संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट जब लीक से हटकर कोई काम करती है, तो उससे कई बार एक नया कानून बनता है। वह कानून तब तक लागू रहता है जब तक संसद उसे पलटने का कोई नया कानून न बना दे। अब जैसे शाहबानो के केस में सुप्रीम कोर्ट ने उसे गुजारा भत्ता का हकदार माना था, लेकिन राजीव गांधी की सरकार ने संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया था। अगर संसद में वह काम नहीं किया गया रहता तो सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला ही देश में लागू रहता। अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में बड़ा ही दिलचस्प आदेश दिया है, लेकिन साथ-साथ यह भी कह दिया है कि इसे नजीर के तौर पर ऐसे दूसरे मामलों में लागू नहीं किया जा सकेगा, बल्कि वैसे हर मामले को गुण-दोष के आधार पर अलग-अलग तय किया जाएगा।
यह मामला पुदुचेरी की एक दलित महिला का है जो अपनी बच्ची के लिए दलित वर्ग का आरक्षण सर्टिफिकेट चाहती थी। बच्ची का पिता दलित तबके का नहीं था। मां का तर्क था कि वह उस प्रदेश के आदि द्रविड़ दलित समुदाय की है, और उसके माता-पिता की पिछली दो पीढिय़ां भी इसी समुदाय की थीं। शादी के बाद पति इसी महिला के घर पर रहता था। अब बच्ची की पढ़ाई के लिए उसने आरक्षण प्रमाणपत्र मांगा लेकिन सरकार ने उससे मना कर दिया। बाद में मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने मां की जाति के आधार पर प्रमाणपत्र देने के लिए कह दिया। सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची क्योंकि राष्ट्रपति की जारी की गई अधिसूचनाएं, और गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देश 1964 से लेकर 2002 तक आमतौर पर बच्चों की जाति को पिता के जाति के आधार पर तय करते हैं, और पिता के मूल निवासी दर्जे के आधार पर बच्चों का निवास प्रमाणपत्र बनता है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जयमाला बागची की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया। इस बेंच ने कहा कि यह फैसला इस बच्ची की पढ़ाई-लिखाई को लेकर जारी रखा जा रहा है, और इसे व्यापक संदर्भ में उपयोग नहीं किया जाए। लेकिन जजों ने कहा कि बच्ची की पढ़ाई और भलाई को कठोर व्याख्या का कैदी नहीं बनाया जा सकता। यह रूख सुप्रीम कोर्ट में थोड़ा सा नया है क्योंकि 2003 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए पिता की जाति को ही आधार बनाना जरूरी माना था। इसके बाद 2012 में गुजरात के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिता की जाति का आधार अटल नहीं माना जा सकता। अंतरजातीय या आदिवासी-गैरआदिवासी शादियों में बच्चे मां की जाति ले सकते हैं, बशर्ते वह ये साबित कर सकें कि वे मां के समुदाय में ही पले और बढ़े है, और उन्होंने मां की जाति का ही सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन झेला है। अदालत ने यह भी कहा था कि इन सारी बातों को साबित करने का जिम्मा ऐसे बच्चों के परिवारों का ही रहेगा। 2025 में एक अलग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल खड़ा किया था कि अगर किसी बच्चे की मां ही उसकी अकेली पालक है, तो उसके पिता की जाति का प्रमाणपत्र क्यों जरूरी, महत्वपूर्ण, और मान्य होना चाहिए?
ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट 21वीं सदी के बदले हुए परिदृश्य में महिलाओं के अधिकारों की एक अलग तरीके से अधिक उदार और अधिक प्रगतिशील व्याख्या कर रहा है। एक दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य यह है कि किसी बच्चे के मां-बाप में से, जब तक कोई वैज्ञानिक जांच न हो, तब तक मां होने की तो गारंटी रहती है, और पिता होने का तो महज अनुमान रहता है। ऐसे में अगर मां का समुदाय अधिक पिछड़ा हुआ है, भेदभाव का शिकार है, तो बच्चों को अपनी मां के हिस्से का आरक्षण का हक मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह ताजा आदेश देते हुए यह सावधानी बरती है कि यह मामला नजीर के तौर पर दूसरे ऐसे तमाम मामलों पर अपने-आप लागू नहीं हो जाएगा। यह सावधानी इसलिए जरूरी है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था बहुत अधिक जटिल है, और उसके भीतर जातिगत आरक्षण तब और भी जटिल हो जाता है जब मां-बाप में से कोई एक आरक्षित वर्ग के हों, और दूसरे अनारक्षित वर्ग के। सुप्रीम कोर्ट की यह सावधानी एकदम सही है कि बच्चों को जिस समुदाय के परिवार में बड़ा होना पड़ा है, उन्हें उस समुदाय का मानने पर विचार करना चाहिए। चूंकि ऐसे मामले आरक्षण का एक बड़ा फायदा देने वाले रहते हैं, और उन्हें साबित करना बड़ा आसान नहीं रहता है, इसलिए अदालत ने ऐसे हर मामले को अलग-अलग तय करने की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट ने कल सोमवार को पहले महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाली यौन हिंसा के मामले में अदालतों की संवेदनशून्यता पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा कि वह सभी अदालतों के लिए संवेदनशीलता की गाइड लाइन तैयार करने जा रहा है। यह मामला एक महिला अधिकार संगठन की तरफ से अलग-अलग हाईकोर्ट जजों द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के खिलाफ दायर किया गया है। मामले की सुनवाई में जजों द्वारा यह भी कहा गया-बदकिस्मती से ऐसा कोई एक फैसला नहीं है, इलाहाबाद हाईकोर्ट की अन्य बेंच ने भी ऐसे ही फैसले दिए हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट, राजस्थान हाईकोर्ट के भी फैसलों इसी तरह की बात कही गई है जिनमें कुछ मामलों में तो बलात्कार-पीडि़ता को ही दोषी ठहराया गया है। अदालत को एक वकील ने यह भी बताया कि केरल की जिला अदालत में सेक्स-अपराध के एक मामले की बंद कमरे में हुई सुनवाई में कई लोग मौजूद थे जिन्होंने पीडि़ता को परेशान किया था।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने इसी साल मार्च के महीने में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज की टिप्पणी के खिलाफ अपने अखबार के यू-ट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर कड़ी भत्र्सना की थी। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने एक नाबालिग लडक़ी को पकडक़र एक पुल ने नीचे खींचकर ले जाने, उसके स्तन पकडऩे, और उसके पायजामे के नाड़े को तोडऩे को बलात्कार, बलात्कार की कोशिश नहीं माना था। हमने इस फैसले के अगले ही दिन इसकी कड़ी निंदा करते हुए उम्मीद की थी कि सुप्रीम कोर्ट इसे पलटेगा। कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के इस हिस्से पर रोक भी लगाई थी, लेकिन आधा-पौन साल गुजर जाने पर भी देश में सेक्स-हिंसा के शिकार लोगों पर अदालती हिंसा जारी है। सुप्रीम कोर्ट खासकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक के बाद दूसरे जज द्वारा ऐसी ही संवेदनशील टिप्पणियों को पढक़र हैरान था। एक दूसरे मामले में वहां के एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए यह लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। लोगों को यह भी याद होगा कि बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की एक एडिशनल जज पुष्पा गनेरीवाल ने एक बालिका के साथ यौन हिंसा के आरोपी को यह कहकर बरी कर दिया था कि कपड़े के ऊपर से स्तन दबाना यौन अपराध में नहीं आता, और आरोपी के ऊपर पॉक्सो एक्ट नहीं लगाया जा सकता। हमने उस वक्त भी अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट से इस फैसले को खारिज करने की मांग की थी।
आज इस पर एक बार फिर लिखने की जरूरत इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरूषवादी, महिला विरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरी तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं, उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। जो धर्म या जाति के पूर्वाग्रह से सने हुए रहते हैं, उस किस्म के मामलों से परे ही रखना चाहिए। हम जजों से यह तो उम्मीद नहीं करते किए पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से परे रखना चाहिए।
भारत की संसद देश भर के आंकड़ों को पाने के लिए सबसे अच्छी जगह मानी जाती है। दिल्ली में पीएचडी करने वाले बहुत से लोग अलग-अलग सांसदों के दफ्तरों में शोधकर्ता की तरह काम करते हैं, और उन्हीं से कोई जानकारी पाने के लिए संसद में सवाल लगवा देते हैं। जिस जानकारी को देश भर से जुटाना किसी व्यक्ति के लिए नामुमकिन हो, उसे संसद में एक सवाल से आसानी से हासिल किया जा सकता है। इसलिए पीएचडी करने वाले कई छात्र-छात्रा सांसदों के साथ मुफ्त में भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। अभी राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के जो आंकड़े बताए हैं, वे हैरान-परेशान करते हैं। 2020-21 से 2025-26 के बीच 65 लाख 70 हजार बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं, और इनमें 29.8 लाख कमउम्र छात्राएं शामिल हैं। यह हाल तब है जब केन्द्र सरकार का एक बड़ा बजट राज्यों को मिलता है स्कूली शिक्षा के लिए, और राज्यों का अपना पैसा भी इस पर खर्च होता है। लेकिन इन आंकड़ों से परे जो बात अधिक हैरान करती है वह अलग-अलग राज्यों के आंकड़े हैं। 2024 के मुकाबले इस बरस जो बढ़ोत्तरी हुई है उसमें सबसे कम बढ़ोत्तरी 12 फीसदी की ममता के बंगाल की है। फिर 14 फीसदी बढ़ोत्तरी कांग्रेस के कर्नाटक की है। 15 फीसदी बढ़ोत्तरी यूपी की है, झारखंड 16 फीसदी, एमपी 18 फीसदी, ओडिशा 20 फीसदी, बिहार 22 फीसदी बढ़ोत्तरी स्कूल छोडऩे वाले बच्चों में पिछले एक साल में हुई है। लेकिन सबसे ऊपर जो दो राज्य हैं, उनमें असम में 28 फीसदी बच्चों ने स्कूल छोड़ा है, और गुजरात में 340 फीसदी! चूंकि ये आंकड़े मोदी सरकार के दिए हुए हैं, और संसद में पेश हैं, इसलिए हम यह नहीं मान सकते कि गुजरात की ऐसी दुर्गति बताने वाले ये आंकड़े गलत होंगे।
देश में अलग-अलग राज्यों में स्कूलों के बाहर जो बच्चे रह गए हैं, उनके बारे में राज्यों ने अलग-अलग वजहें भी बताई हैं। असम में बाढ़, गरीबी, सामाजिक संघर्ष, और चाय बागानों के इलाकों को वजह बताया है। दूसरी तरफ गुजरात में लोगों के काम छोडक़र बाहर जाने, स्कूलों को जोडक़र उनकी संख्या कम करने, और औद्योगिक इलाकों के आर्थिक दबाव को बच्चों के स्कूल छोडऩे की वजह बताया है। एक वजह गुजरात के बारे में यह भी कही जा रही है कि पहले स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के पूरे आंकड़े दर्ज नहीं होते थे, और अब बेहतर तरीके से दर्ज हो रहे हैं, इसलिए ये बढ़े हुए दिख रहे हैं। अब गुजरात के बारे में यह ध्यान रखना होगा कि यह न सिर्फ एक बहुत ही विकसित और कारोबार-संपन्न राज्य है, बल्कि पिछले 30 साल 2 महीने से यहां पर लगातार भाजपा सरकार रही है। 1995 से अब तक अंगद के इस पांव को कोई हिला नहीं पाए हैं। इसमें से कई बरस, 12 साल 7 महीने एक पखवाड़ा तो नरेन्द्र मोदी की सरकार भी रही है। अब पिछले 11 बरस से नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए भी गुजरात के साथ किसी भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। पिछले बरस आंकड़े सही दर्ज नहीं हुए थे, और इस बरस सही दर्ज हुए हैं, तो इन दोनों बरसों में भी वहां भाजपा की ही सरकार रही है। मोदी के प्रधानमंत्री रहते और गुजरात में भाजपा की सरकार रहते यह उम्मीद की जाती है कि गुजरात अधिकतर पैमानों पर देश की एक सबसे अच्छी मिसाल रहे। फिर भी अगर वहां पिछले बरस के मुकाबले इस बरस स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की संख्या में 340 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई है, तो यह बहुत फिक्र की बात है। इसके तुरंत बाद जो दो राज्य आते हैं, वे असम और राजस्थान भी भाजपा शासन के ही हैं। केन्द्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी दोनों को अपने इन प्रदेशों पर खास गौर करना चाहिए।
हमने संसद में पेश इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ का जिक्र ढूंढने की कोशिश की, तो यह पिछले बरस के मुकाबले इस साल 12 फीसदी अधिक है। इन बच्चों के भीतर भी लड़कियां थोड़ी सी अधिक, 15 फीसदी बढ़ी हैं। पहली से आठवीं तक इस राज्य में स्कूल छोडऩे वाले बच्चे साल भर में 10 फीसदी बढ़े हैं, और नवमीं से बारहवीं के बीच 18 फीसदी। देश में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के राष्ट्रीय औसत से छत्तीसगढ़ के आंकड़े अधिक हैं। इस राज्य मेें नक्सल प्रभावित सुकमा में सबसे अधिक लड़कियों ने स्कूल छोड़ा है, और बहुत से मामलों में जल्दी शादी हो जाना, लड़कियों को घरेलू काम में लगा देना, और मां-बाप का मजदूरी के लिए दूसरे प्रदेश जाना भी एक वजह है।
बांग्लादेश के मौजूदा आर्मी चीफ जनरल वकार उज जमान के बारे में कल यह खबर थी कि किस तरह वहां के घरेलू मामलों में उनका दखल बढ़ते चल रहा है। वे बांग्लादेश के बाहर भी दूसरे देशों के साथ रिश्तों में दखल रखने लगे हैं। प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाने के बाद से वहां एक बहुत ही अस्थिर और नाजुक अंतरिम सरकार काम कर रही है जिसने आने वाले महीनों में चुनाव का वायदा किया है। लेकिन वहां की जमीनी हकीकत यह भी बताती है कि मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें वहां सिर उठा चुकी हैं, और अधिक से अधिक ताकतवर होती चल रही हैं। ऐसे में भारत में शेख हसीना को न केवल राजनीतिक शरण दे रखी है, बल्कि बांग्लादेश के मांगने पर उन्हें वहां भेजने से इंकार भी कर दिया है। बांग्लादेश की अदालती कार्रवाई उन्हें मौत की सजा सुना चुकी है, और उन्हें भारत में बनाए रखकर भारत सरकार बांग्लादेश के साथ एक तनातनी की नौबत में भी उलझी हुई है। ठीक इसी वक्त पाकिस्तान में संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी से सरकार ने ऐसे नए और बिल्कुल ही असाधारण कानून बनाए हैं जो वहां के मिलिटरी चीफ असीम मुनीर को फील्ड मार्शल बनाने के साथ-साथ उन्हें किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई से ऊपर भी कर चुके हैं। वे अपने किसी भी काम के लिए कानून के प्रति जवाबदेह नहीं रह गए हैं, और 2030 तक उनका कार्यकाल भी तय कर दिया गया है। इस तरह वे पाकिस्तान के इतिहास में संवैधानिक रूप से सबसे अधिकत ताकतवर व्यक्ति बन गए हैं जिनके अकेले के हाथ में वहां के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का सारा फैसला छोड़ दिया गया है। वे दुनिया के अकेले ऐसे फौजी अफसर हैं जो देश की किसी भी निर्वाचित ताकत से परे अकेले ही परमाणु हथियार और हमले पर फैसला ले सकते हैं। इसके साथ-साथ यह भी देखना जरूरी है कि किस तरह असीम मुनीर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के सबसे चहेते पाकिस्तानी हैं जिन्हें वे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से ऊपर महत्व देते हैं। यह भी देखने की जरूरत है कि किस तरह असीम मुनीर की अगुवाई में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक मिलिटरी समझौता किया है जिसमें ये दोनों देश एक-दूसरे पर हमले को अपने पर हमला मानेंगे, और एक साथ मिलकर निपटेंगे। अपने आपमें कंगालहाल बना हुआ पाकिस्तान आज सऊदी अरब की बेहिसाब दौलत के साथ जैसी बेकाबू फौजी ताकत बन सकता है, वह भारत के पड़ोस की शक्ल में एक खतरा है।
लगे हाथों यह भी देखने की जरूरत है कि चीन परंपरागत रूप से भारत का फौजी दुश्मन रहते आया है, और भारत की जंग की तैयारी में चीन को कभी अनदेखा नहीं किया जा सकता। साथ-साथ अभी भारत की सरहद से लगा हुआ म्यांमार भी है जो कि एक बहुत ही भयानक खूंखार फौजी हुकूमत के तहत चल रहा है, और उसके रिश्ते चीन से अच्छे हैं, भारत से नहीं। जब हम भारत के नक्शे को देखते हैं तो इसकी 15 हजार किलोमीटर की जमीनी सरहदों में से इन चार देशों की सरहद ही 83 फीसदी बनती है। बांग्लादेश के साथ भारत 4 हजार किलोमीटर से अधिक सीमा रखता है, चीन के साथ 35 सौ किलोमीटर, पाकिस्तान के साथ 33 सौ किलोमीटर, और म्यांमार के साथ 16 सौ किलोमीटर से अधिक की जमीनी सरहद भारत की है। मतलब यह कि भारत आज मैदानी इलाकों में 83 फीसदी सरहद अपने खिलाफ खड़ी ताकतों के साथ रखता है। इनमें बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच पिछले साल भर से अधिक में एक बिल्कुल ही अविश्वसनीय सा तालमेल विकसित हो गया है, और दोनों तरफ फौजी मुखिया भी काबू में हैं। चीन का हाथ इन दोनों ही देशों पर है। इन तीनों ही देशों की बड़ी फौजी हसरतें हैं, और भारत के साथ चीन और पाकिस्तान की जंग का इतिहास बड़ा लंबा है।
पिछली पौन सदी का भारत का सरहदी इतिहास देखें, तो चीन और पाकिस्तान के साथ जंग के दिनों के अलावा इतना अधिक तनाव, और इतना अधिक खतरा शायद कभी नहीं रहा। फिर 1971 में जब इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को तोडक़र बांग्लादेश अलग बनवा दिया, तब तक भारत-पाकिस्तान के दो हिस्सों से घिरा हुआ था, लेकिन बांग्लादेश की ताजा क्रांति (या बगावत?) के पहले तक भारत के बांग्लादेश से रिश्ते अच्छे थे। अब ये रिश्ते तकरीबन उतने ही खराब हैं जितने कि पाकिस्तान के साथ हैं। यह नौबत भारत की फौजी तैयारियों के लिए बहुत ही तनावपूर्ण हैं। चार सरहदी देशों में लोकतंत्र का नामोनिशान न हों, फौज की ताकत हो, या चीन जैसी अलोकतांत्रिक सरकार के हाथ असीमित परमाणु ताकत हो, तो इनसे घिरा हुआ देश कितने चैन से सो सकता है? आज भी इन सरहदी इलाकों में हर तरफ से वहां के लोगों की अवैध घुसपैठ, भारतीय सरहद के भीतर चीनी अवैध कब्जे, म्यांमार से हथियार और नशे की तस्करी, चारों तरफ से आतंकियों की आवाजाही, सरहद के नक्शों को लेकर इन सभी से टकराव, यह सब बहुत फिक्र की नौबत है।
भारत में नए बने हुए शहर तो चंडीगढ़, नया रायपुर, या गांधीनगर जैसे गिनेचुने हैं। अधिकतर शहर तो पुराने शहरों का ही चारों तरफ, या आसमान की तरफ विस्तार करके ही बढ़ते चले जा रहे हैं। इनके फैलाव में एक बड़ी बात यह भी जुड़ी हुई है कि न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में शहरों की आबादी छलांग लगाकर बढ़ रही है, और गांवों की आबादी घटती चली जा रही है। फिर शहरों में इंसानों की टक्कर में ही गाडिय़ों की आबादी भी बढ़ रही है। आज अधिकतर परिवारों में पढऩे वाले बच्चों, या कामकाजी लोगों जितनी ही दुपहिया या चौपहिया रहने लगी हैं। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, और बाजार इन सभी में आने-जाने के घंटे सीमित रहते हैं, और सडक़ों पर भारी जाम लगना भारत की एक शहरी पहचान हो गई है। ऐसे में आज केंद्र और राज्य सरकार की ओर से रायपुर शहर के लिए दो बड़ी घोषणाएं हुई हैं, शहर के कई चौराहों को पार करते हुए एक छोटा सा फ्लाईओवर पौने दो सौ करोड़ रुपये की लागत से मंजूर किया गया है और दूसरी तरफ शहर के चारों तरफ की रिंग रोड़ के किनारे बनी सर्विस लेन की चौड़ाई को पांच मीटर से बढ़ाकर 11 मीटर करने की मंजूरी केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल के अनुरोध पर दी है। पहली नजर में इन दोनों का काम पूरा हो जाने पर राजधानी के लाखों लोगों को राहत मिलनी चाहिए, हालांकि ये शहर की ट्रैफिक की दिक्कतों के एक छोटे हिस्से का समाधान ही है। इसके बाद भी बाकी दिक्कतें तो बनी ही रहेंगी। इन दोनों में सैकड़ों करोड़ रुपये लगने हैं और यह पैसा जनता की जेब से ही जाएगा।
अब अगर शहरीकरण के किसी छात्र की नजर से हम नमूने के तौर पर किसी भी शहर को देखें तो वहां चौड़ी होने वाली अधिकतर सडक़ों की चौड़ाई गैरकानूनी पार्किंग में जाती है, या फिर उनके किनारे काम करने वाले कारोबारी ही कब्जा कर लेते हैं, और नई बनी चौड़ाई सडक़ के काम नहीं आती, कारोबार के ही काम आती है। यह हाल हमने शहर के भीतर देखा है जहां सरकारी स्कूलों के मैदान काटकर सडक़ चौड़ी की गई, तर्क दिया गया कि मैदान में खेलने वाले खिलाडिय़ों के लिए पार्किंग रहेगी, लेकिन वहां पर आसपास के संपन्न लोगों की कारों की स्थाई पार्किंग हो गई है, मैदान के किसी काम की नहीं रह गई। इसी तरह जहां-जहां सडक़ें चौड़ी की जाती हंै, वहां ट्रांसपोर्ट और बस कारोबारी अपनी गाडिय़ां स्थाई रूप से लगा देते हैं, और चौड़ीकरण की मेहनत, सडक़ की लागत यह सब कुछ कारोबार-कल्याण के लिए किया गया काम होकर रह जाता है।
कारोबारी पार्किंग से परे बाजार के ग्राहकों की पार्किंग, और सडक़ किनारे रहने वाले लोगों की निजी गाडिय़ों से सडक़ों की चौड़ाई खत्म हो जाती है। इस पार्किंग के लिए क्यों तो सरकार को किनारे के लोगों को मुआवजा देकर, उनकी जगह लेकर सडक़ चौड़ी करनी चाहिए, और भारी गाडिय़ों के चलने लायक महंगी सडक़ बनवानी चाहिए? जिन दिक्कतों को गिनाकर शहरों में सैकड़ों-हजारों करोड़ के ये प्रोजेक्ट मंजूर किए जाते हंै, वे दिक्कतें बहुत हद तक तो म्युनिसिपल, जिला प्रशासन, और पुलिस की एक मामूली सी टीम दूर कर सकती है। लेकिन यह काम बिना किसी लागत के होगा, इसलिए भी उसमें किसी की दिलचस्पी नहीं रहती। फिर सडक़ किनारे के बड़े लोगों के कारोबारी कब्जों को हटाने के बजाय अफसर किसी सडक़ के ठेलों और गुमटियों को हटाकर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। इन छोटे लोगों के पास तो कारोबार की कुल उतनी सी जगह रहती है, लेकिन जिनके पास धंधे की अपनी बहुत बड़ी जगह है, वे अगर सामने और कब्जा करते हैं, या गाडिय़ों के कारोबारी सडक़ों पर पार्किंग और गोदाम बना लेते हैं, तो वह अधिक नाजायज बात है जिसे दूर करके सडक़ों को पर्याप्त चौड़ा किया जा सकता है। दिक्कत यह है कि जिन निर्वाचित स्थानीय संस्थाओं की जिम्मेदारी बड़े कारोबारियों के कब्जे, और गाडिय़ों की अवैध पार्किंग को हटाने की है, वे संस्थाएं भी कुछ नए प्रोजेक्ट बनाने के काम में जुट जाती हैं, क्योंकि उनमें तरह-तरह के फायदे रहते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे हुए गरियाबंद जिले में एक पटवारी को गिरफ्तारी का डर दिखाकर ब्लैकमेल करने वाले दो ऐसे मेडिकल छात्र पुलिस के हाथ लगे हैं जो जगदलपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 17 साल से एमबीबीएस में पढ़ रहे हैं। अभी कुछ बरस पहले एमबीबीएस के पांच साल के कोर्स को दस साल में पूरा कर लेने की समय सीमा तय की गई है, लेकिन ये दोनों छात्र उसके पहले से पढ़ते हुए आ रहे हैं, और उन पर शायद यह सीमा लागू नहीं हो रही है। फिलहाल खबर इनके मुजरिम होने की है, इनके 17 बरस तक एमबीबीएस में पढ़ाई जारी रखने की नहीं है जो कि पांच साल में इन्हें कर लेना था। अब जब इस मामले में गिरफ्तारी हुई है तो पता लगा है कि धमकी और ब्लैकमेलिंग से परे ये दोनों पहले पीएमटी के इम्तिहान में दूसरे लोगों को बिठाकर परीक्षा पास करवाने का ठेका ले चुके थे, और उसमें भी इनकी गिरफ्तारी हो चुकी थी। इनके खिलाफ नौकरी लगवाने के नाम पर ठगने के भी केस दर्ज हैं, और कुछ दूसरे मामले भी। निखिल राज और चन्द्रशेखर सेन नाम के ये दो छात्र बड़े ही हरफनमौला दिख रहे हैं, और ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग जैसी कई हरकतों के बड़े जानकार हैं।
सरकारी कॉलेजों में जहां एक डॉक्टर की पढ़ाई पर सरकार के करोड़ों रूपए खर्च होते हैं, वहां अगर कोई पांच बरस का कोर्स 17 बरस में भी पूरा न करे, तो उस पर सरकार के साढ़े तीन गुना तो खर्च हो ही चुके हैं, और उनके डॉक्टर बनने का भी कोई आसार दिख नहीं रहा है। सरकार के नियम चाहे जो हों, सरकारी कॉलेजों की क्षमता तो बड़ी सीमित रहती है, और वहां बहुत मामूली फीस पर सरकारी खर्च से पढ़ाई होती है तो वहां के छात्र-छात्राओं से एक ईमानदार मेहनत की उम्मीद करना गलत नहीं होगा। जिन लोगों की दिलचस्पी एमबीबीएस की पढ़ाई में नहीं है, उनके लिए अभी जो दस साल की समय सीमा तय की गई है, वह तो जायज है ही, जरूरत से अधिक ही है। सीमा से दोगुना वक्त किसी को क्यों दिया जाना चाहिए? और सरकारी कॉलेज में भी यह देखना चाहिए कि अगर आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के बच्चे बार-बार फेल होते हैं, तो उनसे अतिरिक्त फीस लेनी चाहिए। देश में मेडिकल कॉलेज जरूरत से बहुत कम हैं, उनमें सीटें भी आबादी के अनुपात में बहुत कम हैं, और ऐसे में कॉलेजों की क्षमता को इस तरह बर्बाद नहीं करना चाहिए।
किसी भी कॉलेज में पढ़ाई, और उसके साथ-साथ जुर्म भी करने वाले लोगों के लिए अलग से कोई कानून तो नहीं बनाया जा सकता है, लेकिन कॉलेज यह तो देख ही सकता है कि उसके छात्र-छात्रा नियमित रूप से पढ़ाई कर रहे हैं या नहीं, और अगर वे क्लास में नहीं आते हैं, तो उन्हें निकालकर बाकी लोगों के सामने एक मिसाल पेश करनी चाहिए। बोलचाल में कहा जाता है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, असल जिंदगी में हम देखते हैं कि किसी दफ्तर में एक कामचोर की वजह से बाकी लोगों को भी कामचोरी का संक्रमण होने लगता है, एक-दो छात्र-छात्राओं की अराजकता से बाकी भी अराजक होने लगते हैं, नशा एक-दो से शुरू होता है, और फिर बाकी लोगों तक फैलने लगता है। एमबीबीएस के पांच साल के कोर्स में 17 साल लगा चुके इन अधेड़ हो चुके आदमियों को अगर जुर्म में ही दिलचस्पी है, तो उन्हें चिकित्सा शिक्षा पर बोझ क्यों बनने दिया जाए?
लेकिन सरकार के हाथ-पैर बहुत धीरे-धीरे हिलते हैं। उसके कई कर्मचारी और अधिकारी सालों तक गायब रहते हैं, न छुट्टी ली हुई रहती, न काम पर आते। इसके बाद भी सरकार उन्हें हटाने में बरसों लगा देती है। अदालतें भी मानो उन्हें राहत देने में यकीन रखती हैं। सरकार को अपने गायब रहने वाले, काम न करने वाले, शराब पीकर आने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को बहुत तेजी से बर्खास्त करना चाहिए। देश में बेरोजगारी इतनी है कि एक सरकारी दफ्तर में चपरासी बनने के लिए सैकड़ों पोस्ट ग्रेजुएट, पीएचडीधारी, और एमबीए या बीटेक जैसी पढ़ाई किए हुए लोग कतार में लग जाते हैं। ऐसे में औसत से घटिया दर्जे के कर्मचारी-अधिकारी को हरामखोरी के बावजूद बनाए रखना जनता के पैसों की बर्बादी है, और जनता के कामकाज की हेठी भी है। सरकार के फैसले जब किसी नेता या बड़े अफसर की नापसंदगी की वजह से लेना होता है, तो वे रातोंरात ले लिए जाते हैं, और कुछ घंटों में ही आदेश निकल जाते हैं। दूसरी तरफ अगर किसी नेता-अफसर की नाराजगी नहीं है, तो लोग बरसों तक हरामखोरी करते हुए गायब रह सकते हैं। किसी सरकारी कॉलेज में पढऩे वाले लोग हों, या स्कूल में पढ़ाने वाले, किसी और सरकारी दफ्तर में काम करने वाले, उनकी सेवा शर्तों में यह फेरबदल होना चाहिए कि वे काम के प्रति लापरवाही और गैरजिम्मेदारी दिखाकर जनता के पैसों से लंबे समय तक तनख्वाह नहीं पा सकते, या पढऩे के नाम पर बिना पढ़ाई किए हुए कॉलेज में बने नहीं रह सकते। जिन लोगों पर पुराने और मौजूदा सेवा नियम लागू होते हैं, उनसे परे जिन नए लोगों को काम पर रखा जा रहा है, उनके लिए अधिक कड़े नियम पहले दिन से बना देने चाहिए।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से लड़कियों को ले जाकर महानगरों में बेचने का काम चलते ही रहता है। इसे पूरी तरह बिक्री कहने पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, क्योंकि इनमें से कुछ लड़कियां बालिग रहती हैं, जाती अपनी मर्जी से हैं, लेकिन उन्हें काम दिलाने का लालच देकर ले जाया जाता है, लेकिन वहां ले जाकर बंधुआ मजदूर की तरह रखा जाता है, किसी प्लेसमेंट एजेंसी के मार्फत किसी घर में चौबीस घंटे की नौकरी दिलवाई जाती है, या कहीं किसी की जबर्दस्ती शादी करवा दी जाती है। कुछ मामलों में उन्हें देह के धंधे में भी धकेल दिया जाता है। ऐसा ही एक मामला अभी सामने आया है जिसमें सरगुजा जिले की दो युवतियों को नौकरी के नाम से मध्यप्रदेश के उज्जैन ले जाकर ढाई लाख रूपए में बेच दिया गया, और इनमें से एक की वहां जबर्दस्ती शादी करवा दी गई, जबकि वह पहले से शादीशुदा बताई जा रही है। इन्हें बलपूर्वक बंद करके रखा गया, और इन्हें छोडऩे के एवज में इनके घरवालों से पैसे मांगे जा रहे हैं।
ये जानकारियां अभी पुलिस में इन युवतियों और इनके घरवालों की दी हुई हैं, और हो सकता है कि सच इसके कुछ दाएं-बाएं भी हों। लेकिन यह तो सच है कि बिना किसी हिफाजत के, या कानूनी औपचारिकता के छत्तीसगढ़ की लड़कियों को दूसरे प्रदेशों में अलग-अलग मकसद से ले जाया जाता है। पिछले कुछ महीनों में कई अलग-अलग घटनाओं में बिहार की कुछ जगहों से छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को चकलाघरों से बरामद किया गया है, और कुछ दूसरी लड़कियां वहां मेलों में नाच दिखाने वाले कारोबारियों के पास बंधक मिली हैं। छत्तीसगढ़ और दूसरे प्रदेशों की पुलिस कभी मिलकर, और कभी अलग-अलग भी काम करते हुए इन लड़कियों को बरामद करती हैं। कुछ गैरसरकारी स्वयंसेवी संगठन भी लड़कियों को बचाने के लिए पुलिस को खबर करते हैं, और कार्रवाई में साथ भी डटे रहते हैं। हर बरस दर्जनों ऐसी लड़कियां दूसरे प्रदेशों से छुड़ाकर लाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ के सैकड़ों लोग बेहतर मजदूरी के लिए दूसरे प्रदेशों में जाते हैं, और उन्हें वहां पर बंधक बनाकर रख लिया जाता है। ऐसे मामले भी राज्य सरकार और पुलिस की दखल से सुलझते हैं, और गिरफ्तारियां भी होती हैं।
अब जो मजदूर परिवार अपनी मर्जी से दूसरे प्रदेशों में जाते हैं, और खालिस मजदूरी के लिए जाते हैं, उन पर अगर कानूनी औपचारिकताएं पूरी करके जाने का दबाव डाला जाएगा, तो वह सरकारी अमले की वसूली का एक और नाका शुरू हो जाएगा। लेकिन प्रदेश के लोग कहां-कहां काम कर रहे हैं इसकी जानकारी अगर नहीं रहेगी, तो शोषण के कई हफ्ते या महीने निकल जाने के बाद उनमें से कोई राज्य में किसी को खबर करेंगे तो ही सरकार को खबर होगी। आज देश के बाहर बसे हुए लोगों से शादी के लिए भारत की जो लड़कियां जाती हैं, भारत सरकार उनकी भी जानकारी दर्ज करने की एक योजना चलाती है ताकि दूसरे देश की जमीन पर उनके नए परिवार उनके साथ कोई जुल्म न करें। भारत के प्रदेशों में दूसरे प्रदेशों में ले जाए जाने वाले लोगों की हिफाजत के लिए ऐसे अधिक इंतजाम नहीं हैं। जब कभी बड़ी संख्या में मजदूरों को लेकर जाने के लिए दलाल यहां आते हैं, तो उन पर जरूर पुलिस यह सख्ती करती है कि वे सूचना देकर ही लेकर जाएं। जब बड़ी संख्या में लोग स्टेशन या बस स्टैंड पर दिखते हैं, तो पुलिस पूछताछ भी कर लेती है। लेकिन जब सीमित संख्या में लड़कियों को कोई बाहर ले जाए, और वे पहली नजर में बालिग लगें, तो पुलिस की नजर भी चूक सकती है।
छत्तीसगढ़ की एक तिहाई आबादी आदिवासियों की है, और इस राज्य से मानव तस्करी के अधिकतर मामलों की शिकार लड़कियां आदिवासी ही रहती हैं। कई लड़कियां पढ़-लिख लेने के बाद महानगरों की जिंदगी से आकर्षित होकर भी वहां काम करने जाना चाहती हैं, लेकिन वहां के शोषण के खतरों के खिलाफ उनके पास बचाव का कोई जरिया नहीं रहता। ऐसे में सभी राज्यों को एक-दूसरे के साथ तालमेल करके उन राज्यों से आए हुए मजदूरों और कामगारों की जानकारी एक-दूसरे को देना चाहिए। इसके लिए सरकारों का कोई आंतरिक पोर्टल ऐसा हो सकता है जो कि किसी राज्य में काम कर रहे, बसे हुए, या फंसे हुए लोगों की जानकारी पल भर में उस पोर्टल पर अपलोड करे, तो उनके गृहप्रदेश की पुलिस या दूसरे महकमे को वह जानकारी दिख जाए। इसके लिए हर प्रदेश को ऐसे समन्वय-अधिकारी नियुक्त करने चाहिए जो कि अपनी जमीन के ऐसे सारे मामलों को संबंधित राज्यों को दे सकें, या दूसरे राज्यों से जानकारी या शिकायत मिलने पर उसे अपने जिलों तक भेजकर जानकारी ले सकें।
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य बहुत संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सरहद पर भी बसे हुए हैं। वे भौगोलिक रूप से बाकी भारत से थोड़े से अलग भी हैं, और उनमें से कई राज्यों की राजनीति एक अलग और अजीब किस्म की अस्थिरता का शिकार रहती है। इनमें से एक अरूणाचल प्रदेश भी है जहां पर फौजी टकराव वाले चीन के साथ सरहद सैकड़ों किलोमीटर लंबी है, 890 किलोमीटर। जाहिर है कि यह प्रदेश जिस पर कि चीन अपना होने का दावा करता है, भारत सरकार की नजरों में अधिक संवेदनशील रहता है। ऐसे में यहां की स्थानीय राजनीति को भी देश की राष्ट्रीय पार्टियां कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। फिलहाल मुद्दे की बात करें, तो अभी वहां भाजपा की अगुवाई वाली राज्य सरकार है जिसके मुख्यमंत्री पेमा खांडू कुछ और पार्टियां बदल-बदलकर भी मुख्यमंत्री बने हुए हैं। जब उनकी कुर्सी डगमगाती है, वे पार्टी या गठबंधन बदल लेते हैं, और सीएम बने रहते हैं। उन पर और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के असाधारण आरोप लगते आए हैं, लेकिन जिस तरह उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई बातों को अनदेखा करके उन्हें देश की मूलधारा में बनाए रखने की कोशिश होती है, अरूणाचल में भी पेमा खांडू के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से आगे जनहित याचिका भी लगी हुई है, लेकिन वे डंके की चोट पर अपना सिलसिला जारी रखे हुए हैं।
उनके खिलाफ अदालत में लगी एक जनहित याचिका में कहा गया है कि उनकी सरकार हर तरह के बड़े ठेके अपने परिवार, या बहुत करीबी लोगों की कंपनियों को देती है। ठेके देने के लिए जो मान्य प्रक्रिया है, उसे कूड़े की टोकरी में डालकर मुख्यमंत्री मनमाने तरीके से जनता का खजाना अपने घर की तरफ लगातार मोड़े रहते हैं। अदालत ने इस याचिका पर केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजे हैं, और पिछले दस बरस के सारे सरकारी ठेकों की जानकारी मांगी है। इसी से खबरें निकलकर सामने आई हैं कि बिना किसी मुकाबले के आपस में ही मिलीभगत (या मिलेमौलाना कहा जाए?) करके मनमाने रेट पर सारा माल घर में लाने का काम मुख्यमंत्री लगातार करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कल इस बात पर भारी हैरानी जाहिर की कि दस साल में एक जिले में 31 ठेके सीएम के परिवार को मिले हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने राज्य सरकार के पिछले हलफनामों की जानकारी गिनाते हुए दावा किया कि सभी मामलों में कुल दो कंपनियों ने टेंडर भरे, और सीएम से जुड़ी कंपनियों ने 0.01 फीसदी कम रेट भरा, और उसे सब काम मिल गए। अदालत में ही यह जानकारी सामने आई कि पेमा खांडू देश के दूसरे सबसे अमीर सीएम हैं, उनके पास 332 करोड़ की संपत्ति बताई गई है। परिवार के सारे के सारे लोग ठेकेदार हैं, और कंस्ट्रक्शन कंपनियां चलाते हैं। लेकिन इस सीएम के भ्रष्टाचार को सिर्फ भाजपा से जोडऩा ठीक नहीं है क्योंकि वे कांग्रेस के भी सीएम रहे हैं, और फिर किसी दूसरी क्षेत्रीय पार्टी की भी। कभी वे निर्दलीय चुनाव जीतते हैं, तो कभी निर्विरोध।
हम कुछ देर के लिए इस एक प्रदेश के इस एक सीएम को छोड़ दें, तो देश में कई ऐसे और मंत्री-मुख्यमंत्री रहे हैं जिनकी दौलत का कोई थाह नहीं लगता। महाराष्ट्र में शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार के बीच सत्ता में बने रहने के लिए जिस तरह की नूरा-कुश्ती चलती रहती है, उससे परे इन दोनों की दौलत बेहिसाब मानी जाती है। अजीत पवार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगते रहते हैं, और उनके दलबदल के साथ वे आरोप कचरे की टोकरी में जाते रहते हैं। कर्नाटक के बेल्लारी के रेड्डी भाईयों की वह तस्वीर लोगों को याद होगी जिसमें उन दोनों के सिर पर हाथ रखकर सुषमा स्वराज खड़ी थीं जो कि कर्नाटक से इनके इलाके से चुनाव भी लडक़र आई थीं। लालू यादव जेल में पड़े हुए ही हैं, फिर चाहे वे जमानत पर बाहर हैं। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार के कार्यकाल के हजारों करोड़ के मामले अदालत में चल रहे हैं, और उनके इर्द-गिर्द के तकरीबन तमाम ताकतवर अफसर जेल में हैं, और बेटा भी जमानत नहीं पा सक रहा है। अलग-अलग प्रदेशों में भ्रष्टाचार आसमान छूता दिखता है, लेकिन वामपंथियों के अलावा किसी राजनीतिक दल को भ्रष्टाचार से परहेज नहीं दिखता। वामपंथियों से सांप-नेवले जैसे मधुर संबंध रखने वाली ममता बैनर्जी भी अपने कई कार्यकाल में वामपंथियों के कार्यकाल को लेकर किसी को जेल नहीं भेज पाई हैं, यह अलग बात है कि उन्हीं के मंत्री रहे लोग अपनी प्रेमिका वगैरह के साथ भी जेल में हैं, या बेल पर हैं।
अभी पिछले महीने दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर कई विमानों के उडऩे और उतरने में दिक्कत आई थी, और उन्हें जो सिग्नल मिलने चाहिए थे, वे गड़बड़ लग रहे थे। गनीमत ये है कि बिना किसी हादसे के वह दौर निकल गया लेकिन एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों को तुरंत ही यह बात समझ में आ गई थी कि किसी ने विमानों, और कंट्रोल टॉवर के जीपीएस सिग्नलों के साथ छेड़छाड़ की थी। यह बात केंद्र सरकार ने संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताई है और कहा है कि जीपीएस-स्पूफिंग की यह हरकत दिल्ली के अलावा कोलकाता, अमृतसर, मुंबई, हैदराबाद, बैंगलुरू, और चेन्नई एयरपोर्ट पर भी हुई थी। मतलब यह कि देश के सात अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों को एक ऐसी छेडख़ानी का निशाना बनाया गया था जिससे विमान हादसे हो सकते थे। एक ही वक्त जब ऐसी जीपीएस छेडख़ानी इतनी जगहों पर एक साथ हो सकती है, तो फिर बाकी एयरपोर्ट पर भी हो सकती है, और तकनीकी सावधानी में भारत से कमजोर और भी बहुत से देशों में हो सकती है। अभी कल-परसों ही हमने अपने अखबार या यू-ट्यूब चैनल पर साइबर हमलों के बारे में कहा था कि एआई से लैस कुछ आतंकी संगठन अपने अलग-अलग किस्म के एजेंडा को लेकर हर किस्म के कंप्यूटर और डिजिटल सिस्टम पर हमले कर सकते हैं। हमने कहा ही था, और कल संसद में सरकार ने एक सवाल के जवाब में यह बात मान भी ली है। समाचार में कहा जा रहा है कि अमरीका में बैठे हुए लोग उन्हें हासिल उपकरणों से ऐसे नकली सिग्नल कहीं भी भेज सकते हैं। आज से 25 साल पहले बनी हॉलीवुड की फिल्मों में साइबर हमलों और किसी देश की बिजली व्यवस्था, ट्रैफिक व्यवस्था, बैंकिंग व्यवस्था पर पूरी तरह कब्जा कर लेने के मुजरिमों या आतंकियों के हमले दिखाए जा चुके हैं। अब बस धीरे-धीरे वे सिनेमाघरों के पर्दों से असल जमीन पर उतर रहे हैं।
कोई अगर अपने घर बैठे मामूली उपकरणों और कंप्यूटरों का इस्तेमाल करके विमानों को फर्जी जीपीएस सिग्नल भेज सकते हैं, तो फिर इजराइल जैसे हमलावर देश जो कि पूरी दुनिया में हमलावर और घुसपैठिया टेक्नोलॉजी बेचने के लिए बदनाम हैं, वे क्या-क्या नहीं कर सकते? लोगों को अभी पिछले ही साल की वह घटना याद होगी कि अपने को नापसंद एक दूसरे देश के संगठन के तमाम नेताओं के इस्तेमाल किए जा रहे पेजर संचार उपकरणों में इजराइल ने किस तरह एक साथ विस्फोट किया था। मतलब यह कि उसे ऐसी तकनीकी ताकत हासिल है, दुनियाभर में ऐसे लोग बिखरे हुए हैं जिन्हें वह अपना दुश्मन मानता है, और इजराइली कारोबारी लगातार इस तरह की तबाही लाने वाले उपकरण और टेक्नॉलॉजी बनाने और बेचने के लिए बदनाम भी हैं। ऐसे में जैसे-जैसे दुनिया टेक्नॉलॉजी पर अधिक, और अधिक आश्रित होती जाएगी, वैसे-वैसे वह खतरे, और अधिक खतरे में पड़ती भी जाएगी। अब आज भारत के सात अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर अगर एक साथ गड़बड़ी फैलाई जा सकी है, तो यह सोचा जा सकता है कि देश में आने, और यहां से जाने वाले मुसाफिरों और सामानों में कितनी बाधा खड़ी की जा सकती है।
दुनिया में जगह-जगह सार्वजनिक उपयोग की प्रणालियों और टेकनॉलॉजी में छेडख़ानी के खतरों के बारे में हम लगातार आगाह करते हैं कि कुछ आतंकी संगठन एआई का इस्तेमाल करके किसी खास तबके को निशाना बना सकते हैं। अब पर्यावरण बचाने के लिए कोई ऐसा संगठन एआई आधारित आतंक का सहारा ले सकता है, और अतिसंपन्न आबादियों तक बिजली पहुंचाने वाले बिजलीघरों को ठप्प कर सकता है कि एक-एक व्यक्ति इतनी बिजली इस्तेमाल क्यों करे? इसी तरह एक-एक मुसाफिर को लेकर जाने वाले पर्यावरण के लिए बहुत महंगे निजी विमानों की आवाजाही को ऐसी ही जीपीएस-स्पूफिंग से रोका-टोका जा सकता है, उन्हें तबाह भी किया जा सकता है। ऐसा करने वाले आतंकी समूह अपनी हरकत को यह कहते हुए भी जायज ठहरा सकते हैं कि वे पर्यावरण बर्बाद करने वालों को एक चेतावनी दे रहे थे।
ऑटोमेशन किस तरह जिंदगी को प्रभावित कर रहा है इसकी कुछ मिसालें हर हफ्ते कहीं न कहीं सामने आती हैं जब सडक़ों पर कोई गाड़ी एक्सीडेंट का शिकार होती है, उसमें आग लग जाती है, और उसके दरवाजे ऑटोलॉक से बंद हो जाते हैं, जो कि भीतर के मुसाफिर खोल भी नहीं पाते, जलकर खत्म हो जाते हैं। अधिक से अधिक ऑटोमेशन काम की सहूलियत को बढ़ाता है, लेकिन काम को खतरनाक भी करता है। आज पूरी दुनिया में अधिकतर काम इसी तरह की टेक्नॉलॉजी के अधिक से अधिक मोहताज हो चुके हैं। लोग अपने मोबाइल फोन पर कोई काम करके दुनिया के सुपर कंप्यूटरों को काम से लगा सकते हैं। हम एआई के एक बहुत मामूली औजार से कोई सवाल करके धरती के किसी दूसरे कोने के कंप्यूटरों को व्यस्त कर सकते हैं। एक-दूसरे से इस तरह, इस हद तक, बेतार जुड़ी हुई दुनिया जितनी सहूलियत की लगती है, उतनी ही वह नाजुक भी हो गई है। आज दुनिया के जो काम पूरी तरह कंप्यूटरों पर टिक गए हैं, और जिन्होंने अपना कोई गैर-कंप्यूटरीय विकल्प बनाकर नहीं रखा है, उन्हें यह सोचना चाहिए कि कंप्यूटर सिस्टम बंद हो जाने से कितने मरीजों का इलाज ही बंद हो जाएगा?
छत्तीसगढ़ के बालक और बालिका संप्रेक्षण गृहों से लडक़े-लड़कियों का भाग निकलना जारी है। दुर्ग के बाल संप्रेक्षण गृह से इस महीने दो घटनाओं में दस नाबालिग लडक़े भाग निकले जिनमें कुछ तो हत्या और लूट जैसे जुर्म में शामिल थे। शायद कुछ बरस पहले यही बाल सुधारगृह ऐसा था जिसमें लडक़े बागी होकर छत पर चढ़ गए थे, और उन्हें काबू करने के लिए पहुंचे लोगों पर फेंकने के लिए गैस सिलेंडर उठा लिया था। लडक़ों का यह हाल तो अक्सर ही कहीं न कहीं से सुनाई देता है, अब छत्तीसगढ़ के ही राजनांदगांव में बालिका सुधारगृह से निकल भागीं 13 और 15 साल की लड़कियों की तलाश की जा रही है। वे तीन-चार दिन ही यहां पर रही थीं, और मौका मिलते ही दीवाल फांदकर भाग निकलीं। ये वो जगहें हैं जो कि किसी एनजीओ की चलाई हुई नहीं हैं, ये खुद राज्य सरकार के चलाए हुए सुधार केंद्र हैं, और किशोर न्यायालय भी यह मानकर बच्चों को यहां भेजते हैं कि वे यहां से सुधरकर घर लौटेंगे। इन जगहों की जो हालत सुनाई पड़ती है, उनसे साफ होता है कि यहां से नाबालिग बच्चे और अधिक खूंखार, या पेशेवर मुजरिम बनकर निकलते हैं। किशोर न्याय की पूरी सोच इन जगहों की असलियत को देखने पर दम तोड़ती हुई दिखती है। किसी तरह का कोई सुधार इन जगहों पर बच्चों में नहीं हो सकता, बल्कि अधिक बड़ा जुर्म करके यहां पहुंचे हुए बच्चे छोटा जुर्म करके आए हुए बच्चों के लिए पेशेवर-प्रशिक्षक साबित होते हैं। जिस जगह से बच्चे फरार होते हों, उस जगह पर उनमें कोई सुधार होने की कल्पना ही बेबुनियाद रहती है।
भारत में नाबालिगों के लिए कानून, उनके लिए बनी अलग से अदालतें, उनकी जांच और मुकदमे की प्रक्रिया, और उनके सुधारगृह, इन सबमें बुनियादी कमजोरियां हैं, जिनमें से एक, कानून पर तो अलग-अलग जगहों पर बहस चल भी रही है, लेकिन बाकी सबको तो सुधारने की कोई चर्चा तक नहीं होती। गंभीर अपराधों के मामलों में उनमें शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर उन पर मुकदमा चलाया जाए, यह सवाल अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़ा हुआ है। इसमें दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, और अदालत ने कोई आखिरी फैसला अब तक शायद दिया नहीं है। दरअसल नाबालिग हाल के बरसों में जिस किस्म के अपराधों में शामिल हो रहे हैं, उनसे समाज में ऐसी भावना बन रही है कि इन्हें उम्र की छूट क्यों दी जाए? जब वे गैंगरेप कर रहे हैं, कत्ल कर रहे हैं, रेप के बाद कत्ल कर रहे हैं, तो फिर वे किस कोने से नाबालिग रह गए हैं? दिल्ली का सबसे चर्चित निर्भया कांड ऐसा था जिसके सामूहिक बलात्कारियों और कातिलों में एक नाबालिग भी था, और उसी ने सबसे अधिक हिंसा की थी। वह तो बाद में सुधारगृह में कुछ बरस गुजारकर बाहर निकलकर सरकारी पुनर्वास के तहत कहीं बस गया, लेकिन उसने यह बहस छोड़ दी कि वह किस कोने से नाबालिग होने की रियायत का हकदार है?
सुधारगृहों की एक दिक्कत यह भी है कि वे बालिगों की जेलों की तरह की व्यवस्थित जगहें नहीं हैं। जेलों के अधिक व्यवस्थित होने के अपने नुकसान हैं कि वहां पर मुजरिमों का माफिया गिरोह चलता है, लेकिन बच्चों के सुधारगृहों की भी एक दिक्कत है कि वहां अलग-अलग कई उम्र के नाबालिगों को रखा जाता है, और अधिक संगीन जुर्म करके वहां पहुंचे हुए नाबालिग स्वाभाविक रूप से वहां के मुखिया बन जाते हैं, और भीतर उनका एक किस्म से राज चलता है। उनकी उम्र और उनकी अराजकमिजाजी उन्हें किसी एक जगह पर बंधकर रहने के खिलाफ भडक़ाती रहती है, और वे जब खुले में किन्हीं नियमों से बंधकर नहीं रहते, तो फिर वे सुधारगृह की इमारत के भीतर भला कैसे बंधकर रह जाएंगे? बहुत से बच्चे इन जगहों को छोडक़र भाग निकलते हैं। ऐसा भी नहीं कि वे निकलकर अपने घर जाते हैं, वे निकलकर बस खुली दुनिया में जाना चाहते हैं, जहां वे मनमर्जी का नशा कर सकें, जुर्म को आगे बढ़ा सकें, और अपने जायज या नाजायज शौक पूरे कर सकें।
कानून को सुधार की इस सोच को एक बार फिर से तय करना होगा। सुधार का यह कोई तरीका नहीं होता कि कम बिगड़े बच्चों को अधिक बिगड़े बच्चों के साथ स्थायी रूप से रख दिया जाए जहां उनके पास दो-तीन वक्त खाने, सोने के अलावा जुर्म की कहानियां सुनने और जुर्म सीखने का ही काम रह जाता है। सरकारी इंतजाम में सुधार की गुंजाइश! यह तो बात ही कुछ अटपटी लगती है। सुधार को न तो टेंडर करके खरीदा जा सकता, न ही कोटेशन बुलाए जा सकते, सुधार की सप्लाई भी नहीं हो सकती, सुधार का निर्माण भी नहीं हो सकता। सुधार करने के लिए समाज में सबसे अधिक अक्षम अगर कोई तबका है, तो वह सरकार है। और सारे के सारे सुधारगृह ठीक उसी तरह सरकारी हैं, जिस तरह सारी जेलें भी सरकारी हैं।
चूंकि नाबालिग अपराधियों से जुड़ा हुआ एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चल ही रहा है, इसलिए बाल सुधारगृहों के अपने सुधार के लिए कोई जनहित याचिका उसके साथ जोड़ी जा सकती है, या फिर अलग से भी दायर हो सकती है। सुधार के नाम पर बच्चों को बरसों तक इन जगहों पर रखना एक अलग किस्म की बेइंसाफी है। उन्हें बालिगों की जेलों से बचाना तो ठीक है, लेकिन उन्हें सुधार के किसी इंतजाम के बिना अधिक हिंसक मुजरिम-बच्चों के बीच में डालकर रखना उन्हें जुर्म की तरफ और आगे बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं है। एक तरफ तो कानून इतना संवेदनशील है कि वह बच्चों को आरोपी या अभियुक्त भी नहीं कहने देता, और उनके लिए कानून से टकराव करते हुए बच्चे जैसे संवेदनशील शब्द इस्तेमाल करता है। दूसरी तरफ इन बच्चों में सचमुच कोई सुधार लाने के लिए सरकार में संवेदनशीलता दिखाई नहीं पड़ती है।
अभी देश की कुछ बड़ी अदालतों ने जेलों की बदहाली पर फिक्र जाहिर करते हुए यह सलाह दी है कि बंद जेलों की जगह खुली जेलें बनाई जाएं, वहां कैदियों को परिवार के साथ कुछ वक्त गुजारने मिले। आज तो बालिग कैदियों की जेलों का हाल अपने आपमें भ्रष्टाचार और रिश्वत से बर्बाद है, और वहां पर जुर्म की एक अलग किस्म की दुनिया का राज चलता है। इसलिए इस देश में बच्चों या बड़ों के सुधारगृहों के सुधार की एक बुनियादी कोशिश की जरूरत है।
कुछ घटनाएं जो कि स्वाभाविक तौर पर आम लगनी चाहिए, वे आज के माहौल में बड़ी खास लगने लगती हैं। दो दिनों से एक वीडियो तैर रहा है कि पानी में एक कार डूबती चली जा रही है, और एक छोटी सी नाव पर सवार एक नौजवान कार की खिडक़ी से किसी व्यक्ति को खींचकर निकालने की कोशिश में लगा हुआ है। दो मिनट के इस वीडियो में नाव डूब जाती है, कार भी डूब जाती है, लेकिन यह नौजवान किसी तरह से कार के ड्राइवर को बचा लेता है। तब तक किनारे से पहुंचा एक और नौजवान मदद करता है, और दोनों मिलकर किसी तरह कार सवार को बचाकर किनारे लाते हैं। इन तीनों के नाम सहित यह वीडियो हजारों लोगों ने आगे बढ़ाया है, और खबर शायद सही ही रही होगी कि इसका कोई खंडन देखने नहीं मिला। कार चालक हिन्दू था, उसे बचाने वाला मुस्लिम था, और किनारे से पहुंचा तीसरा नौजवान हिन्दू था। डूबते हुए को बचाते हुए किसी को उसके जात-धरम पूछने की न जरूरत रहती है, न फुरसत रहती है। इसी तरह जब कोई डूब रहा हो तो उसे बचाने वाले के जात-धरम क्या हैं, इसे पूछने की भी जहमत कोई नहीं उठाते। यह तो सीधे-सीधे डूबते से बचने की बात, लोग तो अस्पताल के ब्लड बैंक में खून लेते हुए, या आंखें और किडनी देते हुए कभी नहीं पूछते कि देने वालों के जात-धरम क्या हैं। जब अपनी जान पर आ पड़ी हो, तो जिससे जान बच रही है, वे ईश्वर ही लगते हैं। जात-धरम तब सूझते हैं जब पेट भरा रहता है, और दिल-दिमाग पर बददिमागी छाई रहती है। राह चलते भिखारी होटल-ठेले वालों के नाम पढ़-पढक़र भीख नहीं मांगते, और इसी तरह घरों की तख्तियों पर जात-धरम देखकर लोग मांगने नहीं पहुंचते, या घर छोडक़र आगे नहीं बढ़ते।
एक हिन्दू को बचाने वाले इस मुसलमान नाव वाले की बात पर लिखने की आज इतनी बड़ी वजह नहीं रहती, अगर जम्मू से एक दूसरी खबर नहीं आई रहती। दुनिया के सबसे अधिक फौजी मौजूदगी वाले जम्मू-कश्मीर में अभी जम्मू के एक पत्रकार ने एक अफसर के नशा-तस्करी में हाथ होने की रिपोर्टिंग की, तो उसका 40 बरस पुराना घर आनन-फानन बुलडोजर से गिरा दिया गया। कहा गया कि वह सरकारी जमीन पर बना हुआ अवैध निर्माण था। वैसी सरकारी जमीन पर दूसरे दर्जनों और अवैध निर्माण बरकरार हैं, और इस पत्रकार का यह मकान भी 40 साल से वहां बना हुआ था, और दूसरे मकानों की तरह। एक रिपोर्ट उसने बनाई, और उसे बेघर कर दिया गया। उसके बच्चे मलबे के पास खुली जमीन पर बैठे हुए थे। यह देखकर जम्मू के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने सार्वजनिक रूप से अपनी जमीन के कागज इस पत्रकार अरफाज अहमद डैंग को दिए, और कहा कि चाहे उसे भीख मांगनी पड़े, वह उनका घर बनवाकर रहेंगे। कुलदीप शर्मा नाम के इस सामाजिक कार्यकर्ता ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि वे सिर्फ कागज नहीं दे रहे हैं, जमीन अरफाज के नाम करने की पूरी कानूनी कार्रवाई भी कर रहे हैं। कुलदीप शर्मा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, और उनकी बेटी तान्या शर्मा ने कहा कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है जिन्होंने एक बेहतरीन मिसाल कायम की है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना चाहिए। जम्मू के अफसरों ने बिना किसी कानूनी कार्रवाई के इस एक अकेले एकमंजिला मकान को मलबे में बदल दिया। कुलदीप शर्मा के बारे में लोगों ने बताया कि वे अरफाज का घर टूटने से बहुत परेशान थे, और उन्होंने खुद होकर यह फैसला लिया। उनकी बेटी पिछले कुछ सालों से आसपास के गरीब बच्चों को मुफ्त की ट्यूशन पढ़ाती हैं। कुलदीप शर्मा का कहना है कि अरफाज ने उस वक्त सच बोला जब बहुत कम लोगों में ऐसा कहने की हिम्मत रह गई है। बदकिस्मती से सच के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं इस परिवार के घर को दुबारा खड़ा करने में काम आ सकूं, मेरा ईश्वर मेरे जाने के बाद भी मेरे सिर पर छत रखेगा।
सोशल मीडिया पर कई बार बड़ी दिलचस्प बहस देखने मिलती है। अभी कुछ लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिजली से चलने वाली मिक्सी पर चटनी पीसने के बजाय सिलबट्टे पर उसे पीसना बेहतर होता है। कई लोग यह भी मानकर चलते हैं कि रात को खाना बचना नहीं चाहिए, और अगली सुबह फ्रिज से निकालकर किसी भी चीज को गर्म करने से बचना चाहिए। इनमें से कुछ बातें तो सेहत के लिए, कुछ बातें बिजली बचाने के लिए अच्छी हो सकती हैं, लेकिन इनमें से कौन सी बातें गृहिणी के लिए भी अच्छी हैं, वह बात चर्चा की प्राथमिकता में नहीं रहती। हर दिन आटा गूंथकर ताजी रोटियां बनाना, यह क्यों जरूरी होना चाहिए? क्या महज इसलिए कि घर पर एक महिला की यह जिम्मेदारी है कि वह इस काम को करे? या फिर इसका सहूलियत से भी कोई लेना-देना है? जब फ्रिज की तकनीक इस्तेमाल में आ रही है, तो दो वक्त की दाल, दो वक्त की कढ़ी, दो वक्त की सब्जी, और दो वक्त का चावल भी एक साथ बनाकर बचे हुए फ्रिज में क्यों नहीं रखे जा सकते? मां के हाथ के गर्म खाने की महिमा से इस देश की संस्कृति भरी हुई है, लेकिन मां के हाथ कितने होने चाहिए, इस पर कुछ नहीं कहा जाता, बल्कि बिना कहे हुए देवियों की प्रतिमाएं दिखा दी जाती हैं कि कम से कम आठ तो हाथ होने ही चाहिए ताकि वह चार महिलाओं जितना काम कर सके। खाड़ी के मुस्लिम देशों को देखें तो वहां घर पर रोटी बनाने की कोई परंपरा नहीं है। बाजार में तंदूर वाले बड़ी-बड़ी रोटियां बेचते हैं, जिनमें से एक-एक रोटी से दो-तीन लोगों के पेट भर जाएं। लोग बाजार जाते हैं रोटियों का ग_ा खरीद लाते हैं, और घर पर उसके साथ खाने लायक कुछ बन जाता है। हर दिन आटा गूंथना, और रोटी बनाना यह उन महिलाओं पर भी लागू नहीं होता जिन पर बुरका लदे होता है, नकाब या हिजाब लदे होता है।
अब खाने से परे एक दूसरी बात पर आ जाएं, तो हिंदुस्तान में पिछले बरसों में हर घर में शौचालय बन गए हैं। आने वाले बरसों में हो सकता है कि हर घर तक नल भी पहुंच जाए, लेकिन शौचालय बने बरसों हो गए, और उनमें हर इस्तेमाल के बाद डलने वाला आधा बाल्टी पानी ढोकर लाना आमतौर पर महिला की ही जिम्मेदारी रहती है, कई बार तो पानी कुछ मील दूर से भी लाना पड़ता है। ग्रामीण जीवन की ऐसी एक भी तस्वीर देखने नहीं मिलती जिसमें कोई मर्द पानी ढोते दिखता हो। अब सरकार की तरफ से खुले में शौच को अपमान साबित किया गया है, कई जगहों पर तो अधिकारी-कर्मचारी मुंहअंधेरे टॉर्च लेकर निकलते थे, और खुले में शौच करते लोगों पर रौशनी फेंककर उन्हें शर्मिंदा करते थे। अब सरकारी आंकड़ों में, या जमीन पर, जैसा भी हो शौचालय बने, तो सचमुच के शौचालयों में तो पानी लगता ही है, और वह औरत ही लाती है। लोगों को अपने आसपास के लोगों से यह भी पूछना चाहिए कि सरकारी मदद से बने हुए शौचालयों को, या कि बाकी घरों के शौचालयों को साफ करने की जिम्मेदारी किसकी रहती है? इस्तेमाल तो सभी लोग करते हैं, लेकिन सफाई करना शायद महिला का एकाधिकार रहता है।
ऐसी बहुत सी सामाजिक परंपराएं हैं जिन्हें लोगों के बचपन से ही संस्कृति की तरह पेश किया गया है। घरों में पकाने और परोसने का काम महिलाएं और बच्चियां ही करती हैं, और यह सोच धीरे-धीरे लडक़े-लड़कियों सभी में कई पीढिय़ों के लिए पैठ जाती है। और सुबह से रात तक खटने वाली, काम करने वाली महिला के बारे में जब बाहर कोई पूछते हैं कि वह क्या करती है, तो आमतौर पर जवाब मिलता है कि वह कुछ नहीं करती, गृहिणी है। अब अगर एक गृहिणी के घर संभालने, खाना खिलाने, बुजुर्गों की सेहत का ख्याल रखने, गर्भधारण करने, बच्चे पैदा करने, बच्चों को बड़ा करने तक की मेहनत को अलग-अलग घरेलू कामगारों से करवाया जाए, तो पता लगेगा कि घर का पूरा बजट ही कम पड़ रहा है। जिम्मेदारियों का बोझ गिनते हुए भारत जैसे समाज में महिला पारदर्शी हो जाती है, उसे गिना ही नहीं जाता, उसे बस घर पर रहती है, कह दिया जाता है, मानो वह घर पर आरामकुर्सी पर बैठकर धूप सेंकती हो। भारत जैसे आम समाज में महिला के सम्मान के लिए जरूरी यह है कि उसके किए गए अधिकतर काम को मर्द भी करके देखें कि उनमें कितनी मेहनत लगती है, कितना वक्त लगता है।
अमरीका के वॉशिन्गटन में दो दिन पहले एक अफगान नागरिक ने जिस तरह वहां के दो सैनिकों को गोली मार दी, उससे अमरीका में बाहर से आकर शरण पाए हुए, या कामकाज कर रहे लोगों पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप वैसे भी आप्रवासियों के खासे विरोधी रहते आए हैं, और अब उन्हें अपने को नापसंद देशों पर और अधिक कड़े प्रतिबंध लगाने का एक अभूतपूर्व मौका मिला है। किसी भी देश को अपनी हिफाजत की कीमत पर दूसरे देशों के लोगों को जगह देने की कोई मजबूरी तो रहती नहीं है। ट्रंप ने अपनी चुनावी घोषणाओं के वक्त से ही जिन देशों के नागरिकों पर रोक लगाने की बात कही थी, उन्हीं देशों के लोग अगर अमरीका में सैनिकों को मार डालने जैसी हरकत करेंगे, तो उसका नुकसान अमरीका की जमीन पर ठहरे हुए उनके दूसरे देशवासियों को, उनके धर्म के लोगों को झेलना पड़ेगा। आज एक अफगान की वजह से अमरीका में सारे अफगानों की दाखिला अजऱ्ी पर रोक लग गई है।
जब किसी मुस्लिम या अफ्रीकी देश से योरप पहुंचे हुए शरणार्थियों में से कोई हिंसा करते हैं, तो उसका नुकसान बाकी सारे ही मुस्लिम लोगों को झेलना पड़ता है। योरप में एक-एक करके कई देशों में ऐसे ही शरणार्थियों की वजह से राजनीतिक उथल-पुथल हुई है, और कुछ जगहों पर कट्टरपंथी पार्टियों को अभूतपूर्व जनसमर्थन भी मिला है। जब एक बार कट्टरपंथी पार्टियां सत्ता पर भागीदार बन जाती हैं, तो फिर उन देशों में दूसरे देशों से आए हुए लोगों पर रोक-टोक और भी बढ़ जाती है। इसलिए जिस देश या जिस धर्म के लोगों को दूसरी जगह जगह चाहिए, उन्हें अधिक सावधान रहना होता है क्योंकि उन जगहों के मूलनिवासी अगर बागी हो जाते हैं, तो फिर उनमें से किसी को भी उस जमीन पर जगह नहीं मिलती। भारत की ही बात करें, तो आज यहां पर बांग्लादेशी, या म्यांमारी लोगों के आने और बसने का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हो चुका है। अब इनमें से अगर कोई भारत की जमीन पर किसी जुर्म में शामिल रहते हैं, तो उसका नुकसान इन देशों से यहां आए हुए दसियों लाख लोगों को उठाना पड़ता है। फिर धीरे-धीरे यह धर्म के आधार पर भी एक चुनावी नारा बनने लगता है, जैसाकि अमरीका और योरप के देशों में वहां की ईसाई-बहुल आबादी के बीच मुस्लिम शरणार्थियों का मुद्दा बना हुआ है।
यह भी समझने की जरूरत है कि सिर्फ विदेशी शरणार्थी होने से स्थानीय लोगों की नाराजगी नहीं हो जाती, नाराजगी के पीछे कामकाज के अवसर घटना भी रहता है, और संस्कृतियों का टकराव भी रहता है। पश्चिम के देशों में जाकर बसे हुए मुस्लिम शरणार्थी जब वहां की स्थानीय लोकतांत्रिक परंपराओं के साथ घुल-मिल नहीं पाते, तब भी एक टकराव खड़ा होता है, और स्थानीय लोग यह पाते हैं कि विदेशी शरणार्थी अपनी खुद की महिलाओं के साथ बुरा सुलूक करते हैं जो कि वे अपने बच्चों की नजरों में आने देना नहीं चाहते। ऑस्ट्रेलिया में अभी दो-चार दिन पहले ही एक दक्षिणपंथी महिला सांसद ने संसद में सनसनी फैला दी जब वे वहां बुरका पहनकर चली गईं। उनकी अपनी पोशाक के मुताबिक उनकी टांगें खुली हुई थीं, और उस पर बुरका अटपटा भी लग रहा था, लेकिन वे देश में बुरके पर रोक लगाने के मुद्दे को एक बार फिर उठाना चाहती थीं। संसद ने उनके इस व्यवहार को नामंजूर करते हुए उन्हें पूरे सत्र से निलंबित कर दिया, लेकिन इससे ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में भी मुस्लिम रीति-रिवाजों के खिलाफ एक राजनीतिक माहौल का संकेत तो मिलता ही है। लोगों को याद होगा कि योरप के कुछ देशों में भी बुरके पर रोक लगाने के खिलाफ मुस्लिम समुदाय यूरोपीय संसद तक पहुंचा, अदालतों तक के दरवाजे खटखटाए, लेकिन सरकारों का फैसला सही माना गया, और यह रोक जारी रही। संस्कृतियों के ऐसे टकराव के बीच जब बाहर से आए हुए लोग किसी तरह की हिंसा में शामिल होते हैं, तो उससे नौबत बहुत खराब हो जाती है। ट्रंप ने आज अमरीका में आने की अर्जी लगाने वाले तमाम अफगान लोगों की अर्जियों पर रोक लगी दी है। दूसरी तरफ ब्रिटेन में सरकार कानून बनाकर वहां पहुंचने वाले अवैध शरणार्थियों पर आज तक की सबसे कड़ी रोक लगा रही है क्योंकि उन शरणार्थियों को होटलों में ठहराना ब्रिटिश नागरिकों पर बहुत बड़ा बोझ बन रहा था, और सरकारें लगातार अपने नागरिकों को नाखुश बनाकर नहीं चल सकती हैं।
पश्चिम के देशों की जो उदार सरकारें हैं, उनकी उदारता भी शरणार्थियों की हिंसा के सामने लंबे नहीं टिक सकतीं। और जिन मुस्लिम देशों से ऐसे शरणार्थी आए हैं, उन मुस्लिम देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों और उदारता का कोई माहौल उन्होंने देखा हुआ नहीं है। अपने गृहयुद्ध से, भुखमरी या, किसी और वजह से उन्हें अपना देश छोडऩा पड़ा, लेकिन शायद उनकी अपनी मातृभाषा में, जैसा देश, वैसा भेष, यह नसीहत उन्हें मिली हुई नहीं थी, इसलिए वे शरण देने वाले देश की परंपराओं का सम्मान नहीं कर पा रहे। दुनिया के विकसित और सभ्य देश अपनी उदार लोकतांत्रिक परंपराओं के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश तो कर सकते हैं, लेकिन सत्तारूढ़ लोग इसी मुद्दे पर अपनी सरकार खोने का खतरा नहीं उठा सकते। आज एक-एक करके कई देशों में मतदाताओं का बहुमत बाहरी लोगों के खिलाफ होते जा रहा है, और ऐसा स्थानीय तनाव कोई राजनीतिक पार्टी नहीं झेल सकती। फिर यह भी है कि बाहर से आने वाले शरणार्थियों का कोई एक संगठन तो होता नहीं है कि उनसे किसी अनुशासन की उम्मीद की जा सके। जिनका धर्म और जिनकी संस्कृति उन्हें हिंसा की तरफ आसानी से धकेल देते हैं, उनकी आत्मघाती हरकतों को भला कौन रोक सकते हैं? अब अफगानिस्तान छोड़ते हुए अमरीकी सरकार वहां से अपने मददगार हजारों लोगों को ढोकर ले आई थी, उन्हीं में से एक ने अभी वहां के दो सैनिकों को मार डाला। ऐसे तनाव को कोई भी देश बर्दाश्त नहीं कर सकता, और ऐसे इक्का-दुक्का हिंसक लोग अपनी पूरी बिरादरी की संभावनाओं को तबाह करते हैं, चाहे वे अमरीका में रहें, चाहे हिंदुस्तान में।
आंकड़े बड़े दिलचस्प होते हैं। खासकर तब जब वे किसी चुनावी-राजनीति की योजना के हों, और उन्हें अर्थव्यवस्था के मुकाबले खड़ा कर दिया जाए। चुनावी समीकरण और अंकगणित का समीकरण बिल्कुल अलग-अलग हो सकते हैं, और हो सकता है कि जमीनी हकीकत इन दोनों के बीच कहीं हो। अभी एक संस्था की रिपोर्ट भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारों द्वारा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे नगदी ट्रांसफर करने पर आई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्यों के बजट का एक खासा बड़ा हिस्सा इस कैश ट्रांसफर पर खर्च हो रहा है। इनमें हिमाचल की इंदिरा सम्मान निधि पर सबसे ही कम पैसा जा रहा है जो कि दशमलव में भी नहीं गिना जा सकता। इसके बाद असम, और फिर उसके ऊपर के राज्य हरियाणा, तमिलाडु, छत्तीसगढ़ हैं। छत्तीसगढ़ में बजट का 3.33 फीसदी महतारी वंदन योजना में जा रहा है। लेकिन इसके ऊपर के राज्य देखें, तो बढ़ते-बढ़ते एमपी में करीब 5 फीसदी, महाराष्ट्र और दिल्ली में 5 फीसदी से अधिक, बंगाल और कर्नाटक में साढ़े 7 फीसदी या उससे अधिक, और झारखंड में बजट का करीब 10 फीसदी महिलाओं को कैश ट्रांसफर में जा रहा है। एक-एक करके चुनावों में ऐसी योजना जीत और हार को तय करने वाली होती चली गई, और जिन पार्टियों के जीत के आसार कम थे, उन्होंने तो बढ़-चढक़र इससे भी अधिक आंकड़े घोषणापत्र में रखे थे।
बजट के तीन फीसदी से लेकर दस फीसदी तक का हिस्सा अगर महिलाओं को सीधे कैश देने की योजनाओं पर जा रहा है, तो यह समझने की जरूरत है कि राज्य का बजट सौ फीसदी तो किसी भी सरकार को उपलब्ध नहीं रहता। जिसे सरकारी अमले की तनख्वाह, बिजली-पेट्रोल, सरकारी इमारतों का रखरखाव, सफर का खर्च कहा जाता है, वह स्थापना व्यय ही अधिकतर सरकारों को बड़ा भारी पड़ता है। एक तिहाई से लेकर 40 फीसदी तक का स्थापना व्यय अलग-अलग राज्यों के बजट आंकड़े बताते हैं, जबकि हकीकत में ये आंकड़े और ऊपर भी जा सकते हैं। एक तिहाई या अधिक स्थापना व्यय के बाद सरकार के पास बजट राशि सीमित ही बचती है, और उसमें से महिलाओं के लिए, या किसी भी और दूसरी योजना के लिए एक बड़ी रकम जाने का मतलब बजट के लचीलेपन को खत्म करना भी रहता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धान खरीदी पर सरकारी रियायत बजट का बहुत बड़ा हिस्सा रहती है, इसी तरह गरीबों को राशन देने पर भी केन्द्र और राज्य सरकारों का खासा पैसा जाता है। ऐसे में महिलाओं को उनके खातों में मिलने वाली राशि को लेकर अर्थशास्त्रियों, और पुरूषों के बीच खासी बेचैनी रहती है। ऐसी योजना भारत में तो अभी पिछले कुछ बरसों में ही शुरू हुई हैं, लेकिन दुनिया के अलग-अलग कई देशों में महिलाओं की गरीब आबादी को लेकर डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना का जो फायदा मिला है, उस पर भी एक नजर डालना चाहिए।
कुछ सबसे सफल उदाहरण ऐसे देशों के हैं जहां पर गरीबी हावी रहती है, या थी। मैक्सिको में 1997 से अब तक परिवार ने मां के खाते में पैसे जाते थे, और उसके साथ बच्चों के स्कूल जाने, और अस्पताल में जांच करवाने की शर्त जोड़ी गई थी। इससे वहां लड़कियों का स्कूल जाना 15 फीसदी बढ़ा, बच्चों का कुपोषण 20 फीसदी तक घटा, और परिवार में महिला की स्थिति मजबूत हुई। ब्राजील में 2003 से बिना किसी शर्त के गरीब माताओं को हर महीने उनके खाते में पैसे मिलते हैं, और इससे गरीबी 25 फीसदी तक घटी, घरों में मारपीट और झगड़े 10 फीसदी तक कम हुए, और महिलाएं अपना छोटा-मोटा कोई काम शुरू करके आर्थिक रूप से कुछ या अधिक हद तक आत्मनिर्भर बनीं। दक्षिण अफ्रीका में शिशु संरक्षण अनुदान के नाम से सवा करोड़ से अधिक महिलाओं को हर महीने पैसे मिलते हैं, और इससे उनके बच्चों के कद छोटे रह जाने (स्टंटिंग) में 8 फीसदी तक कमी आई, और परिवार में महिला की आवाज अधिक बुलंद हुई। केन्या में महिलाओं को बिना किसी शर्त के सीधे पैसे देना 2018 में ही शुरू हुआ। इससे वहां महिलाओं की कमाई एक तिहाई से अधिक बढ़ गई, उनके किए जाने वाले छोटे-छोटे कारोबार डेढ़ गुना हो गए, घर में पति द्वारा की जाने वाली हिंसा में 16 फीसदी कमी दर्ज की गई।
पिछले कुछ दिनों से मध्यप्रदेश के एक ऐसे नौजवान के बारे में खबरें आ रही थीं जिसने अनारक्षित-आर्थिक-कमजोर की हैसियत से यूपीएससी का इम्तिहान दिया था, और आईएएस बनने के बाद जब उसका स्वागत हुआ, तो टीवी चैनलों के इंटरव्यू में ही पता लगा कि उसकी पत्नी बेंगलुरू में आईटी सेक्टर में काम करती है, जिसकी तनख्वाह इस नौजवान के कोचिंग सेंटर की कमाई से पांच गुना है, मां-बाप अलग कमाते हैं। ऐसे संपन्न परिवार का लडक़ा अपने को आर्थिक रूप से कमजोर बताकर आईएएस बन गया। वह खबर अभी चक्कर लगाना बंद कर भी नहीं पाई थी कि एक नई खबर आ गई कि आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित तबके से मेडिकल कॉलेज पहुंचने वाले और ग्रेजुएट होने वाले लोगों ने चिकित्सा-पीजी के लिए एनआरआई, या मैनेजमेंट कोटे की सीटों पर दाखिला लिया है जिसकी फीस आधा-एक करोड़ रूपए बताई जाती है। अपने आपको ईडब्ल्यूएस बताकर मेडिकल-दाखिला लिया, एमबीबीएस किसी तरह किया, पीजी दाखिले में फ्लॉप शो रहा, तो उसके बाद मैनेजमेंट सीट या एनआरआई कोटे से पीजी दाखिला ले लिया। ईडब्ल्यूएस बनने के लिए परिवार की आय 8 लाख रूपए साल से अधिक नहीं होनी चाहिए, दूसरी तरफ अब आधा-एक करोड़ देकर वे आगे दाखिला ले रहे हैं।
जब अनारक्षित वर्ग के लिए ईडब्ल्यूएस सीमा तय की गई थी, और उनके लिए आरक्षण रखा गया था, तब ही यह आशंका होने लगी थी कि इसका बेजा इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि आज ओबीसी तबकों के भीतर क्रीमीलेयर के ऊपर वाले लोग भी झूठा आय प्रमाणपत्र बनवाकर आरक्षण का फायदा ले लेते हैं। बहुत से लोग तो बैंक खातों में मिलने वाली तनख्वाह को भी छुपा लेते हैं, और धड़ल्ले से फर्जी सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं। फिर इनकी आर्थिक क्षमता की वजह से इनके बच्चे अधिक सक्षम रहते हैं, इम्तिहान में बेहतर तैयारी कर पाते हैं, और वे ही आरक्षण का अधिकतम फायदा झपट लेते हैं। अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश ने दलितों के बारे में कहा था कि उनके आरक्षण से क्रीमीलेयर को बाहर करना जरूरी है, वरना सच में कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा नहीं मिल पाएगा। हम भी दशकों से यही तर्क लिखते आ रहे हैं कि सभी आरक्षित वर्गों से क्रीमीलेयर को बाहर किया जाए। लेकिन अभी अनारक्षित वर्ग का ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट पाने के लिए सक्षम लोगों ने जैसी जालसाजी और धोखाधड़ी की है, उसका क्या किया जाए? जब कॉलेजों में दाखिला गलत तरीके से हो जाए, लोग डॉक्टर भी बन जाएं, तब अदालतें भी इस दुविधा में पड़ जाती हैं कि वे क्या करें? कैसे गलत दाखिले वाले इन लोगों की जिंदगी की घड़ी वापिस घुमाएं?
हमने कुछ दिन पहले ही मुख्य न्यायाधीश की बातों के संदर्भ में अपनी पुरानी बातें गिनाई थीं, लेकिन अब अनारक्षित ईडब्ल्यूएस के संदर्भ में इस पूरे मुद्दे पर एक बार और गौर करने की जरूरत है। जब कभी आरक्षण का लाभ पाने वालों में अपात्र लोग खड़े हो जाते हैं, तो उसका नुकसान बाकी तमाम लोगों को उठाना पड़ता है। एसटी, एससी, और ओबीसी तबकों के ताकतवर लोग जब आरक्षण पाकर समाज के अनारक्षित वर्गों के कमजोर लोगों से आगे निकल जाते हैं, तो सामाजिक न्याय के लिए स्थापित आरक्षण पर से लोगों का भरोसा उठने लगता है। वे देखते हैं कि उनके आसपास के बंगला-गाड़ी वाले, महंगी कोचिंग वाले एसटी-एससी, और ओबीसी बच्चे किस तरह आरक्षित वर्गों में आगे बढ़ते हैं। और अब तो अनारक्षित वर्ग के गरीब होने का झूठा सर्टिफिकेट जुटाकर संपन्न सवर्ण भी बाकी तमाम लोगों को पीछे छोडक़र आसमान पर पहुंच रहे हैं।
बिहार की एक रिपोर्ट अगर सिर्फ किसी अखबार या टीवी चैनल की रहती, तो उसे सनसनीखेज कहकर खारिज किया जा सकता था। लेकिन यह रिपोर्ट कुछ वैज्ञानिक संस्थानों की शोध रिपोर्ट पर आधारित है, और देश की एक सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण संस्था, सीएसई की पत्रिका डाऊन टू अर्थ की अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट पर आधारित है, इसलिए इसे खारिज करना आसान नहीं है। बिहार के अलग-अलग कई जिलों में माताओं के दूध के नमूनों की जांच की गई, और उनमें यूरेनियम का प्रदूषण पाया गया। यह बहुत खतरनाक बात इसलिए है कि दुधमुंहे शिशु पूरी तरह मां की दूध पर निर्भर रहते हैं, और उसमें अगर यूरेनियम आकर उन बच्चों के लिए खतरा खड़ा कर रहा है, तो उन बच्चों के लिए इसका कोई विकल्प भी तो नहीं है।
इस मामले में किए गए सर्वे, अध्ययन, और शोध से यह पता लगा है कि जितनी भी माताओं के दूध की जांच की गई, उनमें सभी में यूरेनियम मिला है। यह जमीन के नीचे से आने वाले पानी में आने वाला प्रदूषण है, और ये सारी माताएं ऐसे ही पानी पर निर्भर हैं। छोटे बच्चे अपनी माताओं के मुकाबले भी ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके शरीर का वजन कम होता है, उनके अंग, और उनका मस्तिष्क विकसित नहीं हुआ रहता, और उनकी पाचन शक्ति पेट में गई भारी धातुओं को आसानी से बाहर नहीं निकाल सकती। यूरेनियम के प्रदूषण से बच्चों की किडनी पर असर होता है, उन पर स्नायुसंबंधी (न्यूरोलॉजिकल) असर होता है, कैंसर का खतरा रहता है, और भी कई किस्म की गंभीर बीमारियां उनको हो सकती हैं। सीएसई के एक शोध के मुताबिक बिहार के 11 जिलों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुझाई गई सीमा से बहुत ऊपर है, कई जिलों में तो यह दो-ढाई गुना से भी अधिक है। रिपोर्ट बताती हैं कि बिहार में गंगा तट के इलाके ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक जाने जाते हैं। फिर भी डॉक्टरों का कहना है कि खतरे के बावजूद इन बच्चों से मां का दूध छुड़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि उसका कोई बेहतर विकल्प इन बच्चों के लिए अभी उपलब्ध नहीं है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि भूजल में प्रति लीटर में 30 माइक्रोग्राम से अधिक यूरेनियम मां के दूध में पहुंच सकता है। बिहार के जिलों में यह 66, 77, और 82 माइक्रोग्राम/लीटर तक मिला है।
अब देश के अलग-अलग हिस्सों में जमीन के भीतर के पानी में कई किस्म के खतरनाक प्रदूषण बने हुए हैं। छत्तीसगढ़ के ही गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा में प्रदूषित पानी की वजह से किडनी खराब होने से लगातार मौतें होती हैं, और करोड़ों खर्च करने के बाद भी वहां पानी से इस प्रदूषण को खत्म करने, या साफ पानी पहुंचाने का काम नहीं हो पाया है। देश के बहुत से हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, ऐसे बहुत से नुकसानदेह रसायन मिले हुए हैं, और अलग-अलग इलाकों से भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें कहीं लोगों के दांत खराब हो गए हैं, कहीं उनकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं, और बदन में पानी से जूझने वाली किडनी तो कई मामलों में खराब हो जाती है जो कि चेहरे से दिखती नहीं है। सरकार के ही कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में 16 करोड़ से अधिक लोगों को सुरक्षित पानी नहीं मिल रहा है। भयानक रसायनों के जमीन के नीचे के भंडारों से परे कई जगहों पर खेती में इस्तेमाल होने वाले, कारखानों में काम में लाए जाने वाले रसायनों को बह-बहकर भूजल में जाते पाया गया है, और उससे कैंसर जैसे खतरनाक रोग भी लोगों को हो रहे हैं।
जिन लोगों को यह लगता है कि वे अपने लिए घरों में तरह-तरह के महंगे फिल्टर लगाकर अपने पीने के पानी को साफ कर लेंगे, उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके खाए जाने वाले फल और सब्जी भी प्रदूषित पानी से उगते हैं, और रासायनिक प्रदूषण उनमें से होते हुए बदन के भीतर पहुंचता रहता है। फल-सब्जी, या फसल में छिडक़ा जाने वाला, खेतों में जमीन में डाला जाने वाला रसायन और जहर भी घूम-फिरकर पानी तक भी पहुंचता है, और फसलों के रास्ते तो इंसानों के बदन में आता ही है। जहर से परे माइक्रोप्लास्टिक भी हर तरह के पानी में घुसकर लोगों के बदन में आता है, और अब वह इंसानों के खून में घूम रहा है, उनके दिमाग के भीतर भी पहुंच रहा है।
भोपाल के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए एक ऐसा मामला पहुंचा है जिसमें महिला को यह शिकायत है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला उसका पति सिर के बालों में पीछे चुटैया रखता है, जो कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ लगती है, और इसलिए वह तलाक चाहती है। उसका कहना है कि शादी के पहले उसे उम्मीद थी कि शादी के बाद इसे कटाने को मान जाएगा, लेकिन उसके न मानने पर अब पत्नी अपने मां-बाप के पास रहती है, और तलाक चाहती है। एक दूसरे मामले में पति ने तलाक की अर्जी लगाई है कि पत्नी रात-दिन पूजा में लगी रहती है। इस तरह के मामले देश की अलग-अलग फैमिली कोर्ट में आते ही रहते हैं। एक पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने किसी अनजान नंबर पर हाय लिखकर एक स्माइली भेजी, इसलिए अब उसे तलाक चाहिए। घर में खाना पकाने को लेकर तनातनी बहुत से तलाक-प्रकरणों की आम वजह है। मुम्बई का एक मामला ऐसा है जिसमें शादी के पहले पति-पत्नी दोनों मांसाहारी थे, और शादी के बाद अब पत्नी शाकाहारी हो गई है, और पति को भी मांस खाने से रोक रही है। तलाक चाहने वाले एक पति का आरोप है कि पत्नी ने उसके मां-बाप और बहन को फोन पर ब्लॉक कर रखा है, और मिलने भी नहीं देती। कुत्ता पालने या न पालने को लेकर कई जोड़ों के बीच तनातनी तलाक तक पहुंचती है। बरसों तक देहसंबंध न बनाना तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना जाता है। दिल्ली की लडक़ी की शादी राजस्थान में हुई, और गर्मियों में भी वहां एसी नहीं था, इस आधार पर अदालत ने तलाक मंजूर कर दिया कि जीवनशैली का यह एक बड़ा फर्क है। लखनऊ के एक मामले में पत्नी ने शादी के बाद सोशल मीडिया से पति का सरनेम हटा दिया, और अपना शादी के पहले का सरनेम इस्तेमाल करने लगी, इस पर पति ने तलाक मांग लिया।
इस तरह की सैकड़ों किस्में हैं जो कि पति-पत्नी के बीच कलह की वजह रहती हैं, और बहुत से मामलों में ये तलाक तक पहुंचती हैं। तलाक तो फिर भी ठीक है, बहुत से मामलों में ये वजहें विवाहेत्तर संबंधों तक पहुंच जाती है, और उसके बाद तरह-तरह की हिंसा की वजह भी बनती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि अगर शादी के पहले जोड़े के दोनों लोगों को किसी पेशेवर विवाह-परामर्शदाता के साथ बिठा दिया जाता, तो शायद एक-दो घंटे में यह समझ आ जाता कि एक-दूसरे की कौन-कौन सी बातें नापसंद हैं, और कौन-कौन सी बातों पर जोड़ीदार को कोई भी समझौता मंजूर नहीं होगा। अगर टेबिल पर ये तमाम बातें साफ-साफ हो जाएं, तो न केवल बहुत सारे तलाक की नौबत टल सकती है, बल्कि गृहकलह कम हो सकता है, हिंसा तो कम हो ही सकती है। लेकिन भारत में या तो लडक़ा-लडक़ी खुद एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं, और फिर बात परिवार की मर्जी से, या मर्जी के खिलाफ शादी तक पहुंच जाती है। लेकिन डेटिंग या दोस्ती के इस दौर में ताजा-ताजा प्यार की आंखें कुत्ते के नवजात पिल्लों की आंखों की तरह खुली नहीं रहती हैं, और एक-दूसरे की खामियां दिखती नहीं हैं, और लोग अपनी-अपनी खामियां छुपाते भी चलते हैं। फिर यह भी है कि दोस्ती या मोहब्बत के इस दौर में दोनों परिवारों की जटिलताएं, कमाई के साधन, बुरी आदतों की कोई अधिक चर्चा होती नहीं। और शादी के बाद जोड़ों के बीच जब बदन से निकलने वाली हर किस्म की गंध, और हर किस्म की आवाज के साथ जीना रोज की जरूरत बन जाता है, तब असली दिक्कतें सामने आने लगती हैं, और या तो बर्दाश्त करते हुए लोगों के मन भड़ास से भरे रहते हैं, या फिर वे अलग होने तक पहुंच जाते हैं।
इस बारे में लिखते हुए अभी हमें मालूम नहीं है कि शादी के पहले ऐसे जोड़ों के सुखी साथ की संभावनाओं को आंकने के लिए कोई मोबाइल ऐप या कोई वेबसाइट मुफ्त में हासिल है या नहीं। आज कोई परामर्शदाता भी कम्प्यूटर पर ऐसे प्रोग्राम को देखकर ही दोनों को सामने बिठाकर सवाल करेंगे, या अलग-अलग बात करके। कुल मिलाकर शादी के बाद आने वाले तमाम किस्म के संभावित टकराव को पहले ही सुलझा लेने में समझदारी हो सकती है। एक बार शादी हो जाए, बच्चे हो जाएं, कोई संयुक्त संपत्ति लेना हो जाए, उसके बाद तलाक में कई किस्म की दिक्कतें आती हैं। लोगों का मिजाज शादी के पहले जो रहता है, वह भी बाद में बदल सकता है, और अभी तक हमने बेवफाई या बदचलनी का जिक्र नहीं किया है, जो कि बहुत से जोड़ों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह रहती है। आज के जमाने में लडक़े-लड़कियां दोनों ही बाहर रहते हैं, पढ़ते हैं, काम करते हैं, और मिलते-जुलते हैं। ऐसा शादी के पहले से शुरू होता है, और शादी के बाद भी चलते रहता है। इसलिए कब किसी की पिछली जिंदगी की कोई दफन मोहब्बत कब्र फाडक़र निकल आए, और भूतपूर्व पर वर्तमान में कब्जा करने की हसरत दिखाए, यह भी अंदाज लगाना पहले से मुमकिन नहीं रहता। फिर भी ऐसे तमाम असुविधाजनक सवाल कोई भी पेशेवर परामर्शदाता शादी के पहले तो कर ही सकते हैं, और यह अंदाज लगा सकते हैं कि जोड़ों के बीच सामंजस्य किन मुद्दों पर कितना हो सकेगा, और कहां पर कोई समझौता नहीं होगा।
अभी-अभी बिहार के चुनाव निपटे तो जातियों की चर्चा इस प्रदेश की राजनीति को लेकर, और समाज के बाकी दायरों को लेकर भी खूब बढ़-चढक़र हुई। इस बीच एक रिपोर्ट बिहार के जातिवाद पर इस चुनाव के पहले की भी सामने आई। देश के एक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान, आईआईएम बेंगलोर के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि बिहार के सरकारी स्कूलों में अलग-अलग जातियों के छात्र परीक्षाओं में जो नंबर पाते हैं, उन बच्चों के शिक्षकों की धारणाएं उनसे अलग रहती हैं, और वह जातियों से प्रभावित रहती हैं। पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं की क्षमता को उनके परीक्षा-परिणामों के मुकाबले भी कम आंका जाता है, और आईआईएम का यह अध्ययन कहता है कि यह शिक्षकों के ‘मूल्यांकन पक्षपात’ की वजह से होता है। तथाकथित शिक्षकों से जब परीक्षा परिणामों से परे छात्रों का अपने अंदाज से मूल्यांकन करने कहा गया, अगड़ी जातियों के शिक्षकों का अंदाज पिछड़ी जातियों के बच्चों के प्रतिकूल ही रहा। पिछड़ी जातियों के जिन बच्चों के अंक सवर्ण छात्रों के बराबर थे, उन्हें भी शिक्षक के गैरइम्तिहानी मूल्यांकन में सवर्ण बच्चों से कमजोर बताया गया। आईआईएम के इस शोध को करने वाले दो वरिष्ठ प्राध्यापक सोहम साहू, और ऋत्विक बनर्जी थे, जिन्होंने बिहार के 105 सरकारी स्कूलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, और छात्रों, शिक्षक, परिवारों, और स्कूलों का विस्तृत सर्वेक्षण भी किया। शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष है कि ऐसा पूर्वाग्रही आंकलन लंबे समय में पिछड़ी जातियों, जिसमें ओबीसी से परे एसटी-एससी भी शामिल हैं, छात्र-छात्राओं का आत्मविश्वास तोड़ता है और धीरे-धीरे जाकर एक असली शैक्षणिक अंतर पैदा होने लगता है। उन्होंने इसे पिग्मेलियन इफेक्ट कहा है जिसमें टीचर की अपेक्षाएं ही छात्रों के नतीजे तय करने लगती हैं।
अभी हम एक जिम्मेदार संस्थान के दो वरिष्ठ शोधकर्ताओं की इस रिपोर्ट की अधिक बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन इससे जुड़ी हुई, और इससे बिल्कुल अलग भी, एक दूसरी खबर पर जाना चाहते हैं, जो कि मध्यप्रदेश से आई है। यह खबर वहां पर सिविल जज-2022 की परीक्षा के बारे में है जिसमें आदिवासियों के लिए 121 पद आरक्षित थे, लेकिन चयन एक का भी नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी 20 फीसदी है, और संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है। यह भी 15 बरस पहले की 2011 की जनगणना का कहना है। अब अगर डेढ़-दो करोड़ आबादी में सिविल जज बनने के लिए 121 आदिवासी भी तैयार नहीं हो पाए, या उन्हें छांटा नहीं गया, तो यह बहुत ही शर्मनाक नौबत है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस नौबत को देखकर बड़ा सख्त रूख दिखाया, और अदालत ने दिसंबर तक नई चयन सूची पेश करने के लिए कहा है। इस मामले में सामाजिक न्याय के लिए बने वकीलों के एक संगठन ने अदालत में अपील की थी, और कहा था कि आदिवासी वर्ग के प्रतियोगियों पर सामान्य वर्ग के बराबर कटऑफ लागू कर दिया गया था। न्यूनतम योग्यता में छूट नहीं दी, और साक्षात्कार में कम अंक देकर भेदभाव दिखाया गया। इस इम्तिहान में सरकार की अपनी बनाई हुई शर्तों के खिलाफ जाकर एसटी-एससी प्रतियोगियों पर गलत शर्तें लागू की गईं।
बिहार के स्कूलों और मध्यप्रदेश के इस इम्तिहान का आपस में कोई सीधा संबंध नहीं है, सिवाय इसके कि इससे यह साबित होता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। जिन लोगों को यह लगता है कि जाति व्यवस्था टूट चुकी है, आरक्षण खत्म कर देना चाहिए, उनकी इस सोच से ही उनके जाति-वर्ग का अंदाज लगाया जा सकता है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आज से करीब 35 साल पहले एक इंटरव्यू में जाति व्यवस्था खत्म हो जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि जिन लोगों के पांव में बूट है, उन्हें जिनके पांव कुचले जाते हैं, उनका दर्द पता नहीं चलता। आज जाति की हालत वैसी ही है। जिन्हें अगड़ी जातियां कहा जाता है, उन्हें अपनी जातियों पर बात-बात पर अहंकार होने लगता है, वे बात-बात में एसटी-एससी, और आरक्षण पाने वाली ओबीसी को सरकारी दामाद कहने लगते हैं, उनकी जुबान, चेहरे के भाव, और आवाज से हिंसक हिकारत टपकने लगती है। उन्हें कुछ मिनट सुन लें तो यह समझ आ जाता है कि आरक्षित वर्गों के वकीलों और उनके तर्कों को सुनने की जरूरत ही नहीं है, अनारक्षित वर्ग के लोगों की हिंसक बातें ही उनके खिलाफ वकील की तरह खड़ी रहती है। देश में यह नौबत जाने कब सुधरेगी, जल्द तो सुधरने का कोई आसार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के एक फैसले को पलटते हुए अभी एक बड़ी बेंच ने राष्ट्रपति के भेजे हुए एक संदर्भ पर अपनी राय सुनाई कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास गए हुए विधेयकों पर उनके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। इसके पहले दो जजों की एक बेंच ने यह फैसला दिया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयक उनके पास पहुंचने के बाद तीन महीने के भीतर उस पर अपना फैसला देना चाहिए। केन्द्र सरकार इस फैसले के बहुत खिलाफ थी, और उसने जजों को याद दिलाया था कि संविधान में इन दो संवैधानिक पदों के लिए समय सीमा तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। ऐसे मामले अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राज्यों में उठते ही रहते हैं जहां सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन से केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के राजनीतिक विरोध रहते हैं। ऐसी नौबत रहने पर राज्यपाल या राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की मर्जी से राज्य विधानसभाओं से पास किए गए विधेयकों को मंजूरी देने के बजाय उन्हें गद्दे के नीचे दबाकर उस पर सो जाते हैं। कुछ राज्यों में तो कई साल पहले से विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास पड़े हुए हैं, और जनता द्वारा निर्वाचित विधायकों वाली विधानसभा सिवाय इंतजार करने के और कुछ नहीं कर सकती है। ऐसे में जब कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की थी, तब हमने उस फैसले की तारीफ करते हुए यह लिखा था कि यह इन दो संवैधानिक पदों की जनता के प्रति जवाबदेही भी तय करने वाला फैसला है, और इन पदों को सरकार के असर से परे का मानना इसलिए ठीक नहीं है कि राज्यपाल तो केन्द्र सरकार के मनोनीत किए हुए होते हैं, और राष्ट्रपति भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिशों के मुताबिक काम करने को मजबूर रहते हैं। ऐसे में केन्द्र का गठबंधन उसे नापसंद किसी भी राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पास करवाए गए विधेयक को अंतहीन रोक सकता है, और सामने ही दिख रहा है कि रोकते आया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच का है, और उसने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों को मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। 111 पेज का यह बहुत ही निराशाजनक फैसला घोर अलोकतांत्रिक है, और केन्द्र सरकार को तानाशाही के सारे अधिकार देता है। ये दोनों ही पद पूरी तरह से केन्द्र सरकार के काबू के, और उसके मातहत सरीखे पद हैं। राज्यपाल और राष्ट्रपति को बेमुद्दत हक देना केन्द्र सरकार के हाथ में केन्द्र सरकार को तानाशाह बना देने के अलावा और कुछ भी नहीं है। आज की बात आज केन्द्र पर सवार गठबंधन को लेकर नहीं है, यह बात जनता द्वारा निर्वाचित विधानसभाओं के पारित विधेयकों के कानून बनने के जनता के परोक्ष अधिकार की बात है। जनता किसी विधेयक के लिए सीधे वोट नहीं देती, लेकिन उसके निर्वाचित विधायकों का एक बहुमत ऐसे विधेयक के साथ जब होता है, तभी वह पास होकर मंजूरी के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के लिखे हुए शब्दों की व्याख्या हो सकता है, लेकिन यह लोकतंत्र की भावना के ठीक खिलाफ है। जस्टिस गवई रिटायर होते-होते ऐसा फैसला क्यों कर गए हैं, इसे वे ही जाने। इस बेंच में उनके ठीक बाद जस्टिस बनने वाले जज भी हैं। सुप्रीम कोर्ट तो देश की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत है, और इसका हक संविधान की व्याख्या करना भी रहता है। कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट अगर संविधान के प्रावधानों को छू नहीं पाता, तो भी फैसले में उनके खिलाफ टिप्पणी जरूर करता है। ऐसा करने के लिए जजों में कुछ हौसले की भी जरूरत पड़ती है, और उन्हें रिटायर होने के बाद के लिए मोह-माया से मुक्त भी रहना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का दो दिन पहले का यह फैसला बहुत ही निराश करता है। संविधान एक मुर्दा दस्तावेज नहीं रहता, वह शब्दों के साथ-साथ भावनाओं का पुलिंदा भी रहता है, और इसीलिए उस पर आधारित बातों के लिए कहा भी जाता है कि इन लैटर, एंड स्पिरिट। ऐसा लगता है कि पांच जजों की इस बेंच ने राष्ट्रपति और केन्द्र सरकार के वकीलों के संविधान के दिए गए संदर्भों के शब्द ही पढ़े हैं, लोकतंत्र की भावना का इस्तेमाल नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच की यह व्याख्या हक्का-बक्का करती है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। अपने फैसले की इज्जत बचाने के लिए इस फैसले में लिखा गया है कि राज्यपाल विधेयक को रोक सकते हैं, लेकिन अनावश्यक देरी का कारण स्पष्ट न हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। राष्ट्रपति के उठाए गए सवालों में से अधिकांश पर कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। लोकतंत्र में किस तरह एक राजनीतिक सरकार के तहत काम करने वाले दो लोगों को ऐसे असीमित अधिकार दिए जा सकते हैं? आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट की कोई और बड़ी बेंच इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी, और उसमें जज कड़ा और खरा बोलने और लिखने वाले रहेंगे, तो यह फैसला पलट दिया जाएगा। हम कानून और संविधान की बारीकियों में उलझे बिना यह सोचते हैं कि किसी राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास विधानसभा से पारित विधेयक पहुंचने के बाद उन्हें तीन महीने से अधिक का वक्त क्यों लगना चाहिए? राज्यपाल के पास कानूनी सलाहकार रहते हैं, वे केन्द्र सरकार के वकीलों से भी सलाह ले सकते हैं। जनता की निर्वाचित विधानसभा के पारित विधेयक पर अगर राज्यपाल 90 दिन में भी फैसला नहीं ले सकते, तो वे जनता के पैसों की बर्बादी करते हुए इस कुर्सी पर क्यों बैठे हैं? कानूनी और संवैधानिक सलाह-मशविरा तो कुछ दिनों के भीतर ही हो सकता है, तीन महीने के और बाद जाकर तो महज राजनीति हो सकती है, जो कि हो रही है। एक आदिवासी समुदाय से आई हुई राष्ट्रपति ने जब यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट को भेजा, और उससे संवैधानिक राय मांगी, तो भी यह बड़ी हैरानी की बात इसलिए थी कि क्या वे निर्वाचित विधानसभा के अधिकारों को केन्द्र सरकार के इशारे पर नीचा दिखाने की हिमायती हो गई हैं? जनता के पैसों पर जो राज्यपाल और राष्ट्रपति राजसी ठाठ से जीते हैं, उस जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले विधेयकों को क्या ये सामंती सहूलियतों वाले लोग बिस्तर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट में अभी मुस्लिम समाज में महिला के हक के खिलाफ प्रचलित एक प्रथा पर सुनवाई हो रही है। अदालत ने एक मुस्लिम मर्द के वकील से यह पूछा है कि तलाक-ए-हसन नाम की प्रथा क्या सभ्य समाज में जारी रहनी चाहिए? यह मामला एक पत्रकार बेनजीर हिना का दायर किया हुआ है जिसमें कहा गया है कि मुस्लिम महिला को तलाक देने का यह तरीका तर्कहीन, मनमानी, और असंवैधानिक है जो कि महिलाओं के सम्मान, और समानता के अधिकार के खिलाफ है। बीते बरसों में भारत में मुस्लिम महिलाओं से जुड़े हुए कई मामले अदालतों में आए, इनमें से एक, तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को 2017 में अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद मोदी सरकार ने तीन तलाक को गैरकानूनी करार देने वाला एक कानून बनाया जो 1 अगस्त 2019 से लागू हो गया। इसके बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई चुनावी रैलियों में कहा था कि मुस्लिम मां-बहनों को तीन तलाक के जुल्म से आजादी दिलानी है। इस कानून में ऐसा करने वाले मुस्लिम मर्द को तीन साल तक की कैद, और जुर्माने का प्रावधान किया गया था। इसके लागू होने के बाद से देश में तीन तलाक देने वाले हजारों मर्दों के खिलाफ उनकी बीवियों की तरफ से पुलिस रिपोर्ट हुई है, और मुकदमे चल रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में तलाक की एक दूसरी किस्म के खिलाफ मामला पहुंचा है।
भारत में 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधान चले आ रहे हैं। इनमें से बहुत से प्रावधान महिलाओं के हक के खिलाफ हैं। देश में कुछ अलग-अलग प्रदेशों ने मुस्लिमों को इस कानून के तहत नाबालिग लड़कियों की शादी करने की मिली हुई छूट को खत्म करना शुरू किया है, और हमने अपने अखबार में तीन तलाक को सजा के लायक बनाने का भी समर्थन किया था, और नाबालिग लड़कियों की इस्लामिक कानून के हवाले से शादी करने के खिलाफ भी बार-बार लिखा है, अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसके खिलाफ कई बार कहा है। आज भी सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के इस दूसरे तरीके के खिलाफ कड़ा रूख दिखाया है, और कहा है कि पति की तरफ से उसका वकील ही महिला को तलाक के तीन नोटिस एक-एक महीने के फासले से भेजकर शादी को खत्म कर सकता है, यह आज के वक्त पर सही कैसे माना जा सकता है? अदालत ने यह भी कहा है कि हर महिला के पास कानूनी लड़ाई लडऩे की ताकत नहीं होती है।
मुस्लिम महिला के तलाक के बाद उसका वही पति अगर दुबारा उससे शादी करना चाहे, तो उसके लिए हलाला नाम का एक रिवाज है जिसके तहत उस औरत को पहले किसी और मर्द से शादी करनी पड़ती है, फिर उससे तलाक लेना पड़ता है, तब जाकर वह अपने पिछले पति से दुबारा निकाह कर सकती है। इस प्रथा के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का कई जगह बहुत बुरा शोषण होता है। मुस्लिम मर्द को चार बीवियां रखने का हक है, और यह बात भी मुस्लिम महिला के हक मारने वाली रहती है। मुस्लिम लड़कियों को अपने भाईयों के मुकाबले आधा हक ही मिलता है, और मुस्लिम विधवा को भी कानून के तहत बहुत कम हक मिलता है। तलाक के बाद मुस्लिम महिला को कोई स्थाई गुजारा-भत्ता नहीं मिलता। रूपए-पैसे के कुछ मामलों में मुस्लिम कानून में दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही मानी जाती है। ऐसे कई बेइंसाफ कानूनों को बदलने की मांग मुस्लिम महिला संगठन लंबे समय से करते आ रहे हैं, और मुस्लिम समाज के बाहर हमारे सरीखे लोग भी इन बातों को बार-बार उठाते हैं।
कर्नाटक की स्कूल-कॉलेज की छात्राओं पर वहां की पिछली भाजपा सरकार के वक्त हिजाब पहनने पर यह कहते हुए रोक लगाई गई थी कि यह स्कूली पोशाक का हिस्सा नहीं है। सरकार की इस रोक के खिलाफ मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। हमने इस मुद्दे पर शुरू से अंत तक यही लिखा था कि कोई समुदाय हिजाब की शर्त पर अडक़र अपनी लड़कियों को स्कूल-कॉलेज से निकाल देने का काम करता है, तो वह परले दर्जे की मर्दाना बेअक्ली है। दुनिया में बहुत से ऐसे इस्लामिक या मुस्लिम देश हैं जहां पर हिजाब की कोई बंदिश नहीं है, बुर्के की कोई बंदिश नहीं है। इस पर भी अगर मुस्लिम मर्द अपने समाज की महिलाओं को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि यह उनका हक है, तो यह एक मर्दानी कामयाबी है, और सदियों से उसकी गुलाम चली आ रही महिलाओं की नासमझी भी है। जिस बोझ को मुस्लिम महिला का हक करार देने में मर्द कामयाब हो गए हैं, उस साजिश को भी समझना चाहिए, और समाज सुधार के रास्ते, या कानून के रास्ते, सिर्फ महिलाओं पर लादे जाने वाले ऐसे रिवाज खत्म किए ही जाने चाहिए। यह कोई हक नहीं है एक बोझ है। एक वक्त राजस्थान में हिन्दू महिला के पति के गुजर जाने पर उसे भी साथ-साथ सती कर देने की घटना होती थी, और उसे हिन्दू महिला का हक करार दिया जाता था। बाद में कानून बनाकर उसके इस तथाकथित हक को खत्म किया गया है।
उत्तरप्रदेश में 2015 में एक मुस्लिम अखलाक के गांव में यह अफवाह फैली कि उसने अपने घर में गोमांस रखा है। इस बात की घोषणा गांव के मंदिर से लाउडस्पीकर पर हुई, और बात की बात में एक बड़ी भीड़ जुट गई, और अखलाक को उसके घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला गया। उसे बचाते हुए उसके बेटे को भी गंभीर चोटें आईं। 2015 में ही पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट फाइल की जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, और इनमें एक नाबालिग लडक़ा भी था, और एक स्थानीय भाजपा नेता का बेटा भी। 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने, और उसके बाद 2021 से अखलाक-मॉबलिंचिंग मामले की सुनवाई शुरू हुई। देश में अपने किस्म की यह पहली भीड़त्या थी जिसे खबरों में मॉबलिंचिंग कहा गया था। अब उत्तरप्रदेश सरकार ने अदालत में अर्जी दाखिल की है कि वह सारे ही अभियुक्तों के खिलाफ हत्या के आरोप सहित तमाम आरोप वापिस लेना चाहती है।
क्या लोकतंत्र में इससे भयानक और कुछ हो सकता है कि एक मांसाहारी परिवार के व्यक्ति को उसके घर पर रखे गए मांस के गौमांस होने का आरोप लगाकर घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला जाए? क्या देश में प्रशासन और पुलिस नहीं रह गए हैं कि जगह-जगह ऐसी गौ-गुंडई की जाए? कहीं राजस्थान में, कहीं हरियाणा में, अक्सर ही उत्तरप्रदेश में, और अब छत्तीसगढ़ में भी गौहत्या या गौमांस, या गौ-कारोबार, गौ-परिवहन का आरोप लगाकर किसी को भी पीट-पीटकर मार डाला जाता है। छत्तीसगढ़ में पिछले साल राजधानी रायपुर की सरहद पर एक पुल के ऊपर पशु व्यापारियों को पीट-पीटकर मार डाला गया, और फिर उन्हें पुल से कूदकर जान देना बता दिया गया। अपने आपको गौरक्षक कहने वाले लोगों ने 50-60 किलोमीटर तक पशु व्यापारियों की गाड़ी का पीछा किया, उस पर हमला करके उसे रोका, और उसमें कोई गाय नहीं थी, लेकिन तीन मुस्लिम पशु व्यापारी मार डाले गए। ये तीनों अपनी गाड़ी में भैंस ले जा रहे थे। उनमें से एक ने अपने परिवार को फोन लगाया था, और परिवार 47 मिनट तक इन लोगों के मार खाने की चीखें सुनते रहा। लेकिन जैसा कि अभी यूपी सरकार कर रही है, उस वक्त छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इस घटना में किसी मारपीट का जिक्र नहीं किया, और यह दिखाया कि ये पशु व्यापारी पुल से नीचे कूदे, और पत्थरों पर गिरकर मर गए। जिन लोगों ने पीछा किया, हमला किया, उन पर हत्या का जुर्म भी दर्ज नहीं किया गया।
आज अखलाक को दिल्ली से 50 किलोमीटर के भीतर ही गादरी नाम के गांव में दफन हुए 10 बरस गुजर चुके हैं, और अब हत्या के सारे ही आरोपियों के खिलाफ सरकार मामला वापिस लेने की अर्जी लगा चुकी है। खबर बताती है कि इसमें राज्यपाल की अनुमति भी साथ में लगाई गई है। गौतम बुद्ध नगर जिले की अदालत में लगी इस अर्जी को लेकर बुद्ध क्या सोच रहे होंगे, इसका अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। अब तक तो पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां, सरकारी या दूसरे वकील, और न्याय प्रक्रिया में शामिल दूसरे लोग धर्म के नाम पर रियायत करते हुए सुने जाते थे। लेकिन अब तो संविधान की शपथ लेकर काम करने वाली एक सरकार ने एक औपचारिक अर्जी ऐसी लगाई है, जो कि बुरी तरह हक्का-बक्का करती है।
लोगों को याद होगा कि गुजरात में दो-तीन बरस पहले 2002 के दंगों के दौरान एक गर्भवती मुस्लिम महिला से बलात्कार करने वाले, और उसके छोटे से बच्चे को मार डालने वाले 11 लोगों को राज्य और केन्द्र सरकार ने अच्छे चाल-चलन की फाइल बनाकर समय से पहले जेल से रिहा कर दिया था। जेल के बाहर इन्हें माला पहनाकर, मिठाइयां खिलाकर इनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया था। जब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई, तो अदालत ने इन सारे लोगों को दुबारा जेल भेजा। हमारा ख्याल है कि यूपी की जिला अदालत में यूपी सरकार की लगाई हुई अर्जी का सुप्रीम कोर्ट को खुद ही संज्ञान लेना चाहिए, और इस सरकारी अर्जी को खारिज करते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और उससे पूछना चाहिए कि संविधान की शपथ का क्या हुआ? देश में आज जगह-जगह अल्पसंख्यकों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, और ऐसे में अल्पसंख्यकों की खुली भीड़त्या करने वाले लोगों को अगर इसी तरह माफी मिलती रही, तो वे क्या-क्या नहीं करेंगे, और देश में बाकी जगहों पर गाय के नाम पर इंसानों को काटने की घटनाएं कहां-कहां पर नहीं होंगी?
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बनाया था जिसकी निर्माण लागत ही सौ करोड़ रूपए तक पहुंच गई थी, और जमीन के दाम जोड़ें, तो शायद हजार-दो हजार करोड़ का स्टेडियम था। अब सफेद हाथी खाने में तो काले हाथी जितना ही खाता है, लेकिन उसे नहलाने में साबुन अलग से लगता है, जो कि खासा महंगा रहता है। यह स्टेडियम भी भूले-भटके यहां होने वाले किसी क्रिकेट मुकाबले की शकल कभी देख पाता था, और इसके अलावा तो इतने बड़े ढांचे का और तो इस्तेमाल था नहीं। अब सरकार ने पांच साल के लिए यह स्टेडियम छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन को दिया है, जिससे सालाना कुछ रकम भी मिलेगी, रखरखाव भी होगा, और हो सकता है कि मैच कुछ अधिक हो जाएं, या कुछ रकम भी सरकार को मिल जाए। हम अभी सरकार के इस फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन इससे जुड़े हुए एक मुद्दे पर बात करना जरूरी है।
प्रदेश में दसियों हजार स्कूल-कॉलेज के खेल मैदान हैं, कुछ छोटे हैं, कुछ बड़े हैं, लेकिन खेल गतिविधियां ठप्प सरीखी रहती हैं। चूंकि सरकार चाहती है इसलिए खेल मुकाबले तो हो जाती है, स्कूलों से लेकर दूसरी टीमें बन जाती हैं, प्रतियोगिताएं हो जाती हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में राज्य के खिलाड़ी राज्य के भीतर ही रह जाते हैं, और गिने-चुने खिलाड़ी ही राष्ट्रीय स्तर पर किसी किनारे पहुंच पाते हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की एक फिजियोथैरेपिस्ट युवती छत्तीसगढ़ की है, और टीम विश्वकप जीतकर लौटी, तो यह प्रदेश इस फिजियोथैरेपिस्ट का सम्मान-अभिनंदन करने का मौका पा सका, पूरा प्रदेश इसी बात को लेकर गौरवान्वित रहा। कहने के लिए प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के अलावा, अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम भी है, लेकिन इनका प्रदेश के खिलाडिय़ों से कुछ लेना-देना नहीं है। नेता-अफसर-ठेकेदार बड़े-बड़े निर्माण से खुश रहते हैं, और बड़े-बड़े स्टेडियम बनने से तो सरदार खुश हुआ किस्म के फिल्मी डायलॉग भी याद आते हैं। लेकिन प्रदेश के खिलाड़ी इन स्टेडियमों में खेलने लायक बन सकें, वह बात किनारे धरी हुई है। स्कूल और गांव के स्तर के खिलाडिय़ों को आगे बढ़ाने, उन्हें मैदान मुहैया कराने, खेल के सामान और खेल शिक्षक-प्रशिक्षक देने का काम स्टेडियम बनाने जितना आकर्षक नहीं रहता, इसलिए सरकार में किसी की दिलचस्पी ऐसे बिखरे हुए काम में नहीं रहती, जहां स्कूल की स्पोटर््स किट खरीदी से छोटे-छोटे से कमीशन ही मिलें। फिर स्कूलों में खेल के अभ्यास से तो किसी को कुछ नहीं मिलना है, सिर्फ बच्चों को खेलने का मौका मिलेगा, आगे बढऩे का मौका मिलेगा। इसलिए प्रदेश भर में स्कूल-कॉलेज के, और बाकी सार्वजनिक खेल मैदानों पर गैरखेल काम ही चलते रहते हैं। सरकार, राजनीति, बाजार, धर्म, और आध्यात्म, इन सब के तम्बू लगने और उखडऩे के बीच एक-दो दिन खेल मैदानों पर बच्चे पहुंच पाते हैं, तो हाथ-हाथ भर गहरे गड्ढे पड़े रहते हैं, कोई मैदान खेल के लायक नहीं बचते।
इस प्रदेश में हर खेल के लिए कोई न कोई खेल संघ है। हरेक पर कोई न कोई बड़ा नेता, बड़ा अफसर, या बहुत बड़ा कारोबारी काबिज है। सत्ता बदलने के साथ-साथ कुछ खेल संघों के मुखिया के नाम बदल जाते हैं, लेकिन वे रहते नेता-अफसर, और कारोबारी ही हैं। खेल मैदानों की बात कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा ने भी उठाई थी। लेकिन प्रदेश के एक भी खेल संघ ने यह बात नहीं उठाई कि खेल मैदानों पर दूसरे काम नहीं होने चाहिए, उन्हें सिर्फ बच्चों और खिलाडिय़ों के खेलने के लिए रखना चाहिए, ताकि वे स्टेडियम में पहुंचने लायक टीम के लायक भी बन सकें, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ साबित कर सकें। खेल संघ सत्ता से इतने जुड़े रहते हैं, सत्ता का हिस्सा रहते हैं कि वे सरकारी या राजनीतिक हितों से परे कुछ सोच भी नहीं पाते। खेल आयोजनों और खेल संघों के मंच देखें, तो उन पर सत्ता, सत्तारूढ़ पार्टी, और प्रदेश का खेल माफिया हावी रहता है, जिनका खेलों से कुछ लेना-देना नहीं रहता, लेकिन वे इन संघों के नाम पर एक सामाजिक प्रतिष्ठा, और एक ताकत पाते रहते हैं। तमाम खेल एक तरफ तो खेल मैदानों को लेकर सरकारी लापरवाही और उदासीनता के शिकार हैं, और दूसरी तरफ वे खेल संघों के शिकार हैं। आज जितने खिलाड़ी थोड़े-बहुत भी आगे बढ़ पाते हैं, वे खेल संघों की वजह से नहीं, खेल संघों के बावजूद आगे बढ़ जाते हैं।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में अनगिनत नक्सल हमलों के पीछे जिम्मेदार रहा एक बड़ा नक्सल नेता हिड़मा आज सुबह आंध्रप्रदेश में एक पुलिस मुठभेड़ में अपनी बीवी और कुछ दूसरे नक्सल साथियों के साथ मारा गया। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि वह दो दर्जन से अधिक हमलों के पीछे था, और आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, और तेलंगाना की सरहदों पर वह लगातार सक्रिय रहता था। आंध्र पुलिस ने इस मुठभेड़ के बाद प्रेस को बताया कि छत्तीसगढ़ पुलिस के दबाव के चलते नक्सली आंध्र में भीतर तक आए थे, और आंध्र पुलिस निगरानी रख रही थी। माड़वी हिड़मा नाम के इस नक्सल नेता पर 50 लाख रूपए का ईनाम था, वह नक्सल सेंट्रल कमेटी का शायद नौजवान सदस्य था, और इस कमेटी में बस्तर इलाके का अकेला आदिवासी भी। वह बस्तर के सुकमा में ही पैदा हुआ था, और अभी हफ्ते भर पहले ही छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री, और गृहमंत्री विजय शर्मा उसके गांव होकर आए थे, जहां उन्होंने हिड़मा की माँ और गांव के दूसरे लोगों के साथ खाना खाया था, और हिड़मा की माँ से अपील की थी कि वह अपने बेटे को पुनर्वास के लिए कहे। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि बीते कुछ महीनों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने बड़े-बड़े नक्सल नेताओं सहित उनके हथियारबंद साथियों के हिंसा छोडऩे को आत्मसमर्पण कहना छोड़ दिया है, और अब इसे हथियार डालना कहा जा रहा है। हाल ही में ऐसे नक्सल नेताओं ने यह भी कहा कि आदिवासी हक के लिए उनकी लड़ाई अब बिना हथियारों के चलती रहेगी। यह सरकार के हिस्से की एक समझदारी है कि भाषा की जटिलता में उलझे बिना उसने शायद नक्सल नेताओं के आत्मसम्मान के लिए आत्मसमर्पण शब्द छोड़ दिया, और हथियार डालना कहा।
नक्सल मोर्चे से परे आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा का एक विशेष सत्र चल रहा है जो कि इस सदन का रजत जयंती वर्ष समारोह भी है, और विधानसभा के मौजूदा भवन को बिदाई भी है। आज के इस सत्र के बाद विधानसभा का अगला सत्र नया रायपुर के नए भवन में होगा, और 25 बरस तक संसदीय कार्य के बाद अब विधायक इस भवन का धन्यवाद करते हुए आज यहां से आखिरी बार रवाना होंगे। भारत और मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ का मजबूत संसदीय इतिहास रहा है, और आज नक्सल मोर्चे पर सुरक्षाबलों की एक और कामयाबी के बाद इन दो बातों को जोडक़र देखने की जरूरत लग रही है। जैसा कि किसी भी देश की संसदीय व्यवस्था रहती है, वह जनता के हित के लिए काम करती है, या कम से कम उससे यह उम्मीद तो की ही जाती है। दूसरी तरफ बस्तर जैसे नक्सल इलाके में नक्सली भी अपने आपको आदिवासी जनता के हित के लिए लडऩे वाला कहते आए हैं, और उनके घोषित एजेंडा को देखें, तो उसमें कई बातें सचमुच ही आदिवासी हितों की दिखती हैं। नक्सलवाद के साथ दिक्कत यह है कि वह जनता के हक लोकतंत्र में मिलना मुमकिन नहीं मानता, और इसीलिए वह हथियारों के दम पर हक की यह लड़ाई लड़ता है। लोकतंत्र में चाहे मुद्दा कितना ही जायज क्यों न हो, उसके लिए हथियारबंद लड़ाई का हक किसी को नहीं मिलता। जिन लोगों को लगता है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था आदिवासियों को उनका हक नहीं दे पा रही है, तो उन्हें देश के कुछ दूसरे तबकों को देखना होगा जिन्हें लगता है कि यह व्यवस्था अल्पसंख्यकों को, दलितों को, महिलाओं को, गरीबों को उनका हक नहीं दिला पा रही है। अब हक नहीं मिल रहा, इसलिए हथियार उठा लेना, यह लोकतंत्र में कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए छत्तीसगढ़ की मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदा भाजपा सरकार ने जब एक तरफ नक्सलियों को खत्म करने की ऐतिहासिक कामयाबी वाली मुहिम छेड़ी, तो दूसरी तरफ उसने पुनर्वास के लिए नक्सलियों का हौसला बढ़ाया, उनसे अपील की। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी लगातार नक्सलियों से मूलधारा में लौटने की अपील की, और यह तक कहा कि अगर वे बिना हथियारों और हिंसा के अपनी विचारधारा पर कायम रहते हैं, तो उससे सरकार को कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में हर विचारधारा के सहअस्तित्व की गुंजाइश है। इस तरह केन्द्र और राज्य के इस लचीले रूख से नक्सल मोर्चे पर वह कामयाबी मिली जो कि देश के किसी भी दूसरे राज्य में नहीं मिली थी, और छत्तीसगढ़ में तो इन दो बरसों के पहले किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
आज छत्तीसगढ़ की संसदीय रजत जयंती के मौके पर अगर हिड़मा और उनके साथी हथियार डालकर लोकतंत्र की मूलधारा में लौटते, और हथियारविहीन संघर्ष जारी रखते, तो बेहतर होता। लेकिन जब कोई भी विचारधारा या आंदोलन हथियारबंद होकर, लगातार हिंसा करते हुए सक्रिय रहे, तो ऐसे लोकतंत्र में सरकारों के पास उन्हें काबू में करने, या मजबूरी हो जाने पर खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हिड़मा उन नक्सल हमलावर दलों का मुखिया रहा है जिसने दर्जनों लोगों को मारा था। सरकार के बार-बार के प्रस्ताव के बाद भी वह उन नक्सल नेताओं में था जो हथियार डालने तैयार नहीं थे। इसलिए हथियारबंद संघर्ष के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। छत्तीसगढ़ और बस्तर के सरहदी राज्यों में नक्सली सरहद के आरपार आते-जाते रहते हैं, और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के साथ मिलकर इन राज्यों की पुलिस कार्रवाई करती रहती है। आज सुबह आंध्र की इस कार्रवाई में इस पति-पत्नी जोड़े के अलावा भी चार और लोगों के मारे जाने की खबर है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई ने कल अपने इस विचार को दुहराया कि अनुसूचित जाति के आरक्षण से उस वर्ग के मलाईदार तबके को बाहर करना चाहिए। वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोल रहे थे, और उन्होंने कहा कि जब रिजर्वेशन की बात आती है तो एक गरीब खेतिहर मजदूर के बच्चे का मुकाबला एक आईएएस अफसर के बच्चे से भला कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि जो ओबीसी आरक्षण में लागू होता है, वही अनुसूचित जाति के आरक्षण में भी लागू होना चाहिए। उन्होंने खुद ही यह भी कहा कि जब उन्होंने इस बारे में फैसला लिखा था, तो उसकी व्यापक आलोचना हुई थी। उल्लेखनीय है कि 2024 में उन्होंने दविन्दर सिंह प्रकरण में अपनी यही सोच फैसले में लिखी थी।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बीते दशकों से लगातार यह बात लिखते आ रहे हैं कि दलित और आदिवासी दोनों ही तबकों में आरक्षण का फायदा पाने वाले लोगों पर क्रीमीलेयर की सीमा लागू करनी चाहिए ताकि एक बार इसका फायदा पाकर सामाजिक रूप से सक्षम हो चुके परिवारों को उनकी संपन्नता या परिवार के लोगों के ओहदों की ताकत से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वह फायदा न मिलता रहे। एक बार जो परिवार आरक्षण के फायदे से ताकतवर हो जाते हैं, वे अपने ही तबके के कमजोर लोगों को कभी बराबरी तक नहीं आने दे सकते। इसलिए एक बार कमाई जा चुकी ताकत की ऐसी विरासत को जारी रखने का मतलब सामाजिक अन्याय को जारी रखना है। पहले तो दूसरे वर्गों के मुकाबले इस अन्याय को खत्म करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, अब इन तबकों के भीतर असमानता को देखते हुए क्रीमीलेयर की धारणा लागू करना बहुत जरूरी है क्योंकि उसके बिना सबसे कमजोर तबके कभी भी फायदा पाने लायक नहीं बन पाएंगे, और ताकतवर हो चुके लोग ही आरक्षण का सारा फायदा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पाते रह जाएंगे।
मुख्य न्यायाधीश गवई खुद दलित तबके के हैं, और उनका परिवार क्रीमीलेयर में गिनाएगा, लेकिन अपने निजी नुकसान की कीमत पर भी उन्होंने यह सोच सामने रखी है। हमारा भी तर्क यही रहते आया है कि जिस संसद या विधानसभा को आरक्षण की व्यवस्थाओं में किसी भी तरह का फेरबदल करने का अधिकार हो सकता है, उसके सारे ही सांसद और विधायक सदस्य क्रीमीलेयर के गिनाएंगे, और क्रीमीलेयर लागू करने उनके लिए ठीक वैसे ही निजी नुकसान का होगा जिस तरह सरकार के बड़े अफसरों, या अदालत के बड़े जजों के लिए होगा। हितों के ऐसे टकराव के चलते हुए दलित और आदिवासी तबकों के आरक्षण पर क्रीमीलेयर लागू नहीं हो पाई है। इसका नुकसान यह है कि इन तबकों के भीतर एक बार ताकतवर हो चुके लोग अपने बच्चों को आगे के सभी फायदों पर काबिज होने के लिए मजबूत बनाते चलते हैं, और एक काल्पनिक क्रीमीलेयर के ठीक नीचे के लोग भी उनका मुकाबला नहीं कर पाते। सामाजिक न्याय के आरक्षण के भीतर यह एक बड़ा सामाजिक अन्याय धड़ल्ले से चल रहा है।
अब इस मुद्दे पर बात करते हुए हमारा यह साफ मानना है कि जिन एसटी-एससी परिवारों की आय 10 लाख रूपए से ऊपर है, जिनके परिवारों में कोई भी सांसद या विधायक हैं, या किसी भी सरकार संस्थान में प्रथम या द्वितीय वर्ग के अधिकारी हैं, उनके बच्चों को आरक्षण की पात्रता से बाहर करना चाहिए। इसके अलावा जिन लोगों को एक या दो पीढ़ी आरक्षण मिल चुका है, उनकी तीसरी पीढ़ी को आरक्षण के फायदे से बाहर करना चाहिए। यह बात स्कूल-कॉलेज के दाखिलों और नौकरियों पर सीधे-सीधे लागू हो सकती है, होनी चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ इन तबकों के लिए आरक्षित चुनावी सीटों पर क्रीमीलेयर लागू करना शायद व्यवहारिक और सही नहीं होगा, इसलिए हम उस पर अभी कोई विचार नहीं रख रहे हैं। इस बात को समझना जरूरी है कि पढ़ाई और नौकरी के अवसर गिने-चुने रहते हैं, और एसटी-एससी तबकों के क्रीमीलेयर में वे सारे ही खत्म हो जाते हैं। इनको हटा देने पर भी इन तबकों के शायद 90 फीसदी लोग मुकाबलों में फिर भी बचे रहेंगे। और वे ही लोग सामाजिक अन्याय के इतिहास की रौशनी में आज आरक्षण के असली हकदार हैं।
एक वक्त था जब आज के मीडिया के तहत सिर्फ अखबार ही आया करते थे। उन दिनों अखबारों का वजन रद्दी से तय नहीं होता था, बल्कि उसकी प्रसार संख्या से तय होता था, और उसकी साख से भी। कुछ अखबार कम छपते-बिकते थे, लेकिन उनकी बात का वजन अधिक रहता था। बाद में टीवी चैनल आए, और उनकी दर्शक संख्या गिनने के सच्चे-झूठे जैसे भी हो, कुछ पैमाने बनाए गए। इस दौर में भी यह कुछ हद तक कायम रहा कि सबसे अधिक देखे जाने वाले चैनलों की साख भी सबसे अधिक हो, यह जरूरी नहीं था। दर्शक संख्या की लिस्ट में नीचे आने वाले कुछ चैनलों का नाम भी साख की लिस्ट में ऊपर रहता था, ठीक वैसे ही जैसे कुछ अखबार बिकते-दिखते तो कम थे, लेकिन उनकी बात को अधिक गंभीरता से लिया जाता था।
अखबार के बिकने को उसके अलग-अलग पन्नों से नहीं तौला जा सकता था। पूरे का पूरा अखबार एक ही रहता था, उसकी सामग्री किसी वेबसाईट पर भी नहीं रहती थी जिससे कि यह देखा जा सके कि उसके अलग-अलग पन्नों पर छपी सामग्री में से किसे कम देखा जा रहा है, और किसे अधिक। लेकिन टीवी के आने के साथ ही यह भी हिसाब-किताब लगने लगा कि किस चैनल के कितने बजे के कार्यक्रम में दर्शक संख्या कितनी है, और दर्शक कितनी देर वहां पर रूकते हैं। फिर धीरे-धीरे अखबारों और टीवी चैनलों की वेबसाइटें बननी लगीं, और बहुत सी समाचार वेबसाइटें खुद की भी थीं। इनमें किस लेख या समाचार, किस वीडियो या ऑडियो को कितने लोगों ने देखा, यह अलग-अलग दिखने लगा, और इसी से यह तय होने लगा कि वेबसाइट पर, या उसके पीछे के अखबार में क्या छापा जाए, और क्या नहीं।
अब जब सोशल मीडिया पर फॉलोअर, लाईक्स, रीपोस्ट, और कमेंट जैसे कई पैमाने लोकप्रियता को तय करने लगे, तो उत्कृष्टता सौतेले बच्चे सरीखी हो गई। उसी घर में उसे ऐसे कोने पर रखा गया कि वह मेहमानों को न दिखे। आज पल-पल यह तय होता है कि किसी रिपोर्टर, स्तंभकार, या संपादक के लिखे हुए पर कितने दर्शक, श्रोता, या पाठक जुटे। यूट्यूब पर यह दिखने लगा कि किस उम्र के औरत या मर्द, देश और दुनिया के किन इलाकों से कितनी देर देख रहे हैं, उनकी उम्र क्या है, और कितने फीसदी लोग कितने सेकेंड के बाद देखना बंद कर देते हैं।
किसी देश में लोकतांत्रिक चुनावों में चुनी गईं सरकारें जिस तरह उत्कृष्टता की कोई गारंटी नहीं होतीं, ठीक उसी तरह आज के मीडिया पर किसी सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से उसकी उत्कृष्टता का कुछ भी लेना-देना नहीं रहता, इससे जरूर लेना-देना रहता है कि उसे कितने लोग देखने वाले हैं। अब किसी भी तरह के मीडिया संस्थान में महत्व का यही एक पैमाना रह गया है कि उसे कितने लोग देखेंगे, सुनेंगे, या पढ़ेंगे। नतीजा यह हुआ है कि आज के मीडिया में काम करने वाले लोग, चाहे वे वहां के कर्मचारी हों, या बाहर बैठे हुए लेखक हों, उनके ऊपर विश्लेषकों का लगातार यह दबाव रहता है कि उन्हें किस विषय पर लिखना है, क्या लिखना है, क्या बोलना है, और कितनी देर यह काम करना है।
हमारा अपना तजुर्बा यह है कि हम अपने अखबार के यूट्यूब चैनल पर अगर रूस और यूक्रेन के बारे में कुछ कहते हैं, या गाजा पर इजराइली ज्यादतियों के बारे में कुछ कहते हैं, तो उसे बड़ी सीमित संख्या में लोग देखते हैं। दूसरी तरफ हम किसी बहुत ही सतही राजनीतिक विवाद के बारे में कोई गंभीर टिप्पणी करते हैं, तो उसके सतही पहलू की वजह से उसे देखने वालों की कतार लग जाती है। अब अगर हमारी अर्थव्यवस्था यूट्यूब से मिलने वाली कमाई की मोहताज रहती, तो दुनिया के जरूरी मुद्दों पर कुछ कहना बड़ा मुश्किल हो जाता, और ओछी बातों को बोलने के बाद किसी और बात पर बोलने को समय ही नहीं रहता। गनीमत यही है कि हम अभी तक इस अंधी दौड़ में शामिल हुए बिना काम कर रहे हैं। अखबार की वेबसाइट पर भी अगर हमने अलग-अलग सामग्री को देखने वाले लोगों की गिनती देखना शुरू किया होता, तो कोई गंभीर और ईमानदार बात लिखना मुश्किल हो गया रहता।


