संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : संसदीय रजत जयंती, और नक्सल मोर्चे पर कामयाबी
सुनील कुमार ने लिखा है
18-Nov-2025 4:51 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : संसदीय रजत जयंती, और नक्सल मोर्चे पर कामयाबी

छत्तीसगढ़ के बस्तर में अनगिनत नक्सल हमलों के पीछे जिम्मेदार रहा एक बड़ा नक्सल नेता हिड़मा आज सुबह आंध्रप्रदेश में एक पुलिस मुठभेड़ में अपनी बीवी और कुछ दूसरे नक्सल साथियों के साथ मारा गया। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि वह दो दर्जन से अधिक हमलों के पीछे था, और आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, और तेलंगाना की सरहदों पर वह लगातार सक्रिय रहता था। आंध्र पुलिस ने इस मुठभेड़ के बाद प्रेस को बताया कि छत्तीसगढ़ पुलिस के दबाव के चलते नक्सली आंध्र में भीतर तक आए थे, और आंध्र पुलिस निगरानी रख रही थी। माड़वी हिड़मा नाम के इस नक्सल नेता पर 50 लाख रूपए का ईनाम था, वह नक्सल सेंट्रल कमेटी का शायद नौजवान सदस्य था, और इस कमेटी में बस्तर इलाके का अकेला आदिवासी भी। वह बस्तर के सुकमा में ही पैदा हुआ था, और अभी हफ्ते भर पहले ही छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री, और गृहमंत्री विजय शर्मा उसके गांव होकर आए थे, जहां उन्होंने हिड़मा की माँ और गांव के दूसरे लोगों के साथ खाना खाया था, और हिड़मा की माँ से अपील की थी कि वह अपने बेटे को पुनर्वास के लिए कहे। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि बीते कुछ महीनों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने बड़े-बड़े नक्सल नेताओं सहित उनके हथियारबंद साथियों के हिंसा छोडऩे को आत्मसमर्पण कहना छोड़ दिया है, और अब इसे हथियार डालना कहा जा रहा है। हाल ही में ऐसे नक्सल नेताओं ने यह भी कहा कि आदिवासी हक के लिए उनकी लड़ाई अब बिना हथियारों के चलती रहेगी। यह सरकार के हिस्से की एक समझदारी है कि भाषा की जटिलता में उलझे बिना उसने शायद नक्सल नेताओं के आत्मसम्मान के लिए आत्मसमर्पण शब्द छोड़ दिया, और हथियार डालना कहा।

नक्सल मोर्चे से परे आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा का एक विशेष सत्र चल रहा है जो कि इस सदन का रजत जयंती वर्ष समारोह भी है, और विधानसभा के मौजूदा भवन को बिदाई भी है। आज के इस सत्र के बाद विधानसभा का अगला सत्र नया रायपुर के नए भवन में होगा, और 25 बरस तक संसदीय कार्य के बाद अब विधायक इस भवन का धन्यवाद करते हुए आज यहां से आखिरी बार रवाना होंगे। भारत और मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ का मजबूत संसदीय इतिहास रहा है, और आज नक्सल मोर्चे पर सुरक्षाबलों की एक और कामयाबी के बाद इन दो बातों को जोडक़र देखने की जरूरत लग रही है। जैसा कि किसी भी देश की संसदीय व्यवस्था रहती है, वह जनता के हित के लिए काम करती है, या कम से कम उससे यह उम्मीद तो की ही जाती है। दूसरी तरफ बस्तर जैसे नक्सल इलाके में नक्सली भी अपने आपको आदिवासी जनता के हित के लिए लडऩे वाला कहते आए हैं, और उनके घोषित एजेंडा को देखें, तो उसमें कई बातें सचमुच ही आदिवासी हितों की दिखती हैं। नक्सलवाद के साथ दिक्कत यह है कि वह जनता के हक लोकतंत्र में मिलना मुमकिन नहीं मानता, और इसीलिए वह हथियारों के दम पर हक की यह लड़ाई लड़ता है। लोकतंत्र में चाहे मुद्दा कितना ही जायज क्यों न हो, उसके लिए हथियारबंद लड़ाई का हक किसी को नहीं मिलता। जिन लोगों को लगता है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था आदिवासियों को उनका हक नहीं दे पा रही है, तो उन्हें देश के कुछ दूसरे तबकों को देखना होगा जिन्हें लगता है कि यह व्यवस्था अल्पसंख्यकों को, दलितों को, महिलाओं को, गरीबों को उनका हक नहीं दिला पा रही है। अब हक नहीं मिल रहा, इसलिए हथियार उठा लेना, यह लोकतंत्र में कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए छत्तीसगढ़ की मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदा भाजपा सरकार ने जब एक तरफ नक्सलियों को खत्म करने की ऐतिहासिक कामयाबी वाली मुहिम छेड़ी, तो दूसरी तरफ उसने पुनर्वास के लिए नक्सलियों का हौसला बढ़ाया, उनसे अपील की। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी लगातार नक्सलियों से मूलधारा में लौटने की अपील की, और यह तक कहा कि अगर वे बिना हथियारों और हिंसा के अपनी विचारधारा पर कायम रहते हैं, तो उससे सरकार को कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में हर विचारधारा के सहअस्तित्व की गुंजाइश है। इस तरह केन्द्र और राज्य के इस लचीले रूख से नक्सल मोर्चे पर वह कामयाबी मिली जो कि देश के किसी भी दूसरे राज्य में नहीं मिली थी, और छत्तीसगढ़ में तो इन दो बरसों के पहले किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी।

आज छत्तीसगढ़ की संसदीय रजत जयंती के मौके पर अगर हिड़मा और उनके साथी हथियार डालकर लोकतंत्र की मूलधारा में लौटते, और हथियारविहीन संघर्ष जारी रखते, तो बेहतर होता। लेकिन जब कोई भी विचारधारा या आंदोलन हथियारबंद होकर, लगातार हिंसा करते हुए सक्रिय रहे, तो ऐसे लोकतंत्र में सरकारों के पास उन्हें काबू में करने, या मजबूरी हो जाने पर खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हिड़मा उन नक्सल हमलावर दलों का मुखिया रहा है जिसने दर्जनों लोगों को मारा था। सरकार के बार-बार के प्रस्ताव के बाद भी वह उन नक्सल नेताओं में था जो हथियार डालने तैयार नहीं थे। इसलिए हथियारबंद संघर्ष के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। छत्तीसगढ़ और बस्तर के सरहदी राज्यों में नक्सली सरहद के आरपार आते-जाते रहते हैं, और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के साथ मिलकर इन राज्यों की पुलिस कार्रवाई करती रहती है। आज सुबह आंध्र की इस कार्रवाई में इस पति-पत्नी जोड़े के अलावा भी चार और लोगों के मारे जाने की खबर है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के सामने जितने बार प्रस्ताव रखे, उनके पुनर्वास की जो नीतियां बनाई, उनके हथियार सहित आने के बाद उन्हें जितने तरह के नगद फायदे दिए गए, वे हथियार छोडऩे के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन थे। अब कोई हथियारबंद आंदोलन अगर अपनी विचारधारा को लेकर लड़ते-लड़ते ही खत्म होना चाहता है, तो भारत जैसे विशाल देश और उसके प्रदेशों की सरकारों की ताकत के सामने किसी भी क्षेत्रीय सशस्त्र आंदोलन के जिंदा रहने की अधिक संभावना तो रहती नहीं है। बस्तर एक वक्त बहुत शांत इलाका था, और वहां पर सरकारी और राजनीतिक शोषण की पराकाष्ठा की वजह से नक्सलियों को पांव जमाने का मौका मिला था। अब आज नक्सलियों के पांव उखडऩे के बाद यह सरकार की जिम्मेदारी है कि बस्तर जैसे सीधे-सरल आदिवासी इलाके में सरकारी और राजनीतिक शोषण फिर काबिज न हो जाए। जिस तरह नक्सलियों से सरकार हथियार डालने की उम्मीद करती है, उसी तरह बस्तर के जंगलों में बसे हुए सीधे-सरल आदिवासी भी बिना शोषण और भ्रष्टाचार के विकास में अपनी हिस्सेदारी की उम्मीद करते हैं। रजत जयंती मना रही छत्तीसगढ़ की संसदीय व्यवस्था के कंधों पर यह जिम्मेदारी है कि वह बस्तर को शोषणमुक्त बनाए, और भ्रष्टाचारमुक्त रखे।

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