संपादकीय
हर कुछ हफ्तों में छत्तीसगढ़ के निजी नर्सिंग कॉलेजों के बारे में खबरें छपती हैं कि किस तरह वहां न साधन है, न सुविधा, और इसके बाद भी उनकी मान्यता जारी रहती है। फीस सरकार तय करती है, और यहां आने वाले छात्र-छात्राओं में 90 फीसदी के करीब छात्राएं रहती हैं, और तमाम लोगों में 90 फीसदी गरीब परिवारों से आते हैं। फीस और रहने-खाने का साल भर का करीब लाख रूपए का खर्च होता है, कई साल का कोर्स है, और कॉलेजों का ढांचा इतना कमजोर है कि मरीजों की देखरेख का पर्याप्त मौका पाए बिना यहां से नर्सें निकलती हैं, और अस्पताल उन्हें मामूली से भी कम तनख्वाह पर रखते हैं। गरीब परिवारों का खर्च भरपूर हो जाता है, लेकिन यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों का भविष्य बिल्कुल सीमित रहता है। अखबारों में बार-बार छपने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह नियमों को अनदेखा करके नर्सिंग कॉलेज चलते हैं, और दर्जनों कॉलेजों की किसी अस्पताल से संबद्धता नहीं है, फिर भी उन्हें मान्यता मिली रहती है।
सरकार की यह उदासीनता हमें कुछ अधिक हद तक हैरान इसलिए करती है कि इस कोर्स में आने वाली तमाम छात्राएं गैरसवर्ण तबकों की रहती हैं, आदिवासी, अनुसूचित जाति, और अधिक से अधिक ओबीसी समुदाय की लड़कियां नर्स बनने आती हैं, आदिवासी इलाकों में नर्सिंग कॉलेज भी इसीलिए अधिक रहते हैं, लेकिन नर्सिंग-शिक्षा का स्तर चौपट है। अब नर्स बनकर निकलने तक अगर किसी अस्पताल में मरीजों के इलाज का असल काम कुछ बरस तक करने नहीं मिला, तो यह कोर्स क्लासरूम की पढ़ाई का तो है नहीं। और हालत यह है कि भारतीय नर्सों की दुनिया के बहुत से पश्चिमी, विकसित, और संपन्न देशों में अच्छी-खासी मांग है। भारत के भीतर भी बड़े-बड़े महंगे अस्पताल लगातार बढ़ रहे हैं, और वहां भी अच्छे नर्सिंग कॉलेजों से पढक़र निकली हुई नर्सों को तो जगह मिल जाती है, लेकिन वहां का मैनेजमेंट भी यह देख लेता है कि किस प्रदेश, या किन कॉलेजों में नर्सिंग-शिक्षा का स्तर खराब है, और वहां के लोगों को अच्छी जगहों पर जगह नहीं मिलती।
एक ऐसी पढ़ाई जिसमें सौ फीसदी रोजगार की गारंटी होनी चाहिए, जिसके लिए देश के बाहर भी अंधाधुंध संभावनाएं हैं, उसे स्तरहीन शैक्षणिक ढांचे, स्तरहीन पढ़ाई, और इलाज के साथ के पर्याप्त अनुभव की कमी से बहुत ही औसत दर्जे का बनाकर रख दिया गया है। यह सिलसिला देश में एक नौजवान पीढ़ी को उसकी बेहतर संभावनाओं से दूर रखता है। आज हालत यह है कि अस्पतालों से परे भी संपन्न या मजबूर-मध्यमवर्गीय परिवारों में घर पर मरीजों या बुजुर्गों की देखभाल का रोजगार बढ़ते चल रहा है। डॉक्टर की निगरानी में इलाज चलता है, और नर्सों की मदद से घर पर बुजुर्ग या बीमार की जिंदगी चलती है। रोजगार का यह दायरा लगातार बढ़ते चल रहा है क्योंकि न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है, तरह-तरह के इलाज बढऩे से लोगों की देखभाल की संभावना भी बढ़ रही है। ऐसे में दुनिया के जिन देशों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ते जा रहा है, वहां के बारे में हमने पहले भी यह बात लिखी थी कि होम केयर के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों को दुनिया के कई देशों में काम मिल सकता है, और जिन देशों में भारतीय होम केयर कामगारों की मांग है, वहां की भाषा, और संस्कृति को भी सिखाने-पढ़ाने का काम भारत में करना चाहिए। देश के भीतर सरकारी नौकरियां कम होती चल रही हैं, लेकिन बाकी दुनिया में भारत के कामगारों के लिए नौकरी-रोजगार की संभावनाएं इसके मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। अगर भारत इन संभावनाओं को अनदेखा करेगा, तो दुनिया के बहुत से और देश हैं जहां से होम केयर के शिक्षित-प्रशिक्षित कामगार आज भी हर संपन्न देश जाकर काम कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कल राज्य के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को खासा सुनाया है। इन्हें नियमित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सरकार को चार महीने के भीतर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने को कहा है। ये मामला वन विभाग के डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का है जो कि 2006 से 2016 तक लगातार कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक, और सुरक्षाकर्मी जैसे पदों पर नियुक्त हुए थे। लेकिन 10 साल से काम करने के बाद भी राज्य सरकार ने उन्हें नियमित नहीं किया। ये कर्मचारी अदालत तक जाकर यह तर्क भी दे रहे हैं कि अब वे यह काम करते-करते किसी भी दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। हाईकोर्ट में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि आर्थिक तंगी की वजह से सरकार सबको नियमित कर्मचारी नहीं बना सकती। इस पर अदालत ने कहा कि अगर किसी काम का स्वरूप स्थायी और बारहमासी है, तो कर्मचारियों को अस्थायी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह गरीब कर्मचारियों की हक की कीमत पर अपने बजट का संतुलन नहीं साध सकती। जज ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो कर्मचारी बरसों से बुनियादी और जरूरी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक अस्थायी बनाए रखना उनके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फैसलों की भावना के अनुरूप ही सरकार कर्मचारियों के मामलों पर विचार करे। जज ने कहा कि नियमित नियुक्तियों से बचने के लिए सरकार अस्थायी व्यवस्था और आउटसोर्सिंग का सहारा लेती है।
यह मामला बड़ा व्यापक और बड़ा दिलचस्प है। सरकार के अलग-अलग दर्जनों विभागों और हजारों दफ्तरों में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं। इन्हें कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मजदूरी की तरह मेहनताना दिया जाता है, जो कि एक व्यक्ति के जिंदा रहने के लिए ही काफी रहता है। ऐसे में यही कर्मचारी अगर 10-10 बरस तक सरकार में वही काम कर रहे हैं, तो उन्हें दैनिक वेतनभोगी बनाकर रखना सचमुच ही नाजायज बात लगती है। लोगों को याद होगा कि शिक्षकों की कमी में सरकार शिक्षाकर्मी नियुक्त करती थी जो कि काम वही का वही करते थे, पूरी तरह से शिक्षकों जैसा ही पढ़ाते थे, लेकिन सरकार उन्हें शिक्षकों के वेतन के मुकाबले बहुत थोड़ा सा भुगतान करती थी। उनका भी मामला बरसों तक चला था, और नियमित करने के लिए वे आंदोलन करते ही रहते थे। पुलिस की कमी में एक वक्त नगर सैनिक या होमगार्ड बनाए जाते थे, लेकिन उन्हें पुलिस बनने का मौका नहीं मिलता था। सरकार के बहुत सारे अमले की कमी को इसी तरह कामचलाऊ इंतजाम से पूरा किया जाता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर जहां फौज में सैनिकों की कमी है, वहां पर क्या अग्निवीर नाम के चार सालाना लोग तैनात किए जा रहे हैं, और चार बरस के बाद कानूनी रूप से तो वे सडक़ों पर रहेंगे, यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार की बहुत महत्वाकांक्षी योजना होने के कारण उन्हें राज्य सरकारें कहीं न कहीं एडजस्ट करने की बात कर रही हैं। लेकिन जिस तरह का मुद्दा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का आया है, क्या अग्निवीरों का मुद्दा ठीक उसी तरह का नहीं है? कि वे चार बरस तक फौज में काम करने के बाद किसी कारखाने के गेट को खोलने-बंद करने की चौकीदारी में लगेंगे? केंद्र सरकार भी तो अग्निवीरों की उसी तरह संवैधानिक नियोक्ता है जैसी नियोक्ता छत्तीसगढ़ सरकार दस बरस से वन विभाग में काम कर रहे इन दैनिक वेतनभोगियों की है।
दरअसल जनता की जरूरतें और सरकार का बजट, इन दोनों के बीच में कोई तालमेल हो नहीं पाता है। फिर इसके बाद अलग-अलग राज्यों में पांच साल में दो-तीन अलग-अलग चुनाव हो जाते हैं, जिनकी वजह से सत्तारूढ़ पार्टी की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, और वोटरों को तात्कालिक संतुष्ट करने का एक दबाव बना रहता है। सत्तारूढ़ पार्टी तो यह दबाव झेलती ही है, अधिकतर चुनावों में प्रमुख विपक्षी दल भी किसी भी तरह सत्ता पर आने की कोशिश में अपने चुनाव घोषणा पत्र में कई तरह के वायदे करते हैं, और सरकार में आने पर उन्हें निभाने में बजट का खासा हिस्सा चले जाता है।
ऐसा माना जा रहा है कि वोटरों को सीधे फायदा देने की कई योजनाओं के चलते देश के कई राज्य विकास के, और रोजाना के रखरखाव के बहुत से काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। दीर्घकालीन ढांचा-विकास की योजनाओं के बारे में सोचना कम होने लगा है, क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनावों में वोटरों का समर्थन राज्य, केंद्र, और म्युनिसिपल-पंचायत में कायम रखने के लिए, ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने के लिए दबाव झेलती है, और कर्मचारियों को नियमित करना वोटरों को लुभाने में उतना कारगर नहीं होता है, जितना कि सीधे फायदा पहुंचाने वाली कई योजनाएं होती हैं।
बीती बहुत देर रात तक हिन्दुस्तानी अखबारों ने राह देखी होगी कि आखिरी संस्करण छपने जाने के पहले अगर ईरान पर हमला शुरू हो जाए, तो उस खबर को ले लिया जाए। वह तो हो नहीं पाया, क्योंकि दुनिया के इतिहास की सबसे खतरनाक धमकी के बाद डॉनल्ड ट्रम्प ईरान के साथ एक पखवाड़े के युद्धविराम की घोषणा करते दिखे। हमले का वक्त भारत के समय के मुताबिक सुबह साढ़े 5 बजे बताया गया था, और इसके ठीक 10 मिनट पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐलान किया कि युद्धविराम हो गया है, और तुरंत लागू हो गया है। एक लाईन में कहा जाए तो दो बुनियादी शर्तों पर यह सहमति बनी है कि ईरान पर हमले रोक दिए जाएं, और ईरान जलडमरूमध्य को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दे। दोनों देशों ने इस पर सहमति जाहिर की है, और दो दिन बाद 10 अप्रैल से पाकिस्तान में दोनों पक्षों के बीच शांति और समझौता वार्ता शुरू होगी। ट्रम्प ने जिस जुबान में ईरान से सभ्यता को हमेशा के लिए खत्म कर देने का ऐलान किया था, वह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी फौजी धमकी थी, और अमरीकी मूल के पोप लियो ने इस धमकी पर कहा था कि ईरान के सभी लोगों के खिलाफ ऐसी धमकी और ऐसा खतरा मंजूर नहीं किया जा सकता। वे अमरीका में जनमे हुए पहले पोप हैं, और जंग के बीच उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति के इस बयान की आलोचना के पहले भी अमरीकी युद्ध-मंत्री के फतवों की आलोचना की थी जिसमें उसने इस जंग को ईश्वर की मर्जी करार दिया था।
खैर, आज सुबह का हिन्दुस्तानी सूरज का वक्त पूरी दुनिया के लिए एक नई तस्वीर लेकर आया है। महीने भर से अधिक से ईरान पर इजराइल, और उसके पिट्ठू बने हुए अमरीका के फौजी हमले चल रहे थे। इस एक महीने ने यह भी साबित किया कि अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प किस तरह एक मानसिक रोगी है, अस्थिर दिमाग का है, फैसले लेने में सक्षम नहीं है, तुरंत ही दफ्तर से बाहर कर देने के लायक है, यह एक अलग बात है कि अमरीकी संविधान में बिना दिमाग के तानाशाह राष्ट्रपति को भी हटाने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसलिए खुद अमरीकियों ने इस युद्धविराम से राहत की सांस ली है क्योंकि बेदिमाग ट्रम्प ने पूरी दुनिया को जिस तरह के ऊर्जा संकट में डाला है, अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, उसकी वजह से खुद अमरीकी अपने-आपको कोस रहे हैं कि उन्होंने यह कैसा पिशाच चुन लिया था। खैर, अगर ट्रम्प आज जिस तरह पूरी दुनिया को तबाह कर रहा है, उस तरह अगर वह सिर्फ अमरीका को तबाह करता, तो हमें कोई शिकायत नहीं रहती। दिक्कत यह है कि वह चुना तो गया है अमरीका के लिए, लेकिन तबाह उसने पूरी दुनिया को कर दिया है। लेकिन इस एक महीने ने अमरीका को यह आईना भी दिखा दिया है कि उसकी निहायत नाजायज जंग से किस तरह योरप के एक-एक देश ने अपने-आपको अलग कर लिया, और नाटो को खत्म कर देने की धमकी देने के बावजूद कोई देश ट्रम्प के साथ नहीं आया। ऐसी अंतरराष्ट्रीय तबाही के दबावतले भी ट्रम्प तानाशाही दिखा रहा था, और यह उसकी असामान्य और बीमार मानसिक हालत का एक सुबूत था।
बाकी दुनिया के साथ-साथ यह भारत के लिए भी एक राहत की बात हो सकती है कि देश में इस वक्त चल रही गैस की किल्लत शायद कुछ दिनों में खत्म या कम हो जाए, इसके साथ-साथ खाड़ी के देशों में भारत से होने वाले निर्यात का रास्ता भी कुछ खुल सकता है, हो सकता है इससे छत्तीसगढ़ के तरबूज एक बार फिर खाड़ी के देशों में जा सकें, और नदी की जलती रेत पर तरबूज की फसल लेने वाले लोगों की बर्बादी टल सके, भारत के दसियों हजार कारखाने फिर शुरू हो सकें, और करोड़ों मजदूर तात्कालिक बेरोजगारी से बच सकें। लेकिन भारत को अपने बारे में कुछ सोचना होगा। जब ईरान की जंग को लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने विपक्षी पार्टियों से बात की, और विपक्ष ने पूछा कि भारत इस जंग में चुप क्यों है, जबकि पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, तो इस पर विदेश मंत्री जयशंकर का जवाब था- भारत कोई दलाल देश नहीं है, भारत की अपनी अलग गरिमा और नीति है। यह बयान सैकड़ों अखबारों में गूंजा, जगह-जगह इसके बारे में लिखा गया, लेकिन भारत सरकार ने इस शब्द का खंडन नहीं किया, बल्कि यह कहा कि भारत वैश्विक मंच पर बिचौलिए की भूमिका निभाने के बजाय सीधे संवाद और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। कई विपक्षी दलों ने जयशंकर की भाषा को अमर्यादित बताया, लेकिन जयशंकर इस पर अड़े रहे। अभी चार-पांच अप्रैल को ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक्स पर लिखकर पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों की सराहना की, कहा कि वे इसके लिए दिल से अहसानमंद हैं, और उन्होंने संदेश के अंत में पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा। ईरान को लग रहा था कि तमाम मुस्लिम देशों के बीच अकेला पाकिस्तान ही ऐसा है जो उसके बारे में अमरीका से बात कर रहा है। इधर भारत में जयशंकर के कहे हुए दलाल और दलाली जैसे शब्दों को लेकर पाकिस्तान की बात तो छोड़ें, खुद भारत में लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। जब दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर रही दो देशों के बीच की जंग इस हद तक बेकाबू हो चली हो, तो उसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाना दलाली नहीं होती, वह एक लीडरशिप होती है। यह भारत की जाने कौन सी विदेश नीति है जो मध्यस्थता के बारे में सोच भी नहीं रही, शायद सोच भी नहीं सकती, और एक मध्यस्थ को गाली दे रही है!
छत्तीसगढ़ के अखबारों में पिछले कुछ दिनों से गर्मी बढऩे के साथ-साथ जमीन के भीतर पानी नीचे जाने की खबरें आ रही हैं। ऐसा हर गर्मी में होता है, और कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों में कलेक्टरों के आदेश निकल जाएंगे कि जिला प्रशासन की इजाजत के बिना गर्मी में नए ट्यूबवेल नहीं खोदे जा सकेंगे। लेकिन गर्मी निकलते ही ट्यूबवेल खोदना फिर शुरू हो जाएगा, और उनसे पानी निकालना तो बाकी की पूरी जिंदगी चलता ही रहेगा। केन्द्र सरकार के भूजल के सर्वे के आंकड़ों को देखें, तो छत्तीसगढ़ के कई जिलों, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, मुंगेली, बालोद, जैसे जिलों के सभी विकासखंडों में लगातार भूजल नीचे जा रहा है। बस्तर संभाग को छोडक़र बाकी चार संभागों में हालत तेजी से बिगड़ रही है। और यह तब है जब 2023-24 में छत्तीसगढ़ में औसत से बेहतर बारिश हुई थी। अखबारी खबरों से किसी की नींद खुलते दिख नहीं रही है, और जब छत्तीसगढ़ की हालत चेन्नई शहर, या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों जैसी हो जाएगी, तब नौबत संभालने का वक्त निकल चुका रहेगा। आज समय रहते अगर राज्य सरकार जागकर कड़ी कार्रवाई करे, कमर कसकर यह तय करे कि जब तक भूजल स्तर बढऩे नहीं लगे, तब तक जो-जो जरूरी रहेगा, वह किया जाएगा, तो ही बात बन सकती है।
हम जमीन के नीचे पानी तेजी से नीचे चले जाने की वजहों को देखते हैं, तो समझ आता है कि प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना पानी बारिश के वक्त जमीन के भीतर जा नहीं पाता है। इसकी कई बहुत जाहिर वजहें हैं। एक तो यह कि धान की फसल राजस्थानी ऊंट सरीखी प्यासी रहती है, और मुफ्त की बिजली, या रियायती बिजली की मेहरबानी से, और फसल का तकरीबन एक-एक दाना महंगे दामों पर सरकार द्वारा खरीद लेने से लोग धान के अपने खेत को तालाब की तरह लबालब भर लेते हैं। जितना पानी जरूरी नहीं रहता, उतना भी जमीन के नीचे से उलीचकर खेतों में डाल दिया जाता है, जिसका बहुत सा हिस्सा भाप बनकर उड़ भी जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में पानी की खपत का 84 फीसदी हिस्सा खेतों में जाता है, 12 फीसदी हिस्सा शहरी घरों में, और 4 फीसदी हिस्सा कारखानों में। ऐसे में सरकार को इनमें से हर मोर्चे पर कड़े फैसले लेने पड़ेंगे, वरना किसी भी मौजूदा सरकार के पांच साल तो निकल जाएंगे, लेकिन जमीन के पेट से निकाला गया पानी वापिस नहीं जा पाएगा।
हम आंकड़ों के जाल में इस बुनियादी बात को उलझाना नहीं चाहते। इसलिए साफ-साफ आसान शब्दों में खतरे, और उससे जूझने की संभावनाओं पर लिख रहे हैं। खेतों में बेहिसाब पानी को रोकना आसान नहीं है, और सरकार चाहे गर्मी की फसल के लिए नहरों से पानी न दे, लोगों के पंप तो चलते ही हैं। सरकार को यह इंतजाम करना होगा कि गर्मी के महीनों में जब धान की फसल और अधिक पानी मांगती है, तब तो बाकी आबादी को भी पानी की अधिक जरूरत रहती है, और गर्मी की धान की फसल को हर हाल में रोकना चाहिए, सरकार को न उसकी खरीदी करनी चाहिए, न उसकी इजाजत देनी चाहिए। अब इस बारे में किसानों का कहना कुछ और हो सकता है, लेकिन हमारी सामान्य समझ हमें पानी बचाने के लिए यह रास्ता बता रही है। दूसरी बात यह कि फसल के बाकी मौसम में भी धान की फसल के विकल्प की तरफ सरकार को बढऩा होगा, किसानों को बढ़ाना होगा, वरना एक दिन धान के लायक पानी नहीं बचेगा, धान की फसल नहीं बचेगी, और किसानों के पास मंडी में बेचने को कुछ रहेगा नहीं। ऐसा हाल हो सकता है कि दस-बीस बरस न हो, लेकिन जब हम पूरे राज्य की बात कर रहे हैं, तो हमें अगले सौ-पचास बरस की तैयारी करनी चाहिए। पांच-पांच बरस में बंटी हुई सरकारें अपने कार्यकाल से आगे का देखना नहीं चाहतीं, लेकिन उतने से काम चलेगा नहीं।
आज की ही एक खबर बताती है कि पांच साल में रायपुर का भूजल स्तर 45 फीसदी गिर गया है। और यह 60 से 120 फीट तक नीचे चले गया है। कई इलाकों में तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे जा चुका है। लोगों को अधिक गहराई से पानी खींचने वाले पंपों पर अधिक भरोसा है, इसलिए पानी की खपत की तरफ से, और धरती का पेट खाली हो जाने की तरफ से वे बेफिक्र हैं। सीधे शब्दों में कहें तो लोगों के तमाम निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाने की जरूरत है क्योंकि अपने जमीन पर खुदवाए हुए ट्यूबवेल भी पानी तो जमीन के नीचे से सामूहिक जल भंडारों से ही खींचते हैं। किसी का भी नलकूप सिर्फ उन्हीं की जमीन के नीचे से तो पानी नहीं खींचता। आज हालत यह है कि पैसे वाले लोग अपनी गाडिय़ों को ड्राइवरों से इतनी देर तक धारदार पानी से धुलवाते हैं कि मानो वह धान का खेत हो, और वहां पानी लबालब भरना हो। राजधानी के भीतर ही सडक़ किनारे प्रेशर पंप से गाडिय़ों को धोने के कारोबार चल रहे हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। दरअसल पानी को सार्वजनिक और सामूहिक संपत्ति मानने की सोच जब तक विकसित नहीं होगी, और उसके लिए कानून नहीं बनेगा, पैसेवालों की नजर में सार्वजनिक सम्पत्ति अपने घर के सामने सडक़ धोने लायक बनी रहेगी। जिसके पास बोर है, पंप है, और बिजली बिल देने के लिए इफरात पैसा है, वे धरती को खाली कर दें, यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का इंतजाम है। दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों में भी गाडिय़ों के धोने पर तरह-तरह की रोक रहती है। ट्यूबवेल पर मीटरिंग से बर्बादी में कमी आएगी, और लोगों में जागरूकता भी आएगी। वरना कुछ बरस बाद जाकर जब छत्तीसगढ़, या कोई दूसरा प्रदेश, जब प्यास से मरने लगेगा, उस दिन एकाएक जागरूकता नहीं आएगी। आज ट्यूबवेल से निकला हुआ एकदम साफ पानी जिस तरह बर्बाद किया जा रहा है, उसमें बड़े-बड़े बंगलों में घास के मैदान, लॉन सींचना भी शामिल है। इससे पर्यावरण को कुछ हासिल नहीं होता, और संपन्न या सत्तारूढ़ तबके की आंखों को हरा-हरा सुख देने के लिए घास लगाई जाती है।
छत्तीसगढ़ में कल 17 बरस की एक 11वीं की छात्रा की मौत हो गई। घटना की पूरी जानकारी सामने आई है। वह किसी के साथ प्रेम-प्रसंग में थी, और दोनों ने मिलकर कोई मोबाइल फोन खरीदा था, लडक़े ने शायद अपने हिस्से का पैसा दे दिया था, लडक़ी नहीं दे पाई थी। दो दिन पहले वह शाम को उस लडक़े के घर गई, रात वहीं रूकी, फोन को लेकर झगड़ा हुआ, तो उस लडक़े ने फोन रख लिया। गुस्से में लडक़ी ने जाकर पेट्रोल खरीदा कि वह आत्मदाह करेगी, लडक़े ने पेट्रोल छीनकर अपनी मोटरसाइकिल में डाल लिया, और चले गया। पीछे से लडक़ी ने सडक़ पर ही आत्मदाह किया, और बुरी तरह जली हालत में एक दिन बाद अस्पताल में वह चल बसी।
हम इस एक अकेली घटना को लेकर यहां लिखना नहीं चाहते, लेकिन बालिग-नाबालिग लोगों में जिस तरह के प्रेम और देह-संबंध हो रहे हैं, जिस तरह शादीशुदा जिंदगी से परे के बेवफाई के रिश्ते हो रहे हैं, जिस तरह कुछ पत्नियां प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों को निपटा दे रही हैं, और जिस तरह कुछ पत्नियों को डरे-सहमे पति भी प्रेमी के साथ बिदा कर दे रहे हैं, इन सब पर गौर करने और सोचने-विचारने की जरूरत है। समाज में एकदम से शादी के पहले के प्रेम और देह-संबंधों, और शादी के बाद के विवाहेत्तर संबंधों का विस्फोट सा हुआ है। ऐसा लगता है कि पहले तो दुपहियों से मिली आजादी, और उसके बाद मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर सवार होकर आई बड़े आकार की आजादी ने एक पीढ़ी में ही लोगों की सोच बदल दी, उनका तौर-तरीका बदल दिया, और समाज के ढांचे को बदलकर रख दिया। टेक्नॉलॉजी की वजह से मिली हुई नई आजादी, बनते हुए नए रिश्तों ने समाज के परंपरागत ढांचे को, लोगों की वर्जनाओं को एकदम से ढहा दिया है, और लोगों को मानसिक और शारीरिक रोमांच की संभावनाएं दिखा दी हैं। परंपरागत प्रेम का रोमांस अब एक रोमांच के साथ मिलकर कई तरह की नई दुनिया गढ़ रहा है। बालिग और नाबालिग होने के फर्क खत्म हो गए हैं, और शादीशुदा जिंदगी के बाद के प्रेम के संबंध भी हर दिन पहले के मुकाबले अधिक आम होते जा रहे हैं।
आज ही मध्यप्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट का एक कुछ हटकर फैसला आया है जिसमें 19 बरस की एक युवती की शादी 40 बरस के एक आदमी से कर दी गई थी, और तालमेल न बैठने की वजह से उसने मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने पर अपने प्रेमी के साथ रहने की इच्छा जताई, हाईकोर्ट ने प्रेमी के साथ रहती हुई इस युवती को इस बात की इजाजत दी कि वह वहां रहना चाहती है तो वहां रहे। अदालत ने इतना किया कि पुलिस की दो महिला सिपाहियों को 6 महीने तक इस युवती की हिफाजत के लिए ‘शौर्या दीदी’ नियुक्त किया है। इसके साथ ही इस केस को अदालत ने खत्म कर दिया। शादीशुदा महिला अपने प्रेमी के साथ रहने लगी, पति द्वारा दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हाईकोर्ट ने मामला सुना, और बालिग युवती के मनमर्जी के हक के हक में फैसला सुनाया। ऐसी व्याख्या अलग-अलग कई अदालतें कई मामलों में कर चुकी हैं, अभी कुछ दिन पहले ही एक दूसरा मामला आया था जिसमें एक शादीशुदा आदमी पत्नी से परे अपनी प्रेमिका के साथ रह रहा था, और उसे भी अदालत ने जायज ठहराया था। जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस तरह के उदार फैसले देने लगते हैं, तो समाज में हसरतें रखने वाले और लोगों का भी हौसला बढ़ता है। ऐसे फैसलों के बाद ये नजीरें निचली अदालतों में भी काम आती हैं।
दुनिया में डॉनल्ड ट्रम्प जैसे बेवकूफों की कमी नहीं है जो जलवायु परिवर्तन को एक फर्जी दावा मानते हैं। और भी बहुत से लोग अपने सुख या दुख के घरौंदों के भीतर रहते हुए यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण शायद एक दिन अपने आप ठीक हो जाएगा, या कि यह महज सरकार की जिम्मेदारी है, और इसमें उनके करने का भला क्या है। लेकिन पूरी दुनिया में जगह-जगह जलवायु परिवर्तन से जो स्थाई नुकसान होना शुरू हो रहा है, वह आगे बढ़ते ही चलना है। मिसाल के लिए राजस्थान का गर्मी का यह मौसम देखें, तो वहां यूपी-बिहार से आए हुए लाखों खेतिहर मजदूर वापिस अपने गांव लौट रहे हैं, क्योंकि 48 से 50 डिग्री तक गर्म होने वाले राजस्थान की सूखी मिट्टी में पानी इतना नीचे जा चुका है, और जाते जा रहा है कि वहां के बहुत से हिस्सों में अब खेती मुमकिन नहीं रह गई है। जो खेतिहर मजदूर पिछले 10-15 बरस से वहां फल-सब्जी, और मसालों के खेतों में काम करते थे, वे वापिस जा रहे हैं कि राजस्थान के खेतों में अब फसल मुमकिन नहीं रह गई। इनमें खेतिहर मजदूरों से थोड़े ऊपर के ऐसे किसान भी हैं जो राजस्थान जाकर खेती करते थे, लेकिन अब वह मुमकिन नहीं रह गया।
राष्ट्रीय अप्रवासन सर्वेक्षण (एनआईएस, और आईआईएम अहमदाबाद) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में राजस्थान से पिछले बरस करीब 13 लाख मजदूर यूपी-बिहार लौटे, इनमें से तीन चौथाई छोटे और सीमांत किसान थे, और बाकी खेतिहर मजदूर थे। राजस्थान के कई जिलों में, प्याज, जीरा, और ग्वारफल्ली की खेती करने वाले पूरब के ये मजदूर परिवार सहित रेलगाडिय़ों पर लदकर लौट रहे हैं। राजस्थान में पिछले तीन साल से मानसून करीब आधा ही रहा। नहरों में पानी नहीं है, ट्यूबवेल सूख गए हैं क्योंकि जमीन के नीचे पानी पांच-छह सौ फीट तक नीचे चला गया है। ऐसी सूखी हालत में जीरे की फसल एक तिहाई-एक चौथाई रह गई है। पशुओं के लिए भी चारा नहीं है, इसलिए दूध-दही का कारोबार भी ठप्प है, या खत्म है। जो मजदूरी बनती है, वह खाने-रहने में ही खर्च हो जाती है। एक वक्त बिहार और यूपी के कई जिलों से परंपरागत रूप से हर बरस राजस्थान आकर काम करने वाले किसान-मजदूर पहले तो यहां के भरोसे पीछे देश में भी घर चला लेते थे, लेकिन वे अब देश ही लौटकर पशुपालन या मनरेगा की मजदूरी पर चल रहे हैं। और यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है, यह रिपोर्ट सिर्फ राजस्थान से आई है। देश भर में अगर ऐसा व्यापक सर्वे होगा, तो कई दूसरे प्रदेशों से कई दूसरे प्रदेशों में लोगों का यह बेबस-प्रवास बेहतर तरीके से दर्ज हो सकेगा। लोग सूखे-प्यासे राजस्थान से अपने यूपी-बिहार लौट तो रहे हैं, लेकिन उधर घर पर बाढ़ का एक अलग खतरा है जो हर बरस बहुत बड़े इलाकों डुबा देता है, और गाद-मिट्टी से खेत पट जाते हैं, बाढ़ के इलाकों में फसलें डूब या बह जाती हैं। जलवायु परिवर्तन से एक तरफ सूखा बढ़ रहा है, और एक तरफ अचानक कम वक्त में बहुत अधिक बारिश से बाढ़ बढ़ रही है।
कृषि अर्थशास्त्रियों की बात सुनें, तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले जलवायु-प्रवास का कोई जिक्र नहीं है। अभी तक सरकारें इसे मौसमी-मजदूरी मानकर चल रही हैं, जबकि यह जलवायु परिवर्तन से होने वाले मजबूर-मजदूर-प्रवास का मामला है। यूपी और बिहार में जलवायु-प्रवास फंड बना जरूर है लेकिन उसमें इतना छोटा बजट रखा गया है कि 25 लाख से अधिक प्रभावित परिवार हैं, और रकम कुल 120 करोड़ है। आईआईटी गांधीनगर के जलवायु वैज्ञानिक प्रो.वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि 2030 तक राजस्थान से 40 लाख लोग बिहार लौटेंगे, और 60 लाख लोग यूपी लौटेंगे। एक तरफ खेतिहर मजदूर गायब हो जाएंगे, क्योंकि खेतों में फसल गायब होती जा रही है, या इतनी घटती जा रही है कि उसमें भूस्वामी और किसान-मजदूर सबका गुजारा नहीं है। ऐसे में खेतिहर-मजदूर शहरी स्लम-मजदूर बनकर रह जाएंगे, शहरों में झोपड़पट्टियों की गिनती और आबादी बढ़ती जाएगी, दूसरी तरफ शहरों में गर्मी से जो बुरा हाल बढ़ते जाना है, बढ़ते ही जा रहा है, उसकी वजह से वहां साल के दर्जनों दिन काम ठप्प रहेगा, किसी तरह का काम खुले में हो नहीं सकेगा। शहरों की गर्मी में लोगों के मरने की नौबत अधिक आएगी, दूसरी तरफ शहरों में बढ़ती गर्मी की वजह से लोगों की उत्पादकता घटती जाएगी, और एक मजदूर की तरह वहां रहना मुश्किल हो जाएगा।
जब जलवायु से जुड़ी इन बातों को दिल्ली जैसे महानगर की प्रदूषित जहरीली हवा के असर से जोडक़र देखेंगे, तो समझ पड़ेगा कि वहां साल में कुछ महीने कंस्ट्रक्शन बंद रहता है, कारखाने बंद रहते हैं, गाडिय़ों की आवाजाही पर रोक रहती है, उस हवा में सांस लेकर जीने का मतलब एक औसत उम्र को 8-10 बरस घटा देना रहता है। ऐसे में वहां सालाना मजदूरी के दिन इस वजह से भी घटते जा रहे हैं। अब पिछले कई हफ्तों से गैस की कमी से छोटे-छोटे कारखाने बंद हैं, खाने-पीने से जुड़े कारोबार बंद हैं, और मजदूरों को निर्माण और उत्पादन के केन्द्र छोडक़र घर लौटना पड़ रहा है। जब इस तरह की जंग से पैदा आपदा को जलवायु-आपदा के साथ जोडक़र देखें, तो लगता है कि मजदूर की तो हर कहीं मौत है। अब ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों के जिम्मे क्या आता है? ईरान की जंग और ऊर्जा-खाद के संकट पर तो सरकार का तात्कालिक काबू कुछ नहीं है, इससे जूझने-निपटने के लिए सरकारों को घरेलू आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ निजी गाडिय़ों की खपत पर बुरी तरह रोक भी लगानी होगी, और उसके पहले सरकारों को सार्वजनिक परिवहन को बहुत आगे तक ले जाना होगा।
एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें बंगाली या असमी में दुकानों के बोर्ड दिख रहे हैं, बाजार के बीच जोरों से एक धार्मिक डीजे बज रहा है, एक धर्म के झंडे-डंडे दिख रहे हैं, कुछ लोग तलवारें लिए भी दिख रहे हैं, और सैकड़ों बालिग-नाबालिग लड़कियां लाउडस्पीकर पर बजते मां की गाली वाले एक गाने की धुन पर बावलों की तरह नाच रही हैं, और गाने में किसी के मां के शरीर के जिस अंग का ब्यौरा है, अपने शरीर के उस अंग की तरफ इशारा करते हुए भी नाच रही हैं। गजब का धार्मिक उत्साह दिख रहा है। कई लोगों ने इस वीडियो के महज स्क्रीनशॉट पोस्ट किए हैं कि इतनी गंदी गालियों वाले गाने-वीडियो वे पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन कुछ लोगों ने वीडियो भी पोस्ट किए हैं। यह शायद चुनाव के मुहाने पर खड़े असम या बंगाल का वीडियो दिखता है, और जाहिर तौर पर इस चुनाव के मकसद से इसे सडक़ पर किसी धार्मिक जुलूस में रिकॉर्ड किया गया, या अभी फैलाया गया है। किसी दूसरे धर्म के लोगों की मां को सबसे गंदी गाली देते हुए न सिर्फ यह गाना कम्पोज किया गया, बल्कि उसे रिकॉर्ड करके बजाया भी जा रहा है, और तेज आवाज के डीजे की धुन पर लड़कियों दीवानों की तरह नाच रही हैं। धर्म का मकसद पूरा हो गया लगता है।
अभी भारत में कई तरह के दूसरे मामले भी धर्म से जुड़े हुए सामने आए हैं। महाराष्ट्र में मंदिर ट्रस्टों का मुखिया, और एक हिन्दू ज्योतिषी, धर्म का और ईश्वर का नाम लेकर कोई सौ-डेढ़ सौ हिन्दू महिलाओं के साथ अपने सेक्स के वीडियो बनाकर बैठा था। इसके खिलाफ बलात्कार की शिकायतें सामने आईं, तो गिरफ्तारी के साथ पुलिस को इसके कब्जे से ऐसे करीब डेढ़ हजार वीडियो मिलने की खबर है। राज्य के बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेताओं से इसका गठजोड़ सामने आया है। राजनीतिक लोगों को बेशर्म बना ही देती है, लेकिन एक सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के नाम पर देवी-देवताओं की प्रतिमा-फोटो लगाकर, मंदिर बनवाकर जो आदमी इस तरह दर्जनों या सैकड़ों हिन्दू महिलाओं की जिंदगी बर्बाद करते रहा, और अब उनसे सेक्स के वीडियो छोड़ गया है, तो इस पर हिन्दू संगठनों ने क्या किया? यह सवाल हमारा बहुत मौलिक सवाल नहीं है, सोशल मीडिया पर बहुत सारे जाने-माने, परिचित, और जिम्मेदार प्रमुख हिन्दू लोग ही यह सवाल खड़ा कर रहे हैं। और इस सवाल से सहमति के साथ हम इसे दोहरा रहे हैं कि कहीं-कहीं इक्का-दुक्का होने वाली अंतरजातीय शादियों, या दो धर्मों के बीच होने वाली शादियों को लेकर, सहमति को भी अनदेखा करके बवाल तो आसानी से खड़ा हो जाता है, लेकिन जब एक-एक व्यक्ति इस तरह दर्जनों महिलाओं के साथ धर्म, आध्यात्म, तंत्र-मंत्र साधना के नाम पर सेक्स करता है, वीडियो रिकॉर्डिंग करके उन्हें ब्लैकमेल करता है, और उनकी पहचान को उजागर कर देता है, तो इस पर इन पीडि़त महिलाओं का धर्म क्या करता है? उसका झंडा-डंडा लेकर चलने वाले लोग क्या करते हैं? और बात महज इस नए ज्योतिषी या तांत्रिक की नहीं है, हर कुछ दिनों में ऐसे किसी का मामला सामने आता है। अलग-अलग नामों वाले आसाराम बलात्कारी साबित होते हैं, और पीडि़ता या शिकार के धर्म के लोग चुप रह जाते हैं क्योंकि बलात्कारी से उनके धर्म का नाम जुड़ा है। कई मामलों में तो ऐसा भी हुआ है कि इसे एक धर्म के संतों को बदनाम करने की साजिश भी कह दिया गया है। इसी आसाराम पर जब भक्त परिवार की नाबालिग लडक़ी ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी, तो देश भर से उसे एक हिन्दू संत को बदनाम करने की साजिश करार दिया गया था। और यह बलात्कार सुप्रीम कोर्ट तक साबित हुआ, आसाराम को उम्रकैद हुई, और उसे सिर्फ इलाज के नाम पर जमानत की राहत बरसों बाद किसी तरह मिल पाई है। लेकिन एक हिन्दू भक्त परिवार की नाबालिग हिन्दू बेटी के साथ बलात्कार पर हिन्दू समाज ने आसाराम को धिक्कारा हो, ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उसकी संस्था के भक्तजन अपने बीवी-बच्चों के साथ देश भर में सार्वजनिक जगहों पर उसके पर्चे बांटते रहते हैं, उसके नाम का पंडाल-शामियाना लगाकर प्रचार करते हैं। भक्त-समाज को इस बात की परवाह नहीं है, कि इन सबसे बलात्कार की शिकार उस लडक़ी के दिल पर क्या गुजरती होगी। इन्हें यह भी परवाह नहीं है कि देश की सबसे बड़े अदालत तक जो आसाराम मुजरिम साबित हो चुका है, उसके लिए हिकारत दिखाते हुए ये लोग आसाराम का प्रचार करते हैं। अलग-अलग नामों से अलग-अलग धर्मों में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जो अपने धर्म के सबसे घटिया लोग रहते हैं, लेकिन उस धर्म के लोग हैं कि धर्म के नाम पर उनकी पूजा जारी रखते हैं। यह धर्म से परे भी होता है, राजनीतिक दल या दूसरे संगठनों में लोग अक्सर ही अपने सबसे घटिया लोगों को बचाने के लिए, उनके साथ खड़े दिखते हैं।
अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने जंग मिनिस्टर पेट हेगसेथ से कहलवाकर थलसेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को खड़े-खड़े बर्खास्त कर दिया। दुनिया के किसी भी बड़े और जिम्मेदार लोकतंत्र में ऐसी घटना याद नहीं पड़ती कि देश की एक मुश्किल जंग के बीच थलसेना प्रमुख को हकालकर निकाल दिया जाए। आज ईरान के मोर्चे पर अमरीका को बहुत से लोग बहुत मुश्किल नौबत में देख रहे हैं, और ऐसे में एक सबसे बड़े फौजी अफसर को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करके निकाल देना अमरीकी सरकार के बाकी लोगों को एक बड़ा साफ संदेश देता है। संदेश यह कि अब अमरीका में किसी भी संवैधानिक या सरकारी संस्था में ट्रम्प के प्रति निजी निष्ठा सबसे ऊपर है, और लोगों से किसी पेशेवर काबिलीयत की जरूरत नहीं है। जो लोग ट्रम्प की हमलावर नीतियों से जरा भी असहमति जताएंगे, उनके लिए ट्रम्प की सरकार में जरा भी जगह नहीं है। पिछले कुल सवा साल के इस कार्यकाल में ट्रम्प ने कुछ सबसे बड़े फौजी अफसरों को इसी तरह बर्खास्त किया, और इनमें से एक को तो ट्रम्प ने देशद्रोही तक कहा। रक्षा मंत्रालय के कई गैरफौजी अफसरों को भी ट्रम्प ने हटा दिया जिन्हें वह अमरीका के भीतर एक सरकारविरोधी भूमिगत सरकार (डीप स्टेट) कहता है। हमारी अपनी समझ यह कहती है कि अब अमरीका ईरान के मोर्चे पर अपने सैनिकों को वहां की जमीन पर उतारने के लिए उन्हें खाड़ी के पड़ोसी देशों में भेज चुका है, और इस बात को अमरीका में बहुत ही खराब फैसला माना जा रहा है। जो ईरान अमरीका के लिए किसी भी तरह का खतरा नहीं था, उस ईरान पर पहले तो इजराइल के कहे हुए इस तरह का निहायत गैरजरूरी, और नाजायज फौजी हमला करना, पूरी दुनिया को तेल, और दूसरे कारोबारी संकट में डालना, और अब अमरीकी सैनिकों के उस इजराइल की इस जंग में विदेशी जमीन पर उतार देना, जहां पर खुद इजराइल शायद अपने सैनिकों को भेजने के लिए तैयार नहीं है। हमारा सिर्फ एक अंदाज है कि कोई भी जिम्मेदार थलसेना अध्यक्ष राष्ट्रपति के ऐसे फैसले का विरोध करेगा जो कि हजारों अमरीकी सैनिकों को एक अवांछित युद्ध में भेजने का है, जहां से सैकड़ों का ताबूत में लौटना तय सरीखा होगा।
ट्रम्प की शक्ल में अमरीका को 21वीं सदी की इस दूसरी चौथाई में एक ऐसा तानाशाह मिला है जो कि अमरीकी विश्लेषकों को हक्का-बक्का कर रहा है। हमारे पास इसे देने के लिए अब छापने लायक कोई गाली बची नहीं है, लेकिन हम लगातार यह देखते हैं कि लिखने के कुछ हफ्तों के भीतर खुद अमरीका से कोई न कोई जिम्मेदार तबका उस बात को दोहराता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक विख्यात संविधान-विशेषज्ञ ने इसे फौज पर राजनीतिक नियंत्रण का सीधा हमला करार दिया है। अमरीकी राष्ट्रपतियों के एक इतिहासकार ने कहा है कि ट्रम्प फौजी जनरलों से राजा के दरबारियों जैसी निष्ठा मांग रहे हैं, और ऐसी ही नौबत अमरीका के संस्थापक नेताओं को सबसे ज्यादा डराती थी। न्यूयॉर्क टाईम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि यह तानाशाहों जैसा व्यवहार है, न कि लोकतांत्रिक राष्ट्रपति सरीखा। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रपति को तकनीकी रूप से किसी फौजी कमांडर को हटाने का हक है, लेकिन चल रही जंग के बीच सिर्फ निष्ठा के आधार पर टॉप जनरलों को हटाना बुरी तरह खतरनाक और असमान्य है। अमरीका के सबसे बड़े संस्थापक नेताओं का डर राजा जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति का था। वे ब्रिटिश राजा से आजादी के बाद किसी भी तरह की तानाशाही नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने मजबूत, लेकिन जवाबदेह राष्ट्रपति का प्रावधान किया था। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध, उसके बाद के शीतयुद्ध, और 11 सितंबर के ओसामा के हमले के बाद राष्ट्रपति पद की ताकत बहुत बढ़ जाने दी गई, और इसे सम्राट जैसा राष्ट्रपति मान लिया गया। अब ट्रम्प अमरीका पर किसी हमले के बिना, बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला दीवाने की तरह इजराइल की जंग में शामिल हो गए हैं, और दुनिया के बाकी तमाम देशों को धमकाना, डराना जारी रखा है। एक अकेले इजराइल के साथ नाजायज दोस्ती निभाने के लिए ट्रम्प ने बाकी पूरी दुनिया से अपने रिश्तों को आग में झोंक दिया है। सच तो यह है कि जिस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति को सलाह-मशविरे की सबसे अधिक जरूरत दिख रही है, उसने अपने आपको मुसाहिबों और चापलूसों के घेरे में कैद कर लिया है, और सरकार के सारे बड़े ओहदों पर उन लोगों को बिठा दिया है, जो उसकी बदबू को शीशी में भरकर इत्र की तरह इस्तेमाल करने में गर्व पाते हैं।
कल सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने अदालत के बेजा इस्तेमाल को लेकर केन्द्र सरकार को झिडक़ा है, और जनता को भी। एक मामला तो ऐसा रहा जिसमें अदालत ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने पर केन्द्र सरकार पर 25 हजार रूपए का जुर्माना लगाया है। यह मामला सीआईएसएफ के एक सिपाही को गलत तरीके से बर्खास्त करने का था, हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर दी थी, और कुछ पुराना बकाया भी देने को कहा था। इसके खिलाफ केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, और वहां पर जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और जस्टिस उज्जल भुयां ने नाराजगी के साथ कहा कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत सरकार ने इस मामले में अदालत में अपील क्यों की है? उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार देश में आज सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है, इस तरह की गैरजरूरी की मुकदमेबाजी अदालतों पर बोझ बढ़ाती है, और इंसाफ में देरी की वजह बनती है। इन जजों ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़े खुलासे से आदेश दिया था, फिर भी केन्द्र सरकार बिना किसी ठोस आधार के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। यह एक असाधारण मामला था जिसमें कड़ी आलोचना के साथ केन्द्र सरकार पर जुर्माना भी लगाया गया। अदालत ने इसे तुच्छ याचिका कहा, और कहा कि सरकार को आदर्शवादी होना चाहिए, न कि हर छोटे फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचना चाहिए। जजों ने कहा कि आज हजारों लोग जेलों में बंद हैं, और जमानत या फांसी जैसे गंभीर मामलों में अदालती आदेश या फैसले के इंतजार में हैं, ऐसे में सरकार का ओछे कानूनी दांव-पेंच लेकर आना, उन लोगों के हक का समय छीनना है। कोर्ट ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा बिना सोचे-समझे अपील दायर करने की संस्कृति को बंद करना होगा। यह जुर्माना इसीलिए प्रतीकात्मक रूप से लगाया गया ताकि भविष्य में अफसरों को यह याद रहे कि वे अदालत के समय के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अगर सरकार खुद इस तरह की याचिकाएं दायर करती रहेगी, तो अदालतों पर से मामलों का बोझ कभी कम नहीं होगा।
एक दूसरे मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एक वकील द्वारा दायर कई जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने वकील को झिडक़ा, और कहा कि ये जनहित याचिकाएं पूरी तरह से अस्पष्ट और बेबुनियाद हैं। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या आप इन्हें आधी रात में तैयार करते हैं? जजों ने कहा कि पीआईएल दायर करने का मतलब यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपनी मनमानी शिकायतें लेकर अदालत आ जाए, ऐसी जनहित याचिका दुकानें चलाने वालों पर नजर रखनी होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी पीआईएल दायर करने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। इस वकील, सचिन गुप्ता ने अपनी पीआईएल में प्याज-लहसून को तामसिक बताने, शराब पर रोक लगाने, किसी भाषा को क्लासिकल (शास्त्रीय) घोषित करने जैसे बेतुके मुद्दे उठाए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बहुत से लोग अपने निजी हितों के लिए, किसी रंजिश में, या किसी को परेशान करने के लिए गलत इरादे से केस दर्ज करते हैं। कई मामलों में लोग केवल विपक्षी पार्टी को डराने, उनका पैसा खर्च कराने, या उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने के लिए फर्जी या कमजोर आधार वाले केस करते हैं। जजों ने कहा कि अदालतें व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने की जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि अदालतों में मुकदमों की बाढ़ इसलिए नहीं है कि जुल्म बढ़ गया है, बल्कि इसलिए भी है कि कानूनी पैंतरेबाजी बढ़ गई है, लोग तथ्यों को तोड़-मरोडक़र पेश करते हैं, ताकि मामला लंबा खिंचे। कोर्ट ने कहा कि जो लोग साफ-सुथरी नीयत से अदालत नहीं आते हैं, उन्हें भारी दंड मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की वजह से असली पीडि़तों को तारीख मिलने में सालों लग जाते हैं, क्योंकि जज उन केसों में उलझे रहते हैं जो शुरू ही नहीं होने चाहिए थे।
अभी महाराष्ट्र के नासिक में पकड़ाए एक तथाकथित आध्यात्मिक गुरू, और ज्योतिषी के सेक्स-वीडियो से सोशल मीडिया पटा हुआ है। ऐसा लगता है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से हर दिन इस पर हर वह व्यक्ति रील बना रहे हैं, जिनके पास एक मोबाइल फोन है, मुंह है, आवाज है, और इस बाबा, अशोक खरात की कोई भी वीडियो क्लिप है। लोग आधे हिस्से में इसकी वीडियो क्लिप लगाकर आधे हिस्से में अपना चेहरा दिखाकर, सनसनीखेज सुर्खी लगाकर दर्शक बटोर रहे हैं। लेकिन यह केस है तो पूरी तरह हकीकत। उसके पास पहुंचने वाली महिलाओं को वह उनके पति को लेकर कई तरह से डराता था, खतरा टालने का कोई ऐसा तरीका सुझाता था जिसे वह यौन पूजा कहता था, और इस तरह उन महिलाओं का या तो सिलसिलेवार, लगातार यौन शोषण करता था, अपने ही सीसीटीवी कैमरों पर रिकॉर्ड करता था, और फिर उन्हें ब्लैकमेल करके यौन शोषण को बढ़ाता था, या उगाही भी करता था। इसके पास से कोई डेढ़ सौ करोड़ की दौलत भी मिली है।
इस पर लिखने को नया बहुत कुछ नहीं रहता, अगर आज सुबह सूरत की एक और खबर बहुत सारे वीडियो और ऑडियो के साथ नहीं आई रहती। वहां एक जैन मुनि के ऑडियो-वीडियो से गुजरात उबल रहा है, जिसमें एक महिला के साथ इस जैन मुनि के सेक्स का नजारा है, इसके अलावा उसके कुछ टेलीफोन कॉल भी है जो इस, या ऐसी ही किसी दूसरी महिला, या लडक़ी से फोटो-वीडियो की ही बात करते हुए है। यह आरोप किसी विरोधी ने नहीं लगाया है, यह गुजरात में जैन समाज की महिलाओं ने ही जाकर पुलिस को दिया है कि एक जैन मुनि के ऐसे वीडियो-ऑडियो से पूरे समाज की बदनामी हो रही है, धर्म पर आंच आ रही है, और इस मुनि को सन्यासी चोले से बाहर निकालकर सांसारिक कपड़े पहनाए जाएं। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे जैन मुनि को बलात्कार में दस साल की कठोर कैद हुई है। इसने 2017 में अपनी एक 19 वर्षीय छात्रा-अनुयायी को दीक्षा देने, और शुद्धिकरण के बहाने से एक कमरे में बुलाकर बलात्कार किया था, और डराया था कि अगर यह बात किसी को बताई तो उसके परिवार पर दैवीय प्रकोप होगा। इस छात्रा के हौसले से डटे रहने, और मेडिकल सुबूतों के आधार पर इस मुनि को उम्रकैद हुई, बाद में उसे दस साल की कड़ी कैद में बदला गया। एक और मामला हरिद्वार और दिल्ली के पास का था जिसमें एक जैन मुनि एक छात्रा के साथ आपत्तिजनक यौन मुद्रा में दिख रहा था, बाद में वह फरार भी हो गया था, और समाज की पंचायत ने उसे सन्यास से हटा दिया था। देश का इतिहास हर कुछ महीनों में धर्म, आध्यात्म, या योग से जुड़े हुए ऐसे किसी बलात्कारी की खबरों को दर्ज करता है। केरल-तमिलनाडु की सीमा पर आश्रम चलाने वाले स्वामी प्रेमानंद पर 13 लड़कियों से बलात्कार, एक पुरूष की हत्या का आरोप साबित हुआ था, और सुप्रीम कोर्ट तक ने उसकी दोहरी उम्रकैद को बरकरार रखा था। भारत के कई टीवी चैनलों के दिल के टुकड़े, दिल्ली और राजस्थान के पाली में विशाल आश्रम चलाने वाले दाती महाराज नाम के अजीब हुलिए वाले एक धार्मिक चोगाधारी पर उसकी ही शिष्या ने सालों तक बलात्कार का आरोप लगाया था, और मामला सीबीआई तक गया था। दिल्ली के एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के वीरेन्द्र देव दीक्षित के आश्रम से 2017 में सौ से अधिक लड़कियों, और महिलाओं को लोहे के पिंजरों से निकाला गया था। यह दीक्षित खुद को कृष्ण का अवतार बताता था, और लड़कियों को गोपियां बनाने के नाम पर नशा देता था, और उनका यौन शोषण करता था। अब 8 सालों से वह फरार है, और सीबीआई उसे दुनिया भर में ढूंढ रही है। फिर आसाराम नाम के एक बलात्कारी के नाम को भला देश में अब कौन नहीं जानते? इससे परे राम-रहीम नाम का एक दूसरा बाबा जेल काटकर अभी शायद बाहर निकला हुआ है।
भारत में ही नहीं, दूसरों देशों में भी जो हिन्दुस्तानी योग, ध्यान, आध्यात्म जैसे धंधों में लगे हुए हैं, उन पर समय-समय पर जुर्म दर्ज होते रहे हैं। भारत के विदेशों में सबसे अधिक चर्चित इस दर्जे के आचार्य रजनीश, बाद में स्वघोषित ओशो, पर भी कितने तरह के मामले चले, और बाद में अमरीका से निकाल दिया गया। योग सिखाने वाले एक विक्रम चौधरी पर अमरीका में 6 पूर्व शिष्याओं ने बलात्कार के मुकदमे दर्ज कराए, अमरीकी अदालत ने उस पर करीब 58 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया, वह अमरीका छोडक़र भाग गया, और उसकी सारी सम्पत्तियां जब्त कर ली गई हैं। लेकिन ऐसे मामलों की लिस्ट हम जब तक गिनाते रहेंगे, तब तक तो ऐसे एक-दो और मामले भी आ जाएंगे। आखिर यह नौबत आती क्यों है, इसे समझने की जरूरत है।
बस्तर में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हुई है, या तकरीबन खत्म हुई है, इस विवाद में हम पडऩा नहीं चाहते। जिस हद तक वह खत्म हुई है, वह केन्द्र और राज्य सरकार की घोषणाओं के मुताबिक ही है। अब अगर बहुत थोड़ी सी गिनती में नक्सली बचे हुए हैं, तो जाहिर है कि उनकी मारक क्षमता खत्म हो चुकी है, और वे शायद अपने आखिरी हथियारबंद दिन गुजार रहे हैं। कल संसद में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर कामयाबी गिनाते हुए छत्तीसगढ़ में पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल पर भी एक सीधा हमला किया है कि उनकी सरकार ने नक्सलियों को संरक्षण दिया, जिससे नक्सल उन्मूलन अभियान में देर हुई। उन्होंने चुनौती दी और कहा कि भूपेश बघेल को पूछो, सुबूत दूं क्या, और कहा कि अगर भूपेश हां बोलेंगे, तो फंस जाएंगे। यह संसद में कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार पर केन्द्रीय गृहमंत्री का अब तक का सबसे बड़ा हमला था, और भूपेश ने संसद के बाहर अमित शाह को सुबूत देने की चुनौती दी है, साथ ही यह कहा है कि उनके पांच बरस के कार्यकाल में केन्द्र सरकार के साथ नक्सल मोर्चे पर लगातार बैठकें हुईं, और किसी भी बैठक में केन्द्रीय गृहमंत्री या केन्द्र सरकार की तरफ से छत्तीसगढ़ की भूपेश-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई। अब अचानक यह बात कही जा रही है।
दरअसल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आज के घटनाक्रम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनका श्रेय लेने के लिए कोशिश करने, या दावा करने का हक सत्तारूढ़ पार्टी का बनता ही है। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार की लगाई गई इतनी बड़ी तोहमत पर भूपेश बघेल की जवाबदेही भी बनती है, और उन्होंने अपनी जवाबदेही अमित शाह से एक सवाल करके पूरी की है। ये दोनों चुनौतियां इतनी दिलचस्प हो चुकी हैं कि जनता इंतजार करेगी कि अमित शाह कुछ अधिक जानकारी सामने रखें, सुबूत बताएं, और जनता अपनी सोच तय करे। इसके पहले भी एक ऐसी नौबत आई थी, लेकिन उस वक्त मुख्यमंत्री बनने के पहले के भूपेश बघेल ने यह दावा किया था कि उनके पास झीरम घाटी हमले की साजिश के सुबूत हैं, और उन्हें वे सही जांच एजेंसी को देंगे। कई तरह की जांच एजेंसियां झीरम की जांच करती रही, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से एनआईए की जांच चलते-चलते भी भूपेश सरकार की पुलिस को जांच करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी भूपेश बघेल ने झीरम साजिश के कोई सुबूत किसी एजेंसी को नहीं दिए जिन्हें कि वे अपनी जेब में लेकर चलने का दावा करते थे। हम तो जनता के जानने के हक के तहत पहले भी इस बात को बार-बार लिख चुके हैं कि न सिर्फ मुख्यमंत्री को, बल्कि देश के किसी आम नागरिक को भी किसी भी जुर्म या साजिश की जानकारी होने पर यह उनकी नागरिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उसे जांच एजेंसी को दें। ऐसे में विपक्ष के नेता के रूप में भूपेश बरसों झीरम के सुबूत जेब में थपथपाते रहे, लेकिन दिए कभी नहीं। मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने कभी सुबूत जांच एजेंसी को देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। अब संसद में अमित शाह ने भूपेश बघेल को जो चुनौती दी है, उस पर हम अपनी पुरानी सोच को दोहराते हुए यही कहेंगे कि भूपेश बघेल उनसे सुबूत न भी मांगें, तब भी देश का यह हक है कि अगर कांग्रेस सरकार ने पांच बरस नक्सलियों को संरक्षण दिया, तो इसके सुबूत जनता के सामने आने चाहिए। यह बात किसी भी पार्टी के किसी भी संगठन के साथ रिश्तों पर लागू होती है, अगर कोई कानून तोड़े जाते हैं। चाहे ऐसे संगठन हथियारबंद हों, या साम्प्रदायिकता से लैस हों, रिश्तों के सुबूत, और शपथ ली हुई सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण तो उजागर होने ही चाहिए।
अब हम इन दोनों नेताओं की एक-दूसरे को दी गई चुनौतियों का मजा लेते हुए, इनके आगे बढऩे का इंतजार करेंगे, क्योंकि यह पारदर्शिता जनता के हक में है। ऐसी राजनीतिक बातें जनता के किसी सूचना पाने के अधिकार के तहत नहीं रहती हैं, ऐसी बातें नेताओं के सूचना देने की जिम्मेदारी के तहत आती हैं, जिसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है, बस एक सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जरूरी रहती है। लोकतंत्र में ऐसी गंभीर बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस किस्म के बहुत से मामलों में श्वेतपत्र जारी करने की भी परंपरा रही है जिसमें सरकार उसे हासिल तमाम किस्म के तथ्यों को एक दस्तावेज की तरह जनता के लिए जारी करती है। बस्तर के नक्सल मोर्चे को लेकर अगर अमित शाह के पास सचमुच ही कांग्रेस सरकार के दिए हुए संरक्षण के सुबूत हैं, तो उन्हें श्वेतपत्र के रूप में भी जारी किया जा सकता है।
भारतीय संसद के दोनों सदनों में अभी ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक मंजूर किया गया है, और इसका खुलासा सामने आने के बाद ट्रांसजेंडर समुदायों के बीच इसका जमकर विरोध हो रहा है। हमारे यूट्यूब चैनल से एक इंटरव्यू में ट्रांसजेंडरों ने रोते हुए कहा कि इससे तो अच्छा है कि उन्हें जहर दे दिया जाए। अब सरकार के नजरिए से देखें, तो 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक थी, और अब सात साल के भीतर ही किए जा रहे इस संशोधन विधेयक में इस वर्ग में जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों को ही प्राथमिकता दी गई है। संशोधन विधेयक में यह साफ कहा गया है कि जो लोग खुद अपनी शारीरिक-मानसिक भावनाओं के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान स्थापित करना चाहते हैं, या अपना यौन रूझान बताना चाहते हैं, उन्हें इस विधेयक के दायरे में नहीं रखा जाएगा। यानी बिना एक मेडिकल बोर्ड के किसी ट्रांसजेंडर की पहचान सिर्फ उसकी मर्जी से तय नहीं होगी। अभी तक जो लोग अपने आपको किसी दूसरे जेंडर के शरीर में कैद महसूस करते थे, वे कोई ऑपरेशन कराकर भी जेंडर बदलवा सकते थे, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो सरकार ऐसे सेक्स-चेंज ऑपरेशन का खर्च भी उठाती थी। अब इस नए विधेयक में यह खतरा खड़ा हो गया है कि किसी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होकर अपनी खुद की पहचान साबित करने के लिए बोर्ड के डॉक्टरी पैमानों पर खुद को साबित करना, पूरी तरह अपमानजनक भी है, और यह मेडिकली संभव नहीं है कि किसी की मन की अपनी भावनाएं डॉक्टर पहचान सकें, और मान सकें। आज ट्रांस लोगों की व्यापक परिभाषा में कई तरह की यौन-पहचान, या यौन-पसंद वाले लोग आते हैं, और इस नए विधेयक में उनमें से बहुत सारे लोगों को ट्रांस नहीं माना जाएगा, और वे कानूनी सुरक्षा खो बैठेंगे। इस विधेयक में यह भी है कि किसी पर ट्रांसजेंडर पहचान थोपी गई, तो वह जुर्म कहलाएगा, और उस पर बड़ी कड़ी सजा होगी। ट्रांस-कार्यकर्ताओं को डर है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल उन डॉक्टरों, एनजीओ, या सहायता समूहों के खिलाफ हो सकता है जो लोगों को अपनी मर्जी की सेक्स पहचान पाने में डॉक्टरी मदद करते हैं। इसमें ट्रांस लोगों की शादी, गोद लेने, उत्तराधिकार, और आरक्षण जैसे नागरिक अधिकारों का कोई जिक्र नहीं है। सरकार का कहना है कि ट्रांस लोगों की पुरानी परिभाषा में बहुत सारे फर्जी लोग भी फायदे पा रहे थे, इसलिए इसकी एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा जरूरी हो गई थी। दूसरी तरफ कई प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वगैरह इस विधेयक को एक ऐतिहासिक गलती बतला रहे हैं, और उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि इसे मंजूरी न दें।
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में लोगों को अपनी ट्रांस पहचान तय करने के लिए जिस तरह एक मेडिकल बोर्ड की मजबूरी डाली गई है, उससे सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों के साथ इस विधेयक का टकराव हो रहा है। भारत में ट्रांस अधिकारों को लेकर न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा फैसला नाल्सा-जजमेंट माना जाता है। 2014 में दो जजों की बेंच ने यह तय किया था कि किसी व्यक्ति की जेंडर-पहचान उसके आत्मसम्मान और उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर-पहचान तय करने के लिए किसी डॉक्टरी जांच या सर्जरी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, व्यक्ति जैसा महसूस करते हैं, उन्हें वैसी ही मान्यता पाने का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह लिखा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत गरिमा के साथ जीने में अपनी पहचान खुद तय करना शामिल है। इस फैसले के बाद एक दूसरे फैसले में एक और जज ने यह लिखा था कि राज्य को किसी व्यक्ति की निजी पहचान की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोई बहुत बड़ा सार्वजनिक हित न हो।
अभी ट्रांस-कार्यकर्ताओं की आशंका यह है कि यह नया विधेयक उनके लोगों को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए मजबूर करके अपमानित भी करता है, और यह किसी व्यक्ति की गरिमा को एक डॉक्टरी मामला बना देता है। उनकी यह भी आशंका है कि मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता से यह प्रक्रिया लंबी और कठिन हो जाएगी, और पहचान प्रमाणपत्र पाने में भ्रष्टाचार बढ़ेगा। कानून के कुछ जानकारों का कहना है कि 2026 का यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के नाल्सा-फैसले की मूल भावना के खिलाफ है, और इसे अदालत में अगर चुनौती दी जाएगी, तो इसके टिकने की संभावना पर शक है। यहां दो-तीन बातों को समझ लेना जरूरी होगा कि 2014 और 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद 2019 में बने हुए ट्रांसजेंडर कानून को सात बरस के भीतर इस तरह आमूलचूल बदलने की क्या जरूरत आ गई है? ट्रांसजेंडरों के अधिकारों का ऐसा कौन सा बेजा इस्तेमाल होने लगा था कि जिसकी वजह से सरकार ने उनकी पहचान को डॉक्टर जांच और सर्टिफिकेट से स्थापित करना अनिवार्य समझा है?
पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर अब ये अटकलें लगने लगी हैं कि किन राज्यों में राजनीतिक दल कौन से फॉर्मूले इस्तेमाल करेंगे। अभी सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबीज नाम का एक मामला चल ही रहा है जिसमें न केवल चुनाव के वक्त, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल जनता को कौन-कौन सी चीजें ‘मुफ्त’ देते हैं। इनमें इन दिनों सबसे अधिक चर्चा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे भेजी जाने वाली रकम है जो कि कमजोर महिलाओं के सशक्तिकरण के तर्क के साथ शुरू हुई हैं। राजनीतिक आंकलन यह है कि महिलाओं को सीधे नगद मदद भेजने से कई राज्यों में ऐसी पार्टी की जीत हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हमने पिछले विधानसभा चुनाव में यह देखा है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में तकरीबन हर महिला को हजार रूपए महीने देने की महतारी वंदन योजना घोषित की, और चुनावी नतीजे उसके पक्ष में चले गए। हालांकि इसके साथ-साथ भाजपा ने धान किसानों से 31 सौ रूपए क्विंटल, प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक खरीदने का वायदा भी किया था, लेकिन किसानों के लिए तो वायदा कांग्रेस का भी था। जो भी हो, भारतीय चुनाव किन वजहों से प्रभावित हुए, इसका अंदाज लगाना बड़ा ही मुश्किल रहता है।
फिलहाल इस बरस असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में दस दिन बाद वोट डलना शुरू हो जाएंगे, और आज से पांच हफ्ते के भीतर सारे नतीजे आ जाएंगे। भारत के चुनावों की लिस्ट देखें, तो हर बरस चार-छह राज्यों के चुनाव होते हैं। और हर पांच बरस में लोकसभा के चुनाव होते हैं जो कि अब 2029 में इसी वक्त होंगे। इसके अलावा देश में पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव भी एक संवैधानिक बाध्यता हैं, और हर राज्य में इनका समय अलग-अलग है। कई राज्यों में ये तीनों किस्म के चुनाव साल-साल भर के फासले से भी होते हैं, नतीजा यह होता है कि ये राज्य पूरे पांच बरस चुनावी मोड में रहते हैं। सरकारें कोई कड़े फैसले कर नहीं पातीं, हर थोड़े-थोड़े अरसे में कुछ लुभावने फैसले लेने पड़ते हैं, और हर चुनाव की आचार संहिता के दौर में कई तरह के काम थम जाते हैं। फिर सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्षी दल, सबके नेता प्रचार में लग जाते हैं, और गैरचुनावी लोकतांत्रिक-सरकारी काम प्रभावित होते हैं। अभी जैसे जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां पर उन राज्यों के नेता भी जाकर प्रचार कर रहे हैं, जहां पर चुनाव नहीं हैं। मतलब यह कि सत्ता के नेता हों, या विपक्ष के, वे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी के इलाकों से दूर जाकर चुनाव प्रचार में लगे हैं। देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की सोच इन वजहों से भी बनती है, और हम इसका समर्थन भी करते आए हैं। हालांकि देश के बहुत से समझदार दलों ने इस सोच का विरोध किया है, और यह कहा है कि राष्ट्रीय चुनाव अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं, प्रदेश के चुनाव अलग मुद्दों पर, और स्थानीय चुनावों के मुद्दे इन दोनों से अलग रहते हैं। ऐसे में अगर ये सभी चुनाव एक साथ करवाए जाएंगे, तो कोई राष्ट्रीय मुद्दा राष्ट्र में भी किसी पार्टी की सरकार बनवा देगा, और राष्ट्रीय मुद्दा ही पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव पर भी हावी हो जाएगा। हम इस तर्क से असहमत नहीं हैं, फिर भी हमारा यह मानना है कि जब लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों के चुनाव भी हुए हैं, तो भी उनमें जनता कुछ जगहों पर इतनी समझदार रही है कि उसने देश में एक पार्टी की सरकार चुनी, और प्रदेश में उसी पोलिंग बूथ से, उसी दिन वोट डालते हुए दूसरी पार्टी की सरकार चुनी। भारत के आज के विपक्षी दलों की आशंका के खिलाफ हमें तो यह भी लगता है कि पंचायत और म्युनिसिपल के स्तर पर किसी पार्टी के उम्मीदवार देखकर, उसके पिछले कार्यकाल का कामकाज देखकर, हो सकता है कि वोटर उसी दिन के वोट में संसदीय चुनाव में भी उस पार्टी के खिलाफ वोट डाल दे। और ऐसा ही राज्य स्तर पर किसी पार्टी की बदनामी की वजह से उसके संसदीय चुनाव पर असर पड़ जाए। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को लेकर अधिक आशंका से नहीं घिरना चाहिए, मतदाता की सोच लोकल से नेशनल, या नेशनल से लोकल, दोनों तरह से प्रभावित हो सकती है।
खैर, आज का हमारा मुद्दा वन नेशन-वन इलेक्शन नहीं है। हम तो यह सोच रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदान के नतीजों को, या उसके बाद बनने वाली सरकार को ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कामयाबी मान लिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि ये सारे चुनाव, और चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया तरह-तरह के अलोकतांत्रिक प्रभावों से भरे रहते हैं। सुनने में अच्छा लगे या नहीं, राजनीतिक दल ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाते हैं, जो चाहे परले दर्जे के मुजरिम ही क्यों न हों, उनकी जीत की क्षमता रहनी चाहिए, आमतौर पर उम्मीदवार के पास गैरकानूनी खर्च के लायक अंधाधुंध पैसा होना चाहिए। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि धर्म और जाति का ध्रुवीकरण कैसे करवाया जा सकता है, कैसे साम्प्रदायिकता खड़ी करके उससे उपजने वाली नफरत को वोटों की शक्ल में भुनाया जा सकता है। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि किस तरह वोटरों को शराब या नोट बांटकर आखिरी के दो-तीन दिनों में उनका रूख अपनी तरफ किया जा सकता है। वे यह भी देखते हैं कि किस तरह दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को खरीदकर बिठाया जा सकता है, कार्यकर्ताओं को खरीदकर विपक्षी उम्मीदवार को कमजोर किया जा सकता है। हमने कई तरह के नाजायज काम देखे हैं। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने लोकसभा चुनाव लड़ते हुए अपने सामने के भाजपा उम्मीदवार चन्दूलाल साहू के नाम वाले आधा दर्जन और चन्दूलाल साहू ढूंढकर उनसे नामांकन भरवा दिया था, और फिर उन सबको मतदान तक गायब कर दिया था। इसी छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ के कांग्रेस उम्मीद्वार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज भी चारों तरफ घूमती है। हमने अपने ही आसपास के शहरों में देखा है कि किस तरह मुस्लिम वोटरों को शक से देखने वालों ने ऐन मतदान के दिन उनकी अजमेर की टिकटें करवा दी थीं, और एक दूसरे उम्मीदवार ने मतदान के एक दिन पहले मुस्लिम वोटरों को बुला-बुलाकर उनकी उंगलियों पर काली चुनावी स्याही लगाकर नगद भुगतान कर दिया था, ताकि वे अगले दिन वोट न डाल सकें। इस तरह की सैकड़ों तिकड़में भारत के चुनावों में होती हैं जिनकी कोई आशंका भी देश के संविधान और चुनाव आयोग के नियमों में नहीं है। फिर अब तो चुनाव आयोग का हाल यह है कि उसके बारे में लतीफे बनते हैं कि वह फलां गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा, वह बाहर से समर्थन करेगा। शेषन की साख वाले चुनाव आयोग की शेष न रह गई साख के बारे में अब क्या ही कहा जाए! अभी तो बहुत से लोगों का यह मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण से ही अगले चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं।
नेपाल में हाल ही में आई नई सरकार ने एक जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछले प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली, और पिछले गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया है। अभी नए नौजवान प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ ली थी। मंत्रिमंडल ने यह तय किया था कि ओली सरकार के दौरान हुए जनप्रदर्शनों पर जो सरकारी कार्रवाई हुई थी, और पिछली सरकार के दूसरे मामलों को लेकर एक आयोग की जो जांच रिपोर्ट आई थी, उसे लागू किया जाएगा। उसी के मुताबिक यह कार्रवाई की गई है। नेपाल के चुनावी नतीजों को जिन लोगों ने बारीकी से देखा है वे जानते हैं एक रैप सिंगर से राजनेता बने बालेन शाह ने चुनाव में ओली को भारी लीड से हराया था, और अपनी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया था। नेपाल के चुनाव भ्रष्टाचार, और बेरोजगारी के अलावा एक बड़े भावनात्मक मुद्दे को लेकर भी हुए थे। वहां सत्तारूढ़ नेताओं की औलादें अपनी रईसी, ऐशोआराम, और देश-विदेश की फिजूलखर्ची सोशल मीडिया पर पोस्ट करती थीं, और उन्हें देख-देखकर नौजवान पीढ़ी अधिक भडक़ी हुई थी। पिछले बरस सितंबर के इस आंदोलन में 76 लोग मारे गए थे, जिनमें से कई मौतें पुलिस गोलियों से हुई थीं। ऐसे में एक जनक्रांति की तरह नेपाल में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ, और जनता ने ही सरकार को बर्खास्त कर दिया, पिछली सरकार के सारे नेता किसी तरह जान बचाकर भागे थे। अब ऐसे में पिछले पीएम और गृहमंत्री को आपराधिक लापरवाही के आरोप में गिरफ्तार करने की चर्चा है, जांच आयोग ने इन दोनों को इस बात का दोषी ठहराया है कि इन्होंने जनआंदोलन को हिंसक तरीके से दबाने की अनुमति दी थी।
यह केवल नेपाल की बात नहीं है, दुनिया के दर्जनों देशों में अलग-अलग वक्त पर ऐसा होता है कि नई आई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कार्रवाई करती है। भारत में ही आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी सरकार ने देश भर में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ जांच आयोग बिठाए थे, और इंदिरा गांधी को गिरफ्तार भी किया था। अमरीका में अभी ट्रम्प ने पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल के जाने कितने ही बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करवाई, जुर्म दर्ज करवाए, उन्हें बर्खास्त किया, क्योंकि पिछली डेमोक्रेटिक सरकार के कार्यकाल में इन लोगों ने ट्रम्प के तरह-तरह के जुर्म पर संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई की थी। ऐसा बांग्लादेश में भी देखने आया, पाकिस्तान में भी, और श्रीलंका में भी। पाकिस्तान में तो हालत यह थी कि जनरल जिया उल हक की फौजी तानाशाह सरकार ने पिछले प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी ही दे दी थी। भारत के बहुत से प्रदेशों में भी नाटकीय से लेकर शर्मनाक तक घटनाएं सामने आई हैं। लोगों को तमिलनाडु का वह नजारा नहीं भूलता जब जयललिता की सरकार ने एक बुजुर्ग नेता, और पिछले मुख्यमंत्री एम.करूणानिधि को गिरफ्तार करवाया था, और रात दो बजे उनके घर में बड़ी संख्या में पुलिस घुसी थी, और 78 साल के करूणानिधि को बिस्तर से उठाकर घसीटते हुए, और फिर पूरा का पूरा उठाकर ले जाया गया था। इस दौरान उनके साथ बदसलूकी भी हुई थी, उन्हें गिरा भी दिया गया था, और वे दर्द से चीखते भी रहे थे। ऐसा कई देश-प्रदेश में होता है, और इनको गिरफ्तार होने वाले नेता बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार देते हैं, और सरकार कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है। कानून से परे भी बदले और अपमान की भावना से होने वाली कुछ घटनाएं भयानक तरीके से याद रहती हैं। तमिलनाडु में करूणानिधि की गिरफ्तारी के 12 बरस पहले, विधानसभा में विपक्ष की पहली महिला नेता जयललिता एक हंगामे के बीच चलती हुई चप्पलों से विचलित जब सदन से बाहर जा रही थीं, तो उनकी विरोधी पार्टी डीएमके के एक मंत्री ने उनकी साड़ी का पल्लू पकडक़र खींचा था, कंधे पर साड़ी से लगी सेफ्टी पिन अलग हो गई थी, खून निकलने लगा था, और फटी हुई अस्त-व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बालों सहित रोती हुई जयललिता ने सदन छोड़ा था। शायद करूणानिधि की गिरफ्तारी इसी का हिसाब चुकता करना था। जयललिता उस दिन कसम खाकर निकली थीं कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सदन में लौटेंगी, और दो साल के भीतर ही 1991 में ऐसी नौबत आ गई थी।
दुनिया भर में टेलीफोन पर लोगों को ठगने, धमकाने, ब्लैकमेल करने के संगठित जुर्म लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। भारत के पड़ोस में राजनीतिक अस्थिरता, और फौजी तानाशाही से गुजरते हुए म्यांमार में हजारों लोगों को कैद करके उनसे ऐसे कॉलसेंटर चलवाए जा रहे हैं जो भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों से साइबर ठगी-जालसाजी करते हैं, उन्हें धमकाते हैं, डिजिटल अरेस्ट का झांसा देते हैं, और उनकी जिंदगी भर की कमाई को खाली कर देते हैं। ऐसे साइबर क्राइम की खबरें हर दिन आती हैं, लेकिन अभी दो दिन पहले आई एक खबर कुछ अनोखी निकली। जिस छत्तीसगढ़ में हर दिन दर्जनों लोग साइबर-ठगी के शिकार होते हैं, उस छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसा एक अपराधी कॉलसेंटर चल रहा था, जो दुनिया के दूसरे देशों, खासकर अमरीका और यूएई के लोगों को लोन दिलाने के नाम पर ठग रहा था। छत्तीसगढ़ पुलिस ने रायपुर के एक संपन्न इलाके में फायनेंस कंपनी की आड़ में चल रहे ऐसे कॉलसेंटर को पकड़ा, और यहां से 42 लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से कई दर्जन मोबाइल फोन, डेढ़ दर्जन लैपटॉप, दो दर्जन से अधिक कम्प्यूटर, और बाकी चीजें गिरफ्तार की गईं। पुलिस की जानकारी के अनुसार अहमदाबाद में बैठा हुआ एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क को कंट्रोल कर रहा था, वही यह कॉलसेंटर चला रहा था, कर्मचारियों का इंतजाम कर रहा था, और वसूली-उगाही कर रहा था। अभी तक छत्तीसगढ़ का नाम ठगने वाले मुजरिम प्रदेशों की लिस्ट में नहीं था, लेकिन अब अहमदाबाद में बैठे एक मुजरिम की वजह से यह प्रदेश भी ठग-जालसाज प्रदेश की तरह पहली बार सामने आया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का कोई बहुत अंतरराष्ट्रीय लेन-देन कभी नहीं रहा। कुल मिलाकर थोड़ा-बहुत आयरन ओर, और कुछ चावल ही यहां से निर्यात होता है, लेकिन धोखाधड़ी-जालसाजी निर्यात होने का यह पहला मौका सामने आया है। अमरीका और योरप के वक्त के मुताबिक रायपुर में यह कॉलसेंटर शाम में काम शुरू करता था, और दूसरे देशों में लोन का फर्जी प्रस्ताव देकर ठगी करता था। जो लोग यहां से गिरफ्तार हुए हैं, वे सारे के सारे इस प्रदेश के बाहर के हैं, शायद इसलिए कि स्थानीय लोगों से बात बाहर जाने का खतरा अधिक हो सकता था। गिरफ्तार नौजवान कई प्रदेशों से यहां जुटाए गए थे, और यहां ठगी से जुटाया गया पैसा हवाला या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए विदेश भेज देने की जानकारी भी सामने आई है। दिलचस्प बात यह भी है कि अधिकतर आरोपी दसवीं या बारहवीं पास हैं, मतलब यह कि जितनी पढ़ाई पर हिन्दुस्तान में ढंग का कोई काम नहीं मिल सकता, वे यहां बैठे हुए अमरीका और योरप के लोगों को ठग रहे थे। रोजगार की इन नई संभावनाओं से यह भी पता लगता है कि अगर मौका मिले, तो हिन्दुस्तानी अर्धशिक्षित बेरोजगार भी कहीं तक भी पहुंच सकते हैं।
जब संपन्न और विकसित देशों के लोग ठगी का शिकार हो सकते हैं, तो यह बात भी उठती है कि क्या साइबर-ठगी, और दूसरे किस्म के साइबर-जुर्म से बचाव के लिए बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए सरकार को शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई इंतजाम तुरंत नहीं करना चाहिए? हाल के बरसों में जो मामले सामने आए हैं, उनमें फौज के बड़े-बड़े तीन स्टार जनरल रह चुके रिटायर्ड अफसर भी साइबर-ठगी में करोड़ों रूपए गंवा चुके हैं, देश के बहुत से प्रदेशों में बहुत से लोग अपने आपको डिजिटल अरेस्ट में गिरफ्तार मानकर अपनी सारी जमापूंजी ठगों के बैंक खातों में डाल चुके हैं। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें तीन-चार हफ्तों तक कोई बुजुर्ग, या परिवार के सारे लोग अपने के डिजिटल अरेस्ट में मानकर कैद रहे, ठगों के हुक्म मानते रहे, बैंक अफसरों के समझाने पर भी समझने को तैयार नहीं हुए, और अपनी पूरी रकम ठगों के खातों में डालते रहे। इनमें ऐसे-ऐसे बुजुर्ग और बीमार लोग शामिल थे, जो कि ऐसे तनाव में मर सकते थे। अब अगर ऐसी मौतें हुई भी होंगी, तो भी वे हमें अभी तुरंत याद नहीं पड़ रही हैं। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी इसी वक्त अमरीका के एक राज्य में एक अदालत ने फेसबुक की कंपनी, मेटा पर सैकड़ों करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को जुर्म का शिकार होने से बचाने के लिए जरूरत के मुताबिक सावधानी नहीं बरती थी। ऐसे में दुनिया भर के साइबर और ऑनलाइन मुजरिम अमरीका, ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में छोटे स्कूली बच्चों को फंसा लेते हैं, उनकी नग्न तस्वीरें ले लेते हैं, और फिर उन्हें ब्लैकमेलिंग के एक रैकेट में फंसाकर उनसे वसूली करते हैं। खुद अमरीका में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थके हुए दहशत के शिकार कई बच्चों ने खुदकुशी तक कर ली है। अभी भारत जैसा देश इस तरह की साइबर-सावधानी बरतने से कोसों दूर है। इस देश के एक-दो राज्य, तेलंगाना, और कर्नाटक यह पहल जरूर कर रहे हैं कि कमउम्र बच्चों को किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर दाखिला न दिया जाए, लेकिन ऐसे कानून भी जब तक देश के स्तर पर नहीं बनेंगे, बाकी प्रदेशों के बच्चे तो खतरे में रहेंगे ही। फिर मेटा जैसी दानवाकार कंपनी से लडऩे-भिडऩे की ताकत किसी एक प्रदेश की नहीं हो सकती, और इसके लिए भारत सरकार जैसी एक बड़ी ताकत की जरूरत होगी।
लड़कियों और महिलाओं की माहवारी का मामला लगातार किसी न किसी खबर में बने रहता है। यह एक किस्म से अच्छी नौबत है कि एक-दो पीढ़ी पहले जिस बात की चर्चा भी शर्मिंदगी मानी जाती थी, वह बात अब पहले के मुकाबले कुछ अधिक खुलकर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो अलग-अलग मामलों में माहवारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है, और टिप्पणी की है। एक मामले में उसने तमाम राज्य सरकारों को कहा है कि स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड दिए जाएं, और उनके लिए शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसे अलग शौचालय बनाए जाएं, जहां पर वे माहवारी के दिनों में सहूलियत से पैड बदल सकें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानना राज्य सरकारों के लिए एक बंदिश है, यह एक अलग बात है कि ऐसे कई फैसलों पर अमल करने में राज्य सुस्ती दिखाते हैं, और आसानी से आदेश पूरा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी कुछ लोगों को खटक सकती है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दिनों में अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान बनाने से महिलाओं में हीनभावना भी आ सकती है, और नौकरी देने वाले लोग भी महिलाओं को काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ये दोनों ही मामले अलग-अलग किस्म के थे, छुट्टी वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दी, और कहा कि ऐसे स्वैच्छिक अवकाश की नीति बनाने पर सरकार विचार कर सकती है, लेकिन इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने का मतलब महिलाओं के कामकाज का नुकसान करना हो जाएगा।
आज इस पर चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि महाराष्ट्र के नासिक का एक ताजा समाचार है कि वहां स्कूल की बोर्ड इम्तिहान दे रही एक छात्रा ने जब वहां मौजूद शिक्षिका को बताया कि उसकी माहवारी शुरू हो गई है, तो भी शिक्षिका ने उसे बाथरूम तक नहीं जाने दिया, और उसी हालत में उसे बाद के एक घंटे तक बैठना पड़ा। इस घटना की खबर उजागर होने पर बोर्ड के चेयरमैन ने इसे गलत फैसला बताया, और कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं को शौचालय न जाने दिया जाए। उन्होंने कहा कि शरीर की प्राकृतिक जरूरतों को नहीं दबाया जा सकता, और शिक्षकों को ऐसे नियम बनाने और थोपने का कोई अधिकार नहीं है। बोर्ड की तरफ से इस शिक्षिका को नोटिस भी जारी किया जा रहा है कि उसने इस छात्रा के कहने पर भी उसे बाथरूम तक जाने की छूट क्यों नहीं दी। छात्रा का कहना है कि माहवारी शुरू होने के बाद उसके लिए पर्चा लेकर बैठना मुमकिन नहीं था, और उसके पूरे कपड़े खून से भर गए। इम्तिहान के बाद भी उसे अपनी सहेलियों के घेरे में निकलना पड़ा, क्योंकि ऐसे कपड़े शर्मिंदगी की वजह थे। जब उसने स्कूल की एक कर्मचारी से सेनेटरी नेपकिन मांगा, तो उसने कहा कि स्कूल में इसे नहीं रखा जाता। परिवार ने इसकी शिकायत करते हुए कहा कि शिक्षिका को सजा दिलवाना नहीं चाहते, लेकिन वे बोर्ड के नियमों और निर्देशों को अधिक संवेदनशील बनवाना चाहते हैं।
महाराष्ट्र एक विकसित प्रदेश माना जाता है जहां पर साक्षरता, शिक्षा, जागरूकता, और संपन्नता सभी देश के औसत से अधिक होनी चाहिए। इसके बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसलों और निर्देशों के बाद भी इम्तिहान के दौरान अगर स्कूलों में पैड का इंतजाम नहीं है, शिक्षिका में संवेदनशीलता नहीं है, तो यह बड़ी ही फिक्र की बात है। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं नियमों को कड़ाई से लागू करने के लिए अमानवीय हद तक चले जाते हैं। देश में जगह-जगह छोटे-छोटे बच्चों को भयानक अमानवीय सजा देने वाले टीचर्स गिरफ्तार भी होते हैं, लेकिन फिर भी हर किसी को समझ नहीं आती है। ऐसे में समाज के भीतर ही अपनी जिम्मेदारी, और दूसरों के अधिकार को लेकर एक बेहतर सामाजिक चेतना की जरूरत है। आज भारत का हाल यह है कि लोगों को अपने अधिकार, और दूसरों की जिम्मेदारी से परे कुछ नहीं सूझता है।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर कल देश भर में एक खलबली मची। बहुत से लोगों ने जाने किस वजह से खुशियां मनाईं, कुछ राजनीतिक दलों के प्रवक्ता इसे जीत की तरह साबित करने पर उतारू हो गए, कुछ जातियों के संगठन भी खुशियां मनाने लगे। और फैसला महज इतना था कि जो दलित हिन्दू, बौद्ध, या सिक्ख धर्म से परे के किसी भी धर्म में जाते हैं, तो उनका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है। मतलब यह कि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, और अनुसूचित जाति को जुल्म से बचाने के लिए जो एक कानूनी संरक्षण बनाया गया है, उसका लाभ भी नहीं मिलेगा। यह 1950 में भारत में लागू हुए संविधान में ही लिखा हुआ है, और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक, या कि किसी छोटी अदालत तक भी जाने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में इतना लचीलापन है कि संविधान के कई बुनियादी तत्वों को भी लोग चुनौतियां दे सकते हैं, और अदालतें काफी दूर तक उन्हें सुनने-समझने की कोशिश भी करती हैं कि शायद संविधान के किसी पहलू की कोई नई व्याख्या निकल आए।
अब इस मामले को देखें, तो यह आंध्रप्रदेश का एक मामला था जिसमें ईसाई बन चुके एक दलित पादरी ने शिकायत की थी कि उन्हें 2020 में कुछ लोगों ने घर पर प्रार्थना के बीच जाति आधारित गालियां दी थीं। उन्होंने एसटी-एससी एक्ट के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। अभियुक्तों का कहना था कि वे सालों से ईसाई हैं, इसलिए वे एससी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज नहीं कर सकते। इस तर्क के आधार पर मामला आंध्र हाईकोर्ट तक पहुंचा, और पिछले बरस आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत करने वाला पादरी दस साल से ईसाई है, और चूंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं, इसलिए दलितों को जाति के संरक्षण से बाहर कर दिया गया है। यह शिकायत खारिज होने पर यह भूतपूर्व दलित पादरी सुप्रीम कोर्ट गया, और सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि सिर्फ हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध धर्मों में ही जाति व्यवस्था का ऐसा ढांचा है कि उसमें दलितों से भेदभाव की परंपरा है, इसलिए इन धर्मों में जो लोग दलित हैं, वे भी कोई दूसरा धर्म अपनाने पर इस लाभ से बाहर हो जाते हैं।
अदालत के सामने इस मामले में दलितों के इन तीन धर्मों से परे के किसी धर्म में जाने पर सिर्फ कानूनी संरक्षण का मुद्दा था, आरक्षण का मुद्दा तो पहले से ही पूरी तरह तय हो चुका है कि धर्मांतरित दलित इन तीन धर्मों के बाहर जाने पर आरक्षण के भी हकदार नहीं रह जाते। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिना कोई नई बात कहे 1950 की संवैधानिक व्यवस्था को ही दुहराया है, और इस पर जाने क्या-क्या सोचकर कौन-कौन से तबके खुशियां मनाने में जुट गए हैं। एक दिलचस्प दूसरा पहलू यह भी है कि ओबीसी तबकों के जो लोग ईसाई या मुस्लिम बनते हैं, उन्हें अभी तक ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है। जाहिर है कि पिछड़े वर्ग की व्यवस्था हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध से परे के कुछ धर्मों में भी लागू होती हो, और केन्द्र सरकार वहां भी ओबीसी आरक्षण का हकदार उन्हें मानती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 2004 से एक ऐसी याचिका खड़ी हुई है जिसमें कहा गया है कि इस्लाम और ईसाई धर्म में जाने वाले हिन्दू, दलितों को भी अनुसूचित जाति में गिना जाना चाहिए, और उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक केन्द्र सरकार ने इसका विरोध किया है, लेकिन एक कमेटी गठित की है, जो कि यह गौर कर रही है कि क्या मुसलमान और ईसाई हो चुके हिन्दू-दलितों को अनुसूचित जाति के दर्जे में रखा जाना चाहिए? अभी तक इस मामले में कुछ तय नहीं हुआ है, इसलिए 1950 से चली आ रही संवैधानिक व्यवस्था ही जारी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के सिर्फ 14 महीनों में इतनी बार अपनी नीतियां, वादे और फैसले पलट चुके हैं कि अब यह उनकी कार्यशैली का स्थायी चरित्र बन गया है। कुछ लोग इसे लचीलेपन और कल्पनाशील सौदेबाजी कहकर बचाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने कम समय में इतने बड़े-बड़े फैसले उलट-पलट करने वाला कोई निर्वाचित राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में पहले नहीं हुआ। ट्रम्प अब ‘यू-टर्न राष्ट्रपति’ बन चुके हैं। हर हफ्ते नया पलटाव, नई अनिश्चितता, नया विश्वासघात।
ट्रम्प के यू-टर्न की सूची लंबी और चौंकाने वाली है। ईरान पर अधिकतम दबाव का दावा करते हुए उन्होंने ईरानी तेल पर छूट दे दी। रूस पर सख्ती का ऐलान कर रूसी तेल खरीदने का रास्ता खोल दिया। कनाडा-मैक्सिको पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, फिर टाल दिया। यूक्रेन युद्ध 24 घंटे में खत्म करने का दावा किया, फिर मदद जारी रखी। ग्रीनलैंड खरीदने का ड्रामा रचा, फिर चुपचाप पीछे हट गए। टिकटॉक बैन का वादा किया, अब एक अमरीकी कंपनी को जोडक़र चीनी मालिक के साथ समझौता कर रहे हैं। क्रिप्टो पर दुश्मनी का रवैया रखा, अब रणनीतिक स्टॉक बनाने की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला त्याग है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ट्रम्प के इन यू-टर्न से नैटो देशों, यूरोप और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों का भरोसा पूरी तरह टूट गया है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि ‘ट्रम्प की कोई नीति स्थायी नहीं है। आज जो वादा करते हैं, कल पलट देते हैं।’ नतीजा यह कि नैटो देश अब अपनी रक्षा पर खुद ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यूरोप में अमरीका-प्रथम को अब महज-अमरीका के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प ने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे अमरीका की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इसके अलावा, ट्रम्प की कमजोर नब्जों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एपस्टीन से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिशें और इजराइली मोसाद के हाथ में ट्रम्प की कुछ कमजोरियां होने की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। कई रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि नेतन्याहू इन कमजोरियों का इस्तेमाल करके ट्रम्प से वह सब करवा रहे हैं, जो आधी सदी में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं करवा सके। साथ ही ट्रम्प परिवार के कारोबारी हित भी विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी, रेयर मिनरल्स और अन्य क्षेत्रों में ट्रम्प परिवार के हितों की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। कई देशों से जुड़े इन व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभों के कारण अमेरिकी विदेश नीति व्यक्तिगत स्वार्थ की दिशा में मुड़ती दिख रही है।
ट्रम्प की इस अस्थिरता और व्यक्तिगत हितों की नीति ने पूरी दुनिया की चैरिटी, पर्यावरण, कारोबार और रोजगार को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, उतना तो हिटलर भी नहीं कर पाया था। पर्यावरण समझौतों से पीछे हटना, ग्लोबल वार्मिंग पर चुप्पी, कारोबारी युद्ध, टैरिफ की अनिश्चितता और रोजगार के अवसरों का नुकसान, सब कुछ एक साथ हुआ है।
सबसे बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला खतरा यह है कि ट्रम्प का यह मिजाज अगले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नवसामान्य बन सकता है। एक बार जब एक निर्वाचित राष्ट्रपति दिखा देता है कि बड़े-बड़े वादे और नीतियाँ इतनी आसानी से पलटी जा सकती हैं, तो भविष्य के नेता भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, सहयोगी देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अलग गठबंधन बनाने लगेंगे और अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। यह छोटा खतरा नहीं है। यह लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
ट्रम्प का हर हफ्ते यू-टर्न अब कोई छोटी बात नहीं रह गया है। यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को कमजोर कर रहा है, सहयोगियों का भरोसा तोड़ रहा है और दुनिया भर में अनिश्चितता फैला रहा है। कुछ इसे लचीलापन कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह अस्थिरता है, जिसकी कीमत न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया चुका रही है। और सबसे अधिक खुद अमरीका चुका रहा है जिसके भीतर यह पूरी तरह, और बुरी तरह स्थापित हो चुका है कि वहां के संविधान में कुछ बुनियादी दरारें हैं जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति को एक पिशाच-तानाशाह बन जाने का पूरा मौका हासिल हुआ है। इस ट्रंप ने पूरी दुनिया के सामने घटियापन की नई मिसालें कायम की हैं, और इसकी काट किसी भी लोकतांत्रिक देश में आसानी से नहीं निकल पाएगी, इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे घटिया राष्ट्रपति की तरह दर्ज हो जाना तय है।
भारत में जब-जब मानसून में किसी शहर में बाढ़ की नौबत आ जाती है, तो श्मशान वैराग्य की तरह पॉलीथीन-कचरे पर रोकथाम की बात होने लगती है। फिर जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतरता है, शहरी घरों से कीचड़ धुल जाता है, सडक़ों पर आवाजाही शुरू हो जाती है, लोग फिर से कचरा फैलाने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी तीर्थ से लौटते ही लोग नए उत्साह के साथ पाप करने में जुट जाते हैं। आज शहरों की हालत यह होती जा रही है कि नालियों को लोग घूरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, हर नाली में तरह-तरह का कचरा पटा हुआ रहता है। लोग प्लास्टिक के कचरे को अधिक खतरनाक मानते हैं क्योंकि पतली झिल्लियां जगह-जगह फंस जाती हैं, और पानी आगे बढऩा बंद हो जाता है। लेकिन न सिर्फ सिंगल यूज प्लास्टिक कही जाने वाली ऐसी पतली झिल्लियों का खतरा है, बल्कि हर वह कचरा खतरा है जो कि नालियों में डाल दिया जाता है। इसके पीछे की अलग-अलग वजहों को समझने की जरूरत है।
एक तो यह कि भारत में निर्वाचित स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जनता में अनुशासन लागू करने का हौसला नहीं रहता। महापौर या निगम-पालिका अध्यक्ष न किसी अवैध निर्माण को रोक पाते, न अवैध कब्जे को, और ऐसे में नालियों में कचरा फेंकने वाले लोगों को, या कि हर रात दुकान बंद करते समय बाहर सडक़ों पर पैकिंग का अपार कचरा छोडक़र जाने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई की चर्चा भी औसत शहर में नहीं होती। हो सकता है कि देश के कुछ चुनिंदा शहरों में निर्वाचित प्रतिनिधि, और म्युनिसिपलों में तैनात अफसर दिल कड़ा करके कचरा फैलाने वालों पर कुछ सख्ती दिखाने की सोचते भी हों, लेकिन स्थानीय शासन की कुर्सियों पर बैठे अधिकतर लोगों को समझाने, और उनसे अमल करवाने के बजाय सरकारी खर्च पर कचरा इकट्ठा करवाने को अधिक सहूलियत का पाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब जनता जिम्मेदार नहीं होती, तो घरों और बाजारों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग छांटने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिस कचरे को सड़ाकर खाद बनाई जा सकती है, या जो सडक़र खुद ही खत्म हो सकता है, ऐसे बायोडीग्रेडेबल कचरे के भी प्लास्टिक और दूसरे कचरे के साथ मिलाकर जब कचरा गाडिय़ों में डाला जाता है, तो फिर उसमें से प्लास्टिक अलग करके उसकी री-साइकिलिंग की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, और इसमें से सिंगल यूज प्लास्टिक, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह सिर्फ दो-तीन फीसदी रहता है। बाकी सारा कचरा अलग-अलग किस्म की पैकिंग का रहता है, जो अभी भी बिना रोक-टोक धड़ल्ले से चल रही है। अभी सरकार ने एक कानून बनाकर इतना जरूर किया है कि प्लास्टिक के अलग-अलग ग्रेड की पैकिंग इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपने इस्तेमाल जितनी मात्रा के उन ग्रेड के प्लास्टिक की री-साइकिलिंग के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए सरकार की रजिस्टर्ड री-साइकिलिंग यूनिट्स हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला सरकारी फर्जीवाड़े से घिरा हुआ है, और जिस तरह गाडिय़ों के प्रदूषण वाले सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बन जाते हैं, वैसे ही प्लास्टिक री-साइकिलिंग के सर्टिफिकेट खरीद लिए जाते हैं।
भारत बहुत सारी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच जीने वाला देश है। यहां एक तरफ आम जनता को हासिल सरकारी अस्पताल बदहाल हैं, कई प्रदेशों में तो इलाज का ढांचा इतना कमजोर है कि लोगों को पास के किसी महानगर जाकर वहां संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ ऐसा कोई दिन नहीं होता जब देश के किसी न किसी शहर में कोई बहुत महंगा अस्पताल शुरू न होता हो, या कोई बड़ा सा डायग्नोस्टिक सेंटर न बनता हो। अमीर और गरीब के बीच बंटी हुई दो किस्म की चिकित्सा-सुविधाओं के अलावा एक तीसरे किस्म की चिकित्सा सुविधा देश में और विकसित होती चल रही है, और वह है दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत पहुंचने वाले संपन्न विदेशियों की। दुनिया के संपन्न और विकसित देशों में इलाज इतना महंगा है कि वहां चिकित्सा बीमे के लिए लोगों को बड़ी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कुछ दूसरे कम महंगे देशों की तरफ भी मरीजों का जाना चलते रहता है। और तो और एक महंगे देश ब्रिटेन से दूसरे देशों में, हंगरी, टर्की, पोलैंड, रोमानिया, स्पेन, पुर्तगाल, थाइलैंड, मैक्सिको, और भारत दांतों का इलाज कराने के लिए हर दिन हजारों लोग चले जाते हैं, और यह इलाज इन दूसरे देशों में ब्रिटेन के मुकाबले खासा सस्ता पड़ता है।
भारत के बारे में यह समझने की जरूरत है कि इतने विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अलग-अलग रहता है, और दूसरे देशों से आने वाले लोगों को अपनी पसंद और प्राथमिकता के भारतीय इलाके मिल जाते हैं। फिर यहां के महंगे अस्पताल विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले हैं, हिन्दुस्तानी डॉक्टर पूरी दुनिया में कामयाबी से काम करते हैं, हर विकसित देश में भारतीय नर्सें दिख जाती हैं, और अब कोई ऐसी अंतरराष्ट्रीय आधुनिक चिकित्सा-मशीनें नहीं हैं जो कि भारत में न हों। ऐसे में महंगे देशों के मुकाबले भारत में इलाज का खर्च काफी कम पड़ता है, यहां मरीजों के साथ रहने वाले परिवार को भी बाहर सस्ते में मकान या होटल मिल जाते हैं। इसके साथ-साथ जब वे हिन्दुस्तान आ ही जाते हैं, तो वे ऑपरेशन या लंबे इलाज के साथ-साथ देश के अपने पसंदीदा हिस्से में घूमने भी जा सकते हैं। मरीजों और उनके परिवारों का इलाज का ऐसा भारत भ्रमण उन्हें कुल मिलाकर सस्ता और सहूलियत का पड़ता है। कई किस्म के महंगे इलाज पर अमरीका के मुकाबले भारत में एक चौथाई से भी कम खर्च आता है। भारत से जाकर दूसरे देशों में बसे हुए, और भारतीय पैमानों पर संपन्न हो चुके मरीज तो बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते ही हैं, खाड़ी के देशों के संपन्न लोगों के लिए भी हिन्दुस्तान एक बड़ी पसंद है।
भारत और अंतरराष्ट्रीय जुबान में इसे भारत का मेडिकल टूरिज्म कहा जाता है। अब इस देश में बड़े अस्पतालों के ढांचे जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, हर तरह का पर्यटन भारत में जिस तरह बढ़ रहा है, वह देखने लायक है। इस क्षेत्र के एक जानकार विशेषज्ञ से अभी बीच में रूककर ही हमने बात की, तो पता लगा कि देश के कुछ सबसे बड़े निजी अस्पतालों का 30-40 फीसदी बिल तो विदेशी मरीजों का ही बन रहा है, और उनकी वजह से भारत के मरीजों का इलाज कुछ कम दाम पर हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में तो पर्यटन विकास निगम मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को अभियान के रूप में जोड़ चुका है, और इसकी वेबसाइट पर इसे अलग से बढ़ावा दिया जा रहा है। आंध्र की राजधानी में दो सौ एकड़ में एक मेगा ग्लोबल मेडिसिटी बनाई जा रही है, जो कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगी। इसी से जुड़ी हुई जानकारी खंगालते हुए यह दिखा कि केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में ऐसे पांच क्षेत्रीय मेडिकल केन्द्र बनाने की घोषणा की है, और टीडीपी के चन्द्राबाबू नायडू तो ऐसा फायदा उठाने वाले सबसे पहले राज्य रहेंगे ही।
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने अभी दो नए विधेयक पास किए हैं, और राज्यपाल से इन पर मंजूरी मिल जाने पर वे कानून बन जाएंगे। भारत में जैसी राजनीतिक परंपरा है, उसके मुताबिक यह बात साफ है कि जिस पार्टी की राज्य सरकार रहती है, केन्द्र से अगर उसी पार्टी की सरकार ने राज्यपाल नियुक्त किए हैं, तो वे उस सरकार के भेजे विधेयकों पर अड़ंगा नहीं लगाते। छत्तीसगढ़ में एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का है जिसमें धर्मांतरण करवाने वाले लोगों पर पहले के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ी कार्रवाई का इंतजाम है। पहले भी लालच देकर, दबाव डालकर, या प्रताडि़त करके, धोखा देकर धर्मांतरण करवाने पर सजा का इंतजाम था, अब उस सजा को इस नए विधेयक में बहुत बढ़ा दिया गया है। यह एक अलग बात है कि देश के अलग-अलग कई राज्यों के इसी तरह के धार्मिक स्वतंत्रता, या धर्मांतरण विधेयकों, या कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और उन पर एक साथ सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जो दूसरा विधेयक पास किया है, वह किसी भी तरह के इम्तिहान में पर्चे आउट करने वाले लोगों को बड़ी लंबी और कड़ी सजा देने का है। इसमें नकल करने वाले लोगों को भी कई बरस के लिए अपात्र कर दिया जाएगा, और साजिश के तहत पेपर लीक करने वालों को उम्रकैद तक की सजा, एक करोड़ तक का जुर्माना नए कानून में रहेगा, और उनकी सम्पत्ति जब्त करके उससे भी जुर्माना वसूल किया जाएगा। दोनों ही कानून बहुत कड़े हैं, और दोनों में ही उम्रकैद जैसे प्रावधान रखे गए हैं, जो कि आमतौर पर सामूहिक बलात्कार, या कत्ल जैसे हिंसक अपराधों में ही रहते आए हैं।
देश की सरकार को, या हर प्रदेश को अपनी विचारधारा के मुताबिक कानून बनाने का हक है, और उसके लिए संसद या विधानसभाओं में जितने बहुमत की जरूरत रहती है, वह अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को हासिल है, तो फिर सदन में असहमति कोई मायने नहीं रखती। संसदीय व्यवस्था, और परंपरा यही है कि बिना किसी बहस के ध्वनिमत से भी विधेयक पास हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए मतदान में हारने के बजाय कई बार सदन छोडक़र भी चले जाता है। लेकिन जहां कहीं भी कोई नया कानून बनता है, वहां एक लोकतांत्रिक परंपरा शुरू करने की जरूरत है। चूंकि सदनों में चर्चा का माहौल घटते चल रहा है, बहुत से मुद्दों पर विपक्ष को सदनों में बोलने की इजाजत ही नहीं मिलती, इसलिए इसे सरकार की जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वह सदन के अलावा सडक़ के लोगों को भी अपनी बात समझाने के लिए सरल शब्दों में यह बताए कि इस नए कानून की जरूरत क्या है। लोगों की राजनीतिक चेतना के लिए यह जरूरी है कि जटिल कानूनों की सरल व्याख्या उनके सामने रखी जाए। वैसे तो सरकारें यह कह सकती हैं कि वे विधेयकों को पेश करने के पहले उन पर जनता की राय जानने के लिए वेबसाइट पर लोगों से रायशुमारी करती हैं, लेकिन आम जनता वेबसाइट पर भी जटिल बातों को न पढ़ पाती है, न उन पर प्रतिक्रिया दे पाती है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे अपने विधेयकों को एक सामाजिक ऑडिट के लिए जनता के सामने भी पेश करें। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जनता के सामने कुछ पेश करने का एक माध्यम मीडिया होता है, लेकिन अगर उसके लोग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए तल्ख सवाल न करें, और महज डिक्टेशन लेकर, बयान रिकॉर्ड करके लौट जाएं, तो जनता के लिए जरूरी उसका लोकतांत्रिक हक किनारे धरा रह जाता है।
सामाजिक ऑडिट से हमारा एक मतलब यह भी है कि सरकारों को यह साफ करना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में कौन सी कमी थी जिसकी वजह से नए कानून की जरूरत आन पड़ी है। क्या जांच की कमी, सुबूत दर्ज करने की कमजोरी, बेअसर हद तक धीमी हो चुकी अदालतें कानूनों के बेअसर होने के लिए जिम्मेदार हैं, या कि इन सब पहलुओं के मजबूत कर देने के बाद भी मुजरिम छूट जा रहे हैं, उन्हें सजा का खौफ नहीं रह गया है? आमतौर पर हमारा तजुर्बा यह है कि सरकारें मौजूदा कानूनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जांच में कमी रहती है, सुबूत ठीक से दर्ज नहीं होते हैं, गवाही समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाती, अदालत में सरकारी वकील कमजोर पड़ जाते हैं, और हर स्तर पर कुछ बाहरी वजहें भी असर डालने लगती हैं, जिनसे मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती। अब अगर मौजूदा कानून, और उनकी जगह आने जा रहे अधिक कड़े कानून दोनों पर अमल की तुलना करें, तो अगर अमल ही कमजोर है, तो नया अधिक कड़ा कानून भला किस काम आएगा? अभी एक-दो दिन पहले ही दो नौजवानों को देश के एक सबसे कड़े और खतरनाक कानून यूएपीए से अदालत ने शायद सात बरस बाद रिहा कर दिया कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त सुबूत नहीं थे। अब जिस एक सबसे बड़े कानून के तहत पांच-पांच बरस तक तो जमानत नहीं होती, उस कानून की जगह अगर और कड़ा कानून भी लागू कर दिया जाए, और उसके तहत दस-दस बरस तक जमानत न हो, और सुबूतों के अभाव में अदालत से लोग छूट जाएं, तो ऐसे अधिक कड़े कानून किस काम के रहेंगे? सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकारें मौजूदा कानूनों का पूरी हद तक इस्तेमाल करने के बाद भी, पूरी बारीकी बरतने के बाद भी असफल हो रही हैं? अगर ऐसा है तब तो नए अधिक कड़े कानून की जरूरत है, वरना ऐसे कानून जनता को संतुष्ट करने के लिए अधिक बनते हैं कि सरकार किसी मामले में कितनी गंभीर है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़े निजी अस्पताल में गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने वाले टैंक में सफाई कर्मचारी उतरे, तो उनमें से तीन की मौत वहां बनी हुई गैस से हो गई। सफाई कर्मचारियों के साथ देश भर में जगह-जगह ऐसे हादसे होते रहते हैं, और जब बाकी पूरी दुनिया ऐसी सफाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल करती है, सफाई कर्मचारी गैस मास्क लगाकर ही ऐसी टंकियों में या गटर-नालों में उतरते हैं, तब भारत इन मशीनों से दूर है। मशीनें हैं जरूर, लेकिन वे जरूरत जितनी नहीं हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दमकल गाडिय़ां हैं जरूर, लेकिन जरूरत जितनी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि इधर गटर में उतरे हुए सफाई कर्मचारी दम घुटने से मरते हैं, तो उधर फायर ब्रिगेड का इंतजार करते हुए लोग दम घुटने से जिंदगी खो बैठते हैं। पूरे देश में ये दोनों ही सहूलियतें शहरी विकास के साथ जुड़ी हुई हैं, और शहरों का बाकी विकास तो हो जाता है, लेकिन सफाई की मशीनी क्षमता, और आग बुझाने की पर्याप्त क्षमता अधिकतर राज्यों में स्थानीय शासन की प्राथमिकता नहीं रहती।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फायर ब्रिगेड को म्युनिसिपल से लेकर पुलिस को इसलिए दिया गया था कि पुलिस अधिक कड़ाई और अनुशासन से इस इमरजेंसी सेवा को बेहतर चला सकेगी। लेकिन जिम्मा तो पुलिस को दे दिया गया, सहूलियतें नहीं दी गईं, नतीजा यह हुआ कि बिना पर्याप्त गाडिय़ों, और बिना पर्याप्त कर्मचारियों के अब फायर ब्रिगेड मानो किसी की जिम्मेदारी नहीं रह गई। अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पूरे प्रदेश के बारे में सरकार से जवाब-तलब कर रहा था कि आग से जूझने की क्षमता विकसित करने में इतनी लापरवाही क्यों है? ठीक इसी तरह अब जब म्युनिसिपल के इलाके में, राज्य की राजधानी में सफाई कर्मचारी मर गए हैं, तो यह बात सामने आ रही है कि अस्पताल में नगर निगम से एसटीपी की सफाई का अनुरोध किया था, और म्युनिसिपल ने इसे खुद करवाने कह दिया था। अब खबरें बताती हैं कि खुद म्युनिसिपल के पास इस विशाल और विकराल हो चुके शहर में शौचालयों और गटरों की सफाई के लायक मशीनें गिनी-चुनी हैं। जाहिर है कि नेताओं, और अफसरों के बंगलों से वक्त मिलने पर ही बाकी जगह गाडिय़ां जा पाती होंगी, और इस अस्पताल की तरह बहुत से लोग ठेकेदारों के मोहताज रहते होंगे सफाई के लिए।
साथ-साथ चल रही इन दोनों खबरों से यह लगता है कि क्या ऐसी शहर सरकार को सचमुच ही गौरवपथ नाम की कोई चीज बनानी चाहिए? क्या शहर का गौरव किसी चौराहे से, बगीचे या सडक़ से होता है, या फिर वह आंखों से दूर एक ऐसी छुपी हुई सुविधा से होता है जिसकी चर्चा तो नहीं होती, लेकिन जिससे शहर का, और नागरिकों का जीवन सुरक्षित होता है, और सहूलियत का रहता है। आज शहरों में जगह-जगह कहीं गौरवपथ, कहीं गौरव गार्डन, कहीं सडक़ के डिवाइडरों का सौंदर्यीकरण, तो कहीं किसी नई प्रतिमा का स्थापना, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा, और उनके अहंकार को पूरा करना भी प्राथमिकता में रहता है। नतीजा यह होता है कि बुनियादी जरूरतें किनारे धरी रह जाती हैं। जब से स्थानीय शासन, या म्युनिसिपल की धारणा शुरू हुई, तब से ही साफ पानी, साफ शहर, रौशनी और सडक़, ये ही म्युनिसिपल की प्राथमिकताएं मानी जाती हैं। अब इन बुनियादी जरूरतों के पूरे न होने पर भी म्युनिसिपल साज-सज्जा, और राजनीतिक स्मारकों में जुट जाती हैं, जनता की साफ और सुरक्षित जिंदगी की जरूरतें हाशिए पर चली जाती हैं।
दशकों से स्थानीय संस्थाओं को देखते हुए अभी भी हमारे लिए यह तय करना दुविधा का मामला है कि इन्हें चलाने के लिए अफसर बेहतर होते हैं, या निर्वाचित जनप्रतिनिधि? कानून के हिसाब से पंचायत हो या म्युनिसिपल, इनके निर्धारित चुनाव करवाना एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, ठीक उसी तरह, जिस तरह संसद और विधानसभाओं के चुनाव तय समय पर होते हैं। लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का जो हाल स्थानीय संस्थाओं में दिखता है, उससे मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या सचमुच ही भारत के इस हिस्से के शहर ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हैं, या फिर यहां अफसरों से ही म्युनिसिपलों को चलवाना चाहिए? यह सवाल कुछ अलोकतांत्रिक लग सकता है, लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अपनी जिम्मेदारियों, और अधिकारों के बीच तालमेल बैठाते बहुत कम दिखते हैं। फिर इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये जनप्रतिनिधि वही तो बन सकते हैं जिन्हें राजनीतिक दल उम्मीदवार मनोनीत करते हैं। ये उम्मीदवारी किसी भी तरह से स्थानीय संस्थाओं को चलाने को ध्यान में रखने की क्षमता के हिसाब से तय नहीं की जाती, धर्म, जाति, उपजाति, और जीत की संभावना को देखते हुए जब स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप के लिए उम्मीदवार तय होते हैं तो इन्हें चलाने की क्षमता किसी प्राथमिकता सूची में नहीं रहती। ऐसे में लगता है कि इनके राजनीतिक दबाव और नियंत्रण से परे शायद अफसर अकेले ही कुछ बातों को बेहतर तरीके से तय कर पाते, लेकिन पंचायती राज कानून के बाद अब हमारी यह चर्चा केवल एक काल्पनिक चर्चा है जिसकी कोई संभावना नहीं है।
भारत में रसोई गैस की कमी से खलबली तो मची हुई है, लेकिन नौबत भगदड़ तक नहीं पहुंची है। घरेलू गैस सिलेंडर कुछ देर से सही, मिल तो जा रहे हैं, और बाजार के लिए कारोबारी गैस सिलेंडर की सप्लाई तकरीबन बंद है, लेकिन इस देश में कालाबाजारी इतनी संगठित और व्यवस्थित है कि कुछ शहरों में गिने-चुने रेस्त्रां छोडक़र बाकी सबका हाल खींचतान कर चल ही रहा है। पोहे के ठेलेवालों ने 30 रूपए का पोहा 50 रूपया कर दिया है, जाहिर है कि यह कालाबाजारी में महंगे मिलने वाले सिलेंडर का अतिरिक्त दाम है। एक प्लेट पोहे पर ब्लैक में मिले सिलेंडर से शायद एक-दो रूपए का ही फर्क पड़ा होगा, लेकिन दाम 20 रूपए बढ़ाने का एक मौका मिल गया। अभी भारत में ईरान के तंग रास्ते से गुजरते हुए दो एलपीजी जहाज पहुंचे हैं, लेकिन उनसे कितने दिन की सप्लाई होगी, कितने दिन की एलपीजी की कमी कायम रहेगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर आज भी अमरीकी इजाजत से भारत में रूसी तेल आ रहा है, और अगले कुछ हफ्तों में अमरीका इस इजाजत को खत्म भी कर देगा, तो क्या उसके बाद पेट्रोल-डीजल की कोई कमी होगी, यह भी अभी साफ नहीं है। साफ तो अभी जंग के बादल ही नहीं हैं कि खाड़ी के देशों में चल रही बमबारी से वहां से तेल और गैस का बाहर निकलना कब तक कितना प्रभावित रहेगा। ऐसे में भारत के लोगों को अपनी पेट्रोल-डीजल, और गैस की खपत के बारे में खुद होकर भी सोचना चाहिए। सरकार शायद अधिक कड़े फैसले तेजी से न ले पाती है, न उसकी घोषणा सरकार के लिए सहूलियत की बात रहती, लेकिन बाजार, घरेलू खपत, और संस्थागत ईंधन की खपत को काबू में करने की बात सभी लोगों को सोचनी चाहिए, न सिर्फ आज के इस परेशानी के दौर में, बल्कि बाद में भी।
आज दुनिया में अलग-अलग देशों ने इस नौबत से जूझने के लिए कई तरह के कड़े फैसले लिए हैं। पाकिस्तान में बिजली की कमी हो गई है, जिसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, और दफ्तरों को चार दिन का कर दिया गया है। पाकिस्तान में एलएनजी से बिजली बनाने के प्लांट बंद कर दिए थे क्योंकि रूस-यूक्रेन संकट से वही सबक निकला था। अब पाकिस्तान तेजी से सौर ऊर्जा को बढ़ा रहा है, और कोयले से बिजली भी बढ़ाई जा रही है ताकि आयातित तेल या गैस पर मोहताज रहना घट सके। भारत के ही बगल के बांग्लादेश में यूनिवर्सिटी और बहुत से स्कूल बंद कर दिए गए हैं, बिजली कटौती आम हैं, एलएनजी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयले से बिजली उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। लेकिन उसने कोयले से बिजली बनाना बढ़ा दिया है, और कोयले के निर्यात को फिलहाल रोक दिया है ताकि घरेलू बिजली उत्पादन में कमी न रहे। चीन को रूस और ईरान से तेल मिलना जारी है, लेकिन उसने अपने बिजली घरों को अधिकतम क्षमता पर ले जाना जारी रखा है। दक्षिण कोरिया में कोयले से बिजली पर लगी गई एक सीमा को हटा दिया गया है, उसे अधिक से अधिक बनाया जा रहा है, परमाणु बिजली उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है, और बाहर से आने वाली एलएनजी की खपत को कम करने के लिए सभी उद्योगों को कह दिया गया है। थाईलैंड ने ऊर्जा बचत के कई तरीके लागू किए हैं, और लोगों से गैरजरूरी जमाखोरी न करने को कहा है। योरप में गैस की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ गई हैं, बहुत से देश कोयला और परमाणउ बिजलीघरों पर वापिस लौट रहे हैं, और बड़े-बड़े विकसित देशों जर्मनी, फ्रांस, और ब्रिटेन ने ऊर्जा बचत के अभियान चलाए हैं। जापान ने कोयले से बिजली बनाने को सबसे तेज किया है, ताकि एलएनजी पर निर्भरता कम रहे।
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, और अगले महीने 9 से 29 तारीख के बीच असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में चुनाव हो जाएंगे। इन पांच राज्यों में तीन राज्य कुछ अधिक दिलचस्प हैं जहां मुस्लिम और ईसाई आबादी काफी है। इनमें असम में करीब 34 फीसदी मुस्लिम, और 4 फीसदी ईसाई वोटर हैं। कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां मुस्लिम वोटर 50 से 70 फीसदी तक हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मुस्लिम आबादी को बरसों से एक बड़ा मुद्दा बनाकर चल रहे हैं कि राज्य का ढांचा ही बढ़ते मुस्लिमों से बदल जाएगा। मुस्लिमों के साथ-साथ असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आकर बसे हुए लोगों का भी एक बड़ा मुद्दा है जिनकी छंटनी करने में चुनाव आयोग लगा हुआ है, और दसियों लाख वोटरों के कागजात की छानबीन बंगाल में अभी बाकी है। वहां सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि चुनाव की घोषणा के दिन तक 50 लाख से अधिक वोटरों के कागजात की जांच बाकी है, और ऐसे में चुनाव कैसे करवाए जा सकते हैं? बंगाल में असम से कम, लेकिन 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। कुछ जिलों में मुस्लिम वोटरों का अनुपात खासा है। बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस को पीछे छोडक़र भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बनी हुई है, और उसने बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। अब केरल चलते हैं जहां पर 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, और 18 फीसदी ईसाई वोटर हैं। इन दोनों प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों को देखें, तो केरल इन सारे पांच राज्यों में सबसे आगे है। तमिलनाडु और पुदुचेरी में मुस्लिम और ईसाई वोटर मिलाकर करीब 12 फीसदी हैं, और इन राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण जैसी नौबत नहीं है।
इस मुद्दे पर लिखने की आज इसलिए सूझी कि मुस्लिम बहुल राज्यों में आज एक अलग किस्म का तनाव भी चल रहा होगा। इजराइल और अमरीका, दोनों गैरमुस्लिम, और एक किस्म से मुस्लिम-विरोधी देशों ने एक शिया-मुस्लिम देश ईरान पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला किया है। फिर इसके जवाब में ईरान ने अड़ोस-पड़ोस के दूसरे मुस्लिम देशों पर हमला किया है, जहां पर अमरीकी फौजी अड्डे हैं। कहने के लिए ये हमले सिर्फ फौजी ठिकानों पर हो रहे हैं, लेकिन पूरी दुनिया में ऐसे कोई हमले दर्ज नहीं हो रहे जो फौज पर किए जाएं, और फौज पर ही निशाना लगे। यूक्रेन से लेकर गाजा तक, और ईरान के पड़ोसियों से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक नागरिक ठिकानों पर हमले आम बात हैं, और केरल से खाड़ी के देशों में जाकर बसे हुए और काम करने वाले लाखों मलयाली लोगों पर ईरान-युद्ध का क्या असर होगा, यह अभी साफ नहीं है। भारत के मुस्लिमों में शिया मुस्लिम बहुत कम हैं, इसलिए जब खाड़ी के दूसरे गैरशिया मुस्लिम देशों पर शिया-ईरान का हमला हो रहा है, तो ऐसे देशों में बसे हुए भारतीय मुस्लिम, और गैरमुस्लिमों की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर यह भी साफ नहीं है कि क्या भारत के घरेलू प्रादेशिक चुनावों में इन सबका कोई असर होगा। लेकिन हम जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिया मुस्लिमों, और बाकी मुस्लिमों के मुद्दे को देख रहे हैं, उसी तरह केरल में भी हम मुस्लिम और ईसाई समुदाय की भावनाओं को समझना चाहते हैं क्योंकि केरल अपने लोगों की परदेस में मौजूदगी की वजह से हो सकता है कि कई भावनाओं से, घटनाओं से प्रभावित होता हो।
हमने अंदाज लगाने की कोशिश की, तो बंगाल और असम में तो बांग्लादेशी, और दीगर मुस्लिमों के मुद्दे सबसे बड़े हैं। एक तरफ भाजपा खुलकर इन दोनों तबकों के खिलाफ हैं, हिमंत बिस्वा सरमा तो हेट-स्पीच की सीमा में भीतर दूर तक जाकर बयान देते हैं, और बंगाल में भी जिन दसियों लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर हैं, उनमें शायद मुस्लिम ही सबसे अधिक हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण का अभियान चुनावी नतीजे पहले ही तय कर चुका है। बंगाल में एक वक्त जो मुस्लिम समुदाय वामपंथियों के साथ था, वह अब पूरी तरह से ममता बैनर्जी के साथ है, क्योंकि वामपंथी किसी भी तरह से भाजपा को रोकने की ताकत अब नहीं रखते। ऐसे में ममता के पक्ष में मुस्लिमों का एक मजबूत ध्रुवीकरण चुनावी नतीजों को ममता के खिलाफ भी ले जा सकता है, क्योंकि करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में से एक बड़े हिस्से के मतदाता सूची से बाहर हो जाने का आसार दिख रहा है।
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का यह दूसरा कार्यकाल अभी सवा साल भी पूरा नहीं कर सका है, और पिछले चार दिनों में जो बात सबसे तल्खी से उभरकर आई है, वह यह कि आज ट्रम्प खुद, और उसके चक्कर में अमरीका दुनिया में सबसे अलग-थलग पड़ चुके हैं। आज अमरीका के कल तक के अपने पिट्ठू इजराइल के अलावा कोई देश उसके साथ बचा नहीं है, और खुद ट्रम्प आज इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का पिट्ठू दिख रहा है। अब तक जो पूरी दुनिया पर साम, दाम, दंड, भेद से राज करते आया था, आज अपनी गुंडागर्दी में दूसरे देशों की मदद मांग रहा है, लेकिन कोई देश उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। क्या पिछले सौ-पचास बरस में अमरीका का यह बदहाल किसी और राष्ट्रपति ने आज तक किया था? जिस अमरीका की तरफ देखे बिना नैटो देशों की सुबह नहीं होती थी, नैटो देशों के मुखिया सोने के पहले यह देखते थे कि क्या अमरीका का कोई संदेश आया है, या उससे जुड़ी हुई कोई जरूरी बात है, उसके बाद ही सोने जाते थे। आज उसी अमरीका के राष्ट्रपति की फौजी-मदद की अपील को एक-एक करके वे सारे देश खारिज कर चुके हैं जिन देशों ने मध्य-पूर्व के अलग-अलग देशों पर हमले में अब तक अमरीका का साथ दिया था, बदनामी और तोहमतें झेलने की कीमत पर भी। ट्रम्प आज ठीक उस तरह अकेला पड़ गया है जिस तरह रैबीजग्रस्त कोई कुत्ता अकेले रह जाता है, जिसे पकडक़र पिंजरे में बंद कर देना जरूरी समझा जाता है, आज ट्रम्प दुनिया के लिए रैबीज-डॉग जैसा ही खतरनाक हो चुका है, और उसके काटे की कोई वैक्सीन भी नहीं है। हम रैबीज-डॉग से तुलना नाजायज मानते हैं क्योंकि कोई कुत्ता खुद होकर तो रैबीज-संक्रमित होता नहीं है, ट्रम्प तो आज जो कुछ कर रहा है, सब अपनी बददिमागी से। ऐसे में एक बेकसूर कुत्ते की मिसाल का इस्तेमाल हम मजबूरी में इसलिए कर रहे हैं कि ट्रम्प दुनिया के लिए ठीक उतना ही खतरनाक हो चुका है। रैबीज-संक्रमित कुत्ते के सामने तो जिंदगी बचे-खुचे दिनों की रहती है, ट्रम्प के सामने तो करीब पौने तीन बरस का कार्यकाल बाकी है।
हमने आज इस पर लिखना जरूरी इसलिए समझा कि ईरान के मोर्चे पर एक समुद्री रास्ता खोलने के लिए ट्रम्प ने दुनिया भर के देशों से फौजी मदद मांगी है, और उसने खासकर नैटो-देशों को यह खुली धमकी दी है कि अगर वे साथ नहीं देते हैं, तो यह नैटो के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात होगी। अभी ईरान की जंग में अमरीकी जनता की मर्जी के खिलाफ अमरीका को फंसा देने वाले ट्रम्प की फौजी मदद की इस अपील पर फ्रांस ने कह दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। जापान ने भी सहयोग से इंकार कर दिया, और कहा कि वह तेल आयात पर निर्भर तो है, लेकिन अमरीका के साथ मिलकर युद्ध में शामिल नहीं होगा। दक्षिण कोरिया ने मना कर दिया, और कहा कि वे क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं, लेकिन अमरीकी गठबंधन में नहीं। ब्रिटेन ने भी अपने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया, और कहा कि वह कूटनीति पर जोर देगा। खाड़ी के अमरीकी-सहयोगी देशों, यूएई, और सउदी अरब ने भी जंग में अमरीका का साथ देने से मना कर दिया, और कहा कि उन्हें पहले सूचना नहीं दी गई, और वे अमरीका-इजराइल की नीति से असहमत भी हैं। खाड़ी के जिन देशों में अमरीका फौजी अड्डे बनाकर चल रहा है, वे भी आज लड़ाई में ईरान के हमले झेल रहे हैं, लेकिन जंग में वे साथ नहीं उतरे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने ट्रम्प की मांग को खारिज कर दिया, और कहा कि वे जंग में शामिल नहीं होगा। तुर्की ने ट्रम्प की अपील को अमरीका की गलती कहा, और जंग में शामिल होने से मना कर दिया। जर्मनी तो ग्रीनलैंड को लेकर अमरीकी गुंडागर्दी के समय से ट्रम्प का बड़ा मुखर आलोचक रहा है, और उसने ग्रीनलैंड और ईरान दोनों पर ट्रम्प के फैसलों को खारिज करते हुए खतरनाक बताया है। उसने अभी ट्रम्प की अपील पर कहा है कि वह अपने जहाज नहीं भेजेगा, यह उसकी लड़ाई नहीं है, और अमरीका को पहले कूटनीति पर जोर देना चाहिए। जर्मनी ने कहा कि ईरान पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा पर खतरा गहराएगा। जर्मनी ने यूरोपीय संघ के साथ मिलकर कहा कि वह ईरान के जंग में अमरीका को कोई फौजी समर्थन नहीं देगा, और ट्रम्प की नीतियां एकतरफा और खतरनाक हैं। इटली को ट्रम्प का करीबी माना जाता था, उसने ट्रम्प की धमकी को नामंजूर कर दिया है, और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पूरा सम्मान होना चाहिए। इटली ग्रीनलैंड से लेकर ईरान के जंग तक खुलकर अमरीका के खिलाफ है, और उसने साफ-साफ कहा कि यह जंग अमरीका की समस्या है, जिसे कि कूटनीति से हल किया जाना चाहिए। इस मामले में इटली यूरोपीय संघ के साथ है, जिसने यह कहा है कि वह ट्रम्प के हमलों के साथ नहीं हैं। इस पूरे महीने में ईरान पर हमले को लेकर यूरोपीय संघ ट्रम्प के खुलकर खिलाफ है, और वह इसके पहले भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर पूरी तरह से डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ था। ईरान पर ईयू ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। ईयू की मुखिया ने ईरान पर हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ कहा।
अमरीका के अंदर भी ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 36-40 फीसदी के आसपास है। जो मतदाता दोनों प्रमुख पार्टियों से परे हैं, वे बेचैन हैं। महंगाई, तरह-तरह के टैरिफ, और पेट्रोलियम अचानक बहुत महंगे हो जाने से लोग खफा हैं। खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी में फूट है, और संसद में जरूर इन सांसदों ने जंग के फैसले पर सरकार का साथ दे दिया है, लेकिन बाहर खुलकर कई रिपब्लिकन सांसद जंग के खिलाफ बोल रहे हैं। जिस हिन्दुस्तान में ट्रम्प के लिए हवन-पूजन होता था, वहां वह अब न सिर्फ मुस्लिम समुदाय की धिक्कार पा रहा है, बल्कि देश के विचारवान लोग भी अब उसे धिक्कार रहे हैं। ऐसे लोग और ऐसे महिला आंदोलनकारी भी, जो कि ईरान की मुल्ला-सरकार के कट्टरपंथ के खिलाफ रहते हैं, वे भी आज ईरान पर इस तरह के फौजी हमले के मुद्दे पर ईरान के साथ खड़े हो गए हैं।


