विचार / लेख

रवीन्द्रनाथ ठाकुर परिवार में खुदकुशी की कहानी
28-Oct-2025 8:43 PM
रवीन्द्रनाथ ठाकुर परिवार में खुदकुशी की कहानी

-अमनदीप गुजराल

5 जुलाई 1859 को जन्मी कादम्बरी देवी का ब्याह रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ के साथ हुआ। तब वे सिफऱ् नौ वर्ष की थीं और उनके पति उन्नीस वर्ष के। कादम्बरी देवी को रवीन्द्रनाथ नोतुन बोउठान कहते थे। वय में वे कादम्बरी देवी से दो साल छोटे रवीन्द्रनाथ उनके बचपन के संगी रहे। कहते हैं बड़े घरों के बहुत उलझे हुए रिश्ते रहे हैं।

महज 25 वर्ष की उम्र में कादम्बरी देवी ने आत्महत्या कर ली। उस समय रवीन्द्रनाथ के विवाह को मात्र चार महीने ही बीते थे। जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या उनके विवाह ने कादम्बरी और रवीन्द्रनाथ के बीच के संबंधों को प्रभावित किया था? कहा जाता है कि जो सुसाइड नोट कादम्बरी देवी ने लिखा उसको उनके ससुर, ठाकुर परिवार के मुखिया महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर की आज्ञानुसार मिटा दिया गया। यह उपन्यास इस रहस्य को उजागर करने का प्रयास करता है कि ऐसा क्या था उस पत्र में, क्यों इस साक्ष्य को मिटा देना आवश्यक समझा गया?

कादम्बरी देवी के पिता ठाकुरबाड़ी के बाजार-सरकार अर्थात हाट-बाजार करने वाले श्याम गांगुली थे। कादम्बरी देवी उनकी तीन नम्बर की कन्या थीं। वे रोज अपने पिता को अपमानित होते देखतीं, दु:खी होतीं। उनकी माँ हालांकि नहीं चाहती थीं कि जुलाई महीने में जन्मी कादम्बरी देवी का विवाह भी उसी महीने यानी कि जुलाई में हो। किन्तु 5 जुलाई 1868 के दिन, नौ वर्ष की उम्र में कादम्बरी देवी का विवाह उन्नीस वर्षीय ज्योतिरिन्द्रनाथ के साथ हुआ।

उपन्यास इस कल्पना पर आधारित है, कि कादम्बरी देवी और युवा रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बीच भावनात्मक निकटता होने के साथ-साथ दोनों में गहरे साहित्यिक, बौद्धिक और आत्मिक संबंध थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनात्मकता की प्रेरणा-स्रोत तो थी ही साथ ही कादम्बरी देवी, रवीन्द्रनाथ की पहली पाठिका, प्रशंसिका और आलोचक भी थीं।

सत्रह बरस एक दूसरे के अभिन्न मित्र रहे थे कादम्बरी देवी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर। जब रवीन्द्रनाथ का विवाह मृणालिनी देवी से होता है, तो कादम्बरी देवी अचानक अकेली और उपेक्षित महसूस करती हैं। यह विवाह उनकी दुनिया को बेतरह झकझोर देता है, और उनके भीतर एक अंतर्द्वंद्व और खालीपन पैदा होता है। परिवार के सदस्यों द्वारा हमेशा से उपेक्षा की शिकार रही कादम्बरी देवी का अनायास ही अपने अभिन्न मित्र की प्राथमिकता सूची से गायब हो जाना उन्हें अवसाद की ओर ढकेल देता है।

रंजन बंद्योपाध्याय द्वारा रचित और शुभ्रा उपाध्याय द्वारा अनूदित, ‘कादम्बरी देवी का सुसाइड नोट’ उपन्यास तथ्य और कल्पना की सीमाओं के मध्य खड़े रह कर 19वीं सदी के बंगाल की सामाजिक संरचना, प्रतिष्ठित साहित्यिक परिवार में स्त्री की स्थिति और एक त्रासद प्रेमकथा को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास की भाषा-शैली, प्रतीकात्मकता और संवादों में गहन भावनात्मकता और साहित्यिक सौंदर्य निहित है।

कादम्बरी देवी की मन की असीम पीड़ा, मानसिक व्यथा, और उनकी दबी हुई इच्छाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति लेखक ने गहन आत्मसंवादों और विचारों के माध्यम से की है। कादम्बरी देवी की यात्रा में, उनकी पीड़ा में पाठक उनका सहभागी बन जाता है।

ठाकुर परिवार जैसे प्रतिष्ठित परिवार में महिलाओं की स्थिति, 19वीं सदी के उत्तरार्ध के बंगाल नवजागरण के सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, पितृसत्तात्मक ढाँचे को उजागर करती यह कृति समाज के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने को प्रेरित करती है। उसकी प्रासंगिकता में कहीं कोई कमी नजऱ नहीं आती।

एक स्त्री के अकेलेपन की पीड़ा, दमित इच्छाओं, अनकहे प्रेम और सामाजिक बेडिय़ों के कारण पैदा हुए अवसाद को उपन्यासकार कादम्बरी देवी के नष्ट कर दिए गए सुसाइड नोट की कल्पना के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यह उपन्यास न तो पूरी तरह तथ्यात्मक, न ही काल्पनिक अपितु इतिहास और कल्पना की सीमाओं के बीच खड़ा है। इस उपन्यास का कथ्य ऐतिहासिक सन्दर्भो और मनोविश्लेषण पर आधारित है जो कादम्बरी देवी की आत्महत्या के कारणों की जाँच करने के साथ उसके पीछे छिपी भावनात्मक, पारिवारिक और सामाजिक जटिलताओं की भी पड़ताल करता है।


अन्य पोस्ट