संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : यूपी का पुलिस-मुजरिम माफिया कई सवाल खड़े करता है सीएम योगी पर
सुनील कुमार ने लिखा है
08-Nov-2025 6:53 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : यूपी का पुलिस-मुजरिम माफिया कई सवाल खड़े करता है सीएम योगी पर

उत्तरप्रदेश में अभी प्रमोशन से डीएसपी बना एक पुलिस अधिकारी ऋषिकांत शुक्ला पकड़ाया, जिसने पिछले दस बरस में सौ करोड़ से अधिक की दौलत जुटा ली है। खुद यूपी पुलिस की जांच रिपोर्ट में इतनी दौलत का हिसाब-किताब अभी तक मिला है, और इसके अलावा कुछ दूसरी जमीन-जायदाद का भी पता लगा है। इस अफसर पर नजर तब पड़ी, जब कानपुर में एक बड़े चर्चित माफियानुमा वकील अखिलेश दुबे को एक पूरा गिरोह चलाने के जुर्म में अभी कुछ समय पहले ही गिरफ्तार किया गया, क्योंकि यह पता लगा था कि इस वकील ने कई पुलिस अफसरों के साथ मिलकर जुर्म का एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था, और लोगों को फर्जी मुकदमे दर्ज करने की धमकी देकर जबरन वसूली करना, उनकी जमीन-जायदाद पर कब्जा करना, बड़े पैमाने पर किया जा रहा था। इस वकील के जुर्म की लिस्ट इतनी लंबी है कि यह कई पुलिसवालों को साथ रखकर लोगों को पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी देता था, और वसूली-उगाही करता था। ऐसी रंगदारी और ब्लैकमेलिंग में अखिलेश दुबे का साथ देने वाले चार इंस्पेक्टर, और दो दारोगा अब तक निलंबित हो चुके हैं, इनमें इंस्पेक्टर मानवेन्द्र सिंह, इंस्पेक्टर आशीष द्विवेदी, इंस्पेक्टर अमान सिंह, इंस्पेक्टर नीरज ओझा, सबइंस्पेक्टर सनोज पटेल, और सबइंस्पेक्टर आदेश यादव हैं।

उत्तरप्रदेश को अभी हाल में ही भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक इंटरव्यू में देश में सबसे अच्छी कानूनी व्यवस्था वाला प्रदेश कहा था। यहां पर 2017 से लगातार भाजपा के योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं, और वे भाजपा के भीतर भी एक स्वायत्तशासी नेता की तरह काम करते हैं। वे एक बहुत कडक़ मिजाज प्रशासक के अंदाज में बातें करते हैं, और जुर्म के आरोप झेलने वाले लोगों की मुठभेड़-हत्या, या मुठभेड़ में उन्हें जख्मी करना, ऐसे आरोप उत्तरप्रदेश में बड़े आम हैं। उत्तरप्रदेश से ही बुलडोजर इंसाफ शुरू हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट कई बार उत्तरप्रदेश पुलिस के तौर-तरीकों पर नाराजगी जाहिर कर चुका है। ऐसे शासन वाले प्रदेश में अगर प्रदेश के एक सबसे बड़े शहर में वकील और दर्जनों पुलिसवालों का इतना संगठित माफिया अंदाज का गिरोह चल रहा है, और सैकड़ों बेकसूर लोगों को लुटा जा रहा है, तो वह इतने बरस तक सरकार की नजरों से बचा रहे यह मुमकिन नहीं लगता। यह भी मुमकिन नहीं लगता कि ऐसे परले दर्जे के मुजरिम पुलिस अधिकारी सरकार में लगातार कमाऊ जगहों पर तैनात होते रहें, और सरकार को उसकी खबर न हो। खबरें बताती हैं कि पुलिस महकमा दुबे-सिंडीकेट नाम के इस माफिया गिरोह को भीतरी जानकारी देते रहता था, और अखिलेश दुबे उनके आधार पर लोगों से भारी वसूली-उगाही की साजिश बनाते रहता था। न सिर्फ यूपी, बल्कि किसी भी प्रदेश में पुलिस के ऐसे संगठित जुर्म सत्ता की नजरों से छुप नहीं सकते हैं।

अब हम कुछ देर के लिए यूपी की मिसाल छोडक़र पूरे देश की बात करें, तो आज बहुत से ऐसे प्रदेश हैं जहां पर पुलिस सत्ता की मनमर्जी, मनमानी, और उसके गैरकानूनी कामों को ही अपनी ड्यूटी मानती है। पुलिस के हाथ झूठे जुर्म दर्ज करने की जो असीमित ताकत रहती है, वह उसे उगाही का एक बड़ा जरिया बना देती है। बहुत से प्रदेशों में नेता इसी उगाही-तंत्र का इस्तेमाल करके अपनी राजनीति करते हैं, स्थाई और नियमित रूप से करोड़ों रूपए कमाते हैं, और अपने मुजरिम साथियों को बचाते भी हैं। आज सिर्फ जुर्म की कमाई वाले मुजरिम नहीं हैं, आज जाति और धर्म के नाम पर, साम्प्रदायिकता और नफरत के नाम पर रात-दिन जुर्म होते हैं, और ऐसे मुजरिमों को बचाना कई जगहों पर सत्ता पर काबिज उनके संरक्षकों की प्राथमिकता होती है। भारत के अधिकतर प्रदेशों में पुलिस का इस हद तक राजनीतिकरण हो चुका है कि इस राजनीतिक पसंद वाले मुजरिमों के माध्यम से कई पुलिसवाले कमाऊ कुर्सी तक पहुंचते हैं। मुजरिम ही अपने इलाकों में जब अपनी पसंद के पुलिस अफसर ले जाते हैं, तो जुर्म का और अधिक संगठित हो जाना महज वक्त की बात रहती है। उत्तरप्रदेश में जिस तरह के नाम बड़े-बड़े संगठित जुर्म के सिलसिले में सामने आते हैं, वे हैरान करते हैं। अपने आपको धर्म का सबसे बड़ा केन्द्र बताने वाला यह प्रदेश धर्म से सबसे गहराई से जुड़ी हुई जाति के पुलिस अफसरों और माफिया-सरगनाओं के जुर्म का केन्द्र बन गया है, वह सरकार से परे भी समाज की फिक्र की बात भी है।

देश में एक ऐसे निगरानी तंत्र की जरूरत है जो कि केन्द्र और राज्यों की सहमति से चले, लेकिन जहां पर राज्य सरकारें जुर्म में भागीदार दिखें, वहां पर केन्द्र सरकार को सीधे कार्रवाई करने का मौका भी मिले। आज भी आयकर, ईडी, एनआईए जैसी कुछ एजेंसियां हैं जो कि राज्य सरकार की पहल, सहमति, या अनुमति के बिना भी कार्रवाई कर सकती हैं। हमारा मानना है कि जहां कहीं इतना कालाधन दिखता है कि आयकर विभाग उस पर कार्रवाई कर सके, वहां पर केन्द्र सररकार को सीधे कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि हर राज्य में बहुत से संगठित अपराधों से उस राज्य के सत्तारूढ़ नेताओं का बड़ा गहरा भाईचारा रहता है। अगर अघोषित संपत्ति कहीं भी एक अनुपात से अधिक है, तो वह आयकर के दायरे में आती है। जब सरकारी कर्मचारी पूरी नौकरी इसी अंदाज में कमाते हैं, और एक-एक के पास से करोड़ों के नगद नोट मिलते हैं, किलो के हिसाब से सोना-चांदी बरामद होते हैं, और दसियों करोड़ की दौलत मिलती है, तो इन पर कार्रवाई के लिए केन्द्र को राज्य पर मोहताज होने की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। फिर चाहे केन्द सरकार अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते सिर्फ विपक्षी पार्टियों के राज्यों में कार्रवाई क्यों न करे, कार्रवाई होगी तो किसी न किसी भ्रष्ट पर ही होगी। अधिक से अधिक यह हो सकता है कि केन्द्र सरकार की पसंदीदा सरकारें, और उन सरकारों के पसंदीदा लोग कार्रवाई से बच सकते हैं, लेकिन कोई केन्द्रीय एजेंसी किसी ईमानदार पर कार्रवाई करे, ऐसा तो अमूमन नहीं होता है।

इस ताजा जुर्म के कारोबार के पकड़ाने के पहले भी उत्तरप्रदेश में योगी सरकार के चलते-चलते कई और तरह के संगठित अपराध पकड़ाए हैं, लेकिन आठ बरस से योगी के सीएम रहते हुए, अभी तक ये गिरोह अगर खुलकर मैदान में हैं, तो इससे योगी की स्वघोषित साख चौपट होती है। हम किसी एक पार्टी के खिलाफ लिखने के लिए यह चर्चा नहीं कर रहे हैं, जितनी भी पार्टियां हैं, उन्हें अपनी-अपनी सरकारों के राज में चल रहे कुकर्मों के बारे में भी सोचना चाहिए। कई जगहों पर जुर्म से थके हुए लोग भी सत्ता पलट सकते हैं। चूंकि नेताओं के पास पुलिस-मुजरिम पार्टनरशिप फर्म से मोटी और संगठित, नियमित कमाई का एक जरिया रहता है, इसलिए ऐसे गिरोह उन्हें खटकते नहीं हैं। लेकिन जनता को भी चाहिए कि चुनाव में ऐसे गिरोह के आकाओं को खारिज करे। 

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