संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : वैक्सीन नहीं है, इंसानों को काटने को कुत्ते गली-गली
सुनील कुमार ने लिखा है
12-Nov-2025 5:06 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : वैक्सीन नहीं है, इंसानों को काटने को कुत्ते गली-गली

तस्वीर / ‘छत्तीसगढ़’


देश में इंसान-जानवर टकराव अब तक जंगलों में चल रहा था, जहां कहीं पर जानवर इंसानों को मार रहे थे, तो कहीं पर इंसान करंट बिछाकर, पानी में जहर घोलकर, या किसी और तरीके से जानवरों को मार रहे थे। अब जानवर-मानव टकराव जंगलों से निकलकर शहरों तक आ गया है, और देश भर के शहरों में कुत्तों और इंसानों के बीच अस्तित्व का खतरा खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को अपने मनमाने आदेशों से ऐसा उलझा दिया है कि कोई राज्य सरकार, या कोई म्युनिसिपल समझदारी का कोई काम कर ही न सके। कुत्तों की आबादी शहरों में बेकाबू है, उन्हें खिलाने पर आमादा पशुप्रेमियों के उत्साह में कोई कमी नहीं है, और उनके काटे हुए इंसानों के लिए सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन नहीं हैं। नतीजा यह है कि गरीबों को बाजार से महंगी वैक्सीन खरीदकर लगवाना पड़ता है, वरना कहावतों की जुबान में, कुत्तों की मौत करने के लिए तैयार रहना पड़ता है। काटने वाले कुत्तों में से कितने रैबीज से संक्रमित रहते हैं, इसका कुछ पता नहीं चल पाता क्योंकि सडक़ के कुत्तों का कोई रिकॉर्ड तो रहना नहीं है, और काट लेने के बाद ऐसे कुत्ते की कोई शिनाख्त भी नहीं हो पाती। मतलब यह कि वैक्सीन का पूरा कोर्स किए बिना रैबीज से मरने का पूरा खतरा रहता है, और कोई भी वैसी मौत की कल्पना भी नहीं कर सकते।

हजारों बरस पहले इंसानों ने जंगली जानवरों को पालतू बनाते हुए कुत्तों को पालना शुरू किया था, और पिछले कुछ सौ बरसों से तो कुत्ते इंसानों के परिवार की तरह जगह-जगह रहने लगे थे। वे इंसानों को जंगली जानवरों के हमले से आगाह भी करते थे, शिकार में मदद भी करते थे, और पहुंच से परे की जगहों से शिकार को उठाकर भी लाते थे। लेकिन इंसानी बसाहटों में धीरे-धीरे पालतू कुत्ते सार्वजनिक भी होने लगे, और गांव-कस्बे, शहरों की सडक़-गलियों में कुत्तों की आबादी पनपने लगी। जिन संपन्न और विकसित देशों में कुत्ते सिर्फ पालतू होते हैं, वहां पर तो उन्हें पालने वाले परिवार उनका टीकारण करवा पाते हैं, लेकिन बाकी जगहों पर पंचायत या म्युनिसिपल के बस में हर बेघर-आवारा कुत्ते की नसबंदी या टीकाकरण नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि रैबीज के खतरे वाले कुत्तों की आबादी सडक़ों पर बढ़ती चलती है। जो लोग कुत्तों को पालते हैं वे भी शौक पूरा हो जाने पर, या किसी निजी वजह से उन्हें सडक़ों पर छोड़ देते हैं, अगर टीकाकरण किया भी रहा हो, तो भी उसका असर कुछ महीनों में खत्म हो जाता है, और वे खुद रैबीज संक्रमित होने का खतरा उठाते हुए इंसानों के लिए भी इस जानलेवा संक्रमण का खतरा बने रहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दो-तीन महीनों में तीन अलग-अलग आदेशों में एक बदअमनी सी खड़ी कर दी है। पहले फैसले में दो जजों ने दिल्ली-एनसीआर के पूरे इलाके से हर कुत्ते को हटाकर बाड़े में रखने को कहा था। अगले फैसले में सुप्रीम कोर्ट एक बड़ी बेंच ने इस पर रोक लगा दी थी, और किसी भी इलाके से उठाए गए कुत्तों को टीकाकरण और नसबंदी के बाद उसी इलाके में वापिस छोडऩे का हुक्म दिया था। इसी बेंच ने अब तीसरे फैसले में यह कहा है कि स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, स्टेशन-बसस्टैंड से कुत्तों को हर हाल में हटाकर बाड़ों में रखा जाए, और इन जगहों पर कुत्ते दुबारा न घुस सकें, उसका पुख्ता इंतजाम किया जाए। लेकिन इन सार्वजनिक जगहों से परे बाकी इलाकों से कुत्तों को हटाने पर रोक जारी है। ऐसे माहौल मेें देश भर के अधिकतर इलाकों में कुत्ते लोगों को काट रहे हैं, लोगों के लिए सरकारी इंतजाम में वैक्सीन नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट के जज कारों में बंगले से कोर्ट आ-जा रहे हैं। अभी तक ऐसे कुत्ते बने नहीं हैं जो कि कारों के आरपार इंसानों को काट सकें। 

दवाओं के सरकारी इंतजाम का जो हाल है, उसमें यह शक भी पैदा होता है कि जहां कहीं एंटी रैबीज वैक्सीन है, क्या वह सही तापमान पर रखी गई है, उसका असर बाकी है, क्या वह असली है, क्या कर्मचारी सचमुच ही वही वैक्सीन लगा रहे हैं? ऐसे कई सवालों के जवाब कुत्ते के काटे हुए इंसान की पहुंच के बाहर रहते हैं। ऐसे खतरे को देखते हुए होना तो यह चाहिए था कि सार्वजनिक जगहों से कुत्तों को हटाया जाए, लेकिन गरीबों के इस देश में कुत्तों के लिए जैसे बाड़े की शर्तें हैं, वे किसी इंसान को रखने से अधिक खर्चीली हैं। अब कौन सी म्युनिसिपल अपने इलाके के दसियों हजार कुत्तों के लिए दसियों करोड़ के बाड़े बना और चला सकती हैं? इस देश को एक कुत्ता-नीति की जरूरत है जो कि आवारा कुत्तों की आबादी को आगे बढऩे से रोके, धीरे-धीरे करके कुछ बरसों में सडक़ों और सार्वजनिक जगहों को कुत्तामुक्त करे, और इंसानों को उनसे बचाए। जिनको कुत्तों से बहुत पे्रम है, वे अपने घरों में म्युनिसिपल या पंचायत से लाइसेंस-रजिस्ट्रेशन प्राप्त कुत्ते रख सकें, और उन्हें घर से निकाल देने की सहूलियत उन्हें हासिल न हो।

रातों-रात किसी देश को कुत्तामुक्त नहीं किया जा सकता, अगर उस देश में फौजी तानाशाही, या राजशाही न हो। लोकतंत्र में पशुओं के अधिकारों को भी बहुत दूर तक सम्मान होता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर बेघर कुत्तों की आबादी को काबू में करना आसान नहीं है, लेकिन अगर इस काम को गंभीरता से शुरू नहीं किया गया, तो यह आधी-एक सदी भी पूरा नहीं हो पाएगा। सडक़ों पर आवारा कुत्तों और इंसानों का कोई सुरक्षित सहअस्तित्व नहीं हो सकता। आज के कुत्तों को बाड़ों में ले जाना ही होगा, नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें वहां पर किसी भी वैज्ञानिक तरीके से रखना होगा, और उनकी अगली पीढ़ी को पैदा होने से रोकना होगा। सुप्रीम कोर्ट इंसानों के पैरों पर मंडराता खतरा नहीं देख पा रही है, और सरकार के पास कुत्तों या इंसानों की किसी भी समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला लंबे समय तक नहीं टिकेगा, केंद्र और राज्य सरकारों को जजों के सामने यह रखना पड़ेगा कि अदालत के हुक्म किस तरह अमल के लायक नहीं हैं। बेघर कुत्तों की आजाद आबादी का खतरा न जनता उठा सकती, न सरकारी खजाने। जानवर-इंसान का टकराव जंगलों से निकलकर शहरी सडक़ों पर आ गया है, गांवों की गलियों तक मंडरा रहा है। इस टकराव की लागत के आंकड़े अभी तक सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे नहीं गए हैं। अदालत के कहे मुताबिक तो देश का पूरा बजट ही कुत्तों पर खर्च होने का एक खतरा दिख रहा है। 

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