विचार / लेख
बिहार विधानसभा चुनाव में ऐसे कई मुद्दे हैं जिनकी मालूमात तो अरसे से है, लेकिन हल अब तक नहीं निकला. पलायन और रोजगार इनमें से सबसे अहम मुद्दे हैं, लेकिन क्या इनका असर इस बार के चुनाव पर दिखेगा?
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट –
बिहार विधानसभा चुनाव के बीच छठ महापर्व के मौके पर घर लौट रहे और फिर यहां से वापस जाने वाले लोगों की परेशानियों ने एक बार फिर पलायन का सच उजागर किया है. गुजरात का उधना रेलवे स्टेशन हो या देश के किसी भी हिस्से से बिहार आने वाली रेलगाड़ियों-बसों में जगह लेने के लिए लोगों की लंबी कतारें हों, इन्होंने एक बार फिर कोरोना काल की याद ताजा कर दी. दावे जो भी किए जा रहे हों, मगर सच यही है कि आज भी रेलगाड़ियों-बसों में भर-भरकर लोग रोजगार की तलाश में अपने घरों से सैकड़ों मील दूर जा रहे हैं. कोरोना काल में की गई तमाम घोषणाएं भले ही कुछ समय तक धरातल पर उतरती दिखीं, लेकिन बाद में धराशायी हो गईं.
पलायन: अरसे पुराना नासूर
पलायन बिहार की एक स्थायी समस्या बन चुकी है. पिछले चुनावों की तरह इस बार भी पलायन एक बड़ा मुद्दा है. राजनीतिक विश्लेषक एस.के. सिंह कहते हैं, ‘‘जनसुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर इस चुनाव में क्या करेंगे, यह तो 14 नवंबर को पता चलेगा. पिछले विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने नौकरी को अहम मुद्दा बना दिया था. उसी तरह इस बार प्रशांत किशोर की बच्चों का चेहरा देखकर वोट करने की बार-बार की गई अपील ने सभी पार्टियों को पलायन और इससे जुड़े रोजगार जैसे मुद्दों पर मुखर होने के लिए मजबूर कर दिया है. मुझे लगता है, यह युवाओं के लिए अवश्य ही निर्णायक मुद्दा होगा.''
प्रशांत किशोर तो पिछले तीन साल से गांव-गांव घूमकर लोगों को यह समझा रहे हैं कि जब तक आप जात-पात से इतर अपने बच्चों का मुंह देखकर वोट नहीं डालेंगे, तब तक स्थिति यथावत ही रहेगी. वह लोगों से कहते रहे हैं कि दस-पंद्रह हजार रुपये की खातिर बच्चे घर से दूर मेहनत-मजदूरी कर दूसरे शहरों को संवारने में लगे रहेंगे, लेकिन इससे उनका कायाकल्प नहीं होगा.
प्रशांत किशोर अपने चुनाव अभियान में जनता से कहते रहे हैं कि उनके वोट लेकर फैक्ट्री गुजरात में लगाई जा रही है और बिहारी बच्चे मजदूरी के लिए वहां जा रहे हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव पर दूसरे राज्यों में रह रहे लोगों की नजर तो है ही, विदेशों में रह रहे प्रवासी भी गंभीरता से स्थिति का आकलन कर रहे हैं. कनाडा में बिहार एसोसिएशन ऑफ कनाडा नामक प्रवासियों के संगठन के सदस्यों का कहना है कि अवसर मिले, तो वे भी बिहार में ही नौकरी करना चाहेंगे. इससे जुड़ी नेहा शुभम कहती हैं, ‘‘वाकई, हम घर लौटना चाहते हैं, लेकिन रोजगार आज भी हमारे लिए बड़ा मुद्दा है. लोगों से हम अपील भी कर रहे हैं कि वे शिक्षित और ईमानदार प्रत्याशियों को ही चुनें.''
पलायन की टीस पड़ रही भारी
मौका चुनाव का है, तो सत्तारूढ़ पार्टी भी रोजगार के लिए किए गए अपने कार्यों को गिना रही है. साथ ही, नई घोषणाएं भी की गईं. विपक्षी दल भी वादे कर रहे हैं. चुनावी सभा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हो या कांग्रेस नेता राहुल गांधी की, दोनों ही रोजगार की बात कर रहे हैं. बीते दिनों पीएम मोदी ने नमो ऐप के जरिए युवाओं से संवाद में कहा कि बिहार का युवा अब बाहर नहीं जाएगा, बिहार में ही रहकर नाम कमाएगा. मोदी ने कहा कि इसके लिए सरकार प्रदेश के हर जिले में स्टार्ट अप हब विकसित करेगी, जिससे युवाओं को पलायन नहीं करना पड़ेगा और वे अपने ही राज्य में आजीविका कमा सकेंगे.
राहुल गांधी ने भी नालंदा व शेखपुरा जिले में अपनी जनसभा में कहा, "बिहार के लोग जहां भी जाते हैं, अपनी मेहनत से वहां की तकदीर बदल देते हैं, लेकिन बिहार की तकदीर नहीं बदल रही. पिछले 20 सालों में बीजेपी-जेडीयू ने हर अवसर छीनकर उन्हें या तो मजबूर बनाया या फिर मजदूर."
प्रशांत किशोर अपने चुनाव अभियान में जनता से कहते रहे हैं कि उनके वोट लेकर फैक्ट्री गुजरात में लगाई जा रही है और बिहारी बच्चे मजदूरी के लिए वहां जा रहे हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव पर दूसरे राज्यों में रह रहे लोगों की नजर तो है ही, विदेशों में रह रहे प्रवासी भी गंभीरता से स्थिति का आकलन कर रहे हैं. कनाडा में बिहार एसोसिएशन ऑफ कनाडा नामक प्रवासियों के संगठन के सदस्यों का कहना है कि अवसर मिले, तो वे भी बिहार में ही नौकरी करना चाहेंगे. इससे जुड़ी नेहा शुभम कहती हैं, ‘‘वाकई, हम घर लौटना चाहते हैं, लेकिन रोजगार आज भी हमारे लिए बड़ा मुद्दा है. लोगों से हम अपील भी कर रहे हैं कि वे शिक्षित और ईमानदार प्रत्याशियों को ही चुनें.''
पलायन की टीस पड़ रही भारी
मौका चुनाव का है, तो सत्तारूढ़ पार्टी भी रोजगार के लिए किए गए अपने कार्यों को गिना रही है. साथ ही, नई घोषणाएं भी की गईं. विपक्षी दल भी वादे कर रहे हैं. चुनावी सभा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हो या कांग्रेस नेता राहुल गांधी की, दोनों ही रोजगार की बात कर रहे हैं. बीते दिनों पीएम मोदी ने नमो ऐप के जरिए युवाओं से संवाद में कहा कि बिहार का युवा अब बाहर नहीं जाएगा, बिहार में ही रहकर नाम कमाएगा. मोदी ने कहा कि इसके लिए सरकार प्रदेश के हर जिले में स्टार्ट अप हब विकसित करेगी, जिससे युवाओं को पलायन नहीं करना पड़ेगा और वे अपने ही राज्य में आजीविका कमा सकेंगे.
राहुल गांधी ने भी नालंदा व शेखपुरा जिले में अपनी जनसभा में कहा, "बिहार के लोग जहां भी जाते हैं, अपनी मेहनत से वहां की तकदीर बदल देते हैं, लेकिन बिहार की तकदीर नहीं बदल रही. पिछले 20 सालों में बीजेपी-जेडीयू ने हर अवसर छीनकर उन्हें या तो मजबूर बनाया या फिर मजदूर."
नौकरी व रोजगार पर वादों की बहार
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एनडीए ने 31 अक्टूबर को अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया. इसमें 25 घोषणाएं की गई हैं. इनमें किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों के लिए रेवड़ियां तो हैं ही, नौकरी-रोजगार के उपक्रम की सर्वाधिक चर्चा भी है. इसमें एक करोड़ सरकारी नौकरी-रोजगार, हर जिले में मेगा स्किल सेंटर, प्रत्येक जिले में फैक्ट्री व 10 नए औद्योगिक पार्कों का निर्माण, 100 एमएसएमई पार्क व 50,000 से अधिक कुटीर उद्यम, सेमी कंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग पार्क की स्थापना व महिला रोजगार योजना से महिलाओं को दो लाख तक की सहायता राशि देने की बातें कही गई हैं.
इसी तरह महागठबंधन ने 'तेजस्वी का प्रण' नाम से जारी घोषणा पत्र में महिलाओं, किसानों तथा अन्य वर्गों के अलावा खासतौर पर युवा वोटरों को साधने के उद्देश्य से एक बार फिर नौकरी के अपने पुराने वादे को ही दोहराया है. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दस लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. इस बार इससे एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने 20 महीने में हर घर में एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी का वादा किया है.
अर्थशास्त्र के अवकाश प्राप्त व्याख्याता अविनाश के.पांडेय कहते हैं, ‘‘इस बार के चुनाव में युवा मतदाताओं की संख्या करीब 1.63 करोड़ है. ये 18 से 35 साल के आयुवर्ग में हैं. इनके लिए नौकरी अहम मुद्दा है. तेजस्वी यादव ने जिस तरह से घोषणा की है, उस तरह तो करीब 2.8 करोड़ सरकारी नौकरी उन्हें देनी होंगी. इसके लिए इतनी भारी संख्या में नौकरी और वेतन की राशि कहां से लाएंगे, यह तो यक्ष प्रश्न ही है.''
राजनीतिक विश्लेषक रेखांकित करते हैं कि चुनावी घोषणाएं जनता को लुभाती तो हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझने की जरूरत है कि क्या ये संभव हैं और अतीत का रिकॉर्ड क्या बताता है.
प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं सबीना कहती हैं, ‘‘सरकारी नौकरी के लिए बिहार में होने वाली परीक्षाओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा नहीं है. पेपर लीक, समय पर रिजल्ट नहीं निकलना तो आम बात है. जब अभ्यर्थी इसका विरोध करते हैं, तो किसी न किसी बहाने उनपर लाठियां चलाई जाती हैं. मुझे लगता है इस बार युवा इन बातों को ध्यान में रखकर ही वोटिंग करेंगे.''
वहीं, राजनीतिक समीक्षक समीर सौरभ इस विषय पर कहते हैं, "अगर लोगों ने जातीय समीकरण को देखने की जगह बेरोजगारी या पलायन के मुद्दे पर वोट किया होता, तो बीते पांच सालों में आंशिक सुधार ही सही लेकिन कुछ तो देखने को मिलता.
नौकरी व रोजगार पर वादों की बहार
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एनडीए ने 31 अक्टूबर को अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया. इसमें 25 घोषणाएं की गई हैं. इनमें किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों के लिए रेवड़ियां तो हैं ही, नौकरी-रोजगार के उपक्रम की सर्वाधिक चर्चा भी है. इसमें एक करोड़ सरकारी नौकरी-रोजगार, हर जिले में मेगा स्किल सेंटर, प्रत्येक जिले में फैक्ट्री व 10 नए औद्योगिक पार्कों का निर्माण, 100 एमएसएमई पार्क व 50,000 से अधिक कुटीर उद्यम, सेमी कंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग पार्क की स्थापना व महिला रोजगार योजना से महिलाओं को दो लाख तक की सहायता राशि देने की बातें कही गई हैं.
इसी तरह महागठबंधन ने 'तेजस्वी का प्रण' नाम से जारी घोषणा पत्र में महिलाओं, किसानों तथा अन्य वर्गों के अलावा खासतौर पर युवा वोटरों को साधने के उद्देश्य से एक बार फिर नौकरी के अपने पुराने वादे को ही दोहराया है. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दस लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. इस बार इससे एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने 20 महीने में हर घर में एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी का वादा किया है.
अर्थशास्त्र के अवकाश प्राप्त व्याख्याता अविनाश के.पांडेय कहते हैं, ‘‘इस बार के चुनाव में युवा मतदाताओं की संख्या करीब 1.63 करोड़ है. ये 18 से 35 साल के आयुवर्ग में हैं. इनके लिए नौकरी अहम मुद्दा है. तेजस्वी यादव ने जिस तरह से घोषणा की है, उस तरह तो करीब 2.8 करोड़ सरकारी नौकरी उन्हें देनी होंगी. इसके लिए इतनी भारी संख्या में नौकरी और वेतन की राशि कहां से लाएंगे, यह तो यक्ष प्रश्न ही है.''
राजनीतिक विश्लेषक रेखांकित करते हैं कि चुनावी घोषणाएं जनता को लुभाती तो हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझने की जरूरत है कि क्या ये संभव हैं और अतीत का रिकॉर्ड क्या बताता है.
प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं सबीना कहती हैं, ‘‘सरकारी नौकरी के लिए बिहार में होने वाली परीक्षाओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा नहीं है. पेपर लीक, समय पर रिजल्ट नहीं निकलना तो आम बात है. जब अभ्यर्थी इसका विरोध करते हैं, तो किसी न किसी बहाने उनपर लाठियां चलाई जाती हैं. मुझे लगता है इस बार युवा इन बातों को ध्यान में रखकर ही वोटिंग करेंगे.''
वहीं, राजनीतिक समीक्षक समीर सौरभ इस विषय पर कहते हैं, "अगर लोगों ने जातीय समीकरण को देखने की जगह बेरोजगारी या पलायन के मुद्दे पर वोट किया होता, तो बीते पांच सालों में आंशिक सुधार ही सही लेकिन कुछ तो देखने को मिलता.''
नीतीश कुमार की दुर्लभ राजनीति
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बार बार गठबंधन बदलने में शायद ही कोई मुकाबला हो. वो 17 सालों में पांच बार गठबंधन बदल चुके हैं.
'इंडिया' गठबंधन में भूमिका
2024 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्ष ने जो 'इंडिया' गठबंधन बनाया था, नीतीश कुमार की उसमें अहम भूमिका रही. उनकी पार्टी के कई नेताओं की मांग थी कि उन्हें गठबंधन का संयोजक बनाया जाए. महीनों की खींचतान के बाद जनवरी, 2024 में उन्हें संयोजक बनाने की घोषणा कर दी गई, लेकिन उन्होंने पद ठुकरा दिया.
इमरजेंसी से शुरुआत
नीतीश कुमार ने राजनीति में शुरुआत इमरजेंसी का विरोध करने के लिए कई दलों के साथ आने से बनी जनता पार्टी से की थी. बाद में जब जनता पार्टी के टूटने से कई दल बने तो इन टूटे दलों में से कुछ ने मिल कर बनाई जनता दल और कुमार इसमें शामिल हो गए. 1985 में वो जनता दल से ही पहली बार विधायक बने.
नई पार्टी का जन्म
1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिल कर समता पार्टी की स्थापना की. 1996 में कुमार ने पहली बार बीजेपी का दामन थामा और एनडीए में शामिल हो गए. उन्होंने लोक सभा चुनावों में जीत हासिल की और वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया.
एक और नई पार्टी
2000 में कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत ना जुटा पाने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. तब भी वो बीजेपी के साथ ही थे. 2003 में उन्होंने जनता दल और समता पार्टी को मिला कर जनता दल (यूनाइटेड) की स्थापना की.
मुख्यमंत्री पद हुआ हासिल
2005 के विधान सभा चुनावों में जेडीयू के सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद पर कुमार की वापसी हुई. बीजेपी के साथ मिल कर उन्होंने बिहार में एनडीए की सरकार बनाई.
पहली बार बीजेपी से तकरार
2010 में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने फिर से चुनावों में जीत हासिल की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2012 में नरेंद्र मोदी को एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनाए जाने का कुमार ने विरोध किया और 2013 में उन्होंने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया.
पुराने प्रतिद्वंदी से मिलाया हाथ
जनता परिवार में कभी नीतीश कुमार के सहयोगी रहे लालू यादव बाद में अपनी पार्टी आरजेडी बना कर कुमार के प्रतिद्वंदी बन गए थे. लेकिन 2015 में जब एनडीए से अलग हो जाने के बाद कुमार को सत्ता पाने के लिए नए साझेदार की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने करीब 25 साल से उनके प्रतिद्वंदी रहे लालू यादव से हाथ मिला लिया. जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिल कर महागठबंधन की रचना की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए.
एनडीए में वापसी
यह महागठबंधन सिर्फ दो सालों तक चल सका. 2017 में कुमार ने आरजेडी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए महागठबंधन को अलविदा कह दिया और एक बार फिर बीजेपी का हाथ थाम कर मुख्यमंत्री बन गए. 2020 के विधान सभा चुनावों में इसी गठबंधन की फिर से जीत हुई.
महागठबंधन में 'वापसी'
अगस्त 2022 में कुमार ने 2017 के घटनाक्रम को दोहरा दिया, लेकिन इस बार मुख्य किरदारों की भूमिका बदल गई थी. 2017 में वो कार्यकाल के बीच में महागठबंधन छोड़ कर एनडीए में चले गए थे, लेकिन 2022 में उन्होंने कार्यकाल के बीच में ही एनडीए को छोड़ कर फिर से महागठबंधन का दामन थाम लिया.
कहीं अन्य मुद्दे गौण न हो जाएं
बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों ही प्रमुख गठबंधन पूरी एकता का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन उनका आपसी विरोधाभास भी समय-समय पर जाहिर हो रहा है. साथ ही, दोनों गठबंधनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका है.
राहुल गांधी ने एक जनसभा में कह दिया कि नरेंद्र मोदी वोट के लिए मंच पर डांस भी कर सकते हैं. प्रत्यारोप में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि डांस की संस्कृति राहुल गांधी के परिवार से जुड़ी है. राहुल गांधी ने छठ महापर्व पर भी मोदी द्वारा ड्रामा किए जाने की बात कही. इसके बाद छठ पर राजनीति तेज हो गई.
पीएम मोदी ने मुजफ्फरपुर की जनसभा में कहा कि छठ बिहार और देश का गौरव है, लेकिन राजद और कांग्रेस के नेता छठ पर व्रत करने वाली मां-बहनों का अपमान कर रहे हैं. लालू प्रसाद यादव के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव ने भी राहुल पर तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी को क्या पता कि छठ क्या होता है, "जो बार-बार विदेश भाग जाता है, वह छठ क्या जाने." राजनीतिक दलों के बीच हो रहे आरोप-प्रत्यारोप पर समीर सौरभ कहते हैं, ‘‘इस बार भ्रष्टाचार, विकास, लॉ एंड ऑर्डर, एसआईआर, महिला सशक्तिकरण पर भी खासी चर्चा हो रही है, यह अच्छी बात है. किंतु, ध्यान रखा जाना चाहिए कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की आड़ में ये मुद्दे कहीं गौण न पड़ जाए.''
नौकरी व रोजगार पर वादों की बहार
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एनडीए ने 31 अक्टूबर को अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया. इसमें 25 घोषणाएं की गई हैं. इनमें किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों के लिए रेवड़ियां तो हैं ही, नौकरी-रोजगार के उपक्रम की सर्वाधिक चर्चा भी है. इसमें एक करोड़ सरकारी नौकरी-रोजगार, हर जिले में मेगा स्किल सेंटर, प्रत्येक जिले में फैक्ट्री व 10 नए औद्योगिक पार्कों का निर्माण, 100 एमएसएमई पार्क व 50,000 से अधिक कुटीर उद्यम, सेमी कंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग पार्क की स्थापना व महिला रोजगार योजना से महिलाओं को दो लाख तक की सहायता राशि देने की बातें कही गई हैं.
इसी तरह महागठबंधन ने 'तेजस्वी का प्रण' नाम से जारी घोषणा पत्र में महिलाओं, किसानों तथा अन्य वर्गों के अलावा खासतौर पर युवा वोटरों को साधने के उद्देश्य से एक बार फिर नौकरी के अपने पुराने वादे को ही दोहराया है. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दस लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. इस बार इससे एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने 20 महीने में हर घर में एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी का वादा किया है.
अर्थशास्त्र के अवकाश प्राप्त व्याख्याता अविनाश के.पांडेय कहते हैं, ‘‘इस बार के चुनाव में युवा मतदाताओं की संख्या करीब 1.63 करोड़ है. ये 18 से 35 साल के आयुवर्ग में हैं. इनके लिए नौकरी अहम मुद्दा है. तेजस्वी यादव ने जिस तरह से घोषणा की है, उस तरह तो करीब 2.8 करोड़ सरकारी नौकरी उन्हें देनी होंगी. इसके लिए इतनी भारी संख्या में नौकरी और वेतन की राशि कहां से लाएंगे, यह तो यक्ष प्रश्न ही है.''
राजनीतिक विश्लेषक रेखांकित करते हैं कि चुनावी घोषणाएं जनता को लुभाती तो हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझने की जरूरत है कि क्या ये संभव हैं और अतीत का रिकॉर्ड क्या बताता है.
प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं सबीना कहती हैं, ‘‘सरकारी नौकरी के लिए बिहार में होने वाली परीक्षाओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा नहीं है. पेपर लीक, समय पर रिजल्ट नहीं निकलना तो आम बात है. जब अभ्यर्थी इसका विरोध करते हैं, तो किसी न किसी बहाने उनपर लाठियां चलाई जाती हैं. मुझे लगता है इस बार युवा इन बातों को ध्यान में रखकर ही वोटिंग करेंगे.''
वहीं, राजनीतिक समीक्षक समीर सौरभ इस विषय पर कहते हैं, "अगर लोगों ने जातीय समीकरण को देखने की जगह बेरोजगारी या पलायन के मुद्दे पर वोट किया होता, तो बीते पांच सालों में आंशिक सुधार ही सही लेकिन कुछ तो देखने को मिलता.''
नीतीश कुमार की दुर्लभ राजनीति
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बार बार गठबंधन बदलने में शायद ही कोई मुकाबला हो. वो 17 सालों में पांच बार गठबंधन बदल चुके हैं.
'इंडिया' गठबंधन में भूमिका
2024 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्ष ने जो 'इंडिया' गठबंधन बनाया था, नीतीश कुमार की उसमें अहम भूमिका रही. उनकी पार्टी के कई नेताओं की मांग थी कि उन्हें गठबंधन का संयोजक बनाया जाए. महीनों की खींचतान के बाद जनवरी, 2024 में उन्हें संयोजक बनाने की घोषणा कर दी गई, लेकिन उन्होंने पद ठुकरा दिया.
नीतीश कुमार ने राजनीति में शुरुआत इमरजेंसी का विरोध करने के लिए कई दलों के साथ आने से बनी जनता पार्टी से की थी. बाद में जब जनता पार्टी के टूटने से कई दल बने तो इन टूटे दलों में से कुछ ने मिल कर बनाई जनता दल और कुमार इसमें शामिल हो गए. 1985 में वो जनता दल से ही पहली बार विधायक बने.
1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिल कर समता पार्टी की स्थापना की. 1996 में कुमार ने पहली बार बीजेपी का दामन थामा और एनडीए में शामिल हो गए. उन्होंने लोक सभा चुनावों में जीत हासिल की और वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया.
2000 में कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत ना जुटा पाने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. तब भी वो बीजेपी के साथ ही थे. 2003 में उन्होंने जनता दल और समता पार्टी को मिला कर जनता दल (यूनाइटेड) की स्थापना की.
2005 के विधान सभा चुनावों में जेडीयू के सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद पर कुमार की वापसी हुई. बीजेपी के साथ मिल कर उन्होंने बिहार में एनडीए की सरकार बनाई.
2010 में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने फिर से चुनावों में जीत हासिल की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2012 में नरेंद्र मोदी को एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनाए जाने का कुमार ने विरोध किया और 2013 में उन्होंने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया.
पुराने प्रतिद्वंदी से मिलाया हाथ
जनता परिवार में कभी नीतीश कुमार के सहयोगी रहे लालू यादव बाद में अपनी पार्टी आरजेडी बना कर कुमार के प्रतिद्वंदी बन गए थे. लेकिन 2015 में जब एनडीए से अलग हो जाने के बाद कुमार को सत्ता पाने के लिए नए साझेदार की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने करीब 25 साल से उनके प्रतिद्वंदी रहे लालू यादव से हाथ मिला लिया. जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिल कर महागठबंधन की रचना की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए.
एनडीए में वापसी
यह महागठबंधन सिर्फ दो सालों तक चल सका. 2017 में कुमार ने आरजेडी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए महागठबंधन को अलविदा कह दिया और एक बार फिर बीजेपी का हाथ थाम कर मुख्यमंत्री बन गए. 2020 के विधान सभा चुनावों में इसी गठबंधन की फिर से जीत हुई.
महागठबंधन में 'वापसी'
अगस्त 2022 में कुमार ने 2017 के घटनाक्रम को दोहरा दिया, लेकिन इस बार मुख्य किरदारों की भूमिका बदल गई थी. 2017 में वो कार्यकाल के बीच में महागठबंधन छोड़ कर एनडीए में चले गए थे, लेकिन 2022 में उन्होंने कार्यकाल के बीच में ही एनडीए को छोड़ कर फिर से महागठबंधन का दामन थाम लिया.
कहीं अन्य मुद्दे गौण न हो जाएं
बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों ही प्रमुख गठबंधन पूरी एकता का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन उनका आपसी विरोधाभास भी समय-समय पर जाहिर हो रहा है. साथ ही, दोनों गठबंधनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो चुका है.
राहुल गांधी ने एक जनसभा में कह दिया कि नरेंद्र मोदी वोट के लिए मंच पर डांस भी कर सकते हैं. प्रत्यारोप में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि डांस की संस्कृति राहुल गांधी के परिवार से जुड़ी है. राहुल गांधी ने छठ महापर्व पर भी मोदी द्वारा ड्रामा किए जाने की बात कही. इसके बाद छठ पर राजनीति तेज हो गई.
पीएम मोदी ने मुजफ्फरपुर की जनसभा में कहा कि छठ बिहार और देश का गौरव है, लेकिन राजद और कांग्रेस के नेता छठ पर व्रत करने वाली मां-बहनों का अपमान कर रहे हैं. लालू प्रसाद यादव के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव ने भी राहुल पर तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी को क्या पता कि छठ क्या होता है, "जो बार-बार विदेश भाग जाता है, वह छठ क्या जाने." राजनीतिक दलों के बीच हो रहे आरोप-प्रत्यारोप पर समीर सौरभ कहते हैं, ‘‘इस बार भ्रष्टाचार, विकास, लॉ एंड ऑर्डर, एसआईआर, महिला सशक्तिकरण पर भी खासी चर्चा हो रही है, यह अच्छी बात है. किंतु, ध्यान रखा जाना चाहिए कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की आड़ में ये मुद्दे कहीं गौण न पड़ जाए.''
राजनीतिक हत्याओं का क्रम भी शुरू
30 अक्टूबर को पटना जिले के मोकामा विधानसभा क्षेत्र में 'बाहुबली' से नेता बने जनसुराज पार्टी के समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई. हत्या उस समय हुई, जब वे प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के साथ चुनाव प्रचार कर रहे थे. हत्या का आरोप जेडीयू के प्रत्याशी व 'बाहुबली' अनंत सिंह के समर्थकों पर लगा है.
इसी दिन देर रात आरा में एनडीए के घटक दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के समर्थक पिता-पुत्र की हत्या कर दी गई. 31 अक्टूबर को पंडारक में मोकामा से ही आरजेडी प्रत्याशी व 'बाहुबली' सूरजभान की पत्नी वीणा देवी के काफिले पर पथराव किया गया. इन घटनाओं पर सौरभ कहते हैं, ‘‘अब तो राजनीतिक हत्याओं का क्रम भी शुरू हो गया है. इसे जातीय रंग देने की कोशिश होगी. जाहिर है, इसका असर चुनाव पर भी पड़ेगा. 'बाहुबली' नेताओं को प्रचार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए''
नीतीश कुमार की दुर्लभ राजनीति
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बार बार गठबंधन बदलने में शायद ही कोई मुकाबला हो. वो 17 सालों में पांच बार गठबंधन बदल चुके हैं.
'इंडिया' गठबंधन में भूमिका
2024 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्ष ने जो 'इंडिया' गठबंधन बनाया था, नीतीश कुमार की उसमें अहम भूमिका रही. उनकी पार्टी के कई नेताओं की मांग थी कि उन्हें गठबंधन का संयोजक बनाया जाए. महीनों की खींचतान के बाद जनवरी, 2024 में उन्हें संयोजक बनाने की घोषणा कर दी गई, लेकिन उन्होंने पद ठुकरा दिया.
इमरजेंसी से शुरुआत
नीतीश कुमार ने राजनीति में शुरुआत इमरजेंसी का विरोध करने के लिए कई दलों के साथ आने से बनी जनता पार्टी से की थी. बाद में जब जनता पार्टी के टूटने से कई दल बने तो इन टूटे दलों में से कुछ ने मिल कर बनाई जनता दल और कुमार इसमें शामिल हो गए. 1985 में वो जनता दल से ही पहली बार विधायक बने.
1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिल कर समता पार्टी की स्थापना की. 1996 में कुमार ने पहली बार बीजेपी का दामन थामा और एनडीए में शामिल हो गए. उन्होंने लोक सभा चुनावों में जीत हासिल की और वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया.
2000 में कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन बहुमत ना जुटा पाने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. तब भी वो बीजेपी के साथ ही थे. 2003 में उन्होंने जनता दल और समता पार्टी को मिला कर जनता दल (यूनाइटेड) की स्थापना की.
मुख्यमंत्री पद हुआ हासिल
2005 के विधान सभा चुनावों में जेडीयू के सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद पर कुमार की वापसी हुई. बीजेपी के साथ मिल कर उन्होंने बिहार में एनडीए की सरकार बनाई.
2010 में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने फिर से चुनावों में जीत हासिल की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2012 में नरेंद्र मोदी को एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनाए जाने का कुमार ने विरोध किया और 2013 में उन्होंने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया.
जनता परिवार में कभी नीतीश कुमार के सहयोगी रहे लालू यादव बाद में अपनी पार्टी आरजेडी बना कर कुमार के प्रतिद्वंदी बन गए थे. लेकिन 2015 में जब एनडीए से अलग हो जाने के बाद कुमार को सत्ता पाने के लिए नए साझेदार की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने करीब 25 साल से उनके प्रतिद्वंदी रहे लालू यादव से हाथ मिला लिया. जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिल कर महागठबंधन की रचना की और कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए.
यह महागठबंधन सिर्फ दो सालों तक चल सका. 2017 में कुमार ने आरजेडी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए महागठबंधन को अलविदा कह दिया और एक बार फिर बीजेपी का हाथ थाम कर मुख्यमंत्री बन गए. 2020 के विधान सभा चुनावों में इसी गठबंधन की फिर से जीत हुई.
महागठबंधन में 'वापसी'
अगस्त 2022 में कुमार ने 2017 के घटनाक्रम को दोहरा दिया, लेकिन इस बार मुख्य किरदारों की भूमिका बदल गई थी. 2017 में वो कार्यकाल के बीच में महागठबंधन छोड़ कर एनडीए में चले गए थे, लेकिन 2022 में उन्होंने कार्यकाल के बीच में ही एनडीए को छोड़ कर फिर से महागठबंधन का दामन थाम लिया.


