विचार / लेख
-तपेश झा
आँकड़ों का आईना: और. हमारी अपनी ‘सोच’? ‘खूंखार हाथी का आतंक, एक और व्यक्ति की कुचलकर मौत!’
ये पढ़ते सुनते ही, सबके मन में एक सिहरन दौड़ जाती है। गुस्सा आता है, डर लगता है और जितना ज्यादा ज्यादा इस तरह के समाचार सामने आते जाते हैं उतना ही हाथी और वन्य प्राणियों के लिए एक पूर्वाग्रह से ग्रसित खराब माहौल बनने लग जाता है। यह माहौल कुछ इस कदर बन गया है थोड़ा रुक कर आंकड़ों को थोड़ा दूसरे ढंग से देखने की तथ्यात्मक ढंग से देखने की कोशिश भी नहीं हो रही है।
पहला सच: (जो हमें दुखी करता है)
ये बिल्कुल सच है कि हाथी और इंसान का टकराव एक बड़ी समस्या है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि 2023 में, इस टकराव में हमने 606 जानें खो दीं। ओडिशा, झारखंड, बंगाल... हर जगह से दिल दुखाने वाली खबरें आती हैं। किसानों की लाखों हेक्टेयर फसलें बर्बाद होती हैं, घर टूटते हैं। ये नुकसान बहुत बड़ा है और हर एक जान कीमती है।
...लेकिन अब एक
दूसरा सच: (जो हमें चौंकाता नहीं, पर चाहिए)
ये वो आँकड़े हैं जो हमें रोज़ दिखते हैं, पर शायद हमें इनकी ‘आदत’ हो गई है।
जरा 2023 के ही इन आँकड़ों पर नजऱ डालिए:
सडक़ हादसों में मौतें: 1,72,000 से ज़्यादा! (यानी हर दिन 474 लोग!)
ट्रेन हादसों में मौतें: 24,000
हत्या (ष्टह्म्द्बद्वद्ग): 27,721
आग लगने से मौतें: 7,435
हाथी के हमले से दिन में औसतन 1 या 2 मौतें (1.7) होती हैं। और हमारी अपनी बनाई सडक़ों पर, हमारी अपनी लापरवाही से, हर दिन 474 लोग मर जाते हैं! हाथी के हमलों से 284 गुना ज़्यादा मौतें हमारी सडक़ों पर हो रही हैं!
‘हाथी का हमला’ नेशनल न्यूज़ बन जाता है, और सडक़ पर मरते 474 लोग बस एक छोटी सी खबर बनकर रह जाते हैं?
यहीं पर सारा खेल है ‘सोच’ का
सडक़ हादसा: ‘अरे यार, ये तो होता रहता है।’
अपराध: ‘दुनिया ही खराब हो गई है।’
ये सब हमारे लिए ‘स्वीकार्य’ (्रष्ष्द्गश्चह्लड्डड्ढद्यद्ग) जोखिम बन गए हैं। और कोई ताज्जुब नहीं कि इस स्वीकार्यता के चलते इन क्षेत्रों में रोज नई नई तकनीकों का इस्तेमाल करके समस्याओं के समाधान भी सहज रूप से सामने आते जा रहे हैं।।
लेकिन हाथी का हमला: ‘ये जानवर पागल हो गए हैं!’ ‘जंगल से बाहर क्यों निकलते हैं?’ ‘ये एक आपदा है!’
वन्य प्राणी के क्षेत्र के लिए मानव समाज में स्वीकार्यता का अभाव ही पहली सबसे बड़ी समस्या है। तथ्यात्मक आंकड़ों के स्वीकार्यता के इस अभाव में भावनात्मक तीव्रता हावी हो जाती है जिसके चलते आगे की सोच रुक जाती है। ना आगे कोई समाधान की दिशा में वैज्ञानिक और तकनीकी उत्कृष्ट प्रयास ही हो पाते हैं।
सबसे कड़वा सच: ‘अधिकार’ का फर्क
हम सब एकतरफा क्यों सोचते हैं? क्योंकि फर्क ‘अधिकारों’ का है।
हमारे पास, आपके पास, देश के सबसे गऱीब इंसान के पास भी ‘मौलिक अधिकार’ हैं (्रह्म्ह्लद्बष्द्यद्ग 21: जीवन का अधिकार)। हमारे पास ‘वोट’ की ताकत है। हमारी एक ‘आवाज़’ है, जिसे हम उठा सकते हैं।
उस हाथी के पास क्या है?
न कोई मौलिक अधिकार।
न कोई राजनीतिक आवाज़।
न कोई प्रतिनिधि। न कोई वोट से अपने फायदे के मोलभाव का मौका
न बोलकर बताने की क्षमता कि वो सिफऱ् अपने बच्चे को बचाने के लिए दौड़ा था, या भूख के मारे फ़सल खाने आया था। वो सिफऱ् ‘खलनायक’ है।
आत्ममंथन का सवाल...
आज जब ये सारे तथ्य सामने हैं, तो मन में यह सवाल भी उठता है कि हमारे समाज के दबे-कुचले इंसानों की आवाज बनने के लिए, उन्हें उनके हक दिलाने के लिए बाबासाहेब आंबेडकर और महात्मा गांधी जैसे नेतृत्व आए। तो कुछ कानून बने, कुछ सोच बनी, और समस्याएं सुनहरे अवसरों में बदल गई।
क्या इन बेजुबान जानवरों को... इन हाथियों को... भी अपने ‘अंबेडकर’ का इंतजार है।
कोई ऐसा, जो उनके लिए जन-आंदोलन खड़ा न भी कर सके, तो कम से कम हमारे दिमाग़ में उनके खिलाफ जो ‘नफरत’ और ‘डर’ भरा जा रहा है, उसे तो रोक सके। जो हमें बता सके कि हर कहानी का दूसरा पहलू भी होता है और फैसले ‘भावनाओं’ में बहकर नहीं, ‘तथ्यों’ के आधार पर हो तो समस्या का स्वरूप एक सहज समाधान के रूप में स्वत: स्वीकार्य हो जाता है। और फिर हल करने के रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं।
कैद-ए-हयात ओ बंद-ए-गम अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यूँ


