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क्या महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा नींद की जरूरत है?
29-Oct-2025 9:51 PM
क्या महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा नींद की जरूरत है?

कई महिलाओं का लगता है कि आठ घंटे की नींद उनके लिए काफी नहीं है। इसकी वजह हार्मोन, परिवार या सामाजिक दबाव वजह कुछ भी हो सकता है। साइंस भी सहमत है कि महिलाओं को वाकई ज्यादा नींद की जरूरत है।

 डॉयचे वैले पर कौकब शायरानी का लिखा-

अच्छी नींद हर इंसान की जरूरत है, लेकिन हर इंसान एक तरीके से नहीं सोता। रिसर्च बताते हैं कि ना केवल महिलाओं के सोने का तरीका पुरुषों से काफी अलग होता है, बल्कि पुरुषों के मुकाबले उन्हें ज्यादा नींद की भी जरूरत है।

डीडब्ल्यू ने दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं से बात की। कमोबेश सभी महिलाओं ने बताया कि वे जितना सो पाती हैं, वह उन्हें पर्याप्त महसूस नहीं होता। उन्होंने यह भी बताया कि कथित ‘स्लीप डेट’ का उनपर क्या असर पड़ता है। आपके शरीर को जितनी नींद चाहिए और आप जितनी देर सो पाती हैं, उनके बीच का कुल जमा अंतर ‘स्लीप डेट’ कहा जाता है।

दफ्तर में देर रात तक काम करने के बाद ऑफिस की ही एक मेज पर सिर टिकाकर सो रही महिला। सांकेतिक तस्वीर। दफ्तर में देर रात तक काम करने के बाद ऑफिस की ही एक मेज पर सिर टिकाकर सो रही महिला। सांकेतिक तस्वीर।

सना अखंद, न्यूयॉर्क की एक टेक कंपनी में नौकरी करती थीं। वह एचआर विभाग की प्रमुख थीं। सना ने बताया कि नौकरी करते हुए वह हमेशा थकान महसूस करती थीं। उन्हें समझ आया कि इससे उनकी मानसिक सेहत पर भी असर पड़ रहा है। आखिरकार, थक-हारकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

सना ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘मैं हर रात वाइन लेकर टीवी के सामने बैठ जाती थी और वहीं सो जाती थी। मैं बहुत थक चुकी थी। मुझमें बिलकुल भी ताकत नहीं बची थी।’

सेहतमंद महसूस करने के लिए अब सना नींद को सबसे ज्यादा अहमियत देती हैं। उन्होंने बच्चे ना करने का फैसला किया और अच्छी नींद भी इसकी एक वजह है। वह हर रात 10 बजे सो जाती हैं और नौ घंटे की नींद लेती हैं। सना बताती हैं कि वह अपनी नींद से कोई समझौता नहीं कर सकती हैं, ‘मैं हर सुबह आठ बजे उठती हूं। मेरे शरीर को इसकी जरूरत है।’

इस बारे में विज्ञान क्या कहता है?

औसतन, महिलाएं हर रात पुरुषों के मुकाबले करीब 11 से 13 मिनट ज्यादा सोती हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार, महिलाओं को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के मुश्किल कामों, जैसे कि एक साथ कई काम करना, भावनाओं को नियंत्रित करना या हार्मोनल संतुलन बनाना और पीरियड्स वगैरह में खुद को संभालने के लिए 20 मिनट तक की अतिरिक्त नींद चाहिए।

पीरियड्स के शुरुआती आधे हिस्से (फॉलिक्युलर फेज) में एस्ट्रोजन का स्तर बढऩे से नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है। साथ ही, आरईएम नींद यानी वह अवस्था जिसमें सपने आते हैं और याददाश्त, भावनाएं मजबूत होती हैं, वह भी बढ़ जाती है।

पीरियड्स के दूसरे हिस्से, यानी ल्यूटियल फेज में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ जाता है। यह महिलाओं को सुस्त और उनींदा महसूस कराता है। मगर विरोधाभास यह दिखता है कि इस दौरान नींद की गुणवत्ता घट जाती है। बार-बार नींद टूटती है और गहरी नींद में करीब 27 फीसदी तक की कमी आ जाती है।

बॉडी इंटेलिजेंस कोच, शांतनी मूर ने डीडब्ल्यू को बताया कि वह अपने पीरियड्स और नींद के अनुसार अपनी दिनचर्या को तय करती हैं।

उन्होंने कहा, ‘मैंने बहुत सोच-समझकर अपनी जिंदगी में यह तरीका अपनाया है। जब मेरी नींद पूरी नहीं होती है, तो बहुत थकान और बेचैन महसूस होती है। इससे ध्यान लगाने में दिक्कत होती है। गलत फैसले लेने लगती हूं। अपने पार्टनर को झिडक़ देती हूं। उन चीजों के लिए 'हां' कहने लगती हूं, जिसके लिए नहीं कहना चाहिए था।’

नींद, परिवार, काम, घर के काम  और फिर नींद

करांची की रहने वालीं सबरीना (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनकी थकान की सबसे बड़ी वजह रोजमर्रा की जिम्मेदारियां और काम है। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि उन्हें केवल छह से सात घंटे की ही नींद मिल पाती है। वह बताती हैं, ‘मेरे दिमाग को पूरे हफ्ते ताजगी महसूस करने के लिए कम-से-कम 12 घंटे की नींद चाहिए। यह औसतन आठ घंटे की नींद से ज्यादा अवधि है।’

जब उनकी 12 घंटे की नींद पूरी नहीं होती, तो वह झपकी लेकर उसकी कमी पूरी करने की कोशिश करती हैं। कई बार ये झपकियां मिनटों की जगह घंटों में बदल जाती है। वह बताती हैं, ‘30 मिनट की झपकी चार घंटे की नींद हो जाती है।’

सबरीना बताती हैं, ‘मुझे सिर्फ ऑफिस के काम से ही थकावट नहीं नहीं होती, बल्कि लगातार चल रहा मानसिक और घरेलू काम मुझे थकाता है। सुबह कपड़े प्रेस करने से लेकर दोपहर का खाना बनाने और फिर रात का खाना तैयार करते-करते बहुत थक जाती हूं।’

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई व्यक्तिगत मसला नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या है।

एमर्सन विकवायर, अमेरिकी की मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में नींद विशेषज्ञ हैं। वह बताते हैं, ‘पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ‘शिफ्ट वर्क डिसऑर्डर’ ज्यादा होता है। वह जितना गैर-परंपरागत शिफ्टों में काम करती हैं, उतना ही नकारात्मक असर भी झेलती हैं।’ उन्होंने आगे बताया, ‘अगर सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे को काम का आम समय माना जाए, तो महिलाएं इससे कहीं अधिक काम करती हैं।’

काम के लचीले घंटों से मदद मिलेगी?

क्लारा पाउला, बर्लिन में रहती हैं।  उन्होंने नींद पूरी करने के लिए फ्रीलांसिंग काम में समाधान खोजा। क्लारा ने डीडब्ल्यू को बताया कि काम के घंटों के लचीलेपन की वजह से वह जरूरत के मुताबिक ज्यादा सो पाती हैं, ‘मैं अब सात, आठ, यहां तक कि नौ घंटे भी सो पाती हूं। कोई मुझसे यह कहने वाला नहीं है कि मुझे कंप्यूटर के आगे बैठना होगा। मैं बाद में काम शुरू करती हूं, बीच-बीच में ब्रेक लेती हूं और फुर्ती से काम खत्म करती हूं।’

मगर सवाल केवल यह नहीं कि आप कितने घंटे सोती हैं, नींद की गुणवत्ता भी अहम है। रिसर्च बताते हैं कि महिलाओं को अपनी शारीरिक बनावट के कारण गहरी नींद की जरूरत है।

जूलियो फर्नांडीज-मेंडोजा, अमेरिका के 'पेन स्टेट हेल्थ' में क्लिनिकल रिसर्चर और नींद मनोवैज्ञानिक हैं। वह इस पक्ष को रेखांकित करते हुए बताते हैं, ‘इस बात से आशय है एन3 स्तर की ज्यादा नींद, नॉन-आरईएम नींद का सबसे गहरा स्तर और साथ ही, आरईएम नींद की भी अधिक आवश्यकता।’

यहां तक कि लैब में स्वस्थ महिलाओं और पुरुषों पर हुई स्टडीज में भी पाया गया कि महिलाएं, पुरुषों से ज्यादा समय तक और गहरी नींद में सोती हैं। इसी संदर्भ में फर्नांडीज-मेंडोजा बताते हैं, ‘यह इस विचार का आधार है कि शायद जैविक रूप से महिलाओं को ज्यादा नींद की जरूरत होती है।’

जरूरत का यह पक्ष शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा क्षमता से भी जुड़ा हो सकता है। जैसा कि फर्नांडीज-मेंडोजा बताते हैं, ‘यह बात तर्कसंगत लगती है कि जब एक शरीर नई जिंदगी देने के हिसाब से बना है, तो उसकी सुरक्षा होनी चाहिए। गर्भावस्था के दौरान भी महिलाओं को इतना सक्षम रहना होता है कि वे ठीक से सो सकें और सामान्य रूप से काम कर सकें।’

हालांकि, इस स्वाभाविक लचीलेपन के बावजूद महिलाओं में अनिद्रा (इंसोम्निया) के लक्षण पुरुषों की तुलना में लगभग दोगुने पाए जाते हैं। फर्नांडीज-मेंडोजा बताते हैं, ‘यह समस्या किशोरावस्था से शुरू हो जाती है। लगभग 11 से 12 साल की उम्र से ही लड़कियां, लडक़ों की तुलना में नींद से जुड़ी ज्यादा परेशानियों की शिकायत करने लगती हैं। यह रुझान वयस्क होने पर भी जारी रहता है।’

क्या वीकेंड पर ज्यादा सोना मददगार हो सकता है?

फर्नांडीज-मेंडोजा के अनुसार, ‘वीकेंड पर देर तक सोने से आप फिर से तरोताजा महसूस कर सकते हैं। आप नींद की कसर पूरी कर लेते हैं।’

इसका मतलब यह नहीं है कि वीकेंड पर थोड़ा ज्यादा सो लेने से आपका शरीर पूरी तरह ठीक हो जाएगा। फर्नांडीज-मेंडोजा बताते हैं, ‘इससे सुस्ती और उनींदापन दूर हो सकता है, लेकिन शरीर और सेहत को जो नुकसान पहुंचा है वो शायद खत्म ना हो।’

अध्ययन बताते हैं कि ध्यान केंद्रित करने और तुरंत प्रतिक्रिया देने जैसी दिमागी क्षमताओं को फिर से सामान्य होने में काफी अधिक समय लगता है। (dw.comhi)


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