संपादकीय
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से अभी कुछ दिन पहले कुछ वीडियो, फोटो, और कुछ बातें निकलीं, और वे चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गईं। एक धुंधली सी फोटो में आसमान पर कोई छोटा विमान उड़ते दिख रहा था, नीचे पहाड़ी थी, या जंगल था। उसके बाद दूसरी फोटो या वीडियो में विमान गायब था, और नीचे से उठता हुआ धुआं दिख रहा था। इन दोनों को जोडक़र लोगों ने तुरंत ही प्लेन गिरने की खबर बना ली, वेबसाइटों और टीवी चैनलों पर खबर चलने लगी। जशपुर में पुलिस और प्रशासन के फोन की घंटी बजना ही बंद नहीं हो रहा था। दूसरी तरफ प्रशासन को यह जानकारी थी कि जंगल में सुबह आग लगी थी, अधिकारी-कर्मचारी जाकर उसे बुझाकर आए थे। बाद में जाकर यह पता लगा कि जबलपुर से किसी तरह के एक सर्वे के लिए एक छोटा विमान उड़ा था, और वह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए इस इलाके में भी आया था, और लौट गया था। वीडियो, तस्वीर, और विमान की एक झलक, इन सबको जोड़-जोडक़र लोगों ने प्लेन गिरने का अंदाज लगाया, और उसे पोस्ट करना शुरू कर दिया। बात दिन की थी, इसलिए उस वक्त अखबार नहीं छप रहे थे, और सिर्फ वेबसाइटों, और टीवी चैनलों पर खबर छाई हुई थी। उसी दिन शाम तक यह साफ हो गया था कि कोई प्लेन नहीं गिरा है, लेकिन बहुत से समाचार माध्यमों ने एआई की मेहरबानी से प्लेन के मलबे की तस्वीरें दिखा दीं, और मुम्बई के एक बड़े नामी-गिरामी अंग्रेजी अखबार ने अपनी वेबसाइट पर अगले दिन तक यह समाचार दिखाना जारी रखा कि एक निजी विमान गिर गया है, उसके पायलट और को-पायलट दोनों मर गए हैं, और जिला कलेक्टर और एसपी विमान के मलबे के पास खड़े देख रहे हैं कि कोई और जिंदा है क्या।
पुराने वक्त से एक बात कही जाती है कि अगर धुआं है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। लेकिन अब इसे बदलकर यह करने की जरूरत है कि अगर धुआं है, तो नीचे प्लेन भी गिरा हो सकता है। या यह भी किया जा सकता है कि मीडिया अगर प्लेन क्रैश में लोगों के मरने की खबर दिखा रहा है, तो वह सूखे पत्तों के जलने से उठता हुआ धुआं भी हो सकता है। मीडिया ने इतना भी परखने की जहमत नहीं उठाई कि जशपुर के चारों ओर जो सबसे करीब के एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर हैं, क्या उनसे कोई खबर निकली है कि उनके इलाके का कोई विमान संपर्क से बाहर हो गया है? चारों तरफ यह खबर खूब फैली, हमारे अखबार में भी वेबसाइट पर यह खबर तुरंत डाली गई, क्योंकि कई बहुत भरोसेमंद पत्रकारों ने फोटो-वीडियो के साथ यह ‘खबर’ पोस्ट की थी। कुछ घंटों के भीतर गुब्बारे की हवा निकल गई, और एक-एक करके वेबसाइटों ने समाचार हटाना या बदलना शुरू कर दिया। यह तो गनीमत है कि यह मामला पाकिस्तान की सरहद के करीब का नहीं था, वरना कुछ लोग इसे पाकिस्तान की तरफ से आया हुआ हवाई हमला, या कोई ड्रोन हमला करार दे देते।
ऐसा लगता है कि प्रिंट मीडिया अपने जिम्मेदार इतिहास को भूलकर पहले तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की देखादेखी पल भर में खबर दिखाने के मुकाबले में उतर आया था, और अब बाद में समाचार वेबसाइटों की वजह से यह मुकाबला और कुछ मील आगे निकल गया है। अब जिस सहूलियत से पल भर में गलत समाचार को मिटा देने की सुविधा हासिल हो गई है, उसके चलते अब झूठ या गलत पोस्ट करने से भी कोई परहेज रह नहीं गया है। जो लोग अधिक सावधानी बरतते हैं, और अपनी साख की फिक्र करते हैं, वे लोग भी वेबसाइट से समाचार पूरी तरह नहीं मिटाते, और बल्कि उसकी हैडिंग, और फोटो बदल देते हैं, जानकारी भी बदल देते हैं, और सच और झूठ की, सही और गलत की बात आई-गई हो जाती है। चूंकि सोशल मीडिया ने भी डिजिटल मीडिया के साथ मिलकर माहौल को गैरजिम्मेदार बनाने का बड़ा काम किया है, इसलिए अब किसी खबर के गलत साबित हो जाने के बाद भी कई दिन तक सोशल मीडिया अपने झूठ पर अड़े रहता है। प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रॉनिक से डिजिटल, और डिजिटल से सोशल मीडिया तक का यह सफर बड़ा लंबा रहा, और इसके हर दो-चार किलोमीटर पर जिम्मेदारी का अवांछित बोझ घटते चले गया, लोगों को सनसनी की एक बड़ी ताकत मिलती चली गई। प्रिंट के दिनों में किसी बात को ठोक बजाकर लिखने की जो आदत थी, उससे लोगों ने बदन की किसी अवांछित गठान की तरह छुटकारा पा लिया। अखबार छपने जाने के पहले कुछ घंटे का समय मिलता था, जिसमें जांच-पड़ताल हो जाती थी। फिर एक बार अखबार छप जाए तो कुछ भी बदलना मुमकिन नहीं होता था, इसलिए अखबारनवीसों के दिल-दिमाग पर जिम्मेदारी का बड़ा बोझ रहता था। टीवी चैनलों के समाचार बुलेटिन आकर चले जाते हैं, और अगले घंटे के बुलेटिन में गलत खबरों को हटा देने की सुविधा रहती है, इसलिए अखबारों वाली सावधानी की आदत खत्म हो गई। अब आज के डिजिटल और वेबसाइट वाले जमाने में सब कुछ मिटा देना आसान है, और किसी सावधानी की जरूरत नहीं रह गई है।
कर्नाटक में कूर्ग का इलाका बड़ा खूबसूरत माना जाता है, और वहां पर्यटक भी बहुत पहुंचते हैं। राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, और पर्यटकों को भारतीय जनजीवन की बेहतर झलक दिखाने के लिए घरों में पर्यटकों के ठहरने का एक नया कार्यक्रम शुरू किया है। देश के कई और पर्यटन केन्द्रों पर ऐसा पहले से भी चल रहा है, और कई विदेशी सैलानी कमखर्च में भारत देखने के लिए, यहां का पारिवारिक जीवन देखने के लिए भी परिवारों में रूकते हैं। कर्नाटक में अभी ऐसे ही एक होम-स्टे में रूकी हुई एक अमरीकी पर्यटक महिला को उसी जगह काम करने वाले एक कर्मचारी ने किसी ड्रिंक में नशा घोलकर पिला दिया, और फिर उसके साथ बलात्कार किया। इसके सुबूत मिटाने, और महिला शिकायत न कर सके इसलिए वाईफाई बंद कर देने का काम भी किया गया। बाद में किसी तरह इस महिला ने बाहर निकलकर अमरीकी दूतावास को खबर की, और इस घर के मालिक-नौकर को गिरफ्तार किया गया। कुछ और लापरवाहियां भी सामने आई हैं कि कर्नाटक में इस घर ने अपने को पर्यटकों को ठहराने के लिए रजिस्टर भी नहीं करवाया था।
दूसरे देशों से भारत आने वाले लोगों से इस देश का करोड़ों लोगों का जीवन चलता है। एक अंदाज यह है कि पर्यटन से सीधे, और किसी और तरह से करीब साढ़े 8 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। भारत की जीडीपी में इस सेक्टर का योगदान करीब सवा 5 फीसदी है। ऐसी एक-एक घटना न केवल उस पर्यटक के अपने देश में, बल्कि भारत आने की सोच रहे और तमाम लोगों के बीच भी हौसला पस्त करती है। अलग-अलग कुछ प्रमुख देश अपने नागरिकों के लिए समय-समय पर ऐसी चेतावनी जारी करते आए हैं कि भारत अकेली महिला पर्यटक के लिए सुरक्षित नहीं है। अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों ने अपने नागरिकों को यह सलाह दे रखी है जिसमें भारत में विदेशी महिलाओं के साथ होने वाले यौन-अपराधों का जिक्र किया गया है, उन्हें भारत में कहीं भी अकेले न घूमने की सलाह दी गई है, और यह भी कहा गया है कि होटल या होम स्टे में अनजान लोगों से खाने-पीने की चीजें न लें, क्योंकि इनमें नशा मिला होने का खतरा रहता है।
यह देश कहने के लिए अतिथि देवो भव: की परंपरा का दावा करता है, लेकिन हमने विदेशी सैलानियों के साथ सार्वजनिक जगहों पर दिनदहाड़े देसी लोगों द्वारा तरह-तरह की बदसलूकी के कितने ही वीडियो देखे हैं। बदसलूकी से थोड़ा सा कम अगर देखें, तो किसी भी गोरी या विदेशी महिला के आसपास के हिन्दुस्तानी लडक़े और मर्द उसके साथ अपनी सेल्फी खिंचवाना अपना कानूनी हक समझते हैं। इस देश में अपने लोगों के साथ भी बलात्कार एक किस्म से पार्ट टाईम काम हो गया है, ऐसे में विदेशियों के प्रति यहां के लोगों का मोह सिर चढक़र बोलने लगता है। भारत अपने आपमें एक पूरे योरप जितना बड़ा विविधता वाला देश है। इसके कश्मीर का केरल से कोई भी मेल नहीं है, पश्चिम के गुजरात और राजस्थान से उत्तर-पूर्व के राज्यों का कोई मेल नहीं है, इसलिए यहां दुनिया भर के पर्यटक आते हैं क्योंकि एक वीजा से, एक देश के भीतर उन्हें कई देशों को घूमने जैसा फायदा मिल जाता है। भारत का पर्यटन उद्योग बहुत छोटे-छोटे से स्थानीय लोगों को रोजगार देता है, और किसी एक महिला पर्यटक के साथ बलात्कार जैसी घटना शायद दसियों हजार महिला पर्यटकों का भारत आने का इरादा बदल देती होगी।
भारत में चाहे जो सोचकर सरकार होम स्टे की छूट देती है, या उसे बढ़ावा देती है, उससे जुड़े हुए खतरों को न समझना देश के इस बहुत बड़े कारोबार को नुकसान पहुंचाएगा। एक रिपोर्ट बतलाती है कि एक-दो बलात्कारों के बाद ही महिला पर्यटकों के भारत आने में पिछले दो साल में करीब 12 फीसदी की गिरावट आई है। अब लोग छुट्टियां मनाने के लिए भारत की जगह वियतनाम, श्रीलंका, और थाईलैंड को प्राथमिकता दे रहे हैं जो कि पर्यटक सुरक्षा के मामले में भारत से ऊपर माने जाते हैं। भारत में एक औसत विदेशी पर्यटक ढाई-तीन हजार डॉलर खर्च करते हैं, जो कि ढाई-तीन लाख रूपए के बराबर होता है। इसमें होटल, टैक्सी, रेस्त्रां, ढाबे, गाईड, हस्तशिल्पी जैसे दर्जनों अलग-अलग पेशे के करोड़ों लोगों को काम मिलता है। अब एक दिक्कत यह है कि बलात्कार जैसे संगीन जुर्म करने वालों से परे राह चलती विदेशी सैलानी महिला को घेरकर उसके साथ तरह-तरह की छेडख़ानी, और बदसलूकी करने वाले हर शहर में मिल जाते हैं। जिन शहरों में विदेशी सैलानियों का लगातार आना-जाना रहता है, जहां लोग गोरी या किसी और रंग की चमड़ी को देखने के आदी हैं, वहां भी किसी महिला को देखते ही मर्दों के दिल कुलबुलाने लगते हैं। यह सिलसिला भारत की साख को बहुत बुरी तरह चौपट कर रहा है।
हर दिन किसी नए विषय पर लिखने का दबाव बड़ा खराब रहता है। वैसे तो घिसे-पिटे कई विषय ऐसे रहते हैं जिनमें आए दिन कुछ न कुछ नया होता है, और उन पर एक बार फिर लिखना जायज कहा जाएगा। लेकिन उन्हीं-उन्हीं घटनाओं या मुद्दों पर, या उन्हीं लोगों पर लिखने से बात तो बहुत सारी दुहराना हो जाता है। इसलिए हम कोशिश करते हैं कि जैसे ही कोई नया मामला हाथ लगे, उस पर लिखना चाहिए। ऐसे में आज अमिताभ बच्चन की सोशल मीडिया पर एक ताजा पोस्ट दिखी जिसमें उन्होंने लिखा है- इंसान चाहे कुछ भी कर ले, अंत में वो अकेला ही रहता है, और उसे सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा- कि समझदारों के सलाह-मशविरे हमेशा काम आएंगे, लेकिन आखिर में उस काम को अंजाम देने वाले हमेशा ‘आप’ ही होंगे। आप जो महसूस करते हैं, जिस दौर से गुजरते हैं, जिस पर गौर करते हैं, जो दुख सहते हैं, जो लुत्फ उठाते हैं, जो हासिल करते हैं, या जिसका ख्याल करते हैं, वह सब सिर्फ ‘आप’ ही हैं। आप ही सर्वोच्च हैं। अहमियत सिर्फ ‘आपकी’ है, और किसी चीज की नहीं। आप विचारों, यादों, और संभावनाओं का एक पूरा ब्रम्हांड हैं, जो हर नए तजुर्बे के साथ लगातार निखर रहा है। आपके भीतर वो ताकत छिपी है जिस पर अक्सर नजर नहीं जाती, वो लचीलापन है जो आपको मुश्किलों से बाहर निकाल लाता है, और वो जिज्ञासा है जो आपको अनजाने मंजिलों की ओर धकेलती है। आप अपनी पसंद, अपने शब्दों, और अपने कामों से अपनी दुनिया को गढ़ते हैं, और हर मिलने वाले शख्स पर अपनी एक अनकही छाप छोड़ जाते हैं। खुद को समझने के इस सफर में, आप अपने आसपास की दुनिया को और भी साफ तौर पर समझने लगते हैं। याद रखें हर ‘आप’ (इंसान) के भीतर अपनी एक निजी ताकत होती है, यही आपका वो हथियार है जिसे कोई तोड़ नहीं सकते। इसे अपने भीतर सहेजकर रखें, और जब सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब इसे बाहर निकालें। यही आपका सबसे बेहतरीन ढाल और रक्षक बनेगा।
अब अमिताभ बच्चन 83 साल की उम्र में अपने पेशे में देश के सबसे कामयाब व्यक्ति साबित हो चुके हैं, और उनकी समझदारी में भी कोई कमी नहीं दिखती है। वे विवादों से अपने को बहुत हद तक बचाकर चलते हैं, और अपने कामकाजी परिवार में वे अकेले ही सबसे अधिक उम्रदराज होने के बाद भी आज सबसे अधिक व्यस्त रहते हैं, सबसे अधिक कमाते भी हैं। उन्होंने अपनी अधेड़ उम्र में एक कारोबार में इतना लंबा नुकसान झेला था कि जिससे उबर पाना कम ही लोगों के बस का रहता है, लेकिन वे न सिर्फ उबरे, बल्कि वे उसके बाद लगातार ऊंचाईयों के आसमान पर चलते रहे, और आज वे देश के एक सबसे बड़े मनोरंजन-पेशेवर व्यक्ति हैं। कारोबारी घाटे से परे वे एक बार राजनीति में भी हाथ आजमा चुके हैं, और समय रहते वहां से बाहर निकल चुके हैं। उस वक्त देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी से उनका दो पीढ़ी का घरोबा रहा है, और जब यह घरोबा खत्म हुआ, तो वे उसके बिना जीना भी सीख चुके हैं।
अमिताभ बच्चन की लिखी इन बातों में से हम एक निचोड़ निकालकर उस पर आगे बात करना चाहते हैं कि हालात चाहे जो हो, आखिर में बस ‘आप’ ही रह जाते हैं। अमिताभ ने माता-पिता से कोई बहुत मामूली से विरासत पाई हो सकती है, लेकिन वे अपने बच्चों के लिए हजारों करोड़ की एक विरासत खड़ी कर चुके हैं। बहुत अधिक समाजसेवा, और दान पर भरोसे का उनका कोई इतिहास नहीं है, और किसी एक गांव के किसानों के कर्ज पटाने की घटना शायद उनके दान का अकेला सार्वजनिक समाचार रहा है। खैर, यह तो हर व्यक्ति की अपनी पसंद की बात है कि वे समाज के कितने काम आते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन जिस हद तक आत्मकेन्द्रित हैं, उनका पूरा जीवन इसी की एक मिसाल रहा है, और इसलिए उनकी कही यह बात ईमानदार लगती है कि आखिर में इंसान एकदम ही अकेले रह जाते हैं। यह तो ठीक है कि परिवार के लोग, और यार-दोस्त कुछ लोग तो बहुत से लोगों के इर्द-गिर्द रहते हैं, लेकिन जिस तरह मेले में अकेले कहा जाता है, उसी तरह लोगों को अपने आखिरी वक्त के लिए अकेले रहने की तैयारी कर लेनी चाहिए। महज अमिताभ बच्चन नहीं, हम तो बहुत से आम लोगों की जिंदगी की अपनी मिसाल, या उनकी कही हुई कुछ बातों में भी दूसरों के लिए राह ढूंढ लेते हैं, अमिताभ बच्चन तो एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।
अमिताभ की कही हुई बात को याद रखते हुए लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि आखिरी में वो अकेले हो सकते हैं। यह तो ठीक है कि अमिताभ आज बिना दोस्तों के दिखते हैं, परिवार में भी अपनी व्यस्तता के चलते कई बार आधी रात और सुबह के बीच किसी वक्त काम से घर लौटते हैं, और घर के बाकी कम उम्र सदस्य तब तक शायद सो चुके रहते हैं। इसके बावजूद वे, बिना किसी जरूरत के लगातार इतनी मेहनत करते हैं, इतना कमाते हैं, और ऐसी कोई भी मिसाल नहीं है कि वे गंवाते भी हैं। हम अमिताभ बच्चन की राजनीतिक तटस्थता के कायल नहीं हैं, हम कई बार इस बात की आलोचना कर चुके हैं कि दलगत या चुनावी राजनीति से परे भी देश और दुनिया के कई मुद्दों पर चर्चित और मशहूर लोगों को बोलना चाहिए, मुंह खोलना चाहिए, जिससे अमिताभ बच्चन बचते हैं। कोई दस-पन्द्रह बरस पहले पेट्रोल के बढ़ते दाम, या डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती हुई कीमत पर सोशल मीडिया पर लिखकर वे अपने हाथ जला चुके हैं, क्योंकि आज पेट्रोल उस वक्त से दुगुना महंगा हो जाने पर, और रूपये की कीमत आधी रह जाने पर भी उनके होंठ सिले हुए हैं। हम ऐसी तमाम मिसालों में दुनिया भर लोगों के लिए नसीहतें ढूंढते हैं, जो कि आसानी से सतह पर तैरती हुई मिल जाती हैं। अमिताभ ने अपने आपको किसी भी तरह की सार्वजनिक जिम्मेदारी से परे रखा है, और यह बात भी लोगों को अच्छी लगे, या बुरी लगे, उन्होंने इसकी एक मिसाल तो पेश की है कि जिस भोपाल में उनकी ससुराल थी, वहां पर गैस त्रासदी में हजारों लोगों के मर जाने, और लाखों लोगों की सेहत बहुत बुरी तरह बर्बाद हो जाने पर भी उन्होंने कभी मुंह नहीं खोला, शायद मदद का हाथ भी नहीं बढ़ाया। इतना आत्मकेन्द्रित व्यक्ति आखिर में अकेले तो रह ही जाएगा।
छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के बिलासपुर दफ्तर में एक नौजवान की फाइल सालभर से नहीं मिल रही थी। किसी दफ्तर में फाइल न मिलने की भारत में कुछ बड़ी जाहिर सी वजहें रहती हैं, जिन्हें मुंह से बोलकर जाहिर नहीं किया जाता, लेकिन पता सबको रहता है। लोगों को याद होगा कि ऑफिस-ऑफिस जैसे किसी नाम का एक टीवी सीरियल रहता था जिसमें मुसद्दीलाल नाम का एक किरदार था, जो कि सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते दिखता था, और दफ्तरों के लोग उसका मजा लेते रहते थे। वह भारत के आम सरकारी दफ्तरों पर टेलीविजन पर एक सबसे ताकतवर कटाक्ष था। वह सीरियल तो अपनी जिंदगी जीकर खत्म हो गया, लेकिन सरकारी दफ्तर अब तक जारी हैं, और इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में कोई सुनामी भी सरकारी इंतजाम को बहाकर कम नहीं कर सकती।
अब बिलासपुर में इस नौजवान ने सालभर धक्के खाने के बाद आधा किलो बादाम खरीदा, और महिला अधिकारी की मेज पर जाकर उसे बिखेर दिया कि इसे खाने से शायद आपकी याददाश्त तेज हो जाए, और न मिल रही फाइल मिल जाए। दोनों तरफ से इस बादाम के वीडियो बन रहे थे, जिस महिला अधिकारी की मेज पर यह प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया गया, वह भी अपने फोन से इसकी रिकॉर्डिंग करते दिख रही थी। खैर, जब यह वीडियो चारों तरफ फैला, और सरकार की, हाउसिंग बोर्ड की खासी खिल्ली उड़ गई, तो इस महिला अधिकारी को भी हाउसिंग बोर्ड के मुख्यालय अटैच कर दिया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में बरसों तक फाइलों को रोकने का जो आम सिलसिला चलता है, उसके लिए क्या हर सरकारी दफ्तर के बाहर पान-ठेलों पर बादाम के पैकेट भी बेचे जाएं? जिस तरह लोग शंकरजी के मंदिर में धतूरे का फूल लेकर जाते हैं, और नंदी के लिए बेलपत्री, क्या उसी तरह सरकारी दफ्तरों में साहब और बाबुओं की याददाश्त बढ़ाने के लिए बादाम चढ़ाए जाएं? हालांकि कोई भी अधिकारी, या कर्मचारी को चढ़ाए गए बादाम किसी मंदिर में चढ़ाए गए नारियल की तरह घूम-फिरकर उसी ठेले पर फिर आ जाएंगे, और अगले दिन कुछ नए लोग उन्हीं पैकेट को खरीदकर फिर सरकारी कुर्सियों पर चढ़ाएंगे? भारत में दीवाली के समय एक से दूसरे तक सफर करने वाली सोनपपड़ी के डिब्बे की तरह बादाम के पैकेट घूमना क्या ठीक रहेगा? क्या इससे हर सरकारी दफ्तर के बाहर दो-तीन रोजगार पैदा होंगे? क्या सरकारी चढ़ावे के लिए एक अलग किस्म का घटिया, और दीमक खाया हुआ बादाम चलन में आएगा? क्या बादाम के ऐसे इस्तेमाल के लिए चीन से बनकर नकली बादाम भी आने लगेंगे, ऐसे कई तरह के सवाल इस बादाम प्रणाली से उठ खड़े होंगे।
भारतीय सरकारी दफ्तरों में अभी तक एक दूसरी भाषा चलती थी कि किसी अर्जी के ऊपर कुछ वजन रखो, वरना वह कागज उड़ जाता है। हमने अपने बचपन से ही इसी भाषा को सुना है। अब यह बादाम वाली एक नई भाषा है, और यह पता नहीं कितने दिन चल पाएगी, कितने दिन में इस बादाम के देश को लेकर हंगामा होने लगेगा? कब यह कहा जाने लगेगा कि अफगान काबुलीवाला एक वक्त ऐसे बादाम लाकर हिंदुस्तान में बेचता था, और अफगानी बादाम को चढ़ाना ठीक नहीं होगा, अफगानी हाथों से उगाए हुए, तोड़े और तौले हुए बादाम यहां नहीं चलेंगे। हो सकता है कि ऐसी आपत्ति आने में अधिक देर न लगे, और खालिस इसी देश के, कुछ तबकों के उगाए हुए बादाम ही सरकारी दफ्तरों के बाहर बेचने की शर्तें लगाकर लोग डंडे-झंडे लेकर खड़े हो जाएंगे? लेकिन कुल मिलाकर एक बात यह समझ में आई कि सालभर में जो फाइल नहीं मिली थी, वह आधा किलो बादाम के बाद एक-दो दिनों में ही मिल गई। अब इसमें बादाम के साथ-साथ वीडियो बनाने, और उसे वायरल करने का योगदान कितना बड़ा था, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। फिर भी मोबाइल कैमरों से आज लोकतंत्र इतना तो आ गया है कि एक मुसद्दीलाल भी दो दिनों में किसी का ट्रांसफर करवा पाया, और उससे भी बड़ी बात कि अपनी गुमी हुई फाइल को ढुंढवाकर इंसाफ पाने की तरफ एक कदम बढ़ा पाया। अभी दो दिन पहले ही एक अदालत का एक किस्सा छपा था। एक बहुत ही गरीब और बुजुर्ग व्यक्ति के पक्ष में जब अदालत से फैसला हुआ, तो उसने जज को दुआ देते हुए कहा कि जाओ एक दिन थानेदार बन जाओगे। जज ने जब बताया कि वह तो थानेदार से बड़े ओहदे पर है, तो उस बुजुर्ग ने कहा कि थानेदार ने तो मुझे कहा था कि 5 हजार रुपए दो तो मैं दो दिन में मामला निपटा दूंगा। आपकी अदालत में 20 साल से मुकदमा लड़ते हुए वकील और बाबुओं पर 50 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं, तब इंसाफ मिला है, मेरे लिए तो थानेदार ही बड़ा रहता, लेकिन मैंने बादाम खाए नहीं थे इसलिए अक्ल नहीं आई थी।
यूपी की एक खबर है कि एक महिला अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए एक मस्जिद में मौलवी के पास गई, वहां मौलवी और एक दूसरे नौजवान ने उसे कुछ नशीली चीज पिलाकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अब उसकी शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज करके पुलिस ने जांच शुरू की है। इस महिला का कहना है कि उसका इकलौता बड़ा बेटा बीमार रहता है, और गांव के ही एक नौजवान ने उसे मौलवी से झाड़-फूंक कराने की सलाह दी। फिर वह नौजवान उन दोनों को मोटरसाइकिल पर गांव की मस्जिद ले गया। वहां मौलवी ने कुछ पिलाकर उसे बेहोश किया, दोनों लोगों ने उससे बलात्कार किया, उसके वीडियो बनाए, तस्वीरें खींची, और धमकी दी कि अगर किसी को बताया तो यह वीडियो फैला देंगे, और जान से मार देंगे। घर पहुंचकर पीडि़ता ने पति को यह सब बताया, और फिर पुलिस में शिकायत की गई। देश भर से, जगह-जगह से ऐसी शिकायतें आती हैं कि कहीं किसी तांत्रिक के पास इलाज के लिए जाने पर, तो कहीं किसी बैगा-गुनिया के पास झाड़-फूंक के लिए जाने पर वे लोग बलात्कार करते हैं, छोटे-छोटे बच्चों का भी देह-शोषण करते हैं। जहां कहीं धर्म या आध्यात्म के नाम पर अंधविश्वास के दर्जे की आस्था हो जाती है, वहां ऐसे खतरे खड़े हो जाते हैं। यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, बहुत सारे धर्मों में ऐसा होता है। अब इससे लोगों के बचने का क्या इलाज हो सकता है?
जहां तक इलाज के नाम पर शोषण की बात है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार पर आती है जिसका काम इलाज का पर्याप्त इंतजाम करना है। यह बात बिल्कुल साफ है कि जहां-जहां भरोसेमंद और सुविधापूर्ण आधुनिक चिकित्सा सुविधा रहती है, वहां धीरे-धीरे अंधविश्वास जाने लगता है, और लोग आस्था चिकित्सा को छोडऩे लगते हैं। लेकिन जहां अस्पताल नहीं है, इमारत है तो डॉक्टर नहीं है, डॉक्टर है तो नर्स नहीं है, मशीनें खराब हैं, दवाइयां हैं नहीं, तो फिर लोगों के पास मजबूरी में निजी चिकित्सा सुविधाओं तक जाना रह जाता है, और कई लोग ऐसे रहते हैं जो प्राइवेट डॉक्टरों या अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते, और वैसे लोग जादू-टोना, झाड़-फूंक, मंत्र-ताबीज जैसी चीजों की तरफ चले जाते हैं। आज ही छत्तीसगढ़ की एक खबर है कि एक पिछड़े हुए जिले में एक जंगली बिल्ली ने एक बुजुर्ग महिला को जख्मी कर दिया था, वह अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक कराती रह गई, और अब रैबीज के लक्षणों सहित मर गई। जंगली जानवर से भी रैबीज का संक्रमण हो सकता है, इसका अंदाज भी बहुत से लोगों को नहीं होगा, और गरीब बूढ़ी महिला अस्पताल जाकर भी हो सकता है कि रैबीज का इंजेक्शन न पा सके, जिसकी कमी पूरे प्रदेश में चल रही है, और हाईकोर्ट तक इस पर तल्ख टिप्पणियां कर चुका है।
मौत या बलात्कार जैसी खबरें आने पर लोगों का ध्यान इस तरफ जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हर गली-मोहल्ले में बिना चिकित्सकीय शिक्षा के, तरह-तरह के फर्जी कोर्स किए हुए लोग, या फर्जी कोर्स भी न किए हुए लोग दवाखाना खोलकर बैठते हैं, कई जगहों पर तो ऐसे लोग नकली अस्पताल भी चलाते हैं। हैरानी की एक खबर यह थी कि गुजरात जैसे विकसित और संपन्न राज्य में बिना डॉक्टरों के एक नकली अस्पताल ही चल रहा था। कमोबेश ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं, और कहीं-कहीं तो यूट्यूब पर वीडियो देखकर भी किसी स्वास्थ्य कर्मचारी ने सर्जरी कर डाली, और मौत हो जाने पर फरार हो गया। देश में मोटेतौर पर चिकित्सा व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, कुछ गिने-चुने एम्स जैसे केन्द्रीय संस्थान अलग-अलग राज्यों में केन्द्र सरकार चलाती है, लेकिन मरीजों का 90 फीसदी हिस्सा राज्य के अपने इंतजाम पर ही जाता है। हम छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं कि किस तरह यहां दवा खरीदी से लेकर चिकित्सा सेवा के बाकी हर पहलू में बीते बरसों का भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोल रहा है। आखिर ऐसा भ्रष्टाचार गरीब मरीजों के हक पर डाके के अलावा और क्या है? फिर किसी एक पार्टी की सरकार के रहते हुए ऐसा होता हो, और दूसरी पार्टी की सरकार रहते हुए न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। इस छत्तीसगढ़ में बीते 25 बरस में हमने हर सरकार में स्वास्थ्य विभाग में ऐसा ही परले दर्जे का भ्रष्टाचार देखा है, और शायद यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री रहे हुए अधिकतर नेता अगला चुनाव हार भी चुके हैं।
उत्तर भारत का एक वीडियो आया है जिसमें सडक़ किनारे किसी घर के सामने अपनी माँ के साथ खड़ी एक लडक़ी के पास दुपहिया रोककर नशे में चूर दो नौजवान उससे उसका रेट पूछते हैं। वह लडक़ी वीडियो में दिख नहीं रही है क्योंकि वही यह वीडियो बना रही है, जिसमें वह दुपहिया का नंबर भी रिकॉर्ड कर रही है, दोनों नौजवानों के चेहरे, और उनकी गंदी बकवास सब कुछ रिकॉर्ड कर रही है। बाद में पता लगता है कि इनमें से एक नौजवान एक भूतपूर्व मंत्री का बेटा है। गाड़ी का नंबर भी रहता है, चेहरे भी खूब अच्छी तरह दर्ज हैं, गिरफ्तारी होती है, और एक-दो घंटों में ही जमानत पर रिहाई हो जाती है। यह मामला देश में इन दिनों चल रहे कुछ दूसरे मामलों के मुकाबले बड़ा छोटा लगता है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक कस्बे में इन दिनों तीन-चार मुस्लिम नौजवानों ने जिस तरह बताया जा रहा है कि पौने दो सौ से अधिक लड़कियों को फांसा, उनके वीडियो बनाए, ब्लैकमेल किया, उन पर बलात्कार किया, और अब ये सब सुबूत सहित पुलिस की कैद में हैं। इन्हीं दिनों कर्नाटक के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, देवेगौड़ा कुनबे का चिराग, देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री का पोता सैकड़ों महिलाओं के साथ सेक्स हजारों वीडियो सहित कैद है, बीते बरस अगस्त में एमपी-एमएलए अभियुक्तों के लिए बनी एक विशेष अदालत ने प्रज्जवल रेवन्ना को उम्रकैद सुनाई है, इसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी है, और वह बेंगलुरू की जेल में सजा काट रहा है। उसके वीडियो तो हजारों मिले हैं, लेकिन शिकायत करने कुल चार महिलाएं सामने आई थीं, और इनमें से एक में ही अभी सजा हुई है।
देश भर में जगह-जगह न सिर्फ पेशेवर मुजरिमों, बल्कि तरह-तरह के नेताओं, और राजनीतिक या ताकतवर परिवारों के कपूतों के किए हुए बलात्कार सामने आते हैं, और ऐसे में एक घटना याद पड़ती है, जो काफी पुरानी है, लेकिन जो याद दिलाती है कि जब सरकार और अदालत इंसाफ नहीं कर पाते, तब फिर लोग कानून किस तरह अपने हाथ में लेते हैं। इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल महाराष्ट्र में नागपुर की एक जिला अदालत की 2004 की है। वहां पर 40 से अधिक बलात्कार और हत्याओं का आरोपी अक्कू यादव खड़ा था, पुलिस उसे 13 साल से बचाते आ रही थी, लेकिन कस्तूरबा नगर की थकी हुई महिलाओं ने उसे गिरफ्तार करवाकर दम लिया था। जब उन्हें यह लग रहा था कि यह अदालत से जमानत पर छूटकर आएगा, और फिर मोहल्ले, और इलाके में जिससे चाहे उससे बलात्कार करेगा, तो चार सौ महिलाएं अदालत में घुसीं, वे मिर्च पावडर, सब्जी काटने वाले चाकू, और पत्थर लेकर गई थीं। उन्होंने अदालत के भीतर ही उस पर हमला किया, और उसे चाकुओं से गोद डाला। उन महिलाओं का तनाव इस बात से देखा जा सकता था कि उन्होंने उसके मर्दाने शरीर का वह हिस्सा ही काटकर अलग कर दिया जिससे वह बलात्कार करता था। यह मामला अदालत में चलते रहा, किसी ने इन महिलाओं के खिलाफ गवाही नहीं दी, और सारी महिलाएं छूट गईं। दस बरस लगे, लेकिन अदालत ने इन महिलाओं को बरी करते हुए यह माना कि अपराधी के आतंक, और पुलिस की सांठगांठ ने उन्हें इस सामूहिक आक्रोश के लिए मजबूर किया था।
2015 में नागालैंड में जेल की दीवार तोडक़र भीड़ ने बलात्कार के एक आरोपी को बाहर निकाला, उसे शहर में घुमाया, और मार डाला। भीड़ का तर्क था कि अगर आज इसे नहीं मारा, तो कल यह जमानत पर बाहर आकर यही काम करेगा। एक दूसरा मामला बिहार के पूर्णिया में 2021 का है, वहां एक व्यक्ति पर एक बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप था। गांव के लोगों ने पुलिस के आने के पहले अपनी खुली अदालत शुरू की, हजारों की भीड़ के बीच पहुंची पुलिस बेबस खड़ी रही, और भीड़ ने पुलिस की मौजूदगी में ही आरोपी को मार डाला, उनका तर्क था कि पुलिस ले जाएगी, तो दो साल बाद यह छूटकर फिर गांव में घूमेगा, और यही हरकत करेगा। इसके कुछ पहले 2018 का एक मामला अरूणाचल प्रदेश के ईटानगर का है। वहां दो लोगों पर एक मासूम के साथ बलात्कार करने, और उसे मार डालने का आरोप था। वे पुलिस हिरासत में थे, भीड़ ने पुलिस थाने पर हमला किया, लॉकअप के ताले तोड़े, दोनों आरोपियों को खींचकर बाजार के बीच ले गए, पुलिस की गोलियां भी भीड़ को नहीं रोक पाईं, दोनों को लोगों ने सडक़ पर ही मार डाला, क्योंकि पुलिस और अदालत पर उनका अधिक भरोसा नहीं रह गया था।
सुप्रीम कोर्ट में पिछले कुछ दिनों से कैसी गजब की दिलचस्प बहस चल रही है कि उसे सुनने के लिए तरह-तरह के ईश्वर भी ऊपर टकटकी लगाकर बैठे होंगे, और कानों के पीछे हाथ टिकाकर ध्यान से सुन रहे होंगे। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को लेकर 9 जजों की संवैधानिक बेंच पिछले दस दिनों से सुनवाई कर रही है, और वह इस एक मंदिर से ऊपर उठकर आस्था और संविधान की बहस का आज तक का शायद सबसे बड़ा मामला बन गया है। अब बहस इस पर नहीं टिकी है कि एक नागरिक के रूप में, एक हिन्दू के रूप में महिला का इस मंदिर में दाखिल होने का हक मंदिर की परंपराओं के ऊपर है, या परंपराएं महिला के मौलिक अधिकार के ऊपर हैं। बहस अब इससे बढक़र यहां पहुंच गई है कि क्या अदालत को धर्म के अंदरुनी मामलों में घुसने का हक है भी या नहीं? और चूंकि यह बहस बहुत से बड़े-बड़े जानकार वकीलों, और सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के बीच चल रही है, इसलिए इसमें हर दिन हर टिप्पणी को लेकर नए पहलू सामने आते हैं। मीडिया के अलग-अलग हिस्से इन टिप्पणियों को लेकर अपनी पसंद और प्राथमिकता के मुताबिक सुर्खियां बनाते हैं, जिन्हें पढक़र एक पुरानी लाईन याद आती है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अभी चूंकि यह मामला चल ही रहा है, इसलिए हर पहलू से बहस जारी है, और यह बहस कुछ लंबी भी चल सकती है क्योंकि यह बड़ी संवैधानिक पीठ है, और यह इस एक मंदिर से परे भी जिन संवैधानिक सवालों पर गौर कर रही है, वे लंबे भविष्य तक इस देश में धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों की परिभाषाएं तय करेंगे। अदालत इस बात पर गौर कर रही है कि क्या किसी व्यक्ति का समानता का अधिकार, किसी धार्मिक संप्रदाय की अपनी परंपरा को मानने की आजादी से बड़ा है? इस सवाल को इस संदर्भ में समझने की जरूरत है कि केरल के सबरीमाला मंदिर में दस बरस से पचास बरस तक की महिलाओं को दाखिला नहीं है क्योंकि मंदिर की परंपराएं यह मानती हैं कि वहां के देवता आजीवन ब्रम्हचारी रहे हैं, और उनके सामने माहवारी की उम्र वाली महिलाओं को नहीं जाना चाहिए। एक दूसरा सवाल अदालत के सामने यह है कि क्या जज यह तय कर सकते हैं कि किस धर्म के लिए कौन सी प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? क्या अदालत को धर्मशास्त्री की भूमिका निभानी चाहिए, या यह फैसला उस धर्म के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए? एक और दिलचस्प सवाल अदालत के सामने यह आया है कि छुआछूत का मतलब क्या सिर्फ जातिगत भेदभाव होता है, या माहवारी के दिनों के आधार पर महिलाओं को मंदिरों से बाहर रखना भी इसी दायरे में आता है? एक और सवाल अदालत के सामने यह है कि नैतिक किसे कहा जाए, जो समाज की नजर में सही है, उसे कहा जाए, या जो संविधान की प्रस्तावना में लिखा है, उसे कहा जाए? अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि क्या धार्मिक नैतिकता को संवैधानिक नैतिकता के सामने झुकना होगा, या इसका उल्टा अधिक जायज होगा? फिर इस मंदिर को लेकर एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि भगवान अयप्पा के भक्त क्या एक अलग संप्रदाय हैं? अगर हाँ, तो क्या उन्हें अपने मंदिर के नियम खुद तय करने का हक है, जिसमें सरकार या अदालत दखल नहीं दे सकते? इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि जो व्यक्ति इस धर्म, या इस मंदिर के भक्तों के एक काल्पनिक संप्रदाय की परंपराओं का पालन नहीं करते, क्या वे अदालत आकर उस धर्म या संप्रदाय की प्रथाओं को चुनौती दे सकते हैं? अदालत के सामने एक सवाल यह भी है कि अदालत और धर्म के बीच लक्ष्मण रेखा कहां पर है? क्या अदालतें किसी धर्म की निजी आस्था की समीक्षा कर सकती हैं? क्या आस्था को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, या आस्था अपने आपमें तर्क से परे, और तर्क से ऊपर है?
अब हमें 2018 का इसी मामले में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला याद करना पड़ेगा। पांच जजों की एक बेंच के सामने सबरीमाला का ही मामला आया था जिसमें 4:1 के बहुमत से फैसला आया था, और एकमात्र महिला जज ने ही बाकी बहुमत के खिलाफ राय दी थी। जस्टिस दीपक मिश्रा उस वक्त मुख्य न्यायाधीश थे, और वे क्रांतिकारी बदलाव के पक्ष में थे। एक दूसरे जज, जस्टिस ए.एम.खानविलकर भी बहुमत के साथ थे। जस्टिस आर.एफ.नरीमन ने यह कड़ा रूख अपनाया था कि संविधान ही सर्वोच्च है। और जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने इसे छुआछूत और पितृसत्तात्मक सामाजिक परंपराओं से जोडक़र देखा था। अकेली महिला जज जस्टिस इन्दू मल्होत्रा ऐसी थीं जिनका तर्क था कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक परंपरा सही है, और कौन सी गलत। इस फैसले की लैंगिक-व्याख्या भी जरूरी है कि चार पुरूष जजों ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता खोला था, और बेंच की अकेली महिला जज ने परंपरा और आस्था का हवाला देकर महिलाओं को इस मंदिर के बाहर रोका था। अब 2026 की 9 जजों की बेंच 2018 के उस पांच जजों के फैसले की समीक्षा कर रही है कि उस फैसले में धार्मिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज तो नहीं कर दिया गया था।
हिन्दुस्तान बड़ा मजेदार देश है। किसी का मकान गिराया जा रहा हो, या बड़ी सी कोई मशीन नाले से कचरा निकाल रही हो, सडक़ों पर कोई मशीन झाड़ू लगा रही हो, या रिग मशीन ट्यूबवेल खोद रही हो, सौ-पचास लोग आसपास बैठकर उसे देखते रहते हैं। उन्हें हासिल कुछ नहीं होता, लेकिन शायद जिंदगी में उसे देखने से बेहतर कुछ करना उन्हें नसीब नहीं है। कुछ ऐसा ही लोकसभा और विधानसभा की सीटों के बढऩे को लेकर चल रहा है। जो नेता चुनाव लडक़र सांसद या विधायक बनना चाहते हैं, उनका तो उत्साही होना जायज है, लेकिन ऐसे नेता देश में कुछ लाख ही हैं। बाकी दसियों करोड़ लोग बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह डाँस कर रहे हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि बढ़े हुए सांसदों और विधायकों का बोझ तो उन्हीं की जेब पर जाएगा। मामला कुछ ऐसा है कि किसी गैर की बारात में नाचने वालों से डीजे का पैसा लिया जाए, वैसा ही देश के आम नागरिक सांसद और विधायकों की संख्या बढऩे को लेकर खुश हैं। यह समझने की जरूरत है कि यह गिनती बढ़ जाने से क्या लोकतंत्र का संसदीय-संवैधानिक काम कुछ बेहतर हो जाएगा?
पहले तो यह समझने की जरूरत है कि सांसद और विधायक गली-मोहल्ले के काम करने वाले पंच या पार्षद सरीखे नहीं रहते हैं। उनके जिम्मे सिर्फ संसद या विधानसभा में देश-प्रदेश के मामलों पर चर्चा करना, नए विधेयक, या पुराने कानून में संशोधन आने पर उन पर चर्चा करना, और जरूरत रहने पर मतदान करना आता है। उन्हें पार्षदों सरीखे नाली-पानी, रौशनी-सडक़ जैसे काम नहीं करने रहते। इसलिए एक सांसद पांच लाख लोगों पर रहे, या दस लाख लोगों पर, संसद के भीतर उनके बोलने की गुंजाइश एक सी रहती है, सीमित रहती है, और अब तो पार्टियों के अनुशासन में बंधे रहने के बाद रहती ही नहीं है। पार्टियां ही उन्हें मिले हुए समय को अपने सदस्यों के बीच अपनी मर्जी से बांटती हैं कि किस सदस्य को कितने मिनट मौका मिले। ऐसे में उन्हें चुनने वाली जनता का संसद में सांसदों के कहे हुए से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। सांसद अपनी पार्टी के अनुशासन से बंधे हुए अपने मन की बात भी नहीं कह सकते, अपनी सीट के मतदाताओं की बात कहना तो दूर रहा।
अब आज-कल में डी-लिमिटेशन के बाद लोकसभा की मौजूदा 543 सदस्यों की गिनती बढक़र 850 करने की तैयारी है। अगले लोकसभा चुनाव के बाद इस सदन में 33 फीसदी अधिक लोग बैठेंगे। अब हम संसद के कामकाज को देखें, तो पिछले 20 बरस में संसद साल में औसतन 60 दिन बैठी है। साल में 52 इतवार होते हैं, उससे जरा ही ज्यादा दिन संसद चली है। सरकारें अब कम दिनों में, कम या तकरीबन बिना बहस के अधिक बिल पास करवाने की कोशिश करती हैं, और संसद के बजट और मानसून सत्र अक्सर समय के पहले खत्म हो जाते हैं। बाकी बचे हुए दिनों में भी बहुत सारे दिन तो नारेबाजी, बहिष्कार, और बहिर्गमन में चले जाते हैं। काम की बात सीमित होती है, और कई नेताओं के बड़े-बड़े भाषण का संसदीय काम से कोई लेना-देना नहीं रहता है, वह देश के मतदाताओं को दिया जा रहा एक राजनीतिक संदेश रहता है जो कि वे किसी आमसभा के मंच से भी दे सकते थे, लेकिन वे संसद का इस्तेमाल इस काम के लिए करते हैं। अब जब 33 फीसदी अधिक सांसद इस सदन में बैठेंगे, तो जाहिर है कि लोगों के बोलने का औसत वक्त करीब-करीब एक-तिहाई तो कम हो ही जाएगा।
भावनात्मक रूप से यह बात अच्छी लग सकती है कि अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों पर एक सांसद होंगे। लेकिन क्या किसी सांसद का अपने चुनाव क्षेत्र की आबादी की गिनती से अधिक लेना-देना रहता है? इलाका तो उतने का उतना रहता है, अब जब सीटें बढ़ेंगी, तो चुनाव क्षेत्र का आकार घट जाएगा, मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में 11 की जगह 17 सीटें हो जाने की चर्चा है, तो एक सांसद का चुनाव क्षेत्र कुछ छोटा हो जाएगा। लेकिन इससे लोकसभा सीट पर क्या फर्क पड़ेगा? जनता पर क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा कि उसके सांसद के सिर पर अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों का ही बोझ है? क्या इससे सांसद अपने वोटरों के पैर दबाने के लिए अधिक वक्त पाएगा, या पाएगी? यह पूरा सिलसिला रिग मशीन से बोरिंग खुदने जैसा है। खुदने वाले बोरिंग से किसी को पानी मिलेगा या नहीं, इस संभावना से भी परे लोग नजारा देखने बैठ जाते हैं। अब लोग यह नजारा देखने के लिए 33 फीसदी अधिक खर्च भी करेंगे। सांसदों के वेतन-भत्ते, उनके सफर की टिकटें, दिल्ली में उनके रहने-खाने का खर्च, यह सब बढ़ जाएगा। बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला की जेब से यह बढ़ा हुआ खर्च निकालकर लोकसभा नाम की डीजे पार्टी को दिया जाएगा, लेकिन वोटरों को मिलेगा क्या?
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अभी दिल्ली में एक व्याख्यान में कहा कि 50 साल बाद की भारतीय न्यायपालिका कैसी दिखेगी, यह एक गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि उस वक्त के जज आज के जजों से अलग होंगे, और उनके ज्ञान, उनकी समझ की जरूरतें भी अलग होंगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जज केवल कानूनी विशेषज्ञ तक सीमित नहीं रह पाएंगे, उन्हें उस वक्त अदालतों के सामने आने वाले मामलों को समझने के लिए कानून की किताबों, और पुराने फैसलों से कहीं आगे की समझ की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के जजों का अलग-अलग बहुत से दायरों का जानकार होना जरूरी होगा, उन्हें विज्ञान, तकनीक, समाजशास्त्र, नैतिकता, पर्यावरण, और मानव व्यवहार की गहराई समझनी होगी। जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ मिसालें देते हुए कहा कि जब जीवन को प्रयोगशाला में इंजीनियरिंग से बनाया जाएगा, तो कानूनी जिम्मेदारी का सवाल उठेगा। उस ‘निर्मित’ का मालिक कौन होगा, उसे क्या अधिकार होंगे? डिजिटल और एआई मुद्दों से विवाद बढ़ेंगे, और जजों को इनको समझने के लिए एक तकनीकी समझ लगेगी। आने वाले बरसों में जलवायु परिवर्तन, और पर्यावरण के मामले बहुत बढ़ेंगे। इन मिसालों के अलावा जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को इमारतों या भूगोल की सीमाओं तक कैद नहीं रहना चाहिए, न्याय लोगों तक पहुंचना चाहिए, न्याय के लिए लोगों को अदालतों तक आने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
हम सिर्फ जजों के बारे में, या भविष्य के जजों के बारे में आज की बात को सीमित रखना नहीं चाहते। जस्टिस सूर्यकांत की बात तो महज एक मिसाल है, कोई अदालत अकेले ही 2050 के बरस में नहीं पहुंचेगी, उसके साथ-साथ पूरा समाज भी आगे बढ़ेगा, संसद, सरकार, मीडिया, विज्ञान, टेक्नॉलॉजी, और जटिल समाज-व्यवस्था, ये सब भी अभी से लेकर चौथाई सदी का सफर पूरा करके बिल्कुल ही नए-नए किस्म के हो जाएंगे। इसलिए उस वक्त न सिर्फ अदालतों में बेहतर, और अधिक समझ वाले जज लगेंगे, बल्कि समाज के अलग-अलग दायरों में भी लोगों को अधिक शिक्षित रहना होगा। इस शिक्षा का मतलब महज स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई से नहीं है, हालांकि उससे भी है। एक वक्त था जब 5वीं पास मुख्यमंत्री भी देश के सबसे काबिल मुख्यमंत्री हो सकते थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब देश और दुनिया को बेहतर समझने के लिए टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल जरूरी हो चुका है। नेताओं को, पत्रकारों और दूसरे किसी भी पेशे के लोगों को कम्प्यूटर, और एआई, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया, इन सबसे वाकिफ रहना पहले के मुकाबले बहुत अधिक जरूरी आज भी हो चुका है। हर दिन यह जरूरत बढ़ती जा रही है, और चौथाई सदी बाद कैसी हालत रहेगी, यह समझ से परे है। आज भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बहुत सारे मामले ऑनलाईन सुने जाते हैं, शायद एक-दो बरस के भीतर ही एक आभासी अदालत खड़ी हो जाएगी, जिसमें आभासी जज बैठे होंगे, और आज की वीडियो कांफ्रेंस की तरह उस अदालत में वकीलों की होलोग्राफिक त्रिआयामी छवि खड़ी होकर बहस करती रहेगी। यह तकनीक आज भी मौजूद है, और इसका इस्तेमाल महज वक्त की बात है।
लेकिन हम अदालत तक सीमित रहना नहीं चाहते। आने वाले वक्त के लिए लोगों को इसलिए भी तैयार हो जाना चाहिए, क्योंकि आज बहुत से लोगों के लिए जो भविष्य है, वह तो आज ही बहुत से लोगों का वर्तमान भी है। आज दुनिया का एक हिस्सा जिस तकनीक का इस्तेमाल करता है, वह बहुत से लोगों के लिए एक विज्ञानकथा किस्म की है। इसलिए रात-दिन जंगल के हिरण की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ती हुई तकनीक के बारे में सोच पाने की काबिलीयत नेताओं में भी लगेगी, पत्रकारों में भी लगेगी, और पेशेवर लोगों के बाकी दायरों में भी लगेगी। दुनिया में करोड़ों रोजगार खत्म होंगे, और शायद कुछ लाख नए रोजगार खड़े भी होंगे। इस बात को लिखते हमें महीनों हो चुके हैं कि आज एआई का खतरा उन अधिकतर कामों पर मंडरा रहा है, जो कम्प्यूटरों पर किए जाते हैं, मोबाइल फोन पर किए जाते हैं, जिनके लिए कुछ बोलना या सुनना पड़ता है, जिनके लिए की-बोर्ड की जरूरत पड़ती है, ऐसे सारे के सारे काम आज खतरे में हैं। इसलिए 25 बरस बाद की नौबत को सोच और समझ पाने की ताकत नेताओं के अलावा किसी भी देश-प्रदेश के बड़े अफसरों, योजनाशास्त्रियों को तो होनी ही चाहिए, जिन समाजों में अभी तक थिंक टैंकों का चलन खत्म नहीं किया गया है, वहां पर ऐसे थिंक टैंक सदस्यों को भी एक बेहतर कल्पनाशीलता की जरूरत पड़ेगी।
दुनिया का सोशल मीडिया ट्रम्प के मीम से भरा हुआ है। यह मीम शब्द हाल ही में हिन्दी के लोगों के बीच भी प्रचलित हुआ है, जिसका मतलब किसी पर तंज कसते हुए, या किसी का मजाक बनाते हुए कोई फोटो, कार्टून, या वीडियो बनाना। सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों में अब हास्य और व्यंग्य की समझ कुछ बढ़ी है, और बहुत से लोगों में ऐसी कल्पनाशीलता देखने में मिल रही है, जो पहले नहीं थी। सोशल मीडिया के पहले तक आम लोगों के लिए अखबारों में पाठकों के पत्र कॉलम रहता था, या किसी सुनसान जगह पर दीवार पर कुछ लिखना। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति कुछ अधिक समर्पित लोग शौचालयों के भीतर से बंद दरवाजों पर भी अपनी मनपसंद सूक्तियां लिखा करते थे, और फिर बाहर से यह देखने का इंतजार करते थे कि उन्हें पढक़र निकलने वाले लोगों के चेहरों पर कैसी प्रतिक्रिया दिख रही है। अब इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर लोग इतना खुलकर लिखने लगे हैं कि सोशल मीडिया को कई गंभीर और उत्साही लोग पहले के मुकाबले अधिक दिलचस्पी से देखने लगे हैं।
अब ताजा मामला अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का है जो कि अपने युद्धमंत्री के साथ मिलकर दुनिया के सबसे बड़े धर्मगुरू, पोप के साथ एक सार्वजनिक बहस में उलझे हुए हैं। अपने आपको ईसा मसीह की तरह दिखाते हुए एआई से गढ़ी हुई तस्वीर पोस्ट करने का हौसला सिर्फ ट्रम्प का ही हो सकता था, क्योंकि उसके संकीर्णतावादी, दकियानूसी, धर्मालु समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा चर्च जाने वालों का है, और शायद उन्हीं के दबाव, उन्हीं की आलोचना के चलते ट्रम्प को अपने को ईसा मसीह दिखाती तस्वीर हटानी पड़ी। लेकिन सार्वजनिक जीवन में आप किसी विवाद या बहस की शुरूआत तो कर सकते हैं, उसे बंद नहीं कर सकते। नतीजा यह हुआ है कि अब सोशल मीडिया पर पोप लियो के साथ ट्रम्प के टकराव पर लाखों किस्म के फोटो, कार्टून बनकर पोस्ट हो रहे हैं। फेसबुक और ट्विटर इनसे भरे हुए हैं, और कुछ सर्च करने की भी जरूरत नहीं पड़ रही है। ट्रम्प के चक्कर में ईसा मसीह एकाएक खबरों में इतने आ गए हैं, कि ऊपर उन्हें अनायास यह लगने लगा होगा कि लोग उन्हें इतना अधिक याद कर रहे हैं। याद उन्हें नहीं कर रहे हैं, याद ट्रम्प की कमीनगी को कर रहे हैं, उसे कोस रहे हैं, उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, और इसके लिए सबसे बड़ा विषय ईसा मसीह हैं।
ट्रम्प ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। वह यह काम ईरान पर हमले के साथ भी कर चुका है, और जब मधुमक्खियों ने डंक मारना शुरू किया, तो वह भागे-भागे योरप के देशों, नाटो देशों, और दूसरे भूतपूर्व दोस्तों की तरफ बचाओ-बचाओ चिल्लाते हुए दौड़ा। उन तमाम लोगों ने ट्रम्प को कह दिया कि मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की योजना उनकी नहीं थी, और इसमें वे कोई मदद नहीं कर सकते। दरअसल ट्रम्प की दिमागी हालत ऐसी हो गई है कि वह किसी महिला के कपड़ों में हाथ डालने के अंदाज में मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल रहा है, ईरान पर हाथ डाल रहा है, हॉर्मुज को कभी बंद करने की मुनादी कर रहा है, तो कभी खोलने की। ऐसी अस्थिर, विचलित, और असामान्य मानसिक स्थिति के साथ जिसे मानसिक चिकित्सालय में भर्ती होना चाहिए था, वह दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री, और परमाणु हथियारों के सबसे बड़े जखीरे के बटन पर हाथ रखकर बैठा है। ऐसी ही विचलित दिमागी हालत में उसने अपने आपको दिव्य और दैवीय बताने का काम भी तेजी से आगे बढ़ा दिया है। ट्रम्प और उसका युद्धमंत्री ईरान पर हमले को दैवीय और ईश्वरीय करार देते थक नहीं रहे हैं, और ईश्वर के आशीर्वाद को अपनी हमलावर फौज के साथ बता रहे हैं। अमरीका विश्व इतिहास की ऐसी पहली महाशक्ति बन गया है जो कि एक मनोरोगी के हाथों चल रही है।
छत्तीसगढ़ में कल सामने आया एक जुर्म एक अजीब किस्म का गंभीर खतरा सामने रखता है। एक ठेकेदार के 16 बरस के नाबालिग बेटे को इंस्टाग्राम पर एक महिला ने दोस्ती के रास्ते आगे बढक़र मोहब्बत में फंसाया, और उसके बाद उसका अपहरण कर लिया। इसके बाद उसके पिता को वीडियो भेजकर एक करोड़ रूपए की फिरौती मांगी गई। एक दिन के भीतर गिरफ्तार कर लिए गए इन आरोपियों में इस महिला का पति भी है, और अपहरण किए गए लडक़े के परिवार का एक करीबी रिश्तेदार भी है। किसी नाबालिग से इस तरह ऑनलाइन दोस्ती करके, परिवार के लोगों के साथ मिलकर उसका अपहरण करके फंसाने वाली किसी महिला का यह पहला ही मामला है, और इसमें उसका पति भी शामिल था, जो कि कुछ चौंकाता भी है। इस वारदात के बहुत से अलग-अलग पहलू हैं, और उन सबके बारे में सोचने की जरूरत है।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा बड़ा और प्रमुख देश बना है जिसने 14-15 बरस से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर दाखिला देने के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बनाया है। भारत में भी दक्षिण के एक-दो राज्यों में ऐसी तैयारी चल रही है, लेकिन पूरे देश में जिस बात की जरूरत है, वह अभी नजर नहीं आ रही है। नाबालिग छात्र-छात्राओं को सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर फंसाकर, उन्हें हनी ट्रैप में उलझाकर, उन्हें ब्लैकमेल करके वसूली और उगाही करते हुए खुदकुशी तक के लिए मजबूर करने की घटनाएं दुनिया में कई जगह हो रही हैं। अमरीका और योरप के विकसित देशों में नाइजीरिया जैसे देशों में बैठे हुए लोग भी ऐसा साइबर-क्राइम कर रहे हैं। फिर यह सिलसिला सिर्फ नाबालिगों या कम उम्र के लोगों तक सीमित नहीं है, हमने बहुत से अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को इसी तरह हनी ट्रैप में फंसते देखा है जब वे किसी वीडियो कॉल पर किसी अनजान लडक़ी या महिला के न्यौते और उकसावे पर उतावले होकर अपने कपड़े उतार देते हैं, और अपने को कुछ मिनटों के भीतर ही ब्लैकमेल का सामान बना लेते हैं। ऐसे मामले भी भारत में हर दिन सैकड़ों की संख्या में हो रहे हैं, दर्जनों की संख्या में पुलिस तक पहुंच रहे हैं, और इक्का-दुक्का लोग पकड़ा भी रहे हैं। लेकिन इस ताजा वारदात में कुछ और भी पहलू गौर करने लायक हैं।
पहली बात तो यह कि इस साजिश में गिरफ्त में लिए गए लड़क़े का एक एकदम ही करीबी रिश्तेदार भी शामिल था। दूसरी बात यह कि ब्लैकमेल और अपहरण करने वालों में इस नाबालिग लडक़े से करीब 10 बरस बड़ी शादीशुदा युवती भी थी, और उसका पति भी। ये दोनों ही बातें परिवार के कमजोर ढांचे, शून्य नैतिकता, और सजा की तरफ से बेफिक्री की सुबूत हैं। लोग अपने बच्चों को किस-किससे बचाकर रखें? परिवार के लोग, पड़ोसी, शिक्षक-प्रशिक्षक, स्कूल के कुक और गार्ड, हर दर्जे के लोग तो बलात्कारी निकल रहे हैं। तीन-चार बरस के बच्चों से भी बलात्कार हो रहा है, और उनका कत्ल भी कर दिया जा रहा है। अब मां-बाप किस-किस पर, कहां-कहां पर नजर रखें? 14-15 बरस का लडक़ा इंस्टाग्राम पर किससे दोस्ती कर रहा है, इस पर नजर रखना मां-बाप के लिए एक मुश्किल और नामुमकिन काम इसलिए हो जाता है कि कई बच्चे उनके मोबाइल फोन, मोबाइल गेम, और सोशल मीडिया के जीवन में दखल देने वाले मां-बाप को छोडक़र, बगावत में खुदकुशी भी कर रहे हैं। सच तो यह है कि एक-दो पीढ़ी पहले बच्चे मां-बाप से डरे रहते थे, आज मां-बाप बच्चों से डरे रहते हैं, और बच्चे इमोशनल ब्लैकमेलिंग करके मां-बाप से मनचाहे मोबाइल हासिल कर लेते हैं, और उनकी औकात के बाहर की दूसरी सहूलियतें भी। यह सिलसिला मां-बाप को बहुत कमजोर बना देता है, क्योंकि हर दिन कहीं न कहीं की खबर आती है कि मोबाइल पर अधिक वक्त गुजारने से रोकने पर किसी बच्चे ने खुदकुशी कर ली, तो किसी दूसरे बच्चे ने महंगे मोबाइल का पसंदीदा मॉडल न मिलने पर जान दे दी। ऐसे जमाने में सोशल मीडिया पर पहुंचे हुए कम उम्र, नाबालिग बच्चों की गतिविधियों पर मां-बाप कितनी नजर रख सकते हैं? सरकारों को ही सोशल मीडिया पर रोक लगानी होगी कि वे कम उम्र बच्चों को वहां दाखिला न दें। इसके साथ-साथ सरकारें मोबाइल फोन, लैपटॉप जैसे उपकरणों पर भी ऐसी रोक-टोक जोडऩे की शर्त कंपनियों पर लगा सकती हैं कि मां-बाप अगर अपने बच्चों के लिए ये उपकरण ले रहे हैं, तो वे इन पर नजर भी रख सकें। नाबालिग बच्चों की उनके मां-बाप से निजता कोई बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए। सरकार इन कंपनियों को यह भी कह सकती है कि वे ऐसे मोबाइल फोन और कम्प्यूटर पर यह सूचना दिखाते रहें कि इन उपकरणों पर उनके माता-पिता की निगरानी है। इससे ही नाबालिग बच्चों के कई तरह के खतरे टल सकते हैं। लेकिन इस सिलसिले में जो भी होना है, उसके लिए देश-प्रदेश की सरकारों को ही कानून और नियम बनाने होंगे, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने होंगे। इन सबमें निजता के सवाल उठेंगे, और समाज को उन पर भी चर्चा करनी पड़ेगी।
ट्रम्प की कमीनगी पर अधिक लिखने को कुछ बचा नहीं है क्योंकि वह अमरीकी की सारी फौजी और कारोबारी ताकत को लेकर दुनिया को जिस तरह रौंद रहा है, उसका कोई इलाज फिलहाल तब तक नहीं दिख रहा, जब तक कि रूस और चीन दोनों एक साथ मिलकर अमरीकी फौज का सामना करने के लिए खड़े हों, और योरप चुपचाप बैठकर तमाशा देखता रहे। ऐसी कोई नौबत आ जाए तो हमें हैरानी नहीं होगी, क्योंकि जब योरप के भीतर के स्पेन और फ्रांस जैसे देश ट्रम्प को आईना दिखा रहे हैं, इजराइल के मुजरिम प्रधानमंत्री नेतन्याहू की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, और इजराइल के हर तरह के बहिष्कार की मांग कर रहे हैं, तब रूस और चीन मिलकर अगर अमरीका की फौजी गुंडागर्दी के मुकाबले उतरते हैं, तो यह सच्चे मायनों में एक विश्वयुद्ध हो जाएगा, और ट्रम्प ने कोई कसर तो छोड़ी नहीं है, अमरीका को बर्बाद करने की। दूसरी तरफ अमरीकी संसद को आज भी अगर इस बेदिमाग को ढोने से परहेज नहीं हो रहा है, तो फिर अमरीका इसी मवाली की हुकूमत का हकदार है।
लेकिन दुनिया भर के लोग अमरीकी गुंडागर्दी के मुकाबले अब सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें उठा रहे हैं। अभी जब ट्रम्प ने ईरान को तबाह करने के लिए नाटो देशों से मदद मांगी, और उन्होंने ट्रम्प की इस निजी जंग को नाटो के नीति-सिद्धांत से परे का बताते हुए इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया, तो ट्रम्प ने और कई देशों को पहले फतवा जारी किया कि वे आकर जंग में शामिल हों, और फिर उन्हें कोसना शुरू किया। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर जो लिखा है, उसे हम खुलासे से यहां पेश कर रहे हैं कि यह होता है दुनिया के सबसे बड़े मवाली के मुंह पर उसे उसकी हकीकत और औकात दिखाना।
दुनिया के विकसित देशों, और भारत के महानगरों से दशकों पीछे चलते हुए अब इस देश के छोटे शहरों में सडक़ों पर गाडिय़ों की स्पीड चेक करने, या दूसरे ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों की रिकॉर्डिंग करने की तकनीक का इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है। बहुत देर से शुरू होने के बाद भी अब पुलिस और प्रशासन के हाथ ऐसी तकनीक आसानी से लगी है जिससे वह सडक़ों पर, और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर गाडिय़ों, और गुंडागर्दी पर नजर रख सकती है। अब छोटे-छोटे शहरों में भी इतने कैमरे लग गए हैं, और वे इस तरह के नेटवर्क से जुड़ गए हैं कि पुलिस कंट्रोल रूम में बैठकर यह आसानी से देखा जा सकता है कि कौन किस जगह नियम तोड़ रहे हैं, उनकी तस्वीरें भी रिकॉर्ड की जा सकती हैं, और कंट्रोल रूम में बैठे-बैठे उनका ट्रैफिक चालान उनके नंबरों पर भेजा जा सकता है। अब मामूली से शहरों में भी किसी जगह लगने वाले ट्रैफिक जाम को उपग्रह से भी देखा जा सकता है, और उसे खत्म करवाने के लिए पुलिस की टीम को भेजा जा सकता है।
अब इसे भारत की जमीनी हकीकत के साथ अगर जोडक़र देखें, तो ट्रैफिक पुलिस बहुत बदनाम और भ्रष्ट समझी जाने वाली है। अगर वह ईमानदारी से भी सडक़ों पर चालान करती है, तो भी लोगों को लगता है कि यह वसूली या उगाही के लिए की जा रही कार्रवाई है। दूसरी तरफ जब सडक़ों पर खड़े होकर चालान की जरूरत नहीं रह जाती, जब कंट्रोल रूम में लगी हुई बड़ी-बड़ी स्क्रीन पर देखकर सुबूत सहित चालान करना पल भर का काम रहता है, तो सरकार को ऐसी सस्ती टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इससे एक साथ दो बातें होती हैं, एक तो नियम तोडऩे वाले लोगों पर जब बड़े पैमाने पर तेज रफ्तार से कार्रवाई होती है, तो लोगों में नियमों का डर तेजी से आता है। जब इक्का-दुक्का लोगों पर अपवाद की तरह कार्रवाई होती है, तो लोग बेधडक़ होते जाते हैं। इसलिए पुलिस को हर दिन सीमित चालान का एक कोटा तय करने के बजाय अलग-अलग शिफ्ट में कर्मचारियों को रखकर बड़े पैमाने पर चालान करने चाहिए, ताकि जिन्हें महीने में एक-दो बार जुर्माना भरना पड़ जाए, जिनके ड्राइविंग लाइसेंस सस्पेंड होने का खतरा दिखने लगे, उनके बीच नियमों का सम्मान तेजी से बढ़ेगा।
आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को देखें, तो पुलिस विभाग की मांग से आधे-चौथाई ही ट्रैफिक वाले यहां तैनात हैं। यह मांग उस वक्त से चली आ रही है जब टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल बड़ा सीमित था। आज तो स्पीड दर्ज करने वाले रडार वाले कैमरे हैं, सडक़ों पर नियम तोडऩे वाले लोगों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करने वाले कैमरे लगे हैं, और अब ट्रैफिक पुलिस की उतनी जरूरत नहीं है जितनी कि पहले सोची और मांगी गई थी। अब बहुत ही आसान सी टेक्नॉलॉजी इतने सस्ते में हासिल है कि वह सरकार पर पुलिस के पडऩे वाले आर्थिक बोझ के मुकाबले बहुत ही सस्ती भी है, और एयरकंडीशंड कंट्रोल रूम में बैठकर आसानी से वह काम किया जा सकता है, जिसके लिए पुलिस को खराब मौसम में भी सडक़ों पर धूल और धुएं के बीच बदमिजाज लोगों से बदसलूकी झेलते हुए काम करना पड़ता था। अब पूरी दुनिया में टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल इतना आम हो चुका है कि एक पुलिस सिपाही पर सरकार के एक महीने के खर्च में एक से अधिक कैमरे लगाए जा सकते हैं, जो कि दूर से नियंत्रित होते हैं, और भ्रष्टाचार के आरोपों के बिना सरकार को अधिक कमाई करके दे सकते हैं।
ईरान पर अमरीकी और इजराइली हमलों के बीच एक-दो बड़ी अटपटी बातें सामने आई हैं। ट्रम्प सरकार, और कैथोलिक ईसाईयों के मुख्यालय, वेटिकन के बीच जो टकराव चल रहा है, वह राजा और धर्म के बीच टकराव का एक अनोखा मामला है। इतिहास आमतौर पर राजा की हिंसा का साथ देने वाले धर्म की मिसालों से भरा हुआ है। अलग-अलग देश, अलग-अलग राजा, या अलग-अलग शासन प्रणालियां, और उनमें से हर किसी के सबसे बुरे फैसलों का भी साथ देता हुआ धर्म, यही सबसे आम बात है। लेकिन खास बात इस बार यह है कि ट्रम्प सरकार इस जंग को धर्म के नाम पर लड़ रही है, और पोप यह साफ कर रहे हैं कि दुनिया का कोई हमला धर्म और ईश्वर के नाम पर नहीं किया जा सकता। तनातनी कुछ आगे तक बढ़ गई है, और अभी नौबत यह पहुंच गई कि खबरें बताती हैं कि अमरीकी रक्षा विभाग, पेंटागन ने अमरीका में पोप के दूत, कार्डिनल को बुलाकर फटकार लगाई है, और कहा है कि चर्च को अमरीका का साथ देना चाहिए, क्योंकि अमरीका के पास अपनी मर्जी पूरी करने की ताकत है। ऐसा पता चला है कि वेटिकन ने इस धमकी के जवाब में अमरीका की 250वीं सालगिरह के जलसे में शामिल होने का न्यौता ठुकरा दिया है, और पोप के प्रस्तावित अमरीकी दौरे को रद्द कर दिया है।
यह बात कुछ अटपटी इसलिए है कि अमरीका के ताजा इतिहास में धर्म का इतना अधिक और बेजा इस्तेमाल करके और कोई सरकार नहीं बनी थी। ट्रम्प ने सत्ता में आने के पहले, और आते ही चर्च को खुश करने के लिए और कट्टर धर्मालुओं को संतुष्ट करने के लिए गर्भपात के खिलाफ तरह-तरह की कार्रवाई की। ट्रम्प के सबसे करीबी लोग अपने को धर्म का बड़ा झंडाबरदार कहते हैं, और ऐसे में पोप के साथ एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज जुबानी जंग कुछ हैरान भी करती है। ईरान पर हमला शुरू होने के वक्त से ट्रम्प और उसके करीबी मंत्रियों ने फौजी कार्रवाई को ईश्वर की इच्छा, और न्यायसंगत युद्ध की तरह पेश किया। ट्रम्प की टीम अमरीका की फौजी ताकत को दुनिया में अच्छाई लाने का जरिया करार दे रही है। अमरीकी मूल के पहले पोप बने, वर्तमान, पोप लियो ने इसे सार्वजनिक रूप से ईश्वर के नाम का दुरूपयोग कहा, और कहा कि युद्ध कभी भी ईश्वर की इच्छा नहीं हो सकते। उन्होंने यह भी कहा कि इसे सभ्यताओं की जंग कहना पूरी तरह गलत है। जंग का साथ देने के लिए ट्रम्प सरकार के दबाव पर वेटिकन ने यह साफ किया कि ताकत सच का पैमाना नहीं हो सकता। पोप ने इस बारे में कहा कि ईश्वर कमजोरों और मजदूरों के साथ है, न कि मिसाइलों और परमाणु बमों के।
दरअसल ट्रम्प सरकार आने के बाद से, और ईरान की जंग छिडऩे के बीच भी पोप ने (और पिछले पोप फ्रांसिस ने भी), अपनी चिट्ठियों में यह लिखा है कि प्रकृति की बर्बादी ईश्वर की रचना का अपमान है। यह बात पर्यावरण को बर्बाद करने के संदर्भ में भी मानी जाती है, और जंग या दूसरी मानव निर्मित आपदाओं से होने वाली प्रकृति की बर्बादी के संदर्भ में भी। अमरीकी राजनीति में एक तबका चर्च के ऐसे बयानों को राजनीति कहकर खारिज करता है, जबकि पोप ने इस मुद्दे को उठाना, चर्च का धार्मिक कर्तव्य माना है। ट्रम्प सरकार की असाधारण और अभूतपूर्व सख्त प्रवासियों पर कार्रवाई का विरोध करते हुए पोप ने कहा है कि प्रवासियों को रोकना ईसाई मूल्यों के खिलाफ है, क्योंकि ईश्वर हर इंसान में बसता है। पोप ने अमरीकी सरकार की नीतियों को मानवीय गरिमा का हनन भी बताया था। वर्तमान पोप लियो ने अमरीकी सरकार के जंग को लेकर धर्म के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति की है। दरअसल अमरीकी रक्षा (जंग) मंत्री पीट हेगसेथ ने ईरान में फंसे एक अमरीकी पायलट के बचाव की तुलना ईसा मसीह के पुनर्जन्म से की थी, और कहा था कि यह पायलट ईस्टर के दिन फिर से जीवित हुआ है, और ईश्वर की कृपा अमरीका पर है। इस मंत्री ने इस जंग को सीधे यीशु मसीह के नाम पर लड़ा जाने वाला युद्ध बताया था, और कहा था कि अमरीकी सैनिकों को असीमित हिंसा की ताकत ईश्वर से मिले, जिसमें दुश्मनों के लिए दया की कोई जगह न हो। इसके बाद ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर धमकी दी थी कि आज रात एक पूरी सभ्यता (ईरान) खत्म हो जाएगी, साथ-साथ ट्रम्प ने यह इशारा भी किया था कि यह विनाश ईश्वरीय न्याय का एक हिस्सा है क्योंकि वे अमरीका को ईश्वर समर्थित देश मानते हैं।
अमरीका के शिकागो में जन्मे पोप लियो ने अपनी अमरीकी जड़ों के बावजूद वेटिकन से ही अमरीकी सरकार के खिलाफ एक मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर जंग को आशीर्वाद नहीं देता, जो कोई भी ईसा मसीह के शिष्य हैं, वे कभी भी बम गिराने वालों के साथ खड़े नहीं हो सकते। ईसाई धर्म के एक प्रमुख समारोह, पाम संडे के संदेश में पोप ने एक धार्मिक आयत का हवाला देते हुए अमरीकी नेताओं से कहा- भले ही तुम कितनी भी प्रार्थनाएं करो, ईश्वर नहीं सुनेगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से सने हैं। पोप ने युद्ध के लिए ईश्वर के नाम का इस्तेमाल करने को ईशनिंदा करार दिया, और कहा कि ईश्वर को अंधेरे (जंग) के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, वह केवल रौशनी और शांति का प्रतीक है।
हर कुछ हफ्तों में छत्तीसगढ़ के निजी नर्सिंग कॉलेजों के बारे में खबरें छपती हैं कि किस तरह वहां न साधन है, न सुविधा, और इसके बाद भी उनकी मान्यता जारी रहती है। फीस सरकार तय करती है, और यहां आने वाले छात्र-छात्राओं में 90 फीसदी के करीब छात्राएं रहती हैं, और तमाम लोगों में 90 फीसदी गरीब परिवारों से आते हैं। फीस और रहने-खाने का साल भर का करीब लाख रूपए का खर्च होता है, कई साल का कोर्स है, और कॉलेजों का ढांचा इतना कमजोर है कि मरीजों की देखरेख का पर्याप्त मौका पाए बिना यहां से नर्सें निकलती हैं, और अस्पताल उन्हें मामूली से भी कम तनख्वाह पर रखते हैं। गरीब परिवारों का खर्च भरपूर हो जाता है, लेकिन यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों का भविष्य बिल्कुल सीमित रहता है। अखबारों में बार-बार छपने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह नियमों को अनदेखा करके नर्सिंग कॉलेज चलते हैं, और दर्जनों कॉलेजों की किसी अस्पताल से संबद्धता नहीं है, फिर भी उन्हें मान्यता मिली रहती है।
सरकार की यह उदासीनता हमें कुछ अधिक हद तक हैरान इसलिए करती है कि इस कोर्स में आने वाली तमाम छात्राएं गैरसवर्ण तबकों की रहती हैं, आदिवासी, अनुसूचित जाति, और अधिक से अधिक ओबीसी समुदाय की लड़कियां नर्स बनने आती हैं, आदिवासी इलाकों में नर्सिंग कॉलेज भी इसीलिए अधिक रहते हैं, लेकिन नर्सिंग-शिक्षा का स्तर चौपट है। अब नर्स बनकर निकलने तक अगर किसी अस्पताल में मरीजों के इलाज का असल काम कुछ बरस तक करने नहीं मिला, तो यह कोर्स क्लासरूम की पढ़ाई का तो है नहीं। और हालत यह है कि भारतीय नर्सों की दुनिया के बहुत से पश्चिमी, विकसित, और संपन्न देशों में अच्छी-खासी मांग है। भारत के भीतर भी बड़े-बड़े महंगे अस्पताल लगातार बढ़ रहे हैं, और वहां भी अच्छे नर्सिंग कॉलेजों से पढक़र निकली हुई नर्सों को तो जगह मिल जाती है, लेकिन वहां का मैनेजमेंट भी यह देख लेता है कि किस प्रदेश, या किन कॉलेजों में नर्सिंग-शिक्षा का स्तर खराब है, और वहां के लोगों को अच्छी जगहों पर जगह नहीं मिलती।
एक ऐसी पढ़ाई जिसमें सौ फीसदी रोजगार की गारंटी होनी चाहिए, जिसके लिए देश के बाहर भी अंधाधुंध संभावनाएं हैं, उसे स्तरहीन शैक्षणिक ढांचे, स्तरहीन पढ़ाई, और इलाज के साथ के पर्याप्त अनुभव की कमी से बहुत ही औसत दर्जे का बनाकर रख दिया गया है। यह सिलसिला देश में एक नौजवान पीढ़ी को उसकी बेहतर संभावनाओं से दूर रखता है। आज हालत यह है कि अस्पतालों से परे भी संपन्न या मजबूर-मध्यमवर्गीय परिवारों में घर पर मरीजों या बुजुर्गों की देखभाल का रोजगार बढ़ते चल रहा है। डॉक्टर की निगरानी में इलाज चलता है, और नर्सों की मदद से घर पर बुजुर्ग या बीमार की जिंदगी चलती है। रोजगार का यह दायरा लगातार बढ़ते चल रहा है क्योंकि न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है, तरह-तरह के इलाज बढऩे से लोगों की देखभाल की संभावना भी बढ़ रही है। ऐसे में दुनिया के जिन देशों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ते जा रहा है, वहां के बारे में हमने पहले भी यह बात लिखी थी कि होम केयर के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों को दुनिया के कई देशों में काम मिल सकता है, और जिन देशों में भारतीय होम केयर कामगारों की मांग है, वहां की भाषा, और संस्कृति को भी सिखाने-पढ़ाने का काम भारत में करना चाहिए। देश के भीतर सरकारी नौकरियां कम होती चल रही हैं, लेकिन बाकी दुनिया में भारत के कामगारों के लिए नौकरी-रोजगार की संभावनाएं इसके मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। अगर भारत इन संभावनाओं को अनदेखा करेगा, तो दुनिया के बहुत से और देश हैं जहां से होम केयर के शिक्षित-प्रशिक्षित कामगार आज भी हर संपन्न देश जाकर काम कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कल राज्य के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को खासा सुनाया है। इन्हें नियमित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सरकार को चार महीने के भीतर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने को कहा है। ये मामला वन विभाग के डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का है जो कि 2006 से 2016 तक लगातार कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक, और सुरक्षाकर्मी जैसे पदों पर नियुक्त हुए थे। लेकिन 10 साल से काम करने के बाद भी राज्य सरकार ने उन्हें नियमित नहीं किया। ये कर्मचारी अदालत तक जाकर यह तर्क भी दे रहे हैं कि अब वे यह काम करते-करते किसी भी दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। हाईकोर्ट में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि आर्थिक तंगी की वजह से सरकार सबको नियमित कर्मचारी नहीं बना सकती। इस पर अदालत ने कहा कि अगर किसी काम का स्वरूप स्थायी और बारहमासी है, तो कर्मचारियों को अस्थायी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह गरीब कर्मचारियों की हक की कीमत पर अपने बजट का संतुलन नहीं साध सकती। जज ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो कर्मचारी बरसों से बुनियादी और जरूरी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक अस्थायी बनाए रखना उनके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फैसलों की भावना के अनुरूप ही सरकार कर्मचारियों के मामलों पर विचार करे। जज ने कहा कि नियमित नियुक्तियों से बचने के लिए सरकार अस्थायी व्यवस्था और आउटसोर्सिंग का सहारा लेती है।
यह मामला बड़ा व्यापक और बड़ा दिलचस्प है। सरकार के अलग-अलग दर्जनों विभागों और हजारों दफ्तरों में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं। इन्हें कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मजदूरी की तरह मेहनताना दिया जाता है, जो कि एक व्यक्ति के जिंदा रहने के लिए ही काफी रहता है। ऐसे में यही कर्मचारी अगर 10-10 बरस तक सरकार में वही काम कर रहे हैं, तो उन्हें दैनिक वेतनभोगी बनाकर रखना सचमुच ही नाजायज बात लगती है। लोगों को याद होगा कि शिक्षकों की कमी में सरकार शिक्षाकर्मी नियुक्त करती थी जो कि काम वही का वही करते थे, पूरी तरह से शिक्षकों जैसा ही पढ़ाते थे, लेकिन सरकार उन्हें शिक्षकों के वेतन के मुकाबले बहुत थोड़ा सा भुगतान करती थी। उनका भी मामला बरसों तक चला था, और नियमित करने के लिए वे आंदोलन करते ही रहते थे। पुलिस की कमी में एक वक्त नगर सैनिक या होमगार्ड बनाए जाते थे, लेकिन उन्हें पुलिस बनने का मौका नहीं मिलता था। सरकार के बहुत सारे अमले की कमी को इसी तरह कामचलाऊ इंतजाम से पूरा किया जाता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर जहां फौज में सैनिकों की कमी है, वहां पर क्या अग्निवीर नाम के चार सालाना लोग तैनात किए जा रहे हैं, और चार बरस के बाद कानूनी रूप से तो वे सडक़ों पर रहेंगे, यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार की बहुत महत्वाकांक्षी योजना होने के कारण उन्हें राज्य सरकारें कहीं न कहीं एडजस्ट करने की बात कर रही हैं। लेकिन जिस तरह का मुद्दा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का आया है, क्या अग्निवीरों का मुद्दा ठीक उसी तरह का नहीं है? कि वे चार बरस तक फौज में काम करने के बाद किसी कारखाने के गेट को खोलने-बंद करने की चौकीदारी में लगेंगे? केंद्र सरकार भी तो अग्निवीरों की उसी तरह संवैधानिक नियोक्ता है जैसी नियोक्ता छत्तीसगढ़ सरकार दस बरस से वन विभाग में काम कर रहे इन दैनिक वेतनभोगियों की है।
दरअसल जनता की जरूरतें और सरकार का बजट, इन दोनों के बीच में कोई तालमेल हो नहीं पाता है। फिर इसके बाद अलग-अलग राज्यों में पांच साल में दो-तीन अलग-अलग चुनाव हो जाते हैं, जिनकी वजह से सत्तारूढ़ पार्टी की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, और वोटरों को तात्कालिक संतुष्ट करने का एक दबाव बना रहता है। सत्तारूढ़ पार्टी तो यह दबाव झेलती ही है, अधिकतर चुनावों में प्रमुख विपक्षी दल भी किसी भी तरह सत्ता पर आने की कोशिश में अपने चुनाव घोषणा पत्र में कई तरह के वायदे करते हैं, और सरकार में आने पर उन्हें निभाने में बजट का खासा हिस्सा चले जाता है।
ऐसा माना जा रहा है कि वोटरों को सीधे फायदा देने की कई योजनाओं के चलते देश के कई राज्य विकास के, और रोजाना के रखरखाव के बहुत से काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। दीर्घकालीन ढांचा-विकास की योजनाओं के बारे में सोचना कम होने लगा है, क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनावों में वोटरों का समर्थन राज्य, केंद्र, और म्युनिसिपल-पंचायत में कायम रखने के लिए, ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने के लिए दबाव झेलती है, और कर्मचारियों को नियमित करना वोटरों को लुभाने में उतना कारगर नहीं होता है, जितना कि सीधे फायदा पहुंचाने वाली कई योजनाएं होती हैं।
बीती बहुत देर रात तक हिन्दुस्तानी अखबारों ने राह देखी होगी कि आखिरी संस्करण छपने जाने के पहले अगर ईरान पर हमला शुरू हो जाए, तो उस खबर को ले लिया जाए। वह तो हो नहीं पाया, क्योंकि दुनिया के इतिहास की सबसे खतरनाक धमकी के बाद डॉनल्ड ट्रम्प ईरान के साथ एक पखवाड़े के युद्धविराम की घोषणा करते दिखे। हमले का वक्त भारत के समय के मुताबिक सुबह साढ़े 5 बजे बताया गया था, और इसके ठीक 10 मिनट पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐलान किया कि युद्धविराम हो गया है, और तुरंत लागू हो गया है। एक लाईन में कहा जाए तो दो बुनियादी शर्तों पर यह सहमति बनी है कि ईरान पर हमले रोक दिए जाएं, और ईरान जलडमरूमध्य को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दे। दोनों देशों ने इस पर सहमति जाहिर की है, और दो दिन बाद 10 अप्रैल से पाकिस्तान में दोनों पक्षों के बीच शांति और समझौता वार्ता शुरू होगी। ट्रम्प ने जिस जुबान में ईरान से सभ्यता को हमेशा के लिए खत्म कर देने का ऐलान किया था, वह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी फौजी धमकी थी, और अमरीकी मूल के पोप लियो ने इस धमकी पर कहा था कि ईरान के सभी लोगों के खिलाफ ऐसी धमकी और ऐसा खतरा मंजूर नहीं किया जा सकता। वे अमरीका में जनमे हुए पहले पोप हैं, और जंग के बीच उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति के इस बयान की आलोचना के पहले भी अमरीकी युद्ध-मंत्री के फतवों की आलोचना की थी जिसमें उसने इस जंग को ईश्वर की मर्जी करार दिया था।
खैर, आज सुबह का हिन्दुस्तानी सूरज का वक्त पूरी दुनिया के लिए एक नई तस्वीर लेकर आया है। महीने भर से अधिक से ईरान पर इजराइल, और उसके पिट्ठू बने हुए अमरीका के फौजी हमले चल रहे थे। इस एक महीने ने यह भी साबित किया कि अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प किस तरह एक मानसिक रोगी है, अस्थिर दिमाग का है, फैसले लेने में सक्षम नहीं है, तुरंत ही दफ्तर से बाहर कर देने के लायक है, यह एक अलग बात है कि अमरीकी संविधान में बिना दिमाग के तानाशाह राष्ट्रपति को भी हटाने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसलिए खुद अमरीकियों ने इस युद्धविराम से राहत की सांस ली है क्योंकि बेदिमाग ट्रम्प ने पूरी दुनिया को जिस तरह के ऊर्जा संकट में डाला है, अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, उसकी वजह से खुद अमरीकी अपने-आपको कोस रहे हैं कि उन्होंने यह कैसा पिशाच चुन लिया था। खैर, अगर ट्रम्प आज जिस तरह पूरी दुनिया को तबाह कर रहा है, उस तरह अगर वह सिर्फ अमरीका को तबाह करता, तो हमें कोई शिकायत नहीं रहती। दिक्कत यह है कि वह चुना तो गया है अमरीका के लिए, लेकिन तबाह उसने पूरी दुनिया को कर दिया है। लेकिन इस एक महीने ने अमरीका को यह आईना भी दिखा दिया है कि उसकी निहायत नाजायज जंग से किस तरह योरप के एक-एक देश ने अपने-आपको अलग कर लिया, और नाटो को खत्म कर देने की धमकी देने के बावजूद कोई देश ट्रम्प के साथ नहीं आया। ऐसी अंतरराष्ट्रीय तबाही के दबावतले भी ट्रम्प तानाशाही दिखा रहा था, और यह उसकी असामान्य और बीमार मानसिक हालत का एक सुबूत था।
बाकी दुनिया के साथ-साथ यह भारत के लिए भी एक राहत की बात हो सकती है कि देश में इस वक्त चल रही गैस की किल्लत शायद कुछ दिनों में खत्म या कम हो जाए, इसके साथ-साथ खाड़ी के देशों में भारत से होने वाले निर्यात का रास्ता भी कुछ खुल सकता है, हो सकता है इससे छत्तीसगढ़ के तरबूज एक बार फिर खाड़ी के देशों में जा सकें, और नदी की जलती रेत पर तरबूज की फसल लेने वाले लोगों की बर्बादी टल सके, भारत के दसियों हजार कारखाने फिर शुरू हो सकें, और करोड़ों मजदूर तात्कालिक बेरोजगारी से बच सकें। लेकिन भारत को अपने बारे में कुछ सोचना होगा। जब ईरान की जंग को लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने विपक्षी पार्टियों से बात की, और विपक्ष ने पूछा कि भारत इस जंग में चुप क्यों है, जबकि पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, तो इस पर विदेश मंत्री जयशंकर का जवाब था- भारत कोई दलाल देश नहीं है, भारत की अपनी अलग गरिमा और नीति है। यह बयान सैकड़ों अखबारों में गूंजा, जगह-जगह इसके बारे में लिखा गया, लेकिन भारत सरकार ने इस शब्द का खंडन नहीं किया, बल्कि यह कहा कि भारत वैश्विक मंच पर बिचौलिए की भूमिका निभाने के बजाय सीधे संवाद और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। कई विपक्षी दलों ने जयशंकर की भाषा को अमर्यादित बताया, लेकिन जयशंकर इस पर अड़े रहे। अभी चार-पांच अप्रैल को ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक्स पर लिखकर पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों की सराहना की, कहा कि वे इसके लिए दिल से अहसानमंद हैं, और उन्होंने संदेश के अंत में पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा। ईरान को लग रहा था कि तमाम मुस्लिम देशों के बीच अकेला पाकिस्तान ही ऐसा है जो उसके बारे में अमरीका से बात कर रहा है। इधर भारत में जयशंकर के कहे हुए दलाल और दलाली जैसे शब्दों को लेकर पाकिस्तान की बात तो छोड़ें, खुद भारत में लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। जब दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर रही दो देशों के बीच की जंग इस हद तक बेकाबू हो चली हो, तो उसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाना दलाली नहीं होती, वह एक लीडरशिप होती है। यह भारत की जाने कौन सी विदेश नीति है जो मध्यस्थता के बारे में सोच भी नहीं रही, शायद सोच भी नहीं सकती, और एक मध्यस्थ को गाली दे रही है!
छत्तीसगढ़ के अखबारों में पिछले कुछ दिनों से गर्मी बढऩे के साथ-साथ जमीन के भीतर पानी नीचे जाने की खबरें आ रही हैं। ऐसा हर गर्मी में होता है, और कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों में कलेक्टरों के आदेश निकल जाएंगे कि जिला प्रशासन की इजाजत के बिना गर्मी में नए ट्यूबवेल नहीं खोदे जा सकेंगे। लेकिन गर्मी निकलते ही ट्यूबवेल खोदना फिर शुरू हो जाएगा, और उनसे पानी निकालना तो बाकी की पूरी जिंदगी चलता ही रहेगा। केन्द्र सरकार के भूजल के सर्वे के आंकड़ों को देखें, तो छत्तीसगढ़ के कई जिलों, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, मुंगेली, बालोद, जैसे जिलों के सभी विकासखंडों में लगातार भूजल नीचे जा रहा है। बस्तर संभाग को छोडक़र बाकी चार संभागों में हालत तेजी से बिगड़ रही है। और यह तब है जब 2023-24 में छत्तीसगढ़ में औसत से बेहतर बारिश हुई थी। अखबारी खबरों से किसी की नींद खुलते दिख नहीं रही है, और जब छत्तीसगढ़ की हालत चेन्नई शहर, या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों जैसी हो जाएगी, तब नौबत संभालने का वक्त निकल चुका रहेगा। आज समय रहते अगर राज्य सरकार जागकर कड़ी कार्रवाई करे, कमर कसकर यह तय करे कि जब तक भूजल स्तर बढऩे नहीं लगे, तब तक जो-जो जरूरी रहेगा, वह किया जाएगा, तो ही बात बन सकती है।
हम जमीन के नीचे पानी तेजी से नीचे चले जाने की वजहों को देखते हैं, तो समझ आता है कि प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना पानी बारिश के वक्त जमीन के भीतर जा नहीं पाता है। इसकी कई बहुत जाहिर वजहें हैं। एक तो यह कि धान की फसल राजस्थानी ऊंट सरीखी प्यासी रहती है, और मुफ्त की बिजली, या रियायती बिजली की मेहरबानी से, और फसल का तकरीबन एक-एक दाना महंगे दामों पर सरकार द्वारा खरीद लेने से लोग धान के अपने खेत को तालाब की तरह लबालब भर लेते हैं। जितना पानी जरूरी नहीं रहता, उतना भी जमीन के नीचे से उलीचकर खेतों में डाल दिया जाता है, जिसका बहुत सा हिस्सा भाप बनकर उड़ भी जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में पानी की खपत का 84 फीसदी हिस्सा खेतों में जाता है, 12 फीसदी हिस्सा शहरी घरों में, और 4 फीसदी हिस्सा कारखानों में। ऐसे में सरकार को इनमें से हर मोर्चे पर कड़े फैसले लेने पड़ेंगे, वरना किसी भी मौजूदा सरकार के पांच साल तो निकल जाएंगे, लेकिन जमीन के पेट से निकाला गया पानी वापिस नहीं जा पाएगा।
हम आंकड़ों के जाल में इस बुनियादी बात को उलझाना नहीं चाहते। इसलिए साफ-साफ आसान शब्दों में खतरे, और उससे जूझने की संभावनाओं पर लिख रहे हैं। खेतों में बेहिसाब पानी को रोकना आसान नहीं है, और सरकार चाहे गर्मी की फसल के लिए नहरों से पानी न दे, लोगों के पंप तो चलते ही हैं। सरकार को यह इंतजाम करना होगा कि गर्मी के महीनों में जब धान की फसल और अधिक पानी मांगती है, तब तो बाकी आबादी को भी पानी की अधिक जरूरत रहती है, और गर्मी की धान की फसल को हर हाल में रोकना चाहिए, सरकार को न उसकी खरीदी करनी चाहिए, न उसकी इजाजत देनी चाहिए। अब इस बारे में किसानों का कहना कुछ और हो सकता है, लेकिन हमारी सामान्य समझ हमें पानी बचाने के लिए यह रास्ता बता रही है। दूसरी बात यह कि फसल के बाकी मौसम में भी धान की फसल के विकल्प की तरफ सरकार को बढऩा होगा, किसानों को बढ़ाना होगा, वरना एक दिन धान के लायक पानी नहीं बचेगा, धान की फसल नहीं बचेगी, और किसानों के पास मंडी में बेचने को कुछ रहेगा नहीं। ऐसा हाल हो सकता है कि दस-बीस बरस न हो, लेकिन जब हम पूरे राज्य की बात कर रहे हैं, तो हमें अगले सौ-पचास बरस की तैयारी करनी चाहिए। पांच-पांच बरस में बंटी हुई सरकारें अपने कार्यकाल से आगे का देखना नहीं चाहतीं, लेकिन उतने से काम चलेगा नहीं।
आज की ही एक खबर बताती है कि पांच साल में रायपुर का भूजल स्तर 45 फीसदी गिर गया है। और यह 60 से 120 फीट तक नीचे चले गया है। कई इलाकों में तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे जा चुका है। लोगों को अधिक गहराई से पानी खींचने वाले पंपों पर अधिक भरोसा है, इसलिए पानी की खपत की तरफ से, और धरती का पेट खाली हो जाने की तरफ से वे बेफिक्र हैं। सीधे शब्दों में कहें तो लोगों के तमाम निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाने की जरूरत है क्योंकि अपने जमीन पर खुदवाए हुए ट्यूबवेल भी पानी तो जमीन के नीचे से सामूहिक जल भंडारों से ही खींचते हैं। किसी का भी नलकूप सिर्फ उन्हीं की जमीन के नीचे से तो पानी नहीं खींचता। आज हालत यह है कि पैसे वाले लोग अपनी गाडिय़ों को ड्राइवरों से इतनी देर तक धारदार पानी से धुलवाते हैं कि मानो वह धान का खेत हो, और वहां पानी लबालब भरना हो। राजधानी के भीतर ही सडक़ किनारे प्रेशर पंप से गाडिय़ों को धोने के कारोबार चल रहे हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। दरअसल पानी को सार्वजनिक और सामूहिक संपत्ति मानने की सोच जब तक विकसित नहीं होगी, और उसके लिए कानून नहीं बनेगा, पैसेवालों की नजर में सार्वजनिक सम्पत्ति अपने घर के सामने सडक़ धोने लायक बनी रहेगी। जिसके पास बोर है, पंप है, और बिजली बिल देने के लिए इफरात पैसा है, वे धरती को खाली कर दें, यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का इंतजाम है। दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों में भी गाडिय़ों के धोने पर तरह-तरह की रोक रहती है। ट्यूबवेल पर मीटरिंग से बर्बादी में कमी आएगी, और लोगों में जागरूकता भी आएगी। वरना कुछ बरस बाद जाकर जब छत्तीसगढ़, या कोई दूसरा प्रदेश, जब प्यास से मरने लगेगा, उस दिन एकाएक जागरूकता नहीं आएगी। आज ट्यूबवेल से निकला हुआ एकदम साफ पानी जिस तरह बर्बाद किया जा रहा है, उसमें बड़े-बड़े बंगलों में घास के मैदान, लॉन सींचना भी शामिल है। इससे पर्यावरण को कुछ हासिल नहीं होता, और संपन्न या सत्तारूढ़ तबके की आंखों को हरा-हरा सुख देने के लिए घास लगाई जाती है।
छत्तीसगढ़ में कल 17 बरस की एक 11वीं की छात्रा की मौत हो गई। घटना की पूरी जानकारी सामने आई है। वह किसी के साथ प्रेम-प्रसंग में थी, और दोनों ने मिलकर कोई मोबाइल फोन खरीदा था, लडक़े ने शायद अपने हिस्से का पैसा दे दिया था, लडक़ी नहीं दे पाई थी। दो दिन पहले वह शाम को उस लडक़े के घर गई, रात वहीं रूकी, फोन को लेकर झगड़ा हुआ, तो उस लडक़े ने फोन रख लिया। गुस्से में लडक़ी ने जाकर पेट्रोल खरीदा कि वह आत्मदाह करेगी, लडक़े ने पेट्रोल छीनकर अपनी मोटरसाइकिल में डाल लिया, और चले गया। पीछे से लडक़ी ने सडक़ पर ही आत्मदाह किया, और बुरी तरह जली हालत में एक दिन बाद अस्पताल में वह चल बसी।
हम इस एक अकेली घटना को लेकर यहां लिखना नहीं चाहते, लेकिन बालिग-नाबालिग लोगों में जिस तरह के प्रेम और देह-संबंध हो रहे हैं, जिस तरह शादीशुदा जिंदगी से परे के बेवफाई के रिश्ते हो रहे हैं, जिस तरह कुछ पत्नियां प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों को निपटा दे रही हैं, और जिस तरह कुछ पत्नियों को डरे-सहमे पति भी प्रेमी के साथ बिदा कर दे रहे हैं, इन सब पर गौर करने और सोचने-विचारने की जरूरत है। समाज में एकदम से शादी के पहले के प्रेम और देह-संबंधों, और शादी के बाद के विवाहेत्तर संबंधों का विस्फोट सा हुआ है। ऐसा लगता है कि पहले तो दुपहियों से मिली आजादी, और उसके बाद मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर सवार होकर आई बड़े आकार की आजादी ने एक पीढ़ी में ही लोगों की सोच बदल दी, उनका तौर-तरीका बदल दिया, और समाज के ढांचे को बदलकर रख दिया। टेक्नॉलॉजी की वजह से मिली हुई नई आजादी, बनते हुए नए रिश्तों ने समाज के परंपरागत ढांचे को, लोगों की वर्जनाओं को एकदम से ढहा दिया है, और लोगों को मानसिक और शारीरिक रोमांच की संभावनाएं दिखा दी हैं। परंपरागत प्रेम का रोमांस अब एक रोमांच के साथ मिलकर कई तरह की नई दुनिया गढ़ रहा है। बालिग और नाबालिग होने के फर्क खत्म हो गए हैं, और शादीशुदा जिंदगी के बाद के प्रेम के संबंध भी हर दिन पहले के मुकाबले अधिक आम होते जा रहे हैं।
आज ही मध्यप्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट का एक कुछ हटकर फैसला आया है जिसमें 19 बरस की एक युवती की शादी 40 बरस के एक आदमी से कर दी गई थी, और तालमेल न बैठने की वजह से उसने मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने पर अपने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई, हाईकोर्ट ने प्रेमी के साथ रहती हुई इस युवती को इस बात की इजाजत दी कि वह वहां रहना चाहती है तो वहां रहे। अदालत ने इतना किया कि पुलिस की दो महिला सिपाहियों को 6 महीने तक इस युवती की हिफाजत के लिए ‘शौर्या दीदी’ नियुक्त किया है। इसके साथ ही इस केस को अदालत ने खत्म कर दिया। शादीशुदा महिला अपने प्रेमी के साथ रहने लगी, पति द्वारा दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने मामला सुना, और बालिग युवती के मनमर्जी के हक के हक में फैसला सुनाया। ऐसी व्याख्या अलग-अलग कई अदालतें कई मामलों में कर चुकी हैं, अभी कुछ दिन पहले ही एक दूसरा मामला आया था जिसमें एक शादीशुदा आदमी पत्नी से परे अपनी प्रेमिका के साथ रह रहा था, और उसे भी अदालत ने जायज ठहराया था। जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस तरह के उदार फैसले देने लगते हैं, तो समाज में हसरतें रखने वाले और लोगों का भी हौसला बढ़ता है। ऐसे फैसलों के बाद ये नजीरें निचली अदालतों में भी काम आती हैं।
दुनिया में डॉनल्ड ट्रम्प जैसे बेवकूफों की कमी नहीं है जो जलवायु परिवर्तन को एक फर्जी दावा मानते हैं। और भी बहुत से लोग अपने सुख या दुख के घरौंदों के भीतर रहते हुए यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण शायद एक दिन अपने आप ठीक हो जाएगा, या कि यह महज सरकार की जिम्मेदारी है, और इसमें उनके करने का भला क्या है। लेकिन पूरी दुनिया में जगह-जगह जलवायु परिवर्तन से जो स्थाई नुकसान होना शुरू हो रहा है, वह आगे बढ़ते ही चलना है। मिसाल के लिए राजस्थान का गर्मी का यह मौसम देखें, तो वहां यूपी-बिहार से आए हुए लाखों खेतिहर मजदूर वापिस अपने गांव लौट रहे हैं, क्योंकि 48 से 50 डिग्री तक गर्म होने वाले राजस्थान की सूखी मिट्टी में पानी इतना नीचे जा चुका है, और जाते जा रहा है कि वहां के बहुत से हिस्सों में अब खेती मुमकिन नहीं रह गई है। जो खेतिहर मजदूर पिछले 10-15 बरस से वहां फल-सब्जी, और मसालों के खेतों में काम करते थे, वे वापिस जा रहे हैं कि राजस्थान के खेतों में अब फसल मुमकिन नहीं रह गई। इनमें खेतिहर मजदूरों से थोड़े ऊपर के ऐसे किसान भी हैं जो राजस्थान जाकर खेती करते थे, लेकिन अब वह मुमकिन नहीं रह गया।
राष्ट्रीय अप्रवासन सर्वेक्षण (एनआईएस, और आईआईएम अहमदाबाद) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में राजस्थान से पिछले बरस करीब 13 लाख मजदूर यूपी-बिहार लौटे, इनमें से तीन चौथाई छोटे और सीमांत किसान थे, और बाकी खेतिहर मजदूर थे। राजस्थान के कई जिलों में, प्याज, जीरा, और ग्वारफल्ली की खेती करने वाले पूरब के ये मजदूर परिवार सहित रेलगाडिय़ों पर लदकर लौट रहे हैं। राजस्थान में पिछले तीन साल से मानसून करीब आधा ही रहा। नहरों में पानी नहीं है, ट्यूबवेल सूख गए हैं क्योंकि जमीन के नीचे पानी पांच-छह सौ फीट तक नीचे चला गया है। ऐसी सूखी हालत में जीरे की फसल एक तिहाई-एक चौथाई रह गई है। पशुओं के लिए भी चारा नहीं है, इसलिए दूध-दही का कारोबार भी ठप्प है, या खत्म है। जो मजदूरी बनती है, वह खाने-रहने में ही खर्च हो जाती है। एक वक्त बिहार और यूपी के कई जिलों से परंपरागत रूप से हर बरस राजस्थान आकर काम करने वाले किसान-मजदूर पहले तो यहां के भरोसे पीछे देश में भी घर चला लेते थे, लेकिन वे अब देश ही लौटकर पशुपालन या मनरेगा की मजदूरी पर चल रहे हैं। और यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है, यह रिपोर्ट सिर्फ राजस्थान से आई है। देश भर में अगर ऐसा व्यापक सर्वे होगा, तो कई दूसरे प्रदेशों से कई दूसरे प्रदेशों में लोगों का यह बेबस-प्रवास बेहतर तरीके से दर्ज हो सकेगा। लोग सूखे-प्यासे राजस्थान से अपने यूपी-बिहार लौट तो रहे हैं, लेकिन उधर घर पर बाढ़ का एक अलग खतरा है जो हर बरस बहुत बड़े इलाकों डुबा देता है, और गाद-मिट्टी से खेत पट जाते हैं, बाढ़ के इलाकों में फसलें डूब या बह जाती हैं। जलवायु परिवर्तन से एक तरफ सूखा बढ़ रहा है, और एक तरफ अचानक कम वक्त में बहुत अधिक बारिश से बाढ़ बढ़ रही है।
कृषि अर्थशास्त्रियों की बात सुनें, तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले जलवायु-प्रवास का कोई जिक्र नहीं है। अभी तक सरकारें इसे मौसमी-मजदूरी मानकर चल रही हैं, जबकि यह जलवायु परिवर्तन से होने वाले मजबूर-मजदूर-प्रवास का मामला है। यूपी और बिहार में जलवायु-प्रवास फंड बना जरूर है लेकिन उसमें इतना छोटा बजट रखा गया है कि 25 लाख से अधिक प्रभावित परिवार हैं, और रकम कुल 120 करोड़ है। आईआईटी गांधीनगर के जलवायु वैज्ञानिक प्रो.वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि 2030 तक राजस्थान से 40 लाख लोग बिहार लौटेंगे, और 60 लाख लोग यूपी लौटेंगे। एक तरफ खेतिहर मजदूर गायब हो जाएंगे, क्योंकि खेतों में फसल गायब होती जा रही है, या इतनी घटती जा रही है कि उसमें भूस्वामी और किसान-मजदूर सबका गुजारा नहीं है। ऐसे में खेतिहर-मजदूर शहरी स्लम-मजदूर बनकर रह जाएंगे, शहरों में झोपड़पट्टियों की गिनती और आबादी बढ़ती जाएगी, दूसरी तरफ शहरों में गर्मी से जो बुरा हाल बढ़ते जाना है, बढ़ते ही जा रहा है, उसकी वजह से वहां साल के दर्जनों दिन काम ठप्प रहेगा, किसी तरह का काम खुले में हो नहीं सकेगा। शहरों की गर्मी में लोगों के मरने की नौबत अधिक आएगी, दूसरी तरफ शहरों में बढ़ती गर्मी की वजह से लोगों की उत्पादकता घटती जाएगी, और एक मजदूर की तरह वहां रहना मुश्किल हो जाएगा।
जब जलवायु से जुड़ी इन बातों को दिल्ली जैसे महानगर की प्रदूषित जहरीली हवा के असर से जोडक़र देखेंगे, तो समझ पड़ेगा कि वहां साल में कुछ महीने कंस्ट्रक्शन बंद रहता है, कारखाने बंद रहते हैं, गाडिय़ों की आवाजाही पर रोक रहती है, उस हवा में सांस लेकर जीने का मतलब एक औसत उम्र को 8-10 बरस घटा देना रहता है। ऐसे में वहां सालाना मजदूरी के दिन इस वजह से भी घटते जा रहे हैं। अब पिछले कई हफ्तों से गैस की कमी से छोटे-छोटे कारखाने बंद हैं, खाने-पीने से जुड़े कारोबार बंद हैं, और मजदूरों को निर्माण और उत्पादन के केन्द्र छोडक़र घर लौटना पड़ रहा है। जब इस तरह की जंग से पैदा आपदा को जलवायु-आपदा के साथ जोडक़र देखें, तो लगता है कि मजदूर की तो हर कहीं मौत है। अब ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों के जिम्मे क्या आता है? ईरान की जंग और ऊर्जा-खाद के संकट पर तो सरकार का तात्कालिक काबू कुछ नहीं है, इससे जूझने-निपटने के लिए सरकारों को घरेलू आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ निजी गाडिय़ों की खपत पर बुरी तरह रोक भी लगानी होगी, और उसके पहले सरकारों को सार्वजनिक परिवहन को बहुत आगे तक ले जाना होगा।
एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें बंगाली या असमी में दुकानों के बोर्ड दिख रहे हैं, बाजार के बीच जोरों से एक धार्मिक डीजे बज रहा है, एक धर्म के झंडे-डंडे दिख रहे हैं, कुछ लोग तलवारें लिए भी दिख रहे हैं, और सैकड़ों बालिग-नाबालिग लड़कियां लाउडस्पीकर पर बजते मां की गाली वाले एक गाने की धुन पर बावलों की तरह नाच रही हैं, और गाने में किसी के मां के शरीर के जिस अंग का ब्यौरा है, अपने शरीर के उस अंग की तरफ इशारा करते हुए भी नाच रही हैं। गजब का धार्मिक उत्साह दिख रहा है। कई लोगों ने इस वीडियो के महज स्क्रीनशॉट पोस्ट किए हैं कि इतनी गंदी गालियों वाले गाने-वीडियो वे पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन कुछ लोगों ने वीडियो भी पोस्ट किए हैं। यह शायद चुनाव के मुहाने पर खड़े असम या बंगाल का वीडियो दिखता है, और जाहिर तौर पर इस चुनाव के मकसद से इसे सडक़ पर किसी धार्मिक जुलूस में रिकॉर्ड किया गया, या अभी फैलाया गया है। किसी दूसरे धर्म के लोगों की मां को सबसे गंदी गाली देते हुए न सिर्फ यह गाना कम्पोज किया गया, बल्कि उसे रिकॉर्ड करके बजाया भी जा रहा है, और तेज आवाज के डीजे की धुन पर लड़कियों दीवानों की तरह नाच रही हैं। धर्म का मकसद पूरा हो गया लगता है।
अभी भारत में कई तरह के दूसरे मामले भी धर्म से जुड़े हुए सामने आए हैं। महाराष्ट्र में मंदिर ट्रस्टों का मुखिया, और एक हिन्दू ज्योतिषी, धर्म का और ईश्वर का नाम लेकर कोई सौ-डेढ़ सौ हिन्दू महिलाओं के साथ अपने सेक्स के वीडियो बनाकर बैठा था। इसके खिलाफ बलात्कार की शिकायतें सामने आईं, तो गिरफ्तारी के साथ पुलिस को इसके कब्जे से ऐसे करीब डेढ़ हजार वीडियो मिलने की खबर है। राज्य के बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेताओं से इसका गठजोड़ सामने आया है। राजनीतिक लोगों को बेशर्म बना ही देती है, लेकिन एक सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के नाम पर देवी-देवताओं की प्रतिमा-फोटो लगाकर, मंदिर बनवाकर जो आदमी इस तरह दर्जनों या सैकड़ों हिन्दू महिलाओं की जिंदगी बर्बाद करते रहा, और अब उनसे सेक्स के वीडियो छोड़ गया है, तो इस पर हिन्दू संगठनों ने क्या किया? यह सवाल हमारा बहुत मौलिक सवाल नहीं है, सोशल मीडिया पर बहुत सारे जाने-माने, परिचित, और जिम्मेदार प्रमुख हिन्दू लोग ही यह सवाल खड़ा कर रहे हैं। और इस सवाल से सहमति के साथ हम इसे दोहरा रहे हैं कि कहीं-कहीं इक्का-दुक्का होने वाली अंतरजातीय शादियों, या दो धर्मों के बीच होने वाली शादियों को लेकर, सहमति को भी अनदेखा करके बवाल तो आसानी से खड़ा हो जाता है, लेकिन जब एक-एक व्यक्ति इस तरह दर्जनों महिलाओं के साथ धर्म, आध्यात्म, तंत्र-मंत्र साधना के नाम पर सेक्स करता है, वीडियो रिकॉर्डिंग करके उन्हें ब्लैकमेल करता है, और उनकी पहचान को उजागर कर देता है, तो इस पर इन पीडि़त महिलाओं का धर्म क्या करता है? उसका झंडा-डंडा लेकर चलने वाले लोग क्या करते हैं? और बात महज इस नए ज्योतिषी या तांत्रिक की नहीं है, हर कुछ दिनों में ऐसे किसी का मामला सामने आता है। अलग-अलग नामों वाले आसाराम बलात्कारी साबित होते हैं, और पीडि़ता या शिकार के धर्म के लोग चुप रह जाते हैं क्योंकि बलात्कारी से उनके धर्म का नाम जुड़ा है। कई मामलों में तो ऐसा भी हुआ है कि इसे एक धर्म के संतों को बदनाम करने की साजिश भी कह दिया गया है। इसी आसाराम पर जब भक्त परिवार की नाबालिग लडक़ी ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी, तो देश भर से उसे एक हिन्दू संत को बदनाम करने की साजिश करार दिया गया था। और यह बलात्कार सुप्रीम कोर्ट तक साबित हुआ, आसाराम को उम्रकैद हुई, और उसे सिर्फ इलाज के नाम पर जमानत की राहत बरसों बाद किसी तरह मिल पाई है। लेकिन एक हिन्दू भक्त परिवार की नाबालिग हिन्दू बेटी के साथ बलात्कार पर हिन्दू समाज ने आसाराम को धिक्कारा हो, ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उसकी संस्था के भक्तजन अपने बीवी-बच्चों के साथ देश भर में सार्वजनिक जगहों पर उसके पर्चे बांटते रहते हैं, उसके नाम का पंडाल-शामियाना लगाकर प्रचार करते हैं। भक्त-समाज को इस बात की परवाह नहीं है, कि इन सबसे बलात्कार की शिकार उस लडक़ी के दिल पर क्या गुजरती होगी। इन्हें यह भी परवाह नहीं है कि देश की सबसे बड़े अदालत तक जो आसाराम मुजरिम साबित हो चुका है, उसके लिए हिकारत दिखाते हुए ये लोग आसाराम का प्रचार करते हैं। अलग-अलग नामों से अलग-अलग धर्मों में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जो अपने धर्म के सबसे घटिया लोग रहते हैं, लेकिन उस धर्म के लोग हैं कि धर्म के नाम पर उनकी पूजा जारी रखते हैं। यह धर्म से परे भी होता है, राजनीतिक दल या दूसरे संगठनों में लोग अक्सर ही अपने सबसे घटिया लोगों को बचाने के लिए, उनके साथ खड़े दिखते हैं।
अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने जंग मिनिस्टर पेट हेगसेथ से कहलवाकर थलसेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को खड़े-खड़े बर्खास्त कर दिया। दुनिया के किसी भी बड़े और जिम्मेदार लोकतंत्र में ऐसी घटना याद नहीं पड़ती कि देश की एक मुश्किल जंग के बीच थलसेना प्रमुख को हकालकर निकाल दिया जाए। आज ईरान के मोर्चे पर अमरीका को बहुत से लोग बहुत मुश्किल नौबत में देख रहे हैं, और ऐसे में एक सबसे बड़े फौजी अफसर को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करके निकाल देना अमरीकी सरकार के बाकी लोगों को एक बड़ा साफ संदेश देता है। संदेश यह कि अब अमरीका में किसी भी संवैधानिक या सरकारी संस्था में ट्रम्प के प्रति निजी निष्ठा सबसे ऊपर है, और लोगों से किसी पेशेवर काबिलीयत की जरूरत नहीं है। जो लोग ट्रम्प की हमलावर नीतियों से जरा भी असहमति जताएंगे, उनके लिए ट्रम्प की सरकार में जरा भी जगह नहीं है। पिछले कुल सवा साल के इस कार्यकाल में ट्रम्प ने कुछ सबसे बड़े फौजी अफसरों को इसी तरह बर्खास्त किया, और इनमें से एक को तो ट्रम्प ने देशद्रोही तक कहा। रक्षा मंत्रालय के कई गैरफौजी अफसरों को भी ट्रम्प ने हटा दिया जिन्हें वह अमरीका के भीतर एक सरकारविरोधी भूमिगत सरकार (डीप स्टेट) कहता है। हमारी अपनी समझ यह कहती है कि अब अमरीका ईरान के मोर्चे पर अपने सैनिकों को वहां की जमीन पर उतारने के लिए उन्हें खाड़ी के पड़ोसी देशों में भेज चुका है, और इस बात को अमरीका में बहुत ही खराब फैसला माना जा रहा है। जो ईरान अमरीका के लिए किसी भी तरह का खतरा नहीं था, उस ईरान पर पहले तो इजराइल के कहे हुए इस तरह का निहायत गैरजरूरी, और नाजायज फौजी हमला करना, पूरी दुनिया को तेल, और दूसरे कारोबारी संकट में डालना, और अब अमरीकी सैनिकों के उस इजराइल की इस जंग में विदेशी जमीन पर उतार देना, जहां पर खुद इजराइल शायद अपने सैनिकों को भेजने के लिए तैयार नहीं है। हमारा सिर्फ एक अंदाज है कि कोई भी जिम्मेदार थलसेना अध्यक्ष राष्ट्रपति के ऐसे फैसले का विरोध करेगा जो कि हजारों अमरीकी सैनिकों को एक अवांछित युद्ध में भेजने का है, जहां से सैकड़ों का ताबूत में लौटना तय सरीखा होगा।
ट्रम्प की शक्ल में अमरीका को 21वीं सदी की इस दूसरी चौथाई में एक ऐसा तानाशाह मिला है जो कि अमरीकी विश्लेषकों को हक्का-बक्का कर रहा है। हमारे पास इसे देने के लिए अब छापने लायक कोई गाली बची नहीं है, लेकिन हम लगातार यह देखते हैं कि लिखने के कुछ हफ्तों के भीतर खुद अमरीका से कोई न कोई जिम्मेदार तबका उस बात को दोहराता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक विख्यात संविधान-विशेषज्ञ ने इसे फौज पर राजनीतिक नियंत्रण का सीधा हमला करार दिया है। अमरीकी राष्ट्रपतियों के एक इतिहासकार ने कहा है कि ट्रम्प फौजी जनरलों से राजा के दरबारियों जैसी निष्ठा मांग रहे हैं, और ऐसी ही नौबत अमरीका के संस्थापक नेताओं को सबसे ज्यादा डराती थी। न्यूयॉर्क टाईम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि यह तानाशाहों जैसा व्यवहार है, न कि लोकतांत्रिक राष्ट्रपति सरीखा। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रपति को तकनीकी रूप से किसी फौजी कमांडर को हटाने का हक है, लेकिन चल रही जंग के बीच सिर्फ निष्ठा के आधार पर टॉप जनरलों को हटाना बुरी तरह खतरनाक और असमान्य है। अमरीका के सबसे बड़े संस्थापक नेताओं का डर राजा जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति का था। वे ब्रिटिश राजा से आजादी के बाद किसी भी तरह की तानाशाही नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने मजबूत, लेकिन जवाबदेह राष्ट्रपति का प्रावधान किया था। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध, उसके बाद के शीतयुद्ध, और 11 सितंबर के ओसामा के हमले के बाद राष्ट्रपति पद की ताकत बहुत बढ़ जाने दी गई, और इसे सम्राट जैसा राष्ट्रपति मान लिया गया। अब ट्रम्प अमरीका पर किसी हमले के बिना, बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला दीवाने की तरह इजराइल की जंग में शामिल हो गए हैं, और दुनिया के बाकी तमाम देशों को धमकाना, डराना जारी रखा है। एक अकेले इजराइल के साथ नाजायज दोस्ती निभाने के लिए ट्रम्प ने बाकी पूरी दुनिया से अपने रिश्तों को आग में झोंक दिया है। सच तो यह है कि जिस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति को सलाह-मशविरे की सबसे अधिक जरूरत दिख रही है, उसने अपने आपको मुसाहिबों और चापलूसों के घेरे में कैद कर लिया है, और सरकार के सारे बड़े ओहदों पर उन लोगों को बिठा दिया है, जो उसकी बदबू को शीशी में भरकर इत्र की तरह इस्तेमाल करने में गर्व पाते हैं।
कल सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने अदालत के बेजा इस्तेमाल को लेकर केन्द्र सरकार को झिडक़ा है, और जनता को भी। एक मामला तो ऐसा रहा जिसमें अदालत ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने पर केन्द्र सरकार पर 25 हजार रूपए का जुर्माना लगाया है। यह मामला सीआईएसएफ के एक सिपाही को गलत तरीके से बर्खास्त करने का था, हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर दी थी, और कुछ पुराना बकाया भी देने को कहा था। इसके खिलाफ केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, और वहां पर जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और जस्टिस उज्जल भुयां ने नाराजगी के साथ कहा कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत सरकार ने इस मामले में अदालत में अपील क्यों की है? उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार देश में आज सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है, इस तरह की गैरजरूरी की मुकदमेबाजी अदालतों पर बोझ बढ़ाती है, और इंसाफ में देरी की वजह बनती है। इन जजों ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़े खुलासे से आदेश दिया था, फिर भी केन्द्र सरकार बिना किसी ठोस आधार के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। यह एक असाधारण मामला था जिसमें कड़ी आलोचना के साथ केन्द्र सरकार पर जुर्माना भी लगाया गया। अदालत ने इसे तुच्छ याचिका कहा, और कहा कि सरकार को आदर्शवादी होना चाहिए, न कि हर छोटे फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचना चाहिए। जजों ने कहा कि आज हजारों लोग जेलों में बंद हैं, और जमानत या फांसी जैसे गंभीर मामलों में अदालती आदेश या फैसले के इंतजार में हैं, ऐसे में सरकार का ओछे कानूनी दांव-पेंच लेकर आना, उन लोगों के हक का समय छीनना है। कोर्ट ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा बिना सोचे-समझे अपील दायर करने की संस्कृति को बंद करना होगा। यह जुर्माना इसीलिए प्रतीकात्मक रूप से लगाया गया ताकि भविष्य में अफसरों को यह याद रहे कि वे अदालत के समय के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अगर सरकार खुद इस तरह की याचिकाएं दायर करती रहेगी, तो अदालतों पर से मामलों का बोझ कभी कम नहीं होगा।
एक दूसरे मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एक वकील द्वारा दायर कई जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने वकील को झिडक़ा, और कहा कि ये जनहित याचिकाएं पूरी तरह से अस्पष्ट और बेबुनियाद हैं। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या आप इन्हें आधी रात में तैयार करते हैं? जजों ने कहा कि पीआईएल दायर करने का मतलब यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपनी मनमानी शिकायतें लेकर अदालत आ जाए, ऐसी जनहित याचिका दुकानें चलाने वालों पर नजर रखनी होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी पीआईएल दायर करने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। इस वकील, सचिन गुप्ता ने अपनी पीआईएल में प्याज-लहसून को तामसिक बताने, शराब पर रोक लगाने, किसी भाषा को क्लासिकल (शास्त्रीय) घोषित करने जैसे बेतुके मुद्दे उठाए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बहुत से लोग अपने निजी हितों के लिए, किसी रंजिश में, या किसी को परेशान करने के लिए गलत इरादे से केस दर्ज करते हैं। कई मामलों में लोग केवल विपक्षी पार्टी को डराने, उनका पैसा खर्च कराने, या उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने के लिए फर्जी या कमजोर आधार वाले केस करते हैं। जजों ने कहा कि अदालतें व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने की जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि अदालतों में मुकदमों की बाढ़ इसलिए नहीं है कि जुल्म बढ़ गया है, बल्कि इसलिए भी है कि कानूनी पैंतरेबाजी बढ़ गई है, लोग तथ्यों को तोड़-मरोडक़र पेश करते हैं, ताकि मामला लंबा खिंचे। कोर्ट ने कहा कि जो लोग साफ-सुथरी नीयत से अदालत नहीं आते हैं, उन्हें भारी दंड मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की वजह से असली पीडि़तों को तारीख मिलने में सालों लग जाते हैं, क्योंकि जज उन केसों में उलझे रहते हैं जो शुरू ही नहीं होने चाहिए थे।
अभी महाराष्ट्र के नासिक में पकड़ाए एक तथाकथित आध्यात्मिक गुरू, और ज्योतिषी के सेक्स-वीडियो से सोशल मीडिया पटा हुआ है। ऐसा लगता है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से हर दिन इस पर हर वह व्यक्ति रील बना रहे हैं, जिनके पास एक मोबाइल फोन है, मुंह है, आवाज है, और इस बाबा, अशोक खरात की कोई भी वीडियो क्लिप है। लोग आधे हिस्से में इसकी वीडियो क्लिप लगाकर आधे हिस्से में अपना चेहरा दिखाकर, सनसनीखेज सुर्खी लगाकर दर्शक बटोर रहे हैं। लेकिन यह केस है तो पूरी तरह हकीकत। उसके पास पहुंचने वाली महिलाओं को वह उनके पति को लेकर कई तरह से डराता था, खतरा टालने का कोई ऐसा तरीका सुझाता था जिसे वह यौन पूजा कहता था, और इस तरह उन महिलाओं का या तो सिलसिलेवार, लगातार यौन शोषण करता था, अपने ही सीसीटीवी कैमरों पर रिकॉर्ड करता था, और फिर उन्हें ब्लैकमेल करके यौन शोषण को बढ़ाता था, या उगाही भी करता था। इसके पास से कोई डेढ़ सौ करोड़ की दौलत भी मिली है।
इस पर लिखने को नया बहुत कुछ नहीं रहता, अगर आज सुबह सूरत की एक और खबर बहुत सारे वीडियो और ऑडियो के साथ नहीं आई रहती। वहां एक जैन मुनि के ऑडियो-वीडियो से गुजरात उबल रहा है, जिसमें एक महिला के साथ इस जैन मुनि के सेक्स का नजारा है, इसके अलावा उसके कुछ टेलीफोन कॉल भी है जो इस, या ऐसी ही किसी दूसरी महिला, या लडक़ी से फोटो-वीडियो की ही बात करते हुए है। यह आरोप किसी विरोधी ने नहीं लगाया है, यह गुजरात में जैन समाज की महिलाओं ने ही जाकर पुलिस को दिया है कि एक जैन मुनि के ऐसे वीडियो-ऑडियो से पूरे समाज की बदनामी हो रही है, धर्म पर आंच आ रही है, और इस मुनि को सन्यासी चोले से बाहर निकालकर सांसारिक कपड़े पहनाए जाएं। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे जैन मुनि को बलात्कार में दस साल की कठोर कैद हुई है। इसने 2017 में अपनी एक 19 वर्षीय छात्रा-अनुयायी को दीक्षा देने, और शुद्धिकरण के बहाने से एक कमरे में बुलाकर बलात्कार किया था, और डराया था कि अगर यह बात किसी को बताई तो उसके परिवार पर दैवीय प्रकोप होगा। इस छात्रा के हौसले से डटे रहने, और मेडिकल सुबूतों के आधार पर इस मुनि को उम्रकैद हुई, बाद में उसे दस साल की कड़ी कैद में बदला गया। एक और मामला हरिद्वार और दिल्ली के पास का था जिसमें एक जैन मुनि एक छात्रा के साथ आपत्तिजनक यौन मुद्रा में दिख रहा था, बाद में वह फरार भी हो गया था, और समाज की पंचायत ने उसे सन्यास से हटा दिया था। देश का इतिहास हर कुछ महीनों में धर्म, आध्यात्म, या योग से जुड़े हुए ऐसे किसी बलात्कारी की खबरों को दर्ज करता है। केरल-तमिलनाडु की सीमा पर आश्रम चलाने वाले स्वामी प्रेमानंद पर 13 लड़कियों से बलात्कार, एक पुरूष की हत्या का आरोप साबित हुआ था, और सुप्रीम कोर्ट तक ने उसकी दोहरी उम्रकैद को बरकरार रखा था। भारत के कई टीवी चैनलों के दिल के टुकड़े, दिल्ली और राजस्थान के पाली में विशाल आश्रम चलाने वाले दाती महाराज नाम के अजीब हुलिए वाले एक धार्मिक चोगाधारी पर उसकी ही शिष्या ने सालों तक बलात्कार का आरोप लगाया था, और मामला सीबीआई तक गया था। दिल्ली के एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के वीरेन्द्र देव दीक्षित के आश्रम से 2017 में सौ से अधिक लड़कियों, और महिलाओं को लोहे के पिंजरों से निकाला गया था। यह दीक्षित खुद को कृष्ण का अवतार बताता था, और लड़कियों को गोपियां बनाने के नाम पर नशा देता था, और उनका यौन शोषण करता था। अब 8 सालों से वह फरार है, और सीबीआई उसे दुनिया भर में ढूंढ रही है। फिर आसाराम नाम के एक बलात्कारी के नाम को भला देश में अब कौन नहीं जानते? इससे परे राम-रहीम नाम का एक दूसरा बाबा जेल काटकर अभी शायद बाहर निकला हुआ है।
भारत में ही नहीं, दूसरों देशों में भी जो हिन्दुस्तानी योग, ध्यान, आध्यात्म जैसे धंधों में लगे हुए हैं, उन पर समय-समय पर जुर्म दर्ज होते रहे हैं। भारत के विदेशों में सबसे अधिक चर्चित इस दर्जे के आचार्य रजनीश, बाद में स्वघोषित ओशो, पर भी कितने तरह के मामले चले, और बाद में अमरीका से निकाल दिया गया। योग सिखाने वाले एक विक्रम चौधरी पर अमरीका में 6 पूर्व शिष्याओं ने बलात्कार के मुकदमे दर्ज कराए, अमरीकी अदालत ने उस पर करीब 58 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया, वह अमरीका छोडक़र भाग गया, और उसकी सारी सम्पत्तियां जब्त कर ली गई हैं। लेकिन ऐसे मामलों की लिस्ट हम जब तक गिनाते रहेंगे, तब तक तो ऐसे एक-दो और मामले भी आ जाएंगे। आखिर यह नौबत आती क्यों है, इसे समझने की जरूरत है।
बस्तर में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हुई है, या तकरीबन खत्म हुई है, इस विवाद में हम पडऩा नहीं चाहते। जिस हद तक वह खत्म हुई है, वह केन्द्र और राज्य सरकार की घोषणाओं के मुताबिक ही है। अब अगर बहुत थोड़ी सी गिनती में नक्सली बचे हुए हैं, तो जाहिर है कि उनकी मारक क्षमता खत्म हो चुकी है, और वे शायद अपने आखिरी हथियारबंद दिन गुजार रहे हैं। कल संसद में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर कामयाबी गिनाते हुए छत्तीसगढ़ में पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल पर भी एक सीधा हमला किया है कि उनकी सरकार ने नक्सलियों को संरक्षण दिया, जिससे नक्सल उन्मूलन अभियान में देर हुई। उन्होंने चुनौती दी और कहा कि भूपेश बघेल को पूछो, सुबूत दूं क्या, और कहा कि अगर भूपेश हां बोलेंगे, तो फंस जाएंगे। यह संसद में कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार पर केन्द्रीय गृहमंत्री का अब तक का सबसे बड़ा हमला था, और भूपेश ने संसद के बाहर अमित शाह को सुबूत देने की चुनौती दी है, साथ ही यह कहा है कि उनके पांच बरस के कार्यकाल में केन्द्र सरकार के साथ नक्सल मोर्चे पर लगातार बैठकें हुईं, और किसी भी बैठक में केन्द्रीय गृहमंत्री या केन्द्र सरकार की तरफ से छत्तीसगढ़ की भूपेश-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई। अब अचानक यह बात कही जा रही है।
दरअसल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आज के घटनाक्रम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनका श्रेय लेने के लिए कोशिश करने, या दावा करने का हक सत्तारूढ़ पार्टी का बनता ही है। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार की लगाई गई इतनी बड़ी तोहमत पर भूपेश बघेल की जवाबदेही भी बनती है, और उन्होंने अपनी जवाबदेही अमित शाह से एक सवाल करके पूरी की है। ये दोनों चुनौतियां इतनी दिलचस्प हो चुकी हैं कि जनता इंतजार करेगी कि अमित शाह कुछ अधिक जानकारी सामने रखें, सुबूत बताएं, और जनता अपनी सोच तय करे। इसके पहले भी एक ऐसी नौबत आई थी, लेकिन उस वक्त मुख्यमंत्री बनने के पहले के भूपेश बघेल ने यह दावा किया था कि उनके पास झीरम घाटी हमले की साजिश के सुबूत हैं, और उन्हें वे सही जांच एजेंसी को देंगे। कई तरह की जांच एजेंसियां झीरम की जांच करती रही, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से एनआईए की जांच चलते-चलते भी भूपेश सरकार की पुलिस को जांच करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी भूपेश बघेल ने झीरम साजिश के कोई सुबूत किसी एजेंसी को नहीं दिए जिन्हें कि वे अपनी जेब में लेकर चलने का दावा करते थे। हम तो जनता के जानने के हक के तहत पहले भी इस बात को बार-बार लिख चुके हैं कि न सिर्फ मुख्यमंत्री को, बल्कि देश के किसी आम नागरिक को भी किसी भी जुर्म या साजिश की जानकारी होने पर यह उनकी नागरिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उसे जांच एजेंसी को दें। ऐसे में विपक्ष के नेता के रूप में भूपेश बरसों झीरम के सुबूत जेब में थपथपाते रहे, लेकिन दिए कभी नहीं। मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने कभी सुबूत जांच एजेंसी को देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। अब संसद में अमित शाह ने भूपेश बघेल को जो चुनौती दी है, उस पर हम अपनी पुरानी सोच को दोहराते हुए यही कहेंगे कि भूपेश बघेल उनसे सुबूत न भी मांगें, तब भी देश का यह हक है कि अगर कांग्रेस सरकार ने पांच बरस नक्सलियों को संरक्षण दिया, तो इसके सुबूत जनता के सामने आने चाहिए। यह बात किसी भी पार्टी के किसी भी संगठन के साथ रिश्तों पर लागू होती है, अगर कोई कानून तोड़े जाते हैं। चाहे ऐसे संगठन हथियारबंद हों, या साम्प्रदायिकता से लैस हों, रिश्तों के सुबूत, और शपथ ली हुई सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण तो उजागर होने ही चाहिए।
अब हम इन दोनों नेताओं की एक-दूसरे को दी गई चुनौतियों का मजा लेते हुए, इनके आगे बढऩे का इंतजार करेंगे, क्योंकि यह पारदर्शिता जनता के हक में है। ऐसी राजनीतिक बातें जनता के किसी सूचना पाने के अधिकार के तहत नहीं रहती हैं, ऐसी बातें नेताओं के सूचना देने की जिम्मेदारी के तहत आती हैं, जिसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है, बस एक सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जरूरी रहती है। लोकतंत्र में ऐसी गंभीर बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस किस्म के बहुत से मामलों में श्वेतपत्र जारी करने की भी परंपरा रही है जिसमें सरकार उसे हासिल तमाम किस्म के तथ्यों को एक दस्तावेज की तरह जनता के लिए जारी करती है। बस्तर के नक्सल मोर्चे को लेकर अगर अमित शाह के पास सचमुच ही कांग्रेस सरकार के दिए हुए संरक्षण के सुबूत हैं, तो उन्हें श्वेतपत्र के रूप में भी जारी किया जा सकता है।


