राजपथ - जनपथ

Date : 17-Mar-2019

जोगी पार्टी के अधिकांश नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं और वे इसके लिए जी-तोड़ मेहनत भी कर रहे हैं। मगर, कांग्रेस के नेता गंभीर नहीं है और उन्हें मजाक में ले रहे हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी लंबे समय तक जोगी के साथ रहे हैं। स्वाभाविक तौर पर जोगी पार्टी के ज्यादातर नेता उन्हीं के संपर्क में बताए जाते हैं। 
सुनते हैं कि पिछले दिनों जोगी पार्टी के पदाधिकारियों ने कांग्रेस प्रवेश की इच्छा जताई, तो उन्होंने अजीब सुझाव दे दिया। शैलेष ने कहा बताते हैं, आप लोग नई पार्टी का गठन कर लो। चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा, तो सम्मानजनक ढंग से कांग्रेस में विलय हो जाएगा। इससे कांग्रेस में उन्हें महत्व भी मिलेगा। शैलेष की बातें सुनकर जोगी पार्टी के नेता मायूस हो गए। 
कुछ इसी तरह का वाक्या जोगी पार्टी के कुछ नेताओं के साथ हुआ जब ये नेता, मंत्री मोहम्मद अकबर से मिलने गए। उन्होंने अकबर से कहा कि वे आना चाहते हैं। बताते हैं कि अकबर ने मजाकिए लहजे में उनसे कहा कहां आना चाहते हैं। कहां से कहां, किसका तबादला चाहते हैं? नेताओं ने कहा कि वे तबादले के लिए नहीं, कांग्रेस में शामिल होने आए हैं। इस पर अकबर ने गंभीर मुद्रा में कहा कि अभी नहीं, कांग्रेस में वैसे ही ओवर-फ्लो है। कुछ समय इंतजार कीजिए, अपनी जमीन मजबूत कीजिए तब कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। 

कश्यप बंधुओं की आर्थिक ताकत
बस्तर भाजपा में दिवंगत बलीराम कश्यप का दबदबा रहा है। बलीराम के गुजरने के बाद भी उनके परिवार की हैसियत में कोई कमी नहीं आई। उनके एक बेटे दिनेश सांसद हैं और केदार 15 साल मंत्री रहे, लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बाद कश्यप परिवार की ताकत पार्टी के भीतर घटी है। कम से कम प्रत्याशी चयन प्रक्रिया के दौरान जिस तरह कश्यप बंधुओं के खिलाफ विरोध के स्वर सुनाई दिए, उससे ऐसा ही लगता है। 
सुनते हैं कि बस्तर लोकसभा अंतर्गत सात जिलों के अध्यक्षों ने दिनेश या फिर केदार की जगह किसी नये चेहरे को टिकट देने की वकालत की है। इनमें से एक जिला अध्यक्ष ने तो खुद को योग्य प्रत्याशी बताया है। ऐसे में बस्तर में किसी एक के नाम पर सहमति बनाना पार्टी के रणनीतिकारों के लिए कठिन हो चला है। आरएसएस ने पूर्व मंत्री महेश गागड़ा का नाम आगे किया है, तो संगठन में हावी खेमा लता उसेंडी को प्रत्याशी बनाना चाहता है। इन सबके बावजूद कश्यप बंधु एक बड़ी आर्थिक ताकत भी हैं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। 
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Date : 16-Mar-2019

आमतौर पर जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। राज्य बनने के बाद विपक्ष के नेता रहे क्रमश: नंदकुमार साय, महेंद्र कर्मा, टीएस सिंहदेव भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के प्रकरणों पर कार्रवाई न होने अदालत की शरण में गए थे। साय ने तत्कालीन सीएम अजीत जोगी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव लडऩे का आरोप लगाया था और इसको लेकर अभी तक अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। 
कर्मा तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ पुष्पस्टील को नियम विरूद्ध खदान आबंटन पर जांच की मांग को लेकर अदालत गए थे। सिंहदेव भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद में अनियमितता पर जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ी। प्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद विपक्षी भाजपा भी सरकार के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ रही है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी हाईकोर्ट गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार की जांच नहीं, बल्कि रोकने गए हैं। कौशिक ने नान घोटाले की एसआईटी जांच को ही गलत ठहराया है। पिछले दिनों कौशिक की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई भी हुई।
 कौशिक चाहते थे कि जांच रोकी जाए, लेकिन सरकार की पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदम्बरम ने कौशिक की याचिका पर तंज कसा, कि पहली बार जनहित याचिका देख रहे हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की जांच रोकने की मांग की गई है। जबकि जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। चिदम्बरम की तर्कों का प्रतिफल यह रहा कि नान घोटाले की जांच रोकने की तमाम कोशिशें सफल नहीं हो पाई। 29 अप्रैल को अगली सुनवाई होगी।  

अब दूसरे अस्पताल की बारी
सरकार बदलते ही सत्ता प्रतिष्ठानों में भी बदलाव हुआ। कई बदले गए और कुछ प्रक्रियाधीन है। सीएस, डीजीपी और पीसीसीएफ के बाद निचले क्रम में कई अहम पदों पर नई पदस्थापना हुई है। इससे परे सुपरस्पेशलिटी डीकेएस अस्पताल अधीक्षक पद से पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता को हटाया गया। अब मेकाहारा के अधीक्षक डॉ. विवेक चौधरी को बदलने की चर्चा चल रही है। 
वैसे डॉ. चौधरी बेहद काबिल डॉक्टर माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ के आसपास के प्रदेशों में भी उनके जैसा कैंसर विशेषज्ञ दूसरा नहीं है। बावजूद उनके खिलाफ यह शिकायत चर्चा में है कि वे पीते हैं। सुनते हैं कि डॉ. चौधरी को हटाने का प्रस्ताव तैयार भी हो गया था। स्वतंत्रता सेनानी डॉ. महादेव पांडेय के पुत्र डॉ. राजीव पांडेय को अधीक्षक बनने का प्रस्ताव भी तैयार हो गया। फाइल आगे बढ़ी, तभी उनका सीआर खंगाला गया। डॉ. पांडेय का 11 साल का सीआर ही नहीं मिला। वे पहले रमेश बैस के केंद्रीय मंत्री रहते उनके निजी चिकित्सक थे। इसके बाद अलग-अलग जगहों पर पदस्थ रहे। अब सीआर नहीं था तो आगे की प्रक्रिया रूक गई। डॉ. चौधरी की जगह नए अधीक्षक के लिए फाइल दौड़ रही है। इसमें डॉ. फुलझेले का नाम सबसे ऊपर बताया जा रहा है। फिर भी कुछ लोग लगे हैं कि डॉ. चौधरी को ही रहने दिया जाए। चुनाव आचार संहिता हटने के बाद इसको लेकर फैसले की उम्मीद है। 

अब किस मुंह से मना करें?

कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के बेटे को बाराबंकी सीट से प्रत्याशी बनाया है। अब पुनिया को उन नेताओं को टिकट देने से मना करना मुश्किल हो गया है, जो कि अपने बेटे-रिश्तेदारों के लिए टिकट मांग रहे थे। इनमें कैबिनेट मंत्री ताम्रध्वज साहू अपने दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से अपने बेटे के लिए टिकट चाह रहे हैं। पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ला अपने पुत्र भवानीशंकर और धनेंद्र साहू अपने पुत्र प्रवीण की टिकट के लिए प्रयासरत हैं। इसी तरह  पूर्व विधायक देवती कर्मा भी अपने पुत्र छविंद्र या दीपक के लिए टिकट चाहती हैं। सुनते हैं कि पुनिया ने फिलहाल सभी को आश्वासन देकर शांत करने की कोशिश की है, लेकिन वे अपने बेटे की तरह दूसरों के लिए कितना कुछ कर पाते हैं, यह देखना है। 

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Date : 15-Mar-2019


सरकार बदलते ही आधा दर्जन से अधिक आईएफएस अफसर अपने मूल विभाग में भेज दिए गए। यह फैसला कोई गलत भी नहीं था।  सरकार ने वन विभाग की बेहतरी के लिए ऐसा किया। वन विभाग में लौटने वालों में वर्ष-90 बैच के आईएफएस अफसर संजय ओझा भी हैं, जो कि दिल्ली में आवासीय आयुक्त पद पर थे। वैसे तो आवासीय आयुक्त का पद आईएएस के कैडर का है, लेकिन ओझा की पदस्थापना करते समय इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया था। 
खैर, ओझा एपीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं। भाजपा सरकार आने के बाद सीनियर आईएएस डॉ. कल्याण चक्रवर्ती केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए, तो ओझा को भी प्रतिनियुक्ति पर साथ ले गए थे। संजय ओझा ने लंबे समय तक केन्द्र सरकार में काम किया। केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटे, तो ओझा के आग्रह पर पिछली सरकार ने उन्हें दिल्ली में ही रहने दिया। दरअसल, उनकी माता बीमार रहती हैं और उनका दिल्ली के अस्पताल में इलाज चल रहा है। यहां लौटने पर वन मुख्यालय में पोस्टिंग हो गई। वे केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव पद के लिए सूचीबद्ध तो हो चुके थे, जल्द ही उनकी पोस्टिंग भी तय हो गई। केन्द्र सरकार ने संजय ओझा को रिलीव करने के लिए राज्य सरकार को पत्र भेजा। 
सुनते हैं कि सीएम भूपेश बघेल को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने बाकायदा नोटशीट पर इसके लिए अनुमति दे दी। अब विभाग को मात्र रिलीव करना था, लेकिन रिलीविंग की फाइल अफसरों के बीच घूमती रही। संजय ओझा मिन्नतें करते रहे कि उनकी माता बहुत बीमार है और उनकी देखरेख करने के लिए दिल्ली में रहना जरूरी है। वे यहां-वहां रिलीविंग के लिए घूमते रहे। रिलीव न होने पर दो दिन पहले केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति निरस्त हो गई।
यह अफसरशाही का अनोखा नमूना है जिसमें सीएम-मिनिस्टर से लेकर सीएस तक उन्हें केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की अनुमति देना चाह रहे थे, पर उन्हें रिलीव नहीं किया गया। जबकि हाल यह है कि कई सीनियर आईएफएस अफसरों के पास कोई काम नहीं है। अरण्य भवन में कई आला अफसर दो महीने से खाली बैठे हैं।  

पार्ट-2
कुछ दिन पहले रिटायर हुए आईएफएस अफसर पीसी मिश्रा को ग्रामीण विकास का जानकार माना जाता है। वर्ष-85 बैच के अफसर मिश्रा केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग में काम कर चुके हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार में रहते छत्तीसगढ़ के लिए कई योजनाओं को मंजूरी दिलाई। मिश्रा जब प्रतिनियुक्ति से लौटे, तो उनकी पोस्टिंग पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में की गई। वे हर मर्ज की दवा थे। कलेक्टर हो या जिला पंचायत सीईओ, मिश्रा हर किसी को मार्गदर्शन देते थे। वे सबसे ज्यादा लंबे समय तक ग्रामीण विकास विभाग में काम करने वाले अफसर रहे। विभाग में कई घपले-घोटाले भी हुए, लेकिन मिश्रा के दामन पर कभी दाग नहीं लगे। 
सरकार बदलने पर वे विभाग में लौटे तो उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नत होने की उम्मीद थी क्योंकि उनके बैच के राकेश चतुर्वेदी, कौशलेन्द्र सिंह पीसीसीएफ हो चुके थे। अगले तीन महीने में पीसीसीएफ स्तर के चार अफसर रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उन्हें एपीसीसीएफ से पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत करने में कोई तकनीकी अड़चन भी नहीं थी। पर विभाग ने ऐसी उदारता नहीं दिखाई। पिछले दिनों उनके रिटायरमेंट पर विभाग के अफसरों ने फेयरवेल पार्टी दी, तो मिश्रा का दर्द झलक उठा। 
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Date : 14-Mar-2019

छोटे जोगी के बर्ताव से जोगी पार्टी में भारी नाराजगी है। एक-एक कर कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। पिछले दिनों पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में एक सदस्य ने निष्ठावान कार्यकर्ताओं के पार्टी छोडऩे पर चिंता जताई। उन्होंने छोटे जोगी के बर्ताव पर नाराजगी जताते हुए कहा बताते हैं कि हम किसी के साथ सम्मानजनक ढंग से पेश नहीं आएंगे, तो कोई हमारे साथ क्यों रहेगा? आखिर में छोटे जोगी के बोलने की बारी आई। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि जैसे हम हैं, वैसे ही रहेंगे। हमारा व्यवहार नहीं बदलेगा। जिसे पार्टी में रहना है रहे अन्यथा छोड़कर चले जाए। छोटे जोगी के तेवर के बाद पार्टी से पलायन और तेज होने के आसार दिख रहे हैं। फिलहाल विधान मिश्रा जैसे कुछ नेता हैं जो पुराने दोस्त धरमजीत सिंह के फेर में अब तक जोगी कांगे्रस में तो हैं, लेकिन वहां जाना-आना बंद कर चुके हैं, और कांगे्रस में सम्मानजनक वापिसी तक घर बैठे हैं।

कल आए, आज घोड़ी पर चढऩे...
कांग्रेस में टिकट के दावेदार काफी सक्रिय हैं। प्रभारी मंत्रियों के यहां भी दावेदारों की भीड़ देखी जा सकती है। पिछले दिनों नांदगांव सीट से चुनाव लडऩे के इच्छुक कई नेता रायपुर पहुंचे और वे सीधे प्रभारी मंत्री मोहम्मद अकबर के घर गए। अकबर नांदगांव और कवर्धा के सारे नेताओं को एक साथ देखकर कुछ देर चुप रहे, फिर सबको साथ बिठाकर आने का कारण पूछा। इनमें पूर्व विधायक योगीराज सिंह और हाल ही में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए नरेश डाकलिया भी थे। टिकट के दावेदार अकेले में चर्चा करना चाह रहे थे, लेकिन अकबर ने बताते हैं कि उन्हें कहा घर की बात है, सबके सामने अपनी बात रख सकते हैं। 

योगीराज-डाकलिया और अन्य ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जताई और पार्टी का टिकट दिलाने में अकबर का सहयोग मांगा। फिर क्या था, अकबर ने साफ शब्दों में कह दिया कि टिकट के लिए उन्हें प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और सीएम भूपेश बघेल से मिलना होगा। टिकट वे ही तय करेंगे। मेरी कोई भूमिका नहीं होगी। फिर बातों-बातों में हंसी मजाक के बीच उन्होंने कह दिया कि 68 सीट का कमाल है कि लोकसभा में टिकट मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है। उनका इशारा डाकलिया की तरफ था, जो कि कुछ दिन पहले ही कांग्रेस में आए हैं और लोकसभा टिकट की दौड़ में शामिल हो गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिन्हें (भोलाराम साहू) टिकट का मजबूत दावेदार माना जा रहा है वे ज्यादा किसी से मेल-मुलाकात नहीं कर रहे हैं और चुपचाप जनसंपर्क में जुटे हैं।
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Date : 13-Mar-2019

भूपेश बघेल सीएम बनने के बाद सम्मान समारोह में शिरकत कर रहे हैं। तकरीबन हर समाज के लोग उनका सम्मान कर चुके हैं। व्यस्तता के बावजूद लोगों से मेल-मुलाकात के लिए समय निकाल रहे हैं। इन सबके बीच पिछले दिनों रायपुर दक्षिण के पराजित कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल ने सीएम भूपेश बघेल के सम्मान का कार्यक्रम रखा, तो सीएम वहां नहीं गए। जबकि सीएम दिनभर रायपुर में ही थे। वे कांग्रेस नेता अरूण भद्रा के निवास पर भी गए और कुछ अन्य प्रमुख लोगों के साथ बैठक की। ऐसे में कन्हैया के कार्यक्रम में सीएम के नहीं पहुंचने की जमकर चर्चा रही। 
कार्यक्रम में न सिर्फ सीएम बल्कि मंत्रियों का भी सम्मान होना था, लेकिन कोई भी मंत्री वहां नहीं पहुंचा। सिर्फ लोकसभा टिकट के दावेदार प्रमोद दुबे, किरणमयी नायक और अन्य लोगों ने ही उपस्थिति दर्ज कराई। सुनते हैं कि सीएम, कन्हैया अग्रवाल से खासे नाराज हैं। कन्हैया ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और टीएस सिंहदेव को साधकर टिकट तो हासिल कर ली थी, लेकिन प्रचार ठीक से नहीं किया। यही नहीं, टिकट तय होने से पहले कन्हैया रामसागरपारा स्थित एक होटल में भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल के कुछ करीबी लोगों के साथ बैठक में देखे गए। हाल यह रहा कि प्रदेश में अनुकूल माहौल न होने के बावजूद बृजमोहन का राह आसान रही। यह सब जानकर भूपेश बघेल का कन्हैया के कार्यक्रम में नहीं जाना स्वाभाविक था। 

लोकसभा चुनाव के लिए 
समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार
पापा मैनपुरी से
बेटा आजमगढ़ से
बीवी कन्नौज से
चचेरा भाई बदायूं से
चाचा बहराइच से
मामा इटावा से
साली खेरी से
साला अकबरपुर से
छोटा भाई फिरोजाबाद से
(सोशल मीडिया से)
  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Mar-2019

आखिरकार दिल्ली में छत्तीसगढ़ भवन के संयुक्त आवासीय आयुक्त संजय अवस्थी को निलंबित कर दिया गया। पिछली सरकार में अवस्थी बेहद पॉवरफुल रहे। वे सीएसआईडीसी में उद्योग निरीक्षक के पद पर थे और फर्नीचर घोटाले के भी आरोपी रहे, लेकिन सरकार में उनकी पकड़ का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि वे एक के बाद एक प्रमोशन पाते गए और संयुक्त आवासीय आयुक्त पद पर पहुंच गए। 
सुनते हैं कि वे छत्तीसगढ़ भवन में रूकने वाले मंत्री-अफसरों के मेल-मुलाकात पर भी नजर रखते थे और इसकी सूचना यहां-वहां पहुंचाते रहे हैं। उनके खिलाफ ढेरों शिकायतें रही, लेकिन बाल-बांका नहीं हुआ। उन्होंने नौकरी के साथ-साथ ट्रेवल्स का भी कारोबार जमा लिया था। सरकार बदली तो दुर्दिन शुरू हो गए। उनकी कई अनियमितताएं पकड़ी गईं। फिर क्या था, उन्हें निलंबित कर जगदलपुर में अटैच कर दिया गया। 

हर बार खबरों में रहते हैं...
रायपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस टिकट के लिए राजेन्द्र तिवारी और पारस चोपड़ा का नाम भी चर्चा में है। दोनों नेता पार्टी के अहम पदों पर रहे हैं। दोनों राज्य बनने से पहले विधानसभा का चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा। हर चुनाव में दोनों नेता टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। विधानसभा चुनावों में राजेन्द्र तिवारी धरसींवा से लेकर भाटापारा और बलौदाबाजार तक की सीट से टिकट मांग चुके हैं। कुछ यही हाल पारस चोपड़ा का भी है। चर्चा तो यह भी है कि विधानसभा चुनाव के पहले पारस ने पार्टी छोडऩे का मन बना लिया था। पिछली सरकार के एक ताकतवर मंत्री से उनकी चर्चा हो चुकी थी, लेकिन वे ठिठक गए। 
मीडिया में दोनों नेताओं का नाम आया तो पार्टी के रणनीतिकारों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। राजेन्द्र तिवारी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से मीडिया प्रबंधन देखते रहे हैं। मीडिया के लोगों से उनकी मित्रता जगजाहिर है। वे व्यवहार कुशल नेता माने जाते हैं और पत्रकारों से मेल मुलाकात पर हमेशा रबड़ी-मीठे से स्वागत के लिए तत्पर रहते हैं। पारस भी मिलनसार हैं। ऐसे में टिकट की अधिकृत घोषणा से पहले दोनों नेताओं का नाम दावेदारों के रूप में मीडिया में चर्चा में रहता है, तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

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Date : 11-Mar-2019

सरकार ने चुनाव आचार संहिता लगने से पहले आनन-फानन में कुछ अफसरों के तबादले भी किए। आईपीएस अफसर अजातशत्रु सिंह को जगदलपुर और शशिमोहन सिंह को सेनानी छसबल दंतेवाड़ा भेजा गया। ये दोनों अफसर राज्य पुलिस सेवा से पदोन्नत हुए थे। दोनों पिछली सरकार में बेहद पावरफुल रहे। उनकी हैसियत किसी आईजी-एसपी से ज्यादा रही है। अजातशत्रु सेक्स-सीडी प्रकरण की जांच से भी जुड़े रहे। हाल यह रहा कि एसपी तो दूर, उस समय के दुर्ग, रायपुर आईजी तक को मालूम नहीं था कि जांच किस दिशा में चल रही है। 
आईपीएस अवॉर्ड होने के बाद अजातशत्रु को मानवाधिकार आयोग में एसपी और शशिमोहन को एसपी पुलिस अकादमी बनाकर भेजा गया। वैसे तो, ये पद अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन चुनाव के वक्त दोनों अफसरों की भूमिका अहम रही है। हल्ला यह है कि दोनों पॉलिटिकल इंटेलीजेंस का काम देखते थे। दोनों की खासियत यह रही है कि सत्ता के बेहद करीब होने के बावजूद तत्कालीन सीएम के बाकी करीबी अफसरों की तरह धौंसबाजी नहीं दिखाई, बल्कि प्रेम-व्यवहार से अपना काम कराते रहे। सरकार बदलने के बाद भी दोनों के खिलाफ कोई खास नाराजगी नहीं थी। फिर भी उन्हें नक्सल प्रभावित बस्तर और दंतेवाड़ा में भेजा गया, जहां पहले कभी उनकी पोस्टिंग नहीं हुई थी। 
आखिर कोई न कोई तो बस्तर में तैनात ही किया जाएगा, और हर अफसर को कभी न कभी तो बस्तर में जाना ही पड़ता है, लेकिन आज के माहौल में इन दोनों की वहां रवानगी के कई मायने निकाले जा रहे हैं। शशिमोहन के दुर्ग में तैनात रहते हुए फिल्मों में काम करने से लेकर छात्राओं के फ्लैट पर छापा मारने तक बहुत से विवाद खड़े हुए। इसी तरह अजातशत्रु ने सेक्स-सीडी कांड में कानूनी संभावनाओं से एकदम बाहर जाते हुए कार्रवाई की, जिसका नतीजा यह निकला कि शुरू में पुलिस द्वारा लगाई गई धाराएं बाद में सीबीआई ने हटा लीं। यह अलग बात है कि अजातशत्रु ने इस सरकार के लोगों को पिछली सरकार के सबसे ताकतवर लोगों द्वारा सामने बैठाकर, बांह मरोड़कर कार्रवाई करवाने की जानकारी दे दी थी। फिर भी कार्रवाई की तो उन्होंने ही थी।

इनका टाईम आ गया....
अभी चार-छह दिन पहले राजधानी रायपुर के सबसे व्यस्त बाजार में दूकानों के बाहर फैलाकर रखे गए सामान जब हटाने के लिए पुलिस ने कहा, तो दूकानदार ने भारी बदसलूकी की, गालियां दीं, धमकियां दीं, और अपने साथ के लोगों को भड़काया कि पुलिस कुछ करे तो उस पर हमला कर दें। पूरे वक्त पुलिस दबी रही क्योंकि गुंडागर्दी कर रहे दूकानदार सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी के एक स्थानीय नेता के रिश्तेदार थे। पुलिस मां-बहन की गालियां खाकर लौट आई, और उसका वीडियो कई लोगों ने बनाया। इसके बाद जब यह वीडियो चारों तरफ फैला और पुलिस के ऐसे डरने पर लोगों ने पुलिस को धिक्कारा, तब जाकर दूकानदार गिरफ्तार किया गया। इसी वीडियो का नतीजा यह हुआ कि कल भिलाई में जब सुपेला में सड़क पर गाडिय़ां सजाकर बेचने वाले लोगों की गाडिय़ां पुलिस ने जब्त कीं, तो दूकानदारों ने पुलिस को खूब गालियां देते हुए पुलिस की क्रेन-ट्रक से अपनी गाडिय़ां बलपूर्वक उतार लीं, और पुलिस भीड़ के सामने कुछ भी नहीं कर पाई। कुछ हफ्ते पहले पिथौरा में भी ऐसा ही हुआ था। आज तकरीबन पूरे प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के ही विधायक हैं। ऐसे में हर गुंडा-मवाली किसी विधायक का नाम लेकर, किसी मंत्री का नाम लेकर पुलिस पर धौंस दिखाने में लगा हुआ है। यह सरकार को सोचना है कि सत्तारूढ़ पार्टी के करीबी लोगों के गुंडे अगर पुलिस की इतनी बेहाली करते हैं, और वह अगर वीडियो कैमरे पर दर्ज भी हो जाती है, तो उसका क्या नतीजा होगा? एक दूसरी दिक्कत यह है कि इन तीनों ही मामलों में एक धर्म-समुदाय के लोग ही  थे जो पुलिस पर गालियों से हमला कर रहे थे। ऐसी कई घटनाओं का एक नतीजा यह भी निकलने वाला है कि कांगे्रस के सत्ता में आने के बाद एक समुदाय के लोगों की गुंडागर्दी बढऩे की जनधारणा मजबूत होती जाएगी। देश में कुछ पार्टियां जनधारणा का ऐसा ही धु्रवीकरण चाहती भी हैं। अभी सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियों के साथ ये वीडियो तैरने भी लगे हैं, और आबादी का खासा बड़ा हिस्सा ऐसा है जो किसी एक धर्म को मुजरिम साबित करने के लिए इसे बढ़ाते भी चल रहा है। ऐस वीडियो के साथ यह टिप्पणी भी चल रही है कि अपना टाईम आ गया...। हो सकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी विधानसभा चुनाव के ताजा नतीजों के बाद अब तक कोई खतरा महसूस नहीं कर पा रही हो, लेकिन इसका नुकसान छोटा नहीं होगा।

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Date : 10-Mar-2019

रमन सिंह ने ट्वीट किया कि कांग्रेस सरकार कर्ज लेकर घी पियो, की नीति पर चल रही है। हमने 15 साल में जितना कर्जा नहीं लिया, उतना कांग्रेस सरकार ने दो महीने में ले लिया। रमन के ट्वीट को लेकर भाजपा के अंदरखाने में बहस चल रही है। विरोधी इसके लिए खुद रमन सिंह को जिम्मेदार ठहराते हैं। 
विरोधियों का तर्क है कि कैबिनेट में मंत्रियों की राय के खिलाफ जाकर रमन सिंह ने मोबाइल बांटने का फैसला लिया था। करीब 22 सौ करोड़ की इस योजना से भाजपा को कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टे प्रदेश में भाजपा की गांव-गरीब और किसान विरोधी छवि बन गई। मोबाइल योजना कांग्रेस सरकार ने बंद कर दी है, लेकिन इसका भुगतान सरकार के गले की हड्डी बन गया है। रमन सरकार ने 27 लाख मुफ्त मोबाइल बांटे थे। अब इसका भुगतान नई सरकार पर छोड़ दिया गया है। कुल मिलाकर 1027 करोड़ रूपए कंपनी को देने हैं, जिसमें से सिर्फ 179 करोड़ पिछली सरकार ने दिए हैं। मोबाइल तो बंट चुके हैं, बकाया भुगतान की जिम्मेदारी नई सरकार पर है। यानी इसके लिए कर्ज तो लेना ही पड़ेगा। 
कमीशनखोरी को लेकर भी हल्ला है। भाजपा के लोग मानते हैं कि जब पूरा भुगतान हुआ ही नहीं है, तो कमीशन कैसा। यानी वे अपने को पाक साफ बता रहे हैं, लेकिन अंदरखाने की खबर यह है कि योजना शुरू होने से पहले जियो रिलायंस कंपनी का कनेक्शन पूरे प्रदेश में मात्र 14 हजार था, जो कि दो महीने के भीतर बढ़कर 10 लाख से अधिक हो गया। अब कंपनी को बैठे बिठाए इतना फायदा हुआ है, तो काम देने वालों का कुछ हक तो बनता ही है। आज जब कांगे्रस सरकार पता लगा रही है तो सामने आ रहा है कि किस तरह इस एक अकेली कंपनी को तमाम गांव-जंगल में टॉवर लगाने के लिए अफसरों ने खड़े-खड़े इजाजत दी थी।

पंचायतें इस वजह से खफा थीं...
एक दूसरा मामला उस समय भी सामने आ गया था जब मोबाइल कंपनी को टॉवर लगाने के लिए रमन सरकार 6सौ करोड़ से अधिक की रकम देने जा रही थी। और इस रकम का इंतजाम उस वक्त पंचायत विभाग के एसीएस रहे एमके राऊत ने एक रास्ता निकालकर कर दिया था। उन्होंने पंचायतों की मूलभूत की राशि को वापिस बुलवाकर राज्य सरकार को टॉवर के लिए देने का हुक्म निकाल दिया था। इसके पीछे यह तर्क ढूंढ लिया गया था कि यह रकम पंचायत के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए रहती है, और हर पंचायत की तरफ से यह मान लिया गया था कि उसे अपना मोबाइल नेटवर्क ही विकसित करना है। इसके लिए सैकड़ों करोड़ रुपये पंचायतों से चिप्स के खाते में आ भी गए थे, लेकिन समय रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह को लोगों ने सावधान किया, और इस फैसले को रोक दिया गया था। लेकिन तब तक प्रदेश के पौने दो लाख पंच-सरपंच अपनी पंचायत के हिस्से की रकम राज्य सरकार द्वारा लूट लेने के फैसले से खफा हो चुके थे, और वह नाराजगी चुनाव में भी इसलिए हावी रही कि यह सरकार लौटेगी तो फिर पंचायत की रकम खा जाएगी। नतीजा यह हुआ कि अफसरों के इस फैसले की वजह से भाजपा निपट गई। लेकिन ताकतवर अफसरों के सामने पार्टी में किसी की कोई जुबान थी नहीं, और इसलिए वोटरों ने मौका मिलते ही ऐसी सरकार को ही निपटा दिया। ऐसी तमाम बातें किसी भी सरकार के लिए एक सबक हो सकती हैं।(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 09-Mar-2019

आईएएस अफसर चंदन कुमार जब तक नांदगांव जिला पंचायत सीईओ रहे, उनकी कांग्रेस के सदस्यों से नहीं बनी। कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्य उन पर भाजपाईयों को महत्व देने का आरोप लगाते रहे, लेकिन सरकार बदलते ही उन्हें कलेक्टरी का मौका मिल गया। वे सुकमा कलेक्टर बनाकर भेजे गए। सुनते हैं कि स्थानीय कांग्रेस नेता भले ही उनके विरोधी रहे, लेकिन प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव चंदन  यादव का उन्हें भरपूर साथ मिला। 
दोनों चंदन बिहार के रहने वाले हैं और पुरानी जान-पहचान भी है। चुनाव से पहले चंदन यादव, चंदन कुमार से जिले में कांग्रेस की स्थिति को लेकर फीडबैक लेते रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस ने जब खुज्जी से छन्नी साहू और डोंगरगढ़ से भुनेश्वर बघेल को टिकट देना तय किया था तो चंदन यादव ने चंदन कुमार से भी राय ली थी। दोनों ही जिला पंचायत के सदस्य रहे हैं। कुल मिलाकर चंदन कुमार को कांग्रेस की सरकार में दिक्कत नहीं रहेगी। 

नेताजी का बीज सप्लायर
पिछली सरकार में भाजपा के प्रदेश स्तर के सबसे बड़े नेता के दबदबे के चलते वन विभाग पर यह दबाव बने रहता था कि उनके सबसे करीबी एक आदमी से ही बांस के बीज खरीदने हैं। बेलगहना के रहने वाले इस आदमी का रूतबा ऐसा था कि वह बड़े-बड़े वन संरक्षकों के दफ्तर में बैठकर तय करता था कि कौन सा अफसर कहां पर रहेगा। कई गुना दाम पर बांस के बीज लेने में भी वैसे तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं थी क्योंकि सरकारी खरीदी तो होती ही कई गुना दाम पर है, लेकिन बीज ऐसे घटिया क्वालिटी के मिलते थे कि उनमें से 10 फीसदी भी अंकुरित नहीं हो पाते थे। नतीजा यह होता था कि वन विभाग का बांस लगाने का सारा खर्च ही बेकार हो जाता था। 
अब ऐसे लोग नेताजी के लिए एक-एक घर बनवाते चलते थे। नेताजी के खुद के तो कई घर बन गए, लेकिन उनकी पार्टी का घर ठीक वैसा ही उजड़ गया जैसा कि बांस का जंगल जो कि उगने के पहले ही उजड़ गया। एक जंगल अफसर ने कहा कि उन्होंने नेताजी को यह सुझाया था कि उन्हें बीज देहरादून से भारत सरकार की नर्सरी से लेने दें, वे बेलगहना के सप्लायर को घर बैठे कमीशन दे देंगे, कम से कम बांस तो उगेगा। लेकिन काली कमाई का मोह ऐसा था कि नेताजी ने पार्टी का जिम्मेदार रहते हुए भी पार्टी को बांस पर लिटाकर दम लिया।

स्टेडियम खाली रहना भारी पड़ा
खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह प्रदेश के बड़े नेताओं से खफा हैं। शाह इंडोर स्टेडियम में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद विधायक-सांसदों की बैठक लेने वाले थे, लेकिन स्टेडियम खाली देखकर उनका मूड उखड़ गया। चार लोकसभा क्षेत्र के इस सम्मेलन में ले-देकर तीन-चार हजार लोग ही जुट पाए। जबकि करीब 38 हजार कार्यकर्ताओं को न्यौता भेजा गया था। हाल यह रहा कि खुद महामंत्री (संगठन) पवन साय युवा मोर्चा के पदाधिकारियों को शाह के स्टेडियम पहुंचने पर पटाखा फोडऩे का आग्रह करते देखे गए। 
शाह सम्मेलन के बाद विधायक-सांसदों की बैठक लेने के बजाय अपनी गाड़ी में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह व सौदान सिंह को बिठाकर सीधे एयरपोर्ट के लिए निकल गए। सुनते हैं कि रास्ते में शाह ने इस फीके सम्मेलन के लिए दोनों नेताओं के समक्ष नाराजगी भी जाहिर की।  इस सम्मेलन के बाद से धरमलाल कौशिक का अध्यक्ष पद से हटना तय हो गया था। जबकि उन्हें पहले लोकसभा चुनाव तक पद पर बने रहने के संकेत दे दिए गए थे। (rajpathjanpath@gmail.com)
 


Date : 08-Mar-2019

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा लोकसभा प्रत्याशी चयन में अतिरिक्त सतर्कता बरतती दिख रही है। आरएसएस के पुराने नेताओं से रायशुमारी की जा रही है। सुनते हैं कि केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पार्टी हाईकमान को पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर लोकसभा से टिकट देने का सुझाव दिया है। हालांकि बृजमोहन मौजूदा हालात में चुनाव नहीं लडऩा चाहते हैं। कम से कम उन्होंने अपने करीबियों को ऐसा ही संकेत दिया है। 
जिस तरह नेता प्रतिपक्ष के चयन में उनकी दावेदारी को नजरअंदाज किया गया, उसके बाद से वे पार्टी गतिविधियों में कोई खास रूचि लेते नहीं दिख रहे हैं। अमित शाह के कार्यक्रम के दौरान भी नजर नहीं आए। यह कहा गया कि वे एक शादी में शामिल होने पुरी गए हैं। खैर, तमाम अटकलों के बाद भी मौजूदा सांसद रमेश बैस की टिकट काटना आसान नहीं होगा। वे सात बार के सांसद हैं। कभी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। उन्होंने काम चाहे किसी का न किया हो, कभी किसी का अहित भी नहीं किया। हल्ला तो यह भी है कि रायपुर लोकसभा के प्रभारी पूर्व सांसद अशोक शर्मा ने तो पार्टी के रणनीतिकारों को कह दिया है कि बैस ही सबसे बेहतर प्रत्याशी होंगे। अब जब भूपेश बघेल के सीएम बनने के बाद छत्तिसढिय़ावाद हावी हुआ है, उससे तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी पार्टी के रणनीतिकारों को भी बैस का कोई विकल्प नहीं दिख रहा। 

ट्रांसफर का रिकॉर्ड

आखिरकार आईएएस चंद्रकांत उइके को संस्कृति संचालक के प्रभार से मुक्त कर दिया गया। उनकी जगह आईएफएस अफसर अनिल साहू की पदस्थापना की गई। इस फेरबदल के पीछे मुक्ताकाशी मंच में ओड्री मागधी कार्यक्रम को लेकर विवाद मुख्य वजह रही है। पहले ओडिसी के प्रख्यात कलाकारों को बुलाया गया था। उन्हें भुगतान भी कर दिया गया। बाद में स्थानीय कलाकारों का कार्यक्रम कराने की बात कहकर ओडिसी का कार्यक्रम पहले स्थगित कर दिया गया। बाद में इसको लेकर विवाद बढ़ा, तो सीएम के हस्तक्षेप के बाद ओडिसी नृत्य का कार्यक्रम हो पाया। सुनते हैं कि इस पूरे आयोजन को लेकर इतनी अफरा-तफरी मची हुई थी कि बाहर से आए कलाकारों को प्रैक्टिस के लिए जगह भी ठीक से उपलब्ध नहीं कराई गई। उनके पैरों में फफोले पड़ गए। इस पूरे आयोजन में संस्कृति विभाग के अफसरों का गैर जिम्मेदाराना रूख सामने आया। इसके बाद उइके से संस्कृति संचालक का अतिरिक्त प्रभार ले लिया गया। उनकी जगह मंत्री की पसंद पर अनिल साहू की पदस्थापना की गई। हालांकि अनिल स्थानीय साहू न होकर ओडिशा के रहने वाले हैं। इस तरह चंद्रकांत उइके ने ट्रांसफर का एक नया रिकॉर्ड भी कायम किया, उनकी जितने बरस की नौकरी रही है, उतने बार ट्रांसफर हो चुका है।
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Date : 07-Mar-2019

भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का फैसला तो कर लिया था, लेकिन इसका क्रियान्वयन आसान नहीं था। अपैक्स बैंक के कुछ अफसरों का रोड़ा तो था ही, बाकी बैंकर्स भी परेशानी खड़ी कर रहे थे। ऐसे में सीएम के पीएस गौरव द्विवेदी ने कर्जमाफी योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा खुद अपने हाथों में लिया। सुनते हैं कि सबसे पहले उन्होंने अपैक्स बैंक के अफसरों को बुलाया और उनमें से एक को जमकर फटकार लगाई। 
गौरव खुद आईटी एक्सपर्ट हैं और केन्द्र सरकार की 'माईगवडॉटइन' (मेरी सरकार) परियोजना के मुख्य सूत्रधार रहे हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ में पीडीएस के कम्प्यूटराईजेशन का श्रेय दिया जाता है, इसके लिए उन्हें प्रधानमंत्री अवार्ड तक मिल चुका है। उन्होंने इस पूरी योजना की डे-टू-डे मॉनिटरिंग की और कर्जमाफी के काम में बैकिंग व्यवस्था में आ रही दिक्कतों को दूर करने ठोस पहल की। कर्जमाफी का क्रियान्वयन तीन चरणों में करने का फैसला लिया गया। पहले चरण में जिन किसानों से लिकिंग के लिए राशि ली गई थी उनकी राशि लौटाना था। यह काम सफलतापूर्वक हुआ, तो अगले चरण में किसानों की अल्पकालीन ऋण माफी की गई।
तीसरे चरण में 25 सौ रूपए क्विंटल समर्थन मूल्य देने के फैसले के बाद डिफरेंस की राशि किसानों के खाते में जमा की गई और वर्तमान में किसानों के द्वारा व्यावसायिक बैंकों से लिए गए कर्जा माफी की कार्रवाई चल रही है। यह सब काम बिना शोरगुल के हो गया, जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान में कर्जमाफी की घोषणा के बाद भी क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। मध्यप्रदेश में तो कर्जमाफी के लिए किसानों से फॉर्म जमा कराए जा रहे हैं, लेकिन यहां बिना किसी बाधा के किसानों की कर्जमाफी के लिए खुद राहुल गांधी, भूपेश बघेल की पीठ थपथपा चुके हैं। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर चुपचाप काम करने की प्रवृत्ति गौरव द्विवेदी को दूसरों से अलग बनाती है। 

सीएम के तेवरों से हुआ काम
कहावत है 'भय में होत न प्रीत' यानी बिना डर के कोई काम नहीं होता। सीएम भूपेश बघेल को कई मौकों पर अपने तेवर दिखाने पड़े हैं। हुआ यूं कि सरकार ने छोटे भूखण्डों की रजिस्ट्री की इजाजत देने का फैसला ले लिया था। बिना किसी दिक्कत के डायवर्शन होना था, लेकिन पेचीदगियां इतनी थीं कि काम नहीं हो रहा था। इसकी शिकायत मिलने पर सीएम ने रिवेन्यू और रजिस्ट्रेशन के आला अफसरों को तलब किया। 
सुनते हैं कि अफसरों ने उन्हें दिक्कतें गिनानी शुरू कीं। सीएम ने उन्हें टोका और शाम तक ऑर्डर निकालने के निर्देश दिए। उन्होंने यह तक कह दिया कि यदि इसमें कोई कानूनी उलझन पैदा कर रोकने की कोशिश की गई, तो उन्हें हटा दिया जाएगा। सीएम के तेवर देख हड़बड़ाए अफसर तुरंत दिक्कतों को दूर करने में जुट गए। शाम तक ऑर्डर भी निकल गया। अब हाल यह है कि छोटे भूखण्डों की रजिस्ट्री तेजी से होने लगी है। एक जानकारी के मुताबिक प्रदेश में अब तक साढ़े 11 हजार रजिस्ट्रियां हो चुकी है और सरकार को करीब 4 सौ करोड़ राजस्व की प्राप्ति हुई है। पिछले कई बरसों से मंदा पड़ा जमीन का कारोबार अब चमक रहा है। लेकिन सरकार और बाजार की कमाई से परे सबसे बड़ी राहत उन छोटे भू-स्वामियों को हुई है जो परिवार की जरूरतों के लिए भी अपनी जमीन नहीं बेच पा रहे थे, पूरे प्रदेश के ऐसे लाखों लोगों की दुआ सरकार को मिल रही है। घर में शादी, इलाज, बच्चों की पढ़ाई, या मकान बनाने के लिए भी लोग अपनी खुद की जमीन नहीं बेच पा रहे थे।

चुनाव और एक नया धंधा
चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, कई किस्म के कारोबार चल निकलेंगे। झंडा-डंडा तो परंपरागत पुराना धंधा हो गया है, अब छत्तीसगढ़ में इस चुनाव में एक संगठन ने एक नए किस्म की ट्रेनिंग देने का दावा किया है, और चुनाव में मदद करने का भी। इसने फेसबुक पर यह प्रचार किया है कि जो लोग सांसद, विधायक बनकर काम करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को एक दिन का राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए दो हजार रूपए देने होंगे, और इसके बाद छांटे हुए लोगों को चुनाव लडऩे के लिए फंड भी जुटाकर दिया जाएगा, दस हजार लोगों को भी साथ में जोड़ा जाएगा। इस संगठन ने अपने बारे में कोई जानकारी नहीं दी है, और फेसबुक पर इसका इश्तहार ही चल रहा है। आगे लोग अपनी समझदारी से फैसला करें।
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Date : 05-Mar-2019

अमित शाह गुरूवार को रायपुर में कार्यकर्ता सम्मेलन में शरीक होंगे। अब विधानसभा चुनाव में करारी हार का नतीजा यह रहा कि कार्यकर्ता अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से मेल-मुलाकात के लिए उत्साहित नहीं दिख रहे हैं। यह नजारा सम्मेलन की तैयारी बैठक में देखने को मिला। इस बैठक में खुद प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी थे। 
सम्मेलन में व्यवस्था और फंड की बात आई, तो फंड मैनेजरों ने हाथ खड़े कर दिए। एक पूर्व मंत्री ने यह कह दिया, कि विधानसभा चुनाव निपटे दो माह ही हुए हैं। तब कौशिक ने कहा कि 15 साल प्रदेश में सरकार थी। सारी व्यवस्थाएं सरकार से हो जाती थी। कार्यकर्ता भी सरकारी हो गए थे। अब सरकार नहीं रह गई है, तो कार्यकर्ताओं को संसाधन जुटाकर व्यवस्था करनी होगी। ऐसा नहीं है कि सिर्फ फंड होने से ही भीड़ जुटती है। भाजपा के कई नेता ऐसे हैं जिनके व्यक्तिगत कार्यक्रम में हजारों की भीड़ जुटी है। 

कुर्सी पर न रहने पर भी...

सोमवार को महाशिवरात्रि के कार्यक्रम में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय के निवास पर हजारों की भीड़ जुटी। प्रेमप्रकाश पिछले 30 साल से अपने निवास पर महाशिवरात्रि की पूजा रखते आए हैं। इस बार भी उनके कार्यक्रम में न सिर्फ दुर्ग लोकसभा बल्कि अन्य जगहों से भी लोग आए। खास बात यह है कि उनका यह कार्यक्रम बिना आमंत्रण के होता है। यानी किसी को न्यौता नहीं दिया जाता। उनके समर्थक-विरोधी भी बिना बुलावे के उनके यहां पूजा में शामिल होने के बहाने मेल-मुलाकात के लिए पहुंचते हैं। प्रेमप्रकाश खुद किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन उनके निवास पर जुटी भीड़ ने एहसास नहीं होने दिया। 
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Date : 04-Mar-2019

राजधानी रायपुर में सरकार की सबसे बड़ी योजना कमल विहार को लेकर अब यह सामने आ रहा है कि सैकड़ों करोड़ डुबा देने के बाद अब उस योजना को बंद किया जा रहा है। आरडीए के तहत बनी इस बड़ी कॉलोनी में लोगों को जमीनें बेची गईं, और यह बेचते समय आरडीए ने जो नक्शा लोगों को दिया, उसमें बहुत से बाग-बगीचे, बहुत से मैदान, और बहुत सी सार्वजनिक सुविधाएं भी थीं। लोगों ने इस भरोसे पर बाजार भाव से खासे महंगे प्लाट खरीदे, और जिन लोगों की जमीनें कमल विहार में गई थीं, उन लोगों को भी वहां पर 35 फीसदी जमीन दी गई थी। लेकिन आज एक कानूनी अड़चन यह खड़ी हो रही है कि अगर इस योजना के प्रकाशित और प्रचारित नक्शे में दिखाए गए हसीन सपने आरडीए पूरे नहीं करता है, तो क्या वह भी रेरा के घेरे में नहीं आ जाएगा? राज्य में एक भूतपूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड रेरा के चेयरमेन हैं, और वहां से बहुत से बिल्डरों, कॉलोनाइजरों को जुर्माना सुनाने, उनकी बिक्री रोकने की खबर आती है क्योंकि उन्होंने ग्राहकों से किए वायदे पूरे नहीं किए। अब आरडीए भी एक कॉलोनाइजर है, और वह अगर आमोद-प्रमोद की जगह का व्यवसायिक उपयोग करके कर्ज पटाना चाहता है, तो यह ग्राहकों के साथ वादाखिलाफी रहेगी, और इस धोखाधड़ी के खिलाफ उस पर बड़ा जुर्माना लग सकता है। जिस आरडीए के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं, उस आरडीए की कमल विहार की धोखाधड़ी को लोग छोड़ देंगे ऐसा लगता नहीं है। रेरा के दायरे में सिर्फ निजी कॉलोनियां और निजी हाऊसिंग-कारोबारी स्कीम नहीं आतीं, उसके दायरे में हाऊसिंग बोर्ड और आरडीए भी आते हैं। हाऊसिंग बोर्ड के बारे में घटिया निर्माण की खबरें रोज आ रही हैं, और किसी शिकायत पर उस पर भी रेरा की कार्रवाई हो सकती है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

खानपान की आजादी

खानपान को लेकर हिन्दुस्तान में अलग-अलग तबकों के बीच टकराव चलते ही रहते हैं। देश के एक सबसे अच्छे अखबार, द हिन्दू, के दफ्तर में तमिल ब्राम्हण मालिकों के मैनेजमेंट ने मांसाहारी टिफिन लाना बंद करवा दिया कि उससे शाकाहारी लोगों को दिक्कत होती है। यह अखबार देश में सहिष्णुता और सहअस्तित्व के सबसे बड़े हिमायतियों में से एक है, और ऐसे में उसका यह कायदा बहुत से लोगों को दकियानूसी, पाखंड लग रहा है। 
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी देश में खानपान की आजादी की सबसे बड़ी वकालत करने वाली है, और इसके नेताओं के बीच एक अटपटी नौबत अभी कल सामने आ गई। रायपुर एयरपोर्ट पर मोतीलाल वोरा, पी.एल. पुनिया, और अखिल भारतीय कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के सचिव हरनाम सिंह बैठे हुए थे। ऐसे में हरनाम सिंह जाकर चिकन खरीदकर ले आए, और खाने लगे। वहीं बैठे हुए मोतीलाल वोरा को यह अंदाज लगा कि यह चिकन है, तो वे कुछ विचलित हुए क्योंकि वे खाना भी प्याज-लहसून के बिना खाते हैं, और मांसाहार इतने करीब से देखने की उनकी आदत नहीं है। ऐसे में उनके भतीजे राजीव वोरा ने भी मीडिया से बयान में इन नेताओं के ऐसे बर्ताव पर कड़ी आपत्ति की, और कहा कि यह सामाजिक संस्कारों के भी खिलाफ है। 
अब दूसरी तरफ कुछ दूसरे मांसाहारी कांग्रेसियों ने अलग से इस बात पर मजाक उड़ाते हुए कहा कि जब वोराजी प्लेन के भीतर बैठते हैं, तो क्या उनके लिए अलग से शाकाहारी सीट रखी जाती है, या बगल की सीट पर बैठे हुए को मांसाहार करने से मना कर दिया जाता है? एक कांग्रेसी ने कुछ और आगे बढ़कर कहा कि मांसाहारियों की भावनाओं को भी शाकाहार से चोट लग सकती है। अब पता नहीं सोनिया-राहुल की जिन दावतों में वोराजी मौजूद रहते होंगे वहां पर मांसाहार रहता होगा या नहीं, या फिर मांसाहारी लोग शाकाहारियों से कुछ दूर बैठकर खाते होंगे? जो भी हो, हिन्दुस्तान में मांसाहार से परहेज करने वाले लोगों के लिए यह एक दिक्कत की बात तो होती ही है कि बगल या सामने चल रहे मांसाहार को देखते हुए वे चैन से बैठ सकें। 
कांग्रेस के कुछ पुराने लोगों को यह याद है कि एक वक्त मध्यप्रदेश में संवेदनशील मुख्यमंत्री कहे जाने वाले अर्जुन सिंह खाने की एक मेज पर मोतीलाल वोरा के साथ मौजूद थे, और उन्होंने अंडे के किसी व्यंजन के बारे में पूछा कि है क्या? बगल के किसी ने धीरे से याद दिलाया कि टेबिल पर ही वोराजी भी हैं, और अर्जुन सिंह ने हाथ के इशारे से अपनी मांग को खारिज कर दिया था। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Mar-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों पिछली भाजपा सरकार के कई अफसरों के खिलाफ कई तरह की जांच, नई कांग्रेस सरकार ने शुरू की है, जिसे लेकर भाजपा बदलापुर का नारा लगा रही है, और कांग्रेस इसे बदलावपुर कह रही है। लेकिन जितने किस्म की जांच आगे बढ़ रही है, उससे यह साफ हो रहा है कि घपले तो भरपेट हुए थे, और अगर भारी भ्रष्टाचार न हुआ होता, तो आज नई सरकार को इतनी जांच का मौका भी न मिला होता। खासकर निर्माण कार्यों वाले विभागों में जो गड़बडिय़ां पकड़ा रही हैं, वे बहुत से अफसरों की नौकरियां खाने वाली हैं। गांव-गांव तक सड़क बनाने वाले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना दफ्तर का हाल भयानक निकल रहा है, और यहां के ठेकेदार पिछले विभागीय मंत्री अजय चंद्राकर के इलाके के थे, उनके पसंदीदा थे, और उनके करीबी थे। आज शुरुआती जांच में ही यह पकड़ में आ रहा है कि अफसरों और ठेकेदारों ने मिलकर भाजपा सरकार के पूरे दौर में फर्जी बिल बना-बनाकर सैकड़ों करोड़ रूपए का संगठित भ्रष्टाचार हर बरस किया। सड़कों की मरम्मत के नाम पर और भी बड़ा भ्रष्टाचार हुआ जिसमें सड़क निर्माण के मुकाबले अधिक धांधली निकली है। आज हालत यह है कि जिन ठेकेदारों की जालसाजी पकड़ में आ रही है, वे दूसरे ठेकेदारों की जालसाजी के मामले लाकर दे रहे हैं, ताकि वे अकेले न डूबें। पूरे प्रदेश में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को पिछली सरकार ने एक ऐसी दुधारू गाय की तरह दुहा, कि उसके थन के तमाम दूध निकल जाने के बाद दुहने की मशीन ने उसके लहू को भी खींच लिया था। भाजपा सरकार के जाते-जाते आखिरी के महीनों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के टेंडरों में सैकड़ों करोड़ का अतिरिक्त भ्रष्टाचार किया गया, ताकि चुनावी खर्च में पहले की बचत खर्च न करनी पड़े, और ताजा-ताजा उगाही काम आ जाए। सरकार बदलने से अगर भ्रष्टाचार की इतनी जांच हो रही है, तो फिर सरकार बदलना अच्छा ही है। लेकिन आज सत्तारूढ़ कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि पांच बरस बाद यही लाईन लिखने की नौबत फिर आ सकती है, और वैसी नौबत से बचना चाहिए। 

उम्मीदवारी के नाजुक मौके पर

कांग्रेस में लोकसभा प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया चल रही है। इसी बीच रायपुर लोकसभा टिकट के बड़े दावेदार महापौर प्रमोद दुबे पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़े हैं। सामान्य सभा की बैठक में प्रॉपर्टी टैक्स पर काफी गरमागरम बहस हुई। निर्दलीय पार्षद मृत्युंजय दुबे ने प्रॉपर्टी टैक्स वसूली के नाम पर लेन-देन का खुलासा किया। यह कहा कि कांग्रेस ने प्रॉपर्टी टैक्स आधा करने का वादा किया था, लेकिन आधा होना तो दूर, पिछले साल से ज्यादा टैक्स लिया जा रहा है। जीआईएस सर्वे के नाम पर अनाप-शनाप मूल्यांकन कर टैक्स लिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कह दिया कि महापौर का फोन जाने पर टैक्स कम भी हो जा रहा है। इसकी आड़ में काफी वसूली हो रही है। 
यह स्पष्ट है कि महापौर का निगम अफसर-कर्मियों से काफी मधुर संबंध हैं। उनके बड़े भाई निगम के कर्मचारी नेता रहे हैं और उनकी अभी भी कर्मियों में अच्छी पैठ है। अब जब निगम कर्मियों के जरिए अवैध वसूली की बात हो रही है, तो इसमें महापौर के खिलाफ आरोपों को बल मिल रहा है। यह अलग  बात है कि सामान्य सभा में वाद-विवाद के बाद प्रॉपर्टी टैक्स पिछले साल के बराबर यथावत रखने का फैसला ले लिया गया, लेकिन सामान्य सभा में बहस का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। और यह पार्टी नेताओं तक पहुंचाई गई है कि महापौर प्रमोद दुबे पाक साफ नहीं रहे हैं। और यह बात भी याद दिलाई जा रही है कि किस तरह विधानसभा चुनाव के मौके पर जब पार्टी ने प्रमोद दुबे को बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ लडऩे को कहा था, तो वे पीछे हट गए थे, और उन्होंने मना कर दिया था। बंद कमरे में प्रमोद और छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी पी.एल. पुनिया के बीच क्या बात हुई यह तो ठीक से नहीं मालूम, लेकिन चर्चा यह है कि पुनिया ने प्रमोद दुबे से कहा था कि वे विधानसभा चुनाव लड़ें, और अगर वे हार भी जाते हैं, तो भी पार्टी लोकसभा में उन्हें उम्मीदवार बनाएगी, इसके बाद भी कहा जाता है कि प्रमोद दुबे तैयार नहीं हुए। विधानसभा के चुनावी नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस का जरा भी मजबूत कोई उम्मीदवार इस माहौल में बृजमोहन को हरा देता। ऐसे में रायपुर शहर की एक प्रतिष्ठापूर्ण सीट पार्टी के हाथ आते-आते रह गई। अब यह बात लोकसभा टिकट के समय कितने आड़े आती है, यह तो पुनिया ही बता सकते हैं।

जमीं पर पांव न पडऩे का नतीजा
रायपुर शहर में भारी लागत से एक स्काईवॉक बनाना शुरू हुआ था जो कि शहर के एक विधायक, और राज्य के सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक, राजेश मूणत का सपना था। कागजों पर ही इसकी लागत बढ़ती चली गई, और एक दानवाकार फौलादी ढांचा ऐसा अधूरा खड़ा हो गया है कि जिसे पूरा करके और रकम डुबाना समझदारी होगी, या उसे तोड़कर हटा देना बेहतर होगा, यह अभी किसी को समझ नहीं आ रहा है। फिलहाल इस फौलादी ढांचे को तोडऩे के फैसले की उम्मीद में एक तबका रोज अखबार देखता है कि क्या उसे कोई काम मिलेगा? लोहे के कबाड़ी टकटकी लगाकर बैठे हैं कि अगर स्काईवॉक को तोड़ा जाए, तो उन्हें कई पीढिय़ों का यह सबसे बड़ा कबाड़-कारोबार मिलेगा। फिलहाल सौ-पचास करोड़ रूपए की लागत वाले इस स्काईवॉक के साथ एक कानूनी दिक्कत भी सामने आ रही है। 
शहर के बीचोंबीच, म्युनिसिपल इलाके के भीतर कई किलोमीटर में फैले ऐसे हवाई रास्ते को बनाने के लिए न तो म्युनिसिपल से नक्शा पास हुआ, और न ही टाऊन एंड कंट्री प्लानिंग से इसकी इजाजत ली गई। इन दो कानूनी जरूरतों को पूरा न करने वाले पानठेलों को भी उठाकर फेंक दिया जाता है, लेकिन शहर के बीच के हिस्से की तस्वीर को पूरी तरह बदल देने वाले इस स्काईवॉक को बिना इजाजत बनते देखकर भी अफसर चुप थे, क्योंकि सरकार की मनमर्जी इसके पीछे थी। जैसा कि लोहे के इस हवाई सड़क का नाम था, स्काईवॉक, उसी नाम के मुताबिक पिछली सरकार के पांव जमीन पर पड़ नहीं रहे थे, और वह आसमान पर ही चल रही थी। कानूनी औपचारिकताओं को पूरा किए बिना कोई शहर पर इतना बड़ा फौलादी निर्माण कर दे, शहर की जिंदगी बदल दे, इसकी कोई दूसरी मिसाल छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में नहीं है। एक बात तय है कि आज की कांग्रेस सरकार इस स्काईवॉक को लेकर कोई भी फैसला करे, आधी आबादी उसके खिलाफ ही रहेगी।

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 02-Mar-2019

सरकार बदलते ही कई संस्थानों में विशेषज्ञों की नियुक्ति से कामकाज में फर्क दिख रहा है। सरकार ने पॉवर कंपनी के साथ-साथ संचालक उद्यानिकी, पर्यावरण संरक्षण मंडल में आईएएस-आईएफएस अफसरों की जगह विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति की है। पॉवर कंपनी में शैलेन्द्र शुक्ला को लाया गया है, जो कि छत्तीसगढ़ के साथ-साथ हरियाणा में भी काम कर चुके हैं। 
सुनते हैं कि विद्युत नियामक  आयोग के कई फैसलों के खिलाफ पॉवर कंपनी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रही है। आयोग में नारायण सिंह के कार्यकाल में काफी अनाप-शनाप फैसले हुए थे। हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में लड़ाई के लिए कई करोड़ रूपए पॉवर कंपनी वकीलों पर फूंक चुकी है। शुक्ला ने इन खर्चों पर लगाम कसने के लिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट के लिए पहल की है। उन्हें आयोग के नए अध्यक्ष डीएस मिश्रा का साथ मिल रहा है। डीएस मिश्रा की साख बहुत अच्छी है और वे खुद भी मितव्यतता के पक्षधर रहे हैं। ऐसे में उम्मीद जगी है कि पॉवर कंपनी की हालत अब पहले से बेहतर होगी। पिछली सरकार में तो कमल विहार योजना पर कोर्ट कचहरी के चक्कर में 13 करोड़ से अधिक खर्च वकीलों पर किए गए थे। 
दूसरा सरकार का बड़ा फैसला उद्यानिकी संचालक के पद पर प्रभाकर सिंह की नियुक्ति का है। उद्यानिकी में ज्यादातर समय आईएफएस अफसर पदस्थ रहे हैं। यह विभाग सरकार के लिए परिवहन विभाग की तरह दुधारू बन गया था। काफी समय बाद यहां विषय विशेषज्ञ के आने से कामकाज का तौर तरीका बदलता दिख रहा है। इसी तरह पर्यावरण संरक्षण मंडल में भी ज्यादातर समय आईएफएस अफसर पदस्थ रहे हैं। काफी समय बाद मंडल के ही सीनियर अफसर आरपी तिवारी को ही सदस्य सचिव बनाकर कामकाज में बदलाव की कोशिश की गई है। 

पैनल में विज का नाम नहीं!
डीजीपी पद के लिए पैनल में डीएम अवस्थी और संजय पिल्ले के साथ रवि सिन्हा का नाम रखा गया। जबकि सिन्हा से सीनियर आरके विज और मुकेश गुप्ता हैं। मुकेश गुप्ता का नाम नहीं होना समझ में आ रहा है, क्योंकि वे निलंबित हैं और उनके खिलाफ कई तरह की जांच चल रही हंै, पर 88 बैच के आईपीएस विज का नाम नहीं होना हैरानी का विषय है। 
सुनते हैं कि विज का नाम जानबूझकर नहीं रखा गया। वजह यह है कि वे झीरमकांड के समय एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) थे। और उनके पास नक्सल इंटेलीजेंस भी था। इस कांड में कांग्रेस के बड़े नेता मारे गए। कांग्रेस के लोग इसके लिए सरकार और बड़े पुलिस अफसरों पर निशाना साधती रही है। खुद भूपेश बघेल इसको लेकर मुखर रहे हैं। चूंकि अब प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आ गई है, तो उस समय के प्रभावशाली अफसरों को निशाने पर लिया जा रहा है। ऐसे में विज भी किनारे लगा दिए गए। यह एक दूसरी बात है कि पुलिस विभाग में आज काम का सबसे अधिक बोझ ढोने वाले आरके विज चौबीस कैरेट साख वाले अफसर हैं, और पिछले बरसों में हजारों करोड़ की खरीदी उनके मातहत होने के बावजूद किसी सप्लायर से एक कप चाय पीना भी उनके नाम नहीं लिखा है। कोई कारोबारी दफ्तर में कोई तोहफा भी देना चाहें, तो वे मना कर देते हैं, उनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है, और केंद्र सरकार-यूपीएससी के इस पैनल में उनका नाम न रहने से बहुत से अच्छे अफसरों को निराशा हुई है। 
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  • जितने कट्स पाकिस्तान ने हिंदुस्तान के एक पायलट के वीडियो में किए हैं, उतने तो पहलाज निहलानी ने अपने कॅरियर में नहीं किए...
  • सर्जिकल स्ट्राइक बवासीर के ऑपरेशन की तरह होता है, डॉक्टर हर किसी को कहता है कि वह कामयाब रहा, और मरीज उसे राज बनाए रखना चाहता है...
  • पंजाब में अफवाह फैली कि कफ्र्यू लगने वाला है, पेट्रोल पंप बंद रहेंगे, अपनी गाडिय़ां फुल करा लो..., सभी लोग गाडिय़ां लेकर पंप पर लाईन में लग गए। एक समझदार बूढ़ा ट्रैफिक जाम में फंसकर चिल्लाया- अरे अहमको, जब कफ्र्यू ही लग जाना है, तो गाडिय़ां क्या अपने आंगन में चलाओगे? घर में ही तो बैठोगे। समझ आते ही पूरी कतार पंप छोड़कर दारू ठेके पर चली गई।
  • बीवी को पैसा और पाकिस्तान को सुबूत जितना भी दो उतना ही कम रहता है...
  • हिंदुस्तान में 15 साल पुरानी कार चलाने पर रोक है, लेकिन 50 साल पुराने फाइटर प्लेन को उड़ाने पर नहीं...
  • पाकिस्तान के दोस्ताना बर्ताव का जवाब देने के लिए आज शाम हिंदुस्तान नवजोत सिंह सिद्धू को रिहा करके करतारपुर कॉरिडोर से पाकिस्तानी फौज के हवाले करेगा।
  • फ्रांस सरकार ने मोदी से पूछा है कि राफेल की डिलीविरी सीधे देनी है, या पाकिस्तान में डेमो देते हुए लाएं?
  • हिंदुस्तान के मर्दों की राहत के लिए एक जरूरी खबर यह है कि... पाकिस्तान में हिना रब्बानी सुरक्षित है...
  • ये जो पाकिस्तान के हवाई हमले देख रहे हो न आप, इसका बटन आप ही ने 2014 में दबाया था...
  • देश असमंजस में है कि दुबारा चुनाव करवाएं, या मोदी को सीधे ही शपथ दिलवा दें...
  • हमले के अगले दिन पाकिस्तान में बैठक हुई, और यह तय पाया गया कि कुछ भी बोलो यार, मनमोहन सिंह देवता आदमी था...
  • स्वच्छ भारत अभियान पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर तक पहुंच गया।
  • बचपन से ही मुझे अच्छा इंसान बनने का शौक था, फिर बचपन गया तो शौक भी चला गया...
  • लेन-देन में जल्दबाजी ने करें, प्रॉपर्टी भरोसा, और रिश्ते अभी और भी सस्ते होंगे।

 


Date : 28-Feb-2019

आखिरकार शिवराम प्रसाद कल्लूरी को ईओडब्ल्यू से हटा दिया गया। कल्लूरी ने नान घोटाले-फोन टैपिंग मामले में अपने सीनियर दबंग अफसर मुकेश गुप्ता और एसपी रजनेश सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का हौसला दिखाया। कल्लूरी हमेशा से विवादों से घिरे रहे हैं। उनके खिलाफ कई तरह की शिकायतें रही हैं। इन सबको गिनाकर भाजपा पूरी जांच पर सवाल खड़े कर रही थी। 

हाईकोर्ट में भी सोमवार को नान प्रकरण पर दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान काफी बहस हुई। एक-दो याचिकाकर्ताओं की तरफ से भी जांच पर सवाल खड़े किए गए। साथ ही एसआईटी के मुखिया कल्लूरी के खिलाफ चल रही जांच का जिक्र किया गया। सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने जांच की स्टेटस रिपोर्ट रखी और कहा कि पूर्वाग्रह से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। 

चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि एसआईटी के प्रमुख के खिलाफ जांच चल रही है। ऐसे में जांच पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकारी वकीलों ने दलील दी कि अब तक की जांच पूरी तरह निष्पक्ष रही है। रिपोर्ट आपके सामने हैं। फिर भी आप चाहते हैं तो सरकार एसआईटी प्रमुख को बदल देगी। चीफ जस्टिस के हामी भरने के बाद देर शाम कल्लूरी को हटाने के आदेश जारी कर दिए गए। उनकी जगह जीपी सिंह की पोस्टिंग की गई। 

सरकार बदलने के बाद जीपी सिंह को पीएचक्यू में बिठा दिया गया था। बाद में उन्हें अंतागढ़ टेपकांड की मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी दी गई। उनके मार्गदर्शन में टेपकांड की जांच तेजी से चल रही है और कई अहम सुराग मिले हैं। अब नान घोटाले की जांच किस तरह करते हैं, यह देखना है। क्योंकि वे पिछली सरकार के पसंदीदा रहे हैं। मुकेश गुप्ता और अमन सिंह से उनकी मित्रता किसी से छिपी नहीं है। खुद रमन सिंह उन्हें काबिल अफसर मानते रहे हैं। और कई बार उनकी कार्यशैली की सराहना कर चुके हैं। लोगों को रमन मंत्रिमंडल की वह बैठक याद है जिसमें बृजमोहन अग्रवाल ने जीपी सिंह के खिलाफ जमकर कहा था, कई किस्म के गंभीर आरोप लगाए थे, और यह भी कहा था कि वे जीपी सिंह से बात करना बंद कर चुके हैं। अब वक्त ने ऐसी पलटी खाई है कि जीपी सिंह एसीबी, ईओडब्ल्यू  के आईजी हैं, और खुद बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ एक जांच वहां खड़ी हुई है। राजनीति और सत्ता के खेल में बड़े अजीब और अविश्वसनीय हमबिस्तर होते रहते हैं।

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Date : 27-Feb-2019

छत्तीसगढ़ में स्थानीय जरूरतों को लेकर पहले कुछ ऐसे मौके भी आए हैं जब किसी एक प्रशासनिक जिले के भीतर एक नया पुलिस जिला और बना दिया गया, और एक कलेक्टर वाले जिले में दो एसपी रहे। ऐसे पुलिस जिलों की जरूरत पहले तो नक्सल इलाकों में हुई, लेकिन अब कुछ शहरी इलाकों में भी ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है। दुर्ग एक ऐसा जिला है जहां दुर्ग और भिलाई, ये दो जुड़वां शहर हैं, दोनों ही घनी आबादी के हैं, और भिलाई में बाहर के कारोबार और लोगों की इतनी अधिक आवाजाही है कि वहां की पुलिस-समस्याएं बहुत अलग हैं, और भारी-भरकम भी हैं। अभी सरकार के सामने किसी ने जुबानी चर्चा में यह राय रखी है कि भिलाई को एक अलग पुलिस जिला बना देना बेहतर होगा क्योंकि वहां की स्थानीय जरूरतें बाकी के दुर्ग जिले से बिल्कुल अलग है। पन्द्रह बरस बाद राज्य में एक नई सरकार आई है जो बहुत से नए फैसले ले रही है, और ऐसे में लोग नई सोच भी सरकार के लोगों के सामने रख रहे हैं। खुद गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने बार-बार अलग तरह से, और नई सोच के साथ काम करने की बात कही है, और परंपरागत पुलिस प्रणाली में पूरी तरह फेरबदल की बात भी कही है। दुर्ग जिला उन्हीं का गृहजिला है, और आने वाले दिनों में देखना है कि क्या इस जिले के पुलिस ढांचे में कोई फेरबदल होता है? 
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Date : 26-Feb-2019

सीएम बनने के बाद भूपेश बघेल दूसरी बार उत्तरप्रदेश के बाराबंकी गए। वे कबीर आश्रम में सत्संग कार्यक्रम में शामिल हुए। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया बाराबंकी से सांसद रहे हैं। उनके फिर लोकसभा चुनाव लडऩे की चर्चा है। बाराबंकी पहले सामान्य सीट थी और यहां से उत्तरप्रदेश के बड़े कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से कुल मिलाकर चार बार सांसद रहे हैं। अब यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है। यहां अभी भी कुर्मी समाज के वोटर निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में भूपेश के बाराबंकी दौरे को कुर्मी वोटरों को कांग्रेस के पाले में लाने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। पुनिया ने छत्तीसगढ़ में जी-तोड़ मेहनत कर कांग्रेस को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाया है, तो उन्हें लोकसभा में पहुंचाने के लिए भूपेश बघेल बाराबंकी दौरा कर रहे हैं, तो इसमें कोई गलत नहीं है। वैसे भी पार्टी हाईकमान भूपेश बघेल को यूपी और बिहार में प्रचार की जिम्मेदारी दे रही है। दोनों ही राज्यों में कुर्मी समाज के वोटरों की तादात अच्छी-खासी है। अब भूपेश बघेल के प्रचार से पार्टी को कितना फायदा मिलता है, यह देखना है।

राकेश के आने पर हैरानी नहीं
पीसीसीएफ (मुख्यालय) के पद पर राकेश चतुर्वेदी की पदस्थापना आदेश जारी हुआ, तो हैरानी नहीं हुई। चर्चा तो यह है कि डीजीपी, सीएस से पहले पीसीसीएफ (मुख्यालय) को ही बदलने का विचार था। नए साल के पहले दिन से ही यह चर्चा चल रही थी। वजह यह है कि 84 बैच के अफसर मुदित कुमार सिंह अपने मातहत वन अफसरों के पसंदीदा नहीं रहे। ज्यादातर वन अफसर उनसे नाखुश थे। वे अकेले अफसर रहे हैं जिन्होंने पिछली सरकार में सबसे ज्यादा मौज की थी। उनके पास एपीसीसीएफ लैंड मैनेजमेंट का प्रभार सबसे ज्यादा समय तक रहा। यह पद वन विभाग में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। खास बात यह है कि पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत होने के बाद भी लैंड मैनेजमेंट का पद काफी समय तक उनके पास रहा। 
सुनते हैं कि भूपेश बघेल विपक्ष के विधायक के रूप में भैंसाकन्हार अवैध खनन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे थे, तो विभाग की तरफ से ओआईसी मुदित कुमार सिंह ही थे। एक तरह से वे पिछली सरकार के बेहद करीब थे। इस दौरान विकास यात्रा और अन्य प्रयोजन में लघु वनोपज के माध्यम से काफी कुछ खेल खेला गया। तब मुदित ही एमडी के पद पर थे। सरकार बदलने के बाद आधा दर्जन से अधिक अफसर प्रतिनियुक्ति से वापस वन मुख्यालय लौटे, तो उनके पास कोई काम नहीं था। मुदित ने अपने तरफ से इन सभी के लिए कोई काम आबंटित करने कोई ठोस प्रयास नहीं किया। दो महीने बाद उनके हटने के साथ वन मुख्यालय में आए अफसरों का कार्य विभाजन किया गया। उनकी यह उदासीनता उन सहकर्मी आलाअफसरों पर भारी पड़ी जो कि अरण्य भवन में एक-एक कमरे में तीन-तीन लोग बैठकर किसी काम मिलने की राह देख रहे थे। दूसरी तरफ राकेश चतुर्वेदी यारबाज अफसर माने जाते हैं जो आसपास सभी लोगों की फिक्र करते हैं, सबकी मदद करते हैं।
नए पीसीसीएफ (मुख्यालय) राकेश चतुर्वेदी से भी सीनियर शिरीष अग्रवाल और कुछ अन्य अफसर हैं, लेकिन वे अगले दो-चार महीनों में रिटायर हो जाएंगे। ऐसे में सोच-समझकर राकेश चतुर्वेदी का नाम तय किया गया। राकेश छत्तीसगढ़ के रहवासी हैं और स्कूल-कॉलेज की शिक्षा रायपुर में ही प्राप्त की है। कुछ विवादों को छोड़ दें, तो उन्हें काबिल अफसर माना जाता है। उनके ऊपर जो तोहमतें लगी थीं, उन सबसे वे पाकसाफ निकल गए। अब इस सरकार के चुनौतीपूर्ण घोषणापत्र से में राकेश पर वनोपज आधारित उद्योग लगाने की महती जिम्मेदारी है, जो कि सरकार की प्राथमिकता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 25-Feb-2019

विधानसभा में जहां भाजपा के विधायकों ने नरवा योजना को लेकर सवाल खड़े किए, तो बैस की राय उनसे एकदम अलग रही। उन्होंने इस योजना को काफी अहम बताया और कहा कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा। कई अन्य मसलों पर भी भूपेश सरकार को लेकर भाजपा नेता बंटते दिखे। एसआईटी के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट गए हैं, तो उनके ही विधायक दल के तीन सदस्य मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एसआईटी जांच के लिए बधाई देकर आ गए। भूपेश बघेल के नाम पर भाजपा नेताओं के बीच वैसे भी दो अघोषित खेमे बन गए हैं। भाजपा के ताकतवर विधायक बृजमोहन अग्रवाल अकेले ऐसे पिछले मंत्री हैं जो कि अब तक अपने उसी सरकारी बंगले में बने हुए हैं। कुछ कारणों से उन्हें वही बंगला दिया भी जा सकता है, और अब तक नए मंत्री रूद्र गुरू को इस मकान में जाने की कोई संभावना दिख नहीं रही है। भाजपा विधायकों के बीच रमन सिंह और धरम कौशिक ही एक तरफ रह गए हैं।

माहौल अडानी के खिलाफ
प्रदेश में अडानी समूह के लिए अनुकूल हालात नहीं हंै। इस समूह का प्रदेश में खनन क्षेत्र में एकाधिकार है। इन सबके बावजूद उद्योग मंत्री ने तो एक कदम आगे जाकर यहां तक कह दिया, कि बैलाडीला में अडानी समूह को घुसने नहीं देंगे। आमतौर पर सरकारें राज्य में निवेश के लिए उद्योग समूहों का स्वागत करती हैं, ऐसे में देश के इस बड़े औद्योगिक घराने के खिलाफ सार्वजनिक खुली नाराजगी को लेकर चर्चा ज्यादा हो रही है। 
सुनते हैं कि अडानी के खिलाफ सरकार की नाराजगी प्रशासनिक न होकर राजनीतिक ज्यादा है। सर्वविदित है कि अडानी समूह भाजपा के ज्यादा करीब माना जाता है। चर्चा तो यह है कि दिल्ली में पार्टी का कोष संभालने वाले कांग्रेस के नेता अडानी समूह से पांच राज्यों के चुनाव के लिए फंड की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन फूटी कौड़ी नहीं मिल पाई। उल्टे राज्य में सीएम पद के लिए अडानी समूह की अपनी अलग पसंद रही है। इन सबको देखते हुए अडानी समूह से नाराजगी बेवजह नहीं दिखती है। अब लोकसभा चुनाव होने हैं ऐसे में अडानी समूह से उम्मीद भी ज्यादा बड़ी दिख रही है। यदि सबकुछ ठीक ठाक नहीं हुआ तो राज्य में इस बड़े घराने के लिए कारोबार में दिक्कत बढ़ सकती है। 

एक ही नाम चढ़ा हुआ था
राज्य में सरकार तो बदल गई है, लेकिन लोगों की जुबान पूरी तरह नहीं बदल पाई है। रमन सिंह 15 साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे। लिहाजा, अभी भी सामान्य बोलचाल में कई बार मुख्यमंत्री के रूप में रमन सिंह का नाम आ जाता है। पिछले दिनों धरसींवा के ग्राम पथरी में खूबचंद बघेल की पुण्यतिथि का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस एक मंच पर थे। बैस ने अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री डॉक्टर... बोल गए फिर उन्होंने गलती सुधार भूपेश बघेल का नाम लिया। उन्होंने गलती के लिए क्षमा भी मांगी और कहा कि 15 साल एक ही नाम था इसलिए चूक हो गई। 
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Date : 24-Feb-2019

जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था, तब छत्तीसगढ़ के एक आदमी पर कुछ परेशानी आई, जो कि सरकार से जुड़ी हुई थी। अपने एक परिचित पत्रकार से भोपाल में बात की, तो उनका कहना था कि मुख्यमंत्री से बात करके सब ठीक करवा लेंगे। उनका आत्मविश्वास था कि मुख्यमंत्री जो चाहे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि लड़के को लड़की, और लड़की को लड़का बनाना ही मुख्यमंत्री के हाथ में नहीं रहता, बाकी तो हर काम मुख्यमंत्री कर सकते हैं। यह बात दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए हुई थी, और बाद में वह समस्या निपट भी गई। भारत जैसे लोकतंत्र में किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री किसी भी समस्या को निपटा सकते हैं यह तो सभी लोगों का देखा हुआ है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे यह लगता है कि पिछली रमन सिंह सरकार में मुख्यमंत्री के आसपास के लोग समस्याओं को तो निपटाने की ताकत रखते ही थे, वे लोगों को निपटाने की भी ताकत रखते थे, और लोगों को बुरी तरह निपटाया भी था। लेकिन पिछली सरकार की मिसालें इस सरकार के लोगों के भी काम आनी चाहिए कि सरकार की ताकत जब लोगों के इस काम आती है कि वे अपने विरोधियों को किस तरह निपटाएं, तो सरकारी ढांचे में गहरे पैठी हुई यह ताकत अगली सरकारों के लिए भी ऐसा ही एक खतरा रखती भी है। पिछली सरकार के बड़े-बड़े अफसर आज अपने बचे हुए कार्यकाल की बड़ी कुर्सियों को छोड़कर जिस तरह कोर्ट-कचहरी और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं, वह सब कुछ नेताओं और अफसरों के लिए एक बड़ा कीमती सबक भी होना चाहिए। 

इस बार फिर चर्चा में...
मीडिया के तो एक वक्त हाथ-पांव होते थे, लेकिन सोशल मीडिया बिल्कुल भी बिना हाथ-पांव का होता है, और उस पर चर्चा कब, कैसे, कहां तक पहुंचती है, यह समझ पाना बड़ा मुश्किल होता है। मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग का नाम विधानसभा चुनाव के पहले बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ उम्मीदवारी के लिए चर्चा में आया, और वह महज चर्चा नहीं थी, क्योंकि कई पुराने पत्रकार साथियों, और कई नए कांग्रेसी साथियों के साथ रूचिर चुनाव प्रचार के पहले जनसंपर्क पर निकल भी पड़े थे। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि उनकी जगह टिकट एक ऐसे उम्मीदवार को मिली जिसके बारे में यह कहा गया कि वह बृजमोहन अग्रवाल की असली पसंद था, और टिकट पक्की होने की खबर दिल्ली से कांग्रेस के लोगों ने उम्मीदवार को बाद में दी, बृजमोहन को पहले दी। चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस और भाजपा में अब हर कोई यही कहते दिखते हैं कि अगर रूचिर को टिकट मिली होती तो बृजमोहन निपट गए होते। अब एक बार फिर रूचिर का नाम लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार के रूप में चर्चा में घूमना शुरू हुआ है, लेकिन आगे क्या होगा इसके बारे में कांग्रेस पार्टी में एक पुरानी लाईन इस्तेमाल होती है कि कांग्रेस की टिकट और मौत का कोई भरोसा नहीं होता, कब किसे आ जाए।  

गौसेवा का ऐसा मेवा!
छत्तीसगढ़ में दुर्ग, राजनांदगांव सहित कई ऐसे जिले हैं जहां पुलिस और प्रशासन के अफसरों को एक बड़ी डेयरी की तरफ से तोहफे में गाय मिल जाती हैं। अब अफसर हैं तो बड़े-बड़े बंगले रहते ही हैं, वहां पर घास या चारा उगाने के लिए अनगिनत अर्दली, सिपाही, या मजदूर भी रहते हैं। ऐसे में अफसरों के लिए दूध का कारोबार बड़े फायदे रहता है। परिवार तो दूधों नहाता ही है, सरकारी नौकर जाकर दूध बेच भी आते हैं। अभी दुर्ग जिले से एक पुलिस अफसर का पहले तो दंतेवाड़ा तबादला हुआ जो कि इस राज्य में आमतौर पर सजा की तरह होता है। जबकि इस अफसर की पत्नी पुलिस की नौकरी में ही दुर्ग में ही कायम रही। 
आमतौर पर पति-पत्नी को एक शहर में साथ रखा जाता है। इसके बाद दो दिनों के भीतर इस अफसर का कालेपानी की इस सजा से ट्रांसपोर्ट विभाग के मजे में तबादला हो गया, और राज्य की सबसे कमाऊ समझी जाने वाली एक कुर्सी पर यह अफसर पहुंच गया। अब इन दो दिनों में वह गाय कन्फ्यूज हो गई है जो कि दुर्ग से पहले तो दंतेवाड़ा के लिए चल पड़ी थी, और अब वहां से नया रायपुर के लिए उसे मुडऩा पड़ा है। यह रहस्य समझने की कई लोग कोशिश कर रहे हैं कि गौमाता की सेवा का ऐसा नतीजा अगर निकलता है तो वे भी जाकर डेयरी मालिक से एक गाय ले आएं, और सिपाहियों को लगाकर सेवा भी करें, और मेवा भी पाएं। 
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