संपादकीय
पिछले हफ्ते भर से उत्तरप्रदेश का संभल एक बार फिर खबरों में बना हुआ है। वहां के एक मंझले पुलिस अफसर ईद की तैयारियों की शांति समिति की बैठक के वायरल हुए वीडियो में कहते सुनाई दे रहे हैं- बहुत सारे लोगों को खुजली मची हुई है कि ईरान और इजराइल-अमरीका का झगड़ा हो रहा है, अगर इतनी परेशानी है तो जहाज का टिकट कटवाओ, और ईरान चले जाओ। इस अफसर ने इसी बैठक में खुलकर कहा कि ईरान के लिए छाती पीटने वालों को ईरान चले जाना चाहिए। उसने यह भी कहा कि अगर सडक़ पर नमाज पढ़ी तो जेल भेज देंगे, इलाज करेंगे। जो लोग ईरान के समर्थन में या अमरीका-इजराइल के खिलाफ रील बना रहे हैं, उनके संदर्भ में इस अफसर ने बैठक में कहा-रील बनाई, तो रेल बना देंगे। इन हमलावर बयानों पर देश के बहुत से भले लोग लिख रहे हैं कि क्या अगर कोई हिन्दू अमरीका और इजराइल के लिए हवन और प्रार्थना करे, तो क्या पुलिस की यही जुबान होगी? देश के एक बड़े मुस्लिम नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा- यह मुल्क आपके बाप का नहीं है, पुलिस का काम हिफाजत देना है, धमकी देना नहीं है। कुल मिलाकर साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील चले आ रहा एक जिला, यूपी का संभल अब अपने एक खुले आक्रामक साम्प्रदायिक अफसर को और देख रहा है। इसके पहले भी यहां ऐसे दूसरे अफसर आ चुके हैं।
कल 15 मार्च को ही संयुक्त राष्ट्र में दुनिया भर के लिए इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की याद दिलाई है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि सरकारों को नफरत फैलाने वाले बयानों को रोकने, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, और भेदभाव के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेश ने कहा कि ऑनलाइन मंचों को हेट स्पीच और उत्पीडऩ समाप्त करने के लिए काम करना होगा जो किसी व्यक्ति के धर्म या उसकी आस्था के आधार पर उसे निशाना बनाते हैं। 15 मार्च के इस अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर एक और बड़ी चीज हुई।
यूपी के ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण फैसला दिया कि किसी निजी सम्पत्ति में बनी हुई मस्जिद, या किसी निजी जगह पर नमाज पढऩे पर, या धार्मिक सभा आयोजित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी जिले संभल के साथ-साथ एक और जिले बदायूं के अफसरों को कड़ी फटकार लगाई कि निजी सम्पत्ति के भीतर धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रशासन से किसी भी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, और अफसर निजी परिसरों में होने वाली नमाज या प्रार्थनाओं में दखल न दें। अदालत ने ऐसी प्रार्थना या उपासना को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार माना, और अफसरों को फटकार लगाई कि अगर उन्हें कानून व्यवस्था बिगडऩे का डर है, तो या तो वे उसे संभालने की जिम्मेदारी दिखाएं, या अपना तबादला करवा लें, या इस्तीफा दे दें। अदालत ने कहा कि कोई धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक सडक़ या सम्पत्ति पर होती है, तभी पुलिस की इजाजत जरूरी होगी। इन दो जिलों में प्रशासन ने लोगों की निजी सम्पत्ति पर भी नमाज पढऩे पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम निजी सम्पत्ति पर, या मस्जिद में नमाज पढ़ रहे लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे शांतिपूर्ण ऐसा कर सकें, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का जिम्मा उस पर है। अदालत ने हैरानी जाहिर की कि पुलिस सुरक्षा देने के बजाय नमाज पढऩे पर ही रोक लगा रही थी। अदालत ने कहा कि पुलिस सिर्फ इस आधार पर किसी धार्मिक आयोजन को निजी सम्पत्ति पर नहीं रोक सकती कि वहां भीड़ है, या वहां तनाव हो सकता है। संभल में एक मस्जिद में रमजान के दौरान प्रशासन ने यह प्रतिबंध लगाया था कि वहां कुल 20 लोग नमाज पढ़ेंगे। दो अलग-अलग बेंचों में आए हुए दो अलग-अलग जिलों के मामलों में जजों ने अफसरों को फटकार लगाई है, और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला भी दिया है कि निजी स्थान पर धार्मिक गतिविधियां पूर्ण रूप से संरक्षित हैं, और संभावित तनाव के नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। कानून के विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरप्रदेश का यह फैसला इस साम्प्रदायिक बना दिए गए प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए राहत की बात है जो निजी मस्जिदों या घरों में प्रार्थना करते हैं, और उस पर पुलिस और प्रशासन तरह-तरह की नाजायज कार्रवाई करते हैं। कानून के जानकार कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये दो फैसले मिसाल कायम करते हैं कि निजी सम्पत्ति पर धार्मिक आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है।
भारत को पिछले कुछ समय से दुनिया का डायबिटीज-कैपिटल भी कहा जा रहा है, और यह भी कहा जा रहा है कि यह दुनिया में कमउम्र बच्चों में डायबिटीज की सबसे बड़ी जगह बन गया है। आंकड़ों के साथ एक दिक्कत यह है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आंकड़े अलग-अलग देशों में ऐसे कुल मरीजों की संख्या बताते हैं। होना तो यह चाहिए कि उन देशों की आबादी के अनुपात में ऐसे डायबेटिक कितने हैं, वह समझ आना चाहिए। फिलहाल जिस तरह भी आंकड़े हैं उनके मुताबिक भारत में चाइल्डहुड ओबेसिटी (बचपन में मोटापा) चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। करीब डेढ़ करोड़ बच्चे और ढाई-पौने तीन करोड़ किशोर-किशोरियां बहुत अधिक वजन वाले हैं। ये आंकड़े बढ़ते ही चल रहे हैं। और इनका पहला असर इन लोगों के आगे चलकर डायबिटीज का शिकार होने की शक्ल में सामने आता है। हम बहुत अधिक मोटापे (ओबेसिटी) और डायबिटीज को जोडक़र दोनों के लिए जिम्मेदार बातों पर कुछ चर्चा जरूरी समझते हैं।
बच्चों के बीच बाजार में मिलने वाले फास्टफूड, तरह-तरह के कोल्डड्रिंक्स, आइसक्रीम, चॉकलेट, और मिठाइयों जैसी भयानक मीठी चीजें तेजी से फैल रही हैं। जो संपन्न तबका है, उसके पास इन चीजों को खरीदने के लिए हमेशा ही पैसे रहते हैं, और अब घर बैठे कुछ भी बुला लेने की सहूलियत ने लोगों को रबड़ी या कुल्फी भी घर बुलाकर खाने का आराम दे दिया है। जब बाहर निकलने की जहमत भी न उठानी पड़े, तो यह खानपान खतरनाक हद तक बढऩा ही है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और चीजें भी हो गई हैं। कोरोना-लॉकडाउन के दौर में जिस तरह बच्चों को ऑनलाइन काम करना पड़ा, उनका स्क्रीन के साथ वह रिश्ता चलते रह गया। आज हिन्दुस्तान में किसी भी आय वर्ग के बच्चे और बड़े हर दिन कई घंटे स्क्रीन पर उलझे रहते हैं। खाने में भारी घी-तेल-मक्खन, नमक और शक्कर, मैदा और दूसरी नुकसानदेह चीजें, और चलने-फिरने, खेलने-कूदने की जगह स्क्रीन की कैद! नतीजा यह हो रहा है कि शक्कर और कैलोरी, घी और दीगर चीजें भीतर जा रही हैं, और बदन इनमें से किसी को खर्च नहीं कर रहा है। खेल के मैदान घटते चले गए हैं, गली-मोहल्ले की सडक़ों पर खेलने वाले बच्चों को माँ-बाप सडक़ हादसे के डर से वहां खेलने नहीं देते, घूम-फिरकर सबके पास मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम, या कम्प्यूटर पर वक्त गुजारना रह गया है। आज किसी भी तरह की भीड़ के बीच अगर यह देखें कि औसत वजन से अधिक के कितने लोग हैं, तो भीड़ उन्हीं की दिखती है।
हम भारत में अतिमोटापे के आंकड़ों को देखें, तो दस लाख की आबादी पर 34 हजार अतिमोटे बच्चे हैं। जंकफूड के प्रचार की वजह से 70 फीसदी बच्चे हफ्ते में 3 से अधिक बार जंकफूड खाते हैं। लेकिन जब हमने यह ढूंढना शुरू किया कि क्या मोटापे का अनुपात देशों की संपन्नता के अनुपात में होता है? गरीब देशों या समाजों के बच्चे आखिर क्या खाकर मोटे होंगे, तो एआई से मिला विश्लेषण बतलाता है कि गरीबों के बीच भी परंपरा घरेलू खानपान से हटकर अब लोग बाजार के बने हुए तरह-तरह के जंकफूड की तरफ जाते हैं क्योंकि मजदूर और कामकाजी माँ-बाप के लिए बच्चों को आसानी से तुरंत कुछ खाना देना आसान हो जाता है। कई गरीब देशों में बच्चे बाजार में मिलने वाले अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड अधिक पा जाते हैं क्योंकि परिवार फल-सब्जियों को अधिक महंगा पाते हैं। जंकफूड से बदन में कैलोरी तो जमा होती रहती है, लेकिन शारीरिक विकास के लिए जरूरी पोषण आहार नहीं मिलता। इसे ‘डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रीशन’ कहा जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में गरीब परिवारों में एक ही वक्त कुपोषण भी है, और मोटापा बढ़ाने वाले ओवरन्यूट्रीशन भी हैं! यह बात कुछ विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन इस सच्चाई का विश्लेषण करने वाले कहते हैं कि भूख और मोटापा एक ही घर में रहते हैं!
हमने डायबिटीज के विशेषज्ञ कई डॉक्टरों से पूछा तो उनका कहना था कि खूब शारीरिक मजदूरी करने वाले गरीब भी इन दिनों डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं। भारत सरकार के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि शहरी गरीबों के बीच कुपोषण और अतिपोषण का यह दोहरा बोझ तेजी से बढ़ रहा है। गरीब ग्रामीण महिलाओं में भी मोटापा चौथे सर्वे से पांचवें सर्वे के बीच चार फीसदी से बढक़र चौदह फीसदी तक हो गया, और शहरी गरीब महिलाओं में तो यह 20-30 फीसदी तक पहुंच गया है। अब बच्चे अगर मोटे दिख रहे हैं, तो जरूरी नहीं है कि वे सेहतमंद हों, वे कुपोषण के शिकार भी हो सकते हैं। ये सारे आंकड़े, और यह निष्कर्ष अटपटे लग सकते हैं, लेकिन ये सब सरकारी सर्वे से मिले हुए नतीजे हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट में कल एक जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह कहते हुए खारिज किया कि महिलाओं को माहवारी की छुट्टी का अनिवार्य हक देने से उनके ही रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन रोजगार देने वालों को जब यह पता लगेगा कि उन्हें कानूनी शर्त के तहत महिलाओं को हर महीने 3-4 दिन छुट्टी देनी ही होगी, तो ऐसे मालिक या कंपनी महिलाओं को काम पर रखने से ही परहेज करेंगे। इसके पहले एक पिछले सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने भी 2024 में इसी तरह की बात कही थी कि ऐसी छुट्टी महिलाओं को रोजगार से बाहर करने की वजह बन सकती है। जो लोग अदालत में इस जनहित याचिका को लेकर गए थे उनका तर्क है कि महिलाओं की माहवारी उनकी एक शारीरिक स्थिति है जो उनकी पसंद से नहीं रहती। ऐसे में अधिकतर महिलाएं कई तरह की तकलीफ महसूस करती हैं, और कुछ को तो छुट्टी भी लेनी पड़ती है। इसलिए मानवीयता के आधार पर या महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए, उनकी गरिमा की रक्षा के लिए ऐसा कानून बनाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि माहवारी को लेकर समाज के बीच में जिस तरह की एक नकारात्मक सोच बनी हुई है, वह भी कानूनी छुट्टी मिलने से कुछ कमजोर होगी। याचिका में तो यह तक कहा गया कि बहुत सी महिलाएं तकलीफ के ऐसे दिनों में भी काम पर जाने के लिए मजबूर होने पर काम ही छोड़ देती हैं।
वर्तमान और एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के तर्क को भी समझने की जरूरत है जिनका कहना है कि छोटे कारोबारों में, या अनौपचारिक क्षेत्रों में कर्मचारियों पर खर्च एक बड़ा अनुपात रहता है, और अगर वहां पर महिला कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से माहवारी की छुट्टी देनी पड़ेगी, तो लोग उन्हें काम पर रखने पर ही कतराएंगे। आज भी भारत में बहुत से देशों के मुकाबले कामगारों में महिलाओं का अनुपात बड़ा नीचे है, प्रसूति अवकाश और महिलाओं के बच्चों की देखरेख के कानूनी अवकाश जहां-जहां लागू हैं, वहां-वहां नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने में कतराते भी हैं।
इन दोनों पक्षों को देखने के साथ-साथ महाराष्ट्र की एक पुरानी चली आ रही नौबत की चर्चा भी जरूरी है। वहां बीड जिले में गन्ने के खेतों में काम करने वाली महिलाओं को लगातार 12-18 घंटे तक काम पर लगाया जाता है। उन्हें कोई छुट्टी नहीं दी जाती, शौचालय तक जाने का समय नहीं दिया जाता। ठेकेदार इन खेतों में पति-पत्नी दोनों को रोजी पर एकसाथ रखते हैं, और अगर पत्नी ने माहवारी की छुट्टी ली, तो मजदूरी दोनों की काट ली जाती है। इससे बचने के लिए वहां पर बड़ी संख्या में महिलाएं गर्भाशय निकलवा देती हैं ताकि माहवारी ही बंद हो जाए, और गन्ने के खेतों से छुट्टी लेने की नौबत ही न आए। इस पर महाराष्ट्र सरकार ने औपचारिक जांच भी करवाई थी, और पता लगा कि गन्ना उत्पादक बीड जिले में गर्भाशय निकलवाने की राष्ट्रीय औसत दर 3 फीसदी से आगे बढक़र कई गांवों में 36 फीसदी तक है। कुछ महिलाओं ने 20-30 साल की उम्र में ही गर्भाशय निकलवा दिए ताकि खेतों की मजदूरी न कटे। खेत-मजदूरी के ठेकेदार इस सर्जरी के लिए मजदूरों को कर्ज देते हैं जो कि बाद में उनकी रोजी से काटते हैं।
महाराष्ट्र की यह विकराल समस्या अपने पूरे अमानवीय रूप के साथ पूरी दुनिया में कुख्यात है। लेकिन इससे परे भी पूरे देश में हाल यही है कि महिलाओं को काम पर रखने के पहले नियोक्ता यह अंदाज लगा लेते हैं कि माहवारी, गर्भ, प्रसूति, शिशु पालन के साथ-साथ हर किस्म के त्यौहारों का बोझ भी महिलाओं पर आता है, और परिवारों में कोई भी बीमार रहे, रिश्तेदारी में कोई भी मरे, अड़ोस-पड़ोस से लेकर जात-बिरादरी तक कोई भी शादी हो, उसका पहला बोझ महिलाओं पर ही पड़ता है। इसलिए लोग महिलाओं को काम देने के पहले यह सोच लेते हैं कि उनकी छुट्टियां पुरूष सहकर्मियों के मुकाबले अधिक रहेंगी। इसके साथ-साथ यह बात भी रहती है कि शिफ्ट वाले काम में महिलाओं को रात की शिफ्ट में रखना बहुत ही कम जगहों पर संभव हो पाता है। इन सब वजहों से लोग महिलाओं को अधिक काम देना नहीं चाहते हैं। नियोक्ता की अपनी मजबूरियां रहती हैं, उसे बाजार के मुकाबले में अपनी कंपनी या अपने कारोबार को चलाना रहता है, उसे प्रकृति के नियमों से अधिक लेना-देना नहीं रहता। फिर कुछ श्रम कानून तो काम की जगहों पर एक संख्या से अधिक महिलाओं के रहने पर उनके बच्चों के लिए भी कुछ तरह के इंतजाम की शर्त रखते हैं। इन सबकी वजह से महिलाओं की उत्पादकता को कम मान लिया जाता है। अब अगर कानून माहवारी की छुट्टी को अनिवार्य बना देगा, तो इसका मतलब महिला के काम के दिन दस फीसदी तक कम हो जाना होगा, 30 दिनों के महीने में 3-4 दिनों की छुट्टी, कोई भी मालिक पसंद नहीं करेंगे।
मुख्य न्यायाधीश की यह फिक्र देश के कुछ अलग-अलग राज्यों में पिछले कुछ समय से लागू कानून के साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। बिहार में 1992 से ही सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन का माहवारी अवकाश मिलता है। कर्नाटक में अभी पिछले साल से सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में महीने में एक दिन की ऐसी छुट्टी अनिवार्य कर दी गई है। ओडिशा में 2024 से हर महीने एक दिन की छुट्टी मिलती है। केरल में 2023 से उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं को छुट्टी मिलती है, और उनकी हाजिरी 75 फीसदी के बजाय, 73 फीसदी ही अनिवार्य है। कुछ बड़ी निजी कंपनियां भारत में भी महिला कर्मचारियों को ये सहूलियत देती हैं।
पूरे देश में कुल कामगारों को अगर देखें, तो कुछ राज्य सरकारों के, और कुछ बहुत बड़ी निजी कंपनियों के सीमित कर्मचारियों के लिए ही ऐसा हक लागू किया गया है। इसलिए अभी यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि अगर इसे पूरे देश में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के लिए अनिवार्य किया जाता है, तो मालिक या नियोक्ता की प्रतिक्रिया इस पर किस तरह की होगी। ऐसा न हो कि महिलाओं को हक देने के लिए कोई ऐसा कानून बना दिया जाए जो कि व्यावहारिक रूप से उनके ही पूरे तबके की रोजगार की संभावनाओं को घटा दे। सरकारी क्षेत्र में तो महिला आरक्षण लागू है, लेकिन निजी क्षेत्रों में तो कोई महिला आरक्षण भी नहीं है, और कम काम मिलने पर भी पूरी तनख्वाह देना बिजनेस मैनेजमेंट की समझ के खिलाफ भी जा सकता है। आज गिनी-चुनी कंपनियां ही ऐसी हैं जो कि महिला अधिकारों, या दूसरे मजदूर कानूनों की फिक्र और परवाह करती है, बाकी तो आज महिलाओं से परे के भी मजदूर कानूनों की कोई परवाह नहीं करतीं। ऐसे में बाजार की क्या प्रतिक्रिया ऐसे माहवारी-अधिकार पर होगी, उसे भी सोचना चाहिए, वरना हवन करते महिलाओं के ही हाथ जलेंगे।
ब्रिटिश संसद ने अभी एक फैसला लिया है जिसकी वजह से वहां सदियों से चली आ रही एक परंपरा खत्म होने जा रही है। वहां के लोकतंत्र में जो सामंती परंपराएं चली आ रही हैं, उनके खिलाफ नई सोच वाले लोग आलोचना करते आए हैं, और अब संसद में मतदान से यह तय किया है कि वहां के उच्च सदन (भारत की राज्यसभा जैसे) में राज परिवारों के लोग अपने शाही खिताबों की वजह से नहीं बैठ सकेंगे। एक विकसित, पश्चिमी, और आधुनिक लोकतंत्र किस तरह सदियों पुरानी सामंती परंपराओं का गुलाम बने रह सकता है, यह उसकी बहुत बड़ी मिसाल है। जिन शाही परिवारों के सेक्स-स्कैंडल न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया को हिलाते, और गुदगुदाते रहे हैं, वैसे ब्रिटिश शाही परिवारों के लोग हाऊस ऑफ लॉड्र्स में अपने खिताब की वजह से बैठते थे। एक दिलचस्प बात यह भी है कि वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड के वरिष्ठ पदाधिकारी भी बैठते हैं। शाही परिवारों के अलावा राजा अपने समर्थक सामंतों को भी जमीन या उपाधि दे देते थे, और यह उपाधि उनके परिवारों में किसी शाही विरासत की तरह चलती थी, और ऐसे कुनबों में पैदा होने की वजह से लोग ब्रिटिश संसद के उच्च सदन में बैठते थे! किसी पारिवारिक फर्म के मालिक की संतान जैसे दुकान की मालिक हो सकती है, कुछ उसी तरह का ब्रिटेन में वहां की उच्च सदन की सदस्यता का भी था। पहले ऐसे सैकड़ों सदस्य थे, लेकिन 1999 में इन्हें घटाकर 92 ऐसे वारिस-सदस्य रखे गए थे। चर्च ऑफ इंग्लैंड के 26 वरिष्ठ बिशप उच्च सदन के सदस्य रहते हैं, सदन की बहस में भाग लेते हैं, और कानूनों पर मतदान भी कर सकते हैं। कहने को ब्रिटेन एक धर्मनिरपेक्ष देश लगता है, लेकिन वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड को राजकीय चर्च माना जाता है।
भारत की संसदीय व्यवस्था का बुनियादी ढांचा ब्रिटेन से प्रेरित है, यहां ब्रिटिश हाऊस ऑफ कॉमंस की तरह लोकसभा बनाई गई, और हाऊस ऑफ लॉड्र्स की तरह राज्यसभा। दिलचस्प बात यह भी है कि भारत में इन दोनों सदनों की सीटों का रंग भी लंदन के संसदीय भवन के दोनों सदनों की सीटों की तरह रखा गया था। लेकिन जब भारतीय संसदीय व्यवस्था तय की गई तो संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश परंपराओं से ऊपर उठकर उससे बेहतर, और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई थी। इसे महज अधिक कहना बेइंसाफी होगी भारत में पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई। भारत में कोई वंशानुगत सांसद नहीं हैं, कोई धार्मिक प्रतिनिधि स्वत: इसके सदस्य नहीं हैं। इसके अलावा भारत में संसद से परे भी पुराने राजा-महाराजा, नवाब जैसे रहे हुए लोगों की राजकीय उपाधियों को कानून बनाकर खत्म कर दिया। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था राजपरिवार के बोझ को भी ढोती है। वहां एक ही शाही परिवार संविधान प्रमुख चले आ रहा है, और उसके भीतर विरासत की पीढिय़ां तय हो जाती हैं। जब तक पिछली रानी गुजर नहीं गई, तब तक उनका बूढ़ा हो चुका राजकुमार बेटा राजा नहीं बन पाया! दिलचस्प बात यह भी है कि ब्रिटिश शाही परिवार बहुत सारे देशों के आजाद हो जाने के बाद भी वहां का संविधान प्रमुख बना हुआ है। इसके पीछे ब्रिटेन की कोई ताकत नहीं है, लेकिन उन देशों की इससे उबरने की हसरत भी नहीं है। वो देश अपने आपमें पूरी तरह स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसे 15 देशों में ब्रिटिश सम्राट ही संवैधानिक प्रमुख हैं, उन्हीं की तस्वीर नोट, सिक्कों, और डाक टिकटों पर छपती हैं। इनमें बहुत से तो एक वक्त अंग्रेजों के गुलाम रहे हुए छोटे देश हैं, लेकिन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड जैसे कुछ बड़े देश भी ब्रिटिश राजा को अपना संवैधानिक प्रमुख मानते हैं। इसके साथ भारत के संविधान-प्रमुख, राष्ट्रपति के पद की तुलना करके देखें, तो यह पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यह किसी कुनबे की गुलाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्रपति को अपने सांसदों और विधायकों के वोटों से चुनते हैं, जो किसी भी धर्म, जाति के हो सकते हैं। भारत में अब तक बहुत से धर्मों के लोग, और महिलाएं भी राष्ट्रपति बन चुके हैं, और भारत की यह संवैधानिक व्यवस्था ब्रिटेन जैसे देश के सामने एक मिसाल है।
आज जब ईरान पर अमरीका और इजराइल की मिलिट्री के जमकर हमले चल रहे हैं, और इसके जवाब में ईरान अपने अड़ोस-पड़ोस के उन देशों पर हमले कर रहा है जहां अमरीकी फौजी अड्डे हैं, तो इन धमाकों के बीच पर्यावरण की सोचने की किसी को न जरूरत लग रही है, न मुमकिन ही है। पांच बरस से रूस और यूक्रेन के बीच जंग चल रही है, पिछले कुछ बरसों में इजराइल ने फिलीस्तीन के गाजा पर जितने फौजी हमले किए हैं, पड़ोस के लेबनान पर वहां बसे हुए हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला पर हमले अभी भी जारी हैं, उनसे कितना प्रदूषण हो रहा है, पर्यावरण कितना तबाह हो रहा है, और धरती पर जंग और हथियारों को चलाने के लिए, इनके कारखानों से धरती पर कार्बन कितना बढ़ा है, पर्यावरण कितना चौपट हुआ है, उसका कोई हिसाब नहीं है। अभी तो ईरान के मोर्चे पर जंग बढ़ते ही दिख रही है, इसलिए उसके कम होने की अटकलें बेबुनियाद हैं। फिर कुछ छोटी-मोटी जंग और चलती रहती है, जो कि लड़ाई के दर्जे में गिनी जाती है। हाल के महीनों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने एक-दूसरे पर कुछ फौजी-हथियारबंद हमले किए हैं।
आज जब दुनिया वैसे जलवायु-संकट में है, जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में मौसम इस रफ्तार से बदल रहा है, और उसकी चरम मार धरती पर इतना बुरा असर डाल रही है कि लोगों ने ऐसी तबाही पहले देखी नहीं थी। फिर यह भी है कि यह तबाही बढ़ती ही चल रही है। अभी जंग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ का एक इंटरव्यू आ रहा था जिसमें वे बता रहे थे कि किस तरह दुनिया की फौजों को खड़ा करने के लिए बहुत सारे हथियारों और दूसरे सामानों का निर्माण होता है, बड़े-बड़े ढांचे बनते हैं, बड़े-बड़े जहाज बनते हैं, कुछ खास किस्म के हवाई जहाज और पनडुब्बी बनाने के लिए कुछ खास किस्म की धातु और दूसरी सामग्री इस्तेमाल होती है जिसे बनाने के लिए बहुत सारी ऊर्जा लगती है, और बहुत सारा प्रदूषण होता है। फिर इन फौजों के नियमित अभ्यास में भी गोला-बारूद से लेकर बाकी सामानों का उसी तरह इस्तेमाल होता है जिस तरह कि किसी असल जंग में। बड़े-बड़े जहाजी बेड़ों के साथ उनकी हिफाजत करते हुए दूसरे जहाजों का दस्ता चलता है, और इन सबमें खूब ईंधन लगता है। जंग में जब कोई जहाज डुबाया जाता है, जैसा कि अभी भारत के बगल में ही ईरान का एक फौजी जहाज अमरीकी पनडुब्बी ने समंदर में डुबा दिया, तो उससे भी हर तरह का प्रदूषण समंदर में चले गया, सौ से अधिक जिंदगियां भी गईं, लेकिन वह एक अलग मामला है।
एक अंदाज यह है कि दुनिया की फौजें मिलकर दुनिया भर में पैदा होने वाली ग्रीन हाऊस गैस का करीब साढ़े पांच फीसदी पैदा करती हैं। और यह मात्रा नागरिक विमानों, और मालवाहक जहाजों से होने वाली ग्रीन हाऊस गैसों से अधिक है। एक जानकार विशेषज्ञ बता रहे थे कि अपनी फौज की गोपनीयता बनाए रखने के लिए दुनिया की कोई भी फौज न तो अपने सामानों की पूरी जानकारी देती, न अपने अभ्यास की। इन सबसे उन्हें अपने पर खतरा दिखता है, इसलिए कोई भी देश अपनी फौजी हलचल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को अपने आंकड़ों में शामिल नहीं करते। जंग में किसी तरह की प्रदूषणमुक्त ऊर्जा इस्तेमाल नहीं होती। विमानों से लेकर जहाजों तक तरह-तरह के पेट्रोल और डीजल ही इस्तेमाल होते हैं, और वे नागरिक विमानों, और जहाजों के मुकाबले बहुत अधिक ईंधन खपाते हैं। इसलिए किसी भी युद्ध में, या फौजी हमले में दुनिया पर कार्बन का खूब सारा बोझ बढ़ जाता है।
अमरीका के न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की एक रिसर्च-रिपोर्ट कहती है कि जो लोग नकारात्मक लोगों के साथ अधिक रहते हैं, या अधिक नकारात्मक लोगों के साथ रहते हैं, वे जल्दी उम्रदराज होने लगते हैं। शोधकर्ताओं ने 23 सौ से अधिक लोगों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के साथ-साथ उनकी लार के नमूनों को डीएनए विश्लेषण भी किया, और इन सबसे यह समझ आया कि तकरीबन हर किसी की जिंदगी में परेशान करने वाले लोग रहते हैं, और ऐसे एक नकारात्मक व्यक्ति की मौजूदगी से उम्र बढऩे की रफ्तार करीब डेढ़ फीसदी बढ़ जाती है। मतलब यह कि पूरी जिंदगी अगर एक नकारात्मक व्यक्ति आसपास है, तो लोगों की जिंदगी 9 महीने तक घट सकती है। अब इसे हम दिल्ली के प्रदूषण से जोडक़र देखना नहीं चाहते जहां वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां की प्रदूषित हवा में जीने वाले लोगों की उम्र कई बरस घट जा रही है, शायद 9 बरस तक। अब नकारात्मकता का यह एक नए किस्म का प्रदूषण सामने आया है।
हम पहले से नकारात्मकता के नुकसानों को समझते आ रहे थे, और इस बारे में बीच-बीच में कभी लिखते भी थे। नकारात्मकता सिर्फ निजी जिंदगी में नहीं, अगर देश-प्रदेश की हवा में है, शहर या मुहल्ले में लगातार कोई तनाव बने रहता है, नफरत की कोई वजह रहती है, तो उसका भी असर लोगों के जल्द बूढ़े होने की शक्ल में सामने आता है। आज की खबर में जिस वैज्ञानिक निष्कर्ष का जिक्र है, उसके बिना भी हमारी बुनियादी समझ का निष्कर्ष यही था, और हम किसी भी जगह नकारात्मकता, नफरत, हिंसा की हवा के खिलाफ लिखते आए हैं। हमारा तो यह भी मानना है कि लगातार इनके बीच जीने वाले लोगों के तन-मन का असर उनकी अगली पीढिय़ों तक भी जाता होगा, और हो सकता है कि एआई की मेहरबानी से अगले कुछ बरसों में ऐसे शोध-निष्कर्ष सामने आ भी जाएं कि नकारात्मकता की हवा लोगों के डीएनए में किस तरह का बदलाव लाती है जो कि अगली पीढिय़ों तक जाता है।
फिलहाल हम आज की बात करें, तो कुछ समझदार लोग पहले से इसका ख्याल रखते हैं कि उनके आसपास के लोग बहुत नकारात्मक सोच के न हों। फिर कई ऐसे लोग रहते हैं जो खुद तो बहुत नकारात्मक नहीं रहते, लेकिन जिन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों की जिंदगी की तकलीफों की कहानी का बखान बड़ा सुहाता है, और वे दूसरों की दिलचस्पी या जरूरत के बिना भी उन पर अपनी देखी या सुनी गई दुखदाई कहानियों को दुहराते रहते हैं। अगर दूसरों की जिंदगी के ऐसे दुख में आपके करने का कुछ नहीं है, आप उनकी कोई मदद नहीं कर सकते, तो उसे सुन-सुनकर उसमें डूब जाने का कोई मतलब नहीं रहता। हर किसी की अपनी जिंदगी की नकारात्मकता काफी रहती है, दूसरों से बिना मतलब उसे न सुनना चाहिए, न देखना चाहिए। जहां आपके सामाजिक सरोकार आपको मदद करना सुझाते हैं, वहीं पर आप शामिल हों, वरना अपने आसपास के किस्सेबाजों से कह दें कि आप इस तरह की बातों को सुनना नहीं चाहते।
यह बात सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन की नहीं रह गई है, अब तरह-तरह की चिकित्सा शास्त्रीय रिसर्च भी यही सुझाती है कि लगातार नकारात्मक रिश्तों की वजह से, वैसी बातों, या वैसे माहौल की वजह से लोगों में अलग किस्म के हार्मोन पैदा होते हैं, बदन में सूजन बढ़ सकती है, प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, दिल की बीमारी, डायबिटीज, और मानसिक रोगों का खतरा बढ़ सकता है। रिसर्च बताती है कि तनावपूर्ण रिश्तों, और कहानियों से शरीर की कोशिकाओं में डीएनए के स्तर पर बदलाव होने लगता है जिससे जैविक उम्र तेजी से बढ़ सकती है। कुछ और शोध नतीजे बताते हैं कि लगातार नकारात्मक सामाजिक अनुभवों से अवसाद (डिप्रेशन) और स्मृति का नुकसान भी हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि लोगों का अपने जीवनसाथी के साथ होने वाला तनाव कम नुकसानदेह रहता है, बजाय दूसरे लोगों से मिले हुए तनाव के। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों की असल जिंदगी में कुछ और किस्म के तनाव जुड़ गए हैं, इनसे भी छुटकारा पाने की जरूरत है।
अभी छत्तीसगढ़ में परिवार के भीतर एक भयानक हत्या हुई। एक व्यक्ति को जब पहली पत्नी से बच्चे नहीं हुए, तो दूसरी शादी की, उससे भी बच्चे नहीं हुए, तो एक बीवी पर जादू-टोना करने का शक हुआ। ऐसे में पति, सौत, और परिवार के दूसरे लोगों ने मिलकर एक पत्नी को इतनी बुरी तरह मारा कि उसका ब्यौरा यहां देना लोगों का दिल दहला देगा। पोस्टमार्टम में पता लगा कि मरने वाली के बदन में लकड़ी ठूंसकर उसे मार डाला गया। परिवार के भीतर इस तरह की हिंसा के बहुत सारे मामले सामने आ रहे हैं। फिर परिवारों से परे भी ऐसे कत्ल हो रहे हैं। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता है जब किसी न किसी हत्या या बलात्कार के मामले में लोगों की गिरफ्तारी की खबर न आती हो। पुलिस अपने सोशल मीडिया पेज पर भी फोटो सहित ऐसी जानकारी डालती है, और प्रेस-टीवी से भी तकरीबन रोज लोगों तक पहुंचती है। इन दिनों दूसरे किस्म के समाचार-माध्यम भी बढ़ चले हैं, और लोगों को वॉट्सऐप पर घंटे भर के भीतर ही जुर्म, और गिरफ्तारी जैसी खबरें मिलती रहती हैं। अदालती खबरों से यह भी पता लगता है कि हत्या और बलात्कार जैसे मामलों में सात साल, दस-बीस बरस, या उम्रकैद सुनाई जाती है। इसके बावजूद लोगों के मन में जेल और कैद का खौफ नहीं दिखता!
कोई पेशेवर मुजरिम रहे, उनका जुर्म करना तो समझ आता है, लेकिन जो लोग जुर्म की कमाई पर जिंदा नहीं हैं, भाड़े के हत्यारे नहीं हैं, वे जब ऐसे बड़े जुर्म करते हैं, तो उन्हें तो अपने काम का अंत अच्छी तरह मालूम रहता है। इसके बावजूद लोग ऐसे संगीन जुर्म से कतराते नहीं हैं। यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, न सिर्फ खबरों में, बल्कि संगीन जुर्म के आंकड़ों में भी। और अब तो कत्ल और बलात्कार जैसे मामलों में नाबालिगों की हिस्सेदारी भी बढ़ती चल रही है। हर दिन कोई न कोई ऐसी खबर रहती है, जिसमें पकड़ाए गए लोगों में से कुछ के नाम और चेहरे कानूनी जरूरत के मुताबिक छुपाने पड़ते हैं, क्योंकि वे नाबालिग रहते हैं।
अब हम अलग-अलग वजहों पर जाने के बजाय यह सोचते हैं कि ये कैसे लोग हैं जिनके लिए अगले दस-बीस बरस खुली हवा में जीने, और जेल में कैद रहने में कोई फर्क नहीं है? ऐसा नहीं है कि इन लोगों को गिरफ्तारी और कैद का खतरा समझ न आता हो, क्योंकि कोई बड़ी मुजरिम अब गिरफ्तारी से बचते नहीं हैं, वे दिन हवा हो चुके हैं। तो क्या इन लोगों को अपनी जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? यह सवाल कुछ परेशान करता है, इसलिए भी कि अगर लोगों में अपने भविष्य को लेकर कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, और वे इस हद तक लापरवाह हो गए हैं, तो फिर वे किसी और तरह का भी जुर्म कर सकते हैं, अभी जितना भयानक जुर्म किया है, उससे भी भयानक। क्या इन लोगों की जिंदगी में परिवार और समाज के साथ सुख से जीने की संभावनाएं नहीं रह गई हैं, क्या इनके पास कोई महत्वाकांक्षाएं नहीं रह गई हैं, ऐसी बातों पर गंभीरता से सोचना चाहिए। लोग जुर्म से परे के कई पहलुओं पर बात करते हुए भी यह कहते हैं कि जिसे कमाई की परवाह न हो, उसे कारोबार नहीं करना चाहिए, जिसे राज-पाट जारी रखने की परवाह न हो, उसे राजा नहीं बनना चाहिए, और जिन लोगों के लिए उनकी तनख्वाह मायने नहीं रखती हो, उन्हें नौकरी नहीं करनी चाहिए। जब लोग बिना जरूरत के कोई काम करते हैं, तो वे एक खतरा खड़ा कर सकते हैं। हर किसी को अपने मिजाज का ही काम करना चाहिए। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के आम लोगों का बेहतर जिंदगी जीने का मिजाज न रह गया हो, तो वे खतरनाक हो सकते हैं। जिन्हें आगे कोई संभावनाएं न दिखती हों, जिन्हें साख की परवाह न हो, जिन्हें एक आजाद दुनिया की खुली हवा में सांस लेने, और बरसों कैद रहने में कोई बड़ा फर्क न दिखता हो, वे ही लोग आपा खोकर, या सोच-समझकर, या शान दिखाने के लिए कत्ल कर सकते हैं, या बरसों की कैद का खतरा उठाकर बलात्कार कर सकते हैं।
घूम-फिरकर बात अमरीका पर ही आ टिकती है कि आज वह खुद अपनी फौजों की ताकत से, और अपने मवाली-साथी इजराइल के साथ मिलकर दुनिया पर किस तरह का कहर ढा रहा है। अभी सालभर ही हुआ है कि डॉनल्ड ट्रंप ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया, और ऐसी मनमानी चालू की कि अमरीकी संसद से लेकर अमरीकी सुप्रीम कोर्ट तक, सब हिल गए। संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह खारिज करते हुए ट्रंप ने एक कोई अपना घरेलू शांति का बोर्ड बना लिया है, जिसमें भुगतान करके लोग स्थायी सदस्य बन सकते हैं। भारत के लिए अब तक इज्जत बचने की एक बात यह है कि ट्रंप के बांह मरोडऩे के बावजूद भारत इसमें शामिल नहीं हुआ है। लेकिन ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप जिस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, वह अभी दस दिन पहले तक की उसकी खुद की गुंडागर्दी को बहुत पीछे छोड़ चुका है। आज या तो उसकी शह पर, या अपनी किसी मनमर्जी से इजराइल सरकार अपनी वेबसाइट पर यह घोषणा कर रही है कि ईरान जिसे भी अपना अगला सुप्रीम लीडर बनाएगा, इजराइल उसका कत्ल कर देगा! दुनिया के इतिहास में किसी देश ने लोकतांत्रिक होने का ढकोसला करते हुए इस तरह की बातें नहीं की थीं, जैसी ट्रंप और इजराइल आज कर रहे हैं। यह ट्रंप खुद अपनी संसद को यह नहीं समझा पाया कि ईरान पर हमला क्यों जरूरी था, उसका क्या न्यायोचित कारण है। लेकिन पहली बार दुनिया को यह समझ में आ रहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति को वहां के संविधान में मिले हुए अघोषित, असीमित, और धुंध से घिरे हुए अधिकारों के चलते उसके तानाशाह बन जाने का इतना बड़ा खतरा है। ट्रंप अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा तानाशाह-राष्ट्रपति साबित हो चुका है, और अभी उसका कार्यकाल एक तिहाई भी नहीं गुजरा है।
हम आज सिर्फ अमरीका, इजराइल, और ईरान को लेकर बात नहीं कर रहे हैं, हम इस जंग से प्रभावित दूसरे देशों को लेकर भी बात करना चाहते हैं। आज दुनिया इस बात पर भी हैरान है कि रूस और चीन, ईरान के जो दो सबसे ताकतवर दोस्त दिखते आ रहे थे, वे अचानक चुप बैठ गए हैं। अमरीका और इजराइल के, इतिहास के सबसे नाजायज हमलों पर भी वे ईरान के साथ नहीं खड़े हैं, बल्कि कोई कड़े बयान तक इन दो महाशक्तियों से नहीं आए हैं। चीन के बारे में आज सुबह एक अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक कह रहे थे कि अगले महीने ट्रंप चीन जा रहा है, और चीन ऐसे नाजुक मौके पर ईरान के बारे में कोई कड़ी या कड़वी बात कहकर ट्रंप का मूड खराब करना नहीं चाहता है। दुनिया का सबसे बड़ा मवाली जाने किस बात से भडक़ जाए, या गब्बर किस बात पर आपा खोकर गोलियां चलाने लगे, यह किसे पता है।
ऐसे माहौल में भारत के भीतर सरकार की खासी आलोचना हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल से लेकर आज तक कभी उनकी इतनी आलोचना नहीं हुई थी जितनी ट्रंप के सामने उनकी चुप्पी को लेकर हो रही है। मोदी एक नेता के रूप में ही नहीं, भारत एक देश के रूप में भी ट्रंप के बकवासी बयानों पर असाधारण चुप्पी साधे हुए है। कई लोगों का ऐसा मानना है कि यह भारत के राष्ट्रीय सम्मान के खिलाफ है, लोग 1971 की इंदिरा गांधी को याद करते हैं जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाते हुए अमरीका की किसी धमकी को नहीं सुना था। दो मिसालों को जोडऩे से एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि उन दोनों के बीच की समानताएं गिनाने के पहले उनके बीच की असमानताएं उभरकर सामने आ जाती हैं। 1971 की दुनिया अलग किस्म की थी, उस वक्त अमरीका के ईर्द-गिर्द दुनिया एकध्रुवीय नहीं घूम रही थी, उस वक्त रूस रूस नहीं था, वह सोवियत संघ था, और उसकी बड़ी ताकत थी, दुनिया में गुट-निरपेक्ष आंदोलन बहुत मजबूत था, और भारत नेहरू की वैश्विक लीडरशिप की रौशनी में बना हुआ था, उनके बाद इंदिरा गांधी उसी लीडरशिप की विरासत को आगे बढ़ा रही थीं। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बहुत रफ्तार से अमरीका ने एकध्रुवीय साम्राज्य कायम कर लिया, और अब तो उसके बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका है, और अमरीका के सामने दुनिया में कुछ नहीं बचा है। ऐसे में जब अमरीका का राष्ट्रपति अपने नाटो के साथी देशों से भी हिकारत दिखाते हुए, उन्हें धमकियां देते हुए, कहीं ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मुनादी करते हुए गुंडागर्दी कर रहा है, तो भारत उसके सामने सीना तानकर खड़ा हो, यह एक देश के रूप में तो अच्छी बात होगी, लेकिन यह अमरीका में बसे हुए लाखों कामकाजियों के लिए भी अच्छी बात होगी या नहीं, अमरीका से आयात-निर्यात पर जिंदा लाखों भारतीय कारोबारियों के लिए अच्छी बात होगी या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। इंदिरा गांधी के वक्त दुनिया के देशों के रिश्तों में कारोबार का इतना दखल नहीं रहता था, जितना कि हाल के बरसों में हुआ है। इंदिरा के वक्त आर्थिक उदारीकरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन बाद के बरसों में राजीव गांधी, नरसिंह राव, और फिर मनमोहन सिंह के कार्यकालों ने भारत की आर्थिक फिलॉसफी को बदलकर रख दिया था। आज भारत के लोग भी देश के भीतर उस पुरानी अर्थव्यवस्था में वापिसी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए न सिर्फ भारत, बल्कि रूस और चीन जैसी सरकारों को, और योरप के तमाम नाटो-सदस्य देशों को भी ट्रंप को बर्दाश्त करना पड़ रहा है। हम इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोडक़र तो देखते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक बिफरे हुए गैंगस्टर की बंदूकों के सामने खड़े होते हुए बरती जा रही सावधानी से भी जोडक़र देखते हैं। आज दुनिया में अमरीका का सबसे बड़ा मुकाबला जिस चीन से है, वह चीन भी ईरान के बारे में कुछ बोलने के पहले सौ बार सोच रहा है, और याद रख रहा है कि अगले ही महीने यह गैंगस्टर चीन पहुंचने वाला है।
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर चारों तरफ जलसे चल रहे हैं। इन दो दिनों में इतने अधिक कार्यक्रम हमारे इर्द-गिर्द हो रहे हैं कि वे किसी बिना सोची-समझी साजिश जैसे अधिक लग रहे हैं कि महिलाओं को निरर्थक समारोहों में इतना व्यस्त कर दिया जाए, कि वे काम का कोई काम न कर सकें। इसमें नई बात कुछ नहीं होगी क्योंकि बनने-संवरने के पैमाने, गहने और कपड़ों की फैशन, मेहंदी से लेकर दूसरी साज-सज्जा तक, अनगिनत ऐसे तरीके अनंतकाल से चले आ रहे हैं, जिनमें महिलाओं को व्यस्त रखा जाता है। ऐसा शायद इसलिए भी किया जाता रहा होगा कि अगर वे काम करने लगेंगी, तो मर्दों के दबदबे के एकाधिकार का टूटना तय हो जाएगा। आज मुल्लाओं की मनमानी वाले ईरान में भी उच्च शिक्षा, और सरकारी कामकाज, दूसरे ओहदों तक पहुंचने में महिलाओं ने गजब का कमाल किया हुआ है। जब दबी-कुचली महिलाएं भी पढऩे का मौका मिलने पर इतना कुछ कर सकती हैं, तो जाहिर है कि पड़ोस के जाहिल तालिबान दहशत में रहते होंगे कि लडक़ी पढ़ेगी, तो मुसीबत बनेगी। अभी महिला दिवस पर एक-एक सरकारी और गैरसरकारी संगठन महिलाओं के सम्मान, और उनकी भागीदारी के जितने कार्यक्रम कर रहे हैं, उनका एक प्रतीकात्मक आडंबर से परे महिलाओं की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है। इस सिलसिले से महिलाएं कैसे बचेंगी, और कैसे उबरेंगी, यह पता नहीं है। एक किसी पुराने गाने की तर्ज पर ऐसा लगता है कि मर्दों की दुनिया चाहती यही है कि औरतों की, उम्र जलसों में गुजर हो...
आज दुनिया के सबसे खूंखार तालिबानियों से लेकर सबसे संपन्न और विकसित अमरीका तक को देखें, जो कि अपने आपको लोकतंत्र का मुखिया कहता है, और दादा बनकर चलता है, तो वहां भी लड़कियों और महिलाओं की हालत भयानक दिखती है। एपस्टीन फाइलों को देखें, तो न सिर्फ अमरीका बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया से लेकर खाड़ी के शेखों तक, और हिन्दुस्तान के ताकतवर लोगों तक की जैसी यारी नाबालिग लड़कियों के भड़वे-दलाल एपस्टीन से रही है, उससे समझ पड़ता है कि लड़कियों और महिलाओं के बारे में मर्दों का क्या कहना है। आज जो ट्रम्प पूरी दुनिया का बेताज माफिया सरगना बना हुआ है, उस ट्रम्प ने लाख कोशिश की कि उसके सेक्स-हमलों की फाइलें दबी रह जाएं, लेकिन अमरीकी संसद की साफ-साफ चेतावनी के बाद अब सरकार को बहुत मजबूरी में रोते-झींकते इनमें से कुछ फाइलों को जारी करना पड़ा है। जिस देश का राष्ट्रपति नाबालिग लड़कियों से लेकर दूसरी महिलाओं तक पर सेक्स-हमले करने के लिए जाना जाता हो, अदालत में गुनहगार साबित हो चुका हो, उसके राज में लड़कियों और महिलाओं की हालत की कल्पना की जा सकती है। जब यह एपस्टीन निजी जेट विमानों में नाबालिग लड़कियों को लादकर ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रीव के लिए अमरीका से वहां पहुंचता था, तो ब्रिटिश एयरफोर्स के हवाईअड्डों पर उसके विमान का स्वागत होता था। जब दुनिया की इतनी बड़ी ताकतें नाबालिगों से बलात्कार में जुटी हुई हों, तो फिर किसी लडक़ी की देह बच कैसे सकती है? आज जब दुनिया में विश्व महिला दिवस मनाया जा रहा है, तो एक बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या महिला का एक ही दिन होना चाहिए, और साल के बाकी दिन क्या उसके नहीं होने चाहिए?
शायद हिन्दी के विख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि दिवस हमेशा कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, शिक्षक दिवस, मजदूर दिवस वगैरह। उनका कहना था कि कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता। अब यह उनके नाम के साथ प्रचलित बात है, जिससे सहमत होते हुए हम और भी याद करते हैं कि भारत में सरकारी स्तर पर हिन्दी दिवस भी मनाया जाता है जो कि राष्ट्रभाषा कही जाती है, लेकिन राजभाषा भी नहीं है। इसी तरह महिलाओं के नाम पर साल में एक दिन मनाकर एक-एक जत्थे में सौ-सौ महिलाओं का सम्मान-अभिनंदन करके, उन्हें नाच-गाने, और रैलियों में व्यस्त रखकर, उन्हें छोटे-मोटे तोहफे देकर महज यही साबित किया जाता है कि उनके अस्तित्व को मान लिया गया है, उन्हें इससे ऊपर कुछ करने की जरूरत नहीं है। फिर आम हिन्दुस्तानी भीड़ में किसी को यह सुझाना तो निहायत ही फिजूल की बात होगी कि कोई उनका सम्मान कर रहे हैं, तो क्या उन्हें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि सम्मान करने वाले लोगों का इरादा और मकसद क्या है? क्या उनका संगठन इसी काम के लिए बना है? क्या उनका कोई निष्पक्ष और निर्विवाद निर्णायक मंडल भी था जिसने ये सम्मान तय किए हों? और सम्मान लेने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि उनके कौन से काम सम्मान के लायक माने गए हैं? लेकिन भारत में न पुरूष, न महिला, किसी को भी सम्मान से परहेज नहीं रहता, और तकरीबन हर कोई इसे लेने पर उसी तरह आमादा रहते हैं, जिस तरह कई त्यौहारों पर सडक़ किनारे लगने वाले भंडारों में मुफ्त का खाते हुए लोगों को यह भी नहीं लगता कि क्या वे मुफ्त के खाने के हकदार हैं या नहीं? इसी तरह सम्मान की कतार में महिलाओं को लगाकर राजनीतिक दल, सरकारें, राजभवन, अलग-अलग संगठन सब महिलाओं के प्रति सम्मान की अपनी तथाकथित भावना को दिखा देते हैं, और अगले दिन से महिलाओं के हितों को अनदेखा करना शुरू कर देते हैं। महिला दिवस न सिर्फ भारत में, बल्कि दुनिया के अधिकतर हिस्सों में एक सालाना प्रायश्चित की तरह होता है, जो कि चर्च के कन्फेशन-चैम्बर की तरह का रहता है। साल भर मर्द, खासकर ताकतवर और ओहदेदार मर्द जिस अंदाज में बड़ी-बड़ी अदालतों के जज बने हुए, या अमरीका का राष्ट्रपति बने हुए यह साबित करते हैं कि कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे, उसे उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है, साल भर की ऐसी सोच का सालाना प्रायश्चित एक-एक टिफिन देकर, या एक-एक प्लेट नाश्ता देकर बहुत सारे लोग कर लेते हैं।
एक अंतरराष्ट्रीय चॉकलेट कंपनी के इश्तहार का स्लोगन है- कुछ मीठा हो जाए। आज कुछ उसी तरह हम ट्रम्प और अमरीका से परे कुछ लिख रहे हैं, ताकि हमारे पाठकों और हमारे यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल के दर्शकों को थोड़ी सी ताजी हवा भी मिल सके। दुनिया में ट्रम्प से परे भी कुछ चल रहा है, ऐसा बहुत से लोगों को नहीं लगेगा, लेकिन भारत से लगे हुए नेपाल में एक नया इतिहास रचा जा रहा है। वहां पिछले बरस हुई नौजवान-क्रांति में हुए तकरीबन अहिंसक सत्तापलट के बाद के इस चुनाव में राजधानी काठमांडू के मेयर बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) की पार्टी, आरएसपी प्रचंड बहुमत पाते दिख रही है। वहां की पुरानी पार्टियां, नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, माओवादी सेंटर, इन सबका भट्ठा बैठ रहा है। इन नतीजों को इस हिसाब से भी देखने की जरूरत है कि सितंबर 2025 में बहुचर्चित जेन-जेड, यानी नौजवानों की पीढ़ी ने जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किए थे, उनके उठाए गए भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और वंशवाद के मुद्दों ने असर दिखाया है, और परंपरागत पार्टियां सब निपट गई हैं।
35 बरस के बालेन्द्र शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी इस मायने में भी थोड़ी अटपटी है कि अभी शाह ठीक से अधेड़ भी नहीं हो पाए हैं, वे अगर हिन्दुस्तान की राजनीति में होते, तो अभी युवा मोर्चा या युवक कांग्रेस में ही रहते, लेकिन नेपाल में वे अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। वे अपने निजी चुुनाव में पिछले प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली को हराते हुए दिख रहे हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले बरस का नेपाल का जनप्रदर्शन इस मुद्दे पर शुरू हुआ था कि वहां के सत्तारूढ़ नेताओं की बिगड़ैल औलादों ने अपने सोशल मीडिया पेज पर अपनी अतिसंपन्नता का हिंसक और अश्लील प्रदर्शन किया था, और महंगाई, बेरोजगारी से जूझते हुए नौजवान उसे बर्दाश्त नहीं कर पाए थे। नेताओं की औलादें बाप के दम पर अंधाधुंध दौलत बना रही थीं, और यही बात सत्ता के जाने की वजह बनी। जनआंदोलन खुलकर ऐसे लोगों के खिलाफ था, लोग सोशल मीडिया पर इन बिगड़ैल औलादों, और वंशवाद के खिलाफ पोस्टर और गाने बनाकर डाल रहे थे, इस पर सरकार ने सोशल मीडिया पर ही प्रतिबंध लगा दिया था, और इसके खिलाफ जो प्रदर्शन हुए, उसमें आंदोलनकारियों की मौतें भी हुई थीं, और नेताओं की कई संपत्तियों को आग के हवाले भी कर दिया गया था।
अब नेपाल का यह ताजा चुनाव भारत की सरहद से लगे हुए समाज के बारे में बता रहा है कि वहां आज किस तरह वंशवाद और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एक बिल्कुल ही नौजवान की पार्टी को ऐतिहासिक तरह से जिता दिया है, जो कि राजनीति से परे एक लोकप्रिय रैपर सिंगर भी रहा है। आज नेपाल के चुनावी नतीजों के बारे में रूख साफ दिख रहा है कि 165 सीटों के चुनाव में बालेन्द्र शाह की पार्टी को प्रत्यक्ष, और परोक्ष, दोनों तरह से मिलाकर डेढ़ सौ से अधिक सीटें मिलने का आसार है। इसके बारे में वहां के लोग लिख रहे हैं- बालेन शाह का उदय पुरानी राजनीति का अंत है, जेन-जेड ने वोट से क्रांति की। कुल मिलाकर यह है कि नेपाल के राजनीतिक परिवारों में वंशवादी विरासत का जमकर विरोध हुआ है, जहां पर आल-औलाद, या करीबी रिश्तेदारों को ही आगे बढ़ाने का लंबा चलन चले आ रहा है। इस बार के चुनाव में, और इसके भी पहले पिछले साल के प्रदर्शन में, वंशवाद खत्म करने के जननारे लगाए गए, और वही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा।
एक बड़ी दिलचस्प बात आज दिखती है कि भारत में जिस बिहार राज्य से नेपाल की सरहद सबसे अधिक मिलती है, उस बिहार में आज दस बार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हटाए जाने के बाद उनके बेटे को उनका राजनीतिक वारिस बनाया जा रहा है। यह भारत की समाजवादी पार्टियों की एक बहुत बड़ी विसंगति और त्रासदी है, कि वे बात तो समाजवाद की करते हैं, लेकिन मुलायम, लालू, नीतीश, इन सबके पास विरासत के लिए अपनी औलादों के अलावा और कोई नहीं है। पता नहीं अपने बेटे की ताजपोशी, और जैसी कि चर्चा है उसे उपमुख्यमंत्री बनाने के बाद, नीतीश नाम का समाजवादी नेता आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएगा। नेपाल और बिहार के बीच छह-सात सौ किलोमीटर की साझा सरहद है, और नेपाली हवा के थपेड़े नीतीश को अपने मुंह पर किस तरह पड़ रहे होंगे, यह भी सोचने की बात है। 35 साल का नौजवान एक ऐतिहासिक बहुमत से नेपाल का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है, और उसका नारा ही है कि उसकी लड़ाई वंशवाद के खिलाफ है। पार्टी का घोषणापत्र कहता है कि उसकी सरकार वंशवाद खत्म करके नई पीढ़ी को सत्ता सौंपेगी, भ्रष्टाचारमुक्त नेपाल खड़ा करेगी।
ईरान पर हमले को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमरीकी संसद में अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों को तो समर्थन देने के लिए तैयार कर लिया, लेकिन इससे अमरीका के लोकतांत्रिक समाज में एक गहरी दरार पड़ गई है। जिस तरह इजराइल के गुलाम की तरह बर्ताव करते हुए अमरीकी सरकार ने ईरान पर हमला किया है, उसे अमरीका का ईरान पर हमला कहना भी जायज नहीं होगा। यह हमला ट्रंप का निजी और अकेले का फैसला है, और उसके रक्षामंत्री, या विदेश मंत्री उसकी हां में हां मिलाने वाले पिछलग्गुओं से अधिक कुछ नहीं हैं। इस फैसले का अमरीका में अकेले विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से तो जमकर विरोध हो ही रहा है, अमरीका में जितने किस्म के और लोकतांत्रिक संस्थान हैं, वे सब भी ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। लेकिन ट्रंप न सिर्फ बेदिमाग है, बल्कि बद्दिमाग भी है। इन दोनों का मेल घातक और जानलेवा रहता है, ट्रंप का खुद का तो कुछ नहीं बिगडऩा है, वह अमरीका के इतिहास, वर्तमान, और भविष्य तीनों को तबाह करने पर आमादा है। अमरीका का हर बड़ा मीडिया संस्थान ईरान पर इजराइल के साथ मिलकर हमला करने के ट्रंप के फैसले की व्याख्या करते हुए यह साफ देख रहा है कि ट्रंप और उसके मंत्रियों ने इस हमले की वजहों को गिनाते हुए हर बार अलग बात कही, हर बार झूठ बोला। इसके साथ यह भी है कि सारी बातों को मिलाकर भी ट्रंप एक जायज वजह नहीं गिना पा रहे हैं कि यह हमला किस तरह अमरीका के लिए जरूरी था, और अमरीका के हित में था। खुद ट्रंप और उनके मंत्रियों की कही बातों में यह मंजूर किया गया कि इजराइल ने ईरान पर हमला तय कर लिया था, वह करने ही वाला था, और उसके बाद ईरान मध्यपूर्व के देशों में डेरा डाले हुए अमरीकी सैनिकों पर हमला कर सकता था, इसलिए अमरीका के संभावित नुकसान को रोकने के लिए पहले ही ईरान पर यह हमला कर देना जरूरी था। इस बयान से यह भी जाहिर होता है कि इजराइल अमरीका के काबू के बाहर का एक देश हो चुका है, और अमरीकी सैनिकों पर खतरा लाने की कीमत पर भी उसने यह हमला किया। ऐसे इजराइल को अंधाधुंध समर्थन करके ट्रंप अमरीकियों के लिए एक खतरा खड़ा कर रहा है, और किसी भी देश के मुताबिक यह उसके लिए सबसे महंगा मोल लिया जाने वाला खतरा है।
दूसरी तरफ जिस तरह ईरान में लड़कियों के एक स्कूल पर हवाई हमला किया गया जिसमें 165 से अधिक बच्चियां मारी गईं, उसने भी संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया के बाकी संवेदनशील, समझदार, और जिम्मेदार देशों को हिलाकर रख दिया है। खुद अमरीका को इस जंग के बीच यह कहना पड़ा है कि वह इस बात की जांच करेगा कि स्कूल पर यह हमला किसने किया है, और कैसे हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि जब ईरानी जनता 165 से अधिक बच्चियों की लाशें सफेद कफन में लपेटे हुए राष्ट्रीय शोक मना रही थी, उसी वक्त ट्रंप उनके लिए फतवा जारी कर रहा था कि उन्हें ईरान की इस्लामी-तानाशाह सरकार को पलट देना चाहिए। इस मौके पर ट्रंप के इस बयान को अमरीका के कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों ने दुनिया की सबसे घटिया स्क्रिप्ट करार दिया है। खुद अमरीका के अनगिनत लोगों को यह याद पड़ रहा है कि यह जंग, और इस किस्म के हमले वियतनाम युद्ध की याद दिला रहे हैं जो बरसों तक चलने के बाद अमरीका को शिकस्त पाकर वहां से पीछे हटना पड़ा था। हमले के कुछ दिनों के भीतर से ही अभी अमरीका के दर्जनों बड़े शहरों में जनता सडक़ों पर उतर आई है, और बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगा रही है कि यह नाजायज, गैरकानूनी और असंवैधानिक हमला बंद करो। लोग बैनर-पोस्टर लेकर चल रहे हैं कि अमरीका को जंग नहीं चाहिए। 2 मार्च को अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बाहर एक बड़े प्रदर्शन में लोग ट्रंप को जंगखोर करार दे रहे थे। कुछ लोगों का कहना है कि ट्रंप इजराइल की खुशी के लिए और उसकी जिद के लिए अमरीका को जंग में झोंक रहा है। अमरीकी मीडिया में ऐसे कार्टून बने हैं जिनमें इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हाथ में पट्टा थामे हुए हैं, और उससे बंधा ट्रंप जैसा दिखता कुत्ता ईरान पर झपट रहा है, उसके पैरों में दांत धंसा रहा है। यह सब वह अमरीकी राष्ट्रपति कर रहा है जो दुनिया में जंग खत्म करने का नारा लगाते हुए अभी सवा साल पहले ही सत्ता पर आया था, और शांति का नोबल पुरस्कार पाने के लिए उसने बिफरे हुए किसी जानवर की तरह चारों तरफ सिर मारना जारी रखा हुआ है। अभी उसने खुद होकर यह कहा है कि जब उसे नोबल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया, तो दुनिया में शांति अब उसकी जिम्मेदारी नहीं रह गई है। मतलब यह कि अब वह नोबल शांति पुरस्कार की उम्मीद रखे बिना दुनियाभर में तबाही लेकर आएगा। कुछ कार्टून ऐसे भी बने हैं जिनमें ट्रंप की फौज उससे पूछ रही है कि एक बम नोबल पुरस्कार कमेटी पर भी गिरा दें क्या?
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में सूरजपुर जिले में होली के एक दिन पहले ही बड़ा बुरा हादसा हुआ। एक नौजवान ने अपनी फसल को जानवरों से बचाने के लिए किनारे बाड़ में बिजली का करंट दौड़ा दिया था। इससे उसी का चचेरा भाई करंट लगने से मर गया। जब इसे लेकर उसे लगा कि घरवाले उसे कभी माफ नहीं करेंगे, या शायद उसके साथ हिंसा होगी, तो उसने तकलीफ और दहशत दोनों से गुजरते हुए खुदकुशी कर ली। एक दिन के भीतर एक परिवार के दो चचेरे भाई इस तरह चल बसे। इस घटना को लेकर दो-तीन पहलुओं से सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि फसल बचाने के लिए आज जिस तरह लोग खेतों के चारों तरफ बिजली का करंट दौड़ाते हैं, उसका क्या इलाज है? फसल को बचाना भी जरूरी है, और यह गैरकानूनी तरीका जानलेवा रहता है। कुछ जानवर भी इससे मरते होंगे, लेकिन बीच-बीच में इंसान भी इससे मारे जाते हैं। जानवरों की बढ़ती हुई दखल से किस तरह फसल और इंसान को बचाया जाए, यह सोचना जरूरी है। लेकिन इस घटना के एक पहलू और है, और वह यह है कि किसी दुख-तकलीफ या डर की वजह से लोगों का खुदकुशी करना। अब खेती-किसानी करने वाला नौजवान कोई बहुत निराश रहा हो, ऐसा तो नहीं लगता है। एक सेहतमंद दिल-दिमाग का नौजवान ऐसे हादसे से डरकर खुदकुशी कर ले, उससे यह भी समझ पड़ता है कि समाज के लोगों में किसी सदमे या हादसे से जूझने की दिमागी तैयारी नहीं है। लोग सौ किस्म की छोटी-बड़ी बातों को लेकर खुदकुशी कर रहे हैं, और हम हर बार कुछ बुनियादी मुद्दों को लेकर यह सलाह दोहराते हैं कि समाज में सरकार और लोगों को मिलकर परेशान लोगों के मानसिक परामर्श का इंतजाम करना चाहिए।
अभी पिछले ही महीने की बात है कि दो-चार दिन के भीतर ही एक जिले कोरबा में चार छात्रों ने खुदकुशी कर ली थी। उनकी वजहें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन सारे के सारे स्कूली बच्चे थे। इस उम्र के बच्चे अगर जिंदगी से इतना निराश हो जाते हैं, तो उनके मानसिक विकास में सुधार की जरूरत है। इससे जुड़े हुए फिर कुछ पहलू सामने आते हैं। आज स्कूली उम्र से ही लडक़े-लड़कियों में मोबाइल और सोशल मीडिया के चलते असल जिंदगी से कटना हो जाता है। उनके आसपास असली दोस्त कम रह जाते हैं, और ऑनलाईन दोस्त अधिक। फिर यह भी होता है कि लगातार सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के चलते बच्चे या बड़े भी अपने परिवारों से कटने लगते हैं, और किसी मानसिक सहारे की नौबत आने पर उनके पास कोई नहीं बचते। यहीं पर यह फर्क समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन दोस्तियां मौज-मस्ती के लिए अधिक रहती हैं, ऑनलाईन अगर कोई मोहब्बत भी लगती है, तो वह मोहब्बत न होकर कुछ वक्त के लिए दिल लगाने सरीखा रहता है। ऐसे में जब भावनात्मक सहारे की जरूरत रहती है, तो जरूरी नहीं है कि कोई हमदर्द और राजदार दर्जे का कोई दोस्त ऑनलाईन उपलब्ध हो। इसलिए हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि ऑनलाईन-डिजिटल जिंदगी असल जिंदगी का कोई विकल्प कभी नहीं बन सकती।
यूक्रेन पर रूसी हमले को जंग में तब्दील हुए पांच बरस पूरे हो गए, रूस यह मानकर चल रहा था कि यूक्रेन को जीतना गुपचुप खाने की तरह होगा, बस उठाया और मुंह में रख लिया। लेकिन एक मामूली टी-शर्ट और जींस पहने हुए यूक्रेनी राष्ट्रपति जिस अंदाज में गैरबराबरी की इस जंग में डटा हुआ है, वह देखना गजब का है। दुनिया के कई देश भारत से यह उम्मीद कर रहे थे कि वह इन दोनों देशों के बीच बीच-बचाव करने की कोशिश करेगा, लेकिन भारत के रूस के साथ हर किस्म के हित इतने जुड़े हुए हैं कि भारत इस विवाद में पंच परमेश्वर नहीं बन सकता था। और ऐसी दिक्कत महज भारत के साथ नहीं है, आज बहुत से अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर दुनिया के अधिकतर देशों के सामने नैतिकता का तकाजा कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि देशों की सरकारें और वहां की लीडरशिप अगले चार या पांच बरस के अस्तित्व की मोहताज रहती हैं, और उससे अधिक दूर का देखना, महानता हासिल करने की कोशिश करना आत्मघाती हो सकता है। आज जब अमरीका और इजराइल एकजुट होकर ईरान पर टूट पड़े हैं, और ईरान ने हाल के बरसों का अपना सबसे बड़ा नुकसान फौजी हमलों में झेला है, तो दुनिया के देशों के सामने यह चुनौती भी है कि वे किसका कितना साथ दें। अमरीका के दो सबसे बड़े दुश्मनों, और अलग-अलग वजहों से प्रतिद्वंद्वियों, रूस और चीन ने भी आज इस लड़ाई में ईरान के साथ जुबानी एकजुटता से अधिक कुछ नहीं दिया है।
आज दुनिया के देशों की नौबतों को समझना होगा। कई दशक पहले दुनिया एक से अधिक ध्रुवों में बंटी हुई थी, अमरीका और पश्चिम के नाटो-देश अलग थे, लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शक्ल में अमरीका से परे भी एक बड़ा गठबंधन था, या एकजुटता थी। धीरे-धीरे सोवियत संघ के विघटन के बाद यह खेमा कमजोर होते चले गया, और पूरी दुनिया अमरीका के इर्द-गिर्द घूमने वाली एकध्रुवीय व्यवस्था हो गई। इसके साथ-साथ अमरीका ने फौजी गठबंधनों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी मदद, और कूटनीतिक कोशिशों का एक ऐसा जाल बिछाया जिससे कि वह अपनी आर्थिक और फौजी ताकततले सबको ढांककर चल रहा था। यह तो दुनिया के लिए काले बादलों में भी रौशनी की एक किरण सरीखी है कि ट्रम्प की बददिमागी और बेदिमागी की वजह से योरप अपने पैरों पर खड़ा हो रहा है, भारत अब योरप और चीन के साथ नए किस्म के समीकरण बना रहा है, और बाकी की दुनिया भी ट्रम्प के अमरीका के बिना अपने दम पर जीने की कोशिश कर रही है, इस मुश्किल काम को सीख रही है। ऐसे में ट्रम्प की टैरिफ-सनक को झेल चुके देश अब अमरीकाविहीन विश्वव्यवस्था की संभावनाओं को भी कुछ हद तक तो देख ही रहे हैं।
लेकिन आज जब ईरान के साथ परमाणु हथियार रोकने की बातचीत अंतरराष्ट्रीय निगाहों के सामने ही एक किनारे पहुंच रही थी, जब अमरीका पूरी तरह ऐसे किसी संभावित समझौते को लेकर ईरान के साथ बात कर रहा था, कुछ मध्यस्थ देश भी इसकी कोशिश कर रहे थे, तब अचानक ही अमरीका और इजराइल ने जिस तरह ईरान पर हमला किया है, वह परले दर्जे की घटिया दगाबाजी है कि एक तरफ बातचीत का नाटक जारी रखो, और दूसरी तरफ जाकर बमबारी कर दो। हम इस बारे में कल ही काफी कुछ लिख चुके हैं, और उन बातों को यहां दोहराने के बजाय आज की विश्वव्यवस्था के बारे में ईरान के खास संदर्भ में बात आगे बढ़ाना चाहते हैं।
गुजरात सरकार ने अभी राज्य के विवाह पंजीयन कानून-2006 में एक संशोधन का प्रस्ताव किया है जिसमें बालिगों की शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए मां-बाप को सूचना, और उनकी सहमति को अनिवार्य बनाया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में कहा कि यह बदलाव लव-जिहाद जैसे मामलों को रोकने के लिए है जिनमें राज्य की बेटियों को फंसाया जाता है। प्रस्तावित नियमों में मैरिज-रजिस्ट्रेशन के लिए जोड़े को आवेदन में मां-बाप के नाम-पते, आधार कार्ड और संपर्क की जानकारी के साथ-साथ यह हलफनामा भी देना होगा कि मां-बाप को शादी की जानकारी दी गई है या नहीं। इसके बाद विवाह-पंजीयक मां-बाप को नोटिस भेजेगा, और 30 दिनों की जांच अवधि रहेगी। यह याद रखने की बात है कि दो धर्म के लोगों के बीच शादी के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में पहले से 30 दिनों के पब्लिक नोटिस का नियम है, लेकिन उसमें भी मां-बाप की सहमति जरूरी नहीं थी। अब नए नियमों के तहत तो बालिग लोगों के किसी भी धर्म या जाति के पंजीयन के लिए उनके मां-बाप को नोटिस भेजा जाएगा। पहली नजर में ही यह दिखता है कि यह संशोधन अगर सिर्फ विधर्मियों के बीच शादी पर लागू करना रहता, तो वह स्पेशल मैरिज एक्ट पर लागू किया जाता, लेकिन यह तो किसी भी तरह के विवाह के पंजीयन के 2006 के कानून में किया जा रहा संशोधन है जिसका मतलब है कि एक धर्म के भीतर के विवाह भी तभी हो सकेंगे, जब बालिगों के मां-बाप को खबर होगी। जाहिर है कि मां-बाप असहमत रहने पर अगले 30 दिन में जो कर सकते हैं, वह देश भर में जगह-जगह होने वाली ऑनर-किलिंग से अधिक और कैसे साबित हो सकता है?
आज देश के कई प्रदेशों में ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं जो कि संसद द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय कानूनों को धकेलकर बन रहे हैं। इसके बाद इनकी संवैधानिकता को चुनौती देने की लंबी पहाड़ी चढ़ाई लोगों को चढऩी पड़ती है, और राज्यों के कई कानूनों को खारिज करने में अदालत को बरसों लग जाते हैं। गुजरात के संदर्भ में यह बात भी देखने की जरूरत है कि सरकार विधानसभा में जिसे लव-जिहाद कह रही है, उसे रोकने के लिए 2021 में वहां धार्मिक स्वतंत्रता कानून में संशोधन करके ‘लव-जिहाद’ को दंडनीय बनाया है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती के बाद भी लागू रखा है। अब ऐसा अंदाज है कि यह ताजा संशोधन उसी कानूनी अभियान का अगला कदम है जो कि धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए है, और उसके साथ-साथ सभी तरह की अंतरजातीय शादियों को रोकने के लिए भी। गुजरात में आज भी अंतरजातीय शादियां बहुत कम हैं, विवाह-पंजीयन के नए कानून जब मां-बाप को पहले से खबर करने का हलफनामा भरवाएंगे, तो जाहिर है कि प्रेम विवाह और कम हो जाएंगे। जबकि पूरे देश के अलावा गुजरात में भी 1990 से ही अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना चल रही है जिसके तहत अंतरजातीय, और अंतर-धर्म शादियों पर 50 हजार रूपए नगद प्रोत्साहन का प्रावधान है। अब वैसा प्रावधान तो किनारे धरा रह गया, अब मां-बाप की अनुमति अनिवार्य होने से सरकार का यह खर्च होना बंद सा हो जाएगा।
दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी को लेकर बड़ा साम्प्रदायिक तनाव देश के कई राज्यों में आम बात हो गई है। ऐसे में जब बालिग जोड़े पर कई और तरह के नियम लादे जा रहे हैं, तो उससे यह बात साफ है कि यह बालिग नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों को कुचलने के अलावा कुछ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसले यह बार-बार स्थापित कर चुके हैं कि बालिग जोड़े अपनी मर्जी से किसी भी धर्म या जाति में शादी कर सकते हैं, या बिना शादी किए भी साथ रह सकते हैं। आज देश में, खासकर उत्तर भारत और हिन्दीभाषी प्रदेशों में यह तनाव सामने आ रहा है कि साथ रहते हुए दो अलग-अलग जातियों के जोड़ों पर कुछ धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठन हमले करते हैं। कुछ ताजा हमले तो इसी सार्वजनिक रेस्त्रां में चल रही ऐसी जन्मदिन की दावत पर हुए हैं जिनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के बालिग सहकर्मी शामिल थे। ऐसे में किसी राज्य में अगर मां-बाप को 30 दिन पहले खबर देकर उनकी अनुमति या सहमति लेने को अनिवार्य कर दिया जाएगा, तो इतना मौका साम्प्रदायिक संगठनों को लाठियों में लगे हुए तेल को बालिग बदनों पर उतारने के लिए काफी होगा।
सोशल मीडिया आज दुनिया के किसी भी देश का या किसी भी भाषा का ऐसा सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच बन चुका है, जहाँ आम से लेकर खास लोग तक अपनी राय, अपने विचार और अपनी भावनाएँ बिना किसी रोक-टोक, बिना किसी संपादन के जब चाहे तब पोस्ट कर सकते हैं। जब चाहे तब उसे मिटा सकते हैं। दूसरे लोग जब चाहे तब उसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसकी तारीफ कर सकते हैं, उसकी कॉपी करके उसे अपने नाम से आगे बढ़ा सकते हैं। बात यहाँ तक रहती तब भी ठीक रहता, लेकिन दिक्कत यह है कि नफरत की बातें सोशल मीडिया पर जंगल की आग की रफ्तार से फैलती हैं। चाहे वह दूसरे देश के लोगों से नफरत हो, दूसरे रंग, दूसरी नस्ल, दूसरे धर्म, दूसरी भाषा, दूसरे प्रदेश या दूसरी राजनीतिक पसंद के लोगों से नफरत, यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है।
सोशल मीडिया पर जिन लोगों को ट्रोल कहा जाता है, वे लोग एक पेशेवर अंदाज़ में किसी के भी पीछे लग जाते हैं, उसे घेरकर परेशान करने के अंदाज में। हम यह तो नहीं जानते कि ऐसे सारे लोग हर पोस्ट पर, हर नफरत पर, किसी के पीछे पडऩे पर, किसी को पसंद या नापसंद करने पर कोई भुगतान पाते हैं या वे अपनी सोच के चलते समर्पित कार्यकर्ता हैं। इनमें जो भी बात हो, लेकिन जो सामने दिखता है वह यह है कि नफरत, उत्तेजना और भडक़ाने वाली बातें लगातार सोशल मीडिया पर अधिक बढ़ावा पाती हैं। शायद नकारात्मक बातों को पसंद करने वाले लोग अधिक होते हैं और इसलिए सोशल मीडिया के एल्गोरिथ्म नकारात्मक बातों को तेजी से आगे बढ़ाते हैं। यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते अब बहुत से गंभीर लोगों को, जो सकारात्मक या किसी काम की बात सोशल मीडिया पर करते हैं, हतोत्साहित करने लगा है। अब लोगों को कोई न्यायसंगत और दर्द से जुड़ी बात लिखने से पहले यह सोचना पड़ता है कि कितने लोग उन्हें गालियाँ देने लगेंगे। सच यह है कि हर किसी में इतनी गालियाँ बर्दाश्त करने की क्षमता भी नहीं होती। आज हालात यह हैं कि हिंदुस्तान में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार 2024 में साइबर अपराधों में सबसे अधिक संख्या नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट की थी, जिनमें धार्मिक उन्माद, जातिगत टिप्पणियाँ, महिलाओं के खिलाफ गालियाँ और क्षेत्रीय भेदभाव की बातें सबसे आम थीं।
सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानने में हमें कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन यह इस हद तक अराजक हो चुकी है और अधिकतर देशों में इस पर कोई प्रभावी कानूनी काबू नहीं है। सरहदों के आर-पार फैले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी एक देश के कानून के तहत बाँध लेना आसान भी नहीं है। भारत का ही तजुर्बा यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म लगातार सरकार के नोटिस झेलते रहते हैं कि किस पोस्ट को हटाया जाए। अब सरकारों का, चाहे वह किसी प्रदेश की हों या किसी देश की, अपना तंग नज़रिया और राजनीतिक एजेंडा होता है, और वे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कुछ पोस्ट हटवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम देखते हैं कि भारत जैसे देश में ही सत्ता के विरोधियों के खिलाफ जिस हद तक हिंसक और अश्लील बातें लिखी जाती हैं, जिन पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, वहाँ अक्सर कुछ भी नहीं होता। इस तरह सत्ता अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आजादी और अराजकता के दो हिस्सों में बाँट देती है। लेकिन दूसरी बात भी है, सरकार तो केवल कानूनी कार्रवाई के समय सामने आती है या उससे बचती है। दूसरी तरफ जनता के वे लोग, जो अपने नाम से सामने हैं, जो अपनी असली तस्वीरें लगाते हैं, अपने बच्चों की तस्वीरें लगाते हैं या अपने ईश्वरों की तस्वीरें भी लगाते हैं, जिनका हर चौथा-पाँचवाँ पोस्ट धर्म, आध्यात्मिक गुरु या पसंदीदा राजनेता के बारे में होता है, ऐसे लोग भी लगातार हिंसा फैलाने, अश्लील बातें लिखने और गंदी गालियाँ देने से परहेज़ नहीं करते। सोशल मीडिया आने से पहले तक इस किस्म की गंदी बातें लोग सिर्फ सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों के भीतर वाले हिस्सों में लिखते थे, और कहीं और ऐसी बातें लिखने का हौसला बिना नाम के भी नहीं होता था। अब हालात यह हो गए हैं कि लोग सोशल मीडिया पर अपने नाम से दूसरों को धमकियाँ देते हैं, महिलाओं को बलात्कार की धमकियाँ देते हैं। कई बड़े क्रिकेटरों और फि़ल्मी सितारों की छोटी बच्चियों तक को बलात्कार की धमकियाँ सोशल मीडिया पर दी गईं, और कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई।
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
यहाँ तो हर चीज बिकती है
कहो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
लालाजी तुम क्या-क्या
मियाँ जी तुम क्या-क्या
बाबू जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
कहो जी तुम...
ये बलखाती हुई जुल्फें,
ये लहराते हुए बाज़ू ये होठों की जवाँ मस्ती,
ये आँखों का हसीं जादू
अदाओं के खजाने,
जवानी के तराने
बहारों के जमाने
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
तड़पती शोखियाँ दे दूँ,
मचलता बाँकपन दे दूँ
अगर तुम एक कली माँगो,
तो मैं सारा चमन दे दूँ
ये मस्ती के घेरे,
ये महके अँधेरे
ये रंगीन डेरे
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
मोहब्बत बेचती हूँ मैं,
शराफत बेचती हूँ मैं
ना हो गैरत तो ले जाओ,
के गैरत बेचती हूँ मैं
निगाहें तो मिलाओ,
अदाएँ न दिखाओ
यहाँ न शर्माओ
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
गाने में तवायफ (वैजयंतीमाला) खुद को बाजार का माल बता रही है। एपस्टीन के ‘लिटिल सेंट जेम्स’ आइलैंड और न्यूयॉर्क मैनहट्टन टाउनहाउस में भी वही था, एक प्राइवेट ‘बाजार’ जहां पावरफुल लोग ‘खरीद’ सकते थे। क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स, प्रिंस एंड्र्यू, कुछ ताकतवर भारतीय नाम भी फाइल्स में आए। ये लोग ‘खरीद’ रहे थे, न सिर्फ सेक्स, बल्कि ब्लैकमेल पावर, बिजनेस डील्स, और साइलेंस। साहिर की ये लाइन बहुत कड़वी है, एक औरत को अपनी भावनाएं, सम्मान और शर्म भी बेचनी पड़ रही है। एपस्टीन ने सैकड़ों नाबालिग लड़कियों को ‘ग्रूम’ किया, उन्हें बताया कि ये ‘मॉडलिंग’ या ‘मसाज’ जॉब्स हैं। फिर उन्हें ताकतवर लोगों से ‘मिलवाया’। उसकी पार्टनर ने कई लड़कियों को रिक्रूट किया। फाइल्स में दिखता है कि ये सब ‘डील्स’ थे, एक लडक़ी की बॉडी के बदले आर्थिक या राजनीतिक एहसान। गैरत, शर्म का कोई मतलब नहीं रहता था।
लालाजी, मियांजी, बाबूजी गाने में हर क्लास के ‘खरीदार’ को न्यौता दिया गया है। एपस्टीन का नेटवर्क भी ऐसा ही था, अरबपति, राजनेता, साइंटिस्ट, सेलिब्रिटी, नोबल पुरस्कार विजेता, और राजकुमार। हर तरह के ‘बाबूजी’ वहां थे। भारत के मंत्री हरदीप पुरी के दर्जनों मेंशन (ईमेल और मीटिंग्स) से लगता है कि ये ग्लोबल नेटवर्क भारत तक फैला हुआ था, और इसमें अंबानी जैसे ताकतवर भारतीय भी शामिल थे। अदाओं के खजाने, जवानी के तराने। ये लाइनें जवानी और आकर्षण को ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेचने की बात करती हैं। एपस्टीन की लड़कियां ज्यादातर 14-17 साल की थीं, जवानी का ‘तराना’। वो उन्हें ट्रेन करता था कि कैसे ‘अदा’ दिखानी है, कैसे ‘मिलना’ है। फाइल्स में वीडियो और फोटोज हैं जो ब्लैकमेल के लिए यूज होते थे। गाने की तरह, ये सब ‘बिकने’ के लिए था।
एपस्टीन स्कैंडल दिखाता है कि सभ्यता की चमड़ी बहुत पतली है। त्वचा के नीचे वही प्राचीन इंसान है, जो वासना, दौलत, ताकत, और काबू के लिए कुछ भी कर सकता है। साहिर लुधियानवी ने 1958 में ही ये लिख दिया था कि समाज में औरत को (या कमजोर को) माल की तरह देखा जाता है। एपस्टीन ने इसे ग्लोबल स्केल पर किया। वासना सब ओवरटेक कर लेती है, क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स जैसे लोग, जो दुनिया बदल सकते थे, लेकिन अपनी इच्छाओं के आगे झुक गए। पावर इम्यूनिटी देता है, ब्रिटेन के हटाए गए राजकुमार एंड्र्यू की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन दुनियाभर में कई ताकतवर लोग बचे हुए हैं। एपस्टीन फाइलों से परे भी भारत में भी प्तरूद्गञ्जशश में कई ताकतवर आरोपी बिना सजा के घूम रहे हैं। ग्लोबल ब्रोकर, एपस्टीन जैसे लोग नेटवर्क बनाते हैं। वो पैसे, लक्जरी, और ‘प्राइवेसी’ देते हैं, बदले में ब्लैकमेल। नाबालिग देह उनका सामान और सेवा बन जाते हैं। भारत में भी अंबानी और हरदीप पुरी का नाम आना दिखाता है कि ये स्कैंडल सरहदों से परे है। भारत के भी पावरफुल लोग (पॉलिटिशियन, सेलिब्रिटी, बिजनेसमैन) ऐसे नेटवर्क में फंस सकते हैं। हैरानी यह भी है कि जो इंटरपोल दुनिया भर के चाइल्ड-सेक्स मुजरिमों की जानकारी दुनिया भर की सरकारों को देता है, वह एपस्टीन से अनजान रहा!
एपस्टीन का मामला बड़े-बड़े नामों की भागीदारी की वजह से दुनिया का आज तक का सबसे बड़े लोगों का सेक्स-स्कैंडल बन गया है। लेकिन इतने सारे नामों के एक साथ होने से परे अगर देखें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। दुनिया के जितने बड़े लोग हैं, खासकर ताकत, शोहरत, और दौलत के मालिक, उनमें से बहुत से लोग अक्सर ही यह मानकर चलते हैं कि उनकी ये ताकतें उन्हें किसी भी लडक़ी या महिला के बदन पर हाथ डालने का हक दे देती हैं। ट्रंप के उस बयान को दुनिया कैसे भूल सकती है जो उनकी ही आवाज में चारों तरफ फैला था जिसमें उसने कहा था कि एक कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे उसे, उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है। लेकिन दौलत-शोहरत जैसी ताकत से परे के कुछ दूसरे लोगों को देखें जो एपस्टीन फाइल्स में दर्ज हैं, तो उसमें नोबल पुरस्कार विजेता, बड़े-बड़े लेखक, या नोम चॉम्स्की जैसे वामपंथी विचारक भी हैं, जो कि एपस्टीन की बाल यौन शोषण की शोहरत के दस-दस बरस बाद भी उसकी मेहरबानियों के मोहताज रहे।
एल्विन टॉफलर ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘फ्यूचर शॉक’ (1970) में एक ऐसी भविष्यवाणी की थी जो आज पूरी तरह सत्य साबित हो रही है। उन्होंने कहा था कि तकनीकी और सामाजिक बदलाव इतनी तेजी से होंगे कि इंसान का दिमाग और भावनाएं उन्हें संभाल नहीं पाएंगी। इस स्थिति को उन्होंने ‘फ्यूचर शॉक’ नाम दिया, यानी भविष्य का झटका। टॉफलर के अनुसार, औद्योगिक युग में बदलाव धीमे होते थे, लेकिन 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी में जानकारी, तकनीक और जीवनशैली में बदलाव इतनी तेजी से आएंगे कि लोग लगातार तालमेल (एडजस्टमेंट) की कोशिश में थक जाएंगे। वे लिखते हैं कि जब बदलाव की गति इंसान की तालमेल क्षमता से ज्यादा हो जाती है, तो व्यक्ति में तनाव, भ्रम, चिंता और निर्णय लेने में असमर्थता पैदा होती है। उन्होंने तीन तरह के झटकों की बात की। तकनीकी बदलाव (नई मशीनें, कंप्यूटर), सामाजिक बदलाव (परिवार, रिश्ते, काम का तरीका), सांस्कृतिक बदलाव (मूल्य, विश्वास, जीवनशैली) टॉफलर ने चेतावनी दी कि अगर समाज ने इस तेजी को नियंत्रित नहीं किया, तो लोग ‘ओवरलोड’ महसूस करेंगे। जानकारी की बाढ़, विकल्पों की अधिकता और लगातार अनिश्चितता से। आज सोशल मीडिया, स्मार्टफोन और 24x7 न्यूज से हम ठीक वही अनुभव कर रहे हैं। टॉफलर की भविष्यवाणी ने हमें बताया कि बदलाव अच्छा है, लेकिन उसकी गति अगर इंसान से ज्यादा तेज हो, तो वह ‘शॉक’ बन जाता है।
टॉफलर ने आधी सदी के और पहले भविष्य का अपना जो अनुमान सामने रखा था वह कई टुकड़ों में सही साबित हो रहा है। आज इंफर्मेशन ओवरलोड दुनिया के लोगों की एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। जो देश, समाज, या व्यक्ति जितने अधिक विकसित, संपन्न, या कामकाजी हैं, वे उतने ही अधिक थके हुए भी हैं। जिस तरह किसी ऊंची इमारत पर रेत की बोरी चढ़ाते हुए मजदूर थकते हैं, कुछ वैसे ही आज लोग थके हुए हैं। अमरीका की एक शोध रिपोर्ट बताती है कि वहां एक औसत व्यक्ति दिन में 74 बार फोन चेक करते हैं, और साल में हजारों घंटे से ज्यादा डिजिटल कंटेट पढ़ते, सुनते, या देखते हैं। बहुत से लोग व्यस्त कामकाजी रहते हैं, और वे कंप्यूटरों पर काम करते हुए कुछ सुनते भी रहते हैं, या किसी दूसरी स्क्रीन पर कुछ देखते भी रहते हैं। यह डिजिटल-सहूलियत लोगों पर एक पीढ़ी के भीतर ही आ गई है। 1990 के दशक के लोगों को टीवी, और साधारण मोबाइल फोन ही हासिल थे। धीरे-धीरे वॉक-मैन जैसे चलते-फिरते संगीत उपकरण भी मिलने लगे। लेकिन तब से अब तक की एक पीढ़ी के भीतर ही अब नए लोग दिन में 8-10 घंटे तक स्क्रीन पर गुजारने लगे हैं। इंसानी दिमाग का विकास लाखों बरस में हुआ, लेकिन डिजिटल युग ने इसे इस तेजी से बदला है और एक साथ बहुत से काम करने का बोझ उस दिमाग पर लाद दिया है जो एक वक्त पर दो-चार ही चीजों पर ध्यान देता था। अब हर स्क्रीन एक औसत व्यक्ति के लिए कई तरह के मैसेंजरों पर लगातार संदेश या सूचना लाती है, सोशल मीडिया के जाने कितने ही प्लेटफॉर्म पर उसे उसकी दिलचस्पी के फोटो-वीडियो, या पोस्ट सुझाती है, दफ्तर या कारोबार का काम लादती है, दोस्तों या रिश्तेदारों के सुख और दुख की खबरें पहुंचाती है। एक स्क्रीन आज इंसानों के आंख-कान के रास्ते उसके दिमाग को चारों तरफ से सूचनाओं से घेर देती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग की वर्किंग मेमोरी सीमित रहती है, और ओवरलोड से आगे का सीखना भी धीमा होता है, और बुरी तरह प्रभावित होता है। यह ठीक उसी तरह का है जैसे कम क्षमता के कंप्यूटर, धीमे प्रोसेसर पर कोई बड़ा सा वीडियो एडिट करने के लिए बैठ जाए। कुछ मनोवैज्ञानिकों का यह कहना है कि जब किसी व्यक्ति के सामने देखने, सुनने, पढऩे की अपार पसंद पेश हो जाती है, तो उनकी पसंद करने की क्षमता को लकवा सरीखा मार जाता है। हमारा खुद का यह मानना है कि जब लोग लगातार, पल-पल निजी, कारोबारी, और महज दिलचस्पी के संदेशों और पोस्ट से घिरे रहते हैं, तो इन सबको पल-पल देखने की उनकी बेचैनी बढ़ती जाती है। कुछ दशक पहले जब ई-मेल शुरू हुआ तो पश्चिम की एक संपन्न महिला एक सैलानी जहाज पर गई हुई थी। समंदर के बीच उस वक्त उसे इंटरनेट हासिल नहीं था, और अपने ई-मेल बॉक्स में झांके बिना उसे चैन नहीं पड़ रहा था। ऐसे में उसने जहाज से संदेश भिजवाकर किराए का हेलिकॉप्टर बुलवाया उससे वह किनारे पहुंची, अपना ई-मेल बॉक्स देखा, जिसमें कुछ भी काम का नहीं था, लेकिन इसके बाद ही वह लौटकर सैलानी जहाज पर अपना बाकी का वक्त चैन से गुजार सकी।
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन एक बार फिर विवादों में हैं। उनके ताजा बयान, जो 23 फरवरी 2026 को तमिलनाडु के होसुर में एक आध्यात्मिक कार्यक्रम ‘गुरू वंदना उत्सव’ में दिए गए, उसने देशभर में बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि जो लोग आध्यात्मिक गुरुओं को भगवान का रूप नहीं मानते, वे ‘रास्कल्स (दुष्ट), फूल्स (मूर्ख) और बार्बेरियंस (बर्बर)’ हैं। उन्होंने यह बयान तमिलनाडु के कुछ रेशनलिस्टों (तर्कवादियों) के खिलाफ दिया, जो उनके अनुसार गुरु-भक्ति को मूर्खता बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘तमिलनाडु में कुछ लोग खुद को रेशनलिस्ट कहते हैं। वे हमें गुरु को भगवान का रूप मानने पर ‘दुष्ट, मूर्ख और बर्बर’ कहते हैं। मैं कहता हूं कि ऐसे कहने वाले खुद दुष्ट, मूर्ख और बर्बर हैं।’ उन्होंने गुरुओं को ‘भगवान का जीवंत रूप’ बताया और कहा कि गुरु की निकटता से ‘आध्यात्मिक आभा’ मिलती है, जो व्यक्तिगत कमजोरियों को दूर करती है। यह बयान उनकी नौकरी के सेवा के बाकी चार सालों में उनके आलोचकों को और भडक़ा रहा है। यह बयान जस्टिस स्वामीनाथन की हिंदू धर्म और आध्यात्मिक झुकाव वाली छवि को मजबूत करता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि एक जज के रूप में उन्हें सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) रहना चाहिए। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल हो गया है, जहां कुछ ने इसे ‘धार्मिक कट्टरता’ कहा, जबकि समर्थकों ने इसे ‘आस्था की रक्षा’ बताया। रेशनलिस्ट ग्रुप्स ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताया, क्योंकि जज का पद सार्वजनिक बयानों में निष्पक्षता मांगता है। यह बयान उनके पहले के विवादों से जुड़ता है, जहां वे धार्मिक मुद्दों पर बोलते रहे हैं। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन मदुरै बेंच के जज हैं और कई हाई-प्रोफाइल केस संभाल चुके हैं। उनके फैसले और बयान अक्सर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस छेड़ते हैं। उदाहरणस्वरूप, दिसंबर 2025 में तिरुपरनकुंड्रम दरगाह के पास ‘दीपाथून’ (एक पत्थर का स्तंभ) पर दीपक जलाने का आदेश दिया, जो एक हिंदू परंपरा है। उन्होंने राज्य सरकार के कानून-व्यवस्था बिगड़ जाने के तर्क को खारिज किया और कहा कि ‘कानून-व्यवस्था’ कोर्ट के आदेशों को न मानने का बहाना नहीं बन सकता। यह आदेश 1 दिसंबर 2025 को आया, जब एक हिंदू की याचिका पर सुनवाई हुई। दरगाह के वकील ने कहा कि सुनवाई में उन्हें बोलने नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन था।
इस केस ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को जन्म दिया। दिसंबर 2025 में 107 से ज्यादा सांसदों (डीएमके, कांग्रेस, अन्य इंडिया ब्लॉक पार्टियां) ने लोकसभा स्पीकर को प्रस्ताव दिया। आरोप लगाया गया कि पक्षपात, सेकुलरिज्म के खिलाफ काम, ‘एक विशेष राजनीतिक विचारधारा’ से प्रभावित फैसले, और ‘एक विशेष समुदाय’ (ब्राह्मण) के वकीलों को उपकृत करते हैं। सांसदों ने 13-पॉइंट प्रतिनिधित्व पहले राष्ट्रपति और देश के मुख्य न्यायाधीश को दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर महाभियोग प्रस्तुत किया। आलोचकों ने कहा कि यह जज को दबाने-धमकाने की कोशिश है। महाभियोग अभी पेंडिंग है, क्योंकि स्पीकर को इसे स्वीकार या रिजेक्ट करना है। कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि फैसलों से असहमति महाभियोग का आधार नहीं हो सकती, सिर्फ साबित हो रहा दुराचार ही इसका आधार हो सकता है।
जस्टिस स्वामीनाथन पहले भी अपने कई सार्वजनिक बयानों में और अदालती फैसलों-आदेशों में अपना हिंदुवादी रुख दिखाते रहे हैं। 2023 में उन्होंने कहा- ‘अगर हम वेदों की रक्षा करेंगे, तो वेद हमारी रक्षा करेंगे’ उन्होंने कहा अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक बहस में यह कहा था- ‘देश का संविधान इसकी आबादी के धर्म के अनुपात (डेमोग्राफिक प्रोफाइल) पर निर्भर करता है।’ यहां यह उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु देश में दलित राजनीति का एक बड़ा केंद्र है, और वहां पर हिंदू धर्म से जुड़े हुए मुद्दों को दलितों के नजरिए से भी देखा जाता है। ऐसे में जस्टिस स्वामीनाथन का वाचाल होना और खुलकर एक धर्म की मान्यताओं का साथ देना विवाद खड़ा करते ही रहता है।
लेकिन भारत के हाईकोर्ट और यहां के सुप्रीम कोर्ट के जजों के पहले के भी कुछ बयान, फैसले, और व्यक्तिगत जीवन की उनकी मान्यताएं विवाद खड़े करती रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रहे आरएम लोढ़ा ने 2014 में राजस्थान के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से सतीप्रथा को महिलाओं के त्याग और पवित्रता का प्रतीक बताया था। इस प्रथा के आलोचक सतीप्रथा को विधवा-दहन की तरह देखते हैं, जिसके खिलाफ कड़े कानून हैं। ऐसे आलोचकों ने जस्टिस लोढ़ा की जमकर आलोचना की थी। महिला अधिकार समूहों ने इस बयान की कड़ी आलोचना की थी और जजों से उनके बयानों पर काबू करने की मांग की थी। यह बयान जस्टिस लोढ़ा ने रिटायरमेंट के बाद अदालत के बाहर दिया था। एक दूसरे मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गाय से जुड़े एक फैसले में अदालत में कहा था कि मोर जीवन भर ब्रह्मचारी रहता है और यौन संबंध से बच्चे पैदा नहीं करता। इसके साथ ही उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सिफारिश की थी और कहा था कि गाय दिव्य रहती है।
अमरीका के एक बड़े डेमोक्रेटिक लीडर बर्नी सैंडर्स ने अभी सोशल मीडिया पर यह चेतावनी दी है कि एआई डेटा सेंटर्स पर रोक लगाने की उनकी कुछ महीने पहले की मांग की गूंज अब अलग-अलग जगहों से सुनाई पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम (अस्थायी रोक) का प्रस्ताव रखा था तो इसे विकास के खिलाफ, तकनीक के खिलाफ कट्टरपंथी सोच मान लिया गया था। लेकिन आज अमरीका के एक बड़े शहर डेनवर के मेयर ने देशभर के बहुत से दूसरे शहरों और वहां के निर्वाचित लोगों की राह पर चलते हुए अपने शहर में डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की घोषणा कर दी है। बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि एआई डेटा सेंटर्स जमीन और पानी के इस्तेमाल पर गहरा असर डालेंगे, बिजली की लागत बहुत बढ़ा देंगे, और पर्यावरण पर बुरा असर होंगे। उन्होंने आगे कहा है कि लेकिन यही अकेली वजह नहीं है, एआई का अमरीकी कामकाजी वर्क पर विनाशकारी असर पडऩे वाला है। यह हर क्षेत्र में सफेदपोश और शारीरिक मेहनत वाली, दोनों किस्म की लाखों-करोड़ों नौकरियां खत्म कर देगा। उन्होंने आगे कहा है कि एआई जिस हैरतअंगेज रफ्तार से छलांगें लगाकर आगे बढ़ रहा है, कई जानकार विशेषज्ञों को डर है कि यह क्रांतिकारी तकनीक जल्द ही इंसानों से ज्यादा होशियार हो जाएगी और इंसानी काबू से बाहर भी, और इसके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने आखिर में कहा है कि ऐसे में लोग चुप नहीं बैठ सकते, और कुछ मु_ीभर बड़ी टेक कंपनियों के मालिकों को यह फैसला करने की इजाजत नहीं दे सकते कि वे हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे लोकतंत्र, और मानवता के भविष्य को अपनी मनमानी बदल दें। उन्होंने कहा कि इस बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर सार्वजनिक बहस और लोकतांत्रिक निगरानी की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अब कार्रवाई का समय है और अमरीका को राष्ट्रीय स्तर पर एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की जरूरत है।
दुनिया के एक सबसे विकसित और टेक्नॉलॉजी-संपन्न देश अमरीका को एआई के विकास की लीडरशिप भी हासिल है, और तबाही का खतरा बढ़ाने में भी। इसलिए बाकी दुनिया जहां अमरीकी टेक्नॉलॉजी पर अमल कर रही है, उसे अमरीका के भीतर कारोबार से परे के जनसरोकारी लोगों की उठाई गई बातों पर भी सोचने और फिक्र करने की जरूरत है। बर्नी सैंडर्स ने जो कहा है उसके पीछे का तर्क यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को बिना रुके हर पल हजारों-लाखों सर्वर चलाने पड़ते हैं। ये किसी छोटे शहर जितनी बिजली अकेले खा सकते हैं और आगे चलकर लोगों के लिए बिजली महंगी हो सकती है। बिजली की मांग बढऩे से कोयले या गैस पर आधारित बिजलीघर लगाने की नौबत आ सकती है जिसका मतलब होगा अधिक खदानें, जंगलों की अधिक कटाई, पानी की अधिक खपत, और अधिक प्रदूषण। एआई डेटा सेंटर्स सभी जगह किसी प्यासे ऊंट से अधिक पानी पीते हैं (ऊंट भाई-बहन माफ करें), उनके सर्वर इतने गर्म होते हैं कि उन्हें ठंडा रखने के लिए एक-एक डेटा सेंटर को हर दिन लाखों लीटर पानी लगता है। जिन इलाकों में पहले से पानी की कमी है वहां यह भयानक खतरा पैदा कर सकता है। इसके अलावा एआई डेटा सेंटर्स से निकलने वाली गर्मी और उसका शोरगुल आसपास के लोगों का जीना हराम करने ही लगा है। पर्यावरण के हिसाब से देखें तो लगातार भारी इस्तेमाल से सर्वर और चिप्स जल्दी बेकार होते हैं, और इनको बदलने से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ता है। लेकिन इसके भी पहले एआई के लिए बनने वाले खास किस्म के असाधारण ताकतवर चिप्स बनाने में भी अंधाधुंध ऊर्जा और साधन लगते हैं, जिससे पर्यावरण का बड़ा नुकसान होता है।
पर्यावरण के इन नुकसानों से परे देखें, तो एआई से जितने तरह की नौकरियां और रोजगार खत्म होने जा रहे हैं उनके बारे में अलग-अलग विशेषज्ञ-जानकार लगातार चेतावनियां दे ही रहे हैं। अभी-अभी एआई-विकास में लगी हुई एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के एआई मुखिया ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किस तरह एक-डेढ़ बरस में ही एआई अमरीका के ऑफिस-जॉब बड़ी संख्या में खत्म कर देगा। पूरी दुनिया का यह तजुर्बा है कि बड़ी-छोटी सभी तरह की कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह साफ कह चुकी हैं कि वे अपने काम में एआई का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। मतलब यह कि इन कर्मचारियों को यह कह दिया गया है कि अपने फंदे के लिए रस्सियां बुनें। जिन लोगों को यह बात कुछ बढ़-चढक़र कही हुई लगती है, उन्हें यह देखना चाहिए कि अब दुनिया में अनुवादकों, डिजाइनरों, कॉपी राइटरों की शायद ही कोई नौकरी निकलने वाली है। जिन देशों में मजदूर और कर्मचारी कानून मालिकों के पक्ष में है वहां लोगों को बड़े पैमाने पर निकाला जा चुका है। एआई ही कंपनियों को यह बता रहा है कि उसके कौन से कर्मचारी कम जरूरी हैं, अधिक नालायक हैं, कामचोर हैं, या एआई उस काम को मुफ्त में करने के लिए तैयार खड़ा है। जिन लोगों को अभी तक एआई से बेरोजगारी का खतरा दिख नहीं रहा है, वे रेत में सिर घुसाए शुतुरमुर्ग की तरह रेतीली आंधी के गुजर जाने की राह देख रहे हैं, हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि शुतुरमुर्ग को लेकर यह अवैज्ञानिक कहावत बनाई गई है, और वे इंसानों जितने बेवकूफ नहीं होते कि आंधी को अनदेखा करें।
भारत में अभी-अभी दुनिया की सबसे बड़ी एआई समिट निपटी ही है। प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोगों ने वहां पर शर्ट खोलकर एक चौथाई-नग्न प्रदर्शन किया है (अर्धनग्न कहना ज्यादती होगी), यह सही था या गलत था इस गुणदोष पर गए बिना हम यही कह सकते हैं कि एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में ऐसी अभूतपूर्व हरकत शायद एक फ्रॉडियन हरकत थी कि मानो इन लोगों को यह अंदाज लग गया था कि एआई जल्द ही सबको नंगा करके छोड़ेगी। कायदे की बात तो यह होती कि मजदूरों और कर्मचारियों के संगठन चौथाई, या अर्धनग्न होकर यहां पर प्रदर्शन करते कि एआई फोटो-वीडियो के अलावा रोजगार में भी उनके कपड़े उतारने जा रहा है।
आज जब चारों तरफ कहीं नंगई की राजनीति चल रही है, कहीं ओछेपन की हिंसानियत दिखाते हुए बड़े-बड़े नेता हवा में जहर घोल रहे हैं, तब इन सब उथली और छिछली बातों को छोडक़र जिंदगी और दुनिया के कुछ असल और अहम मुद्दों पर बात करना बेहतर है। ट्रम्पियापे की शिकार आज की दुनिया में साफ हवा की तो कोई बात हो नहीं सकती क्योंकि जलवायु परिवर्तन धीमा करने की चर्चाओं को इस मूढ़मगज ने पटरी से उतारकर ही दम लिया, और अब दुनिया के एक सबसे बड़े प्रदूषक-देश अमरीका के गैरजिम्मेदार हो जाने पर दुनिया के बाकी बड़े देशों को भी यह लगने लगा है कि वे ही दुनिया को साफ रखने, और मानव प्रजाति को बचाने की महंगी जिम्मेदारी क्यों ढोएं? इसलिए हवा को लेकर अब अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, दूसरी तरफ हवा के तुरंत बाद लोगों की जो जरूरत है, वह पानी की है। खाने की बारी पानी के बहुत बाद आती है। पानी का हाल बाकी दुनिया से कुछ आगे बढक़र हिन्दुस्तान में और भयानक इसलिए है कि जिन लोगों के पास जमीन का एक टुकड़ा है, उस पर बंगला, मकान, या कारखाना है, कोई सर्विस सेंटर है, या होटल है, उन तमाम लोगों ने यह मान लिया है कि उतनी जमीन पर खोदे गए जितने भी नलकूप मुमकिन हैं, उन सबसे धरती के पेट से पानी उलीच लेना उनका हक है। यह काम सरकार के नियमों के खिलाफ कारखानों में भी हो रहा है, और कारोबारों में भी हो रहा है। घरों में तो हो ही रहा है जहां पर लोग संपन्न कॉलोनियों में घर के बाहर की सडक़ तक तेज धारदार पानी वाले पाईप से धोते हुए दिखते हैं, और हर दिन गाड़ी धोने के लिए रखे गए लोग उन्हें धान का खेत मानकर मानो सींचते रहते हैं। लोग देश के सबसे गर्म इलाकों में भी छतों पर बगीचे लगाकर रखते हैं, क्योंकि उनके नीचे पानी है, उनके पास भारी-भरकम पंप हैं, और बिजली का बिल चुकाने की हिंसक ताकत भी है। इन सबका मिलाजुला नतीजा यह है कि जिस तरह कोई दौलतमंद बिगड़ैल अपनी गाड़ी से कुचलकर किसी को मार सकते हैं, उसी तरह ऐसे ही दूसरे कुछ दौलतमंद बिगड़ैल धरती का पूरा ही पानी निकालकर इस्तेमाल कर लेने का हिंसक इरादा रखते हैं।
हम दशकों से इस बात को लिखते आ रहे हैं कि चाहे सरकारी नलों से आने वाला पानी हो, चाहे अपनी जमीन पर नलकूप खुदवाकर उससे अपने पंप और बिजली से खींचा जाने वाला पानी हो, इन सब पर मीटर लगने चाहिए। पानी जहां से भी इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर वह साफ-सुथरा जमीनी पानी है, या टंकियों से आने वाला फिल्टर किया हुआ पानी है, तो उसकी खपत पर काबू रखना जरूरी है। छत्तीसगढ़ के पड़ोस के नागपुर में जब पानी की सप्लाई का निजीकरण किया गया, तो निजी कंपनी ने पाईप बदले ताकि हर घर तक पानी चौबीसों घंटे पहुंच सके, रास्ते में उसका लीक होना बंद हो, पानी की चोरी बंद हो। इन सबके साथ जब मीटर लगाए गए, तो कुछ सीमा तक पानी हर परिवार को मुफ्त दिया जा रहा है, लोग बाकी का मामूली भुगतान कर रहे हैं, और अधिक खपत वाले अधिक भुगतान। इसके पहले तक महिलाओं और बच्चों को रात-रात जागकर नल या टैंकर आने की राह देखनी पड़ती थी, जैसा कि छत्तीसगढ़ के भी बहुत से शहरों में गर्मियों में देखने मिलता है। देश के लोग इतने गैरजिम्मेदार हैं कि मुफ्त में मिलने वाले पानी की कोई कदर नहीं है। इसलिए जब मामूली दाम देने पड़ेंगे, तो उस पानी की इज्जत होने लगेगी। जो लोग पानी के निजीकरण के खिलाफ हैं, और अपने आपको जनता के लिए फिक्रमंद मानते हैं, वे अगर मीटरों का विरोध करते हैं, तो वे उसी जनता को एक सूखे कल की तरफ ले जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तान जैसे देश में भी अफ्रीका के देशों की तरह इलाका छोडक़र जाने को मजबूर होना पड़ेगा।
किसी भी देश-प्रदेश को यह समझने की जरूरत है कि गरीब को तो एक परिवार के लिए हर दिन दो-चार सौ लीटर पानी मुफ्त दिया जा सकता है, और बाकी के लिए उसे रियायती बिजली की तरह कुछ भुगतान करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ देश के एक-एक करके बहुत से शहर सूखे का शिकार होते चल रहे हैं, जहां एक दिन पैसा देने पर भी पानी नसीब नहीं होगा। नेताओं को, और अपने आपको जनता का हिमायती कहने वाले, निजीकरण के विरोधी लोगों को ऐसी नौबत लाने के लिए ओवरटाइम नहीं करना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल, या सरकार के लिए पानी की मीटरिंग एक लुभावना काम नहीं हो सकता। दूसरी तरफ पानी के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन करके कई तरह के नारे उठाना आसान काम रहता है। लेकिन इन दोनों ही तबकों के पास जनता को जिम्मेदार बनाने का और कोई भी तरीका नहीं है, सिवाय पानी की मीटरिंग के। आज भी पानी जैसी ही जरूरत बन चुकी बिजली पर मीटरिंग तो है ही, और सरकार अपने दम-खम पर जितनी यूनिट मुफ्त दे सकती है, उतनी यूनिट देती है, बाकी को रियायती दर पर देती है, और बड़ी खपत पर बड़ा ऊंचा रेट भी लगता है। ठीक ऐसा ही काम पानी को लेकर होना चाहिए, जिसमें सरकारी पाईप लाईन, और लोगों के निजी नलकूप दोनों ही शामिल हों। आज तो शहरी सडक़ों के किनारे बड़े-बड़े ऐसे सर्विस सेंटर चलते हैं जो नलकूप के पानी में तेज धार वाले जेट लगाकर कारों को धोने का काम करते हैं, और उन्हें रोकने वाले कोई नहीं हैं। यह अदूरदर्शिता लोगों के मिजाज में ऐसी अराजकता भर चुकी है कि उन्हें किसी भी चीज का पैसा देना अखरता है। वे अनाज का पैसा देना नहीं चाहते, पढ़ाई या इलाज का पैसा देना नहीं चाहते, बिजली या पानी का पैसा देना नहीं चाहते, और इनमें से हर मामले में मुफ्त में मिली रियायत में भी तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी हो रही है। सरकारी खजाने को चूना लगाने का कोई भी मौका न अमीर छोड़ रहे, न गरीब से गरीब छोड़ रहे। जिन्हें अनाज तकरीबन मुफ्त मिलता है, वे भी उसका एक हिस्सा दुकानदार को ही बेचकर उसकी दारू पी जाते हैं।
कल छत्तीसगढ़ में एक नौजवान ने खुदकुशी कर ली। कुछ अरसा पहले पिता की मौत हुई थी, और आपदा राहत राशि हड़पने वाले एक गिरोह ने परिवार को झांसा दिया कि अगर सांप के काटने से मौत दिखाई जाए तो सरकार से चार लाख मिल सकते हैं। ऐसे में कई तरह के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, और निकली रकम में से विधवा महिला को कुल 50 हजार रूपए मिले, और बाकी रकम इस गिरोह के लोगों ने बांट ली। जब दस्तावेज फर्जी पाए गए, तो इस महिला को कल गिरफ्तार किया गया, और बेटे ने सदमे में आकर थाने से घर जाकर खुदकुशी कर ली। हम आत्महत्या की कई अलग-अलग वजहों को लेकर कई बार लिखते हैं क्योंकि उन्हें ठीक से समझने की समाज को जरूरत लगती है। अभी दो-चार दिन पहले ही या तो इसी जगह, या अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर हमने बच्चों की खुदकुशी का मुद्दा भी उठाया था। अब यह आत्महत्या सामने आई है, इसलिए समाज में आत्महत्या की वजहों के बारे में कुछ अधिक खुलासे से सोचने-समझने, और उस पर चर्चा करने की जरूरत है।
जब समाज में तरह-तरह के जुर्म, जालसाजी, और ठगी-धोखाधड़ी का चलन बढ़ गया हो, तो धीरे-धीरे लोगों को यह आसान कमाई सुहाने लगती है, और मेहनत के कामकाज को जरूरी मानना बंद कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ लोग लगातार जुर्म करते रहते हैं, और बहुत से लोग लगातार जुर्म के शिकार होते रहते हैं। हवा में एक नकारात्मकता छाई रहती है। कई लोग जुर्म करके खतरे की आशंका में तनावग्रस्त रहते हैं, और बहुत से लोग जुर्म के शिकार होकर, नुकसान झेलकर एक अलग किस्म की कुंठा में चलते हैं। हवा में तनाव घुला रहता है। इससे परे जब कभी जिस देश-प्रदेश में, किसी शहर-समाज में जातिवाद या साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद या भाषा के विवाद चलते रहते हैं, तो उससे भी एक तनाव रहता है। जब किसी इलाके में स्थानीय और बाहरी-परदेसिया का मुद्दा रहता है, तो दोनों ही तबकों के लोग एक अलग तरह के तनाव में रहते हैं। जिन्हें बाहरी-परदेसिया कहा जाता है, वे संख्या में कम रहते हैं, और वे आशंका से भर जाते हैं, उन्हें अपने काम और कारोबार, संपत्ति और परिवार को लेकर आशंकाएं रहती हैं। दूसरी तरफ जो स्थानीय होने का दावा करते हैं, रहते हैं, उन्हें जब स्थानीयता का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं दिखता, तो उनके भीतर भी भड़ास का गुबार बढ़ते चलता है।
जब लोगों को यह लगता है कि उनके दिए हुए वोट से सत्ता पर आने वाले लोग भ्रष्ट हैं, दुष्ट हैं, और वोट के दिन उनके पास ऐसे ही लोगों में से किसी एक को छांटने की मजबूरी है, तो उनके भीतर भी लोकतांत्रिक-निराशा बढ़ती चलती है। इसी तरह कहीं किसी सरकारी दफ्तर की भ्रष्ट व्यवस्था से लोग निराश रहते हैं, कहीं पर अदालत की धीमी रफ्तार लोगों को बेइंसाफी लगती है, और वह रहती भी है। ऐसे बहुत से कारण रहते हैं जो कि लोगों में निराशा बढ़ाते हैं। लोगों को किसी आत्महत्या के पीछे इतनी सारी वजहों को हमारा गिनाना हो सकता है कि गैरजरूरी लगे, लेकिन हमारा यह साफ-साफ मानना है कि किसी देश-प्रदेश या समाज में लोगों के खुश रहने का अपना एक असर होता है, जहां जिंदगी बेहतर, सुख से भरी हुई, संभावनाओं वाली, और खुशहाल होती है, वहां तो लोग इतनी खुदकुशी नहीं करते होंगे। आज अगर हिन्दुस्तान में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बड़ी संख्या में खुदकुशी होती है, तो वह उनके सामने की एक तात्कालिक वजह के साथ-साथ बहुत सी परोक्ष वजहें भी उनके मामले में रहती है, जो कि उनकी दिमागी हालत को आत्मघाती बनाने का काम करती हैं।
जिस देश-प्रदेश, या समाज को खुश रहना है, उन्हें नफरत, हिंसा, और बाकी किस्म के नकारात्मक कारणों से छुटकारा पाने की तरकीबें ढूंढनी चाहिए। आज लोग अपने घरों में अगर नफरत की बातें करते हैं, तो घर के दूसरे बालिग सदस्यों के साथ-साथ बच्चों की रगों में भी लहू के साथ-साथ नफरत भी दौडऩे लगती है। बच्चे स्कूलों में उस नफरत का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं, और फिर उस नफरत के शिकार दूसरे बच्चों में उसकी एक प्रतिक्रिया भी होने लगती है। आत्महत्या हो, या हत्या, दोनों के पीछे एक हिंसक इरादे की जरूरत रहती है, चाहे वह अपने खिलाफ हो, चाहे दूसरों के खिलाफ। कुछ बच्चे दूसरों के हाथों परेशान होकर खुदकुशी कर सकते हैं, और कुछ दूसरे बच्चे दूसरों का कत्ल। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग में कुछ मुस्लिम स्कूली बच्चों को पाकिस्तान के एक आतंकी-हैंडलर के साथ संपर्क में पकड़ा गया। इन बच्चों को इनकी स्कूल के दूसरे गैरमुस्लिम बच्चे धर्म की वजह से आतंकी कहते हुए, पाकिस्तानी कहते हुए प्रताडि़त करते थे। नतीजा यह हुआ कि किसी तरह यह घटना पता लगने पर पाकिस्तान में बैठे भारत में आतंक फैलाने वाले एक एजेंट ने इन मुस्लिम बच्चों को भडक़ाना शुरू किया, और इन बच्चों ने इंटरनेट पर डार्क वेब वाली जुर्म की दुनिया में जाकर हथियारों की पूछताछ शुरू कर दी थी। इसी वक्त भारत की एजेंसियों की नजर इन पर पड़ी, तो पता लगा कि स्कूल में दूसरे बच्चों की प्रताडऩा की वजह से इन बच्चों के मन में हिंसक भावनाएं भडक़ रही थीं।
करीब 20 बरस अफगानिस्तान पर राज करने के बाद अमरीका को जब यह समझ आया कि वह किसी किनारे पहुंच नहीं रहा है, न तो अफगानिस्तान में किसी तरह का लोकतंत्र, या पिट्ठू सरकार कायम करने की गुंजाइश है, और न ही इतने लंबे खर्च को, अमरीकी सैनिकों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए जारी रखना मुमकिन है, तो उसने 2021 में दुम दबाई, और रातों-रात अफगानिस्तान छोडक़र भागा। उस दिन वहां की जो खबरें आ रही थीं, वे बता रही थीं कि किस तरह राजधानी काबुल के एयरपोर्ट से अमरीकी विमानों पर सवार होकर अमरीकी सैनिक भाग रहे थे, और तालिबान एयरपोर्ट की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। आखिर में हाल यह था कि ढेर सारे हथियार, गोला-बारूद, और फौजी हेलीकॉप्टर भी छोडक़र अमरीकी भागे थे। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका अपने तमाम अफगान मददगारों को भी धोखा देकर भागा था, जो कि इतने बरस तक अमरीकी हुकूमत की मदद कर रहे थे, उसकी फौज के साथ काम कर रहे थे, तालिबानों के खिलाफ अफगान महिला जज फैसले दे रही थीं, महिलाएं तरह-तरह के दूसरे सरकारी कामकाज में लगी हुई थीं, इन सबको छोडक़र, तालिबान के हवाले करके अमरीका भाग गया था। नतीजा यह निकला कि अभी पांच बरस होने को हैं, अफगान तालिबानों ने दुनिया की सबसे जुल्मी महिलाविरोधी सरकार कायम करके रखी है, और अमरीका सहित दुनिया के कोई भी देश उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है।
ऐसे तालिबानों ने छांट-छांटकर उन महिलाओं के खिलाफ पहले कार्रवाई की जो कि अमरीकी फौजी शासन के साथ मिलकर काम कर रही थीं। उनमें से अधिकतर को अफगानिस्तान की कोई न कोई सरहद पार करके पड़ोसी देश के रास्ते भागना पड़ा। लेकिन जो महिलाएं वहां बच गईं, उनकी पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, कोई नौकरी करना, अकेले घर से निकलना, या घर पर भी खुली आवाज में नमाज पढऩा, इन सब पर तालिबानी रोक लग गई। एकदम से अमरीका के छोड़े गए शून्य में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अभूतपूर्व और असाधारण पैमाने लागू हो गए। विश्व समुदाय इस बात को लेकर दुविधा में फंस गया कि भूखे और बीमार मरते अफगान लोगों को मदद करने के लिए वह तालिबान हुकूमत के सामने महिला अधिकारों की शर्त रखे, या अफगान आबादी को जिंदा रहने में मदद करे? भारत जैसे बहुत से देशों के लिए रणनीतिक रूप से यह आसान नहीं था कि वह तालिबानों को महिला अधिकार का सम्मान करना सिखाए, और उस शर्त पर उनसे बातचीत करे। भारत जैसे बहुत से देशों ने तालिबानी हुकूमत को मान्यता नहीं दी है, लेकिन बहुत से देशों ने तालिबानी नेताओं के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला जारी रखा है, और लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले इस सरकार का एक बड़ा नेता भारत आया था, तो उसकी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया था। इस पर बवाल होने के बाद अगले दिन फिर एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें महिला पत्रकारों को भी शामिल किया गया। कई दिनों तक अफगान नेता भारत में रहा, और मान्यता दिए बिना भी भारत अफगान सरकार के साथ एक बड़े तालमेल के साथ चल रही है क्योंकि वह पाकिस्तान से लगा हुआ देश भी है, और उसका पाकिस्तान के साथ बड़ा टकराव भी चल रहा है, और यह बात भारत अनदेखी नहीं कर सकता।
आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि अफगान-तालिबान के सबसे बड़े नेता ने अभी पिछले ही महीने 90 पेज का एक नया क्रिमिनल कोड जारी किया है जो कि महिलाओं को संपत्ति की तरह मानता है, और पत्नी पर पति की हिंसा को एक बड़ी सीमा तक कानूनी दर्जा देता है। यह लिखित नियम बताते हैं कि अगर पति पत्नी को इस बुरी तरह पीटता है कि उसकी हड्डियां टूट जाती हैं, जख्म आते हैं, लहू निकलता है, तो इसके सुबूत अगर पत्नी अदालत में देती है, तो उस पर अधिकतम 15 दिनों की कैद का प्रावधान है। दूसरी तरफ जानवरों को चोट पहुंचाने पर इससे अधिक सजा है। इस क्रिमिनल कोड का एक दूसरा हिस्सा बताता है कि पत्नी अगर पति की अनुमति के बिना मायके या रिश्तेदारों के घर जारी है, और वापिस नहीं लौटती है, तो पत्नी और उसके परिवार को तीन महीने की कैद हो सकती है। कुल मिलाकर पति को ‘विवेकपूर्ण सजा’ की छूट है, जिसका मतलब है कि हड्डी तोड़े बिना, खून बहाए बिना पीटना। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने महिला पर ऐसी भयानक हिंसा को कानूनी दर्जा दे देने के तालिबानी फैसले की जमकर निंदा की है।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अभी 48 घंटे के भीतर स्कूली इम्तिहानों में शामिल होने जा रहे चार नाबालिग बच्चों ने खुदकुशी कर ली। इनके पीछे मोटेतौर पर पढ़ाई का तनाव दिख रहा है, लेकिन जैसा कि किसी की भी जिंदगी में होता है, यह भी हो सकता है कि साथ-साथ कोई दूसरा तनाव भी हो। एक नाबालिग ने तो खुदकुशी की जो चिट्ठी लिख छोड़ी है उसमें परिवार से कहा है कि उसका शरीर मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाए। यह अतिपरिपक्व सोच इस उम्र के हिसाब से कुछ अधिक गंभीर है, और हक्का-बक्का करने के अलावा यह हैरान भी करती है। वैसे तो बालिगों, या नाबालिगों, अक्सर ही प्रेमीजोड़ों, या वैध-अवैध कहे जाने वाले रिश्तों में उलझे हुए लोगों की खुदकुशी की खबरें आती रहती हैं, लेकिन एक ही जिले में दो दिनों के भीतर इम्तिहान के मौसम में चार नाबालिग छात्र-छात्राओं की खुदकुशी दिल दहलाती है, और लोग इसे गंभीर मानें तो यह सोचने का एक बहुत बड़ा मुद्दा है। वरना इसे कोई महत्व न देना हो, तो यह पुलिस, अस्पताल, पोस्टमार्टम का मामला है, और इसके साथ ही केस बंद हो जाएगा। समाज या सरकार के सामने इससे अधिक कुछ करने की कोई बेबसी नहीं है।
एक बिल्कुल अलग मामले में धमतरी जिले की एक सरकारी स्कूल में 35 बच्चे ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपने कलाई पर किसी नुकीली या धारदार चीज से खरोंच लगाई है, अपने ही बदन को नुकसान पहुंचाया है, कई मामलों में काटने का निशान मिला है। यह जानकारी तो अभी सामने आई है, लेकिन इस मिडिल स्कूल के छात्र-छात्राओं की कलाई पर ये निशान कुछ हफ्तों तक से कुछ महीनों तक के पुराने दिख रहे हैं। इनमें लडक़े-लड़कियां दोनों ही शामिल हैं, और किसी ने घर के तनाव की वजह से ऐसा किया है, किसी ने दिल टूट जाने के कारण। ऐसा लगता है कि एक-दूसरे के देखादेखी इन बच्चों ने अपने को नुकसान पहुंचाने का यह तरीका निकाला है। इसे लेकर अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं, और बच्चों से और उनके मां-बाप से बात करने के लिए किसी परामर्शदाता को गांव भेजा भी गया है। यह मामला खुदकुशी तक नहीं पहुंचा है, लेकिन कुछ कम दर्जे का आत्मघाती मामला तो है ही, अपने को नुकसान पहुंचाने का।
हम किसी भी खुदकुशी को उस व्यक्ति की असफलता के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक दायरों की असफलता भी मानते हैं जिन्होंने वक्त रहते अपने बीच के सदस्यों की निराशा को नहीं भांपा, और वे खुदकुशी कर बैठे। अधिकतर मामलों में यह होता है कि खुदकुशी की कगार पर पहुंचने के पहले लोगों के बर्ताव से आसपास के लोगों को यह अहसास हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। लोग चाहें तो अपने बीच के व्यक्ति को संभाल सकते हैं, और कोई ठोस मदद न सही, कम से कम दिलासा दिला सकते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगा सकते हैं। जब लोगों के मन में जिंदगी छोड़ देने का ख्याल आता है, तब वे ऐसी अस्थिर मानसिक स्थिति में रहते हैं कि वे निराशा जरा सी और बढऩे पर कगार के बाहर कदम बढ़ा सकते हैं, और हौसला थोड़ा सा मिल जाए, तो वे उस कगार से वापिस भी लौट सकते हैं। इम्तिहानों के दिनों में कई नेता, कहीं-कहीं पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए सामान्य अपील जारी करते हैं, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया और मोबाइल सरीखे उपकरणों की मेहरबानी से लोगों को सिर्फ सबसे अधिक आकर्षक, सनसनीखेज, या उत्तेजक सामग्री ही बांध पाती है, और ऐसे में नसीहत की बातें उन पर अधिक असर नहीं करती, सच तो यह है कि उनका ध्यान तक नहीं खींचती।
कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में दिए गए फैसले बलात्कार में लडक़ी या महिला की अलग-अलग स्थितियां तय करते हैं। इन दोनों की आपस में तुलना करने की कोई वजह नहीं है, दोनों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन भारतीय कानून में महिलाओं की स्थिति, और भारतीय हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के नजरिए को लेकर इन दोनों की एक तुलना करना जरूरी भी है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन बरस कर दिया, क्योंकि हाईकोर्ट जज का यह मानना था कि किसी महिला की योनि पर अगर आरोपी ने अपना गुप्तांग टिकाया था, और वहीं उसका स्खलन हुआ, तो जब तक उसने योनि के भीतर प्रवेश नहीं किया था, तब तक वह बलात्कार नहीं, सिर्फ बलात्कार का प्रयास कहलाएगा। यह पूरी बात सुनने में बड़ी अप्रिय लगती है, लेकिन सेक्स अपराधों के मामले में इस चर्चा से इसलिए नहीं बचा जा सकता कि ऐसे बारीक तकनीकी फर्क से कानून के नजर में जुर्म बदल जाता है। हाईकोर्ट ने इस तकनीकी फर्क के आधार पर मौजूदा कानून के तहत इसे बलात्कार की कोशिश ही माना, और उस आधार पर ही सजा सुनाई, ट्रॉयल कोर्ट की दी गई सजा घटाकर आधी कर दी।
एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए गए उस विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक नाबालिग लडक़ी को सीना पकडक़र, उसका नाड़ा खींचा गया था, उसे पुल के नीचे ले जाया गया था, और हाईकोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास मानने से भी इंकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। हमने पिछले बरस के इस फैसले के तुरंत बाद इसी जगह यह लिखा था कि जज का यह तर्क सही नहीं है कि उस नाबालिग लडक़ी का सीना भींचना, और उसका नाड़ा खोलने या तोडऩे की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं है। इसके खिलाफ हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर जमकर कहा था, और सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस फैसले को तुरंत खारिज करे। इसे खारिज करने में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 11 महीने लगा दिए, और सर्वोच्च अदालत को जो संवेदनशीलता दिखानी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा का नाम तब से हमारे दिमाग में घूम ही रहा था कि कैसे कोई जज इतना संवेदनाशून्य हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। हमने इस पर पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक-सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरुषवादी, महिलाविरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरियों तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो जज सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। हम जजों से यह उम्मीद तो नहीं करते कि वे पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से, धर्म या जाति के मामलों से पूर्वाग्रह की वजह से ही अलग रखना चाहिए।
जब-जब हमारी कही कोई बात सुप्रीम कोर्ट में जायज करार दी जाती है, तो थोड़ी तसल्ली होती है कि प्राकृतिक न्याय पर आधारित हमारी सीमित समझ सही साबित हुई है। इससे भी अधिक तसल्ली यह होती है कि भारतीय समाज में जो तबके सबसे कमजोर हैं, उन तबकों के साथ, उनमें से कम से कम किसी एक तबके के साथ यह थोड़ी हमदर्दी की बात हुई है। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले में नफरती-बयान की याचिका पर जो रूख दिखाया है, वह एकदम ही निराश करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले, रिटायर हो चुके जजों ने हेट-स्पीच के मामले में जो साफ-साफ फैसले दिए थे, और पूरे देश के प्रशासन पर एफआईआर दर्ज करने की जो जिम्मेदारी डाली थी, आज के चीफ जस्टिस खुद ही हाल के बरसों के उस फैसले को अनदेखा करते हुए दिख रहे हैं। खैर, आज लड़कियों और महिलाओं के हक, उनकी गरिमा, उनके साथ इंसाफ की चर्चा में हम नफरती-बयानों के मुद्दे को जोडक़र सब कुछ बहुत जटिल करना नहीं चाहते, इसलिए उस पर अलग से।
छत्तीसगढ़ में अभी सरगुजा के एक बाल सुधारगृह में गंभीर अपराधों में बंद किए गए 13 नाबालिग फरार हो गए। उनमें से 4 पकड़ा गए हैं, लेकिन 9 को कई जिलों में ढूंढा जा रहा है। समाचार बताता है कि वे गार्ड को बंधक बनाकर, उन पर हमला करके, दीवाल से छलांग लगाकर भाग निकले। इन नाबालिगों पर कुछ सबसे गंभीर अपराधों के मामले किशोर न्यायालय में चल रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है कि इस राज्य के बाल सुधारगृह में हिंसा करके वहां बंदी बनाए गए किशोर फरार हुए हों, लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तो दुर्ग के एक बाल सुधारगृह की छत पर चढ़ गए लडक़े रसोई गैस सिलेंडर को पुलिस पर फेंकने के लिए उठाकर खड़े थे, और दिल दहलाने वाली उनकी वैसी तस्वीरें सामने आई थीं। देश का कानून नाबालिगों को मुजरिम नहीं मानता है, उन्हें कानून से टकरा रहे नाबालिग ही मानता है। सुप्रीम कोर्ट में एक बहस यह भी चल रही है कि बहुत भयानक जुर्म में शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर सजा नहीं दी जानी चाहिए? इस मामले में मानवाधिकारवादी लोगों का कहना है कि नाबालिगों के साथ अलग सुलूक होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ निर्भया जैसे भयानक सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल एक नाबालिग ने निर्भया की देह के साथ जैसे जुल्म किए थे, उसे देखते हुए लोगों को यह भी लगता है कि कई किस्म के जुर्म उम्रसीमा से परे मान लेने चाहिए।
हम बाल सुधारगृह के नाम पर ही आते हैं। इसे सुधार माना गया है। लेकिन वहां का जो हाल रहता है, क्या उसमें सचमुच ही किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश रहती है? एक तो जो नाबालिग वहां पहुंचते हैं, उनमें से बहुत सारे लगातार जुर्म के बीच बरसों से जीते हुए रहते हैं। वे नशा सीख चुके रहते हैं, दूसरे बालिग मुजरिमों के मातहत और उनके साथ काम करते हुए वे जुर्म की दुनिया का हिस्सा बन चुके रहते हैं। किसी मामले में पकड़ में आने के बाद जब उन्हें बाल सुधारगृह भेजा जाता है, तब तक वे अपराधों में रम चुके रहते हैं। बहुत ही कम नाबालिग ऐसे रहते होंगे जो अपनी पहली चूक या पहली गलती, पहले गलत काम के साथ ही पकड़ाए जाते हों, और बाल सुधारगृह भेज दिए गए हों। फिर सरकार के दूसरे किसी भी इंतजाम की तरह बाल सुधारगृह में नाबालिगों के भीतर के भी अलग-अलग उम्र सीमा के सभी तरह के बच्चे वहां रहते हैं, और जैसा कि बालिगों की जेल में होता है, जो अधिक बड़े मुजरिम रहते हैं, उन्हीं का राज चलता है। बाल सुधारगृह में भी अधिक बड़े जुर्म में पकडक़र भेजे गए लडक़ों का दबदबा रहता है, और यह बात तो बहुत आम है कि देश की सबसे सुरक्षित जेलों में भी मोबाइल भी पहुंच जाते हैं, नशा भी पहुंच जाता है। यह मानना भी फिजूल होगा कि नशे के आदी हो चुके नाबालिग सुधारगृह में नशे का जुगाड़ करने की कोशिश नहीं करते होंगे। सरकारों की सारी व्यवस्था जितनी भ्रष्ट रहती है, उसमें ऐसा इंतजाम बहुत मुश्किल भी नहीं रहता होगा। बाल सुधारगृह तो जेलों जैसी बहुत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था वाले भी नहीं रहते, हथकड़ी, बेड़ी, सलाखों की कोठरियां उनमें नहीं रहतीं, और ऐसे में अधिक बड़े जुर्म वाले, अधिक अराजक हो चुके लडक़ों का वहां अधिक दबदबा स्वाभाविक ही लगता है।
जब देश का कानून नाबालिगों को एक अलग दर्जा देता है, और किसी जुर्म में उनके शामिल होने पर भी न उन्हें मुजरिम कहता, न उन्हें दी जाने वाली सजा को कैद कहता, और सब कुछ सुधार के नजरिए से किया जाता है। ऐसे में सच तो यह है कि सरकारों को सुधारगृहों को सचमुच ही सुधार के लायक बनाना होगा, वरना नाबालिगों को वहां रखकर उन्हें जुर्म से अधिक वाकिफ करके ही छोड़ा जा रहा है। बड़े या बालिग कैदियों की जेलों में भी यही होता है, जिनको वहां बंद रखा जाता है, वे और अधिक बड़े, और अधिक कड़े मुजरिम बनकर निकल सकते हैं। अब बच्चों के, नाबालिगों के सुधारगृह में भी अगर माहौल वैसा ही है, तो फिर सरकारें अपनी न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी भी पूरी करते नहीं दिखती हैं। यह बात भी समझना चाहिए कि बड़े लोगों की जेलों में पहुंचे हुए लोग जिंदगी का अधिक बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद वहां पहुंचते हैं, और वहां पर वे अपने जुर्म के अनुपात में ही लंबे बरसों के लिए कैद रहते हैं। दूसरी तरफ बाल सुधारगृह में पहुंचे हुए नाबालिगों की उम्र बहुत बाकी रहती है, उन्हें सुधारगृह में बंद रखने का वक्त भी बड़ा कम रहता है, और अगर वे जुर्म में मंजकर बाहर निकलते हैं, तो वे समाज में लंबे समय के लिए एक खतरा रहते हैं। इसलिए सरकार को समाज की व्यापक हिफाजत और भलाई के लिए कानून से टकरा रहे बच्चों के लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए। हम किसी रहस्य की बात नहीं कर रहे हैं, पूरी दुनिया का यही तजुर्बा है कि अगर वहां बच्चों को ठीक से नहीं रखा गया, तो भविष्य बहुत लंबे वक्त के लिए बर्बाद होता है, उन बच्चों का भी, और पूरे समाज का भी।


