संपादकीय

Posted Date : 26-Apr-2018
  • कुछ महीने पहले हरियाणा में बाबा राम रहीम नाम के एक बलात्कारी की गिरफ्तारी के लंबा-चौड़ा नाटक चला, और उस बाबा के भक्तों ने गिरफ्तारी और सजा के दौरान जो अराजकता फैलाई उसमें कई लोग मारे गए थे, उसके पहले संत रामपाल नाम के एक आदमी को जब कई गंभीर अपराधों में गिरफ्तार करने की नौबत आई तो उसके समर्थकों ने उसके किले जैसे आश्रम की ऐसी हथियारबंद मोर्चेबंदी की कि सरकार को फौजी कार्रवाई करके उसे निकालना पड़ा, और अदालत के रास्ते जेल भेजना पड़ा। कल जिस आसाराम को सजा हुई है, उसे भी जब इंदौर के आश्रम से गिरफ्तार करने की नौबत आई थी तो बड़ा हंगामा हुआ था। 
    ऐसे तमाम पाखंडियों, बलात्कारियों, और भ्रष्ट चोगाधारियों के पास किसी आश्रम के नाम से या किसी ट्रस्ट के नाम से हजारों करोड़ की दौलत जुट जाती है, और उसकी ताकत से वे अपने आपमें एक संविधानेत्तर सत्ता बन जाते हैं। देश में हर बरस कहीं न कहीं ऐसा कोई धर्म-आध्यात्म से जुड़ा जुर्म सामने आता है। इसके लिए भारत के कानून में एक फेरबदल करने की जरूरत है। आज भी ऐसे बाबाओं और आश्रमों की दौलत किसी न किसी रजिस्टर्ड ट्रस्ट के नाम से रहती है। ट्रस्टों को लेकर राज्य सरकारों से लेकर केन्द्र सरकार के इंकम टैक्स तक के नियम बड़े कड़े रहते हैं, और राज्य सरकारें किसी भी ऐसे ट्रस्ट को भंग करके उस पर प्रशासक बिठा सकती हैं। एक ऐसे कानून को लाने की जरूरत है कि जब कभी किसी ट्रस्ट के मुखिया या किसी सम्प्रदाय के मुखिया को इस किस्म की सजा हो, और उसके आश्रम जुर्म का अड्डा बन जाएं, तो सरकार जनहित में ऐसे ट्रस्टों की सारी दौलत जब्त करके उसे जनता के काम में लेकर आए। क्योंकि यह दौलत जनता से ही आती है, फिर चाहे वह अंधविश्वास में डूबी हुई भक्त जनता ही क्यों न हो। 
    देश में जब बड़े-बड़े मंदिरों की सम्पत्ति पर सरकार प्रशासक बिठाती है, और वहां पर सरकारी ट्रस्ट बनाकर उनकी व्यवस्था करती है, तो ऐसे तमाम आश्रमों की सम्पत्ति को जब्त करने का कानून रहना चाहिए। जब लोकतंत्र में कुछ निजी लोगों का साम्राज्य इतना बड़ा हो जाता है कि वह कानून को आंख दिखाने लगता है, सड़कों पर हिंसा और उत्पात करने लगता है, जब वह राजद्रोह से परहेज नहीं करता, तब उस पर काबू के लिए अलग कानून की जरूरत है। ये तमाम ट्रस्ट सरकार से टैक्स रियायत पाने वाले रहते हैं, इनके लिए जमीनें भी कई जगह सरकारें रियायत पर देती हैं या मुफ्त भी देती हैं। ये तमाम कानूनों को तोड़ते हुए अवैध निर्माण करते हैं। इन सब बातों को देखते हुए सरकार के पास इनके अधिग्रहण का ऐसा अधिकार रहना चाहिए कि ऐसे सारे पाखंडी और मुजरिम साधु-संत अपने साम्राज्य को लेकर अतिआत्मविश्वास से भरे हुए न रहें। 
    हिन्दुस्तान में जनता की वैज्ञानिक समझ को सत्ता के लोगों ने सोच-समझकर कमजोर बनाए रखा है। ऐसे में जनता इन पाखंडियों को अपने पैसे भी देती है, और अपने घर की लड़कियां-महिलाएं भी दे देती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और चूंकि सामाजिक जागरूकता बहुत धीमी रफ्तार से आती है, इसलिए कानून बनाकर ऐसे तमाम मुजरिमों पर काबू करना चाहिए। देश में कानून में ऐसे फेरबदल की जरूरत भी है कि पाखंडी धर्मगुरूओं से परे भी अगर कोई दौलतमंद कोई जुर्म करते हैं, तो उन्हें भी कैद देने के साथ-साथ उनकी दौलत का एक हिस्सा सरकारी खजाने में ले लेना चाहिए। लोगों को लगने वाले जुर्माने की रकम तय नहीं करनी चाहिए, लोगों की आर्थिक क्षमता के मुताबिक उस अनुपात में उनसे जुर्माना लिया जाना चाहिए। एक मामूली हत्यारे को जितनी कैद होती है, एक खरबपति मनु शर्मा को भी महज उतनी ही कैद अगर होगी, तो वह इंसाफ नहीं होगा। ऐसे लोगों से उनकी संपत्ति का एक हिस्सा भी छीन लेना चाहिए। इंसाफ अंधा नहीं होना चाहिए, उसे मुजरिमों की दौलत को देखते हुए उसके एक हिस्से जितना जुर्माना लगाना चाहिए, और अगर वह दौलत कोई धार्मिक या सामाजिक ट्रस्ट है, तो वह पूरा ही ट्रस्ट सरकार को ले लेना चाहिए। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 25-Apr-2018
  • हजारों करोड़ की दौलत के मालिक, और करोड़ों अनुयायियों वाले आसाराम को अदालत ने एक नाबालिग छात्रा के साथ बलात्कार का मुजरिम करार दिया है, और इस फैसले का बड़ा इंतजार किया जा रहा था। यह छात्रा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के ही एक स्कूल के हॉस्टल में रहती थी, और इस मुकदमे की जानकारी के मुताबिक उसे देह शोषण की साजिश के तहत आसाराम के पास भेजा गया था। इस छात्रा का परिवार आसाराम का भक्त था। इसके बाद पिछले कुछ बरस से आसाराम जेल में ही बंद रहा क्योंकि जमानत की हर कोशिश हर अदालत से खारिज होती चली गई। इसकी वजह शायद यह थी कि आसाराम के खिलाफ इस मुकदमे में जितने गवाह थे उनकी एक-एक कर हत्या होती गई, या रहस्यमय मौत हो गई। नतीजा यह निकला कि जेल में रहते हुए आसाराम की मदद के लिए बाहर अगर कोई ऐसा कर रहे थे, तो जेल के बाहर रहने पर आसाराम और क्या नहीं करते, शायद इसीलिए आसाराम को जमानत नहीं मिल पाई। 
    इक्कीसवीं सदी के भारत को हिन्दू धर्म के सबसे बड़े जनाधार वाले लोगों में से आसाराम एक है, और वह आसाराम बापू नाम से मशहूर रहा, सत्ता से जुड़े हुए लोग उसके पैरों तले ऐसे बिछे रहते थे कि उन पैरों पर खड़े बदन के ऊपर का दिमाग बददिमाग हो जाना जायज ही है। लेकिन मामला अकेले आसाराम का नहीं था, आसाराम के बेटे नारायण सांई पर भी इसी किस्म के आरोप लगे, और गिरफ्तारी हुई। बाप-बेटे दोनों के बलात्कारी होने के मामले सामने आए, बाप के खिलाफ साबित हो गया, लेकिन इनके भक्तों का हाल यह है कि अभी कुछ दिन पहले तक वे देश भर में आसाराम की तस्वीरें लेकर रैली निकालते आए हैं, आसाराम के समर्थन में पर्चे बांटते आए हैं, और इसे पाकिस्तानी, मुस्लिम, और विदेशी साजिश करार देते आए हैं। 
    नाबालिग के साथ बलात्कार की सजा अभी आसाराम को सुनाई नहीं गई है, लेकिन वह शायद दस बरस से अधिक हो। वकीलों ने आसाराम की अधिक उम्र का हवाला देते हुए सजा कम करने की मांग की है, लेकिन दोषी करार देने के बाद किसी एक जैन धर्मगुरू की प्रतिक्रिया टीवी की खबरों पर आ रही थी कि बलात्कार के वक्त भी तो आसाराम की उम्र अधिक थी, उस वक्त तो अधिक उम्र की वजह से वह हरकत नहीं टली। इस जैन धर्मगुरू ने कहा कि यह सजा दूसरे साधु-संतों और ऐसे धर्मगुरूओं के लिए एक सबक भी रहेगी। अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे स्वघोषित धर्मगुरू बाबा गुरमीत राम रहीम इंसान को भी बलात्कार में सजा हुई है, और हर कुछ हफ्तों में देश में कोई न कोई ऐसा भगवा या दूसरे धर्म का रंग ओढ़ा हुआ इंसान बलात्कार में गिरफ्तार होते दिखता ही है। 
    धर्म और जुर्म, न सिर्फ उच्चारण में मिलते-जुलते हैं, बल्कि इनका मेल भी बहुत दिखता है। बहुत से लोगों के जुर्म के लिए धर्म एक किस्म की बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह काम आता है कि कानून की गोलियां उन तक पहुंच नहीं पातीं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विख्यात चंबल के इलाके का एक धर्मगुरू ऐसा है जिसके आश्रम से डकैतों और मुजरिमों को भाड़े पर हथियार मिलने की जानकारी आम हैं, लेकिन इस बात के लिए कुख्यात होने पर भी पुलिस और जजों के बीच खासा लोकप्रिय यह गुरू सार्वजनिक रूप से विख्यात ही बना हुआ है। धर्म का कुल मिजाज देखें, तो वह लोकतंत्र, कानून, इंसानियत कहे जाने वाले शब्द, इन सबके ठीक खिलाफ रहता है। धार्मिक रंग ओढ़े हुए लोगों के भक्तों ने जितने ताकतवर लोग जितनी संख्या में रहते हैं, उतनी ही बददिमागी उनमें आ जाती है, और उतने ही जुर्म वे करने लगते हैं। लोगों को यह बात ठीक से याद नहीं कि एक भक्त परिवार की नाबालिग छात्रा से आसाराम ने यह बलात्कार 56 महीने पहले 15 अगस्त 2013 को किया था, आजादी की सालगिरह पर। और गिरफ्तारी से लेकर अब तक उसके जुर्म के कई गवाह या तो मार डाले गए, या वे लापता हो गए। 
    लेकिन इस मौके पर देश के तमाम लोगों को सावधान भी हो जाना चाहिए कि वे किसी भी बाबा या संत-पाखंडी के पास अपने परिवार के लोगों, अपने बच्चों को भेजने के पहले सावधान हो जाएं कि वहां उन पर सेक्स-हमला भी हो सकता है, उनके दिमाग को किसी साजिश में फंसाया भी जा सकता है, और उन्हें एक किस्म के सम्मोहन में फांसकर स्थायी रूप से अपना भक्त बनाकर घर-परिवार से दूर भी किया जा सकता है। लोगों को धर्म और आध्यात्म से जुड़े पाखंडियों से दूर रहना चाहिए, और अपने परिवार को भी दूर रखना चाहिए। ईश्वर अगर कहीं है, तो वह ऐसा कारोबारी तो हो नहीं सकता कि वह अपने तक लोगों को लाने के लिए दलाल तैनात करे। आसाराम को मिली सजा से पहले ही उसकी गिरफ्तारी के वक्त से उसका बापू का स्वघोषित दर्जा खत्म हो गया था, और उसका बचाखुचा करिश्मा अब कमजोर पडऩा चाहिए। जिन लोगों को इस सजा के बाद भी आसाराम में भलाई दिखती है, उन्हें लेकर देश के कानून में यह इंतजाम रहना चाहिए कि उनके बच्चों की देखरेख सरकार भी करे, सरकार भी ऐसे गैरजिम्मेदार मां-बाप के बच्चों पर निगरानी रखे, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए। यह फैसला बहुत ही अच्छा फैसला है, और इतने ताकतवर एक बलात्कारी-पाखंडी की सारी लोकप्रियता के बावजूद जांच एजेंसियों से लेकर अदालत तक पर कोई असर न पडऩा एक बड़ी बात है। जिन पैरों पर मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री तक गिरे पड़े दिखते आए हैं, उन पैरों में बेडिय़ां लगना कानून की कामयाबी है। आसाराम के इस जुर्म के बाद उसकी दौलत के जब्त होने की संभावना भी कानून में ढूंढनी चाहिए, और ऐसा न होने पर सरकार को एक नया कानून बनाकर भी ऐसा करना चाहिए। और हजारों करोड़ की उसकी दौलत का इस्तेमाल लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 24-Apr-2018
  • इन दिनों इंटरनेट और क्रेडिट-डेबिट कार्ड रखने वाले लोगों को सौ-दो सौ रूपए के सामान भी खरीदने होते हैं, तो वे पहले ऑनलाईन परखते हैं। वहां से मिले रेट को जब लोकल बाजार से मिलाकर देखते हैं, तो बाजार महंगा लगता है। नतीजा यह है कि लोगों की ऑनलाईन खरीदी बढ़ते चली जा रही है। लेकिन अभी भारत के ऑनलाईन शॉपिंग वालों को लेकर हुए दो सर्वे बताते हैं कि लोगों को उनके मंगाए गए सामानों में से एक तिहाई सामान नकली मिले। यह अनुपात बड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि बड़ी-बड़ी शॉपिंग वेबसाइटें मॉल के खरे होने के बड़े-बड़े दावे भी करती हैं, और सामान वापिस करने की सहूलियत भी देती हैं। 
    आज भारत ही नहीं बाकी दुनिया में भी ऑनलाईन शॉपिंग लगातार इस तरह बढ़ गई है कि ब्रिटेन की आज की खबर बताती है कि वहां पर कार के ताले तोडऩे के औजार तक इंटरनेट पर बिक रहे हैं, और पुलिस इसे रोकने की कोशिश कर रही है जो कि हो नहीं पा रहा। इंटरनेट लोगों को बेचेहरा और बेनाम रहने की एक बड़ी सहूलियत देता है जिसके चलते लोग तरह-तरह की धोखाधड़ी भी करते हैं। अब सवाल यह है कि बाजार जाने की जहमत से बचने के लिए बहुत से लोग ऑनलाईन खरीदी कर रहे हैं क्योंकि शहरों में ट्रैफिक जाम रहता है, बाजारों में गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं रहती है, और बाजार के खुलने के घंटे सरकार के काबू में रहते हैं। दूसरी तरफ इंटरनेट पर खरीददारी चौबीसों घंटे की जा सकती है, और लोग बाथरूम में बैठे हुए भी फोन से दुनिया जहां की चीज खरीद डालते हैं। 
    कुछ बरस पहले जब हिन्दुस्तानी शहरों में बड़े-बड़े मॉल खुले, उनमें सुपर बाजार खुले, तो मोहल्लों की किराना दुकानों से लेकर बाजार के ब्रांडेड सामानों के शोरूम तक का धंधा कमजोर हो गया। मॉल्स में लोगों को एक साथ कई कंपनियों के सामान देखने और खरीदने मिल जाते हैं, और शहरी बाजारों की धूल-धुएं भरी धक्का-मुक्की के मुकाबले मॉल्स आरामदेह भी रहते हैं। अब भारतीय शहरों में मॉल्स आने के दस-बीस बरस के भीतर ही ऑनलाईन बाजार ने मॉल्स को पीटना शुरू कर दिया है। एक वक्त लोग जिस फास्टफूड को खाने के लिए बाजार या मॉल्स जाते थे, अब लोग उसे घर बैठे बुलाने लगे हैं। इससे कारोबार और रोजगार, इन दोनों में बड़ी रफ्तार से एक फर्क आया है, कई किस्म के रोजगार घटे हैं, वहीं घर तक सामान पहुंचाने वाले लाखों-करोड़ों रोजगार हिन्दुस्तान जैसे देश में पैदा भी हुए हैं। कुरियर कंपनियों के नौजवान ऑनलाईन खरीदी के सामानों से लेकर लोकल फास्टफूड तक पहुंचाते हुए दिखते हैं, और जहां दुकानों का धंधा मंदा हुआ है, यह एक नई नौकरी, नए किस्म का रोजगार बढ़ गया है। 
    इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि कारोबार हो या रोजगार, लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि नई टेक्नालॉजी, और बाजार के नए तरीके मिलकर जरा सी देर में किसी कारोबार को ठप्प कर सकते हैं, किसी रोजगार को बेकार कर सकते हैं। आने वाले वक्त में ड्रोन से घर-दफ्तर तक सामान पहुंचाना बढ़ते चले जाएगा, और वैसे वक्त आज के डिलीवरी ब्वॉय फिर कोई नया काम ढूंढने में लग जाएंगे। आज लोगों में इतने चौकन्नेपन की जरूरत है कि वे किसी काम के लिए, किसी कारोबार के लिए, अपने को तैयार करते हुए दस-बीस बरस का अंदाज लगाएं। टेक्नालॉजी बड़ी रफ्तार से रोजगार-कारोबार खत्म भी करती है, खड़े भी करती है। वक्त की लहर और उसके बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी है, आज, कल जिंदा रहने के लिए। 

    -सुनील कुमार

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Posted Date : 23-Apr-2018
  • अमरीका में एक रेस्त्रां में घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक गोरे नौजवान ने चार लोगों को मार डाला, और बहुत से लोगों को जख्मी कर दिया। यह नौजवान पहले से आत्मघाती मिजाज का था, और उसके परिवार ने एक बार पहले पुलिस को खबर भी की थी। पिछले बरस उसे राष्ट्रपति भवन के पास एक सुरक्षा घेरे को लांघने के जुर्म में गिरफ्तार भी किया गया था। लेकिन इसके बावजूद अमरीकी कानून के मुताबिक उसे कई तरह के हथियार रखने की छूट दी, और वह एक ऑटोमेटिक रायफल लेकर इतवार की सुबह रेस्त्रां में घुसा, और गोलीबारी की। अमरीका में हर नागरिक के पास कितने भी हथियार हो सकते हैं, और ये हथियार आत्मरक्षा के हथियार जैसे न होकर, हमला करने के हथियार भी रहते हैं, और हर कुछ दिनों में वहां गोलीबारी के बाद हथियारों पर काबू की मांग उठती है, लेकिन हथियार कंपनियां सरकार पर अपने दबाव के चलते ऐसा होने नहीं देती। अमरीका की कुख्यात गन-लॉबी बहुत सी पार्टियों, और बहुत से उम्मीदवारों को चुनाव में बहुत सा पैसा देती है, और उनके कारोबार पर रोक नहीं लग पाती। 
    लेकिन आज इस गन कंट्रोल की मांग पर लिखने का मकसद नहीं है, बल्कि इस हादसे में हीरो की तरह सामने आए एक नौजवान पर लिखना है जिसने इस बंदूकबाज पर कब्जा किया, और बाकी बहुत सी जिंदगियों को बचाया। एक अश्वेत नौजवान उस वक्त जिस रेस्त्रां में ही था, और वह ठीक हमलावर की तरह 29 बरस का ही था। उसने मौका मिलते ही इस बंदूकबाज को दबोचा, उसका हथियार छीना, और उससे वहां मौजूद बाकी लोगों की जिंदगियां बचीं। लेकिन जब अमरीकी मीडिया और वहां मौजूद लोग जख्मी हो गए इस अश्वेत नौजवान को एक हीरो की तरह मानकर उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं, तो उसने कहा कि- सब लोग जो कह रहे हैं उसे मान लेना बहुत स्वार्थी बात होगी, मैंने जो कुछ किया वह अपने आपको बचाने की कोशिश थी, मेरे सामने एक मौका आया और मैंने हथियार छीनने की कार्रवाई की। 
    अब एक नौजवान को खबरों में हीरो बनने का यह मौका बिना मांगे मिला, पुलिस से लेकर प्रेस, और पब्लिक तक लोगों ने उसे हीरो माना, और वह अपने मन की बात को उजागर करके इस तारीफ के हक को नकार रहा है। यह विनम्रता आसान नहीं है। आज दुनिया में लोग किसी तरह का सम्मान या पुरस्कार पाने के लिए सौ किस्म के झूठ गढ़ते हैं, इतिहास को बदल डालते हैं, और सम्मान को एक किस्म से खरीद लेते हैं। हमने अपने आसपास ही ऐसे पुलिस वाले देखे हैं जो कि बहादुरी के किस्से गढऩे के लिए झूठी मुठभेड़ को असली बताकर प्रदेश की राजधानी से लेकर देश की राजधानी तक जलसों में मैडल पाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी रहते हैं जो अपने गुजर चुके मां-बाप को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने के लिए कई तरह के किस्से गढ़ लेते हैं, और गवाह भी जुटा लेते हैं। ऐसे में अगर अमरीका में किसी अश्वेत नौजवान के सामने बहादुर कहे जाने का मौका खुद चलकर आया, और उसे वह बहादुरी नहीं, महज आत्मरक्षा कह रहा है, तो यह ईमानदारी और विनम्रता सोचने-समझने लायक बातें हैं। 
    दुनिया में अधिकतर लोग ऐसे मौकों पर चुप रहकर तारीफ को ले लेते, और उनके अपने दिल-दिमाग पर यह बोझ भी नहीं रहता कि उन्होंने कुछ झूठ कहा, कुछ गलत कहकर यह सम्मान हासिल किया। लेकिन अपने खुद के तात्कालिक हितों के खिलाफ जाकर सिर्फ खुद को मालूम सच को इस तरह सामने रखने के लिए इंसान में एक महानता की जरूरत होती है। चाहे इस नौजवान ने महज अपने आपको बचाने के लिए हमलावर का हथियार छीना हो, लेकिन उसने इस तारीफ को जिस विनम्रता से नकारा है, उस विनम्रता के लिए तो वह सम्मान का अधिकारी है ही। यह बात बहुत छोटी सी है, लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि ऐसे कितने मौके उनके सामने आ सकते हैं, जब वे ऐसी ही सच्चाई और ईमानदारी से घर पहुंची शोहरत और तारीफ को विनम्रता से लौटा सकें कि वे उसके हकदार नहीं हैं। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • देश में संसद ठप्प पड़ी है, सरकार पर संसद से परे और तो कोई काबू रहता नहीं है सिवाय न्यायपालिका के। लेकिन इन दिनों न्यायपालिका को लेकर जिस तरह से जनता का विश्वास हिल गया है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक नौबत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आधा दर्जन राजनीतिक दलों के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी एक महाभियोग लेकर आ रही है, उसने राज्यसभा के सभापति को इसका प्रस्ताव दिया है, और इसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी के साथ खासी खींचतान के आसार दिख रहे हैं। लेकिन इस बीच एक दूसरी बात यह हुई है कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने मुख्य न्यायाधीश के तौर-तरीकों और विवेक के उनके फैसलों पर सवाल उठाते हुए उन्हें अदालत की साख कम करने वाला ठहराया। और इसी तरह की सोच रखने वाले कुछ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के अधिकारों को चुनौती देते हुए एक याचिका लगाई जो कि खारिज कर दी गई। इसी दौर में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह कहा कि मुख्य न्यायाधीश अपने आपमें एक संस्था होते हैं, और उस पर शक या सवाल नहीं उठाए जा सकते।
    इसी न उठाए जा सकने को लेकर आज हम यहां पर लिखना चाहते हैं कि लोकतंत्र में किसी को भी सार्वजनिक ओहदे पर रहते हुए जवाबदेही से परे क्यों होना चाहिए? राष्ट्रपति हो, या प्रधानमंत्री, या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज, जहां तक उनके कामकाज को लेकर सवाल पूछे जाते हैं, उन पर संदेह खड़ा होता है, तो उन्हें पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सामने रखकर एक जवाब देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने जजों की सम्पत्ति की जानकारी सूचना के अधिकार में देने से मना कर चुका है, और सरकारी कर्मचारियों से सरकार को जितने किस्म की जानकारियां मिलती है, उस तरह की जानकारी देने से भी जज मना करते रहे हैं। जजों ने अपनी एक अलग दुनिया बना रखी है जिसमें अपने लिए सम्मान जुटाते हुए वे बहुत किस्म के पाखंडी काम करते हैं। पिछले दिनों हमने इसी जगह लिखा भी था कि जब सरकारी विज्ञापनों से मुख्यमंत्री तक की तस्वीरों को बाहर कर दिया गया था, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर विज्ञापनों में देने की छूट दी थी। 
    अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अखबारों के इश्तहार में अपनी तस्वीर क्यों देनी चाहिए? जब जनता के पैसों की बर्बादी मानते हुए विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों तक की तस्वीरें रोक दी थीं, तब भी मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर को छूट दी गई थी। जजों के बाकी अंदाज अगर देखें, तो सफर के दौरान, सार्वजनिक जगहों पर, दूसरे शहरों में ठहरने पर उनके इंतजाम करने वाले लोग एक किस्म से दहशत में आए हुए दिखते हैं, और सड़कों को भी बड़े जजों के लिए आम जनता के ट्रैफिक से खाली कराया जाता है। 
    हम मुख्य न्यायाधीश को लेकर उठे बाकी सवालों के न्यायोचित होने या न होने पर कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन हम इस बात के खिलाफ हैं कि मुख्य न्यायाधीश को एक संस्था मान लिया जाए, और उस संस्था को सवालों से परे कर दिया जाए। लोकतंत्र में जिस किसी को सवालों से परे किया जाता है, वहां पर भ्रष्टाचार पनपने का खतरा खड़ा हो जाता है। जो अदालत देश में तमाम लोगों को जानकारी देने के लिए बेबस कर सकती है, वह अदालत अपने खुद के मामलों में लुकाछिपी करते अच्छी नहीं लगती। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को उन पर लग रहे तमाम आरोपों को देखते हुए अपने आपको कुछ किस्म के मामलों से अलग कर लेना चाहिए। ऐसा तो देश में कई बार होता है कि किसी एक जज के फैसले कुछ पार्टियों को पसंद न आएं, लेकिन हर वक्त हर जज को हटाने की बात नहीं होती है। आज के मुख्य न्यायाधीश को लेकर पहले से भी कुछ अप्रिय विवाद चलते आए हैं, और अब तो उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव आया है। ऐसे में उनको सावधानी से अपने आपको विवादास्पद मामलों से अलग रखना चाहिए जिनको लेकर उन पर और अधिक तोहमतें लग सकती हैं। 

    -- सुनील कुमार

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Posted Date : 21-Apr-2018
  • पिछले महीनों में एक-एक करके कई राज्यों में यह तय किया है कि बारह बरस या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने पर, या किसी भी उम्र की महिला से सामूहिक बलात्कार करने पर मौत की सजा दी जा सके। इसके लिए वहां की सरकारें विधानसभा में कानून का प्रस्ताव ला चुकी हैं, या ला रही हैं। इसके साथ-साथ महिलाओं के साथ बाकी किस्म के अपराधों पर भी कड़ी सजा का इंतजाम किया जा रहा है। जब इस प्रस्तावित सजा पर चर्चा हो रही थी, कुछ लोगों ने यह राय रखी थी कि इस सजा का एक खतरा यह रहेगा कि लोग बलात्कार के बाद बलात्कार की शिकार को मार ही डालेंगे क्योंकि सजा तो हत्या जितनी ही बलात्कार की भी मिलेगी, ऐसे में सुबूत या गवाह को क्यों छोड़ा जाए?
    हम इसके पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि भारत को एक सभ्य लोकतंत्र के रूप में मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। दुनिया के बेहतर देशों में एक-एक करके इसे खत्म किया जा रहा है, खासकर उन देशों में जहां पर लोकतंत्र के बारीक पहलुओं को महत्व दिया जाता है। अमरीका में भी कई राज्यों में यह सजा खत्म हो चुकी है, और तकरीबन हर राज्य में इसका बड़ा विरोध होता है। इस आधार पर भी भारत में अधिक किस्म के अपराधों पर मौत की सजा का विस्तार करना एक गलत सिलसिला है। दूसरी बात यह है कि अधिक कड़ी सजा से किसी अपराध में कमी आती हो ऐसा जुर्म के इतिहास के इतिहास में कहीं स्थापित नहीं है। बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाए, या नहीं, इसका फैसला करते हुए सरकारों के सामने जब सड़कों और चौराहों पर भीड़ चीखती होती है, तब वोटों से चुनी गई सरकारें आमतौर पर कड़वे फैसले नहीं ले पातीं। लेकिन हमारा मानना है कि कानून का फेरबदल भीड़ के सिरों को गिनकर नहीं होना चाहिए, बल्कि इस नजरिए से होना चाहिए कि उसके असर से जुर्म कम हों। जो लोग बलात्कार के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि आज तो बलात्कारी पांच-सात बरसों में छूटकर बाहर आ जाते हैं। कल जब उनको पता होगा कि बलात्कार की सजा भी फांसी होगी, तो सुबूत खत्म करने के लिए उनके पास सबसे आसान तरीका होगा, बलात्कार की शिकार का कत्ल कर देना। न सुबूत, न गवाह, और न फांसी। इसलिए कानून में फांसी जोड़ देने से बलात्कार तो कम नहीं होंगे, सजा मिलना तो नहीं बढ़ेगा, कत्ल और बढ़ जाएंगे।
    दरअसल जो सरकारें मौजूदा कानून को कड़ाई से लागू नहीं कर पाती हैं, वे अपनी नालायकी, और अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिए कानून को और कड़ा करके यह जाहिर करती हैं कि वे सचमुच कुछ कर रही हैं। जबकि भारत के किसी भी राज्य में अगर सरकारें लड़कियों और महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा दे पातीं, उनको बलात्कारियों से, छेडख़ानी करने वालों से बचा पातीं, तो फांसी की इस नई सजा का इंतजाम करने की नौबत भी नहीं आती। मध्यप्रदेश में सरकार बच्चियों से बलात्कार पर फांसी का विधेयक लाकर विधानसभा में पास करवा चुकी है। लेकिन आज भी इस राज्य में देश के बाकी राज्यों के मुकाबले बलात्कार का अनुपात बहुत अधिक है। मध्यप्रदेश में दलितों पर अत्याचार भी बहुत अधिक है, और जहां-जहां दलित आदिवासी पर जुल्म अधिक होते हैं, वहां-वहां उनकी महिलाओं पर ऐसे जुल्म और जुर्म अनुपात से अधिक होते ही हैं। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को कानून को कड़ा करने के बजाय मुजरिमों पर रोकथाम को कड़ा करने की जरूरत है। रसोई में अगर खाना जल गया है, तो गैस सिलेंडर को खुले में ले जाकर जला देना किसी बात का समाधान नहीं हो सकता। मध्यप्रदेश की राजधानी में ही कुछ महीने पहले पुलिस मां-बाप की बेटी सामूहिक बलात्कार के बाद 20 घंटे से अधिक भटकती रहे, थाने में रपट दर्ज कराने, और उसके बाद सरकारी डॉक्टर एक फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाए कि उस लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, उसने अपनी सहमति और मर्जी से सेक्स किया है। जिस प्रदेश में सरकार में बैठे लोगों का महिलाओं के साथ यह रूख है, वहां पर मध्यप्रदेश सरकार मुजरिमों से यह उम्मीद करती है कि वे अधिक कड़ी सजा से डर-सहम जाएंगे।
    समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को  राष्ट्रपति  माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा?
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 20-Apr-2018
  • पिछले कुछ महीनों से लगातार बुरी बातों की वजह से खबरों में बने रहने वाले एक वक्त के मशहूर और लोकप्रिय कॉमेडियन कपिल शर्मा के बारे में जब-जब ऐसा लगा कि उनके बारे में सबसे बुरी खबर आ चुकी है, और अब वे वापिस सुधार के रास्ते पर दिखेंगे, तब-तब उन्होंने और घटिया हरकत करके अपने प्रशंसकों को निराश किया है, और बाकी लोगों के सामने भी एक मिसाल रखी है कि किस तरह कामयाबी और शोहरत लोगों के सिर पर चढ़कर नंगा नाचने लगती हैं, और लोग समझदारी छोड़कर आत्मघाती गलतियां करने लगते हैं। 
    आज जब फोन और टेक्नालॉजी के नमूने के रूप में रोजाना ही किसी न किसी की बातचीत की रिकॉर्डिंग मीडिया में छाई रहती है, तब कपिल शर्मा ने किसी पत्रकार से गंदी बातें कहने और धमकाने का एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। उन्होंने जो गालियां दीं, उन्हें न छापा जा सकता, और न ही टीवी पर सुनाया ही जा सकता। उनकी जुबान से निकले शब्द बीच-बीच में दूसरे निशान लगा-लगाकर ही कहीं पोस्ट किए गए हैं, और कहीं छापे गए हैं। एक पूरी तरह से नाकामयाब हो चुका कॉमेडियन इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि उस पर हम यहां लिखें, लेकिन इस मिसाल पर लिखना जरूरी लग रहा है कि कामयाबी और शोहरत की ताकत के बीच अपने दिमाग को काबू में रखना कितना जरूरी होता है। जो ऐसा नहीं कर पाते, उनका बेकाबू दिमाग उन्हें कहां ले जाकर पटकता है, यह देखना हो तो कपिल शर्मा सामने है जो अपने टीवी शो की रिकॉर्डिंग करने की हालत में भी नहीं बचे हैं। 
    शोहरत और कामयाबी का नशा शराब जैसे नशे के मुकाबले भी अधिक खतरनाक होता है, और राजनीति से लेकर कारोबार तक बहुत सी जगहों पर आसमान पर पहुंचे लोग इस नशे में जमीन पर आ गिरते हैं। इसीलिए बुजुर्गों ने दिमाग को काबू में रखने के लिए अनगिनत कहावतें और मुहावरे गढ़े हैं, और सयाने लोग आसपास के लोगों को ऐसी मुफ्त नसीहत भी बांटते रहते हैं। ऐसी नौबत से बचने के लिए लोगों को अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों को रखना चाहिए जिनके लिए कहा गया था कि निंदक नियरे राखिए। दिक्कत यह है कि कामयाबी और ताकत में आसपास चापलूसों की भीड़ खींच लेने की अद्भुत ताकत होती है। लोग अपने मुसाहिबों के मुंह से अपनी तारीफ सुन-सुनकर अपने को खुदा मान बैठते हैं, और ऐसे लोगों के लिए किसी ने एक वक्त लिखा था कि तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्त नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था।
    मनोरंजन की दुनिया से दूर, खासकर सत्ता की राजनीति में ऐसी बददिमागी बहुत अधिक दिखती है जब ताकतवर नेता पेशाब करने को जाते हुए भी सायरन बजाते हुए जाने की जिद पर अड़े रहते हैं। उन तमाम लोगों को चापलूसी से परे यह भी देख लेना चाहिए कि उनके पहले के नेताओं का क्या हाल हुआ है। हो सकता है कि उन्होंने एक वक्त लालू-कुनबे जैसी कमाई कर ली हो, लेकिन उनको आज लालू-कुनबे जैसी सजा और कोर्ट-कचहरी भी देखना पड़ रहा है। कपिल शर्मा की मिसाल सिर्फ मनोरंजन के कारोबार की मिसाल नहीं है, यह इंसान की बददिमागी की मिसाल है, और उसे देखकर लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि इंसान को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 19-Apr-2018
  • न चाहते हुए भी आज फिर बलात्कार के मुद्दे पर लिखना पड़ रहा है। क्योंकि चारों तरफ से हिन्दुस्तानी इंसानों की इसी एक हरकत की खबर सबसे अधिक विचलित कर रही है। थोड़ी बहुत भावनाएं रखने वाले लोग यह कहते मिल जाएंगे कि ऐसी खबरों को छापना ही नहीं चाहिए क्योंकि इन्हें पढ़कर लोगों को ऐसे कामों के लिए बढ़ावा मिलता है। लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी किस्म के जुर्म की खबर को छुपाकर वैसे जुर्म को कम नहीं किया जा सकता। और भारत को लेकर दुनिया के बहुत से देशों की सरकारें अपने नागरिकों को ऐसा मशविरा जारी कर चुकी हैं कि भारत में जाने वाले पर्यटकों को सेक्स-अपराधों से सावधान रहना चाहिए। अभी जम्मू-कश्मीर में एक बच्ची के साथ जिस तरह गैंगरेप हुआ और जिस तरह उसकी हत्या हुई, और जिस तरह हत्यारों को बचाने के लिए राष्ट्रीय झंडा लेकर लोग सड़कों पर आए, मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया, वकीलों ने जांच एजेंसी को अदालत में चार्जशीट दायर करने जाने से रोका, उसे देखकर दुनिया के कई देशों में लोग टी-शर्ट पर इस बलात्कार की बात लिखकर महिलाओं को भारत जाने से रोक रहे हैं। इस मुद्दे पर लिखने का एक और समाचार अभी-अभी आया है कि एक बारात में गए दूल्हे के दोस्त ने दूल्हे की बहन से बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी और लाश फेंक दी। आज उत्तर भारत की एक खबर आई है जिसमें एक बाप ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ही बेटी से बलात्कार किया है। अब इसके बाद क्या बचता है, कौन किस पर भरोसा कर सकते हैं?
    किसी देश में बलात्कार करने वालों को कैसे रोका जाए इस पर कुछ चर्चा की जा सकती है, फिर चाहे वह सही नतीजे पर पहुंचे, या महज जुबानी जमा-खर्च होकर खत्म हो जाए। दुनिया के जिन देशों में पोर्नोग्राफी रोक नहीं है, सेक्स-खिलौनों पर रोक नहीं है, वेश्यावृत्ति पर रोक नहीं है, वहां पर सेक्स-अपराध कम हैं। इनके कम होने के पीछे और भी सामाजिक वजहें हो सकती हैं, लेकिन कम से कम एक वजह यह होनी चाहिए कि जिन लोगों को सेक्स की जरूरत है, उन्हें सेक्स उपलब्ध है। महज देखने के लिए, महज देह सुख के लिए, या फिर सेक्स के लिए। ऐसे देशों में बलात्कार कम होते हैं, और कई देशों के आंकड़े ऐसा बताते हैं। भारत एक कुंठित समाज होकर रह गया है, जहां लड़के-लड़कियों को मिलने से भी रोकने की कोशिश होती है, फैशन पर रोक लगती है, वयस्क मनोरंजन की कोई संभावना नहीं है, पोर्नोग्राफी या सेक्स-खिलौनों पर जुर्म दर्ज हो जाता है, और धड़ल्ले से चलने वाली वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा हासिल नहीं है। 
    इन तमाम बातों से लोगों की सेक्स की जरूरत पूरी होने की गुंजाइश बहुत बुरी घट जाती है, नतीजा यह होता है कि वे अपनी उत्तेजना के मौकों पर कोई गलत काम कर बैठते हैं। हिन्दुस्तान में सदियों पहले नगरवधुओं की परंपरा थी, वेश्यावृत्ति कोई जुर्म नहीं था, लेकिन बाद में जो सामाजिक पाखंड बढ़ा, उसके चलते इस बात को गैरकानूनी करार दे दिया गया। उससे यह धंधा बंद नहीं हुआ, बल्कि नेता, अफसर, पुलिस, और मवालियों के कारोबार की एक नई संभावना निकल आई जो कि वेश्या की कमाई में अपना हिस्सा वसूलते हैं, और इस धंधे को सुरक्षा देते हैं। आज भारत में हालत इतनी खराब है कि हर बरस दसियों हजार नाबालिग बच्चियों को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है, और देश के महानगरों में जहां पर सरकार बसती है, वहां पर बड़े-बड़े चकलाघर धड़ल्ले से चलते हैं, पूरे-पूरे इलाके इसी काम के लिए बदनाम है, और सरकार इसकी अनदेखी करके मानो यह साबित करने की कोशिश करती है कि इस देश में यह धंधा नहीं होता। 
    एक व्यवहारिक नजरिया अपनाने के बजाय देश की सरकार लोगों पर नाजायज काबू करने में लगी रहती है, और इसकी आदी हो चुकी है। आज जवान लड़के-लड़कियों को उनकी जरूरत के लिए होटल में कमरा नहीं मिलता, और गैर शादीशुदा लड़के-लड़कियों के साथ रहने पर वेश्यावृत्ति का जुर्म कायम हो जाता है। यह पूरा ढकोसला खत्म होना चाहिए और समाज को अपने इंसानों की हकीकत को समझना चाहिए। ऐसा होने पर बलात्कार खत्म चाहे न हों, उनकी गिनती बहुत कम हो जाएगी। और सरकार लोगों की वयस्क जरूरतों पर हर तरफ से रोक लगाकर बलात्कारों को बढ़ाने का काम ही करती है। इस जुर्म के और भी बहुत से पहलू हैं, और यही अकेली बात इसे तय नहीं करतीं, लेकिन वयस्क जरूरतों को मान्यता देना एक बड़ा मुद्दा जरूर है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 18-Apr-2018
  • तमिलनाडू में राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई क्योंकि वहां के एक कॉलेज में एक प्राध्यापिका पर यह आरोप लगा था कि उसने छात्राओं को फोन पर यह सुझाया कि उन्हें अगर बहुत अच्छे नंबर पाने हैं, और कुछ पैसे भी कमाने हैं, तो उन्हें शिक्षा विभाग के कुछ अफसरों को खुश रखना चाहिए। चूंकि राज्यपाल उच्च शिक्षा के प्रमुख भी होते हैं इसलिए उन्होंने इस बारे में सफाई देने के लिए मीडिया को बुलाया था। लेकिन जब एक महिला पत्रकार ने उनसे कई सवाल किए, तो उन्होंने उठते-उठते उस महिला का गाल छुआ, मानो वे तारीफ कर रहे हों या हौसला बढ़ा रहे हों, और वे चले गए। लेकिन इस पर वह महिला पत्रकार बहुत ही विचलित हुई, और उसने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि उसने जाकर कई बार अपने गाल धोए, लेकिन फिर भी वह सामान्य हालत में नहीं आ पाई है। यह पूरा मामला मीडिया में सार्वजनिक होने के बाद और चारों तरफ निंदा होने के बाद राज्यपाल ने चि_ी लिखकर उस पत्रकार से माफी मांगी है और यह जिक्र किया है कि वे खुद 40 बरस पत्रकारिता से जुड़े रहे, और उन्होंने यह मानते हुए तारीफ में उसका गाल छुआ था कि वह उनकी नातिन जैसी है। लेकिन उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए माफी की चि_ी भी भेजी है। 
    यहां पर हम श्री पुरोहित की सोच पर नहीं जाते, जो कि हमारा मानना है कि सही रही होगी, हम उनके बर्ताव पर जाते हैं जो कि आज के माहौल में बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। आज पूरा देश महिलाओं के साथ बदसलूकी, बच्चियों के साथ बदसलूकी की खबरों से इतना भरा हुआ है, हवा में इतनी उत्तेजना और हिंसा भरी हुई नफरत है कि ऐसे में किसी को भी आचरण की कोई छूट नहीं लेनी चाहिए। एक वक्त था जब लोग अपने बच्चों को पड़ोस के परिवार में छोड़कर भी कई दिनों के लिए बाहर चले जाते थे, लेकिन आज का माहौल ऐसा है कि लोग अपने घर में, रिश्तेदारों के बीच में बच्चों को अकेले छोडऩे के पहले कई बार सोचते हैं। किसी भी तरह का व्यवहार या आचरण, भाषा या भाव, ये सब जगह और समय के मुताबिक चलते हैं। कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी सार्वजनिक नेता का मीडिया की किसी महिला का गाल छूना सामान्य बात हो, लेकिन भारत में इन दिनों माहौल ऐसा नहीं है, और लोगों को इससे बचना चाहिए। 
    दरअसल सार्वजनिक जीवन में जो लोग ऐसे ओहदों पर बैठे हों, जिनसे बहुत से लोगों का मिलना-जुलना होता है, उन्हें अपना दफ्तर भी ऐसा पारदर्शी रखना चाहिए जिससे कि उन पर कोई तोहमत न लग सके। आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में कई जगहों पर पुरूष डॉक्टर भी किसी महिला मरीज को देखते समय अपने साथ किसी नर्स को मौजूद रखते हैं, ताकि बाद में किसी विवाद की नौबत न आए। सभी लोगों को ऐसी सावधानी अपने हित में, और दूसरों के हित में भी रखनी चाहिए ताकि न तो तोहमत लग सके, और न ही खतरा हो सके। हालांकि बनवारी लाल पुरोहित ने एक भरी हुई प्रेस कांफ्रेंस के बीच, कैमरों के सामने महिला पत्रकार का गाल छुआ, लेकिन उन्हें भी ऐसा स्नेह दिखाने से बचना चाहिए था। ऐसे मामलों में एक पुरूष के मन की भावना पर एक महिला के मन की आपत्ति अधिक भारी पड़ती है, और भारत में जो लोग सार्वजनिक खबरों को देखते-सुनते हैं, उन्हें इस बात की अच्छी खासी समझ रहनी भी चाहिए। 
    लेकिन इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि सार्वजनिक जीवन के तमाम लोगों को मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ एक सुरक्षित फासला बनाकर रखना चाहिए, क्योंकि दो लोगों की अलग-अलग सोच, उनकी सांस्कृतिक समझ एक नहीं हो सकती, और न ही दो लोगों की भावनाएं एक सरीखी हो सकतीं।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 17-Apr-2018
  • देश के बहुत बड़े हिस्से में एटीएम खाली पड़े हैं। लोग दर्जन-दर्जन भर जगहों पर धक्के खा रहे हैं, और अब तो बैंकों ने एटीएम पर यह नोटिस लगाने की जहमत भी उठाना बंद कर दिया है कि कैश नहीं है। कुछ ही दिन पहले हमने रिपोर्ट छापी थी कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कैश मशीनें बैंक एटीएम से ही निकले हुए नए और असली नोटों को भी नहीं ले रही हैं, और 40 हजार रूपए जमा करने के लिए एसबीआई की आधा दर्जन मशीनों तक जाकर 21 बार कोशिश करनी पड़ी, तब उतनी रकम जमा हो पाई। आज पूरे देश में नोटबंदी के दिनों जैसी हड़कंप है, और लोगों के खाते में पैसा है लेकिन एटीएम खाली है। दूसरी तरफ वित्तमंत्री का कहना है कि देश में पर्याप्त से अधिक नोट चलन में हैं, और कुछ जगहों पर अधिक रकम निकालने से एटीएम खाली हुए हैं जो कि अगले कुछ दिनों में सामान्य हो जाएंगे। 
    यह नौबत दो वजहों से खराब है। एक तो इससे सरकार की और बैंकों की साख चौपट हो रही है जो कि तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी में बैंकों की भागीदारी साबित होने पर वैसे भी मिट्टी में मिली हुई है। दूसरी बात यह कि नोटबंदी के भयानक दिनों को जनता अब तक भूली नहीं है, और एक बार फिर उसे डर लग रहा है कि कहीं यह दो हजार रूपए वाले नोटों को बंद करने की तैयारी तो नहीं है। जब लोग मेहनत से की गई अपनी बचत को अपनी जरूरत के समय न निकाल सकें, तो सरकार और बैंकों के ये तमाम आंकड़े फिजूल हैं कि देश में कितने नोट चलन में हैं। हम पिछले कई दिनों से इस बारे में लिख रहे थे कि मशीनें काम नहीं करती हैं, जहां काम करती हैं वहां नोट नहीं रहते। और यह नौबत अब बढ़ते-बढ़ते देश के बहुत से प्रदेशों में आ गई है। 
    गैस सिलेंडरों से लेकर एटीएम तक, और बैंकों तक जब आम जनता की लंबी-लंबी कतारें लगती हैं, तो ऐसा लगता है कि सरकार की नजर में आम जनता के वक्त और उसकी उत्पादकता की कोई कीमत नहीं है। जब किसी को कुछ हजार रूपए निकालने के लिए आधा दर्जन एटीएम तक धक्का खाना पड़ता है, तो छोटे लोगों का बड़ा वक्त बर्बाद होता है। बड़े लोगों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता, और वे तो अपने क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर लेते हैं, या पूरे के पूरे बैंक को अपने क्रेडिट कार्ड की तरह इस्तेमाल करके दूसरे देश जा बसते हैं। लेकिन गरीब जनता को घर में नोट रखने में भी डर है कि कब कौन सा नोट बंद हो जाए, दूसरी तरफ बैंकों में रखने में भी डर है कि वक्त -जरूरत निकल पाए या नहीं। पिछले कुछ महीनों से यह बात भी चर्चा में है कि मोदी सरकार संसद में एक ऐसा कानून लाने जा रही है जिसमें किसी बैंक के डूबने की नौबत आने पर बैंक उसमें लोगों की जमा रकम का इस्तेमाल करके अपने आपको बचा सकेगा। यह बात महज अफवाह नहीं थी, और संसद में लाए जा रहे विधेयक में इस तरह की बात थी, जिसे सरकार को हटाना पड़ा। फिर हर बार एटीएम इस्तेमाल करने पर कुछ बार के बाद बैंक एक चार्ज वसूलने लगती है, और वह भी गरीबों पर बड़ा भारी पड़ता है। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि बैंकों की शक्ल में मुगल-ए-आजम अनारकली से कह रहे हैं कि सलीम तूझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे। 
    देश की जनता में आत्मविश्वास का इतना टूटना लोकतंत्र के लिए घातक और खतरनाक है। दूसरी तरफ सरकार की साख का इतने बड़े पैमाने पर चौपट होना सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के राजनीतिक-चुनावी हितों के खिलाफ भी है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 16-Apr-2018
  • हिन्दुस्तानी बाजार की खबर है कि देश की दो प्रमुख संचार कंपनियां, आइडिया और वोडाफोन का विलय होने जा रहा है, और इसके साथ ही दोनों कंपनियों के कुल 21 हजार कर्मचारियों में से 5 हजार की छंटनी होने का खतरा खड़ा हो गया है। आंकड़ों को देखें तो इन दोनों कंपनियों के एक चौथाई लोग शायद निकाले जा रहे हैं। जब कभी बैंकों का विलय होता है, या कंपनियों का, या कोई बड़ा अखबार दूसरे अखबारों को खरीदता है, तो बहुत से लोगों की नौकरियां जाती हैं क्योंकि मिले हुए बड़े ढांचे में कम लोगों की ही जरूरत रहती है। यह कुछ उसी किस्म का है जिस तरह कि किसी शहर में जब कोई बड़ा सुपर बाजार खुलता है तो हर मोहल्ले में बिखरे हुए किराना कारोबार चौपट होते हैं, उनके नौकर तो रोजगार खोते ही हैं, बहुत से मामलों में दुकानदार भी बेकार हो जाते हैं। यह कुछ उसी किस्म का है कि जिस तरह किसी शहर में जब सड़कें चौड़ी होती हैं, तो इस विकास के साथ-साथ किनारे पर कारोबार करते ठेले और गुमटियां बेदखल किए जाते हैं। दिक्कत यह है कि यह फेरबदल और उठापटक कुछ अधिक ही रफ्तार से हो रहा है, और यह रफ्तार बढ़ती जानी है। 
    भारत में जिस तरह से खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी को छूट दी गई है, जिस तरह भारत के बहुत से उद्योगों में विदेशी पूंजी की छूट बढ़ रही है, उसके चलते कर्मचारियों की जरूरत कम रहेगी, और गिने-चुने कारोबार अधिक धंधा करेंगे, अपने-अपने दायरे के छोटे दुकानदारों को बेदखल और बेकार भी करेंगे। उदार अर्थव्यवस्था के ये खतरे पश्चिम के देश एक सदी पहले से देख और झेल रहे हैं, लेकिन भारत में हाल के बरसों में यह फेरबदल बड़ी रफ्तार से आया है, और लोग शायद उसके लिए तैयार भी नहीं हैं। भारत में रोजगार के बाजार की हालत गड़बड़ है। हम आंकड़ों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन निजी क्षेत्र में कारखानों से लेकर कारोबार तक, और कई किस्म की सर्विस उपलब्ध कराने वाले धंधों तक से छंटनी हो रही है। नोटबंदी के बाद से यह सिलसिला बढ़ा, और जीएसटी आने के बाद यह और तेज हुआ। जब कारोबारी की खुद की हालत ठीक नहीं रहे, तो वह अपने कर्मचारियों और कामगारों की छंटनी से ही फिजूलखर्ची घटाने की शुरूआत करता है। 
    भारत में सरकार को आंकड़ों से परे बड़ी कल्पनाशीलता के साथ यह सोचने-समझने की जरूरत है कि देश के बाहर के कारोबार में भारत के कामगारों को कैसे काम दिलवाया जा सकता है। और यह बात आसान भी नहीं है क्योंकि अमरीका अपनी ताजा नीतियों को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके भारत के कामगारों से लेकर भारत के कारोबार तक पर हमला कर रहा है। ऐसे में भारत की योजनाशास्त्रियों को दुनिया में काम के नए मौकों की तलाश करनी होगी, नए देशों को ढूंढना होगा, नए पेशों को छांटना होगा, और उनके मुताबिक हिन्दुस्तानी हुनर तैयार करना पड़ेगा। आज भारत में शिक्षण-प्रशिक्षण की हालत आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थान में तो बहुत अच्छी है जिसकी कि बाकी दुनिया में बड़ी कद्र है, बड़ी मांग है। लेकिन छोटे-छोटे हुनर सिखाने वाले संस्थान फर्जी अधिक हैं, ईमानदार कम हैं। आज दुनिया के कई देशों में आबादी का बड़ा अनुपात बुजुर्ग हो चला है। उन्हें कई किस्म की ऐसी सेवाएं चाहिए जो कि मशीनों से नहीं मिल सकती। ऐसी निजी घरेलू सेवा देने की क्षमता अगर हिन्दुस्तानी नौजवान पीढ़ी में विकसित की जाएगी, और उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर की उत्कृष्टता सुनिश्चित की जाएगी, उसके साथ-साथ अलग-अलग देशों की भाषाओं की कुछ बुनियादी तालीम दी जाएगी, तो हो सकता है कि भारतीय युवा पीढ़ी आने वाले बरसों में दुनिया में बहुत आगे बढ़े। लेकिन इसके लिए बड़ी सोच और बड़ी तैयारी की जरूरत होगी, ईमानदार मेहनत की जरूरत होगी, और हिन्दुस्तान मेेंं लोगों के बीच काम के लिए सम्मान को फिर से कायम भी करना पड़ेगा। आज भी हिन्दुस्तानी आबादी सबसे बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरी को ही कामकाज मानता है, और वैसे दिन अब लद चुके हैं। इसलिए आज भारत सरकार को, या अलग-अलग राज्य सरकारों को बड़ी कल्पनाशीलता के साथ आगे की सोचनी होगी, तभी जाकर देश बेरोजगारी के बढ़ते खतरे को और बढऩे से रोक पाएगा। आने वाले बरस उदार अर्थव्यवस्था, कमजोर मजदूर कानून, और मशीनीकरण के चलते हुए अधिक बेरोजगारी के दिख रहे हैं जिससे निपटने के लिए तुरंत तैयारी करनी चाहिए। इसमें केरल जैसे राज्य एक मिसाल हैं जहां शिक्षण-प्रशिक्षण के चलते हर परिवार से कोई न कोई दूसरे देशों में जाकर काम कर रहे हैं। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 15-Apr-2018
  • विश्व हिन्दू परिषद के इतिहास में आधी सदी बाद चुनाव हुए, और जैसे कि उम्मीद थी, उसके अब तक के कार्यकारी मुखिया, डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की वहां से विदाई हो गई। वे परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष थे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनके मतभेद, मनमुटाव, और टकराव का लंबा इतिहास रहा है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब से ही तोगडिय़ा से उनकी तनातनी चलती रही, और उस पूरे दौर में तोगडिय़ा की सारी साम्प्रदायिक दुकानदारी गुजरात के बाहर ही चल पाई। पिछले चार बरस में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तोगडिय़ा एक किस्म से हाशिए पर चले गए थे, और पिछले कुछ महीनों में उनकी भड़ास सार्वजनिक रूप से, मीडिया के सामने आ रही थी, जिसमें वे अपनी जान को खतरा भी बता रहे थे, और उनका सारा इशारा घूमफिरकर मोदी की तरफ ही था। ऐसे में पिछले कुछ हफ्तों में लगातार यह माना जा रहा था कि विश्व हिन्दू परिषद में अब कोई ऐसा नया अध्यक्ष बनाया जाएगा जिसके बाद तोगडिय़ा वहां से बाहर हो जाएंगे, और वही हुआ भी। 
    आज मोदी के विरोधी तोगडिय़ा के अस्थायी हमदर्द हो सकते हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि प्रवीण तोगडिय़ा देश के ऐसे सबसे बड़े नफरतजीवी लोगों में से एक हैं, जिनका सारा अस्तित्व ही साम्प्रदायिक नफरत पर टिका रहा। वे पेशे से कैंसर सर्जन रह चुके हैं, लेकिन कड़वे शब्दों में अगर कहा जाए तो वे देश के साम्प्रदायिक सद्भाव में एक बहुत बड़े कैंसर-ट्यूमर थे, और उनका किसी भी किस्म की सत्ता से जाना शायद देश के हित में ही होगा। मोदी के विरोध का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि नफरत को बढ़ावा देने की कीमत पर भी उसे जारी रखा जाए। और फिर उस तोगडिय़ा के साथ किसकी हमदर्दी हो सकती है, जिसने लगातार इस देश में मुस्लिमों या दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसक साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए हिन्दुओं के ध्रुवीकरण को आक्रामक तरीके से बढ़ाना ही अपनी जिंदगी का अकेला मकसद बना रखा था। आज विश्व हिन्दू परिषद से बाहर हो जाने के बाद तोगडिय़ा गुजरात में बेमुद्दत भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं, और अब वे अपनी पुरानी घिसी-पिटी मांगों को एक बार फिर उठा रहे हैं कि राम मंदिर बनाने के लिए कानून बनाया जाए, या कश्मीर से धारा 370 खत्म की जाए, देश से बांग्लादेशी मुस्लिमों को निकाला जाए। 
    खुद भाजपा और संघ परिवार के लिए तोगडिय़ा भारी पड़ रहे थे। एक व्यापक हिन्दू छतरी के नीचे अगर हिन्दुत्व के सबसे बड़े सितारे नरेन्द्र मोदी को कोई अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते चुनौती देना शुरू करे, तो फिर यह वीएचपी की निर्णायक संस्था आरएसएस के लिए भी एक बेवजह परेशानी की बात थी। इसलिए तोगडिय़ा का यह अंत एक तर्कसंगत और स्वाभाविक अंत दिखता है, इसके अलावा उनका अब और कोई भविष्य संघ परिवार की छत्रछाया में बचा हुआ नहीं था। ऐसा लगता है कि संघ या भाजपा ने भी कुछ हद तक इस हकीकत को माना है कि सत्ता पर बहुमत होने के बावजूद कौन-कौन से भावनात्मक मुद्दों को सरकार पूरा नहीं कर सकती है। आज संसद में, और देश की विधानसभाओं में भाजपा और एनडीए का जिस किस्म का बहुमत है, वैसे में भाजपा अपनी तमाम भावनात्मक बातों को पूरा कर सकती है, लेकिन सत्ता भी बहुत सा सबक सिखा जाती है, इसलिए पार्टी और संघ के तमाम पुराने नारे अभी किनारे रख दिए गए हैं। जिन लोगों को लगता है कि तोगडिय़ा के जाने के बाद विश्व हिन्दू परिषद में एक युग खत्म हुआ है, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि जिस तरह नक्सलियों के हिमायती संगठन नाम बदल-बदलकर काम करते हैं, जिस तरह पाकिस्तान में आतंकी संगठन नाम बदल-बदलकर काम करते हैं, ठीक उसी तरह भारत में भी साम्प्रदायिक संगठन नए-नए खड़े होते चलते हैं, एक-दूसरे से अलग रहने का नाटक भी करते हैं, और समय रहने पर वे पारे की बिखरी हुई बूंदों की तरह पल भर में मिलकर एक भी हो जाते हैं। इसलिए तोगडिय़ा किस शक्ल में देश की साम्प्रदायिक एकता के लिए एक नया ट्यूमर बनकर उभरेंगे इसको देखने के लिए इंतजार ही करना पड़ेगा। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 14-Apr-2018
  • छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के बीजापुर जिले से इस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बहुत महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे हैं। आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत पूरे देश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को बेहतर और मजबूत बनाया जाएगा, और देश की 40 फीसदी आबादी को स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा ताकि वे इससे और ऊपर के इलाज के लिए भी जा सकते हैं। इसके साथ-साथ बीजापुर जिले को देश के उन 115 आकांक्षी जिलों में से छांटा गया है जहां प्रधानमंत्री विकास का सबसे अधिक फोकस करना चाहते हैं क्योंकि ये जिले देश में सबसे पिछड़े हुए हैं, और इन्हें विकास की मूलधारा में लाए बिना न तो समानता आ सकती है, और न ही देश का पूरा विकास ही हो सकता है। 
    ये दोनों ही बातें अभी तक की घोषणाओं में और कागजों पर अच्छी लग रही हैं, लेकिन आने वाले बरस बताएंगे कि केन्द्र और राज्य मिलकर कहां-कहां पर कामयाब होते हैं, और कहां-कहां पर ये दोनों योजनाएं महज कागजों पर रह जाएंगी। पिछली करीब आधी सदी में हिन्दुस्तान में अलग-अलग केन्द्र सरकारों के कार्यकाल में तरह-तरह की योजनाओं को सुना है। इनमें से कुछ कामयाब रहीं, और कुछ बड़ी सहूलियत से भुला दी गईं। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही हर आदिवासी परिवार को एक गाय देने की घोषणा जब किसी किनारे नहीं पहुंची, तो राज्य सरकार ने उसे छोड़ ही दिया। दूसरी तरफ राज्य के हर गरीब को बहुत ही रियायती अनाज देने की योजना न सिर्फ जमीन पर उतरी, बल्कि उसकी कामयाबी आसमान पर पहुंची, और छत्तीसगढ़ सरकार ने उसे लगातार आगे बढ़ाया, उसका विस्तार किया, और दूसरे राज्य भी इसे देखने छत्तीसगढ़ आए। 
    अब जहां तक आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के विकास की सोच है, और इन्हें स्वास्थ्य एवं स्वस्थ जीवन केन्द्र का नया ब्रांड नाम भी दिया गया है, तो इनकी कामयाबी के लिए हम अभी शुभकामनाएं ही दे सकते हैं, अभी कोई उम्मीद इसके लिए नहीं कर सकते। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवा को लेकर लोगों का तजुर्बा बहुत ही खराब रहा है। एक तरफ तो सरकार स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हुए कुछ चुनिंदा अभियानों में कामयाबी गिनाते थकती नहीं है, तो दूसरी तरफ बिना किसी अभियान के जो रोजमर्रा के काम हैं, उनमें सरकारी केन्द्रों और अस्पतालों की बदहाली गांव-गांव से लेकर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक एक आम बात है। ऐसे में केन्द्र सरकार तो बजट ही दे सकती है, उस योजना पर अमल और खर्च तो राज्य सरकार को ही करना है, और आज शायद ही कोई ऐसा दिन है जो कि स्वास्थ्य विभाग के व्यापक, संगठित, और भयानक भ्रष्टाचार की खबरों के बिना आता हो। दिल्ली में बैठकर प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी के राज्यों में अमल पर कितना काबू रख पाएंगे, इस पर हमें भारी शक है। 
    दूसरी योजना, आकांक्षी जिलों, की कामयाबी की संभावना हमें अधिक दिखती है क्योंकि सबसे पिछड़े जिले में अगर मेहनत हो, तो उनमें तेजी से सुधार लाने की गुंजाइश हमेशा रहती है, और ऐसे जिलों में तैनात अफसरों को छांटने में अगर सावधानी बरती जाए तो वे राज्य स्तर के भ्रष्टाचार से कुछ या अधिक हद तक बचे भी रह सकते हैं। आज भी छत्तीसगढ़ सहित बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर नौजवान कलेक्टर अपने पहले या दूसरे जिलों की जिम्मेदारी को एक चुनौती की तरह लेते हैं, और उन जिलों में कुछ ऐसा कर दिखाने की कोशिश करते हैं जो कि बाकी देश के लिए भी एक मिसाल बने। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने खनिज विकास निधि को पूरी तरह जिला कलेक्टरों के विवेक पर छोड़ दिया है, और उससे भी कई जिलों में बहुत बड़े और अच्छे काम हो रहे हैं। हम कलेक्टरों के काम और खनिज विकास निधि के फैसले पर अपनी कुछ असहमति के बावजूद यह सोचते हैं कि सबसे पिछड़े जिलों में सचमुच ही एक चुनौती की तरह काम करने वाले नौजवान अफसरों को मौका देना चाहिए, और उनके बीच राष्ट्रीय स्तर पर एक मुकाबला करवाने में भी कोई बुराई नहीं है। आकांक्षी जिलों को लेकर केन्द्र सरकार इसी तरह की सोच रखती है, और हम देश की एक बड़ी आबादी को विकास के पैमानों पर बाकी लोगों की ओर बढ़ाने के हिमायती हैं। इसलिए चाहे किसी भी पार्टी के प्रधानमंत्री हों, चाहे किसी भी पार्टी की राज्य सरकार हो, बिना किसी मतभेद और टकराव के इस संघीय लोकतंत्र में सबसे पिछड़ों की सबसे बढ़ोत्तरी की कोशिश की जानी चाहिए। देश की 15 फीसदी आबादी इन आकांक्षी जिलों में बसी है, और ये जिले सभी 28 राज्यों में बिखरे हुए हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे 10 आकांक्षी जिले हैं जिनमें से कई नक्सल-हिंसा प्रभावित हैं। आने वाले बरसों में यह योजना एक दिलचस्प अध्ययन का मुद्दा रहेगी, और आज बस्तर एक किस्म से इन दोनों ही योजनाओं की शुरूआत देख रहा है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 13-Apr-2018
  • उत्तरप्रदेश की एक तस्वीर अखबारों में आई है कि वहां बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा को विरोधी गुंडों से बचाने के लिए उसे एक जंगला बनाकर उसके बीच कर दिया गया है, और बगल में चौकसी करते हुए पुलिस बैठी है। भारत एक ऐसी विविधता वाला देश है जिसमें वामपंथी बंगाल में भाजपा के श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमाएं हैं, देश के अधिकतर हिस्सों में गांधी, अंबेडकर, और धर्मों से जुड़े हुए कई और प्रमुख लोगों की प्रतिमाएं हैं। ये प्रतिमाएं गांव-कस्बे और शहरों में बिखरी हुई हैं, सुनसान सड़कों पर हैं, किसी इमारत के अहाते में है, या बगीचे के बीच हैं। इन पर कालिख पोतना या इनमें तोडफ़ोड़ करना सबसे आसान काम हो सकता है, और उसके बाद की नौबत से निपटना एक सबसे मुश्किल काम है। कल तक यह कहा जाता था कि भारत अनेकता में एकता वाला देश है, और यह भी कहा जाता था कि यह कई अलग-अलग देशों का मिला हुआ एक अलग किस्म का यूरोप है। लेकिन अब नौबत वैसी दिख नहीं रही है, और फिक्र खड़ी हो रही है। 
    देश के भीतर राजनीतिक और धार्मिक आधार पर जाति और क्षेत्र के आधार पर, खानपान और रीति-रिवाज के आधार पर लोगों के बीच तनाव लगातार बढ़ाया जा रहा है। खासकर उत्तरप्रदेश एक ऐसी साम्प्रदायिक प्रयोगशाला बन गया है जहां पर हज हाऊस के हरे रंग को भगवा करके मुस्लिम समाज के बर्दाश्त को परखा जाता है, और दलितों के बीच प्रचलित नीले रंग को अंबेडकर प्रतिमा से हटाकर उसे भी भगवा किया जाता है। ये सारी बातें मासूमियत से की गई, या अनायास हो गई बातें नहीं हैं। इन्हें सोच-समझकर किया जाता है, और देखा जाता है कि इन पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने आक्रामक हिन्दुत्व के चलते ही संसद में बार-बार पहुंचे, और अब मुख्यमंत्री बने। उन्हें दूसरे धर्मों से परहेज से कोई परहेज नहीं है, और वे खुलकर अपनी बात कहते हैं। लेकिन ऐसी आक्रामकता का असर उत्तरप्रदेश की सरहदों से बाहर बाकी देश में भी होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि जब मुस्लिमों की बाकी देश में हत्या होती है, तो उसका असर कश्मीर पर भी होता है। 
    यह सिलसिला तुरंत थमना चाहिए, वरना इस देश का सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा। इसके लिए देश को एक ऐसे बड़े नेता की जरूरत है जो बड़प्पन से काम ले, और खुलकर ऐसी बातों के खिलाफ बोल सके, गलत कामों को गलत कहने का हौसला रखे, और समय रहते असरदार जुबान में बोले, और अपनी सरकार की तरफ से, अपनी पार्टी की सरकारों की तरफ से कथनी को करनी बनाकर भी दिखाए। यह देश किसी एक रंग में रंगना मुमकिन नहीं है, यह जरूर है कि ऐसे सामाजिक तनावों के चलते हुए महज एक लहू का रंग चारों तरफ बिखरा रह जाएगा, और इतिहास ऐसे दिनों को अच्छी तरह दर्ज भी करेगा। उत्तरप्रदेश की प्रयोगशाला को जम्मू में एक गरीब मुस्लिम बच्ची के साथ मंदिर में सामूहिक बलात्कार और पत्थर मार-मारकर उसे कत्ल करने तक बढ़ाया गया, और ये जख्म इस देश के दिल-दिमाग से कभी खत्म नहीं होंगे। लोगों को याद है कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त साम्प्रदायिक हिंसा के जो जख्म थे, उनको भरने में कुछ पीढिय़ां लग गई थीं। वैसी नौबत इस देश में दुबारा नहीं आने देने चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 12-Apr-2018
  • उत्तरप्रदेश के उन्नाव रेप केस का इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खुद होकर संज्ञान दिया है, और सरकार को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बेंच इसकी सुनवाई करने जा रही है। यह मामला राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक पर लगे रेप के आरोप का है, और शिकायत करने वाली महिला के पिता को ऐसा कहा जा रहा है कि विधायक के भाई ने इतना मारा, फिर झूठे केस में जेल भेजा, और वहां उसकी मौत हो गई। इसके पहले के जो वीडियो सामने आ रहे हैं, उसमें रेप-पीडि़ता के पिता के जख्मों की मेडिकल जांच के दौरान पुलिस और डॉक्टर सब मिलकर सरकारी अस्पताल में जोरों से हंॅस रहे हैं, जख्मी की आवाज की नकल करके मखौल उड़ा रहे हैं, और मानो पूरी पार्टी और सरकार अपने बलात्कारी को बचाने में जुट गई हैं। ऐसे में हाईकोर्ट ने खुद होकर इस पूरे मामले का नोटिस लिया है। 
    जब कभी अदालत अपने पास आए किसी शिकायतकर्ता के बिना खुद होकर किसी मामले का नोटिस लेती है, तो उसे एक सक्रिय या प्रोएक्टिव न्यायपालिका कहा जाता है। कुछ लोग इसे एक अच्छी नौबत मानते हैं, और कुछ लोग इसे सरकारी काम में अदालती दखल भी मानते हैं। हमारा यह मानना है कि निष्क्रिय कार्यपालिका सक्रिय न्यायपालिका का रास्ता खोलती है। जब लोकतंत्र में तीन पायों में से कोई एक पाया अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करता है, तो फिर संतुलन बनाए रखने के लिए बचे दो पायों में से किसी एक को, किसी-किसी मामले में दोनों को भी दखल देना पड़ता है। यह वैसा ही एक मामला है। सरकारों को इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अगर न्यायपालिका के जज रिटायरमेंट के बाद अपने पुनर्वास को लेकर आज अपनी आत्मा बेचने को तैयार न हों, तो वे ईमानदार फैसले भी देते हैं, और सरकारी अनदेखी की अनदेखी नहीं करते हैं। बहुत से मामलों में ऐसा भी हो सकता है कि जज बिके हुए हों, या कि वे बाद में किसी ऐसे ओहदे पर जाना चाहें जिससे और पांच बरस की जिंदगी सुख भरी हो जाए, तो वे सरकार के काम में दखल न देना भी तय कर सकते हैं। हमारा यह मानना है कि भारत में न्यायपालिका की दखल गैरजरूरी नहीं रहती है, और आमतौर पर बड़ी लंबी अनदेखी के बाद अदालतें किसी-किसी मामले में सरकारी गैरजिम्मेदारी की अनदेखी बंद करती हैं, और नोटिस जारी करती हैं। 
    आज जब देश में संसद अपना काम नहीं कर रही है, जब राजनीतिक दलों के बीच कटुता इतनी बढ़ गई है कि संसद एक बेकार संस्था साबित हो रही है, जब सरकारें अपने को मिले कानूनी अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करने पर उतारू हैं, और उसी को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी मान रही हैं, तब किसी न किसी को तो दखल देनी होगी। जब लोकतंत्र में चुनावी कामयाबी पार्टियों और उनकी सरकारों में इतनी बददिमागी भर देती हैं कि उन्हें न तो सार्वजनिक जीवन की नैतिकता से कोई लेना-देना रह जाता, और न ही जनभावनाओं से, तो फिर ऐसे अहंकार से भरे हुए जुर्म के खिलाफ जज को खुद ही सुनवाई करनी पड़ती है। आज उत्तरप्रदेश में यही हो रहा है। वहां पर आज का माहौल वीडियो पर दर्ज होकर जिस तरह से सामने आ रहा है, उससे लगता है कि वहां पर कानून का राज खत्म हो गया है। हम राज्यों में राष्ट्रपति शासन के हिमायती नहीं हैं, और न ही अब इंदिरा-राज की तरह राष्ट्रपति शासन का फैशन रह गया है, लेकिन फिर भी आज उत्तरप्रदेश में जिस तरह राज सरकार के काबू के बाहर का है, या फिर सरकार ही अराजकता को बढ़ावा दे रही है, वह नौबत निर्वाचित सरकार की बर्खास्तगी की है, और लोकतंत्र की बहाली की है, चाहे वह राष्ट्रपति शासन जैसा एक स्थगित-लोकतंत्र ही क्यों न हो। 
    हमारा यह मानना है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायरमेंट के बाद ऐसे किसी भी ओहदे पर भेजना बंद होना चाहिए, जिसके लिए कि भूतपूर्व जज होना जरूरी न हो। इसके अलावा एक दूसरा काम यह भी होना चाहिए कि जज ने जिस राज्य में हाईकोर्ट में काम किया हो, उस राज्य में उसे ऐसे ओहदे पर भी मनोनीत नहीं किया जाना चाहिए जिस पर जज को ही मनोनीत करना जरूरी हो। ऐसी कुर्सियों के लिए भी केवल ऐसे जज छांटने चाहिए जिन्होंने उस राज्य में कभी काम न किया हो। इससे ही न्यायपालिका की गंदगी कुछ हद तक कम होगी, और जजों में सरकारी मक्कारी के खिलाफ पहल करने की हिम्मत आएगी। अभी हम न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बड़े और व्यापक मुद्दे को यहां पर जोडऩा नहीं चाहते हैं, लेकिन हम उत्तरप्रदेश जैसे हालात को लेकर अदालती दखल को सही और जरूरी मानते हैं। बाकी राज्यों में भी हाईकोर्ट को अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। सरकार की साजिश को देखते हुए हाईकोर्ट ने अभी दोपहर उससे पूछा है कि अगले एक घंटे में यह विधायक गिरफ्तार होगा या नहीं, सरकार बताए? 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 11-Apr-2018
  • आज दो-चार अलग-अलग खबरें दिल दहलाने वाली हैं, और वे सारी की सारी एक दूसरी बात का सुबूत भी हैं कि सत्ता की ताकत वाले लोग किस तरह कमजोर लोगों पर बलात्कार कर सकते हैं, उसके बाद भी बच सकते हैं, और लोग किस बेशर्मी और तथाकथित हैवानियत के साथ बलात्कार के आरोपियों को बचाने के लिए सामने आ सकते हैं। एक खबर जम्मू-कश्मीर की है जहां जम्मू इलाके में एक बच्ची का अपहरण करके कई लोगों ने उससे कई दिनों तक मंदिर में बलात्कार किया, और जब इस मामले एक बलात्कारी पुलिस अफसर को गिरफ्तार किया गया, कुछ दूसरे पुलिस अफसरों पर सुबूत नष्ट करने का जुर्म लगा, तो मुस्लिम बच्ची के बलात्कारी हिन्दू लोगों को बचाने के लिए जम्मू में लोग सड़कों पर तिरंगे झंडे लेकर निकल आए। यह सिलसिला पिछले कुछ हफ्तों में कई बार हुआ, और जुलूस निकले, जिनमें भाजपा का एक प्रदेश पदाधिकारी अगुवाई भी कर रहा था। हालत इतनी बिगड़ी कि जम्मू में वकीलों ने जांच अफसरों को अदालत में चार्जशीट फाईल करने से भी रोका, और वे भी तिरंगे झंडे लेकर सड़कों पर हैं, मानो किसी बलात्कारी को बचाना इक्कीसवीं सदी का एक नया राष्ट्रवाद है। यह मामला आज के अखबार के पहले पन्ने पर छप भी रहा है, इसलिए बाकी डरावनी जानकारी वहां से ली जा सकती है। 
    एक दूसरा मामला उत्तरप्रदेश के उन्नाव का है जहां पर पुलिस में रिपोर्ट है कि सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक ने एक महिला से बलात्कार किया, और इसकी शिकायत पर विधायक और उसके भाई ने इस महिला के पिता को इतना मारा, और एक झूठी रिपोर्ट पर जेल भिजवा दिया, जहां उसकी मौत हो गई। अब जो वीडियो सामने आ रहे हैं उनमें इस घायल बाप के अंगूठे को थामकर पुलिस के लोग कोरे कागजों पर उसका निशान लगाते चल रहे हैं ताकि बाद में उसके किसी भी बयान पर उसका इस्तेमाल हो सके। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ विधायक फोन पर मरने वाले के भाई पर दबाव डाल रहा है, ऐसा भी ऑडियो सामने आया है। मरने वाला मरने के पहले कैमरे पर यह बता रहा है कि किस तरह पुलिस की मौजूदगी में विधायक के भाई ने उसे रायफल के हत्थे से मारकर घायल किया। 
    अब तीसरी खबर यह है कि उत्तरप्रदेश के ही एक पूर्व केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर दर्ज बलात्कार का मामला उत्तरप्रदेश की योगी सरकार वापिस ले रही है। इस बलात्कार की शिकार महिला ने अब राष्ट्रपति और तमाम लोगों को लिखा है कि उसकी 2011 की शिकायत पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई, और अब योगी सरकार यह मामला ही उठा रही है। 
    इन सारी बातों को मिलाकर अगर देखें तो यह एक अलग बात है कि ये तीनों ही बलात्कार के मामले भाजपा से जुड़े हुए लोगों के हैं जो कि इन दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी है। लेकिन हम इसे किसी पार्टी का मामला न मानकर सरकारों की नाकामयाबी का मामला मान रहे हैं, और जम्मू के मामले में तो यह समाज और वकीलों के तबके के लिए एक शर्मनाक सोच और बर्ताव का मामला भी है। बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के लिए न सरकारों के मन में हमदर्दी दिख रही है, और न ही समाज को इस बात में कोई दिक्कत लग रही है कि आठ बरस की एक बच्ची को मंदिर में ले जाकर उसके साथ कई दिन सामूहिक बलात्कार किया जाता है, और फिर पत्थर मार-मारकर उसकी हत्या कर दी जाती है। ऐसे बलात्कारियों और हत्यारों को भी बचाने के लिए जिस देश-प्रदेश में जो लोग राष्ट्रीय झंडा लेकर इसे एक राष्ट्रवादी मुद्दा बनाते हैं, उस राष्ट्र को इसे देखकर शर्म और ग्लानि से डूब मरना चाहिए। यह पूरा सिलसिला देश के लोगों के बीच भारी निराशा भरने वाला है, और लोगों का भरोसा लोकतंत्र पर से उठ रहा है, सरकार और न्यायपालिका पर से उठ रहा है, और इंसानियत पर से तो उठ ही रहा है। हैरानी की बात यह है कि इन तीनों ही मामलों से जुड़ी हुई भाजपा, या भाजपा सरकार का इन मामलों पर कोई भी बयान सामने नहीं आया है, न सरकार का, और न ही भाजपा का। ऐसी चुप्पी को भारतीय संस्कृति में सैकड़ों बरस पहले से मौन: सम्मति लक्षणम् कहा जाता है, यानी यह चुप्पी सहमति की चुप्पी है। यह नौबत लोकतंत्र में बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जा सकती, और उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, और हरियाणा जैसे राज्यों में लगातार दलितों के साथ, कमजोर तबकों के साथ बलात्कार जारी हैं, और बलात्कारियों को बचाने की सरकारी-राजनीतिक कोशिशें भी जारी हैं। ऐसा बलात्कारी माहौल देश के लोगों को कमजोर कर रहा है। 
    - सुनील कुमार 

     

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