विचार / लेख

किताबें जलाने की जरूरत नहीं, बस...
27-Oct-2025 9:46 PM
किताबें जलाने की जरूरत नहीं, बस...

-अशोक पांडे

‘हमें अकेला छोड़ दिए जाने की ज़रूरत नहीं है। कभी-कभार हमें सचमुच झकझोर दिया जाना चाहिए। याद करो आखिऱी दफा ऐसा कब हुआ था जब तुम किसी बात से सचमुच परेशान हुए थे? किसी ज़रूरी बात से – किसी असल बात से?’

यह पंक्ति रे ब्रैडबरी के उपन्यास फारेनहाइट 451 में एक जगह आती है। 1953 में छपी इस किताब में भविष्य के एक ऐसे समाज की कल्पना है जिसमें किताबें पढऩा जुर्म बन चुका है। सरकार ने नागरिकों के सोचने की ताकत पर काबू कर लिया है। अनवरत चलने वाले मनोरंजन और लगातार बदलती, विकसित होती टेक्नोलॉजी ने लोगों को इस कदर सुन्न बना दिया है कि वे न सवाल पूछते हैं, न किसी बारे में बात करते हैं।

सरकार ने बहुत सारे फायरमैन नियुक्त किये हैं जो आग बुझाने का काम नहीं करते। उल्टे उन्हें जहां भी किताबों के होने की खबर लगती है, वे वहां पहुँच कर किताबों को जला डालते हैं। उन्हें सुनिश्चित करना है कि कैसा भी ज्ञान या चेतना किसी भी नागरिक तक न पहुँच सके।

मॉन्टैग एक ऐसा ही फायरमैन है। वह अपना काम पूरी निष्ठा से करता है। एक दफ़ा उसकी मुलाक़ात पड़ोस में रहने वाली एक सादा और ईमानदार लडक़ी क्लैरिस से होती है। दोनों दोस्त बन जाते हैं। कुछ समय बाद लडक़ी उससे पूछती है, ‘क्या तुम वाकई खुश हो?’

यह इकलौता सवाल मॉन्टैग को भीतर तक उद्वेलित कर देता है। धीरे-धीरे उसकी समझ में आता है कि किताबें में सिर्फ शब्द नहीं होते। कि वे इंसान के तजुर्बों की परछाइयां होती हैं।

फिर एक बार एक घटना घटती है - वह एक बूढ़ी औरत को अपनी किताबों के साथ जलते हुए देखता है। इस त्रासद घटना के बाद वह पूरी तरह रूपांतरित हो जाता है – उसे पूरी तरह समझ में आ जाता है कि विचारों को जलाना किसी कीमत पर मुमकिन नहीं। अब वह खुद सरकार की परिभाषा के हिसाब से अपराधी बन जाता है - यानी किताबें छिपाकर पढऩे लगता है।

किताब का शीर्षक 451 डिग्री के उस तापमान से सम्बद्ध है जिस पर कागज़ अपने आप जलने लगता है। कुल डेढ़ सौ पन्नों की यह छोटी सी किताब एक ज़रूरी चेतावनी सरीखी है कि जब भी कोई सभ्यता मशीनों और मनोरंजन की अंधी दौड़ में लिखने-पढऩे से दूर हो जाती है, उसकी आत्मा में घुन लग जाता है।

उपन्यास में एक जगह रे ब्रैडबरी लिखते हैं, ‘किसी संस्कृति को नष्ट करने के लिए किताबें जलाने की जरूरत नहीं। बस इतना करना है लोगों को उन्हें पढऩा निषिद्ध करवा दो।’

समझदार के लिए इशारा काफी है!


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