संपादकीय

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Date : 11-Nov-2019

अयोध्या पर फैसले के साथ ही लोगों को बाबरी मस्जिद गिराने की याद आई और याद आए लालकृष्ण अडवानी जिन्होंने रथयात्रा निकालकर देश में हिंदू-उन्माद को बाबरी मस्जिद के गुम्बदों की ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। देश में जो सोचने वाले अब भी बचे हैं उनमें से कुछ ने याद किया कि रथयात्रा के प्रबंधक नरेन्द्र मोदी नाम के एक नौजवान थे। फिर लोगों को लगा कि चौथाई सदी हो गई, बाबरी विध्वंस का मुकदमा ही चल रहा है, उसका फैसला भी क्या मुजरिमों की जिंदगी में आएगा, या स्वर्गवासियों को सजा होगी? लोगों को वे मुख्यमंत्री और राज्यपाल याद आ रहे हैं जो बाबरी केस के कटघरे से सीधे शपथ लेने गए थे और अब फिर कटघरे में हैं। धरती की नाचीज अदालत का इंसाफ आए तब तक राम और अल्लाह का इंसाफ इन लोगों को बुला तो नहीं लेगा?

लेकिन देश की मंदिरों की घंटियों की तेज होती आवाजों के बीच सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक अधिक धार्मिक, अधिक धर्मान्ध और अधिक साम्प्रदायिक देश के रूप में हिंदुस्तान अधिक खुशहाल भी होगा? आज जब नारे हिंदुत्व के मील के पत्थर को खासा पीछे छोड़कर हिंदू राष्ट्र की ओर लपक चले हैं, तो दुनिया के सभ्य, सुखी, खुशहाल लोकतंत्रों की ओर भी देखना जरूरी है कि क्या वे खुशहाली की ओर धर्म के घोड़े पर सवार होकर पहुंचे हैं? 

दुनिया के खुशहाल देशों की फेहरिस्त में जो देश ऊपर हैं, वहां धर्म दम तोड़ रहा है। अधिकतर लोग गैरसाम्प्रदायिक और गैरनफरती हैं। धर्म का महत्व भी घटते चल रहा है और धर्म से परे जाते, नास्तिक होते लोग बढ़ते जा रहे हैं। हिंदुस्तान जैसे धर्म से लबालब, उफनते हुए, देश में जहां बेरोजगारी करोड़ों की गिनती में बढ़ रही है, वहीं सभ्य, विकसित और खुशहाल देशों में धर्म की दुकानें बंद हो रही हैं और चर्चों का बंद होकर वहां शराबखाने खुलना चल रहा है। उधर धर्म बेरोजगार हो रहा है, लोग खुशहाल हो रहे हैं, इधर धर्म खुशहाल हो रहा है, लोग बेरोजगार और बदहाल हो रहे हैं, लेकिन धर्म नाम की अफीम के नशे में उसके दर्द का अहसास नहीं हो रहा है। कभी किसी कमसमझ ने लिखा था कि भूखे भजन न होए गोपाला। अब आज के हिंदुस्तान में भोजनवंचित लोग भजनसंचित होकर बेतहाशा खुश हैं और भूखे पेट, नंगे पैर, हिंदू राष्ट्र की मंजिल की तरफ बढ़े चल रहे हैं। कार्ल मार्क्स ने धर्म को नाहक ही अफीम का दर्जा नहीं दिया था। आज वह इस देश में सिर चढ़कर बोल रहा है।

दुनिया के नास्तिक होते देशों और अमरीका के सबसे कम धार्मिक प्रदेशों को देखें तो उनमें एक बात एक सरीखी है, वे बेहतर हालत में हैं, और अधिक खुशहाल हैं। हिंदुस्तान का मॉडल यह समझाने के लिए आज एकदम सही है कि धर्म की धार को बढ़ाते चलने से उसके सामने एक काल्पनिक विधर्मी दुश्मन खड़ा कर देने से वह धर्म से बढ़कर धर्मोन्मादी हो जाता है, फिर साम्प्रदायिक हो जाता है, और फिर जानलेवा हो जाता है। वह अपने को मानने वालों के लिए भी जानलेवा हो जाता है।

आज अपने ही परिवार के किसी बच्चे को बेहतर इंसान बनाना हो तो उसे धर्म से दूर रखकर देखें, वह दुनिया का एक बेहतर नागरिक बनेगा, और बेहतर दुनिया बनाएगा।
-सुनील कुमार


Date : 10-Nov-2019

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हिन्दुस्तान जिस तरह और जिस हद तक शांत है, उससे कम से कम देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को मानो सांप सूंघ गया है। देश में बड़े बवाल की उम्मीद करने वाले लोगों की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी शायद सोचा था कि दंगा-फसाद शुरू होगा, भड़काऊ बातें होंगी, और कैमरों को नजारे मिलेंगे। लेकिन हुआ कुछ नहीं। जिनसे तेजाब की उम्मीद थी, उन लोगों ने भी इस मुकदमे के खत्म होने पर उस पर गंगाजल चढ़ाया, दुआ की, और वहां से चल निकले। अब आज सुबह से कुछ टीवी चैनल रामनाम के कीर्तन को घंटों दिखा रहे हैं, तो कुछ और हैं जो दर्शकों से राम के नाम पर कुछ दे बाबा के अंदाज में अपील कर रहे हैं। फैसले के कुछ समय पहले से देश में टीवी समाचार चैनलों के रूख को लेकर सरकार, जनता, और अदालत तक जिस तरह की नाराजगी चल रही थी, उसके बाद ऐसा लगता है कि समझदारी को थोड़ी सी जगह मिली, और चैनलों को समझ आ गया कि पेट्रोल के कनस्तर स्टूडियो से भी परे कर लेना ही ठीक होगा। 

अब इससे एक बात समझ पड़ती है कि हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपने 24 घंटों को भरने के लिए, और दर्शकों को बांधकर रखने के लिए जितना कारोबारी दबाव रहता है, उतनी खबरें नहीं रहती हैं। और अगर रहती भी हैं, तो उनको जुटाना बड़ा महंगा इसलिए पड़ेगा कि वे भड़काऊ खबरों की तरह, पानी की सतह पर तैरती जलकुंभी जैसे, आसानी से हासिल नहीं रहतीं। असल जिंदगी की असल खबरें न तो उतनी उत्तेजक रहतीं, न उतनी भड़काऊ रहतीं, और न ही उनके दम पर विज्ञापनों के मिनट बेचे जा सकते। असल जिंदगी के असल मुद्दे रूखे-सूखे होते हैं, और उनमें मादक-उत्तेजक, भड़काऊ-नफरती माल बिल्कुल भी नहीं रहता। इसलिए रूखे-सूखे कागज वाले अखबार तो आज के बाजार के बीच भी कम या अधिक हद तक असल मुद्दों को ढो रहे हैं, लेकिन इंसानी दिल-दिमाग की सबसे बुरे स्वाद वाली रगों को सहलाने का काम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही करता है, और अमूमन वही करता है। इसलिए कल जब देश भड़का नहीं, नफरत का लावा फैलना कहीं शुरू हुआ नहीं, तो आज टीवी चैनलों को कीर्तन का सहारा लेना पड़ा। वैसे नफरत के मुकाबले कीर्तन फिर भी बेहतर है क्योंकि संगीत के सुर-ताल पर हिलते हुए सिर कम से कम उतनी देर तो कोई हिंसा नहीं करते हैं। 

कुछ लोगों ने यह लिखा जरूर कि अगर कोई चैनल भड़काने का काम करें तो पहले उनका बहिष्कार किया जाए, और उसके बाद उनके खिलाफ शिकायत की जाए। आज बाजार को दुहने के लिए जिस तरह के गलाकाट मुकाबले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भड़काने पर जिंदा हैं, उसे समझकर लोगों को गैरजिम्मेदार का बहिष्कार करना चाहिए। आज भारत में टीवी चैनलों को छांटने की जो सुविधा है, उसके चलते लोगों को जिम्मेदार समाचार चैनलों को ही लेना चाहिए, और गैरजिम्मेदार चैनलों को हटा देना चाहिए। ऐसा ही अखबारों के साथ भी किया जाना चाहिए, लेकिन अखबार अपने मिजाज से इतने गैरजिम्मेदार अब तक हुए नहीं हैं, इसलिए वैसी नौबत अभी आई नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तान के टीवी समाचार चैनलों में से अधिकतर गैरजिम्मेदारी में एक बेनाम और गुमनाम सोशल मीडिया का मुकाबला करते दिखते हैं, इसलिए उनके बारे में दर्शकों को तय करना चाहिए। देश में कुल मिलाकर मीडिया को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में अलग-अलग बांटना चाहिए क्योंकि दोनों का स्तर अलग है, मिजाज अलग है, और दोनों की प्राथमिकताएं अलग हैं। इसी तरह सोशल मीडिया और ऑनलाईन मीडिया को भी अलग-अलग रखना चाहिए क्योंकि शुरू से प्रिंट मीडिया जिस तरह की पत्रकारिता करते आया है उससे इलेक्ट्रॉनिक या वेबमीडिया का कुछ भी लेना-देना नहीं है, और इनमें से हर तबके को अपनी-अपनी जरूरत और अपने-अपने मिजाज के मुताबिक अलग-अलग पहचान बनाना चाहिए। एक-दूसरे की साख को कम करने का काम नहीं करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 09-Nov-2019

एक लंबे इंतजार के बाद पिछली की पिछली सदी से चले आ रहा अयोध्या का रामजन्म भूमि का विवाद आखिर निपटा, और सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने  सर्वसम्मति से यह फैसला दिया है कि इस जमीन को रामलला का माना जाए, और यहां पर एक मंदिर बनाने-चलाने के लिए केन्द्र सरकार एक ट्रस्ट बनाए। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में कहीं और पांच एकड़ अच्छी जमीन देने के लिए सरकार को कहा। साथ-साथ अदालत ने मस्जिद को गिराने को गलत कहा है और वहां पर रामलला की मूर्तियों को बलपूर्वक बिठाकर पूजा करने को भी गलत करार दिया है। लेकिन चूंकि बाबरी मस्जिद गिराने का मामला अलग से चल रहा है, और वह सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में विचाराधीन भी नहीं था, इसलिए यहां पर जजों ने सिर्फ जमीन के मालिकाना हक को तय किया है। अदालत ने सुबूतों के आधार पर यह माना कि बाबरी मस्जिद के नीचे का ढांचा कोई इस्लामिक ढांचा नहीं था, इसलिए बाकी सुबूतों के आधार पर वह जमीन रामलला की मानी जाती है, और सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन कहीं और दी जाए। 

एक लंबा विवाद जिस पर सभी पक्षों को एक साथ संतुष्ट करना मुमकिन नहीं था, वह एक किस्म से यहां खत्म हुआ, और देश में कोई ऐसा माहौल नहीं दिख रहा है कि इसके खिलाफ कोई ऐसा आक्रामक आंदोलन शुरू हो जिससे अमन-चैन खत्म हो। मुस्लिमों का इस मामले में खड़ा हुआ एक पक्ष फैसले से संतुष्ट न होने के बावजूद इसका सम्मान करने की बात कह रहा है, और ऐसा लगता है कि दर्जन भर चुनावों का मुद्दा रह चुका यह मामला अब खत्म हो गया है। इस फैसले के खिलाफ किसी अपील की गुंजाइश है या नहीं, यह अभी हमारे सामने साफ नहीं है, लेकिन यह साफ है कि यह अब एक बड़ा राजनीतिक और चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है। देश की बहुसंख्यक आबादी इस फैसले से संतुष्ट होगी, और अल्पसंख्यक आबादी अगर संतुष्ट नहीं भी होगी, तो भी आज के हिन्दुस्तान में उसके संघर्ष करने और लडऩे की अधिक गुंजाइश है नहीं। 

देश के हित में भी यही है कि मुगलों के आने के पहले से इस जमीन के हो रहे धार्मिक इस्तेमाल, और मुगलों के वक्त में इसके बदले गए धार्मिक इस्तेमाल को देखते हुए, आजाद हिन्दुस्तान में गिराई गई बाबरी मस्जिद और वहां रामलला की पूजा शुरू करने जैसे बहुत से मुद्दे ऐसे हैं जिनमें देश लंबे समय से उलझकर रह गया था, जिसे अपनी पसंद के किनारे पर पहुंचाने के लिए एक वक्त लालकृष्ण अडवानी ने पूरे देश को पहले रथयात्रा की आग में झोंक दिया था, और फिर खड़े रहकर बाबरी मस्जिद गिरवाई थी। ऐसी तमाम बातों को एक साथ रखकर देखें तो ऐसा लगता है कि देश को कम से कम जमीन के इस टुकड़े के मालिकाना हक को तय करके, विवाद के उतने हिस्से का निपटारा करके आगे बढऩा चाहिए। यह एक अलग बात है कि बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए जो मुकदमा चल रहा है, उसे भी इंसाफ के किनारे तक पहुंचाना चाहिए, और जिन लोगों ने देश भर में दंगों और साम्प्रदायिक हिंसा की यह वजह खड़ी की थी, उनको भी जल्द सजा मिलनी चाहिए, इसके पहले कि गुनहगारों को ईश्वर कही जाने वाली वह ताकत बुला ले। 

पहली नजर में यह फैसला सर्वसम्मति का होने की वजह से, और पांच जजों की बेंच होने की वजह से अंतिम फैसला भी लगता है, और किसी पुनर्विचार याचिका की अधिक गुंजाइश दिखती नहीं है। अभी जब हम यह बात लिख रहे हैं, उस वक्त फैसले की बातें एक-एक लाईन में आती जा रही हैं, और पूरे फैसले को पढ़कर यह नहीं लिखा जा रहा है, लेकिन इसकी मोटी-मोटी बातों से ऐसा लगता है कि यह सुबूत और हालात, दोनों को देखते हुए समझदारी का एक फैसला है, और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही इस फैसले का स्वागत किया है। अदालत ने आखिर में जाकर कुल दो ही दावेदारों के बीच मालिकाना हक का फैसला लिया है, किसी धार्मिक समुदाय को इसका हक देने के बजाय रामलला को ही एक व्यक्ति मानते हुए उन्हें मालिकाना हक दिया है, और सरकार को उनकी ओर से मंदिर ट्रस्ट बनाने की जिम्मेदारी दी है। दूसरी तरफ मस्जिद बनाने के लिए जमीन देने का जिम्मा सरकार को दिया है, और उसे बनाने का अधिकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही बिरादरियों से बाकी दावेदार भी जुटे हुए थे, लेकिन उन सबका दावा अदालत ने पहले ही खारिज किया, और फिर आखिर में इन दो पक्षों के बीच फैसला सुनाया। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Nov-2019

जिन वजहों को बताकर तीन बरस पहले मोदी सरकार ने हिन्दुस्तानी जनता पर नोटबंदी थोपी थी, उनमें से एक भी वजह जायज साबित नहीं हुई। न एक धेले का कालाधन कम हुआ, न आतंक की घटनाएं घटीं, और न ही डिजिटल लेन-देन बढ़ा। वैसे भी जब कालेधन को घटाने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार के नोट शुरू किए गए, तो सरकार की सोच की खामी सिर चढ़कर दिखने लगी थी, और हमने कई बार इस बात पर लिखा भी था। अब वह गलती साबित भी हो रही है और सरकार एटीएम से दो हजार के नोट बंद कर रही है, उन्हें प्रचलन से कम कर रही है क्योंकि वे कालेधन के लिए हजार के पुराने नोटों के मुकाबले दुगुने आसान साबित हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और बातें भी नोटबंदी के बाद के इन तीन बरसों में हुई हैं जिन्होंने नोटबंदी के वक्त की सरकारी सोच को पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है। 

आज जिस तरह एक-एक कर कई बैंक डूब रहे हैं, लोग अपनी ही रकम को अपने ही इलाज के लिए निकाल नहीं पा रहे हैं, उससे लोगों का बैंकों पर भरोसा घटा है, और लोग पहले के मुकाबले अधिक नगदी घर पर इसलिए रखने लगे हैं कि पता नहीं कब बैंक डूब जाए, पता नहीं कब कोई साइबर मुजरिम लोगों के खातों की रकम गायब कर दे, और पता नहीं कब बैंक और एटीएम रकम निकासी पर तरह-तरह की नई बंदिशें लाद दें। बिना दवा मरते हुए ऐसे लोग खबरों में दिख रहे हैं जिनके खातों में दसियों लाख रूपए जमा हैं, लेकिन बैंक की धोखाधड़ी-जालसाजी की वजह से रिजर्व बैंक ने लोगों के रकम निकालने पर रोक लगा दी है। यह भी समझ पड़ रहा है कि किसी बैंक के डूबने पर एक खातेदार को महज एक लाख रूपए मिलना है, और बाकी डूब जाना है। ऐसे में लोग घर पर नगदी रख रहे हैं, या कुछ दिन पहले तक सोना भी खरीद रहे थे। अब नई बंदिश सामने आते दिख रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी घरेलू सोने की सीमा तय करने वाले हैं, लोगों को उसके कागजात सहित सरकार के सामने घोषणा करनी पड़ेगी, और उसके पुराने बिल अगर नहीं होंगे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगने की खबर है। 

अब जनता के सामने दिक्कत यह है कि वह जाए तो जाए कहां? बैंकों में रकम डूब जाने का खतरा है, ब्याज बहुत कम है, और रकम निकालने पर किसी भी दिन नई रोक लग जाने का तजुर्बा लोगों का है। जब एटीएम काम नहीं भी करते हैं, तब भी कुछ बार कोशिश करने पर एक दिन में कोशिश करने की सीमा खत्म हो जाती है, और स्क्रीन पर लिखा दिखने लगता है कि एक दिन में ट्रांजेक्शन की सीमा खत्म हो गई है। लोग खाते के लाखों रूपए में से दो हजार निकाल पाते हैं, और सीमा खत्म हो जाती है। यह सिलसिला जनता के भरोसे को तोड़ चुका है, और लोगों को लगता है कि सरकार और बैंकों के हजारों करोड़ खाने वाले लोग तो विदेशों में मस्ती कर रहे हैं, और मेहनत की कमाई बैंकों में रखने वालों की रकम डूब रही है, या उनकी अपनी जिंदगी बचाने के लिए भी काम नहीं आ रही है। कोई हैरानी नहीं है कि ऐसे हाल में यह देश जनता की खुशी के पैमाने पर दुनिया में पाकिस्तान के भी नीचे आ रहा है। अगर लोग अपनी मुसीबत के वक्त अपनी ही खून-पसीने की कमाई को छू नहीं सकते, तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद ही उनका भरोसा बनाए रख सकता है। 

आज सुबह से हिन्दुस्तान के हर किस्म के मीडिया में बिना किसी अपवाद के नोटबंदी की सालगिरह पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह इसे एक निहायत ही अवांछित, नाजायज, और नाकामयाब हरकत बता रहा है। खुद केन्द्र सरकार अपने सबसे बड़े फैसले की तीसरी सालगिरह पर इसकी तारीफ में दो शब्द भी नहीं कह पा रही है, और केन्द्र सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी बहुत ही सुविधाजनक याददाश्त का इस्तेमाल करते हुए नोटबंदी को ठीक उसी तरह भुला दे रही हैं जिस तरह अच्छे दिनों के जुमले को भुला दिया गया था, विदेशों से कालाधन लाकर हर किसी को 15 लाख रूपए देने की बात को भुला दिया गया था, जिस तरह डॉलर और पेट्रोल के दाम 30-40 रूपए करने की बात को भुला दिया गया था। नोटबंदी की तीसरी बरसी तो चली जाएगी, लेकिन इसकी वजह से अर्थव्यवस्था की तबाही की भरपाई कभी नहीं होगी।
-सुनील कुमार


Date : 07-Nov-2019

आज जब देश भर में कांग्रेस की हालत को लेकर लतीफे और कार्टून बनना भी तकरीबन बंद हो गया है, क्योंकि वह चर्चा से ही बाहर हो गई है, तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में बनाए रखने का एक काम किया है। लेकिन यह काम महज खबरों में बने रहने के लिए नहीं हैं, बल्कि पार्टी को सत्ता में लाने वाले धान के समर्थन मूल्य का मामला है जिसके लिए भूपेश केन्द्र सरकार से टकराव मोल लेने के लिए सैकड़ों गाडिय़ों के काफिले में दस-बीस हजार लोगों को लेकर दिल्ली जाने का ऐलान कर चुके हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतने के बाद छत्तीसगढ़ में अपने चुनावी वायदे के मुताबिक ढाई हजार रूपए के दाम से धान खरीदा था। बाजार की व्यवस्था के बीच यह एक बड़े घाटे का काम था, लेकिन नई-नई सरकार ने बड़ा कर्ज लेकर भी इसे पूरा किया। इसके साथ-साथ भूपेश सरकार ने अपने पहले कुछ दिनों में ही किसानी-कर्जमाफी का भी वायदा पूरा किया। इन दो फैसलों से राज्य के ग्रामीण इलाकों में सरकार को भारी वाहवाही मिली, यह एक अलग बात है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी का मुकाबला इस वाहवाही की मदद से भी नहीं हो पाया। दूसरी तरफ यह भी याद रखने की जरूरत है कि धान के समर्थन मूल्य और कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर विधानसभा चुनाव के काफी पहले से छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा ने नरेन्द्र मोदी-अमित शाह से अपील की थी, लेकिन वहां से बड़ी साफ मनाही हो गई थी कि अर्थव्यवस्था इसकी इजाजत नहीं देती, और पार्टी चुनाव हार जाए तो हार जाए। ऐसे में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र और वायदे पर छत्तीसगढ़ की जनता ने विश्वास किया, और कांग्रेस भवन का छत फाड़ते हुए सीटें बरसा दी थीं। 

अब आज जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर न कोई मुद्दा है, न कोई माहौल है, और न ही देश में विपक्ष वजनदार रह गया है, तो ऐसे में भूपेश बघेल केन्द्र सरकार से धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए, और छत्तीसगढ़ से अधिक धान लेने के लिए केन्द्र सरकार के सामने प्रदर्शन करने जा रहे हैं। उन्होंने जिस तरह के दिल्ली कूच की घोषणा की है, वह अपने आपमें अभूतपूर्व है, और देश के किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिए अकल्पनीय भी है। भूपेश बघेल विधानसभा चुनाव के पहले से नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ जिस तरह के हमलावर तेवरों के साथ एक जनमोर्चा चला रहे हैं, वह कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों या किसी भी प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्षों के बीच भी कुछ अनोखी बात रही। इसलिए अब जब दिल्ली से सवा हजार किलोमीटर दूर बसे एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इतना बड़ा कारवां लेकर मोदी के सामने जाने की घोषणा कर चुका है, तो यह प्रदेश के भीतर किसानों से वायदा निभाने के साथ-साथ, देश की राजनीति में किसानों के हमदर्द की तरह खड़े होने का काम भी है। लोगों को याद रखना होगा कि जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, तो भाजपा ने किसानों के समर्थन मूल्य पर स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों को मानने का वायदा किया था। लेकिन सरकार बनाने के बाद भाजपा को यह समझ आया कि यह वायदा वह पूरा नहीं कर सकती। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान ही बंद कमरों की बैठकों में यह साफ कर दिया था कि भाजपा स्वामिनाथन कमेटी की सिफोरिशों के मुताबिक समर्थन मूल्य नहीं देगी क्योंकि उससे देश का दीवाला निकल जाएगा। अब ऐसे हाल में भूपेश बघेल न सिर्फ छत्तीसगढ़ में पिछले बरस से अधिक धान खरीदी की घोषणा कर चुके हैं, बल्कि 25 सौ रूपए का दाम देने के लिए उन्होंने कर्ज लेने की तैयारी भी की है। अब वे केन्द्र सरकार से मांग करने जा रहे हैं कि वह छत्तीसगढ़ से अधिक धान ले ताकि राज्य में क्षमता से अधिक धान जमा न हो जाए। 

भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के किसानों से किए गए अपने वायदे को तो खुद पूरा कर रहे हैं, लेकिन आगे के इंतजाम के लिए वे दिल्ली जाकर एक मोर्चा खोल रहे हैं। इससे छत्तीसगढ़ के किसानों से परे भी एक बात होने जा रही है, कि फसलों का समर्थन मूल्य एक बार फिर चर्चा में आएगा, देश भर के किसानों के सामने छत्तीसगढ़ की मिसाल खड़ी रहेगी जो कि कांग्रेस पार्टी को बाकी प्रदेशों से परे की एक अलग साख दिलवाएगी। इसके साथ-साथ जब एक राज्य केन्द्र सरकार से अधिक अनाज लेने की मांग कर रहा है तो यह बात भी बहस में आएगी कि अगर देश में अनाज की इतनी पैदावार है जिसे रखने की दिक्कत है, तो फिर यह देश भूख और कुपोषण की लिस्ट में इतना ऊपर क्यों है? यह बात भी चर्चा में आएगी कि क्या अधिक पैदावार को लोगों के बीच, खासकर सबसे गरीब और कुपोषण के शिकार लोगों के बीच बांट देना कोई बुरी बात रहेगी? आज तो हालत यह है कि देश में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है लेकिन लोगों को बांटा नहीं जा रहा है। इस तस्वीर को कैसे बदला जा सकता है, उस पर भी देश को सोचना चाहिए, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के इस दिल्ली-कूच से देश की सरकारें, देश की पार्टियां, अर्थशास्त्री इस बारे में सोचने के लिए मजबूर होंगे। कुल मिलाकर अपने वायदे को पूरा करने के साथ-साथ, उससे आगे बढऩे के साथ-साथ भूपेश बघेल मोदी-शाह के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की अपनी ही भाजपा की बात तो इन्होंने अनसुनी कर दी थी, लेकिन अब एक सार्वजनिक विपक्षी चुनौती को उसी तरह अनसुना करना एक राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ का बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य भी स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों से बहुत कम है, और उस तरफ आगे बढऩे के लिए जिस बहस की जरूरत है, अब कम से कम वह तो दिल्ली-कूच से शुरू होगी।
-सुनील कुमार


Date : 06-Nov-2019

मद्रास हाईकोर्ट ने अभी मेडिकल दाखिला इम्तिहान के लिए होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, नीट, को लेकर यह फिक्र जताई है कि नतीजे बताते हैं कि तकरीबन उन्हीं लोगों को इसमें कामयाबी मिल पाती है जो कि निजी कोचिंग सेंटरों को मोटी फीस देकर दाखिला इम्तिहान की तैयारी करते हैं। अदालत ने तमिलनाडू के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए यह तंज भी कसा कि जब केन्द्र सरकार पिछली सरकार की लागू की हुई लगभग हर योजना को पलट रही है तो इस नीट को ही क्यों छोड़ दिया गया है? सरकारी वकील से अदालत ने सवाल पूछा कि गरीब बच्चे किस तरह ऐसी महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते हैं? अदालत ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों के दरवाजों कभी भी गरीबों के लिए नहीं खुले रहते, और जब नीट को शुरू किया गया था तो दावा किया गया था कि इससे पैसों से खरीदी जाने वाली मेडिकल सीटों का धंधा खत्म होगा। लेकिन अब यह खर्च कोचिंग सेंटरों पर करके सीटें हासिल की जा रही हैं। अदालत ने केन्द्र सरकार द्वारा जमा की गई जानकारी को देखते हुए ये बातें कही हैं जिनके मुताबिक तमिलनाडू में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचने वाले तीन हजार से अधिक छात्रों में से कुल 48 ऐसे थे जो कोचिंग सेंटरों में नहीं गए थे। इसी तरह निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले करीब 16 सौ छात्रों में से कुल 52 ऐसे थे जिन्होंने कोचिंग नहीं ली थी। 

ये आंकड़़े एक ऐसी हकीकत को उजागर करते हैं जिसे गरीबों के वोटों और अमीरों के नोटों से चुनकर बनने वाली सरकारों को देखना चाहिए था, लेकिन अफसोस यह है कि हाईकोर्ट के जजों को यह बात दिख रही है, केन्द्र सरकार को नहीं दिख रही कि गरीबों की अब ऊंची पढ़ाई में जगह तकरीबन खत्म हो चुकी है। इस कड़वी सामाजिक हकीकत को बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा रहना चाहिए था, लेकिन दिक्कत यह है कि वामपंथियों को छोड़कर बाकी किसी भी पार्टी के सांसद संसद पहुंचने तक इतने नोट देख चुके होते हैं कि वे गरीबों की तकलीफों से ऊपर उठ जाते हैं। इसके बाद संसद में सवाल पूछने के लिए जो कमाई होती है, वह संसद के रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और उसके स्टिंग ऑपरेशन देश की जनता सुन चुकी है। इनमें से कोई भी सांसद जेल नहीं गए, और संसद के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए तमाम लोग बाहर हैं। अब ऐसे सांसदों की ऐसी संसद, ऐसे विधायकों की विधानसभाएं, और राजनीतिक दान के लिए लागू की गई पूरी तरह दोनंबरी सी बॉंड योजना से जिस तरह पार्टियों को सैकड़ों करोड़ मिल रहे हैं, जिस तरह सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त पर सैकड़ों करोड़ खर्च की चर्चा है, ऐसी राजनीतिक संस्कृति के बीच यह सोचना भी ज्यादती होगी कि कोई संपन्न पार्टी, और उसकी सरकार गरीब बच्चों के कॉलेज दाखिले में समानता के मौके के बारे में सोचेंगी भी। 

यह देश गरीबों की लाशों पर खड़ी होने वाली व्यवस्था का देश हो गया है। गरीब की जगह बुनियाद के पत्थरों की जगह पर है, और इन पत्थरों को कभी रौशनी देखना नसीब नहीं होता। जो आंकड़े सामने हैं वे बताते हैं कि देश किसी भी कोने से आजाद नहीं हैं, और नागरिकों के बीच समान अवसर की बात फिजूल है। नौकरी के लिए हो या ऊंची पढ़ाई में दाखिले के लिए, सरकारों ने ऐसे इम्तिहान गढ़ रखे हैं कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोग और उनका संपन्न तबका ही इन इम्तिहानों की तैयारी कर सके। मीडिया कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से पटा हुआ है, और ऐसा मीडिया इस बात को खुलकर सामने इसलिए भी नहीं रख सकता कि यह आत्मघाती काम होगा, और अपने ही पेट पर लात मारने सरीखा होगा। कुदरत को ऐसी दिक्कत का अंदाजा था, इसलिए उसने इंसानी बदन में लात को इस तरह डिजाइन किया है कि कितना भी घुमाकर उसे अपने पेट पर नहीं मारा जा सकता। इसलिए देश का संपन्न और मलाईदार तबका, सत्तारूढ़ तबका, अपने तबके के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे इम्तिहान बनाता है जिनको पार पाना सिर्फ उसी तबके के बस की बात हो। जिस तरह दो-चार फीसदी बच्चे बिना कोचिंग के मेडिकल कॉलेज पहुंच पा रहे हैं, उसे भी उनकी प्रतिभा या कोई संयोग मानना बेहतर होगा, ऐसा सोचने का हमारे पास कोई कारण नहीं है कि सत्ता ने दो-चार फीसदी की गुंजाइश भी गरीबों के लिए छोड़ी होगी। 
इस देश के लिए यह सबसे शर्मिंदगी की बात है कि सामाजिक न्याय के मुद्दे न सरकार उठाती है, न संसद, इन्हें बीते बरसों में अक्सर अदालतों ने ही उठाया है जिन पर चुनाव लड़कर जीतकर आने का कोई दबाव भी नहीं रहता। यह सिलसिला इस देश में ताकतवर तबके को और अधिक ताकतवर बनाने की एक ऐसी साजिश है जिसे करने वाले लोग आज भी अंग्रेजों की शिक्षा नीति को इतनी गालियां देते हैं कि आज की शिक्षा नीति की तरफ किसी का ध्यान न जाए। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को रावण के पुतले की तरह खड़ा रखा जाता है, ताकि उसकी ओट में आज 21वीं सदी में भी गरीबों को उच्च शिक्षा से दूर रखा जाए, और संपन्न तबका एक कुलीन तबके की तरह एकाधिकार बनाए रखे। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Nov-2019

दिल्ली में आज एक अभूतपूर्व प्रदर्शन हो रहा है जिसमें पुलिस मुख्यालय पर वर्दी में पुलिसकर्मी अपने लिखे हुए पोस्टरों सहित प्रदर्शन कर रहे हैं और पिछले दो-चार दिनों में वकीलों के हमलों का विरोध कर रहे हैं। यह नजारा हैरान भी करता है, और परेशान भी करता है। जब आमतौर पर अपनी किसी हिंसा की तस्वीर या वीडियो के साथ पुलिस लोगों के सामने अपनी एक हिंसक छवि के लिए जानी जाती है, उसमें जब वकीलों ने एक भीड़ की शक्ल में पुलिस पर हमले किए, एक से अधिक बार, एक से अधिक अदालतों में, और सड़कों पर पुलिस को पीटा, तो यह नजारा आम तस्वीर से बिल्कुल उल्टा था। दिल्ली पुलिस ऐसी हिंसा का विरोध करते खड़ी थी और पुलिस के बड़े अफसर उन्हें समझाते हुए माईक पर बोल रहे थे। और यह एक ऐसा मामला है जिसकी तोहमत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर नहीं थोपी जा सकती क्योंकि दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, और वकील भी किसी सरकार के तहत काम नहीं करते हैं। ऐस मेें यह टकराव एक फिक्र खड़ी करता है, दिल्ली के बाहर भी।

इस मामले पर लिखते हुए तेलंगाना की कल की एक घटना को भी देखने की जरूरत है जिसमें एक महिला तहसीलदार को दिन-दहाड़े उसके दफ्तर में जिंदा जलाकर मार डाला गया है। लोगों को याद होगा कि हाल ही के महीनों में छत्तीसगढ़ में जगह-जगह लोगों ने पुलिस को पीटा है, लेकिन वह बिखरी हुई छोटी-छोटी वारदातों में हुआ इसलिए पुलिस की ओर से ऐसा कोई संगठित विरोध सामने नहीं है जो कि दिल्ली में आज दिख रहा है। लेकिन हर कुछ हफ्तों में देश के किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की पिटाई होती है, और हड़ताल चलती है। इन तमाम बातों का आपस में वैसे तो कोई रिश्ता नहीं दिखता, लेकिन इनके बीच एक रिश्ता है जरूर और उस पर सोचने की जरूरत है।

यह याद रखना चाहिए कि एक वक्त जब देश में जगह-जगह मॉबलिंचिंग होती है, और हमें मजबूर होकर उसके लिए भीड़त्या जैसा शब्द गढऩा पड़ता है, तो वह किसी एक इंसान की मौत नहीं होती, देश के लोगों में तथाकथित इंसानियत की मौत भी होती है, और फिर ऐसे समाज में दूसरी जगहों पर भी यह मौत असर डालती है। पुलिस को इस तरह पीटते हुए वकीलों के जहन में वे तस्वीरें और वे वीडियो जरूर रहे होंगे जिसमें कहीं पर, खासकर उत्तरप्रदेश में, पुलिस बेकसूरों को बुरी तरह पीट रही है, या किसी भी जगह हिंसक भीड़ के बिना दिमाग वाले बहुत से सिरों के चलते किसी बेकसूर को पीटा जा रहा है। जब पीटना, या पीट-पीटकर मार डालना देश की संस्कृति होने लगती है, और बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बड़बोले बड़े-बड़े मुंह भी ऐसी भीड़त्याओं पर जरा सा भी नहीं खुलते, तो वह इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में देश में स्वीकार्य संस्कृति बन जाती है, बन चुकी है। इसलिए काले कोटों वाली भीड़ खाकी वर्दी पर ऐसा संगठित हमला करती है, और हिंसा पर पुलिस का एकाधिकार खत्म करने की एक नुमाइश भी करती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि यह आज देश की राजधानी में, केंद्रीय गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, और सुप्रीम कोर्ट के ठिकानों के बीच चल रहा है, और वर्दीधारी पुलिस वाले ऐसे प्रदर्शन को मजबूर हुए हैं। यह मामला किसी न्यायिक जांच से निपट भी सकता है, लेकिन यह तो तय है कि भीड़ की हिंसा किसी जांच रपट से सुलझेगी नहीं। आज देश में कदम-कदम पर भीड़ कानून अपने हाथ में ले रही है, और फिर पैरोंतले रौंद भी रही है। ऐसे में जरूरत देश के पूरे माहौल को इंसाफ की तरफ मोडऩे की है। ऐसा नहीं हो सकता कि देश में जगह-जगह गाय के नाम पर हिंसक भीड़त्याओं को अनदेखा किया जाए, और महज वकीलों की, या पुलिस की हिंसा पर काबू पाया जा सके। आज देश का माहौल लोकतंत्र के खिलाफ है, इंसाफ के खिलाफ है, और तथाकथित इंसानियत के भी खिलाफ है। एक जगह की अराजकता दूसरी जगह अराजकता को हवा देती है, और देश में हिंसा को कतरे-कतरे में काबू नहीं किया जा सकता।
-सुनील कुमार


Date : 04-Nov-2019

बीते दो दिनों में उत्तर भारत में अधिकतर जगहों पर बड़ी संख्या में लोगों ने छठ का पर्व मनाया, और बाकी जगहों पर भी जहां-जहां बिहार से गए हुए लोग बसे हैं, वहां भी नदियों और तालाबों तक दो दिनों तक लोग पहुंचे और पानी में डूबे हुए पूजा-अर्चना की। लेकिन बिहार में कुछ जगहों पर ऐसा भी हुआ कि तालाब सूख जाने की वजह से गरीबों ने एक गड्ढा खोदकर उसमें कहीं से पानी जुटाकर छठ की रस्म पूरी की, और कुछ रईस लोगों ने घर की छत पर पानी की टंकी बनाकर यह काम किया। कुल मिलाकर देखें तो हिन्दुस्तान के बहुत से धार्मिक त्यौहार नदियों और तालाबों के किनारे या उनके भीतर होते हैं, गणेश-दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होता है, ताजिया विसर्जित किए जाते हैं, पूजा सामग्री विसर्जित की जाती है। नदियों की अपने आपमें पूजा होती है, गंगा को मां माना जाता है, और उत्तर भारत के एक हाईकोर्ट ने तो गंगा को एक व्यक्ति मानते हुए उसके हक तय किए हैं जो कि भारत के किसी भी नागरिक के होते हैं। गंगा को साफ करने की कसम खाते हुए गंगा सफाई मंत्री उमा भारती ने यह काम पूरा न होने पर जल समाधि लेने की घोषणा की थी, जिसकी एक गंदी पड़ी हुई गंगा बेसब्री से राह देख रही है।

सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने ऐसी तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें उत्तर-पूर्वी भारतीय प्रदेशों की कांच की तरह साफ और पारदर्शी नदियां दिखती हैं जहां पर नदियों को न मां माना जाता, न जिनकी पूजा होती। दूसरी तरफ जिस उत्तर भारत में या पश्चिम से लेकर दक्षिण भारत तक जहां-जहां नदियों की पूजा होती है, वहां-वहां नदियां प्रदूषण के बोझ से लदी हुई हैं, और दम तोड़ रही हैं। गंगा का पानी पीना तो दूर रहा, नहाने के लायक भी नहीं हैं। अगर किसी को गंगा का साफ पानी चाहिए तो वह गंगोत्री से छोटी-छोटी बोतलों में भरकर लाकर पोस्ट ऑफिसों में बेचने वाले काऊंटर पर ही मिल सकता है। तालाब पूरे देश में एक-एक कर सिमटते जा रहे हैं, पाटकर वहां इमारतें बनती जा रही हैं, और ऐसा लगता है कि आधी सदी में एक दिन ऐसा आ जाएगा जब छठ की पूजा के लिए बड़े बर्तनों में डूबकर बारी-बारी से रस्म पूरी करनी पड़ेगी। जिस तरह एक वक्त सूखे गुजरात में लोहे के बनाए गए चबूतरों पर चढ़कर लोग नहाते थे, और नीचे उसी पानी में कपड़े धोए जाते थे, हो सकता है कि आने वाले रस्म-रिवाज इसी किस्म के होंगे। 

दरअसल नदी को नदी न मानकर मां मान लेने का नतीजा यह होता है कि उसे आसानी से वृद्धाश्रम भेजा जा सकता है, और भुलाया जा सकता है। गाय को मां मानने का नतीजा यह होता है कि साल में चार बार किसी त्यौहार पर गाय को ढूंढकर उसकी पूजा करके उसे खिलाया जाए, और बाकी पूरी जिंदगी उसे घूरों पर पॉलीथीन खाने के लिए छोड़ दिया जाए। न जीने दिया जाए, न ही कसाईखाने जाने दिया जाए, बस भूखे मरने दिया जाए। जिन देशों में गाय को जानवर मानते हैं, वहां उसे काटने के ठीक पहले तक एक आलीशान जिंदगी नसीब होती है, और जन्म से लेकर कटने तक गाय कभी घूरे नाम की चीज को देख नहीं पाती। इधर हिन्दुस्तान में गौमाता दंगे का सामान बनाकर रख दी गई है, और उसकी जिंदगी घूरे तक सीमित कर दी गई है। गाय से लेकर गंगा तक, जिसे-जिसे जानवर और नदी के दर्जे से बाहर निकालकर मां का दर्जा दिया गया है, वहां-वहां उसे बूढ़ी और बेबस मां की तरह वृद्धाश्रम में डाल दिया गया है, जहां न खाने को है, न मरने को है। हिन्दुस्तान में रीति-रिवाजों में नदी और तालाब का महत्व बहुत है, लेकिन पूजा का दिन निकल जाने के बाद इन जगहों को बर्बाद करते हुए ही पूरा साल गुजरता है। इतिहास में कहा जाता है कि किसी देश की सभ्यता उसकी नदियों के किनारे विकसित होती है। हिन्दुस्तान में जाने गंगा के किनारों का कैसा बेजा इस्तेमाल हुआ है कि ऐसी असभ्य नस्ल इस देश में विकसित हुई है जो कि गंगा को मार डालने के लिए उतनी ही उतारू है जितना कि कोई कपूत अपनी मां को मारने पर उतारू रहता है। ऐसी धार्मिक इज्जत से बेहतर तो वह पर्यावरण की इज्जत है जो नदियों का सम्मान करना सिखाती है, तालाबों का सम्मान करना सिखाती है। मां का दर्जा गाय से लेकर गंगा तक महज नुकसान ही कर रहा है। 
-सुनील कुमार


Date : 03-Nov-2019

दिल्ली की एक चर्चित अदालत, तीस हजारी कोर्ट, में कल वकीलों और पुलिस के बीच जिस तरह का हिंसक टकराव हुआ, गोलियां चलीं, गाडिय़ां जलाई गईं, और दोनों तरफ के लोगों पर यह आरोप है कि उन्होंने दूसरे पक्ष के लोगों को बुरी तरह पीटा। कम से कम एक ऐसा वीडियो अभी ट्विटर पर दिख रहा है जिसमें दर्जनों वकील दो पुलिसवालों को घेरकर उन्हें लात-घूसों से देर तक बुरी तरह पीट रहे हैं, बेल्ट से मार रहे हैं, और उनके गिर जाने के बाद बड़ी संख्या में पुलिस के आ जाने के बाद वकील वहां से हटे। वकीलों की तोहमत है कि पुलिस लॉकअप में वकीलों को बेल्ट से पीटा गया। यह पूरा झगड़ा एक कार की पार्किंग को लेकर हुआ था, और बढ़ते हुए इसने इतनी हिंसा दिखा दी। 

सोचने के कुछ मुद्दे हैं। वकील और पुलिस, दोनों ही तबके कानून के पेशे से जुड़े हुए हैं। पुलिस के जिम्मे कानून बनाए रखना है, मुजरिमों को पकडऩा है, और उन्हें सजा दिलाने के लिए अदालत में जुर्म साबित करना है। दूसरी तरफ वकीलों में से कम से कम कुछ तो ऐसे रहते ही हैं जो कि पुलिस और जांच एजेंसियों की तरफ से सजा दिलाने का काम करते हैं, और बाकी वकील ऐसे भी रहते हैं जो मुजरिमों को बचाने का वकालत का अपना जिम्मा निभाते हैं। इन दोनों से परे बहुत से और वकील रहते हैं जो कि दूसरे मुजरिमों के बीच तरह-तरह के कानूनी काम करते हैं। कुल मिलाकर इन दोनों तबकों के बारे में एक बात साफ है कि ये लगातार अपराधियों के साथ काम करते हैं, उनके इर्द-गिर्द रहते हैं, और इसका असर इनके मिजाज पर दिखने लगता है। देश भर में ऐसे कई मौके आए हैं जब वकीलों ने कानून तोड़ा है, और जमकर तोड़ा है। कई बार जब बहुत ही खराब किस्म के अपराधी, बच्चों के बलात्कारी अदालत पहुंचते हैं, तो वकील भी उनको पीटने के लिए टूट पड़ते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि पुलिस हो या वकील उनके भीतर इंसान रहते हैं जो कि उनसे सही-गलत दोनों काम करवाते हैं। वकील और पुलिस जो कि आमतौर पर एक-दूसरे को देखने के आदी होते हैं, अक्सर ही एक-दूसरे के साथ काम करते हैं, एक-दूसरे की मदद भी करते हैं, वे जब इस तरह आपस में भिड़ते हैं, तो उसकी वजहों को भी समझना चाहिए। 

जिस दिल्ली में आज सांस लेना मुश्किल हो गया है, वहां पर एक वकील के कार पार्क करने को लेकर यह झगड़ा शुरू हुआ। ऐसी हवा के बीच जीने वाले लोग एक जाने-अनजाने बड़े से तनाव के बीच जीते हंै, और आपा खोने के करीब वे जल्दी आ सकते हैं। यह बात सिर्फ वकील और पुलिस की नहीं है, बल्कि दिल्ली के हर इंसान की है, हर जानवर और पंछी की भी है, जिसके सिर पर सांस की बीमारी में जकड़े जाने का खतरा टंगा रहता है। ऐसे में लोग आपा जल्दी खो सकते हैं, अगर वे अस्पतालों में डॉक्टरों के कमरे के बाहर किसी लंबी कतार में लगे हुए नहीं हैं तो। ऐसी दिल्ली को ऐसी हवा के बीच उस पार्किंग के बारे में भी सोचना चाहिए जिसकी वजह से कल का यह झगड़ा हुआ। जिन लोगों को दिल्ली रूबरू देखना नसीब होता है, या देखने की मजबूरी होती है, वे जानते हैं कि दिल्ली किस तरह गाडिय़ों से लबालब भरी हुई है। गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं है, और साथ-साथ सड़कों पर भी गाडिय़ां चलने की गुंजाइश नहीं है। कल तीस हजारी कोर्ट में पूरी तरह अवांछित यह हिंसा इस तरफ ध्यान खींचती है कि वहां गाडिय़ों को कम करना कितना जरूरी है, और क्यों जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ बाकी हिन्दुस्तान को भी यह समझने की जरूरत है कि तमाम शहर ऐसी ही एक मौत की तरफ बढ़ते चले जा रहे हैं क्योंकि गाडिय़ां बढ़ रही हैं, उनका इस्तेमाल बढ़ रहा है। शहरीकरण की एक परले दर्जे की बेवकूफी अधिक से अधिक पार्किंग बढ़ाते हुए इसके लिए आसमान छूती इमारतें बनाने में लगी हैं, मानो वहां आने-जाने वाली गाडिय़ां सड़कों से हुए बिना ही आना-जाना करेंगी। 

यह समझने की जरूरत है कि जिंदा रहने के लिए शहरीकरण को ट्रैफिक घटाना होगा, और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाना होगा। बाकी शहर वक्त रहते इसका इंतजाम कर सकें, तो उन्हें दिल्ली के लोगों की तरह नाक और मुंह पर नकाब पहनकर चलने की मजबूरी नहीं रहेगी, जिसके बारे में एम्स के डॉक्टरों ने कह दिया है कि दिल्ली सरकार के बांटे गए ये मास्क प्रदूषण को रोक नहीं सकते। आज यहां पर लिखी गई टुकड़ा-टुकड़ा बातें एक-दूसरे से असंबद्ध लग सकती हैं, लेकिन ये सब एक-दूसरे से रिश्ता रखती हैं, और ये सब एक धीमी मौत की चचेरी बहन भी हैं। लोगों को अपने, पूरी जिंदगी जीकर, या बेवक्त, मर जाने के बाद के बारे में भी सोचना चाहिए कि वे आने वाली पीढिय़ों को कारों की शक्ल में फौलादी ताबूत देकर जाना चाहती हैं, या फिर सांस लेने लायक खुली हवा? जिन शहरों को जिंदा रहना है, और धरती पर कोई शहर बाकी शहरों के प्रदूषण से दूर अकेले टापू की तरह नहीं रह सकता, तो जिन शहरों को जिंदा रहना है, उन्हें यह भी समझना होगा कि अगर वे आज से तैयारी करेंगे, तो दस-बीस बरस बाद जाकर उन बातों का असर होगा क्योंकि सुधार धीमा होता है, बर्बादी घोड़े पर चढ़कर आती है।

अभी जैसे ही ऊपर का लिखना पूरा हुआ, एक खबर सामने आई है कि वायु प्रदूषण सिर्फ सेहत पर ही नहीं, व्यवहार पर भी असर डालता है। 1970 के दशक में अमरीका में पेट्रोल से शीशे को निकाल दिया गया, और इसके बाद 1990 के दशक में अमरीका के हिंसक अपराधों में 56 फीसदी तक की कमी आ गई। इसे पेट्रोल से शीशा निकालने से जोड़कर देखा गया। दरअसल शीशे के संपर्क में आने से, खासतौर पर बच्चों में, आवेग और आक्रामकता बढऩे लगती है, और उनका आईक्यू घट जाता है, जो उनमें आपराधिक व्यवहार को बढ़ा सकता है। ऐसा ही एक अध्ययन चीन के शंघाई में हुआ कि प्रदूषण के दौर में मानसिक अस्पताल में भर्ती होने वाले रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। अमरीका के करीब 10 हजार शहरों में किए गए एक अध्ययन से भी पता चला है कि वायु प्रदूषण से जुर्म बढ़ते हैं। इसलिए दिल्ली में वकीलों ने और पुलिस ने जो किया है, उसकी कुछ तोहमत वायु प्रदूषण को भी दी जानी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 02-Nov-2019

दिल्ली में इन दिनों जितना भयानक प्रदूषण फैला हुआ है उसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, लोग इमारतों के भीतर भी नाक और मुंह पर मास्क लगाकर जी रहे हैं, और प्रदूषण की वजह दिल्ली के इर्द-गिर्द के राज्यों में खेतों में बच गए ठूंठ जलाने को भी बताया जा रहा है, और यह भी खबर है कि पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके से भी खेतों से ऐसा धुआं उठकर हिन्दुस्तान में प्रदूषण का बढ़ा रहा है। ऐसे मौके पर किसी ने सोशल मीडिया पर सुझाया है कि भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेद किनारे करके इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए। 

वैसे तो इन दोनों देशों के बीच अलग-अलग कुछ मुद्दों पर बात हो भी रही है। जब-जब हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री को पाकिस्तान से आगे कहीं विदेश जाना होता है, तो भारत सरकार पाकिस्तान की सरकार से मोदी का विमान गुजरने देने की इजाजत मांगती है जो कि मिली नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ इन दिनों खबरों में पाकिस्तान की जमीन पर आने वाले सिक्खों के एक सबसे बड़े तीर्थ, करतारपुर गुरुद्वारा को लेकर भी भारत और पाकिस्तान के बयान आ रहे हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी तरफ से यह घोषणा की है कि वहां भारत से जाने वाले सिक्ख तीर्थयात्रियों को पासपोर्ट नहीं ले जाना होगा, और कोई भी पहचानपत्र काम करेगा। दूसरी तरफ भारत के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पाक पीएम को लिखा है कि यह छूट सभी धर्मों के लोगों को दी जाए क्योंकि गुरुद्वारों में सभी धर्मों के लोग जाते हैं। अगले दो-चार दिनों में भारत का एक औपचारिक प्रतिनिधि मंडल नए बनाए गए गलियारे से होकर पाकिस्तान जाने भी वाला है क्योंकि गुरूनानक देव की 500वीं जन्म शताब्दी का समारोह शुरू हो रहा है, और अभी-अभी पाकिस्तान की सरकार ने उन पर एक स्मारक सिक्का भी जारी किया है। दूसरी तरफ दिल्ली से नए बने भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने हाल ही में ट्विटर पर भारतीय विदेश मंत्री से एक पाकिस्तानी मरीज बच्ची के परिवार को वीजा देने के लिए अपील की थी, और वह तुरंत ही हो भी गया। पाकिस्तानी मरीजों को भारत में इलाज के लिए लगातार वीजा मिल भी रहा है। 

कश्मीर को लेकर, और बहुत सी आतंकी घटनाओं को लेकर, सरहद पर गोलाबारी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव, अनबन, और अनबोला जारी है। लेकिन कारोबार को लेकर दोनों देशों को बड़ा नुकसान होता है जब वे आपसी खरीद-बिक्री नहीं कर पाते तो दोनों ही देश किसी तीसरे-चौथे देश को फायदा देते हैं। ऐसे में प्रदूषण से लेकर नदियों के पानी तक, कारोबार से लेकर इलाज तक, बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनमें बातचीत की जरूरत है। तनाव अपनी जगह ठीक है, लेकिन इन दोनों देशों को यह बात भी समझना चाहिए कि लोग रिश्तेदारी दूर-दूर तक कर सकते हैं, दोस्त धरती के दूसरे सिरे पर भी बना सकते हैं, लेकिन पड़ोसी तो बगल के ही हो सकते हैं, उस मामले में कोई पसंद-नापसंद की गुंजाइश नहीं रहती। भारत और पाकिस्तान को बातचीत लंबे समय तक बंद रखने के बजाय किसी न किसी तरीके से एक-दूसरे से शिकायतें सुलझाने के रास्ते देखने चाहिए, चाहे इसके लिए अनौपचारिक चर्चा हो, या कोई मध्यस्थ यह काम कर सके। कुछ महीने पहले भी हमने इस मुद्दे को लेकर लिखा था कि तमाम आपसी मतभेदों को बिना किसी तीसरे पक्ष के सुलझाने के शिमला समझौते को किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ की तरह का मानना ठीक नहीं होगा जिसमें कि कोई बदलाव नहीं हो सकता। इन दोनों देशों को आज के हालात देखते हुए यह समझना होगा कि बातचीत शुरू करने के रास्ते जरूरी हैं, तनाव में जीते हुए, शिमला समझौते पर अड़े हुए कुछ हासिल नहीं हो सकता। फिर दोनों देशों पर राज कर रहे लोगों को यह भी समझना होगा कि इनमें से कोई इस तनाव की लागत उठाने की हालत में नहीं हैं, क्योंकि दोनों तरफ भारी भूख और कुपोषण है, गरीबी और बीमारी है, अस्पतालों और स्कूलों की जरूरत है। तनाव को खत्म करने का एक बड़ा ऐतिहासिक मौका इसी हफ्ते आ रहा है जब भारतीय प्रतिनिधि मंडल बिना पासपोर्ट और वीजा के पाकिस्तान के करतारपुर गुरुद्वारा जाएगा। गुरूनानक से लेकर भगत सिंह तक कुछेक ऐसे नाम हैं जो कि सरहद के दोनों तरफ लोगों के लिए बहुत ही बड़ी श्रद्धा का केन्द्र है। दोनों देशों को ऐसी साझी विरासत की ओर देखना चाहिए, बजाय भड़काऊ बयानों के, नफरत और धमकियों के, क्योंकि उनसे केवल जंग के सौदागरों का भला हो सकता है, इन दोनों देशों के भूखे, कुपोषित, बीमार, और अशिक्षित लोगों का नहीं। इन देशों की राजधानियों में बसे लोगों को अपनी तैश, और अपने अहंकार के चलते जंग के फतवे देना बंद करना चाहिए, क्योंकि जंग में राजधानियों के लोग नहीं मरते, सरहदों पर बसे, या वहां पर लडऩे वाले प्यादे मरते हैं। इसलिए सारे तनावों के चलते हुए भी आपसी सद्भाव के कुछ न कुछ मुद्दे और मोर्चे ढूंढना जारी रखना चाहिए। जंग के फतवों के पीछे एक बड़ी वजह रहती है कि सरकारें अपने भूखे, बेरोजगार, और फटेहाल लोगों को राष्ट्रवाद में उलझाना चाहती हैं ताकि वे बाकी तकलीफों को महत्वहीन मान लें। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Nov-2019

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों यह राय सामने रखी थी कि देश में सभी तरह के पहचान-पत्रों की जगह एक ही डिजिटल कार्ड जारी किया जाये  आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, सभी का काम करे। देश में आधार कार्ड के इस्तेमाल को जरूरी बनाने को लेकर  में पहले से संदेह बना हुआ है कि  सरकार लोगों पर नजर रख सकती है, उनकी हर बात सरकार की निगाह में है। एक अकेले कार्ड की सोच और भी संदेह करेगी। इस पर आज चर्चा की जरूरत इसलिए पैदा हो गई है कि कल की खबर है कि एक इजराइली छांट-छांटकर बहुत से हिंदुस्तानी सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के मोबाइल फोन पर व्हाट्सऐप वॉइसकॉल के रास्ते से जासूसी की। इजराइली कंपनियों जैसे बदमाश लोग पैसों के लिए, राजनीति के लिए दुनिया भर के हर तरह बुरे काम भी करतेे है, वहां की कुख्यात जासूसी कंपनी मोसाद को दुनिया भर में साजिश के साथ कत्ल करने के लिए भी जाना जाता है। यह जानना भी जरूरी है कि हिंदुस्तान अकेला इजराइल के पूरे निर्यात के आधे से अधिक का खरीददार है। और न सिर्फ हिंदुस्तानी कारोबारी, बल्कि यहां की फौज तक, बहुत से संवेदनशील संस्थान इस्राएली निगरानी कम्प्यूटर चीजों के खरीददार हैं। ऐसे में यह सोचना मुश्किल नहीं है कि इजराइल की यह कंपनी किसी हिन्दुस्तानी एजेंसी के लिए भी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ऐसी निगरानी करती हो सकती है। ऐसे में हिंदुस्तान के सारे पहचान पत्रों को जोड़ देने का मतलब खुले में बिना कपड़ों के नहाने से भी अधिक खतरनाक होगा। फिर यह भी है कि साइबर जुर्म के ऐसे हथियार कितने दिन तक साइबर मुजरिमों की पहुँच से परे रहेंगे?

अब जब पूरे देश को डिजिटल तकनीक से जोड़ा जा रहा है, और ऐसा कोई दिन नहीं है कि बैंक खातों और एटीएम की जालसाजी न हो, तब देश की साइबर-सुरक्षा को तौलने की जरूरत है। और देश की साइबर-सुरक्षा से हमारा मतलब सरकार के कम्प्यूटरों की साइबर-सुरक्षा नहीं, आम जनता के बैंक और दूसरे सरकारी कामकाज की सुरक्षा से है। आज तो विकीलीक्स के संस्थापक का यह संदेह डरावना लगता है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी की पहुंच भारत के आधार कार्ड से जुड़ी सारी जानकारियों तक है जिसमें लोगों के बायोमेट्रिक्स भी हैं, उनकी उंगलियों के निशान भी हैं। एक किस्म से यह डर भी लगता है कि आधार कार्ड से एक तरफ तो लोगों की निजता पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और दूसरी तरफ लोगों के बैंक और सरकारी रिकॉर्ड खतरे में आ गए हैं। एक तरफ आधार कार्ड, और दूसरी तरफ लगभग अनिवार्य हो चुके बैंक खातों को लेकर लोगों की कमसमझी की वजह से साइबर-जालसाज तरह-तरह से लोगों को लूट रहे हैं। ऐसे में लोगों की जानकारी मुजरिमों के हाथ एक बड़ा हथियार बन गई है।

कुछ समय पहले देश में एक बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखते हैं कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।

भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।

लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इकट्ठा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी। साइबर-मुजरिमों की बाकी कोशिशों के साथ-साथ अब आधार कार्ड से एक बड़ा खतरा देश की पूरी जनता पर ही आ गया है, और सरकार बिना इससे बचाव की तैयारी के इसे अधिक से अधिक अनिवार्य करते चल रही है।
-सुनील कुमार


Date : 31-Oct-2019

पाकिस्तान में अभी एक दिलचस्प बहस छिड़ी है जिस पर हिन्दुस्तान के लोग भी सोच सकते हैं। पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी, पेमरा, ने अभी दो दिन पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक निर्देश जारी किया था कि जिसमें उन्होंने अदालतों में चल रहे मामलों को लेकर टीवी पर चलने वाली बहस पर अपनी राय दी थी। इसके मुताबिक उसने टीवी शो होस्ट करने वाले एंकर कहे जाने वाले लोगों से कहा था कि उन्हें केवल एक तटस्थ संचालक की तरह बहस में शामिल लोगों को बोलने का मौका देना चाहिए, न कि खुद किसी विषय विशेषज्ञ की तरह खुद अपने विचार रखने चाहिए। निर्देशों में यह भी सुझाया गया है कि चैनलों को बहस में आने वाले लोगों को छांटने में भी सावधानी बरतनी चाहिए कि विषयों के विशेषज्ञ लोग ही बुलाए जाएं जो कि उस विषय के जानकार लोग हों। पेमरा ने यह निर्देश पाकिस्तान की एक बड़ी अदालत के एक आदेश को दुहराते हुए जारी किए थे जिसमें अदालत ने यह पाया था कि हाल ही में भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जमानत मिलने को लेकर कुछ चैनलों की बहसों पर लोग अदालती आदेश को लेकर अटकलें भी लगा रहे थे। 

यह मामला तो पाकिस्तान का है, लेकिन इसमें से पाकिस्तान शब्द को हटा दें, और वहां हिन्दुस्तान लिख दें, तो यह इस देश पर भी पूरी तरह लागू होता है। इधर अदालतों में किसी मामले की सुनवाई चलती है, उधर टीवी चैनलों में किसी फिल्म या टीवी सीरियल की तरह के सेट तैयार करके एंकर कहीं वकील तो कहीं फौजी बनकर अदालती मामलों पर घटिया से घटिया बहस छिड़वाने के लिए अधिक से अधिक बकवासी लोगों को छांटकर लाते हैं, और फिर उनके बीच मुर्गा लड़ाई करवाते हुए उकड़ू बैठकर चैनल को दर्शकों के बीच बेचते हैं। बहुत से लोग अब हिन्दुस्तान में यह लिखने और बोलने लगे हैं कि टीवी चैनलों ने मानो दंगा करवाने को, नफरत और हिंसा फैलाने को, झूठ कहने और लावा उगलवाने को अपना धंधा बना लिया है। हमारा ख्याल है कि एक ऐसा वक्त आ गया है जब प्रिंट मीडिया को अपने और टीवी चैनलों के लिए इन दिनों इस्तेमाल होने वाले मीडिया नाम के एक अकेले शब्द का विकल्प ढूंढना चाहिए, और अखबारों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की संदिग्ध साख के साथ एक बोट पर सवार नहीं होना चाहिए। आज देश में अखबारों का काम और चैनलों का काम बिल्कुल अलग-अलग किस्म का हो गया है, दोनों की नीयत और जरूरत अलग-अलग हो गई हैं, और दोनों के पत्रकारों-कामगारों का मिजाज भी अलग-अलग हो गया है। अब मीडिया नाम का एक शब्द इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को साख दिला रहा है, और उसी के साथ गिने जाने की वजह से प्रिंट की साख गिरा रहा है। एक वक्त था जब पत्रकारिता या अखबारनवीसी के मायने सीधे-सीधे प्रिंट मीडिया ही होते थे। उसके बाद धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दाखिल हुआ, और हावी हुआ, उसने पेशे को इस हद तक बिगाड़ दिया कि पेशा खत्म होकर महज कारोबार रह गया। ऐसे में आज प्रिंट को अपने लिए एक अलग शब्द छांटना चाहिए, और अपने आपको मीडिया में गिनने से लोगों को रोकना चाहिए। 

आज इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों के जो तौर-तरीके रह गए हैं, जिन्हें लेकर पाकिस्तान में ब्रॉडकास्टिंग की संवैधानिक संस्था ने फिक्र जाहिर की है, जिसे लेकर वहां एक हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी किया है, उससे हिन्दुस्तान को भी एक सबक लेना चाहिए, एक नसीहत लेनी चाहिए। यहां अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की साख के साथ प्रिंट को नहीं खड़े होना चाहिए, और मीडिया नाम की एक बड़ी छतरी से बाहर आकर अपने को सिर्फ प्रिंट कहने का काम करना चाहिए। वैसे भी अगर कानूनी रूप से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम के रजिस्ट्रेशन से लेकर उसके मालिकाना हक तक बहुत सी बातें अलग किस्म की हैं, और प्रिंट मीडिया के लिए कानून बिल्कुल अलग हैं। इन दोनों का साथ में इज्जत के साथ गुजारा नहीं है, और गरीब अखबारों को महंगे चैनलों से परे अपनी दुनिया अलग रखनी चाहिए। पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत का ख्याल रखने वाले श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के खात्मे के पीछे भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कामगारों का एक अलग मिजाज रहा है, और अब प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ अलग गिनाना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 30-Oct-2019

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने वहां की बसों में लड़कियों और महिलाओं का सफर मुफ्त कर दिया है। कुछ महीने पहले उसने दिल्ली मेट्रो को महिलाओं के लिए मुफ्त कर दिया था। इस बार की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बस और मेट्रो मुसाफिरों में से महिलाएं 30 फीसदी से कम हैं। उन्होंने इसका यह मतलब बताया कि समाज में महिलाओं के काम करने के मौके कम हैं इसलिए उनकी आवाजाही भी कम होती है। इसका दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि उनके लिए आवाजाही मुश्किल या महंगी है, इसलिए भी वे काम कम कर पाती हैं, पढ़-लिख कम पाती हैं। 

आंकड़े अपने-आपमें कई बार एक गलतफहमी भी पैदा करते हैं, इस मामले में भी हो सकता है कि महिलाओं का अनुपात मेट्रो-बसों में कम होने के पीछे एक वजह यह भी है कि वे देर रात अकेले सफर नहीं करतीं, और उस वक्त के मुसाफिरों ने तकरीबन सारे ही लोग पुरूष ही होते हैं। लेकिन ऐसी जो भी वजह हो, यह बात सही है कि महिलाओं के काम करने के मौके कम हैं, महिलाओं को सफर करना अधिक मुश्किल या महंगा पड़ता है, और मुफ्त स्थानीय सफर उनके आगे बढऩे में बहुत बड़ा हाथ बंटा सकता है। केजरीवाल ने यह भी कहा है कि मुफ्त सफर को बुजुर्गों और छात्र-छात्राओं तक भी बढ़ाया जा सकता है। 

केजरीवाल की इस घोषणा के तुरंत बाद दीवाली पर प्रदूषण के जो आंकड़े आए हैं, वे भयानक हैं। दिल्ली एक बार फिर भयानक प्रदूषण की शिकार है, और सबसे संपन्न तबके के लिए विदेशों में बने हुए घरेलू उपकरणों के इश्तहार दिल्ली के अखबारों में जो कि घर की हवा को छोटे बच्चों तक के लिए महफूज बना देने का दावा कर रहे हैं। लेकिन गिने-चुने लोगों को छोड़कर बाकी तमाम लोग तो सड़क-चौराहों और फुटपाथों के जानलेवा प्रदूषण में जीने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में पूरी दुनिया में हर समझदार महानगर का यह तजुर्बा है कि सार्वजनिक परिवहन अधिक आसानी से हासिल हो, अधिक सस्ता या मुफ्त हो, तो निजी गाडिय़ों का इस्तेमाल घटता है, और प्रदूषण भी। जो लोग महानगरों में स्थानीय यातायात को रियायती या मुफ्त करने के खिलाफ रहते हैं, वे इस बात को अनदेखा करते हैं कि निजी गाडिय़ों से, या टैक्सी-ऑटो के अधिक इस्तेमाल से जो प्रदूषण बढ़ता है, वह मुफ्त बस-मेट्रो से अधिक महंगा पड़ता है। 

दिल्ली सरकार की यह सोच और कार्रवाई कई मायनों में मायने रखती है। पहली बात तो यह कि चुनाव करीब आने की वजह से यह घोषणा हो रही हो ऐसा भी नहीं है क्योंकि इस सरकार ने आते ही बिजली-पानी को बहुत सस्ता किया था, स्कूलों को बेहतर बनाया था, और सस्ता या मुफ्त इलाज सबको मुहैया कराया था। इस सरकार के इस पहले और मौजूदा कार्यकाल में महिलाओं के लिए मुफ्त मेट्रो और मुफ्त बस उसी सिलसिले की एक कड़ी होने के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक क्रांतिकारी कदम भी है। भारत एक ऐसा संघीय देश है जिसमें ढाई दर्जन के करीब प्रदेश हैं, और ये सब एक-दूसरे के तजुर्बों से सीख सकते हैं। ऐसा पहले भी होते रहा है कि किसी एक प्रदेश की कामयाबी से दूसरे प्रदेशों में उससे सीखा और अपना काम भी बेहतर किया। पूरे देश को बेहतर सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है, और इसके साथ-साथ अगर वे प्रदेश महिलाओं को, बुजुर्गों और छात्र-छात्राओं को, बीमारों को मुफ्त स्थानीय सफर दे सकते हैं, तो उन्हें जरूर देना चाहिए। यह महज वोटों की खातिर दिया गया मुफ्त तोहफा नहीं है, यह पूरी की पूरी धरती को बचाने के लिए प्रदूषण घटाने का एक ऐसा तरीका है जिससे कि हर प्रदेश बाकी दुनिया को बचाने में भी मदद कर सकते हैं। 

भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात को जोर-शोर से उठाना चाहिए कि प्रदूषण को घटाने की किसी देश-प्रदेश की ऐसी कोशिशों के लिए लगने वाली लागत में बाकी संपन्न दुनिया को भी हाथ बंटाना चाहिए। कार्बन-उत्सर्जन के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं-कहीं ऐसा तालमेल है भी कि इसे घटाने वाले देशों को बाकी देशों से किस तरह की मदद मिले, और औसत से अधिक कार्बन-उत्सर्जन करने वाले अमरीका जैसे देश किस तरह उसका बोझ उठाएं। इस बात को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अधिक जोरों से उठाना चाहिए ताकि दुनिया भर के मंझले शहरों को भी सार्वजनिक यातायात में विकसित देशों से मदद मिल सके। केजरीवाल सरकार का महिलाओं के लिए मेट्रो-बस मुफ्त करने का फैसला ऐतिहासिक है, और हमारा मानना है कि आने वाले बरसों में सरकारों को यह मानना पड़ेगा कि सार्वजनिक परिवहन पर होने वाला घाटा दरअसल फायदा है। आखिर में यह बात भी लिखने लायक है कि दिल्ली की बसों के लिए केजरीवाल सरकार ने महिलाओं की हिफाजत के लिए वर्दीधारी मार्शल तैनात किए हैं, इससे भी इस कुख्यात शहर में महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा। 
-सुनील कुमार


Date : 29-Oct-2019

पिछले छह बरसों का क्या कोई ऐसा भी हफ्ता गुजरा है जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को चौंका न दिया हो? और इस बार तो उन्होंने हिंदुस्तानियों के साथ-साथ योरप के लोगों को भी चौंका दिया है क्योंकि वे यूरोपीय संघ के सत्ताईस ऐसे सांसदों की मेजबानी कर रहे हैं जिन्हें धारा 370 खत्म होने के बाद का कश्मीर देखना नसीब होगा। वह कश्मीर जिसे खुद के वहां के तीन-तीन भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को अपनी खिड़की के भीतर से देखना नसीब नहीं हो रहा है, कश्मीर में पैदा हुए और संसद में पहुंचे हुए गुलाम नबी आजाद जैसे लोगों को नसीब नहीं हो रहा है, हिंदुस्तानी और विदेशी मीडिया को नसीब नहीं हो रहा है, दुनिया के इस महान लोकतंत्र रहे हिंदुस्तान के मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को नसीब नहीं हो रहा है। ऐसे में हिंदुस्तान को डेढ़ सौ बरस गुलाम बनाकर रखने वाले अंगे्रजों के सांसदों और उनके यूरोपीय भाई-बहन गोरों को यह नसीब हो रहा है, तो यह दुनिया को चौंकाने वाली बात है।

लेकिन हिंदुस्तानी मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक यूरोपीय संसद के इन सत्ताईस सांसदों में से कम से कम बाईस ऐसे हैं  जो कि अपने-अपने देशों में दक्षिणपंथी या कट्टर दक्षिणपंथी माने जाते हैं। वे इटली में परदेशियों के बसने के खिलाफ हैं, जो यूके को यूरोपीय संघ से अलग करना चाहते हैं, और जो एक दूसरे देश में आवाजाही, कामकाज के खिलाफ राष्ट्रवादी सांसद हैं। इनमें से एक ऐसे हैं जो कि अभी डेढ़ बरस पहले एक नेता पर भद्दी नाजीवादी टिप्पणी करने की वजह से यूरोपीय यूनियन के उपाध्यक्ष पद से बर्खास्त किए गए थे। ईयू के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। कुछ दूसरे सांसद ऐसे आए हैं जो कि अपने देशों में मानवाधिकार उल्लंघन पर आंखें मूंदे रखते हैं। कोई सांसद ऐसा है जिसे इस बात पर हैरानी है कि हिटलर के इतने मानव संहार के बाद इतने यहूदी बच कैसे गए थे?

एक तरफ सीपीएम के सीताराम येचुरी ने इन सांसदों, ऐसे सांसदों के कश्मीर दौरे का विरोध किया है, और साथ-साथ दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के सांसद, सुब्रमण्यम स्वामी ने इस दौरे को रद्द करने की मांग करते हुए कहा है कि उन्हें हैरानी है कि विदेश मंत्रालय ने यूरोपीय संघ के सांसदों के व्यक्तिगत तौर पर जम्मू-कश्मीर इलाके का दौरा करने के इंतजाम किए हैं। उन्होंने कहा- यह हमारी राष्ट्रनीति से पीछे हटना है, मैं सरकार से यह दौरा रद्द करने की अपील करता हूं, क्योंकि यह अनैतिक है। कांगे्रस नेता राहुल गांधी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जाने के लिए योरप के सांसदों का स्वागत किया जा रहा है जबकि भारतीय सांसदों के कश्मीर दौरे पर प्रतिबंध लगाकर रखा गया है, यह बहुत गलत है। कांगे्रस के जयराम रमेश ने लिखा है- जब भारतीय नेताओं को जम्मू-कश्मीर के लोगों से मिलने से रोका जा रहा है तो सीना ठोककर राष्ट्रवाद की बात करने वालों ने क्या सोचकर यूरोपीय नेताओं को जम्मू-कश्मीर जाने की इजाजत दी? उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे भारत की अपनी संसद और हमारे लोकतंत्र का अपमान है।

इन तथ्यों से यह मामला साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किस तरह अंतराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर के आज के हालात पर सकारात्मक बातें कहलवाने के लिए यह काम कर रहे हैं। भारत सरकार के रूप में उनका यह काम ठीक है क्योंकि सरकार को अपने फैसले के पक्ष में डिंडोरा पीटने का हक है, यह उसकी जिम्मेदारी भी है। लेकिन जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे नफे  के बजाय सरकार को नुकसान ज्यादा होते दिख रहा है। और यह नुकसान महज सरकार का नहीं है, यह पूरे देश का नुकसान है जिसकी साख इस बात से चौपट होगी कि चुनिंदा कट्टरपंथी और नफरतजीवी फिरंगी सांसदों को लाकर उनसे भारत जैसा लोकतंत्र एक चरित्र प्रमाणपत्र हासिल करने जा रहा है। आजादी की पौन सदी बाद भी अगर गोरों से सर्टिफिकेट अपनी खुद की संसद के समर्थन से अधिक मायने का समझा जा रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र की बड़ी शिकस्त है और उसकी बड़ी बेइज्जती है। कश्मीर के हालात को हिंदुस्तानी संसद और सांसदों की नजरों से दूर रखकर विदेशी सांसदों को कश्मीर दिखाने पर खुद भाजपा के एक जानकार और जागरूक सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जो कहा है, उससे अधिक हम क्या कहें? मोदी ने देश के लोगों को चौंकाने का सिलसिला इस हफ्ते भी जारी रखा है, लेकिन इससे उनके भक्तों से परे, और आए हुए कट्टरपंथियों से परे शायद ही किसी और तबके में उनका, देश का, और भारतीय लोकतंत्र का सम्मान बढ़ेगा। कश्मीर के लोगों में तो बिल्कुल भी नहीं बढ़ेगा।
-सुनील कुमार


Date : 26-Oct-2019

विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिया जाए या नहीं इस पर देश के लोग दो खेमों में बंट गए हैं। इन खेमों के आकार देश में मोदी की शोहरत वालों, और मोदी पर तोहमत वालों के आकार के हो सकते हैं, लेकिन इतिहास को गिनाने के लिए तो गिनती के दस्तावेज काफी होते हैं, और इतिहास जनमत संग्रह तो होता नहीं है। देश के इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि सावरकर ने एक वक्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था, और फिर जेल से ही उन्होंने अंग्रेजों से बार-बार माफी मांगते हुए अपनी रिहाई करवाई थी, अंग्रेज सरकार के लिए वफादारी के वायदे लिखकर दिए थे, अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था, अंग्रेज सरकार से गुजारा-भत्ता या पेंशन हासिल की थी, उसे बढ़ाने की मांग भी की थी। वे गांधी हत्या के मुकदमे में भी घिरे थे, और बाद में सुबूत न मिलने पर बरी किए गए थे। अब महाराष्ट्र चुनाव के पहले भाजपा ने महाराष्ट्र के इस बेटे को भारत रत्न देने की घोषणा की थी जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के हाथ की बात है, और एनडीए की गठबंधन सरकार के भीतर भला भाजपा या नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की घोषणा का कौन विरोध कर सकते हैं? 

अब सवाल यह उठता है कि गांधी के हत्यारों के साथ बड़े गहरे रिश्तों वाले और अंग्रेजों की वफादारी की कसमें खाने वाले, अंग्रेजों से पेंशन पाने वाले को अगर भारत रत्न दिया जाता है, तो फिर यह सरकारी सम्मान और किसी भी, कैसे को भी क्यों नहीं दिया जा सकेगा? इसलिए जब सत्ता की ताकत किसी को अच्छी तरह दर्ज इतिहास को खारिज करते हुए, लोगों के हाथ के लिखे हुए माफीनामे को अनदेखा करते हुए, सरकारी खजाने से पेंशन मिलने के खातों को अनदेखा करते हुए देश का रत्न साबित करने का हक देता है, तो क्या सचमुच ही लोकतंत्र में ऐसा कोई हक रहना चाहिए? और इस बात को हम आज पहली बार इस सिलसिले में नहीं उठा रहे हैं, बरसों से हम लगातार यह लिखते आ रहे हैं कि सरकारों को किसी भी सम्मान या पुरस्कार देने से अपने को अलग रखना चाहिए। जो सरकारें वोटों की बदौलत बनती हैं, उनके समझौतापरस्त होने की गारंटी रहती है, और ऐसे में उन सरकारों को कैसे यह हक दिया जा सकता है कि वे अपनी मर्जी से लोगों का सम्मान करें? किसी चुनाव के पहले, किसी धर्म या जाति के लोगों को खुश करने के लिए, किसी के रिश्तेदारों का समर्थन संसद या विधानसभा में पाने के लिए जो सम्मान दिए जा सकते हैं, उन सम्मानों का वैसे भी क्या महत्व रहता है? इस बात को हम पहले भी दस-दस बार लिख चुके हैं कि सरकारों को सम्मान और पुरस्कार के कारोबार से अपने को परे रखना चाहिए। सरकारी सम्मान-पुरस्कार कभी विश्वसनीय या सम्माननीय नहीं हो सकते। देश में हर बरस दर्जनों लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण, और पद्मविभूषण जैसे सम्मान दिए जाते हैं। और तो और प्रणब मुखर्जी जैसे पेशेवर सत्ता-नेता को भी इनमें से कोई सम्मान दिया जा चुका है जबकि वे यूपीए की दोनों सरकारों के हर उस फैसले में शामिल थे जिन्हें बाद में भ्रष्ट पाया गया था। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय सम्मान देने का हक भी अगर सरकार को होता है, तो ऐसे हक को खत्म कर दिया जाना चाहिए। और अब तो बात देश के सबसे बड़े सम्मान की आ गई है, और देश के एक सबसे ही विवादास्पद आदमी को जब उसे देने की राजनीतिक घोषणा हो चुकी है, तो देश के समझदार तबके को एक बार फिर यह सोचना चाहिए कि क्या कोई भी सरकारी अलंकरण जारी रहने चाहिए? दिक्कत यह है कि देश के बड़े-बड़े लेखक और विचारक, कलाकार और फिल्मकार बीते बरसों में इन सम्मानों को खुशी-खुशी हासिल करते रहे हैं, और देश के गिने-चुने ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने इसे मना किया हो। इसलिए उम्मीद तो बिल्कुल नहीं है कि सरकारी सम्मानों को खत्म करने पर अधिक लोग बात करेंगे, लेकिन हम इस मुद्दे को उठाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं कि इसके पहले न हो पाया तो न सही, कम से कम अब तो राष्ट्रीय सम्मान-पुरस्कार बंद कर दिए जाएं ताकि इसके विरोध में लोग अपने को मिले ऐसे सम्मान-पुरस्कार लौटाने को मजबूर न हों। आज तो भारत रत्न पाने वाले अधिकतर लोग गुजर चुके हैं, और वे लोग अपने तमगे लौटाने के लिए भी लौट भी नहीं सकते। 
-सुनील कुमार


Date : 25-Oct-2019

पड़ोस के देश भारत के साथ तुलना न भी की जाए, तो भी पाकिस्तान की हालत अपने आपमें बहुत ही खराब है। एक प्रधानमंत्री इमरान खान जिनके चुनकर आने के वक्त से यह चर्चा रही कि वे फौज की मदद से जीतने वाले नेता हैं, और फौज की मेहरबानी से ही प्रधानमंत्री हैं, वे कम से कम आज तो जाहिर तौर पर फौज के मोहताज दिख रहे हैं। इमरान के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों ने एक आजादी मार्च निकालने की घोषणा की, तो इस विपक्षी नेता से मिलकर पाकिस्तानी फौज के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा कि वे आजादी मार्च न निकालें। ऐसी खबरें आई हैं कि फौज ने पाकिस्तान की राजधानी तक पहुंचने वाली सड़कों को खोद दिया है ताकि प्रदर्शन के लिए आने वाली गाडिय़ां न पहुंच पाएं। फौज ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है कि इमरान के खिलाफ कोई जंगी प्रदर्शन न हो पाए। और दिलचस्प बात यह भी है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनके खिलाफ आजादी मार्च की योजना से भारत खुश है, और इस प्रदर्शन को विदेश से समर्थन हासिल है। इमरान ने यह भी कहा कि यह प्रदर्शन कश्मीर के मुद्दे को नुकसान पहुंचाएगा। विपक्ष के नेता फजल उर रहमान ने इमरान का इस्तीफा मांगते हुए फौज की सलाह को खारिज कर दिया है, और प्रदर्शन करने की घोषणा की है। 

पाकिस्तान के हाल पर लिखने के लिए भारत के साथ उसकी कोई तुलना करने की जरूरत नहीं है। यह समझने की जरूरत जरूर है कि उसका यह बुरा हाल क्यों हुआ है। एक ही दिन आजाद हुए ये दोनों देश आज इतने फर्क वाले क्यों हो गए हैं? पाकिस्तान शुरू से ही धर्म के आधार पर बना हुआ देश रहा, और वहां पर धर्मान्ध कट्टरपंथियों की ताकत लगातार बढ़ती रही। पाकिस्तान में लंबे समय से आजादी के बाद से ही कई बार फौजी हुकूमतें आईं जिन्होंने निर्वाचित नेताओं को जेल में डाला, फांसी चढ़ाया, या देश के बाहर रहने को मजबूर किया। धार्मिक कट्टरपंथियों के अलावा पाकिस्तान ने समय-समय पर अपने सरहदी मकसदों से जिस तरह हमलावर आतंकियों को बढ़ावा दिया, वह भी उसे घुन की तरह खोखला करने वाला काम साबित हुआ। मीडिया की आजादी को कुचलने का काम हुआ, सामाजिक आंदोलन खत्म कर दिए गए, और सवालों का जवाब गोलियों से देने का सिलसिला चलते रहा। इस देश में मजहब को इतनी अहमियत दी गई कि लोगों की रोटी, कपड़े, और मकान की जरूरतें किनारे धरी रह गईं, और एक वक्त ऐसा आया जब इसके नेताओं ने खुलकर कहा कि वे चाहे घास खाकर जिंदा रह लेंगे, लेकिन परमाणु बम जरूर बनाएंगे, और आज यह देश परमाणु हथियारों पर तो बैठा है, लेकिन इसके औजार खाली पड़े हैं, लोगों के रोजगार गायब हैं, फौज से लेकर कट्टरपंथियों तक, और आतंकियों तक हर कोई बेकाबू है। जो अकेली वजह इस देश के बनने से लेकर अब तक सबसे अधिक बर्बाद करने वाली दिखती है वह मजहबी कट्टरता है जो कि जाने कब अपना दायरा पार करके धर्मान्ध हमलावर आतंक में बदल गई, और फौज की सियासी हसरतें बढ़ती चली गईं। 

पाकिस्तान आज एक तरफ अमरीका और दूसरी तरफ चीन के रहमोकरम पर दो वक्त की रोटी पा रहा है, लेकिन उसका अपना हाल बड़ा फटेहाल है। इंग्लैंड में पढ़े हुए एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री भी इसका कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मुल्क की बदहाली एक कैंसर की तरह लाइलाज हो चुकी दिखती है। आज दुनिया में जगह-जगह पाकिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह माना जा रहा है, और उस पर खुलकर चर्चा हो रही है। इस हाल को देखकर दुनिया के बाकी देशों को कई किस्म के सबक लेने की जरूरत है कि किस तरह राजनीति में धर्म का घालमेल देश को अराजक बनाता है, और बर्बाद करता है। यह भी समझने की जरूरत है कि जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक-एक कर कमजोर और खत्म किया जाता है, तो देश के लोगों को लोकतंत्र से परे फौज पर भरोसा होने लगता है, कानून अपने हाथ में ले लेना आसान और बेहतर लगने लगता है। यह पूरा सिलसिला पाकिस्तान की इस खतरनाक नौबत को तो बताता ही है, लेकिन कमजोर और खोखले हो चुके एक लोकतंत्र के पड़ोस के देशों पर कई किस्म के खतरे भी बताता है। दुनिया में यह उत्तर कोरिया के बाद दूसरा ऐसा देश है जहां के लोग, जिम्मेदार और ताकतवर ओहदों पर बैठे हुए लोग लापरवाही से परमाणु हथियारों की चर्चा करते हैं, उनके इस्तेमाल की चर्चा करते हैं। हाल यह है कि पाकिस्तान को अपने गंभीर बीमार लोगों को इलाज के लिए हिन्दुस्तान भेजना पड़ता है, लेकिन वह अपने परमाणु हथियारों के दंभ को छोड़ नहीं पा रहा है। किसी भी ऐसे देश में परमाणु हथियार पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है जहां पर किसी पल भी फौज हुकूमत सम्हाल सकती है, या फौजी निगरानी के बीच भी मजहबी आतंकी किसी भी हथियार तक पहुंच सकते हैं। आर्थिक रूप से दीवालिया हो चुके इस देश में निराशा इतनी बड़ी हो चुकी है कि अपने लोगों को उसके बीच फख्र की एक वजह देने के लिए देश की सरकार या फौज पड़ोसी पर हमला करके एक जंग की तरफ लोगों का ध्यान बांट सकती है। पाकिस्तान के पड़ोसी लोकतंत्रों को इस नौबत से खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है।
-सुनील कुमार


Date : 24-Oct-2019

एक तरफ जब महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे दो पुराने कांग्रेसी रहे हुए राज्यों में कांग्रेस सीटें बढ़ाकर भी सरकार बनाने से बहुत दूर है, उस बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर में चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत कुछ दूसरे रिकॉर्ड भी कायम कर रही है। बस्तर में इतनी जल्दी-जल्दी दो उपचुनाव हुए जिनमें पिछले दंतेवाड़ा विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के नक्सल-हिंसा शिकार विधायक की खाली हुई सीट पर कब्जा ही नहीं किया, बल्कि दंतेवाड़ा विधानसभा में जीत की लीड का एक नया रिकॉर्ड भी बनाया। वह जीत इस मायने में भी अधिक मायने रखती थी कि वहां पर भाजपा ने नक्सल-हिंसा के शिकार हुए विधायक भीमा मंडावी की पत्नी को उम्मीदवार बनाया था, और ताजा-ताजा हादसे की याद के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने वहां भाजपा को कड़ी शिकस्त दी थी। अब दो महीने के भीतर के चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की सारी कोशिश के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जिस अंदाज में जीत हासिल की है, वह देखने लायक है। 

जैसा कि भारत के अधिकतर प्रदेशों में आमतौर पर कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रहने पर होता है, छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का संगठन मोटेतौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पर ही चलता है। ऐसे में अगर चित्रकोट में कांग्रेस की हार हुई होती, तो इसकी तोहमत भूपेश बघेल पर ही लगती, और अगर जीत हुई है, तो उसके हकदार भी भूपेश बघेल और कांग्रेस संगठन हैं। इस नतीजे के बाद अब राज्य के दोनों बड़े आदिवासी इलाकों से भाजपा पूरी तरह खत्म हो गई है, और विधानसभा में बस्तर और सरगुजा से कोई भाजपा विधायक नहीं रहेंगे। यह एक अलग बात है कि इन दोनों ही आदिवासी इलाकों में भाजपा के एक-एक सांसद जरूर हैं। छत्तीसगढ़ के इन दोनों उपचुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में जिस दम-खम और एकता के साथ चुनाव लड़ा, उसका मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। लेकिन इन दोनों जीत का श्रेय सिर्फ चुनाव अभियान को देना ठीक नहीं होगा। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने घोषणापत्र के वक्त से आदिवासी इलाकों के लिए जो बड़ी बातें कही थीं, और उन्हें राज्य में सरकार बनते ही जिस तरह पूरा करना शुरू किया था, उसका खासा असर हुआ था। और नतीजा यह था कि लोकसभा चुनाव के वक्त राज्य की 11 सीटों में से जो दो लोकसभा सीटें कांग्रेस को हासिल हुईं, उनमें से एक आदिवासी बस्तर सीट भी थी। कांग्रेस ने जिस तरह टाटा के लिए ली गई आदिवासी जमीन उसके मालिकों को वापिस की, वह बस्तर में एक अनोखा काम था, और उसका असर उन आदिवासियों पर भी हुआ जिनकी जमीनें नहीं गई थीं। दूसरा फर्क यह हुआ कि भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की हिंसा बहुत कम हुई क्योंकि पुलिस और बाकी सुरक्षा बलों को यह समझ आ गया कि उनके जुर्म अब पिछले बरसों की तरह बर्दाश्त नहीं होंगे। आदिवासियों के लिए यह एक बड़ा फर्क था कि उन्हें इंसानों की तरह माना जाने लगा, और हमारा यह मानना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की इस मोर्चे पर कड़ाई से आदिवासियों के मन में कांग्रेस के लिए जगह बनी है। फिर ऐसी भी खबरें हैं कि मुख्यमंत्री हाट बाजार स्वास्थ्य योजना के तहत पूरे बस्तर में ही जगह-जगह जिस तरह मड़ई और बाजार में क्लिनिक लगाकर इलाज किया गया, दवाईयां दी गईं, उसका भी असर हुआ है। मुख्यमंत्री ने पूरे प्रदेश में सुपोषण योजना को जितने आक्रामक तरीके से लागू किया है, उसका भी असर इस उपचुनाव में देखने मिला है। एक और बड़ी चीज जिसका असर इस चुनाव पर हुआ होगा, वह है तेंदूपत्ता का दाम बढ़ाना, और उसका बोनस बढ़ाना, लघु वनोपज का दाम बढ़ाना। इन बातों का असर पूरे प्रदेश के जंगल वाले इलाकों में होना तय है, और दंतेवाड़ा-चित्रकोट की जीत में इसका भी योगदान रहा होगा। 

अब मोटेतौर पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पूरे निपट गए हैं, उपचुनाव भी फिलहाल निपट गए हैं, और भूपेश बघेल एक विजेता की तरह उभरकर सामने आए हैं। लोकसभा चुनाव में जहां पूरे देश में कांग्रेस की सीटों में बहुत मामूली बढ़ोत्तरी हुई थी, वहां पर छत्तीसगढ़ में सीटें बढ़कर एक से दो हुई थीं, जो बहुत अच्छी कामयाबी नहीं थी, तो बहुत बुरी भी नहीं थी। आने वाले महीनों में प्रदेश में म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव होंगे, और वह भूपेश बघेल सरकार, और कांग्रेस संगठन दोनों के लिए एक बड़ी कसौटी होगी। फिलहाल कांग्रेस के लिए यह खुशी मनाने का मौका है, और भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ में एक लंबे आत्ममंथन का मौका भी है, और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनावों में अपनी वापिसी की कोशिश करने का भी। कुल मिलाकर इन दो उपचुनावों के बाद भूपेश बघेल संगठन के भीतर भी अधिक ताकतवर और कामयाब होकर उभरे दिखते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 23-Oct-2019

जम्मू-कश्मीर के जम्मू इलाके में आठ बरस की एक मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक, एक घर की दो पीढिय़ों तक के लोगों ने जिस तरह गैंगरेप किया था, और अपने परिचितों को बुला-बुलाकर बलात्कार करवाया था, बाद में उस बच्ची की हत्या कर दी थी, उस मामले की जांच करने वाली राज्य की पुलिस के खिलाफ अदालत ने साजिश करने की एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। देश को याद होगा कि कठुआ रेप-मर्डर नाम से चर्चित इस मामले में हिन्दू बलात्कारियों को बचाने के लिए देश के कई हिन्दू संगठनों ने तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे, इनमें राज्य के दो भाजपा मंत्री भी शामिल थे जिन्हें बाद में इस्तीफा देना पड़ा था। और जम्मू में तो हालत यह थी कि इस बच्ची का मामला लडऩे से वकीलों को रोका गया था, और वैसे बागी माहौल में एक हिन्दू महिला वकील ने बड़े हौसले के साथ हत्यारे-बलात्कारियों को सजा दिलवाने में कामयाबी पाई थी। अब इस बच्ची के रेप-मर्डर की जांच करने वाली विशेष पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज हो रही है कि उसने कुछ बेकसूर लोगों के खिलाफ गवाही देने के लिए दूसरे लोगों की हिंसक प्रताडऩा की थी। जाहिर है कि मामले की जांच में राज्य पुलिस की यह टीम जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे, उन्होंने बेईमानी की थी, और बाद में सुबूत नष्ट करने के लिए भी कुछ पुलिसवाले गिरफ्तार हुए थे। आज मुद्दे की बात यह है कि इस भयानक रेप-हत्या मामले में झूठे गवाह तैयार करने के जुर्म में अदालत के आदेश से पुलिस की विशेष जांच टीम पर एफआईआर हो रही है। 

इस मामले को देखकर छत्तीसगढ़ राज्य के शुरू के तीन बरसों का सबसे चर्चित जग्गी हत्याकांड याद पड़ता है जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष और तत्कालीन एनसीपी नेता विद्याचरण शुक्ल के एक करीबी, रामावतार जग्गी, को खुली सड़क पर मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बंगले पर आने-जाने वाले लोगों ने मार डाला था। इस मामले में हत्या के तुरंत बाद हत्यारों को भगाने के लिए, जांच को बर्बाद करने के लिए, और बेकसूरों को फंसाने के लिए रायपुर पुलिस के उस वक्त के कुछ अफसरों को अदालत से सजा हुई थी, वे बर्खास्त हुए थे। रायपुर का वह हत्याकांड उस वक्त सत्ता का संरक्षण प्राप्त हत्यारों को बचाने के लिए था, लेकिन वह सबसे पहले साजिश में शामिल पुलिसवालों पर भारी पड़ा था, और बर्खास्तगी के बाद भी ऐसे कई पुलिसवाले अभी ऊपर की अदालत में मुकदमा झेल ही रहे हैं। देश में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें पुलिस की साजिश, उसकी हिंसा, और उसके जुर्म पर दस-बीस बरस बाद भी सजा होती है, और लंबी-चौड़ी सजा होती है, बहुत से लोग बहुत बरसों के लिए, पूरी जिंदगी के लिए जेल चले जाते हैं। 

ऐसे मामलों को देखकर यह लगता है कि पुलिस को सत्तारूढ़ नेताओं या अपने बड़े अफसरों के कहे हुए भी किसी जुर्म में भागीदार नहीं बनना चाहिए क्योंकि अब अदालतों में कई किस्म के सुबूत जुर्म को साबित करने के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं। मोबाइल फोन के डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज, और फोरेंसिक लैब में साबित सुबूत लगातार अधिक कारगर होते जा रहे हैं। लोगों की कानूनी जागरूकता भी बढ़ी है, और कमजोर तबकों की कानूनी मदद के लिए कुछ जनसंगठन भी सामने आए हैं। बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाके में सरकारी बंदूकों की लंबी मौजूदगी से वहां सत्ता की हिंसा के भी अनगिनत मामले सामने आए हैं जिनमें से कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे हुए हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंकवाद के दिनों में वहां के पुलिस-मुखिया केपीएस गिल की अगुवाई में पुलिस और सुरक्षा बलों ने जो हिंसा की थी उसे लेकर दशकों बाद भी अदालतों से गिल के पुलिसवालों को उम्रकैद जैसी सजा हुई हैं, और आज के कुछ बरस बाद अगर बस्तर में कई बरस पहले पुलिस और सुरक्षा बलों के जुर्म सजा पाएं, तो भी किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। 

हमारा ख्याल यह है कि बेकसूरों को जैसे गंभीर जुर्म में फंसाने की बात साबित होती है, उन जुर्मों के लिए जिन सजाओं का प्रावधान होता है, उतनी सजा साजिश करने वाले पुलिसवालों को दी जानी चाहिए। हत्या या बलात्कार का झूठा जुर्म किसी पर थोपने की साजिश के लिए पुलिस को उतनी ही कैद देनी चाहिए जितनी कि हत्या या बलात्कार के जुर्म में दी जा सकती थी। ऐसा इसलिए जरूरी है कि अगर किसी बेकसूर को ऐसी सजा दिलवाना कामयाब हो गया होता, तो पुलिस को बनाने का पूरा मकसद ही उल्टा साबित हो जाता। मुजरिम पुलिस को जल्द से जल्द, और अधिक से अधिक सजा इसलिए भी होनी चाहिए कि देश में दूसरी जगहों पर भी पुलिस को ऐसी साजिश का हौसला न हो।
-सुनील कुमार


Date : 22-Oct-2019

पश्चिम बंगाल की भाजपा के बारे में एक खबर है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने वहां के अपने नेताओं को नसीहत दी है कि नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के विचारों को लेकर उनकी आलोचना न करें। ऐसी खबर है कि पार्टी को लगता है कि बंगाल के लोग जिस नोबल विजेता पर गर्व कर रहे हैं, उसकी आलोचना से पार्टी का राजनीतिक नुकसान हो सकता है। कहने के लिए तो यह बात छोटी सी है, लेकिन आज देश के व्यापक संदर्भ में इस पर चर्चा करने की जरूरत है। अभिजीत बनर्जी के खिलाफ शुरूआत मोदी सरकार के एक प्रमुख भाजपा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने की जब उन्होंने अभिजीत बनर्जी का मखौल उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने कांगे्रस के चुनाव अभियान के एक प्रमुख नारे, न्याय नाम के कार्यक्रम को तैयार करने में सैद्धांतिक मदद की थी जिसे देश की जनता ने चुनाव में पूरी तरह खारिज कर दिया। नेताओं का एक-दूसरे के खिलाफ ओछा और नाजायज बोलना तो चलते रहता है, लेकिन दुनिया ने जिस अर्थनीति को महत्वपूर्ण मानते हुए उसके पीछे के तीन अर्थशास्त्रियों को नोबल पुरस्कार का हकदार माना, उसकी खिल्ली उड़ाकर भाजपा कुछ भी हासिल नहीं कर सकती। और फिर एक बात यह भी है कि देश के पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी और एनडीए को ऐतिहासिक जनसमर्थन मिलने से कांगे्रस की न्याय नामक योजना जनता ने खारिज कर दी ऐसा सोचना अपने-आपमें एक राजनीतिक अपरिपक्वता से किया गया अतिसरलीकरण है, और पीयूष गोयल जैसे परिपक्व को ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए।

किसी के विचारों से, किसी के सिद्धांतों से असहमति एक बात है, लेकिन उसे खारिज करते हुए किसी चुनाव के नतीजों को उसी एक बात से जोड़कर देखना एक बड़ी चूक है। चुनाव के नतीजे एक बहुत ही जटिल फैसला होते हैं, और मतदाताओं के सामने मौजूद विकल्पों के बीच से वे किन मुद्दों से कितना प्रभावित होते हैं, इसका अंदाज लगाना आसान नहीं होता। और फिर हिंदुस्तान के चुनाव पिछले बरसों में लगातार एक मैनेजमेंट का करिश्मा भी साबित होते आए हैं, इसलिए एक अर्थशास्त्री के सिर पर उसका घड़ा नहीं फोडऩा चाहिए। और फिर इस अर्थशास्त्री के साथ तो यह भी जुड़ा हुआ है कि वह दुनिया के गरीबों की मददगार अर्थनीतियों के लिए जाना जाता है। उसकी खिल्ली उड़ाना आत्मघाती ही हो सकता है। अभिजीत बनर्जी के पहले अमत्र्य सेन भी बंगाल के, गरीबों के अर्थशास्त्री रहे, नोबल विजेता रहे, लगातार गरीबों की भलाई की नीतियों और कार्यक्रमों के लिए जाने जाते रहे, और मोदी सरकार उनसे पूरी तरह असहमत रही। लेकिन उनकी खिल्ली उड़ाने से केंद्र सरकार या भाजपा का नुकसान छोड़कर और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद महज अभिजीत बनर्जी के बारे में लिखना नहीं है, आज हिंदुस्तान में लोगों को असहमति की वजह से बोलते हुए यह जरूर देखना चाहिए कि उनकी आलोचना नाजायज तो नहीं हो जा रही है? यह बात सावरकर को लेकर भी लागू होती है, और कई दूसरे लोगों को लेकर भी। आलोचना जहां नाजायज होती है, वहां वह आत्मघाती और प्रतिउत्पादक (काउंटरप्रोडक्टिव) हो जाती है। आज ही एक वरिष्ठ स्तंभकार ने इस बारे में लिखा है कि जनसंघ की आलोचना करते हुए इंदिरा ने कभी उसे हिंदू पार्टी कहकर नहीं कोसा, उसे बनियापार्टी कहकर कोसा। उनका मानना है कि यह इंदिरा की सोची-समझी रणनीति थी कि वे देश के हिंदुओं की विशाल आबादी को अपने बयानों से अपने खिलाफ करने की चूक नहीं कर रही थीं। चुनावी राजनीति पर आधारित भारतीय लोकतंत्र में सैद्धांतिक लड़ाई लड़ते हुए भी सामान्य समझबूझ को ताक पर धरना न अच्छी रणनीति हो सकती, न ही समझदारी।
-सुनील कुमार


Date : 21-Oct-2019

सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण तरीका संविधान पीठ होता है, और दो दिन बाद वहां इस मुद्दे पर जजों की बड़ी बेंच बैठकर विचार करेगी कि क्या बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों पर मंत्री और अफसर बयानबाजी कर सकते हैं? अदालत के सामने यह मुद्दा कुछ बरस पहले तब सामने आया था जब उत्तरप्रदेश में एक बलात्कार पर वहां के नेता आजम खां ने उसे राजनीति प्रेरित साजिश कहा था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी इस लड़की के पिता की शिकायत पर जब सुप्रीम कोर्ट ने आजम खां को कटघरे में खड़ा किया था, तो उसके पहले ही हम आजम खां का बयान आते ही यह सुझा चुके थे कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर ऐसे बयानों पर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए, और बकवासी नेताओं को सजा देनी चाहिए। बाद में आजम खां से बहुत बुरी तरह माफी मंगवाकर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें छोड़ तो दिया था, लेकिन इस मामले पर सैद्धांतिक और संवैधानिक सवालों पर विचार करना रह गया था जिसके लिए उस वक्त संविधान पीठ बनी थी, और वह अब सुनवाई शुरू करने वाली है। 

लोगों को याद होगा कि जब-जब नेता या अफसर ऐसे बयान देते हैं, हम कई बार उनके खिलाफ लिखते आए हैं। एक वक्त जब आसाराम को एक नाबालिग शिष्या के साथ बलात्कार की तोहमत का सामना करना पड़ा, तो देश में बहुत से भाजपा नेताओं ने इसे एक हिन्दू संत के खिलाफ राजनीतिक साजिश करार दिया था। उस वक्त भी हमने खुलकर ऐसे बयानों के खिलाफ लिखा था और सुझाया था कि प्रदेशों और देश के महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल अधिकार परिषद में बैठे लोग चूंकि सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से मनोनीत होते हैं, इसलिए वे ऐसे गंदे बयानों और बकवास पर भी कोई नोटिस जारी नहीं करते, तब तक जब तक कि ऐसे बयानों के पीछे कोई विपक्षी नेता न हो। यह समझने की जरूरत है कि जब सत्ता पर काबिज लोग ऐसे गंदे और हिंसक बयान देते हैं जो कि जांच भी शुरू होने के पहले फैसला देने के बराबर होते हैं, तो ऐसे बयान जांच एजेंसियों पर एक बड़ा भारी दबाव रहते हैं कि उन्हें सत्ता की मर्जी से ही जांच का नतीजा निकालना है। 

यह एक अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट बरसों बाद जाकर वही काम कर रहा है जिसके लिए हम हमेशा से उसे उकसाते आए हैं कि शिकायतकर्ता का इंतजार किए बिना सुप्रीम कोर्ट को ऐसे बयानों को खुद होकर एक जनहित याचिका दर्ज करके बकवासी नेताओं को कटघरे में खींचना चाहिए। यह एक तकलीफदेह नौबत है कि ऐसे बयान आते और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को शर्मनाक बनाते हुए आधी सदी गुजर गई है, और उसके बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट को यह सूझ रहा है कि सत्ता और राजनीतिक ताकत की ऐसी हिंसा पर काबू पाना चाहिए, और उसे शायद सजा भी देना चाहिए। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में एक ऐसी मिसाल कायम करनी चाहिए कि गैरजिम्मेदारी से बयान देने वाले, शिकायतकर्ता पर आरोप लगाने वाले, उसके चरित्र पर लांछन लगाने वाले, और जांच एजेंसियों को प्रभावित करने वाले नेताओं और अफसरों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि ये लोग जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, और ताकतवरों की हिंसा की शिकार जनता के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए उनका चरित्र भी दागदार साबित करने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए कि देश की संसद में ऐसे बकवासी लोग भरे हुए हैं जो बलात्कार की शिकार बच्चियों को भी राजनीतिक साजिश बताते हैं, जो अपने बयानों से साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश करते हैं, जो इस देश के सद्भाव के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में लगे रहते हैं। संसद के भीतर कही ऐसी बातें तो अदालत की बांहों से परे की रहती हैं, लेकिन जब-जब संसद के बाहर, विधानसभा के बाहर ऐसी गंदी और हिंसक बातें कही जाती हैं, तो उन पर कैद से कम किसी सजा का इंतजाम नहीं रहना चाहिए। ऐसा अगर होता है तो बरसों से हमारे उठाए गए मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट का समर्थन साबित होगा। देश के कमजोर तबकों को, आम लोगों को इस फैसले का इंतजार रहेगा ताकि खास लोग उनके साथ अलोकतांत्रिक हिंसा करके शान से घूमते न रहें।
-सुनील कुमार


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