विचार / लेख

हम सब असामाजिक और अपारिवारिक...
31-Oct-2025 9:14 PM
हम सब असामाजिक और अपारिवारिक...

-सिद्धार्थ ताबिश

आपकी ज़्यादातर किताबें और साहित्य आपको ये सिखाते हैं कि ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’.. मगर ये बात सच्चाई से बहुत दूर है।

मनुष्य सामाजिक प्राणी नहीं है.. वो कभी नहीं रहा है.. मनुष्य सामाजिक सिर्फ ‘असुरक्षा’ की भावना के तहत होता है। जैसे ही उसकी ‘असुरक्षा’ की भावना हटती है, मनुष्य तुरंत ‘असामाजिक’ प्राणी हो जाता है। मनुष्य को अगर आप ‘सामाजिक’ प्राणी कहते हैं तो ये ऐसे ही है जैसे आप ये कहें कि ‘मनुष्य भगवान/ख़ुदा से प्रेम करता है’। नहीं मनुष्य किसी भी भगवान या ख़ुदा से प्रेम नहीं करता है.. वो ‘डरता’ है भगवान और ख़ुदा से इसलिए ‘प्रेम’ करने का नाटक करता है।

संसार में जितने भी लोग जो आर्थिक रूप से सामथ्र्य हो जाते हैं, वो सबसे पहले समाज का त्याग करते हैं.. एक व्यक्ति जो मध्यम वर्गीय परिवार में पला बढ़ा होता है, वो जैसे ही आर्थिक रूप से संपन्न होता है, और उसके भीतर से असुरक्षा की भावना कम हो जाती है, वो सबसे पहले अपना मध्यम वर्गीय समाज छोड़ के दूर चला जाता है.. फिर जब उसकी असुरक्षा की भावना और कम होती है और वो आर्थिक रूप से और सुरक्षित हो जाता है, वो संपन्न लोगों का भी समाज छोड़ कर और दूर चला जाता है.. जिनके भीतर असुरक्षा की भावना पूरी तरह से खत्म हो जाती है वो कहीं दूर जंगल या पहाड़ में जा कर अपना आशियाना बना कर वहां रहने लगते हैं और उसी समाज की खूब बुराइयां करते हैं जिनमें रहकर कभी वो स्वयं और दूसरों को ‘सामाजिक प्राणी’ साबित करते थे।

मनुष्य पारिवारिक प्राणी भी नहीं है.. वो पारिवारिक सिफऱ् इसलिए है क्योंकि बचपन से उसकी कंडीशनिंग और ट्रेनिंग हम ऐसी करते हैं.. कोई भी लडक़ा, जिसे आप ऐसे समाज में पैदा करें जहां शादी ब्याह, परिवार और जिम्मेदारी वाला माहौल नहीं होगा, वो लडक़ा एक ‘अपारिवारिक’ लडक़ा ही बनेगा.. प्राकृतिक रूप से हम सब असामाजिक और अपारिवारिक ही हैं.. समाज और परिवार प्रकृति ने नहीं बनाया है और ये हमारा मूल स्वभाव नहीं है

हम दूसरे जानवरों और दूसरी नस्लों द्वारा मार दिए जाते थे इसलिए हमने गुट में और कबीले में रहना शुरू किया। असुरक्षा की भावना ने हमें एकजुट किया और हमने समाज बना कर स्वयं को सामाजिक कहना शुरू किया। भीड़ बनाकर रहने को हमने ‘सामाजिक’ कहना शुरू कर दिया जबकि भीड़ कोई समाज नहीं होती है। आपकी हर छोटी सी भीड़ में हज़ारों समाज रहते हैं। कोई हिंदू, कोई मुस्लिम, कोई दलित, कोई पंडित, कोई अंसारी, कोई सैय्यद, फिर कोई लखनवी, कोई बरेलवी, कोई आर्यसमाजी, कोई राधास्वामी कोई कुछ और कुछ और सब एक दूसरे से भिन्न समाज में रहने का दावा करते हैं और सब एक दूसरे को नापसंद करते हैं। जितना मनुष्य एक दूसरे को नापसंद करते हैं उतना दुनिया का कोई भी अन्य प्राणी एक दूसरे को नहीं करता है.. सामाजिक प्राणी एक दूसरे को नापसंद नहीं करते हैं। जो भी प्राणी झुंड में रहते हैं वो कभी एक दूसरे को नापसंद नहीं करते हैं।

मनुष्य द्वारा बनाया गया समाज ‘मजबूरी’वाला समाज है.. तभी मौका मिलते ही हिंदू अपना नया समाज बनाने लगता है, मुस्लिम अपना, सिख अपना, वीगन अपना, मांसाहारी अपना, शाकाहारी अपना। यहां तक कि सलमान खान को पसंद करने वालों का अपना समाज है और अमिताभ बच्चन को पसंद करने वालों का अपना.. कभी भेडिय़ों के झुंड में हिरन पसंद करने वाले भेडि़ए खरगोश का मांस पसंद करने वाले भेडिय़ों से नफऱत नहीं करते हैं.. क्योंकि वो प्राकृतिक रूप से पारिवारिक प्राणी हैं।

प्राकृतिक रूप से मनुष्य एकाकी जीव है.. उसे जब भी शांति और स्वयं की तलाश की चाह होती है, अकेले में जाना होता है.. उसे जब भी कुछ नया खोजना होता है, अकेले में जाना होता है.. उसे जब भी कुछ रचनात्मक करना होता है, अकेले में जा कर करना होता है.. भीड़ में मनुष्य कुछ भी नहीं कर पाता है सिवाय युद्ध, मुंडन, जगराता, ईद, होली दिवाली के.. और ये सब कुछ भी प्राकृतिक नहीं है, समाज द्वारा प्रायोजित चीज़ें हैं.. मनुष्यों की भीड़ अगर कोई वैज्ञानिक खोज कर पाती कभी या स्वयं के लिए शांति पा पाती, तब उसे सामाजिक प्राणी कहा जा सकता था। प्राकृतिक रूप से मनुष्य नितांत एकाकी जीव है। सामाजिक वो बस असुरक्षा की भावना की वजह से है।


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