कि जो कुछ हुआ उसे सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण कहना काफी नहीं है। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट को 6 साल बाद भी यह तय करना चाहिए था कि याचिका सही थी या नहीं, बजाय इसके कि चूंकि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इस पर फैसला निरर्थक है कहने के। हाईकोर्ट जज ने याद दिलाया कि 2015 में उसने ही मोहम्मद अकबर और अशोक साहू के मामले में यह आदेश दिया था कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा तेजी से किया जाना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस अंदाज में इस मामले को बिना फैसला सुनाए खत्म कर दिया है, उसे हाईकोर्ट ने न्याय का गंभीर मजाक बताया है, और चेतावनी दी है कि अगर अदालतें अपने ही दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करती रहीं, तो देश तानाशाह देशों की राह पर जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि दस साल तक एक ऐसे व्यक्ति को विधायक के रूप में बिठाया गया जिसे बाद में अदालत ने गैर चुना हुआ पाया। मतदाताओं को दस साल एक प्रतिनिधि के साथ रहना पड़ा, जो वैध रूप से चुना ही नहीं गया था। हाईकोर्ट जज की टिप्पणी इस बात के लिए बड़ी गंभीर है कि उन्होंने यह आशंका जताई है कि यह देश उन कुछ देशों की तरह तानाशाही की तरफ जा सकता है जिन्होंने 75 साल पहले भारत के साथ आजादी पाई थी। हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून का भी जिक्र किया जिसमें याचिका का निपटारा 6 महीने के भीतर करने का प्रावधान है। जज ने लिखा कि इस प्रावधान को बहुत ही सहूलियत से अनदेखा (सुप्रीम कोर्ट द्वारा) किया गया। जज ने लिखा कि चुनाव विवादों में इतनी लंबी देरी लोकतंत्र को कमजोर करती है, और वयस्क मताधिकार की मूलभावना को नुकसान पहुंचाती है।
यह बड़ा ही दिलचस्प मामला है, जो कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की असहमति की वजह से देश में एक बार फिर चुनाव याचिकाओं में देरी के मुद्दे को चर्चा में ला सकता है। जमीन-जायदाद, या दूसरे कई किस्मों के मामलों से चुनाव याचिकाएं इस मायने में अलग रहती हैं कि जब ये चलती रहती हैं, तब विधानसभा, संसद, या किसी और सदन में उस सदस्य का कार्यकाल भी चलते रहता है। किसी सदस्य के कार्यकाल को चुनाव याचिका के चलते हुए रोका नहीं जा सकता। और सदन का ही कार्यकाल जब पूरा हो जाता है, तब उस मामले में जीते हुए सदस्य के खिलाफ अगर फैसला आता है, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? कार्यकाल तो निकल ही चुका रहता है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के विधायक मोहम्मद अकबर के मामले में यह आदेश दिया था कि चुुनाव याचिकाओं को तेजी से सुना जाए। और वही सुप्रीम कोर्ट, देश की सबसे बड़ी अदालत, खुद ही अपने दिए हुए एक स्थगन आदेश पर 6 बरस बैठी रही, और विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने का तर्क देते हुए उसने केस को बिना फैसला सुनाए खत्म कर दिया।
हाईकोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट की तरह संवैधानिक कोर्ट होता है। वह भी संविधान के प्रावधानों की व्याख्या कर सकता है। हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के ऊपर किसी तरह का अधिकार नहीं रखता, बल्कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपील का कोर्ट रहता है, और सुप्रीम कोर्ट के कुछ किस्म के आदेश हाईकोर्ट के लिए बंधनकारी भी रहते हैं। लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट के जज ने जिस अंदाज में सुप्रीम कोर्ट को आईना दिखाया है, वह बड़ा दिलचस्प है। और चूंकि यह एक संवैधानिक मुद्दा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट यह तर्क भी नहीं ले सकता कि हाईकोर्ट ने उसकी आलोचना की है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल देर लगाकर मामले को हाईकोर्ट को वापिस भेजा है, तब तक मतदाताओं के फैसले की मौत हो चुकी थी, तो श्रद्धांजलि सभा में हाईकोर्ट जज की कही हुई बातें सुप्रीम कोर्ट की आलोचना के बिना पूरी नहीं हो सकती थीं।
भारत के इम्तिहानों की नाकामयाबी पर एक तंज की तरह ट्विटर पर शुरू कॉकरोच जनता पार्टी को अमरीका में पढ़ रहे एक भारतवंशी छात्र अभिजीत दीपके ने बनाया था, और वह ऑनलाईन सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर उतरते-चढ़ते कभी कहीं पर ब्लॉक होते, तो कभी कहीं पर मशहूर होते अब सडक़ पर आ रही है। कल 6 जून को अभिजीत के दिल्ली पहुंचने पर इसका पहला आयोजन जंतर-मंतर पर एक शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की शक्ल में करने की घोषणा हुई है। नीट पेपर लीक और सीबीएसई इम्तिहानों की गड़बडिय़ों को लेकर केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफे की मांग कल का मुख्य मुद्दा घोषित किया गया है। दो दिन पहले ही पार्टी ने अपने तीन राष्ट्रीय प्रवक्ता घोषित किए हैं, जिनके बारे में सोशल मीडिया पर दूसरे लोग जीवविज्ञान की प्रयोगशाला में मेंढक के किए जाने वाले डिसेक्शन की तरह चीर-फाड़ कर रहे हैं। अब भारत में बहुत सारे तबके जो कि अब तक मोदी समर्थक, और मोदीविरोधी जैसे एकदम साफ-साफ बंटे हुए खेमों में बंटे हुए थे, वे एकदम से दुविधा में आ गए हैं कि कॉकरोच का डिसेक्शन कैसे किया जाए?
दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी अगर इतनी शोहरत नहीं पाती, सोशल मीडिया पर उसके हफ्ते भर में करोड़ों फॉलोअर नहीं हो जाते, तो सब लोग अपने-अपने खेमों के तम्बुओं में चैन से बैठे सोशल मीडिया पर जुगाली करते रहते। लेकिन कॉकरोच अचानक खाने में आ जाने से, लोगों को अब समझ नहीं पड़ रहा है कि इसे खाएं कैसे, इसके बाद जुगाली कैसे करें, या इसे बिना खाए छोड़ दें? हिन्दुस्तान के लोग अलग-अलग विचारधाराओं, नेताओं, और राजनीतिक दलों के तजुर्बों से थके हुए भी हैं, और गरिष्ठ हिन्दी में कहें तो दिग्भ्रमित भी हैं। हाल के दशकों में इस देश ने अरविंद केजरीवाल एंड गैंग को जिस तरह से देखा था, उससे देश में तरह-तरह की राजनीतिक साजिश आईआईटी से निकले उस नौजवान तिलचट्टे को लेकर बाद में लोगों के बीच चर्चित हुई। ऐसी अपराधकथाओं के कोई सुबूत तो होते नहीं हैं, लेकिन कई लोगों का अब यह निष्कर्ष है कि केजरीवाल, अन्ना हजारे, रामदेव, रविशंकर, जस्टिस हेगड़े, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जैसे दर्जन भर से अधिक चर्चित लोग भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर एकजुट हुए थे, लेकिन बाद में समझ पड़ा कि इनका अकेला मकसद उस समय की यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के तात्कालिक आरोपों का झंडा फहराना था, और देश में अविश्वास की एक ऐसी हवा खड़ी करनी थी जो कि 2014 के आम चुनावों को प्रभावित कर सके। इस गैरराजनीतिक कहे जा रहे आंदोलन के कई साथी बाद में मोहभंग से अलग होते चले गए, और इन सबने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि केजरीवाल ने उन्हें इस्तेमाल कर लिया। लोगों को याद भी होगा कि सीएजी की एक कल्पना-आधारित रिपोर्ट को लेकर, जनलोकपाल नाम की एक रामबाणी कल्पना सामने रखकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन नाम का यह आंदोलन आम आदमी पार्टी की सरकारों में तब्दील हुआ, और बाद के राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना था कि यह कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने के लिए भाजपा का ही खड़ा किया हुआ एक मोर्चा था। इस तरह की राजनीति के कोई सुबूत नहीं रहते, इसलिए हम अलग-अलग लोगों के विश्लेषण ही यहां रख रहे हैं।
अब जब कॉकरोच जनता पार्टी कल जमीन पर उतर रही है, उसी तरह दिल्ली में एक मंत्री के इस्तीफे की मांग लेकर सार्वजनिक आंदोलन करने जा रही है, अपने को गैरराजनीतिक करार दे रही है, तब केजरीवाल के आंदोलन की याद आना स्वाभाविक है। केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक धूमकेतू की तरह आए थे, और परंपरागत राजनीतिक पार्टियों से थकी हुई जनता ने उन्हें ईमानदारी और नैतिकता के मसीहा की तरह सिर पर बिठाया था, यह अलग बात है कि उनका अंत सरकारी सादगी की अपनी घोषणाओं को कुचलते हुए दिल्ली में अपने लिए शीशमहल बनवाने तक चले गया था, और अगर भाजपा ने उन्हें खड़ा किया था, तो केन्द्र की भाजपा सरकार की सीबीआई ने ही उन्हें उसी तरह सत्ता से हटा दिया, जिस तरह केजरीवाल एंड गैंग ने 2014 में यूपीए को सरकार से हटा दिया था।
भारत में केजरीवाल से जले हुए लोग कॉकरोच को भी फूंक-फूंककर खा रहे हैं। इसमें कुछ अनहोनी बात नहीं है। सार्वजनिक जीवन के तजुर्बे आने वाले लोगों के लिए कई बार ऐसी ही दिक्कतें खड़ी करते हैं। भारत के कुछ राजनीतिक दल बड़ी सावधानी से कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध करने से बच रहे हैं, कुछ लोग इसे मोदी सरकार की ही एक योजना बता रहे हैं ताकि केन्द्र सरकार की बड़ी असफलताओं की तरफ से ध्यान हटाया जा सके, और केन्द्र के एक मंत्री तक ही उसे सीमित किया जा सके। अगर ऐसा है भी, तो इसमें कुछ अनहोनी बात नहीं है, क्योंकि दुनिया भर में सरकारें ऐसी स्पिन डॉक्टरी कही जाने वाली हरकतें करती हैं। अमरीका में जब एपस्टीन फाइलों के कंकाल व्हाइटहाऊस के बाहर सडक़ पर कुछ ज्यादा ही नाचने लगे, तो ट्रम्प ने इजराइल के झांसे में ईरान पर हमला कर दिया। इसके बाद जब ईरान ट्रम्प की जिंदगी की सबसे बड़ी शिकस्त बन गया, तो इसकी तरफ से ध्यान हटाने के लिए बीती आधी सदी से और पहले की भी उडऩतश्तरियों, और यूएफओ की फाइलें जारी कर दी गईं। अमरीका और दुनिया को ट्रम्प ने दर्जनों अलग-अलग चीजों में ऐसे उलझाया कि एपस्टीन का नाम ही खबरों से गायब हो गया।
उत्तराखंड की एक खबर है कि घर में माँ के पकाए हुए खाने के टिफिन लोगों के घरों तक पहुंचाने वाली एक लडक़ी, मीनाक्षी ने उत्तराखंड पीएससी का इम्तिहान न सिर्फ पास किया है, बल्कि राज्य में ये पांचवें नंबर पर आई हैं, और डिप्टी कलेक्टर बनने जा रही हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा का यह पद राज्य की पीएससी में किसी भी प्रदेश में सबसे ऊपर माना जाता है। बहुत अभाव चाहे न सही, लेकिन संघर्ष की जिंदगी से गुजरते हुए मीनाक्षी जहां तक पहुंची है, वहां तक पहुंचने के लिए तमाम राज्यों में संपन्न परिवारों के बच्चे भी साल-दो साल लाखों रूपए की कोचिंग लेते हैं, और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य हो, तो पीएससी के चेयरमैन को आधा-एक करोड़ रूपए रिश्वत देकर परिवार के एक-दो लोगों को डिप्टी कलेक्टर बनवा लेते हैं। यह एक अलग बात है कि रिश्वत देने, लेने, और रिश्वत से चुने गए ये सारे लोग अब जेल में हैं। लेकिन हम आज की बात पीएससी के भ्रष्टाचार पर नहीं करना चाहते, बल्कि इस सकारात्मक पहलू की चर्चा करना चाहते हैं कि संघर्ष की आग से तपकर भी किस तरह खरा सोना सामने आता है। मीनाक्षी की बड़ी बहन अभी एक साल पहले ही इसी पीएससी इम्तिहान से सांख्यिकी अधिकारी बनी, और उसे देखकर मीनाक्षी ने भी तैयारी की, यूपीएससी का इम्तिहान भी दिया, जिसमें वह 5 नंबरों से चूक गई।
देश में हर बरस यूपीएससी इम्तिहान, या अलग-अलग प्रदेशों के सरकारी नौकरियों के बड़े इम्तिहानों के नतीजे आने पर यह पता चलता ही है कि कहीं किसी ऑटोरिक्शा ड्राइवर की बेटी ने कामयाबी पाई, तो कभी किसी मजदूर के बेटे ने। जो सामने तैरते हुए नाम हैं उनके मुताबिक महाराष्ट्र के जालना के अंसार शेख के पिता ऑटो चलाते थे, और माँ खेतों में काम करती थी। अपने कुनबे के पहले ग्रेजुएट अंसार ने रोज 12-13 घंटे पढ़ाई की, और पहली ही कोशिश में वे आईएएस बने। एक दूसरे गरीब छात्र हिमांशु गुप्ता स्कूल जाने के लिए रोज 70 किलोमीटर का सफर करते थे, पिता का हाथ बंटाने के लिए चाय की दुकान पर भी काम किया था, और यूपीएससी में तीसरी कोशिश में वे आईएएस बने। यूपी के पीलीभीत जिले के नुरूल हसन की पढ़ाई और कोचिंग के लिए उनके पिता ने अपनी जमीन तक बेच दी, और गरीबी से उठकर वे आईपीएस बने। इन इम्तिहानों से परे कई दूसरे किस्म की सफलता की कहानियां भी हैं। क्रिकेट सितारे एम.एस.धोनी के पिता एक पंप ऑपरेटर थे, लेकिन मेहनत और प्रतिभा ने साधारण परिवार के धोनी को भी आसमान तक पहुंचा दिया। कुछ ऐसा ही उत्तर-पूर्व की मीराबाई चानू का है, वे भी बिल्कुल साधारण परिवार से उठकर टोकियो ओलंपिक में रजत पदक तक पहुंचीं। एम.टी.आर. नाम का एक बड़ा फूड ब्रांड खड़ा करने वाले दक्षिण भारतीय भाईयों ने होटलों में वेटर का काम भी किया था, और वहां से आगे बढक़र उन्होंने यह कारोबारी सफलता पाई। क्रिकेट पर लौटें, तो भारतीय टीम में पहुंचे उमेश यादव के पिता कोयला खदान में काम करते थे, मुनाफ पटेल का परिवार भी बहुत गरीब था, भुवनेश्वर कुमार यूपी के मेरठ के एक गरीब परिवार थे, इरफान पठान और युसूफ पठान सूरत की एक मस्जिद में पले-बढ़े, और उनके पिता वहीं मस्जिद में नौकरी करते थे, रविन्द्र जडेजा के पिता एक निजी सुरक्षा कार्यालय में चौकीदार थे, यशस्वी जायसवाल ने मुम्बई के आजाद मैदान में टेंट में रहकर गुजारा किया, और पेट पालने के लिए गुपचुप भी बेचा, टी.नटराजन एक बिहारी पिता के बेटे थे, और माँ सडक़ किनारे खाना बेचती थी, सिमरन शेख मुम्बई के धारावी स्लम में रहने वाले एक वायरमैन की बेटी हैं जिन्हें महिला प्रीमियर लीग में भारी कीमत पर खरीदा गया है, नामी हो चुकी मुक्केबाज मैरीकॉम मणिपुर के एक गरीब किसान परिवार की हैं, और उनके पास ट्रेनिंग के लिए जूते तक नहीं थे, फिर भी वे छह बार विश्व मुक्केबाजी चैंपियन बनीं।
देश के प्रमुख उद्योगपति हर्ष गोयनका सोशल मीडिया पर बड़े सक्रिय रहते हैं, खुद भी लगातार कई सकारात्मक बातें पोस्ट करते हैं, और उन्हें कोई बहुत जरूरतमंद दिख जाते हैं, तो उनकी मदद भी करते हैं। अभी उन्होंने स्विटजरलैंड की एक होटल के मैनेजर का भारतीय पर्यटकों के लिए जारी किया गया एक नोटिस एक्स पर पोस्ट किया है। इस नोटिस में भारतीयों से होटल के कुछ नियमों का पालन करने को कहा गया है। यह कहा गया है कि सुबह के नाश्ते पर जितनी चीजें टेबिलों पर सजाई जाती हैं, वे सिर्फ नाश्ते पर खाने के लिए हैं, उन्हें लपेटकर, बैग में डालकर, लंच के लिए न ले जाएं। अगर उन्हें दोपहर के खाने के लिए कुछ चाहिए, तो उसके लिए अलग से ऑर्डर करें, और उसका भुगतान करें। होटल में ठहरे दूसरे मेहमानों का ध्यान रखते हुए साफ-सफाई और शिष्टता बरतने को भी कहा गया है। यह भी कहा गया है कि पूरी दुनिया से आए हुए मेहमान होटल में रूकते हैं, और उन सबको अच्छा लगेगा, अगर बाकी लोग शांति बनाए रखें। कॉरीडोर और बाल्कनी में धीरे बात करने की सलाह भी दी गई है। होटल का यह नोटिस पोस्ट करते हुए हर्ष गोयनका ने लिखा है कि यह सिर्फ हिन्दुस्तानियों के लिए बनाया गया देखकर वे हक्का-बक्का रह गए, और सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने आगे लिखा है कि सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तानी किसी रेस्त्रां में गरबा करते दिखते हैं, और किसी एयरपोर्ट पर भी। विमानतलों पर वे जोरों से बातचीत करते हैं, और विमान के भीतर वे पिकनिक मनाने के अंदाज में बर्ताव करते हैं। उन्होंने लिखा कि स्विटजरलैंड के दावोस में उन्होंने एक भारतीय कारोबारी को एक क्लब में इतने जोर से पंजाबी संगीत बजाते हुए देखा कि पूरा शहर उसे सुने। उन्होंने लिखा कि भारत अगर सचमुच एक वैश्विक सुपर पॉवर बनना चाहता है, तो दुनिया के सामने बेहतर बर्ताव रखना होगा। सार्वजनिक जगहों पर हिन्दुस्तानियों की नागरिक जिम्मेदारियों को सुधारने की गंभीर जरूरत है।
किसी भी होटल की लॉबी में गरबा करते हुए लोगों के समूह दिख जाते हैं। अभी एक एयरपोर्ट में विमान के ठीक बगल में दूसरे मुसाफिरों के आने-जाने के बीच में इसी तरह का ग्रुप डांस किया जा रहा था, और दूसरे लोग हक्का-बक्का थे। एक वीडियो चीन की दीवार पर दुनिया भर के पर्यटकों के बीच हिन्दुस्तानियों के गरबा का भी आया है, और इसके लिए जाहिर है कि वे अपना संगीत तो बजाते ही हैं। भारत के भीतर भी एयरपोर्ट पर विमान के इंतजार में संगीत बजाकर दर्जनों लोगों का एक साथ गरबा करना कई जगह देखने में आया है, और गरबा के मौसम से परे भी यह बारहमासी मनोरंजन दूसरों को तकलीफ पहुंचाने की हद तक चलते रहता है। दूसरे देशों में तो घूरते और टोकते हुए लोगों की वजह से हिन्दुस्तानी कहीं-कहीं पर कुछ धीमे भी बोलने लगते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के भीतर तो कोई प्रदेश ऐसा नहीं है जहां के एयरपोर्ट पर मोबाइल फोन पर चीख-चीखकर बात करने वाले लोग न दिखते हों। लोग अपनी पारिवारिक और निजी बातें, कारोबारी, और राजनीतिक बातें, यहां तक कि मोहब्बत और वैध-अवैध संबंधों की बातें, तमाम किस्म की गालियों के साथ दर्जनों और लोगों को सुनाई पड़े, इतनी जोरों से करते हैं। कई लोग किसी एक एयरपोर्ट पर खड़े हुए फोन पर अपने किसी और शहर में होने की झूठी जानकारी देने में भी कोई लिहाज नहीं करते। एक मोबाइल फोन ने लोगों को किसी भी सीमा से परे बदतमीज बनाकर रख दिया है, और सार्वजनिक जगह पर अपनी जिम्मेदारी, और दूसरों के अधिकार का सम्मान इस देश में पश्चिमी संस्कृति के दुष्प्रभाव मान लिए जाते हैं।
भारत से दूसरे देशों में गए हुए पर्यटकों के वीडियो और उनकी कहानियों से सोशल मीडिया लबालब रहता है। देश-विदेश की होटलों के कमरों से चोरी इतनी आम बात है कि उसे हिन्दुस्तानी पर्यटक अपना राष्ट्रीय अधिकार मानकर चलते हैं। एक वीडियो तो किसी देश का ऐसा देखने मिला था जहां होटल के कर्मचारियों ने भारत के एक परिवार से होटल छोड़ते हुए बार-बार अनुरोध किया कि अगर उन्होंने होटल का कोई सामान लिया है, तो कृपया उसे निकाल दें। इस पर वह परिवार होटल के कर्मचारियों पर चीखने लगता है। लेकिन जब सुरक्षा कर्मचारी कार में लद चुका सामान उतरवाते हैं, और एक-एक सूटकेस-बैग को खोलते हैं, तो उसमें से होटल से चुराए गए बिजली के आयरन, हेयरड्रायर से लेकर तकिया, चादर, टेलीफोन, और जाने क्या-क्या सामान निकलते ही चले जाता है। जब चोरी किए गए सामानों का ढेर लग जाता है, और हिन्दुस्तानी परिवार को यह समझ आ जाता है कि अब उन पर कानूनी कार्रवाई तय दिख रही है, तो पूरा परिवार होटल कर्मचारियों के सामने हाथ जोडक़र गिड़गिड़ाने लगता है, माफी मांगने लगता है। यह सिलसिला हिन्दुस्तानी होटलों में ठहरने के दौरान भी चलते रहता है, और दूसरे देशों में जाने के बाद तो वहां कई और किस्म के सामान दिखते हैं, जिन्हें देखते ही लार टपकने लगती है।
दूसरी तरफ जापानी लोग हैं कि दुनिया के किसी देश में जाते हैं, वहां किसी स्टेडियम में अगर जापान की टीम खेल रही है, तो वे मैच खत्म होते ही बड़े-बड़े झोले लेकर पूरे स्टेडियम में किसी भी दर्शक के फेंके गए खाने-पीने के पैकेट-बक्से, और खाली बोतलों को उठाकर सारा कचरा साफ करते हैं, और उसे ले जाकर बाहर छोडऩा अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी मानते हैं। हिन्दुस्तानियों को लेकर दुनिया का तजुर्बा यह रहता है कि वे जहां जाते हैं, गंदगी फैलाते हैं, शोर फैलाते हैं, सार्वजनिक सहूलियतों को चुराने की कोशिश करते हैं। हिन्दुस्तान से कई देशों को जाने वाली उड़ानों में बाथरूम में रखे जाने वाले लिक्विड सोप की बोतल की चोरी देखकर एयरलाईंस बोतल को बिना ढक्कन रखती है, लेकिन मौलिक सूझ-बूझ से संपन्न हिन्दुस्तानी पर्यटक घर से खाली ढक्कन लेकर जाते हैं, और वहां की बोतल में उसे लगाकर तुरंत ही हासिल करने के लिए विमान में चढ़ते ही शौचालय भागते हैं। वहां रखे हुए कागज के नेपकिन को गट्ठा-गट्ठा जेब में भर लेते हैं। जब विमान में चॉकलेट, या शराब की छोटी बोतलें पेश की जाती हैं, तो हिन्दुस्तानी उसे तब तक उठाने में लग जाते हैं, जब तक विमान कर्मचारी उन्हें रोकने न लगें। कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में तो शराब की ऐसी छोटी बोतलों के लिए हिन्दुस्तानी सैलानी गिरोह बनाकर विमान के स्टोररूम पर धावा बोल देते हैं, और वहां से बोतलें लूटकर ले जाते हैं। भारत की संसद में एक बार सरकारी विमान सेवा इंडियन एयरलाईंस के बारे में एक सवाल पूछा गया था कि एक हवाई मुसाफिर औसतन कितनी चॉकलेट लेते हैं, तो वहां 50-60 चॉकलेट प्रति मुसाफिर जैसा कुछ आंकड़ा दिया गया था। एयरहोस्टेस ट्रे में चॉकलेट-पिपरमेंट सर्व करने निकलती थी, तो लोग मुट्ठी में जितनी भर सकते थे, उसे एक साथ उठाकर जेब में रख लेते थे, ताकि घर पहुंचने पर बच्चे कई दिन खुश रह सकें।
कनाडा में बसे हुए एक भारतवंशी की कंपनी बाज़ार के रुख़ के रिसर्च का काम करती है। उसके संस्थापक रितेश जैन ने अभी यह लिखा है कि दुनिया में सफेदपोश डिग्रीधारियों की अधिकता है, लेकिन ब्लू-कॉलर कहे जाने वाले कारीगरों और कामगारों की कमी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी भविष्यवाणी में कहा है कि अगले 5 सालों में भारत से प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, बढ़ई, ड्राइवर, नर्स, और देखरेख-रखरखाव करने वाले लोग संपन्न देशों में जाएंगे, और भारत में ऐसे कामगारों की भारी कमी हो सकती है। यह उनका निजी पूर्वानुमान है, लेकिन दुनिया में अलग-अलग कई किस्म के जो तथ्य सामने आते हैं, वे भी कुछ इसी किस्म की तस्वीर बताते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इन दोनों बातों को बहुत लंबे समय से लिखते आ रहे हैं कि भारत में कॉलेज की किताबी पढ़ाई करवाकर लोगों को बेरोजग़ार बनाने के बजाय उन्हें तकनीकी हुनर सिखाना चाहिए, और दुनिया के जिन देशों में उनके लिए भविष्य में जगह बन सकती है, वहां की ज़ुबान सिखानी चाहिए, वहां की तहज़ीब सिखानी चाहिए। हम लंबे समय से राज्य सरकारों के लिए भी यह बिन मांगी सलाह लिखते आए हैं, और अब एक रिसर्च संस्था चलाने वाले ने तकऱीबन ऐसी ही बात लिखी है।
इस बारे में बड़ी सामान्य जानकारी यह है कि दुनिया के संपन्न देशों में आबादी गिरती चल रही है, और आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ते जा रहा है। ऐसे लोग ख़ुद बहुत सारे तकनीकी काम नहीं कर सकते, और उन्हें तो ख़ुद की भी देखरेख के लिए लोग लगते हैं। दुनिया की कुछ दूसरी सलाहकार संस्थाओं का यह अंदाज़ है कि 2030 तक विकसित देशों में ही 4-5 करोड़ कामगारों की कमी आने जा रही है। और यह 2047 तक बढ़ती चलेगी, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में डिमांड और सप्लाई का यह फासला 20-25 करोड़ लोगों तक पहुँच जाएगा। एक अंदाज यह है कि कामगारों की कमी का कऱीब 50 फीसदी हिस्सा ड्राइवर, बढ़ई, प्लंबर, निर्माण-मजदूर जैसे लोगों का रहेगा। इसके अलावा 20 फीसदी रोजग़ार नर्सों के, और बुजुर्गों, बीमारों, और बच्चों की देखरेख के रहेंगे। एक अध्ययन बतलाता है कि अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, और दक्षिण कोरिया जैसे 20 प्रमुख देश मिलकर ही रोजगारों की ऐसी 90 फीसदी कमी झेलेंगे। यहां पर बुजुर्ग आबादी बढ़ती जा रही है, जन्मदर घटती जा रही है। इसलिए इनमें से बहुत से देश बहुत रफ्तार से अपनी प्रवासियों संबंधी नीतियां बदल रहे हैं, और हुनरमंद कामगारों के आने की बाधाओं को दूर करते जा रहे हैं।
ऐसे में भारत एक बड़ा स्वाभाविक निर्यातक देश हो सकता है क्योंकि यहां की औसत उम्र 30 साल के नीचे हैं, और कऱीब 60 करोड़ आबादी 18-40 बरस की कामकाजी उम्र वाली है। दुनिया के कई विकसित देशों में कामकाजी लोगों की औसत उम्र 40 बरस से ऊपर है। आज भी भारत से बाहर गए हुए कामगार और दूसरे कामकाजी लोग हर बरस बहुत बड़ी विदेशी मुद्रा कमाकर घर और देश भेजते हैं। विश्लेषकों का यह मानना है कि भारत अगर अंतरराष्ट्रीय कामगार-कमी के मौके पर अपने-आपको तैयार रखता है, तो यहां से बाहर जाने वाले लोग 2030 तक दोगुना हो सकते हैं, और आज भारतीय कामगारों से दूसरे देशों से कऱीब 130 बिलियन डॉलर देश आता है, वह बढक़र 300 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत से किस तरह लोग बाहर जा सकते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल है जहां से पिछले दशकों में शायद लाखों नर्सें योरप, खाड़ी के देशों, और अमरीका चली गई हैं। जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया पहले से भारतीय नर्सों, केयरवर्करों और हेल्थकेयर सहायकों की भर्ती बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा पूरे योरप में वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, और मैकेनिक किस्म के कामगारों की भारी कमी चल रही है।
अब इसके साथ भारत की हकीकत को जोडक़र देखें तो भारत में हर साल दसियों लाख बीए, बीकॉम, एमए, एमबीए, इंजीनियर वगैरह तैयार हो रहे हैं। भारत का ही एक सर्वे कहता है कि ग्रेजुएट लोगों में बेरोजगारी 30 फीसदी है, जबकि हुनरमंद-कामगारों, और अशिक्षित मजदूरों में बेरोजगारी 3 फीसदी से कम है। आज भी भारत में अच्छे हुनरमंद कारीगर ढूंढना कुछ मुश्किल है, और शहरों में इसीलिेए अर्बन कंपनी जैसी सेवाएं लोकप्रिय हो रही हैं। हम लगातार इस बात को उठाते आए हैं कि भारत को ग्रेजुएट-बेरोजगार पैदा करना बंद करना चाहिए। मिडिल स्कूल, या हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद वहीं की इम्तिहान में ऐसे बहुत से बच्चों को छाँट लेना चाहिए जो कि आगे किताबी पढ़ाई में बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। इनके लिए बहुत अच्छी ट्रेनिंग का इंतज़ाम करना चाहिए जो कि उन्हें किसी न किसी हुनरमंद काम की तरफ ले जाए। इस तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ-साथ उनका रुख़ देखकर उन्हें विदेशी भाषाएं भी सिखानी चाहिए, ख़ासकर उन 20 देशों में से किसी की, जिनका जिक्र हमने ऊपर किया है, जो कि लगातार कामगारों की कमी का शिकार हैं, संपन्न हैं, और जहां कामगारों को अच्छा मेहनताना मिल सकता है। इन देशों का हाल यह है कि यहां कुशल-कारीगरों को ग्रेजुएट कर्मचारियों के मुकाबले अधिक कमाई होती है।
वेश्यावृत्ति को दुनिया का सबसे पुराना पेशा माना जाता है। भारतीय संस्कृति में भी सैकड़ों बरस पुरानी कहानियों में वेश्याओं का जिक्र रहा है। हाल के दशकों में तो भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लगातार देह का धंधा करने वाली
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महिलाओं के साथ हमदर्दी दिखाई है, और उन्हें मुजरिम मानने से पुलिस को मना किया है। अगर महिलाओं को मुजरिमों या किसी गिरोह ने देह के धंधे में डाला, तो उन्हें जुर्म का शिकार मानने के लिए अदालत ने पुलिस को साफ-साफ निर्देश दिए थे। इसका नतीजा यह होता था कि जुर्म की शिकार महिला मानकर ऐसी किसी जगह पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद पुलिस ऐसी महिला को पुनर्वास केन्द्र भेज देती थी, क्योंकि जुर्म की शिकार महिला के लिए कानून और सरकार की नजर में वही पहला ठिकाना रहता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा ही लंबा फैसला दो दिन पहले दिया है। करीब तीन सौ पेज के इस फैसले में जस्टिस जे.बी.पारदीवाला, और जस्टिस, आर.महादेवन ने समाज, सरकार, और न्यायपालिका के वेश्याओं के बारे में नजरिए को लेकर बहुत सी तीखी बातें लिखी हैं, और यह भी लिखा है कि इतने विस्तृत फैसले के बाद इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को और कहीं कुछ पढऩे की जरूरत नहीं रहेगी। इतने लंबे फैसले का निचोड़ यहां लिखना मुमकिन नहीं है, लेकिन हम इसकी कुछ बुनियादी बातों को यहां जरूर लिखना चाहते हैं क्योंकि भारत में समाज और सरकार दोनों का नजरिया वेश्याओं के खिलाफ रहता है, और इस फैसले से उनके बारे में एक अलग व्यवस्था कायम हो रही है।
जजों ने इस बात पर गहरी फिक्र जताई है कि भारतीय समाज कानून से परे जाकर वेश्याओं के बारे में एक नैतिक पाखंड को लादता है। फैसले में कहा गया है- सेक्स वर्कर्स के प्रति समाज का जो दृष्टिकोण है वह अक्सर गहरे पूर्वाग्रहों, और एक प्रकार के नैतिक पाखंड से संचालित होता है। यह समझना होगा कि कानून का काम समाज की नैतिकता को थोपना नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा करना है। जब तक इस पेशे से जुड़े सामाजिक कलंक को कम नहीं किया जाएगा, तब तक इन महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में गरिमामय जीवन देना असंभव रहेगा। जजों ने आगे लिखा है- यौनकर्मियों को समाज या राज्य की किसी दया या सहानुभूति की जरूरत नहीं है। वे भारत की नागरिक होने के नाते कानूनन बराबरी के नागरिक अधिकारों की हकदार हैं। राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह इन महिलाओं को स्वास्थ्य, कानूनी सहायता, और सुरक्षा के वे सारे मौके मुहैया कराए जो किसी भी अन्य नागरिक को प्राप्त हैं। जजों ने आगे लिखा है- कि हमारी साफ राय है कि वेश्यावृत्ति के बारे में बने आईटीपीए कानून के पुराने प्रावधान आज के वक्त और जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। संसद को इस विसंगति को दूर करने के लिए तुरंत ऐसा व्यावहारिक कानून बनाना चाहिए, जो कि महिलाओं की जबरन तस्करी को तो पूरी तरह कुचले, लेकिन उन वयस्क महिलाओं को प्रताडि़त होने से बचाए, जो अपनी मर्जी, या परिस्थितियों के कारण इस पेशे में हैं। एक नजर में इस फैसले को देखें, तो इससे देह का धंधा करने वाली महिलाओं की जिंदगी पर सीधा असर यह पडऩे जा रहा है कि पुलिस किसी कार्रवाई के बाद इस काम में लगी महिला को जबरिया पुनर्वास केन्द्र नहीं भेज पाएगी। अदालत ने यह साफ किया है कि अगर देश का कानून वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा नहीं भी देता है, तो भी वेश्यावृत्ति करने वाली महिला के अधिकार देश के किसी भी दूसरे नागरिक के मुकाबले कम नहीं हैं। इसके साथ-साथ उस महिला को ऐसा पेशा करने का पूरा नागरिक हक हासिल है।
इस ऐतिहासिक फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको सुधारवादी और प्रगतिशील तो साबित किया ही है, उसने भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं, और समाज के पाखंड पर भी वार किया है। जनता के बीच चुनावों के लिए जाने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए इस तरह के मामलों में कोई सुधारवादी नजरिया दिखाना आसान नहीं रहता। कोई भी प्रगतिशील बात पार्टियों के खिलाफ चुनावी मुद्दा बन सकती हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के जज ही समाज के नैतिक मूल्यों के ऊपर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को रख सकते थे, और वही उन्होंने किया है। आज के इस संपादकीय में हम अपने विचारों को अधिक लिखने की जरूरत नहीं समझ रहे, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की बातों से पूरी तरह सहमत हैं, और उनकी लिखी हुई बातें ही आज का हमारा लिखना है। जजों ने यह साफ किया है कि अगर किसी जगह सेक्स के धंधे को लेकर पुलिस छापा मारती है, तो वहां मौजूद बालिग यौन-कर्मी को पुलिस उसकी मर्जी के खिलाफ सुधारगृह, या पुनर्वास केन्द्र नहीं भेज सकती। वह महिला अपनी मर्जी से उसी जगह रहना चाहती है, तो उसे उसका हक है।
इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक और बात लिखी है जो कि पुलिस के आम प्रचलित नजरिए के खिलाफ है, और उसे पूरी तरह तोड़ती है। फैसले में लिखा गया है कि यदि कोई सेक्स वर्कर अपने खिलाफ हुए किसी जुर्म, चाहे वह जबर्दस्ती, बलात्कार, या किसी और तरह के यौन-अपराध की शिकायत करने के लिए पुलिस के पास जाती है, तो कानून लागू करने वाली एजेंसियां उसकी शिकायत को सिर्फ इसलिए हल्के में नहीं ले सकतीं, या खारिज नहीं कर सकतीं कि वह सेक्स वर्क करती है। जजों ने लिखा है कि एक महिला की सहमति का कानूनी महत्व हर परिस्थिति में समान रहता है, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो। जजों ने लिखा कि अब समय आ गया है जब संसद और सरकार कानून की इस विसंगति को दूर करें, और पूरे देश में एक समान ‘पीडि़त सुरक्षा योजना’ लागू की जाए ताकि कानून का डर दिखाकर दलाल या पुलिस इनका शोषण न कर सकें।
भारत में हाल के दशकों में ऐसे नेताओं की गिनती बढ़ती चल रही है जो एक चुनाव एक पार्टी से लड़ते हैं, और ठीक अगला चुनाव किसी दूसरी पार्टी से। कुछ नेता तो ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने दूसरी पार्टी में जाते हुए अपनी निर्वाचित सीट से इस्तीफा दे दिया, और उसी उपचुनाव में दूसरी पार्टी की टिकट पर लडक़र फिर जीत गए। पंजाब में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य थोक में भाजपा में चले गए, जबकि उन्हें चुनने वाले आम आदमी पार्टी के विधायक और सांसद थे। दलबदल की ऐसी अलग-अलग कई किस्म की कहानियां हैं, और हर बार कुछ लोग यह नैतिक सवाल उठाते हैं कि क्या दलबदल करने वालों को सदन की सदस्यता से इस्तीफा भी देना चाहिए क्योंकि वे दूसरी पार्टी के समर्थक मतदाताओं के वोटों से भी जीतकर आए रहते हैं। भारत में पहले किसी पार्टी को छोडऩे वाले सांसद या विधायक सदन में एक तिहाई से अधिक रहने पर उसे दलबदल नहीं माना जाता था, और उसे विभाजन माना जाता था। एक तिहाई से कम के दलबदल पर सदन की सदस्यता भी चली जाती थी। लेकिन जब एक तिहाई का दलबदल करवाना धन-बल से आसान काम हो गया, तो कानून बदलकर इस सीमा को दो तिहाई किया गया। लेकिन जैसा कि अभी पंजाब के राज्यसभा के मामले में हुआ है दो तिहाई सदस्यों का दलबदल करवाना भी मुश्किल काम नहीं रह गया। इसके पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के वक्त भी दलबदल के कई संवैधानिक पहलू सामने आए थे।
नेताओं के वैचारिक रूप से बिल्कुल ही विपरीत पार्टियों में भी जाकर वहां भी पार्टी टिकट पाकर निर्वाचित हो जाने को देख-देखकर जनता थकी हुई है। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह भी लिख रहे हैं कि ऐसे लोगों पर 20 बरस के लिए चुनाव लडऩे पर रोक लगा देनी चाहिए। हम भी अपने अखबार में बीते दशकों में बार-बार यह बात लिखते आए हैं कि एक पार्टी टिकट पर चुनाव जीतने वाले लोग अगर उस कार्यकाल के बीच में ही किसी दूसरी पार्टी में चले जाते हैं, तो वे अपने मतदाताओं को भी धोखा देते हैं, और उनके अगले चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। हमारी यह सोच कुछ उसी तरह की है जो कि रिटायर्ड जज, फौजी अफसर, या बड़े सरकारी अफसर के रिटायर होने के तुरंत बाद किसी निजी कंपनी में काम करने पर रोक की है। लोगों को सांस लेने का वक्त मिलना चाहिए। मछली अगर पेड़ पर जीना तय करे, तो उसे रातोंरात पेड़-प्राणियों का मुखिया बनाना ठीक नहीं होगा। इसी तरह पेड़ पर पीढिय़ों से जीने वाले पंछी अगर पानी के भीतर जाकर जीना तय करें, तो उन्हें कुछ मौका देना चाहिए, और जलचर संघ का मुखिया तुरंत नहीं बनाना चाहिए। लोग वैचारिक आधार पर दूसरे दल में जाएं इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन प्राकृतिक न्याय के नजरिए से भी देखें तो दशकों से किसी पार्टी में दरी उठाने और पानी पिलाने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को छोडक़र नए-नवेले, बीती रात ही पार्टी में आए नेताओं को उम्मीदवार बनाना तो नैतिकता के हिसाब से भी गलत है। और राजनीति में सिर्फ चुनावी नजरिए से संभावनाओं को लचीला रखने के लिए नैतिकता की ऐसी अनदेखी भी ठीक नहीं है। हम वकालत करते आए थे कि दलबदलुओं को दूसरी पार्टी से अगला चुनाव लडऩे न मिले, वे अगर चाहें तो उस दूसरी पार्टी के संगठन में काम करने के लिए अपनी क्षमताओं को दे सकते हैं।
लेकिन अभी जब हम इस बारे में दुनिया के अलग-अलग देशों की व्यवस्था देख रहे हैं, तो जिन्हें हम बड़ा परिपक्व लोकतंत्र मानते हैं, उनमें भी दलबदलुओं को लेकर कोई कड़े कानून नहीं हैं। शायद इसलिए भी ऐसा हो सकता है कि उन देशों में भारत की तरह बड़े पैमाने पर दलबदल नहीं होता होगा। ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड इनमें से किसी देश में दलबदल करने वालों पर अगला चुनाव लडऩे की रोक नहीं है। बल्कि हैरानी की बात यह है कि जिन्हें विकासशील देश माना जाता है, ऐसे देशों, पाकिस्तान, बांग्लादेश, और कुछ अफ्रीकी देशों में दलबदल करने वालों के अगला चुनाव लडऩे पर कुछ-कुछ रोक है। और वहां पर इसे ठीक उसी तरह का कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा गया है, जिस तरह की बात ऊपर हमने अफसरों, जजों, और फौजियों के बारे में लिखी है। जब इस बारे में हमने अलग-अलग देशों के राजनीतिक विचारकों की सोच ढूंढने की कोशिश की, तो 18वीं सदी के एक पश्चिमी राजनीतिक विचारक, एडमंड बर्के ने एक भाषण में कहा था कि सांसद पार्टी के गुलाम नहीं होते, बल्कि वे अपने विवेक से फैसले लेते हैं। इस एक बात को दलबदल के पक्ष में एक मजबूत तर्क मान लिया जाता है। बाद के दशकों में, या बाद की सदियों में अलग-अलग देशों ने संसद के भीतर किसी पार्टी के लिए मतदान में उसके सदस्यों के साथ देने को अनिवार्य भी बनाया, जैसा कि भारत ने। और इससे विवेक की बात जाती रही। कुछ दूसरे विचारकों ने सांसदों के दलबदल को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मा की आवाज के आधार पर छूट देने की वकालत की। एक अन्य विचारक का कहना था कि बहुत सख्त पार्टी अनुशासन लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की संविधान सभा में डॉ.बी.आर. अंबेडकर ने दलबदल विरोधी कानून के विचार का विरोध किया था, और उनका मानना था कि इससे असहमति खत्म हो जाएगी। एडमंड बर्के की बात से हमने यह चर्चा शुरू की, और उनका मानना था कि सांसद को पार्टी व्हिप, या पार्टी के दबाव में नहीं आना चाहिए। अगर उसे ईमानदारी से यह लगे कि उसकी पार्टी गलत है, तो उसे पार्टी के खिलाफ वोट देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कल एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए देश के तमाम हाईकोर्ट को मामले समय पर निपटाने के लिए कहा है। उसने कहा है कि जिन मामलों की सुनवाई पूरी करके हाईकोर्ट जज फैसला सुरक्षित रख लेते हैं, उन पर अधिकतम
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तीन महीने के अंदर फैसला सुनाना जरूरी होगा। ऐसा न होने पर संबंधित पक्ष चार महीना हो जाने पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि तीन महीने में अगर फैसले नहीं आते हैं, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार मामले को खुद होकर मुख्य न्यायाधीश के सामने रखें, और मुख्य न्यायाधीश दो हफ्ते का समय दे सकते हैं, लेकिन तब भी अगर फैसला नहीं सुनाया जाएगा, तो मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जा सकेगा। जमानतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाएं, अगर किसी वजह से फैसला सुरक्षित रखना पड़े, तो अगले दिन वह फैसला सुना दिया जाए, और वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अर्जी मंजूर होने पर आदेश उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजा जाए, ताकि कैदी की रिहाई में देर न हो। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की वजहें ढूंढने पर यह पता लगा कि कुछ हाईकोर्ट में जज साल-साल भर तक फैसले सुरक्षित रखते आए हैं, और उन पर फैसला घोषित नहीं करते। कुछ मामले तो ऐसे भी हुए हैं जिनमें दो-तीन साल तक फैसले नहीं लिखे गए।
मुख्य न्यायाधीश एवं एक अन्य जज की बेंच का दिया गया यह आदेश पूरे देश के हाईकोर्ट के लिए अनिवार्य रूप से मानने का है। संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मिले अधिकारों के तहत यह समय सीमा तय की गई है। लेकिन हम ऐसे बहुत सारे मामलों को न जानते हुए भी इस बात पर कुछ हैरान हो रहे हैं कि सुनवाई पूरी हो जाने के बाद किसी मामले पर फैसला लिखने में साल भर का वक्त क्यों लगना चाहिए? अदालत के लिखित रिकॉर्ड के साथ-साथ अदालत में जो बातें बहस के दौरान जज सुनते हैं, वे बातें भी साल भर में किसी की भी याददाश्त से धुंधली हो जाना तय है। जब महीनों के बाद कोई जज अदालती रिकॉर्ड देखकर सुबूत, गवाही, और वकीलों के तर्क को पढक़र फैसला लिखते होंगे, तो वे एआई की मदद से तो ऐसा करते नहीं हैं, और इंसानी याददाश्त की एक सीमा रहती है। रिकॉर्ड पर लिखी गई बातों से परे भी कई बातें जजों के दिमाग पर दर्ज रहती हैं, और वे तो धुंधली होते चले जाना तय रहता है। फिर किसी फैसले से जिसका भी नफा होना हो, या जिसे भी नुकसान होना हो, उन पर भी महीनों, और बरस-दर-बरस की देरी से नुकसान या नफा होता है, जो कि पूरी तरह नाजायज रहता है। आज जब हम देश भर में कई मुजरिमों को बार-बार जुर्म करते देखते हैं, तो भी हमें लगता है कि इनके पुराने जुर्मों के पुलिस रिकॉर्ड के बाद भी इन्हें बाद में इतने जुर्म और करने की छूट कैसे मिल जाती है?
कल के ही सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश को देखें, तो इसमें एक तरफ तो शिकायतकर्ता की शिकायत पर समय पर फैसला देना जरूरी किया गया है, और इसके लिए किसी हड़बड़ी या गलती का दबाव भी नहीं डाला गया है। जब सुनवाई पूरी हो जाती है, उसका मतलब यही रहता है कि अब जज को न आगे कोई सुबूत देखना है, न गवाहों को सुनना है, और न ही किसी वकील के तर्क सुनने हैं। इसलिए उसके बाद अगर फैसला लिखने के लिए तीन महीने का वक्त तय किया गया है, तो यह इसलिए भी जरूरी है कि जिसके खिलाफ मामला है, वह अगर मुजरिम है, तो वह जेल जाए, कैद काटे, और अगर मुजरिम नहीं है, तो वह छूट जाए, उसके खिलाफ केस खत्म हो जाए। कल के ही इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से जमानत की सुनवाई और उस पर फैसले को भी उसी दिन तय करने की शर्त लगाई है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ताकतवर विचाराधीन कैदी तो अपने लिए बहुत महंगे वकील लाकर अदालत पर एक किस्म का अघोषित दबाव बनवा लेते हैं, दूसरी तरफ गरीबों की जमानत अर्जी पर सुनवाई का कोई ठिकाना नहीं रहता। अब कल के आदेश से आम जनता के लिए एक तो यह अच्छी बात हो रही है कि जुर्म के मामलों में फैसले में अंधाधुंध देरी के बजाय तीन महीनों में फैसला आ जाएगा, और जुर्म साबित होने पर अभियुक्त को सजा हो जाएगी, समाज कुछ समय के लिए ऐसे मुजरिम से मुक्त हो जाएगा। दूसरी तरफ समाज में एक परेशानी बढऩे भी जा रही है कि अगर किसी अभियुक्त को जमानत, अर्जी के दिन ही मिल जाती है, तो फिर ऐसे लोग बाहर आकर दुबारा उसी तरह के जुर्म कर सकते हैं। समाज के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वजह से जमानत अर्जी पर जल्द आदेश एक परेशानी और खतरा भी लेकर आ सकते हैं, लेकिन यह परेशानी अदालत की फिक्र की नहीं रहती, या कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार सरकार की जिम्मेदारी रहती है।
एक केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई, के 12वीं के इम्तिहान के मूल्यांकन को लेकर जिस तरह की गड़बडिय़ां सामने आई हैं, उनसे पूरी परीक्षा प्रणाली और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बहुत बुरी आंच आई है। भारत में एक के बाद एक, दाखिला या नौकरी इम्तिहान को लेकर विवाद
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चलते ही रहता है, चाहे वह केन्द्र सरकार का जिम्मा हो, चाहे राज्य सरकारों का। बेरोजगारों का मानना रहता है कि नौकरी रिश्वत से मिलती है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पीएससी के पुराने घोटाले अभी दशकों बाद भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पड़े हुए हैं, जिनका दावा सरकारी नौकरियों पर बनता है, वे अब तक इंसाफ के इंतजार में खड़े हैं, और जिन्हें गलत किस्म से नौकरी मिलने की तोहमत लगी है, वे फैसला आने तक शायद रिटायर भी हो जाएं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, एक के बाद एक कई प्रदेशों में तरह-तरह के इम्तिहानों का भ्रष्टाचार, पेपर आऊट, सामूहिक नकल से बुरा हाल रहा है। अभी देश की किसी भी किस्म की चिकित्सा शिक्षा के लिए होने वाले दाखिला इम्तिहान, नीट, के पेपर बड़े पैमाने पर पूरी तरह लीक हो जाने की बात पहली नजर में ही साबित हो जाने के बाद उसे रद्द कर दिया गया, और कल की खबर है कि देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बंगले पर हुई बैठक में यह तय किया गया कि उनकी अगुवाई में अगले महीने की नीट परीक्षा के पर्चे वायुसेना अलग-अलग जगहों पर पहुंचाएगी, सेना की मदद ली जाएगी, और ऐसा सोचा जा रहा है कि इम्तिहान के प्रश्नपत्रों को बैंकों में रखने के बजाय फौजी ठिकानों पर रखा जाए। यह दुनिया के इतिहास में शायद पहला मौका होगा, जब शांतिकाल में, बिना किसी आपातकाल के, बिना किसी मेडिकल इमरजेंसी के, सिर्फ पेपर लीक रोकने के लिए वायुसेना, और फौज का इस्तेमाल किया जाएगा। भला कौन यह सोच सकते थे कि मेडिकल दाखिला इम्तिहान की तैयारी बैठक प्रतिरक्षा मंत्री के घर पर होगी, और सरकारी समाचार बताएगा कि प्रधानमंत्री इस तैयारी पर नजर रख रहे हैं!
22 लाख बच्चों वाली नीट इम्तिहान तबाह हो जाने के बाद कई बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं, और इन बच्चों के परिवार में जो बेचैनी आई है, इम्तिहान अगले महीने दुबारा होने की वजह से परिवारों की गर्मियों की छुट्टियां जिस तरह तबाह हुई हैं, उनसे लगता है कि करीब एक करोड़ या उससे अधिक लोग ही नीट की असफलता से प्रभावित हुए हैं। अब इसके बाद करीब 18 लाख बच्चों वाली सीबीएसई के बोर्ड इम्तिहान की उत्तरपुस्तिकाएं ऑनलाईन जांचने में जो गड़बडिय़ां हुई हैं, वे देश के करोड़ों छात्र-छात्राओं, और उनके परिवारों को सदमा पहुंचाने वाली हैं। अब जब सरकार ने यह माना है कि कुछ मामलों में गड़बडिय़ां हुई हैं, और ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उत्तरपुस्तिकाएं ऑनलाईन डाली गईं, तो वे इतनी धुंधली थी कि जांचने वाले शिक्षक उन्हें पढ़ नहीं पा रहे थे, जिन छात्र-छात्राओं ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं मांगीं वे यह देखकर सदमे में आ गए कि कई प्रश्नों के उत्तर जांचे नहीं गए, या नंबर जोड़े नहीं गए। अब केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने यह माना है कि सीबीएसई इम्तिहान में परीक्षार्थियों के लिखे गए 40 करोड़ पन्नों की जांच में बड़ी चूक हुई है। करीब 4 लाख छात्र-छात्राओं ने दुबारा जांच के लिए आवेदन किया है। जब तकनीकी सिस्टम इस हद तक खराब साबित हो चुका है, कि किसी की कॉपियां किसी और नंबर पर चढ़ा दी गई हैं, किसी की कॉपियों के पन्ने गायब हैं, तो इन 4 लाख के आवेदनों से परे भी विश्वसनीयता खत्म है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री की कल की बैठक में आईआईटी के प्रोफेसरों को भी बिठाया गया था, और सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की कि उसका तकनीकी सिस्टम एकदम ठीक है। दूसरी तरफ 19 साल के एक छात्र निसर्ग अधिकारी का दावा है कि सीबीएसई की वेबसाइट को उसने बड़ी आसानी से हैक कर लिया, और इसकी सुरक्षा एकदम कमजोर होने के बारे में उसने भारत सरकार को फरवरी में ही अलर्ट कर दिया था। उसने अपने सार्वजनिक ब्लॉग में लिखा है कि सीबीएसई पोर्टल में दाखिला और छेडख़ानी आसानी से हो सकते हैं।
इस बीच यह भी देखने की जरूरत है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अभी कुछ दिन पहले जब सीबीएसई इम्तिहान में गड़बड़ी का बयान दिया, तो केन्द्र सरकार और सीबीएसई बोर्ड दोनों ने जमकर उनकी बात का खंडन किया था। सरकार में तो राजनीतिक लोग रहते हैं, उनका तो राजनीतिक जवाब देना समझ में आता है, लेकिन बोर्ड ने भी राहुल के आरोपों का आनन-फानन खंडन किया था, और उन्हें गुमराह करने वाला बताया था। अब शिक्षा मंत्री ने इन सब खामियों, और गड़बडिय़ों की जिम्मेदारी खुद ली है। सीबीएसई को लेकर राहुल से परे भी, जब एक परीक्षार्थी लडक़े ने सोशल मीडिया पर उसकी उत्तरपुस्तिकाओं को लेकर हुई धांधली के बारे में लिखा, तो दसियों हजार लोगों ने उसे धिक्कारना शुरू कर दिया, और कुछ जाने-माने लोगों ने उसे देशद्रोही और पाकिस्तानी करार देना भी शुरू कर दिया था, बाद में बोर्ड ने खुद माना कि उसकी उत्तरपुस्तिकाओं में गड़बड़ी हुई थी। एक छोटे से स्कूली बच्चे, वह भी हिन्दू बच्चे की शिकायत सही साबित होने के पहले ही उसे गद्दार साबित करके पाकिस्तान भेजने के फतवे दिए जाने लगे थे।
छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक ने अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक जगह पर, सार्वजनिक रूप से एक नायब तहसीलदार को मारा। इस मौके पर इस छोटे अफसर के साथ उसके एक बड़े अफसर भी थे, जिन्होंने विधायक को रोकने की कोशिश की, लेकिन विधायक ने अपनी ही सरकार के अधिकारी को पीटने से परहेज नहीं किया। सत्तारूढ़ विधायक के लिए बेहतर और आसान तरीका अफसर को हटवा देने का हो सकता था, लेकिन उन्होंने सडक़ पर अपनी मर्जी का ‘इंसाफ’ कर दिया। न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, और न सिर्फ भाजपा राज में, बहुत सारे प्रदेशों में अलग-अलग सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता सरकारी अमले से, या सार्वजनिक जगहों पर गुंंडागर्दी करते दिखते हैं, और हाल के बरसों में मोबाइल-कैमरों की मेहरबानी से वे सुबूत भी छोड़ जाते हैं। कई नेता अफसरों से टेलीफोन पर गंदी गालियों, और धमकियों से बात करते हैं, और ऐसी कॉल रिकॉर्डिंग से सोशल मीडिया पटा हुआ है। सांसद, विधायक, या उनसे छोटे दर्जे के नेताओं के पांव भी जमीन पर पडऩा बंद हो जाते हैं, और दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा हुआ रहता है।
विपक्षी पार्टी तो अपनी भड़ास निकालने के लिए सरकारी अमले के साथ बदसलूकी कर सकती है, और उसके खिलाफ कड़ी पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है, होती भी है, लेकिन जब सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ऐसी हरकतें करते हुए रिकॉर्ड होते हैं, तो सरकार के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात रहती है। पड़ोस के मध्यप्रदेश में एक किसी जिले के कलेक्टर के बंगले पर पहुंचकर धमकी देने वाले सत्तारूढ़ भाजपाई विधायक को पार्टी ने ही फटकार लगाई थी, लेकिन इससे विधायकों को कोई सबक मिला हो ऐसा नहीं है। अगली घटना एक दूसरे विधायक के साथ हुई जिसके बेटे ने सडक़ पर बददिमागी से लोगों को कुचला था, और विधायक ने इसके बाद अफसरों को खुली धमकी का वीडियो जारी किया था। सत्तारूढ़ नेताओं को यह रियायत जरूर मिल जाती है कि उनके खिलाफ पुलिस आसानी से कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करती, और सरकार भी उनके पीछे नहीं पड़ती। मध्यप्रदेश में ही एक मंत्री ने भारतीय फौज की एक बड़ी महिला अधिकारी को मुस्लिम होने की वजह से आतंकियों की बहन कहा था, और इसके बारे में अदालत के बार-बार के निर्देशों पर भी सरकार ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की थी। फिर मानो अपनी ही तौहीन और बेइज्जती से थककर अदालत ने ही एक और जांच का आदेश दे दिया, ताकि मंत्री कुर्सी पर बना रहे, और सत्ता का कोई राजनीतिक असुविधा न हो। भारत सरकार की हाल के बरसों की सबसे बड़ी फौजी कार्रवाई, ऑपरेशन सिंदूर का ब्यौरा हर दिन मीडिया को देने वाली कर्नल सोफिया ही खुली बेइज्जती करने वाले मंत्री पर आज तक न अदालती आंच आई है, और न ही राजनीतिक या सरकारी आंच। जाहिर है कि अपनी पार्टी, और पार्टी की सरकार की ऐसी मेहरबानी से पार्टी के दूसरे नेताओं में भी बददिमागी आती है, और वे भी बदसलूकी और गुंडागर्दी करने लगते हैं।
लेकिन हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में यह सिलसिला किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए उस वक्त तक तो नुकसानदेह साबित नहीं होता, जब तक उस पार्टी के पक्ष में लहर चल रही हो। लेकिन जिस दिन चुनावी मुकाबला कड़ी टक्कर का हो जाएगा, उस दिन सत्तारूढ़ नेताओं की गुंडागर्दी के वीडियो आखिरी दिन, आखिरी पल मतदाताओं का संतुलन इतना बदल सकते हैं कि दो-चार हजार वोट की होने वाली जीत हार में बदल जाए। सत्ता की बददिमागी की ताकत इतनी रहती है कि सत्तासंपन्न नेता की बड़ी गाड़ी का हॉर्सपावर भी उसका मुकाबला नहीं कर पाता। और जब ये दोनों जुड़ जाते हैं, तो ऐसी गाड़ी मध्यप्रदेश में राह चलते पैदल लोगों को कुचलती है, या यूपी में किसान आंदोलन के लोगों को कुचलकर मार डालती है। यह बददिमागी जगह-जगह सामने आती है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ ऐसे बड़े नेता हुए हैं जिनकी सार्वजनिक रूप से गंदी गालियों के वीडियो अगर फोन या कम्प्यूटर पर अचानक बजने लगें, तो लोगों को आसपास के लोगों के बीच भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। अभी जिस तरह सत्तारूढ़ विधायक ने छत्तीसगढ़ में अफसर को सार्वजनिक रूप से मारा है, ऐसा ही बहुत साल पहले बिलासपुर में हुआ था, जब सर्किट हाऊस में बिना वजह नाराज हुए एक मंत्री ने एक डिप्टी कलेक्टर को थप्पड़ मार दी थी। ऐसे कई मामलों में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी को खून का घूंट पीकर रह जाना पड़ता है क्योंकि पानी में रहकर मछली मगरमच्छ से बैर भला कैसे पाल और निभा सकती है? आमतौर पर ऐसी रिपोर्ट हो जाने के बाद, और जुर्म दर्ज हो जाने के बाद भी शिकायतकर्ता कर्मचारी-अधिकारी पर इतना राजनीतिक और सरकारी दबाव पड़ता है कि वे खुद अपनी शिकायत को कमजोर करते हैं, और किसी तरह इस नौबत से निकलना चाहते हैं। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश के इंदौर में वहां के सबसे ताकतवर नेता के विधायक बेटे ने क्रिकेट की बैट से दिनदहाड़े खुली सडक़ पर म्युनिसिपल अफसर को पीटा था, और बाद में उसी पार्टी की सत्ता के रहते हुए उस अफसर ने अदालत में पीटने वाले को पहचानने से इंकार कर दिया था। उस दिन भी इस पिटाई और हिंसा के अनगिनत वीडियो इंटरनेट पर मौजूद थे, आज भी हैं, लेकिन अगर सरकारी नौकरी करना है, तो सरकारी अमले को अपमान झेलते हुए यह बर्दाश्त करना पड़ता है।
मध्यप्रदेश के देवास में अभी इतवार को 42 नौजवान अपने परिवारों सहित एक मंदिर में शादी का इंतजार कर रहे थे। दूल्हे थे, तो जाहिर है कि सजे-धजे थे, रिश्तेदारों को लेकर आए थे। सुबह से रात हो गई, लेकिन न कोई दुल्हन पहुंची, न कोई शादी हुई। बाद में इन निराश और ठगे गए लोगों की शिकायत पर 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिन्होंने इंदौर के एक अनाथाश्रम की लड़कियों से इनकी शादी करवाने का वायदा किया था, और इसके लिए रजिस्ट्रेशन के नाम पर वसूली की थी। धोखा देने के लिए सोशल मीडिया पर से किन्हीं भी लड़कियों की तस्वीरें निकाल ली गई थीं, और यह भी कहा गया था कि सामूहिक विवाह में सीएम खुद आएंगे, और 51-51 हजार के चेक सबको देंगे। यह भी कहा गया था कि पहले दिन लड़कियों को मिलवाया जाएगा, शादी में दहेज का सामान भी मिलेगा। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि इनमें से अधिकतर दूल्हों की उम्र 40 साल के आसपास थी, और कुछ दूल्हे 60 साल के भी थे।
भारत में शादी का वायदा करके बालिग या नाबालिग से देहसंबंध बनाना, शादी का झांसा देकर किसी नकली दुल्हन से शादी करा देना जो कि शादी के तुरंत बाद गहने लेकर भाग जाए, ऐसे मामले भारत में आते ही रहते हैं। कुछेक तो ऐसी लुटेरी दुल्हनों की खबरें आती हैं जो कि पेशेवर अंदाज में दर्जन-दर्जनभर लोगों से शादी कर चुकी हैं, और भाग चुकी हैं। कई ऐसी शिकायतें पुलिस तक पहुंचती हैं कि किसी व्यक्ति ने अपना नाम-धरम कुछ और बताया, और शादी के बाद लडक़ी को पता लगा कि वह तो किसी दूसरे धरम का है, और उसका नाम भी कुछ और है। ऐसे कई मामलों में बाद में यह भी निकलता है कि यह ताजी शादी करने वाला दूल्हा असल में बासी है, और पहले से उसके बीवी-बच्चे भी हैं। ऐसे बहुत से धोखे भारत की लड़कियों के साथ देश के बाहर भी होते आए हैं, और अब ऐसे रिश्तों के मामले में भारत सरकार जांच-पड़ताल में मदद भी करती है, किसी दूसरे देश में जाकर गलत रिश्ते में फंस गई, धोखा खा चुकी लडक़ी की मदद तो करती ही है। अधिक जायज यह कहना होगा कि दूसरे देशों में भी वहां बसी हुई लड़कियां या महिलाएं भी भारत के मर्दों को ऐसा ही धोखा देती हैं, जैसा कि वहां से कुछ भारतवंशी मर्द देते हैं।
अब जब भारत में सरकार ने जिंदगी की बहुत सारी चीजों को डिजिटल कर दिया है, और हर नागरिक के पास यह अधिकार है कि वह भारत सरकार के मुफ्त के एप्लीकेशन, डिजिलॉकर पर अपना दस्तावेज रख सकते हैं, तो सरकार को रिश्तों की धोखाधड़ी रोकने के लिए कुछ और पहल भी करनी चाहिए। यह हिफाजत इसलिए जरूरी है कि जिंदगियां तबाह न हों, और फिर यह भी तो है कि किसी भी जुर्म की जांच और मुजरिम को सजा दिलवाने की जिम्मेदारी घूम-फिरकर सरकार पर ही तो आती है। इसलिए सरकारों को यह कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी धोखाधड़ी की रोकथाम का तरीका निकाला जाए, ताकि बाद में जुर्म की नौबत ही न आए, न ही जांच और मुकदमे की, और न ही जेल की। यह सब कुछ सरकार और समाज पर बोझ रहता है।
आज जब हिन्दुस्तान में एक सिमकार्ड भी बिना आधार कार्ड के नहीं खरीदा जा सकता, इस किस्म के आधा-एक दर्जन पहचानपत्र में से किसी के बिना न राशन कार्ड बन सकता, न पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो सकती, और न ही ड्राइविंग लाइसेंस बन सकता। ऐसे में सरकार को यह चाहिए कि किसी भी तरह की मैच मेकिंग के लिए आधार कार्ड या किसी दूसरे पहचानपत्र के आधार पर शिनाख्त का एक तरीका मुहैया कराए। हमारी नजर में यह एक बड़ा आसान तरीका रहेगा जिसमें लोगों को डिजिलॉकर में अपने सारे पहचानपत्र, और जरूरी दस्तावेज डालने के लिए बढ़ावा दिया जाए। इसके बाद किसी को काम पर कर्मचारी या कामगार को रखना है, किसी को रिश्ता करना है, किसी को ट्यूशन के लिए शिक्षक तय करना है, तो ऐसे सब मौकों पर लोग एक-दूसरे को अपना आधार कार्ड, या अपना दूसरा पहचानपत्र चाहें तो दे सकते हैं, और आगे की जांच के लिए लोग भारत सरकार के किसी मोबाइल ऐप पर जाकर उन नंबरों को डालकर देख सकते हैं कि जानकारी सही या नहीं। ऐसी सहूलियत का बेजा इस्तेमाल न हो, इसलिए आज भी आधार-ओटीपी की व्यवस्था रहती है, और जब तक लोग अपने फोन पर आया हुआ ओटीपी नहीं देते हैं, उनके आधार कार्ड का कोई ऑनलाईन इस्तेमाल नहीं हो सकता। आज अगर कोई अपने को किसी एक जात-धरम का बता रहे हैं, अपनी कुछ उम्र बता रहे हैं, अपना कोई पता बता रहे हैं, तो उनसे कोई भी संपर्क या संबंध रखना चाहने वाले लोग उनसे आधार-पड़ताल की मांग कर सकते हैं। आज किसी के ड्राइविंग लाइसेंस को देखकर उसे काम पर रखना पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहता। ड्राइविंग लाइसेंस के नंबर से कुछ साबित नहीं होता। ऐसे हर मामले में लोगों को आधार कार्ड की मांग करके कार्डवाले व्यक्ति की इजाजत से ऑनलाईन यह देख लेना चाहिए कि उनकी बताई गई जानकारी सही है या नहीं।
बंगाल में भाजपा की सरकार आने के बाद दुबारा जारी किया गया एक सरकारी आदेश बड़ा बवाल खड़ा कर रहा है। इसमें नया कुछ नहीं है, पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 को ही कड़ाई से लागू करने के लिए कहा गया है। इसे चुनौती देते हुए कुछ राजनीतिक दल, और कई पशु कारोबारी संगठन हाईकोर्ट तक पहुंचे, लेकिन हाईकोर्ट ने इसमें कोई दखल देने से मना कर दिया। यह आदेश गौवंशीय पशुओं को काटने को लेकर 1950 के एक कानून को दुहराता है जिसमें कहा गया है कि गाय, बैल, बछड़े, भैंस, आदि गौवंशीय पशुओं का वध तभी किया जा सकेगा जब उसके लिए सरकारी डॉक्टर की तरफ से सर्टिफिकेट जारी होगा। यह इजाजत तभी मिलेगी जब ऐसे पशु की उम्र 14 वर्ष से अधिक हो, वह कोई काम करने के लायक न हो, आगे बच्चे पैदा करने में अयोग्य हो, या स्थाई रूप से विकलांग या रोगग्रस्त हो। डॉक्टर के सर्टिफिकेट के बाद भी ऐसे पशुओं को म्युनिसिपल द्वारा निर्धारित बूचडख़ानों में ही काटा जा सकेगा। यह कानून 1950 का है, आज की भाजपा सरकार का बनाया हुआ नहीं है। इस पौन सदी में किस सरकार ने इसका कितनी कड़ाई से इस्तेमाल किया, वह इतिहास तो अब न कहीं दर्ज होगा, और न ही अब किया जा सकता। फिर भी भाजपा सरकार ने इसे सख्ती से लागू करने भर का काम किया है।
बकरीद एक ऐसा मुस्लिम त्यौहार है जिसमें बड़ी संख्या में अलग-अलग जानवरों की कुर्बानी देने की परंपरा है, और इस कड़ाई के कारण इस बार की बकरीद पर गौवंश के पशुओं की कुर्बानी सरकारी डॉक्टर की इजाजत से ही दी जा सकेगी, वह भी किसी बूचडख़ाने में। मतलब यह कि धार्मिक रूप से, कई जगहों पर सार्वजनिक स्तर पर जो कुर्बानी दी जाती थी, वह अब गौवंश के साथ तो इस बकरीद नहीं हो सकती। इससे गौवंश, और भैंसवंश के पशुओं की खरीद-बिक्री एकदम ठप्प हो गई है, और पशु कारोबारियों में बड़ी संख्या ऐसे गैरमुस्लिम लोगों की है जिन्होंने इस मौके के कारोबार के लिए खासा पूंजीनिवेश कर रखा था, और पशु इकट्ठा कर रखे थे। लेकिन अब जब सरकार ने पिछले कानून को सख्ती से लागू करना तय कर लिया है, हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं का तेजी से निपटारा करते हुए यह तय कर लिया है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। मुस्लिम समाज के बहुत से नेताओं ने यह सार्वजनिक अपील की है कि गौवंश की कुर्बानी न दी जाए। मुस्लिम नेताओं ने केंद्र सरकार से यह भी मांग की है कि पूरे देश में गौवंश को मारने पर कानूनी रोक लगाई जाए। ऐसे में अब कुछ राजनीतिक दल, कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ पशु कारोबारी हाईकोर्ट में कुर्बानी की ऐसी प्रथा को जारी रखने की याचिकाओं को खारिज पा चुके हैं, और धंधा मंदा जरूर रहेगा, लेकिन गौवंश की कुर्बानी अब सजा की हकदार रहेगी।
बकरीद के निपट जाने के बाद भी बंगाल में बूचडख़ानों में जानवरों को काटने के लिए 1950 के नियम को देखें, तो राज्य में गौवंश को काटने पर कोई अलग से रोक नहीं है। यह बात सत्तारूढ़ भाजपा की देश भर की रीति-नीति के साथ कुछ विरोधाभास वाली है, और इसे कानून के साथ-साथ जानवरों की जिंदगी से जोडक़र भी देखने की जरूरत है। हमने जब भारत में गौवंशीय पशुओं, गाय और भैंस की उम्र और उत्पादकता का रिश्ता देखा, तो आंकड़े बताते हैं कि देसी गाय की उत्पादक उम्र 8 से 12 साल रहती है, क्रॉस ब्रीड गाय की उत्पादक उम्र 6 से 9 साल, और भैंस की उत्पादक उम्र 10 से 14 साल। इन जानवरों की उत्पादक उम्र का मतलब इनके दूध देने से है। अब इसके बाद इन जानवरों की औसत और अधिकतम संभावित उम्र अगर देखें, तो देसी गाय की औसत उम्र 15-20 साल रहती है, अधिकतम उम्र 22-25 साल। क्रॉस ब्रीड गाय की औसत उम्र 12 से 16 साल, और अधिकतम आयु 18-20 साल। भैंस की औसत उम्र 18-22 साल, और अधिकतम उम्र 25-28 साल। जानवरों के जानकार तथ्य बताते हैं कि बोलचाल में गाय-भैंस की औसत उम्र 15-20 साल कही जाती है। हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि औसत उत्पादक उम्र के बाद ये जानवर औसत और कितना जी सकते हैं। देसी गाय दूध देना बंद करने के बाद औसत 4-8 साल रह सकती है, और अधिकतम उम्र 8 से 10 साल भी। क्रॉस ब्रीड गाय दूध देना बंद करने के बाद 4 से 7 साल औसतन जीती है, लेकिन वह अधिकतम 7 से 9 साल भी जी सकती है। भैंस उत्पादक उम्र के बाद 6 से 10 साल औसतन जी सकती है, लेकिन उसकी अधिकतम उम्र 10-12 साल भी हो सकती है।
अब इन पशुओं के जो मालिक हैं, उनके लिए उत्पादकता खत्म होने के बाद 8-10 साल इन्हें पालना बड़ा भारी पड़ेगा, यह समझा जा सकता है। चूंकि सरकार का कानून अभी अपनी पहली बकरीद के पहले खुलासे से सामने आया है, और उसने गोवध पर कोई पूरी पाबंदी नहीं लगाई है, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि गाय-भैंस को काटने की इजाजत कुछ शर्तों के साथ जारी रहेगी, और इन शर्तों को हम ऊपर गिना चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि 8 से 12 बरस तक जो गाय गऊमाता रहेगी, वह बाद के बरसों में किस तरह काटी जा सकेगी, क्या उत्पादकता खत्म होने से गऊमाता का उसका दर्जा खत्म हो जाएगा? और क्या भैंसी-मौसी के साथ भी दूध बंद होने के साथ-साथ लगाव खत्म हो जाएगा, और सरकारी इजाजत से उसे काटा जा सकेगा? सरकार का ताजा आदेश चूंकि हाईकोर्ट में काफी सख्त जांच और आंच झेल चुका है, इसलिए हम उसमें कोई कमजोरी नहीं देख रहे हैं। उस आदेश के तहत यह इजाजत है कि उत्पादकता खत्म होने, या 14 बरस की उम्र हो जाने, या स्थाई विकलांगता या बीमारी की वजह से इन पशुओं को बूचडख़ाने में काटा जा सकेगा।
भारत के अलग-अलग राज्यों में सार्वजनिक नियमों पर अमल का अलग-अलग हाल रहता है, देश के कई प्रदेशों में बिना हेलमेट दुपहिया चलाने वाले, या दुपहियों पर बैठने वाले का तुरंत चालान होता है, लेकिन कई दूसरे प्रदेश या शहर देश भर में लागू इस नियम पर अमल पर कोई दिलचस्पी नहीं रखते। इसी तरह शहरी विकास के नियम कोई प्रदेश मानते हैं, कोई प्रदेश नहीं मानते हैं। कहने के लिए हर प्रदेश बड़े कड़े नियम बनाकर चलते हैं, और नियम जितने कड़े रहते हैं, वसूली-उगाही की गुंजाइश उतनी ही अधिक हो जाती है। मतलब यह कि दिखावे के लिए हाथी दांत बहुत बड़े-बड़े बनाए जाते हैं, और फिर हाथी दांत जैसे कीमती दाम वसूलने के लिए दिखावे के ऐसे नियमों का इस्तेमाल होता है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही हम देखते हैं कि ताकतवर लोग अपने पेट्रोल पंप, रेस्त्रां, या मॉल के सामने डिवाइडर काटकर आने-जाने का रास्ता बना लेते हैं, उन पर कोई नियम लागू नहीं होता। राजधानी रायपुर में ही एक एक्सप्रेस हाईवे है, जिसके किनारे बसे हुए छोटे-छोटे बहुत गरीब घरवालों को भी उस सडक़ पर आने की छूट नहीं रहती, क्योंकि तेज रफ्तार ट्रैफिक में वे कुचल न जाएं। सरकार ने इसके लिए नियम भी घोषित किया हुआ है, लेकिन अभी एक मॉल के लिए इस एक्सप्रेस हाईवे पर रास्ता खोल दिया गया। इसके पहले शहर का, या प्रदेश का एक बड़ा कुख्यात बिल्डर अपनी एक महंगी कॉलोनी का रास्ता सरकारी नियमों के खिलाफ इस सडक़ पर खोल चुका था, उसके खिलाफ भारी शिकायत हुई, लोग अस्पताल तक पहुंचे, और तब जाकर वह रास्ता अभी रोका गया है, यह अलग बात है कि दसियों लाख से बनाए गए अवैध गेट का ढांचा अब तक खड़ा है। प्रदेश का कोई भी शहर हो, ताकतवर नेताओं के पेट्रोल पंपों के सामने सारे नियम-कायदे तोडक़र डिवाइडर काट दिए जाते हैं, ताकि नेताजी के धंधे में कोई कमी न रहे। रायपुर के ही कपड़ा बाजार में कारोबारियों ने नियमों के खिलाफ जाकर पार्किंग की जगह पर दुकानों के दरवाजे खोल दिए थे, उसके खिलाफ म्युनिसिपल और प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की, लेकिन बाजार की ताकत नेताओं तक इतनी थी, कि इस अवैध धंधे को फिर खोल दिया गया।
लोगों की अगर ताकत रहे, तो वे सरकार के नियमों को चुइंगम की तरह चबाकर जनता के मुंह पर थूक सकते हैं। इसके लिए सिर्फ नेता होना जरूरी नहीं रहता, परिवार के किसी दूसरे के नाम से कारोबार करने वाले अफसर भी खेत की जमीन पर शराब कारोबार कर सकते हैं, कोटवार की जमीन पर कब्जा कर सकते हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म को कूड़ेदान में फेंक सकते हैं। राजनीति या पैसों की ताकत से बड़ा कोई संविधान नहीं होता। अवैध कब्जे और अवैध निर्माण, अवैध इस्तेमाल के इतने किस्म के मामले दस-दस, बीस-बीस बरस से अदालती आदेशों का मुंह चिढ़ाते हुए खड़े रहते हैं, कि अगर दस्तखत करने वाले जज उन्हें देख लें, तो हीनभावना से ग्रस्त होकर खुदकुशी ही कर लें।
अभी लगातार भोपाल सहित दूसरे कुछ शहरों में दहेज हत्या के इतने चर्चित मामले सामने आए कि एक बार फिर दहेज प्रताडऩा पर नजर डालना जरूरी लगने लगा। भारत सरकार के दर्ज जुर्म के आंकड़े बताते हैं कि देश में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण हर 30 मिनट में एक जुर्म दर्ज होता है। अब मानो यह काफी न हो, तो दूसरा और भयानक आंकड़ा यह है कि हर दिन 16 महिलाओं की दहेज हत्या होती है, यानी हर 90 मिनट पर एक दहेज हत्या! इससे भयानक और क्या हो सकता है? यह भी समझने की जरूरत है कि दहेज हत्या तो आमतौर पर छुपने लायक बात नहीं रहती है, लेकिन दहेज प्रताडऩा और दहेज हिंसा की शिकायतें तब तक पुलिस तक नहीं पहुंचतीं, जब तक पानी सिर के ऊपर नहीं निकल जाता। जब शादीशुदा लड़कियों के माँ-बाप को यह पक्का भरोसा हो जाता है कि लडक़ी की शादी बचने का अब कोई जरिया नहीं है, और यह भी कि प्रताडऩा झेलते-झेलते वह मर भी सकती है, तभी जाकर दहेज प्रताडऩा की पुलिस रिपोर्ट होती है। यह एक अलग बात है कि जैसा कि हर कड़े कानून के साथ होता है, कुछ फीसदी मामलों में ऐसी झूठी रिपोर्ट भी होती है, लेकिन उस झूठ को देश की बड़ी अदालतें अब साफ-साफ देखने लगी हैं, और ऐसे कई मामलों में झूठी रिपोर्ट लिखाने वालों के खिलाफ ही अदालती आदेश भी हुए हैं।
अब अगर पुलिस में दर्ज मामलों को देखें, तो इतनी बड़ी संख्या में दहेज प्रताडऩा या दहेज हत्या के मामले जारी रहने, दर्ज होने, और अदालत तक पहुंचने की एक बड़ी वजह यह लगती है कि अब अधिकतर लड़कियों और महिलाओं के हाथ में ऐसे मोबाइल फोन रहते हैं जिनमें हिंसा या प्रताडऩा के सुबूत संदेशों के रूप में दर्ज हो जाते हैं, या मामूली समझ रखने वाली नवविवाहिताएं भी प्रताडऩा की किसी न किसी तरह की रिकॉर्डिंग करना सीख जाती हैं, और इन्हें संदेशों के रूप में अपने फोन से सहेलियों, और मायके को भेज देती हैं। पहले ये सुबूत इतने आसान नहीं थे, और कोई खबर भिजवाना भी मुश्किल रहता था। अब आसान संदेश पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। अदालतों का काम भी डिजिटल और साइबर सुबूत के बाद कुछ आसान हो जाता है, जांच एजेंसियों का काम तो आसान हो ही जाता है। हम बिना किसी तंज के यह कहना चाहते हैं कि समाज में बदलती हुई स्थिति के मुताबिक अब लड़कियों और महिलाओं का जो एक नया सशक्तिकरण हुआ है, उससे भी अब दहेज प्रताडऩा का उजागर होना बढ़ गया है। आज जब कुछ गिनी-चुनी महिलाएं शादी तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत रखती हैं, जब वे शादीशुदा रहते हुए भी अपने किसी पुराने या नए प्रेमी के साथ मिलकर पति का कत्ल करने की हिम्मत रखती हैं, तो यह जाहिर है कि वे प्रताडऩा के सुबूत भी अधिक चतुराई से जुटा सकती हैं।
लेकिन भारतीय समाज में दहेज प्रताडऩा का विस्तार संतानमोह, और पुत्रमोह तक हो जाता है। ससुराल में प्रताडऩा के जो मामले दहेज से जुड़े हुए नहीं भी रहते, उनमें भी बहू से संतान की उम्मीद, और संतान में भी बेटा लाकर देने की उम्मीद हिंसा तक पहुंच जाती है। जहां पर उसके साथ रियायत होती है, और शारीरिक हिंसा नहीं होती, वहां भी मानसिक प्रताडऩा और हिंसा तो आम बात रहती है। ससुराल के लोग अपनी अगली पीढ़ी की चाह में मरे पड़े रहते हैं, और यह चाह कन्या शिशु से पूरी नहीं होती, क्योंकि भारत के अधिकतर तबकों में वंश कन्याओं से आगे नहीं बढ़ता, बेटों से आगे बढ़ता है। लड़कियों को तो यह मान लिया जाता है कि वे पराए घर की रहती हैं, और उनकी शादी करने तक उनकी देखभाल करना ही मायके का जिम्मा रहता है। बहनों को बराबरी का हक न देना पड़ जाए, इसलिए डरे-सहमे भाई लोग भी बहन से सीमित रिश्ता ही रखते हैं, और वे भी आखिरी दम तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं कि डोली माँ-बाप के घर से उठती है, अर्थी तो पति के घर से ही उठनी चाहिए। भाईयों की संपत्ति पर एकाधिकार की चाह लड़कियों को मायके से भावनात्मक रूप से भी बेदखल कर देती है। ऐसे में जिस लडक़ी को मायके का भावनात्मक और रोजमर्रा का साथ कम रहता है, उसे ससुराल भी बेसहारा और बेबस मानकर उसके साथ मनचाही बदसलूकी करता है। जिस लडक़ी को मायके का साथ अधिक रहता है, उससे अधिकतर ससुराल वाले यह उम्मीद करते हैं कि किसी सुख में न सही, किसी दुख की नौबत में तो बहू के मायके वालों को आकर साथ देना ही चाहिए। यह कही या अनकही सामाजिक उम्मीद देश की संस्कृति सी बन गई है, और लोग जुबानी जमा-खर्च के लिए उन्हें कोई दहेज नहीं चाहिए, कहते हुए भी साथ में कॉमा के बाद यह जोड़ देते हैं, अपनी बेटी को जो देना हो, वो दें। कुल मिलाकर लेने से परहेज बहुत कम लोगों का रहता है, कुछ चाकू-पिस्तौल की नोंक पर लेते हैं, कोई कुछ सामाजिक और मानसिक प्रताडऩा खड़ी करके लेते हैं, और कुछ लोग मासूम बने हुए हमें कुछ नहीं चाहिए के अंदाज में सब कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। जुर्म के सरकारी आंकड़ों के जानकार विश्लेषक भी यह कहते हैं कि दहेज प्रताडऩा, या बहू की दूसरे किस्म की प्रताडऩा के मामले इससे बहुत अधिक हो सकते हैं, और सामाजिक अपमान की आशंका से शिकायत दर्ज नहीं कराई जाती है। कई परिवार इसलिए भी शिकायत दर्ज करवाने से कतराते हैं कि घर में बची हुई और छोटी लड़कियों का रिश्ता तय होना इससे मुश्किल हो जाएगा।
आज की एक खबर है कि सडक़ पर कुत्ते से टकराकर एक बाइक सवार सडक़ पर गिरा, और रात 11 बजे के करीब की इस घटना में किसी ने उसकी मदद नहीं की। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के भीतर यह व्यक्ति बेहोश पड़े रहा, और कोई उसकी बाइक, मोबाइल फोन और 800 रुपए का पर्स लेकर भाग गया। यही समाचार बताता है कि कुछ दिन पहले शहर के एक दूसरे हिस्से में ऐसा ही हुआ था, और कार से टकराकर दुपहिया सवार नौजवान बेहोश हो गया था, और उसकी दुपहिया भी गायब हो गई थी। बीच-बीच में अखबारों में ऐसी सुर्खियां देने का रिवाज है कि इंसानियत अभी जिंदा है। ऐसा उन खबरों के साथ होता है जिनमें किसी के खोए हुए सामान को लोग वापिस पहुंचा देते हैं, या ऐसी ही कोई दूसरी मदद कर देते हैं जो कि आज की इंसानियत के हिसाब से कुछ चौंकाने वाली रहती है। इंसानियत शब्द भी बड़ा अजीब है, हर उस व्यक्ति के लिए यह आसानी से इस्तेमाल हो जाता है जिनके भीतर इसका एक कतरा भी न बचा हो। एक तरफ तो सरकार यह कहती है कि सडक़ हादसे में जख्मी किसी को अस्पताल में पहुंचाने पर उन्हें 25 हजार जैसी कोई रकम ईनाम में मिलती है, यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनसे कोई पूछताछ तक नहीं होगी। अस्पतालों को कहा जाता है कि सडक़ हादसे में जख्मी होकर अगर कोई पहुंचे तो बिना भुगतान की परवाह किए तुरंत उनका इलाज शुरू किया जाए। ऐसे में भी राजधानी के भीतर अगर लोग किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाना तो दूर रहा, उसे लूट लेने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं, तो उन्हें चोर कहना, चोर की बेइज्जती होगी, उन्हें मामूली लुटेरा कहना, लुटेरों की बेइज्जती होगी, यह एकदम खास दर्जे के जल्लाद किस्म के मुजरिम हैं जिनके लिए सजा में एकदम अलग इंतजाम होना चाहिए। वैसे हिंदुस्तान में इसकी लंबी परंपरा है, और हमारी गौरवशाली संस्कृति ऐसी घटनाओं से भरी-पूरी है। देश में कई ऐसी बड़ी ट्रेन दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें आसपास के गांवों के पहुंचे हुए लोग घायलों को डिब्बों से निकालने के बजाय उनके कहने और उनकी घडिय़ां उतार रहे थे, उनके सामान लूट रहे थे। जिस वक्त इस गौरवशाली देश की संस्कृति को लोगों को यह सुझाना था कि वे घायलों को बचाते, डिब्बों में फंसे हुए लोगों को निकालते, वे गहने नोच रहे थे। अभी हाल के महीनों में ही छत्तीसगढ़ में एक से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें मुर्गियां ले जाते हुए कोई गाड़ी पलट गई, और उसके जख्मी ड्राइवर-कंडक्टर उसमें फंसे रहे, और लोग गाड़ी के ऊपर चढक़र मुर्गियां लूटकर भागते रहे, और गांव-कस्बे में दावत हो गई। किसी भी सामान से भरी हुई गाड़ी हिंदुस्तान की सडक़ों पर पलटे, तो लोग ड्राइवर कंडक्टर को बचाने से अधिक सामान लूटने में जुट जाते हैं। यही गौरवशाली संस्कृति पिछले हफ्तेभर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सडक़ों पर देखने मिली, जब घायल पड़े रहे, बेहोश रहे, और राह चलते लोग उनकी गाड़ी ले भागे, मोबाइल और बटुआ भी ले गए। हमारा अनुभव यह कहता है कि ऐसा लूटकर भागने वाले लोग जरूरी नहीं है कि पेशेवर लुटेरे रहे हों, ऐसे लोग घरेलू और आम लोग भी हो सकते हैं जो कि मौका मिलने पर कुछ देर के लिए फायदा पाने के लिए लुटेरे बन गए हों।
इस देश में लोग बड़ी-बड़ी बीमारियों की नकली दवाइयां बनाने के बहुत ही संगठित कारोबार को चलाते हैं, कोरोना के दौरान उसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन थोक में नकली बनाए गए और लाख-लाख रुपए में बेचे गए, दूसरी तरफ अभी और खबरें आईं हैं कि किस तरह कैंसर की दवाई नकली बनाकर बाजार में सप्लाई की जा रही है।
हिन्दुस्तान बड़ा ही अजीब देश है। यहां के लोग अलग-अलग कई सदियों में जीते हैं। कुछ लोग तो हजारों बरस पहले की गुफाओं में जीने वालों सरीखे हैं, कुछ लोग आज की पीढ़ी के बेधडक़ और बेझिझक लोग हैं जिनकी लिव-इन-रिलेशनशिप सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों से आसान हो गई है, हालांकि उत्तराखंड जैसी सरकार ने उसे मुश्किल और नामुमकिन बनाने के कानून बना दिए हैं। अभी-अभी कल-परसों ही
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उत्तर भारत के किसी एक राज्य में गर्भवती महिला की सोनोग्राफी करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताने वाला डॉक्टर गिरफ्तार हुआ है, और इसी देश के बहुत से बच्चे अंतरिक्ष में जाने का भी सपना देखते हैं। एक तरफ तो केन्द्र सरकार अलग-अलग जातियों के बीच विवाह होने पर दलित और आदिवासी से शादी करने वाले गैरदलित या आदिवासी को एक ठीक-ठाक रकम प्रोत्साहन के रूप में देती है, और हर साल हिन्दुस्तान में दूसरी जाति या धर्म में शादी करने वाले लोगों को उनके परिवार के लोग ही मार डालते हैं। खानदानी इज्जत के लिए की जाने वाली ऐसी हत्याओं को समाज ऑनर-किलिंग कहता है।
ऐसी एक घटना अभी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले से आई है जो दिल दहला देती है। वहां पर एक मुस्लिम ऑटोरिक्शा चालक ने अपनी बहन और बहनोई के साथ मिलकर अपनी नाबालिग बेटी का गला काटकर उसका कत्ल कर दिया, और पहचान छिपाने के लिए लाश के 6 टुकड़े करके अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बताया कि यह आदमी 15 बरस की अपनी बेटी के किसी दूसरे समुदाय के युवक से बात करने से खफा था। उसे डर था कि यह लडक़ी भी अपनी दो बड़ी बहनों की तरह दूसरे समुदाय के युवकों से शादी कर लेगी। इस आशंका में इस पिता ने पत्नी और बेटे को घर के बाहर भेजा, बहन-बहनोई के साथ मिलकर बेटी को इतने वीभत्स तरीके से मारा, और बदन के हिस्से अलग-अलग जगहों पर ठिकाने लगा दिए।
एक तरफ तो देश के बड़े-बड़े हिन्दू नेताओं की लड़कियों की शादी मुस्लिमों से हो जाती है, और कोई हल्ला नहीं होता। बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी, करोड़पति-अरबपति कारोबारी किस जात-धरम में शादी करते हैं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे राजाओं के पुराने दिन याद पड़ते हैं कि राजा जो करते हैं, वही सामाजिक नियम रहते हैं, वे किसी भी तरह के नियमों से ऊपर रहते हैं। आज के राजा बड़े-बड़े नेता, कारोबारी, या शोहरत हासिल कामयाब लोग हैं, और उनके किसी जात-धरम में शादी पर कोई विरोध नहीं होता। समाज के आम लोगों में से कोई ऐसा करें, तो उनके खिलाफ समाज के लोग झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं। दूसरे धरम की शादी तो दूर की बात रही, हिन्दू धर्म के भीतर ही, ओबीसी के भीतर ही, एक जाति से किसी ने दूसरी जाति में शादी कर ली, तो इस पर भी जातबाहर कर दिया जाता है, और ऐसे कई मामले छत्तीसगढ़ में ही अदालतों में चल रहे हैं। इन मामलों की बहुतायत जिस जाति में है, उस जाति के लोग बड़ी संख्या में हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बन रहे हैं, और ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे अपने ही लोगों को अंतरजातीय विवाह पर जातबाहर करके दूसरे धर्म की तरफ नहीं धकेल रहे हैं?
अब उत्तरप्रदेश के इस मुस्लिम पिता ने अपनी ही बच्ची का कत्ल कैसे किया होगा, यह हमारे सरीखे साधारण इंसान के लिए समझना भी मुश्किल है। यही देश एक औलाद के लिए हर किस्म के डॉक्टर के पास, मंदिर-मस्जिद, और दरगाह तक जाते हुए लोगों को देखते रहता है। सरकार के सामने बच्चों की चाह रखने वाले लोग कमेटियों में अर्जी लगाए हुए बरसों तक इंतजार करते हैं कि उन्हें कोई बच्चे मिल जाएं। संपन्न लोग आज के आईवीएफ सेंटरों से लेकर दूसरे कई किस्म के अस्पतालों तक लाखों रूपए खर्च करते हैं, और सरोगेसी के लिए दसियों लाख रूपए भी लगा देते हैं। ऐसे में अपनी ही औलाद के टुकड़े-टुकड़े कर देना, इतनी ताकत कोई धर्म ही दे सकता है, या किसी जाति का कोई पाखंडी अहंकार। शादी पर अपने बच्चों को, या उनके प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना, शादी हो चुकी है तो अपनी औलाद के पति, या उसकी पत्नी को मार डालना एक पारिवारिक अहंकार से बढक़र सामाजिक अहंकार के लिए किया जाने वाला जुर्म है क्योंकि लोगों को लगता है कि परिवार में ऐसा होने के बाद वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे।
अमरीकी संसद के उच्च सदन ने एक स्पष्ट बहुमत से उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है जिसका मकसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित करना है, और ईरान में अमरीकी फौजी कार्रवाई को बिना संसदीय मंजूरी के रोकना है। ट्रम्प ने जब इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, तो अमरीका की संसदीय-संवैधानिक भाषा के बीच से एक चोर दरवाजा ढूंढ निकाला था कि वह जंग नहीं थी, वह सिर्फ फौजी कार्रवाई थी। राष्ट्रपति अपने देश की हिफाजत के लिए, देश को बचाने के लिए फौजी कार्रवाई करने का अधिकार रखता है, लेकिन अगर उसे जंग में तब्दील करना हो, तो उसकी इजाजत, और उसके लिए बजट, दोनों ही संसद पास कर सकती है। ट्रम्प ने संसदीय अग्निपरीक्षा से गुजरे बिना यह जंग शुरू कर दी थी, और किसी पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत में जिरह के दौरान बच निकलने की भाषा का इस्तेमाल कर रहा था कि यह जंग नहीं है, सिर्फ फौजी कार्रवाई है। लेकिन अभी अमरीकी उच्च सदन, सीनेट ने 50-47 के बहुमत के मतदान से युद्ध-अधिकार प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है, जो कि ट्रम्प के इरादों के खिलाफ है, उस पर रोक लगाने की तरफ एक बड़ा कदम है। अमरीकी संसद के इस सदन में ट्रम्प की पार्टी का बहुमत है, लेकिन उसकी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने बगावत करके विपक्षी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। सदन के बाहर भी ट्रम्प की पार्टी के कई सांसद इस जंग, और अमरीका पर इसके असर को लेकर फिक्र जाहिर कर चुके थे, इसकी आलोचना कर चुके थे। लेकिन सदन के भीतर एक औपचारिक मतदान में ट्रम्प के इरादों को इस तरह खारिज करने के लिए अगर उसकी पार्टी के सांसदों ने बगावत की है, कुछ सांसद गैरमौजूद रहे, तो यह ट्रम्प के लिए एक बड़ा झटका है।
हमने अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था को पढक़र इस नौबत को समझने की कोशिश की। वॉर पावर्स एक्ट ऑफ 1973 को वियतनाम युद्ध के दौरान अमरीकी राष्ट्रपतियों की मनमानी को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके तहत बिना संसदीय मंजूरी या जंग की घोषणा के अमरीकी सेना 60 दिनों से अधिक समय तक किसी विदेशी शत्रुता में शामिल नहीं हो सकती। ऐसी समय सीमा पूरी हो जाने पर सेना को वापिस बुलाने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय राष्ट्रपति को मिलता है। अब ईरान युद्ध को 80 दिन से अधिक हो चुके हैं, इसलिए संसद का तर्क है कि ट्रम्प की यह जंग अब अमरीकी कानून और संविधान के तहत पूरी तरह गैरकानूनी हो चुकी है। अभी भी ट्रम्प के पास कुछ तानाशाह अधिकार बचे हुए हैं, और वह इस मौजूदा प्रस्ताव के पास हो जाने के बाद भी राष्ट्रपति का वीटो का इस्तेमाल कर सकता है, और इस वीटो को पलटने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। ट्रम्प के खिलाफ इतना बड़ा बहुमत चाहे न जुट सके, उसकी रिपब्लिकन पार्टी के किले की दीवारों में दरारें तो आ ही गई हैं। अमरीकी विश्लेषक कहते हैं कि जिस तानाशाही के साथ ट्रम्प अपनी पार्टी पर काबिज चले आ रहा है, और देश को हांक रहा है, उसके प्रति वह अंधी वफादारी अब धसक रही है। जंग की वजह से अमरीकी जनता जिस महंगाई से त्रस्त है, हर अमरीकी नागरिक पर जिस तरह इस जंग का बोझ पड़ रहा है, उसे देखते हुए रिपब्लिकन सांसदों और पार्टी को यह डर है कि अगर यह जंग लंबी खिंची, तो नवंबर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में पार्टी को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
जैसे पेशेवर मुजरिम अदालत में बचाव के तर्क ढूंढते हैं, ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि चूंकि ईरान के साथ एक युद्धविराम चल रहा है, इसलिए संसदीय अनुमति देना युद्ध की सीमा अब लागू नहीं हो रही, क्योंकि अभी युद्ध चल ही नहीं रहा है। लेकिन संसद में इस तर्क को खारिज कर दिया है, और उसका कहना है कि युद्धविराम के साए में जो फौजी तैयारियां चल रही हैं, जो फौजी प्रतिबंध लगे हुए हैं, वे युद्ध का ही हिस्सा हैं। आज अमरीका के भीतर के लोकतंत्रवादी लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि आंतरिक लोकतंत्र पर इतना अधिक जोर देने वाला यह देश किस तरह एक तानाशाह राष्ट्रपति की अकेले की सनक का शिकार हो गया है, और वह जहां चाहे वहां जंग छेड़ रहा है, हमले कर रहा है, हमलों की धमकी दे रहा है। ट्रम्प की ही पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने यह कहा है कि यह लड़ाई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच की नहीं है, यह लड़ाई संसद की सर्वोच्चता-सम्प्रभुता, और राष्ट्रपति की तानाशाही के बीच की लड़ाई है। अमरीकी लोकतंत्र में आज की नौबत चेक एंड बैलेंस की मानी जा रही है कि जब राष्ट्रपति बेलगाम होने लगे, तो संसद को अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में भारत की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक हुई, जो कि यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड, इन चार राज्यों की परिषद है और बारी-बारी से इनमें यह बैठक होती है। केंद्रीय गृहमंत्री परिषद के स्थायी अध्यक्ष रहते हैं और वे ही जगह तय करते हैं। जाहिर है कि इस बार की बैठक उन्होंने बस्तर में ही छांटी होगी क्योंकि बस्तर में अमित शाह की
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गृहमंत्री के रूप में देश की सबसे बड़ी कामयाबी दर्ज है उन्होंने बस्तर से नक्सल हिंसा के खात्मे की तारीख की घोषणा कुछ इस तरह तय की थी कि जैसे मानो किसी कार के एसेंबली प्लांट से गाड़ी निकलने की तारीख बताई गई हो। पूरी तरह से अनिश्चितता से घिरा हुआ नक्सल मोर्चा अमित शाह की तय की हुई तारीख तक हिंसामुक्त हो जाएगा, यह किसने सोचा था? पुलिस और सुरक्षाबल, जिन पर यह जिम्मा था, घोषणा के दिन तो खुद उन्हें भी अंदाज नहीं था कि वे ऐसा अभूतपूर्व काम कर पाएंगे। लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इसकी वाहवाही जाती है कि उन्होंने जो कहा, सो किया।
इसलिए इस बार की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक बस्तर में रखी गई, और जिन चार राज्यों के मुख्यमंत्री इसमें शामिल हुए, वे चारों ही भाजपा के थे। देशभर के नक्शे पर खिले हुए कमल से भी अमित शाह का आत्मविश्वास इस बैठक में बहुत ऊंचा था, और उन्होंने अब सुरक्षा इंतजामों की घटती जरूरत के साथ-साथ विकास की बढ़ती जरूरत को जोडक़र कुछ महत्वपूर्ण बातें इस आयोजन में की हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर सुरक्षा कैंपों में से एक तिहाई कैंप वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित होंगे। इन केंद्रों को बैकिंग, डिजिटल सेवाओं, स्कूल आंगनबाड़ी, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाएगा। यह पहली नजर में ही एक अच्छा फैसला इसलिए लगता है कि नक्सल हिंसा मुक्त होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था का जो ढांचा बस्तर में अब रह गया है, उसे समेटने के बजाय उसका इस्तेमाल विकास, जनसेवा, और सरकारी कामकाज में इस तरह से किया जाना चाहिए कि इन इलाकों में नक्सल हिंसा की वजह से जो विकास नहीं हो पाया था, वह अब तेजी से हो सके। इन इलाकों में बने हुए कुछ नए, और कुछ पुराने जिलों का ढांचा बनने में भी कुछ समय लग सकता है, लेकिन अगर एक साथ करीब दो दर्जन सुरक्षा कैम्प इन इलाकों में सरकारी कामकाज और जनकल्याण के केन्द्र की तरह इस्तेमाल होने लगेंगे, तो इससे लोगों में बदले हुए वातावरण के प्रति भरोसा तेजी से बढ़ सकेगा। ये कैम्प जाहिर है कि सबसे बुरी तरह नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे अधिक थे, और ऐसे ही इलाकों में सरकार का रोज का कामकाज पिछड़ा हुआ रहता था। बीते बरसों में धीरे-धीरे सुरक्षा बल आसपास के गांवों का भरोसा जीतने के लिए कुछ किस्म के जनसुविधा और जनसेवा के काम भी करने लगे थे। सुरक्षा कैम्पों में लोगों का इलाज होने लगा था, कई जगह राशन दुकानें भी इन्हीं सुरक्षा शिविरों में चलती थीं। अब जब यहां से अर्धसैनिक बलों की वापिसी होगी, तब इन्हीं जगहों पर जनसुविधा का काम बढ़ाया जा सकता है, और अभी अमित शाह ने जो कहा है, उसका मतलब भी यही दिखता है।
गृहमंत्री के अलावा अमित शाह का जो दूसरा रूप सामने आया, वह सहकारिता मंत्री का है। केन्द्र सरकार में ये दो बिल्कुल अलग-अलग मिजाज के विभाग हैं, और अमित शाह के पास इन दोनों का एक साथ रहने का कोई तर्क समझ नहीं आता था। अब उन्होंने देश के सबसे बड़े सहकारिता-मॉडल, गुजरात के अमूल की तरह छत्तीसगढ़ के बस्तर में दुधारू पशुपालन को बढ़ावा देने की एक बड़ी योजना घोषित की है। इसके तहत हर आदिवासी परिवार को एक गाय और एक भैंस देने की बात उन्होंने की है। उन्होंने यह भी कहा है कि गुजरात के आणंद में जो दुग्ध सहकारिता का बड़ा सफल प्रयोग दशकों से चल रहा है, उसी मॉडल की तरह बस्तर में दुधारू पशुओं के साथ-साथ मिल्क-नेटवर्क भी विकसित किया जाएगा। यह अभियान किसी भी तरह नक्सल हिंसा खत्म करने से कम चुनौतीपूर्ण, या कम महत्वपूर्ण नहीं है। बस्तर में आबादी बहुत बिखरी हुई है, और यहां के लोगों के बीच दुधारू पशुपालन की कोई पुरानी परंपरा भी नहीं रही है। यहां पर पशुओं को खिलाने के लिए पत्ते या दूसरे चारे का इंतजाम हो सकता है, अधिक आसान हो, लेकिन उनके पैदा किए हुए दूध के उत्पादक उपयोग का इंतजाम जब तक नहीं होगा, यह पशुपालन उनकी बहुत मदद नहीं कर सकेगा। इसलिए इस बहुत महत्वाकांक्षी घोषणा के साथ भी हम एक बड़ी चुनौती खड़ी देखते हैं कि बस्तर के नक्सल हिंसा प्रभावित इलाके जो कि दसियों हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका बस्तर में नक्सल प्रभावित रहा है, जिनमें आधा दर्जन से ज्यादा जिले थे। अब अमित शाह यह बोल गए हैं कि वे बस्तर को देश का सबसे विकसित संभाग बनाएंगे, तो यह चुनौती किसी और की दी हुई नहीं है, यह उनका अपना खुद का उठाया हुआ बीड़ा है। बस्तर के इलाके में करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर का हिस्सा नक्सल प्रभावित था। अब इसे न सिर्फ विकास की मूलधारा में लाना है, बल्कि यहां की आबादी के लिए आर्थिक गतिविधियां भी इतनी शुरू करना है कि बस्तर एक बहुत विकसित संभाग बन सके। यह विकास सिर्फ केन्द्र या राज्य सरकार के बजट से नहीं हो सकेगा, बस्तर की करीब 25 लाख आबादी 2011 की जनगणना में थी, जो कि अब काफी बढ़ चुकी होगी, और इस आबादी को जंगल और देहात के बीच हो सकने वाले कामों से जोडक़र ही यह संभाग छलांग लगा सकेगा। केन्द्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल हिंसा तकरीबन पूरी तरह खत्म कर देने का एक अविश्वसनीय काम कर दिखाया है। और यह काम भी किसी और की दी हुई चुनौती की वजह से नहीं किया गया था, अमित शाह ने खुद होकर यह बीड़ा उठाया था। इसलिए इसे सबसे विकसित संभाग बनाने की उनकी घोषणा भी उनकी नक्सल मोर्चे की कामयाबी का एक विस्तार ही रहेगी। अभी केन्द्र और राज्य दोनों जगह उनकी पार्टी की ही सरकारें कुछ और बरस का कार्यकाल देखने वाली हैं, और विकास का मौका उनके सामने है, यह वक्त ही बताएगा कि वे इसमें कितने कामयाब होंगे।
जर्मन संसद के निचले सदन, बुंडेसटाग, के 630 सांसदों की तनख्वाह में 497 यूरो (करीब 45 हजार रूपए) की बढ़ोत्तरी होनी थी, लेकिन सरकार ने इसे टाल दिया। सरकार और विपक्ष सबके बीच इस बात पर सहमति हो गई कि जनता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, उसे तकलीफ झेलनी पड़ रही है, ऐसे में सांसदों को अधिक वेतन नहीं लेना चाहिए। सदन के कुछ नेता देश की बाकी अर्थव्यवस्था की वेतन वृद्धि के मुताबिक संसदीय वेतन को तय करने के हिमायती थे, लेकिन सर्वदलीय सहमति इसके खिलाफ बनी, और बात आई-गई हो गई। भारतीय संसद में पिछले बरस मार्च में सांसदों के वेतन 24 फीसदी बढ़ गए, एक लाख से सवा लाख, दैनिक भत्ता, पेंशन, और बाकी सुविधाएं भी बढ़ गईं। भारत के अलग-अलग प्रदेशों में विधायकों के वेतन भी कई बार बढ़े हैं, लेकिन उनमें ऊंच-नीच बहुत अधिक है।
जर्मन संसद के इस ताजा फैसले को देखते हुए हमने अभी भारत में सांसदों के वेतन और मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की तुलना करके देखी। 1954 में सांसदों को न्यूनतम मजदूरी से 150-200 गुना तनख्वाह मिलती थी। 1980 में भी यही अनुपात बने रहा, और 2000 तक भी। 2010 में सांसदों की तनख्वाह में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई कि वह न्यूनतम मजदूरी से 300-400 गुना अधिक हो गई। 2018 में यह बढक़र 400-500 गुना हो गई, और 2025 में यह बढक़र 500-700 गुना हो गई। एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी और सांसद के उतने ही दिनों के वेतन में 500-700 गुना का फर्क हो गया। ये आंकड़े देखकर हमने कुछ और देशों में न्यूनतम मजदूरी और सांसदों के वेतन का अनुपात जानने की कोशिश की। इंटरनेट पर सहज उपलब्ध आंकड़ों को एक एआई, ग्रोक की मदद से देखने पर जो तस्वीर बनी, वह कुछ इस तरह की है। जिस पैमाने पर इस एआई ने सभी देशों के भीतर की तुलना की है, उनके मुताबिक जर्मनी में सांसद को मजदूर से 5.3 गुना अधिक तनख्वाह मिलती है, यूके में 5-7 गुना, फ्रांस में 5 गुना, या उससे कम, कनाडा में 4-5 गुना, ऑस्ट्रेलिया में 4 गुना, जापान में 4-5 गुना, अमरीका में 9-10 गुना। इस जोड़-घटाने के पैमाने पर भारत में सांसद को न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन मिलता है। जर्मनी में सांसदों की तनख्वाह अपने आप बढऩे का प्रावधान है, लेकिन इस बार आर्थिक स्थिति देखकर सांसदों ने खुद होकर इसे छोड़ दिया। यूरोप के कई देशों में सांसदों की तनख्वाह एक स्वतंत्र आयोग तय करता है, लेकिन भारत में सांसद खुद ही अपनी तनख्वाह और अपनी सहूलियतें तय करते हैं, और इसीलिए संसद की केंटीन में मिट्टी के मोल मिलने वाले शानदार खाने को लेकर खराब माहौल बने रहता है। इसके बाद हमने भारत के अगल-बगल के देशों का हाल देखा, क्योंकि अड़ोसी-पड़ोसी देशों की संस्कृतियां एक जैसी हो सकती हैं। नेपाल में सांसद को मजदूर की तुलना में 50-60 गुना अधिक वेतन मिलता है। इसके बाद की बारी श्रीलंका की है जहां यह 120-140 गुना तक अधिक है। फिर बांग्लादेश आता है जहां सांसद मजदूर से 130-140 गुना अधिक पाते हैं। और भारतीय उपमहाद्वीप में भारत इस मामले में सबसे ऊपर है जहां सांसद मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन पाते हैं।
भारत के अलग-अलग राज्यों में विधायकों की तनख्वाह को उन्हीं राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के साथ मिलाकर देखा गया। इसमें सबसे ऊपर झारखंड है जहां विधायक को मजदूर से 300 गुना अधिक मिलता है। इसके बाद महाराष्ट्र है जहां यह 180-200 गुना तक है। तेलंगाना भी 200 गुना वाला है। दिल्ली में 140 गुना अधिक वेतन विधायक मजदूरी के मुकाबले है। भारत के राज्यों का औसत देखें तो यह 150-250 गुना अधिक विधायक-वेतन बताता है। लेकिन अभी-अभी जिस केरल में नई सरकार बनी है, वहां पर मजदूर के मुकाबले विधायक को 50-60 गुना वेतन मिलता है, जो कि देश में सबसे कम है। केरल की आर्थिक स्थिति देश के बहुत से दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर है, लेकिन जहां झारखंड के विधायक को 2 लाख 90 हजार तनख्वाह मिलती है, वहां केरल के विधायक 70-80 हजार रूपए ही मिलती है। हमने अलग-अलग राज्यों में किसी विचारधारा की पार्टी के शासन के बारे में देखा, तो बड़ा दिलचस्प नजारा दिखा। भाजपा के शासन वाले राज्यों में विधायकों की तनख्वाह औसत से ज्यादा है, देश में सबसे अधिक वेतन इसी पार्टी के राज में है। कांग्रेस, और आम आदमी पार्टी के राज्यों में मध्यम से उच्च वेतन विधायकों का है। तमिलनाडु में औसत, यानी मध्यम वेतन है। लेकिन वामपंथी शासन वाले राज्यों में किफायत और सादगी पर जोर रहता है, और वहां पर वेतन सबसे कम रहता है।
आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने एक बार फिर अपनी यह सोच दुहराई है, और आंध्र के लोगों से अपील की है कि वे अधिक बच्चे पैदा करें। पहले भी वे अपने राज्य के लोगों से तीन-चार बच्चे पैदा करने को कह चुके हैं क्योंकि वहां से काम करने के लिए देश के दूसरे हिस्सों में, और खासकर विदेशों में बड़ी संख्या में लोग जाते हैं। आंध्र की हालत यह हो गई है कि स्थानीय रोजगार के लिए लोगों की कमी आने वाले बरसों में पड़ सकती है, और सामाजिक समस्या भी आ गई है कि परिवारों में सिर्फ बुजुर्ग बचते जा रहे हैं, स्थानीय काम करने वाले बच्चे कम होते जा रहे हैं। आंध्र और तेलंगाना जो कि कल तक एक ही राज्य थे, वहां के तेलुगुभाषी लोग अमरीका में कम्प्यूटरों का काम करने वाले भारतीयों में सबसे बड़ी संख्या में माने जाते हैं। आंध्र-तेलंगाना में हर गांव-कस्बे के बच्चों में अमरीका जाने का सपना रहता है,

यही संपादकीय आप हमारे यूट्यूब चैनल 'इंडिया-आजकल' पर देख-सुन भी सकते हैं जो कि काफी हद तक पूरा भी होता है। अभी मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने कहा है कि राज्य में किसी भी जोड़े के तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार दिए जाएंगे, और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रूपए। उन्होंने एक जनसभा में यह घोषणा की और कहा कि वे पहले जनसंख्या नियंत्रण के हिमायती थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब स्वाभाविक रूप से जनसंख्या वृद्धि दर गिरती जा रही है, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे और कामकाजी बच्चे देश पर बोझ न होकर देश की संपत्ति हैं। उनका कहना है कि आजकल कई जोड़े आमदनी बढऩे के बाद सिर्फ एक बच्चा रखना पसंद करते हैं, दूसरी तरफ कुछ परिवार दूसरे बच्चे का तभी सोचते हैं, जब पहला बच्चा लडक़ा न हो। इसलिए राज्य में 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार जनसंख्या वृद्धि दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेबल से नीचे पहुंच चुकी है, आंध्र में टीएफआर करीब 1.7 और तेलंगाना टीएफआर करीब 1.8 है। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि 2025-26 में यह आंकड़ा 1.5, और 1.6 तक नीचे जा चुका है। यही रफ्तार रही तो इन दोनों राज्यों की आबादी गिरती चलेगी, जैसा कि जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इटली, जैसे कई देशों में हो चुका है, और दक्षिण के कुछ राज्यों, तमिलनाडु और केरल में भी यह 1.5 पर आ गया है।
इसके लिए किसी समाजशास्त्री या वैज्ञानिक अध्ययन और समझ की जरूरत नहीं है कि अगर राज्य के पास बच्चों को बेहतर स्कूल-कॉलेज शिक्षा देने की ताकत है, उन्हें स्वस्थ रखने लायक इलाज की ताकत है, तो ऐसे बच्चे राज्य और सरकार पर बोझ नहीं रहते, वे राज्य के लिए कमाऊ संतान साबित होते हैं। आज पूरी दुनिया में यह माना जा रहा है कि जिस देश में हुनरमंद नौजवान पीढ़ी के जितने अधिक लोग होंगे, उसी का भविष्य होगा। लेकिन इस सोच में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘हुनरमंद’ है। पढ़े-लिखे डिग्रीधारी, बिना हुनर वाले नौजवान किसी भी अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा बोझ होते हैं। हमने अभी दो-चार दिन पहले ही यह लिखा है, या अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर जिक्र किया है कि भारत में स्नातक शिक्षित नौजवानों में से 30 फीसदी बेरोजगार हैं, जबकि पूरी तरह से अशिक्षित लेकिन हुनरमंद मजदूरों या कारीगरों में से कुल 3 फीसदी बेरोजगार हैं। आज ही फेसबुक पर एक मजेदार तंज वाली तस्वीर आई है जिसमें एक कारीगर जोरों से मुस्कुराते दिख रहा है, और उसके साथ लिखा हुआ दिख रहा है कि जब कॉलेज-शिक्षित लोगों के काम एआई खाते चल रहा है, तब प्लंबर और बिजली मिस्त्री इस तरह मुस्कुरा रहे हैं। आज जिस प्रदेश में अपने बच्चों और नौजवान पीढ़ी को हुनरमंद कामकाजी बनाने की ताकत है, जहां पढ़ाई और प्रशिक्षण का स्तर ऊंचा है, वहां पर आबादी कोई समस्या नहीं है। चन्द्राबाबू नायडू की यह बात उस समय सामने आई है जब आंध्र दक्षिण के कुछ दूसरे राज्यों के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय के मामले में थोड़ा पीछे है। लेकिन वे दूरदर्शी व्यक्ति रहे हैं, अविभाजित आंध्र के मुख्यमंत्री रहते हुए चन्द्राबाबू नायडू ने राजधानी हैदराबाद को साइबराबाद बनाने का काम किया था, और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी को वहां लेकर आए थे। अमरीका के किसी भी हिस्से में जाएं, वहां अविभाजित आंध्र के समय से ही तेलुगु लोगों की बहुत बड़ी मौजूदगी है, और वे सारे के सारे कम्प्यूटर हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर के काम में लगे हुए हैं। वे अपनी कमाई से घर जो पैसे भेजते हैं, या राज्य में जमीन-मकान, या दूसरे कारोबार में जो बड़ा पूंजीनिवेश करते हैं, उससे राज्य की अर्थव्यवस्था को खूब बढ़ावा मिलता है। और ऐसे ही लोगों को देखते हुए चन्द्राबाबू नायडू भविष्य की एक कमाऊ फौज बनाने की उम्मीद रखते हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, और केरल में भी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से खासी अधिक है, और दक्षिण के इन सारे राज्यों ने अपने मानव संसाधन विकास पर खूब मेहनत की है। इन राज्यों में भारत के दूसरे राज्यों से भी पढ़ाई के लिए लाखों नौजवान पहुंचते हैं, इनसे इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है, और कमाऊ रोजगार वाली पढ़ाई करके लौटने वाली युवा पीढ़ी भी अपने-अपने राज्यों के आर्थिक विकास में बेहतर योगदान दे पाती है।
भारत में आज 80 करोड़ आबादी सरकार के दिए हुए हर महीने के पांच किलो अनाज की वजह से दो वक्त भरपेट खा पा रही है। अगर राज्य अपनी आबादी को ऐसी ही हालत में रखेंगे, तो वह राज्य और देश पर बोझ रहेगी। लेकिन अगर बेहतर शिक्षा, और बेहतर स्वास्थ्य का इंतजाम करके समझदार राज्य अपने बच्चों, और अपनी युवा पीढ़ी को बाकी देश और दुनिया में मुकाबले के लायक तैयार करेंगे, तो वे अधिक से अधिक आबादी के जायज हकदार भी हैं। एआई की मार से दुनिया में रोजगार चाहे कम होते जाएं, हुनरमंद लोगों के लिए कई किस्म के रोजगार कम नहीं होने हैं, क्योंकि एआई और रोबोटिक्स मिलकर भी हर तरह के रोजगार नहीं खा सकेंगे। आंध्र से देश के बाकी राज्यों को यह सीखने का मौका मिलता है कि वे अगर स्कूल-कॉलेज, और यूनिवर्सिटी को महज बच्चों और नौजवानों को व्यस्त रखने की जगह बनाकर न चलें, उन्हें सचमुच ही काबिल बनाने के लिए इस्तेमाल करें, तो ऐसे राज्य तीन-चार बच्चों के लिए बढ़ावा देने का एक जायज हक रखते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग के एक प्रोफेसर पर आरोप है कि बीएससी फाइनल की एक छात्रा को फोन करके वे उसके लिए पेपर आऊट करने की बात कह रहे हैं, और मिलने के लिए बुला रहे हैं। बातचीत से नीयत जाहिर है कि वे छात्रा को डार्लिंग कहकर बुला रहे हैं, कह रहे हैं कि उसके लिए दोनों पेपर आऊट कर दिए हैं, रखे हुए हैं, दे देंगे, इग्जाम के पहले मिलने आ जाओ। प्रोफेसर यह भी कहते सुनाई देता है, मैं तुम पर फिदा हूं, डिच मत करना। छात्रा की शिकायत पर पुलिस ने इस प्रोफेसर को गिरफ्तार किया है, और शिकायत में छात्रा ने कहा कि प्रोफेसर ने पहले भी उससे शारीरिक छेड़छाड़ की थी। टेलीफोन की बातचीत का यह ऑडियो एकदम साफ-साफ चारों तरफ फैला हुआ है, और बताता है कि पेपर आऊट करने का सिलसिला किस तरह चलता है, और उसका लालच देकर एक प्रोफेसर अपनी छात्रा का देह-शोषण करना चाहता है। छत्तीसगढ़ के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में भी एक छात्रा ने एक प्रोफेसर, जो कि विभागाध्यक्ष भी था, उस पर आरोप लगाया था कि वह केबिन में बार-बार बुलाकर उसे बुरी नीयत से छूता था, यौन उत्पीडऩ करता था, मानसिक प्रताडऩा करता था। इस मामले में भी प्रोफेसर के टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, और यह मामला भी अभी अदालत में चल रहा है। जुलाई 2025 से एफआईआर के बाद से डॉ.आशीष सिन्हा फरार है, और सुप्रीम कोर्ट तक से अग्रिम जमानत नहीं हुई, लेकिन पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है। यह चिकित्सा प्राध्यापक छत्तीसगढ़ के सिकल सेल इंस्टीट्यूट का मेडिकल डायरेक्टर भी था, और विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी जुड़ा हुआ था। ऐसे ताकतवर प्रोफेसर के मुकाबले एमबीबीएस दूसरे बरस की एक छात्रा को सुप्रीम कोर्ट के बाद अब यह देखने मिल रहा है कि यह प्रोफेसर शायद देश छोडक़र भाग गया है।
ये दो मामले पकते हुए चावल की हंडी के दो दानों जैसे हैं। स्कूलों से लेकर कॉलेज, यूनिवर्सिटी, और रिसर्च तक यही हाल है। चारों तरफ लड़कियों और महिलाओं के शोषण के लिए मर्द तैयार बैठे हैं। छत्तीसगढ़ की ही कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक, हेडमास्टर, या प्रिंसिपल, सभी ओहदों के मर्द छात्राओं पर डोरे डालने में लगे रहते हैं, कभी-कभी छात्राएं हिम्मत करके बता पाती हैं, कई बार बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद गर्भवती होने पर बात उजागर होती है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की छात्राओं के छात्रावास में कई बार ऐसे बलात्कार होते हैं, और कमजोर ग्रामीण इलाकों से आई हुई गरीब लड़कियां विरोध नहीं कर पातीं। जिन लोगों को यह बात मुश्किल से समझ आती है कि लड़कियां तुरंत रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं करातीं, उन्हें समाज की सोच को भी समझना होगा कि सबसे पहले लोग लडक़ी पर ही तोहमत लगाएंगे कि उसे खेलने जाने की क्या जरूरत थी, एनसीसी की क्या जरूरत थी, वह किसी टीचर के बुलावे पर गई ही क्यों थी? समाज की नकारात्मक सोच के चलते हुए किसी लडक़ी या महिला के लिए किसी मर्द के खिलाफ शिकायत करना बड़ा ही मुश्किल रहता है। सबसे पहले तो पुलिस ही मसीहाई अंदाज में नसीहत देने लगती है कि जो हुआ है उसे भूल जाओ क्योंकि शिकायत करने पर समाज में लडक़ी का जीना ही मुश्किल हो जाएगा, आगे उसकी शादी नहीं हो सकेगी। इसके बाद अदालतों का रूख बड़ा मर्दाना रहता है, वकीलों में भी महिला वकील भी सेक्स-जुर्म की शिकार लड़कियों और महिलाओं में ही खामियां देखने वाली निकल जाती हैं। राजनीतिक दलों के लोग हर सेक्स-अपराध का राजनीतिक-नगदीकरण करने में लग जाते हैं, और उससे भी परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है।
स्कूलों के मामले में हमने देखा है कि जब स्कूली लड़कियों को गुड टच-बैड टच के बारे में समझाया जाता है, तो उसके बाद उनका हौसला बढ़ता है, शिकायत के लिए टेलीफोन नंबर की घोषणा और प्रचार होने के बाद अब कई मामले ऐसे फोन पर की गई शिकायतों से भी सामने आए हैं। आज जब सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग लाखों रूपए रिश्वत देने के लिए तैयार रहते हैं, तब अच्छी खासी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरी को खतरे में डालते हुए भी जो शिक्षक छात्राओं का ऐसा शोषण करते हैं, उनके लिए कुछ अधिक सजा तय होनी चाहिए, और यह इंतजाम भी होना चाहिए कि चूंकि वे खुद तो जेल में रहेंगे, इसलिए उनकी पेंशन का एक हिस्सा लंबे समय तक उनके शोषण के शिकार लडक़ी या महिला को मिले। इससे बलात्कारी, या यौन-शोषक के परिवार को भी परोक्ष रूप से एक जुर्माना लगेगा। चूंकि यह पेंशन परिवार का हक नहीं है, यह सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की नौकरी से जुड़ा हुआ मामला है, और उस नौकरी के दायरे में ही अगर उसने मातहत कर्मचारी या छात्र-छात्रा के साथ ऐसा जुर्म किया है, तो इसकी सजा का एक हिस्सा तनख्वाह या पेंशन से भी जुर्माने की शक्ल में निकलना चाहिए। ऐसे मामलों में सिर्फ कैद काफी नहीं मानी जानी चाहिए, बल्कि जिस नौकरी की वजह से वे ऐसा जुर्म करने की ताकत पा सके हैं, उस नौकरी के वेतन-पेंशन का कुछ हिस्सा भी जुर्माने में जाना चाहिए।


